शिक्षा की महत्ता और स्कूलों की बढ़ती लापरवाही

12वीं की परीक्षाओं को ढंग से न करवा सकने के चलते सैंट्रल बोर्ड औफ सैकंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) के खिलाफ छात्रों को बारबार अदालतों में जाना पड़ता है. इस बार फिर आशा से कम अंक मिलने के कारण 11 लाख में से 2.47 प्रतिशत छात्रों ने उत्तर पुस्तिकाओं की दोबारा जांच की मांग की. पहले तो बोर्ड ने नियम बना डाले कि जांच केवल कुछ ही विषयों और सीमित संख्या में प्रश्नों की हो सकती है पर अब हाईकोर्ट की फटकार के बाद उस ने नियम बदले हैं. 12वीं की परीक्षा इस देश में छात्रों का पूरा जीवन बदल देती है. जो फिसड्डी हैं, उन का तो कुछ जाता नहीं है पर जो मेधावी, मेहनती हैं उन्हें कठिन मेहनत के बावजूद केवल जांचने वालों की लापरवाही के कारण असफलता देखनी पड़े, यह अन्याय है.

शिक्षा की पहली और एक तरह से आखिरी सीढ़ी पर ही छात्र को यदि किसी की गलती को भुगतना पड़े तो इस से बड़ा दोष नहीं हो सकता. लगता है हमारे गुरु आज द्रोणाचार्य के भक्त हैं जिस ने एक युवा एकलव्य को दंड दे डाला था क्योंकि उन्हें राजपुत्र अर्जुन को धनुर्विद्या में एक नंबर पर रखना था. यह बात दूसरी है कि अंगूठा कटवाने के बाद एकलव्य फिर लड़ा और अफसोस यह कि महाभारत में वह कौरवों के साथ था जिस में एक समय सेनापति द्रोणाचार्र्य ही थे. आज के कुछ टीचर भी यह समझते हैं कि उन के पास छात्रों के जीवन से खेलने का लाइसैंस है. बिहार में टौपरों का विवाद भी ऐसा ही है जहां लगभग अनपढ़ों को पैसा ले कर मनमाने अंक दे दिए जाते हैं और सही में योग्य छात्र पीछे रह जाते हैं. ये शिक्षा व्यवस्था के जर्जर हो जाने के कुछ नमूने हैं.

पिछले 70 सालों में एक तरफ जहां शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है, वहीं शिक्षा को धंधा बना लेने की आदत भी. इस में पिसते हैं युवाओं के सपने. 12वीं की परीक्षा, आईआईटी की परीक्षा हो, मैडिकल कालेजों की प्रवेश परीक्षा हो, हरेक में मनमाने नियम हैं, धांधली है, चोरी है, छल है.

शिक्षा न केवल बाजारू हो गई है, यह बेहद भेदभाव वाली और कुछ को सपोर्ट करने वाली होती जा रही है. देश की बुनियाद में सही शिक्षा ही है और अगर इस में बेईमानी व लापरवाही की रेत मिला दी गई तो यह देश कभी मजबूत न बनेगा.

ये है हाई स्कूल डेटिंग, जहां बुजुर्गों के साथ ये सब करती हैं स्कूल की लड़कियां

आज लड़के लड़कियां एक दूसरे को खुलेआम डेट कर रहे हैं और दुनिया के कई देशों में ये आम बात भी है. इतना ही नहीं आज ‘हाई स्कूल डेटिंग’ तेजी से बढ़ती जा रही है. लेकिन अगर आप जापान का किस्सा सुनेंगे तो हैरान रह जाएंगे.

दरअसल, यहां ‘हाई स्कूल डेटिंग’ का काफी चलन है. इसमें स्कूल यूनिफॉर्म पहने लड़कियां ज्यादा उम्र के पुरुषों के साथ डेटिंग करती हैं. लड़कियां इस डेटिंग के एवज में अच्छी-खासी रकम लेती हैं. इस तरह की ज्यादातर डेटिंग्स में मामला साथ सोने पर जाकर खत्म होता है.

आपको बता दें कि ‘हाई स्कूल डेटिंग’ असल में ‘बाल वेश्यावृति’ का ही एक रूप है. जापान में इसे ‘JK’ या फिर ‘हाई स्कूल डेटिंग’ बिजनेस कहा जाता है. स्थानीय भाषा में JK का मतलब जोशी कोसेई होता है, जिसका अर्थ हाई स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियां है. इसे यहां काफी मुनाफे का बिजनेस माना जाता है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक हाई स्कूल कैफे में बैठे हुए एक अधेड़ उम्र शख्स ने बताया, ‘इन लड़कियों से बात करना आसान है. इन दिनों हमें साधारण बार अच्छे नहीं लगते. वहां बड़ी उम्र की महिलाओं के साथ मैं बोर हो गया था.’ स्कूल यूनिफॉर्म पहने हुए एक 17 साल की नाबालिग लड़की इस शख्स और उसके एक दोस्त के लिए बीयर और खाने-पीने की चीजें लेकर आई. इन दोनों लोगों ने माना कि छोटी उम्र की यूनिफॉर्म पहनी लड़कियां उन्हें ज्यादा लुभाती हैं. 40 की उम्र के एक दूसरे अधेड़ शख्स ने कहा, ‘ये लड़कियां बहुत प्यारी लगती हैं. स्कूल यूनिफॉर्म में ये असलियत से ज्यादा प्यारी लगती हैं.’

इस तरह की डेटिंग्स के लिए खास कैफे बने होते हैं. कई जगह तो बड़े दिलचस्प नियम भी हैं. मसलन, कैफे 10 बजे बंद हो जाने चाहिए ताकि वहां आने वाले पुरुष सही समय पर अपने घर अपनी पत्नियों के पास पहुंच सकें. हाई स्कूल डेटिंग भी कई तरह की होती है. कई कैफे में ऐसी व्यवस्था है कि कम उम्र की हाई स्कूल लड़कियां वन-वे शीशे के आगे स्कूल यूनिफॉर्म पहनकर बैठती हैं और अपने ‘ग्राहकों’ की मर्जी के मुताबिक पोज देती हैं. फिर ‘टूर गाइडिंग’ की भी व्यवस्था है. इसमें ग्राहक चाहे, तो लड़कियों को लेकर टहलने जा सकता है. इस तरह के मामले अक्सर सैक्स सर्विस देने पर खत्म होते हैं. ऐसी डेटिंग्स भी हैं, जहां ग्राहक सैक्स करने में ही दिलचस्पी लेते हैं और इसके एवज में पैसे देते हैं.

मुझे बीवी के साथ सेक्स करने में मजा नहीं आता. ऐसा क्यों है? इस बारे में बताएं.

सवाल
मैं 25 साल का हूं. मेरी शादी हो चुकी है और 2 बच्चे भी हैं. मुझे बीवी के साथ हमबिस्तरी करने में मजा नहीं आता. फोरप्ले करने में भी मजा नहीं आता. ऐसा क्यों है? मुझे हमबिस्तरी करने का मन क्यों नहीं करता है? इस बारे में बताएं?

जवाब
अगर आप का मन हमबिस्तरी करने के लिए नहीं करता, तो कोई बात नहीं. शराफत से बगैर हमबिस्तरी किए जिंदगी बिताते रहें. 2 बच्चे होने के बाद बीवी को भी इस की खास जरूरत नहीं होगी. लिहाजा, इस बारे में दिमाग न खपाएं. एक अरसे बाद अगर हमबिस्तरी की इच्छा हो, तो बीवी आप के पास है ही.

बाल काटने की अफवाह से खौफ में हैं लोग

राजस्थान में पिछले दिनों औरतों को ले कर एक नए तरह का खौफ समाज को जकड़े रहा. इस डर से घबराई औरतों ने तथाकथित तौर पर खुद ही अपने बाल काटने शुरू कर दिए, बाजुओं पर लहसुन की गांठें बांध लीं, घर के बाहर दरवाजे के दोनों ओर गोबर, सिंदूर और रोली के हाथ बनाए गए. हालात ये रहे कि गांव में अगर कोई भीख मांगने वाला भी आ जाता, तो कुहराम मच जाता. छोटे लैवल के साधुबाबाओं की तो जैसे शामत ही आ गई. भगवा धारण किए हर किसी शख्स को शक की निगाह से देखा जाने लगा. यहां तक कि उन को दान में अनाज, रोटी और पुराने कपड़े भी देने से परहेज किया गया. बच्चियों को स्कूल जाने से रोका जाने लगा.

खौफ इतना बढ़ गया कि शाम को औरतों का अकेले घर से बाहर निकलना मुश्किल हो गया. आदिवासी जिले बांसवाड़ा से शुरू हुई इस अफवाह ने देखते ही देखते अजमेर, चित्तौड़गढ़, सीकर, नागौर, चुरू, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर के बाद जयपुर समेत बड़े शहरों के साथ तकरीबन पूरे प्रदेश में अपनी जड़ें जमा लीं.

मानसिक तनाव का आलम यह रहा कि औरतें खुद अपने बाल काटने के बाद बेहोश हो जातीं और जब होश में आतीं, तब तक उन की याददाश्त से यह सब गायब हो जाता.

सोशल मीडिया के साथसाथ प्रिंट और इलैक्ट्रौनिक मीडिया ने इस अफवाह को बढ़ाने में आग में घी का काम किया. सोशल साइटों के तमाम जरीयों से लोग इस अफवाह के शिकार होते देखे गए. कई जगह पढ़ेलिखे लोग भी इस तरह की अफवाह को आगे बढ़ाते रहे.

आईटी ऐक्सपर्ट दिलीप सोनी कहते हैं कि इस तरह की तसवीरें फोटोशौप कर एकदूसरे को भेजी गईं, जिस की जानकारी आसानी से जुटाई जा सकती है. यहां तक कि अफवाह फैलाने वाले तक भी पहुंचा जा सकता है.

हालांकि, सरकार की तरफ से इन अफवाहों को काबू में करने के लिए अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं.

डाक्टर भी अंधविश्वासी

 औरतों के बाल काटने की अफवाह की शिकार एक औरत का इलाज कराने उस के परिवार वाले बाड़मेर के सरकारी अस्पताल पहुंचे, लेकिन अस्पताल में डाक्टर सुरेंद्र बाहरी ने अंधविश्वास की हदें ही पार कर दीं.

डाक्टर ने उस औरत को होश में लाने के लिए पहले अगरबत्ती से पूजा की. इस के बाद भी जब उसे होश नहीं आया, तो डाक्टर ने उसे थप्पड़ जड़ दिए. डाक्टर के इस इलाज का वीडियो वायरल हो गया.

जब इस मामले में डाक्टर से बात की गई, तो उन का कहना था कि महिला का इलाज करते समय उन का भी सिर भारी हो गया था.

दरअसल, बाड़मेर व दूसरे कई जिलों में बीते कई दिनों से औरतों के बाल काटने की शिकायतें पुलिस के पास पहुंच रही थीं.

अफवाह का आलम यह था कि बाड़मेर के एसपी गगनदीप सिंगला को सोशल मीडिया पर ऐसी अफवाहों पर ध्यान नहीं देने की अपील जारी करनी पड़ी थी.

वहीं बाड़मेर शहर के नजदीक महाबार गांव के लोगों का कहना था कि भारी बारिश के चलते गांव में बीते कई दिनों से बिजली नहीं थी. इस दौरान अंधेरे का फायदा उठा कर औरतों के बाल काटे जा रहे थे.

