Crime Story : हुस्न और हवस का खूनी खेल

Crime Story : मिस्टर महेश का कारोबार अच्छा चल रहा था. उन की गारमैंट की कंपनी थी. उन के बनाए सामान का एक बड़ा हिस्सा ऐक्सपोर्ट होता था. मिस्टर महेश थोड़े नाटे और मोटे थे और रंग भी सांवला था, पर उन की पढ़ाईलिखाई और कारोबार करने की चतुराई लाखों में एक थी. मिस्टर महेश ने अमेरिका की हौर्वर्ड यूनिवर्सिटी से एमबीए करने के बाद अपने पिता का कारोबार संभाला था. वे तकरीबन 50 साल के हो चुके थे. उन की शादी भी हो चुकी थी. बीवी काफी खूबसूरत और स्मार्ट थी, पर 5 साल बाद ही उन्हें छोड़ कर किसी और के साथ विदेश जा बैठी थी. उस के बाद उन्हें शादी में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी. पर कुछ महीने पहले ही तकरीबन 25 साल की चंचल से उन की दूसरी शादी हुई थी.

चंचल अपनी निजी जिंदगी में भी काफी चंचल थी. 20 साल की उम्र में उस ने जानबूझ कर रवि से शादी की थी. रवि को कैंसर था और वह 3 साल के अंदर चल बसा.

रवि वैसे तो ज्यादा अमीर नहीं था, फिर भी 2 कमरे का एक फ्लैट, बीमा की रकम और कुछ बैंक बैलैंस मिला कर तकरीबन 2 लाख रुपए और साथ में एक स्कूटर वह छोड़ गया था.

पर वह रकम चंचल जैसी मौडर्न लड़की के लिए ज्यादा नहीं थी. धीरेधीरे वह रकम भी खत्म हो रही थी. इसी बीच उस ने मिस्टर महेश को अपने जाल में फांस लिया था. वह उन की कंपनी में सैक्रेटरी बन कर आई और फिर उन की लाइफ पार्टनर बन बैठी.

चंचल ने शादी के बाद नौकरी छोड़ दी. अब वह मिस्टर महेश के आलीशान बंगले में रहती थी और कार के भरपूर मजे ले रही थी.

इसी बीच मनीष नाम का एक नौजवान मिस्टर महेश की कंपनी में चंचल की जगह सैक्रेटरी बन कर आया.

चंचल और मिस्टर महेश की जिंदगी कुछ दिनों तक सामान्य रही थी. वह पेट से भी हुई थी, पर मिस्टर महेश को इस की भनक भी नहीं होने दी और उस ने बच्चा गिरवा लिया. उस की नजर मिस्टर महेश के कारोबार पर थी.

उधर मनीष अकसर मिस्टर महेश से मिलने घर पर भी आया करता था. चंचल उस की खूब खातिरदारी करती थी. उस के साथ बैठ कर बातें किया करती थी.

बातों के दौरान चाय का कप बढ़ाते समय वह अपना आंचल जानबूझ कर गिरा देती और अपने उभार दिखाती, तो कभी टेबल के नीचे से मनीष के पैरों से खेलती.

धीरेधीरे मनीष भी चंचल की ओर खिंचने लगा था. अब तो वह मनीष के साथ घूमने भी जाया करती थी.

कभीकभार खुद मिस्टर महेश भी मनीष को चंचल के साथ शौपिंग के लिए भेज देते थे. चंचल ने खुश हो कर मनीष को भी बिलकुल अपने जैसा एक कीमती मोबाइल फोन खरीद कर दिया था.

चंचल मनीष को शहर से थोड़ी दूर हाईवे पर बने एक रिसोर्ट पर ले जाती, वहां घंटों उस के साथ समय बिताती और उस के साथ बिस्तरबाजी भी करती. जो देहसुख उसे मिस्टर महेश से नहीं मिलता था, वह मनीष से पा रही थी.

मिस्टर महेश को कारोबार के सिलसिले में शहर से बाहर भी जाना होता था. ऐसे में तो चंचल और मनीष को पूरी छूट होती थी.

खून, खांसी और खुशी छिपाए नहीं छिपते हैं. धीरेधीरे उन दोनों के किस्से दफ्तर से होतेहोते मिस्टर महेश के कानों में भी पड़े, पर उन्होंने इसे चंचल के सामने कभी जाहिर नहीं होने दिया. वैसे, कुछ सचेत चंचल भी हो गई थी.

कुछ दिनों बाद मिस्टर महेश को फिर शहर से बाहर जाना पड़ा था. चंचल मनीष को जीप में बिठा कर फिर किसी रिसोर्ट में मजे ले रही थी.

उसी समय मिस्टर महेश का फोन चंचल के फोन पर आया था. मनीष ने अपना फोन समझ कर ‘हैलो’ कहा.

ठीक इसी बीच चंचल भी बोल उठी, ‘‘किस का फोन है डियर?’’

मिस्टर महेश की आवाज सुन कर मनीष ने फोन चंचल को पकड़ा दिया. बात कर के चंचल ने फोन रख दिया, पर दोनों के चेहरों पर चिंता की लकीरें खिंच आई थीं. उन की मौजमस्ती के आलम में खलल पड़ गया था.

चंचल ने कहा, ‘‘हमें इसी वक्त चलना होगा. मिस्टर महेश 2-3 घंटे में घर आने वाले हैं.’’

रिसोर्ट में आम के बाग थे. चंचल ने 10 किलो आम पैक कराए, तो मनीष पूछ बैठा, ‘‘इतने आमों का तुम क्या करोगी?’’

‘‘तुम आम खाओ, गुठली गिनने की क्या जरूरत है?’’ और दोनों ने एकएक आम जीप में बैठेबैठे खाया.

दोनों अब घर लौट रहे थे. जीप चंचल चला रहा थी. जिस ओर मनीष बैठा था, सड़क के ठीक नीचे गहरी खाई थी. एक जगह जीप को धीमा कर चंचल बाईं ओर पड़ी रेत के ढेर पर कूद गई और जीप का स्टीयरिंग थोड़ा खाई की तरफ ही काट दिया.

मनीष जीप के साथ खाई में जा गिरा था. चंचल की बांह पर मामूली खरोंचें आई थीं. थोड़ी दूर जा कर उस ने लिफ्ट ली और आगे टैक्सी ले कर घर पहुंची, तो देखा कि मिस्टर महेश सोफे पर बैठे कौफी पी रहे थे और टैलीविजन देख रहे थे.

मिस्टर महेश ने पूछा, ‘‘बड़ी देर कर दी… कहां गई थीं?’’

‘‘रिसोर्ट के बाग में फ्रैश आम की सेल लगी थी, वहीं चली गई थी.’’

इसी बीच टैलीविजन पर खबर आई कि एक जीप खाई में गिरी है. उस में सवार एक नौजवान की मौत हो गई है. उस जीप में आमों से भरा एक बैग भी था.

मिस्टर खन्ना बोल उठे, ‘‘तुम्हें तो चोट नहीं आई? मैं मनीष को नौकरी से निकालने ही वाला था. कमबख्त काम के समय दफ्तर से लापता रहता था. मौत ने उसे दुनिया से ही निकाल बाहर कर दिया.’’

इधर शिकारी चंचल अपनी साड़ी पर चिपकी रेत झाड़ रही थी.

Social Story : परमानंद क्या कर पाया क्लेम का आवदेन

Social Story : जब आंखें खुलीं, तो परमानंद ने देखा कि दिन निकल आया था. रात को सोते समय उस ने सोचा था कि सुबह वह जल्दी उठेगा. आटोरिकशा वालों की हड़ताल थी, वरना कुछ कमाई हो जाती. वैसे, आज के समय तांगा कौन लेता है? सभी तेज भागने वाली सवारी लेना चाहते हैं. आटोरिकशा वालों की हड़ताल से कुछ उम्मीद बंधी थी, पर सिर भारी हो रहा था. बुखार सा लग रहा था. इच्छा हुई, आराम कर ले, पर कमाएगा नहीं तो खाएगा क्या? और उस का रुस्तम? उस का क्या होगा?

परमानंद जल्दी से उठा और रुस्तम को चारापानी डाल कर तैयार होने के लिए चल दिया. जल्दीजल्दी सबकुछ निबटा कर उस ने तांगा तैयार किया और सड़क पर जा पहुंचा.

