स्निफ : यकीन नहीं होता ये अमोल गुप्ते की फिल्म है

पुरस्कृत फिल्म ‘तारे जमीन पर’ के लेखक तथा ‘स्टेनली का डिब्बा’ और ‘हवा हवाई’ जैसी उत्कृष्ट फिल्मों के सर्जक अमोल गुप्ते इस बार बाल जासूस फिल्म ‘‘स्निफ’’ लेकर आए हैं, जो कि बहुत निराश करती है.

‘‘हर बच्चे में कोई न कोई काबीलियत होती है.’’ इस मूल मुद्दे के साथ बाल जासूस वाली फिल्म ‘स्निफ’ देखकर मन में एक ही सवाल उठता है कि क्या इस फिल्म के सर्जक वही अमोल गुप्ते हैं, जिन्हें फिल्म ‘‘तारे जमीन पर’’ जैसी फिल्म के लेखन के लिए कई पुरस्कार मिले थे? क्या ‘स्निफ’ के लेखक व निर्देशक वही अमोल गुप्ते हैं, जो अतीत में ‘‘स्टेनली का डिब्बा’’ और ‘‘हवा हवाई’’ जैसी फिल्म का सृजन कर चुके हैं.

फिल्म की कहानी मुंबई की एक कास्मोपोलीटीन इमारत की है, जिसमें हर प्रांत, हर भाषा के लोग रहते हैं. इसी इमारत में एक सरदार परिवार रहता है, जिनका अचार का व्यापार है. उनका बेटा सनी (खुशमीत गिल) अभी तीसरी कक्षा का छात्र है. मगर सनी की दादी (सुरेखा सीकरी) परेशान है कि सनी कुछ भी सूंघ नहीं पाता. यहां तक कि डाक्टर भी कह देते हैं कि सनी की नाक में एक ऐसी व्याधि है, जिसके चलते वह कुछ भी सूंघ नहीं सकता. पर अचानक एक दिन स्कूल की लैबोरेटरी में दो रासायनिक पदार्थों के मिश्रण से एक गैस निकलती है, जो कि सनी की नाक में चली जाती है. सनी को जोर की छींक आती है और फिर उसे अद्भुत चमत्कारिक सूंघने की शक्ति मिल जाती है. वह दो किलोमीटर दूर तक सूंघ सकता है. एक दिन इस इमारत के निवासी कुमार (राजेश पुरी) की कार चोरी हो जाती है. कार को ढूढ़ने के प्रयास में पुलिस लगी हुई है. पर  सनी अपने तरीके से प्रयास करता है. अंततः कुमार की कार वापस मिल जाती है.

बौलीवुड में फिल्म ‘‘स्निफ’’ के निर्देशक अमोल गुप्ते की गिनती श्रेष्ठ बाल फिल्मकार के रूप में होती है. मगर ‘स्निफ’ में वह बुरी तरह से विफल हुए हैं. अनूठी विषयवस्तु के बावजूद पटकथा की तमाम गड़बड़ियों के चलते फिल्म स्तर हीन हो जाती है. अफसोस की बात यह है कि बालक सनी न सुपर हीरो और न ही एक जासूस/डिटेक्टिव के रूप में उभर पाता है. इतना ही नहीं फिल्म के एक भी किरदार का सही ढंग से चित्रण ही नहीं हुआ. सभी किरदार बंगाली या महाराष्ट्यिन या सिंधी या गुजराती समुदाय के लोगों के कैरीकेचर मात्र हैं. फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो दर्शक के दिमाग में याद रह जाए. ‘स्निफ’ ऐसी फिल्म है, जिसे न देखने का अफसोस नहीं हो सकता.

इंटरवल से पहले कई खामियों के बावजूद फिल्म थोड़ी सी उत्सुकता जगाती है. दर्शक सोचता है कि इंटरवल के बाद सनी अपनी चमत्कारी सूंघने की शक्ति से कार चोर को पकड़ेगा, पर ऐसा कुछ नही होता. कार चोरी व कार वापस मिलने तक का पूरा प्लाट अति बचकाना और बोर करने वाला है. कहने का अर्थ यह कि इंटरवल के बाद फिल्म लेखक व निर्देशक के हाथ से बाहर चली जाती है. फिल्म देखते हुए लगता है कि शायद लेखक व निर्देशक ने बिना पटकथा के फिल्म फिल्मा डाली. फिल्म में मिस्टर मुखर्जी कई वर्षों से घर से बाहर क्यों नही निकले? उनकी पुलिस अफसर ने भी उनसे काम करने के लिए क्यों नहीं कहती? इसका जवाब फिल्म खत्म होने पर भी दर्शक को नहीं मिलता.

‘‘तारे जमीन पर’’ के प्रदर्शन के बाद से शिक्षा जगत में काफी बदलाव आया. मगर ‘तारे जमीन पर’ जैसी फिल्म के ही लेखक की फिल्म ‘स्निफ’ के कुछ सीन देखकर सवाल उठता है कि वह बच्चों को किस तरह का पाठ पढ़ाना चाहते हैं? फिल्म में एक सीन है, जिसमें परिवार के सभी सदस्य अचार को पहले सूंघकर और फिर अचार की शीषी के अंदर से उंगली से अचार निकालकर चखते हैं कि अचार अच्छा बना है या नहीं. इस सीन से एक बालक कौन सी तमीज सीखेगा? कौन सी अच्छी सीख लेगा? क्या अचार को चखने के लिए चम्मच का उपयोग करना वर्जित है? इसी तरह फिल्म में एक बंगाली परिवार के अंदर का सीन है. हमेशा घर में रहने वाले और शुगर के मरीज मिस्टर मुखर्जी के चोरी से मिठाई खाने पर उनकी पत्नी व पुलिस अफसर मिसेस मुखर्जी (सुष्मिता मुखर्जी) अपने पति के गाल पर बिना गिने धड़ाधड़ थप्पड़ लगाती हैं. आखिर इस सीन से फिल्मकार बच्चों को क्या सीख देना चाहते हैं? दूसरी बात इस सीन का फिल्म के मूल कथानक से कोई संबंध नजर नहीं आता.

फिल्म का गीत संगीत भी साधारण है. फिल्म में गणपति आरती जबरन ठूंसी हुई लगती है. जहां तक अभिनय का सवाल है, तो बाल कलाकार खुशमीत गिल ने कुछ दृश्यों में काफी अच्छा अभिनय किया है. इसके अलावा इस फिल्म में किसी भी कलाकार ने ऐसा अभिनय नहीं किया है, जो कि याद रहे.

डेढ़ घंटे की अवधि वाली फिल्म ‘‘स्निफ’’ का निर्माण ‘त्रिनिटी पिक्चर्स’ के साथ मिलकर अमोल गुप्ते ने किया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक अमोल गुप्ते, कलाकार हैं- खुशमीत गिल, सुरेखा सीकरी, सुष्मिता मुखर्जी, राजेश पुरी, अमोल गुप्ते व अन्य.

हिन्दुओं में भी खत्म हों तलाक की बंदिशें

एक साथ तीन तलाक पर कानूनी पाबंदी से इस बात की उम्मीद जग गई है कि औरतों के हक पर सरकार और अदालतें गंभीरता से विचार करेंगी. मुसलिम धर्म की ही तरह हिन्दू धर्म में भी बहुत सारे ऐसे मामले हैं जिनमें शादीशुदा जोडे अलग होना चाहते हैं. हिन्दू धर्म में शादी के बाद अलग होने की बेहद जटिल प्रक्रिया होती है. जिसमें सालों साल लोग पिसते रहते हैं. कई बार इस तरह की परेशानियों के चलते अरपराधिक घटनायें भी घटती हैं, जिनके मुकदमे दहेज उत्पीडन और दहेज हत्या जैसी हालातों तक पहुंच जाते हैं. हिन्दू धर्म में खाप पंचायतों और जातीय पंचायतों में शादी से अलग होने के अजीब ओ गरीब फैसले होते रहते हैं. जिस तरह से तीन तलाक को लेकर कानून और सरकार मुखर हुये, उस तरह से ही हिन्दू धर्म में शादी के बाद अलगाव यानि संबध बिच्छेद होने का सरल रास्ता बनाया जाये.

आज समाज में एकल पैरेंटस की संख्या बढ़ती जा रही है. इसकी मूल वजह यह है कि हिन्दू धर्म में शादी के बाद संबंध विच्छेद होना सरल नहीं है. संबंध विच्छेद की शुरुआत दहेज उत्पीड़न जैसे मुकदमों से शुरू होती है. एक पक्ष दूसरे पक्ष पर और दूसरा पक्ष पहले पक्ष पर अलगअगल तरह के आरोप लगाता है. थानों से लेकर कचहरी तक यह मुकदमे चलते हैं. इसके बाद दोनों पक्ष सहमति से अलगाव के लिये तैयार होते हैं. तब अलगाव के बाद यह मुकदमे समझौते के आधार पर खत्म होते हैं. कई बार लोगों में धैर्य नहीं रहता तो घटना गंभीर अपराध में बदल जाती है. हिन्दू धर्म में तलाक लेने के जो अधिकार दिये गये हैं उनमें से सबसे अधिक प्रचलित अधिकार एक दूसरे के चरित्र पर सवाल खड़े करना है. जल्द अलगाव के लिये सैक्सुली टार्चर करने के आरोप भी खूब लगते हैं.

अगर सहमति से अलगाव नहीं हो रहा तो अपनी कही बात को साबित करना बहुत मुश्किल होता है. ऐसे में सालों साल थाने से लेकर कचहरी तक भटकना पड़ता है. हर जिले में पारिवारिक अदालतें हैं. यहां लगी भीड़ को देखकर समझा जा सकता है कि सात जन्मों तक साथ देने का वादा इसी जन्म में किस तरह से टूट रहा है. साथ रह पाने में असफल पति पत्नी के लिये तलाक लेकर दूसरी शादी करना बहुत ही मुश्किल काम होता है. कई बार ऐसे फैसलों में इतना वक्त लग जाता है कि शादी की उम्र ही निकल जाती है. ऐसे में पति या पत्नी अकेले रहना सबसे अधिक पसंद करते हैं.

सबसे बड़ी परेशानी उन पति पत्नी के सामने आती है जिनके बच्चे हो चुके होते हैं. ऐसे में बच्चों को साथ लेकर यह लोग एकल पैरेंट के रूप में रहते हैं. आज समाज में तेजी से एकल पैरेंट की संख्या बढ़ती जा रही है. आज के दौर में 25 साल की उम्र तक शादी हो जाती है. 4 से 5 साल शादी के बंधन से अलग होने का फैसला लेने तक उम्र 30 साल हो जाती है. 10 से 12 साल सबंध विच्छेद होने या अलगाव में लग जाते हैं. अगर 40 की उम्र तक किसी का संबंध विच्छेद हो भी जाये, तो वह दूसरी शादी करके घर बसाने के लायक नहीं रह जाता है.

मुसलिम धर्म में एक साथ तीन तलाक, हलाला, कांट्रैक्ट मैरिज जैसी बहुत ही रूढिवादी सोच है, पर इसके बाद भी वहां तलाक लेने का सरल सीधा रास्ता भी है. हिन्दू धर्म में शादी के बाद अलग होने का रास्ता सरल नहीं है. ऐसे में बहुत सारी मानसिक बीमारियां जन्म लेने लगती हैं. दहेज के नाम पर होने वाले ज्यादातर मुकदमे की जड में अलगाव ही होता है. शादी के बाद कानूनी अलगाव को अगर सरल बना दिया जाये तो हिन्दू धर्म में अवसाद में जीने वाले पति पत्नी एकल पैरेंट बनने से बच सकते हैं. दहेज के नाम पर होने वाले अपराध घट सकते हैं. सोशल मीडिया पर फैला यह मैसेज यूं ही नहीं है कि ‘तीन तलाक के बाद सात जन्मों के रिश्तों पर भी नजर डाल लीजिये.’

कृषि प्रधान देश में संकट में फंसता किसान

भारत एक कृषि प्रधान देश होने के बावजूद यहां खेती और किसान दोनों की ही हालत दिनोंदिन बिगड़ती जा रही है. क्या यह एक सोचनीय सवाल नहीं है कि देश में किसानों की हालत बदतर है. उन के उत्पादों के लिए न तो बाजार ही मिल रहा है और न ही सरकार उन की समस्याओं को हल करने में कोई खास दिलचस्पी ले रही है.

मध्य प्रदेश में कर्जमाफी को ले कर किसानों का आंदालेन उग्र हो चला है. तमाम राजनीतिक दल किसानों की इस पीड़ा पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं. वे इस तथ्य से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि किसान कल्याण के लिए कर्जमाफी कोई स्थायी हल नहीं है. पर वे अपनी राजनीति चमकाने के लिए आग में घी डालने से नहीं चूक रहे हैं.

आजादी के बाद से ही सरकारें समयसमय पर किसानों के कर्जों को माफ करती रही है, पर इस से किसानों की हालत बेहतर होने के बजाय और बदतर होती चली गई. घाटे का सौदा बनी खेती को उबारने के प्रति किसी का भी ध्यान नहीं गया.

जिस काम से भारत की दोतिहाई आबादी जुड़ी हुई है, उसे लाभकारी बना दिया जाता, तो गरीब किसानों को आज यह दिन नहीं देखना पड़ता.

आज देश की सभी सरकारें हैरान हैं कि किसान अपनी आवाज उठाने के लिए क्यों और कैसे खड़े हो रहे हैं और आंदोलन कर रहे हैं. किसानों की हालत पीढ़ी दर पीढ़ी बदतर होने के कारण शायद ऐसा हो रहा है.

केमिकल खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल के चलते जमीन की उर्वरा शक्ति लगातार कम होती जा रही है. इस के चलते खेती की जमीन में देश के अंदर तकरीबन 5 लाख टन सल्फर तत्त्व की कमी हो गई है, जो साल 2025 तक बढ़ कर 20 लाख टन हो जाएगी. जाहिर है कि खेत की मिट्टी को ले कर किसानों का न तो वर्तमान ही ठीक है और न ही भविष्य. जहां तक उत्पादन का सवाल है, तो वह भी हर साल गिरता ही जा रहा है.

पिछले 5 सालों में उत्तर प्रदेश में कृषि उत्पादन बढ़ोतरी से संबंधित 5 योजनाएं पूरी हो चुकी हैं. सब से खास प्रशिक्षण एवं संपर्क योजना को तो 5 साल पहले ही मृत संवर्ग में डाल दिया गया था, जिस के खराब नतीजे अब सामने भी आने लगे हैं.