प्रशासन में भी डर

राजस्थान में बाल काटे जाने जैसी जादूटोने की अफवाहों से प्रदेश का प्रशासन भी डर का शिकार होता नजर आया. इसी बीच 5 जुलाई, 2017 से राजधानी जयपुर में सरकारी अफसरों को डायन प्रताड़ना निवारण और नियम के तहत खास ट्रेनिंग दी गई.

जयपुर जिले के कलक्टर सिद्धार्थ महाजन ने बताया कि यह खास ट्रेनिंग नई दिल्ली की पीएलडी संस्था द्वारा दी गई. इस में डायन प्रताड़ना निवारण 2015 और नियम 2016 के तहत जिलास्तरीय एकदिवसीय ट्रेनिंग कार्यक्रम रखा गया, जो जयपुर में कलक्ट्रेट सभागार में कराया गया.

ऐसे सामने आया सच

 औरतों की चोटी कटने की मारवाड़ से शुरू हुई अफवाह राजधानी जयपुर तक भी आ पहुंची. सांगानेर इलाके में 14 जुलाई, 2017 को ऐसी 3 घटनाएं सामने आईं, लेकिन हाथोंहाथ सच खुल भी गया. एक मामले में घटना वाली जगह पर लगे कैमरे से पता चला कि औरत पहले खुद ही चोटी काट कर फेंक गई, फिर आधा घंटे बाद लौट कर चोटी कटने का दिखावा किया और हंगामा करने लगी.

पुलिस का मानना है कि दूसरी घटनाओं में भी ऐसा ही हुआ होगा. पुलिस के मुताबिक, सांगानेर इलाके में पिछले दिनों एक रिसोर्ट में मजदूरी कर रही औरत ने यह कह कर हंगामा खड़ा कर दिया कि जानवर जैसे दिखने वाले किसी आदमी ने उस की चोटी काट दी. इस पर वहां भीड़ जुट गई. पुलिस ने सीसीटीवी कैमरे खंगाले, तो उस औरत का झूठ पकड़ा गया.

कैमरे में साफ नजर आ गया कि वह औरत पास में एक कमरे में गई थी. वहां 2 मिनट ठहरी, फिर तकरीबन 4 बजे निकली और खुद ही बाल गिरा कर चल दी. इस के बाद तकरीबन साढ़े 4 बजे लौटी और उस जगह पहुंचते ही गिरने का नाटक करने लगी और हाथ में लाई पानी की बालटी फेंक दी.

इस मामले में पुलिस अब उस औरत के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करेगी. साथ ही, ऐसी दूसरी घटनाओं की तह तक जाएगी और अफवाह साबित कर सच जनता के सामने रखेगी.

उधर, जयपुर के ही शिकारपुरा रोड पर जोतड़ावाला में बाबाजी की ढाणी में भी एक औरत ने अपनी चोटी कटने की शिकायत की.

उस औरत का कहना था कि वह बाड़े में मवेशियों को चारा डाल रही थी, तभी किसी ने उस की चोटी काट दी. हालांकि घर में किसी बाहरी आदमी के घुसने की तसदीक नहीं हुई.

त्रिशूल का निशान

 14 जुलाई, 2017 को बीकानेर की 4 औरतों ने बाल कटने का दावा किया. इन में से 2 औरतों ने शरीर पर त्रिशूल बनाने की भी बात कही. उन औरतों को सरकारी अस्पताल में भरती कराया गया. जांच में खुलासा हुआ कि उन्होंने खुद नाखूनों से पेट पर त्रिशूल का निशान बनाया था. दोनों की जांच रिपोर्ट भी सामान्य आई थी.

बीकानेर में देव गैस गोदाम के पास रहने वाली एक औरत नर्बदा देवी अपने परिवार वालों के साथ सुबह 6 बजे सरकारी अस्पताल पहुंची और बाल काटने, पेट पर त्रिशूल बनाए जाने और इस के बाद बेहोशी आने की शिकायत की. डाक्टरों की जांच में उस की भी रिपोर्ट सामान्य आई.

बातचीत में सामने आया कि उस औरत ने खुद ही नाखूनों से पेट पर त्रिशूल का निशान बना लिया था.

क्या है सच

 निवाई कसबे में ऐसी 6 औरतों से बात की गई, जिन का दावा था कि किसी अनदेखी ताकत ने उन के बाल काट लिए.

खातोलाई के जोगियों के महल्ला की रहने वाली सुमन योगी के साथ 12 जुलाई, 2017 को एक घटना घटी थी. परिवार वाले अब झाड़फूंक से उस का इलाज करवा रहे हैं.

जब इस घटना के बारे में उस से पूछा गया, तो सुमन ने रुकरुक कर पूरी बात बताई, जैसे याद करने में उसे दिक्कत आ रही हो.

जब उस से यह सवाल पूछा गया कि कहीं बाल खुद तो नहीं काट लिए, तो जवाब में वह गुस्से में एक सांस में कह गई कि अपने बाल कोई खुद भी काट सकता है क्या?

भाबरू इलाके की हंसा, बियावास की रेखा और मंजू के बाल कट गए हैं, लेकिन कैसे कटे और किस ने काटे, यह बात वे नहीं बता सकीं. सभी का यही कहना था कि घटना के समय वे बेहोश हो गई थीं.

कोटपुतली में 13 जुलाई, 2017 को 2 ऐसी औरतों को बीडीएम अस्पताल में भरती कराया गया था, जिन का दावा था कि किसी ने उन के बाल काट लिए.

बेरी की एक विवाहिता व कांसली की एक 17 साला लड़की के बाल कटने पर उन्हें बीडीएम अस्पताल में भरती कराया गया था. उन के परिवार वालों का कहना था कि दोनों केसों में किसी अनदेखी ताकत ने उन के बाल काट लिए.

जांच करने वाले डाक्टरों का कहना था कि अगर ये औरतें सच बोल रही होतीं, तो घटना के बाद सदमे की वजह से ब्लड प्रैशर असामान्य रूप से बढ़ जाता, लेकिन दोनों ही जिस्मानी रूप से पूरी तरह सेहतमंद थीं. जांच के बाद इन्हें छुट्टी दे दी गई.

चौमू के गोविंदगढ़ में 9 जुलाई, 2017 को बाल काटने की 3 घटनाएं सामने आई थीं. अब पुलिस ने इन तीनों में खुलासा किया है कि वे शिकायतें झूठी निकली थीं.

गोविंदगढ़ के डीएसपी महावीर चोटिया ने बताया था कि तीनों ही मामलों में मुराद पूरी होने के लिए बाल काटे गए. बाद में अफवाह का सहारा लेते हुए झूठी कहानी बना दी गई.

सोशल मीडिया पर भेजे जा रहे तांत्रिकों के फोटो का सच जानने के लिए आईटी ऐक्सपर्ट आरके लदाना से राय लेते हुए फोटो दिखाया गया, तो उन्होंने उन फोटो को इंटरनैट से लिया गया बताया और कहा कि इन्हें फोटोशौप में ऐडिट किया गया है.

मन का वहम

करौली के जिला सीजेएम रामपाल जाट ने इस तरह की घटनाओं के बारे में सोशल मीडिया पर खास संदेश जारी किया, ताकि इस तरह की अफवाहों से आम जनता भी अपना बचाव कर सके.

रामपाल जाट का कहना है कि यह सब मन का वहम है. इस को इतना तूल मत दो. हां, बाल भी कट सकते हैं. ऐसे दौरे भी पड़ सकते हैं. पर कोई दूसरा आ कर ऐसा कर के चला जाए, वह भी कोई अनदेखी ताकत, ऐसा मुमकिन नहीं है.

अगर इस बारे में गंभीरता से सोचा जाएगा, तो कई राज सामने आएंगे. अगर कोई अनदेखी ताकत या तांत्रिक ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहा है, तो वह पूरे गांव के एक या 2 घरों में ही ऐसा क्यों करेगा, बल्कि वह तो पूरे गांव की हर औरत के बाल एक ही रात में काट सकता है, क्योंकि उस के पास तो ताकत है.

हिस्टीरिया है वजह

 चाकसू सैटेलाइट अस्पताल के सीनियर डाक्टर सतीश कुमार सेहरा बताते हैं कि किसी पढ़ेलिखे परिवार के साथ अभी तक ऐसी घटनाएं नहीं हुईं. ये घटनाएं उन्हीं औरतों के साथ हुई हैं, जिन को हिस्टीरिया जैसे दौरे पड़ते हैं या वे किसी मानसिक तनाव से पीडि़त हैं या साधुबाबाओं के चक्कर में रहती हैं या फिर वे मानसिक रूप से बीमार हैं.

जिन के भी साथ ऐसा हादसा हुआ है, उन को किसी न किसी तरह का तनाव जरूर है. कभीकभी रात को सोते हुए अपने खुद के सीने पर हाथ आ जाता है और हम बड़बड़ाने लगते हैं. कभीकभी हम खुद भी ऐसा महसूस करते हैं, जैसे हमारे ऊपर कोई बैठ गया है. एकदम से दम घुटने लगता है और हम बेचैन हो जाते हैं.

सौ में से एक इनसान ऐसा होता है, जिस को नींद में चलने की बीमारी होती है. वह गहरी नींद में उठ जाता है और दिन में कुछ सोच रखा होता है, वही काम करने की फिराक में बाहर निकल जाता है. ऐसे में कोई ठोकर लगने पर वह जाग जाता है और वापस आ कर सो जाता है.

जागरण या नवरात्र के प्रोग्राम आप ने देखे होंगे. उन में जब कालिका का भजन या गाना आता है, तो वहां बैठी 20 से 40 औरतें एकसाथ जोरजोर की आवाजें निकालती हैं. इसे ‘मास हिस्टीरिया’ कहते हैं. यह एक तरह की बीमारी है और यह अफवाहों से भी फैलती है. दिमागी बीमार आदमी के ऊपर इस का सौ फीसदी असर पड़ता है.

जहर देने वाला गिरोह

 यह खबर सब से पहले नागौर जिले से मिली थी और आग की तरह पूरे राजस्थान में फैल गई. खबर यों फैली कि एक औरत हवा में आती है और लोगों के बाल काटती है. इस के बाद बिल्ली, मक्खी, चूहा कुछ भी बन कर हवा में ही गायब हो जाता है. लेकिन यह महज एक कोरा अंधविश्वास है.

सोशल मीडिया पर इस की काफी चर्चा हो रही है और कई फोटो भी सामने आए हैं. लोगों में फैले डर को देख कर जब पुलिस ने कार्यवाही की, तब पता चला कि यह कुछ लोगों का गिरोह है, जो लोगों को रात में अकेला देख कर उन के बाल काटता है और उन को ऐसी जहरीली चीज सुंघाता है, जिस से वे बेहोशी की हालत में आ जाते हैं और धीरेधीरे नशीली चीज के असर से 2-3 दिन में मर जाते हैं.

यह जानकारी पुलिस को उस गिरोह के पकड़े गए 2 लोगों ने बताई. गिरफ्त में आए उन लोगों ने पुलिस को बताया कि वे यह सब लोगों में डर फैलाने के लिए कर रहे हैं और लोगों के बाल तो सिर्फ उन को डराने के लिए काटते हैं, बाकी सारा काम वह जहरीली चीज करती है.