जल्दी ही सवारी भी मिल गई. 2 लोगों ने हाथ दिखा कर उसे रोका. उन में एक अधेड़ था और दूसरा नौजवान.

‘‘कलक्ट्रेट चलना है?’’ अधेड़ आदमी ने पूछा.

‘‘जी, चलेंगे,’’ परमानंद बोला.

‘‘क्या लोगे? पहले तय कर लो,नहीं तो बाद में झंझट करोगे,’’ नौजवान ने कहा.

‘‘आप ही मुनासिब समझ कर दे दीजिएगा. झंझट किस बात का?’’

‘‘नहींनहीं, पहले तय हो जाना चाहिए. हम 30 रुपए देंगे. चलना हैतो बोलो, नहीं तो हम दूसरी सवारी देखते हैं.’’

‘‘ठीक है साहब,’’ परमानंद बोला.

‘‘और देखो, कलक्ट्रेट के भीतर पहुंचाना होगा. बीच में ही मत छोड़ देना.’’

‘‘गांधी मैदान का भाड़ा ही 30 रुपए होता है. भीतर अंदर तक तो 50 रुपए होगा.’’

‘‘देखो, हम ने जो कह दिया, सो कह दिया. चलना है तो चलो,’’ नौजवान की आवाज सख्त थी.

परमानंद इनकार करने ही जा रहा था कि बुजुर्ग ने तांगे पर चढ़ते हुए कहा, ‘‘चलो, तुम 40 रुपए ले लेना. हम भी तो परेशानी में पड़े हैं.’’ अब परमानंद इनकार न कर सका. उस के सिर का दर्द बढ़ता जा रहा था और वह तकरार के मूड में नहीं था.

‘‘ठीक है, 40 रुपए ही सही,’’ परमानंद ने धीरे से कहा. तांगा सड़क पर सरपट दौड़ने लगा. आटोरिकशा वालों की हड़ताल से सड़क खाली सी थी. रुस्तम भी रात के आराम से तरोताजा हो कर तेजी से दौड़ रहा था.दोनों सवारी आपस में बातें कर रहे थे. पता चला, वे एक परिवार के नहीं हैं, बल्कि अलगअलग परिवारों से हैं. शायद दूर का रिश्ता हो. दोनों बाढ़ के नुकसान के अनुदान के सिलसिले में कलक्टर साहब के दफ्तर जा रहे थे.

थोड़ा आगे जाने पर सड़क की दूसरी ओर एक गिरजाघर दिखाई पड़ा. परमानंद ने देखा कि अंधेड़ ने बड़ी श्रद्धा और भक्ति से सिर झुकाया.

नौजवान ने हैरानी से पूछा, ‘‘आप ईसाई गिरजाघर को प्रणाम करते हैं?’’

अधेड़ ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘पता नहीं, किस देवी या देवता का आशीर्वाद मिल जाए और काम बन जाए?’’

वे अधेड़ बता रहे थे, ‘‘इस क्लेम को पाने के लिए मैं 50-60 हजार रुपए खर्च कर चुका हूं. क्लेम 2 लाख रुपए का किया है. अपने एकमंजिला मकान को दोमंजिला दिखाया है. खेती का नुकसान भी दोगुना दिखाया है,’’ और एक लंबी आह भरते हुए उन्होंने आगे जोड़ा, ‘‘देखें, कितना पास होता है और मिलता क्या है?’’

नौजवान ने हामी भरी, ‘‘मैं ने भी अपना नुकसान खूब बढ़ाचढ़ा कर दिखाया है. मुखिया तो मानता ही न था. 30 हजार रुपए दे कर उसे किसी तरह मनाया. मुलाजिम और चपरासी के हाथ अलग से गरम करने पड़े.

‘‘और कलक्ट्रेट में तो खुलेआम लूट है. सभी मुंह खोले रहते हैं. बिना पैसा लिए कोई काम ही नहीं करता. फाइल आगे बढ़ाने के लिए हर बार चपरासी को चढ़ावा देना पड़ता है. लगता है कि सभी बाढ़ और सूखे के लिए भगवान से प्रार्थना करते रहते हैं.’’

आगे गंगा किनारे एक मंदिर था. उन्होंने तांगा रुकवाया, उतर कर बगल की दुकान से तमाम तरह की मिठाइयां खरीदीं और मंदिर में प्रवेश किया.

जब वे वापस आए, तो नौजवान ने कहा, ‘‘इतनी सारीमिठाइयां चढ़ाने की क्या जरूरत थी?’’‘‘सुना नहीं… जितनी ज्यादा शक्कर डालोगे, हलवा उतना ही मीठा होगा. लंबाचौड़ा क्लेम है, चढ़ावा तो बड़ा करना ही होगा. पंडितजी ने कहा है कि जितना ज्यादा चढ़ावा चढ़ाओगे, तो जल्दी फल मिलेगा.’’

इस बाढ़ में तो परमानंद ने अपना सबकुछ खो दिया है. उस का सारा परिवार, उस की प्यारी पत्नी, उस के 2 छोटेछोटे बच्चे, उस का बूढ़ा पिता. सब को इस बाढ़ ने निगल लिया था. एक छोटा सा मिट्टी का घर था, गंगा किनारे सरकारी जमीन पर. सबकुछ, सारे लोग, घर का सारा सामान, रात के अंधेरे में गंगा में समा गए. कुछ भी नहीं बचा.

यह तो रुस्तम की मेहरबानी थी कि वह बच गया, नहीं तो वह भी गंगा की भेंट चढ़ गया होता. पता नहीं, जानवरों को कैसे आने वाली मुसीबत का पता चल जाता है? शायद उसी के चलते उस दिन रुस्तम, जो बाहर बंधा था, रस्सी तोड़ कर जोरों से हिनहिनाते हुए भाग खड़ा हुआ. परमानंद उस के पीछे दौड़ा. दौड़तेभागते वे दूर निकल गए.

रुस्तम लौटने को तैयार ही नहीं था, इसलिए परमानंद भी वहीं रह गया. जब वह लौटा, तो सबकुछ खत्म हो गया था. तेज धारा के कटाव से उस का घर गंगा में बह गया था. तब उस के जीने की इच्छा भी मर गई थी.

वह तो जिंदा रहा सिर्फ रुस्तम के लिए, जो उस का घोड़ा नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा था. वह उस का बेटा था और अब तो उस की जिंदगी बचाने वाला भी.

‘‘जरा जल्दी चलो, दिनभर ले लोगे क्या?’’ नौजवान ने झुंझलाते हुए कहा, ‘‘पहले ही इतनी देरी हो गई है.’’

तांगा तेजी से भाग रहा था… और दिनों से कहीं ज्यादा तेज.

‘क्या उड़ा कर ले चलें? तांगा ही तो है, मोटरगाड़ी नहीं,’ परमानंद ने मन ही मन कहा, पर उन लोगों को खुश रखने के लिए उस ने घोड़े को ललकारा, ‘‘चल बेटा, अपनी चाल दिखा. साहब लोगों को देर हो रही है.’’

लेकिन उस ने चाबुक नहीं उठाया. वह रुस्तम को कभी भी नहीं मारता था.जल्दी ही वे दोनों कलक्ट्रेट पहुंच गए. अधेड़ ने सौ का नोट निकाला, ‘‘बाकी के 60 रुपए दे दो भाई.’’ छुट्टे के नाम पर परमानंद के पास फूटी कौड़ी भी नहीं थी.

‘‘मैं छुट्टे कहां से लाऊं?’’ उस ने आसपास नजर दौड़ाई. छुट्टे पैसे देने वाला उसे कोई न दिखा.

‘‘छुट्टे ले कर चलना चाहिए न?’’ नौजवान बोला. अपने बटुए से उस ने 30 रुपए निकाले, ‘‘मेरे पास तो बस यही छुट्टे हैं.’’

‘‘ले लो भाई. आज ये ही रख लो. बाकी फिर कभी ले लेना,’’ अधेड़ ने कहा.

परमानंद ने वे 30 रुपए ले लिए. पहली सवारी में ही घाटा. फिर उस ने रुस्तम को देखा और उस की पीठ थपथपाते हुए कहा, ‘‘चलो, तेरे लिए चारापानी का इंतजाम तो हो गया.’’

