Hindi Kahani: अमीर

रो की तरह डमरू ने चबूतरे की सफाई की. उसी समय उस पर कुछ सजीधजी औरतों ने दया दिखाई. प्रसाद के 2 लड्डू दे दिए उस को. डमरू आगे बढ़ गया. 10 मिनट चल कर ट्रक के करीब आया. आधे दाम पर 3 दर्जन केले खरीद लिए. अब उसे इस जंगल के दूसरी तरफ चादर बिछा कर केले बेचने थे.
दरअसल, इस कसबे की एक तरफ छोटा सा जंगल है. बंदर आते हैं. लोग केले खिला देते हैं. इस तरह डमरू की आमदनी हो जाती है.

अकेले रहने वाले डमरू के पास बचत के 2,120 रुपए रखे हैं. हर दिन 50 रुपए के केले खरीद कर 130 रुपए में बेच देता है. डमरू को रोज मुनाफा होता है. 65 साल की अकेली जिंदगी. उसे रुपए की इसीलिए कमी नहीं रहती है. अब दोपहर से शाम हो रही थी. वैसे दिन ढलना एक रोज घटने वाली घटना है. उसी तरह तय समय पर डमरू का 1-1 लड्डू कुछ समय पर निकाल कर खाना. खाने का उसे कोई शौक नहीं रहा है, इसलिए कुछ भी पकाना नहीं है और उस का बहुत सारा समय बच जाता है वरना जब पत्नी थी, तब सुबह उठ कर रोटी बनाने में ही उस का बहुत सारा समय बरबाद हो जाता था.

डमरू लड्डू पर बाजार से खरीदा गया काला नमक छिड़कता है और काम तमाम. मीठा और नमकीन दोनों का मजा एकसाथ. जैसे कभीकभार पानी में शक्कर बुरक कर भी पी जाता है. लड्डू खत्म तो अखबार के उस कतरे को कूड़ेदान में डाल कर वह अपनी जगह पर कर बैठ गया. इधर गरमी भी अपना रंग दिखाते जा रही थी, बदन जैसे ?ालस ही जाए. ऐसे में कुछ लोग अपने घरों से निकलने में कतरा रहे थे. दोपहरी का यह समय तमाम जगहों पर आराम का होता है, लेकिन डमरू अपनी टूटी चप्पल घसीट कर घर जाए और फिर बचे हुए केले बेचने आए, यह नामुमकिन है, इसीलिए रोज इतनी तेज धूप में भी इसी नीले के किनारे आसमान के नीचे बैठा रहता है, गरमी के कम होने तक. कोई भूलाभटका ग्राहक भी जाता था.

एक बार तो कुछ मजदूर आए और एक दर्जन केले खरीद कर ले गए. वाह, ऐसे में डमरू खुश हो गया.
लेकिन डमरू का ज्यादा समय ऊंघने में ही बीतता था. जमीन में पड़ा हुआ उस का वजूद कितना कमजोर लगता था. दुबलापतला बूढ़ा आदमी, जिस के बालों की बसावट जरा भी घनी नहीं थी. खोपड़ी ही दिखाई देती थी. मुंह खोल कर बीचबीच में ऊंघता हुआ डमरू सचमुच किसी ढोल सा लग रहा था जिसे किसी ने हथेली नहीं, बल्कि टहनी मार कर, ?ाक?ार कर, बारबार बजा कर जिंदा कर दिया हो. नाली के किनारे पर दूर नीम के पेड़ के पीछे जमा सूखे पत्तों और इस बुजुर्ग में कितनी तो समानता है, मगर इस की किसी को परवाह नहीं. अचानक डमरू को कुछ लोगों की आवाज सुनाई दी. सिर पर पोटली रखे कुछ औरतें रही थीं. वे सब डमरू के करीब गईं. वे 4 औरतें थीं. बेहद गरीब लग रही थीं. डमरू की फटी चादर के पास बैठ गईं.

एक औरत बोली, ‘‘हमारे पास पैसे नहीं हैं. हम को केले खाने को दे दो.’’ डमरू ने उन को गौर से देखा. उसे 4 साल पहले मरी अपनी पत्नी याद गई. लाली नाम था. मटकती रहती थी. डमरू को जाने क्या सू?. वह बोला, ‘‘गीत सुनाओ. तब फोकट में केला मिलेगा.’’ ‘‘अच्छा, ठीक है,’’ कह कर वे औरतें एक फिल्मी गीत गाने लगीं. 2-3 लाइनें गा कर उन सब को जोश गया. एक के बाद एक टूटेफूटे 10 गीत सुना दिए डमरू को. डमरू ने केले गिने. पूरे 12 थे. उस ने खुशीखुशी उन औरतों को दे दिए. खुश हो कर वे औरतें केले ले कर चली गईं. डमरू ने भी चादर समेटी और मजे से गुनगुनाता हुआ अपने ठिकाने की तरफ चल दिया. आज वह किसी अमीरजादे सा महसूस कर रहा था

Hindi Kahani: क्या यही प्यार है?

जेबा की बरात आने वाली थी. सभी पूरी तैयारी के साथ बरात के आने का इंतजार कर रहे थे कि तभी जेबा का आशिक राहिल कहीं से अचानक आंगन में गया. ‘‘आप डरें नहीं. मैं कुछ गड़बड़ करने नहीं आया हूं. मैं तो सिर्फ जेबा से मिलने आया हूं. आज से वह किसी दूसरे की हो जाएगी. प्लीज, मु? उस से आखिरी बार मिल लेने दें,’’ आंगन में खड़ी औरतों से इतना कहने के बाद राहिल सीधा जेबा के कमरे में घुस गया, जिस में वह दुलहन बनी बैठी थी.

‘‘जेबा, यह तो मेरी शराफत है, जो तुम्हें किसी और की होते देख रहा हूं, वरना किस में इतनी हिम्मत थी कि जो तुम को मु? से जुदा कर देता. ‘‘खैर, मैं तुम से यह कहने आया हूं कि हम दो जिस्म जरूर हैं, लेकिन जान एक है. कोई दूसरा तुम्हारे सिर्फ तन पर हक जमा सकता है, लेकिन मन पर नहीं. मु? पूरा यकीन है कि तुम मु? कभी नहीं भूलोगी…’’ इतना कहने के बाद राहिल अपना मुंह जेबा के कान के पास ले जा कर धीरे से बोला, ‘‘तुम अपनी मांग में कभी सिंदूर मत भरना. मैं भी तुम से वादा करता हूं कि जिंदगीभर किसी दूसरी लड़की की तरफ नजर नहीं उठाऊंगा.

‘‘अच्छा जेबा, अब मैं चलता हूं. तुम हमेशा खुश रहो,’’ इतना कह कर राहिल उस कमरे से चला गया.
राहिल के जाने के बाद सब ने राहत की सांस ली, मगर दिलों में यह खटका बना रहा कि वह कमबख्त कहीं निकाह के वक्त कर किसी तरह की हंगामेबाजी शुरू कर दे. इन हालात से निबटने के लिए जेबा के घर वालों ने पूरी तैयारी कर रखी थी. पर सबकुछ शांति से पूरा हो गया और जेबा अपने हमसफर शबाब के साथ एक नई जिंदगी शुरू करने के लिए रवाना हो गई. वैसे तो सबकुछ ठीक हो गया था, लेकिन जेबा और उस के घर वाले अंदर ही अंदर काफी परेशान थे कि राहिल जाने कब क्या कर बैठे.
जेबा और राहिल एकदूसरे को चुपकेचुपके चाहते रहे थे. इस सचाई से परदा तब उठा, जब जेबा की शादी शबाब के साथ तय कर दी गई. राहिल को जब इस बात का पता चला, तो उस के दिल की धड़कन जैसे थम सी गई.

कभी जी चाहता कि जेबा को ले कर कहीं भाग जाए, तो कभी उस के बाप का खून कर देने का मन करता. कभी यह विचार आता कि वह अपना और जेबा का खात्मा कर डाले. वह तो जेबा की सू?ाबू? थी, जो पागल हाथी जैसे राहिल को किसी तरह काबू में किए थी. ‘‘आखिर मु? में क्या कमी है, जो जेबा को मु? से दूर किया जा रहा है?’’ एक दिन राहिल जेबा के अब्बा हशमत अली से उल? पड़ा. ‘‘कमी यह है कि तुम दिमाग से ज्यादा दिल की सुनते हो और जज्बाती हो. सब से बड़ी कमी तो तुम में यह है कि तुम दूसरों पर मुहताज हो. जो खुद मुहताज हो, वह भला दूसरों को क्या दे सकता है,’’ हशमत अली की साफगोई राहिल को बेहद कड़वी लगी, फिर भी जवाब में वह खामोश रहा. राहिल एक बेरोजगार और भावुक किस्म का नौजवान था. बाप के पास जो दौलत थी, बस उसी पर उस की जिंदगी का दारोमदार था. वह अपनी जिंदगी के प्रति कभी संजीदा नजर नहीं आया.