सच नहीं, कोरी अफवाह

बाल कटने की बढ़ती अफवाह के मद्देनजर एडीजी (ला एंड और्डर) एनआर रेड्डी ने आदेश जारी किया. इस में कहा गया कि अफवाह की सूचना पर एसपी या एडिशनल एसपी मौके पर जाएं और सच का पता लगा कर लोगों को समझाएं.

राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष सुमन शर्मा का भी यही कहना है कि कोई गिरोह अफवाह फैला कर अंधविश्वास को बढ़ावा देना चाह रहा है. हम इस के खिलाफ कड़ी कार्यवाही कर रहे हैं.

जानिए आखिर क्या है अथिया शेट्टी की ख्वाहिश

साल 2015 में आई फिल्म ‘हीरो’ से अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत करने वाली अथिया शेट्टी बौलीवुड के हीरो सुनील शेट्टी की बेटी हैं. फिल्मी माहौल में पलीबढ़ी अथिया शेट्टी को बचपन से ही ऐक्टिंग का शौक था. आईने के आगे दुपट्टा ले कर, आंखों में काजल लगा कर वे करीना कपूर की तरह डांस करती थीं. वे स्पोर्ट्स पर्सन भी हैं. वे फुटबाल, बास्केटबाल, बैडमिंटन जैसे कई खेल खेलती हैं. वे अपने पिता की ऐक्शन फिल्मों से बहुत ज्यादा प्रभावित हैं.

पेश हैं, स्वभाव से नम्र और हंसमुख अथिया शेट्टी से हुई बातचीत के खास अंश:

दूसरी फिल्म में इतनी देरी क्यों हुई? इस में क्या ऐक्साइटमैंट लगा?

मेरे हिसाब से पहली फिल्म आप को चुनती है, लेकिन दूसरी फिल्म आप खुद चुनते हैं और फिर सफर की शुरुआत होती है. मेरे लिए सब से ज्यादा जरूरी था कि एक अच्छी फिल्म के लिए सब्र रखना.

इस दौरान मुझे काफी स्क्रिप्ट मिल रही थीं, पर मुझे उन में कुछ ऐक्साइटमैंट वाली बात नजर नहीं आ रही थी. मुझे एक अच्छी स्क्रिप्ट, एक अच्छा डायरैक्टर और एक अच्छा बैनर चाहिए था. मैं खुश हूं कि वह सब मुझे फिल्म ‘मुबारकां’ में मिला. इस फिल्म में मैं अपना किरदार और फिल्मी नाम बिंकल सुन कर खुश हो गई थी.

परिवार की जिम्मेदारियों को आप कैसे शेयर करती हैं?

जिम्मेदारियां मैच्योरिटी के साथ आती हैं और आप समझने लगते हो कि आप को आप के परिवार ने क्या दिया है. मैं ऐसे बहुत से बच्चों को देखती हूं, जो बात को समझने की कोशिश ही नहीं करते हैं. पर मुझे याद है कि मैं ने अपने बचपन का बहुत सारा समय अपने दादादादी के साथ बिताया है. उन्हें खुश रखूं, यही मेरी इच्छा है.

पिता की साख को कैसे बनाए रखती हैं?

मैं हमेशा उसे बनाए रखने की कोशिश करती हूं, क्योंकि आप का स्वभाव आप के चेहरे, आंखों और पूरी शख्सीयत पर होता है, जो परदे पर दिखाई पड़ता है. अच्छी सोच रखने वाला इनसान ही अच्छा काम कर सकता है. आप जितने भी कामयाब हो जाएं, लेकिन अगर आप सिंपल नहीं हैं, तो वह कामयाबी आप के पास नहीं रह सकती.

अपनी पहली कमाई आप ने किसे दी थी या उस से क्या खरीदा था?

मुझे याद आता है, जब मुझे पहला चैक मिला था, तो मैं ने वह अपने दादाजी को दिया था, क्योंकि बचपन से मैं ने उन की आधुनिक सोच को देखा था. उन्हें हर ऐसी लड़की पसंद है, जो अपने पैरों पर खड़ी है या उस का अपना एक वजूद है. शादी करो या मत करो, लेकिन अपने पैरों पर खड़े रहो. उन के नहीं रहने के बाद मुझे भी महसूस होता है कि वे मुझ से खुश हैं, क्योंकि मैं एक फिल्म के सैट पर हूं. मैं जब घर पर होती थी, तो वे पूछा करते थे कि मैं काम क्यों नहीं कर रही हूं.

फिल्मों में प्यार जताने वाले सीन करने में आप कितना सहज महसूस करती हैं?

अभी तक तो मैं ने कोई ऐसा सीन नहीं किया है, क्योंकि फिल्म ‘हीरो’ में ऐसे सीन नहीं थे. मैं ऐसे सीन नहीं करूंगी, ऐसा तो नहीं कह सकती, लेकिन अगर मैं सहज नहीं रहूंगी, तो शूट नहीं करूंगी. आगे क्या करूंगी, यह तो स्क्रिप्ट और किरदार पर निर्भर करता है.

आप का ड्रीम प्रोजैक्ट क्या है?

मुझे एक ऐक्शन फिल्म करनी है. मुझे लगता है कि मैं अपने पापा को ऐक्शन फिल्म कर के एक तरह की चुनौती दे सकती हूं.

आप की दादी और मां बहुत फैशनेबल हैं. आप ने उन से क्या कुछ सीखा है?

लोग मुझे ‘फैशनिस्ता’ कहते हैं, पर मैं बहुत ही सिंपल हूं. मैं ज्यादातर इंडियन पोशाकें पहनती हूं और अपनी मां की पोशाकों से काफी प्रभावित हूं. स्टाइल तो आताजाता रहता है, पर जरूरी होता है कि कपड़ों को ठीक तरह से पहना जाए.

सवालों के घेरे में मोटिव, मर्डर, वेपन और चश्मदीद

19 मार्च, 2017 की सुबह एक औटोचालक गुरुद्वारा के सामने खड़ी पीसीआर वैन के पास पहुंचा तो काफी बदहवास था. औटोचालक औटो चलाता हुआ आया था, जिस से उस के चेहरे पर हवा भी लगी होगी, पर उस हाल में भी उस के माथे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा रही थीं.

औटो से लगभग कूदता हुआ वह पीसीआर वैन के पास पहुंचा और वैन में बैठे सिपाहियों से बोला, ‘‘साहब, उधर एक कोठी में 2 औरतें एक बीएमडब्ल्यू कार में बड़े साइज का सूटकेस रख रही थीं. सूटकेस भारी था, इसलिए उन्होंने मेरा औटो रुकवा कर मुझ से मदद मांगी.’’

‘‘तो क्या हुआ?’’ वैन में बैठे एक सिपाही ने पूछा.

‘‘मैं सूटकेस गाड़ी में रखवाने लगा तो देखा उस में से खून रिस रहा था. जब मैं ने उन से खून के बारे में पूछा तो एक औरत ने अपना खून सना हाथ दिखाते हुए कहा कि सूटकेस नीचे उतारते वक्त उस के हाथ में चोट लग गई थी, यह उसी का खून है.’’

‘‘वहां हुआ क्या है, तुम यह क्यों नहीं बताते?’’ सिपाही ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘मुझे लग रहा है कि किसी की हत्या कर के वे औरतें लाश को उस सूटकेस में रख कर कहीं फेंकने ले जा रही हैं. आप लोग वहां जल्दी पहुंचें वरना वे लाश ले कर निकल जाएंगी.’’ औटोचालक ने कहा.

जैसे ही औटोचालक ने लाश की बात कही, पीसीआर में बैठे सिपाहियों ने औटोचालक को गाड़ी में बिठाया और उसे ले कर मोहाली के फेज-3 बी-1 की कोठी नंबर 116 के सामने पहुंच गए. कोठी के सामने सिल्वर कलर की बीएमडब्ल्यू कार खड़ी थी, जिस का नंबर था सीएच04एफ 0027 था. उस समय वहां कार के अलावा कोई नहीं था. कोई औरत भी वहां नजर नहीं आई.

औटोचालक के कहने पर पीसीआर वैन से आए सिपाहियों ने बीएमडब्ल्यू का पिछला दरवाजा खोला तो उस में गहरे रंग का एक बड़ा सूटकेस रखा था, जिस से खून रिस कर बाहर आ रहा था.

पीसीआर वैन के इंचार्ज ने तुरंत इस बात की सूचना संबंधित थाना मटौर को दे दी. थोड़ी ही देर में थाना मटौर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर बलजिंदर सिंह पन्नू पुलिस टीम के साथ वहां आ पहुंचे.

पुलिस को देख भीड़ जुटने लगी. उस भीड़ में से एक आदमी ने आगे आ कर अपना नाम दर्शन सिंह ढिल्लो बताते हुए कहा, ‘‘सर, अभीअभी मुझे किसी ने बताया है कि मेरे बड़े भाई एकम सिंह किसी हादसे का शिकार हो गए हैं. प्लीज, बताइए न मेरे भाई को क्या हुआ है?’’

बलजिंदर सिंह पन्नू अभी कुछ देर पहले ही वहां आए थे. वहां की स्थिति देख कर उन्होंने कोई काररवाई करने से पहले अपने अधिकारियों को सूचित करना उचित समझा. अधिकारियों को सूचना दे कर वह उन के आने का इंतजार कर रहे थे. इसलिए दर्शन को वह कुछ नहीं बता सके.

थोड़ी देर में डीएसपी (सिटी-1) आलम विजय सिंह के अलावा कुछ अन्य पुलिस अधिकारी भी वहां आ पहुंचे. इंसपेक्टर अतुल सोनी के नेतृत्व में क्राइम ब्रांच की विशेष टीम भी आ गई थी. डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीमों को भी बुला लिया गया था.

पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में मौके का नक्शा बना कर बीएमडब्ल्यू कार से सूटकेस निकलवा कर खोला गया तो उस में एक लंबेतगड़े आदमी की लाश निकली, जिसे इस तरह तोड़मोड़ कर ठूंसा गया था कि उस के घुटने उस की ठुड्डी को छू रहे थे. उसे देखते ही दर्शन सिंह ढिल्लो ने कहा कि यह लाश उस के बड़े भाई एकम सिंह ढिल्लो की है. उस ने बताया कि उस के भाई का कद सवा 6 फुट से ज्यादा लंबा और उन का वजन 90-95 किलोग्राम था. चौंकाने वाली बात यह थी कि जिस सूटकेस में लाश ठूंसी गई थी, उस का आकार 2 बाई ढाई फुट था.

पुलिस लाश का निरीक्षण कर रही थी कि मृतक एकम सिंह के पिता जसपाल सिंह भी आ गए. शायद उन्हें दर्शन ने फोन कर के बुला लिया था.

 

लाश का पंचनामा तैयार कर उसे कब्जे में लेने के बाद पुलिस ने वहां मौजूद कुछ लोगों के बयान लेने के साथ दर्शन सिंह ढिल्लो और उस के पिता जसपाल सिंह से भी काफी विस्तार से पूछताछ की. ये बापबेटे मोहाली के फेज-6 में रहते थे. दोनों से हुई बातचीत में मृतक के बारे में जो पता चला, वह इस तरह से था.