कृषि आपूर्ति संगठन नामक योजना के बंद किए जाने से किसान अब बाजार से महंगे कृषि यंत्र और खाद आदि खरीदने के लिए मजबूर हैं, वहीं उन की चीजें मिट्टी के भाव भी नहीं बिक रही हैं. अगर किसान गन्ने की फसल को ले कर गन्ने की तरह पिस रहे हैं, तो आलू को मुफ्त में किसी को देने के लिए भी मजबूर हैं.

कई जिलों से सूचनाएं प्राप्त हुई हैं कि वहां के किसान अपने खेत खाली करने के लिए मुफ्त में ही आलू खोद कर ले जाने की इजाजत दे रहे हैं, क्योंकि कोल्ड स्टोरेज में वे आलू नहीं रख पा रहे हैं. कोल्ड स्टोरेजों के मालिक केवल प्रभावशाली लोगों के ही आलू रख रहे हैं. इन मालिकों की समस्या यह है कि उन्हें कारोबार में घाटा हो रहा है. वे जितनी धनराशि भंडारण के रूप में पाते हैं, उतना तो उन्हें बिजली का बिल देना पड़ता है.

सरकार आलू किसानों के बारे में कुछ सोचती नहीं है और न ही कोई स्थायी योजना बना पा रही है. सरकार का कृषि विभाग एक सफेद हाथी साबित हो रहा है. यहां यह कहना सही है कि केवल किसान पंचायत करने से ही किसानों की समस्याएं दूर होने वाली नहीं हैं. उस के लिए जिले और राजधानी में बैठे अफसरों के पेंच कसने होंगे, साथ ही किसानों के उत्पादों के लिए बाजार मुहैया कराने के लिए स्थायी योजनाएं भी बनानी होंगी. किसानों की समस्याओं का स्थायी हल तलाशना होगा, नहीं तो कृषि और किसान की हालत बद से बदतर होती जाएगी, जो किसी भी तरह से अच्छी नहीं होगी.

जिस तरह से आलू किसान परेशान हैं, ठीक उसी तरह से गन्ना किसान भी चिंतित हैं, क्योंकि उत्तर प्रदेश में गन्ने की कुल पैदावार के तकरीबन 40 फीसदी से ज्यादा हिस्से की पेराई मिलें नहीं कर पाती हैं. नतीजतन किसानों को अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने गन्ने को औनेपौने दामों में क्रेशर और कोल्हू वालों के हाथों बेचना पड़ता है. गन्ना क्षेत्र में भी सरकार की उदासीनता के चलते इस का उत्पादन लगातार कम होता जा रहा है.

प्रदेश के 67 फीसदी गन्ना क्षेत्रफल में पिछले 20 सालों तक महज 2 प्रजातियां ही बोई जाती रही हैं, जिस के चलते गन्ने का उत्पादन या तो कम हो गया है या फिर वह स्थिर हो गया है.

प्रदेश का गन्ना विभाग किसानों को गन्ने का बीज तक मुहैया नहीं करा पाता. प्रदेश में 600 लाख क्विंटल गन्ने के बीज की जरूरत होती है, पर गन्ना विभाग 60 से 65 लाख क्विंटल ही गन्ने के बीज दे पाता है. देश के कुल गन्ना उत्पादन का तकरीबन 55-60 फीसदी गन्ना उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में ही पैदा किया जाता है. इस वजह से उत्तर प्रदेश का गन्ना किसान अपनी फसल को जलाने के लिए मजबूर हो जाता है. अगर किसानों को आलू मुफ्त में देने पड़ रहे हैं और गन्ने को जलाना पड़ रहा है, तो ऐसी स्थिति में किसान पंचायत का क्या मतलब है हमारी सरकार ने केवल किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी को खत्म करने का काम ही नहीं किया है, बल्कि उन के उत्पादन की खरीद को काफी कम कर के उन के एक बहुत बड़े तबके को, जो कि छोटे और मझोले किसानों का है, पूरी तरह से बाजार के हवाले कर दिया है. नतीजतन, किसान अपनी फसल को जल्द से जल्द औनेपौने दामों में बेचने के लिए मजबूर हैं. इस के लिए उन्हें या तो घाटे का सौदा करना पड़ता है या फिर आत्महत्या करने को मजबूर होना पड़ता है.

यही वजह है कि मध्य प्रदेश में किसान आंदोलन के दौरान गोली लगने से 6 किसानों की मौत हो गई. किसानों का खेती से भागने का असली कारण यही है कि फसल अच्छी होने के बावजूद उन्हें अपने उत्पाद की सही कीमत नहीं मिल पा रही है. इसीलिए किसान बरबाद हो रहे हैं और कृषि क्षेत्र में आए इस संकट के चलते लाखों परिवारों पर भूख का साया मंडराने लगा है. साथ ही राशन व्यवस्था का चौपट होना हालात को और ज्यादा भयावह बना रहा है.

रिश्वत पर ऐसा निबंध आपने कभी नहीं पढ़ा होगा

कल शाम थकाहारा, रिश्वत का मारा सहीसलामत घर लौटने की खुशी में मैं इतरा ही रहा था कि दरवाजे पर दस्तक हुई. मैं परेशान हो कर कुछ सोचने लगा. दिमाग पर दबाव डाला, तो काफी राहत मिली कि जिसजिस ने कुछ दिया था, उन सब का काम तो कर ही आया हूं. अब कौन हो सकता है? शायद कोई घर आ कर सेवा करना चाहता हो? तो आ जाओ भैया.

हम सरकारी मुलाजिम तो नौकरी में आते ही हैं चौबीसों घंटे रिश्वत लेने के लिए, वरना मुफ्त में क्या पागल कुत्ते ने काट रखा है, जो फाइलों में उलझेउलझे सिर गंजा करा लें.

मैं ने थकने के बाद भी हिम्मत न हारी. दरवाजा खोला, तो पड़ोसन का बेटा सामने नजर आया. सोचा था कि थोड़ा और माल बना लूंगा, लेकिन उसे देखते ही सारा का सारा जोश धरा रह गया.

‘‘कहो बेटे, क्या बात है?’’ मैं ने बेमन से पूछा.

‘‘अंकल, आप के पास टाइम है क्या?’’

कोई बड़ा आदमी होता, तो साफ कह देता कि हम सरकारी लोगों के पास टाइम के सिवा सबकुछ होता है, पर बच्चा था इसलिए कहा, ‘‘हांहां. बेटे कहो, क्या करना है?’’

‘‘मम्मी ने मुझे आप के पास निबंध लिखवाने के लिए भेजा?है,’’ बच्चे की कमर से निकर बारबार यों छूट रही थी, जैसे पाकिस्तान के हाथ से कश्मीर छूट रहा है.

‘‘मुझ से…’’ मैं ने ताज्जुब से कहा.

नकल मार कर तो मैं ने 10वीं पास की थी और पापा के दोस्त की पैरवी से यहां लग गया था, वरना कोई होटल पर बरतन मांजने को भी न रखता… अब यह निबंध, वह तो चाहे अंगरेजी का होता या हिंदी का, उसे क्या पढ़ना और क्या याद करना.

5-7 निबंध फाड़ कर परीक्षा भवन में ले जाते थे और जो आ गया, चिपका दिया. पर शायद समय आने पर आदमी बुद्धिमान भी हो जाता है और पड़ोसी उसे पहचान भी लेते हैं. जैसे आज मेरी पहचान हुई थी. मैं ने अपनी बुद्धिमानी को शाबाशी दी और पड़ोसन के बेटे से कहा, ‘‘आओ बेटे, अंदर आओ. मैं तुम्हें निबंध जरूर लिखवाऊंगा. पर निबंध लिखने की कौन सी जरूरत आ पड़ी, अभी तो परीक्षा भी नजदीक नहीं है?’’

‘‘स्कूल में निबंध प्रतियोगिता है न,’’ बच्चे ने बताया.

‘‘तो किसी अच्छी सी गाइड में से लिख लेते.’’

‘‘मौलिक चाहिए था अंकल. अगर आप लिखवा देंगे, तो मैं पहला इनाम जीत जाऊंगा.’’

‘‘सच,’’ मुझे लगा कि बच्चा मुझे पहचानने में गलती कर रहा है. पर बच्चे मन के सच्चे होते हैं, इसलिए यह गलती नहीं हो सकती थी. मैं खुशी के मारे फूलने लगा, तो मुझे ब्रह्मांड भी फूलने के लिए कम लगा.

पता नहीं क्यों मैं आज तक अपनेआप को ‘अंडरऐस्टीमेट’ करता रहा. मैं ने बच्चे को कुरसी पर बिठाया, ‘‘अच्छा बेटे, तो तुम्हें कौन से विषय पर निबंध लिखना है?’’

‘‘रिश्वत पर,’’ बच्चे ने कहा, तो अब पैंट सरकने की बारी मेरी थी. बच्चे को मेरी पैंट सरकने का पता न चले, इसलिए मैं ने बैठते हुए कहा, ‘‘बेटे, पड़ोस वाले पटवारी अंकल के पास जा कर लिख लेते, तो बहुत अच्छा रहता.’’

‘‘अंकल, वे हरिद्वार गए हैं.’’

‘‘तो सामने वाले ऐक्साइज अंकल के पास लिख लेते?’’

‘‘अंकल, उन की बेटी की शादी है. वे ओवर टाइम कर रहे हैं और कई दिनों से घर नहीं आ रहे हैं.’’

‘‘तो बगल वाले पुलिस अंकल भी तो हैं?’’

‘‘अंकल, उन की ड्यूटी चैक पोस्ट पर है. वे रात को भी घर नहीं आते.’’

‘‘कोई बात नहीं, बेटे. तुम्हें मैं ही निबंध लिखवाऊंगा. ऐसा निबंध कि तुम अव्वल आओगे. पर… तुम्हारे पापा तो गुरुजी हैं न… उन्होंने… चलो… उन्हें ट्यूशन से फुरसत नहीं होगी…’’

‘‘समय तो है, पर वे भी किताबी निबंध ही लिखवा सकते हैं, व्यावहारिक नहीं. मौलिक तो आप ही लिखवा सकते हैं.’’

‘पता नहीं, वे लोग बच्चे पैदा क्यों करते हैं, जिन के पास अपने बच्चों को निबंध लिखवाने के लिए व्यावहारिक ज्ञान नहीं होता? बेकार में मास्टर बने फिरते हैं. जब निबंध लिखवाने की बारी आती है, तो बोलती बंद हो जाती है,’ मैं ने सोचा, फिर उस से कहा, ‘‘तो बेटे, तैयार हो जाओ.’’

‘‘मैं तैयार हूं अंकल,’’ बच्चे ने खुश हो कर कहा.

बच्चे के हां कहने पर स्कूल के दिनों का नालायक एकाएक जानकार हो गया. मैं उसे लिखाने लगा, ‘‘हमारा देश पहले कृषि प्रधान देश था, अब रिश्वत प्रधान देश है. रिश्वत की खेती में हमारा देश दुनियाभर में आगे है. यहां दफ्तर के गेट से ले कर चिमनी तक में रिश्वत ली जाती है. इस देश में पैदा होने से ले कर मरने तक में रिश्वत ली जाती है.

‘‘रिश्वत हमारी संस्कृति की सौगात है. रिश्वत के बिना हमारा जीवन भी अधूरा है और संस्कृति भी.

‘‘रिश्वत हमारी पहचान है. रिश्वत हमारा राष्ट्रीय धर्म है. हम देश के लिए नहीं, रिश्वत के लिए मरते हैं. धन्य हैं वे रिश्वतखोर, जिन्होंने डट कर रिश्वत ली, मगर कभी पकड़े नहीं गए. ऐसे रिश्वतखोर ही दुनिया में हमारे देश का नाम रोशन करते हैं. ‘‘रिश्वत देना और लेना भी एक कला है. जो इस कला में माहिर होते हैं, वे आराम से जिंदगी बिताते हैं. रिश्वत देने और लेने के तमाम तरीके हैं.

‘‘इस दुनिया में हर चीज के फायदे और नुकसान दोनों हैं. मगर रिश्वत देने और लेने के फायदे ही फायदे हैं. रिश्वत लेने वाले के लिए भी मुनाफे का सौदा है और देने वाले के लिए भी.

‘‘रिश्वत ले कर फाइलों में पंख लग जाते हैं और रिश्वत दे कर समय की बहुत बचत होती है. मैं तो कहता हूं कि 5-7 सौ रुपए कीमती समय से ज्यादा कीमती तो नहीं हैं. ‘‘रिश्वत लेना और देना एक नेक काम है. रिश्वत ही पूजा है. रिश्वत हमें नियमकानूनों से नजात दिलाती है. आज जो यह नेक काम नहीं करता, वह निकम्मा है. वह अमीर होने के बाद भी दीनहीन है.

‘‘यह सरकारी कामों में तेजी के लिए एक आजमाया टौनिक है. रिश्वत पाने के बाद सरकारी मुलाजिमों की सुस्ती कोसों दूर भाग जाती है. ‘‘रिश्वत न होती, तो गैरकानूनी काम न होते. रिश्वत न होती, तो चपरासियों के महलमकान न होते. रिश्वत न होती, तो बिकने वाले इनसान न होते.

‘‘रिश्वत पर जितना लिखा जाए, कम है. रिश्वत हमारा तन, मन और धन है. हमारे सारे काम रिश्वत पर ही टिके हैं.

‘‘इस देश में मूल्यों, आदर्शों, नैतिकताओं ने तमाम हमले किए, मगर वे अपना एकछत्र राज्य स्थापित न कर सके. अगर इस देश में किसी का एकछत्र राज्य स्थापित हुआ है, तो वह है रिश्वत का. ‘‘रिश्वत बड़ेबड़ों को उसूलों से गिरा देती है. रिश्वत न्याय को नचा देती है. रिश्वत घरबार बनवा देती है.

‘‘अगर हम देश की चहुंमुखी तरक्की चाहते हैं, तो बस एक ही रास्ता है कि रिश्वत का लेनदेन आसान बनाया जाए…’’

‘‘अंकल, मुझे नींद आ रही है,’’ बच्चे ने बोर होते हुए टोका.

‘‘अच्छा तो आखिर में लिखो… मैं यही प्रार्थना करता हूं कि रिश्वत देने वाले भी सलामत रहें और लेने वाले भी. जय देश, जय रिश्वत.’’

बेहतर सेहत के लिए आप भी लगाएं किचन गार्डन

सब्जियों के उत्पादन में बेहिसाब रासायनिक खादों व कीटनाशक दवाओं के इस्तेमाल के कारण सब्जियां सेहत के लिए नुकसानदायक साबित हो रही हैं. लेकिन समस्या यह भी है कि बिना रासायनिक खादों व कीटनाशकों के इस्तेमाल वाली सब्जियां बाजार में या तो मिलती नहीं हैं या कई गुनी महंगी मिलती हैं. इस समस्या का एकमात्र हल यह है कि घर व आसपास की खाली जगह में किचन गार्डन लगा कर जैविक सब्जियां खुद उगाई जाएं.