परमानंद सोच रहा था कि बाढ़ के अनुदान का अधिकार इन लोगों से ज्यादा तो उस का था. उस का इन लोगों से ज्यादा नुकसान हुआ था, पर वह कोई क्लेम नहीं कर सका था. घूस देने के लिए उस के पास पैसे न थे. जमीनजायदाद न थी. उस का घर मिट्टी का था, जो सरकारी जमीन पर बना था. मुखिया 10 हजार रुपए मांग रहा था. मुलाजिम की मांग अलग थी और कलक्ट्रेट का खर्च अलग. कहां से लाता वह यह सब? बाढ़ में सबकुछ खो देने के बाद उसे कुछ भी मुआवजा नहीं मिला. किसी ने सुझाया था, ‘रुस्तम को बेच दो.’

ऐसा परमानंद कैसे कर सकता था? कोई अपने बेटे को बेच सकता है भला? उस ने अपने रुस्तम को प्यार से थपथपाया, ‘‘मेरा क्लेम तो तू ही है. मेरी सारी जरूरतों को तू ही पूरा करता है.’’ रुस्तम ने गरदन हिला कर सहमति जताई. गले में बंधी घंटियां बज उठीं और परमानंद के कानों में मधुर संगीत गूंज उठा.

Family Story : समय के साथ

Family Story : रामलाल की सचिवालय में चपरासी की ड्यूटी थी. वह अपने परिवार के साथ मंत्रीजी के बंगले पर ही रहता था. जब वह सरकारी नौकरी में लगा था, तब गांव में उस की 2 बीघा जमीन थी और एक छोटा सा टूटाफूटा घर था, मगर आज 50 बीघा जमीन और 2-2 आलीशान मकान हैं. तीजत्योहार के अलावा शादीब्याह में जब रामलाल अपनी शानदार कार से बीवीबच्चों के साथ गांव में आता है, तब उसे देख कर कोई यह कह नहीं सकता कि वह चपरासी है. उस के बीवीबच्चों के कीमती कपड़ों को देख कर लोग यही समझते हैं कि वे सब किसी बड़े सरकारी अफसर के परिवार वाले हैं.

एक बार रामलाल गांव में अपने फार्महाउस पर था, तभी वहां पर किसी गांव के बड़े सरकारी स्कूल में चपरासी की नौकरी करने वाला उस के गांव का भोलाराम आया.

भोलाराम बोला, ‘‘रामलालजी, हम लोग एक ही समय पर सरकारी नौकरी में लगे थे, मगर तुम आज कहां से कहां पहुंच गए और मैं गरीब चपरासी ही रह गया हूं. तुम्हारी इस तरक्की के बारे में मुझे भी कुछ बताओ भाई.’’

‘‘मेरी तरक्की का राज यही है कि मैं सचिवालय में नौकरी करते हुए समय के साथ चलने लगा था और तुम गांव में ही रह कर अपनी पुरानी दकियानूसी बातों के कारण यह फटेहाल जिंदगी बिता रहे हो…

‘‘मैं ने अपनी दोनों बेटियों को शहर में खूब पढ़ायालिखाया और तुम ने अपनी बेटियों को घर में ही बिठा रखा है. अगर वे शहर में पढ़तीं, तो आज अच्छी नौकरियां कर रही होतीं. मेरी एक बेटी अब तहसीलदार होने वाली है और दूसरी बेटी कलक्टर,’’ रामलाल ने उसे अपनी तरक्की का राज बताया, तो भोलाराम उस से बोला, ‘‘तो मुझे भी अब अपनी दोनों बेटियों के लिए क्या करना चाहिए ’’

‘‘तुम अपनी दोनों बेटियों को हमारे साथ शहर भेज दो. मेरी दोनों बेटियां उन्हें कुछ ऐसा सिखा देंगी कि उन की और तुम्हारी जिंदगी बन जाएगी. कुछ ही दिनों में वे उन्हें ऐसा बदल देंगी कि उन्हें देख कर तुम यह कह ही नहीं पाओगे कि वे दोनों तुम्हारी ही बेटियां हैं…’’

रामलाल की इन बातों को सुन कर भोलाराम ने अपनी दोनों बेटियों को उन के साथ भेजने की हां कर दी.

भोलाराम ने अपने घर जा कर ये सभी बातें अपनी बीवी सावित्री को बताईं, तो वह उस से बोली, ‘‘शहर में जा कर हमारी दोनों बेटियां कहीं शहर की लड़कियों की तरह मौजमस्ती करने न लग जाएं ’’

‘‘मौजमस्ती तो हमारी ये दोनों बेटियां अपने गांव में रहते हुए भी कर रही हैं. कहने को उन की उम्र 16 और 18 साल है, लेकिन अभी से उन में आवारा लड़कों के साथ मजे लेने की आदत पड़ चुकी है.’’

सावित्री बोली, ‘‘तुम अपनी बेटियों के बारे में यह सब क्यों कह रहे हो ’’

‘‘कुछ दिन पहले जब मैं दोपहर में अपने खेतों पर गया था, तब बाजरे के खेतों में हमारी ये दोनों बेटियां उषा और शर्मिला बिलकुल नंगधड़ंग हो कर गांव के 2 लड़कों के साथ वही सब कर रही थीं, जो पति अपनी पत्नी के साथ करता है. मैं ने ये सब बातें तुम्हें इसलिए नहीं बताईं कि सुन कर तुम्हें दुख होगा.’’

सावित्री यह सुन कर दंग रह गई.

भोलाराम उस से बोला, ‘‘हमारी दोनों बेटियों को लड़कों के साथ सोने का चसका लग गया है. अगर वे किसी के साथ घर से भाग गईं, तो इस से हमारी गांव में इतनी बदनामी होगी कि हम लोग किसी को मुंह दिखाने नहीं रहेंगे, इसलिए उन्हें रामलाल के साथ शहर भेज देते हैं.’’

सावित्री बोली, ‘‘लेकिन, रामलाल के बारे में हमारी पड़ोसन माला कह रही थी कि वह अपनी लड़कियों को मंत्रीअफसरों के अलावा ठेकेदारों के साथ सुलाता है, तभी तो आज वह उन की कमाई से इतना पैसे वाला बना है. जब उस की दोनों बेटियां छोटी थीं, तब वह अपनी बीवी रीना को उन के साथ सुलाता था.’’

‘‘अपनी बीवी और बेटियों को पराए मर्दों के साथ सुला कर रामलाल ने आज अपनी हैसियत बना ली है. वे सभी लोग आज ऐशोआराम की जिंदगी जी रहे हैं और हम लोग अपनी दकियानूसी बातों के चलते गांव में ऐसी फटेहाल जिंदगी बिता रहे हैं…’’ भोलाराम थोड़ा रुक कर बोला, ‘‘हमें भी अब रामलाल की तरह समय के साथ चलना चाहिए. हमारी दोनों बेटियां गांव के लड़कों को मुफ्त में ही अपनी जवानी के मजे दे रही हैं.

‘‘अगर ये दोनों शहर में मंत्रीअफसरों व ठेकेदारों को मजे देंगी, तो हम लोग भी रामलाल की तरह पैसे वाले हो जाएंगे और फिर उन दोनों की अच्छे घरों में शादियां कर देंगे. आजकल लोग आदमी का किरदार नहीं, बल्कि उस की हैसियत देखते हैं.’’

सावित्री ने अपनी दोनों बेटियों को रामलाल के साथ शहर भेजने का मन बना लिया.

शहर भेजने की ये बातें जब उन की दोनों बेटियों ने सुनी, तो वे खुशी से झूम उठीं.

सावित्री ने उन दोनों को खुल कर कह दिया, ‘‘यहां पर तुम दोनों बहनें बाजरे के खेतों में चोरीछिपे लड़कों के साथ सोती हो, लेकिन शहर में पैसे कमाओगी. लेकिन जरूरी उपाय करना मत भूलना.’’

दोनों बहनें मन ही मन सोच रही थीं कि बाजरे के खेत में तो किसी के आने के डर से वे पूरे मजे नहीं ले पाती थीं. उन्हें हमेशा यह डर लगा रहता था कि कभी कोई वहां पर आ कर उन्हें देख न ले. शहर में तो एसी लगे कमरे होते हैं, वहां पर किसी के आने का उन्हें डर भी नहीं रहेगा.

जब वे दोनों बहनें रामलाल और उस के परिवार के साथ उन की एसी कार में बैठीं, तो एसी की ठंडीठंडी हवा खाते हुए उन्हें कब नींद आ गई, पता नहीं लगा.