सरदार जसपाल सिंह अपना कारोबार तो करते ही थे, साथसाथ पंजाब के जानेमाने मानवाधिकार कार्यकर्ता भी थे. दरअसल, खालिस्तान मूवमेंट के फाउंडर संत जरनैल सिंह भिंडरावाला से उन की अच्छी जानपहचान थी. उन के प्रति वह काफी हमदर्दी भी रखते थे. औपरेशन ब्लूस्टार के बाद जसपाल सिंह पूरी तरह ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट बन गए थे. 1990 में कुछ हार्डलाइनर्स सिखों से संबंध रखने के आरोप में वह पंजाब पुलिस द्वारा गिरफ्तार भी किए गए थे. समाज में उन का अच्छाखासा रुतबा था.

जसपाल सिंह ने 3 शादियां की थीं. इन दिनों वह अपनी तीसरी पत्नी और छोटे बेटे दर्शन सिंह के साथ रह रहे थे. दर्शन सिंह ढिल्लो की शादी कुछ दिनों पहले ही हुई थी, लेकिन जल्दी ही उस का पत्नी से तलाक हो गया था. बडे़ बेटे एकम सिंह ने सन 2005 में सीरत कौर से प्रेम विवाह किया था, जिस से उसे 2 बच्चे बेटा गुरनवाज सिंह और बेटी हुमायरा कौर हुई थी.

शादी के 6 महीने बाद ही 40 वर्षीय एकम सिंह पत्नी को ले कर अपने परिवार से अलग हो गया था. कुछ समय तक उस ने असम में नौकरी की. उस के बाद वहां से लौट कर वह चंडीगढ़ के एक बड़े होटल में काम करने लगा था. कुछ दिनों बाद उस ने यह नौकरी भी छोड़ दी थी. इस समय वह स्टोन क्रैशर व कंस्ट्रक्शन का कारोबार कर रहा था. मोहाली के कस्बा नयागांव में उस का अच्छा काम चल रहा था.

इस समय उस का बेटा 11 साल का था तो बेटी 6 साल की. दोनों चंडीगढ़ के प्रतिष्ठित स्कूलों में पढ़ रहे थे.

एकम की अपने छोटे भाई और पिता से बोलचाल नहीं थी. फिर भी उन्हें कहीं न कहीं से एकम के बारे में जानकारी मिलती रहती थी. बेटा बातचीत नहीं करना चाहता था तो वे क्या कर सकते थे. फिर भी जसपाल सिंह को यह जान कर खुशी थी कि एकम तरक्की कर रहा है. उन का सोचना था कि एकम अपने परिवार के साथ बहुत खुश है.

लेकिन लंबे अरसे बाद 8 मार्च की रात एकम सिंह अचानक पिता के पास जा पहुंचा. उस समय वह काफी दुखी और परेशान था. रोते हुए उस ने पिता को बताया था कि वह अपनी जिंदगी से काफी परेशान है. उस की पत्नी और सास उसे परेशान कर रही हैं. उस ने यह भी बताया था कि कल उस के साथ बड़ा धोखा हो सकता है. इस के अलावा भी उस ने कई और चौंकाने वाली बातें बताई थीं.

जसपाल सिंह ने उसे आश्वस्त किया था कि वह जल्दी ही उस के घर आ कर इस मामले में उस की पत्नी और सास से बात कर के उस की समस्या का हल निकालने की कोशिश करेंगे. इस के बाद उन्होंने एकम से खाना खा कर जाने को कहा, लेकिन वह भूख न होने की बात कह कर चला गया था.

अगले दिन सवेरे ही दर्शन सिंह ढिल्लो को उस के किसी दोस्त ने फोन कर के एकम के साथ कोई हादसा होने की बात बताई थी. फोन सुनते ही वह उस के घर की ओर चल पड़ा था. एकम पहले चंडीगढ़ के सैक्टर-35 में किराए के मकान में रहता था, जहां वह 80 हजार रुपए महीना किराया देता था. करीब 20 दिनों पहले ही वह मोहाली में एक कनाल की इस कोठी की पहली मंजिल किराए पर ले कर बीवीबच्चों के साथ रहने आया था.

भाई के घर आने पर दर्शन सिंह को भाई के कत्ल के बारे में पता चला था तो उस ने फोन कर के पिता को भी बुला लिया था.

पुलिस ने लाश को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए मोहाली के सिविल अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम का काम निपटाया गया. पुलिस ने दर्शन सिंह ढिल्लो की तहरीर पर भादंवि की धाराओं 302, 201 व 34 के तहत थाना मटौर में मुकदमा दर्ज कर के आगे की काररवाई शुरू कर दी.

चूंकि मृतक के सिर में गोली लगने का घाव साफ दिखाई दे रहा था, इसलिए पहली ही नजर में यह मामला गोली मार कर हत्या करने का लग रहा था. इसलिए मुकदमे में शस्त्र अधिनियम की धाराओं 25/54 एवं 59 का भी समावेश किया गया था.

दर्शन सिंह ने अपनी तहरीर में जिन लोगों को नामजद किया था, उस में सीरत कौर ढिल्लो, विनय सिंह बराड़ और जसविंदर कौर बराड़ थीं. इन में विनय एकम सिंह का साला था तो जसविंदर कौर सास. इन तीनों को मुख्यरूप से आरोपी बनाने के अलावा शिकायत में यह भी आशंका व्यक्त की गई थी कि वारदात के समय इन के साथ कुछ और लोग भी रहे होंगे.

इस की वजह मजबूत कदकाठी के लंबेतगड़े आदमी के साथ मारपीट करने और गोली मार कर हत्या करने के बाद उस की लाश को सूटकेस में ठूंस कर भरने का काम 2 महिलाएं और एक आदमी के वश की बात नहीं थी. फिर महिलाओं में भी एक औरत दुबलीपतली और बूढ़ी थी.

मौके पर ही दर्शन सिंह ढिल्लो एक बात चीखचीख कर कह रहा था कि सीरत कौर पंजाब के एक बड़े कांग्रेसी नेता की सगी भांजी है, इसलिए पुलिस इस मामले को कतई गंभीरता से नहीं लेगी.

नामजद अभियुक्त फरार हो चुके थे. उन की तलाश में पुलिस ने भागदौड़ शुरू की. पुलिस को इस मामले में कोई सफलता मिलती, उस के पहले ही उसी दिन शाम को एक आदमी बड़ी सी गाड़ी में आया और नामजद मुख्य अभियुक्ता सीरत कौर को थाना मटौर में छोड़ गया. सीरत ने थानाप्रभारी के सामने जा कर आत्मसमर्पण कर दिया. पुलिस ने उसे हिरासत में ले कर औपचारिक पूछताछ शुरू की.

इस पूछताछ में पता चला कि सीरत की दोस्ती अपने भाई विनय प्रताप सिंह बराड़ के एक दोस्त से थी. इसी दोस्ती की वजह से उस ने भाई और उस के उस दोस्त के साथ मिल कर अपने पति को मौत के घाट उतार दिया था. इस बात की जानकारी उस की मां जसविंदर कौर को भी थी. सीरत के दोस्त ने एकम सिंह पर 2 गोलियां चलाई थीं. उन में से एक उस की खोपड़ी में लगी थी और दूसरी पिस्टल में ही फंस कर रह गई थी.

एकम को खत्म करने की योजना बना कर सभी शनिवार की रात घर आ गए थे. देर रात एकम घर आया तो पहले उस से मारपीट की गई. उस के बाद उसे जबरदस्ती बाथरूम में ले जाया गया और गोली मार दी गई. जब वह मर गया तो वहां पड़े खून के धब्बों को साफ कर के एकम की लाश को ठिकाने लगाने के लिए सूटकेस में ठूंस दिया गया.

सुबह सीरत अकेली सूटकेस को खींचती हुई नीचे ले आई. सूटकेस उतारते समय सीढि़यों में जहांतहां भी खून टपका, उस ने उसे साफ कर दिया. इस से पहले वह नीचे जा कर गाड़ी का गेट खोल कर इस बात का अंदाजा लगा आई थी कि सूटकेस को कहां रखना चाहिए.

इसी चक्कर में गाड़ी की चाबी डिक्की में गिर गई थी और इस बात से बेखबर सीरत ने डिक्की बंद कर दी थी. कार के दरवाजे खुले ही थे. सूटकेस नीचे ला कर जब वह सूटकेस गाड़ी में नहीं रख पाई तो वहां सवारी छोड़ने आए औटोचालक को रोक कर उस से मदद मांगी. सूटकेस रखवा कर वह चला तो गया, लेकिन सीरत को उस की बातों से लगा कि उसे उस पर शक हो गया है.

थोड़ी ही देर में सीरत कौर को पुलिस वैन आती दिखाई दी तो वह वहां से भाग गई. उस के बताए अनुसार, उस के साथ कोई अन्य औरत नहीं थी. औटोचालक ने पता नहीं क्यों झूठ बोला था.

पुलिस की तो जैसे लौटरी निकल आई थी. जरा सी देर में बिना खास प्रयास के एक हाईप्रोफाइल मर्डर केस का खुलासा हो गया था. सीरत ने आत्मसमर्पण कर दिया था. अब अन्य अभियुक्तों को भी आसानी से पकड़ा जा सकता था.

परंतु रात में ही पुलिस की आशा निराशा में बदल गई. सीरत की गिरफ्तारी की सूचना पा कर रात में जब पुलिस के बड़े अधिकारी उस से पूछताछ करने थाने पहुंचे तो वह पिछले बयानों से मुकर गई. अब वह कहने लगी थी कि पति के अत्याचारों से तंग आ कर उस ने अकेले ही उस की हत्या की थी. एकम उस के चरित्र पर शक करते हुए उस से मारपीट करता था. पिछली रात भी वह शराब पी कर आया और उस से मारपीट करते हुए उस ने उस पर अपना रिवौल्वर तान दिया. मौका पा कर रिवौल्वर छीन कर उस ने उसी पर गोली चला दी.

रिवौल्वर के बारे में उस ने बताया कि वह घर की अलमारी में पड़ी है. लेकिन इस कांड में उस के साथ कोई और नहीं था. उस ने अकेले अपनी सुरक्षा को ध्यान में रख कर यह कत्ल किया है और वह अपना अपराध स्वीकार कर रही है.

हद तो तब हो गई, जब सीरत का कस्टडी रिमांड हासिल करने के लिए उसे सुबह अदालत में पेश किया गया. वहां माननीय जज से उस ने सीधे कहा कि एकम ने अपने लाइसैंसी रिवौल्वर से आत्महत्या की थी. डर जाने की वजह से वह उस की लाश को ठिकाने लगाने की भूल कर बैठी. अब पुलिस उसे एकम के कत्ल के झूठे केस में फंसा रही है.

माननीय जज ने सीरत को 2 दिनों के कस्टडी रिमांड में रखने का आदेश देते हुए पुलिस से कहा था कि मामला हाईप्रोफाइल है, जांच में कहीं कोई कमी नहीं होनी चाहिए. उसी दिन मोहाली के फेज-6 स्थित सिविल अस्पताल के 3 डाक्टरों मनहर सिंह, हिम्मत मोहन सिंह और कुलदीप सिंह ने एकम के शव का पोस्टमार्टम किया. पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी और स्टिल फोटोग्राफी भी कराई गई. अपनी रिपोर्ट में डाक्टरों ने लिखा कि गोली एकम के सिर में कान के पास से होते हुए दिमाग को चीर कर दूसरी तरफ निकल गई थी. लेकिन रिपोर्ट में एकम के जिस्म पर किसी चोट का कोई उल्लेख नहीं था. मृतक का विसरा ले कर रासायनिक परीक्षण के लिए खरड़ स्थित फोरैंसिक लैब में भिजवा दिया गया था.

