जबर्दस्त इंटीमेट सीन के लिए मशहूर हैं ये एक्ट्रेस

बॉलीवुड में इंटीमेट सीन का चलन जोरों पर है. आज की दौर में फिल्मों की बात करें तो बिना इंटीमेट सीन के किसी भी फिल्म को पूरा नहीं माना जाता है. वहीं ऐसे में एक एक्ट्रेस ने ऐसी सीन्स में भी रिकॉर्ड कायम कर लिया है.

आपको सुनने में थोड़ा अजीब जरूर लगेगा लेकिन ये सच है. बॉलीवुड की एक एक्ट्रेस ने अब तक का सबसे लंबा किस करने का रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है. इस इंटीमेट सीन के बाद इस एक्ट्रेस की चर्चाएं जोरों पर हैं. वहीं ये भी सामने आया है कि इस एक्ट्रेस ने पहले भी न्यूड सीन दिए हैं. इस एक्ट्रेस का ये हॉट अवतार देखकर आपकी नींदें उड़ जाएंगी.

हम बात कर रहे हैं बंगाली अभिनेत्री स्‍वास्तिका मुखर्जी की. स्वास्तिका बंगाली सिनोमा की सबसे हॉट अभिनेत्रियों में से एक हैं. जो अपनी बोल्डनेस के लिए मशहूर हैं. उन्होंने कई फिल्मों में जबदस्त इंटीमेट सीन दिए हैं.

इस फिल्म में दिया किसिंग सीन

स्वास्तिका ने फिल्म डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी में सबसे लंबा किसिंग सीन दिया था. इस फिल्म में उनके साथ अभिनेता सुशांत सिंह थे. सुशांत ने बंगाली ऐक्‍ट्रेस स्‍वास्तिका मुखर्जी के साथ एक लिपलॉक सीन फिल्‍माया है. मजे की बात है कि जब सुशांत ने यह सीन फिल्माया तो उन्हें पता नहीं था कि वह सबसे लंबे किंसिंग सीन का हिस्सा बनने जा रहे हैं.

इन वजहों से भी रहीं सुर्खियों में

स्वास्तिका पर चोरी के साथ ही खुदकुशी की कोशिश करने के आरोप हैं. वहीं एक और बंगाली एक्ट्रेस पाउल डैम फिल्मों में अपने इंटीमेट सीन्स की वजह से विवादों में रहीं हैं. आपको बता दें कि 13 दिसंबर, 1980 को कोलकाता में जन्मीं स्वास्तिका ने अपने करियर की शुरुआत साल 2001 में टीवी सीरियल ‘देवदासी’ से की.

इन्हें पहला लीड रोल 2004 में आई फिल्म ‘मस्तान’ में मिला. ये बात जानकर आपको हैरानी होगी कि साल 1998 में स्वास्तिका ने 18 साल की उम्र में सिंगर परमीत सेन से शादी कर ली थी. हालांकि ये शादी ज्यादा नहीं चली और दो साल बाद ही दोनों अलग हो गए.

चोरी करते पकड़ी गईं स्वास्तिका

सिंगापुर के एक ज्वैलरी मॉल में गोल्ड ईयर रिंग्स बैग में रखते हुए पकड़ी गई थीं.

कर चुकी है खुदकुशी की कोशिश

मई, साल 2014 में स्वास्तिका तब खबरों में आई थीं, जब उन्होंने ब्वॉयफ्रेंड सुमोन की गिरफ्तारी का विरोध करते हुए सुसाइड की कोशिश की थी.

इस हॉट पाकिस्तानी मॉडल के सामने सनी लियोन भी हैं फेल

अक्सर देखा जाता है कि ज्यादातर पाकिस्तानी एक्ट्रेस और मॉडल्स कभी आपने आपको एक्सपोज नहीं करतीं. वैसे कारण तो इसके पीछे बहुत सारे हो सकते हैं.

लेकिन वहीं इन सबके बीच एक पाकिस्तानी मॉडल ऐसी भी हैं, जिन्होंने सभी कारणों को पीछे छोड़कर बोल्डनेस की सारी हदें पार कर दीं हैं. ये मॉडल अपनी बेबाकी और बोल्ड अवतार के लिए जानी जाती हैं.

हम बात कर रहे हैं पाकिस्तानी मॉडल तहमीना अफजल की. क्या आप जानते हैं कि तहमीना बेहद हॉट हैं और अब तक वे पूरी दुनिया में एक मॉडल के तौर पर अपनी पहचान बना चुकी हैं. इनकी हॉटनेस का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि उनकी फैन फॉलोइंग इतनी है कि सनी लियोन भी पीछे हो चुकी हैं.

विदेशी मॉडल के तौर पर पहचान बनाने वाली तहमीना को इसके लिए काफी विरोध का सामना भी करना पड़ा था. इन सबके बावजूद भी आज उनकी पूरी दुनिया में अच्छी फैन फोलोइंग है. क्या आपनो देखी हैं इस हॉट पाकिस्तानी मॉडल की सेक्सी तस्वीरें.

सनी लियोनी भी हैं इनके सामने फेल

सनी लीओन हमेशा चर्चाओ में रहती हैं, वे एक पोर्न स्टार रह चुकी हैं और उन्हें ही अब तक सबसे बोल्ड और हॉट माना जाता है लेकिन आपको ये बात नहीं पता होगी कि इस पाकिस्तानी मॉडल के जलवे भी हर जगह हैं.

मशहूर तहमीना अफजल का चर्चा में आना इसलिए भी बनता है क्योंकि पाकिस्तान में बोल्डनेस को इतनी आजादी नहीं है, वहां तो बुर्का का चलन है. तहमीना ने सनी की ही तरह बोल्डनेस के सारे बंधन तोड़कर खुलके सामने आने की हिम्मत की है.

लाखों हैं दीवाने तहमीना

तहमीना ट्विटर और फेसबुक पर अच्छी खासी फैन फॉलोइंग बना चुकी है. आप उनकी तस्वीरें देखेंगे तो जान जाएंगे कि वे सबसे सेक्सी महिला हैं, जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सबसे सेक्सी महिला के रूप में जाना जाता है.

बेवसाइट की मालिक

तेहमीना अर्बन म्यूजिक वेबसाइट (Urban Music Website) की मालिक है.

एडल्ट मैगजीन

तहमीना कई एडल्ट मैगजीन्स में कवर गर्ल के तौर पर फोटोशूट करवा चुकी हैं. इसके अलावा वे कई वीडियोज कर चुकी है और न्यूयॉर्क शहर के कई वीडियोज में वह प्रमुख मॉडल भी रही हैं.

विदेशों में फैन फॉलोइंग

तहमीना विदेश में काफी पॉप्यूलर हैं. कहा तो ये भी जाता है कि उनकी पॉप्यूलैरिटी सनी पर भारी पड़ सकती है.

व्हेल शार्क के साथ तैरती बिकिनी में हॉट कैटरीना कैफ

बॉलीवुड एक्ट्रेस कैटरीना कैफ तो बिस्कुल अलग अंदाज में नजर आईं. उन्होंने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर की है, जिसमें वे एक व्हेल शार्क के साथ तैरती नजर आ रही हैं. इस वीडियो को फोटोग्राफर और सिनमेटोग्राफर समर वर्मा ने शॉट किया है. कैटरीना ने सफेद रंग का स्विमसूट पहना है और उनके साथ एक व्हेल शार्क भी है. ये शूट फिलीपींस में किया गया है.

कैटरीना की बिकिनी में अपनी फोटो शेयर की गई है जिसमें वो बेहद हॉट लग रही हैं.

‘टाइगर जिंदा है’ में उनके साथ सलमान खान और ‘जग्गा जासूस’ में रणबीर कपूर नजर आएंगे. मतलब कैटरीना अपने दोंनो एक्स बॉयफ्रैंण्स के साथ नजर आने वाली हैं. अब इस फिल्मों के रिलाज के बाद देखना ये है कि  कैटरीना की जोड़ी किसके साथ चल पाती है और कौन इस रेस से बाहर होने वाला है.

