Hindi Story: अधूरी प्यास-नव्या पर लगा हवस का चसका

Hindi Story: चढ़ती हुई बेल… कैसी दीवानी होती है… नयानया जोबन, अल्हड़पन, बदहवास सी, बस अपनी मस्ती में सरसराती हुई छुईमुई सी हिलोरें लेती है… जिस का सहारा मिल गया, उसी से लिपट जाती है.ऐसा ही तो नव्या के साथ हो रहा था. अभीअभी जवानी की दहलीज पर कदम रखा था मानो एक नशा सा चढ़ने लगा था. एक खुमारी सी…

आईने में खुद को कईकई बार देखना, उभरते अंगों को देख कर मुसकराना और अकेले में उभारों को हलके से छूना और मस्त हो जाना. नहीं संभाल पा रही थी वह अपनी भावनाओं को, अब तो बस वह समा जाना चाहती थी किसी की मजबूत बांहों में, जहां उस के हर अंग पर पा सके वह किसी का चुंबन और सैक्स की गहराई का मजा ले सके.‘‘नव्या, यह क्या तू हर समय आईने के सामने खड़ी रहती है… स्कूल नहीं जाना है क्या? इम्तिहान सिर पर हैं…’’

अचानक तनुजा की आवाज से नव्या चौंक गई.‘‘अरे मम्मी, जा रही हूं न. चोटी कर रही थी…’’ नव्या ने कहा और आईने में अपने उभारों को देख कर मुसकराती हुई यूनिफार्म की कमीज ठीक करने लगी.‘‘चल, जल्दी कर. तेरी फ्रैंड बुला रही है,’’ तनुजा ने लंच बौक्स उस के स्कूल बैग में रखते हुए कहा.‘‘ओके, बाय मम्मी. लव यू…’’ तनुजा को गाल पर किस करते हुए नव्या ने कहा और बैग उठा कर बाहर भाग गई.‘‘यह लड़की भी न, घोड़े पर सवार रहती है,’’ तनुजा बोली और काम में लग गई.

‘‘वाह यार, आज तो तू झकास लग रही है… फेशियल किया है क्या?’’ नव्या की फ्रैंड सुहानी ने उस के दमकते हुए चेहरे को देखते हुए कहा.‘‘नहीं तो, यह तो नैचुरल ग्लो है,’’ नव्या ने इतराते हुए कहा.‘‘आज तो देखना कि विपुल सर तुझे ही ताड़ेंगे. नजरें नहीं हटेंगी उन की तुझ पर से. क्या इरादा है नव्या मैडम…’’ सुहानी ने आंख मारते हुए कहा.‘‘अरे यार, अपने ऐसे नसीब कहां…

मैं तो कब से उन्हें लाइन दे रही हूं, लेकिन वे तो भाव ही नहीं देते. काश, एक बार नजरें इनायत कर लें इस बंदी पर तो लाइफ बन जाए यार,’’ नव्या ने आह भरते हुए कहा और दोनों हंस पड़ीं.‘‘अरे, देख तो यह सिम्मी किस के साथ आई है… चलचल देखते हैं कौन है यह बंदा…’’ स्कूल के सामने एक क्लासमेट को किसी लड़के की बाइक से उतरते देख कर सुहानी बोली.‘‘इस की तो…

चल देखते हैं,’’ नव्या ने खीजते हुए कहा.‘हाय सिम्मी…’ दोनों ने पास पहुंच कर एकसाथ कहा.‘‘हाय फ्रैंड्स, यह है मेरा कजिन वासु. और वासु, ये मेरी फ्रैंड्स हैं नव्या और सुहानी,’’ सिम्मी ने उन्हें आपस में मिलवाया.‘‘हैलो, प्रिटी गर्ल्स,’’ वासु ने सनग्लासेस को बालों पर चढ़ाते हुए कहा.‘‘हैलो,’’ नव्या ने कहा और दावत देती हुई निगाहों से उस की आंखों में देखा, जवाब में वासु ने भी पलकें झपका कर मानो उस का आमंत्रण कबूल किया.‘‘चलोचलो, क्लास शुरू हो जाएगी.

ओके वासु, बायबाय… ऐंड थैंक्यू, तुम नहीं आते तो आज मैं लेट हो जाती,’’ सिम्मी ने कहा.‘‘ओके, बायबाय,’’ वासु ने बाइक स्टार्ट करते हुए कहा और चला गया.नव्या उसे जाते हुए देख रही थी कि सुहानी उस को खींचते हुए स्कूल के अंदर ले गई.क्लास चल रही थी. सभी लड़कियां नोट्स लिखने में मगन थीं, लेकिन नव्या की आंखों के सामने वासु का चेहरा घूम रहा था.‘‘नव्या चौधरी…’’ तभी टीचर की आवाज से वह सहम गई. उसे लगा कि उस की चोरी पकड़ी गई है.‘‘जी मैडम,’’

नव्या अपनी जगह पर खड़े होते हुए बोली.‘‘ध्यान कहां है तुम्हारा? बताओ, क्या पढ़ा रही हूं मैं?’’ टीचर ने गुस्से से तमतमा कर कहा.‘‘मैडम… वह… ये… आप…’’ नव्या कुछ बता नहीं पाई.‘‘चुप रहो, मुझे पता है कि तुम्हारा ध्यान नहीं था. एग्जाम टाइम में यह हाल है, बैठो और अब फोकस करो,’’ टीचर ने हिदायत दी.‘‘जी मैडम,’’ कह कर नव्या बैठ गई. अगला पीरियड विपुल सर का था.

वे बिजनैस एडमिनिस्ट्रेशन पढ़ाते थे. नव्या अब उन के आने का बेसब्री से इंतजार करने लगी.‘‘नव्या, विपुल सर आने वाले हैं,’’ सुहानी ने चुटकी ली.‘‘हां यार, मुझे पता है,’’ बालों को झटकते हुए नव्या बोली.‘‘गुड मौर्निंग गर्ल्स…’’ विपुल सर की आवाज सुनते ही नव्या के कानों में सीटियां बजने लगीं. शरीर को एकदम टाइट कर के, पैर पर पैर चढ़ा कर वह ऐसे बैठी, जिस से स्कर्ट से उस की दूधिया और मांसल जांघें साफ नजर आ रही थीं.विपुल सर की निगाहें एक बार उन्हीं पर जा टिकीं, लेकिन जल्दी ही उन्होंने खुद पर काबू करते हुए पढ़ाना शुरू कर दिया.नव्या का बारबार पहलू बदलना, जांघों को हाईलाइट करना, विपुल सर को खुला आमंत्रण लगा. उन्होंने भी क्लास खत्म होने के बाद नव्या को बुलाया.

नव्या की तो धड़कनें आपे से बाहर हो गईं. वह सर के पास पहुंच कर बोली, ‘‘जी सर?’’‘‘नव्या, तुम्हें कोई प्रौब्लम तो नहीं आ रही है न? अगर कोई कंफ्यूजन हो तो तुम मेरे घर आ सकती हो. मैं तुम्हारे सारे डाउट क्लियर कर दूंगा. अगर तुम चाहो तो…’’ सर ने न्योता देने के अंदाज में कहा. नव्या तो यही चाहती थी. उस ने तपाक से कहा, ‘‘सर, मैं कब आप के घर आ सकती हूं?’’

‘‘आज शाम को ही, स्कूल के बाद.’’‘‘सर, आज तो मुश्किल होगी, क्योंकि मम्मी को बता कर नहीं आई हूं. कल शाम को आऊं क्या?’’ नव्या ने पूछा.‘‘देखो नव्या, ऐसा है कि डाउट जितनी जल्दी क्लियर हो जाए तो अच्छा है. आज मेरी वाइफ भी घर पर नहीं रहेगी तो अकेले में मैं तुम्हें बहुत अच्छे से समझा पाऊंगा. समझ गई न तुम…’’ विपुल सर ने उस के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.

विपुल सर का हाथ लगते ही नव्या के तनबदन में जैसे चिनगारियां फूटने लगीं, सांसें तेज और गरम हो गईं, गाल दहकने लगे. अब तो जैसे उस का खुद पर काबू पाना मुश्किल हो गया.नव्या ने मन ही मन सोचा, ‘मम्मी को तो कुछ भी बहाना सुना दूंगी, लेकिन आज का यह मौका हाथ से नहीं जाने दूंगी.’वह बोली, ‘‘ठीक है सर, मैं आज ही आती हूं आप के घर. सुहानी से बोल दूंगी कि वह मेरी मम्मी से कह दे कि वीक स्टूडैंट्स की ऐक्स्ट्रा क्लास है.’’‘‘तो तुम मेरे साथ ही चलना.

मैं गाड़ी से अकेले ही तो जाता हूं,’’ विपुल सर ने कहा.‘‘ओके सर,’’ नव्या बोली.‘‘तो शाम को स्कूल के गेट से निकल कर जो पीसीओ है, वहां से मैं तुम्हें पिक करूंगा. ठीक है?’’ विपुल सर ने फिर नव्या का कंधा दबाया और हाथ को पीठ पर फेरते हुए कहा.नव्या का शरीर कड़क हो गया. मुंह से बस इतना ही निकला, ‘‘ओके सर.’’नव्या जल्दी से सुहानी के पास पहुंची और बोली, ‘‘सुन, विपुल सर ने आज मुझे डाउट क्लियर करने के लिए घर बुलाया है. तू मेरी मम्मी को बता देना कि वीक स्टूडैंट्स की ऐक्स्ट्रा क्लास है, तो मैं 2 घंटे लेट हो जाऊंगी.’’

‘‘वाह रे नव्या, तेरी तो लौटरी लग गई. विपुल सर के घर… डाउट क्लियर… मौजां ही मौजां…’’ सुहानी ने नव्या को छेड़ा. नव्या ने भी उसे आंख मार दी.स्कूल के बाद नव्या धड़कते दिल से गेट के बाहर निकली. कुछ दूर चलने पर ही विपुल सर की कार दिखाई दी. नव्या कार के नजदीक पहुंची, तो सर ने आगे का गेट खोल दिया. नव्या तुरंत गाड़ी में बैठ गई.‘‘तुम रिलैक्स हो न नव्या?’’ विपुल सर ने पूछा.‘‘जी सर…’’

नव्या ने बैग पीछे रखते हुए कहा.‘‘सो स्वीट,’’

विपुल सर ने कहा और उस की जांघों को सहला दिया. नव्या का शरीर कंपकंपा गया.‘‘मैं तुम्हें बहुत दिनों से नोटिस कर रहा था,’’ विपुल सर ने कहा.‘‘क्या सर?’’

नव्या ने डर के लहजे में पूछा.‘‘क्या तुम नहीं जानती?’’ विपुल सर ने सवाल किया.

‘‘जी सर, आप मुझे बहुत अच्छे लगते हैं,’’ नव्या ने दिल खोला.

‘‘अच्छा… कितना अच्छा लगता हूं?’’ विपुल सर ने बात को आगे बढ़ाया.

‘‘सब से अच्छे, इतने अच्छे, इतने अच्छे कि ऐसा लगता है कि…’’

नव्या ने बात अधूरी छोड़ दी.‘‘कितने अच्छे, अब बता भी दो.

यहां तो कोई नहीं हम दोनों के अलावा,’’ विपुल सर ने सुलगती आग को हवा देना शुरू किया.‘‘सर…’’

कह कर नव्या ने उन की जांघों पर हाथ फेरना शुरू कर दिया. विपुल सर ने नव्या का हाथ कस कर पकड़ लिया और कहा, ‘‘तुम्हारी बेचैनी मैं समझ रहा हूं. सब्र करो, बस घर पहुंचने ही वाले हैं, फिर तुम्हारे इस प्यारे से शरीर को बहुत प्यार करूंगा.’’

‘‘ओह सर, आई लव यू सर…’’ कहते हुए नव्या ने उन के गालों को चूम लिया.गाड़ी पार्क कर के विपुल सर नव्या को घर के भीतर ले आए.

दरवाजा बंद कर दिया और पलटते ही नव्या को बांहों में भर कर उस के होंठों को अपने होंठों में भर लिया. नव्या तो पहले ही बेकाबू हो चुकी थी. उसे तो बस आज अपने शरीर की भूख मिटानी थी, जो उसे भीतर ही भीतर खा रही थी. विपुल सर ने नव्या को गोद में उठा लिया और बैडरूम में ले जा कर बिस्तर पर लिटा दिया. नव्या बदहवास हो रही थी. उस ने विपुल सर को पकड़ कर अपने शरीर पर गिरा लिया और बेतहाशा चूमने लगी. विपुल सर के हाथ उस के उभारों पर थे, जिन्हें वह कस कर भींच रहे थे. नव्या को एक मीठामीठा दर्द हो रहा था. उस की सिसकारियां निकलने लगीं.

विपुल सर को तो कोरा बदन मिला था, सो वे भी उस का पूरा मजा लेना चाहते थे. उन्होंने नव्या की कमीज उतार दी. उस के बेदाग, गदराए उभार देखते ही वे पूरी तरह बहक गए. नव्या के अंगों से खेलते हुए उन्होंने कुछ ही देर में उस के सारे कपड़े उतार दिए.नव्या ने उन्हें कस कर पकड़ रखा था मानो वह तो यही चाहती थी. कुछ ही देर में नव्या की सिसकारियों से कमरा गूंज उठा.

नव्या का कुंआरापन भंग हो चुका था, लेकिन नव्या इस से बेफिक्र सैक्स के सागर में गोते लगा रही थी.थोड़ी देर में सबकुछ शांत हो गया.

नव्या कपड़े पहनने लगी. हालांकि, उसे बड़ा दर्द हो रहा था. विपुल सर ने जल्दी से दूसरी चादर बिछा दी और बोले, ‘‘नव्या, तुम ठीक हो न?’’‘‘जी सर.’’‘‘तो फिर अब क्या इरादा है?’’

‘‘क्या मतलब सर?’’‘‘अब दोबारा कब?’’‘‘जब आप कहें…’’‘‘कल?’’

‘‘आप की वाइफ…’’‘‘वह हफ्तेभर के लिए गई है.’’

‘‘फिर तो ठीक है.’’

‘‘चलो, तुम्हें बस स्टौप तक छोड़ दूं…’’

विपुल सर ने नव्या को सीने से कस कर लगाते हुए कहा.‘‘लव यू सर.’’‘‘लव यू टू, माय स्वीटी…’’ कहते हुए विपुल सर ने उस के होंठों को चूम लिया, फिर उसे बस स्टौप तक छोड़ आए.नव्या घर पहुंची, पर सैक्स से अभी उस का मन नहीं भरा था. उस का बस चलता तो वह घर आती ही नहीं. विपुल सर की वाइफ के न होने का वह भरपूर फायदा उठाना चाहती थी.‘‘बहुत थकी हुई लग रही है तू, ऐक्स्ट्रा क्लास के बारे में तू ने सुबह तो कुछ नहीं बताया था…’’ मम्मी ने कहा.‘‘मम्मी, ऐक्स्ट्रा क्लास अचानक ही अनाउंस हो गई.

अब रोज रहेगी. मैं रोज ही देर से आऊंगी,’’ नव्या ने लगे हाथ आगे का रास्ता साफ कर लिया.अगला पूरा हफ्ता नव्या और विपुल सर ने सैक्स का भरपूर मजा लिया.‘‘नव्या, कल मेरी वाइफ वापस आ रही है.’’‘‘ओह सर, फिर अब क्या करेंगे?’’‘‘यही मैं भी सोच रहा हूं.’’‘‘सर, कोई रास्ता तो निकालना होगा, अब तो मैं…’’‘‘जानता हूं, मेरी भी वही हालत है.’’‘‘तो फिर कुछ करिए न.’’

‘‘एक रास्ता है, अगर तुम तैयार हो जाओ तो…’’‘‘कौन सा रास्ता?’’‘‘मेरा एक दोस्त है. उस की वाइफ डिलीवरी के लिए मायके गई हुई है एक महीने के लिए, उस के घर इंतजाम हो सकता है, लेकिन…’’‘‘लेकिन, क्या सर?’’‘‘अब देखो नव्या, हम किसी से मदद लेना चाहते हैं, तो उसे कुछ देना भी होगा.’’‘‘क्या देना होगा?’’ नव्या ने बात समझते हुए कहा.‘‘कभीकभी वह भी तुम्हारे साथ…’’‘‘हां तो नो प्रौब्लम सर. आप के साथ के लिए इतना सैक्रिफाइस तो कर ही सकती हूं.’’‘‘तो फिर कल से गिरीश के घर.’’‘‘ओके सर,’’ दरअसल, नव्या को अब सैक्स का चसका लग चुका था.

उसे एक से ज्यादा मर्दों से संबंध बनाने से कोई परहेज नहीं था और इन शादीशुदा मर्दों को मुंह का जायका बदलने के लिए गरम और कम उम्र की चिडि़या मिल गई थी.अब तो नव्या का हर रोज सैक्स करने का सिलसिला चल निकला. स्कूल से अब कालेज में आ गई थी वह. अपनी अदाओं से नित नए मुरगे फंसाने का हुनर भी आ गया था.‘‘नव्या सुन, आज रोहित आ रहा है, उस की मीटिंग है यहां, शायद 2-4 दिन रुके. रमा बोल रही थी कि वह होटल में रुक जाएगा, लेकिन मैं ने कहा कि मौसी का घर होते हुए होटल में क्यों रुके, इसलिए मैं ने उसे यहीं बुला लिया है. ‘‘तू अपना कमरा उसे सोने के लिए दे देना.

तू मेरे साथ सो जाना. पापा बैठक में सोफे पर सो जाएंगे. ठीक है न?’’ तनुजा ने नव्या से कहा.‘‘अरे यार मम्मी, आप भी न…’’‘‘क्या आप भी, मौसेरा भाई है वह तेरा. 1-2 दिन एडजस्ट नहीं कर सकती क्या?’’‘‘ठीक है बाबा, कर लूंगी एडजस्ट.’’अगले दिन सुबह ही रोहित आ गया. काफी समय के बाद नव्या और रोहित मिले थे.‘‘और कैसी है रे तू छुटंकी?’’ रोहित ने हंसते हुए कहा.‘‘अब मैं छुटंकी कहां हूं, देख कितनी बड़ी हो गई…’’ नव्या ने तनते हुए कहा.‘‘हां, वह तो है,’’ रोहित ने उस के शरीर पर निगाह डालते हुए कहा. उस की नजरें नव्या के अंगों के उतारचढ़ाव से हटने को राजी नहीं थीं. बड़ी मुश्किल से खुद पर काबू करते हुए वह बोला, ‘‘और बताओ, आजकल क्या चल रहा है?’’

