इस अभिनेत्री ने कभी नहीं सोचा शादी से पहले सेक्स

एक समय बॉलीवुड में हवा हवाई नाम से मशहूर हुईं एक्ट्रेस श्रीदेवी जल्द ही फिल्म मॉम’ फिल्म से वापसी करने वाली हैं. ये फिल्म अगले महीने 7 जुलाई को रिलीज हो रही है.

इसी सप्ताह इस फिल्म का एक पोस्टर भी जारी किया गया है, जो लोगों को काफी पसंद आ रहा है. इस फिल्म में श्रीदेवी के अलावा नवाज़ुद्दीन सिद्दिकी अहम भूमिका में हैं. आपको बता दें कि श्रीदेवी आखिरी बार फिल्म इंग्लिश विंगलिश में दिखाई दी थीं, जो काफी हिट हुई थी. आज हम आपके लिए अभिनेत्री से जुड़े कुछ पुराने कुस्से लेकर आए हैं. यहां उनके एक पुराने इंटरव्यू के कुछ अँश भी इसमें शामिल हैं.

तो अब आपको पता चलेगा कि लव रिलेशन्स के बारे में क्या सोचती हैं श्रीदेवी…

मुझे नहीं पता था प्यार क्या होता है

श्रीदेवी अक्सर प्यार के मुद्दों पर काफी बातचीत किया करती थी. एक बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था कि मुझे नहीं पता कि आजकल के बच्चों के लिए प्यार की क्या वैल्यू है, क्योंकि मेरे लिए प्यार सिर्फ ‘आईलवयू’ कह देना ही नहीं है और न ही ये कोई फिज़िकल अट्रैक्शन है.

वर्जिनिटी पर बात

श्रीदेवी के अनुसार कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनका मानना है कि एक औरत की वर्जिनिटी उसके लिए सबसे जरूरी होती है जिसके साथ ही वो अपने पति के घर शादी के बाद जाती है, लेकिन उन्हें नहीं लगता कि इस सोच में कोई गलत बात है.

शादी से पहले सेक्स

शादी से पहले सेक्स पर अपनी राय में उन्होंने एक दफा कहा था कि मैं ऐसा कभी नहीं कर सकती. मुझे नहीं पता लोग ये सब कैसे कर लेते हैं. लेकिन बाद में उन्होंने य भी कहा कि आज के समय में शादी से पहले सेक्स का मानों ट्रेंड सा चल गया है.

अपनी लव स्टोरी पर की बात

आपको बता दें कि कुछ साल पहले श्रीदेवी ने अपनी और बोनी कपूर की लव स्टोरी पर भी बात की थी. श्रीदेवी ने बताया था कि कैसे बोनी कपूर को फिल्म मिस्टर इंडिया के दौरान उनसे प्यार हुआ था और उन्होंने, श्रीदेवी को प्रपोज कर दिया था. श्रीदेवी कहती हैं कि साल 1984 में बोनी ने मुझे फिल्म मिस्टर इंडिया में सीमा का किरदार ऑफर किया. बाद में बोनू ने कहा कि वो उनसे प्यार करते हैं.

मैंने हमेशा दिल की सुनी

अभिनेत्री ने ये भी बताया कि उन्हें बोनी कपूर से कैसे प्यार हुआ. उन्होंने बताया ”मुझे बोनी से प्यार तब हुआ जब मैंने उन्हें असल में जाना. उन्होंने कहा कि मैं हमेशा अपने दिल की सुनती थी और इस बार भी मैंने यही किया, जिसके लिए मुझे काफी खुशी है.

पर उनके इस फैसले से उनकी बहन हैरान हो गई थी. श्रीदेवी ने बताया कि उस समय तक उनके माता पिता चल बसे थे और उनकी बहन बोनी के साथ रिलेशन के उनके फैसले से काफी हैरान थीं. लेकिन अब मेरी बहन की मेरे पति के साथ काफी अच्छी बॉन्डिंग है. अब उसे भी यही लगता है कि मैंने जो किया बिल्कुल ठीक किया.

अपनी सास और ननद के साथ रिश्ता

श्रीदेवी अपने ससुरालवालों के साथ अपने संबंधों पर भी बात करते रहती हैं. उन्होंने कहा कि मेरा उनके साथ काफी अच्छा संबंध है और मेरी सास मुझे काफी प्यार करती हैं. उन्होंने अपनी ननद सुनीता कपूर, जो कि अनिल कपूर की पत्नी हैं, के साथ भी अपने अच्छे संबंधों को दिल से स्वीकारा. वे कहती हैं कि सुनीता हमेशा उनका काफी सपोर्ट करती हैं.

तीन तलाक के मसले को समझना है जरूरी

सरकार ने मुसलिम विवाह कानून तीन बार तलाक तलाक तलाक कह कर शादी को तोड़ने के मामले को इस तरह उछालने की जिद पकड़ ली है, मानो इस के खत्म होते ही औरतों, खासतौर पर मुसलिम औरतों को जहालत और जलालत से नजात मिल जाएगी. ट्रिपल तलाक उतना ही बुरा है, जितना हिंदुओं में कुंडली, व्रत, उपवास, दहेज, जातिउपजाति हैं. 50 सालों के कहने भर के सुधार के बावजूद हिंदू लड़कियों को शादी और शादी के बाद वैसी ही मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं, जैसी ट्रिपल तलाक की शिकार मुसलिम औरतों को.

मुसलिम धर्म के दुकानदार इस मामले पर सकपकाए हुए हैं. कांग्रेसी राजों के दौरान उन के पास वोट की थोड़ीबहुत ताकत थी और उस के सहारे उन्होंने मुसलिम शादीब्याह के मामलों में कोई बदलाव न आने दिया और औरतों को गुलाम की सी जिंदगी जीने को मजबूर किया. कहने को मुसलिम शादी में मेहर तय होता है, पर आम गरीबों में यह मामूली रकम होती है और इसे वसूलने का कोई तरीका नहीं है.

हिंदू कानूनों में अब मजिस्ट्रेट गुजारा भत्ता दिला सकता है, पर उस के लिए मोटी रकम तो वकीलों और पेशियों पर ही खर्च हो जाती है. मुसलिम व हिंदू औरतों की तलाक के बाद एक सी बुरी हालत होती है, बजाय तलाक के बाद औरतों को कोई हक दिलाने के नरेंद्र मोदी मुसलिम तलाक के खिलाफ पिल पड़े हैं, मानो यही औरतों को आगे बढ़ने से रोक रहा है. गुजरात चुनावों में वे 5 के 25 की बातें भी जम कर करते थे जो मुसलिमों में एक से ज्यादा बीवियां रखने पर है. उन्होंने यह हिसाब करने की कतई कोशिश नहीं की कि अगर हर मर्द के पास 4 बीवियां हों, तो आबादी में औरतों को 4 गुना होना पड़ेगा. हिंदुओं की तरह मुसलिमों में औरतों की गिनती आदमियों से कम है और यह जनगणना से साफ है.

सरकार हर समय विकास के मुद्दे को छिपाने के लिए इधरउधर के शिगूफे ढूंढ़ती रहती है और ट्रिपल तलाक उन्हीं में से एक है. सरकार कभी स्वच्छ भारत, कभी नोटबंदी, कभी आधार कार्ड को कंपलसरी बनाने के मामले उछाल रही है. विकास के नाम पर उस के पास यही एक आंकड़ा है कि भारत की बढ़ने की स्पीड दुनिया में सब से तेज है. सच यह है कि जो स्पीड हमारी है, उस से हमें चीन की तरह खुशहाल होने में भी 125 साल लगेंगे. केवल बड़ा देश होने से खुशहाली का आंकड़ा नहीं पैदा हो जाता. एक लाख गरीबों के पास कुल पैसा एक करोड़पति से ज्यादा ही होगा, पर उस पर गुब्बारा तो फुलाया नहीं जा सकता.