सैक्स सीन के लिए रात भर रिहर्सल करते रहे हीरो-हीरोइन

फिल्म के निर्दोशक ने कहा कि ये सेक्स सीन फिल्म की कहानी का अहम हिस्सा है. अब ये उनके ऊपर था कि वे उस सीन को कैसे जानदार बनाते हैं. सीन के बारे में सबकुछ हीरो-हीरोइन को समझा दिया गया.

हम यहां बात कर रहे हैं फिल्म ‘पार्च्ड’ के उस सेक्स सीन की जिसके लीक होने पर हड़कंप मच गया था. शायद आपको याद होगा कि इस सीन को राधिका आप्टे और एक्टर आदिल हुसैन पर फिल्माया गया था. इस सीन में अभिनेत्री राधिका न्यूड नजर आईं थीं.

आमतौर पर कोई भी हीरो या हीरोइन इस तरह के सीन्स करने से कतराते हैं, वहीं राधिका और आदिल ने इस सीन की बाकायदा पूरी एक रात रिहर्सल की थी.

ये जानकर आपको हैरानी तो हुई होगी, पर ये सच है. खुद अभिनेता आदिल हुसैन ने एक इंटरव्यू के वक्त में ये बात कबूल की थी.

आदिल हुसैन ने कहा था कि ‘उस सेक्स सीन की बहुत अच्छी तरह से रिहर्सल की गई थी. किसी भारतीय के लिए इस तरह के सीन शूट करना आसान बात नहीं होगी, खासकर तब जब हम सेक्स जैसे शब्द या फिर उसके बारे में बात करने से भी कतराते रहे हैं, लेकिन एक एक्टर के तौर पर जरूरी है कि आप अपने कंफर्ट जोन से बाहर आएं और कुछ अलग करके दिखाएं. सेक्स एक कला है. ‘उस सीन को करने से पहले मैंने राधिका से बात की थी और वो पूरी तरह से कंफर्टेबल थीं. मुझसे उन्होंने कहा कि उन्हें ये सीन करने में काफी मजा आएगा. बस यहीं से मेरा रास्ता आसान हो गया.’

आदिल हुसैन के मुताबिक, पूरी एक रात उन्होंने और राधिका ने उस सेक्स सीन की रिहर्सल की थी. अब ऐसा भी क्या था तो सारी रात इन्हें इसकी रिहर्सल करनी पड़ी, ये तो ये दोंनो ही बता सकते हैं!

आखिर क्यों थम नहीं रही नक्सली हिंसा

8 मई को नई दिल्ली में नक्सल प्रभावित 10 राज्यों के मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के सुर पहले के मुकाबले काफी बदले हुए थे. उन की बातों में छिपा विरोधाभास साफसाफ चुगली कर रहा था कि सरकार नक्सली समस्या को सिर्फ एक निरर्थक हिंसा के रूप में देखती है जिस से निबटने के लिए वह बंदूक की कार्यवाही के नाम पर छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में, तैनात अर्धसैनिक बलों का आधुनिकीकरण करेगी. राजनाथ सिंह के अनुसार, अब जवानों को बायोमीट्रिक और ट्रैकिंग सिस्टम युक्त स्मार्टगन मुहैया कराई जाएंगी, जवानों के जूतों और बुलैटप्रूफ जैकेट्स में भी बुलैटप्रूफ जीपीएस युक्त ट्रैकर लगाने की बात उन्होंने कही. इस से होगा यह कि नक्सली उन्मूलन अभियान का हिस्सा बने सैनिकों की लोकेशंस के पलपल की जानकारी सरकार को मिलती रहेगी. राजनाथ सिंह ने यह भी माना है कि आमतौर पर माओवादी संगठन सुरक्षा बलों से लूटे हथियारों का ही इस्तेमाल करते हैं.

यही तकनीक माओवादी क्यों न हथिया लेंगे, इस का जवाब शायद राजनाथ सिंह के पास न होगा. गृहमंत्री की बात विरोधाभासी और हास्यास्पद है. इस से यह स्पष्ट नहीं हुआ कि माओवादियों को सुरक्षाबलों से हथियार छीनने से रोका कैसे जाएगा.

अब होगा यह कि सुरक्षाबलों को जो स्मार्ट गनें दी जाएंगी वे भी नक्सलियों के काम आएंगी. रही बात ट्रैकर या जीपीएस ट्रैकर की, तो नक्सली इतने बेवकूफ नहीं है कि इन्हें निष्क्रिय या नष्ट करना न जानते हों.  इस से होगा सिर्फ इतना कि जवान कहां लुटे या मारे गए, यह जल्द पता चल जाएगा.  लेकिन नक्सलियों तक पहुंचना पहले की तरह ही दुष्कर काम रहेगा. माओवादियों को आम जनता का बड़ा समर्थन है और उन्हें सेना व पुलिस के पलपल की खबर रहती है.

सम्मेलन की इकलौती अहम बात राजनाथ सिंह का यह मानना था कि नक्सली हिंसा का हल गोलियां नहीं हैं.  फिर क्यों बस्तर में हथियारों और गोलियों की तादाद व सप्लाई बढ़ाई जाएगी, यह समझ से परे है.

असर सुकमा हमले का

नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और सुरक्षा एजेंसियों के आला अफसरों की 8 मई की मीटिंग दरअसल 24 अप्रैल के नक्सली हमले की सरकारी प्रतिक्रिया थी जिस में सीआरपीएफ के 25 जवान मारे गए थे. उक्त घटना सुकमा में घटित हुई थी.

सुकमा जिला पूरी तरह नक्सली गिरफ्त में है. यहां के बुर्कापाल से दोकनपाल तक बन रही सड़क की सुरक्षा के लिए भारी संख्या में सैन्यबल तैनात हैं. 24 अप्रैल की दोपहर जब जवान खाना खा कर निकले ही थे, तभी नक्सलियों ने बारूदी सुरंग का जोरदार विस्फोट किया और सुस्ताते जवानों पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी.

जवानों ने संभलते हुए जवाबी हमला किया. उन के मुताबिक, नक्सलियों की संख्या लगभग 300 थी. पहले के हमलों की तरह यह हमला भी सुनियोजित था जिस में एक घायल जवान शेर मोहम्मद का कहना है कि नक्सलियों ने गांव वालों, जिन में औरतें भी थीं, को आगे किया हुआ था, जिस से जवान जवाबी गोलियां, नक्सलियों की तरह, अंधाधुंध तरीके से नहीं दाग सके. फिर भी, 20 नक्सलियों को मार गिराया गया.

सुकमा के इस नक्सली हमले की वजह भी अहम है. सरकार नैशनल हाइवे क्रमांक 30 पर छत्तीसगढ़ और तेलांगना को जोड़ने के लिए जंगलों के बीच से एक सड़क बना रही है, जिस का नक्सली संगठन विरोध कर रहे हैं. इस के पीछे उन के अपने तर्क हैं. केवल इस ही नहीं, आदिवासी इलाकों में बन रही हर सड़क के निर्माण में नक्सली यथासंभव अड़ंगा डाल रहे हैं. जिस के चलते पिछले 10 सालों से सड़कें कछुआ चाल से बन पा रही हैं और उस के लिए भी काफी संख्या में सैन्यबल तैनात हैं.

इस हमले में भी जवानों को मारने के बाद नक्सलियों ने उन के हथियार व वायरलैस सैट सरीखा दूसरा सामान भी लूटा और हमेशा की तरह इत्मीनान से चलते बने और बेफिक्र हो गए कि अब लंबे वक्त तक सड़क बनने का काम ठप पड़ा रहेगा. क्योंकि, मानसून के वक्त वैसे ही निर्माणकार्य बंद रहते हैं.

इन जवानों को नक्सली हमले का कोई एहसास या अंदाजा नहीं था. गृहमंत्री ने खुफिया विफलता पर चिंता जताई. लेकिन इस का हल क्या है, दूसरी कई बातों की तरह उन्हें यह भी नहीं मालूम.