एकम के भाई और पिता को पहले से ही मोहाली पुलिस पर भरोसा नहीं था. उन का आरोप था कि एसपी पंधेर आरोपियों को बचा रहे हैं. इस बात की शिकायत करने के लिए वे 20 मार्च को पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से मिले.

मुख्यमंत्री के आदेश पर एसपी पंधेर को इस केस से अलग कर मोहाली के युवा एसएसपी कुलदीप सिंह चाहल की अगुवाई में स्पैशल इनवैस्टीगेटिव टीम (एसआईटी) का गठन कर दिया गया, साथ ही यह आदेश भी पारित किया गया कि इस केस की छानबीन के संबंध में एसएसपी अपनी रिपोर्ट तैयार कर रोजाना मुख्यमंत्री को भेजा करेंगे. ऐसा ही किया भी जाने लगा था, लेकिन पूछताछ में समस्या यह आ रही थी कि जब सीरत से पूछताछ की जाने लगी तो वह कभी अपने कपड़े फाड़ने लगती तो कभी चीखचीख कर थाना सिर पर उठा लेती. वह अपने बच्चों से मिलवाने की जिद भी कर रही थी.

उस की हरकतों से परेशान हो कर पुलिस वाले थाने से बाहर निकल कर अधिकारियों को फोन करने लगते थे. सीरत के इसी नाटक में 2 दिन का कस्टडी रिमांड खत्म हो गया. अब उस का लाई डिटेक्टर टेस्ट करवाने की कवायद शुरू की गई. उस की रिमांड अवधि भी 6 दिनों की करवा ली गई. लेकिन सीरत ने लाई डिटेक्टर टेस्ट करवाने से मना कर दिया. इस बीच सीसीटीवी कैमरे की एक ऐसी फुटेज पुलिस के हाथ लग गई, जिस में सीरत अकेली सीढि़यों से सूटकेस घसीटते हुए नीचे ला रही थी और बारबार खून के धब्बे साफ कर रही थी.

इस से लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि वाकई उस ने अकेले ही इस हत्याकांड को अंजाम दिया हो और अब जानबूझ कर अन्य लोगों को फंसाने का प्रयास कर रही हो. जबकि उस की अपने भाई से पिछले लंबे अरसे से बोलचाल नहीं थी.

6 दिनों का कस्टडी रिमांड भी निकल गया. लेकिन पुलिस सीरत से जरूरी पूछताछ नहीं कर सकी. 27 मार्च को उसे अदालत में पेश कर के रिमांड अवधि बढ़ाने की मांग की गई तो सक्षम जज ने मना करते हुए सीरत को न्यायिक हिरासत में नाभा की हाई सिक्योरिटी जेल भेज दिया. अब पुलिस बिना अदालत की अनुमति के उस से एक भी सवाल नहीं पूछ सकती थी. जबकि एकम परिवार के सदस्य न्याय की खातिर बारबार पुलिस के बड़े अधिकारियों से गुहार लगा रहे थे.

3 अप्रैल, 2017 को सीरत के भाई विनय प्रताप सिंह बराड़ उर्फ विन्नी ने एसएसपी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की गई, जिस में वह बेकसूर पाया गया. उसे रिहा करने के अलावा पुलिस के पास कोई उपाय नहीं था.

इसी तरह 10 अप्रैल को सीरत की मां जसविंदर कौर ने भी अपने वकील के साथ एसएसपी कुलदीप सिंह चाहल के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. उस से भी पुलिस ने पूछताछ की. वह भी पूछताछ में बेकसूर पाई गई तो उसे भी छोड़ दिया गया.

यह एक निहायत उलझा हुआ हाईप्रोफाइल केस था. सीरत के पिता का तभी देहांत हो गया था, जब वह काफी छोटी थी. उस का लालनपालन उस के मामा अजीत सिंह मोफर ने किया था, जो बाद में पंजाब की सरदूलगढ़ सीट से कांग्रेसी विधायक चुने गए थे. सीरत की मरजी के अनुसार एकम से शादी करवाने में भी उस के इस मामा ने अपना पूरा सहयोग दिया था. सीरत की अपने भाई से नहीं बनती थी. वह उस की शादी में भी शामिल नहीं हुआ था.

कहते हैं कि सीरत आधुनिक विचारों की खुले हाथों खर्च करने वाली औरत थी. सन 2011 में जिन दिनों एकम पंजाब एग्रो विभाग में मैनेजर के पद पर कार्यरत था, वहां करोड़ों रुपए का घोटाला हुआ था. इस बारे में आपराधिक केस भी दर्ज हुआ था, जिस में कुछ अन्य लोगों के अलावा एकम और सीरत भी आरोपी थे.

यह केस अभी भी मोहाली की एक अदालत में चल रहा है. एकम हत्याकांड में तभी कुछ सामने आ सकेगा, जब कड़ी से कड़ी जोड़ कर व्यापक छानबीन की जाएगी. पुलिस भी खुल कर सामने नहीं आ रही है. केस को ले कर उस के पास शायद कुछ ऐसे पत्ते हैं, जिन्हें वह अभी खोलना नहीं चाहती. वक्त आने पर ही शायद खोल कर केस को मजबूत करे.

अभी तक तो मर्डर का न मोटिव सामने आया है, न मर्डर वेपन ही विश्वसनीय लग रहा है और न ही इस कांड का कोई चश्मदीद गवाह है. फिलहाल औटोचालक का रोल भी परदे के पीछे कर दिया गया है.

एकम के उस रात शराब न पीने की पुष्टि हो चुकी है. कहा जाता है कि वह एक महीने पहले ही शराब पीना छोड़ चुका था. उस का लाइसैंसी रिवौल्वर भी तब से थाने में जमा था, जब पंजाब में विधानसभा के चुनाव हुए थे. ऐसे में वह पिस्तौल किस की थी, जिस से गोली चलने की बात मान कर मौके से कब्जे में लिया गया.

फिलहाल, केस की ताजा स्थिति यह है कि न्यायिक हिरासत की अवधि समाप्त होने पर सीरत जब मोहाली की अदालत में पेश हुई तो उस की हिरासत अवधि बढ़ाते हुए माननीय जज ने आदेश दिया कि आगे उस की पेशी वीडियो कौन्फ्रैंसिंग से हुआ करेगी.

मतलब सीरत को निजी रूप से अदालत में पेश नहीं होना पड़ेगा. सीरत ने अपने बच्चों की कस्टडी हासिल करने की बात भी जज से कही थी, जिस के लिए उसे संबंधित अदालत में अर्जी लगाने को कहा गया.

पुलिस का कहना है कि इस केस में अभी भी जांच जारी है. फिलहाल इस में किसी को क्लीनचिट नहीं दी गई है. जिन्हें छोड़ा गया है, उन्हें पूछताछ के लिए कभी भी फिर से बुलाया जा सकता है.

प्रेम और प्रेम विवाह के बीच इस फर्क को भी समझिए

दिल्ली के एक होटल में 2 युवाओं ने 14 जुलाई को आत्महत्या कर ली और चूंकि उन्होंने कोई नोट नहीं छोड़ा, सो, यही लगता है कि उन्हें डर रहा होगा कि उन का प्यार दोनों के घर वाले स्वीकार न करेंगे. उन की उम्र अभी ऐसी न थी कि वे शादी कर घर बसा लेते पर प्यार की पार्टनरशिप चालू हो गई थी बिना शर्तों के पहचाने जाने.

प्यार में यही खराबी है कि शर्तें बाद में लिखी जाती हैं, पार्टनरशिप पहले हो जाती है. आम पार्टनरशिप में शर्तों की लंबी लिस्ट बन जाती है और भविष्य में परेशानी हो तो लिस्ट ले कर अदालत का दरवाजा खटखटाया जा सकता है. अभी हाल में बर्गर की बादशाह कंपनी मैक्डोनल्ड और उस की भारतीय सहयोगी विक्रम बक्शी की कंपनी के बीच पार्टनरशिप का विवाद चल रहा है और उन का विवाह टूटने पर है. लेकिन आत्महत्या की नौबत आएगी, ऐसा नहीं लगता.

शर्तों वाला प्यार दरअसल प्यार की भावना के खिलाफ होता है. पर दिक्कत है कि शर्तों का पिटारा दोनों के मन में होता है जो प्यार के परिपक्व होने पर या विवाह होने के बाद परतदरपरत खुलता है. दोनों को नहीं मालूम होता कि उस का पार्टनर प्यार और उस के बाद विवाह से क्याक्या चाहेगा और उसे कैसे पूरा किया जाएगा.

सदियों पुराने धर्मों ने शादी के बाद के तो कुछ नियम बना रखे हैं पर प्यार के बाद के नियमों के बारे में वे चुप हैं या उसे नकारते हैं. शायद उन्हें एहसास है कि प्यार के नियमकानून बनाना कठिन है. इसलिए वे कहते हैं कि भई, प्यार मत करो, शादी कर लो, फिर हम देख लेंगे.

प्यार के नियम बहुत जरूरी हैं और 21वीं सदी में उन्हें फिर से लिखना जरूरी है क्योंकि अब लड़का व लड़की दोनों आजाद हैं, स्वावलंबी हैं और बराबर के सक्षम हैं. अब पार्टनरशिप बराबर की होती है जिस में त्याग कम, सहयोग ज्यादा होता है. लेकिन इस टेढ़ी खीर से निबटना अब मुश्किल हो गया है. प्यार के दौरान ही ब्रेकअप, बदला, हिंसा, रोनाधोना अब आम है क्योंकि प्यार के दौरान किसे क्या करना है, यह किसी को नहीं मालूम.

मजाक नहीं, सीरियसली, कंपनी अदालतों और वैवाहिक अदालतों की तरह अब प्यार की अदालतें भी खुलनी चाहिए. इन्हें सरकारें बनाएं, जरूरी नहीं. कालेज, औफिस, एनजीओ प्यार की अदालतों को चला सकते हैं. इन अदालतों में प्रेमी युगल अपनी शिकायतें ले कर जाएं और किसी तीसरे से फैसला पाएं कि दोनों में से किसे, कब, क्या करना चाहिए या नहीं करना चाहिए. प्रेम तो विवाह की नींव है और विवाह समाज को बल व मजबूती देने वाला किला. देश की उन्नति में सफल विवाहित नागरिक सफल उद्योगों की तरह जरूरी हैं.

मध्य प्रदेश कांग्रेस : प्रदेश में वापसी की कवायद

आमतौर पर चुनावों के दौरान या फिर सियासी जलसों के वक्त ही मध्य प्रदेश में नजर आने वाले 2 बड़े कांग्रेसी नेता कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की कोशिश यह रहने लगी है कि वे ज्यादा से ज्यादा प्रदेश ही में दिखें. तकरीबन 2 साल बाद होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए सियासी बिगुल बज उठा है. कांग्रेसी जगहजगह सियासी जलसे कर शिवराज सिंह चौहान की अगुआई वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार को उखाड़ फेंकने का दम भरने लगे हैं. इस की असल वजह यह नहीं है कि कांग्रेस यहां बहुत मजबूत हो गई है, बल्कि यह है कि भाजपा अब पहले के मुकाबले कमजोर पड़ने लगी है.

