Crime Story : हुस्न और हवस का खूनी खेल

Crime Story : मिस्टर महेश का कारोबार अच्छा चल रहा था. उन की गारमैंट की कंपनी थी. उन के बनाए सामान का एक बड़ा हिस्सा ऐक्सपोर्ट होता था. मिस्टर महेश थोड़े नाटे और मोटे थे और रंग भी सांवला था, पर उन की पढ़ाईलिखाई और कारोबार करने की चतुराई लाखों में एक थी. मिस्टर महेश ने अमेरिका की हौर्वर्ड यूनिवर्सिटी से एमबीए करने के बाद अपने पिता का कारोबार संभाला था. वे तकरीबन 50 साल के हो चुके थे. उन की शादी भी हो चुकी थी. बीवी काफी खूबसूरत और स्मार्ट थी, पर 5 साल बाद ही उन्हें छोड़ कर किसी और के साथ विदेश जा बैठी थी. उस के बाद उन्हें शादी में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी. पर कुछ महीने पहले ही तकरीबन 25 साल की चंचल से उन की दूसरी शादी हुई थी.

चंचल अपनी निजी जिंदगी में भी काफी चंचल थी. 20 साल की उम्र में उस ने जानबूझ कर रवि से शादी की थी. रवि को कैंसर था और वह 3 साल के अंदर चल बसा.

रवि वैसे तो ज्यादा अमीर नहीं था, फिर भी 2 कमरे का एक फ्लैट, बीमा की रकम और कुछ बैंक बैलैंस मिला कर तकरीबन 2 लाख रुपए और साथ में एक स्कूटर वह छोड़ गया था.

पर वह रकम चंचल जैसी मौडर्न लड़की के लिए ज्यादा नहीं थी. धीरेधीरे वह रकम भी खत्म हो रही थी. इसी बीच उस ने मिस्टर महेश को अपने जाल में फांस लिया था. वह उन की कंपनी में सैक्रेटरी बन कर आई और फिर उन की लाइफ पार्टनर बन बैठी.

चंचल ने शादी के बाद नौकरी छोड़ दी. अब वह मिस्टर महेश के आलीशान बंगले में रहती थी और कार के भरपूर मजे ले रही थी.

इसी बीच मनीष नाम का एक नौजवान मिस्टर महेश की कंपनी में चंचल की जगह सैक्रेटरी बन कर आया.

चंचल और मिस्टर महेश की जिंदगी कुछ दिनों तक सामान्य रही थी. वह पेट से भी हुई थी, पर मिस्टर महेश को इस की भनक भी नहीं होने दी और उस ने बच्चा गिरवा लिया. उस की नजर मिस्टर महेश के कारोबार पर थी.

उधर मनीष अकसर मिस्टर महेश से मिलने घर पर भी आया करता था. चंचल उस की खूब खातिरदारी करती थी. उस के साथ बैठ कर बातें किया करती थी.

बातों के दौरान चाय का कप बढ़ाते समय वह अपना आंचल जानबूझ कर गिरा देती और अपने उभार दिखाती, तो कभी टेबल के नीचे से मनीष के पैरों से खेलती.

धीरेधीरे मनीष भी चंचल की ओर खिंचने लगा था. अब तो वह मनीष के साथ घूमने भी जाया करती थी.

कभीकभार खुद मिस्टर महेश भी मनीष को चंचल के साथ शौपिंग के लिए भेज देते थे. चंचल ने खुश हो कर मनीष को भी बिलकुल अपने जैसा एक कीमती मोबाइल फोन खरीद कर दिया था.

चंचल मनीष को शहर से थोड़ी दूर हाईवे पर बने एक रिसोर्ट पर ले जाती, वहां घंटों उस के साथ समय बिताती और उस के साथ बिस्तरबाजी भी करती. जो देहसुख उसे मिस्टर महेश से नहीं मिलता था, वह मनीष से पा रही थी.

मिस्टर महेश को कारोबार के सिलसिले में शहर से बाहर भी जाना होता था. ऐसे में तो चंचल और मनीष को पूरी छूट होती थी.

खून, खांसी और खुशी छिपाए नहीं छिपते हैं. धीरेधीरे उन दोनों के किस्से दफ्तर से होतेहोते मिस्टर महेश के कानों में भी पड़े, पर उन्होंने इसे चंचल के सामने कभी जाहिर नहीं होने दिया. वैसे, कुछ सचेत चंचल भी हो गई थी.

कुछ दिनों बाद मिस्टर महेश को फिर शहर से बाहर जाना पड़ा था. चंचल मनीष को जीप में बिठा कर फिर किसी रिसोर्ट में मजे ले रही थी.

उसी समय मिस्टर महेश का फोन चंचल के फोन पर आया था. मनीष ने अपना फोन समझ कर ‘हैलो’ कहा.

ठीक इसी बीच चंचल भी बोल उठी, ‘‘किस का फोन है डियर?’’

मिस्टर महेश की आवाज सुन कर मनीष ने फोन चंचल को पकड़ा दिया. बात कर के चंचल ने फोन रख दिया, पर दोनों के चेहरों पर चिंता की लकीरें खिंच आई थीं. उन की मौजमस्ती के आलम में खलल पड़ गया था.

चंचल ने कहा, ‘‘हमें इसी वक्त चलना होगा. मिस्टर महेश 2-3 घंटे में घर आने वाले हैं.’’

रिसोर्ट में आम के बाग थे. चंचल ने 10 किलो आम पैक कराए, तो मनीष पूछ बैठा, ‘‘इतने आमों का तुम क्या करोगी?’’

‘‘तुम आम खाओ, गुठली गिनने की क्या जरूरत है?’’ और दोनों ने एकएक आम जीप में बैठेबैठे खाया.

दोनों अब घर लौट रहे थे. जीप चंचल चला रहा थी. जिस ओर मनीष बैठा था, सड़क के ठीक नीचे गहरी खाई थी. एक जगह जीप को धीमा कर चंचल बाईं ओर पड़ी रेत के ढेर पर कूद गई और जीप का स्टीयरिंग थोड़ा खाई की तरफ ही काट दिया.

मनीष जीप के साथ खाई में जा गिरा था. चंचल की बांह पर मामूली खरोंचें आई थीं. थोड़ी दूर जा कर उस ने लिफ्ट ली और आगे टैक्सी ले कर घर पहुंची, तो देखा कि मिस्टर महेश सोफे पर बैठे कौफी पी रहे थे और टैलीविजन देख रहे थे.

मिस्टर महेश ने पूछा, ‘‘बड़ी देर कर दी… कहां गई थीं?’’

‘‘रिसोर्ट के बाग में फ्रैश आम की सेल लगी थी, वहीं चली गई थी.’’

इसी बीच टैलीविजन पर खबर आई कि एक जीप खाई में गिरी है. उस में सवार एक नौजवान की मौत हो गई है. उस जीप में आमों से भरा एक बैग भी था.

मिस्टर खन्ना बोल उठे, ‘‘तुम्हें तो चोट नहीं आई? मैं मनीष को नौकरी से निकालने ही वाला था. कमबख्त काम के समय दफ्तर से लापता रहता था. मौत ने उसे दुनिया से ही निकाल बाहर कर दिया.’’

इधर शिकारी चंचल अपनी साड़ी पर चिपकी रेत झाड़ रही थी.

Social Story : परमानंद क्या कर पाया क्लेम का आवदेन

Social Story : जब आंखें खुलीं, तो परमानंद ने देखा कि दिन निकल आया था. रात को सोते समय उस ने सोचा था कि सुबह वह जल्दी उठेगा. आटोरिकशा वालों की हड़ताल थी, वरना कुछ कमाई हो जाती. वैसे, आज के समय तांगा कौन लेता है? सभी तेज भागने वाली सवारी लेना चाहते हैं. आटोरिकशा वालों की हड़ताल से कुछ उम्मीद बंधी थी, पर सिर भारी हो रहा था. बुखार सा लग रहा था. इच्छा हुई, आराम कर ले, पर कमाएगा नहीं तो खाएगा क्या? और उस का रुस्तम? उस का क्या होगा?

परमानंद जल्दी से उठा और रुस्तम को चारापानी डाल कर तैयार होने के लिए चल दिया. जल्दीजल्दी सबकुछ निबटा कर उस ने तांगा तैयार किया और सड़क पर जा पहुंचा.

जल्दी ही सवारी भी मिल गई. 2 लोगों ने हाथ दिखा कर उसे रोका. उन में एक अधेड़ था और दूसरा नौजवान.

‘‘कलक्ट्रेट चलना है?’’ अधेड़ आदमी ने पूछा.

‘‘जी, चलेंगे,’’ परमानंद बोला.

‘‘क्या लोगे? पहले तय कर लो,नहीं तो बाद में झंझट करोगे,’’ नौजवान ने कहा.

‘‘आप ही मुनासिब समझ कर दे दीजिएगा. झंझट किस बात का?’’

‘‘नहींनहीं, पहले तय हो जाना चाहिए. हम 30 रुपए देंगे. चलना हैतो बोलो, नहीं तो हम दूसरी सवारी देखते हैं.’’

‘‘ठीक है साहब,’’ परमानंद बोला.

‘‘और देखो, कलक्ट्रेट के भीतर पहुंचाना होगा. बीच में ही मत छोड़ देना.’’

‘‘गांधी मैदान का भाड़ा ही 30 रुपए होता है. भीतर अंदर तक तो 50 रुपए होगा.’’

‘‘देखो, हम ने जो कह दिया, सो कह दिया. चलना है तो चलो,’’ नौजवान की आवाज सख्त थी.

परमानंद इनकार करने ही जा रहा था कि बुजुर्ग ने तांगे पर चढ़ते हुए कहा, ‘‘चलो, तुम 40 रुपए ले लेना. हम भी तो परेशानी में पड़े हैं.’’ अब परमानंद इनकार न कर सका. उस के सिर का दर्द बढ़ता जा रहा था और वह तकरार के मूड में नहीं था.

‘‘ठीक है, 40 रुपए ही सही,’’ परमानंद ने धीरे से कहा. तांगा सड़क पर सरपट दौड़ने लगा. आटोरिकशा वालों की हड़ताल से सड़क खाली सी थी. रुस्तम भी रात के आराम से तरोताजा हो कर तेजी से दौड़ रहा था.दोनों सवारी आपस में बातें कर रहे थे. पता चला, वे एक परिवार के नहीं हैं, बल्कि अलगअलग परिवारों से हैं. शायद दूर का रिश्ता हो. दोनों बाढ़ के नुकसान के अनुदान के सिलसिले में कलक्टर साहब के दफ्तर जा रहे थे.

थोड़ा आगे जाने पर सड़क की दूसरी ओर एक गिरजाघर दिखाई पड़ा. परमानंद ने देखा कि अंधेड़ ने बड़ी श्रद्धा और भक्ति से सिर झुकाया.

नौजवान ने हैरानी से पूछा, ‘‘आप ईसाई गिरजाघर को प्रणाम करते हैं?’’

अधेड़ ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘पता नहीं, किस देवी या देवता का आशीर्वाद मिल जाए और काम बन जाए?’’

वे अधेड़ बता रहे थे, ‘‘इस क्लेम को पाने के लिए मैं 50-60 हजार रुपए खर्च कर चुका हूं. क्लेम 2 लाख रुपए का किया है. अपने एकमंजिला मकान को दोमंजिला दिखाया है. खेती का नुकसान भी दोगुना दिखाया है,’’ और एक लंबी आह भरते हुए उन्होंने आगे जोड़ा, ‘‘देखें, कितना पास होता है और मिलता क्या है?’’

नौजवान ने हामी भरी, ‘‘मैं ने भी अपना नुकसान खूब बढ़ाचढ़ा कर दिखाया है. मुखिया तो मानता ही न था. 30 हजार रुपए दे कर उसे किसी तरह मनाया. मुलाजिम और चपरासी के हाथ अलग से गरम करने पड़े.

‘‘और कलक्ट्रेट में तो खुलेआम लूट है. सभी मुंह खोले रहते हैं. बिना पैसा लिए कोई काम ही नहीं करता. फाइल आगे बढ़ाने के लिए हर बार चपरासी को चढ़ावा देना पड़ता है. लगता है कि सभी बाढ़ और सूखे के लिए भगवान से प्रार्थना करते रहते हैं.’’

आगे गंगा किनारे एक मंदिर था. उन्होंने तांगा रुकवाया, उतर कर बगल की दुकान से तमाम तरह की मिठाइयां खरीदीं और मंदिर में प्रवेश किया.

जब वे वापस आए, तो नौजवान ने कहा, ‘‘इतनी सारीमिठाइयां चढ़ाने की क्या जरूरत थी?’’‘‘सुना नहीं… जितनी ज्यादा शक्कर डालोगे, हलवा उतना ही मीठा होगा. लंबाचौड़ा क्लेम है, चढ़ावा तो बड़ा करना ही होगा. पंडितजी ने कहा है कि जितना ज्यादा चढ़ावा चढ़ाओगे, तो जल्दी फल मिलेगा.’’

इस बाढ़ में तो परमानंद ने अपना सबकुछ खो दिया है. उस का सारा परिवार, उस की प्यारी पत्नी, उस के 2 छोटेछोटे बच्चे, उस का बूढ़ा पिता. सब को इस बाढ़ ने निगल लिया था. एक छोटा सा मिट्टी का घर था, गंगा किनारे सरकारी जमीन पर. सबकुछ, सारे लोग, घर का सारा सामान, रात के अंधेरे में गंगा में समा गए. कुछ भी नहीं बचा.

यह तो रुस्तम की मेहरबानी थी कि वह बच गया, नहीं तो वह भी गंगा की भेंट चढ़ गया होता. पता नहीं, जानवरों को कैसे आने वाली मुसीबत का पता चल जाता है? शायद उसी के चलते उस दिन रुस्तम, जो बाहर बंधा था, रस्सी तोड़ कर जोरों से हिनहिनाते हुए भाग खड़ा हुआ. परमानंद उस के पीछे दौड़ा. दौड़तेभागते वे दूर निकल गए.

रुस्तम लौटने को तैयार ही नहीं था, इसलिए परमानंद भी वहीं रह गया. जब वह लौटा, तो सबकुछ खत्म हो गया था. तेज धारा के कटाव से उस का घर गंगा में बह गया था. तब उस के जीने की इच्छा भी मर गई थी.

वह तो जिंदा रहा सिर्फ रुस्तम के लिए, जो उस का घोड़ा नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा था. वह उस का बेटा था और अब तो उस की जिंदगी बचाने वाला भी.

‘‘जरा जल्दी चलो, दिनभर ले लोगे क्या?’’ नौजवान ने झुंझलाते हुए कहा, ‘‘पहले ही इतनी देरी हो गई है.’’

तांगा तेजी से भाग रहा था… और दिनों से कहीं ज्यादा तेज.

‘क्या उड़ा कर ले चलें? तांगा ही तो है, मोटरगाड़ी नहीं,’ परमानंद ने मन ही मन कहा, पर उन लोगों को खुश रखने के लिए उस ने घोड़े को ललकारा, ‘‘चल बेटा, अपनी चाल दिखा. साहब लोगों को देर हो रही है.’’

लेकिन उस ने चाबुक नहीं उठाया. वह रुस्तम को कभी भी नहीं मारता था.जल्दी ही वे दोनों कलक्ट्रेट पहुंच गए. अधेड़ ने सौ का नोट निकाला, ‘‘बाकी के 60 रुपए दे दो भाई.’’ छुट्टे के नाम पर परमानंद के पास फूटी कौड़ी भी नहीं थी.

‘‘मैं छुट्टे कहां से लाऊं?’’ उस ने आसपास नजर दौड़ाई. छुट्टे पैसे देने वाला उसे कोई न दिखा.

‘‘छुट्टे ले कर चलना चाहिए न?’’ नौजवान बोला. अपने बटुए से उस ने 30 रुपए निकाले, ‘‘मेरे पास तो बस यही छुट्टे हैं.’’

‘‘ले लो भाई. आज ये ही रख लो. बाकी फिर कभी ले लेना,’’ अधेड़ ने कहा.

परमानंद ने वे 30 रुपए ले लिए. पहली सवारी में ही घाटा. फिर उस ने रुस्तम को देखा और उस की पीठ थपथपाते हुए कहा, ‘‘चलो, तेरे लिए चारापानी का इंतजाम तो हो गया.’’

परमानंद सोच रहा था कि बाढ़ के अनुदान का अधिकार इन लोगों से ज्यादा तो उस का था. उस का इन लोगों से ज्यादा नुकसान हुआ था, पर वह कोई क्लेम नहीं कर सका था. घूस देने के लिए उस के पास पैसे न थे. जमीनजायदाद न थी. उस का घर मिट्टी का था, जो सरकारी जमीन पर बना था. मुखिया 10 हजार रुपए मांग रहा था. मुलाजिम की मांग अलग थी और कलक्ट्रेट का खर्च अलग. कहां से लाता वह यह सब? बाढ़ में सबकुछ खो देने के बाद उसे कुछ भी मुआवजा नहीं मिला. किसी ने सुझाया था, ‘रुस्तम को बेच दो.’

ऐसा परमानंद कैसे कर सकता था? कोई अपने बेटे को बेच सकता है भला? उस ने अपने रुस्तम को प्यार से थपथपाया, ‘‘मेरा क्लेम तो तू ही है. मेरी सारी जरूरतों को तू ही पूरा करता है.’’ रुस्तम ने गरदन हिला कर सहमति जताई. गले में बंधी घंटियां बज उठीं और परमानंद के कानों में मधुर संगीत गूंज उठा.

Family Story : समय के साथ

Family Story : रामलाल की सचिवालय में चपरासी की ड्यूटी थी. वह अपने परिवार के साथ मंत्रीजी के बंगले पर ही रहता था. जब वह सरकारी नौकरी में लगा था, तब गांव में उस की 2 बीघा जमीन थी और एक छोटा सा टूटाफूटा घर था, मगर आज 50 बीघा जमीन और 2-2 आलीशान मकान हैं. तीजत्योहार के अलावा शादीब्याह में जब रामलाल अपनी शानदार कार से बीवीबच्चों के साथ गांव में आता है, तब उसे देख कर कोई यह कह नहीं सकता कि वह चपरासी है. उस के बीवीबच्चों के कीमती कपड़ों को देख कर लोग यही समझते हैं कि वे सब किसी बड़े सरकारी अफसर के परिवार वाले हैं.

एक बार रामलाल गांव में अपने फार्महाउस पर था, तभी वहां पर किसी गांव के बड़े सरकारी स्कूल में चपरासी की नौकरी करने वाला उस के गांव का भोलाराम आया.

भोलाराम बोला, ‘‘रामलालजी, हम लोग एक ही समय पर सरकारी नौकरी में लगे थे, मगर तुम आज कहां से कहां पहुंच गए और मैं गरीब चपरासी ही रह गया हूं. तुम्हारी इस तरक्की के बारे में मुझे भी कुछ बताओ भाई.’’

‘‘मेरी तरक्की का राज यही है कि मैं सचिवालय में नौकरी करते हुए समय के साथ चलने लगा था और तुम गांव में ही रह कर अपनी पुरानी दकियानूसी बातों के कारण यह फटेहाल जिंदगी बिता रहे हो…

‘‘मैं ने अपनी दोनों बेटियों को शहर में खूब पढ़ायालिखाया और तुम ने अपनी बेटियों को घर में ही बिठा रखा है. अगर वे शहर में पढ़तीं, तो आज अच्छी नौकरियां कर रही होतीं. मेरी एक बेटी अब तहसीलदार होने वाली है और दूसरी बेटी कलक्टर,’’ रामलाल ने उसे अपनी तरक्की का राज बताया, तो भोलाराम उस से बोला, ‘‘तो मुझे भी अब अपनी दोनों बेटियों के लिए क्या करना चाहिए ’’

‘‘तुम अपनी दोनों बेटियों को हमारे साथ शहर भेज दो. मेरी दोनों बेटियां उन्हें कुछ ऐसा सिखा देंगी कि उन की और तुम्हारी जिंदगी बन जाएगी. कुछ ही दिनों में वे उन्हें ऐसा बदल देंगी कि उन्हें देख कर तुम यह कह ही नहीं पाओगे कि वे दोनों तुम्हारी ही बेटियां हैं…’’

रामलाल की इन बातों को सुन कर भोलाराम ने अपनी दोनों बेटियों को उन के साथ भेजने की हां कर दी.

भोलाराम ने अपने घर जा कर ये सभी बातें अपनी बीवी सावित्री को बताईं, तो वह उस से बोली, ‘‘शहर में जा कर हमारी दोनों बेटियां कहीं शहर की लड़कियों की तरह मौजमस्ती करने न लग जाएं ’’

‘‘मौजमस्ती तो हमारी ये दोनों बेटियां अपने गांव में रहते हुए भी कर रही हैं. कहने को उन की उम्र 16 और 18 साल है, लेकिन अभी से उन में आवारा लड़कों के साथ मजे लेने की आदत पड़ चुकी है.’’

सावित्री बोली, ‘‘तुम अपनी बेटियों के बारे में यह सब क्यों कह रहे हो ’’

‘‘कुछ दिन पहले जब मैं दोपहर में अपने खेतों पर गया था, तब बाजरे के खेतों में हमारी ये दोनों बेटियां उषा और शर्मिला बिलकुल नंगधड़ंग हो कर गांव के 2 लड़कों के साथ वही सब कर रही थीं, जो पति अपनी पत्नी के साथ करता है. मैं ने ये सब बातें तुम्हें इसलिए नहीं बताईं कि सुन कर तुम्हें दुख होगा.’’

सावित्री यह सुन कर दंग रह गई.

भोलाराम उस से बोला, ‘‘हमारी दोनों बेटियों को लड़कों के साथ सोने का चसका लग गया है. अगर वे किसी के साथ घर से भाग गईं, तो इस से हमारी गांव में इतनी बदनामी होगी कि हम लोग किसी को मुंह दिखाने नहीं रहेंगे, इसलिए उन्हें रामलाल के साथ शहर भेज देते हैं.’’

सावित्री बोली, ‘‘लेकिन, रामलाल के बारे में हमारी पड़ोसन माला कह रही थी कि वह अपनी लड़कियों को मंत्रीअफसरों के अलावा ठेकेदारों के साथ सुलाता है, तभी तो आज वह उन की कमाई से इतना पैसे वाला बना है. जब उस की दोनों बेटियां छोटी थीं, तब वह अपनी बीवी रीना को उन के साथ सुलाता था.’’

‘‘अपनी बीवी और बेटियों को पराए मर्दों के साथ सुला कर रामलाल ने आज अपनी हैसियत बना ली है. वे सभी लोग आज ऐशोआराम की जिंदगी जी रहे हैं और हम लोग अपनी दकियानूसी बातों के चलते गांव में ऐसी फटेहाल जिंदगी बिता रहे हैं…’’ भोलाराम थोड़ा रुक कर बोला, ‘‘हमें भी अब रामलाल की तरह समय के साथ चलना चाहिए. हमारी दोनों बेटियां गांव के लड़कों को मुफ्त में ही अपनी जवानी के मजे दे रही हैं.

‘‘अगर ये दोनों शहर में मंत्रीअफसरों व ठेकेदारों को मजे देंगी, तो हम लोग भी रामलाल की तरह पैसे वाले हो जाएंगे और फिर उन दोनों की अच्छे घरों में शादियां कर देंगे. आजकल लोग आदमी का किरदार नहीं, बल्कि उस की हैसियत देखते हैं.’’

सावित्री ने अपनी दोनों बेटियों को रामलाल के साथ शहर भेजने का मन बना लिया.

शहर भेजने की ये बातें जब उन की दोनों बेटियों ने सुनी, तो वे खुशी से झूम उठीं.

सावित्री ने उन दोनों को खुल कर कह दिया, ‘‘यहां पर तुम दोनों बहनें बाजरे के खेतों में चोरीछिपे लड़कों के साथ सोती हो, लेकिन शहर में पैसे कमाओगी. लेकिन जरूरी उपाय करना मत भूलना.’’

दोनों बहनें मन ही मन सोच रही थीं कि बाजरे के खेत में तो किसी के आने के डर से वे पूरे मजे नहीं ले पाती थीं. उन्हें हमेशा यह डर लगा रहता था कि कभी कोई वहां पर आ कर उन्हें देख न ले. शहर में तो एसी लगे कमरे होते हैं, वहां पर किसी के आने का उन्हें डर भी नहीं रहेगा.

जब वे दोनों बहनें रामलाल और उस के परिवार के साथ उन की एसी कार में बैठीं, तो एसी की ठंडीठंडी हवा खाते हुए उन्हें कब नींद आ गई, पता नहीं लगा.

रामलाल की बेटियों में से एक ने ही उन्हें जगा कर कहा, ‘‘अब शहर आने वाला है. वहां के एक मौल से तुम्हारे लिए कुछ ढंग के कपड़े लेने हैं, जिन्हें पहन कर तुम दोनों बहनें खूबसूरत लगोगी.’’

जब वे लोग शहर पहुंचे, तो एक बड़े से मौल में उन दोनों के लिए ढंग के कपड़े खरीदे गए. वहीं पर उन के बाल सैट करा कर उन्हें वे कपड़े पहनाए गए. आईने में खुद को देख कर वे दोनों बहनें बड़ी इतरा रही थीं.

जब वे दोनों रामलाल के घर आईं, तो मंत्रीजी भी उन्हें देख कर चौंक गए. उन दोनों को नहला कर मैकअप करा कर जब रामलाल की बेटी उन्हें मंत्रीजी के कमरे में छोड़ने गई, तो मंत्रीजी भूखे भेडि़ए की तरह उन पर झपट पड़े थे.

कुछ ही देर में मंत्री के साथ भी वही हुआ, जो बाजरे के खेत में उन लड़कों से होता था. मंत्री की तो खुशी की कोई सीमा ही नहीं थी. उन्होंने कुछ दिन बाद दोनों बहनों को एक ठेकेदार से एक लाख रुपए दिलवा दिए.

अपनी दोनों बेटियों की एक लाख रुपए की कमाई देख कर भोलाराम तो खुशी से पागल ही हो गया था. भोलाराम ने भी अब समय के साथ चलना सीख लिया था, पर उसे यह नहीं मालूम था कि यह मौज कितने दिन चलेगी. जैसे ही लड़कियों में कुछ बीमारी हुई नहीं या और दूसरी जवान लड़कियां दिखी नहीं कि वे वापस गांव में नजर आएंगी.

Crime Story : सरेआम लूटी गई दो बहनों की इज्जत

Crime Story : रात का दूसरा पहर. दरवाजे पर आहट सुनाई पड़ी. कोई दरवाजा खोलने की कोशिश कर रहा था. आहट सुन कर नीतू की नींद उचट गई. वह सोचने लगी कि कहीं कोई जानवर तो नहीं, जो रात को अपने शिकार की तलाश में भटकता हुआ यहां तक आ पहुंचा हो?

तभी उसे दरवाजे के बाहर आदमी की छाया सी मालूम हुई. उस के हाथ दरवाजे पर चढ़ी सांकल को खोलने की कोशिश कर रहे थे.

यह देख नीतू डर कर सहम गई. उस के पास लेटी उस की छोटी बहन लच्छो अभी भी गहरी नींद में सो रही थी. उस ने उसे जगाया नहीं और खुद ही हिम्मत बटोर कर दरवाजे तक जा पहुंची.

सांकल खोलने के साथ ही वह चीख पड़ी, ‘‘मलखान तुम… इतनी रात को तुम मेरे दरवाजे पर क्या कर रहे हो?’’

नीतू को समझते देर नहीं लगी कि इतनी रात को मलखान के आने की क्या वजह हो सकती है. वह कुछ और कहती, इस से पहले मलखान ने अपने हाथों से उस का मुंह दबोच लिया.

‘‘आवाज मत निकालना, वरना यहीं ढेर कर दूंगा,’’ कह कर मलखान पूरी ताकत लगा कर नीतू को बाहर तक घसीट लाया.

आंगन के बाहर अनाज की एक छोटी सी कोठरी थी, जिस में भूसा भरा हुआ था. मलखान ने जबरदस्ती नीतू को भूसे के ढेर में पटक दिया. उस की चौड़ी छाती के बीच दुबलीपतली नीतू दब कर रह गई. मलखान उस पर सवार था.

‘‘पहले ही मान जाती, तो इतनी जबरदस्ती नहीं करनी पड़ती,’’ मलखान ने अपना कच्छा और लुंगी पहनते हुए कहा.

लच्छो, जो नीतू से 2 साल छोटी थी, उस ने करवट ली, तो नीतू को अपनी जगह न पा कर उठ बैठी. दरवाजा भी खुला पड़ा था. उसे कुछ अनजाना डर सा लगा.

मलखान पहले लच्छो के बदन से खेलने के चक्कर में था. 2 दिन पहले लच्छो ने उस के मुंह पर थूक दिया था, जब उस ने जामुन के पेड़ के नीचे उसे दबोचने की कोशिश की थी.

वह नीतू से ज्यादा ताकतवर और निडर थी. पर उस ने घुमा कर एक ऐसी लात मलखान की टांगों के बीच मारी कि वह ‘मर गया’ कह कर चीख पड़ा था.

अचानक हुए इस हमले से मलखान बौखला गया था. वह सोच भी नहीं पाया था कि लच्छो इस तरह का हमला अचानक कर देगी. उस की मर्दानगी तब धरी की धरी रह गई थी. एक तरह से लच्छो ने उसे चुनौती दे डाली थी.

लच्छो उठी और दालान में पड़े एक डंडे को उठा लिया. वह धीरेधीरे आगे बढ़ने लगी. उस का शक सही निकला कि दीदी किसी मुसीबत में फंस गई हैं.

मलखान उस समय अंधेरे में भागने की कोशिश कर रहा था कि अचानक लच्छो ने घुमा कर डंडा उस के सिर पर जड़ दिया.

डंडा पड़ते ही वह भागने लगा और भागतेभागते बोला, ‘‘सुबह देख लूंगा.’’

‘‘क्या हुआ दीदी, तुम ने मुझे उठाया क्यों नहीं? कम से कम तुम मुझे आवाज ही लगा देतीं,’’ लच्छो रोते हुए बोली.

‘‘2 रोज पहले ही मैं ने इस की हजामत बना डाली थी, जब इस ने मुझ से छेड़छाड़ की थी.’’

‘‘क्या…?’’ यह सुन कर नीतू तो चौंक गई.

‘‘हां दीदी, कई दिनों से वह मेरे पीछे पड़ा हुआ था. उस दिन भी वह मुझ से छेड़छाड़ करने लगा. उस दिन तो मैं ने उसे छोड़ दिया था, वरना उसी दिन उसे सबक सिखा देती,’’ लच्छो ने नीतू को सहारा दे कर उठाया और कमरे में ले गई.

दोनों बहनें एकसाथ रह कर प्राइमरी स्कूल के बच्चों को पढ़ाया करती थीं. कुछ साल पहले उन के पिता की मौत दिल का दौरा पड़ने से हो गई थी. वह बैंक में मुलाजिम थे.

पिता की मौत के बाद उन की मां श्यामरथी देवी को वह नौकरी मिल गई थी. चूंकि बैंक गांव से काफी दूर शहर में था, इसलिए दोनों बेटियों को गांव में अकेले ही रहना पड़ रहा था. मां कभीकभार छुट्टी के दिनों में गांव आ जाया करती थीं.

मलखान की नाक कट गई थी. एक को तो वह अपनी हवस का शिकार बना ही चुका था, पर दूसरी से बदला लेने के लिए तड़प रहा था.

एक दिन शाम के 7 बज रहे थे. दोनों बहनें खाना बनाने की तैयारी में थीं. मलखान ने अपने कुछ दोस्तों को जमा किया और लच्छो के घर पर धावा बोल दिया.

‘‘बाहर निकल, अब देख मेरा रुतबा. गांव में तेरी कैसी बेइज्जती करता हूं,’’ मलखान अपने साथियों के साथ लच्छो के घर में घुसता हुआ बोला.

घर के अंदर मौजूद दोनों बहनें कुछ समझ पातीं, इस से पहले ही मलखान के साथियों ने लच्छो को पकड़ लिया और घसीटते हुए बाहर तक ले आए.

गांव की इज्जत गांव वालों के सामने नंगी होने लगी. मलखान गांव वालों के बीच चिल्लाचिल्ला कर कह रहा था, ‘‘ये दोनों बहनें जिस्मफरोशी करती हैं. इन की वजह से ही गांव की इज्जत मिट्टी में मिल गई है. हम लच्छो का मुंह काला कर के, इस का सिर मुंड़ा कर इसे गांव में घुमाएंगे.’’

दोनों बहनों का बचपन गांव वालों के बीच बीता था. गांव वालों के बीच पलबढ़ कर वे बड़ी हुई थीं. उन्हीं लोगों ने उन का तमाशा बना दिया था.

योजना के मुताबिक, गांव का हज्जाम भी समय पर हाजिर हो गया.

नीतू को अपनी छोटी बहन के बचाव का तरीका समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे इन जालिमों के चंगुल से उसे बचाया जाए? वह सोच रही थी कि किसी तरह लच्छो की इज्जत बचानी है, यह सोच कर नीतू घर से निकल पड़ी.

नीतू भीड़ को चीरते हुए अपनी बहन के पास जा कर खड़ी हो गई.

भीड़ में से आवाज उठी, ‘‘इस का भी सिर मुंड़वा दो.’’

नीतू पहले तो गांव वालों के बीच खूब रोईगिड़गिड़ाई. उस ने अपनेआप को बेकुसूर साबित करने के दावे पेश किए, पर किसी ने उस की एक न सुनी. बड़ेबूढ़े भी चुप्पी साध गए.

नीतू अपने घर से एक तेज खंजर उठा लाई थी. बात बिगड़ती देख उस ने वह खंजर तेजी से अपने पेट में घुसेड़ लिया.

देखते ही देखते खून का फव्वारा फूट पड़ा. वह चीख कर कहे जा रही थी, ‘‘हम दोनों बहनें बेकुसूर हैं. मलखान ने ही एक दिन मेरी इज्जत लूट ली थी.’’

इसी बीच पुलिस की जीप वहां से गुजरी और वहां हो रहे तमाशे को देख कर रुक गई.

नीतू ने मरने से पहले सारी बातें इंस्पैक्टर को बता दीं. कुसूरवार लोग पकड़े गए. पर नामर्द गांव वालों ने गांव की इज्जत को अपने ही सामने लुटते देखा. यह कलियुग का चीरहरण था.

Love Story : वो भूली दास्तां लो फिर याद आ गई

Love Story : कभी कभी जिंदगी में कुछ घटनाएं ऐसी भी घटती हैं, जो अपनेआप में अजीब होती हैं. ऐसा ही वाकिआ एक बार मेरे साथ घटा था, जब मैं दिल्ली से हैदराबाद जा रहा था. उस दिन बारिश हो रही थी, जिस की वजह से मुझे एयरपोर्ट पहुंचने में 10 मिनट की देरी हो गई थी और काउंटर बंद हो चुका था. आज पूरे 2 साल बाद जब मैं दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरा और बारिश को उसी दिन की तरह मदमस्त बरसते देखा, तो अचानक से वह भूला हुआ किस्सा न जाने कैसे मेरे जेहन में ताजा हो गया.

मैं खुद हैरान था, क्योंकि पिछले 2 सालों में शायद ही मैं ने इस किस्से को कभी याद किया होगा.

एक बड़ी कंपनी में ऊंचे पद पर होने के चलते काम की जिम्मेदारियां इतनी ज्यादा हैं कि कब सुबह से शाम और शाम से रात हो जाती है, इस का हिसाब रखने की फुरसत नहीं मिलती. यहां तक कि मैं इनसान हूं रोबोट नहीं, यह भी खुद को याद दिलाना पड़ता है.

लेकिन आज हवाईजहाज से उतरते ही उस दिन की एकएक बात आंखों के सामने ऐसे आ गई, जैसे किसी ने मेरी जिंदगी को पीछे कर उस दिन के उसी वक्त पर आ कर रोक दिया हो. चैकआउट करने के बाद भी मैं एयरपोर्ट से बाहर नहीं निकला या यों कहें कि मैं जा ही नहीं पाया और वहीं उसी जगह पर जा कर बैठ गया, जहां 2 साल पहले बैठा था.

मेरी नजरें भीड़ में उसे ही तलाशने लगीं, यह जानते हुए भी कि यह सिर्फ मेरा पागलपन है. मेन गेट की तरफ देखतेदेखते मैं हर एक बात फिर से याद करने लगा.

टिकट काउंटर बंद होने की वजह से उस दिन मेरे टिकट को 6 घंटे बाद वाली फ्लाइट में ट्रांसफर कर दिया गया था. मेरा उसी दिन हैदराबाद पहुंचना बहुत जरूरी था. कोई और औप्शन मौजूद न होने की वजह से मैं वहीं इंतजार करने लगा.

बारिश इतनी तेज थी कि कहीं बाहर भी नहीं जा सकता था. बोर्डिंग पास था नहीं, तो अंदर जाने की भी इजाजत नहीं थी और बाहर ज्यादा कुछ था नहीं देखने को, तो मैं अपने आईपैड पर किताब पढ़ने लगा.

अभी 5 मिनट ही बीते होंगे कि एक लड़की मेन गेट से भागती हुई आई और सीधा टिकट काउंटर पर आ कर रुकी. उस की सांसें बहुत जोरों से चल रही थीं. उसे देख कर लग रहा था कि वह बहुत दूर से भागती हुई आ रही है, शायद बारिश से बचने के लिए. लेकिन अगर ऐसा ही था तो भी उस की कोशिश कहीं से भी कामयाब होती नजर नहीं आ रही थी. वह सिर से पैर तक भीगी हुई थी.

यों तो देखने में वह बहुत खूबसूरत नहीं थी, लेकिन उस के बाल कमर से 2 इंच नीचे तक पहुंच रहे थे और बड़ीबड़ी आंखें उस के सांवले रंग को संवारते हुए उस की शख्सीयत को आकर्षक बना रही थीं.

तेज बारिश की वजह से उस लड़की की फ्लाइट लेट हो गई थी और वह भी मेरी तरह मायूस हो कर सामने वाली कुरसी पर आ कर बैठ गई. मैं कब किताब छोड़ उसे पढ़ने लगा था, इस का एहसास मुझे तब हुआ, जब मेरे मोबाइल फोन की घंटी बजी.

ठीक उसी वक्त उस ने मेरी तरफ देखा और तब तक मैं भी उसे ही देख रहा था. उस के चेहरे पर कोई भाव नहीं था. मैं सकपका गया और उस पल की नजर से बचते हुए फोन को उठा लिया.

फोन मेरी मंगेतर का था. मैं अभी उसे अपनी फ्लाइट मिस होने की कहानी बता ही रहा था कि मेरी नजर मेरे सामने बैठी उस लड़की पर फिर से पड़ी. वह थोड़ी घबराई हुई सी लग रही थी. वह बारबार अपने मोबाइल फोन पर कुछ चैक करती, तो कभी अपने बैग में.

मैं जल्दीजल्दी फोन पर बात खत्म कर उसे देखने लगा. उस ने भी मेरी ओर देखा और इशारे में खीज कर पूछा कि क्या बात है? मैं ने अपनी हरकत पर शर्मिंदा होते हुए उसे इशारे में ही जवाब दिया कि कुछ नहीं.

उस के बाद वह उठ कर टहलने लगी. मैं ने फिर से अपनी किताब पढ़ने में ध्यान लगाने की कोशिश की, पर न चाहते हुए भी मेरा मन उस को पढ़ना चाहता था. पता नहीं, उस लड़की के बारे में जानने की इच्छा हो रही थी.

कुछ मिनट ही बीते होंगे कि वह लड़की मेरे पास आई और बोली, ‘सुनिए, क्या आप कुछ देर मेरे बैग का ध्यान रखेंगे? मैं अभी 5 मिनट में चेंज कर के वापस आ जाऊंगी.’

‘जी जरूर. आप जाइए, मैं ध्यान रख लूंगा,’ मैं ने मुसकराते हुए कहा.

‘थैंक यू. सिर्फ 5 मिनट… इस से ज्यादा टाइम नहीं लूंगी आप का,’ यह कह कर वह बिना मेरे जवाब का इंतजार किए वाशरूम की ओर चली गई.

10-15 मिनट बीतने के बाद भी जब वह नहीं आई, तो मुझे उस की चिंता होने लगी. सोचा जा कर देख आऊं, पर यह सोच कर कि कहीं वह मुझे गलत न समझ ले. मैं रुक गया. वैसे भी मैं जानता ही कितना था उसे. और 10 मिनट बीते. पर वह नहीं आई.

अब मुझे सच में घबराहट होने लगी थी कि कहीं उसे कुछ हो तो नहीं गया. वैसे, वह थोड़ी बेचैन सी लग रही थी. मैं उसे देखने जाने के लिए उठने ही वाला था कि वह मुझे सामने से आती हुई नजर आई. उसे देख कर मेरी जान में जान आई. वह ब्लैक जींस और ह्वाइट टौप में बहुत अच्छी लग रही थी. उस के खुले बाल, जो शायद उस ने सुखाने के लिए खोले थे, किसी को भी उस की तरफ खींचने के लिए काफी थे.

वह अपना बैग उठाते हुए एक फीकी सी हंसी के साथ मुझ से बोली, ‘सौरी, मुझे कुछ ज्यादा ही टाइम लग गया. थैंक यू सो मच.’

मैं ने उस की तरफ देखा. उस की आंखें लाल लग रही थीं, जैसे रोने के बाद हो जाती हैं. आंखों की उदासी छिपाने के लिए उस ने मेकअप का सहारा लिया था, लेकिन उस की आंखों पर बेतरतीबी से लगा काजल बता रहा था कि उसे लगाते वक्त वह अपने आपे में नहीं थी. शायद उस समय भी वह रो रही हो.

यह सोच कर पता नहीं क्यों मुझे दर्द हुआ. मैं जानने को और ज्यादा बेचैन हो गया कि आखिर बात क्या है.

मैं ने अपनी उलझन को छिपाते हुए उस से सिर्फ इतना कहा, ‘यू आर वैलकम’.

कुछ देर बाद देखा तो वह अपने बैग में कुछ ढूंढ़ रही थी और उस की आंखों से आंसू बह रहे थे. शायद उसे अपना रूमाल नहीं मिल रहा था.

उस के पास जा कर मैं ने अपना रूमाल उस के सामने कर दिया. उस ने बिना मेरी तरफ देखे मुझ से रूमाल लिया और उस में अपना चेहरा छिपा कर जोरजोर से रोने लगी.

वह कुरसी पर बैठी थी. मैं उस के सामने खड़ा था. उसे रोते देख जैसे ही मैं ने उस के कंधे पर हाथ रखा, वह मुझ से चिपक गई और जोरजोर से रोने लगी. मैं ने भी उसे रोने दिया और वे कुछ पल खामोश अफसानों की तरह गुजर गए.

कुछ देर बाद जब उस के आंसू थमे, तो उस ने खुद को मुझ से अलग कर लिया, लेकिन कुछ बोली नहीं. मैं ने उसे पीने को पानी दिया, जो उस ने बिना किसी झिझक के ले लिया.

फिर मैं ने हिम्मत कर के उस से सवाल किया, ‘अगर आप को बुरा न लगे, तो एक सवाल पूछं?’

उस ने हां में अपना सिर हिला कर अपनी सहमति दी.

‘आप की परेशानी का सबब पूछ सकता हूं? सब ठीक है न?’ मैं ने डरतेडरते पूछा.

‘सब सोचते हैं कि मैं ने गलत किया, पर कोई यह समझने की कोशिश नहीं करता कि मैं ने वह क्यों किया?’ यह कहतेकहते उस की आंखों में फिर से आंसू आ गए.

‘क्या तुम्हें लगता है कि तुम से गलती हुई, फिर चाहे उस के पीछे की वजह कोई भी रही हो?’ मैं ने उस की आंखों में आंखें डालते हुए पूछा.

‘मुझे नहीं पता कि क्या सही है

और क्या गलत. बस, जो मन में आया वह किया?’ यह कह कर वह मुझ से अपनी नजरें चुराने लगी.

‘अगर खुद जब समझ न आए, तो किसी ऐसे बंदे से बात कर लेनी चाहिए, जो आप को नहीं जानता हो, क्योंकि वह आप को बिना जज किए समझने की कोशिश करेगा?’ मैं ने भी हलकी मुसकराहट के साथ कहा.

‘तुम भी यही कहोगे कि मैं ने गलत किया?’

‘नहीं, मैं यह समझने की कोशिश करूंगा कि तुम ने जो किया, वह क्यों किया?’

मेरे ऐसा कहते ही उस की नजरें मेरे चेहरे पर आ कर ठहर गईं. उन में शक तो नहीं था, पर उलझन के बादलजरूर थे कि क्या इस आदमी पर यकीन किया जा सकता है? फिर उस ने अपनी नजरें हटा लीं और कुछ पल सोचने के बाद फिर मुझे देखा.

मैं समझ गया कि मैं ने उस का यकीन जीत लिया है. फिर उस ने अपनी परेशानी की वजह बतानी शुरू की.

दरअसल, वह एक मल्टीनैशनल कंपनी में बड़ी अफसर थी. वहां उस के 2 खास दोस्त थे रवीश और अमित. रवीश से वह प्यार करती थी. तीनों एकसाथ बहुत मजे करते. साथ ही, आउटस्टेशन ट्रिप पर भी जाते. वे दोनों इस का बहुत खयाल रखते थे.

एक दिन उस ने रवीश से अपने प्यार का इजहार कर दिया. उस ने यह कह कर मना कर दिया कि उस ने कभी उसे दोस्त से ज्यादा कुछ नहीं माना. रवीश ने उसे यह भी बताया कि अमित उस से बहुत प्यार करता है और उसे उस के बारे में एक बार सोच लेना चाहिए.

उसे लगता था कि रवीश अमित की वजह से उस के प्यार को स्वीकार नहीं कर रहा, क्योंकि रवीश और अमित में बहुत गहरी दोस्ती थी. वह अमित से जा कर लड़ पड़ी कि उस की वजह से ही रवीश ने उसे ठुकरा दिया है और साथ में यह भी इलजाम लगाया कि कैसा दोस्त है वह, अपने ही दोस्त की गर्लफ्रैंड पर नजर रखे हुए है.

इस बात पर अमित को गुस्सा आ गया और उस के मुंह से गाली निकल गई. बात इतनी बढ़ गई कि वह किसी और के कहने पर, जो इन तीनों की दोस्ती से जला करता था, उस ने अमित के औफिस में शिकायत कर दी कि उस ने मुझे परेशान किया. इस वजह से अमित की नौकरी भी खतरे में पड़ गई.

इस बात से रवीश बहुत नाराज हुआ और अपनी दोस्ती तोड़ ली. यह बात उस से सही नहीं गई और वह शहर से कुछ दिन दूर चले जाने का मन बना लेती है, जिस की वजह से वह आज यहां है.

यह सब बता कर उस ने मुझ से पूछा, ‘अब बताओ, मैं ने क्या गलत किया?’

‘गलत तो अमित और रवीश भी नहीं थे. वह थे क्या?’ मैं ने उस के सवाल के बदले सवाल किया.

‘लेकिन, रवीश मुझ से प्यार करता था. जिस तरह से वह मेरी केयर करता था और हर रात पार्टी के बाद मुझे महफूज घर पहुंचाता था, उस से तो यही लगता था कि वह भी मेरी तरह प्यार में है.’

‘क्या उस ने कभी तुम से कहा कि वह तुम से प्यार करता है?’

‘नहीं.’

‘क्या उस ने कभी अकेले में तुम से बाहर चलने को कहा?’

‘नहीं. पर उस की हर हरकत से

मुझे यही लगता था कि वह मुझे प्यार करता है.’

‘ऐसा तुम्हें लगता था. वह सिर्फ तुम्हें अच्छा दोस्त समझ कर तुम्हारा खयाल रखता था.’

‘मुझे पता था कि तुम भी मुझे ही गलत कहोगे,’ उस ने थोड़ा गुस्से से बोला.

‘नहीं, मैं सिर्फ यही कह रहा हूं कि अकसर हम से भूल हो जाती है यह समझने में कि जिसे हम प्यार कह रहे हैं, वो असल में दोस्ती है, क्योंकि प्यार और दोस्ती में ज्यादा फर्क नहीं होता.’

‘लेकिन, उस की न की वजह अमित भी तो सकता है न?’

‘हो सकता है, लेकिन तुम ने यह जानने की कोशिश ही कहां की. अच्छा, यह बताओ कि तुम ने अमित की शिकायत क्यों की?’

‘उस ने मुझे गाली दी थी.’

‘क्या सिर्फ यही वजह थी? तुम ने सिर्फ एक गाली की वजह से अपने दोस्त का कैरियर दांव पर लगा दिया?’

‘मुझे नहीं पता था कि बात इतनी बढ़ जाएगी. मैं सिर्फ उस से माफी मंगवाना चाहती थी?

‘बस, इतनी सी ही बात थी?’ मैं ने उस की आंखों में झांक कर पूछा.

‘नहीं, मैं अमित को हर्ट कर के रवीश से बदला लेना चाहती थी, क्योंकि उस की वजह से ही रवीश ने मुझे इनकार किया था.’

‘क्या तुम सचमुच रवीश से प्यार करती हो?’

मेरे इस सवाल से वह चिढ़ गई और गुस्से में खड़ी हो गई.

‘यह कैसा सवाल है? हां, मैं उस से प्यार करती हूं, तभी तो उस के यह कहने पर कि मैं उस के प्यार के तो क्या दोस्ती के भी लायक नहीं. यह सुन कर मुझे बहुत हर्ट हुआ और मैं घर क्या अपना शहर छोड़ कर जा रही हूं.’

‘पर जिस समय तुम ने रवीश से अपना बदला लेने की सोची, प्यार तो तुम्हारा उसी वक्त खत्म हो गया था, प्यार में सिर्फ प्यार किया जाता है, बदले नहीं लिए जाते और वह दोनों तो तुम्हारे सब से अच्छे दोस्त थे?’

मेरी बात सुन कर वह सोचती हुई फिर से कुरसी पर बैठ गई. कुछ देर तक तो हम दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला. कुछ देर बाद उस ने ही चुप्पी तोड़ी और बोली, ‘मुझ में क्या कमी थी, जो उसे मुझ से प्यार नहीं हुआ?’ और यह कहतेकहते वह मेरे कंधे पर सिर रख कर रोने लगी.

‘हर बार इनकार करने की वजह किसी कमी का होना नहीं होता. हमारे लाख चाहने पर भी हम खुद को किसी से प्यार करने के लिए मना नहीं सकते. अगर ऐसा होता तो रवीश जरूर ऐसा करता,’ मैं ने भी उस के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.

‘सब मुझे बुरा समझते हैं,’ उस ने बच्चे की तरह रोते हुए कहा.

‘नहीं, तुम बुरी नहीं हो. बस टाइम थोड़ा खराब है. तुम अपनी शिकायत वापस क्यों नहीं ले लेतीं?’

‘इस से मेरी औफिस में बहुत बदनामी होगी. कोई भी मुझ से बात तक नहीं करेगा?’

‘हो सकता है कि ऐसा करने से तुम अपनी दोस्ती को बचा लो और क्या पता, रवीश तुम से सचमुच प्यार करता हो और वह तुम्हें माफ कर के अपने प्यार का इजहार कर दे,’ मैं ने उस का मूड ठीक करने के लिए हंसते हुए कहा.

यह सुन कर वह हंस पड़ी. बातों ही बातों में वक्त कब गुजर गया, पता ही नहीं चला. मेरी फ्लाइट जाने में अभी 2 घंटे बाकी थे और उस की में एक घंटा.

मैं ने उस से कहा, ‘बहुत भूख लगी है. मैं कुछ खाने को लाता हूं,’ कह कर मैं वहां से चला गया.

थोड़ी देर बाद मैं जब वापस आया, तो वह वहां नहीं थी. लेकिन मेरी सीट पर मेरे बैग के नीचे एक लैटर था, जो उस ने लिखा था:

‘डियर,

‘आज तुम ने मुझे दूसरी गलती करने से बचा लिया, नहीं तो मैं सबकुछ छोड़ कर चली जाती और फिर कभी कुछ ठीक नहीं हो पाता. अब मुझे पता है कि मुझे क्या करना है. तुम अजनबी नहीं होते, तो शायद मैं कभी तुम्हारी बात नहीं सुनती और मुझे अपनी गलती का कभी एहसास नहीं होता. अजनबी ही रहो, इसलिए अपनी पहचान बताए बिना जा रही हूं. शुक्रिया, सहीगलत का फर्क समझाने के लिए. जिंदगी ने चाहा, तो फिर कभी तुम से मुलाकात होगी.’

मैं खत पढ़ कर मुसकरा दिया. कितना अजीब था यह सब. हम ने घंटों बातें कीं, लेकिन एकदूसरे का नाम तक नहीं पूछा. उस ने भी मुझ अजनबी को अपने दिल का पूरा हाल बता दिया. बात करते हुए ऐसा कुछ लगा ही नहीं कि हम एकदूसरे को नहीं जानते और मैं बर्गर खाते हुए यही सोचने लगा कि वह वापस जा कर करेगी क्या?

फोन की घंटी ने मुझे मेरे अतीत से जगाया. मैं अपना बैग उठा कर एयरपोर्ट से बाहर निकल गया. लेकिन निकलने से पहले मैं ने एक बार फिर चारों तरफ इस उम्मीद से देखा कि शायद वह मुझे नजर आ जाए. मुझे लगा कि शायद जिंदगी चाहती हो मेरी उस से फिर मुलाकात हो. यह सोच कर मैं पागलपन पर खुद ही हंस दिया और अपने रास्ते निकल पड़ा.

अच्छा ही हुआ, जो उस दिन हम ने अपने फोन नंबर ऐक्सचेंज नहीं किए और एकदूसरे का नाम नहीं पूछा. एकदूसरे को जान जाते, तो वह याद आम हो जाती या वह याद ही नहीं रहती.

अकसर ऐसा होता है कि हम जब किसी को अच्छी तरह जानने लगते हैं, तो वो लोग याद आना बंद हो जाते हैं. कुछ रिश्ते अजनबी भी तो रहने चाहिए, बिना कोई नाम के.

Funny Story : लव के लिए कुछ भी करेगा

Funny Story : न जाने क्यों लड़कियां हमेशा से मेरी बड़ी कमजोरी रही हैं. ऐसा नहीं है कि मैं ऐश्वर्या राय, माधुरी दीक्षित या करीना कपूर जैसी परियों की बात कर रहा हूं, मेरे दिल की धड़कनें तो बरतन मांजने वाली धन्नो भी तेज कर दिया करती थी. लेकिन मेरी बीवी ने फौरन उसे हटा दिया. बात तब की है, जब मैं जोरू का गुलाम नहीं बना था. मुझे मनचले लड़कों का गुरु ही समझ लीजिए. लड़कियों को अपनी ओर घुमाने में मुझे महारत हासिल थी. चाहे वे खा जाने वाली नजरों से घूरते हुए घूमें या फिर गाली देने के इरादे से, आखिर घूमती तो थीं.

हालात आज भी कुछ वैसे ही चल रहे हैं. लड़कियों को भी यह अच्छी तरह मालूम है कि वे मेरी कमजोरी हैं.

‘‘लड्डू, मेरे दीवाने…’’

‘‘ओह, मधु तुम…’’

मेरी तो बांछें खिल गईं. आज तक किसी लड़की ने मुझे इतने प्यार से नहीं पुकारा था. शादी जरूर हो गई थी, मगर आज तक लव करने की लालसा मन में ही मचल रही थी.

‘‘ओह लड्डू… क्या तुम मेरा एक काम करोगे?’’

‘‘हांहां, तुम्हारे लिए तो मैं सूली पर चढ़ सकता हूं, जान दे सकता हूं, आसमान से तारे तोड़ कर तेरे कदमों में डाल सकता हूं, सारी दुनिया से लड़…’’

‘‘बसबस, मैं समझ गई. तुम बस बातें ही बनाओगे, काम नहीं करोगे,’’ उस ने रूठने का नाटक किया.

‘‘तुम्हारे लिए तो मैं जमीनआसमान एक कर सकता हूं मधु…’’ मैं ने उसी अंदाज में बोला.

‘‘मुझे स्टेशन जाना है. वहां पहुंचाने के लिए कोई भी 20-30 रुपए मांग ही लेगा. करीब 30-40 किलो की पोटली जो है. क्या तुम मेरी मदद करोगे? यहां से स्टेशन केवल 3 किलोमीटर ही तो है.’’

मेरे तो होश ही उड़ गए. 30-40 किलो वजन और 3 किलोमीटर की दूरी.

मैं ने मधु से कहा, ‘‘मैं दुबलापतला आदमी, भला इतनी दूर कैसे इतना वजन ले जा सकता हूं?’’

‘‘तुम मर्द के नाम पर कलंक हो. देखा नहीं था कि ‘गदर…’ फिल्म में कैसे सनी देओल अपनी हीरोइन के लिए पूरे पाकिस्तान से लड़ गया था. जाओ, तुम मेरे प्यार के काबिल नहीं,’’ मधु ने ताना देते हुए कहा.

‘‘मधु, मेरे कहने का यह मतलब नहीं था. मैं तो वाकई तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूं,’’ मैं ने दीवानगी जताते हुए कहा.

‘‘ऐ मिस्टर…’’ तभी मधु ने टोका, ‘‘ट्रेन छुड़वाने का विचार है क्या? मैं ने औरत होने के नाते कहा, वरना मैं खुद काफी थी.’’

मर्द वाली बात सुनते ही मेरी छाती गर्व से फूल गई और आननफानन पोटली मेरे सिर पर थी.

मेरे बदन से पसीना टपकने लगा था. लग रहा था, जैसे मेरी जान बाहर ही निकलने वाली है और वह अपनी कमर को लचकाती हुई बेरहम की तरह आगेआगे चल रही थी.

‘‘लड्डू, दिक्कत हो रही हो, तो बोल दो. बाद में कुछ न कहना,’’ मधु ने हाथ मटका कर पूछा.

मेरा तो सिर फटा जा रहा था. मन कर रहा था कि पोटली पटक दूं, मगर प्यार के लिए तो कुछ भी करना पड़ता है न. स्टेशन तक कैसे पहुंचा, यह तो मुझे ही पता है.स्टेशन पहुंचते ही मैं लड़खड़ा गया. एक पत्थर से टकरा जाने की वजह से मैं मुंह के बल जा गिरा. पोटली दूर छिटक गई और खनखन कर के कुछ टूटने की आवाज आई.

मधु दहाड़ें मार कर रोने लगी.

‘‘मैं ने कहा था, दिक्कत है तो बोल दो… पर तुम ने कहा कि यह तो मेरे बाएं हाथ का खेल है…’’ कहते हुए मधु का रोना जारी रहा.

तभी किसी ने मेरा कौलर पकड़ कर मुझे धरती से ऊपर उठा लिया. मेरे तो होश ही उड़ गए. वह बड़ीबड़ी मूंछों वाला सिपाही किसी शेर की तरह खा जाने वाली नजरों से मुझे घूरे जा रहा था.

‘‘क्यों बे, कितने का नुकसान किया है मैडम का?’’

‘‘साहब, मैं ने इस से पहले ही पूछ लिया था कि दम है तो चलो, मगर इस ने मेरा 4 सौ रुपए का सामान तोड़ दिया,’’ मधु ने रोतेरोते कहा.

सिपाही गरजा, ‘‘जल्दी से 4 सौ रुपए दो और मैडम से माफी मांगो.’’

भीड़ ने भी हां में हां मिलाई.

मुझे काटो तो खून नहीं. बीवी ने जो पैसे सामान लाने के लिए दिए थे, वे मैं ने हालात को देखते हुए मधु को दे देने में ही भलाई समझी. मधु ने रोतेरोते रुपए अपने हवाले कर लिए और गाड़ी में चढ़ गई. फिर अचानक ही वह धीरे से मुसकराते हुए बोली, ‘‘तू अपना 30 रुपया भाड़ा तो लेता जा. जरा सौ रुपए के छुट्टे भी कर ला.’’

भीड़ खिलखिला कर हंस पड़ी और मैं शर्म से पानीपानी हो गया.

‘‘लाइसैंस है तुम्हारे पास?’’ तभी सिपाही गुर्राया.

मैं चौंका, ‘‘लाइसैंस… किस चीज का लाइसैंस?’’

‘‘स्टेशन पर कुली का काम करने का…’’

‘‘पर, मैं कुली नहीं हूं. मैं ने तो अपनेपन की खातिर मधु का सामान ला दिया था.’’

‘‘कुली न होने का कोई गवाह?’’

‘‘वह मधु से पूछ लीजिए.’’

‘‘मधु के बच्चे. वह अभी तुझे भाड़ा दे रही थी. चल, अभी मैं तेरे होश ठिकाने लगाता हूं,’’ सिपाही भड़क उठा.

गिड़गिड़ाने के अलावा मुझे कोई चारा नजर नहीं आया.

‘‘चल, 5 सौ रुपए दे दे, मैं तुझे छोड़ दूंगा,’’ सिपाही तरस खाते हुए बोला.

‘‘5 सौ रुपए, पर मेरे पास तो एक रुपया भी नहीं बचा.’’

‘‘तो क्या हुआ?’’ उस की नजर मेरी घड़ी पर थी, ‘‘समय नहीं है मेरे पास, पैसे नहीं हैं, तो अपनी घड़ी ला या फिर अंदर जाने की तैयारी कर.’’

‘‘नहीं, यह घड़ी तो ससुराल की है. मैं इसे नहीं दे सकता,’’ मुझे रोना आने लगा.

‘‘तो फिर चल, तुझे ससुराल की ही सैर करा देता हूं.’’

मैं भी अब अजीब मुसीबत में फंस गया था.

‘किस सौतन को अपनी घड़ी और रुपए दे आए?’ बीवी द्वारा पूछे जाने वाला यह सवाल मेरे दिमाग में घूमने लगा.

‘‘क्यों बे, तू ऐसे नहीं मानेगा,’’ सिपाही चिल्लाया.

तभी उस सिपाही ने मुझे किसी चूहे की तरह दबोचा और दूसरे ही पल मेरी घड़ी उस की हो गई. मैं तड़प कर रह गया. घर पहुंचने पर मेरी बीवी ने क्या खातिरदारी की, यह मत पूछिए..

Social Story : मुनमुन ने कैसे दिखाई हिम्मत

Social Story : ‘मैं यह क्या सुन रहा हूं मां… मुनमुन पति का घर छोड़ कर आ गई है. फौरन उसे वापस भेजो, वरना हमारी बहुत बदनामी होगी,’ पवन की गुस्से में भरी तेज आवाज रामेश्वरी के कानों से टकराई.

‘‘फोन पर क्यों इतना चिल्ला रहा है. थोड़ा शांत हो जा. तुझे कौन सी सचाई का पता है… और देखा जाए, तो तुझे इस बात में कोई दिलचस्पी भी नहीं है. तुझे तो गांव छोड़े बरसों हो गए हैं. तू क्यों बदनामी की चिंता कर रहा है. जब से गया है, तू ने और तेरे बड़े भाई ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

‘‘ठीक भी है, आखिर अब तुम ऊंचे ओहदे पर हो, बड़े आदमी बन गए हो. शहरी चमकदमक तुम्हें इतनी रास आ गई है कि तुम दोनों ने मांबाप और गांव को ही भुला दिया है,’’ रामेश्वरी की आवाज में कड़वाहट थी.

‘मां, हम शहर में रह रहे हैं तो क्या… मुनमुन की शादी करने में तो हम ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी…’ पवन फिर भड़का, ‘इतनी सी बात पर कोई घर छोड़ कर आता है भला. थोड़ा सहना भी चाहिए. पति का हाथ तो उठ ही जाता है. इस में कौन सी नई बात है. इतना हक तो होता ही है पति का. मारपीट, लड़ाईझगड़ा किस पतिपत्नी में नहीं होता. लेकिन वह तो घर ही छोड़ कर आ गई.

‘क्या पता, अब मुनमुन कौन सा गुल खिलाएगी. सच तो यह है कि ऐसी बहन को चौराहे पर खड़ा कर के गोली मार देनी चाहिए. नाक कटवा दी उस ने हम सब की,’ पवन के शब्दों से कड़वाहट टपक रही थी.

‘‘वाह, मेरे काबिल बेटे. पढ़लिख कर भी तू ऐसी सोच रखता है. तुम दोनों भाइयों को न पढ़ा कर मैं ने मुनमुन की पढ़ाई पर ध्यान दिया होता, तो कम से कम आज वह अपने पैरों पर तो खड़ी हो जाती.

‘‘और बेटा, तू सही कह रहा है कि शादी में कोई कसर नहीं छोड़ी थी तुम दोनों भाइयों ने. मैं ने और तेरे बाबूजी ने कितना कहा था कि लड़के के बारे में पहले ठीक से जांच कर लो, पर तुम दोनों भाइयों को तो जल्दी थी उस की शादी करने की, ताकि जल्दी से शहर लौट सको.

‘‘तुम ने न घरपरिवार के बारे में पड़ताल की, न लड़के के बारे में. गाय की तरह मुनमुन को उस से बांध दिया और एहसान भी जताया कि देखो बहन की शादी कितनी धूमधाम से कर दी, कितने जिम्मेदार बेटे हैं हम तो…’’ लगातार बोलने से रामेश्वरी की सांस फूलने लगी थी.

‘‘मां, रहने भी दो अब. तुम्हारी तबीयत खराब हो जाएगी,’’ मुनमुन ने मां के हाथों से फोन लेने की कोशिश की.

‘‘बोलने दे मुझे आज…’’ रामेश्वरी ने फोन को कस कर पकड़े रखा, ‘‘सुन पवन, मैं नहीं भेजूंगी मुनमुन को वापस उस नरक में. शराबी पति की मार कब तक खाएगी वह. वह हमारे ऊपर बोझ नहीं है, जो रोटी की जगह मार और प्यार की जगह दुत्कार सहती रहे.

‘‘शर्म आनी चाहिए तुम्हें. बहन का साथ देने के बजाय तुम्हें बदनामी का डर सता रहा है. अपने ही जब कीचड़ उछालने से नहीं चूकते, तो समाज को उंगलियां उठाने से कैसे रोक सकते हैं,’’ रोते हुए रामेश्वरी ने खुद ही फोन काट दिया था.

‘‘मां, तुम किसकिस का मुंह बंद करोगी… यह लखीमपुर खीरी जिले का एक छोटा सा गांव है. घरघर में मेरे मायके आ जाने की बात फैल गई है. बाबूजी तो 2 दिनों से खेत पर भी नहीं गए हैं.

‘‘अच्छा यही होगा कि मैं ससुराल चली जाऊं. जो मेरी किस्मत में लिखा है, उसे सह लूंगी,’’ मुनमुन से मां की पीड़ा देखी नहीं जा रही थी.

‘‘तू क्या समझती है, मैं नहीं जानती कि तेरे साथ वहां और क्याक्या होता होगा. मां हूं तेरी. पति की मार से तू ससुराल छोड़ कर आने वाली नहीं है. सच बता, बात क्या है?’’ रामेश्वरी की अनुभवी आंखें मानो भांप गई थीं कि बात कुछ और ही है.

‘‘मां…’’ मुनमुन सुबकते हुए बोली, ‘‘शादी को डेढ़ बरस हो गया है और मैं उन्हें बच्चा न दे सकी. मुझे बांझ कह कर वे डाक्टर के पास ले गए, पर जांच में सब ठीक आया. मैं ने पति से बोला कि तुम अपनी जांच करा लो, तो वह भड़क गया.

‘‘एक दिन सास और पति दूसरे गांव में गए हुए थे किसी के ब्याह में. रात को ससुर ने मेरे साथ जबरदस्ती करनी चाही. वह बोला, ‘मेरा बेटा तुझे बच्चा नहीं दे सकता तो क्या, मैं तो हूं.’

‘‘पति को बताया, तो सास और पति दोनों ही मुझे कोसने लगे कि मैं बदचलन हूं और ससुर पर झूठा इलजाम लगा रही हूं.

‘‘ससुर हाथ जोड़े ऐसे बैठा था, जैसे उस का कुसूर न हो. उस के बाद तो ससुर की हिम्मत बढ़ गई और वह जबतब मेरा हाथ पकड़ने लगा. सास ने कई बार देखा भी, पर चुप रही.

‘‘बता मां, मैं कैसे रहती वहां? जहां हर समय यही डर लगा रहता था कि न जाने कब ससुर मेरे ऊपर झपट्टा मार लेगा.’’

रामेश्वरी कुछ कहती कि तभी बिसेसर वहां आ गए.

‘‘समझ नहीं आता कि क्या करें मेरी बच्ची. तुझे घर में रखते हैं, तो गांव वाले ताने देते रहेंगे और ससुराल भेजते हैं, तो तुझे घुटघुट कर जीना होगा. वैसे भी हमारे गांव की आबोहवा लड़कियों के लिए ठीक नहीं है,’’ बिसेसर की आवाज में छिपा बाप का दर्द मुनमुन को दर्द दे गया.

‘‘बाबूजी, आप बिलकुल भी परेशान मत हों. मैं लौट जाऊंगी. सच तो यह है कि औरत चाहे जिस कोने में चली जाए, उस के लिए सारे समाज की हवा ही ठीक नहीं है. कहां महफूज है वह?’’

‘‘क्या कहूं मेरी बच्ची. देखो, आज हमारे बेटे ही हमें दोष दे रहे हैं. हमारा कुसूर यह है कि दिनरात शराब पी कर पत्नी को पीटने वाले पति के घर बेटी को झोंटा पकड़ कर क्यों नहीं ठेल देते,’’ बिसेसर सिर पकड़ कर वहीं बैठ गया.

‘‘तेरे दोनों भाइयों को पढ़ाने की खातिर तेरी पढ़ाई बीच में ही छुड़ानी पड़ी और देखो, वही तेरे लायक भाई तेरे दुश्मन बन बैठे हैं,’’ रामेश्वरी के आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे.

‘‘मां, तुम जरा भी चिंता मत करो. मैं तुम पर बोझ नहीं बनूंगी. मैं कुछ न कुछ काम जरूर ढूंढ़ लूंगी,’’ मुनमुन ने कहा.

मुनमुन ने ठान लिया था कि वह बेबसी और लाचारी का दामन नहीं थामेगी, वह जीएगी और अपने मांबाबू का सहारा भी बनेगी. सफर आसान न था, क्योंकि उस के पास कोई ऐसी डिगरी नहीं थी, जिस के बल पर नौकरी कर लेती और न ही उस के पास पैसा था, जो कोई कारोबार शुरू कर पाती.

मुनमुन गांव में काम ढूंढ़ने निकलती, तो मर्दों की गंदी नजरें और फिकरे उस का पीछा करते, ‘अरे, पति को छोड़ आई, तो किसी के साथ तो बिस्तर पर सोएगी. तो हम ही क्या बुरे हैं…’

कोई कहता, ‘‘इस में ही दोष होगा, तभी तो पति मारता था. हमारी औरतें भी तो मार खाती हैं, तो क्या वे घर छोड़ कर चली गईं. आदमी अपनी जोरू को न मारे, ऐसा कभी हुआ है…’’

मुनमुन खून का घूंट पी कर रह जाती. बिना किसी कुसूर के उसे सजा मिल रही थी. लड़की हो कर कोई काम मिलना और वह भी एक पति का घर छोड़ कर आई लड़की के लिए… कोई आसान बात न थी.

तभी मुनमुन को एक सामाजिक संस्था ‘श्रमिक भारती’ के बारे में पता चला, जो केंद्र सरकार की टेरी योजना के तहत गांवों में सोलर लाइट का कार्यक्रम चलाती थी. वह उस से जुड़ गई. तब भी समाज उस पर हंसा कि देखो, एक लड़की हो कर कैसा काम कर रही है. पर मुनमुन ने किसी की परवाह नहीं की.

मां ने जब मुनमुन के इस फैसले पर सवालिया नजरों से उसे देखा, तो वह बोली, ‘‘मां, किस ने कहा कि यह काम केवल मर्द ही कर सकते हैं. अब औरतें भी किसी काम में मर्दों से कम नहीं हैं. फिर मां, कभी न कभी तो किसी को इस सोच को तोड़ना होगा. औरत क्या सिर्फ पिटने के लिए ही होती है?’’

ससुराल वालों ने जब यह सुना, तो वे बहुत बिगड़े और फौरन उसे वापस ले जाने के लिए पति आ पहुंचा.

वह बोला, ‘‘बहुत पर निकल आए हैं तेरे मायके आ कर. चल वापस, वरना मुझ से बुरा कोई नहीं होगा,’’

वह उस पर हाथ उठाने ही वाला था कि रामेश्वरी ने उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘खबरदार, जो मेरी बेटी को मारने की कोशिश की, तो सीधे थाने पहुंचा दूंगी.’’

मांबेटी का यह भयानक रूप देख पति वहां से भाग गया.

धीरेधीरे मुनमुन ने सोलर लाइट से जुड़ा हर काम सीख लिया और उसे यह काम करने की धुन सवार हो गई.

बस, इसी धुन में उस ने सोलर लाइट का कार्यक्रम शुरू कर दिया. वह गांवगांव जा कर सोलर लाइट, सोलर चूल्हे, सोलर पंखे लगाने लगी. उस की लगन और मेहनत देख कर गांव वालों के ताने तो बंद हो ही गए, साथ ही उस की जैसी सताई हुई और भी लड़कियां उस के साथ जुड़ गईं.

गांव की औरतों में अपने हक के लिए लड़ने की जैसे एक क्रांति सी आ गई. गांव के लोग जो उसे बुरी नजरों से देखते थे, उन्होंने उसे ‘सोलर दीदी’ के नाम से बुलाना शुरू कर दिया. गांव में सोलर लाइट खराब हो, पंखा खराब हो या कुछ और, बस लोग ‘सोलर दीदी’ को फोन मिलाते और वह पूरे जोश से अपने बैग में औजार रख अपनी स्कूटी पर दौड़ी चली जाती.

‘‘मैं बहुत खुश हूं मुनमुन कि तू अपने पैरों पर खड़ी हो गई है, लेकिन बेटी, अकेले जिंदगी काटना आसान नहीं है. तू कहे तो मैं कहीं और तेरे लिए रिश्ते की बात चलाऊं. तेरा तलाक हुए भी 3 साल हो गए हैं,’’ मां की आंखों में अपने लिए गर्व देख मुनमुन की आंखें भर आईं.

‘‘मां, तुम ने और बाबूजी ने मेरा साथ दे कर ही मुझे इस मुकाम पर पहुंचाया है. अगर तुम दोनों ही मुझे घर से निकाल देते, तो मैं कुछ भी नहीं कर पाती. बस, किसी दिन कहीं कुएं या तालाब में मरी मिलती.

‘‘और मां, एक बार शादी कर के देख तो लिया. अभी भी हमारे समाज में औरत या तो बिस्तर पर ले जाने के लिए होती है या फिर बच्चा पैदा करने के लिए. मुझे ऐसी जिंदगी नहीं चाहिए.

‘‘अब तो मैं बस तुम दोनों की सेवा करूंगी और अपनी शर्तों पर जिंदगी जीऊंगी. अभी तो मुझे काफी काम करना है. अपनी जैसी कितनी मुनमुन को राह दिखानी है,’’ मुनमुन के चेहरे पर आत्मविश्वास की जलती लौ को देख रामेश्वरी ने उसे सीने से लगा लिया.

बिसेसर पीछे खड़े उसे मन ही मन कामयाब होने का आशीर्वाद दे रहे थे.

Special Story : दादी की अनमोल नसीहत

Special Story : बचपन में मेरी दादी मुझे कहानियां सुनाया करती थीं. वे कहती थीं, ‘वक्त पड़ने पर अगर गधे को भी बाप कहना पड़े तो कोई बात नहीं.’ जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ, तो दादी की नसीहत मुझे बकवास लगने लगी. लेकिन बाद में जबजब सरकारी बाबुओं, पुलिस वालों, छुटभैए नेताओं से अपना काम निकलवाने के लिए मुझे उन्हें ‘बाप’ कहना पड़ा, तो दादी की नसीहतों का मतलब समझ आने लगा.

दादी कहती थीं, ‘वफादारी कुत्ते से सीखो, चालाकी लोमड़ी से. याद करना तोते से, मेहनत करना चींटी से और लक्ष्य पर झपटना बाज से…’

यानी हर अच्छे काम के लिए दादी पशुपक्षियों की ही मिसाल दिया करती थीं. उन्होंने कभी आदमी की मिसाल नहीं दी. कभी यह नहीं कहा कि ईमानदारी खान साहब से सीखो, फर्ज की अहमियत तिवारीजी से, वक्त की पाबंदी वर्माजी से और सच बोलना यादवजी से.

दादी ने एक बार मुझे बताया था कि सभी प्राणियों में आदमी को सब से अच्छा कहा गया है. मैं ने जब उन से पूछा कि आदमी को किस ने और क्यों अच्छा कहा, तो वे इस बात का कोई जवाब नहीं दे सकीं.

दादी द्वारा दी गई इस जानकारी के लिए उन का पशुपक्षियों की मिसाल देना मुझे खटकने लगा था. मैं चक्कर में पड़ गया कि अगर आदमी सब प्राणियों में बेहतर है, तो उसे नसीहत करने के लिए पशुपक्षियों की मिसाल क्यों दी जा रही है?

मासूम बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाना, दूसरों का माल हड़पना, दूसरों को नुकसान पहुंचाने की ताक में रहना, जो है, उस में संतोष करने के बजाय और ज्यादा की लालसा करना जैसे (अव) गुण पशु वर्ग की खूबी हो सकते हैं, तथाकथित सर्वश्रेष्ठ प्राणी के बिलकुल नहीं. लेकिन कानूनों और संविधानों के बावजूद हमारी पशुता बरकरार है.

कुदरत ने इनसान यानी आदमी को एक बना कर भेजा है, लेकिन मामला अब सिर्फ आदमी का नहीं, आदमी बनाम आदमी का हो गया है. एक वह, जो गुंडों द्वारा बहन को तंग किए जाने की शिकायत करने थाने जाते हुए भी डरता है और एक वह, जो थाने आने वाले हर आदमी को मोटा बकरा समझता है.

एक वह, जिसे तपती धूप में चौराहे पर सिर्फ इसलिए खड़ा कर दिया गया है, क्योंकि चौक से मंत्री के काफिले को गुजरना है. और एक वह, जो इस रुतबे को हासिल करने के लिए एक वोट की खातिर कभी आप के दरवाजे पर भिखारी की तरह हाथ जोड़े खड़ा था.

एक वह, जो लेदे कर धरती का भगवान बना बैठा है और एक वह, जो खाली जेब में एंडोस्कोपी, ईसीजी, यूरिन, ब्लड और स्टूल टैस्ट की रिपोर्ट धरे घर लौटते हुए इस उधेड़बुन में खोया रहता है कि साधारण बुखार की यह कौन सी पैथी है?

Short Story : इस की टोपी उस के सिर

Short Story : अपनी सासूजी और पत्नीजी के साथ सुबह का नाश्ता कर रहे थे. सासूजी अर्थशास्त्री चाणक्य की चर्चा कर रही थीं कि हमारे एक मित्र मनोजजी मुंह लटकाए आते दिखलाई दिए. सासूजी ने उस का पिचका, उतरा चेहरा देखा तो आश्चर्य हुआ क्योंकि हमेशा हंसनेबोलने वाला मनोज का चेहरा ऐसा कैसे हो रहा था. पत्नीजी ने उस से नाश्ता करने को कहा तो उस ने थोड़ी नानुकुर करने के बाद सपाटे से फकाफक खाना शुरू कर दिया. लगा, मानो महीनेभर से वह भूखा हो. खा लेने के बाद उस के चेहरे पर थोड़ी राहत दिखाई दी. उस ने मुंह पोंछते हुए कहा, ‘‘इन दिनों बहुत मंदी का दौर चल रहा है.’’

‘‘किस का?’’ पत्नीजी ने प्रश्न किया.

‘‘देश का भी और मेरा भी,’’ उस ने कहा.

सासूजी ने एक कटीली, जहरीली मुसकान बिखेरते हुए कहा, ‘‘जब तक मूर्ख जिंदा है, बुद्धिमान भूखे नहीं मर सकते.’’

‘‘क्या मतलब मम्मीजी?’’ मनोज ने आश्चर्य से प्रश्न किया.

‘‘मैं कह रही थी अगर आप के पास बुद्धि है तो केवल आप ही क्या, आप का पूरा परिवार भी भूखा नहीं मर सकता है,’’ सासूजी ने रहस्यमय ढंग से अपनी बात कही.

‘‘वह कैसे मम्मीजी?’’

‘‘अरे बेटा, इस देश में आप फटे कपड़े पहने हो और तिलक लगा लो तो भूखे नहीं मर सकते. यहां पत्थर को एक रुपए का सिंदूर पोत कर भगवान बनाया जा सकता है. ऐसे में दक्षिणा से पूरा परिवार बिना काम के पेट भर सकता है और तुम कह रहे हो कि मंदी का दौर चल रहा है?’’

‘‘आप ने कहा तो बिलकुल सच है लेकिन मैं इस मंदी से कैसे उबरूं?’’ मनोज का दीनहीन स्वर गूंजा.

पत्नीजी ने भी मोरचा संभाला, कहा, ‘‘देवरजी, मम्मी सच कह रही हैं. आप फुटपाथ पर तोता ले कर या हाथ से लिखा साइनबोर्ड लगा कर हस्तरेखा देखने का काम करने लगो तो मूर्खों की भीड़ लग जाएगी, क्योंकि सब से अधिक समाज में गरीब लोग ही मूर्ख बनते हैं.’’

‘‘तो क्या हाथ देखने लग जाऊं?’’

‘‘देवरजी, मैं बिलकुल नहीं कह रही हूं कि आप यह करें, लेकिन मंदी से उबरने का एक उपाय यह भी है. 10 बातें बताएंगे तो 3 तो सच निकलेंगी ही. यह जनता, जो सच निकला उस की अफवाह अधिक फैलाती है. और बस, आप फेमस हो जाएंगे,’’ पत्नीजी ने अपने ज्ञान का बखान किया तो मनोज बहुत खुश हो गया. हम ने रायता फैलाते हुए कहा, ‘‘दोस्त मनोज, कभी एक भी बात सच नहीं निकली तो बहुत जूते पड़ेंगे.’’

मनोज ने सुना, तो घबरा गया. पत्नीजी कहां हार मानने वाली थीं, उन्होंने तर्क दिया, ‘‘क्या आप जानते हैं कि हम एक रात में 3 से 5 हजार सपने देखते हैं, यानी एक माह में 9 लाख सपने. लेकिन कोई एक गलती से सच हो जाता है तो हम उसे ही आधार बना कर कहते हैं कि सपने सच होते हैं जबकि प्रतिशत निकाला जाए तो वह .0001 प्रतिशत सच भी नहीं होता और हम इस कम प्रतिशत का ही बखान करते रहते हैं. ठीक उसी तरह हम लोग, जो एक भविष्यवाणी सच होगी, उस का गुणगान करते रहेंगे.’’

‘‘अरे, हमें तो यह सपनों वाली बात मालूम ही नहीं थी. यदि ऐसा है तो हस्तरेखा देख कर भविष्य बताने वाली बात उत्तम और उचित है,’’ हम ने भी उस का पक्ष लिया.

सासूजी ने कहा, ‘‘मनोज पढ़ालिखा है, वह यदि फुटपाथ पर बैठ कर भविष्यवाणी करेगा तो यह क्या अच्छा लगेगा? हमें कुछ और उपाय सोचना चाहिए. यह कह कर सासूजी चिंतन की मुद्रा में आ गईं. पूरे कमरे में अजीब सी गंभीरता छा गई. थोड़ी देर बाद सासूजी ने कहा, ‘‘मनोज, तुम्हारे पास कितने रुपए हैं व्यापार करने को?’’

‘‘मम्मीजी, नाश्ते को मैं मुहताज हूं, रुपए कहां से लाऊंगा?’’

‘‘ठीक है, हम तुम्हें 1 हजार रुपए व्यापार के लिए कर्ज में देंगे,’’ सासूजी ने कहा तो मैं जोरों से हंस दिया. मैं ने कहा, ‘‘हजार रुपए में जहर नहीं आता, व्यापार कहां से शुरू होगा?’’

‘‘दामादजी, यह सब दिमाग का खेल है.’’

‘‘कैसे?’’ हम ने प्रश्न किया.

‘देखो मनोज, कुछ पैंफ्लेट छपवाने होंगे, एक बोर्ड लगाना होगा और एक कंपनी का नाम खोजना होगा.’’

‘‘जी,’’ मनोज ने आज्ञाकारी बच्चे की तरह हुंकार भरी.

‘‘तुम 1 रुपए के 10 रुपए एक महीने में दोगे, इस का विज्ञापन करना होगा,’’ सासूजी ने बताया.

‘‘मतलब, मम्मीजी?’’

‘‘तुम 4-5 युवा लड़कों को काम पर रख लो और रसीदें छपवा लो. एक कंपनी का बोर्ड अपने किराए के मकान पर लगा दो और एक टेबल व कुरसी लगा कर कार्यालय खोल लो- मनोज ऐंड कंपनी.’’

‘‘लेकिन किस की कंपनी?’’

‘‘यदि आप 1 रुपए एक माह के लिए देंगे तो हम अगले माह 10 रुपए देंगे और 10 रुपए जमा करेंगे तो 100 रुपए देंगे,’’ सासूजी ने बोलना जारी रखा हुआ था लेकिन मनोज ने बात काट कर कहा, ‘‘और 1 हजार रुपए जमा किया तो पूरे 10 हजार रुपए देंगे.’’

‘‘शटअप, मरना है क्या?’’ नाराजगी से सासूजी ने कहा.

‘‘क्या मतलब, मम्मीजी?’’

‘‘अरे पगले, जो भी हजार रुपए ले कर आए उसे समझाओ कि आप अभी इतना रुपया इन्वैस्ट मत करो, क्योंकि कंपनी नई है, कहीं भाग गई तो? आप 1 रुपया, 10 रुपया ही लगाओ. सामने वाला व्यक्ति आप की ऐसी ईमानदारी की बातें सुन कर खुश हो जाएगा. वह कम ही लगाएगा. बस, हो गया काम.’’ सासूजी ने ताली बजा कर कहा.

‘‘क्या मतलब?’’ हम तीनों की एक जैसी आवाज बाहर निकली.

‘‘अरे बेटी, सिंपल, 1 रुपए और

10 रुपए वाले को 1 महीने बाद जो हम 1 हजार रुपए दे रहे हैं उस में से पेमैंट कर देना. बस, विश्वास जम जाएगा, जो अभी हमारी बिटिया ने कहा कि नौ लाख सपनों में से एक सच होने पर लोग उस का ही विज्ञापन करते हैं, बस, यह 10-20 जमाकर्ता दूरदूर आप का प्रचार करेंगे और अगले माह हजारों ग्राहक आ जाएंगे.’’

‘‘फिर?’’

‘‘अपनी साख 3-4 माह में जमा लो और इस की टोपी, उस के सिर पर रखो और सब का भुगतान करते रहना.’’

‘‘लेकिन अंत में क्या होगा?’’

‘‘अंत में क्या होगा,’’ कुछ देर ठहर कर सासूजी ने कहा, ‘‘3 माह बाद तुम्हारे पास मूर्ख लोग 1 लाख से ले कर 10 लाख रुपए ले कर आएंगे. और 1 करोड़ रुपए होने पर तुम…’’ सासूजी ने बात अधूरी छोड़ दी.

‘‘वाह मम्मीजी, यह आइडिया तो बहुत ही बढि़या है,’’ मनोज ने खुश हो कर कहा.

कमरे में अजीब सी खुशी व्याप्त हो गई थी. परिणामस्वरूप मनोज पूरी तैयारी कर चुका था कंपनी खोलने की. सासूजी उठीं, एक हजार रुपए उसे दिए और गंभीर स्वर में कहा, ‘‘बेटा मनोज, इस तरह का लालच गरीबों को दिया जाता है. और वे बेचारे फंस जाते हैं. इस तरह का लालच मंदी के दौर में तुम जैसे ऐसे विज्ञापन देख कर पत्नी के गहने बेच कर रुपया लगा देते हैं और वह कंपनी भाग जाती है.

बेटा, तुम ऐसे पचड़े में मत पड़ना. मैं ने तो तुम्हें साजिश से अवगत कराया है. ये हजार रुपए मैं ने तुम्हें नौकरी खोजने के लिए दिए हैं. दामाद ही मेरा बेटा नहीं है, बल्कि तुम भी मेरे बेटे जैसे हो. कभी भी गलत रास्ते पर मत जाना.’’ यह कह कर सासूजी ने स्नेह से मनोज के सिर पर हाथ फेरा. सासूजी का चेहरा अचानक सास की जगह ममतामयी मां जैसा हो गया था.

Family Story : नैकसा नाई

Family Story

लेखक- ध्रूव कुमार ‘निर्भीक’

नैकसा दुखी मन से अपने गांव लौट रहा था. जुगल के बुरे बरताव ने उसे तोड़ दिया था. वह मन ही मन सोच रहा था कि वह उस के पास क्यों गया?  ऐसी क्या मजबूरी थी उस की? उस ने तो उस के घर की खैरखबर तक नहीं पूछी. मां कैसी हैं? बहन वीरो कैसी है? छोटा काकू कैसा है? कुछ भी तो नहीं पूछा जुगल ने.

उसे पता होता कि जुगल ऐसा बरताव करेगा, तो वह वहां कभी नहीं जाता. वीरो मर जाए तो मर जाए, जुगल का क्या?

नैकसा ने सोचा नहीं था कि जुगल इतना बदल जाएगा. जुगल को कितनी गरीबी में पढ़ाया, तन काटा, पेट काटा और उसे पढ़ायालिखाया, बड़ा किया. सोचा कि बड़ा बेटा है, कुछ बन गया तो घर की काया पलट जाएगी, लेकिन…

भला हो नैकसा की पत्नी नन्ही का, जो साहब से कहसुन कर जुगल को सरकारी मुलाजिम बनवा दिया. भला हो सरकार का कि उस ने रिजर्वेशन का इंतजाम कर दिया है, जिस का फायदा दिलाते हुए साहब ने भी देर नहीं की और पुलिस में सिपाही लगवा दिया.

नन्ही साहब के घर पर रोटी न बनाती, तो साहब से जानपहचान न होती. साहब नन्ही से खुश थे. उन्होंने जुगल को सरकारी नौकरी दिलवा दी थी. अब उसी जुगल को उसे मां कहने में शर्म आती है.

सरकार ने गरीब, दबेकुचले लोगों की जिंदगी के लिए ऊंचनीच, छुआछूत, भेदभाव, गरीबअमीर की खाई पाटने के लिए अनेक सुविधाएं मुहैया कराई हैं, लेकिन छुआछूत, भेदभाव, जातपांत और ऊंचनीच की खाई पटने के बजाय और भी गहरी होती जा रही है. पहले अमीर गरीब से छुआछूत, भेदभाव का बरताव करते थे, आज न जाने कितने जुगल अपने मांबाप, भाईबहन, चाचाताऊ के बीच भेदभाव शुरू कर चुके हैं.

रिजर्वेशन की सीढ़ी पर चढ़ कर सरकारी मुलाजिम बना बेटा अपने बाप को बाप, मां को मां, बहन को बहन, भाई को भाई कहने में शरमाता है. उन के पहनावे से, उन की चालढाल से, उठनेबैठने से, उन के आचारविचार से, भाषाबोली से नफरत करता है.

नैकसा ने सपने में भी नहीं सोचा था कि सरकारी मुलाजिम बनने के बाद बेटा जुगल उसे बाप मानने से इनकार करते हुए घर का नौकर बता देगा.

नैकसा ने तो सोचा था कि जब जुगल सरकारी मुलाजिम बन जाएगा तो घर की गरीबी दूर हो जाएगी और बुढ़ापे में चैन की जिंदगी गुजरेगी, लेकिन उस ने तो वीरो के बारे में भी नहीं पूछा.

वही वीरो जो हर साल भाईदूज और रक्षाबंधन पर भाई जुगल को राखी बांध कर, माथे पर तिलक कर के ही कुछ खातीपीती है. वह उसे ‘दादादादा’ कहती फिरती है. उस के आने का इंतजार करती है. लेकिन जुगल ने उस बेचारी को  झूठे मुंह पूछा तक नहीं कि कैसी है? आज वह गंभीर बीमार है. उसे इलाज की सख्त जरूरत है. वह भी ठीक होना चाहती है, लेकिन क्या वह ठीक हो कर अपनी खुशहाल जिंदगी जी पाएगी?

नैकसा दुखी और भारी मन से घर लौट आया, तो नन्ही ने पूछा, ‘‘कैसा है अपना जुगल… बहुत खुश हुआ होगा वह… बहुत सेवा की होगी उस ने…’’

नैकसा बोला, ‘‘अरी, बहुत बड़ा आदमी बन गया है वह… अब वह जुगल नाई नहीं, ठाकुर जुगल प्रताप सिंह है. अब उसे जुगल नाई मत कहना… अब तो उसे मुझे अपना बाप कहने में भी शर्म आती है.’’

‘‘क्या…?’’ चौंक कर नन्ही बोली.

‘‘मेरी बहुत बेइज्जती की है उस ने…’’ नैकसा ने कहा, ‘‘कहता था, यह हमारा नौकर है. खेत में गेहूं बो दिया है. खादपानी के लिए पैसे लेने आया है…’’

‘‘क्या…? ऐसा बोला वह? इतना बदल गया है जुगल…’’ नन्ही ने चौंक कर कहा, फिर बोली,’’ क्या इसलिए पैदा किया था उस नाशपीटे को?’’

3 भाइयों में सब से छोटा था नैकसा. 3 बच्चे थे और पत्नी नन्ही. जुगल सब से बड़ा बेटा था, वीरो म झली और काकू छोटा. जमीनजायदाद तो थी नहीं, लोगों की हजामत बना कर ही घर का खर्च चलता था.

नैकसा गांव में लोगों के बाल काटता और जब फसल आती तो खेतखेत जा कर गेहूं वगैरह अनाज के पूले इकट्ठा करता, फिर तिमाहीछमाही धड़ी लेता. धड़ी में पक्की तोल का 5 सेर अनाज आता. गांव में एक हजार परिवार थे. हर परिवार से 5 सेर तो एक हजार परिवारों से 5 क्ंिवटल अनाज जमा हो जाता. खाने के लिए तो अनाज मिल जाता, लेकिन दूसरे घरेलू खर्च के लिए पैसा नहीं था. अनाज बेच कर ही वह दूसरे खर्च चलाता था.

नैकसा की पत्नी नन्ही शहर में रहती थी और दूसरों का खाना बना कर घर चलाने में उस का सहयोग करती थी.

नन्ही शहर में एक पुलिस अफसर रमाशंकर तिवारी की कोठी में भी खाना बनाने जाती थी. वह खाना अच्छा बनाती थी, जिस से रमाशंकर खुश थे. एक दिन उस ने रमाशंकर से जुगल की नौकरी लगवाने की गुजारिश की. उन्होंने हां कह दी और मौका मिलते ही उन्होंने जुगल की सिपाही के पद पर भरती करा दी.

पुलिस में नौकरी लगते ही जुगल की शादी भी हो गई. शादी के बाद जुगल शहर में रहने लगा. उस ने अपना नाम जुगल नाई से बदल कर ठाकुर जुगल प्रताप सिंह प्रचारित कर दिया था. अब सब उसे ठाकुर साहब के नाम से बुलाते थे.

जब जुगल गांव आता तो खुद को दारोगा बताता था. नैकसा नाई भी उसे दारोगाजी कह कर और छाती फुला कर बात करता था. अब वह साधारण आदमी नहीं था. उस का बेटा दारोगा जो बन गया था. वह मन ही मन सोचता कि उस का बेटा थाने में दारोगा है. अब वह किसी के दबाव में नहीं आएगा. किसी के सामने अब वह पैसे के लिए नहीं गिड़गिड़ाएगा.

बेटे से सौ मांगेगा, तो वह हजार देगा. फिर क्यों मांगेगा किसी से? मांगने पर उस के बेटे की बेइज्जती होगी. नहीं… नहीं, वह ऐसा कोई काम नहीं करेगा, जिस से उस के बेटे की बेइज्जती हो.

एक दिन बेटी वीरो बीमार हो गई. पहले तो गांव में इलाज कराया, लेकिन जब वह ठीक नहीं हुई तो गांव वालों ने शहर ले जाने की सलाह दी. शहर ले जाने के लिए पैसों का बंदोबस्त नहीं था.

नैकसा गांव में किसी से उधार नहीं लेना चाहता था. उधार मांगेगा तो लोग क्या कहेंगे? बेटा दारोगा है और बाप कर्ज मांगता फिर रहा है, बेटी के इलाज के लिए. बेटे के पास पैसों की कमी नहीं है. हजारपांच सौ तो मिनटों में वह कमा लेता होगा. वह उस के पास जाएगा और 5-10 हजार रुपए ले आएगा.

अगले दिन ही नैकसा उस थाने में पहुंचा, जिस में जुगल तैनात था. एक पुलिस वाले ने उस से पूछा, ‘‘किस से मिलना है?’’

नैकसा ने कहा ‘‘दारोगाजी से…’’

‘‘कौन से दारोगाजी से?’’ पुलिस वाले ने सवाल किया.

नैकसा ने सरल स्वभाव में जवाब दिया, ‘‘जुगल दारोगाजी से…’’

पुलिस वालों ने एकदूसरे को देखा, फिर दूसरा पुलिस वाला बोला, ‘‘यहां तो कोई जुगल दारोगा नहीं है. हां… सिपाही जरूर है.’’

नैकसा बोला, ‘‘हांहां, वही…’’

पहले पुलिस वाले ने हंसी के लहजे में जुगल को बुलाया, ‘‘अरे दारोगाजी, आप को ये बाबा याद कर रहे हैं.’’

जुगल आया और नैकसा को देखते ही आगबबूला हो गया. उस ने नैकसा को अकेले में खूब डांटा, ‘‘यहां क्यों आ गए? करा दी न बेइज्जती. जाओ यहां से. चले आए. तमीज नहीं है जरा भी,’’ कहता हुआ जुगल नैकसा को थाने से बाहर ले जाने लगा, तो एक पुलिस वाले ने पूछा, ‘‘कौन हैं ये? क्यों डांट रहे हो ठाकुर साहब?’’

जुगल ने कहा, ‘‘नौकर है घर का. पैसा लेने आया है. खेत में गेहूं बो दिया है. अब खादपानी को पैसा चाहिए. मैं मनीऔडर भेजने वाला था, पर यह चला आया मुंह उठाए…’’

नैकसा को यह सुन कर बहुत दुख हुआ. वह तुरंत बोला, ‘‘साहब, मैं नाई हूं. कौम का खानदानी हूं.  झूठ नहीं बोलूंगा. जो बात कहूंगा सोलह आने सच कहूंगा. मैं इस का तो नौकर नहीं हूं, इस की मां का नौकर जरूर हूं. मेरी बात का यकीन न हो, तो गांव में चल कर जांच कर लो.’’

नैकसा की बात सुन कर पुलिस वाले हैरान रह गए और जुगल को नफरत से देखने लगे.

थके कदमों और हताश मन से नैकसा गांव की तरफ चल दिया.

देखतेदेखते नैकसा और जुगल की बातें पूरे थाने में फैल गईं. थाने में तैनात हर पुलिस वाले को जुगल की असलियत पता चल गई. अब उस के साथी पुलिस वालों का बरताव पहले जैसा नहीं रहा था. ठाकुर साहब का संबोधन जुगल में बदल गया था. जो पहले उस की इज्जत करते थे, पर अब आगेपीछे उस का मजाक उड़ाते थे.

एक दिन जुगल सोच में डूबा हुआ था. वह साथी पुलिस वालों के बदले बरताव के लिए खुद को कुसूरवार मान रहा था. काश, उस दिन पिताजी के साथ अच्छा बरताव करता, तो आज उस की यह हालत नहीं होती.

अगले दिन जुगल ने दारोगाजी को 15 दिन की छुट्टी की अर्जी दी, तो उन्होंने मंजूर कर ली. जुगल ने सोचा कि वह गांव जाएगा, पिताजी से माफी मांगेगा. छुट्टियों के दौरान अपना तबादला किसी दूसरे थाने में करा लेगा, फिर भविष्य में कभी ऐसी गलती नहीं करेगा.

गांव में वीरो की बीमारी बढ़ती गई. पैसे की कमी के चलते नैकसा वीरो का इलाज नहीं करा सका. उस ने इलाज के लिए किसी से उधार इसलिए नहीं मांगा कि लोग क्या कहेंगे, बेटा थानेदार है और बाप बेटी के इलाज के लिए उधार मांग रहा है.

इलाज की कमी में एक दिन वीरो ने तड़पतड़प कर दम तोड़ दिया.

वीरो की मौत की खबर रुई की तरह गांवभर में फैल गई. लोगों को पैसे की कमी के चलते वीरो की मौत का पता चला तो सभी हमदर्दी जताने लगे.

नैकसा के पास वीरो के अंतिम संस्कार के लिए पैसे का इंतजाम नहीं था. जब गांव के लोगों को पता चला तो घंटेभर में अंतिम संस्कार की तैयारी हो गई. वीरो का शव अर्थी पर कसा जाने लगा. उसी समय सेवाराम बोला, ‘‘दारोगाजी भी आ गए.’’

‘‘कौन दारोगा?’’ नैकसा ने पूछा.

‘‘अरे वही अपने जुगल…’’ सेवाराम ने बताया.

अर्थी पर वीरो के शव को कस रहे नैकसा ने शव कसना रोक दिया. जुगल वीरो के शव को देख कर हैरान रह गया. मां का रोरो कर बुरा हाल था.

अगले पल लोगों ने वीरो की अर्थी उठाने की तैयारी की तो एक ओर जुगल दूसरी ओर नैकसा ने कंधा दिया.

वीरो का अंतिम संस्कार कर के लोग लौट आए. इस बीच जुगल को वीरो की बीमारी, घर की माली हालत और नैकसा की मजबूरी का पता चला तो वह धम्म से जमीन पर गिर कर बेहोश हो गया.

जुगल के बेहोश होते ही लोगों में खलबली मच गई. बाद में किसी तरह जुगल होश में आया, तो लोगों को राहत महसूस हुई.

नैकसा को पता चला, तो लोगों की भीड़ को चीरते हुए आगे आ कर बोला, ‘‘बेटा, मु झे पता है. जिस दिन से मैं तेरे पास आया हूं, उसी दिन से तू परेशान है, लेकिन एक दिन सचाई सामने आ ही जाती है. बनावटी बातों से खून के रिश्ते नहीं मिटाए जा सकते.

‘‘जो हुआ सो हुआ बेटा. अफसोस मत कर बेटा. तू मु झे पिता माने न माने, लेकिन तू मेरा बेटा है और हमेशा रहेगा. मेरा तुझ पर कोई हक नहीं, लेकिन तेरा मुझ पर हक कोई नहीं छीन सकता. तू मेरा बेटा था और रहेगा.’’

नैकसा की बात सुन कर जुगल रोते हुए माफी मांगने लगा. नैकसा आगे बढ़ा और जुगल को सीने से लगा कर बोला, ‘‘पगले, जो हुआ सो हुआ. गलतियां बच्चों से ही होती हैं और बच्चे गलतियां नहीं करेंगे तो क्या बूढ़े करेंगे.’’

लोगों की भीड़ जा चुकी थी. जुगल को ले कर नैकसा भी अपने घर में चला गया.

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