रामलाल की बेटियों में से एक ने ही उन्हें जगा कर कहा, ‘‘अब शहर आने वाला है. वहां के एक मौल से तुम्हारे लिए कुछ ढंग के कपड़े लेने हैं, जिन्हें पहन कर तुम दोनों बहनें खूबसूरत लगोगी.’’

जब वे लोग शहर पहुंचे, तो एक बड़े से मौल में उन दोनों के लिए ढंग के कपड़े खरीदे गए. वहीं पर उन के बाल सैट करा कर उन्हें वे कपड़े पहनाए गए. आईने में खुद को देख कर वे दोनों बहनें बड़ी इतरा रही थीं.

जब वे दोनों रामलाल के घर आईं, तो मंत्रीजी भी उन्हें देख कर चौंक गए. उन दोनों को नहला कर मैकअप करा कर जब रामलाल की बेटी उन्हें मंत्रीजी के कमरे में छोड़ने गई, तो मंत्रीजी भूखे भेडि़ए की तरह उन पर झपट पड़े थे.

कुछ ही देर में मंत्री के साथ भी वही हुआ, जो बाजरे के खेत में उन लड़कों से होता था. मंत्री की तो खुशी की कोई सीमा ही नहीं थी. उन्होंने कुछ दिन बाद दोनों बहनों को एक ठेकेदार से एक लाख रुपए दिलवा दिए.

अपनी दोनों बेटियों की एक लाख रुपए की कमाई देख कर भोलाराम तो खुशी से पागल ही हो गया था. भोलाराम ने भी अब समय के साथ चलना सीख लिया था, पर उसे यह नहीं मालूम था कि यह मौज कितने दिन चलेगी. जैसे ही लड़कियों में कुछ बीमारी हुई नहीं या और दूसरी जवान लड़कियां दिखी नहीं कि वे वापस गांव में नजर आएंगी.

Oral Sex से लाएं रिश्तों में गरमाहट

Oral Sex : सैक्स पतिपत्नी के रिश्ते में बहुत बड़ा रोल अदा करता है. जैसे अच्छे लाइफस्टाइल के लिए पैसा होना बेहद आवश्यक है, उसी तरह हैल्दी रिलेशनशिप के लिए अच्छा सैक्स बहुत जरूरी है.

सैक्स दोनों पार्टनर्स को करीब लाने का अवसर देता है और ऐसा देखा गया है कि अगर दोनों पार्टनर्स एकदूसरे को पूरी तरह संतुष्ट कर पा रहे हैं तो उन के बीच संबंध काफी अच्छे बने रहते हैं और लड़ाईझगड़े काफी कम होते हैं क्योंकि हैल्दी सैक्स टैंशन को दूर भगा देता है.

क्यों जरूरी है ओरल सैक्स

हमें हमेशा इस बात का खयाल रखना चाहिए कि सैक्स से पहले अपने पार्टनर को इस कदर प्यार देना चाहिए कि दोनों को सैक्स से पहले ही इतना आनंद मिल जाए कि बस दोनों पार्टनर्स सैक्स करने पर मजबूर हो जाएं और सैक्स किए बिना रह न पाएं.

ओरल सैक्स में आप को अपने हाथों के साथसाथ अपने लिप्स और अपनी जीभ का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करना है जिस से कि आप का पार्टनर सैक्स के लिए पूरी तरह तैयार हो जाए.

उस के बाद आप को अपने पार्टनर की पूरी बौडी पर जम कर किस करनी चाहिए जिस से कि वे इस कदर बेचैन हो उठे कि आप को अपनी बांहों में जकड़ ले कि.

जम कर करें कडलिंग और किसिंग

याद रहे कि आप का फोकस सिर्फ सैक्स करना नहीं होना चाहिए बल्कि अपने पार्टनर को और खुद को वह आनंद देना होना चाहिए जिसे पा कर दोनों एकदूसरे के और भी ज्यादा करीब आ जाएं. अगर आप अपने पार्टनर के साथ सिर्फ सैक्स करते हैं तो आप दोनों एकदूसरे से बहुत ही जल्दी बोर होने लग जाएंगे. इसलिए अपनी सैक्स लाइफ में रोमांच भरने के लिए ओरल सैक्स जरूर ट्राई करें.

सैक्स से पहले अपने पार्टनर के साथ खूब रोमांस करना चाहिए और अपने पार्टनर के साथ जम कर कडलिंग और किसिंग करनी चाहिए.

पार्टनर को न होने दें कोई भी तकलीफ

इस बात का जरूर ध्यान रखना है कि हर चीज अपने पार्टनर के हिसाब से करनी चाहिए. ऐसा देखा गया है कि ओरल सैक्स के दौरान पुरूष साथी कुछ ऐसी चीजें ट्राई करने लगता है जिस से महिला साथी को आनंद से ज्यादा तकलीफ होने लगती है. तो आप जो कुछ भी करें बहुत ही आराम से और धीरेधीरे ताकि आप दोनों सैक्स का भरपूर आनंद उठा पाएं और दोनों में से किसी को भी कोई तकलीफ न हो.

मेरे औफिस का कलीग मेरे साथ Sex करने को बोल रहा है.

Sex : अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें..

सवाल –

मैं दिल्ली के द्वार्का इलाके की रहने वाली हूं और मेरी उम्र 30 साल है. करीब 2 साल पहले ही मेरी शादी हुई है. मेरे पति का खुद का बिजनेस है और मैं एक मल्टीनैशनल कंपनी में जौब करती हूं. मेरे पति काम की वजह से अक्सर रात को देरी से घर आते हैं और औफिस जाने के कारण मैं भी थक कर जल्दी सो जाती हूं तो ऐसे में मेरे पति और मेरे बीच काफी कम ही बातचीत हो पाती है. हाल ही में मेरे औफिस में एक लड़के ने ज्वाइन किया है जो दिखने में बहुत हैंडसम और फिट है. वे मुझसे उम्र में 3 साल छोटा है लेकिन उसकी फिजीक कमाल की है. मैं उसे मन ही मन पसंद करने लगी थी और शायद वो भी मुझसे कुछ चाह रहा था. देखते ही देखते हम दोनों ने एक दूसरे को अपना नंबर दिया और मैसेज पर रोजाना बात होने लगी. कुछ दिनों से वे लड़का मेरे साथ सैक्स करने की जिद कर रहा है और मुझे अपने साथ होटल चलने को कह रहा है. सच कहूं तो उसके साथ Sex करने का मेरा भी बहुत मन है लेकिन मुझे डर है कि अगर मेरे पति को इस बारे में पता चल गया तो वे कहीं मुझसे तलाक ना ले लें. मुझे क्या करना चाहिए ?

जवाब –

पति-पत्नी के रिश्ते की डोर बहुत नाजुक होती है और यह डोर सिर्फ विश्वास पर टिकी होती है. जब रिश्ते में विश्वास खत्म हो जाता है तो फिर उस रिश्ते के कोई मायने नहीं रहते. आप जो कर रही हैं या जो सोच रही हैं वे बिल्कुल गलत है. आपके पति काम में बिजी रहते हैं क्यूंकि उनके ऊपर घर चलाने की जिम्मेदारी है और ऐसे में अगर आप किसी दूसरे लड़के के साथ संबंध बना लेंगी तो सोचिए उनके दिल पर क्या बीतेगी ?

अगर आपको अपने पति से कोई शिकायत है तो आप उनके साथ शेयर करें और उन्हें बताएं कि आप उनके साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताना चाहती हैं तो उनको अपने काम का साथ साथ आपको भी समय देना चाहिए. आप अपने पति से कहिए कि वे अपने काम से कुछ दिनों की छुट्टी ले लें और आप दोनों एक साथ किसी ट्रिप पर चले जाइए जिससे कि आप दोनों एक दूसरे के साथ क्वालिटी टाइम बिता पाएं जो आपने काफी समय से नहीं बिताया है.

आपको अपने औफिस वाले लड़के के साथ सारे संबंधों को खत्म कर देना चाहिए क्यूंकि अगर ऐसा ही चलता रहा तो आपका बसा बसाया घर सिर्फ एक गलती की वजह से तहस नहस हो सकता है. एक बार जो घर उजड़ जाते हैं उन्हें बसाने में लोगों की जिंदगी बीत जाती है.

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Crime Story : सरेआम लूटी गई दो बहनों की इज्जत

Crime Story : रात का दूसरा पहर. दरवाजे पर आहट सुनाई पड़ी. कोई दरवाजा खोलने की कोशिश कर रहा था. आहट सुन कर नीतू की नींद उचट गई. वह सोचने लगी कि कहीं कोई जानवर तो नहीं, जो रात को अपने शिकार की तलाश में भटकता हुआ यहां तक आ पहुंचा हो?