इस इलाके के आदिवासी सरकार के बजाय नक्सलियों पर ज्यादा भरोसा करते हैं और उन्हें अपना हमदर्द व मददगार मानते हैं. ऐसा क्यों है, यह सवाल भी किसी जवाब का मुहताज नहीं कि बस्तर में तैनात जवान तरहतरह से आदिवासियों को तंग करते हैं, प्रताडि़त करते हैं और उन की औरतों की इज्जत लूटते हैं. दूसरे, खुद आदिवासी भी मानते हैं कि सड़कें बनने से उन का कोई विकास नहीं होने वाला, क्योंकि सरकार की असल मंशा उन्हें जंगलों से खदेड़ने की है.

वह उन से जल, जंगल और जमीन का हक छीन कर पूंजीपतियों व उद्योगपतियों को बेचना चाहती है. ऐसा हुआ तो वे जाएंगे कहां? ऐसे कई सवाल आदिवासियों को परेशान किए हुए हैं, जिन का जवाब सरकार कभी नहीं देती. हां, आश्वासनों की उस के खजाने में कमी नहीं.

सरकार की परेशानी

नक्सली हिंसा रोकना सरकार के वश की बात है नहीं, यह बात वे लोग भी मानने लगे हैं जो नक्सली अभियान या माओवाद को नहीं जानते. सुकमा हमले के बाद सरकार वादों, इरादों और दहाड़ने की रस्म निभाती रही तो आम लोगों ने सोशल मीडिया पर नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह का खूब मजाक बनाया कि इन्होंने निंदा नाम का बम बस्तर में फेंक दिया है, जिस से नक्सली घबरा कर हथियार डाल देंगे.

उलट इस के, नक्सलियों को ले कर सरकार की अपनी मजबूरियां हैं जिन्हें 8 मई की मीटिंग में राजनाथ सिंह ने बताया भी. खुफियातंत्र कमजोर होने के अलावा उन्होंने नक्सलियों की फंडिंग का जिक्र भी किया कि इसे रोके जाने से ही बात बनेगी क्योंकि किसी भी युद्ध को लड़ने में पैसों की भूमिका अहम रहती है. बगैर पैसों के ऐसे अभियान परवान नहीं चढ़ सकते.

नक्सलियों के पास पैसा कहां से आता है दूसरी कई बातों के साथसाथ इस सवाल का ठीकठाक जवाब भी किसी के पास नहीं, सिवा इन अंदाजों और अफवाहों के कि नक्सली वसूली करते हैं और कई बहुराष्ट्र्रीय कंपनियां उन की आर्थिक मदद करती हैं, जो बस्तर में अपने पांव जमाना चाहती हैं.

इत्तफाक से सुकमा हमले के वक्त ही जम्मूकश्मीर में भी आतंकी हिंसा का तांडव मचा रहे थे जिन के बारे में हर कोई जानता व मानता है कि उन्हें पाकिस्तान से पैसा मिलता है. लेकिन नक्सलियों को विदेशों से कोई आर्थिक सहायता मिलती है, इस बात के प्रमाण तो दूर, कोई चर्चा तक नहीं होती.

दरअसल, सरकार इस बात को हवा दे कर अपनी नाकामी व कमजोरियां ढकना चाहती है कि नक्सलियों को आतंक फैलाने के एवज में विदेशों से मदद मिलती होगी. यह वह दौर है जब दुनियाभर से कम्यूनिस्ट गायब हो रहे हैं. रूस का हाल सामने है और चीन का तो अभी तक नक्सलियों से कोई कनैक्शन होने की बात तक सामने नहीं आई है.

आतंकियों से नक्सलियों की तुलना कर रहे लोगों को भी एहसास है कि ये दोनों समस्याएं भिन्न हैं. नक्सली न तो किसी धर्म को मानते हैं और न ही कर्मकांडों में भरोसा करते हैं. वे मानते हैं कि शोषण अहिंसक तरीके से तो दूर नहीं हो सकता, इसलिए उन के पास हथियार हमेशा रहते हैं.

प्रधानमंत्री या गृहमंत्री ने सुकमा के ताजे हमले के बाद नक्सलियों से बातचीत की कोई पहल नहीं की है तो इस का मतलब साफ है कि सरकार उन्हें राष्ट्रद्रोही मानती है. सिर्फ उन्हें ही नहीं, बल्कि सरकार हर उस शख्स को नक्सली या राष्ट्रद्रोही मानती है जो आदिवासी हितों की बात करता है और उन की मदद करता है. विनायक सेन और सोनी सोरी जैसे समाजसेवी यों ही सरकारी प्रताड़ना के शिकार नहीं हुए थे जो आदिवासी अंचलों में आदिवासियों के हक की बातें कर रहे थे.

हर किसी को नक्सली कह कर राष्ट्रद्रोह के आरोप में जेल में ठूंस दिया जाता है, इस बात को रायपुर जेल की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे ने अपने फेसबुक अकाउंट पर विस्तार देते आदिवासियों की परेशानियां भी बयां की तो छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हें बरखास्त कर दिया.

सरकार पर आदिवासी भरोसा इसलिए भी नहीं करते कि उन्हें इस बात का कहीं ज्यादा अंदाजा है कि सरकार जनता को भरोसे में ले कर ही उन पर अत्याचार करती है. सभ्य और शहरी इलाकों में यह काम दूसरे ढंग से होता है. सरकारी कागजों के आतंक का शिकार हर कोई है.

किसी स्थानीय निकाय का एक तुड़ामुड़ा नोटिस आम लोगों को रुला देने के लिए काफी होता है. अगर किसी को नगरनिगम का यह बेवजह का नोटिस मिल जाए कि आप का मकान नाजायज तरीके से बना हुआ है तो वह बेचारा झट से जेब में पैसे ठूंसठूंस कर दफ्तर की तरफ दौड़ेगा और नेताओं व अफसरों के सामने गिड़गिड़ाएगा कि हुजूर, बचाओ, मेरे साथ ज्यादती हो रही है.

आदिवासी इलाकों में तसवीर उलट है. जहां नक्सलियों के जरिए ही सही, सरकार की हर ऐसी जोरज्यादती, आदिवासी अब बरदाश्त नहीं करते, वे सीधे बंदूक तानने लगे हैं. जान कर हैरानी होती है कि नक्सलियों के डर से बस्तर में घूसखोरी न के बराबर है. वहां के सरकारी मुलाजिम अपनी जान बचाने के लिए काम करें, न  करें, पर घूस मांगने की जुर्रत नहीं कर पाते. इसीलिए वहां परिस्थितियों से बचने के लिए हर सरकारी अफसर मोटी रिश्वत अपने अफसरों व नेताओं को देने को तैयार रहता है.

यह और ऐसी कई बातें सरकार को स्वाभाविक तौर पर नागवार गुजरती हैं, इसलिए उस की नजर में नक्सली राष्ट्रद्रोही हैं, भले ही वे देश को तोड़ने की बात न करें या फिर असहिष्णुता का रोना न रोएं और न ही राष्ट्रगान या तिरंगे का अपमान करें. नक्सलवाद को सरकार ने एक सामूहिक अपराध घोषित कर रखा है.

सरकारपीडि़त नागरिक हर जगह हैं. उन की प्रतिक्रियाएं और विरोध करने

के तरीके अलगअलग हैं. समाजसेवी अन्ना हजारे अनशन पर बैठ जाएं, इस

से सरकार को ज्यादा परेशानी नहीं होती क्योंकि ऐसे अनशन अपार जनसमर्थन के बाद भी जल्द खत्म हो जाते हैं या दम तोड़ देते हैं. लेकिन अन्ना हजारे जैसे आंदोलनों के वक्त लोगों में वही भड़ास होती है जो नक्सलियों की रगरग में स्थायीरूप से बस गई है. उन का आंदोलन या अभियान तात्कालिक नहीं है, न ही सरकार उसे खत्म कर पा रही.