ट्रिपल तलाक खराब है, तो बना डालो कानून. धर्म को आम आदमी के रोजमर्रा के जीवन में आने का वैसे भी कोई हक नहीं. हिंदू कानूनों को भी खत्म कर दो, मुसलिम कानूनों को भी. लेनदेन के कानूनों की तरह शादी और तलाक के कानून हिंदुओं और मुसलमानों में एकजैसे हों. न पंडित शादी कराए, न काजीमुल्ला. शादी तो मजिस्ट्रेट ही कराए. हिम्मत है तो कर के दिखाएं. हां, इस मामले को हिंदुओं को भड़काने के लिए इस्तेमाल करना हो तो बात दूसरी.

मोदी के खिलाफ महागठबंधन क्या सफल होगा

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की जीत का असर बिहार की राजनीति पर दिखने लगा है. इस के अलावा 4 राज्यों में भाजपा की सरकार बनने के बाद राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और जद (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने बीच के तमाम विवादों को खत्म करने की कोशिशें शुरू कर दी हैं. दोनों नेता लगातार एकदूसरे से मिल रहे हैं और साथसाथ फोटो भी खिंचवा रहे हैं. इस बहाने दोनों धुरंधर यह संदेश देने की पुरजोर कवायद कर रहे हैं कि उन के  बीच सबकुछ ठीक है और हर हाल में दोनों साथसाथ हैं.

लालू प्रसाद यादव ने तो बातचीत में ईमानदारी से यह कबूल भी किया कि अगर अब भी गैरभाजपाई दल एकजुट नहीं हुए, तो उन के खत्म होने का पूरा खतरा है.

महागठबंधन में दरार, उठापटक और खटास की अटकलों पर पानी डालते हुए नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव ने एक सुर में कहा है कि वे साथसाथ हैं और उन के बीच कोई विवाद या तनाव नहीं है.

लालू प्रसाद यादव ने यह भी कहा कि नीतीश कुमार की अगुआई में महागठबंधन की सरकार मजबूती से काम कर रही है और वह अपना कार्यकाल पूरा करेगी. वे और नीतीश कुमार मिल कर दिल्ली से भाजपा को खदेड़ेंगे.

लालू प्रसाद यादव कहते हैं, ‘‘कितनी मेहनत से महागठबंधन के पेड़ को खड़ा किया है और उसे खुद ही कालिदास बन कर काट देंगे क्या? संघ बिहार को तोड़ने की साजिश में लगा हुआ है, क्योंकि बिहार उस का डेंजर जोन है.’’

वहीं नीतीश कुमार भी लालू प्रसाद यादव के सुर में सुर मिलाते हुए कहते हैं कि महागठबंधन को ले कर भरम और अफवाह फैलाने वालों की दाल बिहार में नहीं गलेगी. कुछ लोगों को बिहार और महागठबंधन को बदनाम करने की आदत पड़ चुकी है.

भाजपा के खिलाफ नैशनल लैवल पर महागठबंधन बनाने के लिए नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव ने 3 अप्रैल, 2017 को लंबी बातचीत की. पिछले दिनों 5 राज्यों के चुनाव नतीजे आने के बाद पहली बार दोनों नेताओं की मुलाकात हुई.

मुलाकात के बाद लालू प्रसाद यादव ने बताया कि देश को बचाने के लिए गैरभाजपाई दलों की गोलबंदी जरूरी हो गई है. अगर ऐसा नहीं हुआ, तो धर्मनिरपेक्ष ताकतों का बोरियाबिस्तर गोल हो जाएगा.

नीतीश कुमार ने कांग्रेस को इस पर पहल करने को कहा है, क्योंकि वह बड़ी और सब से पुरानी पार्टी है. लालू प्रसाद यादव ने भी यही कहा कि नीतीश कुमार के साथ वे भी सभी दलों के नेताओं से बात करेंगे और राष्ट्रीय महागठबंधन के लिए जमीन तैयार करेंगे.

उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनावी नतीजों में भाजपा को मिली भारी जीत के बाद दोनों नेताओं ने सभी विपक्षी दलों से गुहार लगाई है कि वे आपसी तनाव और अहम को छोड़ कर एक मंच पर आ जाएं, तो इस मुहिम को जमीन पर उतारने में कोई दिक्कत नहीं होगी. उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजे को गैरभाजपाई दलों को चेतावनी और चुनौती की तरह लेना होगा.

लालू प्रसाद यादव ने अपनी पार्टी राजद को राममनोहर लोहिया और मधु लिमये की नीति पर हर कार्यकर्ता को चलाने की रणनीति बनाई है. बिहार के पड़ोसी उत्तर प्रदेश में भगवा पार्टी की कामयाबी और समाजवादियों की करारी हार के बाद राजद ने बिहार में खुद को नए सिरे से खड़ा करने की तैयारी शुरू की है.

लालू प्रसाद यादव कहते हैं कि समाजवादियों की हार को उन्होंने चुनौती के रूप में लिया है. उन्हें इस बात का यकीन है कि बिहार ने हमेशा भगवा रथ को रोका है. सब से पहले लालकृष्ण आडवाणी के रथ को लालू प्रसाद यादव ने बिहार में रोक दिया था. उस के बाद पिछले विधानसभा चुनाव में बिहार ने नरेंद्र मोदी की लहर को नाकाम कर दिया था. इन्हें भरोसा है कि वे अपने 30 लाख सक्रिय कार्यकर्ताओं के दम पर साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में हिंदुत्व के उभार को पटकनी दे सकते हैं.

लालू प्रसाद यादव के बेटे और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव कहते हैं कि वे अपने कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग देंगे कि किस तरह से महागठबंधन की सरकार के कामकाज को गांवगांव और जनजन तक पहुंचाया जाए. इस के लिए कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर लगाया जाएगा.

2 मई से 4 मई तक राजगीर में राजद के सभी नेताओं और ब्लौक लैवल के प्रमुख कार्यकर्ताओं को शिविर में बुलाया गया. राजद ने नया नारा बुलंद किया कि आबादी के हिसाब से देश में बजट बनाया जाए. समाजवादी विचारधारा को पंचायतों और वार्डों तक पहुंचा कर भगवा विचारधारा को हराया जा सकता है.

लालू प्रसाद यादव पिछले 30 सालों से समाजवाद और दलितों, पिछड़ों व अल्पसंख्यकों की राजनीति की धुरी रहे हैं. उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिली जीत के बाद के खतरे को उन्होंने तुरंत भांप लिया है. वे साफसाफ कहते हैं कि अब भी अगर धर्मनिरपेक्ष पार्टियां अपनाअपना अहम छोड़ कर एक मंच पर नहीं आएंगी, तो सांप्रदायिक ताकतें और भी मजबूत होती चली जाएंगी और हमारा वजूद खत्म हो जाएगा.

ईगो प्रौब्लम की वजह से सभी विरोधी दल एकजुट नहीं हो पा रहे हैं, जबकि सभी गैरभाजपाई दलों की एक ही मंजिल है. सभी दल दिल्ली से भाजपा को उखाड़ने की कोशिश में लगे हुए हैं.

पिछले कुछ समय से लालू प्रसाद यादव ने केंद्र की भाजपा सरकार पर जम कर निशाना साधना शुरू कर दिया है. वे बारबार जोर दे कर अपने वोटरों से कह रहे हैं कि केंद्र सरकार ने अडानी का 2 हजार करोड़ रुपए का कर्ज माफ कर दिया. रिलायंस कंपनी को फायदा पहुंचाया जा रहा है.

मोदी सरकार को अमीरों की सरकार करार देते हुए वे कहते हैं कि अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को जड़ से उखाड़ फेंकने की जरूरत है, नहीं तो गरीबों का जीना मुहाल हो जाएगा.

अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने पिछले सारे विवादों और तनावों को दूर करने की पहल की है, जो महागठबंधन के लिए सुकून की बात है.