तभी उसे दरवाजे के बाहर आदमी की छाया सी मालूम हुई. उस के हाथ दरवाजे पर चढ़ी सांकल को खोलने की कोशिश कर रहे थे.

यह देख नीतू डर कर सहम गई. उस के पास लेटी उस की छोटी बहन लच्छो अभी भी गहरी नींद में सो रही थी. उस ने उसे जगाया नहीं और खुद ही हिम्मत बटोर कर दरवाजे तक जा पहुंची.

सांकल खोलने के साथ ही वह चीख पड़ी, ‘‘मलखान तुम… इतनी रात को तुम मेरे दरवाजे पर क्या कर रहे हो?’’

नीतू को समझते देर नहीं लगी कि इतनी रात को मलखान के आने की क्या वजह हो सकती है. वह कुछ और कहती, इस से पहले मलखान ने अपने हाथों से उस का मुंह दबोच लिया.

‘‘आवाज मत निकालना, वरना यहीं ढेर कर दूंगा,’’ कह कर मलखान पूरी ताकत लगा कर नीतू को बाहर तक घसीट लाया.

आंगन के बाहर अनाज की एक छोटी सी कोठरी थी, जिस में भूसा भरा हुआ था. मलखान ने जबरदस्ती नीतू को भूसे के ढेर में पटक दिया. उस की चौड़ी छाती के बीच दुबलीपतली नीतू दब कर रह गई. मलखान उस पर सवार था.

‘‘पहले ही मान जाती, तो इतनी जबरदस्ती नहीं करनी पड़ती,’’ मलखान ने अपना कच्छा और लुंगी पहनते हुए कहा.

लच्छो, जो नीतू से 2 साल छोटी थी, उस ने करवट ली, तो नीतू को अपनी जगह न पा कर उठ बैठी. दरवाजा भी खुला पड़ा था. उसे कुछ अनजाना डर सा लगा.

मलखान पहले लच्छो के बदन से खेलने के चक्कर में था. 2 दिन पहले लच्छो ने उस के मुंह पर थूक दिया था, जब उस ने जामुन के पेड़ के नीचे उसे दबोचने की कोशिश की थी.

वह नीतू से ज्यादा ताकतवर और निडर थी. पर उस ने घुमा कर एक ऐसी लात मलखान की टांगों के बीच मारी कि वह ‘मर गया’ कह कर चीख पड़ा था.

अचानक हुए इस हमले से मलखान बौखला गया था. वह सोच भी नहीं पाया था कि लच्छो इस तरह का हमला अचानक कर देगी. उस की मर्दानगी तब धरी की धरी रह गई थी. एक तरह से लच्छो ने उसे चुनौती दे डाली थी.

लच्छो उठी और दालान में पड़े एक डंडे को उठा लिया. वह धीरेधीरे आगे बढ़ने लगी. उस का शक सही निकला कि दीदी किसी मुसीबत में फंस गई हैं.

मलखान उस समय अंधेरे में भागने की कोशिश कर रहा था कि अचानक लच्छो ने घुमा कर डंडा उस के सिर पर जड़ दिया.

डंडा पड़ते ही वह भागने लगा और भागतेभागते बोला, ‘‘सुबह देख लूंगा.’’

‘‘क्या हुआ दीदी, तुम ने मुझे उठाया क्यों नहीं? कम से कम तुम मुझे आवाज ही लगा देतीं,’’ लच्छो रोते हुए बोली.

‘‘2 रोज पहले ही मैं ने इस की हजामत बना डाली थी, जब इस ने मुझ से छेड़छाड़ की थी.’’

‘‘क्या…?’’ यह सुन कर नीतू तो चौंक गई.

‘‘हां दीदी, कई दिनों से वह मेरे पीछे पड़ा हुआ था. उस दिन भी वह मुझ से छेड़छाड़ करने लगा. उस दिन तो मैं ने उसे छोड़ दिया था, वरना उसी दिन उसे सबक सिखा देती,’’ लच्छो ने नीतू को सहारा दे कर उठाया और कमरे में ले गई.

दोनों बहनें एकसाथ रह कर प्राइमरी स्कूल के बच्चों को पढ़ाया करती थीं. कुछ साल पहले उन के पिता की मौत दिल का दौरा पड़ने से हो गई थी. वह बैंक में मुलाजिम थे.

पिता की मौत के बाद उन की मां श्यामरथी देवी को वह नौकरी मिल गई थी. चूंकि बैंक गांव से काफी दूर शहर में था, इसलिए दोनों बेटियों को गांव में अकेले ही रहना पड़ रहा था. मां कभीकभार छुट्टी के दिनों में गांव आ जाया करती थीं.

मलखान की नाक कट गई थी. एक को तो वह अपनी हवस का शिकार बना ही चुका था, पर दूसरी से बदला लेने के लिए तड़प रहा था.

एक दिन शाम के 7 बज रहे थे. दोनों बहनें खाना बनाने की तैयारी में थीं. मलखान ने अपने कुछ दोस्तों को जमा किया और लच्छो के घर पर धावा बोल दिया.

‘‘बाहर निकल, अब देख मेरा रुतबा. गांव में तेरी कैसी बेइज्जती करता हूं,’’ मलखान अपने साथियों के साथ लच्छो के घर में घुसता हुआ बोला.

घर के अंदर मौजूद दोनों बहनें कुछ समझ पातीं, इस से पहले ही मलखान के साथियों ने लच्छो को पकड़ लिया और घसीटते हुए बाहर तक ले आए.

गांव की इज्जत गांव वालों के सामने नंगी होने लगी. मलखान गांव वालों के बीच चिल्लाचिल्ला कर कह रहा था, ‘‘ये दोनों बहनें जिस्मफरोशी करती हैं. इन की वजह से ही गांव की इज्जत मिट्टी में मिल गई है. हम लच्छो का मुंह काला कर के, इस का सिर मुंड़ा कर इसे गांव में घुमाएंगे.’’

दोनों बहनों का बचपन गांव वालों के बीच बीता था. गांव वालों के बीच पलबढ़ कर वे बड़ी हुई थीं. उन्हीं लोगों ने उन का तमाशा बना दिया था.

योजना के मुताबिक, गांव का हज्जाम भी समय पर हाजिर हो गया.

नीतू को अपनी छोटी बहन के बचाव का तरीका समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे इन जालिमों के चंगुल से उसे बचाया जाए? वह सोच रही थी कि किसी तरह लच्छो की इज्जत बचानी है, यह सोच कर नीतू घर से निकल पड़ी.

नीतू भीड़ को चीरते हुए अपनी बहन के पास जा कर खड़ी हो गई.

भीड़ में से आवाज उठी, ‘‘इस का भी सिर मुंड़वा दो.’’

नीतू पहले तो गांव वालों के बीच खूब रोईगिड़गिड़ाई. उस ने अपनेआप को बेकुसूर साबित करने के दावे पेश किए, पर किसी ने उस की एक न सुनी. बड़ेबूढ़े भी चुप्पी साध गए.

नीतू अपने घर से एक तेज खंजर उठा लाई थी. बात बिगड़ती देख उस ने वह खंजर तेजी से अपने पेट में घुसेड़ लिया.

देखते ही देखते खून का फव्वारा फूट पड़ा. वह चीख कर कहे जा रही थी, ‘‘हम दोनों बहनें बेकुसूर हैं. मलखान ने ही एक दिन मेरी इज्जत लूट ली थी.’’

इसी बीच पुलिस की जीप वहां से गुजरी और वहां हो रहे तमाशे को देख कर रुक गई.

नीतू ने मरने से पहले सारी बातें इंस्पैक्टर को बता दीं. कुसूरवार लोग पकड़े गए. पर नामर्द गांव वालों ने गांव की इज्जत को अपने ही सामने लुटते देखा. यह कलियुग का चीरहरण था.

भव्य होगा छठा ‘Saras Salil Bhojpuri Cine Award’, लखनऊ में होगा रंगारंग आयोजन

Saras Salil Bhojpuri Cine Award : दिल्ली प्रेस की देश चर्चित पत्रिका ‘सरस सलिल’ द्वारा प्रत्येक वर्ष ‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड’ का आयोजन किया जाता है. इस साल ‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड’ का छठा साल होगा.