शौहर के रूप में शबाब को पा कर जेबा बहुत खुश थी. एक भले संजीदा शौहर की सारी खूबियां उस में कूटकूट कर भरी थीं. शबाब जेबा का पूरा खयाल रखता कि उसे किसी तरह की तकलीफ पहुंचने पाए. मगर जेबा ही इस मामले में नाकाम थी, क्योंकि वह पूरे तनमन से चाह कर भी अपने शौहर के आगे खुद को पेश नहीं कर पाती थी. जेबा इस बात को ले कर डरीसहमी रहती कि अपने शौहर से पहले वह किसी और की थी. कभीकभी उसे राहिल के दीवानेपन से भी डर लगता. वह जानती थी कि राहिल जुनून में कर किसी भी हद को पार कर सकता है, इसीलिए वह चाह कर भी शबाब को अपने प्यार से दूर रखती थी.
सब से बड़ी बात तो यह थी कि जेबा ने आज तक शबाब के नाम का सिंदूर अपनी मांग में नहीं लगाया, जो शबाब को अच्छा नहीं लग रहा था. राहिल ने जेबा को इस बात के लिए मना कर के उस की शादीशुदा जिंदगी पर कितना बड़ा जुल्म ढाया था. जेबा राहिल के गुस्से से शबाब को बचाने के लिए ही अपनी मांग को सिंदूर से नहीं सजाती थी.

शादी के 2 दिन बाद ही जेबा की सूनी मांग को देख कर शबाब पूछ बैठा, ‘‘अरे, यह क्या जेबा, तुम्हारी मांग में सिंदूर क्यों नहीं है?’’ जेबा ने बड़े प्यार से शबाब को सम?ाया, ‘‘असल में सिंदूर से मु? एलर्जी है. बचपन में गुड्डेगुडि़यों का ब्याह रचाने के दौरान गुड्डे की अम्मां बनी लड़की ने खेलखेल में मेरी मांग में सिंदूर डाल दिया था. इस के कुछ समय बाद ही मेरे सिर में खुजली होने लगी थी और मैं चकरा कर गिर पड़ी थी. तब से मैं सिंदूर से काफी दूर रहने लगी हूं.’’ जेबा की दलील सुन लेने के बाद शबाब चुप तो हो गया था, लेकिन उसे कुछ अटपटा सा जरूर लगा था. सास ननदें जेबा को मांग में सिंदूर डालने की कहतेकहते थक चुकी थीं, लेकिन उस के कान पर जूं तक नहीं रेंगी. इस बात को ले कर परिवार में मनमुटाव सा रहने लगा था. इससे पहले कि जेबा की जिद और ससुराल वालों की नाराजगी कोई गंभीर रूप लेती, एक दिन अचानक घटी एक घटना ने जेबा की सारी उल?ानों को पलभर में ही सुल? दिया. राहिल ने जेबा के किसी करीबी रिश्तेदार के हाथों उस के पास एक खत भेजा, जिस में लिखा था:

जेबा, मैं तुम्हारे दिलोदिमाग पर हुकूमत तो नहीं कर सका, लेकिन उस पर नाजायज ढंग से कब्जा कर के तुम्हें ब्लैकमेल जरूर करता रहा. अब इस बात का एहसास मु? पूरी तरह से होने लगा है. मु? दुख है कि मेरी घटिया सोच का शिकार हो कर तुम घुटनभरी जिंदगी जी रही हो और धीरेधीरे अपने ससुराल वालों की नजरों में गिरती जा रही हो. मु? माफ कर दो. तुम ने सही कहा था कि मेरा यह गैरसंजीदापन कभी मु? महंगा पड़ सकता है. एक खुशखबरी सुनो. मैं शादी करने जा रहा हूं. वह भी एक ऐसी लड़की के साथ, जो मु? जैसे किसी सड़कछाप आशिक के जुल्म का शिकार हो चुकी है. जानती हो, इस तरह की लड़की को अपना हमसफर बना कर मैं क्या करना चाहता हूं? मैं अपने गुनाह की सजा कम करना चाहता हूं.

शादी के बाद भी तुम पर अपना नाजायज हक जमा कर मैं ने गुनाह नहीं तो और क्या किया है. तुम मेरी दीवानगी का खौफ अपने जेहन से बिलकुल निकाल दो और पूरे तनमन से शबाब की बीवी बन कर जिंदगी गुजारो. आज से अपनी मांग सूनी मत रखना. तुम्हारा नाचीज, राहिल.’ खत पढ़ लेने के बाद जेबा खुद को इतना हलका महसूस कर रही थी, मानो उस की छाती पर से कोई बहुत बड़ा बो? हट गया हो.                        

Hindi Kahani: संकट मोचन

Hindi Kahani: ‘हां सब की इच्छा पूरी होती है.’ आजकल भगवानों में कारोबारी होड़ लगी हुई है. सब ने एक ऐसा स्लोगन ढूंढ़ निकाला है, जो आम आदमी को अपनी तरफ खींचता है. कहते हैं कि यहां सब की इच्छा पूरी होती हैऔर इस में कोई शक भी नहीं कि ज्यादातर लोगों की इच्छाएं पूरी होती हैं. 90 से 95 फीसदी तक, पर वे कैसे पूरी होती हैं? क्या यह किसी बाबा या भगवान का चमत्कार है या जो चंदा हम उस द्वार पर चढ़ाते हैं या फिर कोई मनोविज्ञान?

पहले तो हमें यह देखना होगा कि हम मांग क्या रहे हैं? मान लीजिए कि एक गरीब आदमी के पास एक टूटी हुई साइकिल है, जो रोजाना वर्कशौप में ही खड़ी रहती है. वह भगवान से एक साइकिल मांगता है और कहता है कि पुरानी ही देदे भगवान, बस रोजाना वर्कशौप ठीक कराने जाना पड़े. एक इनसान के पास एक ठीक सी साइकिल है, पर थोड़ी पुरानी हो गई है, वह भगवान से एक नई साइकिल की इच्छा रखता है.
एक इनसान, जिस के पास साइकिल है और 10-12 हजार रुपए हैं, वह एक पुराने स्कूटर या पुरानी मोटरसाइकिल की इच्छा रखता है और जिस के पास पुराना दोपहिया है, वह एक नए दोपहिया के लिए प्रार्थना करता है.

ठीकठाक दोपहिए वाला एक पुरानी कार की इच्छा रखता है और पुरानी कार वाला एक नई कार की. और इसी तरह एक छोटी कार वाला एक बड़ी कार की. कोई लड़का या लड़की अच्छे कालेज में दाखिले की, फिर अच्छी नौकरी की. कोई बहनबेटी की शादी की. खतरनाक बीमारी हो गई है, तो उस के ठीक होने की. सड़क पर सोता होगा तो ?ाग्गी की और ?ाग्गी में सोता होगा तो एक किराए के कमरे की, किराए के 3 कमरे हों तो  अपना हो जाए चाहे एक ही हो. और अगर एक कमरा है तो 2 कमरे, 2 हों तो 3 कमरेऔर इन में से ज्यादातर लोगों की तमन्ना पूरी हो जाती है. किसी गरीब आदमी की ?ाग्गी की छत बहुत ठीक होने के चलते उस में बारिश में पानी टपकता है या सर्दीगरमी में ठंड और गरमी लगती होगी, तो वह भगवान से यही कहता होगा कि कुछ पैसे जाएं, तो मैं छत ठीक करवा लूं.