रही बात नक्सलियों द्वारा लूटपाट की, छिटपुट घटनाओं की तो वे मंदिरों व सरकारी दफ्तरों की लूट के मुकाबले कहीं नहीं ठहरतीं. लूट और घूस के मामले में नक्सली सरकारी मुलाजिमों और पंडेपुजारियों की तरह प्रशिक्षित भी नहीं हैं कि इस में वे विविधता ला पाएं.  वे सिर्फ एक जिद पर अड़े हैं कि आदिवासियों का शोषण बरदाश्त नहीं किया जाएगा, इस के लिए चाहे उन्हें कुछ भी करना पड़े. हालांकि हिंसा को भी कहीं से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता.

नक्सलियों की मंशा

नक्सलियों की मंशा या दर्द बेहद साफ है कि जल, जंगल और जमीन पीढि़यों और सदियों से आदिवासियों के हैं, इन्हें उन से विकास की चालाकी के नाम पर छीना न जाए. नक्सलियों का यह नजरिया कि विकास और जंगलों का सीमेंटीकरण आदिवासियों से उन की मौलिकता व संस्कृति छीन लेगा, एकदम गलत भी नहीं ठहराया जा सकता.

आदिवासी खुद को बड़े गर्व से देश का मूल निवासी और वास्तविक प्रकृतिप्रेमी मानते हैं तो वे गलत नहीं हैं.  वे जंगलों से बाहर इसलिए भी नहीं आना चाहते कि सभ्य समाज उन से हमेशा से जानवरों सरीखा बरताव करता रहा है.  उन का स्वाभिमान शहरी और सभ्य लोगों से कहीं ज्यादा और पुख्ता है.

रही बात नक्सली हिंसा की, तो उस से जूझने और लड़ने के बजाय पहले नक्सलियों की बात सुनी जानी चाहिए.  उन की हर बात मानी जाए, यह कतई जरूरी नहीं. लेकिन संवादहीनता हिंसा को और बढ़ावा देने वाली साबित हो रही है. ऐसे में सरकार को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी समझते इस बाबत पहल

करनी चाहिए. वहीं, इसी संविधान का हवाला अकसर नक्सली भी दिया करते हैं कि इस में वर्णित आदिवासियों के अधिकार उन्हें मिलने चाहिए.

नक्सली भले ही हिंसक हों, पर बुद्धिजीवी भी हैं. वे बेहतर समझते हैं कि ईसाई और हिंदू आदिवासियों को अपनेअपने धर्मों में शमिल करने के लिए कुछ भी करगुजरने को तैयार हैं. अगर वे एक बार धर्म के फंदे में फंस गए तो जिंदगीभर उस में छटपटाते रहेंगे. फिर दुनिया की कोई ताकत उन्हें नहीं बचा पाएगी.  नक्सली हिंसा अनर्थ है तो इस का अर्थ भी समझना जरूरी है, तभी बात बन पाएगी. वरना सैनिक और नक्सली यों ही एकदूसरे को मारते रहेंगे और आदिवासी इन 2 पाटों के बीच पिसते रहेंगे.

वर्षा पर क्यों गिरी बिजली

सरकारें नक्सलियों और आदिवासियों के हमदर्दों में कोई फर्क नहीं करतीं. उन की नजर में हर वह आदमी राष्ट्रद्रोही है जो उस की पोल खोलता है. सुकमा हमले के बाद रायपुर जेल की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे को बरखास्त करने में छत्तीसगढ़ सरकार ने गजब की फुरती दिखाई, निलंबन के कायदेकानूनों को किनारे कर दिया.

वर्षा पर आरोप है कि उन्होंने फेसबुक पर सरकार के खिलाफ टिप्पणियां की जिन में गलत एवं भ्रामक तथ्यों का उल्लेख किया. चूंकि वे अनाधिकृत रूप से कर्तव्य से अनुपस्थित थीं, इसलिए भी उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है. यहां तक बात ठीक थी कि राज्य सरकार ने वर्षा से 32 पृष्ठों में सवाल पूछते उन का स्पष्टीकरण मांगा था.  हैरानी की बात यह है कि जवाब की समयसीमा खत्म होने के पहले ही उन्हें नौकरी से चलता कर दिया गया.

जबकि वर्षा ने अपने 376 पृष्ठीय जवाब में कहा है कि उन्होंने सीबीआई, सुप्रीम कोर्ट और सरकारी दस्तावेजों के हवाले से ही अपनी बात कही है और जवाब देने के पहले ही उन्हें नौकरी से बरखास्त कर दिया गया. जाने क्यों जेल प्रशासन ने प्राथमिक जांच अधिकारी की रिपोर्ट का इंतजार नहीं किया.

वर्षा के पहले भी कई अधिकारी सरकारी ज्यादतियों का शिकार हो चुके हैं. सरकार उन्हें ज्यादा से ज्यादा नौकरी से निकाल सकती है. पर इन से भी बड़ी गाज उन लोगों पर गिरती है जो आदिवासी अंचलों में आदिवासियों के लिए काम कर रहे हैं.

राज्य सरकार क्यों वर्षा से घबराई, इस के लिए वर्षा की फेसबुक पर लिखी जो पोस्ट वायरल हुई उसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है. इस से यह पता चलता है कि नक्सली अभियान और अभिप्राय वास्तव में है क्या और उसे क्यों बंदूक के जोर पर गलत ठहराने की नाकाम कोशिश सरकार सालों से कर रही है.

‘‘मुझे लगता है कि एक बार हम सभी को अपना गिरेबान झांकना चाहिए, सचाई खुदबखुद सामने आ जाएगी. घटना में दोनों तरफ मरने वाले अपने देशवासी हैं, भारतीय हैं. इसलिए कोई भी मरे, तकलीफ हम सब को होती है.  लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था को आदिवासी क्षेत्रों में जबरदस्ती लागू करवाना, उन की जल, जंगल, जमीन से उन्हें बेदखल करने के लिए गांव का गांव जलवा देना, आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार, आदिवासी महिलाएं नक्सली हैं या नहीं, इस का प्रमाणपत्र देने के लिए उन का स्तन निचोड़ कर दूध निकाल कर देखा जाना कैसा इंसाफ है.

‘‘टाइगर प्रोजैक्ट के नाम पर आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन से बेदखल करने की रणनीति बनती है जबकि संविधान की 5वीं अनुसूची में शामिल होने के कारण सरकार का कोई हक नहीं बनता आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन को हड़पने का… आखिर ये सबकुछ क्यों हो रहा है. नक्सलवाद खत्म करने के लिए लगता नहीं…सच तो यह है कि सारे प्राकृतिक खनिज संसाधन इन्हीं जंगलों में हैं जिन्हें उद्योगपतियों व पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है.

‘‘आदिवासी जल, जंगल, जमीन खाली नहीं करेंगे क्योंकि यह उन की मातृभूमि है. वे नक्सलवाद का अंत तो चाहते हैं लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उन की बहूबेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उन के घर जला रहे हैं, उन्हें फर्जी केसों में चारदीवारी में सड़ने को भेजा जा रहा है, तो आखिर वे न्यायप्राप्ति के लिए कहां जाएं. ये सब मैं नहीं कह रही, सीबीआई रिपोर्ट कहती है, सुप्रीम कोर्ट कहता है, जमीनी हकीकत कहती है.

‘‘जो भी आदिवासियों की समस्यासमाधान का प्रयत्न करने की कोशिश करते हैं चाहे वे मानव अधिकार कार्यकर्ता हों, चाहे पत्रकार, उन्हें फर्जी नक्सली केसों में जेल में ठूंस दिया जाता है. अगर आदिवासी क्षेत्रों में सबकुछ ठीक हो रहा है तो सरकार डरती क्यों है. ऐसा क्या कारण है कि वहां किसी को भी सचाई जानने के लिए जाने नहीं दिया जाता.