‘‘सब एकदम बढि़या चल रहा है. तुम सुनाओ, कैसी मीटिंग है तुम्हारी?’’ नव्या ने हिलते हुए कहा.‘‘औफिशियल है. खाली समय में तुम जबलपुर घुमा देना. घुमाओगी या नहीं?’’ रोहित ने नव्या की आंखों में गहरे झांकते हुए कहा.‘‘बिलकुल घुमाएंगे जबलपुर, बदले में क्या दोगे?’’ नव्या ने पूछा.‘‘क्या चाहिए बोलो तो, जो बोलोगी मिल जाएगा,’’ रोहित ने आंख मारते हुए कहा.‘‘अरे, क्या लेनेदेने की बातें हो रही हैं… चल बेटा रोहित, फ्रैश हो ले. मैं नाश्ता लगाती हूं.

नव्या, जरा रोहित को अपना रूम तो दिखा दो,’’ तनुजा ने आ कर कहा.‘‘ओके मम्मी. चलो रोहित, आज से मेरा रूम तुम्हारा है, ऐश करो,’’ नव्या ने हंसते हुए कहा और रोहित को अपने कमरे तक ले आई.‘‘वैलकम इन माय रूम…’’‘‘थैंक्स डियर,’’ कह कर रोहित ने शेकहैंड की मुद्रा में हाथ बढ़ाया.‘‘मोस्ट वैलकम,’’ कह कर नव्या ने अपना हाथ उस के हाथ में दिया, जिसे रोहित ने चूम लिया. नव्या ने मुसकराते हुए उस की इस हरकत का स्वागत किया.नव्या रोहित के इरादे समझ चुकी थी.

उस के लिए तो यह एक बेहतरीन मौका था, घर में ही रात को रंगीन बनाने का.रोहित नाश्ता कर के मीटिंग अटैंड करने चला गया. नव्या भी कालेज चली गई. यह उस का बीए का दूसरा साल था, जहां उस की खुली जिंदगी जीने की चाहत को पंख मिल चुके थे. सैक्स संबंध, ऐयाशी, अमीर मर्दों से महंगे गिफ्ट्स लेना… सबकुछ बड़े मजे से चल रहा था.

शाम को रोहित घर पहुंचा. उस के दिमाग में भी कुछ चल रहा था. नव्या मौसेरी बहन थी, लेकिन उस की दावत देती आंखों ने रोहित का विवेक खत्म कर दिया था. उसे तो बस नव्या का भरा हुआ कसा तन चुंबक की तरह खींच रहा था.‘‘बेटा, कैसी रही तुम्हारी मीटिंग?’’ तनुजा ने पूछा.‘‘बढि़या रही मौसी,’’ रोहित बोला.‘‘चलो, हाथमुंह धो कर रिलैक्स हो जाओ,’’ तनुजा ने कहा.‘‘जी मौसी, नव्या कहां है?’’ रोहित ने पूछा.‘‘वह फ्रैंड की बर्थडे पार्टी में गई है.

आती ही होगी,’’ तनुजा ने बताया.‘‘ओके मौसी, मैं फ्रैश हो कर आता हूं,’’ कह कर रोहित कमरे में चला गया.थोड़ी ही देर में नव्या भी आ गई, ‘‘और जनाब, कैसी रही आप की आज की मीटिंग?’’‘‘बढि़या रही, तुम्हें बहुत ज्यादा मिस कर रहा था.’’‘‘मुझे? वाह…’’‘‘हां नव्या, मैं तुम्हें बहुत मिस कर रहा था. क्या जादू है तुम में, जब से देखा है बस…’’‘‘बस क्या?’’ नव्या इतराते हुए बोली.

‘‘तुम रात में कहां सोओगी?’’‘‘मम्मी के पास.’’‘‘यहीं आ जाना, कुछ देर बातें करेंगे…’’‘‘बातें?’’‘‘और भी बहुतकुछ, आओगी न?’’‘‘आऊंगी… चलो, अब डिनर कर लो. मम्मी बुला रही हैं.’’खाने की टेबल पर रोहित और नव्या की आंखोंआंखों में बातें हो रही थीं. तनुजा और नव्या के पापा सुकेश इन सब बातों से अनजान खाना खा रहे थे.रात को नव्या मम्मीपापा के सो जाने का इंतजार करने लगी.

जब वह पूरी तरह यकीन हो गया कि वे दोनों सो चुके हैं, तो आहिस्ता से रोहित के कमरे में जा पहुंची. उस ने नाइट गाउन पहन रखा था.‘‘हैलो, स्वीटहार्ट…’’ नव्या फुसफुसाते हुए बोली.‘‘वैलकम डियर, मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रहा था. बहुत देर लगा दी तुम ने,’’ रोहित ने बेसब्री से कहा.‘‘तुम्हारे मौसाजी और मौसी के सोने का इंतजार कर रही थी… और कहो क्या इरादा है?’’

नव्या ने होंठ चबाते हुए कहा.‘‘तुम बोलो…’’‘‘अच्छा जी, अब वह सब भी मैं ही बोलूं…’’‘‘तो फिर?’’‘‘चलो, अब ये नाटक छोड़ो.’’‘‘सच में… छोड़ दूं नाटक, तो यह लो छोड़ दिया,’’ कह कर रोहित ने झटके से नव्या को अपनी बांहों में भर लिया.‘‘बहन हूं तुम्हारी…’’‘‘हां यार, लेकिन क्या करूं… यह दिल है कि मानता नहीं, इतनी हौट जो हो,’’ रोहित ने उसे गोद में उठा लिया. फिर शुरू हो गया हवस का गंदा खेल. रोहित और नव्या दोनों ने ही रिश्ते को दरकिनार कर जिस्मानी रिश्ते बना लिए.

बिस्तर पर नव्या के रंगढंग देख कर रोहित ने नव्या को लिवइन में रहने का प्रपोजल दे डाला.नव्या ने सोचा कि यह ऐक्सपीरियंस लेने में क्या जाता है… रोहित अच्छा कमाता है, कोई बुराई भी नहीं है. अगर उस के साथ लिवइन में रहूं, तो मम्मीपापा के बंधन से भी छुटकारा पा जाऊंगी और सैक्स भी ऐंजौय कर सकूंगी.3 दिनों में रोहित का औफिशियल काम भी खत्म हो गया.

नव्या और रोहित ने सब तैयारी कर ली. नव्या रोहित के साथ बालाघाट जाने के लिए पूरी तरह तैयार थी. दोनों ने फैसला किया कि कल घर वालों को अपने इरादों से वाकिफ करवा कर वे बालाघाट निकल जाएंगे.अगली सुबह घर में हंगामा मचा हुआ था. नव्या ने अपने फैसले को बहुत ही बेशर्मी से मातापिता को बता दिया.‘‘कुछ तो शर्म करो… हम दुनिया और समाज को क्या जवाब देंगे..

. क्या कहूंगी तेरी मौसी से… कुछ तो सोच, और तेरी उम्र तो देख, अभी तो पढ़नेलिखने के दिन हैं,’’ तनुजा भरी आंखों से बोली.‘‘मम्मी, अब इन सब बातों का कोई मतलब नहीं है. मेरा फैसला नहीं बदलने वाला… और फिर यह मेरी जिंदगी है, मुझे पूरा हक है कि इसे मैं कैसे जीऊं.

मैं रोहित के साथ बालाघाट जा रही हूं. वहीं उस की पोस्टिंग है. अपने मांबाप को वह बता देगा,’’ नव्या ने तुनक कर कहा और कमरे में चली गई.‘‘तनुजा, अब कोई फायदा नहीं इसे समझाने का. बालिग हो चुकी है वह और इसी बात का फायदा उठा रही है. उस के कदम बहक चुके हैं. क्या पता बात कहां तक बढ़ चुकी है. हमतुम तो शायद वहां तक सोच भी न सकें, क्योंकि जिस बुलंदी से नव्या ने यह बताया है, उस से तो लगता है कि इन दोनों के जिस्मानी…’’

तनुजा के पति हताश स्वर में बोले.‘‘क्या यही दिन देखना बाकी था… हम तो किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहे. क्या इसी दिन के लिए नाजों से पाला था इस को… इतनी आज़ादी दी थी. यह कहां की हवा लग गई इसे कि आंखों की शर्म तक खत्म हो गई…‘‘और रोहित, वह भी… अरे,

अब उसे क्या कहें, जब अपना सिक्का ही खोटा निकला,’’ तनुजा लगातार रोते हुए बोली.नव्या और रोहित परिवार व समाज के गाल पर तमाचा मार कर चले गए. पीछे रह गए 2 परिवार और शर्मसार मातापिता. सैक्स और ऐयाशी की चाहत में बच्चों ने घर वालों को एक ऐसा नासूर दे दिया, जो हर पल कसकता रहेगा. Hindi Story

Hindi Story: बोझ-ससुरजी की मन की पीड़ा को कैसे किया बहू अंजू ने दूर

Hindi Story: उस  रात अंजु और मनोज बुरी तरह झगड़े. मनोज अपने दोस्त के घर से पी कर आया था और अंजु ने अपनी सास के साथ झड़प हो जाने के बाद कुछ देर पहले ही तय किया था कि वह अपनी ससुराल में किसी से डरेगीदबेगी नहीं. इन दोनों कारणों से उन के बीच झगड़ा बढ़ता ही चला गया.

‘‘तुम्हें इस घर में रहना है, तो काम में मां का पूरा हाथ बंटाओ. तुम मटरगस्ती करती फिरो और मां रसोई में घुसी रहे, यह मैं बिलकुल बरदाश्त नहीं करूंगा,’’ मनोज की गुस्से से कांपती आवाज पूरे घर में गूंज उठी.

‘‘आज औफिस में ज्यादा काम था, इसलिए देर से आई थी. फिर भी मैं ने उन के साथ थोड़ा सा काम कराया… अपनी मां की हर बात सच मानोगे, तो हमारी रोज लड़ाई होगी,’’ अंजु भी जोर से चिल्लाई.

‘‘उन की रोज की शिकायत है कि जिस दिन तुम वक्त से घर आ जाती हो, उस दिन भी तुम उन के साथ कोई काम नहीं कराती हो.’’

‘‘यह झठ बात है.’’

‘‘झठी तुम हो, मेरी मां नहीं.’’

‘‘नहीं, झठी तुम्हारी मां है.’’

उस रात मनोज ने अपनी दूसरी पत्नी पर पहली बार हाथ उठा दिया. उन की शादी को अभी 2 महीने ही बीते थे.

‘‘तुम्हारी मुझ पर हाथ उठाने की जुर्रत कैसे हुई? अब दोबारा हाथ उठा कर देखो… मैं अभी पुलिस बुला लूंगी.’’

उस की चिल्ला कर दी गई इस धमकी को सुन कर राजनाथ और आरती अपने बेटेबहू को शांत कराने के लिए उन के कमरे में आए.

गुस्से से कांप रही अंजु ने अपनी सास को जलीकटी बातें सुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. जवाब में आरती कुछ देर ही चुप रही. फिर वह भी ईंट का जवाब पत्थर से देते हुए उस से भिड़ गई.

‘‘मुझे नहीं रहना है इस नर्क में. मैं कल सुबह ही अपने मायके जा रही हूं. तुम्हारे मांबाप का बोझ मुझे नहीं ढोना है,’’ धमकी देने के बाद अंजु ने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.

‘‘ये मुझे कैसे दिन देखने पड़ रहे हैं… पहली बीवी चरित्रहीन थी, सो मुझे छोड़ कर अपने प्रेमी के साथ भाग गई. अब यह दूसरी जो पल्ले पड़ी है, बहुत ही बदतमीज है,’’ अपने को कोसता मनोज उस रात सोफे पर ही सोया.

अगले दिन रविवार था. आंखों में गुस्सा भरी जब 10 बजे के करीब अंजु अपने कमरे से बाहर आई, तो उस ने मनोज को ड्राइंगरूम में मुंह लटकाए बैठे पाया.

उस के पूछे बिना मनोज ने उसे दुखी लहजे में बताया, ‘‘मम्मीपापा सुबह की गाड़ी से मामाजी के पास मेरठ चले गए हैं.’’

‘‘क्यों?’’ चाय बनाने रसोई में जा रही अंजु ने ठिठक कर पूछा.

‘‘ उन के जाने का कारण समझना क्या मुश्किल है?’’

‘‘मुझे जबरदस्ती कुसूरवार मत ठहराओ, प्लीज. तुम्हारी माताजी ने मुझे एक की चार सुनाई थीं.’’

‘‘वे दोनों बीमार रहते हैं. घर से दूर जा कर उन की कैसी भी दुर्गति हो, तुम्हारी बला से.’’

‘‘जब आज मैं ही घर छोड़ कर जाने वाली थी, तो तुम ने उन्हें रोका क्या नहीं?’’

‘‘मैं ने बहुत कोशिश करी, पर पापा नहीं माने.’’

‘‘वे कब तक लौटेंगे?’’

‘‘कुछ बता कर नहीं गए हैं,’’ मनोज ने थकेहारे अंदाज में अपना चेहरा हथेलियों से रगड़ा तो अंजु भी कुछ उदास सी हो गई.

दोनों दिनभर सुस्त ही रहे, पर शाम को उन का बाजार घूम आने का कार्यक्रम बन गया. पहले उन्होंने कुछ खरीदारी करी और फिर खाना भी बाहर ही खाया.

उस रात अंजु को जीभर के प्यार करते हुए मनोज को एक बार भी अपने मातापिता का ध्यान नहीं आया.

अगले 2-3 दिन उन के बीच झगड़ा नहीं हुआ. फिर एक दिन औफिस से अंजु देर से लौटी तो मनोज उस से उलझ पड़ा. दोनों के बीच काफी तूतू, मैंमैं हुई पर फिर जल्द ही सुलह भी हो गई. तब दोनों के मन में यह विचार एकसाथ उभरा कि अगर आरती घर में मौजूद होती, तो यकीनन झगड़ा लंबा खिंचता.

मनोज लगभग रोज ही अपने मातापिता से फोन पर बात कर लेता. अंजु ने उन से पूरा हफ्ता बीत जाने के बाद बात करी थी. उस ने उन दोनों का हालचाल तो पूछ लिया, पर उन के वापस घर लौट आने की चर्चा नहीं छेड़ी.

‘‘देखो, शायद अगले हफ्ते वापस आएं,’’ मनोज जब भी उन के घर लौटने की बात उठाता, तो राजनाथ उसे यही जवाब देते.

जब उन्हें मेरठ गए 1 महीना बीत गया तो अंजु और मनोज के मन की बेचैनी बढ़ने लगी. पड़ोसी और रिश्तेदार जब भी मिलते, तो आरती और राजनाथ के लौटने के बारे में ढेर सारे सवाल पूछते. तब उन्हें कोई झठा कारण बताना पड़ता और यह बात उन्हें अजीब से अपराधबोध का शिकार बना देती.

लोगों के परेशान करने वाले सवालों से बचने के लिए तब दोनों ने मेरेठ जा कर उन्हे वापस लाने का फैसला कर लिया.

‘‘अब वहां पहुंच कर उन से बहस में मत उलझना. उन्हें मनाने को अगर ‘सौरी’ बोलना पडे़, तो बोल देंगे. उन को साथ रखना हमारी जिम्मेदारी है, मामाजी या किसी और की नहीं,’’ मनोज सारे रास्ते अंजू को ऐसी बातें समझता रहा.

मामामामी के यहां 2 दिन बिताने के लिए शुक्रवार की रात को करीब 9 बजे उन के घर पहुंच गए.

उन दोनों से मामामामी बड़े प्यार से मिले. उन की नजरो में अपने लिए नाराजगी के भाव न देख कर अंजु मन ही मन हैरान हुई.

‘‘दीदी और जीजाजी खाना खाने के बाद पार्क में घूमने गए हैं,’’ अपने मामा की यह बात सुन कर मनोज हैरान रह गया.

‘‘पापामम्मी घूमने गए हैं? उन्होंने यह आदत कब से पाल ली?’’ मनोज की आंखों में अविश्वास के भाव पैदा हुए.

‘‘वे दोनों अब नियम से सुबह भी घूमने जाते हैं. तुम उन की फिटनैस में आए बदलाव को देखोगे, तो चकित रह जाओगे.’’

‘‘मम्मी की कमर का दर्द उन्हें घूमने की इजाजत देता है?’’

‘‘दर्द अब पहले से काफी कम है. जीजाजी दीदी का हौसला बढ़ा कर उन्हें सुस्त नहीं पड़ने देते हैं.’’

‘‘क्या मम्मी का किसी नए डाक्टर से इलाज चल रहा है?’’

‘‘हां, डाक्टर राजनाथ के इलाज में है दीदी,’’ अपने इस मजाक पर मामाजी ने जोरदार ठहाका लगाया, तो मनोज और अंजु जबरदस्त उलझन का शिकार बन गए.

जब वे सब चाय पी रहे थे, तब राजनाथ और आरती ने घर में प्रवेश किया. उन पर नजर पड़ते ही मनोज उछल कर खड़ा हो गया और प्रसन्न लहजे में बोला, ‘‘वाह, पापामम्मी. इन स्पोर्ट्स शूज में तो आप दोनों बड़े जंच रहे हो.’’

‘‘तुम्हारे मामाजी ने दिलाए हैं. अच्छे हैं न?’’ राजनाथ पहले किसी बच्चे की तरह खुश हुए और फिर उन्होंने मनोज को गले से लगा लिया.

अपनी मां के पैर छूते हुए मनोज ने उन की तारीफ करी, ‘‘ये बड़ी खुशी की बात है कि कमर का दर्द कम हो जाने से अब तुम्हे चलने में ज्यादा दिक्कत नहीं आ रही है. चेहरे पर भी चमक है. मामाजी के यहां लगता है खूब माल उड़ा रहे हैं.’’