क्यों और कैसे यह इच्छा पूरी होती है, क्योंकि वह भक्त अपनी इच्छा पूरी करने के काफी करीब है, वह उस को पाने वाला ही है, कोशिश तो वह कर ही रहा है और वह अपनी इच्छा पूरी करने में सक्षम है और उस की इच्छा बहुत बड़ी भी नहीं है. टूटी हुई साइकिल वाले के लिए पुरानी ठीक साइकिल, पुरानी ठीक साइकिल वाले के लिए नई साइकिल और नई साइकिल वाले के लिए पुराना स्कूटर, पुराने स्कूटर वाले के लिए नया स्कूटर और नए स्कूटर वाले के लिए पुरानी कार और पुरानी कार वाले के लिए नई कार और छोटी कार वाले के लिए बड़ी कार की इच्छा पूरी होने की बहुत ज्यादा उम्मीद रहती है. सड़क पर सोने वाले के लिए ?ाग्गी, ?ाग्गी वाले के लिए किराए के कमरे की इच्छा पूरी होने की बहुत ज्यादा उम्मीद रहती है. ये सब लोग अपने मकसद के बहुत करीब हैं.

बहनबेटी का ब्याह भी हो ही जाएगा, चाहे जो भी लड़का मिलेगा. बेटेबेटी का भी कालेज में दाखिला होगा और कहीं कहीं नौकरी भी लग ही जाएगी. शुरू में कम और बाद में ज्यादा तनख्वाह की नौकरी लग जाएगी. आज के हालात और इच्छा में आर्थिक अंतर जितना कम होगा, उतनी ही इच्छा पूरी होने की उम्मीद ज्यादा और जल्दी रहेगी. जितना अंतर ज्यादा होगा, उतना समय ज्यादा लगेगा और उम्मीद कम हो जाएगी या फिर उस इच्छा को पूरा करने के लिए गलत रास्ता अपनाना होगा. अगर टूटी हुई साइकिल का मालिक एक नई मोटरसाइकिल की इच्छा करने लगे तो उस की उम्मीद कम हो जाएगी और इच्छा पूरी हुई तो बहुत ज्यादा समय लगेगा. अगर एक किराए के कमरे में रहने वाला कोठी की तमन्ना करने लगे तो
उस की उम्मीद बहुत कम हो जाएगी और हो सकता है कि एक पीढ़ी भी पार कर जाए.

एक आदमी जिस के पास साइकिल है और 10-12 हजार रुपए हैं, तो सम?ों कि आप की इच्छाएं कैसे पूरी हो रही हैं. गांव के लोगों की इच्छाएं पूरी नहीं होतीं, क्योंकि उन की इच्छाएं होती ही नहीं हैं. इच्छाएं क्यों नहीं होतीं, क्योंकि उन की जेब में पैसे ही नहीं हैं. वे किसी भी इच्छा को पूरा करने में सक्षम नहीं हैं, इसलिए वे भगवान के द्वार अपनी अर्जी नहीं लगाते हैं. मु? ऐसे फोन आते हैं कि आप लक्ष्मी, हनुमान, गणेश किसी एक का लौकेट खरीद लें, जो ओरिजनल है (बाजार में डुप्लीकेट भी हैं), आप की सब इच्छाएं पूरी हो जाएंगी और आप के घर लक्ष्मी बरसेगी. कीमत मात्र 3,000 रुपए. मैं ने उस से कहा कि मु? 100 लौकेट दे दें, लेकिन मैं अभी पैसे नहीं दूंगा. मैं  उन को भारत के किसी गरीब गांव में जा कर बांट दूंगा और एक साल बाद जा कर देखूंगा कि कितने लोगों के घर लक्ष्मी बरसी है.

अगर उन में से 50 फीसदी लोग भी अमीर (पेटभर पौष्टिक भोजन, बच्चों को पढ़ाईलिखाई, कपड़े, बड़ों को स्कूटर) हो गए होंगे, तो मैं आप को 6,000 के हिसाब से 3 लाख के बदले 6 लाख दूंगा. इस के बाद से उस का फोन आना बंद हो गया यानी कोई चमत्कार, बाबा या भगवान कुछ नहीं कर रहा. आप ही कर रहे हैं.
एक स्लोगन है किभगवान उन की सहायता करता है, जो अपनी सहायता स्वयं करते हैंतो फिर भगवान क्या करता है? यानी मु? ही कुछ करना है और मैं कर भी रहा हूं, तभी तो मेरी समस्याएं दूर हो रही हैं.
भगवान, अल्लाह, गौड से मेरा मतलब सर्वशक्तिमान यानी सुपर पावर से है.   Hindi Kahani

Politics: आईना-मुफ्तखोरी से चुनाव जीतने की चाल

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली कमेटी ने राजनीतिक दलों के द्वारा चुनावों के समय मुफ्त की घोषणाओं पर चिंता जाहिर की. इस से पहले जस्टिस एनवी रमन्ना ने भी अगस्त, 2022 में राजनीतिक दलों के द्वारा मुफ्त की घोषणाओं पर सवाल खड़ा किया था.

राजनीतिक दल सत्ता में बने रहने के लिए या सत्ता में वापसी के लिए लोकलुभावनी घोषणाएं करते हैं, जो खुलेतौर पर लालच होता है. चुनावों की इन घोषणाओं से मुफ्तखोरी की सोच को खूब बढ़ावा मिला है.
यह शुरुआत साल 1987 के हरियाणा विधानसभा चुनावों के समय से हुई थी. तब चौधरी देवीलाल ने वादा किया था कि अगर वे मुख्यमंत्री बनेंगे तो किसानों का कर्जा माफ कर देंगे और उस समय चौधरी देवीलाल की पार्टी को हरियाणा में भारी बहुमत मिला था और किसानों का कर्जा माफ हुआ था. तब से राजनीतिक दलों ने किसानों की कर्जमाफी को अपनी चुनावी जीत का अमोघ अस्त्र बना लिया. पिछले 10 साल से तो मुफ्त चुनावी घोषणाओं की बाढ़ सी गई है.

जब राजनीतिक दल और नेता मुफ्तखोरी की लालच वाली घोषणा करते हैं तो उन्हें खुद नहीं पता होता है कि मुफ्त घोषणाओं से होने वाले पैसे के नुकसान का कौन जवाबदेह होगा. मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने के मामले में राजनीतिक दल और नेता बेलगाम घोड़े की तरह हो गए हैं. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान ने मुफ्तखोरी के लालच की इतनी घोषणाएं की थीं कि उन्हें खुद पता नहीं है कि कौन सी घोषणा कब कहां की गई, जिस में लाड़ली बहना योजना में महिलाओं को लगातार लालच दिया गया.
वर्तमान मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा है कि लाड़ली बहनों के खाते में 3,000  नहीं 5,000 रुपए दिए जाएंगे. इसी तरह महाराष्ट्र में भी लाड़ली बहना योजना का चुनावी मौडल पेश किया गया.

हाल ही में प्रधानमंत्री ने तमिलनाडु के आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर महिलाओं के खाते में 5,000-5,000 रुपए डालने की घोषणा की. राजनीतिक दलों ने भांप लिया है कि मुफ्तखोरी का टुकड़ा फेंक कर वोट बटोरना बहुत आसान है और यह राजनीतिक दलों के पक्ष में गए चुनाव नतीजों से पता चलता है. प्रयागराज के कुंभ के समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने घोषित कर दिया था कि प्रयागराज आने वाले रेल यात्री अगर बगैर टिकट रेल यात्रा करें तो उन से टिकट के बारे में पूछताछ नहीं होनी चाहिए.
इस का नतीजा यह हुआ कि मुफ्त की भीड़ ने पूरी ट्रेनों पर कब्जा कर लिया. रिजर्व्ड डब्बों में मुफ्त की भीड़ जबरन तोड़फ़ोड़ कर के घुस गई. रेलवे के कानूनकायदे और पुलिस दोनों बेबस हो गए थे.

मुफ्त की भीड़ ने रेलवे का बहुत ज्यादा नुकसान किया और सीना तान कर मुख्यमंत्री जिंदाबाद के नारे लगाए. जिन लोगों ने ऐसी फर्स्ट, सैकंड, थर्ड या स्लीपर में अपना यात्रा रिजर्वेशन बहुत पहले से करा लिया था उन पर भी मुफ्त की भीड़ ने अपना हक जमा लिया था. एक तरह से मुफ्तखोरी, चोरी और सीनाजोरी को खुद सरकार ने खुला मैदान दे दिया था. महात्मा गांधी ने कहा था कि असल भारत गांवों में रहता है. भारत के असल गांव मुंशी प्रेमचंद की कहानियों में रहते हैं. ठीक उसी तरह से भारत का असल वोट बैंक ?ांपड़पट्टियों और पिछड़े लोगों में रहता है. किसानों के कर्ज में रहता है. सरकारी स्कूलों में भले ही तालीम मिले या मिले मुफ्त मिड डे मील जरूर मिलता है. मुफ्त किताबें मुफ्त यूनिफौर्म, लाड़ली बहना का मुफ्त रुपया, मुफ्त अनाज, बुढ़ापे की मुफ्त पैंशन से मुफ्तखोरी खूब फलफूल गई है.