अपने मकान के आसपास खाली पड़ी जमीन या खाली स्थानों पर गमले लगा कर उन में किचन गार्डन तैयार किया जा सकता है. किचन गार्डन तैयार करने के लिए बेल वाली सब्जियों की बोआई गमलों में की जा सकती है, जबकि पत्ती वाली व जड़युक्त सब्जियों की बोआई खाली जमीन पर कर सकते हैं.

किचन गार्डन बनाने के लिए खाली जमीन के एक किनारे पर खाद का गड्ढा बनाना होगा, जिस में घर का प्लास्टिकमुक्त कचरा व पौधों के अवशेष डालने होंगे. इस से बढि़या जैविक खाद बन जाएगी.

किचन गार्डन के लिए तैयार की गई क्यारियों में खुदाई कर के मिट्टी को कई बार पलट देना चाहिए और उस के बाद उस में कंपोस्ट खाद डाल कर मिला देनी चाहिए. क्यारियों के बीच मिट्टी की चौड़ी मेंड़ बना दें ताकि पानी एक क्यारी से दूसरी क्यारी में न जा सके. इन क्यारियों में लगाने के लिए पहले सब्जियों के पौध तैयार करें और उन्हें 15 दिनों बाद इन क्यारियों में लगा दें. सिंचाई जहां तक हो सके स्प्रिंकलर से करें. इसी प्रकार गमलों में बेलदार सब्जियों के पौधों की बोआई करने से पहले उन में कंपोस्ट खाद मिट्टी में मिला कर भर दें.

यदि सब्जियों में कोई रोग या कीटजनक समस्या पैदा होती है, तो उस का जैविक इलाज करें. जो पौधे रोगग्रस्त हो गए हों, उन्हें किचन गार्डन से हटा दें. जहां तक हो सके समयसमय पर सिंचाई करें और पौधों के आसपास उगने वाले खरपतवार हटा दें. तय अंतराल के बाद निराईगुड़ाई करते रहें.

किचन गार्डन से खरीफ के मौसम में लोबिया, तुरई, भिंडी, अरवी, करेला, लौकी, ग्वार, मिर्च, टमाटर, कद्दू, बैगन व पालक वगैरह सब्जियां हासिल की जा सकती हैं. रबी के मौसम सितंबर से नवंबर तक किचन गार्डन में आलू, मेथी, मिर्च, टमाटर, बैगन, प्याज, लहसुन, धनिया, पालक, गोभी, गाजर व मटर जैसी सब्जियों का उत्पादन किया जा सकता है. इसी तरह जायद में फरवरी व मार्च में भिंडी व कद्दूवर्गीय सब्जियां हासिल की जा सकती हैं. यदि घर के आसपास खाली जगह ज्यादा हो तो उस में केला, पपीता, नीबू, अमरूद व करौंदा आदि के पौधे लगाए जा सकते हैं.

किचन गार्डन से कीटनाशक व रासायनिक खादों से मुक्त सब्जियां परिवार को भरपूर मात्रा में हासिल होंगी, वहीं इन सब्जियों से भरपूर विटामिन, खनिजलवण व कार्बोहाइड्रेट भी मिलते रहेंगे. पोषण वैज्ञानिकों के अनुसार एक व्यक्ति को संतुलित भोजन के रूप में रोजाना 85 ग्राम फल और 300 ग्राम सब्जियों की जरूरत होती है, जिस में 125 ग्राम हरी पत्तेदार सब्जियां और 100 ग्राम जड़ वाली सब्जियां व 75 ग्राम अन्य सब्जियां होना जरूरी है. लेकिन मौजूदा वक्त में इस मात्रा में लोगों को सब्जियां मिल नहीं पा रहीं, जिस से उन के शरीर में कुपोषण के कारण रोगों के आक्रमण की संभावना बनी रहती है. इस का हल किचन गार्डन से काफी हद तक किया जा सकता है.

तीर्थाटन की आड़ में हो रहा है ये गंदा काम

जयपुर के आमेर किले को बड़े कौतूहल से निहारने के बाद मार्था जंतरमंतर के 2 चक्कर लगा चुकी थी. उसे सब कुछ अच्छा तो लगा था, लेकिन कालचक्र की गणना करने वाले यंत्रों में उस की कोई दिलचस्पी नहीं थी. हालांकि उस के दूसरे साथी, पुछल्ले की तरह चिपके हुए गाइड की बातें बड़े गौर से सुन रहे थे. अलबत्ता अखरती धूप अब चुभने लगी थी, जिसे वे लोग हथेलियों से ढांपने की असफल कोशिश कर रहे थे.

मार्था ने उन्हें लौट चलने को कहा भी, लेकिन उन का ध्यान मार्था की तरफ नहीं था. नतीजतन वह गुस्से में पांव पटकती हुई जलेब चौक जाने वाले उस रास्ते की तरफ चली गई, जिस के दोनों ओर दूरदूर तक एंटीक की दुकानों की लंबी कतार थी. मार्था को उधर से गुजरते देख राजस्थानी पोशाक में फंसे हुए से दिखने वाले ‘लपका’ किस्म के लड़के, टूटीफूटी अंगरेजी में दुकानों की तरफ ध्यान बंटाने के लिए उस की तरफ दौड़े भी, लेकिन मार्था ने जब उन्हें आंखें तरेरते हुए उपेक्षित भाव से देखा तो वे वहीं थम गए.

मार्था लगभग एक हफ्ते पहले अपने साथियों के साथ आस्ट्रेलिया से यहां पहुंची थी. दिल्ली होते हुए पहले वे जयपुर आए थे. इस दौरान इस टोली ने जयपुर के तकरीबन सभी टूरिस्ट प्लेसेज देख लिए थे. मार्था की कल्पनाओं में जयपुर राजारानियों का शहर था. पिछले 3 दिनों में उस ने इतिहासकालीन वैभव को जी भर कर देखा. राजस्थानी पोशाक पर उस का मन इतना मचला कि जयपुर पहुंचने के बाद उस ने कई जोड़ी पोशाकें खरीद ली थीं और बदलबदल कर उन्हीं को पहन रही थी. उस समय भी उस ने कांचली और घाघरा पहन रखा था. पोनीटेल की तरह उस के बाल पीठ पीछे बंधे थे.

जलेब चौक का रास्ता आगे जा कर इतिहासकालीन इमारतों से घिरे एक बड़े से चौगान में खत्म होता था. उस ने पीछे मुड़ कर दूरदूर तक नजर दौड़ाई, लेकिन उस के साथी काफी पीछे छूट गए थे. उस ने टूटीफूटी अंगरेजी में राहगीरों से पूछताछ की तो पता चला कि आगे जा कर पोल सरीखा रास्ता गोविंददेवजी के मंदिर की तरफ मुड़ता है. वहां तक घंटेघडि़याल की आवाज भी सुनाई दे रही थी. उसी समय उसे कई लोग अपनी तरफ लपकते नजर आए. मार्था को होटल का रास्ता मालूम था, लेकिन होटल लौटने से पहले वह किसी ट्रैवल एजेंसी से पुष्कर के बारे में कुछ जानकारियां लेना चाहती थी.

त्रिपोलिया की तरफ लौटते हुए उसे थोड़ेथोड़े फासले पर ट्रैवल एजेंसियों के बोर्ड लटकते नजर आए. इस से पहले कि वह कुछ तय कर पाती, पास की ट्रैवल एजेंसी की दहलीज पर उसे एक खूबसूरत सा नौजवान खड़ा नजर आया. आसमानी सूट वाला वह युवक काफी स्मार्ट था. उस के गले में सोने की मोटी चेन लटक रही थी और हाथों में सोने का ब्रेसलेट था.

मार्था को असमंजस में एजेंसियों के बोर्ड की तरफ ताकते देख युवक की नजरें उस पर टिक गईं. उस ने बड़ी शालीनता से अंगरेजी में पूछा, ‘‘आप किस से मिलना चाहती हैं?’’

‘‘आई एम मार्था…मार्था जोंस फ्रौम आस्ट्रेलिया.’’ युवक की तरफ गौर से देखते हुए उस ने अपनी बात पूरी की, ‘‘दरअसल, मैं पुष्कर जाना चाहती हूं, इसी सिलसिले में किसी ट्रैवल एजेंट से मिलना चाहती थी.’’ मार्था उस युवक से काफी प्रभावित लगी.

‘‘लेकिन आप ने यहां आने का वक्त गलत चुना.’’ युवक ने अपना नाम नीरज बताते हुए बोर्ड पर लिखी इबारत की तरफ इशारा किया, जिस पर लिखा था, ‘‘मिलने का समय सुबह 8 बजे से दोपहर 12 बजे तक और शाम को 5 बजे से 9 बजे तक.’’

‘‘ओह!’’ अपनी रिस्टवाच की तरफ देखते हुए मार्था थोड़ी मायूस नजर आई. फिर सहज होते हुए बोली, ‘‘कोई बात नहीं, मैं फिर किसी वक्त मिल लूंगी.’’

‘‘आई कांट सी ए डेमसेल इन डिस्टै्रस (मैं किसी सुंदरी को मुश्किल में नहीं देख सकता). आप का इस तरह मायूस होना मुझे अच्छा नहीं लगा.’’ नीरज ने मार्था को आश्वस्त करते हुए कहा, ‘‘आप हमारे शहर की मेहमान हैं. इस नाते आप की मदद करना मेरा फर्ज है.’’

‘‘लेकिन…’’ मार्था ने अचकचाते हुए कहा, ‘‘तो फिर बुकिंग अभी कैसे हो पाएगी?’’

‘‘हर समस्या का हल होता है, इस का भी है. आप सिर्फ डिटेल्स दे कर अपने होटल का नाम बता दीजिए और इत्मीनान से लौट जाइए…टिकट आप को आप के होटल में मिल जाएगा.’’

‘‘लेकिन इस के लिए डिपाजिट..?’’ मार्था ने अपना पर्स टटोलते हुए कहा, ‘‘मुझे कंपलीट पैकेज चाहिए. इस के लिए कितना अमाउंट देना होगा?’’

‘‘मैडम! मैं ने आप से कहा न कि आप इत्मीनान से होटल लौट जाइए. पैकेज अमाउंट की बात छोडि़ए. हिसाबकिताब बाद में होता रहेगा.’’ इस से पहले कि मार्था कुछ कह पाती, वह युवक मुसकरा कर हाथ हिलाता हुआ शौप की दहलीज से उतर कर आगे बढ़ गया.

मार्था एक गहरी कसक लिए उसे जाता देखती रह गई.

बेगाने देश में मददगार की सूरत में रूबरू हुए उस शख्स के जादुई सम्मोहन और लच्छेदार बातों में आ कर आस्ट्रेलियाई मूल की मार्था जोंस ने बाद में कितनी जलालत भुगती, उसे उस ने कांपतीलरजती जुबान में एक ही लफ्ज में समेट दिया, ‘‘वह किसी दरिंदे से भी बदतर था.’’

दरअसल, नीरज ने मार्था को प्रभावित करने के लिए अपनी शराफत को बड़े सलीके से सजासंवार कर उस के सामने पेश किया था. मार्था के साथी इतनी जल्दबाजी में पुष्कर जाने को तैयार नहीं थे. बहरहाल, जिस वक्त नीरज उस के होटल पहुंचा, मार्था अपने कमरे में अकेली थी. वह उस के लिए पैकेज के टिकट ले कर आया था.

मार्था की बारबार मनुहार के बावजूद नीरज पुष्कर पैकेज की रकम लेने को तैयार नहीं हुआ. अलबत्ता उस ने यह कह कर उसे चौंकाया, ‘‘पुष्कर जाने का मन तो मेरा भी है. लेकिन कोई मनचाहा संगीसाथी नहीं मिला, अब तुम मिल गईं तो भला मैं यह मौका क्यों छोड़ता. मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगा.’’

मार्था नीरज के हावभाव से पहले ही बुरी तरह प्रभावित थी. उस की इस बात ने उस की खुशी को दोगुना कर दिया. अब वह सफर में अकेली नहीं थी, उसे मनचाहा साथी मिल गया था.

मार्था पर क्या गुजरी, पुलिस में दर्ज उस की रिपोर्ट रोंगटे खड़े कर देती है. पुष्कर पहुंचने के बाद वह और नीरज सरोवर में बोटिंग, ब्रह्मा मंदिर दर्शन और कैमल सफारी का आनंद लेते हुए वीडियो रिकौर्डिंग करते रहे. शाम को होटल पहुंचे तो दोनों बुरी तरह थके हुए थे. थकान मिटाने के लिए दोनों ने जम कर व्हिस्की पी.

मार्था ने पुलिस को बताया, ‘‘नीरज होशोहवास में लग रहा था, लेकिन मेरी आंखें मुंदी जा रही थीं. मुझे जानबूझ कर उस ने ज्यादा पिलाई थी. वह मुझ पर हावी होता जा रहा था, जबकि मैं अपने आप को काबू में नहीं रख पा रही थी.

जलालत की हद तब हुई जब उस ने यह कहते हुए मेरे साथ जबरन अप्राकृतिक संबंध बनाए कि तुम फारनर्स तो इस तरह के संबंधों के आदी होते हो. मुझ पर बेहोशी तारी होती जा रही थी. दर्द की लहर मेरे पूरे जिस्म के पोरपोर में भर गई थी. जब होश आया तो नीरज कहीं नहीं था. मेरा सामान और भारीभरकम रकम सब गायब थे. मेरे पहनने के कपड़ों के अलावा मेरे पास कुछ नहीं बचा था. अलबत्ता मार्था को बिलखते देखने के लिए वहां कोई था तो केवल होटल का स्टाफ.

केस भले ही दर्ज हो गया, लेकिन नीरज का पकड़ा जाना इतना आसान नहीं था. कौन जाने उस का नाम नीरज ही था या कुछ और, वह था कहां का. बहरहाल, केस के चक्कर में मार्था भारत में ज्यादा नहीं रुक सकती थी. उस के पास पैसे भी नहीं थे. फलस्वरूप वह एंबेसी से मदद ले कर अपने देश लौट गई.

टर्किश युवती टेसर सेजी की कहानी कुछ अलग है. ओस से भीगी सुबह भले ही हलकीफुलकी ठिठुरन पैदा कर रही थी, लेकिन पुष्कर के रेतीले धोरों पर मतवाली हवाओं में लहराती सी टर्किश बाला टेसर सेजी अपनी कामुक काया से आसपास के लोगों को करंट जैसा झटका दे रही थी. आकर्षक चेहरा, बारीक भौंह, उम्र तकरीबन 22-23 साल. लंबी, छरहरी, गौरांग टेरिस सेजी नशे के सुरूर में ठुमक रही थी. यह भी कह सकते हैं कि अपने यौवन के खुमार में उत्पात मचा रही थी.