‘‘मेरी यह शुगर की बीमारी कहां मुझे माल खाने देती है. तुम दोनों कैसे हो? आने की खबर क्यों नहीं दी?’’ अपने बेटेबहू को आशीर्वाद देते हुए आरती की पलकें नम हो उठीं.

‘‘तुम दोनों को भूख लग रही होगी. बोलो, क्या खाओगे?’’ बड़े उत्साहित अंदाज में अपनी हथेलियां आपस में रगड़ते हुए राजनाथ ने अपने बेटेबहू से पूछा.

‘‘ज्यादा भूख नहीं है, इसलिए बाजार से कुछ हलकाफुलका ले आते हैं,’’ कह मनोज अपने पिता के साथ जाने को उठ खड़ा हुआ.

‘‘बाजार से क्यों कुछ लाना है? आलूमटर की सब्जी रखी है. मैं फटाफट परांठे तैयार कर देती हूं,’’ कह मामी रसोई में जाने को उठ खड़ी हुई.

‘‘भाभी, आज आप अपने इस शिष्य को काम करने की आज्ञा दो,’’ रहस्यमयी अंदाज में मुसकरा रहे राजनाथ ने अपनी सलहज का हाथ पकड़ कर वापस सोफे पर बैठा दिया.

‘‘क्या परांठे आप बनाएंगे?’’ मनोज का मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया.

‘‘पिछले दिनों तुम्हारी मामी से कुछ कुकिंग सीखी है मैं ने. बस 15 मिनट से ज्यादा समय नहीं लगेगा खाना लगाने में. तुम दोनों तब तक फ्रैश हो जाओ,’’ अपने बेटे का गाल प्यार से थपथपाने के बाद राजनाथ सीटी बजाते हुए रसोई की तरफ चले गए.

राजनाथ ने क्याक्या बनाना सीख लिया है, इस की जानकारी उन दोनों को देते हुए आरती और मामामामी की आंखें खुशी से चमक रही. ‘‘मटरपनीर, कोफ्ते, बैगन का भरता, भरवां भिंडी. पापा ये सब बना सकते हैं. मुझे विश्वास नहीं हो रहा है. कैसे हुआ यह चमत्कार?’’ मनोज सचमुच बहुत हैरान नजर आ रहा था, क्योंकि राजनाथ को तो पहले चाय भी ढंग से बनानी नहीं आती थी.

‘‘अरे, जीजाजी आजकल बड़े मौडर्न हो गए हैं. कहते हैं कि आज के समय में हर इंसान को घर और बाहर के सारे काम करने आने चाहिए. किसी पर आश्रित हो कर बोझ बन जाना नर्क में जीने जैसा है… अपने इस नए आदर्श वाक्य को वे दिन में कई बार हम सब को सुनाते हैं. इस उम्र में कोई इतना ज्यादा बदल सकता है, यह सचमुच हैरान करने वाली बात है,’’ मामाजी की इस बात का पूरा अर्थ मनोज को अगले 2 दिनों में समझ आया.

राजनाथजी ने उन्हें उस रात खस्ता परांठे बना कर खिलाए. फिर रेत गरम कर के उसे एक पोटली में भरा और आरती की कमर की सिंकाई करी. वे पहले बहुत कम बोलत थे, पर अब उन की हंसी से कमरा बारबार गूंज उठता था.

अगले दिन सब को बैड टी उन्होंने ही पिलाई. इस से पहले वे और आरती घंटाभर पास के पार्क में घूम आए थे. नाश्ते में ब्रैडपकौड़े मामीजी ने बनाए पर सब को गरमगरम पकौड़े खिलाने का काम उन्होंने बड़े उत्साह से किया.

आरती ने पूरे घर में झड़ू लगाया और डस्टिंग का काम राजनाथजी ने किया. फिर नहाधो कर वे लाइब्रेरी में अखबार पढ़ने चले गए.

मनोज और अंजु उन की चुस्तीफुरती देख कर बारबार हैरान हो उठते. ऐसा प्रतीत होता जैसे उन में जीने का उत्साह कूटकूट कर भर गया हो.

शाम को वे सब बाजार घूमने गए. चाट खाने की शौकीन अंजु को राजनाथजी ने एक मशहूर दुकान से चाट खिलाई. बाद में आइसक्रीम भी खाई.

वापस आने पर किसी को ज्यादा भूख नहीं थी, इसलिए पुलाव बनाने का कार्यक्रम बना. आरती और मामीजी यह काम करना चाहती थीं, लेकिन राजनाथजी ने किसी की न चलने दी और रसोई में अकेले घुस गए.

उन्होंने बहुत स्वादिष्ठ पुलाव बनाया. सब के मुंह से अपनी तारीफ सुन कर वे फूले नहीं समाए.

काफी थके होने के बावजूद उन्होंने सोने से पहले आरती की कमर की सिंकाई करने के बाद मूव लगाने में कोई आलस नहीं किया.

रविवार की सुबह मामीजी ने सब को सांभरडोसे का नाश्ता कराया. राजनाथजी उन की बगल में खड़े हो कर डोसा बनाने की विधि बड़े ध्यान से देखते रहे.

सब ने इतना ज्यादा खाया कि लंच करने की जरूरत ही न रहे. कुछ देर आराम करने के बाद मनोज ने दिल्ली लौटने की तैयारी शुरू कर दी.

‘‘पापा, मम्मी, आप दोनों भी अपना सामान पैक करना शुरू कर दो. यहां से 2 बजे तक निकलना ठीक रहेगा. लेट हो गए तो शाम के ट्रैफिक में फंस जाएंगे,’’ मनोज की यह बात सुन कर राजनाथजी एकदम गंभीर हो गए तो आरती बेचैन अंदाज में उन की शक्ल ताकने लगी.

‘‘इन्हें अभी कुछ और दिन यहीं रहने दो, मनोज बेटा,’’ मामाजी भी सहज नजर नहीं आ रहे थे.

‘‘मामाजी, ये दोनों 1 महीना तो रह लिए हैं यहां. इन का अगला चक्कर मैं जल्दी लगवा दूंगा,’’  मनोज ने मुसकराते हुए जवाब दिया.

राजनाथ ने एक बार अपना गला साफ करने के बाद मनोज से कहा, ‘‘हम अभी नहीं चल रहे हैं मनोज.’’

‘‘क्यों? क्या आप अब भी हम से नाराज हो?’’ मनोज एकदम से चिड़ उठा.

‘‘मेरी बात समझ बेटे. हमारे कारण तेरे घर में क्लेश हो, यह हम बिलकुल नहीं चाहते हैं,’’ राजनाथ असहज नजर आने लगे.

‘‘इस तरह के झगड़े घर में चलते रहते हैं, पापा. इन के कारण आप दोनों का घर छोड़ देना समझदारी की बात नहीं है.’’

‘‘तेरी मां की बहू से नहीं बनती है. किसी दिन लड़झगड़ कर अंजु घर छोड़े, इस से बेहतर है कि हम तुम दोनों को अकेले रहने दें.’’

‘‘हमे अकेले नहीं, बल्कि आप दोनों के साथ रहना है. अब आप पिछली बातें भुला कर सामान बांधना शुरू कर दो. अंजु, तुम क्यों नहीं कुछ बोल रही हो?’’ मनोज ने उन दोनों पर दबाव बनाने के लिए अपनी पत्नी से सहायता मांगी.

‘‘आप दोनों हमारे साथ चलिए, प्लीज,’’ अंजु ने धीमी आवाज में अपने ससुर से प्रार्थना करी.

राजनाथजी कुछ पलों की खामोशी के बाद बोले, ‘‘तुम दोनों जोर डालोगे, तो हम वापस चल पड़ेंगे, पर पहले मैं कुछ कहना चाहता हूं.’’

‘‘क्या यह कहनासुनना घर पहुंच कर नहीं हो सकता है, पापा?’’

‘‘अभी मैं ने तुम्हारे साथ वापस चलने का फैसला नहीं किया है, मनोज.’’

‘‘वापस तो मैं आप दोनों को ले ही जाऊंगा. हम से क्या कहना चाहते हो आप?’’

तब राजनाथजी ने भावुक स्वर में बोलना शुरू किया, ‘‘बहू, तुम भी मेरी बात ध्यान से सुनो. उस रात मनोज से लड़ते हुए गुस्से में तुम ने हमें बोझ बताया था. तुम्हारी उस शिकायत को दूर करने के लिए मैं ने खाना बनाना, घर साफ रखना और मशीन से कपड़े धोना सीख लिया है. तुम्हारी सास से ज्यादा काम नहीं होता, पर मैं तुम्हारा हाथ बंटाने लायक हो गया हूं.

‘‘तुम्हारी सास का भी गुस्सा तेज है. मैं ने यहां आ कर इसे बहुत समझया है… इस ने मुझ से वादा किया है कि यह तुम्हारे साथ अपना व्यवहार बदल लेगी.

‘‘उस रात मनोज से झगड़ते हुए जब तुम ने घर छोड़ कर मायके चले जाने की धमकी दी, तो मैं अंदर तक कांप उठा था. उसी रात मैं ने ये फैसला कर लिया था कि घर में सुखशांति बनाए रखने को अगर कोई घर छोड़ेगा, तो वे तुम्हारी सास और मैं, तुम नहीं.

‘‘बहू, मनोज को अपनी पहली पत्नी से तलाक आसानी से नहीं मिला था. जिन दिनों केस चल रहा था, हम शर्मिंदगी के मारे लोगों से नजर नहीं मिला पाते थे. उन के सवालों के जवाब देने से बचने के लिए हम ने घर से निकलना बिलकुल कम कर दिया था. वकीलों और पुलिस वालों ने हमें बहुत सताया था.

‘‘वैसा खराब वक्त मेरी जिंदगी में फिर से आ सकता है, ऐसी कल्पना भी मेरी रूह कंपा देती है. तभी मैं कह रहा हूं कि तुम दोनों हमें साथ ले जाने की जिद न करो. अगर तुम दोनों के बीच कभी अलगाव हुआ और मुझे वैसी शर्मिंदगी का बोझ एक बार फिर से ढोना पड़ा, तो मैं जीतेजी मर जाऊंगा.’’

‘‘पापा, आप अपने आंसू पोंछ लो, प्लीज… मैं वादा करती हूं कि घर छोड़ कर जाने की बात मेरे मुंह से कभी नहीं निकलेगी.’’ अपने ससुर के मन की पीड़ा को दूर करने के लिए अंजु ने भरे गले से तुरंत उन्हें  विश्वास दिलाया.

‘‘और मैं ने आज से शराब छोड़ दी,’’ मनोज के इस फैसले को सुन राजनाथजी ने भावविभोर हो कर उसे गले से लगा लिया.

‘‘आरती, तुम पैकिंग शुरू करो और मैं इस खुशी के मौके पर सब का मुंह हलवे से मीठा कराता हूं,’’ बहुत खुश नजर आ रहे राजनाथजी ने अपने बहूबेटे के सिर पर हाथ रख कर आशीर्वाद दिया और फिर रसोई की तरफ चले गए. Hindi Story

Hindi Story: सिर्फ एक घटना-निशा और गौतम का साहस

Hindi Story:अचानक ही गौतम के मोबाइल फोन की घंटी बज उठी.

‘हैलो, मैं अनीता बोल रही हूं,’ उधर से आवाज आईं.

‘‘हां, बोलो अनीता. कोई खास बात है क्या?’’ गौतम ने पूछा.

‘गौतम, आज मेरे मम्मीपापा एक रिश्तेदार की शादी में जा रहे हैं. मैं रात को घर पर अकेली रहूंगी. तुम मौका देख कर यहां चले आना. हम लोग रातभर मजे करेंगे,’ अनीता ने कहा.

‘‘अनीता, मुझे बहुत डर लग रहा है. कहीं कोई देख लेगा तो मेरा क्या होगा?’’ गौतम की आवाज सहमी हुई थी.

‘मैं लड़की हो कर नहीं डर रही हूं और तुम लड़के हो कर…’ अनीता ने उसे मीठी झिड़की दी.

‘‘ठीक है अनीता, मैं आज रात में आ जाऊंगा. तुम मेरा इंतजार करना,’’ गौतम ने कहा.

गौतम 20 का गठीला नौजवान था. वह लंबे कद का था, जिस से हैंडसम दिखता था. अनीता और गौतम दोनों एकदूसरे से प्यार करते थे.

अनीता 18 साल की बहुत हसीन लड़की थी. उस की आंखें बड़ी खूबसूरत थीं. उस के सुडौल उभार मर्दों को बरबस अपनी तरफ खींच लेते थे. यही वजह थी कि गौतम उस के हुस्न का दीवाना हो गया था.

आधी रात हो गई थी. चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था. लोग अपने घरों में गहरी नींद में सो रहे थे. गौतम चुपके से अनीता के घर पहुंच गया.

अनीता उस का इंतजार कर रही थी. वह गौतम को अपने कमरे में ले गई. उस ने गौतम को प्यार से चूम लिया. गौतम ने भी अनीता को बांहों में भर लिया.

‘‘गौतम, पहले तुम अपना काम कर लो,’’ अनीता ने कहते हुए अपने कपड़े उतार दिए. उस के सैक्सी बदन को देखते ही गौतम के दिल की धड़कनें तेज हो गईं.

अनीता बिछावन पर लेट गई. गौतम भी झटपट अपने कपड़े उतार कर उस के साथ लेट गया. वह अनीता के जिस्म से लिपट कर उस के उभारों को सहलाता रहा. थोड़ी देर बाद गौतम ने अनीता के साथ सैक्स करना चाहा, लेकिन घबराहट व डर के मारे उस में तनाव नहीं आ सका. उसे डर लग रहा था कि अनीता के घर में वह पकड़ा जाएगा.

गौतम ने अनीता को चूम कर उस के कोमल अंगों को सहला कर अपने को जोश में लाना चाहा, लेकिन कामयाबी नहीं मिली.

अनीता 2-4 मिनट तक बिछावन पर लेटी उस के सैक्स करने का इंतजार करती रही, लेकिन गौतम कुछ कर नहीं सका. तब वह गुस्सा हो कर अपने कपड़े पहनने लगी.

अनीता गौतम की छाती को ठोंकते हुए गुस्से में बोली, ‘‘गौतम, तुम तो बहुत बड़े बौडीबिल्डर बनते थे न. आज तुम्हारी पोल खुल गई. तुम नामर्द हो, एकदम नामर्द.’’

गौतम ने अनीता से आंखें चुराते हुए कहा, ‘‘अनीता, मुझे समझने की कोशिश करो. पता नहीं, मुझे क्या हो गया है.’’

अनीता गुस्से में कांप रही थी. वह बोली, ‘‘कपड़े उतार कर अपनी इज्जत भी गंवा बैठी. लेकिन तुम…’’

अनीता तकरीबन चीखते हुए बोली, ‘‘चले जाओ यहां से. आज के बाद मुझ से मिलने की कोशिश भी मत करना.’’

गौतम कुछ नहीं बोला. वह शर्मिंदगी से सिर झुकाए कमरे से बाहर निकल गया. उस रात गौतम और अनीता का मजबूत दिखने वाला रिश्ता टूट गया.

घर आ कर गौतम उस रात सो नहीं सका. उस के मन में यही सब चलता रहा कि क्या वह नामर्द है? वह किसी भी औरत के साथ जिस्मानी संबंध नहीं बना सकता. उसे एक ही उपाय सूझा कि वह शादी नहीं करेगा, नहीं तो उस के चलते किसी लड़की की जिंदगी बरबाद हो जाएगी.

गौतम कुछ दिनों तक टैंशन में रहा. इस तकलीफ को भुला कर वह पढ़ाई में अपना मन लगाने लगा. कालेज में वह एक अच्छे स्टूडैंट के रूप में जाना जाता था. उस का स्वभाव भी शालीन हो गया था, जिस से प्रभावित हो कर कालेज में साथ पढ़ने वाली लड़की निशा उस से मन ही मन प्यार करने लगी थी.

निशा साधारण रूपरंग की लड़की थी. वह पढ़ाई में जहीन थी. वह गौतम को अपने टाइप का पाती थी, जिस से एक लगाव महसूस करती थी.

गौतम को भी निशा अच्छी लगती थी, लेकिन उस की अपनी मजबूरी साथ चल रही थी. वह किसी लड़की से प्यार नहीं करना चाहता था, क्योंकि उस के दिल में अनीता के साथ उस रात की जो घटना घटी थी, उस का पेंच बुरी तरह फंसा हुआ था.

एक दिन निशा ने गौतम को गुलाब का फूल दे कर अपने प्यार का इजहार कर दिया, ‘‘गौतम, मैं तुम्हें दिल से चाहती हूं. मुझे तुम से प्यार हो गया है. मेरे प्यार को ठुकराना मत.’’

गौतम ने हिचकिचाते हुए निशा के हाथ से गुलाब का फूल ले लिया. उस के चेहरे पर थोड़ी चिंता के भाव थे. वह निशा से बस इतना कह सका, ‘‘निशा, अपने प्यार को हर हाल में निभाना. बीच रास्ते में छोड़ कर चले जाना प्यार नहीं होता है.’’

निशा ने गौतम के हाथ को अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘गौतम, मैं हरदम अपने प्यार को निभाती रहूंगी.’’

गौतम और निशा की कालेज की पढ़ाई खत्म हो गई थी. वे दोनों नौकरी के लिए फार्म भरने लगे थे. गौतम की पढ़ाई में की गई कड़ी मेहनत काम आई. वह एक बड़े दफ्तर में जूनियर अफसर बन गया.

उसी दफ्तर में निशा को क्लर्क की नौकरी मिल गई. अब गौतम और निशा एक ही औफिस में साथसाथ काम करने लगे.

गौतम की मां उस की शादी करने की जिद करने लगी, जिस से गौतम डराडरा सा रहने लगा था. वह शादी कर के किसी लड़की की जिंदगी बरबाद नहीं करना चाहता था.