आम मतदाता अपनी सम? से वोट देने के बजाय मुफ्त की घोषणाओं का और कर्जमाफी का इंतजार करता है, उसी बुनियाद पर वोट डालता है. चुनाव से पहले वोट डालने और वोट नहीं डालने का मुआवजा राजनीतिक दल ठिकानों पर भेज देते हैं. चुनाव आयोग के नियमकायदे कागजी घोड़े से ज्यादा कुछ भी नहींहैं. आचार संहिता महज चुनाव आयोग की पारंपरिक औपचारिकता है, चुनाव आयोग की आंख में धूल ?ांकना या खुलेतौर पर चुनाव आयोग के नियमों को रौंद डालना राजनीतिक दलों के बाएं हाथ का मामूली खेल है. जिन लोगों ने चुनावों में मतदान केंद्रों पर ड्यूटी की है और रिटायर हो चुके हैं, उन से पूछा जाए
तो बता देंगे कि चुनाव का गेम कैसे होता है?

सरकारी महकमें से कहीं ज्यादा पावरफुल राजनीतिक दल का पोलिंग एजेंट होता है, चुनाव में ड्यूटी करने वालों को राजनीतिक दल सम? देते हैं कि आप हमारे काम में अड़ंगा मत डालिए, आप को यहीं हमारे बीच ही रहना, चुनाव आज आया है कल चला जाएगा इसलिए आप होश में रहें. चुनाव आयोग से कहीं ज्यादा मजबूत नैटवर्क राजनीतिक दलों के बूथ मैनेजमैंट का होता है. बाकी काम तो मुफ्त की चुनावी घोषणाएं और मुफ्त का लालच करते ही हैं. इसे रोका जाना मुमकिन नहीं है, क्योंकि राजनीति देशसेवा नहीं, बल्कि राजनीति देशसेवा के नाम पर भ्रष्टाचार का सफेदपोश कारोबार है. अगर नेता और राजनीतिक दल सत्ता में हैं तो इतना कमा लेते हैं कि आने वाले 2-3 युगों तक अगर पीढि़यां बैठ कर खाएं, उड़ाएं तो भी भ्रष्टता से बनाया खजाना खाली होने वाला नहीं है.

चुनाव आयोग खुद राजनीतिक दलों की शरणागत हो गया हो तो राजनीतिक दलों की मनमानी पर कंट्रोल करना नामुमकिन है. होना तो यह चाहिए कि मुफ्त की घोषणाओं की सप्लाई सरकारी खजाने के बजाय राजनीतिक दलों के राष्ट्रीय कोष से और नेताओं की निजी आमदनी से होनी चाहिए. आज लोग इनकम टैक्स देते हैं, अलगअलग टैक्स देते हैं, सरकारी ड्यूटी देते हैं, टोल टैक्स देते हैं. आम जनता सरकार का एटीएम बन गई है. सरकारी खजाने का बहुत बड़ा भाग सत्ता के सुख पर खर्च होता है. मध्य प्रदेश के एक मंत्री ने कुछ महीने पहले कहा था कि राजनीतिक दलों को मुफ्त की घोषणाओं से बाज आना चाहिए. मुफ्त की ऐसी घोषणाएं बजट पर और सरकारी खजाने पर भारी पड़ती हैं. सुप्रीम कोर्ट और जज कुछ भी नहीं कर सकते हैं. भांग सारे कुओं में है. कोई भी राजनीतिक दल मुफ्त की घोषणाओं से अछूता नहीं है. अगर कोई राजनीतिक दल या नेता मुफ्त की घोषणा नहीं करे तो उस की जमानत जब्त होना तय है.

राजनीति ने आम वोटरों को लालच की बहुत अच्छी आदत डाल दी है, मुफ्त के माल को कौन छोड़ना चाहेगा. इस के लिए राजनीतिक दल और वोट बैंक दोनों ही जवाबदेह है. बीते दशकों पहले जब एक घोर ईमानदार महापौर का कार्यकाल पूरा हो गया तो उन्हें आटेदाल के भाव याद गए. लोग आपसी चर्चाओं में कहते फिरते थे कि इतना इंतजाम तो कर लेना था कि परिवार को खाक नहीं छानना पड़ती.
मध्य प्रदेश के ही एक और मंत्री ने भ्रष्टाचार पर कहा है कि थोड़ाबहुत तो चलता है. मंत्रीजी भूल गए कि थोड़ा नहीं बहुत ज्यादा चलता है. रिश्वत लेना देना दंडनीय अपराध है.

बिना लेनदेन के कोई काम नहीं होता यह सौ फीसदी सच है. बिना लालच के असल वोट बैंक भी मतदान केंद्र तक जाता ही नहीं है, लालच ही उसे याद कराता है कि वह किस राजनीतिक दल के वोट बैंक की जमा पूंजी है और उसे किस राजनीतिक दल के हक में मतदान करना है. जब तक राजनीतिक लालच का वोट बैंक कायम है, तब तक चुनावी जीत और बहुमत पाना बहुत आसान है. बेवकूफ कोई नहीं है. वोटर और राजनीतिक दल दोनों ही बहुत होशियार हैं. असल वोट बैंक ही फैसला करता है कि देश की सत्ता का मसीहा कौन रहेगा.               

अरुण कुमार चौबे

Hindi Story: गली के कुत्ते

Hindi Story: रा के तकरीबन साढ़े 10 बज रहे थे. शहर की सड़कों पर हलकीहलकी ठंड उतर आई थी. सड़क किनारे बंद होती दुकानें. झिलमिलाती स्ट्रीट लाइट्स. बीचबीच में भागते आटोरिकशा और मोटरसाइकिलें. यह वही शहर था, जो कभी पूरी तरह सोता नहीं था. बस, कुछ घंटों के लिए आंखें मूंद लेता था.
आर्या औफिस से लौटते हुए बस से उतर कर पैदल घर की ओर बढ़ रही थी. बस स्टौप से घर तक का रास्ता मुश्किल से 10 मिनट का था. पर इन 10 मिनट में वह रोज जाने कितनी दुआएं पढ़ लेती थी.
आर्या के कानों में ईयरफोन नहीं थे. मोबाइल भी हाथ में नहीं था, क्योंकि उस ने बहुत पहले सीख लिया था कि रात की सड़कें सजग रहने वालों का इम्तिहान लेती हैं.

उस गली में कदम रखते ही आर्या ने हलकी सी सीटी बजाई. सीटी की आवाज सुनते ही गली के कोने से
3-4 कुत्ते निकल आए. ये कोई नए कुत्ते नहीं थे. ये वही थे जिन्हें वह महीनों से जानती थी. औफिस से लौटते वक्त वह अकसर उन के लिए बिसकुट ले आती थी. वीकैंड पर उन्हें रोटी खिलाए बिना उस के दिन की शुरुआत नहीं होती थी. जब भी महल्ले के डौग लवर्स उन कुत्तों को टीका लगवाने का इंतजाम करते, आर्या भी बढ़चढ़ कर उन की मदद करती. कुत्तों के इलाज और देखभाल में अकसर वह सब से आगे रहती. बरसात में उन के लिए टिन की शैड बनवाने का विचार भी उसी का था. उस छोटे से इंतजाम ने सर्दी और बारिश में गली के कुत्तों को बड़ी राहत दी थी. यही वजह थी कि वे आर्या की आहट पहचानते थे. उसे अपना मानते थे.

आर्या भी जानती थी कि ये कुत्ते भरोसेमंद हैं, क्योंकि ये अपनी हद जानते हैं. हवस की आग में ये पागल हो कर इधरउधर नहीं भटकते और सब से जरूरी बात यह कि ये गली को अपना घर मानते थे. इन दिनों कुत्तों को ले कर शहर में खूब विवाद चल रहा था. अखबारों में सुर्खियां थीं. टीवी डिबेट में शोर था. कोई कहता था सड़क के कुत्ते खतरनाक हैं. कोई उन्हें हटाने की मांग कर रहा था. पर आर्या जानती थी कि असल खतरा दांतों से नहीं, नीयत से होता है. गली के एक बुजुर्ग अकसर कहते थे, ‘‘बेटा, जिस कुत्ते को रोज खाना मिलता है और इलाज होता है, वह गली का पहरेदार बन जाता है.’’ उन की यह बात आर्या के दिल में उतर गई थी.