जो भी हो, नशे की तमतमाहट ने उस की जवानी की रौनक को दोगुना कर दिया था. वह चलती थी तो उस का लंबा जिस्म बांस की तरह लचकता था. मदहोशी में उस के झूमने का क्या सबब था, कौन जाने. अलबत्ता उस की उन्मुक्तता और गोरी चमड़ी पर लट्टू होने वालों की भीड़ उस के इर्दगिर्द जुटती जा रही थी. परमानंद की अवस्था में पहुंचने की बेचैनी में वह ‘शिवा…शिवा…’ की रट लगाती हुई टूटीफूटी अंगरेजी में ‘आई वांट टू बी फेमस…’ का प्रलाप करते हुए बताने की कोशिश कर रही थी कि वह यहां क्यों आई है.

केसरिया रंग के झीने ब्लाउज में से उस के अंग झांकते से लग रहे थे, साथ ही वह बैंगनी रंग की छाप वाला लोअर पहने थी. टेसर तमाशबीनों को सरकस जैसा मजा दे रही थी. कामकिलोल की मादक भंगिमाओं के साथ शरीर का भड़काऊ प्रदर्शन तमाशबीनों को बेकाबू करता, इस से पहले ही वहां पुलिस आ गई.

उसे काबू करने के लिए एएसआई श्रवण कुमार को काफी मशक्कत करनी पड़ी. अस्पताल पहुंचने तक उस ने कितनी कलाबाजियां खाईं, उस की गिनती न भी करें तो कपालेश्वर तिराहे  पर दरख्तों से बंधे कैमल सफारी वाले ऊंटों के साथ उस का गलबहियां करना तो पूरी पुलिस टीम के लिए काफी भारी पड़ा.

तुलसी गेस्टहाउस में उस के साथ ठहरी उस की महिला मित्र जैकलीन ने जो सूरतेहाल बयान किया, वह चौंकाने वाला था. सेजी के सिर हशीश का नशा चढ़ गया था. बड़े तड़के ही सेजी केरला गोल्ड (शुद्ध हशीश) में अपना पसंदीदा फ्लेवर मिला कर गाढ़े धुएं के नशे में रम गई थी. तभी से वह बेहाल थी. अस्पताल लाने के बाद उसे नींद का इंजेक्शन दिया गया, लेकिन नशे के जबरदस्त डोज के कारण वह भी बेअसर रहा और उस का प्रलाप चलता रहा, ‘आई वांट काम एंड पीस…आई वांट टू बी फेमस.’

तीर्थराज के नाम से देश भर में प्रख्यात पुष्कर का आध्यात्मिक पहलू समझें तो पुष्कर झील में स्नान किए बगैर चारधाम की यात्रा को भी अधूरा माना जाता है. छोटेछोटे मंदिरों और घाटों की वजह से पुष्कर को छोटा बनारस भी कहते हैं.

यहां के पारंपरिक पुष्कर मेले की तो विदेशों में भी खूब धूम है. ऊंटों के झुंडों की गहमागहमी के साथ पुष्कर के सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य तो भुलाए नहीं भूलते. उस समय तो पुष्कर में उच्छृंखलता की घटाटोप घटाएं उमड़ रही थीं, जब शहर में कुछ अरसा पहले ही पर्यटन के नए सवेरे के रूप में पुष्कर मेले में ‘सेक्रेड म्युजिकल फेस्टिवल’ हुआ था.

हकीकत में पर्यटन के रुपहले परदे के पीछे एक भरीपूरी काली दुनिया भी उसांसें भरती है. यह वो पुष्कर नहीं है जिस की आध्यात्मिक छवि लोगों के जेहन में बसती है, बल्कि यह विदेशी सैलानियों की निर्लज्जता और मौजमस्ती का ऐसा घिनौना और दागदार चेहरा भी है, जिसे कोई नहीं देखना चाहता, फिर भी देखना उन की मजबूरी है. यहां शहर की सड़कों, रेत के धोरों, होटलों की छतों, झील के घाटों और पर्वतों की तलहटी में विदेशी पर्यटक हाथ थाम कर प्यार का इजहार ही नहीं करते, बल्कि पूरी लंपटता के साथ मिथुन भंगिमाओं को मूर्तरूप देते हुए भी नजर आ जाते हैं.

कच्ची फैनी की गंध बिखेरती तंग लिबास में बलखाती अर्द्धनग्न विदेशी बालाएं कब आप के करीब से तूफानी अंदाज में गुजर जाएं, पता भी नहीं चलेगा. झील के किनारे नंगधडंग पसर कर धूप सेंकने का इनका अंदाज ही निराला है. कभी धूपछांव तो कभी बारिश की बूंदों सी मचलती इन विदेशी बलाओं के माध्यम से प्यार, दोस्ती, फरेब और लंपटता की छोटीछोटी कहानियां सिलसिलेवार आगे बढ़ती हैं.

कभीकभी एस्टेसी और हशीश की खुराक से परमानंद में आने की बेचैनी इन में बलात संसर्ग की कामना भी जगा देती है. सैक्स रैकेटों की कहानियों की भी यहां कोई कमी नहीं है. पुष्कर एक कश में ‘निर्वाण’ के तलबगारों के लिए ही स्वर्ग नहीं है, बल्कि यहां वहशत का लुच्चा बाजार भी है जो रेव पार्टियों और ट्रांस पार्टियों की शक्ल में फलफूल रहा है.

टर्किश युवती टेसर सेजी क्या बुरी तरह डिप्रेशन में थी? आखिर उस की मनोदशा इस तरह पगलाई हुई युवती जैसी क्यों थी? क्यों वह फेमस होने और सुकून की तलाश का राग अलाप रही थी?

सूत्रों के हवाले से बात करें तो टूटीफूटी अंगरेजी में उस की सहेली जैकलीन ने जो बताया, उस का निचोड़ चौंकाने वाला था. बीते कुछ सालों की मानसिक त्रासदी ने टेसर की जिंदगी के पन्नों को कुछ इस तरह जलाया कि वह अपना चैनसुकून खो बैठी. उसे अपने वर्तमान में कुछ नजर नहीं आता था. यहां तक कि उसे अपना भविष्य और भी ज्यादा स्याह दिखने लगा था.

हशीश और एस्टेसी तो उस के लाइफस्टाइल का हिस्सा बन चुके थे. यह कडि़यल नशा बाबाओं की सोहबत का नतीजा था, जिस में गोते लगाना भारत की आध्यात्मिक परंपराओं का हिस्सा रहा है. जैकलीन ने अपनी फ्रैंड टेसर की व्यथाकथा के मूल कारणों की गिरह खोली.

पिछली बार जब टेसर भारत आई थी तो किसी नागा बाबा के संपर्क में आ गई थी. बाबा ने उसे अपनी शागिर्द भी बना लिया था. लेकिन कुछ दिन बाद नागा बाबा एकाएक कहीं चले गए और लाख कोशिश के बावजूद भी उसे नहीं मिले.

उस ने सुबकते हुए बताया, ‘‘बस, तभी से टेसर बुरी तरह डिप्रेशन में है. उस की बेकाबू मदहोशी की भी यही वजह है.’’

पुष्कर की यह कोई एक कहानी नहीं है. पुष्कर में ऐसी हजारों कहानियां बिखरी पड़ी हैं. आए दिन अपने आप से निर्लिप्त हो कर नशे की मदहोशी में कभी अर्द्धनग्न तो कभी बेलिबास घूमना, सरेआम सैक्स के लिए आमादा हो जाना या फिर नंगधड़ंग हो कर शहर की सड़कों पर दौड़ लगाना, यहां के लोगों के लिए अचंभित करने वाले दृश्य नहीं हैं.

यह सिलसिला भले ही थोड़ा रुकता हो, लेकिन थमता बिलकुल नहीं. नशा तो पुष्कर की नसनस में समा गया है. हर दूसरा पर्यटक जेब में चिलम और रोलिंग पेपर लिए घूमता है. इस के असर से पुष्कर के पुरातनपंथी इलाके भी नहीं बचे हैं.

दबेछिपे तरीके से नशा हर जगह मुहैया है. चरस और गांजा तो यहां चिप्स और कोल्डड्रिंक्स की तरह मिल जाते हैं. हशीश से जुड़ा सामान तलाशने के लिए भी ज्यादा जहमत उठाने की जरूरत नहीं पड़ती.

नशे का जुगाड़ कराने वाले दलाल इटली की चिलम से ले कर अमेरिकी आर्किड की खुशबू वाला पेपर तक मुहैया करा देते हैं. पर्यटकों को और क्या चाहिए? ऐसे नशे में मदहोश और उन्मत्त हो कर विदेशी सैलानी जिस लंपटता पर उतारू हो जाते हैं, उसे देख कर वहशत होने लगती है.

पिछले दिनों एक विदेशी युवती तान्या ने होली बाथ के नाम पर बदकारी का ऐसा नजारा पेश किया कि पूरा शहर शर्मिंदगी में डूब गया था. फिनलैंड की एरिका नामक युवती ने भी ऐसा ही कुछ किया कि देखने वालों के होश फाख्ता हो गए. पहले तो उस ने पूरे कपड़े उतार कर पुष्कर सरोवर के वराह घाट में छलांग लगाई. फिर पानी की सतह पर तैराकी की मुद्रा में चित्त लेट कर लोगों को सैक्स के लिए आमंत्रित करते हुए पूरे सरोवर का चक्कर लगा दिया.

उस की बेशरमी पर कोहराम मचा तो उस ने घाट पर पहुंच कर नंगधड़ंग ही अपने होटल की ओर दौड़ लगा दी. यह संभवत: पहला दृश्य था, जब पुष्कर के लोगों ने नंगी युवती को सड़कों पर दौड़ते देखा.

लोग इसे अभी भूले भी नहीं थे कि एक होटल की छत पर एक विदेशी युवती निर्वस्त्र हो कर अपने पुरुष मित्र के साथ सहवास करते देखी गई. बाद में सनक के चलते वह तेजी से सीढि़यां उतरी और उस ताल में छलांग लगा बैठी, जहां देव प्रतिमाएं बताई जाती हैं. आश्चर्य की बात यह कि इन दृश्यों पर अंगुलियों तो अनेक उठीं लेकिन उसे लताड़ा किसी ने नहीं.

समाजशास्त्रियों का कहना है कि सार्वजनिक स्थलों पर लोगों को आपत्तिजनक स्थितियों में देख कर कोहराम मचाने वाले सांस्कृतिक वालंटियर पुष्कर में क्यों सक्रिय नजर नहीं आते? आखिर यह स्वच्छंदता है या पर्यटन के नाम पर लंपटता का प्रदर्शन?

जापानी युवती मिशेल के लिए पुष्कर एक सपना था, लेकिन सपनों का शहर नहीं. उस के कुछ दोस्त जो पुष्कर हो कर आए थे, उन्होंने उसे पुष्कर के बारे में बढ़चढ़ कर बताया था. फलस्वरूप उस की उत्कंठा प्रबल हो उठी थी. लेकिन पुष्कर का सफर उस की जिंदगी की एक कड़वी याद बन कर रह गया.

मिशेल पुष्कर के जिस गेस्टहाउस में रुकी, वही उस के सपनों की कब्रगाह बन गया. इस से बड़ा विश्वासघात क्या होगा कि जिस गेस्टहाउस के मैनेजर को उस ने अपनी सुरक्षा के लिए 50 हजार रुपए की बड़ी रकम अदा की, वही उस का बलात्कारी बन गया. इतना ही नहीं, उस के रुपएपैसे भी चुरा लिए गए.

बड़ी मुश्किल से वह वहां से बच कर निकली और किसी तरह आगरा पहुंची, जहां उस ने कुछ जानकार लोगों की मदद से रिपोर्ट दर्ज कराई. पुलिस ने गेस्टहाउस मैनेजर और उस के कुछ सहयोगियों को गिरफ्तार भी कर लिया. लेकिन इस मामले की छानबीन की गई तो पुलिस यह जान कर अचरज में पड़ गई कि मिशेल के संबंध अंतरराष्ट्रीय ड्रग माफिया से थे.

ताज्जुब है कि औनलाइन मैगजीन ‘स्मार्ट ट्रैवल एशिया’ की ओर से किए गए सर्वेक्षण में  पूरे एशिया में राजस्थान को बेस्ट होलीडे डेस्टिनेशन के रूप में छठा स्थान मिला है. मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे कहती हैं, ‘‘कोशिश करेंगे, हम और आगे जाएं.’’ आगे जाना गौरव की बात होगी, लेकिन क्या भदेस रंगों के साथ आगे जाना ठीक होगा?

बकौल मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ‘हम ने राजस्थान में अंतरराष्ट्रीय पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए नया ग्लोबल प्रचार अभियान शुरू किया है. इस अभियान का उद्देश्य राज्य में विदेशी पर्यटकों की संख्या दोगुनी कर के 30 लाख तक पहुंचानी है. बिलकुल नए अंदाज के इस अभियान से पर्यटकों को राजस्थान आने के लिए प्रेरित करना है.’

लेकिन पर्यटन के लिए आने वाली विदेशी युवतियों की बेहयाई का क्या होगा जो तमाम सीमाएं तोड़ देती हैं. कुछ दिन पहले पुष्कर की सावित्री पहाड़ी की तलहटी में बेशरमी का नंगा नाच हुआ. कथित रूप से भारतइजरायल का यह मिलाजुला सांस्कृतिक उत्सव था.

इजरायली बालाओं ने पहले अश्लील चुटकुले सुनाए, फिर शराब के नशे में संगीत की धुन पर स्ट्रिप्टीज की तर्ज में थिरकते हुए न केवल अपने कपड़े उतार फेंके, बल्कि अपने पुरुष साथी के कपड़े उतारने का भी दुस्साहस किया.

कितनी ही विदेशी युवतियों ने पर्यटन की आड़ में यहां स्वच्छंदता, मौजमस्ती और उन्मुक्त यौनाचरण के कीर्तिमान रचे हैं. विदेशी युवतियों की स्वच्छंदता ने धर्मस्थलों के पंडितपुजारियों को भी इतना पथभ्रष्ट कर दिया कि वे नैतिकता के तमाम तकाजे भूल कर कामावेश में आ गए.

पिछले दिनों चौंकाने वाली एक घटना तब घटी जब पूजा करते हुए पुजारी ने मंदिर में आई 2 जापानी बालाओं को अंजुरी में पानी भर कर पति का नाम लेने को कहा. उन युवतियों ने अपने आप को अविवाहित बताया तो उन पर बुरी तरह आसक्त पुजारी ने उन्हें गंधर्व विवाह के लिए आमंत्रित कर के खुद को अपना पति मान लेने को कहा. युवतियों ने जब ऐसा करने से इनकार कर दिया तो पुजारी छेड़छाड़ और अश्लील हरकतों पर उतर आया.