इस आयोजन के संदर्भ में प्रेस क्लब बस्ती में आयोजित प्रेस वार्ता में दिल्ली प्रेस के दिल्ली कार्यालय से आए भानु प्रकाश राणा ने बताया कि इस बार के अवॉर्ड समारोह में भोजपुरी के सभी बड़े और चर्चित एक्टर और एक्ट्रेस के साथसाथ चरित्र अभिनेताओं, फिल्मों से जुड़े टेक्नीशियंस को निर्धारित कैटेगिरी में जूरी के निर्णय के आधार पर सम्मानित किया जाएगा. इस के लिए नॉमिनेशन की प्रक्रिया चालू है. भोजपुरी फिल्म निर्माता साल 2024 में रिलीज हुई अपनी फिल्मों का नॉमिनेशन भेज सकते हैं.

‘ढेला बाबा’ के नाम से विख्यात भोजपुरी फिल्मों के चर्चित अभिनेता और कॉमेडियन सीपी भट्ट ने कहा कि वे ‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड’ के सभी एडिशन से जुड़े रहे हैं. इस बार भी वे अपने चुलबुले अंदाज में दर्शकों को गुदगुदाने आएंगे. उन्होंने बताया कि वे इस बार एंकरिंग टीम का हिस्सा भी रहेंगे.

भोजपुरी गायक और अभिनेता के साथसाथ ‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड’ के आयोजन से जुड़े विवेक पांडेय ने बताया कि इस अवॉर्ड समारोह में भोजपुरी के सभी जानेमाने सिंगर शिरकत कर रहे हैं.

आयोजन से जुड़े समाजसेवी नितेश शर्मा ने कहा कि हर साल की तरह इस साल भी सभी के लिए प्रवेश निःशुल्क होगा. अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि आयोजन में सुरक्षा के मद्देनजर सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियां भी मुस्तैदी से जिम्मेदारी संभालेंगी. भोजपुरी गायक अमरेश पाण्डेय अमृत नें भी तैयारिओं को लेकर अपनी बात रखा.

अंत में इस समारोह से जुड़े बृहस्पति कुमार पांडेय ने बताया कि ‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड‘ का पहला और तीसरा आयोजन बस्ती में हुआ था. बाकी सालों में यह आयोजन अयोध्या में किया गया था, जिस में भोजपुरी के टॉप हीरो दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’, प्रदीप पांडेय ‘चिंटू’, अरविंद अकेला ‘कल्लू’, समर सिंह, विमल पांडेय के अलावा गुंजन सिंह, आम्रपाली दुबे, रितु सिंह, अंजना सिंह, रक्षा गुप्ता, अनारा गुप्ता, श्रुति राव, पल्लवी गिरी, पाखी हेगड़े, कनक यादव, कनक पांडेय, संजना सिल्क, मधु सिंह राजपूत, निशा सिंह, यामिनी सिंह जैसी हीरोइनों ने भी शिरकत की थी.

बृहस्पति कुमार पांडेय ने यह भी बताया कि भोजपुरी फिल्मों में विलेन के तौर पर अपनी छाप छोड़ रहे संजय पांडेय, देव सिंह, सुशील सिंह, अनूप अरोरा, बृजेश त्रिपाठी, सीपी भट्ट, सिंगर प्रियंका सिंह, अंतरा सिंह, प्रियंका, कविता यादव, अलका झा, संजोली पांडेय, ममता राउत, अनुपमा यादव, कॉमेडियन मनोज सिंह टाइगर, केके गोस्वामी, आरके गोस्वामी, रोहित सिंह मटरू, सीपी भट्ट, लोटा तिवारी, धामा वर्मा जैसे नामचीन एक्टर और एक्ट्रेस के साथसाथ तमाम भोजपुरी फिल्म टेक्नीशियंस भी शामिल होते रहे हैं. इस बार का आयोजन और ज्यादा भव्य और रंगारंग होगा.

65 इंजेक्‍शन्‍स का दर्द सहा पर Sambhavna Seth नहीं बन पाई मां

भोजपुरी फिल्मों में ठुमके लगाने वाली, और पूर्व में बिग बॉस की प्रतियोगी रही संभावना सेठ फिलहाल अपने यूट्यूब चैनल को लेकर चर्चा में है. भोजपुरी और बॉलीवुड के जरिए अभिनय में सक्रिय रहने वाली, हमेशा मस्ती धमाल करने वाली चुलबुली Sambhavna Seth आजकल बुरे दौर से गुजर रही है. दुखी है.

हाल ही में उन्होंने सोशल मीडिया में अपना दर्द बताते हुए कहा की हजार कोशिशें के बावजूद एक बार फिर उनका मिसकैरेज हो गया. संभावना सेठ 3 महीने की प्रेग्नेंट थी, और चार बार आई वी एफ करवा चुकी थी. यह पांचवीं बार था और वह इसमें वह प्रेग्नेंट हो भी गई थी जिसकी खुशी उन्होंने सोशल मीडिया पर शेयर भी की थी लेकिन एक बार फिर संभावना सेठ गर्भवती रहने में असफल रही.

कई सारी सावधानी रखने के बावजूद उनका मिसकैरेज हो गया. जिस वजह से संभावना सेठ बहुत दुखी है. एक्ट्रेस संभावना सेठ अपने पति अविनाश के साथ ये खुशी शेयर करना चाहती थी पहले बच्चे के जन्म लेने को लेकर दोनों ही बहुत एक्साइटेड ओर खुश थे. अगर वर्क फ्रट की बात करें तो फिलहाल वह अपने ब्लॉग में व्यस्त हैं.

एक समय ऐसा भी था की संभावना सेठ भोजपुरी और बॉलीवुड में आइटम नंबर्स के लिए प्रसिद्ध थी. लेकिन संभावना के अनुसार भोजपुरी फिल्मों की हीरोइन ने जब से खुद आइटम डांस करना शुरू कर दिया तो संभावना काम मिलना बंद हो गया.

अर्थात संभावना सेठ फिलहाल प्रोफेशनली और पर्सनली दोनों ही तरह से दुखी हैं. जिसकी वजह से संभावना अपने करियर के खराब होने की वजह भोजपुरी फिल्मों की हीरोइन को मानती हैं. क्योंकि संभावना को बच्चों से बहुत प्यार है इसलिए वह हार नहीं मानेगी फिर से मा बनने की कोशिश करेंगी.

लेखिका – आरती सक्सैना, पत्रकार मुंबई

Power Bank खरीदने से पहले ध्यान रखें यह 4 बातें

मौजूदा वक्त में फोन के अत्यधिक इस्तेमाल के कारण फोन की बैटरी जल्दी खत्म हो जाती है. ऐसे में हम लंबे सफर पर ही नहीं औफिस जाते वक्त भी Power Bank साथ रखते हैं. हमारे फोन में कुछ ऐसे ऐप भी होते हैं, जिनके इस्तेमाल से बैटरी ज्यादा खर्च होती है. ऐसे में पावर बैंक की आवश्यकता पड़ती ही है. पावर बैंक केवल बैटरी क्षमता, साइज व रंग को देखकर न खरीदें, बल्कि कुछ अन्य चीजें हैं, जिनको ध्यान में रखना जरूरी है.

2.5 गुना ज्यादा क्षमता वाले पावर बैंक

फोन चार्जिंग के लिए पावर बैंक खरीदें, तो इस बात का जरूर ध्यान रखें कि पावर बैंक की क्षमता आपके स्मार्टफोन की बैटरी क्षमता से 2.5 गुना अधिक हो. इससे फोन तेजी से चार्ज होगा. साथ ही पावर बैंक की बैटरी भी लंबे समय तक चलेगी और आप अपने स्मार्टफोन को कई बार चार्ज कर सकते हैं. इसके साथ ही जब भी आप पावर बैंक लें, तो उसमें कितने एमएएच की बैटरी है.

यूएसबी चार्जिंग

इसके अलावा पावर बैंक के यूएसबी चार्जिंग पर भी नजर रखें. पावरबैंक खरीदते समय बैटरी की क्षमता के साथ-साथ उसकी यूएसबी चार्जिंग को भी जांच-परख कर लें, क्योंकि बाजार में मौजूद पुराने पावर बैंक केवल अपने यूएसबी केबल के साथ ही काम करते हैं. ऐसे में आपको पावर बैंक से अपने एंड्रायड फोन को चार्ज करने में काफी परेशानी होगी. ऐसे पावर बैंक आपके फोन के लिए किसी काम के नहीं होंगे.

