सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली कमेटी ने राजनीतिक दलों के द्वारा चुनावों के समय मुफ्त की घोषणाओं पर चिंता जाहिर की. इस से पहले जस्टिस एनवी रमन्ना ने भी अगस्त, 2022 में राजनीतिक दलों के द्वारा मुफ्त की घोषणाओं पर सवाल खड़ा किया था.

राजनीतिक दल सत्ता में बने रहने के लिए या सत्ता में वापसी के लिए लोकलुभावनी घोषणाएं करते हैं, जो खुलेतौर पर लालच होता है. चुनावों की इन घोषणाओं से मुफ्तखोरी की सोच को खूब बढ़ावा मिला है.
यह शुरुआत साल 1987 के हरियाणा विधानसभा चुनावों के समय से हुई थी. तब चौधरी देवीलाल ने वादा किया था कि अगर वे मुख्यमंत्री बनेंगे तो किसानों का कर्जा माफ कर देंगे और उस समय चौधरी देवीलाल की पार्टी को हरियाणा में भारी बहुमत मिला था और किसानों का कर्जा माफ हुआ था. तब से राजनीतिक दलों ने किसानों की कर्जमाफी को अपनी चुनावी जीत का अमोघ अस्त्र बना लिया. पिछले 10 साल से तो मुफ्त चुनावी घोषणाओं की बाढ़ सी गई है.

जब राजनीतिक दल और नेता मुफ्तखोरी की लालच वाली घोषणा करते हैं तो उन्हें खुद नहीं पता होता है कि मुफ्त घोषणाओं से होने वाले पैसे के नुकसान का कौन जवाबदेह होगा. मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने के मामले में राजनीतिक दल और नेता बेलगाम घोड़े की तरह हो गए हैं. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान ने मुफ्तखोरी के लालच की इतनी घोषणाएं की थीं कि उन्हें खुद पता नहीं है कि कौन सी घोषणा कब कहां की गई, जिस में लाड़ली बहना योजना में महिलाओं को लगातार लालच दिया गया.
वर्तमान मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा है कि लाड़ली बहनों के खाते में 3,000  नहीं 5,000 रुपए दिए जाएंगे. इसी तरह महाराष्ट्र में भी लाड़ली बहना योजना का चुनावी मौडल पेश किया गया.

हाल ही में प्रधानमंत्री ने तमिलनाडु के आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर महिलाओं के खाते में 5,000-5,000 रुपए डालने की घोषणा की. राजनीतिक दलों ने भांप लिया है कि मुफ्तखोरी का टुकड़ा फेंक कर वोट बटोरना बहुत आसान है और यह राजनीतिक दलों के पक्ष में गए चुनाव नतीजों से पता चलता है. प्रयागराज के कुंभ के समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने घोषित कर दिया था कि प्रयागराज आने वाले रेल यात्री अगर बगैर टिकट रेल यात्रा करें तो उन से टिकट के बारे में पूछताछ नहीं होनी चाहिए.
इस का नतीजा यह हुआ कि मुफ्त की भीड़ ने पूरी ट्रेनों पर कब्जा कर लिया. रिजर्व्ड डब्बों में मुफ्त की भीड़ जबरन तोड़फ़ोड़ कर के घुस गई. रेलवे के कानूनकायदे और पुलिस दोनों बेबस हो गए थे.

मुफ्त की भीड़ ने रेलवे का बहुत ज्यादा नुकसान किया और सीना तान कर मुख्यमंत्री जिंदाबाद के नारे लगाए. जिन लोगों ने ऐसी फर्स्ट, सैकंड, थर्ड या स्लीपर में अपना यात्रा रिजर्वेशन बहुत पहले से करा लिया था उन पर भी मुफ्त की भीड़ ने अपना हक जमा लिया था. एक तरह से मुफ्तखोरी, चोरी और सीनाजोरी को खुद सरकार ने खुला मैदान दे दिया था. महात्मा गांधी ने कहा था कि असल भारत गांवों में रहता है. भारत के असल गांव मुंशी प्रेमचंद की कहानियों में रहते हैं. ठीक उसी तरह से भारत का असल वोट बैंक ?ांपड़पट्टियों और पिछड़े लोगों में रहता है. किसानों के कर्ज में रहता है. सरकारी स्कूलों में भले ही तालीम मिले या मिले मुफ्त मिड डे मील जरूर मिलता है. मुफ्त किताबें मुफ्त यूनिफौर्म, लाड़ली बहना का मुफ्त रुपया, मुफ्त अनाज, बुढ़ापे की मुफ्त पैंशन से मुफ्तखोरी खूब फलफूल गई है.

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