जैसे ही वह थोड़ा आगे बढ़ी, पीछे से बाइक का इंजन दहाड़ा. 2 लड़के थे. सिर पर हैलमैट नहीं. चेहरे पर बेहूदा आत्मविश्वास. एक ने कहा, ‘‘ओए देख, नाइट शिफ्ट वाली रही है.’’ दूसरा हंसा, ‘‘चल, मजे लेते हैं.’’ आर्या का दिल जोर से धड़कने लगा. उस ने कदम तेज कर दिए. पीछे से फिर आवाज आई, ‘‘डर क्यों रही हो जानेमन, हम तो आशिक हैं तुम्हारे. इन कुत्तों से कितना दिल लगाओगी, थोड़ा हम से भी लगा लो. कसम से मजा बहुत आएगा.’’ आर्या के मन में एक वाक्य कौंध गया, ‘गली का कुत्ते गली के इन वहशी लड़कों से कहीं बेहतर होते हैं. वे कम से कम इज्जत की हद जानते हैं.’ उस ने फिर से सीटी बजाई. इस बार आवाज तेज थी. कुत्ते तुरंत उस के चारों ओर गए. एक आगे. 2 पीछे. एक बगल में. बाइक जैसे ही पास आई, कुत्तों ने एक साथ भौंकना शुरू कर दिया. तेज, आक्रामक, चेतावनी भरी लहजे में.
एक लड़का घबरा गया, ‘‘अबे चल, ये काट लेंगे.’’ दूसरा भी बोला, ‘‘छोड़ यार, आज नहीं.’’

बाइक लड़खड़ाई और वापस मुड़ गई. गालियां देते हुए वे दोनों अंधेरे में गायब हो गए. आर्या वहीं खड़ी रह गई. उस के हाथ कांप रहे थे. पर इस बार डर से ज्यादा गुस्सा था. उस ने ?ाक कर कुत्तों के सिर पर हाथ फेरा. वह पूंछ हिलाने लगे. जैसे कह रहे हों, ‘तुम निश्चिंत रहो, यह हमारी गली है और हम तुम्हारे साथ हैं.’
घर पहुंचते ही मां ने पूछा, ‘‘आज फिर देर हो गई.’’ आर्या बोली, ‘‘हां मां, कुछ छिछोरे कुत्ते पीछे लग गए थे.’’ मां ने पूछा, ‘‘सब ठीक तो है ?’’ आर्या ने कहा, ‘‘हां मां, गली के कुत्ते साथ थे.’’ मां हलकी मुस्कुराईं, ‘‘अच्छा है. आजकल इनसानों से ज्यादा वही भरोसेमंद हैं.’’ अगले दिन औफिस में आर्या ने जब यह सारी घटना सुनाई. किसी ने कहा, ‘‘समाज के लिए असली खतरा ये 2 टांगों वाले कुत्ते ही हैं, जो
दुनिया को अपनी हवस के चश्मे से देखते हैं.’’

किसी ने कहा, ‘‘नगरनिगम को इन कुत्तों पर भी नकेल कसने की योजना लानी चाहिए. सड़क पर घुमते वहशी जानवर सोसाइटी के लिए बड़ा खतरा हैं.’’ आर्या शांत स्वर में बोली, ‘‘सच में, खतरनाक वे कुत्ते नहीं हैं जिन्हें रोटी नहीं मिलती, बल्कि खतरनाक वह ठरक है जिसे संस्कार मिलता है, सही इलाज.’’
उस दिन से कुत्तों के लिए आर्या के मन में इज्जत बढ़ गई थी. गली के कुत्तों के लिए अब और लोग आगे आने लगे थे. सही देखभाल मिलने पर कुत्तों का बरताव और संतुलित हो गया. धीरेधीरे गली बदलने लगी. मनचले गायब हो गए. रातें थोड़ी सुरक्षित हो गईं. आर्या अब निडर हो कर घर लौटती है. वह जानती है. इस गली में कुत्ते सिर्फ जानवर नहीं हैं. वे पहरेदार हैं. दोस्त हैं और कई बार इनसानों से ज्यादा इनसान हैं.
इस सड़क पर आज भी 2 तरह के कुत्ते हैं. एक वे जो भूख में भौंकते हैं और दूसरे वे जो हवस में नोंचने को दौड़ते हैं. पहले वाले गली की शान हैं, दूसरे समाज का कलंक.                   

Readers Problem: मैं एक लड़की से प्यार करता हूं लेकिन उससे प्यार का इजहार करने में डरता हूं, अपने दिल की बात उसे कैसे बताऊं?

सवाल

मैं एक लड़की से प्यार करता हूं. हम दोनों रोज मोबाइल फोन पर बात करते हैं, लेकिन मैं उस से प्यार का इजहार करने में डरता हूं. कोई उपाय बताएं कि मैं आगे क्या करूं?

जवाब

आप अभी कुछ दिन और यों ही मोबाइल पर प्यार भरी बातें करते रहें. मुमकिन है कि वह लड़की थकहार कर प्यार का इजहार कर दे.

अभी जो बातचीत हो रही है, उसे और रोमांटिक रुख देने की कोशिश करें. उस के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने की कोशिश करें और प्यार के इजहार के लिए मुनासिब वक्त का इंतजार करें. एक दिन खुद ब खुद आप के मुंह से ‘आई लव यू’ निकल ही जाएगा. वैसे, यह ‘वैलेंटाइन डे’ वाला फरवरी महीना है. इसी महीने में कह डालें कि ‘आई लव यू’ और बोलते न बने तो मैसेज भी कर सकते हैं.

Hindi Story: सही फैसला

मिन्नी कम उम्र की एक शहीद की विधवा थी और बच्ची की मां भी. इधर मेहुल भी पत्नी की मौत के बाद अपने बच्चों को अकेले पाल रहा था. फिर होली आई और गलती से मेहुल ने मिन्नी को रंग लगा दिया. आगे क्या हुआ? मिन्नी का पूरा नाम मीनाक्षी था. मेहुल जबजब दिव्या के घर जाता था, मिन्नी दिखाई पड़ जाती थी. उस को शुरूशुरू में मिन्नी को ले कर उत्सुकता थी, लेकिन दिव्या भाभी से मिन्नी की दुखी जिंदगी के बारे में जो कहानी सुनी थी, उस से उस को सारी बातें पता चली थीं. मिन्नी दिव्या के बड़े ताऊ की एकलौती बेटी थी. मांबाप बहुत पहले ही मर गए थे, लिहाजा उस का लालनपालन दिव्या के घर में ही हुआ था. उस के पिता 2 भाई थे. बहुत सारी जमीन थी. घर में मनों अनाज होता था. रुपएपैसे की कोई कमी नहीं थी.
मांबाप के मरने के बाद मिन्नी की पढ़ाईलिखाई उस के चाचाजी ने एक पिता की तरह से ही की थी. उन्होंने मिन्नी को कभी किसी बात की कमी महसूस नहीं होने दी थी.

मिन्नी पढ़नेलिखने में भी होशियार थी. हमेशा अपनी क्लास में फर्स्ट आती थी. बचपन बीतने के बाद और पढ़ाईलिखाई करने के बाद चाचाजी ने उस की शादी कर दी. शादी के तुरंत बाद ही मिन्नी के पति की मौत हो गई थी. सीमा पर दुश्मनों से लोहा लेते हुए सचिन शहीद हो गया था. पति की मौत के बाद मिन्नी गांव के स्कूल में पढ़ाने लगी थी. वह अपने पैरों पर खड़ी औरत थी. आज के समय की औरत. चुनौतियों से लोहा लेने वाली. पढ़ीलिखी स्वाभिमानी औरत. जबजब मेहुल की नजर मिन्नी पर पड़ती तो वह बस देखता ही रह जाता. मेहुल पास में ही रहता था और दिव्या के घर में उस का आनाजाना था. मिन्नी का गोरा चेहरा, पतली लंबी नाक, भरा हुआ बदन. कोई चाहता भी तो मिन्नी को देख कर नजरअंदाज नहीं कर सकता था, फिर तो मेहुल आदमी था. वह 77 साल का था. उस की पत्नी हेमा जिस की उम्र जब महज 25 साल थी. दूसरे बच्चे को जन्म देते समय चल बसी थी. इस का दुख मेहुल को हमेशा दिल में सालता रहता था.