‘‘मैं ने स्वयं बस्तर में 14 से 16 वर्ष की मडि़या आदिवासी बच्चियों को देखा था जिन को थाने में, महिला पुलिस को बाहर कर, पूरा नंगा कर प्रताडि़त किया गया था. उन के दोनों हाथों की कलाइयों और स्तनों पर करैंट लगाया गया था जिस के निशान मैं ने स्वयं देखे. मैं भीतर तक सिहर उठी थी कि इन छोटीछोटी आदिवासी बच्चियों पर थर्ड डिगरी टौर्चर किसलिए…मैं ने डाक्टर से उचित उपचार व आवश्यक कार्यवाही के लिए कहा.

‘‘हमारे देश का संविधान और कानून कतई हक नहीं देता कि किसी के साथ अत्याचार करें… इसलिए सभी को जागना होगा. राज्य में 5वीं अनुसूची लागू होनी चाहिए. आदिवासियों का विकास आदिवासियों के हिसाब से होना चाहिए.  उन पर जबदरस्ती विकास न थोपा जाए. आदिवासी प्रकृति के संरक्षक हैं. हमें भी प्रकृति का संरक्षक बनना चाहिए, न कि संहारक. पूंजीपतियों के दलालों की दोगली नीति को समझें… किसानजवान सब भाईभाई हैं. सो, एकदूसरे को मार कर न ही शांति स्थापित होगी और न ही विकास होगा. संविधान में न्याय सब के लिए है…इसलिए न्याय सब के साथ हो.

‘‘हम भी इसी सिस्टम के शिकार हुए…लेकिन अन्याय के खिलाफ जंग लड़े, षड्यंत्र रच कर तोड़ने की कोशिश की गई, प्रलोभनरिश्वत का औफर भी दिया गया. लेकिन हम ने इन के सारे इरादे नाकाम कर दिए और सत्य की विजय हुई…आगे भी होगी. न हम अन्याय करेंगे और न सहेंगे.’’

नक्सली आंदोलन 1967 से 2017 तक

नक्सलवाद की उम्र 50 साल हो रही है पर इस पर काबू पाने में सरकारें नाकाम रही हैं. इस की वजहें हैं जिन का सीधा संबंध एकतरफा विकास से है. आजादी के बाद आम लोगों और किसानों को उम्मीद बंधी थी कि अब गांवगांव तक सड़क, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और बिजली होगी लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो यह वर्ग मानने लगा कि पैसे वाले देखते ही देखते पैसे वाले होते जा रहे हैं और गरीब और गरीब होता जा रहा है.

पर तब ऐसा सोचने वाले असंगठित थे. साल 1967 में  बंगाल के एक गांव नक्सलवाड़ी से इस एकतरफा विकास के खिलाफ पहली सशक्त क्रांति हुई थी. इसलिए इस क्रांति का नाम नक्सलवाद पड़ गया. नक्सलवाद के जनक थे भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के चारू मजूमदार और कानू सान्याल, जिन की मुलाकात इत्तफाक से जेल में हुई थी.  उन दोनों का मानना था कि किसानों और मजदूरों की दुर्दशा के लिए सरकारी नीतियां और लोकतांत्रिक व्यवस्था जिम्मेदार है.

सशस्त्र हिंसा फैली तो देखते ही देखते शोषित और वंचित लोग नक्सलवाद को लाल सलाम ठोंकने लगे. 50 सालों में नक्सली आंदोलन काफी बदला भी है. आज घोषित तौर पर उन का कोई नेता नहीं है और वे खुद कई दलम (दलों) में बंट गए हैं पर उन का मकसद आज भी ज्यों का त्यों है. कुछ वैचारिक मतभेदों के चलते चारू मजूमदार और कानू सान्याल अलग हो गए थे. चारू मजूमदार की मौत 1972 में ही हो गई थी जबकि कानू सान्याल ने साल 2010 में फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली थी.

उम्मीद से कम वक्त में नक्सलवाद पश्चिम बंगाल से होता आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड और ओडिशा में फैला. आज हालत यह है कि आंशिक और पूरी तरह से नक्सलप्रभावित राज्यों की संख्या 10 और जिलों की संख्या 190 है. फर्क इतना है कि कहीं नक्सली गतिविधियां न के बराबर हैं तो कहीं उम्मीद से ज्यादा हैं.

आज के नक्सली किसी राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित नहीं रह गए हैं और न ही पहले की तरह लोकतंत्र को कोसते हैं.  इस की एक बड़ी मिसाल आदिवासी क्षेत्रों में भाजपा को मिलती सफलता है जो 20 साल पहले आदिवासी वोटों के लिए तरस जाती थी. कम्यूनिस्ट विचारधारा के होते हुए भी नक्सली आमतौर पर धार्मिक संगठनों को तंग नहीं करते.

अब नक्सलियों का असल मकसद उन सरकारी योजनाओं में अड़ंगा डालना है जो उन्हें जंगलों को खत्म करती लगती हैं. सड़कें बनेंगी तो आदिवासी जंगलों से बेदखल हो जाएंगे और जंगलों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा हो जाएगा.  नक्सली अब इसी आशंका में सोते और जागते हैं और जब भी मौका मिलता है, हिंसा को अंजाम दे देते हैं. सरकार ने नक्सलप्रभावित इलाकों को छावनी सा बना दिया है जिस से नक्सलियों को खास चिढ़ है.

उधर, आदिवासी भी सैन्यबलों से परेशान हैं. इसलिए वे नक्सलियों का साथ देते हैं. हर तरह की सूचना नक्सलियों के पास कैसे पहुंच जाती है, यह किसी को नहीं पता और न ही यह कि आम आदिवासी कैसे नक्सलियों को फंडिंग करता है. उलट इस के, सरकार या किसी और को तो रत्तीभर भी नहीं मालूम कि नक्सली किस जगह से अपनी मुहिम को अंजाम देते हैं, अब उन का नेता कौन है और आगे वे क्या करेंगे.

नक्सली हिंसा के अर्थों और अनर्थ से दूर सिरदर्द की बात सरकार के लिए यह है कि वह भले ही लोकतंत्र व समानता का राग अलापती हो, लेकिन अभी तक वह आदिवासियों का भरेसा नहीं जीत पाई है. यह बात बस्तर सहित दूसरे नक्सलप्रभावित राज्यों में साफसाफ दिखती भी है कि अभी तक आदिवासी अंचलों का अपेक्षित विकास नहीं हुआ है. नक्सली इस बात के लिए सरकार को ही जिम्मेदार मानते हैं.

हिंसा की छोटीबड़ी वारदातें होती रहेंगी, नक्सली दहशत कायम रहेगी, बेगुनाह आदिवासी मारे जाते रहेंगे और उन के साथ में जवान भी. लेकिन सरकार कुछ नहीं कर पाएगी. ऐसे में हल क्या है और कैसे होगा, यह कोई नहीं सोचता. सरकार भी हिंसा का जवाब हिंसा से दे कर नक्सलियों को उकसाती ही लगती है.  अब थोक में बेरोजगार आदिवासी युवा और औरतें नक्सली संगठनों में शामिल हो रहे हैं क्योंकि सरकार उन्हें शिक्षा व रोजगार नहीं दे पा रही.

नदी की राजनीति पर अंधविश्वासों के पुल

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की यह खासीयत है कि वे ऐसा कुछ न कुछ करते रहते हैं जिस से लोगों का ध्यान बंटा रहे और वे राजकाज पर जरूरत से ज्यादा सवाल न करें. यह ऐसा, कुछ धार्मिक ही क्यों होता है? इस का जवाब बेहद साफ है कि इस से अंधविश्वास फलतेफूलते हैं, पंडेपुजारी उन की स्तुति करते रहते हैं और मामला चूंकि धर्म का होता है, इसलिए उन की मंशा पर विपक्ष भी उंगली नहीं उठा पाता जो खुद अधार्मिक या नास्तिक कहलाने से बचने के चक्कर में राज्य से लुप्त होता जा रहा है. इस साल उन्होंने वाकई एक ऐतिहासिक काम नर्मदा नदी की यात्रा का कर डाला जिसे नाम दिया गया ‘नमामि देवी नर्मदे.’ कहने को तो इस यात्रा का मकसद नदी संरक्षण, पर्यावरण वगैरा थे पर 148 दिन, 3,344 किलोमीटर इस लंबी यात्रा के दौरान जगहजगह 90 विधानसभा क्षेत्रों में पूजापाठ और आरती होती रहीं. नर्मदा यात्रा में भीड़ लाई भी गई थी और खुद भी आई थी, जिस ने तबीयत से नर्मदा का पूजापाठ करते यात्रा के साथ चल रहे पंडेपुजारियों के पांव छुए और दानदक्षिणा भी दी.