उत्तर प्रदेश और पंजाब के विधानसभा चुनावों के दौरान नीतीश कुमार लालू प्रसाद यादव की अनदेखी कर अकेले ही वहां जा कर सभाएं कर रहे थे. महागठबंधन में बखेड़ा खड़ा करने से बचने के लिए लालू प्रसाद यादव चुप रह गए, पर राजद के थिंक टैंक माने जाने वाले रघुवंश प्रसाद सिंह ने यह कहने से परहेज नहीं किया कि अपने सियासी फायदे के लिए नीतीश कुमार महागठबंधन के साथियों की अनदेखी करते रहे हैं.

उन्होंने नीतीश कुमार से कई तल्ख सवाल भी पूछे थे. जैसे, नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार किस ने बना दिया? किस हैसियत से नीतीश कुमार मिशन, 2019 की बात कर रहे हैं? क्या अकेले घूम कर नीतीश कुमार सैकुलर ताकतों को कमजोर और सांप्रदायिक ताकतों को मजबूत नहीं कर रहे हैं? दूसरे राज्यों में सभा करने से पहले नीतीश कुमार को क्या सहयोगी दलों से बात नहीं करनी चाहिए थी? क्या उन्हें भरोसे में नहीं लेना चाहिए था?

इन सवालों पर नीतीश कुमार चुप्पी साधे रहे गए और लालू प्रसाद यादव ने भी कुछ नहीं कहा.

राजद सूत्रों के मुताबिक, लालू प्रसाद यादव इस बात से काफी नाराज हुए थे कि नीतीश कुमार ने उन से कोई सलाहमशवरा किए बगैर उत्तर प्रदेश के बनारस, कानपुर, नोएडा और लखनऊ में अकेले ही लगातार कई रैली कर डालीं. इस मामले में महागठबंधन को भरोसे में नहीं लिया गया.

नीतीश कुमार के उत्तर प्रदेश में धुआंधार चुनाव प्रचार कर और अपना जनाधार बनानेबढ़ाने की जुगत से लालू प्रसाद यादव कतईर् खुश नहीं थे. पूर्वी उत्तर प्रदेश में कुर्मी जाति की अच्छीखासी आबादी है और नीतीश कुमार की नजर उन पर गड़ी हुई थी.

लालू प्रसाद यादव ने कई दफा नीतीश कुमार को समझाने की कोशिश की कि प्रधानमंत्री बनने के चक्कर में कहीं मुख्यमंत्री की कुरसी न गंवानी पड़ जाए? इस से जहां महागठबंधन का मकसद पूरा नहीं होगा, वहीं भाजपा को मजबूत होने का मौका भी मिल जाएगा.

गौरतलब है कि 243 सदस्यों वाली बिहार विधानसभा में महागठबंधन ने 178 सीटों पर कब्जा किया है. इस में राजद के खाते में 80, जद (यू) की झोली में 71 और कांग्रेस के हाथ में 27 सीटें हैं. राजग के खाते में 58 सीटें हैं.

लालू प्रसाद यादव को महागठबंधन में अपनी ताकत का एहसास है और इस के साथ उन्हें यह भी डर है कि महागठबंधन में विवाद होने से भाजपा उस का फायदा उठा सकती है.

लालू प्रसाद यादव की नाराजगी की वजह से ही नीतीश कुमार ने नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक, थल सेनाध्यक्ष की नियुक्ति के मामले में केंद्र सरकार का समर्थन कर अपने सहयोगी दलों के साथ समूचे विपक्षी दलों का सिर चकरा दिया था.

लालू प्रसाद यादव भी हैरत में थे. इस से राजनीतिक हलकों में यह अफवाह जोरों से चलने लगी कि नीतीश कुमार दोबारा राजग में जाने का माहौल बना रहे हैं, जबकि नीतीश कुमार को करीब से जानने वाले बताते हैं कि नीतीश कुमार की राजनीतिक चाल दूसरे नेताओं से अलग है.

साल 2012 में जब नीतीश कुमार भाजपा की मदद से बिहार में सरकार चला रहे थे, तो उस समय उन की पार्टी जद (यू) ने राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी को वोट दिया था. उस के बाद जब कांग्रेस सरकार जीएसटी बिल लाई, तो नीतीश कुमार ने उस का भी समर्थन किया था, जबकि उन की सहयोगी भाजपा ने जीएसटी बिल को पास नहीं होने दिया था.

नीतीश कुमार सियासत के चतुर और माहिर खिलाड़ी हैं. फिलहाल जहां वे लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस की मदद से बिहार में सरकार चला रहे हैं और साल 2019 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी को कड़ी टक्कर देने की कवायद में

लगे हुए हैं, वहीं दूसरी ओर वे भाजपा से हाथ मिलाने का रास्ता भी बना कर रखे हुए हैं.

पिछले महीने 4 राज्यों में भाजपा की सरकार बनने के बाद नीतीश कुमार का सियासी गणित कुछ गड़बड़ा सा गया है.  उन्हें लगने लगा है कि बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन को मिली कामयाबी को नैशनल लैवल पर आजमाया जा सकता है. इस के अलावा दूसरा कोई चारा भी नहीं है.

बातबेबात पर लालू प्रसाद यादव को नाराज और नजरअंदाज करने की रणनीति में बदलाव करते हुए नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव के गले

मिल कर फोटो खिंचवाया और जनता को बतानेजताने की कोशिश की कि महागठबंधन पर कोई विवाद नहीं है और लालू प्रसाद यादव से भी कोई खटास नहीं है.

नीतीश कुमार के  बदलाव को देख कर लालू प्रसाद यादव भी खुश हैं, तभी तो वे कहने लगे हैं कि बिहार में भाजपा वालों के लिए कोई जगह नहीं है. यहां कोई वैकेंसी नहीं है. वे और नीतीश कुमार मिल कर दिल्ली से भाजपा को खदेड़ कर ही दम लेंगे.

कोहिनूर की विशेष पेशकश : ‘गुप्त ज्ञान’

कोहिनूर प्लेजर कंडोम आपके लिए लेकर आया है “गुप्त ज्ञान”. कोहिनूर के इस गुप्त ज्ञान की मदद से आप अपने सेक्स के मजे को दोगुना कर सकते हैं.
अगर आप भी लेना चाहते है कोई गुप्त ज्ञान तो हमें इस ईमेल पर लिखें : sarassalilmagazine@gmail.com
आप अपनी समस्या एसएमएस के जरीये भी इस मोबाइल नंबर 08826099608 पर भेज सकते हैं.

तो आइये जानते हैं क्या है आज का गुप्त ज्ञान…

सेक्स के दौरान मेरे पति बहुत जल्दी जोश में आ जाते हैं, जबकि मैं काफी देर बाद जोश में होती हूं. कोई उपाय बताएं.

तजरबा न होने के चलते आप लोगों के साथ ऐसा हो रहा है. अपने पति से कहें कि हमबिस्तर होने के दौरान पहले वे काफी देर तक आप के अंगों को  चूमें व सहलाएं. इस से आप पूरी तरह तैयार हो जाएंगी.

*

मैं 36 साल का हूं. सेक्स के दौरान मैं बहुत जल्दी ढीला पड़ जाता हूं. क्या मुझे कोई बीमारी तो नहीं है.

आप को कोई बीमारी नहीं है. हर वक्त इस बारे में न सोचें. जब भी सेक्स का मूड बने, तो देर तक फोरप्ले करने के बाद ही हमबिस्तरी करें. फोरप्ले का मतलब होता है एकदूसरे को चूमना चाटना और नाजुक अंगों को सहला कर जोश में लाना.

*

मैं हस्तमैथुन का आदी हूं. दोस्त कहते हैं कि यह गलत आदत है. इस बारे में डिटेल से बताएं.