लेकिन? इधर मिन्नी के में जैसी आवाज ही नहीं थी. सचिन की मौत से उस को सदमा सा लगा था. वह हंसना जैसे भूल गई थी. गोद में एक बच्ची थी. उस का दुख और उस के भविष्य के बारे में सोचती तो दिल में जैसे नश्तर से चुभते थे. मिन्नी की शादी भी 24 साल की उम्र में हो गई थी. शादी के महज सालभर बाद ही सचिन की मौत हो गई थी. मिन्नी की कहानी वह दिव्या भाभी के मुंह से सुन चुका था. बेचारी मिन्नी ने इतनी कम उम्र में विधवा होने का दर्द ?ोला था. एक कली जो ठीक से फूल भी नहीं बन सकी थी, मुर?ाई हुई सी रहने लगी थी. ऐसा जबतब बतियाते हुए दिव्या भाभी की रुलाई फूट पड़ती थी. इस बार दिव्या के पति संतोष उसे लिवाने नहीं आए थे. दुकान के काम से सूरत चले गए थे. होली सिर पर थी. मेहुल का अब इस दुनिया में 2 बच्चों के सिवा कोई नहीं था. घर पर दोनों भाभियों और मां के भरोसे उस ने बच्चों को छोड़ रखा था और दिव्या भाभी को लिवाने बनारस चला आया था.

दिव्या भाभी बतातीं कि दुनिया में कोई किसी का नहीं होता है. जब मिन्नी के पति की मौत हो गई तो ससुराल वालों ने मिन्नी को बहुत बुराभला कहा. यहां तक कि मनहूस तक कह दिया. उस को घर से निकाल दिया. दिव्या भाभी के मांबाप  और भाई सब लोग समझते रहे. इस में मिन्नी की क्या गलती है भला. लेकिन वे मिन्नी को घर से निकाल कर ही माने. मायके में चाचा चाची और भाई तो हालांकि कुछ कहते, लेकिन भाभियों को वह फूटी आंख नहीं सुहाती थी. यही वजह थी कि मिन्नी घर में सब से किनारे के कमरे में रहती थी. वह मुफ्त में खाना नहीं खाती थी, बदले में घर बरतन कर देती थी, कपड़े धो देती थी, ताकि उस को कोई मुफ्तखोर कहे. लेकिन इतना करने के बाद भी कोई किसी का मुंह थोड़े ही पकड़ सकता है. जिस के जो मन में आता, वही कह देता. मेहुल यह सब सुन कर दुखी हो जाता था. अगले दिन होली थी. मेहुल मन बना कर आया था कि वह इस बार दिव्या के साथ जम कर होली खेलेगा. बैठक में पकवान बन रहे थे. मेहुल बाहर गया तो चौपाल पर महफिल सजी थी. मेहुल भी बैठ गया. खूब भांग पी.

दोपहर हो गई. मेहुल को भूख लग गई थी. वह वापस घर गया तो देखा कि दिव्या अपनी भाभियों के साथ होली खेल रही थीइसी बीच मेहुल ने दिव्या से कहा, ‘‘भाभी कुछ नमकीन ले कर आओ.’’ दिव्या ने नहीं सुना, लेकिन मिन्नी बाहर ही बैठी थी. वह प्लेट में नमकीन लाने चली गई. इधर मेहुल कमरे में जा कर हथेली पर रंग मलने लगा. सामने ही रंगों से भरा हुआ ड्रम रखा था, जिस में घोला हुआ रंग पड़ा था.
इसी बीच मिन्नी कमरे में नमकीन देने मेहुल के पास चली गई. मेहुल को लगा शायद भाभी नमकीन ले कर आई है. मेहुल ने हथेली पर मला हुआ रंग मिन्नी के गालों पर मल दिया. धोखा दिव्या और मिन्नी के कपड़ों से हुआ था. दोनों ने एक ही रंग के कपड़े पहन रखे थे. तब तक दिव्या भी कमरे में गई थी. वह हंसते हुए बोली, ‘‘क्यों देवरजी, खा गए धोखा.’’ मेहुल बोला, ‘‘भाभी, आप दोनों ने एकजैसे कपड़े पहन रखे थे, इसलिए धोखा हो गया.’’

मिन्नी के चेहरे पर मिलेजुले भाव थे. एक तरफ खुश थी कि कई सालों के बाद किसी ने उस पर रंग डाला था और दुखी सामाजिक मर्यादा को ले कर थी कि भला समाज और लोग क्या कहेंगे. दिव्या ने छेड़ा, ‘‘अच्छा बच्चू, भाभी को छोड़ कर भाभी की बहन से होली खेली जा रही है.’’ ‘‘अभी आप की शिकायत दूर किए देता हूंरुकिए,’’ और हाथ में बचा हुआ गुलाल उस ने दिव्या के गालों पर मल दिया. मिन्नी ने भी ड्रम में पड़ा हुआ रंग मेहुल पर पिचकारी से दे मारा. इस तरह भाभी और मिन्नी के साथ वह बहुत देर तक रंग और गुलाल से होली खेलता रहा. शाम के समय लोग अबीर खेल रहे थे. बैठक में सब लोग बैठे हुए थे. मिन्नी ठंडाई ले कर आई. अचानक मेहुल के मुंह से निकला, ‘‘दिव्या भाभी, मैं एक बात कहना चाहता हूं. हेमा के मरने के बाद से मेरी जिंदगी तहसनहस हो गई है. मैं बच्चों की परवरिश ठीक से नहीं कर पा रहा हूं. घरबाहर दोनों जगह आखिर मैं कैसे संभालूंगा

जब तक मां हैं, चल रहा हैउस के बाद सोचता हूं, तो कलेजा मुंह को आने लगता है. मैं चाहता हूं कि मिन्नी से शादी कर लूं.’’ दिव्या के पिताजी को हैरानी हुई. वे बोले, ‘‘बेटा, मिन्नी हमारी बेटी है. लेकिन तुम्हें मैं अंधेरे में नहीं रखना चाहता. बेटा, मिन्नी विधवा है. उस को एक बेटी है, फिर भी तुम उस से शादी करना चाहते हो…’’ दिव्या बोली, ‘‘पिताजी, कई बार मेरे मन में भी यह खयालआया था, लेकिन देवरजी से कहते डरती थी. पता नहीं वे क्या सोचेंगे. लेकिन आज मैं ने होली खेलते हुए देख लिया कि मेहुल का मन कितना पवित्र है. ‘‘दरअसल, मैं ने और मिन्नी ने एक ही रंग के कपड़े पहन रखे थे. मेहुलजी को धोखा हो गया.  मिन्नी पर रंग डाल दिया था. तब से अपनी गलती का पछतावा करना चाह रहे हैं. ऐसा भला आदमी कहां मिलेगा. इन की भलमनसाहत है कि  मिन्नी से माफी मांगने लगे थे.
‘‘जब से यह घटना हुई है, ये आंख नहीं मिला पा रहे हैं.  खैर इन का रिश्ता बनता है, लेकिन अब ये मिन्नी से शादी करना चाहते हैं.’’

मेहुल बोला, ‘‘हां पिताजी, मिन्नी विधवा हो गई तो इस में भला उस की क्या गलती है. लोगों को उस को भला ताने देना का हक किस ने दे दिया है. यह तो गर्व की बात है कि वह एक शहीद की विधवा है, जिस ने देश के लिए अपनी जान की कुरबानी दी है, लेकिन लोग शहीद की विधवा से कैसा बरताव कर रहे हैं, देख लीजिए. ‘‘क्या किसी विधवा को समाज में जीने का हक नहीं है? क्या किसी विधवा को खुश रहने का हक नहीं है? अगर नहीं है तो मैं परवाह नहीं करता ऐसे समाज की, जिस की जड़ें खोखली हों. ‘‘इस के अलावा 3-3 बच्चों की जिम्मेदारियों के बारे में भी सोचिए. उन की परवरिश करने का भी तो सवाल है. आखिर ये बच्चे कैसे पलेंगे, इस के बारे में भी सोचिए जरा. इन तीनों बच्चों की जिंदगी में खुशियां लौट आएंगी.’’