नतीजतन दोनों युवतियों वहां से भागीं और पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी. इस के बाद तो पुजारी को पुलिस गिरफ्त में आना ही था. बहरहाल इस में कोई संदेह नहीं है कि पुष्कर समेत राजस्थान के जोधपुर, उदयपुर सरीखे रमणीक ऐतिहासिक शहरों में झीलों और नहरों के किनारे अकसर ट्रांस पार्टियां होती रहती हैं, जिन में नशे में धुत युवकयुवतियों को आपत्तिजनक स्थितियों में फैलेपसरे देखा जाना सामान्य सी बात है.

बेशक राजस्थान विदेशी पर्यटकों की पसंदीदा जगह बन गया है, लेकिन क्या पर्यटन की आड़ में सांस्कृतिक मूल्यों का सर्वनाश करने और सैक्स अपराधों को बढ़ावा देने की इजाजत देना ठीक होगा?

मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भले ही लोक देवताओं का खूबसूरत पैनोरमा बना कर धार्मिक और घरेलू पर्यटकों को बढ़ावा देने की कोशिश में हैं. लेकिन क्या इस बेहयाई की कीमत पर? उधर इन घटनाओं को ले कर अजमेर संभाग की पुलिस महानिरीक्षक मालिनी अग्रवाल का कहना है, ‘पर्यटन को अपराध का खोल पहनाने वाले तत्वों पर लगाम कसने के लिए पुलिस पूरी तरह मुस्तैद है.’

50 वर्ष के अधिकारी और योगी सरकार की योजना

उत्तर प्रदेश सरकार 50 वर्ष से ज्यादा उम्र के हो चुके सरकारी अधिकारियों का मूल्यांकन कर के अयोग्यों को रिटायर करने पर विचार कर रही है. यह तो पक्का है कि 50 वर्ष की उम्र तक ज्यादातर सरकारी कर्मचारियों के दिल पक चुके होते हैं क्योंकि उन्हें तबादलों, नएनए विभागों, नएनए बौसों, बदलते राजनीतिक समीकरणों से जूझना होता है. उन के हाथ में असीमित अधिकार होते हैं पर आजकल मीडिया व अदालतों की स्कू्रटिनी भी जम कर हो रही है.

जनता भी अब निडर होने लगी है और हर फैसले पर चूंचूं करने लगती है. 50 वर्ष की उम्र के बाद अधिकतर सरकारी अफसर समय काटने का मूड बना लेते हैं. उन की जो कमाई होनी होती है, हो चुकी होती है. इस उम्र तक वे ऐसे पद पर पहुंच जाते हैं जहां ऊपर की कमाई सीधे नहीं, छनछन कर पहुंचती है हिस्से के रूप में.

हां, इस स्तर पर भी उन के अधिकार बहुत होते हैं. कमेटियों और मीटिंगों में कहनेकरवाने के उन के अवसर बढ़ जाते हैं, रोबदाब भी खूब रहता है. सवाल है कि क्या उत्तर प्रदेश की भगवा सरकार अपने इस विचार को फैसले में बदल कर लागू करवा पाएगी? भाजपा असल में ऊंची जातियों के सरकारी अफसरों, छोटे व्यापारियों (जो खुद ब्राह्मण बनने की कोशिश कर रहे हैं), मंदिरों के महंतों, संतों और पूजापाठी बुजुर्गों के बल पर सत्ता में आई है.

अगर उस ने बड़े पैमाने पर 50 वर्ष से ऊपर वालों को हटाया तो तूफान मच जाएगा और अफसरशाही खुला नहीं, तो चुपचाप विद्रोह कर देगी, ताकि ऐसा कोई फैसला कारगर ही न हो सके.  हां, यदि इस कदम का उद्देश्य आरक्षित अफसरों को हटाना हो, तो बात दूसरी है. उन अफसरों की फाइलों में उन के बारे में बहुत सी नोटिंग्स होती हैं.

आमतौर पर आरक्षण से आए अफसरों को निकम्मा ही माना जाता है और ऊंची जाति का हर वरिष्ठ अफसर घुमाफिरा कर उन की कुंडली में दोष का ग्रह फिट कर ही जाता है. सरकार ने यह कदम भी उठाया, तो भी भारी पड़ सकता है क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार पर वैसे ही बराबरी को समाप्त करने के प्रयास करने के आरोप लग रहे हैं. 50 वर्ष की उम्र के बाद सरकारी अफसरों की छुट्टी करनी है तो सभी की करी जाए ताकि नया खून आ सके जो पुराने संस्कारों, रीतिरिवाजों से उठ कर नई शिक्षा व नई सोच के साथ सरकार में आया हो.

25 वर्ष की सरकारी सेवा अपनेआप में काफी होनी चाहिए.  राजनीति में तो 10 साल भी बड़ी मुश्किल से मिलते हैं. सरकारी अफसर जनता की सेवा के लिए होते हैं और युवा अफसर ही देश को चाहिए जो दमखम से इस गंदे, बदबूदार, गरीब देश की कायापलट कर सकें. बुजुर्ग अफसर तो केवल सचिव स्तर के रहने चाहिए, जो अपने अनुभवों का प्रशासन में सदुपयोग कर सकें.

बदहाल कृषि अर्थव्यवस्था का राजनीतिक अर्थशास्त्र

एक जमाना था, जब कृषि का अर्थव्यवस्था में बोलबाला हुआ करता था. लोगों के लिए खेती ही जिंदगी चलाने का जरीया और जीवन जीने का तरीका दोनों होती थी. कृषि व्यवस्था का विकास अपनेआप में एक प्रगतिशील घटना थी. लेकिन यूरोप में हुई औद्योगिक क्रांति के बाद धीरेधीरे कृषि की अहमियत कम होती गई और उस की जगह नए उद्योगधंधों ने ले ली.

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यूरोप का आधुनिकीकरण जब तीसरी दुनिया के देशों में पहुंचा, तो उन की अर्थव्यवस्था जो उस समय कृषि आधारित थी, के लिए कहर साबित हुआ. गुलामी के कारण इन देशों का पूरा उत्पादन यूरोप के विकसित कारखानों की भूख मिटाने वाला कच्चा माल बन कर रह गया.

भारत की हालत भी अन्य गुलाम देशों से कोई खास अलग नहीं रही. उसे 200 सालों तक अपने कृषि उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा कच्चे माल के रूप में इंगलैंड के उद्योगधंधों के लिए निर्यात करना पड़ा. अंगरेजों ने न केवल भारत को लूटा, बल्कि भारतीयों की जरूरतों को भी नजरअंदाज किया, जिस के कारण कई बार भुखमरी तक की नौबत आ गई. हालात का अंदाजा चंपारण में किसानों से जबरदस्ती नील की खेती कराने से लगाया जा सकता है.

जब साल 1947 में अंगरेजों से भारत को आजादी मिली, तो खेती की हालत खराब थी. यहां के उद्योगधंधों का भी ठीक से विकास नहीं हुआ था. भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कृषि व्यवस्था और उद्योगधंधों में सुधार लाने की कोशिशों का दावा किया गया, पर हकीकत में इन सब कोशिशों से भी कृषि की हालत में कोई खास सुधार देखने को नहीं मिला. वहीं दूसरी तरफ भूसुधार आंदोलनों की असफलता के कारण अंगरेजों के समय में होने वाले किसान आंदोलन आजादी के बाद भी देश के तमाम हिस्सों में उठते रहे हैं. इस की झलक तेलंगाना के महान किसान विद्रोह से ले कर आज के किसान आंदोलनों में देखी जा सकती है.

आमतौर पर हरित क्रांति को कृषि के सुधार क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कदम माना जाता है, जिस से देश के कुल अनाज उत्पादन में काफी इजाफा देखा गया, पर छोटे और मंझोले किसानों के लिए यह बेकार साबित हुई. महंगे खादबीजों और उन्नत मशीनों जैसे टै्रक्टर और सिंचाई के यंत्रों ने बड़े किसानों का काम बहुत हद तक आसान कर दिया. अब उन की फसलों के उत्पादन में काफी इजाफा देखा गया, पर वहीं दूसरी ओर इन सब यंत्रों का इस्तेमाल और महंगे खादबीज खरीदना छोटे किसानों के बूते की बात नहीं थी, जिस से वे पहले से ज्यादा पिछड़ते गए.

कृषि के लिए सब से बुरा दौर तो तब शुरू हुआ, जब साल 1991 में भारत ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीति की ओर कदम बढ़ाया. खेती की पहले से खराब हालत किसानों के लिए फांसी का फंदा बनती गई.

खेतीबारी के तौरतरीके अब पूरी तरह से बदल गए. कृषि की लागत आसमान छूने और कर्ज समय पर न चुकाए जाने के कारण, किसानों पर कर्ज की रकम बहुत ज्यादा हो गई, जो किसानों की औकात से बाहर हो गई.

साल 1995 के बाद के आंकड़े देखें तो वे काफी खराब हैं. सचाई यह है कि किसानों के आत्महत्या के मामले काफी बढ़े हैं. भारत की कुल आबादी के 70 से 72 फीसदी लोग खेती पर निर्भर माने जाते हैं.

जब ऐसी हालत में कृषि पर संकट बढ़ेगा, तो उस पर निर्भर लोगों के जीवन पर संकट आना लाजिम है. सरकारी आंकड़ों की ही बात करें तो साल 1995 से साल 2003 के बीच औसतन हर साल 15400 किसानों के आत्महत्या के मामले सामने आए हैं. वहीं साल 2004 से साल 2012 के बीच इन की संख्या 16000 से ऊपर रही है. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि हकीकत में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या इन आंकड़ों से कहीं ज्यादा है.

अभी हाल ही के अध्ययन से यह सामने आया है कि 80 फीसदी मामलों में किसानों ने कर्ज बैंकों से लिया न कि साहूकारों या बनियों से, जो सरकार की नाकामयाबी को दर्शाता है.

साल 2014 के चुनावी भाषणों में प्रधानमंत्री ने  कृषि और किसानों की हालत सुधारने के बड़ेबड़े वादे किए, लेकिन सत्ता में आने के बाद उन के अन्य वादों की तरह ये वादे भी जुमले साबित हुए.

नई सरकार ने योजना आयोग को नीति आयोग में बदला. किसानों के लिए लुभावनी योजनाएं, जैसे प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना व कृषि सिंचाई योजना बनाई गईं. पर ये सब कोशिशें किसानों की हालत में कोई बदलाव लाने में असफल रही हैं.

नहीं आते दिखाई दे रहे किसानों के अच्छे दिन : मौजूदा सरकार का पूंजीपतियों की ओर बढ़ता झुकाव किसानों के लिए घातक है. उस के द्वारा समाज में राष्ट्र व धर्म के नाम पर जो आग फैलाई जा रही है, वह किसानों को भी अपने लपेटे में ले लेगी.

यह एक सचाई है कि कृषि में खेतीबारी के साथसाथ पशुपालन भी जुड़ा रहता है. जहां खेती नहीं होगी, वहां पशुपालन भी मुश्किल होता है और बिना पशुधन खेती करना कठिन होता है. किसानों को दोनों से आर्थिक लाभ मिलता है. लेकिन जब से बीफ बैन के साथसाथ अन्य मीट पर रोक लगाने को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया गया है, तब से पशुपालन का काम बिगड़ गया है.

खेती और पशुपालन में जो संतुलित संबंध था, वह अब बिगड़ने लगा है. एक ओर जहां गाय, भैंस, बकरी, मुरगी वगैरह पालने वालों का धंधा चौपट होने पर है, वहीं इस से मांस के कारोबारियों की हालत भी खराब हो गई है.

ऐसी हालत में बेबस मजदूर और किसान आत्महत्या करेंगे या फिर मध्य प्रदेश में चल रहे किसान आंदोलन का हिस्सा बनेंगे. मजेदार बात यह है कि इस से रईस लोगों को कोई परेशानी नहीं हो रही है, क्योंकि वैध बूचड़खानों से उन की जरूरत पूरी हो जाती है.

जबजब किसानों की आत्महत्या और आंदोलन के मुद्दे जोर पकड़ते हैं, तो कई प्रकार के सुझाव सामने आते हैं, जैसे एक किसान आयोग की स्थापना की जाए, स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू किया जाए या किसानों को एक तय वेतन दिया जाए, लेकिन दिक्कत यह है कि भारत के राजनीतिक आकाओं ने यहां के दलाल पूंजीपतियों के दबाव में आ कर देश को वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था के आगे इतना गिरवी रख दिया है कि वे चाह कर भी जरूरी कदम नहीं उठा सकते.

अब सवाल उठता है कि क्या और कोई रास्ता नहीं है किसानों के सामने खुदकुशी करने या पुलिस की गोलियों से मरने के अलावा  न केवल किसानों का ही, बल्कि हर भारतीय का फर्ज बनता है कि एक सामूहिक बड़े जन आंदोलन को खड़ा किया जाए, जो भारत को इस पूंजीवादी गुलामी के शिकंजे से बाहर निकालने में कामयाब हो, जिस से न केवल किसानमजदूरों के हालात सुधरेंगे, बल्कि तालीम और रोजगार के क्षेत्र में भी आम नागरिक के लिए रास्ते खुलेंगे.

‘नूतन का बेटा हूं इसलिए मुझे काम मिलता रहा’

मां की सीख और बौलीवुड में कुछ करने की ललक ही मोहनीश को मायानगरी की रंगीन दुनिया में लाई थी. 1983 में आई फिल्म ‘बेकरार’ से ऐक्टिंग की शुरुआत करने वाले मोहनीश आए तो थे ऐक्टर बनने पर 1989 की ब्लौकबस्टर फिल्म ‘मैं ने प्यार किया’ में सलमान के अपोजिट उन के नैगेटिव किरदार ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया.

मोहनीश ने कई यादगार किरदारों को निभाया है. फिल्म ‘हम आप के हैं कौन’ और ‘हम साथसाथ हैं’ में उन के द्वारा निभाया गया आदर्श बड़े भाई का किरदार हमेशा याद रहेगा. 3 साल पहले आई फिल्म ‘जय हो’ के बाद वे छोटे परदे से जुडे़ और दर्शकों का मनोरंजन कर रहे हैं. इन दिनों वे ऐंड टीवी पर आ रहे क्राइम शो ‘होशियार’ को होस्ट कर रहे हैं. पेश हैं, शो के प्रमोशन के दौरान उन से हुई बातचीत के कुछ अंश :

फिल्मों में कैसे आना हुआ?