सब से पहले तो आप को बता दें कि यह हानिकारक नहीं है बल्कि युवावस्था में आम समस्या है. युवावस्था में कदम रखते ही युवकों के मन में सैक्स के प्रति जिज्ञासा के साथसाथ विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण होता है, जिस से उत्तेजना की अवस्था में हस्तमैथुन द्वारा यौन आनंद प्राप्त करना सहज लगता है और युवा इस के आदी हो जाते हैं. आज डाक्टरों ने यह साबित कर दिया है कि यह कोई बीमारी नहीं है.

युवाओं में हस्तमैथुन स्वाभाविक है और इसे नौर्मल व स्वस्थ हैबिट के रूप में लिया जाता है, लेकिन सैक्स की अधूरी जानकारी के कारण इस के आदी युवाओं में निराशा, हताशा और डिप्रैशन हो जाता है, इस से बचना चाहिए.

हां, अति हर चीज की बुरी होती है और हस्तमैथुन भी उस से अलग नहीं. यह आदत तब खतरनाक व हानिकारक है जब इस से आप की पढ़ाई व अन्य कार्यों पर असर पड़े. अत: चिंता न करें. इसे स्वाभाविक क्रिया मान कर अपने अन्य कामों पर हावी न होने दें.

मैं बीवी के साथ ज्यादा देर तक हमबिस्तरी नहीं कर पाता. क्या करूं.

हमबिस्तरी में लगने वाले वक्त के बारे में ज्यादा नहीं सोचना चाहिए. जब मन करे तो देर तक फोरप्ले करने के बाद हमबिस्तरी करें. धीरेधीरे मामला अच्छा हो जाएगा.

*

मैं ने अपने पति के साथ बगैर कंडोम के 5 मिनट तक हमबिस्तरी की थी. कहीं मैं पेट से तो नहीं हो गई हूं?

आजकल दवाओं की दुकानों पर अच्छी कंपनियों के प्रेग्नेंसी चैक करने वाले किट मिलते हैं. आप उस किट के जरीए पता लगा सकती हैं कि आप पेट से हैं या नहीं.

*

मैं 18 साल का हूं और मेरी गर्लफ्रैंड 16 साल की है. लगातार हमबिस्तरी करने की वजह से वह पेट से हो गई थी. लिहाजा, मुझे उस का पेट गिरवाना पड़ा. तब से वह बहुत उदास रहती है. मैं क्या करूं?

आप उसे बाहर घुमाफिरा कर और खिलापिला कर खुश करें, मगर हमबिस्तरी कतई न करें. पहले पढ़ाई पूरी करें, फिर नौकरी करें और शादी की उम्र हो जाने के बाद शादी करें.

*

मेरी उम्र 25 साल है और बीवी की उम्र 23 साल है. हमारी शादी को 5 साल हो चुके हैं, पर अभी तक बच्चा नहीं हुआ. हमें क्या करना चाहिए?

अकसर ऐसा होता है कि शादी के 5-7 सालों बाद बच्चा होता है. लिहाजा, निराश होने की जरूरत नहीं है. वैसे, आप दोनों किसी माहिर डाक्टर से अपनी जांच करा सकते हैं.

*

मैं 19 साल का हूं. मैं ने 26 साल की अपनी मौसेरी बहन के साथ हमबिस्तरी की है. अब वह मुझ से प्यार करने लगी है. मैं क्या करूं?

 मौसी की लड़की के साथ हमबिस्तरी कर के आप ने अच्छा नहीं किया है. घर वालों को पता चलेगा तो आप की फजीहत होगी. आइंदा आप यह गलती न करें.

*

मैं 20 साल का हूं. मैं अपनी चाची के साथ 2 सालों से हमबिस्तरी कर रहा हूं. वह 4 महीने से पेट से है, फिर भी मेरे साथ हमबिस्तरी करना चाहती है. मना करने पर सब को बताने को कहती है. मैं क्या करूं?

चाची के साथ जिस्मानी संबंध बना कर आप ने अच्छा नहीं किया. आप फौरन यह सिलसिला बंद कर दें. चाची की धमकी से न डरें, औरतें ऐसी बातें बता कर खुद मुसीबत में फंस जाती हैं.

सलमान-कैटरीना का ये हौट वीडियो देखा आपने

एक बार फिर सलमान खान सुर्खियों में बने हुए हैं, लेकिन इस बार वे अपनी वजह से नहीं बल्कि अपनी एक्स गर्लफ्रेंड कैटरीना की वजह से सुर्खियों में है. आईफा 2017 का जश्न शुरू होने वाला है और यही वजह है कि गुरुवार रात आईफा की प्रेस कॉन्फ्रेंस रखी गई थी.

इस प्रेस कांफ्रेंस में सलमान खान, कैटरीना कैफ, आलिया भट्ट शामिल हुए, जिन्होंने साथ मिलकर लोगों के लिए समां बांध दिया. जहां सलमान को मीडिया के बीच बिंदास होते हुए देखा जाता है, वहीं कैटरीना अपने रिजर्व नेचर के लिए फेमस हैं. लेकिन इस इवेंट में बिल्कुल उल्टा हुआ. सलमान इवेंट में चुप्पी साधे हुए बैठे थे, जबकि कैटरीना ने जमकर सुर्खियां बटोरीं.

इस इवेंट के दौरान कैटरीना ने सलमान को लेकर कुछ ऐसा कहा, जिसे सुनकर सलमान भरी महफिल में शरमा गए. असल में सलमान से पूछा गया कि वे आलिया भट्ट के साथ काम कब करेंगे? सलमान इसका जवाब देते, इससे पहले कैटरीना ने ही जवाब दे दिया. कैटरीना ने बीच में बोलते हुए कहा कि ‘सलमान को मेरे लिए छोड़ दीजिये.’ जी हां ये किसी और ने नहीं, बल्कि सलमान की एक्स गर्लफ्रेंड ने कैमरा के सामने कहा. यहां तक कि कैट ने आलिया को भी नहीं छोड़ा और उनके लिए कह दिया ‘आलिया को वरुण के साथ रहने दीजिए.’

अब बताइए, भरी महफिल में आपकी एक्स गर्लफ्रेंड आपके लिए ऐसा कह दे, तो आप शर्म से पानी-पानी तो हो ही जाएंगे. कुछ ऐसा ही हाल सलमान का भी था.

सलमान खान और कैटरीना कैफ कभी एक दूसरे के काफी करीब थे. फिर, दोनों ने अपनी राहें बदल लीं. लेकिन, एक बार फिर जब यह जोड़ी ‘टाइगर ज़िंदा है’ में एक साथ काम करती नजर आयी तो दोनों में एक नई बॉन्डिंग देखने को मिली और यहीं से कयास लगाए जाने लगे कि सलमान-कैटरीना फिर से रिलेशनशिप में हैं.

आपको बता दें कि पिछले महीने ही सलमान खान और कैटरीना कैफ दोनों ऑस्ट्रिया में टाइगर जिंदा है की शूटिंग से लौटे हैं. गौरतलब है कि शूटिंग के दौरान कैटरीना बुरी तरह से घायल हो गई थीं, जिससे उनकी पीठ पर काफी चोटें आई. डॉक्टर ने उन्हें आराम करने की सलाह भी दी है. खबर यह भी आई थी कि उस दौरान सलमान की यही कोशिश रही कि कैटरीना को शूटिंग करने में ज्यादा दिक्कतों का सामना ना करना पड़े और वो केवल आसान दृश्यों की शूटिंग ही करें.

