रो की तरह डमरू ने चबूतरे की सफाई की. उसी समय उस पर कुछ सजीधजी औरतों ने दया दिखाई. प्रसाद के 2 लड्डू दे दिए उस को. डमरू आगे बढ़ गया. 10 मिनट चल कर ट्रक के करीब आया. आधे दाम पर 3 दर्जन केले खरीद लिए. अब उसे इस जंगल के दूसरी तरफ चादर बिछा कर केले बेचने थे.
दरअसल, इस कसबे की एक तरफ छोटा सा जंगल है. बंदर आते हैं. लोग केले खिला देते हैं. इस तरह डमरू की आमदनी हो जाती है.

अकेले रहने वाले डमरू के पास बचत के 2,120 रुपए रखे हैं. हर दिन 50 रुपए के केले खरीद कर 130 रुपए में बेच देता है. डमरू को रोज मुनाफा होता है. 65 साल की अकेली जिंदगी. उसे रुपए की इसीलिए कमी नहीं रहती है. अब दोपहर से शाम हो रही थी. वैसे दिन ढलना एक रोज घटने वाली घटना है. उसी तरह तय समय पर डमरू का 1-1 लड्डू कुछ समय पर निकाल कर खाना. खाने का उसे कोई शौक नहीं रहा है, इसलिए कुछ भी पकाना नहीं है और उस का बहुत सारा समय बच जाता है वरना जब पत्नी थी, तब सुबह उठ कर रोटी बनाने में ही उस का बहुत सारा समय बरबाद हो जाता था.

डमरू लड्डू पर बाजार से खरीदा गया काला नमक छिड़कता है और काम तमाम. मीठा और नमकीन दोनों का मजा एकसाथ. जैसे कभीकभार पानी में शक्कर बुरक कर भी पी जाता है. लड्डू खत्म तो अखबार के उस कतरे को कूड़ेदान में डाल कर वह अपनी जगह पर कर बैठ गया. इधर गरमी भी अपना रंग दिखाते जा रही थी, बदन जैसे ?ालस ही जाए. ऐसे में कुछ लोग अपने घरों से निकलने में कतरा रहे थे. दोपहरी का यह समय तमाम जगहों पर आराम का होता है, लेकिन डमरू अपनी टूटी चप्पल घसीट कर घर जाए और फिर बचे हुए केले बेचने आए, यह नामुमकिन है, इसीलिए रोज इतनी तेज धूप में भी इसी नीले के किनारे आसमान के नीचे बैठा रहता है, गरमी के कम होने तक. कोई भूलाभटका ग्राहक भी जाता था.

एक बार तो कुछ मजदूर आए और एक दर्जन केले खरीद कर ले गए. वाह, ऐसे में डमरू खुश हो गया.
लेकिन डमरू का ज्यादा समय ऊंघने में ही बीतता था. जमीन में पड़ा हुआ उस का वजूद कितना कमजोर लगता था. दुबलापतला बूढ़ा आदमी, जिस के बालों की बसावट जरा भी घनी नहीं थी. खोपड़ी ही दिखाई देती थी. मुंह खोल कर बीचबीच में ऊंघता हुआ डमरू सचमुच किसी ढोल सा लग रहा था जिसे किसी ने हथेली नहीं, बल्कि टहनी मार कर, ?ाक?ार कर, बारबार बजा कर जिंदा कर दिया हो. नाली के किनारे पर दूर नीम के पेड़ के पीछे जमा सूखे पत्तों और इस बुजुर्ग में कितनी तो समानता है, मगर इस की किसी को परवाह नहीं. अचानक डमरू को कुछ लोगों की आवाज सुनाई दी. सिर पर पोटली रखे कुछ औरतें रही थीं. वे सब डमरू के करीब गईं. वे 4 औरतें थीं. बेहद गरीब लग रही थीं. डमरू की फटी चादर के पास बैठ गईं.

एक औरत बोली, ‘‘हमारे पास पैसे नहीं हैं. हम को केले खाने को दे दो.’’ डमरू ने उन को गौर से देखा. उसे 4 साल पहले मरी अपनी पत्नी याद गई. लाली नाम था. मटकती रहती थी. डमरू को जाने क्या सू?. वह बोला, ‘‘गीत सुनाओ. तब फोकट में केला मिलेगा.’’ ‘‘अच्छा, ठीक है,’’ कह कर वे औरतें एक फिल्मी गीत गाने लगीं. 2-3 लाइनें गा कर उन सब को जोश गया. एक के बाद एक टूटेफूटे 10 गीत सुना दिए डमरू को. डमरू ने केले गिने. पूरे 12 थे. उस ने खुशीखुशी उन औरतों को दे दिए. खुश हो कर वे औरतें केले ले कर चली गईं. डमरू ने भी चादर समेटी और मजे से गुनगुनाता हुआ अपने ठिकाने की तरफ चल दिया. आज वह किसी अमीरजादे सा महसूस कर रहा था

आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें

डिजिटल + 24 प्रिंट मैगजीन

(1 साल)
USD48USD10
 
सब्सक्राइब करें

सरस सलिल सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं

  • सरस सलिल मैगजीन का सारा कंटेंट
  • 1000 से ज्यादा सेक्सुअल हेल्थ टिप्स
  • 5000 से ज्यादा अतरंगी कहानियां
  • चटपटी फिल्मी और भोजपुरी गॉसिप
  • 24 प्रिंट मैगजीन

डिजिटल

(1 महीना)
USD4USD2
 
सब्सक्राइब करें

सरस सलिल सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं

  • सरस सलिल मैगजीन का सारा कंटेंट
  • 1000 से ज्यादा सेक्सुअल हेल्थ टिप्स
  • 5000 से ज्यादा अतरंगी कहानियां
  • चटपटी फिल्मी और भोजपुरी गॉसिप
 
और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...