‘‘ठीक है बेटा, जब तुम ने और दिव्या ने फैसला कर ही लिया है, तो इस से बड़ी खुशी की बात भला और क्या होगी. होली के बाद किसी दिन लगन रखवाता हूं,’’ मिन्नी के पिताजी बोले. आज मिन्नी के पैर जमीन पर नहीं पड़ते थे. वह बहुत खुश थी. आज से कोई उस को मनहूस नहीं कहेगा. उस का भी कोई चाहने वाला होगा. उस का भी अब कोई अपना घर होगा. मिन्नी की मांग भरने वाली थी. उस की वीरान जिंदगी में बहार आने वाली थी. एक शहीद पिता की बच्ची को एक नए पिता मिल गए थे. आज आसमान में इंद्रधनुष निकला था. सात रंगों का चमकीला इंद्रधनुष.                  

Bhojpuri Star: हर महिला बने बोल्ड-अपर्णा मलिक

Bhojpuri Star: कबड्डी की स्टेट चैंपियन रह चुकी अपर्णा मलिक ने अपने कैरियर की शुरुआत साउथ फिल्म इंडस्ट्री से की, जहां उन्होंने तेलुगु फिल्मों में काम कर अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाया. इस के बाद उन्होंने भोजपुरी सिनेमा की ओर रुख किया और यहां भी अपनी दमदार अदाकारी से दर्शकों के दिलों में जगह बना ली.
पटना में आयोजित 7वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स शो के दौरान अपर्णा मलिक से हुई खास मुलाकात में उन्होंने खुल कर बात की. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश :

कबड्डी की स्टेट चैंपियन से एक्ट्रेस बनने तक, यह ट्रांजिशन कितना फिल्मी रहा?
स्पोर्ट्स बैकग्राउंड होने का बहुत फायदा मिला है. इस से मेरे अंदर हमेशा स्पोर्ट्स स्पिरिट बनी रहती है, जिस से हैल्दी कंपीटिशन की भावना आती है.

क्या आप किसी फिल्म में स्पोर्ट्स गर्ल का रोल करना चाहेंगी?
मैं आप को बताना चाहूंगी कि मेरी एक फिल्म आने वाली है, जिस का नाम हैधाकड़ सासजिस में स्पोर्ट्स गर्ल होते हुए गांव की सीधीसादी लड़की कैसे एक बौक्सिंग चैंपियन बनती है, यह देखने को मिलेगी. मेरी एक तेलुगु फिल्म जो अभी जल्दी ही थिएटर में रिलीज हुई है, ‘वन/4’ जिस में मैं स्विमर बनी हूं, इसलिए मेरी यह हसरत बहुत कम समय में ही पूरी हो चुकी है.

अररिया से सिनेमा तक का सफर, सब से टफ मोमैंट कौन सा था?
अररिया से सिनेमा तक आने का सफर की अगर बात करूं तो मेरा सब से टफ मोमैंट लोगों को सम?ाना रहा क्योंकि अररिया एक छोटी सिटी है. वहां पर लोगों की सोच अभी उतनी विकसित नहीं है कि वे इस चीज को एक्सैप्ट करें कि लड़कियां यहां से निकल के बाहर जा कर या विदेश में जा कर पढ़ाई भी करें, तो फिर सिनेमा जगत में आना तो उन के लिए बहुत बड़ी बात हो जाती है.

आप का पहला आडिशन कैसा गया था?
पहला आडिशन मेरी जिंदगी का बेहद खास अनुभव था. मैं ने उस आडिशन को बहुत ही ध्यान से तैयार किया, 3-4 बार रिकौर्ड किया, अलगअलग स्टेट्स में शूट किया और जब लगा कि यह बिलकुल नैचुरल
और संतोषजनक है, तभी फाइनल वीडियो भेजा. मेरा वह आडिशन बहुत पसंद किया गया. इस के बाद मेरा लुक टैस्ट हुआ, फिर फोटोशूट हुआ और आखिर में मु? तेलुगु फिल्मडैडलाइनऔफर हुई.

क्या ग्लैमरस दिखना इंडस्ट्री की जरूरत है या पर्सनल चौइस?
हर किसी के लिए ग्लैमर की परिभाषा अलग होती है. कई बार लोगों के चेहरे पर ही एक नैचुरल ग्लैमरस लुक होता है, जो उन्हें सब से अलग बनाता है. मेरे हिसाब से ग्लैमरस दिखने के लिए सबसे जरूरी चीज है, आप का कौन्फिडैंस और आप का एटीट्यूड. अगर आप के अंदर खुद को कैरी करने का आत्मविश्वास है, तो वही असली ग्लैमर है.

क्या आप को लगता है कि आज की हीरोइन को ज्यादा बोल्ड होना पड़ता है?
मेरे हिसाब से बोल्ड होने का मतलब है कि आप अपने लिए खड़े हो सकें, अपनी बात खुल कर रख सकें और गलत के खिलाफ आवाज उठा सकें. अगर आप के साथ या किसी और के साथ कुछ गलत हो रहा है और आप उस के खिलाफ बोल पा रहे हैं, तो वही असली बोल्डनैस है, इसलिए मु? लगता है कि सिर्फ हीरोइन को ही नहीं, बल्कि हर महिला को बोल्ड होना चाहिए. हर किसी को अपने हक के लिए खड़ा होना आना चाहिए.

आप का दिल जीतने के लिए किसी में क्या क्वालिटी होनी चाहिए?
हमेशा से सादगी बहुत पसंद है. मेरे लिए सब से जरूरी है कि इनसान दिल का सच्चा हो, अच्छा हो और सम्मान देना जानता हो. अगर किसी में ये गुण हैं, तो मेरे दिल को जीतने के लिए इतना ही काफी है.

इंस्टाग्राम पर फेमस होना कितना चैलेंजिंग है?
आज के समय में इंस्टाग्राम पर फेमस होना काफी चैलेंजिंग हो गया है. कई बार ऐसा लगता है कि वहां
फेमस होने के लिए लोगों को बहुतओवर टौपजा कर काम करना पड़ता हैज्यादा एक्सप्रैसिव होना, कभीकभी जरूरत से ज्यादा ओवर एक्टिंग करना. मैं ने कई ऐसे कलाकारों को देखा है, जो सिर्फ फेमस होने के लिए इस तरह के तरीके अपनाते हैं. लेकिन मेरे हिसाब से ये चीजें ज्यादा समय तक टिकती नहीं हैं. जो चीजें जल्दी वायरल होती हैं, उन का असर भी उतनी ही जल्दी खत्म हो जाता है, जैसे वायरल फीवर कुछ दिनों में उतर जाता है.

फैंस के कमैंट्स आप को मोटिवेट करते हैं या प्रैशर देते हैं?
मेरे इंस्टाग्राम और बाकी सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स पर हमेशा फैंस का बहुत प्यार और सपोर्ट मिलता है. उन के कमैंट्स प्रैशर नहीं देते, बल्कि और ज्यादा मोटिवेट करते हैं. उन का यही प्यार और सपोर्ट हर दिन बेहतर करने के लिए प्रेरित करता है.

क्या कभी भोजपुरी के किसी कोस्टार ने आप को सरप्राइज किया?
मेरा पहला काम जब पवन सिंह के साथ आया, तो मैं ने उन के बारे में पहले काफीकुछ सुन रखा था, इसलिए थोड़ा सा संशय था. लेकिन जब मैं ने उन के साथ काम किया, तो मेरा अनुभव बिलकुल अलग और बेहद पौजिटिव रहा. वे बहुत ही स्वीट, डीसैंट और सहयोगी इनसान हैं. इसी तरह, खेसारीलाल यादव के बारे में भी लोगों से कई तरह की बातें सुनने को मिली थीं, लेकिन जब मैं ने उनके साथ काम किया, तो लगा ही नहीं कि वे वैसे हैं जैसा अकसर कहा जाता है. वे बहुत ही सरल, विनम्र और सहयोगी हैं.

आप को साउथ और भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में सब से बड़ा फर्क क्या लगा?
साउथ फिल्म इंडस्ट्री आज के समय में बहुत बड़ी हो चुकी है और कई मामलों में इंटरनैशनल लैवल तक पहुंच चुकी है. वहीं भोजपुरी इंडस्ट्री में अभी बहुत संभावनाएं हैं और आगे बढ़ने की काफी गुंजाइश है. हालांकि, एक चीज जो दोनों इंडस्ट्री में समान लगी, वह है अपनापन. दोनों ही जगह लोगों का बरताव बहुत ही सहयोगी और आत्मीय होता है. मेरा एक सपना यह भी है कि मैं मलयालम फिल्मों में काम करूं. अभी तक वहां काम करने का मौका नहीं मिला है, लेकिन अगर सबकुछ अच्छा रहा, तो मैं जरूर मलयालम इंडस्ट्री का हिस्सा बनना चाहूंगी.