फिल्मी परिवार से होने के कारण सैट्स पर मेरा अकसर आनाजाना होता था. जब मां मुंबई से बाहर शूटिंग के लिए जाती थीं तो मैं भी उन के साथ ही रहता था. एक दिन फिल्म निर्माता राज खोसला ने मुझे उर्दू सीखने के लिए बुलाया, तब मैं 18-19 साल का था, सैट्स पर ही मेरी उर्दू की क्लास चलने लगी.

फिल्मों में जाने का मन मैं पहले ही बना चुका था. खोसलाजी से मिलने पर यह बात फैल गई कि मैं इंडस्ट्री जौइन कर रहा हूं. सन्नी देओल, संजय दत्त, कुमार गौरव समेत मेरे साथ बहुत से स्टार संस ने डैब्यू किया था. शुरुआती फिल्में बौक्स औफिस पर बुरी तरह फ्लौप हुईं.

उस दौर की ‘पुराना मंदिर’ मेरी हिट फिल्म थी, लेकिन हौरर फिल्मों को उस समय बी ग्रेड माना जाता था. फिल्मों में नाकामयाब होने के बाद मैं ने इंडस्ट्री छोड़ने का मन बना लिया और फ्लाइंग सीखना शुरू कर दिया, क्योंकि काम तो करना ही था.

सलमान खान से मेरी दोस्ती बहुत पहले से थी, सूरजजी ‘मैं ने प्यार किया’ फिल्म के औडीशन ले रहे थे, सलमान ने कहा कि तू भी एक बार औडीशन क्यों नहीं देता. मैं गया और फिल्म के लिए सिलैक्ट हो गया. उस फिल्म में निभाया गया मेरा ग्रे करैक्टर मेरे कैरियर का टर्निंग पौइंट साबित हुआ.

मां का कितना प्रभाव पड़ा?

मां का अपने बच्चे पर प्रभाव पड़ना तो लाजिमी है. मां ने 3 बातें मुझे सिखाई थीं, पहली कैमरे के सामने सिंसियर हो कर काम करो, दूसरी, बड़ी तकनीकी वाली बात थी कि शूटिंग के समय रीटेक के बाद जब दोबारा शूटिंग शुरू हो तो याद रखना कि पहले हाथ का ऐंगल क्या था? यह छोटी बात जरूर थी मगर टैक्निकली बहुत बड़ी है. तीसरी बात वे हमेशा कहती थीं कि तुम्हारी नाक लंबी है इसलिए कैमरे के सामने इस का ध्यान रखना.

नूतनजी इतनी बड़ी अदाकारा थीं, परिवार को उन की कमी तो महसूस नहीं हुई?

वे जितनी अच्छी अदाकारा थीं उतनी ही अच्छी एक मां व एक पत्नी भी थीं. सामंजस्य क्या होता है यह मैं ने उन से ही सीखा. वे बेहद बहादुर थीं. कैंसर जैसी बीमारी का उन्होंने बहादुरी से सामना किया. जब उन्हें कैंसर का पता चला तो वे मायूस नहीं हुईं. उन्होंने कैंसर से पहली जंग जीत ली थी, लेकिन उस के बाद कैंसर ने उन के लिवर पर आक्रमण किया. बीमारी के दौरान भी वे हमें हौसला देती रहीं.

उन के जीवित रहते मेरा फिल्मी कैरियर शुरू हो चुका था, लेकिन परवान नहीं चढ़ा था. उन्होंने मेरी फिल्में ‘मैं ने प्यार किया’ और ‘बाग़ी’ देखीं. उन्हें मेरा काम पसंद आया.

जब बीच में मेरे पास कोई काम नहीं था तब वे हमेशा मेरी हिम्मत बढ़ाती रहतीं और अमितजी का उदाहरण देतीं. हालांकि मेरे ऊपर घर चलाने की जिम्मेदारी नहीं थी, लेकिन वे कहती थीं कि लाइफ में किसी भी चीज की गारंटी नहीं है.

उन की कौन सी फिल्में आप को सब से ज्यादा पसंद हैं?

जब मैं छोटा था तब उन की फिल्में कम देखता था, क्योंकि मां अपनी फिल्मों में रोती बहुत थीं और मुझे उन्हें रोते हुए देखना बिलकुल पसंद नहीं था.

मैं उन्हें परदे पर ही सही, लेकिन तकलीफ सहते हुए नहीं देख सकता था. कुछ फिल्में तो मैं ने तब देखीं, जब बड़ा हो गया था. उन की फिल्में ‘सुजाता’, ‘बंदिनी‘, और मिलन’ मुझे बहुत पसंद हैं.  मां के नाम का सहारा इतना रहा कि 20-22 साल तक तो इसी नाम से फिल्में चलती रहीं और काम मिलता रहा.

आप की इमेज एक ग्रे शेड ऐक्टर की बनी है, अब आप पौजिटिव किरदार निभा रहे हैं तो क्या इस बदलाव को दर्शक पचा पा रहे हैं?

यह सही है कि मैं ने नैगेटिव किरदार ज्यादा निभाए हैं, लेकिन सूरज की फिल्मों में दर्शकों ने मेरे बदले अवतार को बहुत सराहा है. जो प्यार मुझे अच्छे किरदार को निभाने में मिला वह कभी भी ग्रे शेड किरदार में नहीं मिला, इसलिए ऐसे रोल करने से बच रहा हूं क्योंकि इस उम्र में अपनी पहचान विलेन की नहीं एक अच्छे कलाकार की बनाना चाहता हूं.

आप के साथी कलाकारों ने ऊंचाइयां छू लीं. आप कैसे पीछे रह गए?

मैं ने फिल्म ‘तेरी बांहों में’ और ‘पुराना मंदिर’ में हीरो का किरदार निभाया था, लेकिन फिल्म ‘मैं ने प्यार किया’ में काम करने के बाद मैं विलेन बन गया. मैं ने कौमेडी भी की, पौजिटिव संजीदा किरदार भी निभाए हैं. इस के बाद अब छोटे परदे पर भी सक्रिय हूं.

मैं मानता हूं कि मेरे साथी कलाकार आज सितारे बन गए हैं, लेकिन मुझे अपने आप से कोई शिकायत नहीं.

35 साल में आप में क्या बदलाव आया है?

असुरक्षा की भावना से मैं आज तक नहीं उबर पाया हूं. मैं मानता हूं कि हम सभी में असुरक्षा की भावना रहती है.

जब मैं इंडस्ट्री में नया आया था तब से ले कर आज तक फिल्मों में जो बदलाव आया है वह तकनीकी रूप से ज्यादा आया है. पहले बंदिशें बहुत थीं, आज उतनी नहीं हैं. आज किसी ऐक्टर को देख कर आप अंदाजा नहीं लगा सकते कि यह ऐसी फिल्म बनाएगा. पहले सभी के स्लौट सीमित थे. हर फिल्म में कौमेडियन, विलेन, हीरो सभी अलग होते थे, लेकिन आज की फिल्मों की कहानी अलग तरह की होती है. यह बदलाव ही है.

हमेशा से आप राजश्री की फिल्मों में रहे हैं, लेकिन ‘प्रेम रतन धन पायो’ में क्यों नहीं थे?

जब सूरजजी इस फिल्म को बना रहे थे तब मेरे पास उन का फोन आया था कि एक बार मैं इस फिल्म की स्क्रिप्ट देख लूं, लेकिन मैं ने स्क्रिप्ट पढ़ी तो पूरी कहानी में मेरे लायक कोई रोल नहीं था. सलमान इस फिल्म में वैसे ही डबल रोल निभा रहे थे.

आजकल कई सारे क्राइम शो आ रहे हैं, उन के हिट होने का क्या कारण है क्यों लोगों को अपराध देखना पसंद है?

उत्सुकता एक ऐसा शब्द है जो हर जगह होता है. मानवीय प्रवृत्ति ही ऐसी है जिस में दीवार के पीछे क्या है इस की उत्सुकता बनी रहती है. इसलिए ऐसे शोज हिट हैं.

पाक पर पनामा पेपर्स का हमला : नवाज ‘शरीफ’ नहीं

पनामा पेपर्स लीक को ले कर एक और देश के मुखिया को सत्ता से बेदखल होना पड़ा है. पनामा पेपर्स में सामने आए विश्वभर के भ्रष्ट नेताओं में शुमार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को वहां के सुप्रीम कोर्ट ने पद से हटा दिया है. कोर्ट ने शरीफ को पद से हटने का आदेश तो दिया ही, भविष्य के लिए उन्हें अयोग्य भी करार दिया है. कोर्ट के फैसले से शरीफ के परिवार का सियासी भविष्य अधर में लटक गया है.

पनामा पेपर लीक मामले पर कोर्ट का फैसला पाकिस्तान की राजनीति की एक ऐतिहासिक घटना है. देश के प्रमुख पद पर बैठे नवाज शरीफ ऐसे शख्स हैं जिन्हें खोजी पत्रकारिता का शिकार होना पड़ा है.

अदालत द्वारा अयोग्य ठहराने का यह पहला मामला नहीं है. इससे पहले पाकिस्तान में अगस्त 1990 में बेनजीर भुट्टो को 18वें संशोधन के तहत हटा दिया गया. जून 2012 में यूसुफ रजा गिलानी को भी सुप्रीम कोर्ट अयोग्य ठहरा चुका है.

इस से पहले आइसलैंड के प्रधानमंत्री सिग्मुंदुर डेविड को पद छोड़ना पड़ा था. पनामा पेपर्स लीक को ले कर विदेशों में कालाधन जमा करने की जांच कर रहे संयुक्त जांच दल यानी जेआईटी की रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट ने नवाज शरीफ सरकार के वित्त मंत्री इशाक डार और नैशनल असैंबली के सदस्य कैप्टन मुहम्मद सफदर को भी उन के पदों से अयोग्य ठहराया है.

कोर्ट के 5 जजों की बैंच ने साफ निर्देश दिए कि नवाज शरीफ, उन की बेटी मरियम, बेटे हुसैन और हसन के खिलाफ 6 हफ्तों में मुकदमा दर्ज किया जाए. साथ ही, पाकिस्तान की शीर्ष भ्रष्टाचार निरोधी संस्था राष्ट्रीय जवाबदेही ब्यूरो को 6 माह में जांच पूरी करने को कहा गया है.

नवाज शरीफ को संविधान के अनुच्छेद 62 और 63 के तहत अयोग्य ठहराया गया है. इन अनुच्छेदों के अनुसार, संसद सदस्य को ईमानदार और इंसाफपसंद होना चाहिए. न्यायमूर्ति एजाज अफजल खान ने कहा कि नवाज शरीफ अब पाकिस्तानी संसद के प्रति ईमानदार और समर्पित सदस्य होने के योग्य नहीं हैं, उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ना होगा. इस के बाद पाकिस्तान चुनाव आयोग ने तुरंत नवाज की योग्यता को खारिज करने का आदेश दे दिया.

बेनामी संपत्ति ले डूबी

नवाज पर प्रधानमंत्री पद पर रहने के दौरान लंदन में बेमानी संपत्ति बनाने के आरोप हैं. लंदन में शरीफ परिवार द्वारा खरीदे गए फ्लैट के लिए पैसे कहां से आए, इस पर नवाज और उन की टीम द्वारा दिए गए जवाब से कोर्ट संतुष्ट नहीं था. न्यायाधीशों ने कहा था कि अगर शरीफ परिवार ने लंदन में फ्लैट्स की खरीद के समय सभी जरूरी कागजात जमा किए होते तो विवाद खड़ा ही नहीं होता.

जेआईटी ने अपनी रिपोर्ट में नवाज और उन के परिवार पर धोखाधड़ी, फर्जी कागजात बनाने, अपनी संपत्ति के स्रोतों को छिपाने और आय से कहीं ज्यादा आलीशान जीवन जीने जैसे कई संगीन आरोप लगाए थे. इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीके इंसाफ यह मामला कोर्ट में ले गई थी और शरीफ के भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ रखा था.

नवाज शरीफ वर्ष 2013 में तीसरी बार प्रधानमंत्री बने थे और अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके. उन्हें पहली बार राष्ट्रपति, दूसरी बार सेना और तीसरी बार सुप्रीम कोर्ट ने हटाया.

15 महीने पहले नवाज शरीफ के भ्रष्टाचार का यह मामला सामने आया था. नवंबर 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने नवाज शरीफ से जुड़े मामले को देखने का फैसला किया. बाद में कोर्ट ने अप्रैल 2017 में जौइंट इंवैस्टिगेशन टीम के गठन का आदेश दिया. 6 सदस्यीय टीम ने जांच शुरू की और 7 हफ्ते की जांच के बाद 10 जुलाई को रिपोर्ट जमा की. इस दौरान शरीफ परिवार के 8 सदस्यों से पूछताछ की गई.

नवाज शरीफ के तीनों कार्यकाल भ्रष्टाचार व घोटालों से घिरे रहे. 6 नवंबर, 1990 को वे पाकिस्तान के 12वें प्रधानमंत्री बने. उन्होंने उस समय आर्थिक सुधारों के साथ साथ परमाणु कार्यक्रम को रफ्तार देने को प्राथमिकता पर रखा. 1992 में दिवालिया चिटफंड कंपनियों के उन के स्वामित्व वाले इत्तफाक ग्रुप को कर्ज देने के खुलासे से उन की किरकिरी हुई और उन की लोकप्रियता कम हुई थी. दिसंबर 2016 में लंदन, सऊदी अरब, यूएई में मनी लौंड्रिंग से संपत्ति खरीदने के आरोपों का खुलासा हुआ.

नवाज शरीफ 1985 में सैन्य तानाशाह जनरल जियाउल हक की मदद से राजनीति में आए थे. अदालत ने जिस अनुच्छेद के तहत अयोग्य ठहराया है, उसे जियाउल हक 18वें संशोधन के जरिए समाप्त करना चाहते थे पर तब शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन ने ही संशोधन का विरोध किया था.

जांच टीम के अनुसार, नवाज 7 अगस्त, 2006 से 20 अप्रैल, 2014 तक दुबई स्थित एक कंपनी के चेयरमैन थे. उन्हें 10 हजार दिरहम वेतन मिलता था. पर 2013 के चुनाव में उन्होंने यह जानकारी नहीं दी. वे इसे झुठलाते रहे पर यूएई वर्क वीजा रोड़ा बन गया. यूएई में सभी को वैज प्रोटैक्शन सिस्टम के तहत बैंक से वेतन मिलता है. सुबूत जांच टीम के पास था. इसी आधार पर नवाज बेईमान साबित हुए.

पनामा पेपर्स में शरीफ परिवार की लंदन में 4 महंगे फ्लैट्स सहित कई संपत्तियों का खुलासा हुआ था. 1990 के दशक में फर्जी कंपनी बना कर इन संपत्तियों को खरीदा गया था. ये संपत्तियां नवाज शरीफ की बेटी और बेटों के नाम हैं.