नदियां पंडेपुजारियों के लिए कैसे वरदान हैं, यह सच इस यात्रा से फिर समझ आया कि क्यों हिंदू धर्मग्रंथों में नदियों की महिमा चमत्कारिक ढंग से गाई गई है. ऐसी कोई भी नदी नहीं है जिस के बारे में यह न लिखा गया हो कि इस में डुबकी लगाने से पाप धुलते हैं और मोक्ष मिलता है.

धर्म पर राजनीति करने के सीधे आरोप से बचने के लिए शिवराज सिंह ने एक ऐसा धार्मिक इवैंट और कर डाला जिसे वे 2018 के चुनाव में भुनाएंगे. नर्मदा यात्रा की ब्रैंडिंग में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी और जितने सैलिब्रिटीज बुला सकते थे, बुलाए जो फिल्म, खेल, कला सहित राजनीति से भी थे. इन में एक चर्चित नाम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी है.

तारीफ पर तारीफ

गंगा हो या गाय, कुरसी पर जमे रहने के लिए नेताओं का राजनीतिक स्वांग पूरे शबाब पर है. नमामि देवी नर्मदे सेवायात्रा के बहाने हुए राजनीतिक प्रौपेगेंडा को समझना जरूरी है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मध्य प्रदेश के मंडला जिले के शहपुर कसबे में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की चर्चित नमामि देवी नर्मदे यात्रा की तारीफ में जो कसीदे गढ़े उन्हें सुन लोगों का दिल भर आया कि लो, हमारे यशस्वी सीएम इतने होनहार और विद्वान हैं और एक हम मूढ़ हैं कि सूबे की कानून व्यवस्था को कोसते रहते हैं.

अब जब सारी समस्याएं मां नर्मदा की पूजा, अर्चना, वंदना और आराधना से ही हल होनी हैं तो बेकार के गिलेशिकवे क्यों? यह तो अधार्मिकता है. इस से बचना चाहिए और अब तो योगीजी तक कह रहे हैं कि शिवराज ने जो इतिहास गढ़ा, वह बेमिसाल है. अब उत्तर प्रदेश में गंगा का उद्धार भी इसी तरह किया जाएगा. इस सेवायात्रा की तारीफ करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों की दर्जनों हस्तियां मध्य प्रदेश बुलाई जा चुकी हैं पर आदित्यनाथ की बात अलग हट कर थी. वे जिज्ञासा का विषय हैं जिन की मांग इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी ज्यादा है, इसलिए उन के लिए खासतौर से भीड़ इकट्ठा की गई थी.

योगी तारीफ ही करेंगे, इस का अंदाजा हर किसी को था. पर हद से ज्यादा करेंगे, यह कम ही लोगों ने सोचा था. 5 महीनों तक नर्मदा किनारे तारीफों के दौर चले. अपनी तारीफ सुनने के लिए शिवराज सिंह ने जनता का करोड़ों रुपया फूंक डाला. फिर भी उन का जी नहीं भर रहा है. ऐसा लग रहा है कि जब तक खुद नर्मदा मैया मानव अवतार में प्रकट हो कर अपने इस पुत्र को चिरकाल तक राज करने का आशीर्वाद नहीं दे देंगी, वे मानेंगे नहीं. यह और बात है कि आजकल ऐसे चमत्कार होते नहीं. शिवराज की भक्ति और आस्था यह कर डाले, तो किसी को खास हैरानी भी नहीं होगी.

आदित्यनाथ योगी हैं, वे बेहतर समझते हैं कि धर्म और पंडेपुजारियों का धंधा नदीपहाड़ के इस खेल से ही फलताफूलता है, इसलिए शिवराज ठीक कर रहे हैं. भाजपा की सवर्णों और दलितों को एकसाथ साधने की राजनीति के लिए यह जरूरी भी है कि अंबेडकर जयंती भी धूमधाम से मनाई जाए और परशुराम जयंती भी, जिस से चारों वर्णों के लोग खुश रहें.

आधा घंटे शिवराज, नर्मदा और मध्य प्रदेश की कल्याणकारी योजनाओं की आरती गाने के बाद योगी ने उत्तर प्रदेश की पूर्ववर्ती सरकार को कोसा कि वह बड़ी निकम्मी और भ्रष्टाचारी थी, इसलिए अब जनता ने उन्हें चुना. उन्होंने फिर एक जरूरी काम, नरेंद्र मोदी की तारीफ की जिस के बगैर इन दिनों कोई भी भाजपा जलसा मान्य नहीं.

आदित्यनाथ, शिवराज सिंह से जूनियर हैं, इस बात का उन्होंने पूरा ध्यान रखा. वे खुद को शिवराज का छोटा भाई अप्रत्यक्ष बताते रहे पर उत्तर प्रदेश को मध्य प्रदेश का बड़ा भाई बताया. भाईचारे और तारीफ पर तारीफ का खेल खत्म हुआ तब जानकारों को समझ आया कि आदित्यनाथ अभी शिवराज के मुकाबले कच्चे खिलाड़ी हैं और भाषणकला में भी पिछड़े हैं. ये कमजोरियां ऐसे ही समारोहों से दूर होंगी.

महाकौशल इलाके में हासपरिहास इस बात पर भी हुआ कि यह तो भाजपा के कांग्रेसीकरण की शुरुआत है. अगर ये दोनों भाई वाकई एक हो गए तो पार्टी के कई दादाओं की मुश्किल हो जाएगी.

उधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने चहेते योगी की हर गतिविधि पर बेहद बारीक नजर रखे हुए हैं क्योंकि उत्तर प्रदेश में वोट उन के नाम पर मिला है, आदित्यनाथ के नाम पर नहीं. उलट इस के, मध्य प्रदेश में वोट शिवराज के नाम पर डलते हैं और उन्हीं के नाम पर डलते रहें, नमामि देवी नर्मदे इसी मुहिम का नतीजा है.

मध्य प्रदेश के संक्षिप्त प्रवास से योगी आदित्यनाथ को यह मंत्र जरूर मिल गया है कि कुरसी पर जमे रहने के लिए प्रौपेगेंडा जरूरी है फिर चाहे वह गंगा के नाम पर हो या गाय के नाम पर जिन का मकसद लोगों को उलझाए रखना होता है. देखना दिलचस्प होगा कि योगी धर्म अब का कौन सा तत्त्व चुनते हैं.

अंधविश्वास की हद

जब देशभर में नर्मदा यात्रा का मुकम्मल हल्ला मच गया तो उस के समापन के लिए शिवराज सिंह चौहान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बुला डाला. नरेंद्र मोदी की व्यस्तता के चलते यात्रा का समापन 4 दिन बढ़ा दिया गया. इस तरह यह यात्रा 11 मई की जगह 15 मई को खत्म हुई. इस से उस का खर्च और बढ़ा जिस की चिंता शिवराज सिंह ने नहीं की.

हद तब हो गई जब नरेंद्र मोदी के हवाई जहाज के लिए नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक में नया हैलीपैड बनवाया गया. जानकार हैरान थे कि जब पहले से ही हैलीपेड मौजूद है तो नया हैलीपैड बनवाने का औचित्य क्या है.