आउटपुट वोल्टेज

पावर बैंक का इस्तेमाल करें, तो पावर बैंक के आउटपुट वोल्टेज का जरूर ध्यान रखें. यदि आपका पावर बैंक का आउटपुट वोल्टेज आपके फोन के आउटपुट वोल्टेज के बराबर नहीं है, तो फोन चार्ज नहीं होगा. ऐसे में इस बात का ध्यान रखें कि पावर बैंक का आउटपुट वोल्टेज हमेशा आपके फोन चार्जर के आउटपुट वोल्टेज के बराबर होना चाहिए. आउटपुट वोल्टेज के बराबर न होने पर आप अपने फोन के चार्जर से पावर बैंक को चार्ज भी नहीं कर पाएंगे.

डिवाइस की संख्या के आधार पर ले पावर बैंक

आजकल अधिकांश कामकाजी लोगों के पास एक से अधिक स्मार्टफोन मौजूद हैं. चार्जिंग की समस्या होने से दोनों फोन बंद न हो. इसके लिए ज्यादा क्षमता वाला पावर बैंक खरीदें. लेकिन अगर आपके पास एक ही डिवाइस है, तो कम क्षमता वाला पावर बैंक भी ले सकते हैं.

Love Story : लव इन मालगाड़ी

Love Story : देश में लौकडाउन का ऐलान हो गया, सारी फैक्टरियां बंद हो गईं, मजदूर घर पर बैठ गए. जाएं भी तो कहां. दिहाड़ी मजदूरों की शामत आ गई. किराए के कमरों में रहते हैं, कमरे का किराया भी देना है और राशन का इंतजाम भी करना है. फैक्टरियां बंद होने पर मजदूरी भी नहीं मिली.

मंजेश बढ़ई था. उसे एक कोठी में लकड़ी का काम मिला था. लौकडाउन में काम बंद हो गया और जो काम किया, उस की मजदूरी भी नहीं मिली.

मालिक ने बोल दिया, ‘‘लौकडाउन के बाद जब काम शुरू होगा, तभी मजदूरी मिलेगी.’’

एक हफ्ते घर बैठना पड़ा. बस, कुछ रुपए जेब में पड़े थे. उस ने गांव जाने की सोची कि फसल कटाई का समय है, वहीं मजदूरी मिल जाएगी. पर समस्या गांव पहुंचने की थी, दिल्ली से 500 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के सीतापुर के पास गांव है. रेल, बस वगैरह सब बंद हैं.

तभी उस के साथ काम करने वाला राजेश आया, ‘‘मंजेश सुना है कि आनंद विहार बौर्डर से स्पैशल बसें चल रही हैं. फटाफट निकल. बसें सिर्फ आज के लिए ही हैं, कल नहीं मिलेंगी.’’

इतना सुनते ही मंजेश ने अपने बैग में कपड़े ठूंसे, उसे पीठ पर लाद कर राजेश के साथ पैदल ही आनंद विहार बौर्डर पहुंच गया.

बौर्डर पर अफरातफरी मची हुई थी. हजारों की तादाद में उत्तर प्रदेश और बिहार जाने वाले प्रवासी मजदूर अपने परिवार के संग बेचैनी से बसों के इंतजार में जमा थे.

बौर्डर पर कोई बस नहीं थी. एक अफवाह उड़ी और हजारों की तादाद में मजदूर सपरिवार बौर्डर पर जमा हो गए. दोपहर से शाम हो गई, कोई बस नहीं आई. बेबस मजदूर पैदल ही अपने गांव की ओर चल दिए.

लोगों को पैदल जाता देख मंजेश और राजेश भी अपने बैग पीठ पर लादे पैदल ही चल दिए.

‘‘राजेश, सीतापुर 500 किलोमीटर दूर है और अपना गांव वहां से 3 किलोमीटर और आगे, कहां तक पैदल चलेंगे और कब पहुंचेंगे…’’ चलतेचलते मंजेश ने राजेश से कहा.

‘‘मंजेश, तू जवान लड़का है. बस 10 किलोमीटर के सफर में घबरा गया. पहुंच जाएंगे, चिंता क्यों करता है. यहां सवारी नहीं है, आगे मिल जाएगी. जहां की मिलेगी, वहां तक चल पड़ेंगे.’’

मंजेश और राजेश की बात उन के साथसाथ चलते एक मजदूर परिवार ने सुनी और उन को आवाज दी, ‘‘भैयाजी क्या आप भी सीतापुर जा रहे हैं?’’

सीतापुर का नाम सुन कर मंजेश और राजेश रुक गए. उन के पास एक परिवार आ कर रुक गया, ‘‘हम भी सीतापुर जा रहे हैं. किस गांव के हो?’’

मंजेश ने देखा कि यह कहने वाला आदमी 40 साल की उम्र के लपेटे में होगा. उस की पत्नी भी हमउम्र लग रही थी. साथ में 3 बच्चे थे. एक लड़की तकरीबन 18 साल की, उस से छोटा लड़का तकरीबन 15 साल का और उस से छोटा लड़का तकरीबन 13 साल का.

‘‘हमारा गांव प्रह्लाद है, सीतापुर से 3 किलोमीटर आगे है,’’ मंजेश ने अपने गांव का नाम बताया और उस आदमी से उस के गांव का नाम पूछा.

‘‘हमारा गांव बसरगांव है. सीतापुर से 5 किलोमीटर आगे है. हमारे गांव आसपास ही हैं. एक से भले दो. बहुत लंबा सफर है. सफर में थोड़ा आराम रहेगा.’’

‘‘चलो साथसाथ चलते हैं. जब जाना एक जगह तो अलगअलग क्यों,’’ मंजेश ने उस से नाम पूछा.

‘‘हमारा नाम भोला प्रसाद है. ये हमारे बीवीबच्चे हैं.’’

मंजेश की उम्र 22 साल थी. उस की नजर भोला प्रसाद की बेटी पर पड़ी और पहली ही नजर में वह लड़की मंजेश का कलेजा चीर गई. मंजेश की नजर उस पर से हट ही नहीं रही थी.

‘‘भोला अंकल, आप ने बच्चों के नाम तो बताए ही नहीं?’’ मंजेश ने अपना और राजेश का नाम बताते हुए पूछा.

‘‘अरे, मंजेश नाम तो बहुत अच्छा है. हमारी लड़की का नाम ममता है. लड़कों के नाम कृष और अक्षय हैं.’’

मंजेश को लड़की का नाम जानना था, ममता. बहुत बढि़या नाम. उस का नाम भी म से मंजेश और लड़की का नाम भी म से ममता. नाम भी मैच हो गए.

मंजेश ममता के साथसाथ चलता हुआ तिरछी नजर से उस के चेहरे और बदन के उभार देख रहा था. उस के बदन के आकार को देखता हुआ अपनी जोड़ी बनाने के सपने भी देखने लगा.

मंजेश की नजर सिर्फ ममता पर टिकी हुई थी. ममता ने जब मंजेश को अपनी ओर निहारते देखा, उस के दिल में भी हलचल होने लगी. वह भी तिरछी नजर से और कभी मुड़ कर मंजेश को देखने लगी.

मंजेश पतले शरीर का लंबे कद का लड़का है. ममता थोड़े छोटे कद की, थोड़ी सी मोटी भरे बदन की लड़की थी. इस के बावजूद कोई भी उस की ओर खिंच जाता था.

चलतेचलते रात हो गई. पैदल सफर में थकान भी हो रही थी. सभी सड़क के किनारे बैठ गए. अपने साथ घर का बना खाना खाने लगे. कुछ देर के लिए सड़क किनारे बैठ कर आराम करने लगे.

जब दिल्ली से चले थे, तब सैकड़ों की तादाद में लोग बड़े जोश से निकले थे, धीरेधीरे सब अलगअलग दिशाओं में बंट गए. कुछ गिनती के साथी अब मंजेश के साथ थे. दूर उन्हें रेल इंजन की सीटी की आवाज सुनाई दी. मंजेश और राजेश सावधान हो कर सीटी की दिशा में कान लगा कर सुनने लगे.

‘‘मंजेश, रेल चल रही है. यह इंजन की आवाज है,’’ राजेश ने मंजेश से कहा.

