अमित शाह ने कुबूल की कांग्रेसियों की दुआ

कहां तो किसान आंदोलन के बाद से ही कहा जाने लगा था कि भाजपा आलाकमान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कभी भी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को चलता कर सकते हैं, क्योंकि मंदसौर में हुई पुलिस फायरिंग में 6 किसान मारे गए थे जिससे पार्टी की साख पर बट्टा लगा और असल इमेज नरेंद्र मोदी की बिगड़ी. खुद शिवराज सिंह इन अफवाहों और अटकलों से चिंतित थे, जिसे दूर करने जरूरी हो चला था कि वे ऐसा कोई नया कारनामा कर दिखाएं, जिससे न केवल कांग्रेसियों बल्कि पार्टी के अंदर बढ़ रहे उनके विरोधियों के मुंह भी अगले विधानसभा चुनाव तक बंद हो जाएं और मीडिया भी बेवजह हल्ला मचाना बंद कर दे.

18 से 20 अगस्त तक भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का भोपाल दौरा हर लिहाज से शिवराज सिंह को सुकून देने वाला साबित हुआ, जिसके पहले ही दिन अमित शाह ने शिवराज सिंह को हटाये जाने वाली अटकलों को खारिज करते यह कहा कि अगला विधानसभा चुनाव शिवराज सिंह चौहान की अगुवाई में ही लड़ा जाएगा और वे एक कामयाब और लोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं. एक तरह से उन्हें किसान आंदोलन के बाद का डेमेज, मेनेज करने का इनाम मिल गया. इस बाबत शिवराज सिंह को कितना पसीना बहाना पड़ा ये तो वही जानते हैं, लेकिन यह हर किसी ने देखा कि सरकारी पैसे को पूरी बेरहमी के साथ बहाया गया.

अमित शाह का भगवा बना दिये गए भोपाल में देवताओं और अवतारों सरीखा ऐसा स्वागत किया गया जिसके लिए भाजपा कभी कांग्रेस को बदनाम किया करती थी. पहले ही दिन उनकी राह में लाखों रुपये के गुलाब के फूल बिछा दिये गए. भाजपा का हबीबगंज स्थित दफ्तर दुल्हनों जैसा सजाया गया था, जिसमें अलग से एक कमरा खासतौर से तैयार करवाया गया था. अमित शाह के स्वागत के प्रचार प्रसार पर ही करोड़ों रुपये इश्तिहारों, बैनरों और होर्डिंग्स पर खर्चे गए, इसके अलावा तीन दिन चले सामूहिक भोजों के व्यंजनों और पकवानों पर भी दिल खोल कर खर्च किया गया. यह तामझाम और फिजूल खर्ची देख सहज ही लगा कि सूबे में गरीबी नाम की कोई चीज है या किसी को किसी भी तरह की कमी है.

किसान आंदोलन कांग्रेसियों की साजिश या फिर गुंडे बदमाशों की ही हरकत थी, यह न केवल जताने बल्कि साबित करने में भी शिवराज सिंह कामयाब रहे कि जिस राज्य में एक आदमी की खुशामद करने करोड़ो रुपये 72 घंटों में उड़ाए जा सकते हैं, वहां के अन्नदाता को तो कोई कमी हो ही नहीं सकती, फिर भला वे क्यों आंदोलन का रास्ता चुनेंगे. यह बात खुद अमित शाह को तीन दिन में तरह तरह से समझ आई कि जिस मुख्यमंत्री के एक इशारे पर पूरी प्रदेश भाजपा एकजुट होकर उनके पांवों में बिछी जा रही हो, वो कैसे अलोकप्रिय या किसान विरोधी हो सकता है. लिहाजा उन्हें किसान हत्याओं के आरोपों से बाइज्जत न केवल बरी कर दिया गया, बल्कि अगली बार भी मुख्यमंत्री बनाए जाने का आशीर्वाद दे दिया गया.

खर्चीले स्वागत सत्कार और अपनी जय जय कार के नारों में सुदबुध खो बैठे  अमित शाह यह स्वीकार करने मजबूर हो गए कि मध्य प्रदेश में जिस नेता की अगुवाई में भाजपा फिर से सत्ता तक पहुंच सकती है वे शिवराज सिंह चौहान ही हैं, दूसरे किसी नेता में इतना दम नहीं. गणेश की झांकियों के एक हफ्ते पहले ही शिवराज सिंह ने भोपाल में अमित शाह की ऐसी झांकी जमाई कि उनके जाने की बात सुनने की मंशा लिए बैठे उनके विरोधी तो दूर की बात हैं, अमित शाह से उनकी चुगली करने की सोचने वाले भाजपाई भी चुपचाप खिसक लिए या फिर खामोशी ओढ़े इस झांकी को निहारते रहे, जिसमें शिवराज सिंह ने नरेंद्र मोदी की तुलना भगवान से कर डाली.

अमित शाह ने तो नरेंद्र मोदी की तारीफों में कसीदे भर गढ़े थे, बाकी की कसर उन्हे शिवराज सिंह के मुंह से भगवान कहलवाकर यह संदेशा दे दिया गया कि जमाना या युग आज भी भक्ति का ही है, इसे जो ज्यादा करेगा उसकी झोली में उतना ही डाला जाएगा.  दिल्ली वाले  भगवान के यहां न तो देर है और न ही अंधेर है. ऐसे माहौल में, पार्टी में अंदरूनी लोकतन्त्र है जैसी चलताऊ बात सुनकर जरूर कुछ लोगों को अमित शाह पर शायद  तरस आया हो, लेकिन उसके कोई माने नहीं रह गए थे इसकी दूसरी वजह अमित शाह का सबसे पहले पंडित नरोत्तम मिश्रा के यहां खाना खाने जाने था, जो पेड़ न्यूज के मामले में कानूनी तौर पर उलझे हुये हैं.

तीन दिन अमित शाह शिवराज सिंह को बगल में लटकाए सत्ता और संगठन का नया पहाड़ा पढ़ाते रहे, जिसमे टू टू जा फोर होता है दो दूनी चार नहीं होता. अमित शाह की ब्रांडिंग के लिए पुराने लेकिन अचूक टोटकों का जी भर कर इस्तेमाल किया गया, साधू संतों को उनसे मिलवाया गया और फिर आखिरी दिन एक आदिवासी कमल ऊईके के घर उन्हें मालवा के मशहूर पकवान  दाल बाफले खिलाने ले जाया गया.  कोई किसी तरह का आरोप न लगा पाये इस बाबत मीडिया वालों को पहले ही इसकी इत्तला दे दी गई थी, जिससे वे दाल बाफले बनने का सीधा प्रसारण करते रहे. कोई नहीं कह पाया  कि ये दाल बाफले बाजार से मंगवाए गए थे या फिर गुपचुप किसी ऊंची जाति वाले से बनवाए गए थे.  आजकल नेताओं के दलित आदिवासियों के घर जाकर खाना खाने के फैशन के दौर में बाद तो दूर कभी कभी एडवांस में ही इस तरह के आरोप मढ़ दिये जाते हैं.

इसी दिन प्रदेश भर के कालेजों से छात्र छात्राएं ढो कर भोपाल लाये गए थे. मुख्यमंत्री मेधावी छात्र योजना के तहत 25 हजार युवा शिवराज सिंह ने अमित शाह के सामने ला खड़े किए तो वे और हक्के बक्के रह गए कि शिवराज सिंह जितना जमीन के बाहर हैं उससे कहीं ज्यादा जमीन के अंदर भी हैं. इस जलसे में सरकार के तकरीवन 25 करोड़ रुपये खर्च हुये, लेकिन सवाल जब राजर्षि को प्रसन्न करने का था तो पैसा नाम के हाथ का मैल देखने की जहमत शिवराज सिंह चौहान ने नहीं उठाई, उल्टे यह जता दिया कि सरकार किसान आंदोलन के बाद किसानों की नाराजी से बचने अरबों रुपये की प्याज उनसे खरीदकर सड़ाने का सीना रखती है, तो सौ दो सौ करोड़ रुपये पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को खुश करने खर्च कर दिये तो कोई गुनाह नहीं कर रही.

अब सब खामोश हैं, चारों तरफ शिवराज सिंह चौहान की एक और फतह के चर्चे हैं, तो कुछ पुराने और तजुर्बेकार भाजपाइयों को दिग्विजय सिंह का अंजाम याद आ रहा है. ऐसे ही एक बुजुर्ग नेता ने नाम न छापने की गुजारिश पर आह भरते कहा, अब वाकई पार्टी का चरित्र, चाल और  चेहरा सब बदल चुका है, जिसमें प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की नहीं बल्कि कांग्रेस की तरह चाटुकार नेताओं की तूती बोल रही है.  कांग्रेसी खेमा तो इसी बात की दुआ मांग रहा था कि भाजपा अगला चुनाव शिवराज सिंह की अगुवाई में ही लड़े, चिंता की बात तो यह है कि अमित शाह इस दुआ को कबूल कर गए.

मुझे अपनी पत्नी से तलाक लेना है. इस के लिए क्या करना होगा.

सवाल
मुझे अपनी पत्नी से तलाक लेना है. इस के लिए क्या करना होगा?

जवाब
पत्नी से बेवजह तलाक नहीं लिया जा सकता. इस की कोई वाजिब व ठोस वजह होनी चाहिए. आखिर आप की पत्नी का गुनाह क्या है?

नवाजुद्दीन को किससे किस तरह की आजादी चाहिए?

नवाजुद्दीन सिद्दिकी इन दिनों ‘‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’’ से काफी खफा हैं. उनकी फिल्म ‘‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’’ को ‘‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’’ द्वारा 48 कट दिया जाना उन्हे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला लग रहा है. इसलिए जब हाल ही में मुलाकात होने पर हमने उनसे पूछा कि इन दिनों लोग शिकायत कर रहे हैं कि अभिव्यक्ति  की आजादी खत्म हो गई है. इस पर वह खुद क्या सोचते हैं.

इस पर नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने कहा -‘‘हर क्षेत्र के जानकार अपने हिसाब से बात कर रहे हैं. मैं तो अपने क्षेत्र की बात कर सकता हूं. मसलन,हमारी फिल्म ‘‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’’ को सेंसर बोर्ड ने कट लगाए हैं. मैं सरकार से, सेंसर बोर्ड से कहता हूं कि हमें रचनात्मक आजादी दो. हमारी इस आजादी पर कट मत लगाइए. आप फिल्म को प्रमाणित करते हैं, तो फिल्म को एडल्ट प्रमाणपत्र दे दें. एडल्ट फिल्म का प्रमाणपत्र देने के बाद भी कट लगाएं, वह गलत है. हमें वह आजादी चाहिए. सच यह है कि हमारे साथ कई निर्माता खड़े हैं. हम सभी चाहते हैं कि सेंसर बोर्ड की गाइड लाइन्स बदली जाए. हम चाहते हैं कि श्याम बेनेगल कमेटी की सिफारिशों को स्वीकार किया जाए. हमें उसका इंतजार है.’’

प्रभास की फिल्म ‘साहो’ में ये सब होंगे विलेन

खबर है बौलीवुड से जहां साहो फिल्म को लेकर  एक नया खुलासा हुआ है. बात ये है की अब साहो फिल्म के विलेन का नाम भी फाइनल हो चुका है. और विलेन कोई और नहीं बल्कि जैकी श्रौफ हैं. प्रभास की इस फिल्म में जैकी श्रौफ का किरदार काफी अहम है. बता दें कि फिल्म में नील नितिन मुकेश और चंकी पांडे भी विलेन के किरदार में नजर आएंगे.

साहो मे विलेन का लुक

एक खबर के अनुसार  फिल्म में चंकी का किरदार काफी डार्क शेड वाला है, इसके अलावा नील का किरदार एक टेक सेवी विलन का होगा, तो वहीं जैकी का किरदार काफी दिलचस्प तरीके से प्रभास की जिंदगी में मुश्किलों को बढ़ाएगा. फिल्म की शूटिंग इन दिनों हैदराबाद में चल रही है. प्रभास ने हाल ही में इस बाद की जानकारी दी थी कि वह करीब साढ़े चार साल बाद फिल्म साहो की शूटिंग कर रहे हैं. जैकी भी अगले हफ्ते से टीम साहो से जुड़ने वाले हैं.

जैकी ने की प्रभास की तारीफ कहा प्रभास महान कलाकार हैं

जैकी ने इस बात को कन्फर्म करते हुआ कहा कि मैं प्रभास की फिल्म साहो से जुड़ रहा हूं.  यह मेरे लिए काफी सम्मान की बात है. जैकी ने प्रभास की तारीफ करते हुए कहा कि प्रभास एक अच्छे कलाकार हैं और आज उन्हे पूरी दुनिया जानती है. मुझे यह देख कर काफी अच्छा लगा की उन्होंने मुझे अपनी फिल्म के लिए चुना. मैंने बाहुबली के दोनों भाग देखें हैं और वो वाकई में काफी कमाल के थे. फिल्म को देखकर मुझे मेरे बचपन की याद आ गई.

फिल्म के डायरेक्टर और फिल्म के लीड एक्टर इन दिनों अपनी इस एक्शन फिल्म साहो में बौलीवुड एक्टर्स का चुनाव कर रहे हैं. कुछ दिन पहले हीरोइन का नाम फाइनल किया गया था.

बरेली की बर्फी : कृति सैनन का दमदार अभिनय

‘‘निल बटे सन्नाटा’’ फेम निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी की त्रिकोणीय प्रेम कहानी वाली फिल्म ‘‘बरेली की बर्फी’’ बहुत ज्यदा उम्मीद नहीं बंधाती है. इस तहर के विषय पर हजारों फिल्में बन चुकी हैं. मगर फिल्मकार अश्विनी अय्यर तिवारी ने इसमें नयापन लाने के लिए बरेली नामक छोटे शहर या यूं कहें कि कस्बे की लड़की बिट्टी को सिगरेट पीने वाली, रात में घर से बाहर मोटर सायकल पर घूमने से लेकर कई बुराईयों से युक्त बताकर यह दिखाने का प्रयास किया है कि आज का नवयुवक ऐसी लड़की से शादी करना चाहता है, उसे लड़की की इन आदतों में बुराई नजर नहीं आती. काश! आज के समय में भारत के गांवों, कस्बों व छोटे शहरों  में निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी और लेखक नितीश तिवारी की सोच वाले लोग मौजूद हों.

फिल्म ‘‘बरेली की बर्फी’’ की कहानी बरेली के एक मिठाई विक्रेता मिश्रा (पंकज त्रिपाठी) की बेटी बिट्टी (कृति सैनन) के इर्द गिर्द घूमती है. बिट्टी में बरेली के लोगों को कई बुराइयां नजर आती हैं. वह मोटर सायकल पर चलती है. बिट्टी सिगरेट पीती है. बिट्टी रात रात भर घूमती रहती है. बिट्टी की मां (सीमा पाहवा) तो उसे रात रात भर घर से बाहर घूमने वाली चुड़ैल कहती हैं. मगर मिश्रा को अपनी बेटी बिट्टी में कोई बुराई नजर नहीं आती है. जब उनकी सिगरेट खत्म हो जाती है, तो उन्हें बिट्टी से मांगकर सिगरेट पीने में बुराई नजर नहीं आती. मगर बिट्टी की मां उससे परेशान रहती है. मां के ताने सुनते सुनते थक चुकी बिट्टी एक रात अपनी मां के दो हजार रूपए चुरा अपना सामान बांधकर बरेली से बाहर जाने के रेलवे स्टेशन पहुंच जाती है. रेलवे स्टेशन की बुकस्टाल से वह प्रीतम विद्रोही लिखित उपन्यास ‘बरेली की बर्फी’ खरीदती हैं. जिसे पढ़कर बिट्टी को अहसास होता है कि लेखक ने तो उसकी कहानी लिख डाली. अब वह घर वापस आ जाती है और उस लेखक की तलाश शुरू करती है.

उपन्यास ‘बरेली की बर्फी’ के लेखक चिराग (आयुष्मान खुराना) हैं, जो कि एक प्रिटिंग प्रेस के मालिक है.उन्हें अपने प्यार में धोखा मिलता है, तब वह उस प्यार की याद में ही ‘बरेली की बर्फी’ उपन्यास लिखते हैं. मगर उनकी हिम्मत नहीं है कि वह अपने नाम से उसे छापे. इसलिए वह अपने मित्र प्रीतम विद्रोही पर दबाव डालते हैं. इसलिए उपन्यास लेखक के रूप में प्रीतम विद्रोही का नाम व फोटो किताब पर है.

बिट्टी प्रिटिंग प्रेस में पहुंचकर चिराग से प्रीतम विद्रोही के बारे में पूछताछ करती है. चिराग कह देता है कि प्रीतम बरेली छोड़कर जा चुके हैं. पर बिट्टी का पत्र उन तक पहुंचाने और जवाब आने पर बिट्टी तक पहुंचाने की बात करते हैं. इसी क्रम में बिट्टी व चिराग की कई मुलाकातें होती हैं. बिट्टी से चिराग को प्यार हो जाता है. मगर बिट्टी को तो प्रीतम विद्रोही से प्यार है. इसलिए चिराग लखनऊ जाकर प्रीतम विद्रोही को बरेली लेकर आते हैं कि वह बिट्टी के सामने खुद को बहुत बड़ा गुंडा साबित करें, जिससे बिट्टी उनसे नफरत करने लगे, तब वह हमदर्दी जताकर अपने प्यार का इजहार कर बिट्टी से शादी कर लेंगे.

मजबूरन प्रीतम को अपने दोस्त चिराग की बात माननी पड़ती है. पहली मुलाकात में प्रीतम वही करता है, जैसा चिराग ने कहा है. प्रीतम के इस रूप को देखकर बिट्टी उससे नफरत करने लगती है. मगर दो दिन बाद रात में एक जलेबी की दुकान पर प्रीतम का एक अलग व प्यारा रूप देखकर बिट्टी चौंक जाती है. तब प्रीतम, बिट्टी को सारा सच बता देता है. फिर बिट्टी व प्रीतम नाटक करते हैं कि बिट्टी को प्रीतम से ही प्यार है और वह हर हाल में प्रीतम से शादी करेगी. अब इस शादी को रोकने के लिए चिराग चालें चलता है. जबकि बिट्टी, चिराग के असली प्यार की परीक्षा लेती रहती है. अंत में सगाई वाले दिन सच सामने आता है. चिराग व बिट्टी की सगाई हो जाती है.

कमजोर पटकथा व खराब एडीटिंग के साथ फिल्म की गति काफी धीमी है. फिल्म में रोमांस भी ठीक से उभर नहीं पाया. निर्देशक ने कस्बाई प्यार व रोमांस को परदे पर पेश करने की कोशिश की है, पर वह इसमें पूरी तरह से सफल नहीं हो पाए. फिल्म के सभी पात्र बनावटी व पूर्णरूपेण फिल्मी लगते हैं. फिल्म का क्लायमेक्स तो बहुत ही ज्यादा गड़बड़ है. इंटरवल के बाद फिल्म काफी गड़बड़ा जाती है. फिल्म में कसावट की जरुरत है. फिल्म की एडीटिंग भी गड़बड़ है. इंटरवल के बाद तो फिल्म बोर ही करती है. फिल्म का गीत संगीत साधारण है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो बिट्टी के किरदार में कृति सैनन अच्छी लगती हैं. उन्होंने अपने अभिनय को काफी  निखारा है. हकीकत में यह फिल्म सिर्फ कृति सैनन की अभिनय प्रतिभा के लिए ही देखी जा सकती है. आयुष्मान खुराना ठीक ठाक हैं. प्रीतम विद्रोही के किरदार में राजकुमार राव जमे नहीं हैं. उनके करियर का यह सर्वाधिक कमजोर किरदार रहा. मिश्रा के किरदार में पंकज त्रिपाठी काफी निराश करते हैं.

दो घंटे दो मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘बरेली की बर्फी’’ का निर्माण ‘बी आर स्टूडियो’ और ‘जंगली पिक्चर्स’ ने मिलकर किया है. निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी, लेखक नितीश तिवारी व श्रेयष जैन, सूत्रधार जावेद अख्तर तथा कलाकार हैं – आयुष्मान खुराना, राज कुमार राव, कृति सैनन, पंकज त्रिपाठी, सीमा पाहवा व अन्य.

आयाराम गयाराम नीतीश कुमार और उनकी नौटंकी

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी भारतीय जनता पार्टी को किसी न किसी तरह से इंदिरा कांग्रेस की तरह पूरे देश में फैला देने के काम में लगी है. देश के विकास की बातें तो अब हवा सी हो गई हैं, पर विरोधी दल के विनाश की बातें चालू हैं. भारतीय जनता पार्टी की सरकार नोटबंदी, जीएसटी, सीबीआई, आईडी, दलबदल आदि हर तरह के हथियार अपना कर हर जगह सत्ता में आ रही है.

उत्तराखंड, गोवा और अरुणाचल प्रदेश में मोदी और शाह की जोड़ी ने अपने माहिरता पहले ही दिखा दी थी और अब बिहार में नीतीश कुमार को फांस कर 2015 के राज्य विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार का बदला राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव पर मुकदमे ठोंक कर ले लिया. नीतीश कुमार, जो लालू प्रसाद यादव का बोझ नहीं उठाना चाहते थे और नरेंद्र मोदी से 2014 से पहले के मनमुटावों को दूर करने के लिए छटपटा रहे थे, इस मौके का पूरा फायदा उठा रहे हैं.

बिहार में अब भारतीय जनता पार्टी समर्थक सरकार बनी है, जिस में आयाराम गयाराम नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बने हैं. यह कोई अचरज नहीं है. बिहार को तो वैसे ही हिंदू कट्टरवादी शासकों की आदत रही है. लालू प्रसाद यादव से पहले बिहार की बागडोर उन्हीं के हाथों में रही थी, चाहे उस समय बिल्ला कांग्रेस का था. आज मुहर भारतीय जनता पार्टी की लग रही है, पर सत्ता में वही लोग रहेंगे, जो घोर जातिवादी हैं, पर उन का जातिवाद से मतलब केवल ऊंची जातियों का राज है.

नीतीश कुमार को 2015 के चुनावों में उम्मीद थी कि वे लालू प्रसाद यादव से ज्यादा सीटें ले जाएंगे, पर चुनाव नतीजों में जब तरहतरह के आरोपों से घिरे लालू प्रसाद यादव को ज्यादा वोट व ज्यादा सीटें मिल गईं, तो नीतीश कुमार चिड़चिड़े हो गए. वे अपनी साफ छवि का चक्कर बनाए रखने के लिए मौका ढूंढ़ रहे थे, जो केंद्र सरकार ने लालू परिवार पर रेलवे टैंडरों में गड़बड़ी के नाम पर उन्हें दे दिया.

नीतीश कुमार चाहे बात करने में कितने ही ठीक लगते हों, 1995 से ही वे पाले बदलते रहे हैं. लोहियावादी और कट्टरपंथी सोच के खिलाफ होने का मुखौटा पहना जरूर था, पर टोकन के नाम पर कुछ करने के अलावा उन्होंने पिछड़ी व निचली जातियों के लिए खास कभी कुछ न किया.

वे अभी बिहार में बने रहेंगे और सत्ता में रहेंगे. भाजपा अब सभी राज्यों में दलितों और पिछड़ों को ढूंढ़ढूंढ़ कर ऊंचे पदों पर बिठा रही है और एक तरह से जातिवाद में जकड़े समाज के टुकड़ों पर अलगअलग मुहर लगा रही है, ताकि ऊंची जातियों को राज करने का अवसर मिलता रहे.

बिहार की नौटंकी साफ कर रही है कि बिहार असल में फिसड्डी क्यों है. यहां जाति का सवाल काम से ज्यादा बड़ा है और नीतीश कुमार भी इस गुत्थी को सुलझाने के बजाय इसे उलझा कर सत्ता में बने रहने के जुगाड़ में लगे हैं. इस फेरबदल से बिहार के विकास के कदम बढ़ेंगे, यह तो भूल जाएं.

नीतीश कुमार : सत्ता बचाई पर साख गंवाई

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 26 जुलाई, 2017 की शाम को 6 बज कर, 32 मिनट पर राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी को अपना इस्तीफा सौंप कर 20 महीने पुराने महागठबंधन को एक झटके में तोड़ डाला. ‘संघ मुक्त भारत’ का नारा गला फाड़फाड़ कर चिल्लाने वाले नीतीश कुमार रात के 9 बजे तक एक बार फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की गोद में जा बैठे. बिहार की सियासत में ‘इस्तीफा मास्टर’ और ‘पलटीमार’ नेता के नाम से मशहूर हो चुके नीतीश कुमार ने एक बार फिर अपनी इमेज को पुख्ता कर दिया है.

भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे तेजस्वी यादव द्वारा इस्तीफा नहीं देने पर जब लालू प्रसाद यादव अड़ गए, तो नीतीश कुमार ने अपना पुराना राग ‘अंतरात्मा की आवाज’ गाया. साथ ही, महागठबंधन और लालू प्रसाद यादव से नाता तोड़ कर अपनी पुराने साथी भाजपा से हाथ मिला लिया.

जिस भाजपा को नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव के साथ मिल कर साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनावों में धूल चटा दी थी, उसी भाजपा के लिए उन्होंने बिहार में सियासत की मजबूत जमीन तैयार कर दी है.

इस्तीफा देने के एक घंटे बाद ही नीतीश कुमार ने भाजपा नेताओं के साथ बैठक की और राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी से मिल कर सरकार बनाने का दावा भी पेश कर दिया. सबकुछ इतनी तेजी के साथ हुआ, तो खुलासा हो गया कि नीतीश कुमार और भाजपा के बीच काफी समय से सियासी खिचड़ी पक रही थी और नीतीश कुमार इसे परोसे जाने के लिए खास समय का इंतजार कर रहे थे या इस के लिए भूमिका तैयार कर रहे थे.

5 जुलाई, 2017 को तेजस्वी यादव के खिलाफ सीबीआई की एफआईआर और 7 जुलाई, 2017 को लालू प्रसाद यादव के 20 ठिकानों पर सीबीआई और आयकर विभाग की छापेमारी के बाद से ही महागठबंधन में तेजस्वी यादव के इस्तीफे को ले कर घमासान मचा हुआ था.

26 जुलाई, 2017 को जब लालू प्रसाद यादव ने राष्ट्रीय जनता दल की विधायक दल की बैठक के बाद तेजस्वी यादव के इस्तीफा नहीं देने की बात दोहराई, तो महागठबंधन में सन्नाटा पसर गया था. उसी शाम होने वाली जनता दल (यूनाइटेड) के विधायक दल की बैठक पर सब की निगाहें टिक गईं और जैसा अंदाजा था, वही हुआ.

नीतीश कुमार ने जा कर राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी को अपना इस्तीफा सौंप दिया. उस के बाद जब नरेंद्र मोदी ने ट्वीट के जरीए नीतीश कुमार की तारीफ की, तो लालू प्रसाद यादव भड़क गए और उन्होंने नया फार्मूला सुझा कर महागठबंधन को बचाने की कोशिश की.

लालू प्रसाद यादव ने कहा कि न तो नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रहें और न ही तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री रहें. राजद, जद (यू) और कांग्रेस के विधायकों की बैठक हो और नए नेता को चुन लिया जाए. राजद सब से बड़ा दल है, इसलिए मुख्यमंत्री की कुरसी पर उस का हक पहले बनता है.

लालू प्रसाद यादव के इस बयान के बाद शह और मात का खेल तेज हो गया और उसी बीच भाजपा ने लोहा गरम देख कर नीतीश कुमार का साथ देने का हथौड़ा चला दिया. नैतिकता के नाम पर जबतब इस्तीफा दे कर सियासी इलाके में हड़कंप मचाने वाले नीतीश कुमार के बारे में कहा जाता है कि वे सियासी मुश्किलों से जूझने के बजाय भाग खड़े होते हैं. इस बार भी बड़े जतन से बनाए गए महागठबंधन को नैतिकता के नाम पर झटके में तोड़ डाला.

साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनावों में जनता ने महागठबंधन को जनादेश दिया था, न कि अकेले नीतीश कुमार को. सब से बड़ा दल होने के बाद भी राजद (80 सीट) ने जद (यू) (71 सीट) के नेता नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुरसी सौंप दी थी.

राजद को झटका देने से पहले नीतीश कुमार भाजपा को भी इस्तीफे का झटका दे चुके हैं. जून, 2013 को भी भाजपा के साथ 17 साल पुराने रिश्ते को पलक झपकते ही इसलिए तोड़ डाला था, क्योंकि नरेंद्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री के तौर पर प्रोजैक्ट कर दिया था, जबकि नरेंद्र मोदी गोधरा कांड के आरोपों से घिरे हुए थे.

नीतीश कुमार कहते हैं कि 20 महीने में उन्होंने पूरी ईमानदारी के साथ इस गठबंधन सरकार को चलाने की कोशिश की. उन का दावा है कि वे किसी भी कीमत पर भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टौलरैंस’ की नीति से समझौता नहीं कर सकते हैं. वे यह भी सफाई दे रहे हैं कि वे हमेशा से विपक्षी एकता के हिमायती रहे हैं, लेकिन विपक्षी एकता का कोई एजेंडा भी तो होना चाहिए.

उधर लालू प्रसाद यादव नीतीश कुमार पर हमला करते हुए कहते हैं कि वे कहते थे कि मिट्टी में मिल जाएंगे, पर भाजपा के साथ नहीं जाएंगे, पर जनता से मिले भारी जनादेश को लात मार कर दंगाइयों के साथ चले गए.

अपने ऊपर लगे पुत्रमोह के आरोपों को खारिज करते हुए लालू प्रसाद यादव कहते हैं कि उन्होंने आंख मूंद कर बेटे का साथ नहीं दिया, जनता ने उन्हें जनादेश दिया था, इसलिए तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री बनाया गया.

इस सियासी उठापटक से नीतीश कुमार को जहां दोबारा मुख्यमंत्री की कुरसी मिल गई, वहीं साल 2015 के विधानसभा चुनावों में हीरो बन कर उभरे लालू प्रसाद यादव एक बार फिर सियासी हाशिए पर धकेल दिए गए हैं.

‘किंगमेकर’ कहे जाने वाले लालू प्रसाद यादव को अपने ही बेटे तेजस्वी यादव को ‘किंग’ बनाने के चक्कर में बहुत बड़ा झटका लगा है, वहीं लालूनीतीश की दोस्ती से कांग्रेस को जो मलाई खाने का मौका मिला था, उसे अब बिहार में अपना सियासी वजूद बचाने के लिए एक बार फिर जद्दोजेहद करनी पड़ेगी.

उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के परिवार में हुई फूट की वजह से कांग्रेस का सियासी गुणाभाग गड़बड़ा गया था और अब बिहार में लालूनीतीश की फूट से उस का राज्य की सियासत में पैठ बनाने का सपना तारतार हो गया है.

उत्तर प्रदेश और बिहार में लोकसभा की कुल 120 सीटें हैं, जिन में से कांग्रेस के कब्जे में एक भी सीट नहीं है.

बिहार में सियासी उठापटक का सब से बड़ा फायदा भाजपा को मिल गया है. साल 2015 का विधानसभा चुनाव जीतने के लिए एड़ीचोटी का जोर लगाने के बाद भी उसे करारी हार का सामना करना पड़ा था. फिलहाल वह साल 2020 में बिहार पर फतेह करने की कवायद में लगी हुई थी. लालूनीतीश में फूट डाल कर उस ने 3 साल पहले ही बिहार में अपनी सरकार बना ली है.

भाजपा के सूत्र बताते हैं कि अमित शाह और नरेंद्र मोदी की जोड़ी ने बिहार में सत्ता पाने के लिए लंबा इंतजार करने के बजाय महागठबंधन में ही उठापटक मचा कर सत्ता हासिल कर ली है.

लालू प्रसाद यादव और उन के परिवार को सीबीआई, इनकम टैक्स, ईडी और कोर्ट के चक्करों में उलझा कर उन्हें कमजोर बना दिया है और नीतीश कुमार को अपने पाले में मिला कर सत्ता की चाबी हासिल कर ली है.

पिछले साल नवंबर महीने में नोटबंदी के बाद से ही नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुर में सुर मिलाना चालू कर दिया था. उस के बाद सर्जिकल स्ट्राइक के मामले में भी नीतीश कुमार उन के साथ खड़े दिखे.

इस साल जनवरी महीने में पटना में गुरु गोविंद सिंह के 350वें जन्मदिन पर आयोजित प्रकाश पर्व के मौके पर नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के बीच जुगलबंदी तेज हो गई थी.

नीतीश कुमार कई मौकों पर महागठबंधन की लाइन से अलग जा कर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ में कसीदे गढ़ चुके थे. जीएसटी, सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी और बेनामी जायदाद के मामले में नीतीश कुमार ने खुल कर नरेंद्र मोदी का साथ दिया था.

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में भाजपा की जीत और सरकार बनने से नीतीश कुमार की बांछें खिली हुई थीं. नीतीश कुमार और महागठबंधन में उन के साथी और ‘बड़े भाई’ लालू प्रसाद यादव के बीच उसी समय से सबकुछ ठीकठाक नहीं चल रहा था.

जद (यू) के कई नेता दबी जबान में कहते रहे हैं कि लालू प्रसाद यादव के बढ़ते सियासी दबाव और ऊलजुलूल मांगों से नीतीश कुमार परेशान रहते थे. भाजपा से दोबारा हाथ मिलाने की धौंस दिखा कर नीतीश कुमार अपने सियासी साथी लालू प्रसाद यादव को काबू में रखने का दांव चल सकते हैं.

पिछले दिनों राबड़ी देवी ने अपने बेटे तेजस्वी यादव को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने की मांग तेज कर महागठबंधन के अंदर खलबली मचा दी थी. राजद खेमा पिछले कुछ महीने से उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने की जमीन तैयार करने में लगा हुआ था.

राबड़ी देवी ने अपनी बात को बल देने के लिए कह डाला था कि राज्य की जनता तेजस्वी को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती है.

भाजपा नेता और अब नीतीश कुमार की ताजा सरकार में उपमुख्यमंत्री बने सुशील कुमार मोदी पहले भी कई बार यह कहते रहे हैं कि नीतीश कुमार पलटी मारने में माहिर हैं. जब भाजपा से 17 साल पुराना रिश्ता वे एक झटके में तोड़ सकते हैं, तो लालू प्रसाद यादव से उन की सियासी दोस्ती लंबी नहीं चलने वाली है.

नैशनल पार्टी होने के बाद भी भाजपा ने बिहार में नीतीश कुमार को बड़े भाई की भूमिका सौंप रखी थी, उस के बाद भी नीतीश कुमार ने उस रिश्ते की लाज नहीं रखी थी. अब लालू प्रसाद यादव के साथ मिलने से नीतीश कुमार छोटे भाई की भूमिका में आ गए हैंं और लालू प्रसाद यादव के बढ़ते सियासी दबाव को वे ज्यादा समय तक झेल नहीं पाएंगे.

सुशील कुमार मोदी की यह बात आखिरकार 20 जुलाई, 2017 की शाम को सच हो गई. नीतीश कुमार 1974 के जेपी आंदोलन की उपज हैं. 2005 में बिहार के मुख्यमंत्री बने और ‘न्याय के साथ विकास’ का नारा दिया. पटना के बख्तियारपुर प्रखंड में 1 मार्च, 1951 को जन्म हुआ. नालंदा जिले के कल्याणबिगहा में पैतृक गांव है. पिता का नाम कविराज रामलखन सिंह और माता का नाम परमेश्वरी देवी.

पटना से इंजीनियरिंग की. 22 फरवरी, 1973 को मंजू कुमारी से विवाह. 2007 में पत्नी का निधन हुआ. बेटा निशांत कुमार इंजीनियर है. 1985 में पहली बार विधायक बने और 1989 में पहली बार सांसद.
1990 के अप्रैल से नवंबर महीने तक केंद्रीय कृषि मंत्री रहे. 19 मार्च, 1998 से 5 अगस्त, 1999 तक केंद्रीय रेल मंत्री रहे. 13 अक्तूबर, 1999 से 22 नवंबर, 1999 तक भूतल परिवहन मंत्री रहे. 27 मई, 2000 से 20 मार्च, 2001 तक कृषि मंत्री रहे. 22 जुलाई, 2001 से 2004 तक रेल मंत्री रहे.

साल 2000 में 3 मार्च से 10 मार्च तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे. 24 नवंबर, 2005 को दूसरी बार मुख्यमंत्री बने और कार्यकाल पूरा किया. 26 नवंबर, 2010 को तीसरी बार मुख्यमंत्री बने. 18 जून, 2013 को पद से इस्तीफा दे कर जीतनराम मांझी को कुरसी पर बिठाया. 22 फरवरी, 2015 को जीतनराम मांझी को हटा कर मुख्यमंत्री का पद संभाला. उस के बाद महागठबंधन सरकार में मुख्यमंत्री बने.

ताकत : ईमानदार छवि व फैसले के मामले में पक्के हैं. संसदीय जीवन का लंबा अनुभव है और विकास का नारा लगाते हैं.

कमजोरी : ज्यादातर अपने मन की सुनते हैं. भरोसेमंद साथी की पहचान नहीं. गिनेचुने लोगों के साथ रहना पसंद करते हैं.

लालू प्रसाद यादव 1974 के जेपी आंदोलन की उपज हैं. समाजवादी और सामाजिक न्याय के अगुआ नेता रहे हैं. 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर छपरा से पहली बार सांसद चुने गए. 1980 से 1989 तक 2 बार सोनपुर विधानसभा सीट से चुने गए. प्रतिपक्ष के नेता रहे. 10 मार्च, 1990 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने. 1995 में दोबारा भारी बहुमत से जीत कर मुख्यमंत्री बने. 1997 में चारा घोटाले के खुलासे के बाद मुख्यमंत्री पद छोड़ा और पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया.

1997 में जनता दल से अलग हो कर राष्ट्रीय जनता दल बनाया. 2004 लोकसभा चुनावों में ‘किंग मेकर’ बने और केंद्र में रेल मंत्री भी. 24 मई, 2004 से 22 मई, 2009 तक रेल मंत्री रहे.
गोपालगंज जिले के फुलवरिया गांव में 11 जून, 1948 को जन्म हुआ. पिता का नाम कुंदन राय और माता का नाम मछरिया देवी. शुरुआती पढ़ाई गोपालगंज के प्राइमरी स्कूल में. राजनीतिशास्त्र और एलएलबी की पढ़ाई पटना यूनिवर्सिटी से की. 1 जून, 1973 को राबड़ी देवी से विवाह हुआ. 7 बेटियां और 2 बेटे हैं.

ताकत : बोलने में माहिर और आत्मविश्वास से भरपूर हैं. राजनीति पर गहरी पकड़ और मिलनसार हैं. मुसलिम और यादव वोटरों पर पकड़.

कमजोरी : गंभीर मसलों को हलके में लेना. जिद्दी और अतिमहत्त्वाकांक्षी. किसी पर तुरंत भरोसा कर लेते हैं और अपनी बोली और काम करने के तरीकों से विवादों में घिरते रहते हैं.

मिथाली राज और झूलन गोस्वामी की कहानी

तकरीबन 6 साल पुरानी बात है. दिल्ली प्रैस की लोकप्रिय पत्रिका ‘गृहशोभा’ ने मई (प्रथम), 2011 अंक खेल जगत से जुड़ी 15 महिलाओं की कामयाबी के नाम समर्पित किया था. तब क्रिकेट की शानदार खिलाड़ी मिथाली राज से मिलने का मौका हासिल हुआ था. अपने इंटरव्यू में उन्होंने महिला क्रिकेट खिलाड़ियों और बीसीसीआई को ले कर बड़ी अहम बात कही थी, ‘‘बीसीसीआई से पहले महिला क्रिकेट का एक अलग बोर्ड था. उस की माली हालत ज्यादा अच्छी नहीं थी.

साल 2006 में बीसीसीआई ने महिला क्रिकेट को अपने अंडर में ले लिया था. इस के बाद से महिला क्रिकेटरों को पहले के मुकाबले काफी अच्छी सुविधाएं मिलने लगी हैं. इस से हमें अच्छेअच्छे स्टेडियमों में खेलने का मौका मिल रहा है.”

बीसीसीआई और महिला क्रिकेटरों की यह जुगलबंदी क्या आज साल 2017 में रंग ला पाई है. अगर इंगलैंड में हुए हालिया महिला क्रिकेट वर्ल्ड कप की बात छोड़ दें, तो ऐसा कहीं से नहीं लगा कि भारत में महिला क्रिकेट का कोई उज्ज्वल भविष्य है. हां, बीते सालों में भारत की कुछ खिलाड़ियों ने रिकौर्ड बनाए हैं, लेकिन उन्हें उस तरह की पब्लिसिटी नहीं मिली, जैसी पुरुष क्रिकेटरों को मिलती रही है.

2 महिला खिलाड़ियों की बात करते हैं. पहली हैं मिथाली राज, जिन्हें उन के खेल कारनामों की वजह से ‘लेडी सचिन तेंदुलकर’ कहा जाता है.

3 दिसंबर, 1982 को राजस्थान के जोधपुर में जनमी मिथाली राज ने साल 1999 में 16 साल की उम्र में इंगलैंड में आयरलैंड के साथ अपना पहला इंटरनैशनल वनडे मैच खेला था. उन्होंने अब तक 186 वनडे मैच खेले हैं, जिन में उन्होंने 51.58 की औसत से 6190 रन बनाए हैं. वे वनडे मैचों में 6 हजार रन पूरे करने वाली दुनिया की पहली महिला बल्लेबाज हैं.

मिथाली राज ने अब तक 10 टैस्ट मैच खेले हैं, जिन में उन्होंने 51 की औसत से 663 रन बनाए हैं. उन्होंने टैस्ट मैचों में एक दोहरा शतक भी लगाया है.

भारतीय महिला क्रिकेट टीम भले ही इस बार के वर्ल्ड कप में मेजबान इंगलैंड से 9 रन से हार गई, लेकिन जब आईसीसी ने इस टूर्नामैंट को ध्यान में रखते हुए महिला वर्ल्ड कप, 2017 की टीम बनाई, तो उस की कप्तानी मिथाली राज को ही सौंपी. क्रिकेट में अपनी उपलब्धियों के लिए उन्हें ‘अर्जुन अवार्ड’ और ‘पद्मश्री अवार्ड’ भी मिल चुका है.

दूसरी खिलाड़ी हैं झूलन गोस्वामी. अगर मिथाली राज अपनी बल्लेबाजी से ‘लेडी सचिन तेंदुलकर’ कहलाती हैं, तो झूलन गोस्वामी को अपनी बेहतरीन गेंदबाजी की वजह से ‘लेडी कपिल देव’ का खिताब दिया जाना चाहिए.

25 नवंबर, 1982 को पश्चिम बंगाल के नदिया में जनमी झूलन गोस्वामी को ‘बाबुल’ के उपनाम से भी जाना जाता है. उन्होंने पहला वनडे मैच जनवरी, 2002 में चेन्नई में इंगलैंड के खिलाफ खेला था.
सब से तेज गेंदबाज का खिताब पा चुकी झूलन गोस्वामी ने अब तक 164 वनडे मैच खेले हैं, जिन में उन्होंने 21.95 की औसत से 195 विकेट झटके हैं. अब तक 10 टैस्ट मैच खेलने वाली इस खिलाड़ी ने 16.62 की औसत से 40 विकेट बटोरे हैं.

5 फुट, 11 इंच लंबे कद की दाएं हाथ की तेज गेंदबाज झूलन गोस्वामी महिला क्रिकेटरों की दुनिया की सब से ज्यादा विकेट लेने वाली गेंदबाज हैं. उन्हें भी ‘अर्जुन अवार्ड’ और ‘पद्मश्री अवार्ड’ मिल चुका है. झूलन गोस्वामी ने साल 2007 में ‘आईसीसी वुमन क्रिकेटर औफ द ईयर अवार्ड’ भी जीता था और मिथाली राज से पहले वे ही भारतीय क्रिकेट टीम की कप्तान थीं.

भारतीय महिला क्रिकेट टीम में ऐसी और भी कई खिलाड़ी हैं, जिन्होंने अपने बेहतरीन खेल से भारत का नाम रोशन किया है, लेकिन दुख की बात है कि उन्हें वह शोहरत नहीं मिली है, जो पुरुष क्रिकेटरों को मिलती है.

अब वर्ल्ड कप के फाइनल में पहुंचने के बाद बीसीसीआई ने वर्ल्ड कप में खेलने वाली सभी भारतीय महिला खिलाड़ियों को 50-50 लाख रुपए देने की बात कही. इस के अलावा खिलाड़ियों को नौकरियां या उन्हें नौकरी में तरक्की देने की बात चल रही है, लेकिन ये इनाम इस हकीकत को नहीं छिपा सकते हैं कि ज्यादातर भारतीय महिला क्रिकेट खिलाड़ी अभी तक गुमनामी में ही खेली हैं.

इसी गुमनामी को दूर करने के लिए महिला क्रिकेट के आईपीएल टूर्नामैंट को शुरू करने की मांग जोर पकड़ने लगी है. इस से दूसरी महिला खिलाड़ियों को भी अपना हुनर दिखाने का मौका मिलेगा, साथ ही पैसा कमाने का भी.

महिलाओं के इस वर्ल्ड कप को टैलीविजन पर देखने वालों की तादाद बढ़ी है. भारत में क्रिकेट प्रेमी अब महिला खिलाड़ियों के नाम जानने लगे हैं, उन की काबिलीयत से रूबरू हो रहे हैं, जो भारतीय महिला क्रिकेट के लिए अच्छे संकेत हैं.

अगर महिलाओं का आईपीएल शुरू होगा, तो यकीनन उन्हें फायदा होगा और क्या पता वे लोगों की वाहवाही पा कर अपनी मेहनत के दम पर अगला वर्ल्ड कप ही जीत लाएं. मिथाली राज और झूलन गोस्वामी के कारनामों के लिए उन्हें ऐसी सौगात देना सोने पर सुहागा होगा.

पीएम पर भड़की स्वरा, जमकर निकाला गुस्सा

बौलीवुड अभिनेत्री स्‍वरा भास्‍कर एक बार फि‍र से चर्चा में हैं. स्वरा ने नरेन्द्र मोदी के ‘न्यू इंडिया’ और एक अंग्रेजी न्यूज़ चैनल रिपब्लिक को लेकर अपना गुस्‍सा जाहिर किया है. मामला जुड़ा है केरल के चर्चित लव जिहाद मामले से.

स्वरा ने कहा है कि इस ‘न्यू इंडिया’ में हिंदू लड़की मुस्लिम लड़के से प्यार नहीं कर सकती है वर्ना टीवी वाले उसका स्टिंग औपरेशन कर उसे लव जिहाद साबित करवा देंगे और लोग उसे मान भी लेंगे. स्वरा का ये बयान चैनल की उस खबर के बाद आया जिसमें दिखाया गया था कि केरल में हिन्दू लड़की के धर्म परिवर्तन के बाद मुस्लिम लड़के से विवाह का यह अकेला मामला नहीं है.

केरल उच्च न्यायलाय ने मामले को ‘लव जिहाद’ बताते हुए विवाह को रद्द कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने निर्देश दिया कि राष्ट्रीय जांच एजेन्सी शीर्ष अदालत के सेवानिवृत्त न्यायाधीश आर वी रवीन्द्रन की निगरानी में इस मामले की जांच करे. स्वरा ने इसी मामले में ट्वीट करते हुए चुटकी ली है.

गांवों की मूर्तियों पर चोरों की नजर

3 जुलाई, 2017 को बिहार के मधुबनी जिले के राजनगर थाना क्षेत्र के सिमरी गांव के रामजानकी मंदिर से राम, जानकी और लक्ष्मण की अष्टधातु से बनी सैकड़ों साल पुरानी मूर्ति पर चोरों ने हाथ साफ कर डाला. उस मूर्ति को खोजने के लिए पुलिस पूरे मधुबनी जिले में डौग स्क्वाड ले कर दरदर भटकती रह गई, लेकिन चोरों का कोई सुराग नहीं मिला. पुलिस अफसरों का मानना है कि मूर्ति चोरी के मामलों में जांच के लिए माहिर होने चाहिए, जो केवल सीबीआई के पास हैं.

पुलिस से मिली जानकारी के मुताबिक, गिरोह के लोग चावल, दाल जैसे अनाज के बोरों में मूर्तियों को छिपा कर ले जाते हैं. इतना ही नहीं, मूर्ति चुराने में चोर काफी सावधानी बरतते हैं. वे रबड़ के दास्ताने पहन कर मूर्तियां उठाते हैं. प्लास्टिक की चादर पर पीओपी छिड़क कर उसे रबड़ की ट्यूब में पैक किया जाता है. उस के बाद उसे कार्बन शीट से लपेट दिया जाता है. इस से मूर्ति के बारे में मैटल डिटैक्टर से भी पता नहीं चल पाता है.

मूर्ति चोर गिरोह 3 लैवलों पर काम करते हैं. पहला होता है, लोकल अपराधी गिरोह. दूसरा होता है मिडिलमैन, जो सारी चीजें मैनेज करता है. उस के बाद खरीदार की बारी आती है, जो ज्यादातर देश के बाहर होते हैं. मिडिलमैन ही पुरानी मूर्तियों की रेकी और इंटरनैशनल मार्केट में उस की कीमत का आकलन करता है. वही विदेशी खरीदारों के संपर्क में रहता है.

मिडिलमैन ही लोकल अपराधी से मिल कर मूर्ति को चुराने का काम कराता है और इस के एवज में चोर को 50 हजार से एक लाख रुपए तक दिए जाते हैं. मिडिलमैन को 5 से 10 लाख रुपए मिलते हैं और विदेशों में बैठे तस्कर उन मूर्तियों को करोड़ों रुपए में बेचते हैं. बिहार से सटे नेपाल के विराटनगर और काठमांडू में ऐसे खरीदारों और चोरों का अड्डा है.

कुछ समय पहले अररिया पुलिस ने यादव नाम के एक अपराधी को पकड़ा था, जिस का काम चोरी की मूर्तियों का धंधा करना था. उस चोर ने ही पुलिस को बताया था कि बिहार और उत्तर प्रदेश के मंदिरों से मूर्तियों को चुरा कर कुछ दिनों के लिए जमीन में गाड़ कर रख दिया जाता है. पुलिस की जांच धीमी पड़ने के बाद मूर्ति को निकाल कर नेपाल पहुंचा दिया जाता है. चोरी की गई ज्यादातर मूर्तियों की खरीदफरोख्त नेपाल में ही होती है.

बिहार सरकार के होश पिछले साल तब उड़ गए थे, जब बिहार के जमुई जिले के खैरा गांव से चोरों ने महावीर की 26 सौ साल पुरानी ऐतिहासिक मूर्ति गायब कर दी थी.

ब्लैक स्टोन से बनी महावीर की मूर्ति की कीमत इंटरनैशनल मार्केट में करोड़ों रुपए की है. चोरों की खोज में पुलिस ने ताबड़तोड़ छापामारी की, लेकिन वे हाथ नहीं लगे. 6 दिसंबर की सुबह जुमई के ही बिछबे गांव के दरगाही पोखर के पास सड़के के किनारे एक बोरा पड़ा मिला. लोगों को शक हुआ कि कहीं बोरी में किसी की लाश तो नहीं है?

जब बोरा खोला गया, तो उस में महावीर की मूर्ति नजर आई. गांव के मुखिया नरेंद्र कुमार यादव को जब इस बारे में बताया गया, तो उन्होंने पुलिस को सूचना दी.

जमुई से महावीर की कीमती मूर्ति चोरी होने के बाद जैनियों की श्वेतांबर सोसाइटी ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मूर्ति की बरामदगी के लिए इंटरनैशनल दबाव डालना शुरू कर दिया.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस मामले को ले कर पुलिस हैडक्वार्टर के अफसरों की क्लास लगा दी. उधर केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इस मामले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बात की.

खैरा थाना क्षेत्र के गरही में सीआरपीएफ की 215 बटालियन के अफसरों और खैरा थाने के अध्यक्ष रामनाथ राय की अगुआई में पुलिस के जवानों ने हरखार पंचायत के दीपाकरहर, रजला, सिरसिया, काली पहाड़ी और रोपावेल समेत आसपास के दर्जनों गांवों में मूर्ति ढूंढ़ने की मुहिम चलाई थी.

पुलिस की दबिश से घबरा कर तस्करों ने 2 टन वजनी मूर्ति को छोड़ कर भागने में ही अपनी भलाई समझी और मूर्ति को बरामद कर सरकार और पुलिस ने अपनी लाज बचा ली.

जुमई जिले के लछुआर इलाके से तकरीबन 10 किलोमीटर की दूरी पर मशहूर जैन मंदिर है. इस मंदिर में कुल 20 छोटीबड़ी मूर्तियां हैं, जिन में से सब से बड़ी मूर्ति 24वें तीर्थंकर महावीर की है. यह मूर्ति मंदिर के बाहरी भाग में थी और बेशकीमती होने के बाद भी उस की हिफाजत का कोई ठोस इंतजाम नहीं किया गया था.

इस मूर्ति के बारे में कहा जाता है कि 26 सौ साल पुरानी महावीर की इस मूर्ति की स्थापना महावीर के घर छोड़ने के बाद उन के बड़े भाई नंदीवर्धन ने की थी. इस मंदिर को देखने के लिए हर साल तमाम विदेशी सैलानी आते हैं. इस के बाद भी सरकार और जिला प्रशासन ने मूर्ति की हिफाजत का कोई खास इंतजाम नहीं किया था.

चोरी की सब से ज्यादा वारदातें नालंदा, नवादा और गया जिले में हुई हैं. साल 2015 में 13 मूर्तियों की चोरी हुई, जबकि साल 2014 में 28. साल 2013 में चोरों ने 65 ऐतिहासिक मूर्तियों पर हाथ साफ किया, तो साल 2012 में 62 मूर्तियां गायब की गईं. साल 2011 में चोरों ने 30 मूर्तियों की चोरी कर उन्हें ठिकाने लगा डाला. इन मूर्तियों का पता लगाने में पुलिस अभी तक नाकाम रही है.

पिछले साल मूर्ति चोरी की वारदातों में तेजी से हुए उछाल के बाद सरकार की नींद टूटी थी और उस के बाद से अब तक वह ऐतिहासिक मूर्तियों की हिफाजत के पुख्ता इंतजाम करने का केवल ढिंढोरा पीट रही है. पुलिस हैडक्वार्टर ने ऐसे मामलों में शामिल सभी आरोपियों की पहचान कर उन्हें गिरफ्तारी का आदेश जारी किया है. साथ ही, इस तरह के मामलों के अनुसंधान का जिम्मा आर्थिक अपराध इकाई यानी ईओयू को सौंपा गया है. अब तक ऐसे मामलों की जांच सीआईडी करती थी.

आर्थिक अपराध इकाई यानी ईओयू के आईजी जितेंद्र सिंह गंगवार ने बताया कि ऐतिहासिक मूर्तियों की हिफाजत के लिए सभी जिलों के एसपी को मुस्तैद रहने को कहा गया है. तस्करों के नैशनल और इंटरनैशनल नैटवर्क का पता लगाने और उन्हें गिरफ्तार करने के लिए स्पैशल टीम बनाई गई है.

18 जुलाई, 2016 को औरंगाबाद जिले के गोह इलाके में पुलिस ने 10 मूर्ति तस्करों को दबोच लिया था. पुलिस का दावा है कि जमुई से महावीर की मूर्ति चोरी में इसी गिरोह की भागीदारी रही थी. गोह थाना क्षेत्र के मरही धाम मंदिर से सिंहवासिनी देवी और भृगु ऋषि की हजारों साल पुरानी मूर्तियों को चुराने के बाद गिरोह के लोग उन्हें बेचने की कोशिशों में लगे हुए थे.

सिंहवासिनी देवी की मूर्ति को गया जिले के आंती थाना क्षेत्र से बरामद कर लिया गया, जबकि दूसरी मूर्ति को बेचने के लिए राज्य से बाहर भेज दिया गया था.

बिहार के औरंगाबाद जिले में पकड़े गए एक मूर्ति चोर ने पुलिस को बताया कि उस का इंटरनैशनल मूर्ति तस्करों से संबंध है. मूर्ति चोरी को अंजाम देने से पहले वे लोग देशभर के मंदिरों में घूमघूम कर देवीदेवताओं की मूर्ति के फोटो मोबाइल फोन से लेते हैं. इस के बाद सोशल मीडिया के जरीए मूर्तियों के फोटो विदेशों में बैठे खरीदारों को भेज देते हैं.

फोटो देखने के बाद विदेशी खरीदार अपनी पसंद की मूर्तियों के लिए काम करने का आदेश देते हैं. 21 जनवरी, 2017 को समस्तीपुर के मुसरीघरारी थाना क्षेत्र के हरपुर एलौथ के वार्ड नंबर-7 में रामजानकी मंदिर पर चोरों ने अपना हाथ साफ कर दिया. अष्टधातु से बनी सीता और लक्ष्मण की मूर्तियों को चुरा कर चोरों ने पुलिस को खुली चुनौती दे डाली.

6-6 किलो की इन दोनों मूर्तियों की कीमत इंटरनैशनल मार्केट में 20 लाख रुपए आंकी गई है.

मुजफ्फरपुर के बरियारपुर ओपी क्षेत्र के जोगनी जागा गांव में 10 जनवरी, 2017 की रात को चोरों ने रामजानकी मंदिर का ताला तोड़ कर अष्टधातु की

5 मूर्तियां और चांदी के 2 मुकुट चुराए और चंपत हो गए. 11 जनवरी की सुबह जब पुजारी मंदिर में पूजा करने पहुंचे, तो उन्होंने मंदिर का ताला टूटा देखा.

पंडित रामप्रीत झा ने थाने में शिकायत दर्ज कराई. मौके पर पहुंचे डीएसपी मुत्तफिक अहमद ने बताया कि मंदिर से कृष्ण, गणेश, विष्णु, हनुमान और छोटा गोपाल की मूर्तियां चोरी हुई हैं. इन की कीमत तकरीबन 10 लाख रुपए आंकी गई है.

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