क्या आप पैन इंडिया स्टार बनने का सपना देखती हैं?
जी हां, मैं पैन इंडिया स्टार बनने का सपना जरूर देखती हूं. अभी तक मैं ने 5 अलगअलग भाषाओं में काम किया है और मेरा मानना है कि जिस दिन मैं इन सभी भाषाओं में एकसाथ एक बड़ी फिल्म कर पाऊंगी, उसी दिन खुद को सही माने में पैन इंडिया स्टार कह सकूंगी.
अपने फैंस के लिए कोई मैसेज?
अपने फैंस के लिए मैं बस इतना कहना चाहूंगी, ‘दिल में हो तुम, सांसों में तुमज् बोलो तुम्हें और क्या दूं…’ आप लोगों का जो प्यार और आशीर्वाद मिला है, वही मेरी सब से बड़ी ताकत है.                         

 

Filmi Story: परदे की दुनिया-अक्षय है पैसों के पीछे पागल

Filmi Story: फिल्महेरीफेरीमें अक्षय कुमार के किरदार राजू को तिकड़मबाज दिखाया गया था जो किसी भी तरीके से अमीर बनना चाहता है. अब इस फिल्म के डायरैक्टर प्रियदर्शन ने कहा है कि अक्षय कुमार असली जिंदगी में भी राजू जैसा शैतान है, जो पैसों के पीछे पागल है.
एक इंटरव्यू में अक्षय कुमार ने बताया कि पहले फिल्मों में एक्शन सीन करने का ही मौका मिला था, इतना शैतान और पैसों के पीछे पागल राजू के जैसा किरदार कभी नहीं मिला. यही कारण था कि मैं ने राजू को चुना. इस पर डायरैक्टर प्रियदर्शन ने कहा कि अक्षय कुमार असल जिंदगी में भीराजूजैसे ही शैतान हैं और पैसों के पीछे पागल हैं. याद रहे कि तकरीबन 25 साल लंबे गैप के बाद अक्षय कुमार और
डायरैक्टर प्रियदर्शन एकसाथ दर्शकों को हंसाने के लिएभूत बंगलाफिल्म ले कर रहे हैं.

मोनालिसा को धमकी
महाकुंभ में माला बेचने की रील से फेमस हुई नीली आंखों वाली मोनालिसा को अचानक से एक फिल्म मिली और वे लगातार सुर्खियों में बनी रहीं. फिलहाल वे अपनी शादी को ले कर चर्चा में हैं.
दरअसल, मोनालिसा ने कुछ दिन पहले ही फरमान खान के साथ भाग कर शादी की थी. अब दोनों ने कहा है कि उन्हें जान से मारने की धमकी मिल रही है और वे सिक्योरिटी चाहते हैं. दोनों ने सरकार से गुहार लगाई है. मोनालिसा और फरमान दोनों ने मदद की अपील करते हुए कहा, ‘मैं यह वीडियो एक लैटर के साथ सभी को मेल कर रही हूं तो प्लीज हमारी मदद करोहमें खुलेआम जान से मारने और काटने की धमकी दी जा रही है.’

नोरा फतेही के गाने पर बवाल
हिंदी फिल्मों में आइटम डांसर बन कर नोरा फतेही ने खूब नाम कमाया है, पर अब उन के एक गाने पर बवाल हो गया है, इतना ज्यादा कि उसे यूट्यूब से भी हटा दिया गया है. नोरा फतेही और संजय दत्त पर फिल्माया गया गानासरके चुनर तेरी सरकेफिल्मकेडी डेविलका है, पर इस गाने के बोल और डांस को ले कर लोगों ने कड़ा एतराज जताया. इस गाने के बोल को बेहूदा और डबल मीनिंग बताया. साथ ही, गाने की कोरियोग्राफी को भी भड़काऊ करार दिया.                      

 Readers Problem: सच्ची सलाह

मैं 20 साल की लड़की हूं और हरियाणा के सोनीपत शहर में रहती हूं. हमारे घर के पास शराब का एक ठेका है, जहां रोजाना मनचले खड़े होते हैं और आतीजाती लड़कियों और औरतों पर फब्तियां कसते हैं. इस बात से हम सब बहुत ज्यादा परेशान हैं.

इस समस्या से निकलने के लिए मैं क्या करूं?
काजल की कोठरी में हैं तो शरीर तो काला होगा ही. इन मनचलों शराबियों से पंगा लेने से भी कोई फायदा नहीं होता. घर वालों को सम?ाएं कि ध्यान हम नहीं देते ध्यान वे देते हैं और इस से परेशानी होती है, जो कभी किसी बड़े हादसे की सबब भी बन सकती है. घर वाले राजी हो जाएं तो उन्हें इस घर को बेच कर किसी साफसुथरी लोकेशन पर मकान लेने के लिए कहें. मैं 25 साल का हूं. मेरी शादी भाभी की बहन से हुई है. मेरी बीवी मेरी बात नहीं मानती. भाभी भी मेरे मांबाप की इज्जत नहीं करतीं और

मेरी बीवी को भी अपने जैसा बनाना चाहती हैं. वे हमेशा लड़ाई करती हैं. मैं क्या करूं?
आप भाभी को अच्छी तरह सम? दें कि वे आप की बीवी को बिगाड़ें. बीवी को भी सख्ती से बता दें कि उसे आप के साथ रहना है, कि अपनी बहन के साथ. मुमकिन हो, तो मांबाप बीवी को ले कर अलग रहने का बंदोबस्त कर लें. अंतरंग मौकों पर बीवी को प्यार से भी  मैं 19 साल का हूं. मैं 2 साल से एक मुसलिम लड़की से प्यार करता हूं. वह भी मु? चाहती है, पर 6 महीने पहले उस की शादी हो गई. फोन पर उस से बातें होती रहती हैं. मैं उस के बिना नहीं रह सकता. मन करता है कि खुदकुशी कर लूं. राय दें?
आप की उम्र 21 साल नहीं है. लड़की दूसरे धर्म की है और उस की शादी भी हो चुकी है. यानी किसी भी लिहाज से आप के प्यार की कोई मंजिल नहीं है. लड़की को अपने पति के साथ चैन से जीने दें. पढ़लिख कर कुछ बन जाएं, तब सही उम्र में प्यार शादी करें

मैं 22 साल का हूं. मेरी शादी को एक साल हो गया है. मैं बीवी से बहुत प्यार करता हूं और चाहता हूं कि वह हमेशा मेरे साथ रहे, पर वह अपने मम्मीपापा के पास रहना चाहती है. मैं क्या करूं?
शायद आप को प्यार जताना नहीं आता, इसीलिए बीवी आप के साथ
नहीं रहना चाहती. आप उसे खूब घुमाएंफिराएं और वैसा ही करें, जैसा वह चाहती है. उसे इतना प्यार करें
कि वह आप के साथ रहने पर मजबूर हो जाए.

मैं 20 साल का हूं. भाईभाभी की शादी को 7 साल हो चुके हैं. उन के कोई औलाद नहीं है. इस बीच मैं और भाभी आपस में प्यार करने लगे. भाई को पता चल गया. लिहाजा, वे भाभी को छोड़ना चाहते हैं. मैं क्या करूं?
भाभी की इज्जत करनी चाहिए, इज्जत लूटनी नहीं चाहिए. आप भाभी को दें कि आप दोनों से गलती हुई है. भाई से गलती के लिए माफी मांग लें कि वे परिवार तोड़ें. पढ़ाई या नौकरी के नाम पर भाभी की जिंदगी से दूर चले जाएं.
मैं एक लड़के से बहुत प्यार करती हूं, पर उसी लड़के को एक और लड़की भी चाहती है. वह कहती है कि वह उसे पहले से प्यार करती थी. वह मेरे प्रेमी से अलग करना चाहती है. मेरा पे्रमी उस के प्यार से इनकार करता है और छोड़ना नहीं चाहता. क्या करना चाहिए?
आप प्रेमी से खुल कर बातें करें कि अगर वह आप को ही चाहता है, तो आप से शादी कर ले. ऐसा होने पर वह लड़की खुद दूर हो जाएगी. अगर प्रेमी दोनों चक्कर पाले रहता है,  वह लंपट है और उस से नाता तोड़ लें.        
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