फिल्म रिव्यू : डियर माया

बौलीवुड में कभी मनीषा कोईराला की गिनती अति खूबसूरत व बेहतरीन अदाकारा के रूप में हुआ करती थी. पर कैंसर की बीमारी के चलते वह लंबे समय तक अभिनय से दूर रहीं. अब कैंसर की बीमारी से लड़कर जीत हासिल करने के बाद नई जिंदगी की शुरुआत करते हुए उन्होंने फिल्म ‘‘डियर माया’’ से अभिनय में वापसी की है. जिसे देखकर कहा जा सकता है कि मनीषा कोईराला ने वापसी के तौर पर गलत फिल्म का चयन किया है. कहानी, पटकथा व निर्देशन हर स्तर पर यह कमजोर फिल्म है. फिल्म में किसी भी किरदार को सशक्त तरीके से नहीं गढ़ा गया है. फिल्म का सशक्त पक्ष शिमला की लोकेशन मात्र ही है.

फिल्म की कहानी शिमला की है, जहां दो लड़कियां एना (मदीहा ईमाम) और ईरा (श्रेया चैधरी) जो कि आपस में बहुत गहरी दोस्त हैं, उनके बीच पड़ोस में रहने वाली माया (मनीषा कोईराला) हमेशा चर्चा का विषय रहती हैं. माया हमेशा अपने बड़े से बंगले की चार दीवारी के अंदर कैद रहती हैं. ज्यादातर समय वह घर के अंदर बंद रहकर काले या नीले रंग की पोशाक पहनने वाली गुड़िया बनाती रहती हैं. उन्होंने अपने घर के अंदर काफी पक्षियों को पिंजरे में कैद कर रखा है. जिनकी देखभाल करने के लिए एक बूढ़ी नौकरानी उनके साथ रहती है. माया का जीवन अवसाद से भरा हुआ है. खुशी नाम की कोई चीज नहीं है. एना की मां हमेशा एना को समझाती है कि वह ईरा से दूर रहे. क्योंकि ईरा आत्मकेंद्रित लड़की है, वह सिर्फ अपने बारे में सोचती है. वह कभी भी एना को नुकसान पहुंचा सकती है. पर एना को यह सब गलत लगता है.

एना की मां (इरावती हर्षे) से एना व ईरा को पता चलता है कि माया के पिता की मौत के बाद माया के चाचा ने उसकी मां व उसे इतनी तकलीफें दी थी कि एक दिन माया की मां कहीं चली गयी. उसके बाद माया के चाचा ने उस पर भी अत्याचार किया. माया के चाचा के गुस्से की वजह से सभी डरते थे. माया के चाचा की नजर माया की संपत्ति पर रही, जिसके चलते उन्होंने माया की शादी नही होने दी और माया से कहा कि लड़के ने उसे अस्वीकार कर दिया.

सब कुछ जानने के बाद ईरा व एना निर्णय लेते हैं कि वह माया के जीवन में खुशियां भरेंगे. काफी सोचविचार कर ईरा व एना, माया को देव नामक काल्पनिक युवक के नाम से प्रेम पत्र लिखना शुरू कर देती हैं. इन प्रेम पत्रों में देव लिखता है कि किस तरह वह उन्हें पसंद करने लगा था. पर उसके चाचा ने ही उन्हे मिलने नहीं दिया. वगैरह..धीरे धीरे माया की जिंदगी में बदलाव आने लगता है. पर ईरा को यह बर्दाश्त नही कि सब कुछ एना कर जाए, इसलिए वह भी एक पत्र देव की तरफ से लिखकर उस लिफाफे में भेजती है, जिस पर दिल्ली का पता लिखा है. उसके बाद माया शिमला में अपना घर व सारा सामान बेचकर अपने कुत्तों के साथ दिल्ली पहुंच जाती है. इधर एना परेशान है कि माया दिल्ली में क्या करेंगी.

सारा सच जानकर एना के माता पिता नाराज होकर उसे दिल्ली में होस्टल में रहकर पढ़ने भेज देते हैं. एना अपनी तरफ से माया को तलाशने की कोशिश करती है. छह वर्ष बीत जाते हैं. अंततः वह दिल्ली की दीवारों पर माया की तस्वीर के साथ गुमशुदगी के बारे में पोस्टर चिपका देती है. माया बताती हैं कि उसके साथ दिल्ली में क्या क्या हुआ और आखिर उसे एक देव कैसे मिला.

फिल्म में दो सहेलियों की दोस्ती, बनते बिगड़ते रिश्ते, प्रेम के साथ गुमशुदगी का मसला भी है. मगर सब कुछ बहुत ही सतही स्तर पर है. फिल्म बहुत धीमी गति से आगे बढ़ती है. इंटरवल के बाद तो फिल्म एकदम शिथिल हो जाती है. फिल्म को एडीटिंग टेबल पर छोटा करने की जरुरत थी. अति कमजोर कहानी को बेहतर बनाया जा सकता था. गुमशुदगी के मसले पर काफी कुछ कहा जा सकता था, पर यह फिल्म चुप रहती है. पटकथा व निर्देशन में भी काफी कमियां हैं. माया के शिमला से दिल्ली पहुंचने व गायब रहने का रहस्य भी ठीक से नहीं उभरता. प्रभाव हीन संवाद व गीत फिल्म को स्तरहीन बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखते.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो मनीषा कोईराला ने अपनी तरफ से बेहतर परफार्मेंस देने की कोशिश की है, मगर जब किरदार सही ढंग से न लिखा गया हो, पटकथा कमजोर हो, तो कलाकार भी बेबस हो जाता है. एना की मां के किरदार में इरावती हर्षे ने अच्छा काम किया है. श्रेया चौधरी व मदीहा ने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है.

दो घंटे ग्यारह मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘डियर माया’’ की निर्देशक सुनैना भटनागर तथा कलाकार हैं-मनीषा कोईराला, ईरावती हर्षे, श्रेया चौधरी, मदीहा इमाम व अन्य.

आदमी का कुत्तापन : इंसान की अनोखी कहानी

VIDEO : सिर्फ 1 मिनट में इस तरह से करें चेहरे का मेकअप

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

जब से पता चला है कि प्रदेश में कुत्तों की बढ़ती तादाद से परेशान हो कर नगरपालिका और नगरनिगमों द्वारा आवारा कुत्तों की नसबंदी कर दी जाएगी, तब से शहर में 4 टांग वाले कुत्तों के साथसाथ 2 टांग वाले आवारा कुत्ते भी गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो गए हैं.

पिछली बार जब मैं शहर गया था, तो एक पान की दुकान पर मेरा ध्यान गया. उस दुकान में पिछली बार की तुलना में बहुत कम लोग पान खाने आ रहे थे.

मैं ने पान वाले से उत्सुकतावश पूछा, ‘‘क्यों भाई, आजकल तुम्हारी दुकान पर भीड़भाड़ कम क्यों हो गई है? आखिर चक्कर क्या है?’’

पान वाला बोला, ‘‘भाई साहब, जब से शहर में कुत्तों की नसबंदी की बात सुनी है, तब से मेरी दुकान कम चलने लगी है. लोग अब यहां आने से डरने लगे हैं. उन्हें शायद यह लगता है कि कहीं उन्हें भी पकड़ कर उन की नसबंदी न कर दी जाए.’’

हम ने भी सोचा कि हम भी जल्दी ही यहां से खिसक लें. क्या पता, हम भी गेहूं के घुन की तरह पिस जाएं यानी लपेटे में आ जाएं.

टांग और पूंछ के लिहाज से कुत्तों की भी कई किस्में होती हैं, जैसे 4 टांग वाले पूरी पूंछ वाले कुत्ते, पूंछ कटे कुत्ते और सब से खतरनाक बिना पूंछ के 2 टांग वाले कुत्ते.

कुत्तों को भारतीय सभ्यता में एक खास जगह दी गई है. कुछ इनसानों ने कुत्तों के साथ रहतेरहते उन के एक गुण को छोड़ कर बाकी बहुत सी आदतें सीख ली हैं.

पूंछ वाले कुत्तों से बिना पूंछ वाले कुत्तों ने केवल एक ही गुण नहीं सीखा है, वह गुण है वफादारी का. बाकी सभी गुण तो उन में पूरी तरह से आ गए हैं, इसलिए आम घरों में या पड़ोसियों से होने वाली लड़ाइयों में सब से पहले कुत्ते की ही जम कर गाली दी जाती है.