जल्द ही इस सवाल का जवाब भी मिल गया कि दरअसल, अब तक जो भी नेता हवाईयात्रा के जरिए नर्मदा नदी को लांघ कर आया है, उसे इस जुर्रत की कीमत कुरसी गंवा कर चुकाना पड़ी है. इस अंधविश्वास को बनाए रखने के लिए शिवराज सिंह ने नया हैलीपैड ही बनवा डाला. हैरत की बात तो यह भी है कि अपनी कुरसी बचाए रखने के लिए उन्होंने अपने 10 साल से भी ज्यादा के मुख्यमंत्रित्व काल में कभी भी उड़नखटोले के जरिए नर्मदा को नहीं लांघा.

सियासी गलियारों में यह चर्चा होती रही कि बात सच है क्योंकि अभी तक जिनजिन नेताओं ने यह रिवाज तोड़ा है, नर्मदा मैया ने उन की कुरसी डुबो दी. इस बाबत जो नाम गिनाए गए, उन में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई सहित अर्जुन सिंह, मोतीलाल वोरा, विद्याचरण शुक्ल और भैरोसिंह शेखावत प्रमुख हैं. पर इन से भी ज्यादा अहम नाम उमा भारती का लिया गया.

उमा भारती अब से 13 साल पहले मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं लेकिन उन्हें अपने पद से 21 अगस्त, 2004 को इस्तीफा देना पड़ा था. तब किसी ने नहीं कहा था कि चूंकि वे नर्मदा नदी के ऊपर से उड़ी थीं, इसलिए कुरसी गई.

तब हुआ यह था कि उमा ने कर्नाटक के हुबली शहर में सांप्रदायिक भाषण दिया था और वहां के विवादित धर्मस्थल ईदगाह मैदान पर तिरंगा फहराया था. उस मैदान पर हिंदू और मुसलमान दोनों ही अपना हक जताते रहे हैं. साल 1994 में उमा पर हुबली में भड़काऊ भाषण देने, धार्मिक उन्माद फैलाने और तिरंगे के अपमान के कुल 13 मामले दर्ज हुए थे.

अदालत ने उन्हें दोषी करार देते उन के खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी कर दिया तो मजबूरी में उन्हें पद छोड़ना पड़ा और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की कुरसी बाबूलाल गौर के पास से होती हुई चमत्कारिक तरीके से शिवराज सिंह चौहान को मिल गई. इन्होंने शायद अपनी धर्मबहन के जाने की वजह पहले ही जान ली थी कि वे हुबली वारंट के चलते नहीं, बल्कि नर्मदा को फांदने के जुर्म में गई थी.

नरेंद्र मोदी को नर्मदा की बेरहमी या नाराजगी का शिकार न होना पड़े, इसलिए नया हैलीपैड इस तरह बनवाया कि उन्हें नर्मदा के ऊपर से हो कर न गुजरना पड़े. इस अंधविश्वास के बारे में जिस ने भी सुना, वह नर्मदा के एक और चमत्कार के सामने नतमस्तक हो गया.

अंधविश्वास लोगों की सनातनी कमजोरी है पर शिवराज सिंह की तो कुछ ज्यादा ही है जो वे अशोकनगर जाने से कतराते हैं, जहां के बारे में यह बात कुख्यात है कि वहां जो भी मुख्यमंत्री आया, वह ज्यादा दिनों तक कुरसी पर टिक नहीं पाया.

राज्य में 2018 में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर एक धार्मिकयात्रा का ड्रामा कर रहे शिवराज सिंह चौहान दरअसल धार्मिक पूर्वाग्रहों और कुंठा के शिकार हैं. इसलिए वे अब जरूरत से ज्यादा धर्मकर्म करने लगे हैं. वरना कभी उन की छवि एक विकासशील और कल्याणकारी योजनाएं बनाने वाले युवा नेता की हुआ करती थी. उन की छवि अब पूरी धार्मिक हो गई है तो उन पर तरस आना स्वभाविक बात है.

तरस इसलिए कि उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का हाल सामने है जिन्हें कोई गंगा या दूसरा देवी, देवता नहीं बचा सका. हरीश रावत भी शिवराज सिंह की तरह अंधविश्वास की नदी में गलेगले तक डूब गए थे. हालत तो यह तक हो गई थी कि उन्होंने संजीवनी बूटी ढूंढ़ने के लिए एक टीम गठित कर करोड़ों रुपए फूंक डाले थे. पर जब उत्तराखंड के नतीजे सामने आए तो कांग्रेस औंधेमुंह लुढ़की पड़ी थी और वे 2 सीटों से चुनाव हारे थे.

जनता की उम्मीदों और गुस्से के सामने तमाम टोनेटोटके, अंधविश्वास और तंत्रमंत्र लोकतंत्र में फ्लौप साबित होते हैं. इस के बाद भी नेता सबक नहीं लेते, तो यह उन की कमजोरी और जनता के प्रति उन का अविश्वास ही माना जाएगा.

किशोरों की नवचेतना की हत्या

जहां चीन 50 देशों को मिला कर एशिया, अफ्रीका और यूरोप को वन बैल्ट वन रोड को बनवा कर जोड़ने की मेहनती व कठिन डगर पर चल रहा है वहीं भारत को अपने पौराणिक काल को पुनर्जीवित करने की लगी हुई है. चीन सिल्क रोड को नया रूप दे रहा है, हम नई तकनीक का इस्तेमाल यज्ञों, हवनों, स्नानों, कुंभों, पूजाओं, मंदिरों में कर रहे हैं. आज का किशोर जब बड़ा होगा तो अगर चीन का हुआ तो बीजिंग से लंदन तक बाइक पर जा सकेगा, भारत का हुआ तो पाकिस्तान व बंगलादेश में भी घुसेगा तो उस पर देशद्रोही का ठप्पा लग जाएगा.

हमारे देश में स्कूली किताबों में पुरातन का गुणगान करने के लिए कड़ी मेहनत की जा रही है. चीन में पहाड़ों, नदियों, रेगिस्तानों को पार करने में पैसा और शक्ति लग रही है. हम अपने किशोरों को धर्म भक्त बना रहे हैं ताकि वे मोबाइलों व कंप्यूटरों की पूजा करें. चीन में वे नए रास्तों को खोज रहे हैं.

किशोरों के दिमाग के साथ खेलने के लिए देश में बहुत से संस्थान उग आए हैं जिन की नशीली दवाएं महान संस्कृति, संस्कारों का गुणगान करना सिखा रही हैं. विकास के नाम पर जो कल का महान भारत हम बनाने चले थे वह तो लगता है पिछले कल का है, जो हमारे लिए आदर्श है. हमारे नेताओं का चोला बदल गया है, सोच बदल गई है.

आज के किशोर के पास बहुत कम समय है कि वह बिगड़ती हालत को सुधार सके. किशोर के पास 5-7 साल होते हैं जब उस में समझ तो होती है पर जिम्मेदारियां नहीं होतीं और अगर इन दिनों उसे पुरातन की दवा दे दी गई तो वह नवीनता को सदासदा के लिए भूल जाएगा. उसे फलनेफूलने और प्रयोग करने की जो छूट चाहिए वह हमारा तंत्र बंद कर रहा है. हम भारत को महान बनाने में लगे हैं, हमारे जैसा चीन एशिया और यूरोप को मिला कर विशाल बाजार बनाने में लगा है. जो काम हमारी सरकार कर रही है वह किशोरों को भक्ति की गुलामी करने को मजबूर कर देगी.

किशोरों को आगे बढ़ने के सपने देखने की आदत होनी चाहिए. वे आसमान को पार करें, जंगलों को लांघें, समुद्रों के उस पार जाएं. उन्हें असंभव को संभव करने का पाठ पढ़ाया जाए. उन को प्रयोग करने की छूट हो. वे कानूनों व रिवाजों में न उलझें. कुछ नया करें, नया सोचें. उन के लिए विश्व बिना बंधनों, बिना सीमाओं का हो.