एक दिन तो मां ने गौतम से पूछा, ‘‘बेटा, अगर कोई लड़की तुम्हारी पसंद की हो तो बताना. मैं उसी लड़की से तुम्हारी शादी करवा दूंगी.’’

गौतम ने मां से कहा, ‘‘ठीक है, मां. कोई लड़की मेरी पसंद की होगी, तो मैं आप को बता दूंगा.’’

उस दिन औफिस में गौतम बहुत परेशान था. उस की परेशानी उस के चेहरे से साफ झलक रही थी.

गौतम को चिंतित देख कर निशा ने पूछ लिया, ‘‘क्या बात है गौतम, तुम आज काफी उदास दिख रहे हो?’’

‘‘निशा, मां मेरी शादी कराने की जिद कर रही हैं.’’

‘‘तो मां से तुम ने क्या कहा?’’ निशा ने पूछा.

‘‘यही कि कोई लड़की पसंद की होगी तो बताऊंगा,’’ गौतम ने निशा से कहा.

निशा के होंठों पर मुसकान खिल गई, ‘‘इस में उदास होने की तो कोई बात नहीं है.’’

‘‘नहीं निशा, मैं किसी लड़की की जिंदगी बरबाद नहीं करना चाहता. मेरे साथ एक घटना घट गई थी, जिस ने मेरी जिंदगी से शादी का सपना छीन लिया.’’

‘‘कौन सी घटना थी? मैं जानना चाहूंगी,’’ निशा ने पूछा.

गौतम ने अनीता के साथ घटी उस रात की घटना को तफसील से सुनाया. उस ने बताया कि कैसे उस रात को अनीता ने अपने कमरे में उसे नामर्द कहा था, जबकि अनीता ने जिस्मानी संबंध बनाने के लिए उसे खुद बुलाया था.

निशा, गौतम की बात बड़े ध्यान से सुन रही थी.

‘‘निशा अब तुम्हीं बताओ कि कौन सी लड़की एक नामर्द से शादी करना चाहेगी?’’

निशा ने कहा, ‘‘शादी तो मैं तुम से ही करूंगी,’’ निशा ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘गौतम, तुम्हारे साथ ऐसा कुछ भी नहीं है. अनीता के साथ घटी उस रात की घटना में एक बात सामने आ रही है कि तुम बहुत घबराए हुए थे. तुम्हारे मन में पकड़े जाने का डर था, जिस से ऐसे हालात पैदा हो गए थे. वह घटना वहम बन कर तुम्हें अब तक डराती रही है. बेवजह अपने को नामर्द समझना भी तो एक गुनाह है.’’

निशा की बातों से गौतम को हौसला मिला. उस की आंखों में खोई हुई चमक लौट आई.

गौतम और निशा की शादी बड़े ही धूमधाम से हो गई. आज उन की सुहागरात थी. एक कमरे को फूलों से सजा दिया गया था. निशा दुलहन के लाल जोड़े में पलंग पर बैठी थी. वह गौतम का इंतजार कर रही थी.

कुछ देर बाद गौतम कमरे में आया. वह कमरे का दरवाजा बंद कर निशा के पास आ कर बैठ गया, ‘‘निशा, दुलहन के लाल जोड़े में तुम बड़ी खूबसूरत लग रही हो,’’ गौतम ने उसे भरपूर नजर से देखते हुए कहा.

निशा मुसकरा दी. गौतम ने उसे बांहों में भर कर चूम लिया. निशा ने भी गौतम को प्यार से चूम लिया. धीमेधीमे प्यार का नशा दोनों पर छाने लगा. निशा ने गौतम को बांहों में जकड़ लिया.

गौतम और निशा ने जीभर कर सुहागरात का मजा लिया. निशा गौतम के प्यार से संतुष्ट हो गई थी.

निशा ने गौतम से प्यार से कहा, ‘‘आज सुहागरात में आप की मर्दानगी में कोई कमी नहीं थी.’’

‘‘निशा, तुम मेरी बीवी हो. यहां मुझे किस बात का डर था, जिस के चलते मुझे कोई परेशानी नहीं हुई,’’ गौतम ने निशा से कहा.

‘‘गौतम, अब समझ में आ गया न कि आप बेकार के वहम में जी रहे थे,’’ निशा बोली.

‘‘हां निशा, एक बोझ जो आज दिल से उतर गया,’’ गौतम ने कहा और निशा को चूम लिया. Hindi Story

Hindi Story: मुराद-सास बिना ससुराल, बहू हुई बेहाल

Hindi Story: बचपन में एक लोक गीत ‘यह सास जंगल घास, मुझ को नहीं सुहाती है, जो मेरी लगती अम्मां, सैयां की गलती सासू मुझ को वही सुहाती है…’ सुन कर सोचा शायद सास के जुल्म से तंग आ कर किसी दुखी नारी के दिल से यह आवाज निकली होगी. कालेज में पढ़ने लगी तो किसी सीनियर को कहते हुए सुना, ‘ससुराल से नहीं, सास से डर लगता है.’ यह सब देखसुन कर मुझे तो ‘सास’ नामक प्राणी से ही भय हो गया था. मैं ने घर में ऐलान कर दिया था कि पति चाहे कम कमाने वाला मिले मंजूर है, पर ससुराल में सास नहीं होनी चाहिए. अनुभवी दादी ने मुझे समझाने की कोशिश की कि बेटी सुखी जिंदगी के लिए सास का होना बहुत जरूरी होता है, पर मम्मी ने धीरे से बुदबुदाया कि चल मेरी न सही तेरी मुराद तो पूरी हो जाए.

शायद भगवान ने तरस खा कर मेरी सुन ली. ग्रैजुएशन की पढ़ाई खत्म होते ही मैं सासविहीन ससुराल के लिए खुशीखुशी विदा कर दी गई. विदाई के वक्त सारी सहेलियां मुझे बधाई दे रही थीं. यह कहते हुए कि हाय कितनी लकी है तू जो ससुराल में कोई झमेला ही नहीं, राज करेगी राज.

लेकिन वास्तविक जिंदगी में ऐसी बात नहीं होती है. सास यानी पति की प्यारी और तेजतर्रार मां का होना एक शादीशुदा स्त्री की जिंदगी में बहुत माने रखता है, इस का एहसास सब से पहले मुझे तब हुआ जब मैं ने ससुराल में पहला कदम रखा. न कोई ताना, न कोई गाना, न कोई सवाल और न ही कोई बवाल बस ऐंट्री हो गई मेरी, बिना किसी झटके के. सच पूछो तो कुछ मजा नहीं आया, क्योंकि सास से मिले ‘वैल्कम तानों’ के प्लाट पर ही तो बहुएं भावी जीवन की बिल्डिंग तैयार करती हैं, जिस में सासूमां की शिकायत कर सहानुभूति बटोरना, नयनों से नीर बहा पति को ब्लैकमेल करना, देवरननद को उन की मां के खिलाफ भड़काना, ससुरजी की लाडली बन कर सास को जलाना जैसे कई झरोखे खोल कर ही तो जिंदगी में ताजा हवा के मजे लिए जा सकते हैं.

क्या कहूं और किस से कहूं अपना दुखड़ा. अगले दिन से ही पूरा घर संभालने की जिम्मेदारी अपनेआप मेरे गले पड़ गई. ससुरजी ने चुपचाप चाभियों को गुच्छा थमा दिया मुझे. सखियो, वही चाभियों का गुच्छा, जिसे पाने के लिए टीवी सीरियल्स में बहुओं को न जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं. कहते हैं न कि मुफ्त में मिली चीज की कोई कद्र नहीं होती. बिलकुल ठीक बात है, मेरे लिए भी उस गुच्छे को कमर में लटका कर इतराने का कोई क्रेज नहीं रहा. आखिर कोई देख कर कुढ़ने वाली भी तो होनी चाहिए.

मन निराशा से भर उठता है कभीकभी तो. गुस्से और झल्लाहट में कभी बेस्वाद खाना बना दिया या किसी को कुछ उलटापुलटा बोल दिया, तो भी कोईर् प्रतिक्रिया या मीनमेख निकालने वाला नहीं है इस घर में. कोई लड़ाईझगड़ा या मनमुटाव नहीं. अब आप सब सोचो किसी भी खेल को खेलने में मजा तो तब आता है जब खेल में द्वंद्वी और प्रतिद्वंद्वी दोनों बराबरी के भागीदार हों. एकतरफा प्रयास किस काम का? अब तो लगने लगा है लाइफ में कोई चुनौती नहीं रही. बस बोरियत ही बोरियत.

एक बार महल्ले की किसी महान नारी को यह कहते सुना था कि टीवी में सासबहू धारावाहिक देखने का अलग ही आकर्षण है. सासबहू के नित्य नए दांवपेच देखना, सीखना और एकदूसरे पर व्यवहार में लाना सचमुच जिंदगी में रोमांच भर देता है. उन की बातों से प्रभावित हो कर मैं ने भी सासबहू वाला धारावाहिक देखना शुरू कर दिया. साजिश का एक से बढ़ कर एक आइडिया देख कर जोश से भर उठी मैं पर हाय री मेरी किस्मत आजमाइश करूं तो किस पर? बहुत गुस्सा आया अपनेआप पर. अपनी दादी की बात याद आने लगी मुझे. उन्होंने मुझे समझाने की कोशिश की थी कि बेटा सास एक ऐसा जीव है, जो बहू के जीवनरूपी स्वाद में चाटमसाले का भूमिका अदा करता है, जिस से पंगे ले कर ही जिंदगी जायकेदार बनाईर् जा सकती है. काश, उस समय दादी की बात मान ली होती तो मजबूरन दिल को यह न गाना पड़ता, ‘न कोई उमंग है, न कोई तरंग है, मेरी जिंदगी है क्या, सासू बिना बेरंग है…’

मायके जाने का भी दिल नहीं करता अब तो. क्या जाऊं, वहां बैठ कर बहनें मम्मी से जहां अपनीअपनी सास का बखान करती रहती हैं, मुझे मजबूरन मूक श्रोता बन कर सब की बातें सुननी पड़ती हैं. बड़ी दीदी बता रही थीं कि कैसे उन की सास ने एक दिन चाय में कम चीनी डालने पर टोका तो दूसरे दिन से किस तरह उन की चाय में डबल चीनी मिला कर उन्होंने उन का शुगर लैवल बढ़ा दिया. लो अब पीते रहो बिना चीनी की चाय जिंदगी भर. मूवी देखने की शौकीन दूसरी बहन ने कहा कि मैं ने तो अपनी सास को सिनेमाघर में मूवी देखने का चसका लगा दिया है. ससुरजी तो जाते नहीं हैं, तो एहसान जताते हुए मुझे ही उन के साथ जाना पड़ता है मूवी देखने. फिर बदले में उस दिन रात को खाना सासू अम्मां ही बनातीं सब के लिए तथा ससुरजी बच्चों का होमवर्क करवाते हैं. यह सब सुन कर मन में एक टीस सी उठती कि काश ऐसा सुनहरा मौका मुझे भी मिला होता.

अब कल की ही बात है. मैं किट्टी पार्टी में गई थी. सारी सहेलियां गपशप में व्यस्त थीं. बात फिल्म, फैशन, स्टाइल से शुरू हो कर अंतत: पति, बच्चों और सास पर आ टिकी. 4 वर्षीय बेटे की मां मीनल ने कहा, ‘‘भई मैं ने तो मम्मीजी (सास) से ऐक्सचेंज कर लिया है बेटों का. अब उन के बेटे को मैं संभालती हूं और मेरे बेटे को मम्मीजी,’’ सुन कर कुढ़ गई मैं.

सुमिता ने मेरी तरफ तिरछी नजर से देखते हुए मुझे सुनाते हुए कहा, ‘‘सुबह पति और ससुरजी के सामने मैं अपनी सास को अदरक और दूध वाली अच्छी चाय बना कर दे देती हूं फिर उन के औफिस जाने के बाद से घर के कई छिटपुट कार्य जैसे सब्जी काटना, आटा गूंधना, चटनी बनाना, बच्चों को संभालने में दिन भर इतना व्यस्त रखती हूं कि उन्हें फुरसत ही नहीं मिलती कि मुझ में कमी निकाल सकें. शाम को फिर सब के साथ गरमगरम चाय और नमकीन पेश कर देती हूं बस.’’

उस के इतना कहते ही एक जोरदार ठहाका लगाया सारी सखियों ने.

बात खास सहेलियों की कि जाए तो पता चला कि सब ने मिल कर व्हाट्सऐप पर एक गु्रप बना रखा है, जिस का नाम है- ‘सासूमां’ जहां सास की खट्टीतीखी बातें और उन्हें परास्त करने के तरीके (मैसेज) एकदूसरे को सैंड किए जाते हैं, जिस से बहुओं के दिल और दिमाग में दिन भर ताजगी बनी रहती है, पर मुझ जैसी नारी को उस गु्रप से भी दूर रखा गया है अछूत की तरह. पूछने पर कहती हैं कि गु्रप का मैंबर बनने के लिए एक अदद सास का होना बहुत जरूरी है. मजबूरन मनमसोस कर रह जाना पड़ा मुझे.

अपनी की गई गलती पर पछता रही हूं मैं, मुझे यह अनुभव हो चुका है कि सास गले की फांस नहीं, बल्कि बहू की सांस होती है. बात समझ में आ गई मुझे कि सासबहू दोनों का चोलीदामन का साथ होता है. दोनों एकदूसरे के बिना अधूरी और अपूर्ण हैं. कभीकभी दिल मचलता है कि काश मेरे पास भी एक तेजतर्रार, दबंग और भड़कीली सी सास होती पर ससुरजी की अवस्था देख कर यह कहने में संकोच हो रहा है कि पापा एक बार फिर घोड़ी पर चढ़ने की हिम्मत क्यों नहीं करते आप?

नई लड़कियों और अविवाहित सखियो, मेरा विचार बदल चुका है. अब दिल की जगह दिमाग से सोचने लगी हूं मैं कि पति चाहे कम कमाने वाला हो पर ससुराल में एक अदद सास जरूर होनी चाहिए. जय सासूमां की. Hindi Story

Hindi Story: वह बेमौत नहीं मरता-एक कठोर मां ने कैसे ले ली बेटे की जान

Hindi Story: बड़बड़ा रही थीं 80 साल की अम्मां. सुबहसुबह उठ कर बड़बड़ करना उन की रोज की आदत है, ‘‘हमारे घर में नहीं बनती यह दाल वाली रोटी, हमारे घर में यह नहीं चलता, हमारे घर में वह नहीं किया जाता.’’ सुबह 4 बजे उठ जाती हैं अम्मां, पूजापाठ, हवनमंत्र, सब के खाने में रोकटोक, सोनेजागने पर रोकटोक, सब के जीने के स्तर पर रोकटोक. पड़ोस में रहती हूं न मैं, और मेरी खिड़की उन के आंगन में खुलती है, इसलिए न चाहते हुए भी सारी की सारी बातें मेरे कान में पड़ती रहती हैं.

अम्मां की बड़ी बेटी अकसर आती है और महीना भर रह जाती है. घूमती है अम्मां के पीछेपीछे, उन का अनुसरण करती हुई.

आंगन में बेटी की आवाज गूंजी, ‘‘अम्मां, पानी उबल गया है अब पत्ती और चीनी डाल दूं?’’

‘‘नहीं, थोड़ा सा और उबलने दे,’’ अम्मां अखबार पढ़ती हुई बोलीं.

मुझे हंसी आ गई थी कि 60 साल की बेटी मां से चाय बनाना सीख रही थी. अम्मां चाहती हैं कि सभी पूरी उम्र उन के सामने बड़े ही न हों.

‘‘हां, अब चाय डाल दे, चीनी और दूध भी. 2-3 उबाल आने दे. हां, अब ले आ.’’

अम्मां की कमजोरी हर रोज मैं महसूस करती हूं. 80 साल की अम्मां नहीं चाहतीं कि कोई अपनी इच्छा से सांस भी ले. बड़ी बहू कुछ साल साथ रही फिर अलग चली गई.

बेटे के अलग होने पर अम्मां ने जो रोनाधोना शुरू किया उसे देख कर छोटा लड़का डर गया. वह ऐसा घबराया कि उस ने अम्मां को कुछ भी कहना छोड़ दिया.

दुकान के भी एकएक काम में अम्मां का पूरा दखल था. नौकर कितनी तनख्वाह लेता है, इस का पता भी छोटे लड़के को नहीं था. अम्मां ही तनख्वाह बांटतीं.

छोटे बेटे का परिवार हुआ. बड़ी समझदार थी उस की पत्नी. जब आई थी अच्छे खातेपीते घर की लड़की थी लेकिन अब 18 साल में एकदम फूहड़गंवार बन कर रह गई है.

अम्मां बेटी के साथ बैठ कर चुहल करतीं तो मेरा मन उबलने लगता. गुस्सा आता मुझे कि कैसी औरत है यह. कभी उन के घर जा कर देखो तो, रसोई में वही टीन के डब्बे लगे हैं जिन पर तेल और धुएं की मोटी परत चढ़ चुकी है. बहू की क्या मजाल जो नए सुंदर डब्बे ला कर रसोई में सजा ले और उन में दालें, मसाले डाल ले.

मरजी अम्मां की और फूहड़ता का लेबल बहू के माथे पर. बड़ी बेटी जो दिनरात मां का अहम् संतुष्ट करती है, जिस का अपना घर हर सुखसुविधा से भरापूरा है, जो माइक्रोवेव के बिना खाना ही गरम नहीं कर सकती, वह क्या अपनी मां को समझा नहीं सकती? मगर नहीं, पता नहीं कैसा मोह है इस बेटी का कि मां का दिल न दुखे चाहे हजारों दिल दिनरात कुढ़ते रहे.

‘‘मेरे घर में 3 रोटियां खाने का रिवाज नहीं,’’ अम्मां ने बहू के आते ही घर के नियम उस के कान में डाल दिए थे. जब अम्मां ने देखा कि बहू ने चौथी रोटी पर भी हाथ डाल दिया तो बच्चों को नपातुला भोजन परोसने वाली अम्मां कहां सह लेती कि बहू हर रोज 1-1 रोटी ज्यादा खा जाती.