इस में कोई शक नहीं है कि कुत्ते की यह गाली भारत में गाली नं. 1 पर है. हो सकता है कि ‘आंटी नं. 1’, ‘बीवी नं. 1’, ‘हीरो नं. 1’ की तर्ज पर ‘गाली नं. 1’ फिल्म भी बन जाए, जिस में 4 टांग वाले पूंछदार कुत्ते को हीरो और 2 टांग वाले बिना पूंछ के कुत्ते को विलेन के रूप में दिखाया जाए.

वैसे, कुत्ते अगर आपस में गाली देते होंगे, तो उन की गाली नं. 1 आदमी को ले कर ही होती होगी.

वैसे, कुत्ता ही एकलौता ऐसा जानवर है, जिसे गाली और तारीफ दोनों के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

इस बात पर पूंछ वाले कुत्ते अपनेआप पर बेहद फख्र महसूस करते हैं. वे सोचते हैं कि जिस तरह पुराने जमाने में लोग खुद की तुलना किसी महापुरुष से करते थे, उसी तरह आज के दौर में उन से करते हैं.

लेकिन आजकल बिना पूंछ वाले कुत्तों की भी बहुत पूछ है. वैसे पूंछ के न होने से उन्हें अपनी वफादारी दिखाने के लिए बहुत से पापड़ बेलने पड़ते हैं.

बहुत पहले इनसान की भी पूंछ हुआ करती थी, लेकिन इनसानों द्वारा उस का गलत इस्तेमाल करने पर कुदरत ने उसे छीन लिया.

अब जब भी ये बिना पूंछ वाले कुत्ते अपनी उस गुम दुम को किसी खास आदमी के सामने हिलाते हैं, तो उन की हरकतों से पता चल जाता है कि वे अपनी वफादारी दिखा रहे हैं.

देखने वाले भी यही कहते हैं कि यह फलां का कुत्ता है, इस से बच कर रहना. बहुत तेज है, इस का काटा तो इंजैक्शन भी नहीं मांगता.

पूंछ वाले कुत्तों के काटने की तरह बिना पूंछ वाले कुत्ते के काटने पर रेबीज नहीं होता, बल्कि ‘फटीज’ नामक खतरनाक रोग होता है यानी इन के काटे से लोग फटीचर हो जाते हैं. ये लोग अपने मालिक के इशारे पर जिस को भी काटते हैं, वह फटीचर बन जाता है.

कुछ लोग दोनों तरह के कुत्ते पालते हैं. ये कुत्ते उन की बीवियों के काम के होते हैं, जिस से इन कुत्तों की भी चांदी रहती है.

जहां एक तरफ पूंछ वाले कुत्ते उन की बीवियों के साथ गाडि़यों में सैर करते हैं, अच्छा खाना खाते हैं और उन के साथ सोते तक हैं, वहीं दूसरी तरफ बिना पूंछ वाले कुत्ते उन का घरेलू काम काफी  अच्छी तरह से करते हैं.

पूंछ वाले कुत्तों पर तो कुछ खर्च भी होता है, पर बिना पूंछ वाले कुत्ते मुफ्त में अपनी सेवाएं देते हैं. दरअसल, अपने मालिक की आड़ में वे भी अच्छा शिकार कर लेते हैं.

ऐसे कुत्ते मालिक पर भार नहीं होते, इसलिए इन्हें कोई रोक भी नहीं पाता, खुद अफसर भी नहीं. समय आने पर ये अपनी औकात भी दिखा देते हैं. ये जितने ज्यादा हों, उतना ही अच्छा.

आजकल लोगों के स्टेटस की पहचान इसी से होती है कि उस के पास कितने पूंछ वाले और कितने बिना पूंछ वाले कुत्ते हैं.

पुराने जमाने में लोग अपनी जान और माल की हिफाजत के लिए पूंछ वाले कुत्ते ही रखा करते थे, लेकिन अब जमाना तेजी से बदल रहा है. इन कुत्तों के साथसाथ बिना पूंछ वाले कुत्ते भी रखे जाने लगे हैं. जिन के पास ऐसे कुत्ते बड़ी तादाद में होते हैं, उन की उतनी ही ज्यादा वैल्यू होती है.

भले ही बिना पूंछ वाले कुत्ते 3-4 साल तक पड़ेपड़े मुफ्त में ही रोटी तोड़ते रहें, लेकिन चुनाव आने पर अपना वजूद जरूर साबित कर देते हैं और भूंकभूंक कर अपने मालिक के पक्ष में माहौल बनाने में जुट जाते हैं.

पूंछ वाले कुत्तों की वफादारी खरीदी नहीं जा सकती, पर बिना पूंछ वाले कुत्ते मौका मिलने पर खुद को बेच देते हैं. मालिक बदलते उन्हें जरा भी देर नहीं लगती. कई बार तो वे खाते किसी और का हैं और निभाते दूसरे का हैं. ऐसों से हमें सावधान रहने की जरूरत है.

जैसे पूंछ वाले कुत्तों की तादाद बढ़ाने के लिए खास मौसम होता है, ठीक उसी तरह बिना पूंछ वाले कुत्तों का भी अपना खास मौसम ‘चुनाव’ होता है. इस में वे बड़ी लगन और मेहनत से अपनी तादाद को बढ़ाते हैं.

शायद इसी बढ़ती हुई तादाद को देख कर शहरों में कुत्तों की नसबंदी करने का प्रोग्राम बनाया जा रहा है खासतौर पर हमारे प्रदेश की राजधानी में.

दूसरे शहरों के मुकाबले पूंछ वाले और बिना पूंछ वाले कुत्तों की तादाद ज्यादा होना लाजिम है. बिना पूंछ वाले कुछ कुत्ते तो राजधानी के परमानैंट बाशिंदे बन जाते हैं और बाकी आतेजाते रहते हैं.

पूंछ वाले और बिना पूंछ वाले कुत्तों में हमेशा कड़ा मुकाबला रहता है. कई बार तो यह फैसला करना बड़ा ही मुश्किल हो जाता है कि कौन कितनी तेजी से पूंछ हिला रहा है. दोनों ही अपनीअपनी वैल्यू साबित करने में लगे रहते हैं. वे अपने मालिक को हमेशा खुश करना चाहते हैं.

मालिक जितना खुश होगा, कुत्तापन उतना ही कामयाब माना जाएगा. इन दोनों में फर्क सिर्फ गले में पड़े पट्टे के दिखाई देने और न दिखाई देने का है. पूंछ वाले कुत्ते के गले में पट्टा दिखता है, जबकि बिना पूंछ वाले कुत्ते का पट्टा नजर नहीं आता.

बिना पूंछ वाले कुत्ते तो अपने मालिक के पूंछ वाले कुत्ते के सामने भी अपनी नजर न आने वाली पूंछ हिलाने से नहीं चूकते. कई बार तो ऐसा लगता है कि ये बिना पूंछ वाले कुत्ते, पूंछ वाले कुत्तों के भी कुत्ते हैं.

खैर, कुत्ते तो कुत्ते ही होते हैं, चाहे वे पूंछ वाले हों या बिना पूंछ वाले. हमें इन से बच कर रहना चाहिए, क्योंकि काटना इन की फितरत है. एक के काटने पर कीमती इंजैक्शन लगवाने पड़ते हैं और जिंदगी की कोई गारंटी नहीं होती, जबकि दूसरे के काटने पर कैरियर तबाह हो सकता है, जमाजमाया धंधा चौपट हो सकता है.

मैं नहीं चाहता कि महंगाई के इस दौर में इन कुत्तों के द्वारा काटा जाऊं, इसलिए मैं इन्हें दूर से ही देख कर सलाम कर लेता हूं. आप को भी नेक सलाह दे रहा हूं कि आप भी इन बिना पूंछ वाले कुत्तों से दूर ही रहें, इसी में आप की भलाई है.