‘‘वह देख राजेश, वहां कुछ रोशनी सी है. रेल शायद रुक गई है. चलो, चलते हैं,’’ सड़क के पास नाला था, नाला पार कर के रेल की पटरी थी, वहां एक मालगाड़ी रुक गई थी.

‘‘राजेश उठ, इसी रेल में बैठते हैं. कहीं तो जाएगी, फिर आगे की आगे सोचेंगे. भोला अंकल जल्दी करो. अभी रेल रुकी हुई है, पकड़ लेते हैं,’’ मंजेश के इतना कहते ही सभी गोली की रफ्तार से उठे और रेल की ओर भागे. उन को देख कर आतेजाते कुछ और मजदूर भी मालगाड़ी की ओर लपके. जल्दबाजी में सभी नाला पार करते हुए मालगाड़ी की ओर दौड़े, कहीं रेल चल न दे.

ममता नाले का गंदा पानी देख थोड़ा डर गई. मंजेश ने देखा कि कुछ दूर लकड़ी के फट्टों से नाला पार करने का रास्ता है. उस ने ममता को वहां से नाला पार करने को कहा. लकड़ी के फट्टे थोड़े कमजोर थे, ममता उन पर चलते हुए डर रही थी.

मंजेश ने ममता का हाथ पकड़ा और बोला, ‘‘ममता डरो मत. मेरा हाथ पकड़ कर धीरेधीरे आगे बढ़ो.’’

मंजेश और ममता एकदूसरे का हाथ थामे प्यार का एहसास करने लगे.

राजेश, ममता का परिवार सभी तेज रफ्तार से मालगाड़ी की ओर भाग रहे थे. इंजन ने चलने की सीटी बजाई. सभी मालगाड़ी पर चढ़ गए, सिर्फ ममता और मंजेश फट्टे से नाला पार करने के चलते पीछे रह गए थे. मालगाड़ी हलकी सी सरकी.

‘‘ममता जल्दी भाग, गाड़ी चलने वाली है,’’ ममता का हाथ थामे मंजेश भागने लगा. मालगाड़ी की रफ्तार बहुत धीमी थी. मंजेश मालगाड़ी के डब्बे पर लगी सीढ़ी पर खड़ा हो गया और ममता का हाथ पकड़ कर सीढ़ी पर खींचा.

एक ही सीढ़ी पर दोनों के जिस्म चिपके हुए थे, दिल की धड़कनें तेज होने लगीं. दोनों धीरेधीरे हांफने लगे.

तभी एक झटके में मालगाड़ी रुकी. उस झटके से दोनों चिपक गए, होंठ चिपक गए, जिस्म की गरमी महसूस करने लगे. गाड़ी रुकते ही मंजेश

सीढ़ी चढ़ कर डब्बे की छत पर पहुंच गया. ममता को भी हाथ पकड़ कर ऊपर खींचा.

मालगाड़ी धीरेधीरे चलने लगी. मालगाड़ी के उस डब्बे के ऊपर और कोई नहीं था. राजेश और ममता के परिवार वाले दूसरे डब्बों के ऊपर बैठे थे.

भोला प्रसाद ने ममता को आवाज दी. ममता ने आवाज दे कर अपने परिवार को निश्चित किया कि वह पीछे उसी मालगाड़ी में है.

मालगाड़ी ठीकठाक रफ्तार से आगे बढ़ रही थी. रात का अंधेरा बढ़ गया था. चांद की रोशनी में दोनों एकदूसरे को देखे जा रहे थे. ममता शरमा गई. उस ने अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया.

‘‘ममता, दिल्ली में कुछ काम करती हो या फिर घर संभालती हो?’’ एक लंबी चुप्पी के बाद मंजेश ने पूछा.

‘‘घर बैठे गुजारा नहीं होता. फैक्टरी में काम करती हूं,’’ ममता ने बताया.

‘‘किस चीज की फैक्टरी है?’’

‘‘लेडीज अंडरगारमैंट्स बनाने की. वहां ब्रापैंटी बनती हैं.’’

‘‘बाकी क्या काम करते हैं?’’

‘‘पापा और भाई जुराब बनाने की फैक्टरी में काम करते हैं. मम्मी और मैं एक ही फैक्टरी में काम करते हैं. सब से छोटा भाई अभी कुछ नहीं करता है, पढ़ रहा है. लेकिन पढ़ाई में दिल नहीं लगता है. उस को भी जुराब वाली फैक्टरी में काम दिलवा देंगे.

‘‘तुम क्या काम करते हो, मेरे से तो सबकुछ पूछ लिया,’’ ममता ने मंजेश से पूछा.

‘‘मैं कारपेंटर हूं. लकड़ी का काम जो भी हो, सब करता हूं. अलमारी, ड्रैसिंग, बैड, सोफा, दरवाजे, खिड़की सब बनाता हूं. अभी एक कोठी का टोटल वुडवर्क का ठेका लिया है, आधा काम किया है, आधा पैंडिंग पड़ा है.’’

‘‘तुम्हारे हाथों में तो बहुत हुनर है,’’ ममता के मुंह से तारीफ सुन कर मंजेश खुश हो गया.

चलती मालगाड़ी के डब्बे के ऊपर बैठेबैठे ममता को झपकी सी आ गई और उस का बदन थोड़ा सा लुढ़का, मंजेश ने उस को थाम लिया.

‘‘संभल कर ममता, नीचे गिर सकती हो.’’

मंजेश की बाहों में अपने को पा कर कुछ पल के लिए ममता सहम गई, फिर अपने को संभालती हुई उस ने नीचे झांक कर देखा ‘‘थैंक यू मंजेश, तुम ने बांहों का सहारा दे कर बचा लिया, वरना मेरा तो चूरमा बन जाता.’’

‘‘ममता, एक बात कहूं.’’

‘‘कहो.’’

‘‘तुम मुझे अच्छी लग रही हो.’’

मंजेश की बात सुन कर ममता चुप रही. वह मंजेश का मतलब समझ गई थी. चुप ममता से मंजेश ने उस के दिल की बात पूछी, ‘‘मेरे बारे में तुम्हारा क्या खयाल है?’’

ममता की चुप्पी पर मंजेश मुसकरा दिया, ‘‘मैं समझ गया, अगर पसंद नहीं होता, तब मना कर देती.’’

‘‘हां, देखने में तो अच्छे लग रहे हो.’’

‘‘मेरा प्यार कबूल करती हो?’’

‘‘कबूल है.’’

मंजेश ने ममता का हाथ अपने हाथों में लिया, आगे का सफर एकदूसरे की आंखों में आंखें डाले कट गया.

लखनऊ स्टेशन पर मंजेश, ममता, राजेश और ममता का परिवार मालगाड़ी से उतर कर आगे सीतापुर के लिए सड़क के रास्ते चल पड़ा.

सड़क पर पैदल चलतेचलते मंजेश और ममता मुसकराते हुए एकदूसरे को ताकते जा रहे थे.

ममता की मां ने ममता को एक किनारे ले जा कर डांट लगाई, ‘‘कोई लाजशर्म है या बेच दी. उस को क्यों घूर रही है, वह भी तेरे को घूर रहा?है. रात गाड़ी के डब्बे के ऊपर क्या किया?’’

‘‘मां, कुछ नहीं किया. मंजेश अच्छा लड़का है.’’

‘‘अच्छा क्या मतलब?’’ ममता की मां ने उस का हाथ पकड़ लिया.

ममता और मां के बीच की इस बात को मंजेश समझ गया. वह भोला प्रसाद के पास जा कर अपने दिल की बात कहने लगा, ‘‘अंकल, हमारे गांव आसपास हैं. आप मेरे घर चलिए, मैं अपने परिवार से मिलवाना चाहता हूं.’’

मंजेश की बात सुन कर भोला प्रसाद बोला, ‘‘वह तो ठीक है, पर क्यों?

‘‘अंकल, मुझे ममता पसंद है और मैं उस से शादी करना चाहता हूं. हमारे परिवार मिल कर तय कर लें, मेरी यही इच्छा है.’’

मंजेश की बात सुन कर ममता की मां के तेवर ढीले हो गए और वे मंजेश के घर जाने को तैयार हो गए.

लौकडाउन जहां परेशानी लाया है, वहीं प्यार भी लाया है. मंजेश और ममता का प्यार मालगाड़ी में पनपा.

सभी पैदल मंजेश के गांव की ओर बढ़ रहे थे. ममता और मंजेश हाथ में हाथ डाले मुसकराते हुए एक नए सफर की तैयारी कर रहे थे.

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