छोटा लड़का मां को खुश करताकरता ही बीमार रहने लगा था. सुबह से शाम तक दुकान पर काम करता और पेट में डलती गिन कर पतलीपतली 5 रोटियां जो उस के पूरे दिन का राशन थीं. बाजार से कुछ खरीद कर इस डर से नहीं खाता कि नौकरों से पता चलने के बाद अम्मां घर में महाभारत मचा देंगी.

‘‘किसी ने जादूटोना कर दिया है हमारे घर पर,’’ बेटा बीमार पड़ा तो अम्मां यह कहते हुए गंडेतावीजों में ऐसी पड़ीं कि अड़ोसीपड़ोसी सभी उन को दुश्मन नजर आने लगे, जिन में सब से ऊपर मेरा नाम आता था.

अम्मां का पूरा दिन हवनमंत्र में बीतता है और जादूटोने पर भी उन का उतना ही विश्वास था. पूरा दिन परिवार का खून जलाने वाली अम्मां को स्वर्ग चाहिए चाहे जीते जी आसपास नरक बन जाए. छोटा बेटा इलाज के चक्कर में कई बार दिल्ली गया था. सांस अधिक फूलने लगी थी इसलिए इन दिनों वह घर पर ही था. एक सुबह वह चल बसा. हम सब भाग कर उन के घर जमा हुए तो मेरी सूरत पर नजर पड़ते ही अम्मां ने चीखना- चिल्लाना शुरू किया, ‘‘हाय, तू मेरा बेटा खा गई, तूने जादूटोने किए, देख, मेरा बच्चा चला गया.’’

अवाक् रह गई मैं. सभी मेरा मुंह देखने लगे. ऐसा दर्दनाक मंजर और उस पर मुझ पर ऐसा आरोप. मुझे भला क्या चाहिए था अम्मां से जो मैं जादूटोना करती.

‘‘अरे, बड़की बहू तेरी बड़ी सगी है न. सारा छोटा न ले जाए इसलिए उस ने तेरे हाथ जादूटोने भेज दिए…’’

मैं कुछ कहती इस से पहले मेरे पति ने मुझे पीछे खींच लिया और बोले, ‘‘शांति, चलो यहां से.’’

मौका ऐसा था कि दया की पात्र अम्मां वास्तव में एक पड़ोसी की दया की हकदार भी नहीं रही थीं.

इनसान बहुत हद तक अपने हालात के लिए खुद ही जिम्मेदार होता है. उस का किया हुआ एकएक कर्म कड़ी दर कड़ी बढ़ता हुआ कितनी दूर तक चला आता है. लंबी दूरी तय कर लेने के बाद भी शुरू की गई कड़ी से वास्ता नहीं टूटता. 80 साल की अम्मां आज भी वैसी की वैसी ही हैं.

बहू दुकान पर जाती है और बड़ी पोती स्कूल के साथसाथ घर भी संभालती है. अम्मां की सारी कड़वाहट अब पोती पर निकलती है. 4 साल हो गए बेटे को गए. इन 4 सालों में अम्मां पर बस, इतना ही असर हुआ है कि उन की जबान की धार पहले से कुछ और भी तेज हो गई है.

‘‘कितनी बार कहा कि सुबहसुबह शोर मत किया करो, अम्मां, मेरे पेपर चल रहे हैं. रात देर तक पढ़ना पड़ता है और सुबह 4 बजे से ही तुम्हारी किटकिट शुरू हो जाती है,’’ एक दिन बड़ी पोती ने चीख कर कहा तो अम्मां सन्न रह गईं.

‘‘रहना है तो तुम हमारे साथ आराम से रहो वरना चली जाओ बूआ के साथ. दाल वाली रोटी पसंद नहीं तो बेशक भूखी रह जाओ, सादी रोटी बना लो मगर मेरा दिमाग मत चाटो, मेरा पेपर है.’’

‘‘हायहाय, मेरा बेटा चला गया तभी तुम्हारी इतनी हिम्मत हो गई…’’

अम्मां की बातें बीच में काटते हुए पोती बोली, ‘‘बेटा चला गया तभी तुम्हारी भी हिम्मत होती है उठतेबैठते हमें घर से निकालने की. पापा जिंदा होते तो तुम्हारी जबान भी इतनी लंबी न होती…’’

खिड़की से आवाजें अंदर आ रही थीं.

‘‘…अपने बेटे को कभी पेट भर कर खिलाया होता तो आज हम भी बाप को न तरसते. अम्मां, इज्जत लेना चाहती हो तो इज्जत करना भी सीखो. मुझे पापा मत समझना अम्मां, मैं नहीं सह पाऊंगी, समझी न तुम.’’

शायद अम्मां का हाथ पोती पर उठ गया था, जिसे पोती ने रोक लिया था.

तरस आता था मुझे बच्ची पर, लेकिन अब थोड़ी खुशी भी हो रही है कि इस बच्ची को विरोध करना भी आता है.

पेपर खत्म हुए और एक दिन फिर से घर में कोहराम मच गया. घबरा कर खिड़की में से देखा. चमचमाते 3 बड़ेछोटे टं्रक आंगन में पड़े थे. जिन पर अम्मां चीख रही थीं. दुकान से पैसे ले कर खर्च जो कर लिए थे.

‘‘घर में इतने ट्रंक हैं फिर इन की क्या जरूरत थी?’’

‘‘होंगे, मगर मेरे पास नहीं हैं और मुझे अपना सामान रखने के लिए चाहिए.’’

अम्मां कुली का हाथ रोक रही थीं तो पोती ने अम्मां का हाथ झटक दिया था और बोली, ‘‘चलो भैया, टं्रक अंदर रखो.’’

छाती पीटपीट कर रोने लगी थी अम्मां, पोती ने लगे हाथ रसोई में जा कर टीन के सभी डब्बे बाहर ला पटके जिन्हें बाद में कबाड़ी वाला ले गया. पोती ने नए सुंदर डब्बे धो कर सामने मेज पर सजा दिए थे. अम्मां ने फिर मुंह खोला तो इस बार पोती शांत स्वर में बोली, ‘‘पापा कमाकमा कर मर गए, मेरी मां भी क्या कमाकमा कर तुम्हारी झोली ही भरती रहेगी? हमें जीने कब दोगी अम्मां? जीतेजी जीने दो अम्मां, हम पर कृपा करो…’’

पोती की इस बगावत से अम्मां सन्न थीं. वे सुधरेंगी या नहीं, मैं नहीं जानती मगर इतना जरूर जानती हूं कि अम्मां के लिए यह सब किसी प्रलय से कम नहीं था. सोचती हूं इतना ही विरोध अगर छोटे बेटे ने भी कर दिखाया होता तो इस तरह का दृश्य नहीं होता जो अब इस घर का है.

कुछ और दिन बीत गए. 20 साल की पोती धीरेधीरे मुंहजोर होती जा रही है. अपने ढंग से काम करती है और अम्मां का जायज मानसम्मान भी नहीं करती. हर रोज घर में तूतू मैंमैं होती है. बच्चों के खानेपीने में अम्मां की सदा की रोकटोक भला पोती सहे भी क्यों. भाई को पेट भर खिलाती है, कई बार थाली में कुछ छूट जाए तो अम्मां चीखने लगती हैं,  ‘‘कम डालती थाली में तो इतना जाया न होता…’’

‘‘तुम मेरे भाई की रोटियां मत गिना करो अम्मां, बढ़ता बच्चा है कभी भूख ज्यादा भी लग जाती है. तुम्हारी तरह मैं पेट नापनाप कर खाना नहीं बना सकती…’’

‘‘मैं पेट नाप कर खाना बनाती हूं?’’ अम्मां चीखीं.

‘‘क्या तुम्हें नहीं पता? घर में तुम्हीं ने 2 रोटी का नियम बना रखा है न और पेट नाप कर बनाना किसे कहते हैं. तुम्हारी वजह से मेरा बाप मर गया, सांस भी नहीं लेने देती थीं तुम उन्हें. घुटघुट कर मर गया मेरा बाप, अब हमें तो जीने दो. इनसान दिनरात रोटी के लिए खटतामरता है, हमें तो भर पेट खाने दो.’’

अम्मां अब पगलाई सी हैं. सारा राजपाट अब पोती ने छीन लिया है. जरा सी बच्ची एक गृहस्वामिनी बन गई.

‘‘रोती रहती हैं अब अम्मां. सभी को दुश्मन बना चुकी हैं. कोई उन से बात करना नहीं चाहता. पोती को कोसना घटता नहीं. अपनी भूल वह आज भी नहीं मानतीं. 80 साल जी चुकने के बाद भी उन्हें बैराग नहीं सूझता. सब से बड़ा नुकसान उन पंडितों को हुआ है जो अब यज्ञ, हवन के बहाने अम्मां से पूरीहलवा उड़ाने नहीं आ पाते. जब कभी कोई भटक कर आ पहुंचे तो पोती झटक देती है, ‘‘जाओ, आगे जाओ, हमें बख्शो. Hindi Story

Political Story: अमेरिका, डोनाल्ड, ट्रंप और टूटे ख्वाब

Political Story: ‘‘अब मैं क्या कर सकता हूं? मुझे क्या पता था कि अमेरिका में इतना बड़ा उलटफेर हो जाएगा. हम खुद हैरान हैं कि कमला हैरिस कैसे हार गईं? तुम दोनों के ही नहीं, बल्कि और भी कई लोगों के पैसे समझ डूब गए हैं,’’ दलाल ने जब यह बात कही, तो वंदना और अजय के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई.

‘‘ऐसे कैसे हमारे पैसे डूब गए. हम दोनों ने कुल 40 लाख रुपए भरे हैं. हमारे मांबाप ने कर्ज ले कर हमें बाहर भेजने का इंतजाम किया था. वे तो जीतेजी मर जाएंगे,’’ अजय ने कहा.

‘‘भाई, डंकी से अमेरिका और कनाडा जाने वाले को तो पलपल का खतरा रहता है. अच्छा है कि तुम्हारे सिर्फ पैसे ही डूबे हैं, अगर कहीं जान पर बन आती तो हम यहां बैठे क्या कर लेते? हम ने तो पक्का काम किया था, पर इस बार के चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की इतनी भारी जीत ने सब गुड़ गोबर कर दिया.

‘‘अब तो उस ने मंच से भी बोल दिया है कि वहां किसी भी घुसपैठिए को बरदाश्त नहीं किया जाएगा. अब तो जब मामला ठंडा होगा, तो ही दोबारा कोशिश की जा सकती है,’’ दलाल ने अपनी बात कही और अपनी सीट से उठ कर बाहर चला गया.

अजय और वंदना अभी भी दलाल के दफ्तर में बैठे थे. उन्हें लगा जैसे सबकुछ खत्म हो गया है. वंदना तो रोने लगी थी.

अजय और वंदना दोनों वैसे तो उत्तर प्रदेश के मुज्जफरनगर जिले के आसपास के गांवों के रहने वाले थे, पर पिछले 3 साल से नोएडा में लिवइन रिलेशनशिप में रह रहे थे.

23 साल की भरे बदन की वंदना दलित समाज की एक होनहार लड़की थी और पिछले 2 साल से एक प्राइवेट अस्पताल में नर्स की कच्ची नौकरी कर रही थी.

25 साल का अजय एक रैस्टोरैंट में कुक था और बहुत बढि़या खाना बनाता था, पर उस के काम की कद्र नहीं थी.

चूंकि नोएडा महंगा शहर है और खर्चे ज्यादा हैं, तो अजय और वंदना ने सोचा कि क्यों न वे ज्यादा पैसे कमाने के लिए अमेरिका और कनाडा चले जाएं.

अजय कनाडा जाना चाहता था और वंदना अमेरिका. अमेरिका में जुलाई, 2024 तक साढ़े 7 डौलर प्रति घंटे का मिनिमम वेज मिलता रहा है. मतलब, भारतीय रुपए में 660 रुपए प्रति घंटा. रोज 12 घंटे काम करने के तकरीबन 7,000 रुपए. महीने में अगर 25 दिन भी काम कर लिया, तो पौने 2 लाख रुपए की कमाई हो सकती है.

अमेरिका और कनाडा में नर्स और कुक को काम मिल ही जाता है. हो सकता है कि इन्हें कुछ ज्यादा ही कमाई हो जाए.

6 महीने पहले की बात है. अजय और वंदना अपनेअपने गांव गए हुए थे. तब उन दोनों ने अपने मांबाप से विदेश जाने की बात कही थी.

अजय बोला था, ‘‘अरे बाबूजी, पड़ोस के गांव का रतन अमेरिका में ट्रक चलाता है. वह डंकी से वहां गया था और आज देखो, उस ने पूरे परिवार को संभाल लिया है.’’

‘‘यह डंकी क्या होता है?’’ बाबूजी ने सवाल दागा था.

‘‘किसी देश में घुसपैठ कर के घुसना. दलाल पैसे ज्यादा लेते हैं, पर अमेरिका और कनाडा जैसे अमीर देशों में घुसा देते हैं. वहां जाते ही चांदी ही चांदी,’’ अजय ने सम?ाया था.

‘‘पर बेटा, 20 लाख रुपए कम रकम नहीं होती. हमें अपना एक खेत बेचना पड़ेगा,’’ अजय की मां ने अपनी चिंता जताई थी.

‘‘मां, एक बार मैं कनाडा चला जाऊं, फिर 3-4 साल में तुझे नया खेत दिला दूंगा. इस गांव में तुम्हारी तूती बोलेगी,’’ अजय ने मां को मक्खन लगाया था.

उधर वंदना भी अपने मांबाप को मना चुकी थी. हालांकि वह एक साधारण परिवार की लड़की थी, पर चूंकि उस के पिताजी कोटे के चलते सरकारी नौकरी में थे, तो उन्होंने जैसेतैसे पैसे का इंतजाम कर दिया था. दोनों ने एक ही दलाल से मिल कर अमेरिका और कनाडा जाने का बंदोबस्त कर लिया.

इस बीच अमेरिका में चुनाव का ऐलान हो गया था. रिपब्लिकन पार्टी ने डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया था और कमला हैरिस को डैमोक्रैटिक पार्टी ने.

कमला हैरिस का शुरू से पलड़ा भारी लग रहा था, क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप को एक बार राष्ट्रपति के रूप में पहले आजमाया जा चुका था और उन्होंने अपने कार्यकाल में ऐसा कुछ खास कमाल नहीं किया था.

अमेरिका में 5 नवंबर, 2024 को चुनाव हुए थे और डैमोक्रैटिक पार्टी के अलावा तमाम दूसरे नागरिकों को उम्मीद थी कि कमला हैरिस देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनने का गौरव हासिल कर लेंगी, क्योंकि चुनाव से पहले डोनाल्ड ट्रंप ने उन पर खूब निजी हमले किए थे.

डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान पैंसिल्वेनिया में एक रैली में कमला हैरिस की शारीरिक बनावट और बुद्धिमत्ता की निंदा की थी. उन्होंने अपने समर्थकों से कहा था,’’ मैं उन से (कमला हैरिस) कहीं ज्यादा सुंदर हूं.’’

डोनाल्ड ट्रंप ने कमला हैरिस स्पैशल ‘टाइम’ मैगजीन के कवर फोटो का जिक्र करते हुए दावा किया था कि पत्रिका को एक स्कैच कलाकार को काम पर रखना पड़ा, क्योंकि उन की तसवीरें काम नहीं आईं. उन्होंने उन की बुद्धिमत्ता पर भी सवाल उठाया था और उन्हें कट्टरपंथी उदारवादी करार दिया था.

इतना ही नहीं, डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी एक रैली में कहा था, ‘‘कुटिल जो बाइडेन मानसिक रूप से विकलांग हो गए हैं… लेकिन कमला हैरिस, ईमानदारी से कहूं तो मेरा मानना है कि वे ऐसी ही पैदा हुई थीं. कमला में कुछ गड़बड़ है और मुझे नहीं पता कि वह क्या है, लेकिन निश्चित रूप से कुछ कमी है.’’

लोगों को डोनाल्ड ट्रंप का यह बड़बोलापन नहीं सुहा रहा था और ऐसा लग रहा था कि इस बार डोनाल्ड ट्रंप हार जाएंगे, पर जब चुनाव नतीजे आने शुरू हुए तो एकदम से पासा पलटने लगा.

डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार बढ़त बनानी शुरू की, तो वे आगे ही निकलते चले गए. उन्हें कुल 312 सीटें मिलीं और कमला हैरिस महज 226 सीटों पर सिमट कर रह गईं. यह रिपब्लिकन पार्टी की एक बड़ी जीत थी.

चुनाव जीतने के बाद जब डोनाल्ड ट्रंप ने घुसपैठियों पर नकेल कसने की बात कही, तो इस का असर बहुत से देशों पर पड़ने लगा.

एक दिन वंदना और अजय नोएडा के अपने वन रूम फ्लैट में थे. वंदना ने सवाल किया, ‘‘तुम्हें क्या लगता है, डोनाल्ड ट्रंप ने इतनी बड़ी जीत कैसे हासिल की?’’

‘‘खबरों की मानें, तो डोनाल्ड ट्रंप की जीत की एक अहम वजह उन का ग्रामीण क्षेत्रों में अपने समर्थन को बढ़ाने में कामयाब रहना है. उन्होंने इंडियाना, केंटकी, जौर्जिया और उत्तरी कैरोलिना में समर्थन को बढ़ाते हुए अपना दम दिखाया है.

‘‘डैमोक्रैटिक कमला हैरिस को शहरी केंद्रों के साथसाथ आसपास के उपनगरों में भी बड़ी बढ़त हासिल करनी थी. साल 2016 से ही ऐसे उपनगरीय इलाकों में डैमोक्रैट्स को बढ़त मिलती रही है, लेकिन कमला हैरिस को इन इलाकों में मनमुताबिक भारी बढ़त नहीं मिल पाई.

‘‘कमला हैरिस की हार में लैटिन वोटरों के बीच डैमोक्रैटिक पार्टी के लिए समर्थन कम होना बड़ी वजह रहा है. डोनाल्ड ट्रंप को गैरश्वेत वोटरों का भी समर्थन मिला है.’’

‘‘अमेरिका में भी जो बाइडन के खिलाफ एंटीइनकंबैंसी कहीं न कहीं कमला हैरिस की हार की वजह बनी है. रिपब्लिकन पार्टी ने ज्यादा भावनात्मक मुद्दे उठाए. इसी वजह से अमेरिकियों ने भी डैमोक्रैट के मुकाबले रिपब्लिकन पर भरोसा किया.’’ अजय ने अपनी बात रखी.

‘‘मतलब, अब अमेरिका में घुसपैठ करना मुश्किल हो जाएगा?’’ वंदना का अगला सवाल था.

‘‘यह तो डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा ‘चुनावी मुद्दा’ रहा था. उन्होंने वादा किया था कि चुनाव जीतने के बाद वे घुसपैठियों को अमेरिका से बाहर करेंगे. उन्होंने साफ कर दिया था कि अब अमेरिका में सीधे रास्ते से आना होगा.

‘‘डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी कहा था कि वे हर प्रवासी आपराधिक नैटवर्क को निशाना बनाने और उसे खत्म करने के लिए 18वीं सदी के कानून ‘एलियन एनिमीज ऐक्ट’ को लागू करेंगे, लेकिन यह कानून केवल विदेशी दुश्मन देश से आने वाले लोगों पर लागू होता है.’’

‘‘पर, गाज तो हर किसी पर गिरेगी न. हमारा ही हाल देख लो,’’ वंदना बोली.

अजय ने अखबार पढ़ते हुए कहा, ‘‘अरे यार, अब तो एक खरबूजे को देख कर दूसरा खरबूजा भी रंग बदलने लगा है. पिछले कुछ समय से कनाडा में हिंदू और सिख समुदाय के बीच चल रही टैंशन के बाद वहां भी वीजा को ले कर कड़े नियम किए जा रहे हैं.

‘‘जस्टिन ट्रूडो की सरकार ने भारतीय नागरिकों के विजिटर वीजा की अवधि को एक महीने तक सीमित कर दिया है. इस से साढ़े 4 लाख पंजाबियों पर संकट आ गया है. अब उन्हें हर साल टूरिस्ट वीजा लेना होगा. साथ ही, एक महीने में कनाडा छोड़ना होगा. यह कदम कनाडा सरकार ने वीजा प्रणाली में कड़े प्रावधान लागू करने के मकसद से उठाया है.

‘‘इस से भारतीय नागरिकों को लंबी अवधि के वीजा की सुविधा खत्म हो जाएगी. इस का सब से ज्यादा असर पंजाबी समुदाय के लोगों पर होगा, जिन का कनाडा आनाजाना लगा रहता है. पहले 6 महीने का समय मिलता था, पर नए नियम से कनाडा में 10 लाख लोगों पर संकट आ गया है, जो विजिटर या मल्टीपल वीजा पर कनाडा में हैं.’’

वंदना ने कहा, ‘‘भारत के संबंध कनाडा के साथ इतने ज्यादा अच्छे नहीं हैं. आएदिन दोनों देशों के नेता एकदूसरे पर देश में अशांति फैलाने के इलजाम लगाते रहते हैं.’’

‘‘जब वीजा से जाने वालों पर इतने ज्यादा कड़े नियम बनाए जा रहे हैं, तो फिर डंकी वालों पर तो ये दोनों देश नकेल ही कस देंगे. डोनाल्ड ट्रंप कभी नहीं चाहेंगे कि उन का पड़ोसी देश कनाडा घुसपैठियों का अड्डा बन जाए,’’ अजय बोला.

‘‘क्यों न एक बार अपने दलाल से बात कर ली जाए?’’ वंदना ने अजय से धीरे से कहा.

अगले दिन वे दोनों अपने दलाल के पास गए, तो वह बोला, ‘‘अगले कुछ महीनों के लिए तो तुम दोनों अमेरिका या कनाडा जाने के ख्वाब देखने बंद कर दो. वैसे भी तुम्हें अभीअभी 40 लाख रुपए की चपत लगी है.

‘‘हां, एक काम हो सकता है. अगर तुम दोनों चाहो, तो सस्ते में तुम्हें कंबोडिया भिजवा सकता हूं. वहां तुम्हें 30-40 हजार रुपए महीने की नौकरी मिल जाएगी और विदेश जाने का सपना भी पूरा हो जाएगा.’’

‘‘हम कंबोडिया तुम्हारे भरोसे क्यों जाएंगे? तुम ने तो पहले ही हमारे पैसे हड़प लिए हैं,’’ अजय ने वहां से जाते हुए कहा.

‘‘यह भी ठीक है, पर एक बात का ध्यान रखना कि आजकल कंबोडिया जैसे दक्षिणपूर्व एशियाई देश औनलाइन घोटालों के गढ़ बने हुए हैं. मानव तस्कर भारतीय नागरिकों को नौकरी का झांसा दे कर कंबोडिया ले जा रहे हैं और फिर उन्हें औनलाइन घोटाले और साइबर अपराध करने के लिए मजबूर किया जा रहा है.

‘‘भारत के गृह मंत्रालय के साइबर विंग के सूत्रों ने बताया कि घोटालेबाज डिजिटल गिरफ्तारी के जरीए हर दिन तकरीबन 6 करोड़ रुपए उड़ा रहे हैं.

इस साल के पहले 10 महीनों में ही घोटालेबाजों ने 2,140 करोड़ रुपए उड़ा लिए हैं.’’

अजय और वंदना उस दलाल की यह सलाह सुनते हुए वहां से जा रहे थे. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अचानक से उन दोनों की जिंदगी गहरे अंधेरे में जाती हुई लग रही थी. उन के ख्वाब चकनाचूर हो गए थे. Political Story

Hindi Story: बिखरी जिंदगी

Hindi Story: शादी से पहले ही सपना पेट से हो गई थी. पर उस का प्रेमी चिरंजीवी डरपोक निकला. मजबूरी में सपना ने अबौर्शन कराया. फिर उस की शादी प्रभात के साथ हुई. पर डाक्टर ने प्रभात को बता दिया कि सपना का शादी से पहले अबौर्शन हुआ था. आगे क्या हुआ?


जि का डर था वही हुआ. सपना मायके रहने गई. उस के पति ने तलाक का नोटिस भेज दिया.
मैं यानी सपना की भाभी निशा हमेशा अपने पति रंजन से कहती रही कि शादीब्याह के मामले में कुछ भी छिपाना अच्छी बात नहीं है. चाहे जैसा भी हो सपना के अतीत के बारे में बता देना उचित हेगा, उस के बाद जो होगा उन की मरजी. अगर उन्हें लगेगा कि सपना से शादी करना ठीक होगा तो करेंगे, नहीं तो कहीं और कोशिश करो.


दरअसल, नौकरी के दरमियान सपना की जानपहचान एक दक्षिण भारतीय लड़के चिरंजीवी से हुई थी. बात इतनी बढ़ी कि वह उस से पेट से हो गई. सपना ने चिरंजीवी पर शादी करने का दबाव बनाया, तो एकाएक वह नौकरी छोड़ कर अपने गांव चला गया. इस बीच सपना ने उसे कई बार फोन किया, मगर चिरंजीवी ने हर बार यही कहा कि वह शादी करने के हालात में नहीं है, लिहाजा वह बच्चा गिरा दे.
सपना एक ऐसे भंवर मे फंस गई, जहां से उसे सिवा बरबादी के कुछ नहीं दिख रहा था. उस से रोते बन रहा था, ही हंसते. कैसे अपने मांबाप को सब बताएगी? उन्हें जब पता चलेगा तब उन पर क्या बीतेगी? एक बार खुदकुशी करने का खयाल मन में आया, मगर बढ़ते कदम रुक गए. खुदकुशी करना क्या आसान होता है?


आखिरकार सपना ने फैसला लिया कि वह मम्मीपापा को बता देगी. अबौर्शन करवाना कोई गुनाह नहीं. उस का गुनाह इतना था कि उसे इस हद तक नहीं जाना चाहिए था. मांबाप अगर बेटियों पर भरोसा कर के उन्हें बाहर नौकरी करने की इजाजत देते हैं, तो उन्हें मर्यादा का खयाल रखना चाहिए. लड़कों का क्या जाएगा, वे तो कोई भी बहाना बना कर कन्नी काट लेंगे, ?ोलना तो लड़कियों को ही पड़ता है. मम्मीपापा ने सुना तो वे आगबबूला हो गए. सपना को खरीखोटी सुनाई. चिरंजीवी से बात करना चाहा, मगर उस का फोन स्विच औफ मिला. एक बार चेन्नई जाने को सोचा, फिर यह सेच कर चुप हो गए कि उस का पुश्तैनी घर एक गांव में था, जहां कुछ कहनेसुनने से कुछ नहीं होगा. वे हमारी बात सम?ाने वाले नहीं. उलटे सपना को ही कुसूरवार मान कर गांव से भगा देंगे. काफी सोचविचार कर सपना का अबौर्शन कराना उचित सम?.


अब सपना आजाद थी. पर उस का औफिस जाना छुड़वा दिया गया. रंजन के ऊपर सपना की शादी की जिम्मेदारी थी. ऐसा इसलिए, क्योंकि रंजन पूर्वांचल की एक छोटे सी तहसील भाटी में नौकरी करते थे, जो दिल्ली से काफी दूर थी. दिल्ली के आसपास सपना की शादी करना उचित नहीं लगा. भेद खुलने का डर था. लड़का रंजन के ही औफिस में काम करता था. रंजन से उस की अच्छी जानपहचान थी. भाटी में उस का खुद का मकान था, साथ में गांव में कुछ पुश्तैनी जमीन भी थी. सपना इस शादी के हक में नहीं
थी. कहां दिल्ली, कहां एक छोटा सा कसबावह उदास हो गई. मम्मी ने भरोसा दिया कि उस का तबादला लखनऊ हो जाएगा, तब वह आराम से महानगर में रह सकेगी.


पता नहीं मम्मी के भरोसे में कितनी हकीकत थी. एकबारगी मु? लगा कि मम्मीपापा किसी तरह से सपना का घर बसना देखना चाहते थे. लेकिन सपना की पसंदनापसंद का कोई सवाल नहीं था. आज के दौर में शारीरिक संबंध बनना एक सामान्य घटना है. भागदौड़ की जिंदगी में इसे कोई इतनी गंभीरता से नहीं लेता, मगर मम्मीपापा के भीतर  इतना डर था कि उन्होंने सपना को ऐसी जगह ब्याहना मुनासिब सम?, जहां सपना जैसी लड़की के लिए एक पल रहना मुमकिन नहीं था. लड़के का नाम प्रभात था. उसे एकमुश्त जमीन खरीदने के लिए रकम की जरूरत थी, जिसे रंजन ने स्वीकार कर लिया. थोड़े से लोगों की मौजूदगी में सपना की शादी कर दी गई, पर उस का भाटी में कभी मन नहीं लगा.


सपना अकसर रंजन से यही कहा करती थी कि वह किसी तरह प्रभात का तबादला लखनऊ करवा दे, ताकि वहां कोई फ्लैट ले कर रहा जाए. इस बीच सपना पेट से हुई. पहली बार जब प्रभात उसे महिला डाक्टर के पास ले गया, तो चैकअप करने के बाद उस ने प्रभात को अपने केबिन मे बुला कर पूछा कि क्या आप की पत्नी का पहले कभी अबौर्शन हुआ था? यह सुन कर प्रभात थोड़ा हैरान हो कर बोला, ‘‘नहीं, ऐसा तो नहीं है. यह हमारा पहला अनुभव है.’’ डाक्टर ने दोबारा कुछ पूछना मुनासिब नहीं सम?. कुछ दवाएं लिख दीं और बीचबीच में कर दिखाने की सलाह दी. रास्तेभर प्रभात के कानों में लगातार डाक्टर साहिबा की कही बात गूंजती रही. जैसे ही वह सपना के साथ घर के अंदर दाखिल हुआ, सब से पहले उस का यही सवाल था, ‘‘क्या तुम्हें पहले कभी अबौर्शन हुआ था?’’


यह सुन कर सपना कांप गई, फिर खुद को संभालते हुए बोली, ‘‘कैसी बचकानी बातें कर रहे हैं…’’
‘‘डाक्टर की बात ?ाठी नहीं हो सकती…’’ प्रभात बोला.
‘‘डाक्टर बीच में कहां से गई?’’
‘‘उन्होंने ही बताया कि तुम्हारा एक बार अबौर्शन हो चुका है.’’
‘‘डाक्टर कैसे पता लगा सकता है?’’
‘‘और कौन बताएगा?’’


सपना ने थोड़ा कड़ा मन करते हुए कहा, ‘‘मान लो ऐसा ही हो तो तुम कर क्या सकते हो?’’
‘‘मैं ऐसी चरित्रहीन औरत के साथ एक पल भी नहीं रहना चाहूंगा,’’ प्रभात ने दो टूक कहा.
‘‘तलाक लेना क्या आसान होगा? दूसरे, मैं डाक्टर की बात को गलत साबित करती हूं. जब ऐसा कुछ हुआ ही हो तो मैं कैसे मान लूं?’’ सपना की आवाज में आत्मविश्वास की कमी थी.
उस रोज प्रभात और सपना में काफी बहस हुई. दोनों का ?ागड़ा सुन कर प्रभात की मां गईं. पूछने पर प्रभात ने कुछ नहीं छिपाया.
‘‘मु? तो पहले से ही शक था.
तुम्हीं शादी के लिए उतावले थे.
10 लाख क्या दिया खोटा सिक्का
थमा दिया,’’ मां सपना को जलीकटी सुनाने लगीं.


उस दिन के बाद प्रभात ने सपना की  तरफ देखना भी छोड़ दिया. सपना की जिंदगी खजूर पर लटके हुए इनसान की तरह हो गई. वह दिल्ली की रही, ही भाटी की. मम्मीपापा ने जो सोच कर उस की शादी का घरौंदा बनाया था, वह रेत की तरह बिखरने वाला था. एक दिन सपना ने फोन कर के रंजन को सारी बातें बता दीं. रंजन सपना की ससुराल आया. प्रभात को रंजन से इतनी नफरत हो गई थी कि जब कभी उस का औफिस में सामना होता, तो वह दुआसलाम भी नहीं करता था. रंजन को सम? में नहीं आया कि एकाएक प्रभात इतना बदल कैसे गया. उसे लगा होगी कोई औफिस की समस्या, पर अब सारा राज खुल गया था.


प्रभात की मां ने साफसाफ कह दिया कि वह सपना को अपनी बहू बना कर नहीं रखना चाहतीं. रंजन ने लाख सम?ाया, मगर प्रभात सम?ाने के लिए तैयार था, ही उस के घर वाले.
‘‘क्या यह आप लोगों का आखिरी फैसला है?’’ रंजन हताश मन से पूछा.
‘‘हां,’’ प्रभात ने जवाब दिया.
‘‘कहीं तुम ने सपना को तलाक देने का तो फैसला नहीं ले लिया है?’’ रंजन ने शक जताया.
‘‘आप ने सही सोचा है,’’ प्रभात
की इस बात पर रंजन के माथे पर बल पड़ गए.
‘‘तलाक लेना आसान नहीं है. वह तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली है.’’
‘‘मैं उसे अपना बच्चा नहीं मानता,’’ प्रभात ने हेकड़ी दिखलाई.
‘‘तुम्हारे मानने या मानने से कुछ नहीं होगा. जैसे डाक्टर ने सपना के अबौर्शन की जानकारी दी, वैसे ही तकनीक के जरीए बताया जा सकता है कि यह तुम्हारा बच्चा ही है. तुम्हें उसे वे सारे हक देने होंगे, जो एक बच्चे के होते हैं,’’ रंजन बोला.


पर प्रभात पर रंजन की बात का बिलकुल भी असर नहीं पड़ा. उस रोज रंजन बिना कोई ठोस फैसला लिए वापस अपने घर गया. घर कर उस का मन किसी काम में नहीं लगा. उस के दिमाग में बारबार सपना ही घूमती रही. क्या सोचा था, क्या हो गया. उसे भरोसा था कि इतनी दूर, साथ में अच्छाखासा दहेज दे कर वह सपना के नाजायज प्यार पर परदा डाल देगा, मगर ऐसा हुआ नहीं. रंजन को अपने फैसले पर अफसोस होने लगा. इस सब की जानकारी जब मम्मीपापा को लगेगी, तब उन पर क्या बीतेगी, यह सोच कर उस का दिल बैठने लगा. अब अकसर अबौर्शन को ले कर सपना और प्रभात में ?ागड़ा होने लगा. प्रभात का सारा परिवार उस के साथ था, जबकि सपना अकेली. कितनी खिलाफत करती. तंग कर एक
दिन अपना जरूरी सामान बांध कर रंजन के पास रहने चली आई.


औफिस में मौका मिला तो रंजन ने प्रभात को सम?ाने की काफी कोशिश की, मगर वह तो कुछ भी सुनने के लिए तैयार था. वह बहुत गुस्से में था. जल्दी ही यह खबर औफिस में फैल  गयी कि प्रभात और रंजन की बहन सपना में अनबन हो गई है. मामला तलाक पर गया है. रंजन को काफी शर्मिंदगी महसूस होने लगी. ऊपर से तो कोई कुछ नहीं कहता था, मगर अंदर ही अंदर कानाफूसी जारी थी. रंजन ने मम्मीपापा को सारी बात बताई. वे दोनों भी बेहद परेशान हो गए. पापा रंजन से बोले कि चाहे जैसे भी हो सपना को वापस ससुराल भेजो. ‘‘किस के बल पर? क्या गारंटी है कि वहां सपना महफूज होगी? कहीं वे सब सपना को मार डालें तब?’’ ‘‘इतना ही डर था तो फिर शादी क्यों की?’’ पापा चिल्लाए.


‘‘पापा, आप 2 तरह की बातें करते हैं. एक तरफ आप छिपाना चाहते थे, तो दूसरी तरफ शादी पर सवाल खड़ा कर रहे हैं. इतना ही था तो कर लिए होते अपने तरीके से शादी,’’ इतना बोलने के अगले पल रंजन को पापा को कहे शब्दों पर अफसोस होने लगा. उसे पापा से ऐसे तल्ख लहजे में नहीं बात करनी चाहिए थी. उस ने पापा से माफी मांगी. इधर, सपना ने साफसाफ कह दिया कि वह उस गांव में रहने नहीं जाएगी. वहां उस का मन नहीं लगता. भले ही जिंदगी अकेले काटनी हो, काट लेगी मगर वापस उस जेलखाने में नहीं जाएगी. जेलखाना ही थी उस की ससुराल. सासससुर, ननदननदोई कहीं से भी वे लोग शहरी नहीं लगते थे. पता नहीं रंजन ने क्या देखा जो टूट पड़े इस रिश्ते के लिए.


आखिरकार रंजन ने सपना को वापस दिल्ली भेज दिया. दिल्ली कर फिर से वही सवाल खड़ा हुआ कि सपना के पेट में पल रहे बच्चे का क्या होगा? एक बार सोचा कि फिर से अबौर्शन करा कर पहले की तरह आजाद जिंदगी जिए. नौकरी तो मिल ही जाएगी. सपना के मम्मीपापा इस के खिलाफ थे. उन्हें भरोसा था कि देरसवेर प्रभात को सम? जाएगा और सबकुछ ठीक हो जाएगा. काफी जद्दोजेहद के बाद सपना ने मम्मीपापा की बात मान ली. उसे भी लगा यही ठीक रहेगा. इस बीच प्रभात ने तलाक का नोटिस भेज दिया. सपना कुछ पल के लिए बेचैन हुई, मगर अगले पल खुद में हिम्मत संजोई कि चाहे जो भी हो जाए, वह प्रभात को तलाक नहीं देगी.


पूरे 9 महीने बाद सपना ने अपने बच्चे को जन्म दिया. प्रभात ने काफी कोशिश की, मगर सपना टस से मस
हुई. 2 साल गुजरने के बाद भी सपना ने तलाक के लिए कोई पहल नहीं की, तब सुनने में आया कि प्रभात ने दूसरी शादी कर ली. यह तो और भी बड़ा अपराध था. सपना ने बच्चे के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने का मन बनाया. उस ने प्रभात की पुश्तैनी जायदाद पर दावा ठोंक दिया, साथ में उस की दूसरी शादी पर भी सवाल खड़े किए. तमाम कानूनी पचड़े की वजह से प्रभात काफी दबाव में गया और उस ने सपना की बात मान कर उसके मनमुताबिक हर्जाना दे कर तलाक पा लिया. सपना का बेटा 5 साल का हुआ, तो उस ने दोबारा नौकरी करने का मन बनाया. उसे नौकरी मिल भी मिल गई. ऐसे ही एक शाम सपना औफिस से घर आने के लिए मैट्रो का स्टेशन पर इंतजार कर रही थी, तभी उसे चिरंजीवी दिखा. उस ने नफरत से नजरें दूसरी तरफ मोड़ लीं. इस के बावजूद चिरंजीवी ने उसे देख लिया. वह उस के करीब आया.


‘‘सपना, मैं चिरंजीवी,’’ इतना कह कर वह मुसकराया.
सपना ने उस की बात का कोई जवाब नहीं दिया.
‘‘सपना, मु? माफ कर दो. मैं ने तुम्हें धोखा दिया.’’
‘‘अब गड़े मुरदे उखाड़ने से क्या फायदा?’’ सपना की आवाज में
तल्खी थी.
‘‘पिताजी को कोरोना हो गया था. अचानक मु? गांव जाना पड़ा.’’
‘‘चलो, मान लेते हैं. मगर क्या तुम्हारा फर्ज नहीं बनता था कि एक बार फोन कर के मेरा हाल लेते. बड़ी आसानी से कह दिया अबौर्शन करा लो. तुम्हें
मेरी हालत का अंदाजा था?’’ कहतेकहते सपना का गला रुंध गया, ‘‘तुम ने मु? कहीं का नहीं छोड़ा.’’
‘‘मु? माफ कर दो,’’ कह कर चिरंजीवी ने चुप्पी साध ली. उस के चेहरे पर बनतेबिगड़ते भावों से लगा मानो वह सपना से और भी कुछ कहना चाहता है, मगर कह नहीं पा रहा था.
फिर चिरंजीवी ने ही चुप्पी तोड़ी, ‘‘सपना, अगर तुम्हारे पास समय हो तो क्या थोड़ी देर के लिए मेरे साथ पास के किसी रैस्टोरैंट में जा कर चाय पीना पसंद करोगी?’’
‘‘नहीं चिरंजीवी, अब हमारे रास्ते अलगअलग  हैं.’’
‘‘सिर्फ आज, उस के बाद मैं
तुम से कभी नहीं मिलूंगा,’’ चिरंजीवी दोबारा बोला.
दोनों रैस्टोरैंट में आए. चिरंजीवी
ने चाय के साथ कुछ स्नैक्स का भी और्डर दिया.


चाय की चुसकियों के बीच चिरंजीवी ने सपना के पति और बच्चे के बारे में पूछा.
यह सुन कर सपना का मन भीग गया. बड़ी मुश्किल से उस की जबान से बोल फूटे, ‘‘मेरा तलाक हो चुका है. मु? एक 5 साल का बेटा है. वही मेरे जीने का सहारा है.’’
सपना की आंखों में आंसू देख कर चिरंजीवी का दिल पसीज गया.
चाहते हुए भी सपना ने अपने अतीत के पन्ने बारीबारी से खोल कर चिरंजीवी के सामने रख दिए.
चिरंजीवी अपराधबोध से भर गया. सपना की बिखरी जिंदगी के लिए वह खुद को कुसूरवार मानने लगा. वह भरे दिल से बोला, ‘‘सपना, बीते हुए कल को वापस तो नहीं लाया जा सकता, मगर उसे नए सिरे से संवारा जरूर जा सकता है.’’


‘‘मतलब?’’ पूछते हुए सपना हैरानी से उसे देखने लगी.
‘‘क्या हम शादी कर के नई जिंदगी की शुरुआत नहीं कर सकते?’’
‘‘यह तुम क्या कह रहे होतुम्हारे बीवीबच्चे क्या सोचेंगे…’’
‘‘मैं ने आज तक शादी नहीं की.
वैसे भी मेरी उम्र इतनी भी गई नहीं है
कि मैं शादी कर सकूं. अभी तो महज 33 साल का हूं.’’
कुछ सोच कर सपना का मन उदास हो गया, ‘‘नहीं चिरंजीवी, ऐसा नहीं हो सकता. मैं एक बेटे की मां हूं. तुम शायद ही मेरे बेटे का अपना पाओ. अगर मेरा बेटा हम दोनों की शादी की वजह से अनदेखा हुआ, तो मैं खुद का कभी माफ नहीं कर पाऊंगी.’’
‘‘अकेले जिंदगी काटना क्या आसान होगा तुम्हारे लिए?’’ चिरंजीवी के इस सवाल ने सपना को ?ाक?ार कर रख दिया. बेशक आज मांबाप जिंदा हैं, पर कल का क्या ठिकाना. वे नहीं रहे तब किस के सहारे जिंदगी काटेगी. कोई तो होना चाहिए, जो उस के अकेलेपन का साथी हो.


देर हो रही थी. सपना ने चिरंजीवी का मोबाइल नंबर मांगा. घर कर वह बेहद बेचैन हो रही थी. कभी अपने भविष्य के बारे में सोचती, तो कभी बूढ़े हो रहे मांबाप के बारे में. बच्चे को ले कर भी वह परेशान थी. पता नहीं बड़ा हो कर वह चिरंजीवी को अपना पिता स्वीकार करेगा भी या नहीं? सम?ादार होने के बाद अपने असली पिता के पास जाने का जिद कर बैठे और उसे गुनाहगार मानने लगे तब? अगले दिन रविवार था. चिरंजीवी ने सपना के साथ घूमने का प्लान बनाया, जिसे सपना इनकार कर सकी. बेटे को मां के पास छोड़ कर वह यह कह कर गई कि औफिस के काम से जा रही है, जल्द जाएगी.


आज चिरंजीवी और सपना ने एकदूसरे को काफी वक्त दिया.
‘‘चिरंजीवी, क्या तुम मु? पर तरस खा कर शादी तो नहीं कर रहे हो?’’ सपना ने अचानक पूछा.
‘‘बिलकुल नहीं. मैं तुम से आज भी बेहद प्यार करता हूं.’’
‘‘मेरे बच्चे का क्या होगा? क्या तुम उसे बाप का नाम देगे?’’
‘‘सपना, मैं खुद अपने पिता का सौतेला बेटा हूं. क्या मेरे पिता ने मु? बेटे का  मान नहीं दिया. क्या मैं ने उन्हें पिता का दर्जा नहीं दिया. तुम ने खुद देखा होगा कि जब वे कोरोना से पीडि़त हुए थे, तो मैं उन की देखभाल के लिए अपने गांव भागाभागा चला गया था.’’
सपना को चिरंजीवी निश्छल और बेकुसूर लगा.
जब सपना को पूरी तसल्ली हो गई कि चिरंजीवी के बारे में जैसा सोचा था वह वैसा नहीं है, तब घर कर उस ने अपने मम्मीपापा से उस का जिक्र किया. वे तो पहले से ही चाहते थे कि सपना का घर बस जाए. ऐसे में चिरंजीवी की पहल को मना कर सके.


सादे समारोह में शादी हो गई. जब विदाई का समय आया, तब सपना के पापा ने उसे एक कमरे में बुला कर नम आंखों से कहा, ‘‘बेटी, मु? माफ करना. मैं ने तुम्हारे साथ बहुत नाइंसाफी की. तुम पर दबाव बना कर ऐसी जगह तुम्हारी शादी कर दी, जहां करने के बारे में मु? सौ बार सोचना चाहिए था.
सिर्फ शादी कर देना ही मांबाप की जिम्मेदारी नहीं होती, बल्कि शादी के लिए बेटी की रजामंदी भी लेनी चाहिए, जो मैं ने नहीं ली.’’  Hindi Story     

 Social Story: सच्ची सलाह

Social Story: मैं 21 साल की लड़की हूं. मैं मध्य प्रदेश के एक गांव में रहती हूं. हमारे यहां सरकारी स्कूल में मु? पढ़ाने का मौका मिला है. इस के लिए मु? पैसे नहीं मिलते हैं, पर मु? पढ़ाने का शौक है तो मैं 12वीं जमात के बच्चों को विज्ञान पढ़ा देती हूं. उस जमात के कुछ बच्चे बड़े बदमाश हैं.

वे पढ़ाई से ज्यादा लड़कियों पर ध्यान देते हैं और भद्दे कमैंट्स करते हैं. इतने ज्यादा बेहूदा की हम सब का सिर शर्म से ?ाक जाता है. मैं ने उन्हें सम?ाया और प्रिंसिपल से शिकायत करने की धमकी भी दी पर वे बड़े ढीठ हैं. हम ऐसा क्या करें कि सांप भी मर जाए और लाठी भी टूटे, क्योंकि मैं नहीं चाहती कि किसी भी छात्र का कैरियर दांव पर लगे? यह हैरानी की बात है कि सरकारी स्कूल में पढ़ाने के पैसे ही मिलें. अगर आप ठेके पर किसी टीचर के लिए पढ़ा रही हों तो उस से अपनी मेहनत के पैसे लें.


रही बात लड़कों के बरताव की तो पहले यह देखसम? लें कि लड़कियों को भी इस पर कोई एतराज है या नहीं और अगर है तो उन्हें प्रिंसिपल से शिकायत करने को कहें और इस में उन का साथ दें.
वैसे, आप घर पर भी साइंस की ट्यूशन पढ़ा सकती हैं. इस से स्कूल के ?ां?ाटों से बच जाएंगी और फीस भी मिलेगी. फोकट में ज्ञान बांटने से कोई फायदा नहीं



मैं 45 साल का शादीशुदा आदमी हूं और मेरे 2 बच्चे हैं. मेरी पत्नी की उम्र 40 साल है और अब वह सैक्स से दूर भागती है. जब भी रात को मेरा मन करता है तो वह थके होने का बहाना बना कर करवट बदल लेती है. कभीकभार तो मु? बहुत ज्यादा गुस्सा आता है और दिल करता है कि कहीं किसी और औरत से चक्कर चला लूं, पर बाद में मु? महसूस होता है कि यह गलत है. मैं ऐसा क्या करूं कि मेरी पत्नी को मेरी जिस्मानी भूख की सम? जाए?


कुछ औरतों में बढ़ती उम्र में सैक्स में दिलचस्पी रह जाना कुदरती बात है, जिस की अपनी वजहें भी होती हैं मसलन बच्चों घर की जिम्मेदारियां, सेहत से ताल्लुक रखते मसले और इस से भी ज्यादा अहम पति यानी आप का रोल जो भूखे भेडि़ए की तरह महज अपने मजे के लिए बीवी पर टूट पड़ते हैं. उस की संतुष्टि और इच्छा से कोई वास्ता रखने की भूल की कीमत कभीकभी इसी तरह चुकाना पड़ती है, लेकिन यह बहुत बड़ी समस्या नहीं है.


पत्नी की दिलचस्पी सैक्स में पैदा करें, उस के साथ घूमेफिरें, उस से बातें करें, चुहलबाजी करें और फोरप्ले पर खास ध्यान दें. इस पर भी बात बने तो किसी काबिल डाक्टर को दिखाएं. इधरउधर मुंह मारने से समस्या हल होने के बजाय और बढ़ भी सकती है.

मेरी उम्र 25 साल है. मेरी अभी शादी नहीं हुई है, पर एक दोस्त है जो मेरे साथ जिस्मानी रिश्ता बना चुकी है. हाल ही में मु? पता चला कि वह और भी कई लड़कों से दोस्ती किए हुए है और उन के साथ घूमनेफिरने जाती है. पूछने पर मुकर जाती है.


मैं उस से बहुत ज्यादा प्यार करता हूं, पर उस की इन बातों से मु? में बहुत ज्यादा तनाव रहने लगा है. मु? क्या करना चाहिए? आप बजाय सीरियस होने के अपनी गर्लफ्रैंड की तरह जिंदगी के मजे लूटें और अगर ऐसा करने में खुद को नाकाम पाते हैं तो धीरेधीरे उस से किनारा कर लें. लेकिन उस की निजी जिंदगी में दखल दे कर उसे परेशान करें और ही खुद के लिए टैंशन लें.


इस के बाद भी दिलोदिमाग से वह लड़की निकले तो उसे सम?ाने की कोशिश करें. शायद वह रास्ते पर जाए, बशर्ते उस के बारे में आपको जो पता चला है, उस में हकीकत हो.                 
    

Marrycom Life: तुम हमेशा ‘मैग्निफिसैंट मैरी’ ही रहोगी

Marrycom Life: भारतीय मुक्केबाजी में जब भी किसी महिला को याद किया जाएगा, सब से ऊपर एमसी मैरी कौम का नाम रहेगा, जिन्होंने रिकौर्ड 6 बार एआईबीए वुमन वर्ल्ड बौक्सिंग चैंपियनशिप जीती है.


इतना ही नहीं, एमसी मैरी कौम ने साल 2012 के लंदन ओलिंपिक में ब्रौन्ज मैडल और साल 2018 के क्वींसलैंड कौमनवैल्थ गेम्स में गोल्ड मैडल जीता था. साल 2014 के इंचियोन एशियन गेम्स में गोल्ड मैडल जीतने वाली वे पहली भारतीय महिला बौक्सर बनी थीं. उन्होंने 5 बार एशियन वुमन बौक्सिंग चैंपियनशिप में भी गोल्ड मैडल जीता था.


एमसी मैरी कौम को साल 2020 में पद्म विभूषण, साल 2013 में पद्म भूषण, साल 2006 में पद्मश्री, साल 2009 में मेजर ध्यानचंद खेल रत्न और साल 2003 में अर्जुन पुरस्कार दिया गया था. एमसी मैरी कौम को साल 2016 में भारत की राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा के सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया था. वे साल 2007 में जुड़वां बच्चों की मां बनने के बाद भी शानदार प्रदर्शन करने के लिए जानी जाती हैं.


पर हाल ही में एमसी मैरी कौम अपनी घरेलू जिंदगी में आए तूफान से दोदो हाथ करती नजर आईं. एक शो में उन्होंने अपने पूर्व पति करुंग ओन्खोलर परपत्नी की कमाईखाने के आरोप लगाए, उन्हें नकारा बताया और सरेआम उन की बेइज्जती की. ऐसा कहने की वजह क्या थी? इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने से पहले यह जान लें कि यह पारिवारिक और निजी ?ागड़ा पब्लिक डिबेट का हिस्सा कैसे बन गया.


एक बड़ी न्यूज एजेंसी से बात करते हुए एमसी मैरी कौम ने अपनी निजी जिंदगी में मची उथलपुथल पर बताया कि यह संकट 2022 कौमनवैल्थ गेम्स से पहले लगी चोट के बाद शुरू हुआ. वे कई महीनों तक बिस्तर पर रहीं और बाद में उन्हें वौकर का सहारा लेना पड़ा. इसी दौरान उन्हें उन सब बातों का सामना करना पड़ा, जिन्हें वे लंबे समय से नजरअंदाज करती रही थीं.


मैरी कौम ने बताया कि इसी दौर में उन का अपने पूर्व पति करुंग ओन्खोलर पर से भरोसा उठ गया था. वैसे, साल 2023 में उन दोनों का तलाक हो गया था. एमसी मैरी कौम ने बताया, ‘‘मैं नहीं चाहती थी कि यह पूरी दुनिया के लिए तमाशा बने, इसलिए मैं ने कई बार आपसीतौर पर सुल?ाने की कोशिश के बाद तलाक का फैसला लिया. दोनों परिवारों को इस फैसले की जानकारी थी और उन्होंने इसे सम? भी,

लेकिन हालात तब बिगड़ गए, जब मेरी निजी जिंदगी से जुड़ी बातें मीडिया खबरों और सोशल मीडिया पर आने लगीं. मु? लालची कहा गयाऐसे लोगों द्वारा जिन्हें यह तक नहीं पता कि मैं किन हालात से गुजरी हूं.’’ एमसी मैरी कौम ने आरोप लगाया कि उन के साथ करोड़ों रुपए की धोखाधड़ी हुई और उन्होंने अपनी ही कमाई से खरीदी गई जमीन का कब्जा खो दिया.