यह अक्खड़पन से नहीं संभव है. हम ही सही हैं और हम हमेशा सही रहे हैं, यह गलतफहमी न रहे. अगर देश वयस्कों को नया सोचने की इजाजत न दे तो कम से कम कोई नुकसान न करने लायक किशोरों को तो छोड़ दे. यहां तो चीन को देखते हुए भी हम पुरातन की ओर भाग रहे हैं, यह किशोरों की नवचेतना की हत्या है.

किसान आंदोलन के पीछे ‘उत्तर प्रदेश फैक्टर’

उत्तर प्रदेश की सरकार ने मार्च 2017 में 36 हजार रूपये का किसानों का कर्ज माफ किया. अब मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब और हरियाणा के किसान भी कर्ज माफी की मांग कर रहे हैं. कर्ज माफी के लौलीपॉप के जरिये राजनीतिक दल किसानों के वोट हासिल करने का काम करते रहे हैं.

1990 में पहली बार विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार ने यह दांव चला था. इसके बाद केन्द्र और राज्य सरकारों ने इस लौलीपौप का झांसा देना जारी रखा. किसान भी बिना कुछ सोंचे समझे इस झांसें का शिकार होते रहे हैं. कर्ज माफी से किसानों की दशा में कोई भी बदलाव नहीं आता है. रिजर्व बैंक का कहना है कि कर्ज माफी का प्रभाव देश की आर्थिक व्यवस्था पर पड़ता है जिससे देश में मंहगाई बढती है और उससे किसान भी प्रभावित होता है.

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने जब 36 हजार करोड़ रूपये का किसान कर्ज माफ किया तो देश के बाकी हिस्से के किसानों ने भी यही मांग करनी शुरू कर दी. अब वह किसी न किसी बहाने से इस मांग को बढाते जा रहे हैं. किसान आंन्दोलन के चलते मध्य प्रदेश में 6 किसानों की मौत हुई. ऐसे में वहां की सरकार और बाकी प्रदेशों की सरकारें दवाब में आ गई है.

कर्ज माफी के वादे पर चुनाव लड़ने और चुनाव जीतने के बाद कर्ज माफ करने के मामले में उत्तर प्रदेश पहला प्रदेश नहीं है. 2014 के आम चुनाव में आन्ध्र प्रदेश में तेलगू देशम पार्टी, तेलंगाना में कर्ज माफी कों मुददा बनाया गया. दोनों जगहों पर चुनाव जीतने के बाद 40 हजार करोड़ और 20 हजार करोड़ का किसान कर्ज माफ किया गया.

कर्ज माफी के बाद भी आन्ध्र प्रदेश और तेलंगाना में किसानों की हालत में कोई सुधार नहीं आया है. 2014 में आन्ध्र प्रदेश में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 165 थी वहीं 2015 में यह बढ़कर 516 हो गई. तेलंगाना में भी ऐसे ही हालत है. उत्तर प्रदेश में भी 36 हजार करोड़ के कर्ज माफी के बाद भी किसानों की हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा है.

कर्ज माफी से देश की आर्थिक प्रगति प्रभावित होती है. इसके अलावा बैंक किसानों को बिना किसी गारंटी के लोन देने से बचते हैं. कर्ज माफी से किसानों का कल्याण नहीं होता. कर्ज माफी का लाभ सभी किसानों को नहीं मिलता. किसान कर्ज माफ करते समय सरकार इस बात का पूरा ध्यान रखती है कि बड़ी रकम के लोग माफ होने की जगह पर ज्यादा संख्या में छोटे छोटे कर्ज लेने वाले किसानों के लोन माफ जिससे उनको वोट ज्यादा मिले.

2008 में डॉक्टर मनमोहन सिंह सरकार ने भी 60 करोड़ रूपये के कर्ज को माफ किया. जिसकी वजह से 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सरकार बनाने में सफल हुई. इससे भी सभी किसानों को लाभ नहीं हुआ. सभी को बराबर लाभ मिलने से दूसरे किसान नाराज भी हो जाते हैं जिससे सरकार की छवि खराब भी होती है.इसके बाद भी किसानों के कर्ज की माफी अब चुनावी मुददा भी बनने लगी है. मध्य प्रदेश में विधानसभा के चुनाव आने वाले हैं. अब वहां भी किसानों की कर्ज माफी एक मुददा बन सकती है. ऐसे में किसानों को लेकर नई राजनीति शुरू हो सकती है.

अपनी मां की तरह ही इनका अंदाज भी है बोल्ड

80 के दशक की एक्‍ट्रेस पूनम ढिल्लों अपने समय की जानी-मानी अभिनेत्रियों में से  एक हैं. पूनम ने कई हिट‌ फिल्में देकर .ये साबित किया ‌था कि वे एक बेहतरीन एक्ट्रेस हैं. उनकी यादगार फिल्मों में से एक ‘ये वादा रहा’ आज भी दर्शकों द्वारा पसंद की जाती है. इसमें पूनम ने स्टार रहे ऋषि कपूर के साथ काम किया था.

अब 55 साल की हो चुकी पूनम ढिल्लों की एक बेटी पलोमा ढिल्लों और बेटा अनमोल है. ऐसा लग रहा है मानो उनकी बेटी पलोमा ढिल्लों भी अब फिल्मों में आने के लिए तैयार हैं. हाल ही में पलोमा की बिकिनी में कुछ तस्वीरें सामने आईं हैं.

पलोमा मालदीव में वैकेशन एंज्वॉय कर रही हैं. उम्मीद की जा रही है कि 21 साल की पलोमा जल्द ही बॉलीवुड में एंट्री कर सकती हैं.

हर स्टार किड की तरह पलोमा भी सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. पलोमा अक्सर अपनी हॉट तस्वीरें सोशल मीडिया अकाउंट पर शेयर करती रहती हैं.

विदेश में एक बीच पर पलोमा ब्लैक बिकिनी में तो जैसे कहर ढा रही हैं. उनकी तस्वीरों को देख लगता है कि पलोमा को फोटो खिंचवाने का काफी शौक है.

उनकी मां पूनम ने भी कई फिल्‍मों में बोल्ड सीन दिए हैं. जैसे साल 1986 में आई फिल्म ‘समुंदर’ में पूनम ने सनी देओल के साथ एक काफी बोल्ड सीन शूट किया था.

इंटीमेट सीन शूट करते वक्त इस एक्टर ने की ऐसी हरकत

सिर्फ दर्शकों का मनोरंजन करने के लिए, पर्दे पर बोल्ड और इंटीमेट सीन शूट करना सबसे मुश्किल काम होता है. कई बार तो इस तरह के सीन्स के दौरान हीरो-हीरोइन अक्सर काबू से बाहर हो जाते हैं और ऐसा हो भी क्यों न. अब इतने करीब रहकर सेक्स जैसे सीन शूट करना, हर किसी के बस की बात नहीं है.

तो ऐसा ही कुछ हुआ इस एक्टर के साथ हुआ था. हम आपको बता हरे हैं कि एक फिल्म के लिए बेहद इंटीमेट सीन शूट करते हुए वक्त ये अभिनेता हो गए थे बेकाबू. तो ये एक्टर हैं रुसलान मुमताज. और ये बात है उनकी फिल्म ‘आई डोंट लव यू’ की, जिसमें उनके विपरीत काम कर रहीं थी खूबसबरत मॉडल और एक्ट्रेस चेतना पांडे.

ये बात शायद आप जानते होंगे कि इस फिल्म की कहानी एक एमएमएस स्केंडल के इर्द-गिर्द घूमती है और इसी को ध्यान में रखते हुए फिल्म में एक एमएमएस सेक्स सीन शूट किया जाना था.

शूट शुरू हुआ और शूट के दौरान रुसलान बेकाबू हो गए. इसका खुलासा उन्होंने खुद ही, मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में भी किया था. रुसलान ने कहा था कि, ‘शूट के दौरान मैं बेकाबू हो गया था और जैसे ही मैंने अभिनेत्री के ड्रेस की चेन खोली तो वे लगभग जमीन पर गिर ही गईं थीं. वो सीन वाकई मेरे लिए बहुत मुश्किल था.’

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