नवाज शरीफ को इस से पहले 18 जुलाई, 1993 को भी भ्रष्टाचार के मामले में प्रधानमंत्री पद से बरखास्त किया गया था. दूसरी बार अक्तूबर 1999 में जनरल परवेज मुशर्रफ ने उन की सरकार का तख्तापलट किया था. 68 वर्षीय शरीफ पहले ऐसे नेता हैं जो तीसरी बार प्रधानमंत्री बने थे. 1999 में कारगिल युद्ध के चलते शरीफ ने मुशर्रफ को सेना प्रमुख पद से हटाने का फैसला किया पर मुशर्रफ ने तख्तापलट कर दिया. बाद में पाकिस्तान की आतंकवाद निरोधी अदालत ने शरीफ को भ्रष्टाचार मामले में दोषी करार दिया. सऊदी अरब की हुकूमत की मध्यस्थता के चलते वे जेल जाने से बच गए पर उन्हें पाकिस्तान छोड़ना पड़ा. तब उन्होंने सऊदी अरब के शहर जेद्दाह में शरण ली.

अगस्त 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने शरीफ को पाकिस्तान वापस आने की इजाजत दी. सितंबर 2007 में वे 7 वर्षों के निर्वासन के बाद इस्लामाबाद लौटे पर हवाईअड्डे से ही तुरंत उन्हें वापस भेज दिया गया. सऊदी अरब के हस्तक्षेप के चलते नवंबर 2007 में नवाज शरीफ फिर से पाकिस्तान वापस आ गए. तत्कालीन सेना प्रमुख अब पनामा पेपर्स मामले ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पूरी सत्ता को उजाड़ दिया है.

भ्रष्ट नेताओं में जो भय का माहौल व्याप्त है, इस का श्रेय अंतर्राष्ट्रीय मीडिया को दिया जाना चाहिए जिस ने पनामा पेपर्स की रिपोर्ट जारी कर के पूरी दुनिया के अवैध कारोबारियों की कलई खोल दी थी.

100 से ज्यादा देशों के पत्रकारों की संस्था इंटरनैशनल कंसोर्टियम औफ इंवैस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स ने पनामा पेपर्स के नाम से दुनिया की बड़ी हस्तियों का कालाधन उजागर किया था. इसके 1.15 करोड़ दस्तावेज हैं. यह सूचना पनामा की फर्म मोसेक फोंसेका को हैक कर निकाली गई थी. पनामा दक्षिणी अमेरिका का एक छोटा देश है जिस के बीच से एक नहर निकाली गई है जो प्रशांत महासागर व एटलांटिक महासागर को जोड़ती है.

पनामा पेपर्स में 500 भारतीयों के नाम भी सामने आए थे. इन में अभिनेता अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्र्या राय, अजय देवगन, डीएलएफ के चेयरमैन के पी सिंह, गौतम अडाणी के भाई विनोद अडाणी के नाम भी हैं. इन पर फर्जी कंपनियों के जरिए पैसा बाहर भेजने के आरोप हैं. मामले की जांच एसआईटी कर रही है. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और फुटबौलर मैसी जैसी हस्तियों के नाम भी शामिल हैं. भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का दावा करने वाली भारत सरकार इस मामले में कोई कार्यवाही करती नहीं दिख रही है.

भारत में भी ऐसे मामले हुए हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राजनारायण की याचिका पर इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद से हटा दिया था. 1971 में रायबरेली से लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की जीत हुई थी. उन के प्रतिद्वंद्वी राजनारायण चुनाव हार गए थे पर राजनारायण ने इंदिरा गांधी की जीत को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी.

न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी को कदाचार का दोषी पाया और अपने ऐतिहासिक फैसले में गांधी की जीत को अवैध करार दे दिया. कोर्ट ने इंदिरा गांधी पर 6 साल के लिए चुने हुए पद पर आसीन होने से रोक लगा दी थी. हालांकि इस निर्णय से देश में राजनीतिक संकट खड़ा हो गया. इंदिरा गांधी ने इमरजैंसी का ऐलान कर दिया.

पनामा पेपर्स है क्या

पनामा की मोसेक फोंसेका कंपनी द्वारा 1.15 करोड़ गुप्त फाइलों का भंडार इकट्ठा किया गया था. इन में कुल 2,14,000 कंपनियों से संबंधित जानकारी है. इस से अब तक 40 देशों से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक की जा चुकी है. जानकारी के मुताबिक, भ्रष्ट लोगों में सरकारों में बैठे नेता, नौकरशाह, उद्योगपति, फिल्म इंडस्ट्री व खेल जगत के लोग और ड्रग स्मगलर शामिल हैं.

पनामा पेपर्स के नाम से लीक हुए इन दस्तावेजों को सामने लाने में मुख्य भूमिका अमेरिका स्थित एक एनजीओ और खोजी पत्रकारों के अंतर्राष्ट्रीय संगठन आईसीआईजे की है. जांच में जो डाटा सामने आया वह 1977 से ले कर 2015 तक का यानी 40 वर्षों का है. इस मामले में पनामा स्थित ला फर्म मोसेका फोंसेका  के संस्थापक की गिरफ्तारी हो चुकी है.

पनामा की यह लौ कंपनी पैसे के प्रबंधन का काम करती है. कालेधन को सुरक्षित ठिकाने लगाने का काम यह कंपनी सालों से करती आई है. यह फर्जी कंपनी खोल कर कागजों का हिसाब रखती है. पनामा की अर्थव्यवस्था ऐसी ही कंपनियों पर निर्भर है.

आईसीआईजे ने 10 मई, 2016 को कर चोरी के सुरक्षा ठिकाने माने जाने वाले देशों में कंपनियां रखने से जुड़ी पनामा पेपर्स की विस्तृत जानकारी प्रकाशित की थी. इन में हजारों दस्तावेज ऐसे हैं जो भारत के लगभग 2 हजार लोगों, कंपनियों और पतों से जुड़े हैं. इन दस्तावेजों में 147 राजनीतिबाजों के बारे में जिक्र किया गया है. उन के परिवार व नजदीकी लोग इस से जुड़े हैं.

बीते 1 साल में 80 देशों के 100 से अधिक मीडिया संगठनों के 400 पत्रकारों ने इन दस्तावेजों का गहन अध्ययन किया है. अध्ययन करने वाले पत्रकारों में कानून, आयकर, अर्थशास्त्र, मैडिकल जैसे तमाम विषयों के विशेषज्ञ शामिल हैं.

42 देशों में सक्रिय इस कंपनी का करीब 600 लोगों का स्टाफ है. कई देशों में इस कंपनी ने अपनी फ्रैंचाइजी भी दे रखी है. टैक्स हैवन कहे जाने वाले देशों स्विट्जरलैंड, साइप्रस, ब्रिटिश वर्जिन आइसलैंड, जर्सी  जैसे 35 से अधिक देशों में इस के औफिस हैं.

खुलासे के बाद कंपनी को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा. कंपनी के खिलाफ जांच की मांग की गई कि  उस की सूचनाएं कैसे लीक हुईं.

बदहाल राजनीतिक दौर

धर्म के नाम पर बना पाकिस्तान अपनी आजादी के 70 वर्षों बाद भी नेताओं के भ्रष्टाचार और मजहबी कट्टरपंथियों से मुक्त नहीं हो पाया है. पाकिस्तान में उस के जन्म के समय से ही लोकतंत्र पर ग्रहण लगा हुआ है. यही वजह है कि पिछले 70 वर्षों में पाकिस्तान का कोई भी लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री कार्यकाल पूरा नहीं कर सका.

14 अगस्त, 1947 को जब से पाकिस्तान का विश्व के नक्शे पर नए देश के रूप में उदय हुआ था तभी से यह देश भ्रष्टाचार, धार्मिक कट्टरता, सैनिक तानाशाही से जूझ रहा है. सत्ता की छीनाझपटी, तख्तापलट इस राष्ट्र की जैसी स्थायी नियति बन गई है.

1951 में इस देश के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की हत्या कर दी गई. इस के बाद प्रधानमंत्री ख्वाजा नजीमुद्दीन को गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मोहम्मद ने पद से हटा दिया था. ज्योंही 1956 में पाकिस्तान को इस्लामिक राष्ट्र घोषित किया गया, सत्ता वहां फुटबौल बन गई. बारबार कभी सेना ने सत्ता हथियाई तो कभी अदालत ने भ्रष्टाचारी नेताओं पर कोड़ा फटकारा.

1958 में सेना प्रमुख रहे अयूब खान ने लोकतंत्र का गला घोंटते हुए सत्ता कब्जाने की शुरुआत की. देश में मार्शल ला लगा दिया गया. इस के बाद 1960 में वे राष्ट्रपति बन गए. अयूब खान के इस्तीफे के बाद 1969 में जनरल याहया खान ने लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार के खिलाफ बगावत की और उन्हें पद से हटा कर सैन्य शासन लागू कर दिया. बाद में भुट्टो को 1979 में फांसी पर लटका दिया  गया.

1986 में भुट्टो की बेटी बेनजीर भुट्टो ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का नेतृत्व किया. 1990 में बेनजीर को भ्रष्टाचार और अक्षमता के आरोपों में बरखास्त कर दिया गया और नवाज शरीफ देश के प्रधानमंत्री बने.

1993 में राष्ट्रपति इशाक खान और नवाज शरीफ दोनों को ही सेना के दबाव में इस्तीफा देना पड़ा. आम चुनाव हुए तो बेनजीर एक बार फिर सत्ता में लौटीं. फारुख लेघारी राष्ट्रपति बने जिन्होंने 1996 में बेनजीर सरकार को बरखास्त कर दिया. 1999 में बेनजीर भुट्टो और उन के पति आसिफ अली जरदारी को जेल की सजा सुनाई गई. हालांकि वे देश के बाहर ही रहे.

वर्ष 2000 में पीपीपी और शरीफ की मुसलिम लीग ने गठबंधन कर चुनाव जीता और इस गठबंधन की तरफ से पीपीपी के यूसुफ रजा गिलानी देश के प्रधानमंत्री बने. गठबंधन सरकार के साल 1998 में देश में मार्शल ला लगाने की जांच शुरू करने की सहमति बनी तो परवेज मुशर्रफ ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया. नवाज शरीफ ने सरकार से अलग होने का फैसला किया और जरदारी देश के राष्ट्रपति बने.

2007 में बेनजीर भुट्टो निर्वासन से लौट आईं. परवेज मुशर्रफ एक बार फिर राष्ट्रपति चुनाव जीत गए पर सुप्रीम कोर्ट ने उन के निर्वाचन को चुनौती दी. इस से तिलमिलाए मुशर्रफ ने देश में आपातकाल लगा दिया और मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी को बरखास्त कर के नया जज नियुक्त कर दिया. नए जज ने मुशर्रफ की जीत पर मुहर लगा दी. इस बीच, नवाज शरीफ निर्वासन से वापस आ गए और बेनजीर की एक रैली में हत्या कर दी गई.

2012 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को अयोग्य ठहरा दिया जिस से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. दरअसल, उन की सरकार ने जरदारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले खोले जाने से इनकार कर दिया था.  इस के बाद रजा परवेज अशरफ देश में प्रधानमंत्री बने.

2013 में पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामलों में रजा गिलानी की गिरफ्तारी का आदेश दिया था. गिरफ्तारी का यह आदेश उस समय के भ्रष्टाचार से जुड़ा था जो उन्होंने 2010 में जल एवं बिजली मंत्री रहते हुए किए थे.

यह सही है कि पाकिस्तान में चुनी हुई सरकारों ने सही भूमिका नहीं निभाई. उस के नेता भ्रष्टाचार में लिप्त रहे. बाद में उन पर भ्रष्टाचार, बेईमानी के मुकदमे चले, उन्हें निर्वासित होना पड़ा. नवाज शरीफ, बेनजीर भुट्टो, परवेज मुशर्रफ को निर्वासन झेलना पड़ा. मुशर्रफ पर देशद्रोह का मुकदमा चल रहा है.

सरकार और फौज दोनों भ्रष्ट

असल में पाकिस्तान धार्मिक कट्टरपंथियों, भ्रष्ट नेताओं और सेना के दखल के बीच हमेशा डांवांडोल हालात में रहा. तीनों अपनेअपने वर्चस्व के लिए एकदूसरे की टांग खींचने में लगे रहते हैं, इसलिए वहां लोकतंत्र बहुत मजबूत नहीं हो पाया. वहां आतंकवाद पनपता गया. आतंकी ट्रेनिंग कैंप खुल गए. आए दिन अपने ही धर्म के लोगों पर हमले होते हैं.

पाकिस्तान ऐसा देश है जहां चुनी हुई सरकार और फौज दोनों ही समानरूप से भ्रष्ट हैं. पर कानून की तलवार ही कभी कभी कारगर साबित होती रही है. फिर भी, पाकिस्तान की न्यायपालिका को भी निष्पक्ष नहीं कहा जा सकता. वहां भी सेना की दखलंदाजी रहती है. ऐसे में देश में सदैव अराजकता के हालात बने रहते हैं. आम जनता परेशान होती है. उस का गरीबी, भुखमरी, बेकारी से नजात पाना मुश्किल है. यही कारण है कि पाकिस्तान कभी अमेरिका तो कभी चीन के टुकड़ों का मुहताज बने रहने को विवश है.

45 दिनों के प्रधानमंत्री – शाहिद खाकान अब्बासी

पाकिस्तान में राजनीतिक उथलपुथल के बीच शाहिद खाकान अब्बासी को पाकिस्तान के 18वें प्रधानमंत्री के तौर पर चुना गया है.

221 वोटों से चुनाव जीत कर शाहिद अब्बासी पाकिस्तान के अंतरिम प्रधानमंत्री बन गए हैं. प्रधानमंत्री पद के लिए पीएमएल-एन के अब्बासी समेत कुल 6 उम्मीदवार मैदान में थे.

गौरतलब है कि पाकिस्तान मुसलिम लीग-नवाज ने शाहिद खान अब्बासी को अपना उम्मीदवार घोषित किया था, जबकि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की ओर से खुर्शीद शाह और नावेद कमर के नाम पीएम उम्मीदवार के लिए घोषित किए गए थे. वहीं पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ ने शेख राशिद को अपनी ओर से प्रधानमंत्री पद का कैंडीडेट बनाया था. नावेद कमर को 47 वोट, शेख राशिद को 33 वोट और जमाते इस्लामी के साहिबजादा तारिक उल्ला को महज 4 वोट मिले.