उन का दावा है कि उन की जायदाद और मणिपुर की जमीन पर लोन लिया गया, जिसे बाद में वसूली के लिए स्थानीय समूहों ने जब्त कर लिया. हालांकि, इसी रिपोर्ट में उन के पूर्व पति करुंग ओंखोलर ने किसी भी तरह की गलत हरकत से इनकार किया है. मैरी कौम ने आगे कहा कि इस पूरे मामले में सब में सब से दर्दनाक बात यह थी कि सार्वजनिक तौर पर उन के कैरेक्टर पर सवाल उठाए गए. वे अंदर से टूट चुकी हैं, लेकिन उन्हें शोक मनाने की भी इजाजत नहीं है.


यह विवाद तब और बढ़ गया जब एमसी मैरी कौम ने टैलीविजन शोआप की अदालतमें इस बात को खारिज कर दिया कि उन के पति ने उन की बौक्सिंग यात्रा का समर्थन करने के लिए अपने कैरियर काबलिदानकर दिया था. मैरी कौम ने दावा किया कि ओन्खोलर कभी भी परिवार का भरणपोषण करने वाला नहीं था और वह अपना ज्यादातर समयघर पर सो करबिताता था, जबकि वे परिवार के लिए कमाती थीं.


उन्होंने ओन्खोलर पर बिना रजामंदी के बड़ी रकम (एक बार में 10 लाख रुपए तक) निकालने और उस की एसैट्स को गिरवी रखने का आरोप लगाया. उन्होंने अपने पति के सियासी सपनों को पूरा करने के लिए तकरीबन 5-6 करोड़ रुपए खर्च किए. अपने पति को ले कर मैरी कौम ने तब यह भी कहा था ‘‘कैसा सफल कैरियर (पति का) वह तो गलियों में फुटबौल खेला करता था. सच कहूं तो वह एक रुपया भी नहीं कमाता था. कुछ भी नहीं, कहां बलिदान किया? सुबहशाम सोता रहता था.


‘‘वह एक लड़की की कमाई पर जी रहा था. मु? बहुत दुख हुआ. मैं बहुत कमा रही थी, मेरा सारा भरोसा और विश्वास उसी पर टिका था. बाद में मु? पता चला कि मेरा खाता तकरीबन खाली था. ओन्खोलर ने किया पलटवार मैरी कौम के पूर्व पति करुंग ओन्खोलर ने भी अपने ऊपर लगाए गए आरोपों के साथ पलटवार किया.


समाचार एजेंसी आईएएनएस को दिए इंटरव्यू में करुंग ओन्खोलर ने कहा, ‘‘मैं बताऊंगा कि उन्होंने लोक अदालत में क्या कहा. सब से पहले, साल 2013 में उस का एक जूनियर बौक्सर के साथ अफेयर था. हमारे परिवारों में ?ागड़ा हुआ था और उस के बाद हम ने सम?ाता कर लिया. ‘‘इस के बाद साल साल 2017 से उस कामैरी कौम बौक्सिंग एकेडमीमें काम करने वाले किसी शख्स के साथ रिश्ता है. मेरे पास उस के व्हाट्सऐप मैसेज सुबूत के तौर पर हैं. मेरे पास उस शख्स के नाम के साथ सुबूत है जिस के साथ उस का अफेयर था. मैं चुप रहा.’’


साथ ही, करुंग ओन्खोलर ने दिल्ली में किराए के मकान में रहने की अपनी वर्तमान हालत का हवाला देते हुए यह साबित करने की कोशिश की कि उन्होंनेकरोड़ोंरुपए नहीं चुराए हैं. करुंग ओन्खोलर ने आगे कहा, ‘‘उस ने (मैरी कौम) कहा कि चुनाव लड़ने की चाह में मैं ने बहुत पैसा खर्च किया. दरअसल, उस ने ही मु? चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया था. 2016 में उसे राज्यसभा के लिए सांसद के रूप में मनोनीत किया गया था. जब उस का बतौर सांसद कार्यकाल पूरा हो रहा था, तब उस ने मु? चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया.


‘‘जब हमारी मुलाकात हुई थी, तब मैं यूपीएससी की तैयारी कर रहा था. मैं एक कौन्ट्रैक्ट फुटबौल खिलाड़ी भी थाउस ने (मैरी कौम) मु? से अपना कैरियर छोड़ने और उस का साथ देने का अनुरोध किया.
‘‘उस ने मु? से बच्चों की देखभाल करने को कहा. उसे बौक्सिंग का बहुत शौक था और मैं उस से प्यार करता था, इसलिए मैं ने सोचा कि उस का शौक हमारा शौक है. ‘‘वह हफ्तों और महीनों तक घर से दूर रहती थी. मैं ने बच्चों की देखभाल की. मैं ने उन्हें नहलाया, खाना खिलाया, कोचिंग ले गया और घर का सारा काम संभाला.’’


सोशल मीडिया पर फजीहत इस ?ागड़े से सोशल मीडिया पर लोगों की राय के 2 धड़े बन गए. एक धड़े ने पति का साथ दिया कि उस ने वाकई अपने कैरियर की कुरबानी दी और उसे मिली अपनी पत्नी की बेवफाई. मैरी कौम की हिम्मत कैसे हुई उसेऔरत की कमाई खाने वालाकहने की. उस ने तो अपनी पत्नी के सपनों को पूरा करने के लिए खुद को परिवार पालने में ?ांक दिया.


दूसरी तरफ एक धड़े ने मैरी कौम के दर्द को सम? और कहा कि जब किसी औरत का विश्वास टूटता है तो वह अपने पति को भी सही सबक सिखा सकती है. पर यहां सवाल उठता है कि क्यों कोई औरत या लड़की अपनी कमाई का खुद ध्यान नहीं रख सकती?


भारत में ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में हर कामयाब औरत की कमाई का हिसाबकिताब शादी से पहले उस का पिता या भाई रखता है और शादी के बाद पति. इस की सब से बड़ी वजह है औरत या लड़की की बुनियादी सोच जिस में उस के पैदा होने से ही भर दिया जाता है कि उस की सिक्योरिटी कोई मर्द ही कर सकता है. वह हमेशा इसी डर में जीती है.


एमसी मैरी कौम ने अपने इंटरव्यू में कहा कि इतने साल से उन्होंने अपने अकाउंट्स तक चैक नहीं किए. इसी बात का उन्हें बहुत बड़ा नुकसान हुआ. इस मामले से यह बात सम? में आई कि हर औरत और लड़की को अपनी कमाई का हिसाबकिताब खुद रखना चाहिए. क्या और कितना कमाया, कहां इन्वैस्ट
किया, आप का फाइनैंशियल स्टेटस क्या है, हर छोटी से छोटी बात पर नजर रखनी चाहिए.


याद रखें कि महिलाएं किसी भी सूरत में पुरुषों से कम नहीं हैं. जो औरत हर क्षेत्र में नाम और दाम कमा रही हैं, क्या वे पैसे का हिसाब नहीं रख सकतीं? बिलकुल रख सकती हैं. परिवार पर लगाम लगा कर रखने में कोई बुराई नहीं है. महिलाओं को अपने हकों के बारे में पता होना चाहिए. उन्हें किसी
की जीहुजूरी करने की जरूरत नहीं है.

वे अपना ख्याल खुद रख सकती हैं और अपने लिए गए किसी फैसले पर उन्हें कभी भी अफसोस नहीं होना चाहिए. फिलहाल चाहे एमसी मैरी कौम पर लोग उंगली उठा रहे हैं, पर इस महिला ने अपने जीवट से दुनियाभर में नाम कमाया है. भारतीय महिला मुक्केबाजी को नई ऊंचाइयां दी हैं. शायद इसीलिए उन्हेंमैग्निफिसैंट मैरीकहा जाता है और वे हमेशा यही रहेंगी.          

Hindi Story: मुआवजा

Hindi Story: जिस्मफरोशी के धंधे से जुड़ी मगनाबाई एक जुलूस में शामिल हो कर मुख्यमंत्री के पास इंसाफ मांगने जा रही थी. क्या  नाइंसाफी हुई थी उस के साथ?

जुलूस शहर की बड़ी सड़क से होता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था. औरतों के हाथों में बैनर थे, जिन में से एक पर मोटेमोटे अक्षरों में लिखा हुआ था, ‘हम जिस्मफरोश नहीं हैं. हमें भी जीने का हक है. औरत का जिस्म खिलौना नहीं है…’


लोग उन्हें पढ़ते, कुछ पढ़ कर चुपचाप निकल जाते, कुछ मनचले भद्दे इशारे करते, तो कुछ मनचले जुलूस के बीच घुस कर औरतों की छातियों पर चिकोटी काट लेते. औरतें चुपचाप सहतीं, बेखबर सी नारे लगाती आगे बढ़ती जा रही थीं.


वे सब मुख्यमंत्री के पास इंसाफ मांगने जा रही थीं. इंसाफ की एवज में अपनी इज्जत की कीमत लगाने, अपने उघड़े बदन को और उघाड़ने, गरम गोश्त के शौकीनों को ललचाने. शायद इसी बहाने उन्हें अपने दर्द का कोई मरहम मिल सके.


उन के माईबाप सरकार को बताएंगे कि उन की बेटी, बहन, बहू के साथ कब, क्या और कैसे हुआ? करने वाला कौन था? उन की देह को उघाड़ने वाला, नोचने वाला कौन था? औरतों के जिस्म का सौदा हमेशा से होता रहा है और होता रहेगा. ये वे अच्छी तरह जानती हैं, लेकिन वे सौदे में नुकसान की हिमायती नहीं हैं.


घर वाले बतातेबताते यह भूल जाएंगे कि शब्दों के बहाने वे खुद अपनी ही बेटियोंऔरतों को चौराहों पर, सभाओं में या सड़कों पर नंगा कर रहे हैं. उन की इज्जत के चिथड़े कर रहे हैं, लेकिन जुलूस वालों की यह सोच कहां होती है? उन्हें तो मुआवजा चाहिए, औरत की देह का सरकारी मुआवजा.


अखबार के पहले पेज पर मुख्यमंत्रीजी के साथ छपी तसवीर ही शायद उन के दर्द का मरहम हो. चाहे कुछ भी हो, लेकिन लोग उन्हें देखेंगे, पढ़ेंगे और यकीनन हमदर्दी जताने के बहाने उन के घर कर उन के जख्म टटोलतेटटोलते खुद कोई चीरा लगा जाएंगे. भीड़ में इतनी सोच और सम? कहां होती है.


पर मगनाबाई इतनी छोटी सी उम्र में भी सब सम?ाने लगी थी. लड़की जब एक ही रात में औरत बना दी जाती है, तब सम? में आने वाली बातें भी सम? में आने लगती हैं. मर्दों के प्रति उस का नजरिया बदल जाता है. 15 साल की मगनाबाई 8 दिन की बच्ची को कंधे से चिपकाए जुलूस में चल रही थी.

उस के साथ उस जैसी और भी लड़कियां थीं. किसी की सलवार में खून लगा था, कपड़े फटे और गंदे थे. किसी के गले और मुंह पर खरोंचों के निशान साफ नजर रहे थे. अंदर जाने कितने होंगे. किसी का पेट बढ़ा था. क्या ये सब अपनीअपनी देह उघाड़ कर दिखाएंगी? कैसे बताएंगी कि उस रात कितने लोगों ने
मगनाबाई का गला सूखने लगा. कमजोरी के चलते उसे चक्कर आने लगे. लगा कि कंधे से चिपकी बच्ची छूट कर नीचे गिर जाएगी और जुलूस उस को कुचलता हुआ निकल जाएगा. जो कुचली जाएगी, उस के साथ किसी की भी हमदर्दी नहीं होगी.


मगनाबाई ने साथ चलती एक औरत को पकड़ लिया. उस औरत ने मगनाबाई पर एक नजर डाली, उस की पीठ थपथपाई, ‘‘बच्ची, जब इतनी हिम्मत की है, तो थोड़ी और सही. अब तो मंजिल के करीब ही गए
हैं. भरोसा रख. कहीं कहीं तो इंसाफ मिलेगा…’’ कहने वाली औरत को मगनाबाई ने देखा. मन हुआ कि हंसे और पूछे, ‘भला औरत की भी कोई मंजिल होती है? किस पर भरोसा रखे? भेडि़यों से इंसाफ की उम्मीद तुम्हें होगी, मु? नहीं,’ नफरत से उस ने जमीन पर थूक दिया.


कंधे से चिपकी बच्ची रोए जा रही थी. मगनाबाई का मन हुआ कि जलालत के इस मांस के लोथड़े को पैरों से कुचल जाने के लिए जमीन पर गिरा दे. उसे लगा कि बच्ची बहुत भारी होती जा रही है. उस के कंधे बो? उठाने में नाकाम लग रहे थे. जुलूस के साथ पैरों ने आगे बढ़ने से मना कर दिया था.


मगनाबाई कुछ देर वहीं खड़ी रही. जुलूस को उस ने आगे बढ़ जाने दिया. सड़क खाली हुई, तो उस की नजर सड़क के किनारे लगे हैंडपंप पर पड़ी. उस ने दौड़ कर किसी तरह बच्ची को गोद में उठाए ही पानी पीया. फिर वह एक बंद दुकान के चबूतरे पर रोती बच्ची को लिटा कर दीवार की टेक लगा कर बैठ गई.
बच्ची ने लेटते ही रोना बंद कर दिया. मगनाबाई को भी सुकून मिला. कुनकुनी धूप उसे भली लगी. वह भी बच्ची के करीब लेट गई. उस की आंखें मुंदने लगीं.


मगनाबाई इस जुलूस के साथ आना नहीं चाहती थी. गप्पू भाई और भोला चाचा ही उसे बिस्तर से घसीट कर जुलूस के साथ ले आए. उस की आंखों के सामने बस्ता ले कर स्कूल जाती चंपा, गंगा और जूही नाच उठीं, लेकिन अब उस का बस्ता छूट गया और बस्ते की जगह इस बच्ची ने ले ली. गप्पू भाई और भोला चाचा कहते थे कि मगनाबाई पहले की तरह स्कूल जा सकेगी. इस बच्ची को किसी अनाथालय में डाल देंगे. वह फिर पहले की तरह हो जाएगी. बस, मुख्यमंत्री से मुआवजा मिल जाए.


वे दोनों इन औरतों को दलदल से निकालने वाली संस्था के पैरोकार थे. जब भी पुलिस की रेड पड़नी होती थी, वे दोनों और उन की रखैलें इन औरतों के साथ बदसलूकी हो, इसलिए साथ होते. जब भी वे दोनों साथ होते, तो पुलिस वाले रहम से पेश आते थे. आमतौर पर प्रैस रिपोर्टर भी पहुंचे होते थे. वे दोनों कई बार गोरी चमड़ी वाली लड़कियों को भी लाते थे.


उन दोनों का खूब रोब था, क्योंकि दलालों को अगर डर लगता था, तो उन से ही. उन दोनों ने मुख्यमंत्री के सामने धरनेप्रदर्शन का प्रोग्राम बनाया था और पुलिस से मिल कर जुलूस का बंदोबस्त करा था. क्या मजाल है कि ये मिलीजुली जिस्म बेचने वाली थुलथुल लड़कियां इस तरह बाजार में निकल सकें. मगनाबाई को कहा गया था कि वे दोनों मुआवजा मांग रहे हैं. इस से स्कूल खुलवाएंगे.

इन की जिंदगी खुशहाल होगी. तभी मगनाबाई के विचारों को ?ाटका लगा. मुआवजा किस बात का? किसे मिलेगा? क्या इसलिए कि 9 महीने तक इस बच्ची को बस्ते की जगह पेट में लादे घूमती रही थी? बारीबारी से लोगों का वहशीपन सहती रही थी? या फिर मुआवजे के रूप में गप्पू और भोला की पीठ ठोंकी जाएगी कि उन्होंने बेटी और बहन को अपनी मर्दानगी से परिचित कराया? सरकार उस की भी पीठ ठोंकेगी कि वह स्कूल जाने की उम्र में मां बनना सीख गई?


क्या सरकार उस से पूछेगी कि उसे मां किस तरह बनाया गया? क्या वह बता पाएगी कि उस के भाई ने पहली बार उस के हाथपैर खाट की पाटियों से बांध कर उसे चाचा को सौंप दिया था? चाचा ने भी इस के बदले भाई को मुआवजा दिया था और फिर भाई ने भी चाचा की तरह वही सब उस के साथ दोहराया था.


यही सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा. उसे डर दिखाया जाता कि अगर किसी से इस बात का जिक्र किया, तो काट कर फेंक दिया जाएगा. मुआवजे के रूप में यह बच्ची उस की कोख में गई. पता नहीं, दोनों में से किस की थी? क्या इन तमाम औरतों के साथ भी इसी की तरहबच्ची दूध पी कर सो गई थी.
तभी किसी ने बाल पकड़ कर मगनाबाई को ?ाक?ोरा, ‘‘तो यहां है नवाबजादी?’’


मगनाबाई ने मुड़ कर देखा. भोला चाचा जलती आंखों से उसे देख रहा था.
‘‘मैं नहीं जाऊंगी. अब मु? से नहीं चला जाता,’’ मगनाबाई ने कहा.
‘‘चला तो तु? से अभी जाएगा. चलती है या उतारूं सब के सामने…’’
लोग सुन कर हंस पड़े. वे चटपटी बात सुन कर मजेदार नजारा देखने के इच्छुक थे. उसे लगा कि यहां मर्द नहीं, महज जिस्मफरोश हैं.


डरीसहमी मगनाबाई बच्ची को उठा कर धीरेधीरे उन के पीछे चल दी. भोला चाचा ने मगनाबाई को पीछे से जोरदार लात मारी. उस के मुंह से निकला, ‘‘हम जिस्मफरोश नहीं हैं. हमारी मांगें पूरी करोपूरी करो…’’ 

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