वैसे, कुछ महीने पहले तक कांग्रेसी जलसों का फीकापन हर किसी को नजर आता था, लेकिन किसान आंदोलन, जिस में मंदसौर में पुलिस फायरिंग में 6 किसान मारे गए थे, कांग्रेस के लिए वरदान साबित हुआ. किसान आंदोलन से कांग्रेस का कोई सीधा वास्ता नहीं था, लेकिन भाजपा से किसानों की नाराजगी जब उजागर हुई, तो कांग्रेस एकाएक ही उम्मीद के सागर में डुबकियां लगाते हुए हरकत में आ गई.

तेजी से बनतेबिगड़ते सियासी समीकरणों के बीच कांग्रेस की कोशिश अपना खोया हुआ परंपरागत वोट बैंक और साख हासिल करने की है. परंपरागत वोट बैंक यानी दलित, आदिवासी और कुछ पिछड़ों के अलावा मुसलिम वोट एकजुट हो जाएं, तो तख्ता पलटने में देर नहीं लगेगी.

कांग्रेस ने यह वोट बैंक अपने हाथों और हरकतों से खोया था, जिस के एकलौते जिम्मेदार दिग्गज कांगे्रसी नेता दिग्विजय सिंह माने जाते हैं. 10 साल मुख्यमंत्री रहते हुए दिग्विजय सिंह ने अपनी ही पार्टी की लुटिया डुबोने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. नतीजतन, साल 2003 के विधानसभा चुनावों में वोटर ने उन्हें खारिज कर दिया था.

आईना वही, चेहरे बदले

 साल 1993 से ले कर साल 2003 तक कांग्रेस का मतलब ही दिग्विजय सिंह हो गया था. इसी दौर में हैरतअंगेज तरीके से हिंदुत्व सब से ज्यादा परवान चढ़ा था. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उस के सहयोगी संगठनों ने हिम्मत न हारते हुए अपनी गतिविधियां बढ़ाईं और वोटरों को लुभाने में लगे रहे.

वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने दलित, आदिवासी और मुसलिमों की नेतागीरी कुछ इस तरह खत्म कर दी कि ये तबके सियासी तौर पर खुद को लाचार महसूस करने लगे.

इन तबकों की परेशानी को भाजपाई उमा भारती ने बेहद नजदीक से समझा और दिग्विजय सिंह के खिलाफ पूरे प्रदेश में मुहिम छेड़ दी.

उमा भारती ने लोगों को बताया कि भ्रष्टाचार और मनमानी के दलदल में डूबी कांग्रेस सरकार उन का नुकसान कैसे कर रही है. दिग्विजय सिंह ने तब उमा भारती और भाजपा को बेहद हलके ढंग से लिया था.

साल 2003 में नाराज मतदाता ने दिग्विजय सिंह को ऐसा सबक सिखाया कि वे आज तक वोटरों से आंख मिला कर बात नहीं कर पाते हैं. तब कांग्रेस को डुबोने में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी अहम रोल निभाया था.

भाजपा का राज शुरुआती दौर में ठीकठाक रहा, पर जब उमा भारती को हुबली कांड के चलते मुख्यमंत्री पद की कुरसी छोड़नी पड़ी, तो बाबूलाल गौर के बाद हैरतअंगेज तरीके से शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बना दिया गया, जिन्हें सत्ता चलाने का रत्तीभर भी तजरबा नहीं था.

अब हालात ये हैं कि भाजपा में शिवराज सिंह चौहान के अलावा कोई और नेता नजर ही नहीं आता है. जो आता भी है, उसे शिवराज सिंह चौहान चतुराई से चलता कर देते हैं.

फायदा उठाएगी कांग्रेस

इस बात में कोई शक नहीं कि शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में भाजपा राज्य में जितनी मजबूत हुई है, उतनी पहले कभी नहीं हो पाई थी. इस की अहम वजह यह थी कि लाल कृष्ण आडवाणी खेमे के चहेते शिवराज सिंह चौहान एक अच्छे संगठक रहे हैं, जिन्होंने कभी कांग्रेस को पनपने का मौका नहीं दिया.

साल 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस महज 2 सीटों छिंदवाड़ा और गुना पर ही जीत दर्ज करा पाई. कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनेअपने गढ़ों में जीते, तो इस की वजह कांग्रेस कम इन दोनों की पकड़ ज्यादा थी.

दिग्विजय सिंह ने शुरू में तो वापसी की आस और कोशिशें जारी रखीं, पर साल 2013 के विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस की दुर्गति ने उन्हें यह अहसास करा दिया कि अब कोशिश करना बेकार है.

दिग्विजय सिंह के साथ एक दिक्कत यह भी रही है कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदुत्व के विरोध को ही राजनीति मानते रहे, जिस से आम लोगों की परेशानियों से कोई सीधा वास्ता नहीं था. इस के उलट दिग्विजय सिंह को उखड़ते देख रहे कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया चुपचाप अपनी पकड़ मजबूत करते रहे.

अब कांग्रेस 2 खेमों में बंट गई है. पहला खेमा कमलनाथ का है, जिन का दबदबा महाकौशल इलाके में ज्यादा है, तो दूसरा खेमा ज्योतिरादित्य सिंधिया का है, जिन का ग्वालियर, चंबल इलाकों में खासा दबदबा है. दोनों की ही पूछपरख राहुल गांधी व सोनिया गांधी दरबार में बराबर की है.

हालात और माहौल भाजपा विरोधी होते देख कमलनाथ और ज्यातिरादित्य सिंधिया दोनों ही मुख्यमंत्री पद के दावेदार हो गए हैं. कांग्रेस की गुटबाजी अभी खत्म नहीं हुई है, जो भाजपा और शिवराज सिंह चौहान के लिए राहत देने वाली बात है, पर उन्हें डर यह भी है कि अगर कांग्रेस ने इन में से किसी एक को मुख्यमंत्री पेश कर दिया, तो जीत पहले की तरह आसान नहीं रह जाएगी, क्योंकि वोटर बदलाव का मन बना रहे हैं.

कांग्रेस मौके का फायदा उठाने के लिए अपनी खेमेबाजी से छुटकारा पाने की कोशिश कर रही है. सोनिया गांधी और राहुल गांधी को भी समझ आ रहा है कि हिंदीभाषी इलाकों में सत्ता वापसी का रास्ता अगर किसी राज्य से हो कर जाता है, तो वह मध्य प्रदेश है, पर इस के लिए जरूरी है कि कमलनाथ या ज्योतिरादित्य सिंधिया में से किसी एक को बतौर मुख्यमंत्री प्रोजैक्ट कर दिया जाए.

जुलाई महीने के दूसरे हफ्ते में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने यह कह भी डाला कि राज्य में कांग्रेस को चेहरा पेश कर देना चाहिए, तभी सत्ता मिलेगी. अपनी दावेदारी पहली दफा उन्होंने जताई, तो कमलनाथ गुट भी यही बात कहने लगा.

ज्योतिरादित्य सिंधिया राहुल गांधी के खासमखास हैं, तो कमलनाथ सोनिया गांधी के चहेते, लेकिन ज्योदिरादित्य सिंधिया का यह कहना भी बेमतलब नहीं था कि न केवल मध्य प्रदेश में, बल्कि देशभर में कांग्रेस को अपना चेहरा पेश कर देना चाहिए यानी कांग्रेस की कमान राहुल गांधी को सौंप देनी चाहिए.

ये हैं हालात

साफ दिख रहा है कि कांग्रेस को अगर सत्ता वापस चाहिए, तो उसे इन दोनों दिग्गजों में से किसी एक की नाराजगी मोल लेनी पड़ेगी और अगर वह ऐसा करने की हिम्मत पहले की तरह नहीं कर पाती है, तो वोटर उस का भरोसा नहीं करेंगे और भाजपा के पाले में चले जाएंगे.

किसान आंदोलन में हुई मौतों से भाजपा की इमेज इस तरह बिगड़ी है कि किसानों का एक बड़ा तबका यह कहने लगा है कि हम वोट फेंक देंगे, पर भाजपा को नहीं देंगे.

तकरीबन 65 फीसदी किसानों के वोट ही सत्ता तय करते हैं. कांग्रेस नहीं चाहती कि किसानों की भाजपा से नाराजगी दूर हो या उन का गुस्सा ठंडा पड़े, इसलिए वह जगहजगह धरनाप्रदर्शन करते हुए किसानों की खुदकुशी के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रही है.

शिवराज सिंह चौहान किसानों के भले का राग ही अलापते रहे, पर जमीनी तौर पर उन के लिए कुछ किया नहीं, इसलिए कांग्रेस लगातार किसानों पर डोरे डाल रही है. किसान भरोसा तो कांग्रेस पर भी नहीं करते, पर जब उन्होंने भाजपा को सबक सिखाने का मन बना ही लिया है, तो तय है कि इस का फायदा कांग्रेस को मिलेगा.

कांग्रेस के लिए अच्छी बात यह है कि इस दफा सोयाबीन की बोआई का रकबा घटा है और समर्थन मूल्य पर प्याज खरीदी में भी घोटाले हुए हैं. इस से किसानों का गुस्सा और बढ़ रहा है. ऐसे में जब भी कोई किसान कर्ज या दूसरी किसी वजह से खुदकुशी करता है, तो ज्योतिरादित्य सिंधिया तुरंत राज्य सरकार पर हमला बोल देते हैं.

8 नवंबर, 2016 में की गई नोटबंदी से कारोबारियों को खासा झटका लगा था. मझले और छोटे कारोबारियों को तो खाने के लाले पड़ गए थे. इस से भाजपा से कारोबारियों की नाराजगी बढ़ी थी.

जैसेतैसे नोटबंदी का जिन बोतल के भीतर जा रहा था कि केंद्र सरकार ने जीएसटी लागू कर दिया. नतीजतन, छोटेबड़े तमाम कारोबारी लामबंद हो कर भाजपा के खिलाफ हो गए.

जातिगत समीकरण भी तेजी से बदल रहे हैं. पिछले साल कुंभ में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने दलित संतों के साथ उज्जैन में क्षिप्रा नदी में डुबकी लगाई थी, पर इस से दलितों का कोई भला नहीं हुआ. उन पर होने वाले जोरजुल्म बदस्तूर जारी हैं.

एक दलित नेता सिद्धार्थ मोरे की मानें, तो भाजपा दलितों को हिंदुत्व की फीलिंग क्यों करवा रही है? इस से उलटा असर यह पड़ रहा है कि दलित, जिस ने पिछले 4 चुनावों में उसे वोट दिया, अब बिदकने लगा है और जबरन हिंदू कर्मकांड करवाए जाने से जरूर मानने लगा है कि वह हिंदू नहीं है और अगर है तो आखिरकार अछूत ही.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में दलितों ने भाजपा को वोट दिया था, पर नतीजों के बाद उजागर हुआ था कि बसपा समर्थक जाटव समुदाय ने कमल के फूल से परहेज ही किया था. मध्य प्रदेश में भी यही हालत है.

कुंभ की डुबकी का इतना फायदा भाजपा को मिल सकता है कि वाल्मीकि समाज के वोट उसे मिल सकते हैं, क्योंकि कुंभ में उन के संत उमेश महाराज को सवर्ण संतों के साथ नहलाया गया था.

मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों में कभी कांग्रेस के अलावा वोटर कुछ सोचता नहीं था, पर अब वह कांगे्रस के बारे में ही नहीं सोचता, जो कांग्रेस के लिए चिंता की बात है.

गरीब आदिवासियों का न तो किसान आंदोलन से कोई वास्ता है, न ही नोटबंदी और जीएसटी से कोई लेनादेना है. ऐसे में कांग्रेस को अगर सत्ता चाहिए, तो उसे खासतौर से आदिवासी इलाकों में पसीना बहाना पड़ेगा.

युवाओं पर बढ़ती धर्म की गिद्द नजरें

अमरनाथ यात्रा पर जाने वाले यात्रियों की बस पर आतंकवादियों का हमला साफ करता है कि देश में अभी धर्मयुद्घ के थमने के आसार नहीं हैं और यह भी पक्का है कि इस में काफी युवाओं का भविष्य मिट्टी में मिलेगा. 2002 में गोधरा में एक ट्रेन में आग लगने के कारण हुई 59 यात्रियों की मौतों के लिए मुसलिम समुदाय को जिम्मेदार ठहरा कर महीनों तक गुजरात के विभिन्न शहरों में आम निर्दोष मुसलिमों से बदला लिया गया था. तब भी हजारों युवाओं ने मारने में साथ दिया था और सैकड़ों मरे थे.

धार्मिक विवादों में सदियों से युवा शिकार बनते रहे हैं. धर्मरक्षा के नाम पर जब भी कोई बखेड़ा खड़ा होता है, युवाओं को आगे कर दिया जाता है और बुजुर्ग, धर्म के दुकानदार, नेता, अमीरउमराव पीछे से संचालन करते रहते हैं. मरने वाले भी युवा ही होते हैं, मारने वाले भी. पश्चिमी एशिया में आतंकवाद की राह पर चल रहे इसलामिक स्टेट की विचाराधारा वाले मुसलिमों के दूसरे मुसलिमों के साथ युद्घ में मारने वाले मुसलमान, मरने वाले मुसलमान और शरणार्थी बने बच्चे भी मुसलमान, ज्यादातर युवा या युवा होने की दहलीज पर खड़े.

भारत में गौरक्षकों की जो फौज तैयार हो रही है उस में युवा ही हैं. वे गुट बना कर किसी भी पशु व्यापारी को रोक कर मारपीटने का हक रखते हैं क्योंकि सरकारों ने पुलिस से कह रखा है कि इस तरह के मामलों में वह आंख मूंद कर रखे. पशु व्यापारियों को नुकसान होता है, वह अलग. पर बड़ी महत्त्व की बात यह है कि युवाओं को हिंसा की लत पड़ जाती है. उन्हें यह एहसास हो जाता है कि कानून के कागजी महल में छेद करना बहुत आसान है.

अमरनाथ यात्रियों की मौत अगर एक नया देशव्यापी संघर्ष शुरू कर दे तो आश्चर्य न होगा. यहां धर्म का बारूद तो तैयार है. बस, चिनगारी की जरूरत है. देश में जगहजगह आग लगने लगे तो शिकार युवाओं के सपने होंगे. प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष तो बयान देते रह जाएंगे पर जिन्हें अभी 50-60 साल जीना है उन का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा.

2017 में देश सैकड़ों वर्ष पुराने धर्र्म के नाम पर अपनी युवाशक्ति को बरबाद करेगा तो निश्चित ही हम आगे बढ़ने के बजाय गरीबी, गंदगी की ओर बढ़ेंगे और युवाओं की आशा कि हम चीन, यूरोप, अमेरिका, सिंगापुर जैसे बसेंगे, हवा में बह जाएगी.

आखिर क्यों कर रहे हैं किसान आत्महत्याएं

तमाम किसानों द्वारा आत्महत्याएं किए जाने के समाचार अखबारों और टीवी वगैरह की सुर्खियां भले ही बन रहे हों, लेकिन इन मरते किसानों को बचाने की ठोस कोशिशें कहीं दिखाई नहीं दे रहीं. आखिर क्यों कर रहे हैं देश के किसान खुदकुशी किसानों की बेबसी और आत्महत्या के किस्से रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं. एक 40 साला किसान ने कर्ज से परेशान हो कर अपने खेत के पास ही फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. उस पर डेढ़ लाख रुपए का कर्ज था और उस की फसल बरबाद हो गई थी. एक अन्य 40 साला किसान ने आंगन में लगे लगे नीम के पेड़ पर फंदा लटका कर आत्महत्या कर ली. उस किसान ने खेती के लिए ट्रैक्टर फाइनेंस कराया था, लेकिन किश्त नहीं जमा करने पर कंपनी के अधिकारी उसे परेशान करते थे.

एक 48 साला किसान ने फसल खराब होने और उस के बाद भैंसें चोरी हो जाने के सदमे से परेशान हो कर फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली.सोयाबीन की फसल खराब होने और कर्ज का बोझ बढ़ जाने से परेशान 38 साला किसान ने जहर खा कर अपनी जान दे दी. ये तो एक ही दिन के अखबार में छपी खबरों की झलकियां हैं. शायद  ही कोई ऐसा दिन जाता होगा, जब किसानों की आत्महत्याओं के समाचार प्रकाशित न होते हों. इस के अलावा तमाम ऐसे मामले भी होते हैं, जो न तो अखबारों की सुर्खियां बन पाते हैं और न ही रेडियो या टेलीविजन तक पहुंच पाते हैं.

हाल ही में जारी नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट से किसानों की आत्महत्याओं के बारे में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं. आंकड़ों के मुताबिक साल 2015 में 80 फीसदी किसानों ने बैंकों और पंजीकृत माइक्रो फाइनेंस संस्थाओं से कर्ज लेने और फिर दिवालिए होने के कारण आत्महत्याएं कीं. साल 2015 में 3000 से ज्यादा किसानों ने कर्ज लेने के बाद यह कदम उठाया था. एनसीआरबी ने पहली बार किसानों की आत्महत्याओं को कर्ज लेने और दीवलिया होने के आधार पर वर्गीकृत किया है.

बैंकों और साहूकारों दोनों से कर्ज लेने के कारण 10 फीसदी किसानों ने आत्महत्याएं की थीं. साल 2014 से 2015 के बीच किसानों की आत्महत्याओं में 41.7 फीसदी का इजाफा हुआ. साल 2015 में कुल 8007 किसानों ने आत्महत्याएं की थीं, जबकि साल 2014 में 5650 किसानों ने ऐसा कदम उठाया था. रिपोर्ट के मुताबिक कर्ज के बोझ की वजह से सब से ज्यादा आत्महत्याओं के मामले (1293) महाराष्ट्र में आए, जबकि कर्नाटक 946 मामलों के साथ दूसरे स्थान पर रहा. वहीं तेलंगाना राज्य 632 मामलों के साथ तीसरे स्थान पर रहा.

खेती की वजह से होने वाली आत्महत्याओं के मामले में भी महाराष्ट्र (769) पहले स्थान पर रहा, जबकि तेलंगाना (363) दूसरे, आंध्र प्रदेश (153) तीसरे और कर्नाटक (113) चौथे स्थान पर रहा. साल 2015 में पारिवारिक समस्याएं (933) और बीमारियां (842) भी आत्महत्याओं की खास वजहें थीं. साल 2014 की तुलना में कर्ज की वजह से आत्महत्याओं में साल 2015 में 3 गुने (3097) का इजाफा हुआ. खेती की वजहों से आत्महत्या करने के मामलों में 61 फीसदी का इजाफा हुआ. राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि महाराष्ट्र में सब से ज्यादा 3030, तेलंगाना में 1358, कर्नाटक में 1197, छत्तीसगढ़ में 854 और मध्य प्रदेश में 516 किसानों ने आत्महत्याएं कीं. कर्नाटक में किसानों की आत्महत्याओं में 1 साल के भीतर तकरीबन 3 गुने का इजाफा हुआ.

एनसीआरबी ने जो आंकड़े जारी किए हैं, वे किसानों और उन के परिवारों से जुड़ी बेहद दुखद तसवीर को बयां कर रहे हैं. कहां तो सरकार ने दावा किया था कि 5 सालों में किसानों की आय को 2 गुना किया जाएगा, लेकिन हालात इस के उलट हैं. एक तरफ तो किसान कुदरत की मार और साहूकारों के कुचक्र में पिस रहे हैं, तो दूसरी ओर सरकार भी उन की मदद से हाथ खींच रही है.

मध्य प्रदेश में भी खुदकुशी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, वहां साल 2015 में रोजाना औसतन 4 किसानों ने जान दी. साल 2016 में रोजाना जान देने वालों की तादाद बढ़ कर 6 हो गई थी. योजना आयोग के पूर्व सदस्य अभिजीत सेन का कहना है कि ज्यादातर किसान साहूकारों से ही कर्ज लेते हैं, क्योंकि वे बैंकों व माइक्रो फाइनेंस इंस्टीट्यूशंस के मुकाबले लचीले होते हैं.

भारतीय किसानों के बारे मे एक कहावत सदियों से कहीसुनी जाती है कि ‘भारतीय किसान कर्ज में पैदा होता है, कर्ज में पलता है और कर्जदार रहते हुए मर जाता है’ यानी पैदा होने से ले कर मरने तक कर्ज उस का पीछा नहीं छोड़ता. जब कर्ज का बोझ इतना बढ़ जाए कि उसे चुका पाना मुमकिन न हो तो मजबूर हो कर किसान आत्महत्या कर लेते हैं.

कोई किसान आत्महत्या क्यों करता है  इस के पीछे कई वजहें हो सकती हैं. सब से बड़ी वजह गरीबी और कर्ज है. भारतीय किसानों के पास गरीब होने की वजह से खेती की मशीनें नहीं होती हैं. ऐसे में हलबैल से खेती करना उस की मजबूरी है. ऐसी हालत में किसान मशीनें या तो किराए पर लाता है या फिर कर्ज ले कर खरीदता है. अगर किसान कर्ज ले कर मशीनें खरीदता है, तो उसे उस का भारीभरकम ब्याज चुकाना मुश्किल हो जाता है.

हालांकि देश में बैंकिंग सुविधाएं बढ़ी हैं, तो भी एक आम किसान बैंकों की बजाय साहूकार से ही रकम उधार लेता है. जब ब्याज चुकाना ही कठिन हो तो मूलधन चुकाना भी मुश्किल हो जाता है. ऐसे में किसान खुदकुशी कर लेते हैं.

किसान खाद, बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक दवाओं वगैरह के लिए कर्ज लेते हैं. लेकिन जब कुदरती आपदा की वजह से उन की फसल चौपट हो जाती है, तो उन की आशाओं पर पानी फिर जाता है और वे मजबूर हो कर खुद को मिटा डालते हैं. सूखा, बाढ़, पाला फसलों के रोग, कीड़ों, आगजनी व जानवरों वगैरह की वजह से किसानों को अकसर लाभ की बजाय हानि उठानी पड़ती है. ऐसे में वे अपने परिवार का पेट कैसे पालें  घबरा कर वे न केवल अपनी जान ही देते हैं, बल्कि अपने पूरे परिवार को मौत की नींद सुला देते हैं.

भारतीय किसानों में ज्यादातर कम पढ़ेलिखे हैं. वे तमाम सामाजिक रीतिरिवाजों, रूढि़यों और कुप्रथाओं से जकड़े रहते हैं. इन सब में वे फुजूलखर्ची करते हैं. आज भी वे कर्ज ले कर मृत्युभोज का आयोजन बड़े पैमाने पर करते हैं, मगर वह कर्ज अकसर चुका नहीं पाते और फिर हार कर खुदकुशी कर लेते हैं. छोटे किसान पशुओं पर निर्भर रहते हैं. आजकल पशु काफी महंगे हो गए हैं. ऐसे में यदि असमय अचानक पशुओं की मौत हो जाए, तो उन का मामला गड़बड़ा जाता है. वे पशुओं के लिए लिया गया कर्ज चुका नहीं पाते और अकसर हार कर खुदकुशी कर लेते हैं.

ग्रामीण इलाकों में किसानों के बीच जमीन संबंधी मामलों को ले कर काफी मुकदमेबाजी होती है, जिस में उन का काफी पैसा खर्च होता है. ऐसे में यदि वे मुकदमा हार जाते हैं, तो आत्महत्या के सिवा उन्हें कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझता. कहने को तो भारत एक कृषि प्रधान देश है और देश के किसान सभी का पेट भरने के लिए अन्न उपजाते हैं. लेकिन यह भी एक हकीकत है कि ज्यादातर किसान या तो खेतीहर मजदूर हैं या उन के पास इतनी कम जमीन है कि खेती उन के लिए घाटे का सौदा बन कर रह गई है. ऐसे में दूसरों के लिए अन्न उपजाने वाले ये गरीब किसान अकसर घबरा कर खुदकुशी कर लेते हैं.

किसानों को राहत पहुंचाने के लिए केंद्र और राज्य दोनों एकदूसरे पर जिम्मेदारी डालते हैं, लेकिन यह जिम्मेदारी दोनों की है, क्योंकि किसान देश का है किसी राज्य विशेष का नहीं. उस का दुखदर्द हर स्तर पर जाननासमझना होगा और उस का हल भी करना होगा. जब केंद्र और राज्य में अलगअलग दलों की सरकारें होती हैं, तो वे किसानों की आत्महत्याओं और मदद को ले कर राजनैतिक रोटियां सेकने लग जाती हैं. ऐसे में किसानों के हाथ कुछ भी नहीं लगता. किसानों द्वारा आत्महत्या करने के मामले दिनोंदिन बढ़ते जा रहे हैं, जिन्हें राजनैतिक रंग दे कर इलजाम लगाने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा.

ऐसे में अहम सवाल उठता है कि आखिर देश के किसान आत्महत्या पर क्यों उतारू हो रहे हैं  उन के दर्द और परेशानियों को आजादी के 7 दशकों बाद तक दूर नहीं कर पाना हमारी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक नीतियों पर सवालिया निशान लगाता है. वैसे आजादी के बाद देशभर में बैंकों व सहकारी संस्थाओं का जाल बिछाया गया है, फिर भी किसानों की साहूकारों पर निर्भरता कम नहीं हुई है.

साहूकार किसानों का शोषण करते हैं और उन्हें कभी कर्ज मुक्त नहीं होने देते. ऐसे में उन कर्जदार किसानों की मौत के बाद कर्ज की भरपाई उन के घर वालों से कराई जाती है. किसान के बेवक्त मरने का साहूकार की सेहत पर जरा सा भी असर नहीं पड़ता है. भारतीय कृषि मानसून का जुआ है यानी उस पर निर्भर है. कई बार मानसून की गड़बड़ी से किसानों की फसलें पूरी तरह से बरबाद हो जाती हैं. ऐसे बदहाली के आलम में उन्हें कर्ज चुकाने के लिए मजबूर किया जाए तो वे कहां से चुकाएंगे  ऐसे में उन्हें सरकारी मदद की उम्मीद रहती है. अगर समय पर मदद नहीं मिलती, तो अकसर तमाम किसान घबरा कर खुदकुशी कर लेते हैं. कृषि प्रधान देश का एक किसान अगर आत्महत्या करता है, तो इस से ज्यादा शर्म की बात और क्या हो सकती है  हमारे लिए हर किसान बेशकीमती है और उस की जान हर कीमत पर बचानी चाहिए.

बरबादी टमाटरों की – प्रदीप कुमार शर्मा

यह झारखंड सरकार के निकम्मेपन का ही नतीजा है कि किसान भारी मात्रा में उपजे टमाटरों को खरीदार न मिलने के कारण नजदीकी टाटा रांची राजमार्ग एनएच 33 पर फेंकने को मजबूर हो गए. बताया जाता है कि बाहर के व्यापारियों को 50 पैसे प्रति किलोग्राम के हिसाब से देने के बावजूद उन्होंने टमाटरों की खरीदारी में जरा भी रुचि नहीं दिखाई.

वैसे सर्दी का मौसम टमाटर उत्पादन के लिए सब से अच्छा होता है. इस समय टमाटर सहित तमाम सब्जीभाजियों की बंपर खेती होती है. खेती करने वाले किसान दूसरी सब्जियों के मुकाबले टमाटर की खेती करने में ज्यादा रुचि दिखाते हैं, क्योंकि टमाटर की खेती में ज्यादा मेहनत की जरूरत नहीं होती. टमाटर एक ऐसी सब्जी है, जो खाने के स्वाद को बढ़ाती है. इस में विटामिन भी भरपूर होता है. किसी भी सब्जी में टमाटर डाल कर खाना भारत का रिवाज है. सलाद के रूप में इस का काफी ज्यादा इस्तेमाल होता है. इस के बगैर सब्जी बेमजा हो जाती है. यही कारण है कि इस की मांग हर घर में हमेशा बनी रहती है.

टमाटर की खेती के लिए नमी की बहुत जरूरत होती है, इसीलिए इस की खेती के लिए जाड़े का मौसम सब से सही होता है. बेमौसम में जब टमाटर की उपज नहीं होती, तब इस की मांग काफी बढ़ जाती है. ऐसी हालत में इस के दाम उछल कर 70-80 रुपए प्रति किलोग्राम तक हो जाते हैं. वैसे सामान्य दिनों में इस की कीमत 20 से 25 रुपए प्रति किलोग्राम तक हो जाती है.

ज्यादा मांग को देखते हुए तकरीबन सभी किसान अपने खेतों में टमाटर जरूर लगाते हैं. इस की खेती काफी आसान है. बस एक बार पौधा रोप कर 2 से 3 बार पानी देने की जरूरत होती है. इस की देखभाल करने की भी ज्यादा जरूरत नहीं होती. टमाटर का पौधा करीब 3 से 4 फुट ऊंचा होता है. जब उस में टमाटर लगने लगते हैं, तो भारी होने की वजह से वह झुक जाता है. ऐसे में उसे बांस की छड़ी से बांध कर खड़ा रखा जाता है. पूरे मौसम में 1 पौधे से 50 से 70 टमाटर तोड़े जाते हैं.

झारखंड के किसान खेती लायक जमीन होते हुए भी गरीबी और बदहाली की जिंदगी जीते हैं. वे सभी प्रकार की खेती नहीं कर पाते हैं, क्योंकि उन्हें सरकार से कोई सुविधा प्राप्त नहीं हैं. उन्हें सरकार की तरफ से यह जानकारी नहीं दी जाती है कि कौन सी सब्जी लगाने से ज्यादा फायदा होगा. वे ज्यादातर धान की खेती करते हैं और सिंचाई के लिए बरसात के पानी पर निर्भर रहते हैं.

पिछले कुछ सालों से झारखंड ग्लोबल वार्मिंग के कारण सूखे का सामना कर रहा है. वहां औसत बारिश होती है, जो खेती के लिए पर्याप्त नहीं होती. एक साल अच्छी बारिश होती है, तो दूसरे साल राज्य में सूखा पड़ जाता है. राज्य सरकार द्वारा बनाई गई नहर सिंचाई योजना का हाल भी खस्ता है. वहां गरमी के मौसम में पानी के लिए हाहाकार मच जाता है. आम लोगों को जब पीने के लिए पूरा पानी नहीं मिल पाता है, तो फिर खेती के लिए कहां से मिलेगा. नदियों पर बैराज बनाए गए हैं, जोकि अधूरे ही हैं. आम किसानों को उन से कोई फायदा नहीं है. खेती में सिंचाई के लिए वहां के किसान खुद अपने भरोसे रहते हैं. वे नदी, तालाब या नाले के पानी को डीजल की मोटर से खींच कर अपने खेतों तक पहुंचाते हैं. ऐसे में उन्हें खेती करना महंगा पड़ जाता है.

मायूस किसान बताते हैं कि टमाटर की खेती वे इसलिए भी करते हैं, क्योंकि इस में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है और न ही खास लागत लगती है. पैदावार भी अच्छी हो जाती है, इसीलिए वे जाड़े के मौसम में टमाटर की खेती करते हैं. मगर बुरी हालत तब हो जाती है, जब किसान टमाटर बेचने के लिए कसबे के बाजार में लाते हैं और खरीदार नहीं मिल पाते. बाहर के व्यापारी कसबे के बाजार में नहीं आते. वे राष्ट्रीय राजमार्ग पर ही माल मंगवाते हैं, ताकि उन्हें ले जाने में आसानी हो.

व्यापारियों से सौदा तय हो जाने पर टमाटरों को डब्बों में भर कर गाड़ी में लदवाने तक का खर्च किसानों को झेलना पड़ता है. इस के बाद भी किसी वजह से जब माल नहीं बिकता तो उसे वापस ढो कर ले जाने में किसान सक्षम नहीं होते और माल जहां का तहां छोड़ कर भारी मन से वापस गांव लौट जाते हैं. किसानों ने बताया कि इस साल ज्यादा टमाटर होने की वजह से इस का बाजार मूल्य 50 पैसे प्रति किलोग्राम हो गया था, फिर भी खरीदार नहीं मिल रहे थे. ऐसे में हार कर वे टमाटरों को सड़कों पर फेंकने पर मजबूर हुए.

किसानों ने बताया कि वे काफी अरसे से कोल्ड स्टोरेज की मांग कर रहे हैं, लेकिन अभी तक इस पर कोई काम नहीं हुआ, जबकि झारखंड के 2016 के बजट में यहां के किसानों की कच्ची उपज को रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज प्रस्तावित है. लेकिन अभी तक इस पर काम भी शुरू नहीं हुआ. नतीजतन हर साल उन्हें हजारों रुपए का नुकसान होता है.

किसानों ने बताया कि सरकारी सहायता के बिना कोल्ड स्टोरेज बनाना मुमकिन नहीं है, क्योंकि वहां के ज्यादातर किसान गरीब हैं. सब्जीभाजी बेच कर जो पैसा आता है, वह फिर से सब्जीभाजी रोपने के लिए कम पड़ जाता है. खेती को उपजाऊ बनाए रखने के लिए खाद की जरूरत होती है, पर खाद बहुत महंगी हो गई है. नए तरह के कृषि यंत्र उन की पहुंच से बाहर हैं, लिहाजा वे पारंपरिक तरीके से ही खेती करने को मजबूर हैं. किसानों का कहना है कि अगर झारखंड सरकार उन की ओर ध्यान दे, तो वे सब्जी उगा कर भरपूर पैसे कमा सकते हैं. तब रोजगार के लिए उन्हें दूसरे शहरों की ओर नहीं जाना पड़ेगा.

बहुत ज्यादा मात्रा में उगी सब्जीभाजियों को बरबाद होने से बचाने और उन की ताजगी को बरकरार रखने के लिए पिछले साल झारखंड सरकार ने किसानों से फूड प्रोसेसिंग का काम शुरू करने के लिए कहा था, मगर बाद में इस बारे में सरकार का कोई सहयोग नहीं मिला नतीजतन समस्या जस की तस बनी हुई है और किसान जरूरत से ज्यादा उपजी सब्जीभाजियों को फेंकने पर मजबूर हैं.

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