पाकिस्तान के संविधान के मुताबिक किसी पार्टी के उम्मीदवार को बहुमत के लिए 172 वोटों की जरूरत होती है. नवाज शरीफ के बेहद करीबी माने जाने वाले अब्बासी उन के मंत्रिमंडल में पैट्रोलियम एवं प्राकृतिक संसाधन मंत्री रहे हैं. अब्बासी 45 दिनों तक इस पद पर रहेंगे.

पाकिस्तान का सैन्य लोकतंत्र

बंटवारे के बाद जब पाकिस्तान वजूद में आया था तब वहां पूंजीवादी तो दूर की बात है, कोई दूसरी तरह की भी अर्थव्यवस्था नहीं थी. नए आजाद हुए देश के लिहाज से यह बात कतई हैरत की नहीं थी पर पाकिस्तान में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का पनपना और फिर स्थायी हो जाना अर्थशास्त्रियों को भी अचंभित कर देने वाली बात थी.

आजाद पाकिस्तान में सिर्फ प्राकृतिक संसाधन थे, उन में भी उल्लेखनीय जमीनें थीं जो आज भी हैं. दोटूक कहा जाए तो वहां जमींदारी व्यवस्था थी जिस में 99 फीसदी आम लोग थे और 1 फीसदी जमींदार या नवाब.

ब्रिटिशकाल में सैन्य अधिकारियों को जमीनें देने का रिवाज पाकिस्तान में साल 1958 तक कायम रहा. मुट्ठीभर अंगरेजों ने दरअसल संपन्न किसानों को ही सैन्य अधिकारी बनाना शुरू कर दिया था. पद के हिसाब से सैन्य अधिकारियों को जमीनें दे दी जाती थीं. इस से अंगरेजों का फायदा यह था कि सेना उन की वफादार बनी रहती थी. इन सैनिकों या सैन्य अधिकारियों के हाथ में हल नहीं, बंदूक होती थी जिस के दम पर ये गरीब मजदूरों से खेती किसानी करवाते थे.

पाकिस्तानी सेना का ढांचा जैसा अंगरेज छोड़ गए थे वैसा ही बना रहा, और आज भी तकरीबन वैसा ही है. नतीजतन, आधी से ज्यादा जमीनों के मालिक वे सैन्य अधिकारी हैं जो खेती की एबीसीडी भी नहीं जानते लेकिन बंदूक और धर्म के दम पर अपने गोदाम भरते रहे. चूंकि पाकिस्तान बना ही धर्म के आधार पर था इसलिए मालिकों के लिए खेतों में पसीना बहाते शोषित वर्ग का ध्यान कभी इस तरफ नहीं गया कि ये जमीनें किस बिना पर आजादी के बाद भी बांटी जा रही हैं.

विभाजन के बाद एक दशक तो स्थापना और स्थायित्व की अफरातफरी में ही गुजर गया और जब लोग आश्वस्त हो उठे कि अब अंगरेज लौट कर नहीं आएंगे और न ही भारत हमला करेगा, तो जमींदारी और शोषण को ले कर सुगबुगाहट शुरू हुई. पर कट्टरवाद को ले कर किसी ने चूंचपड़ नहीं की. 1960 के बाद इस पूंजीवाद का दिखना शुरू हो गया था और एक अर्थव्यवस्था भी आकार लेने लगी थी.

एक मशहूर और विवादित पाकिस्तानी लेखक मुबारक हैदर के अनुसार, बंटवारे के वक्त वहां जो जागीरें मौजूद थीं वे आज भी कायम हैं. सिंध, पंजाब और बलूचिस्तान में तो कई ऐसे बड़े जमींदार हैं जिन के पास हजारों एकड़ जमीनें हैं. चूंकि जमींदार ही सत्ता में हैं, इसलिए भूमि सुधार की बात कोई नहीं करता. पाकिस्तान के गांवों की बदहाली आजादी के 67 वर्षों बाद भी ज्यों की त्यों है और जमींदारों के जुल्म ढाते तानाशाही रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है.

जब उद्योगों की स्थापना होने लगी और छोटेमोटे ही सही, कारखाने भी वजूद में आने लगे तब एक और हैरतभरी बात 1958 में पाकिस्तानी सेना के पहले कमांडर इन चीफ अयूब खान, जिन्होंने पाकिस्तान में सेना द्वारा तख्ता पलटने का रिवाज शुरू किया था, ने यह की कि सैन्य अधिकारियों को वित्त, उद्योग और अर्थव्यवस्था में अहम पद परोसे जाने लगे. बहुत जल्द ही इन सैन्य अधिकारियों ने अर्थव्यवस्था को भी अपने कब्जे में ले लिया. अब पाकिस्तान के उद्योगों व सार्वजनिक उपक्रमों और प्रतिष्ठानों के मुखिया पद पर भी सैन्य अधिकारी विराजने लगे. दोटूक कहा जाए तो अर्थव्यवस्था, जिसे किसी भी आजाद देश की रीढ़ माना जाता है, भी सेना के हाथ में आ गई.

कल तक सेना के जो अधिकारी गांव देहातों में ब्याज पर पैसा चलाते साहूकारी कर रहे थे वे धीरे धीरे शेयर और स्टौक की खरीदफरोख्त भी करने लगे. तमाम अहम आर्थिक प्रतिष्ठानों पर रिटायर्ड सैन्य अधिकारी नजर आने लगे.

सैनिकों और सैन्य अधिकारियों के हाथ में पैसा आया तो राजनीति और धर्म को इन्होंने बंदी बना लिया. इस्लाम में और कुरान में यह लिखा है, यह हिदायत है, और यह बंदिश है जैसी बातें भी ये थोपने लगे जिस से लोग कूपमंडूक बने रहें और ऐसा हुआ भी. तय है पाकिस्तान पहला देश है जहां पूंजीपति वही है जो कभी सैन्य अधिकारी रहा हो. सैन्य पूंजीपति आधारित इस अर्थव्यवस्था ने वहां लोकतंत्र को पनपने ही नहीं दिया.

पनामा पेपर कांड इस का अपवाद नहीं है. जब आम लोगों का गला सिर्फ दो वक्त की रोटी निगलने लायक भर छोड़ा गया तो इन्हीं सैन्य अधिकारियों ने दूसरे कालेधंधे भी करने शुरू कर दिए जिस के लिए पाकिस्तानी सेना दुनियाभर में कुख्यात है. ये धंधे थे हथियारों की तस्करी और आतंकवाद को शह देने के. जिस के चलते पाकिस्तान में मध्यवर्ग कभी मजबूत नहीं हो पाया. लोकतंत्र उच्चवर्ग के लोग कभी चाहते नहीं और निम्नवर्ग में इतनी क्षमता, बुद्धि या चालाकी, कुछ भी कह लें, होती नहीं कि वह सत्ता से लड़ सके.

सरकारें बदलीं, शासक आए, गए. पर पाकिस्तान की सत्ता उन जमींदारों, उद्योगपतियों और पूंजीपतियों के हाथों में ही रही जो कल तक कुछ नहीं थे. इन सैन्य अधिकारियों को चूंकि देशहितों से कोई लेनादेना नहीं था, इसलिए ये हथियारों और मादक पदार्थों की तस्करी और धंधा भी करने लगे. इन लोगों ने इस बात का ध्यान हर वक्त रखा कि आवाम कभी इसलाम के खिलाफ न जाए, इसलिए लोगों को काबू में रखने के लिए ये लोग मजहब का मनमाना इस्तेमाल करते रहे.

मिसाल कट्टरवाद की

पाकिस्तान में पसरी धार्मिक कट्टरता कभी किसी सुबूत की मुहताज नहीं रही जिस में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मात्र 3 शब्द हैं जिन पर अमल करने की सख्त मनाही है. खुले विचारों और हवा के लिए पाकिस्तान में कभी कोई जगह नहीं रही. ऊपर वाले के डर और नीचे वालों के कहर ने किस तरह लोगों को दिमागी तौर पर गुलाम बना रखा है, इस की एक मिसाल साल 2011 में अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया के रूप में देखने में आई थी.

पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तसीर की हत्या दिनदहाड़े उन के ही सुरक्षा गार्ड ने कर दी थी. इस्लामाबाद की कड़ी सुरक्षा तब एक तरफ रखी रह गई थी क्योंकि सलमान तसीर के हत्यारे मुमताज कादरी को यह बात पसंद नहीं आई थी कि  वे ईशनिंदा कानून पर सार्वजनिक रूप से कुछ बोलें. तसीर की गिनती पाकिस्तान के नामी कारोबारियों में होती थी लेकिन वे कट्टरवाद की घुटन से एक हद तक आजाद थे. उन का कुसूर इतना भर था कि वे एक ऐसी औरत की सजा माफ कर देने की बात कर रहे थे जिस ने ईशनिंदा की थी.

पाकिस्तान में ईशनिंदा यानी हजरत मुहम्मद पैगंबर की आलोचना एक संगीन गुनाह है जिस की सजा सिर्फ मौत होती है.

एक हत्यारे को हीरो की तरह पेश करने और पूजने का काम पाकिस्तान में हुआ तो सहज ही दुनिया को समझ आ गया कि पाकिस्तान में लोकतंत्र एक परिकल्पना भर है. धर्म और कट्टरवाद के खिलाफ बोलने वालों को अदालतों के पहले, आम लोग ही सजा दे देते हैं. एक कातिल को मिले समर्थन पर तत्कालीन राष्ट्रपति आसिफ जरदारी भी कुछ नहीं बोल पाए थे जो सलमान तसीर के बेहद नजदीकी दोस्त थे.

नवाज शरीफ बहुत ज्यादा कट्टर नहीं थे. उन्होंने ही पाकिस्तानियों को टीवी चैनल्स और इंटरनैट इस्तेमाल करने की सहूलियतें दीं. वे कट्टरवादियों की नापसंद बनते जा रहे थे. उन्होंने वही प्रचलित पाकिस्तानी बेईमानी की थी जो उन के पहले के शासक करते आए थे कि मनमाफिक दाम मिले तो देशहित बेचने में हिचकिचाओ मत. लेकिन पनामा कांड में तो दुनियाभर के नेता और दूसरे रसूखदार लोग भी शामिल हैं.

मुमकिन यह भी है कि पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट पर सेना का दबाव इस बाबत रहा हो. वजह, जिस देश में कपड़े धर्म के मुताबिक पहने जाते हों, जहां की दिनचर्या धार्मिक निर्देशों से चलती हो, जहां के नेता पूरी तरह धार्मिक गुलामी ढोते हों, वहां की सब से बड़ी अदालत निष्पक्ष न्याय करेगी, इस में शक है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बारीकी से नजर डालें तो उस ने नवाज शरीफ को यूएई के वर्क वीजा के बाबत झूठ बोलने पर हटाया है, न कि भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध हो जाने पर. हुक्म यह भी था कि उन्हें अपील करने का भी हक न दिया जाए.

इमरान के निशाने पर नवाज की शाही जिंदगी

पनामा पेपर्स लीक में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पद से हटाए जाने से पहले ही नवाज शरीफ की खरबों की जायदाद उन के राजनीतिक विरोधियों खासतौर से इमरान खान के निशाने पर रही है. लाहौर में उन का आलीशान मकान रायविंड पैलेस है जिस में 3 भव्य ड्राइंगरूम और स्वीमिंग पूल भी हैं. नवाज शरीफ के परिजनों के दाखिले के लिए अलग से एक दरवाजा खासतौर से बना हुआ है. रायविंड पैलेस के लगभग सभी दरवाजों पर शेर बने हुए हैं.

नवाज शरीफ की देशविदेश में फैली जायदाद का सही अंदाजा शायद ही कोई लगा पाए पर उजागर तौर पर उन की जायदाद की कीमत 9,000 करोड़ रुपए के लगभग आंकी जाती है. शरीफ 6 शुगर फैक्टरियों और एक स्टील मिल के भी मालिक हैं. पनामा मुद्दे पर नवाज को घेरने वाले इमरान खान का दावा है कि नवाज के पास लंदन के एक पौश इलाके में भी जायदाद है और उन्होंने यूरोप में लाखों डौलर का निवेश कर रखा है. बकौल इमरान, चूंकि पाकिस्तानी संसद में बैठा विपक्ष भी भ्रष्ट है, इसलिए कोई इस बाबत सवाल नहीं करता, सभी के पास बेहिसाब नाजायज दौलत है.

नवाज शरीफ के मालिकाना हक की जमीनों की कीमत ही 150 करोड़ रुपए है. उन के बेटे हुसैन शरीफ के पास 80 करोड़ डौलर की जायदाद लंदन में है. उन की पत्नी कुलसूम नवाज के नाम 10 करोड़ रुपए कीमत की जमीनें और मकान हैं.

फौंट से फंसी सरकार

पनामा लीक्स मामले में तकनीक की बड़ी भूमिका सामने आई है. पनामा पेपर स्कैंडल में फंसे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की बेटी मरियम नवाज शरीफ की एक फौंट ने रातों की नींद उड़ा दी. असल में इस मामले में नवाज शरीफ की बेटी मरियम द्वारा पेश दस्तावेजों के केवल फौंट स्टाइल पकड़ में आने से झूठ की जटिल श्रृंखला का परदाफाश हुआ. इस के केंद्र में कैलिब्री फौंट रहा है. मरियम ने संपत्ति के जो कागजात अदालत में दाखिल किए थे, उन की तारीख और फौंट मेल नहीं खा रहे थे. उन के द्वारा पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत दस्तावेज, जो कि 2006 में तैयार किए गए थे, कैलिब्री फौंट में तैयार किए गए थे. जबकि कैलिब्री फौंट को माइक्रोसौफ्ट कंपनी ने मार्केट में 30 जनवरी, 2007 में विंडोज विस्ता और माइक्रोसौफ्ट औफिस में लौंच किया था. फौंट के मार्केट में आने से पहले कोई दस्तावेज उस फौंट में कैसे तैयार किया जा सकता है?

इसी बात को ले कर मरियम के ऊपर फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत करने का आरोप लग गया. मरियम ने दस्तावेजों की फोटो ट्वीट करते हुए दावा किया था कि वह संपत्ति की केवल ट्रस्टी है, स्वामी नहीं. बाद में ये दस्तावेज अदालत में पेश किए गए. डीड दस्तावेजों पर हस्ताक्षर की गई तारीख फरवरी 2006 की थी और वह माइक्रोसोफ्ट कैलिब्री फौंट में प्रिंटेड थे. यहीं पर मरियम द्वारा दाखिल कागजों की पोल खुल गई. इस सिलसिले में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने फौंट के डिजायनर लुकास डी ग्रूट से और फौंट को मार्केट में लाने वाली माइक्रोसौफ्ट से भी पूछताछ की.

– साथ में भारत भूषण श्रीवास्तव और राजीव खरे

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