फिल्म रिव्यू : बेवाच

एक्शन कामेडी फिल्म ‘‘बेवाच’’ की कहानी इसी नाम के एक लोकप्रिय शो पर आधारित है. मगर अफसोस की बात है कि नब्बे के दशक के इस लोकप्रिय टीवी शो की तुलना इस फिल्म के साथ नहीं की जा सकती. इस फिल्म में एकशन की भरमार है. बंदूकें चल रही हैं. लाशे मिल रही हैं. महिला पात्रों को छाती दिखाना अनिवार्य सा लगता है. गालियां भी हैं. हास्य के नाम पर फूहड़ता के अलावा कुछ नही है. जिसके चलते भारत में ‘वयस्क’ तथा विदशों में यह ‘‘आर’’ श्रेणी की फिल्म है.

विदेशो में समुद्री बीच और उसके किनारे को ‘बेवाच’ कहा जाता है. यह कहानी फ्लोरीडा के एम्राल्ड बे की है. जहां पर ‘लाइफ गार्डस’ यानी कि जीवन रक्षक के रूप में मिच बुचन्नान (द्वायने जान्सन) की टीम कार्यरत है. 500 से अधिक लोगों की जान बचा चुके मिच लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हैं. इस बात से स्थानीय पुलिस अफसर गार्नेर (याहया अब्दुल मस्तीन) और मिच के उच्चाधिकारी कैप्टन थोर्पे (रोब हुबेल) नाराज रहते हैं. एक दिन सुबह सुबह समुद्री बीच पर सैर करते समय हंटले क्लब के सामने मिच को ड्रग्स का एक छोटा सा पैकेट मिलता है. अब हंटले क्लब की मालकिन विक्टोरिया (प्रियंका चोपड़ा) हैं.

इधर ‘लाइफ गार्डस’ का हिस्सा बनने के लिए कई लोग प्रयासरत हैं. इसमें से पूर्व ओलंपिक तैराक मैट ब्राड (जैक इफ्रान) भी हैं, जो कि बेरोजगार हैं. उसे शराब पीने की बुरी लत है. मिच का उच्चाधिकारी जान बूझकर मैट ब्राड को ‘लाइफ गार्ड’ टीम का हिस्सा बनाने के लिए मिच से कहता है. मिच को न चाहते हुए भी रॉनी (जोन बास) और क्विन (अलेक्जेंडर ददारियो) के साथ ब्राड को भी अपनी टीम से जोड़ना पड़ता है. रॉनी की प्रेमिका सी जे पारकर (केली रोहब्राच) भी हैं. जबकि क्विन पर ब्राड फिदा है.

उधर मिच को इस बात का शक हो चुका है कि विक्टोरिया क्लब की आड़ में ड्रग्स का कारोबार चला रही है. जब बीच समुद्र में खड़े याच्ट में आग लग जाती है, तो मिच के आदेश का उल्लंघन कर ब्राड आग में कूदता है, बड़ी मुश्किल से उसे सी जे पारकर बचाती है. जबकि याच्ट पर लगी आग से एक मृत व्यक्ति को लाया जाता है, जिसकी पहचान शहर के एक अधिकारी के रूप में होती है. मिच इस इंसान के शरीर की जांच करना शुरू करता है, तो पुलिस अफसर गार्नेर उसे रोकता है. पुलिस अफसर का तर्क है कि अपराध की जांच करना उसका दायित्व है, जबकि मिच का दायित्व सिर्फ लाइफ गार्ड की ही है. ब्राड भी पुलिस अफसर का साथ देता है. परिणामतः ब्राड तथा मिच का साथ देने वाले अन्य लाइफ गार्डस के लोगों के बीच दुराव पैदा हो जाता है.

विक्टोरिया द्वारा आयोजित पार्टी में ब्राड शराब पीकर बहक जाता है, तब मिच भीड़ के सामने ब्राड का अपमान करता है. दूसरे दिन नशा उतरने पर ब्राड को गलती का अहसास होता है कि वह अपनी बुरी आदतों के चलते ही गरीब हुआ है. वह मिच से माफी मांगकर एक मौका देने के लिए कहता है. मिच उसे माफ कर देता है.

मिच अपनी तरफ से विक्टारिया के खिलाफ जांच कर रहा है. वह एक दिन ब्राड व क्विन को लेकर उस शवग्रह में जाता है, जहां याच्ट से मिली लाश पर विक्टोरिया के आदमी गलत पोस्टमार्टम रिपोर्ट रख रहे होते हैं. सारी बातें क्विन अपने मोबाइल में रिकार्ड कर लेती है, पर ऐन वक्त पर उनकी मौजूदगी उजागर हो जाती है. फिर विक्टोरिया के आदमी यानी कि गुंडे मोबाइल तोड़कर सारे सबूत मिटा देते हैं. मिच पुलिस अफसर के पास पहुंचता है, पर वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं. बल्कि मिच का उच्चाधिकारी उसे नौकरी से बाहर कर ब्राड को मुखिया बना देता है. उसके बाद ब्राड ‘लाइफ गार्डस’ के बाकी सदस्यों के साथ मिलकर विक्टेारिया के खिलाफ लग जाता है, ऐन वक्त पर वह मिच से मदद मांगता है. अंत में विक्टोरिया के ड्रग्स साम्राज्य का खात्मा हो जाता है. मिच को पुनः ‘लाइफगार्डस’ का मुखिया बना दिया जाता है.

कथानक स्तर पर कोई नवीनता नहीं है. बौलीवुड में इस तरह के कथानक पर कई फिल्में बन चुकी हैं. फिल्म में हास्य व एक्शन कुछ भी सही ढंग से नहीं उभरता. वैसे फिल्म को तहस नहस करने में कुछ काम सेंसर बोर्ड ने भी किया है. फिल्म में कोई भी कलाकार सही ढंग से हास्य दृश्यों को नहीं निभा पाया. जैक इफ्रान पटकथा में बंधे हुए नजर आते हैं. क्योंकि वह भी अपने अभिनय का प्रभाव नहीं छोड़ पाते हैं. फिल्म के महिला पात्र तो महज खानापूर्ति के लिए ही हैं. कुछ महिला पात्र तो समुद किनारे बिकनी या अर्धनग्नावस्था में घूमने के लिए नजर आनी ही चाहिए. परिणामतः बेहतरीन कलाकारों की मौजूदगी भी इस फिल्म को बाक्स आफिस पर बुरी तरह से डूबने से कोई नहीं बचा सकता.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो फिल्म ‘‘बेवाच’’ में खलनायक विक्टोरिया के किरदार में प्रियंका चोपड़ा को देखकर तरस आता है कि क्या वह इतना छोटा व घटिया काम करने के लिए ही हौलीवुड फिल्म से जुड़ी हैं. खलनायिका के रूप में उनका किरदार सही ढंग से लिखा ही नहीं गया है, वह सशक्त किरदार के रूप में नहीं उभरता है. उपर से प्रियंका चोपड़ा का अभिनय भी सतही ही है. महज बोल्ड पहनावा व मेकअप ही अभिनय का हिस्सा नहीं होता, यह बात हर अभिनेत्री को याद रखनी चाहिए. इस फिल्म से प्रियंका चोपड़ा के कम से कम भारतीय प्रशंसक तो काफी निराश होंगे.

एक घंटे 56 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘बेवाच’’ का निर्माण इवान रैतमन, मिचाइल बर्क, डगलस ने किया है. जबकि भारत की तरफ से ‘‘वायकाम 18’’ जुड़ा हुआ है. निर्देशक सेठ गोरडन, पटकथा लेखक दमियान शनन व मार्क स्विफ्ट, संगीतकार क्रिस्टोफर, कैमरामैन इरिक स्टीलबर्ग तथा कलाकार हैं-द्वायने जानसन, याह्या अब्दुल मस्तीन, प्रियंका चोपड़ा,  जोन बास, अलेक्जेंडर ददारिया, केली रोहब्राच, रोब हुबेल व अन्य.

सुष्मिता सेन का हौट वीडियो सोशल मीडिया में वायरल

सुष्मिता सेन का एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है. इस वीडियो को देखने के बाद हर किसी की चाहत है कि काश उसे भी ऐसी टीचर मिले.

गौरतलब है कि बॉलीवुड के अलावा दुनिया भर में फैशन का आइकॉन समझी जाने वाली एक्ट्रेस सुष्मिता सेन का जन्म 19 नवंबर 1975 को हैदराबाद में हुआ था. उनका जन्म एक बंगाली परिवार में हुआ था, लेकिन मूल रूप से हैदराबाद की निवासी हैं. उनके पिता एयरफोर्स में कार्यरत थे और मां ज्वैलरी डिजाइनर थीं. उम्र भले ही 40 की हो गई लेकिन उनकी खूबसूरती आज भी बरकरार है. सुष का नाम बॉलीवुड की बेहतरीन एक्ट्रेसेस में शुमार किया जाता है. उन्होंने बॉलीवुड को कई सुपरहिट फिल्में दी हैं.

सुष्मिता सेन वो शख्सियत हैं जिन्होंने कई मायनों में इतिहास रचा है. मिस यूनिवर्स बनने वाली वह पहली भारतीय महिला हैं. साथ ही वह भारत की पहली महिला हैं जिन्होंने शादीशुदा ना होते हुए भी दो-दो लड़कियों को गोद लिया. इन दिनों वह बड़े पर्दे से गायब हैं, फिर भी वह काफी बिजी हैं. जिंदगी की गुल्लक में खुशियां भरने में सुष्मिता सेन का वक्त गुजर रहा है. हाल ही में टैटू आर्टिस्ट समीर पतंगे ने सुष्मिता की कलाई पर सातवां टैटू बनाया. उन्होंने हिब्रयू भाषा में अक्षर लिखाए हैं जिसका अंग्रेजी में मतलब ‘आई एम’ होता है.

सुष्मिता देश की पहली एक्ट्रेस हैं जिन्होंने 1994 में महज 19 साल की उम्र में मिस यूनिवर्स का खिताब जीता लिया था. बताया जाता है कि सुष की मां कभी नहीं चाहती थीं कि वे उन्हें हायर एजुकेशन में डालें. लेकिन भला किस्मत का फैसला आखिरकार कौन बदल सकता है. मिस यूनिवर्स बनने के बाद सुष ने बॉलीवुड में अपने करिअर की शुरुआत की.

सुष्मिता की पहली फिल्म ‘दस्तक’ 1996 में आई. फिल्म में मुकुल देव और शरद कपूर उनके को-स्टार थे. इसके बाद उन्होंने 1999 में आई बीवी नंबर 1 में काम किया जिसके लिए उन्हें फिल्म फेयर में बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का अवॉर्ड मिला. इसके बाद सुष्मिता फिल्म जोर, सिर्फ तुम, हिन्दुस्तान की कसम, फिज़ा, क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलता, वास्तु शास्त्र, मैं हूं ना, मैंने प्यार क्यों किया और नो प्रॉब्लम जैसी फिल्मों में आई.

बताया जाता है कि सुष्मिता के करीब 10 ब्यॉयफ्रेंड के साथ अफेयर चले लेकिन फिर भी अब तक कुंवारी है. उनका नाम, ऋतिक बसीन, फिल्म निर्देशक मुद्दसर अज़ीज, विक्रम भट्ट, अनिल अंबानी, रणदीप हुड्डा, बंटी सचदेवा, बिजनेसमैन संजय नारंग, पाक क्रिकेटर वसीम अकरम आदि से जुड़ा.

शादी नहीं तो क्या सुष्मिता फिर भी दो बच्चों की मां हैं. दरअसल, सुष्मिता ने दो बेटियां को गोद लिया है, जिनका पालन पोषण वे खुद करती हैं. उन्हीं की देख-रेख के चलते सुष्मिता बॉलीवुड में कम सक्रिय हैं.

खैर फिलहाल आप देखिए ये वायरल वीडियो…

A post shared by WapKing (@wapking_official) on

कश्मीर के बहाने जरूरी है ये चर्चा

जम्मूकश्मीर में हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं. 5 लाख से ज्यादा की फौज भी वहां के बाशिंदों को पूरी तरह कंट्रोल में नहीं कर पा रही और अलगाववादी खुलेआम सेना और सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी कर रहे हैं. 60 सालों में दुनिया का स्वर्ग कहलाया जाने वाला कश्मीर अब एक नरक सा बन गया है, जहां न बाहरी जना सेफ है, न कश्मीरी.

उम्मीद थी कि भारतीय जनता पार्टी और महबूबा मुफ्ती की सरकार मिल कर, कंधे से कंधा मिला कर चल कर कश्मीरियों को एक नया रास्ता दिखाएगी. कश्मीरी जवान भी और जगहों की तरह अच्छी नौकरियों, अपने मकान, खुशियों भरे माहौल के लिए तड़प रहा है, पर दोनों तरफ के कट्टरपंथियों के बीच बुरी तरह पिस रहा है. श्रीनगर में आजादी के नारे चाहे दीवारों पर लगे फीके पड़ते दिख जाएं, पर कोचिंग क्लासों के बोर्ड जगमग कर रहे हैं.

कश्मीरी समझ तो गए हैं कि अगर खुशहाली लानी है तो पढ़ना होगा, अपने पैरों पर खड़ा होना होगा, क्योंकि अगर भारत या पाकिस्तान ने कुछ दिया भी तो वह ऊपर के अफसर व नेता हड़प जाएंगे. अपना कल सुधारना है तो मेहनत करनी होगी. कश्मीरी मेहनती हैं, पर धर्म के मामले में कमजोर भी. उन के दिमाग में कीड़ा घुसा है कि शायद भारत से अलग वे ज्यादा अच्छे रहेंगे.

असलियत यह है कि दोनों देशों की सरकारों के लिए कश्मीर तो बहाना है बाकी जनता को फुसलाने और बहलाने के लिए. कश्मीर के नाम पर भारत में इलैक्शन जीते जाते हैं, तो पाकिस्तान में सेना को मनमानी करने का हक मिल जाता है. अगर कश्मीर का मुद्दा न हो तो पाकिस्तान शायद 2-3 मुल्कों में बंट तक जाए.

अफसोस यह है कि जैसे जवाहरलाल नेहरू ने 1947 में सही फैसले न ले कर कश्मीर को आफत की पुडि़या बना दिया था, वैसे ही आज इस की हर रोज नई पुडि़या बनाई जा रही है. सेना के एक ज्यादा दबंग अफसर ने एक जीप पर एक कश्मीरी आदमी को बांध कर पत्थर फेंकने वालों से बचाव का नायाब तरीका तो ढूंढ़ा, पर इस की बड़ी कीमत भारत को दुनियाभर की मेजों पर देनी होगी, जब दूसरे देश इस अत्याचार की सफाई मांगेंगे.

समझदार, ईमानदार सरकार से उम्मीद थी कि वह ऐसा हल निकालेगी कि कश्मीर की जनता को लगेगा कि भारत के साथ उस को लाभ ही लाभ है, पर लगता है कि चुने जाने से पहले के वादों और हकीकत में बहुत फर्क होता है. भाजपा सरकार कश्मीर की हिंसा के सामने कांग्रेस सरकारों की तरह बेबस नजर आ रही है.

सरकार की यह कमजोरी देश के लिए गलत संदेश दे रही है. लोगों को जिस प्रैक्टिकल सरकार की उम्मीद थी, वह कश्मीर में तो दिख नहीं रही.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें