इस एक्ट्रैस ने ड्रेस पहन तो ली पर संभाल नहीं पाई

हाल ही में मुंबई में फिल्म फेयर ग्लैमर एण्ड स्टाइल अवार्ड्स (Filmfare Glamour and Style Awards) का आयोजन किया गया था. जिसमें बौलीवुड के सभी बड़े सितारे मौजूद थे.

इस अवार्ड नाइट में मुन्ना माइकल में नजर आने वाली एक्ट्रैस निधि अग्रवाल भी पहुंची. यह उनका पहला स्टाइल अवार्ड था.

यहां वह आरूषि कोचर के गाउन के साथ अपने हाटनेस का जलवा बिखेरती हुई रेड कार्पेट पर पहुंची.

इस गाउन में वह बेहद ही खूबसूरत दिखाई दे रही थीं. पर कुछ देर बाद ही उन्हें उनके गाउन के साथ परेशान होते हुए देखा गया. कई बार वो इस अवार्ड शो में अपनी इस ड्रेस के साथ अनकंफर्टेबल होती दिखीं.

इस अवार्ड नाइट में वह पर तरफ अपनी ड्रेस को सम्हालते, ठीक करते और उस ड्रेस से परेशान होते हुए ही दिखाई पड़ रही थी. कैमरे के सामने पोज देते समय जब निधि की ड्रैस इधर-उधर होने लगी तो उनके साथ मौजूद लोग उसे ठीक करते दिखे. निधि जब मीडिया से बात कर रही थीं उस वक्त भी वो असहज और घबराई हुईं दिखाई पड़ रही थीं.

इस अवार्ड शो में निधि की कई तस्वीरे सोशल मीडिया पर देखने को भी मिली. उनकी इन तस्वीरों को देखकर ऐसा लग रहा है कि उन्होंने इस खूबसूरत गाउन को पहन तो लिया पर उसे संभाल नहीं पाईं.

बता दें कि निधि अग्रवाल ने मुन्ना माइकल से बौलीवुड में डेब्यू किया है. इस फिल्म में निधि के अपोजिट जैकी श्राफ के बेटे टाइगर श्राफ को कास्ट किया गया था. निधि की ये फिल्म बौक्स आफिस पर कुछ खास नहीं कर पाई.

जाति जैसे भेदभाव से जूझ रहे एड्स मरीज

देश में बढ़ रहे एचआईवी और एड्स मरीजों की तादाद को देखते हुए इस बीमारी से बचाव के लिए सरकार द्वारा बड़े लैवल पर न केवल प्रचारप्रसार किया जा रहा है, बल्कि सरकारी व गैरसरकारी लैवल पर ऐसे काम भी किए जा रहे हैं, ताकि एचआईवी और एड्स को फैलने से रोका जा सके.

बहुत से लोगों का मानना है कि एचआईवी और एड्स बीमारी साथ बैठने, साथ खाना खाने, हाथ मिलाने जैसी वजहों से भी फैलती है, जिस के चलते लोग एचआईवी व एड्स मरीजों से दूरी बनाने की कोशिश करते हैं.

असल में यह दूरी बनाने की आदत वैसे ही हमारे समाज में पहले से है. हमारे यहां ब्राह्मण गैरब्राह्मणों के नहीं आतेजाते. पिछड़ों में सैकड़ों जातियां अपने को दूसरों से ऊंचा समझती हैं. हजारों जातियों को तो जन्म से ही अछूत माना जाता है. एचआईवी पीडि़तों से हर जाति में एक और नई उपजाति पैदा हो गई है.

वैसे, आज तक एड्स फैलने की सिर्फ 4 वजहें ही सामने आ पाई हैं, जिस में पहली असुरक्षित सैक्स संबंध बनाना, दूसरी एचआईवी पीडि़त मां से उस के होने वाले बच्चे में यह बीमारी होना, तीसरी एचआईवी व एड्स मरीज के खून को किसी सेहतमंद शख्स को चढ़ाना और चौथी एचआईवी संक्रमित सूई से नशा करना व औजारों का शरीर के अंगों व घावों में प्रवेश करना. इन के अलावा कोई भी वजह एड्स फैलने का खतरा नहीं बनती है.

लखनऊ, उत्तर प्रदेश की रहने वाली टीना (बदला नाम) को जन्म के समय ही अपनी मां से एचआईवी की बीमारी मिली थी. जब इस बात की जानकारी टीना के पिता को हुई, तो उन्होंने टीना की मां के ऊपर गलत संबंधों का लांछन लगा कर घर से निकाल दिया.

टीना की मां लाख दुहाई देती रही, रोईगिड़गिड़ाई कि उस का किसी से गलत संबंध नहीं रहा है और वह ऐसी हालत में अपनी नवजात बेटी को ले कर कहां जाएगी, लेकिन उस के पति का दिल नहीं पसीजा.

बाद में पता चला कि टीना की मां को यह बीमारी उसके पिता से मिली थी, क्योंकि उस का कई औरतों से नाजायज संबंध था. उस से यह बीमारी टीना की मां को और फिर टीना को भी हो गई.

पति का साथ छूटने के बाद टीना की मां का अपना और बेटी का पेट पालना मुश्किल हो गया था. तभी उस की मुलाकात एचआईवी व एड्स पीडि़तों के एक नैटवर्क से हुई. टीना की मां ने उस नैटवर्क से जुड़ने के बाद लखनऊ के एक बड़े सरकारी अस्पताल में काउंसलर की नौकरी कर ली, लेकिन किराए के जिस मकान में वह रह रही थी, उस के मालिक को जब यह पता चला कि मांबेटी दोनों एचआईवी से पीडि़त हैं, तो उस ने उन्हें घर खाली करने को कह दिया.

इसी बीच टीना की मां की एचआईवी की बीमारी एड्स में बदल गई और उसे कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी ने भी जकड़ लिया. ज्यादा तबीयत बिगड़ने के बाद टीना ने अपनी मां को उसी अस्पताल में भरती कराया, जहां वह काउंसलर थी. लेकिन उस को तब यह एहसास हुआ कि वहां इलाज करने वाले डाक्टर भी एचआईवी व एड्स मरीजों के साथ भेदभाव करते हैं.

टीना ने देखा कि जिस वार्ड में उस की मां भरती थी, उस में उस की मां के साथ जितने भी एचआईवी व एड्स से पीडि़त मरीज थे, उन के बिस्तर पर एक खास टैग लगा हुआ था, जिस में इस लाइलाज बीमारी होने का संकेत था. ऐसे मरीजों से डाक्टर खास दूरी बना कर बात करते थे. साथ ही, इन मरीजों से डाक्टरों का बरताव भी अजीब तरह का होता था.

टीना का कहना है कि एचआईवी व एड्स के चलते उस की मां की जान चली गई, लेकिन उस की मां तो मरने से पहले भी तिलतिल कर इसलिए मरती रही, क्योंकि उस को एचआईवी व एड्स पीड़ा से ज्यादा लोगों की अनदेखी की पीड़ा भी झेलनी पड़ी थी.

मां की मौत के बाद टीना को तमाम तरह की परेशानियों से जूझना पड़ा. फिलहाल वह उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा चलाए जा रहे लखनऊ के एक बड़े अस्पताल में एचआईवी व एड्स मरीजों की काउंसलर है.

टीना कहती है कि उसे एचआईवी है, लेकिन वह एक सेहतमंद जिंदगी जी रही है. फिर भी वह अपनी इस बीमारी के बारे में किसी को इसलिए नहीं बता सकती, क्योंकि उस की इस बीमारी को जानने के बाद लोगों का उस के प्रति नजरिया बदल जाएगा.

नजरिए में लाएं बदलाव

एचआईवी व एड्स पीडि़तों के लिए सरकार द्वारा यह पौलिसी तय की गई है कि इस बीमारी से पीड़ित किसी मरीज का जहां पर जांच इलाज या काउंसलिंग चल रही है, वहां का संबंधित डाक्टर या जिम्मेदार शख्स उस मरीज से जुड़े सभी रिकौर्डों व नाम को राज रखेगा और किसी भी हालत में उस का नाम सार्वजनिक नहीं करेगा.

इस मसले पर ‘स्वास्थ्य का वोट अभियान’ के कैंपेन डायरैक्टर राहुल द्विवेदी का कहना है कि एचआईवी व एड्स पीडि़तों के प्रति लोगों का रवैया बहुत अच्छा नहीं रहता है, जबकि एचआईवी पीडि़त लोग भी सामान्य लोगों की तरह जिंदगी जीने की कूवत रखते हैं.

एचआईवी व एड्स का इंफैक्शन जानकारी की कमी से होता है, ऐसे में बड़े लैवल पर जागरूकता लाने से इस बीमारी को फैलने से रोका जा सकता है. सरकार द्वारा एचआईवी व एड्स पीडि़तों के प्रति भेदभाव पर रोक लगाने के लिए नैशनल एड्स कंट्रोल और्गनाइजेशन के जरीए पौलिसी तय की गई है, जिस का पालन न करने पर संबंधित शख्स पर कार्यवाही की जा सकती है.

भारी पड़ता भेदभाव

भेदभाव का एक मामला राजस्थान के बाड़मेर शहर में देखने को मिला, जब एक एड्स पीडि़त ने सरकारी बस में सफर करते समय कंडक्टर से किराए में छूट लेने के लिए अपनी बीमारी का प्रमाणपत्र दिखाया, लेकिन कंडक्टर ने उस की बीमारी के बारे में जानने के बाद उस शख्स को डांटडपट कर उस की बीमारी सार्वजनिक करते हुए बस से उतार दिया.

प्यार दें दुत्कार नहीं

आम लोगों की तरह एचआईवी व एड्स पीडि़त भी सामान्य जिंदगी बिता सकते हैं. आम लोगों की तरह उठबैठ सकते हैं, त्योहार और खुशियां मना सकते हैं व नौकरी और कारोबार भी कर सकते हैं. ऐसे में इन के साथ किसी तरह का भेदभाव करना इन को तोड़ सकता है.

‘गौतम बुद्ध जागृति समिति’ के सचिव श्रीधर पांडेय का कहना है कि उन की संस्था नोएडा व गाजियाबाद में एड्स पीडि़तों के साथ काम कर रही है. उन्होंने बताया कि पूरी दुनिया में 3 करोड़ से भी ज्यादा लोगों ने एंटीरैट्रो वायरल ट्रीटमैंट ले कर खुद की बीमारी को एक हद तक कंट्रोल में किया है, जिस की वजह से उन्हें एचआईवी से किसी तरह की परेशानी नहीं हो रही है.

नई दिल्ली के रहने वाले हरि सिंह को पता चला कि वे एचआईवी पीडि़त हैं, तो उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने खुद के जीने का रास्ता तो तलाशा ही, साथ ही भारत समेत दुनियाभर के एचआईवी व एड्स पीडि़तों को ले कर फैली भ्रांतियों व इस बीमारी को रोकने की मुहिम को रफ्तार दी. वे दिल्ली सरकार में एचआईवी व एड्स मरीजों के लिए काउंसलिंग का काम कर रहे हैं.

एचआईवी व एड्स में फर्क

एड्स संक्रमित लोगों के साथ भेदभाव में रोकथाम के लिए एचआईवी और एड्स के अंतर को जानना बहुत जरूरी है.

एचआईवी एक वायरस है, जिस का पूरा नाम ह्यूमन इम्यूनोडैफिसिएंसी वायरस है. तकरीबन 12 हफ्ते के बाद ही खून की जांच से पता चलता है कि यह वायरस शरीर में दाखिल हो चुका है.

ऐसे शख्स को एचआईवी पौजिटिव कहते हैं. एचआईवी पौजिटिव कई सालों यानी 6 से 10 साल तक सामान्य दिखता है और आम लोगों की तरह जिंदगी बिता सकता है.

यह वायरस खासतौर पर शरीर को बाहरी बीमारियों से हिफाजत करने वाली खून में मौजूद टी कोशिकाओं व मस्तिष्क की कोशिकाओं को प्रभावित करता है और धीरेधीरे उन्हें नष्ट करता रहता है.

कुछ सालों बाद यानी 6 से 10 साल में यह हालत हो जाती है कि शरीर आम बीमारी के कीटाणुओं से अपना बचाव नहीं कर पाता और तरहतरह के इंफैक्शन से घिरने लगता है. इस को एड्स कहते हैं. लेकिन एचआईवी पीडि़त शख्स को एड्स की अवस्था में जाने से रोका जा सकता है, अगर वह संयमित दिनचर्या, खानपान व अपनी सेहत के प्रति जागरूक रहे.

एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर हम सब की यह जिम्मेदारी बनती है कि किसी एचआईवी संक्रमित मरीज के बारे में जानने के बाद उस से भेदभाव न करें, बल्कि उस के साथ प्यार से पेश आएं. किसी को भी यह हक नहीं है कि वह एचआईवी संक्रमित मरीज को नौकरी से निकाले या उस के साथ गलत बरताव करे, बल्कि उन्हें भी औरों की तरह समाज में इज्जत से रहने और जीने का हक दिया जाए. पर जो समाज जाति के नाम पर अच्छे सेहतमंद लोगों को न छूने के लिए तैयार बैठा है, उसे कोई कैसे समझा सकता है.

राजनीति में उम्मीद जगाते राहुल गांधी

राहुल गांधी कोई युवा तो नहीं रह गए हैं पर जब राजनीति में जगह ही 65-70 साल वालों को मिलती है तो राहुल का 47 वर्ष की आयु में पुरानी पार्टी की बागडोर संभाल लेना, थोड़ा सुकून देने वाला है. भाजपा व दूसरे लोग इसे विरासत की राजनीति कहते हैं. पर यह आरोप आधा ही सही है. अखिलेश यादव, उद्धव ठाकरे, विजय गोयल, स्टालिन जैसे बीसियों ऐसे युवा नेता हैं जिन्हें राजनीति विरासत में मिली है पर उन में से हरेक को अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा है.

1965 में इंदिरा गांधी को लालबहादुर शास्त्री की अचानक मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री पद मिल गया पर असली शक्ति भारी संघर्ष के बाद ही मिली. सोनिया गांधी को 1998 में सीताराम केसरी से लड़ कर कांग्रेस का अध्यक्ष पद मिला. राहुल गांधी को अध्यक्ष पद न मिले और कांग्रेस किसी नेता के अभाव में छिन्नभिन्न हो जाए, इस की भरपूर कोशिश भारतीय जनता पार्टी ने राहुल गांधी को पप्पू कह कर मजाक उड़ा कर की.

राहुल गांधी ने हिचकिचाहट के बाद खुद को अध्यक्ष पद के लिए तैयार किया. गुजरात चुनावों में (परिणाम चाहे जो भी हों) उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी और बीमार होती मां सोनिया गांधी के बिना अकेले नरेंद्र मोदी के पक्के गढ़ पर हमला ही नहीं किया, उस की चूलें हिला भी दीं. उन्होंने चुनावों से पहले नरेंद्र मोदी और अमित शाह को सकते में डाल दिया. नरेंद्र मोदी को राहुल गांधी के कारण उस जीएसटी कानून में बदलाव लाने पड़े, जिसे वे वेद वाक्य मान कर चल रहे थे. एक युवा ने पंडितों के बलबूते चल रही सफेद बालों वाले वृद्धों की पार्टी को हिला कर रख दिया.

राहुल गांधी की ही हिम्मत थी कि उन्होंने हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी, अल्पेश ठाकोर, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव आदि से हाथ मिला कर युवाओं  का एक नया गठजोड़ तैयार कर लिया है. वे धर्म की पुरानी कड़ाही पर रीतिरिवाजों के काढ़े को पकाने की लगभग सफल कोशिश कर चुके हैं और आधे से ज्यादा देश को मिला भी चुके हैं. राहुल गांधी ने कुछ मानो में एक समानांतर पार्टी ही नहीं, गठजोड़ खड़ा कर दिया और कांग्रेस को नया युवा रंग दे दिया.

भारत दूसरे देशों की अपेक्षा एक युवा देश है और इस का नेतृत्व उन हाथों में होना चाहिए जो नया सोचते हैं. फैसले तर्क और विमर्श पर हों, इतिहास की गर्त में जा चुके अपठनीय ग्रंथों के आधार पर नहीं. पुराने का महत्त्व है, उन की छाया हमारे ऊपर रहती है पर वह हमारा अकेला मार्गदर्शक न हो.

आज का युग विज्ञान की नई खोजों को घरघर पहुंचाने का है, विज्ञान के सहारे सरकार को घरघर पर निगरानी करने का नहीं. राहुल गांधी ने अब तक जो कहा है उस से नहीं लगता कि वे नियंत्रण और एकतरफा कथन में विश्वास रखते हैं. अपनी मीटिंगों में वे खुल कर आम आदमियों से बात करते हैं जबकि नरेंद्र मोदी और अमित शाह (बाकी तो हुक्म बजाने वाले हैं) भाषण देते हैं. नरेंद्र मोदी प्रवचनकर्ताओं की तरह आस्था पर जोर देते हैं, जो मैं ने कहा वही सच है. राहुल गांधी कहते हैं कि विद्वान तो सब जगह हैं, उन की सुनने में कोई हर्ज नहीं.

विरासत के नियमों से कांग्रेस से ज्यादा तो भारतीय जनता पार्टी बंधी है. कांग्रेस पर जवाहरलाल नेहरू से शुरू हुई सत्ता की कड़ी का आरोप लग सकता है पर भारतीय जनता पार्टी तो काल्पनिक हजारों सालों से पूजे जा रहे राम, कृष्ण, विष्णु आदि की विरासत के बोझ से दबी है. डायनेस्टी का हल्ला मचाने वाले डायनासौरों के समय की सोच के बोझ से दबे पड़े हैं.

कहानी और किरदार को लेकर समझौते नहीं किए : रिचा चड्ढा

रिचा चड्ढा ने बौलीवुड में अपना एक अलग मुकाम बना लिया है. वह निरंतर कंटेंट आधारित फिल्में करते हुए आगे बढ़ रही हैं. मगर ‘सरबजीत’’के बाद उनके करियर की गति काफी धीमी हो गयी है.

इन दिनों वह ‘एक्सेल इंटरटेनमेंट’ की फिल्म ‘‘फुकरे रिटर्न’’ को लेकर काफी उत्साहित हैं, जो कि कुछ साल पहले प्रदर्शित सफल फिल्म ‘फुकरे’ का सिक्वअल है. ‘फुकरे’ में भी रिचा चड्ढा ने ही भोली पंजाबन का किरदार निभाया था.

अब आपका करियर किस दिशा में जाता नजर आ रहा है. ‘सरबजीत’ के बाद करियर की गति काफी धीमी हो गयी है?

  • ‘सरबजीत’ को करना तो मुझे मेरी गलती लगती है. लेकिन अब किसी पर भी इल्जाम लगाने से कोई फायदा नहीं. आप भी जानते हैं कि बौलीवुड में लोग कैसे होते हैं. लेकिन अब मेरा करियर सही हो जाएगा. करियर के धीमे होने की वजह एक यह भी रही कि मैने पटकथा व किरदार को लेकर समझौते करते हुए कोई भी फिल्म स्वीकार नही की, बल्कि मैंने अच्छे काम के लिए इंतजार करना उचित समझा.

उस बीच मैंने इंडोर्समेंट या दूसरे काम जरुर किए. जब एक ही तरह के किरदार आने लगे या जब आपको आपके कैलीबर के किरदार न मिल रहे हों, तो कुछ समय इंतजार कर लेना चाहिए.जल्दबाजी में या महज पैसे के लिए गलत काम यानी कि गलत फिल्म कर लेने से ईमेज खराब हो जाती है. वैसे भी पहले की गलती जब बाद में आपको काटने आती है तब आपकी समझ में नही आता कैसे बचा जाए?

आपके करियर के धीमे होने की वजहें ‘कैबरे’, ‘जिया और जिया’ ‘और देवदास’ जैसी फिल्मों का बीच में रूक जाना भी रहा?

  • सुधीर मिश्रा की फिल्म ‘‘और देवदास’’ अब फरवरी 2018 में सिनेमाघरों में पहुंचने वाली है. यह फिल्म पहले ही पूरी हो गयी थी. पर निर्माताओं के बीच कोई समस्या थी, इसलिए रूकी हुई थी. पर अब प्रदर्शित होने वाली है. फिल्म के रूकने की वजह विस्तार से तो सुधीर मिश्रा सर ही बताएंगे.

मैने एक गलत फिल्म ‘जिया और जिया’ की थी. पर यह फिल्म तब की थी, जब मुझे केाई सही सलाह देने वाला नहीं था. मेरे माता पिता इस क्षेत्र से वाकिफ नही है, कि वह मुझे सावधान करते. अब एक फिल्म में आप मुझे व कलकी को डालेंगे और पूरी फिल्म विदेश में फिल्माएंगे, तो यह किसे पसंद आएगी. पर कई बार जब फिल्म प्रदर्शित होती है, तब पता चलता है कि कहां गलती हुई. फिल्म को सही ढंग से कागज से पर्दे पर नही उतारा गया. उसे ठीक से कार्यशील नहीं किया गया.

कलाकार की हैसियत से हमारे हाथ में बहुत कम होता है. हमारे मां बाप इस फिल्म उद्योग से नही हैं कि वह फोनकर हमसे कहें कि यह फिल्म मत करो, उलटे दूसरों के मां बाप हमें फोन करके धमकाते रहते हैं. यहां उल्लू बनाने वालों की कोई कमी नही है. मगर अब सब कुछ ठीक हो जाएगा. अब 8 दिसंबर को मेरी फिल्म ‘‘फुकरे रिटर्न’’ आने वाली है, जिसमें लोग एक बार फिर मुझे भोली पंजाबन के किरदार में देखेंगे और पसंद करेंगे.

फिल्म‘‘फुकरे रिटर्न’’की भोली पंजाबन में कुछ बदलाव आया  है?

  • इस बार भोली पंजाबन में काफी बदलाव है. इस बार उसके अंदर गुस्सा काफी है. पहली बार मुझे उसका दर्द समझ में आया. वह एक साल जेल में रह कर आयी है, जेल में उसे बहुत यातना दी गयी, तो उसके सारे लड़के तितर बितर हो चुके हैं, उसका साम्राज्य खत्म हो चुका है, उसके सारे धंधे बंद हो चुके हैं, जमीन बिक चुकी है, जेल से बाहर आने पर भोली पंजाबन अपने सारे लड़कों को ढूंढ़़ती है, उन्हे धमकाती है कि अब सिर्फ मेरा काम करोगे, नहीं से तुम लोगो की जान नहीं बचेगी. इस बार वह कुछ कमजोर भी है. साम्राज्य छिन चुका है, उसके सारे आदमी उसे छोड़ चुके हैं. सिर्फ दो तीन बहुत समर्पित लोग ही बचे हैं. इस वजह से वह काफी परेशान भी है. पर काफी रोचकता है.

2018 से आपको काफी उम्मीदे हैं?

  • जी हां! इसकी वजहे हैं, 2018 की शुरूआत में ही मेरी दो फिल्में ‘और देवदास’ तथा ‘लव सोनिया’ प्रदर्शित होंगी. इन दोनों ही फिल्मों का सब्जेक्ट काफी अच्छा है. इनके निर्देशक बहुत अच्छे हैं. दोनो फिल्मो को उनके निर्देशकों ने बड़ी इमानदारी के साथ बनाया है. मेरी राय में सुधीर मिश्रा के साथ हर कलाकार को कम से कम एक बार अवश्य काम करना चाहिए.

वह अपने आप मे एक स्कूल हैं, फिल्म उद्योग जितनी जल्दी उन्हे पहचान ले, उतना ही अच्छा होगा. इसके अलावा मैने एक्सेल इंटरटेनमेंट के साथ एक अति बेहतरीन फिल्म की है, जो कि 2018 की पहली छमाही में ही प्रदर्शित होगी. तो मुझे सब कुछ बहुत अच्छा व सुनहरा नजर आ रहा है. फिर वेब सीरीज ‘इनसाइड एज’ का दूसरा सीजन भी आने वाला है.

एक्सेल इंटरटेनमेंट वालों से आपके काफी अच्छी ट्यूनिंग हो गयी. आपने ‘फुकरे‘,फुकरे रिटर्न’ के अलावा उनके साथ वेब सीरीज ‘‘इनसाइड एज’’ भी की. अब आप ‘इनसाइड एज’ का दूसरा सीजन भी करने जा रही हैं?

  • मुझे एक्सेल इंटरटेनमेंट वालो के साथ काम करना काफी अच्छा लगता है. इसकी कुछ वजहें हैं. सबसे पहली वजह यह है कि वह कलाकारों की काफी इज्जत करते हैं. कलाकार और उसकी कला की कद्र करते है. उनकी फिल्म में बड़ा कलाकार हो, फिर भी अच्छा और हमारे योग्य किरदार होने पर वह हमें याद करते हैं. नए कलाकारों का भी सम्मान देते हैं, उन्हे अच्छे किरदार निभाने का अवसर देते हैं. मसलन- शशांक अरोड़ा और विक्रांत मैसी, यह दोनो काफी नए हैं, पर उन्होंने इनके साथ भी हमारी ही तरह अच्छा व्यवहार किया.

नए होने के कारण उन्हे अनदेखा नहीं किया. इनके किरदार भी महत्वपूर्ण है. वह कलाकारों को काफी पैंमपर्ड भी करते हैं. फिल्म के साथ साथ उससे जुड़े कलाकारों को भी प्रमोट करते हैं. वह अपने कलाकारों के लिए दूसरे से लड़़ जाते हैं. खुद नही खाएगे, पर पहले अपने कलाकारों को खिलाते हैं. वह कलाकार को इज्जत से रखते हैं. फिल्म सफल हो जाए, तो पार्टी देते है. कलाकारों को घुमाते भी हैं. इसी के चलते हर कलाकार एक्सेल इंटरटेनमेट के साथ काम करना पसंद करता है. मैं पंजाबी हूं, मुझे लगता है कि मेरे घर आया हुआ इंसान भूखा न जाए, यही उनका भी एटीट्यूड है. इससे भी बढ़कर बात यह है कि जब मैं एक्सेल के सेट पर होती हूं, तो मुझे इस बात का अहसास नही होता कि मै लड़की हूं और कोई भी पुरूष मुझे गलत नजर से देख रहा है. वहां मुझे अपनी इज्जत नजर आती है. यह कल्चर फरहान अख्तर, शबाना आजमी, जावेद अख्तर, रितेश सिद्धवानी में कूट कूट कर भरा हुआ है. वह कलाकार को प्यार करते हैं. उन्हे कला की कद्र है. अच्छे दिमाग की अच्छी सोच की वह कद्र करते हैं. कल्चर वाले संस्कारी लोग हैं.

आपने कहा कि आपको यह अहसास नहीं होता कि आप लड़की है,जब आप एक्सेल के साथ काम करती है. इसकी कोई खास वजह?

  • एक्सेल में जो माहौल है और वह अपने कलाकार का जिस तरह से ख्याल रखते हैं, वैसा तो मैने मीडिया या किसी अन्य क्षेत्र के आफिसों में भी नहीं देखा. मैं आपको वेब सीरीज ‘इनसाइड एज’ के सेट का वाकिया बताना चाहूंगी. इस वेब सीरीज में एक लड़का मेकअप आर्टिस्ट की हैसियत से काम कर रहा था. उसने लगभग पूरी वेब सीरीज की शूटिंग की पर अंतिम दिनों मे एक लड़की ने शिकायत की कि उस लड़के ने उसे हाथ लगा दिया. मैं इस घटना की सत्यता को नहीं जानती. वैसे भी वह लड़का गे था, पर फरहान अख्तर ने तुरंत उस मेकअप आर्टिस्ट को न सिर्फ सेट से बाहर किया, बल्कि उसकी बकाया राशि भी नही दी. तो फरहान अख्तर व रितेश सिद्धवानी यह लोग अपने आफिस में, सेट पर औरतों की पूरी इज्जत हो, इसका खास ख्याल रखते हैं. इसलिए मैं हमेशा उनके साथ काम करने को तैयार रहती हूं. फिर एक्सेल ने ‘लक्ष्य’, ‘दिल चाहता है’ सहित कई अच्छी फिल्मो का ही निर्माण किया है.

लेखन के क्षेत्र में कुछ हो रहा है?

  • जी हां! एक फिल्म की पटकथा लिख रही हूं. यह फीचर फिल्म होगी. कोशिश होगी कि इसका निर्माण भी मैं ही करुं. मैने कुछ दिन पहले पंजाबी में एक लघु फिल्म का निर्माण कर फिल्म निर्माण के अनुभव हासिल किए हैं. मैं एक किताब भी लिख रही हूं. इसके सब्जेक्ट पर बाद में बात करना चाहूंगी.

ऊंचाहार के सरकारी पौवर प्लांट में हादसा

उत्तर प्रदेश के सरकारी पौवर प्लांट, जो रायबरेली में ऊंचाहार में है, में बौयलर फटने से हुई दुर्घटना में कम से कम 40 लोग मारे गए हैं. उस बौयलर के पास तब 300 लोग काम कर रहे थे, जब वह दबाव बढ़ जाने की वजह से फट गया था. नैशनल थर्मल पौवर कारपोरेशन के इस 500 मैगावाट के प्लांट में जब यह दुर्घटना हुई, तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ धर्मकर्म के काम में लगे थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उद्घाटनों में.

यह तो अजूबा ही है कि जब भगवान के दूत खुद मुख्यमंत्री हों तो उन की नाक के नीचे उसी तरह बौयलर फटा जैसे राम के राज में ब्राह्मण का पुत्र मरा और दोष शंबूक के वेद पठन को दिया गया. शायद प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री भी किसी ऐसे ही बहाने को खोज रहे थे पर उन्हें मिला नहीं या उन की हिम्मत नहीं हुई. हां, वे उन दिनों अपने गुरगों को ताजमहल के विवाद को भड़काने का संदेश देते रहे.

हमारे देश में इस तरह की दुर्घटनाओं में जब मजदूर, गरीब, किसान, शूद्र, दलित मरते हैं, तो कोई चिंता नहीं की जाती. यदि यह कांड उपहार सिनेमा, दिल्ली या इमामी अस्पताल, कोलकाता की तरह होता, तो हफ्तों तक हल्ला मचता रहता और अफसर या मालिक जेलों में होते. अब चूंकि मजदूर मरे हैं और उन में भी ज्यादातर ठेके पर काम करने वाले, तो किसी की कोई गिरफ्तारी नहीं हुई. बस, कुछ जांच कमेटियां बिठा दी गई हैं.

गरीब की जान हमारे देश में सस्ती इसलिए है कि गरीब खुद ही उस की कीमत नहीं आंकते. ज्यादातर गरीब खुद ही बेवकूफी में ऐसे काम करते हैं जिन से बीमारी या मौत आती है. सड़क के किनारे बैठने, धुएं में हाथ तापने से ले कर टूटेफूटे औजारों से काम करना, जहरीली चीजें खुली रखना, खोदे गए गड्ढों को न भरना, चोट लगे तो देखना नहीं वगैरह इस में शामिल हैं. जहरीली शराब, भरभर कर अफीम व तंबाकू खाना, बीड़ीसिगरेट पीना और पी कर बेबात झगड़े करना गरीबों को मानो सिखाया जाता है.

ऊंचाहार में मरे गरीबों की चिंता किसी ने नहीं की है, क्योंकि उन के घरों में मरे हुए को जल्दी ही भुला दिया जाता है. पैसा अगर मिल गया तो ठीक, वरना मरने को भाग में लिखा सोच कर बीवीबच्चे जल्दी ही संतोष कर लेते हैं कि ऐसा तो होना ही था. सरकारी अफसरों को इस बात का पूरा एहसास रहता है. गरीब को कफन में नया कपड़ा मिल जाता है, यही बहुत बड़ी बात होती है, वरना पंडों की तरह वे भी गरीब के कफन से भी पैसा वसूलने में माहिर रहते हैं.

ऊंचाहार में बौयलर फटने के बाद 5-7 अफसरों और मंत्रियों को कुछ दिन तो जेल में रखना चाहिए था. यदि उपहार सिनेमा और इमामी अस्पताल के मालिक मौतों के जिम्मेदार हैं, तो बिजली मंत्री और मुख्यमंत्री क्यों नहीं?

भारतीय रेल हादसे : मुसाफिरों का विनाश

भारतीय रेल यात्रा में जिस तरह से जानमाल का खतरा बना हुआ है और उस के ‘बुरे दिन’ हैं, ऐसे में किसी शायर की ये चंद लाइनें व भाजपा का नारा ‘सब का साथ सब का विकास’ के बजाय ‘स्टाफ का विकास, मुसाफिरों का विनाश’ बहुत मौजूं है.

यहां की रेल व्यवस्था राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और नकारा स्टाफ की वजह से भारी बुरे दौर से गुजर रही है, मगर फिर भी बुलेट ट्रेन चलाए जाने का थोथा शोर है. मुसाफिरों की जान की हिफाजत का कोई खास जोर नहीं है, क्योंकि सरकार और उस के मुलाजिम दोनों मन, कर्म और वचन से चोर हैं.

सरकारी आंकड़े चीख रहे हैं कि रेलवे में होने वाले हादसों में आधे से भी ज्यादा हादसे सिर्फ स्टाफ की लापरवाही से होते हैं, फिर भी सरकार है कि उन कुसूरवार रेल अफसरों, मुलाजिमों पर कोई आपराधिक कार्यवाही करने से बचती रहती है. महज अनुशासनात्मक कार्यवाही कर अगली बार फिर मौत पर मातम मनाती है, आखिर में मौत के मुलाजिमों को छोड़ देती है. यही वजह है कि अब तक स्टाफ की कमी से हुए रेल हादसों में कार्यवाही का कोई बड़ा उदाहरण नहीं दिखा है, जिस से स्टाफ सहमा हो और रेल हादसे रुके हों.

सरकार संसद के भीतर तो यह स्वीकार करती है कि रेल हादसों में रेलवे मुलाजिम कुसूरवार हैं, मगर उन को गिरफ्तार किए जाने, कठोर सजा दिलवाने में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाती.

ध्यान देने वाली बात यह है कि रेलवे के कुसूरवार अफसरों, मुलाजिमों पर कोई कठोर कार्यवाही न करने के चलते हादसों के साथ इस से होने वाला माली नुकसान भी बढ़ता चला जा रहा है, जो जनता की गाढ़ी कमाई है.

संसद में हुई बहस के दौरान जो आंकड़े बताए गए हैं, उन के मुताबिक, रेल हादसों के चलते साल 2014-15 में 70.07 करोड़ रुपए का माली नुकसान हुआ है, वहीं 2016-17 में हुए कुल सौ हादसों में 59.06 करोड़ रुपए का माली नुकसान हुआ है.

मोदी सरकार ‘अच्छे दिन’ के जुमलों से जोरशोर से सत्ता में तो आ गई, मगर रेल के सफर के दौरान होने वाले मौतरूपी मर्ज को जड़ से न दूर कर के ट्वीट करने पर दूध और दवा मुहैया कराने की वाहवाही लूटने में लग गई. इस के साथ ही बुलेट ट्रेन चलाने और ट्रेनों में वाईफाई मुहैया कराने और अब तो ट्रेन में ही शौपिंग कराने का दावा करने में लगी है, जबकि मुसाफिर ट्रेन में बैठेंगे तो महफूज अपनी मंजिल तक पहुंच पाएंगे, इस की कोई गारंटी नहीं है.

6 महीने में रेल हादसे

* 26 सितंबर, 2017. मुंबई के एलफिंस्टन रोड उपनगरीय रेलवे स्टेशन के फुटओवर ब्रिज पर हुई भगदड़ में 22 लोगों की मौत हो गई और 32 लोग घायल हो गए.

* 6 सितंबर, 2017. नए रेल मंत्री पीयूष गोयल की ताजपोशी के बाद एक ही दिन में देश के अलगअलग हिस्सों में 4 रेल हादसे हुए. पहली घटना में उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में ‘शक्तिपुंज ऐक्सप्रैस’ के 7 डब्बे बेपटरी हो गए, वहीं दूसरी घटना में मिंटो पुल के निकट ‘रांचीदिल्ली राजधानी’ का इंजन और पावर कार उतर गया. तीसरी में महाराष्ट्र में खंडाला के निकट मालगाड़ी पटरी से उतर गई. चौथी में फर्रुखाबाद और फतेहगढ़ के पास ‘दिल्लीकानपुर कालिंदी ऐक्सप्रैस’ बड़ा हादसा होने से बालबाल बच गई.

* 17 अगस्त, 2017. उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के निकट खतौली में ‘पुरी उत्कल ऐक्सप्रैस’ के हादसे में 23 लोगों की जानें चली गईं, जबकि 150 से ज्यादा लोग घायल हुए.

* 22 अगस्त, 2017. उत्तर प्रदेश के औरैया में ‘कैफियत ऐक्सप्रैस’ के एक डंपर से टकराने के चलते 9 कोच पटरी से उतर गए और दर्जनों मुसाफिर घायल हो गए.

* 21 मई, 2017. उत्तर प्रदेश के उन्नाव स्टेशन के पास ‘लोकमान्य तिलक सुपरफास्ट’ ट्रेन के 8 कोच पटरी से उतर गए, जिस में 20 मुसाफिर घायल हो गए.

* 15 अप्रैल, 2017. ‘मेरठलखनऊ राजरानी ऐक्सप्रैस’ के 8 कोच रामपुर के पास पटरी से उतर गए. इस में तकरीबन एक दर्जन मुसाफिर घायल हो गए.

होते होते टला हादसा

* 27 सितंबर, 2017. इलाहाबाद के निकट एक ही पटरी पर ‘दूरंतो ऐक्सप्रैस’ समेत 3 ट्रेनें एकसाथ टकराने से बालबाल बच गईं.

* 29 सितंबर, 2017. उन्नाव में गंगा घाट रेलवे स्टेशन से मालगाड़ी को बिना गार्ड के ही रायबरेली के लिए भेज दिया गया.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, मोदी सरकार में 3 साल तक रेल मंत्री रहे सुरेश प्रभु के कार्यकाल में छोटेबड़े कुल 3 सौ रेल हादसे हुए, जिस में सिर्फ साल 2017 में जनवरी से अगस्त महीने तक 31 रेल हादसे हो चुके थे.

पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने इन हादसों के बाबत नैतिक आधार पर इस्तीफा देने की पेशकश की, जिस के बाद तत्कालीन ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल को यह मंत्रालय मिला, मगर फिर भी हादसे हैं कि थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं.

* 19 जुलाई, 2017. संसद में पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने रेल स्टाफ की लापरवाही की वजह से हुए हादसों के बाबत बताया था कि साल 2015-16 में हुए कुल 107 रेल हादसों में 55 हादसे और साल 2016-17 में 85 हादसों में से 56 हादसे सिर्फ स्टाफ की लापरवाही से हुए हैं.

इसी तरह नीति आयोग की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2012 से साल 2016-17 तक हर 10 रेल हादसों में से सिर्फ 6 हादसे स्टाफ की चूक की वजह से हुए हैं.

नीति आयोग की एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2017 में 31 मार्च तक 104 हादसों में से 66 हादसे स्टाफ की लापरवाही से हुए हैं.

गुनाहगारों को सजा नहीं

दरअसल, रेलवे के बड़े हादसों की जांच के लिए संसद ने एक कानून बना कर रेलवे संरक्षा आयोग बनाया है. निष्पक्ष जांच के लिए इस आयोग को केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय के तहत रखा गया है. इस आयोग का मुखिया संरक्षा आयुक्त होता है, जो रेलवे के अलगअलग जोन का काम देखने वाले 5 आयुक्तों के साथ काम करता है.

संरक्षा आयोग के पास इतना काम होता है कि लंबे अरसे तक जांच ही चलती रहती है. अब तक का इतिहास बताता है कि इस आयोग के आयुक्त ज्यादातर रेलवे के ही लोग होते हैं. इस से भी जांच का काम काफी हद तक प्रभावित होता है. कभी अगर कार्यवाही होती भी है, तो छोटे अफसरों पर हो जाती है, बड़े अफसर साफसाफ बचा लिए जाते हैं.

रेलवे के एक रिटायर्ड जनरल मैनेजर ने बताया कि भारतीय रेलवे की नियम पुस्तिका के मुताबिक, ट्रैक के रखरखाव के लिए रोजाना 3 से 4 घंटे तय हैं, मगर ऐसा हो नहीं पाता. ज्यादातर नियम स्टाफ की लापरवाही की भेंट चढ़ जाते हैं. कभीकभी ट्रैक के खाली न होने या फिर ट्रेन के देरी से आने की वजह से भी ऐसा होता है.

वे आगे बताते हैं कि इस की असल वजह नियमों के न होने की नहीं है, बल्कि उन नियमों के सही से लागू न हो पाने की है.

इधर रेलवे ने हाल ही में टिकट में फ्लैक्सी रेट जैसे नएनए शिगूफे छोड़ कर जम कर आमदनी बढ़ाई है. अकसर रेल मुसाफिर यह कहते हुए मिल जाते हैं कि फर्स्ट क्लास के सफर का खर्च उतनी ही दूरी के हवाईजहाज के सफर के खर्च के तकरीबन बराबर है.

ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब मुसाफिर का अहम मकसद एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचना है, तो क्या रेलवे उस जगह तक महफूज पहुंचाने की गारंटी भी गंभीरता से देती है?

इस बाबत रेलवे से जुड़े एक रिटायर्ड अफसर बताते है कि रेलवे को मिलने वाले एक रुपए में से महज 7 पैसे ही रखरखाव के लिए लगाए जाते हैं, बाकी दूसरे कामों में इस्तेमाल हो जाते हैं.

हालांकि साल 2014-15 के मुकाबले हिफाजत पर खर्च होने वाली रकम को साल 2017-18 में 42.430 करोड़ रुपए से बढ़ा कर 65.241 करोड़ रुपए कर दिया गया है.

रेल का राजनीतिकरण

वैसे तो रेलवे देश की ‘लाइफलाइन’ कहलाती है, मगर इस के राजनीतिकरण ने उसे तकरीबन ‘किलर लाइन’ में तबदील कर दिया है.

देखने में आता है कि गठबंधन सरकारों में यह मंत्रालय किसी मजबूत दल की झोली में ही रहा है और ज्यादातर काम देश के लैवल पर न हो कर केवल इलाकाई लैवल पर ही किए गए.

पहले तो अलग से पेश होने वाले रेल बजट में पश्चिम बंगाल, बिहार, रायबरेली, अमेठी जैसे इलाकों को खास सौगातें मिलती रही थीं.

ऐसे में हाल ही में हुए रेल हादसों पर अगर लालू प्रसाद यादव यह तंज कसते हैं कि खूंटा बदलने से नहीं, बल्कि संतुलित आहार देने व खुराक बदलने से भैंस ज्यादा दूध देगी, तो इसे महज एक राजनीतिक बयान नहीं समझना चाहिए, बल्कि इस को गंभीरता से देखना चाहिए. सत्ता बदलने से या किसी मंत्री का मंत्रालय बदल देने से रेलवे का कोई भला नहीं हो पाएगा.

बेहतर होगा कि रेलवे का भ्रष्टाचार, काम करने का गैरजिम्मेदाराना रवैया खत्म हो और रेलवे स्टाफ व मंत्रालय जनता के प्रति जवाबदेह बनें.

‘बाहुबली’ की देवसेना का ये नया अंदाज देखा आपने

बाहुबली की शानदार कामयाबी के बाद बाहुबली के सितारे अपने अगले प्रोजेक्ट पर काम करने की शुरुआत कर चुके हैं.

जहां बाहुबली प्रभास अपनी अगली फिल्म ‘साहो’ को लेकर व्यस्त हैं, वहीं उनकी कथित गर्लफ्रेंड अनुष्का शेट्टी ने अपने ट्रांस्फोर्मेशन से लोगों का दिल अपनी मुठ्ठी में कर लिया है.

कुछ समय पहले खबर आई थी कि प्रभास के साथ फिल्म ‘साहो’ में अनुष्का शेट्टी बतौर फीमेल लीड की भूमिका में निभाएंगी, लेकिन बाद में खबर आई कि फिल्म मेकर किसी दुबली अदाकारा को इस फिल्म में कास्ट करना चाहते हैं.

अब हुआ ये कि अनुष्का अपना वजह तो घटा ही रही थीं, लेकिन इसमें काफी समय जा रहा था, जिसकी वजह से फिल्म की शूटिंग पर असर हो रहा था. इसलिए ये फैसला लिया गया कि प्रभास के साथ श्रद्धा कपूर को फाइनल किया जाए.

लेकिन अनुष्का की इस तस्वीर को देखकर फिल्म मेकर्स को अपनी गलती का अहसास होगा, क्योंकि अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर अनुष्का ने जो तस्वीर पोस्ट की है, वह अपने आप में किसी बड़े ट्रांस्फोर्मेशन से कम नहीं है.

इस तस्वीर में अनुष्का बेहद दुबली और सुन्दर दिखाई दे रही हैं. उनपर काले रंग का ट्रैक सूट और बौब कट बाल बेहद सूट कर रहे हैं. इस तस्वीर पर आपकी क्या राय है?

ये थी शशि कपूरी की अधूरी तमन्ना

अपने समय के मशहूर रोमांटिक अभिनेता शशि कपूर का 79 वर्ष की उम्र में लंबी बीमारी के बाद सोमवार 4 दिसंबर को मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में शाम पांच बजकर 20 मिनट पर निधन हो गया. शशि कपूर पिछले कई वर्षों से व्हील चेअर पर थे. किडनी की बीमारी के चलते रविवार की शाम को उन्हे मुंबई के अंधेरी स्थित कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती कराया गया था.

जब शशि कपूर ने अंतिम सांसे लीं, उस वक्त उनके पास उनके बड़े बेटे कुणाल कपूर मौजूद थे. जबकि उनकी बेटी संजना कपूर और छोटा बेटा करण कपूर मुंबई से बाहर थे, पर देर रात तक यह दोनों मुंबई पहुंच गए. मंगलवार, 5 दिसंबर को दोपहर 12 बजे मुंबई में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा.

शशि कपूर के निधन के साथ ही कपूर खानदान यानी कि स्व. पृथ्वीराज कपूर की दूसरी पीढ़ी का अंत हो गया, जबकि उनकी तीसरी व चौथी पीढ़ी बौलीवुड में अभिनय के क्षेत्र में कार्यरत है. स्व. पृथ्वीराज कपूर के सबसे बड़े बेटे राज कपूर, मंझले बेटे शम्मी कपूर और शशि कपूर सबसे छोटे बेटे थे. नियति का खेल भी निराला रहा. पृथ्वीराज कपूर के बाद उनके बड़े बेटे राज कपूर, फिर मंझले बेटे शम्मी कपूर और अब सबसे छोटे बेटे शशि कपूर का देहांत हुआ है.

अब कौन कहेगा ‘‘मेरे पास मां है’

शशि कपूर के देहांत की खबर से सिर्फ बौलीवुड ही नहीं, बल्कि शशि कपूर के लाखों प्रशंसक भी गम में डूब गए. हर किसी की जुबान पर सिर्फ एक सवाल है कि, अब कौन कहेगा कि ‘मेरे पास मां है.’ यूं तो हर कलाकार के उनकी सफलतम फिल्मों के कुछ संवाद उनके प्रशंसकों को हमेशायाद रहते हैं, मगर शशि कपूर के अनेक संवाद ऐसे हैं, जो कि उनके हर प्रशंसक की जुबान पर हैं. मगर उन संवादों में से फिल्म ‘दीवार’ में दो सगे भाईयों में से एक माफिया डान बने विजय वर्मा का किरदार निभाते हुए अमिताभ बच्चन अपने छोटे भाई व पुलिस इंस्पेक्टर रवि वर्मा का किरदार निभा रहे शशि कपूर से एक मोड़ पर कहते हैं कि उनके पास ‘बंगला,गाड़ी…वगैरह है..’’ तब रवि वर्मा यानी शशि कपूर उनसे कहते हैं-‘‘मेरे पास मां है.’’ जिसे सुनकर विजय वर्मा निरुत्तर हो जाते हैं. फिल्म ‘‘दीवार’’ का शशि कपूर का यह संवाद हर भारतीय के दिल में समा गया था. तब से मौके बेमौके लोग इस संवाद को अपनी निजी जिंदगी में दोहराते रहते हैं. यही वजह है कि आज शशि कपूर के इस संसार से विदा लेते ही लोगों के जेहन में पहला सवाल यही उठा कि अब कौन कहेगा ‘मेरे पास मां है’.

शशि कपूर ने खुद बनायी थी अपनी राह

इन दिनों बौलीवुड में नेपोटिजम का मुद्दा गर्माया हुआ है, जबकि पृथ्वीराज कपूर ने कभी भी बौलीवुड में आगे बढ़ने के लिए अपने बेटों की मदद नहीं की. 18 मार्च 1938 के दिन कलकत्ता, अब कोलकाता में जन्मे बलबीर पृथ्वीराज कपूर यानी कि शशि कपूर ने जब 1944 में बाल कलाकार के रूप में अभिनय करियर की शुरुआत की थी. उस वक्त उनके पिता पृथ्वीराज कपूर ने कहा था कि शशि कपूर खुद संघर्ष करें, मेहनत करें और अपनी मेहनत व प्रतिभा के बल पर अभिनेता बनें. शशि कपूर ने अपने पिता के इस कथन को गांठ बांध लिया था. पर वह अपने पिता का काफी सम्मान करते थे.

पिता के सम्मान में पृथ्वी थिएटर

अपने पिता के सपनों को याद रखते हुए शशि कपूर थिएटर से जुड़े. इतना ही नहीं शशि कपूर ने अपने पिता के सपनों को पूरा करने और थिएटर की बेहतरी, थिएटर से नई नई प्रतिभाओं को जुड़ने की प्रेरणा देने के मकसद से अपने पिता पृथ्वीराज कपूर के नाम पर मुंबई में जुहू इलाके में ‘‘पृथ्वी थिएटर’’ की शुरुआत की, जहां पर हर दिन नए नए रंगकर्मी और कलाकार अपने नाटकों का प्रक्षेपण करते रहते हैं.

इस पृथ्वी थिएटर पर अपने नाटकों का मंचन करते हुए कई प्रतिभाएं सिनेमा व टीवी की दुनिया में नित नई उंचाइयां छूती रही हैं और आज भी छू रही हैं. इतना ही नहीं सिनेमा के कई दिग्गज कलाकार भी इस पृथ्वी थिएटर पर अपने नाटकों मंचन करते हैं. शुरुआत में खुद शशि कपूर इस पृथ्वी थिएटर की देखभाल किया करते थे. वह हर रंगकर्मी के सुख दुःख सुना करते थे. उसके बाद यह जिम्मेदारी उनकी बेटी संजना कपूर ने निभाना शुरू किया. जब संजना कपूर की वाल्मीक थापर के शादी हो गयी, तब से इस जिम्मेदारी का निर्वाह शशि कपूर के बड़े बेटे कुणाल कपूर बड़ी शिद्दत के साथ कर रहे हैं. यही वजह है कि देश का हर रंगकर्मी शशि कपूर की मौत से गमगीन है?

हीरो बनने से पहले ही की विदेशी लड़की जेनिफर केंडल से विवाह

यूं तो शशि कपूर ने महज दस साल की उम्र में ही बाल कलाकार के रूप में अपने बड़े भाई राज कपूर के बचपन के किरदारों को फिल्मों मेंनिभाना शुरू किया था, पर 16 साल की उम्र में वह अपने पिता के थिएटर जुड़ गए. जब वह 18 वर्ष के थे, तब भारत की यात्रा पर आयी एक ब्रिटेन की नाट्य मंडली ‘शेक्सपियेराना’ से जुड़ गए. जहां उन्हे इस नाट्यमंडली के मालिक की बेटी जेनिफर केंडल से प्यार हो गया और 1958में दोनों ने शादी कर ली. जिनसे उनके दो बेटे कुणाल कपूर व करण कपूर तथा एक बेटी संजना कपूर हैं. 1984 में जेनिफर कपूर की मौत हो गयी थी. उसके बाद से उनकी दुनिया अभिनय, पृथ्वी थिएटर व अपने बच्चों तक ही सीमित होकर रह गयी थी.

विवाह के बाद किस्मत खुली

ब्रिटिश नागरिक जेनिफर केंडल से विवाह रचाने के बाद शशि कपूर की किस्मत ने जबरदस्त पलटा खाया. 1959 में उन्होंने कुछ फिल्मों में बतौर सहायक निर्देशक काम किया. फिर 1961 में उन्हे बी आर चोपड़ा निर्मित तथा उनके भाई यश चोपड़ा निर्देशित फिल्म ‘‘धर्म पुत्र’’ में माला सिन्हा के साथ हीरो बनकर आने का मौका मिला. इस फिल्म को बाक्स आफिस पर सफलता नहीं मिली, मगर इसे राष्ट्रीय पुरस्कार मिल गया. राष्ट्रपति ने इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म के रजत पदक से नवाजा. फिर बिमल राय की फिल्म ‘‘प्रेमपत्र’’ की, पर इसे भी सफलता नहीं मिली. इसके बाद ‘मेंहदी लगी मेरे हाथ’, ‘बेनजीर’ व ‘हालीडे इन बांबे’ सहित उनकी करीबन नौ फिल्में बाक्स आफिस पर सफलता दर्ज नहींकर सकी.

‘वक्त’ ने बदला उनका वक्त

‘धर्मपुत्र’ की असफलता के बावजूद बी आर चोपड़ा ने 1965 में अपनी मल्टीस्टारर फिल्म ‘‘वक्त’’ में बलराज साहनी, राज कुमार, सुनील दत्त,साधना, शर्मिला टैगोर के साथ ही शशि कपूर को भी अभिनय करने का अवसर दिया. इस फिल्म में अभिनय करना शशि कपूर के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी. बलराज साहनी व राज कुमार जैसे कलाकारों के समक्ष खड़े रहना हर कलाकार के बस की बात नहीं थी. इसके अलावा इस फिल्म में उनके साथ सुनील दत्त भी थे. यहां याद रखना होगा कि सुनील दत्त के करियर की पहली फिल्म ‘‘पोस्ट बाक्स 999’’ में शशि कपूर ने बतौर सहायक निर्देशक काम किया था.

खैर, शशि कपूर ने कड़ी मेहनत की और इस फिल्म की सफलता के साथ ही लोगों ने इस फिल्म में शशि कपूर द्वारा निभाए गए विजय उर्फ मुन्ना के किरदार को भी काफी पसंद किया. इतना ही नहीं इस फिल्म को अलग अलग कैटेगरी में कुल सात फिल्मफेअर अवार्ड भी मिले. इसी साल नंदा के साथ उनकी फिल्म ‘‘जब जब फूल खिले’’ तथा ‘‘प्यार किए जा’ ने भी धूम मचायी.

बहरहाल, फिल्म ‘वक्त’ से शशि कपूर का वक्त ऐसा बदला कि फिर उन्होंने करीबन बीस वर्ष तक बौलीवुड में रोमांटिक हीरो के रूप में अपना एकक्षत्र राज्य कायम रखा. बतौर हीरो उन्होंने 170 फिल्में की, जिसमें ‘36 चौरंगी लेन’, ‘चोर मचाए शोर’, ‘दीवार’, ‘कभी कभी’, ‘त्रिशूल’, ‘सुहाग’, काला पत्थर’,  ‘विजेता’, ‘जुनून’, ‘दिल ने पुकारा’, ‘कन्यादान’, उनकी कुछ चर्चित फिल्में हैं.

1998 में उन्होंने दो अंग्रेजी भाषा की फिल्में ‘‘जिन्ना’’ व ‘‘साइडस्ट्रीट’’ की. इसके बाद वह किसी भी फिल्म में नजर नही आए. मगर वह अपने पृथ्वी थिएटर पर हर दिन नाटक देखने जाते रहे हैं.

रोमांटिक और चाकलेटी हीरो ही नहीं, हरफनमौला कलाकार

बौलीवुड के सर्वाधिक हैंडसम और अति खूबसूरत शशि कपूर को लोग ‘चाकलेटी चेहरे’ वाला कलाकार कहते थे. शशि कपूर के ही वक्त मेंचाकलेटी हीरो शब्द इजाद हुआ था. शशि कपूर एकमात्र ऐसे कलाकार रहे हैं, जिन्हें सर्वाधिक सफल व अलग तरह के रोमांटिक हीरो की संज्ञा दी जाती रही. जबकि शशि कपूर ने रोमांटिक किरदारों के अलावा हास्य, एक्शन, नाटकीय किरदार भी निभाए. वह अपने समय के ऐसे कलाकार रहे हैं, जिन्होंने हिंदी के अलावा हौलीवुड फिल्में और अंग्रेजी सिनेमा भी किया. अंग्रेजी भाषा में खुद भी फिल्में बनायी. पर शशि कपूर ने रोमांटिक हीरो के रूप में जो अमिट छाप छोड़ी, वह कोई अन्य नहीं छोड़ पाया.

अमिताभ, शर्मिला, राखी के साथ सबसे ज्यादा फिल्में

शशि कपूर और अमिताभ बच्चन की जोड़ी को फिल्मों मे सर्वाधिक पसंद किया गया. इन दोनों ने ‘सुहाग’, ‘दो और दो पांच’, ‘अजूबा’, ‘दीवार’, ‘कभी कभी’ , ’शान’, ‘सिलसिला’, ‘बांबे टाकीज’, ‘नमक हलाल’, ‘जानेमन’, ‘त्रिशूल’ जैसी फिल्में की. राखी के साथ दस, शर्मिला टैगोर के साथ12, नंदा के साथ ग्यारह यादगार फिल्में की.

व्यावसायिक फिल्मों की कमायी को कला फिल्मों में गंवाया

शशि कपूर पर विदेशी सिनेमा के अलावा कलात्मक सिनेमा का काफी प्रभाव रहा. उन्होंने मुंबईया मसाला फिल्मों में अभिनय कर जमकर पैसा कमाया. पर इस धन का उपयोग उन्होंने ‘पृथ्वी थिएटर’ को संवारने के अलावा अपनी मनपंसद कलात्मक फिल्मों के निर्माण में करते रहे.

शशि कपूर ने सबसे पहले 1978 में फिल्म ‘‘जुनून’’ का निर्माण किया था. उसके बाद ‘कलयुग’, 36 चौरंगी लेन’, ‘विजेता’, ‘उत्सव’ और ‘अजूबा’का निर्माण किया. शशि कपूर ने 1991 में अति महंगी फिल्म ‘‘अजूबा’’ का निर्माण किया था, जिसमें अमिताभ बच्चन भी थे. इस फिल्म की असफलता से उन्हे इतना नुकसान हुआ कि वह पूरी तरह से टूट गए. उसके बाद वह 1993 में अंग्रेजी भाषा की फिल्म ‘इन कस्टडी’ में नजर आए थे. फिर एक विदेशी टीवी पर मिनी सीरीज की. 1998 के बाद वह अभिनय व फिल्म निर्माण से पूरी तरह से दूर हो गए.

पत्नी व भाई की मौत ने तोड़ दिया

1984 में पत्नी जेनिफर की मौत, उसके बाद 1988 में बडे़ भाई राज कपूर की मौत के बाद शशि कपूर खुद को बड़ा अकेला महसूस करने लगे और पृथ्वी थिएटर की जिम्मेदारी बेटी संजना को सौंप एकांतवास की जिंदगी जीने लगे थे. पर कलात्मक इंसान कब तक चुप रहता. तो उन्होंने1991 में ‘अजूबा’ फिल्म का निर्माण किया. इस फिल्म के डूबने से उनकी आर्थिक कमर भी टूट गयी.

उसके कुछ दिनों बाद सडक पर चलते हुए वह एक नाले में इस तरह गिरे कि उनके शरीर की कई हड्डियां टूट गयी. ब्रीच कैंडी अस्पताल में कई माह गुजारने के बाद वह व्हील चेयर पर ही अपने घर पहुंचे. उसके बाद उन्होंने लोगों और पत्रकारों से मिलना जुलना बंद कर दिया. पर सुबह वह पृथ्वी थिएटर पर नाटक देखने पहुंच जाया करते थे. उनके जन्मदिन पर पूरा कपूर खानदान इकट्ठा होता था. उनके हर जन्मदिन पर धर्मेंद्रजरूर पहुंचते थे. शशि कपूर के जन्मदिन पर यदि अमिताभ बच्चन मुंबई में हुए तो वह भी उन्हें बधाईयां देने जरूर पहुंचते थे.

व्हील चेयर पर ही मिले उन्हें 2 बड़े सरकारी सम्मान

जीवन भर कला की सेवा करते रहे शशि कपूर जब व्हील चेयर पर पहुंच गए, तब सरकार ने उन्हें याद किया. 2011 में पद्मभूषण और 2015में सिनेमा के सबसे बडे़ सम्मान दादा साहेब फालके अवार्ड से सम्मानित किया. वैसे उन्हें अपनी फिल्मों के लिए सबसे पहला राष्ट्रीय पुरस्कार1979 में मिला था. और कुल तीन राष्ट्रीय पुरस्कार मिले. इसके अलावा फिल्मफेयर सहित कई पुरस्कार भी उन्हें मिले.

शशि कपूर की अधूरी तमन्ना

फिल्म ‘‘अजूबा’’ बनाने से पहले शशि कपूर की तमन्ना दिलीप कुमार को लेकर एक फिल्म बनाने की थी. उन्होंने इस फिल्म के लिए पटकथा भी तैयार कर ली थी. लेकिन पहले ‘अजूबा’ की वजह से हुए घाटे और बाद में स्वास्थ्य का साथ ना मिलने की वजह से उनकी यह तमन्ना अंत तक अधूरी रही.

अमिताभ बच्चन और शशि कपूर

यूं तो शशि कपूर उम्र में अमिताभ बच्चन से पांच साल बडे थे. मगर लगभग हर फिल्म में शशि कपूर ने अमिताभ बच्चन के छोटे भाई का ही किरदार निभाया. इन दोनों कलाकारों के बीच काफी अच्छी दोस्ती रही है. 80 के दशक में बौलीवुड में कहा जाता था कि  दोनों के बीच एक एग्रीमेंट हो चुका हैं कि दो हीरो वाली फिल्में यह दोनों एक साथ करेंगे. जब कोई निर्माता इनमें से किसी एक के पास फिल्म का आफर लेकर जाता था तो यह दोनों उस एग्रीमेंट की कापी उस निर्माता को दिखा दिया करते थे. यही वजह है कि इन दोनों की जोड़ी ने एक साथ 11 फिल्में की.

लोग बताते हैं कि जब अमिताभ बच्चन संघर्ष कर रहे थे तब शशि कपूर ने उनकी काफी मदद की थी. यहां तक कि एक बार यह दोनों मुंबई कें बांदरा इलाके में उस वक्त के सीराक हाटल में दसवीं मंजिल पर एक साथ शूटिंग कर रहे थे उसी वक्त अमिताभ बच्चन को दमा का अटैक पडा था. तब शशि कपूर ने ही उन्हें पकड़कर पीछे खींचा था अन्यथा वह काफी नीचे गिर सकते थे.

अनिल कपूर के करियर में शशि कपूर का योगदान

शशि कपूर की ही तरह अनिल कपूर ने भी बौलीवुड के साथ साथ कुछ हौलीवुड फिल्मों में अभिनय किया है. शशि कपूर की ही तरह वह भी  फिल्मों का निर्माण कर रहे हैं. पर बहुत कम लोगों को पता होगा कि अनिल कपूर आज जिस मुकाम पर हैं, वह अपने करियर में शशि कपूर का बहुत बड़ा योगदान मानते हैं.

कुछ दिन पहले मीडिया के सामने खुद अनिल कपूर ने कहा था -‘‘मेरे करियर में शशि कपूर साहब का बहुत बड़ा योगदान रहा है. जब मैं सेंट जेवीयर्स कालेज में पढाई कर रहा था, उन दिनों एक समारोह में शशि कपूर मुख्य अतिथि  बनकर आए थे. इसी समारोह में मैंने एक नाटक में अभिनय किया था, जिसके लिए कालेज द्वारा दिलीप कुमार के नाम पर स्थापित पुरस्कार से मुझे नवाजा गया था. मुझे बेहतरीन कलाकार का यह पुरस्कार शशि कपूर के हाथों ही मिला था. इस नाटक को देखकर शशि कपूर काफी खुश हुए थे. मुझे पुरस्कार देने के बाद वह जहां जाते थे मेरे बारे में बात करते थे. मेरी तारीफ करते थे. उस समय इंडस्ट्री के काफी बडे लोगों से उन्होंने कहा कि एक अच्छा कलाकार आ रहा है.’’

अनिल कपूर ने आगे कहा -‘‘फिर जब मैंने फिल्मों में अभिनय करने के लिए संघर्ष करना शुरू किया तो मुझे पहली फिल्म ‘तू पायल मैं गीत’मिली थी. इसमें मुझे शशि कपूर के टीनएजर उम्र यानी कि 15 साल की उम्र का किरदार निभाने का मौका मिला था. मुझे अच्छी तरह से याद है कि यह किरदार एक संगीतकार के बेटे का था जो कि खुद एक गायक बनना चाहता है. मैंने इसमें अभिनय किया था. मगर दुर्भाग्य की बात यह रही कि यह फिल्म कभी रिलीज ही नही हो पायी. उसके बाद मुझे कभी भी शशि कपूर के साथ काम करने का मौका नही मिला.

एक बार फिर डेजी को मिला सलमान का साथ

एक समय ऐसा था जब डेजी शाह हीरोईन बनने का सपना लिए बड़े सितारों के पीछे भीड़ में डांस किया करती थीं. फिर उनकी किस्मत ने उनका साथ दिया जिसके बाद वह असिस्टेंट कोरियोग्राफर बनीं और उन्होंने 2014 में ‘जय हो’ फिल्म के साथ बौलीवुड में डेब्यू कर लिया. इस फिल्म में उनके हीरो सलमान खान थे.

सलमान का साथ इतनी जल्दी मिल जाना किस्मत का ताला खुलने जैसा है. फिर क्या सलमान खान का साथ हो तो किसी का भी समय बदलने में ज्यादा वक्त नहीं लगता.

तभी तो डेजी शाह को ‘रेस-3’ में भी बड़ी आसानी से एंट्री मिल गई है. मालूम हो कि डेजी शाह ‘हेट स्टोरी-3’ में भी नजर आ चुकी हैं. जिसमें उनकी परफार्मेंस काफी बोल्ड थी.

हाल ही में डेजी ‘रेस-3’ को प्रमोट करने के लिए बिग बौस में आई थीं. वहां उनके साथ जैकलीन फर्नांडिस, बाबी देओल और साकिब सलीम भी आएं थे और हमेशा की तरह सलमान खान बिग बौस के मंच पर बतौर होस्ट मौजूद थे.

यहां डेजी ने एक दिलचस्प खुलासा किया. डेजी ने बताया कि जब अब्बास-मस्तान ने ‘रेस’ डायरेक्ट की थी, उस समय वे फिल्म में असिस्टेंट कोरियोग्राफर के रूप में काम कर रहीं थी. बिग बौस के शो पर उन्होंने ‘रेस’ से जुड़े अपने अनुभव को साझा किया.

वहां मौजूद सभी सितारों के साथ सलमान खान भी उनकी बातों को बहुत गौर से सुन रहे थे. डेजी ‘रेस-3’ में एक अहम किरदार कर रही हैं. वैसे सलमान का डेजी की तरफ इतना झुकाव देखकर लगता है कि डेजी उन्हें कुछ ज्यादा ही पसंद आ रही हैं, खैर अब जो भी हो डेजी के लिए वाकई यह बहुत बड़ी एचीवमेंट है कि कभी जिस फिल्म की उन्होंने कोरियोग्राफी में सहयोग किया था, आज वे उसी फिल्म में सलमान खान और कई बड़े सितारों के साथ काम कर रही हैं.

कास्टिंग काउच पर सलमान ने दिया ये बयान

कास्टिंग काउच को लेकर सलमान खान का बयान आया है. टाइगर जिंदा है स्टार सलमान खान ने कहा कि काम का वादा करके किसी का फायदा उठाना गलत है. उन्होंने कहा कि अगर उन्हें किसी ऐसे शख्स के बारे में पता चलता है तो वे उसे क्लीनर्स के पास ले जाएंगे.

एक्टर ने यह बातें एक समिट में कहीं. हिंदी फिल्म इंडिस्ट्री में मौजूद कास्टिंग काउच के बारे में पूछे जाने पर एक्टर ने कहा- किसी ने भी अभी आकर इसे कंफर्म नहीं किया है. मैं वहां काफी समय से हूं, मेरे पिता मुझसे ज्यादा समय से वहां हैं.

आज तक मैंने किसी को आकर सीधे यह कहते हुए नहीं सुना है. अब अगर आप खूबसूरत महिला या पुरुष हैं तो कोई आपसे फ्लर्ट कर सकता है.

52 साल के सुपरस्टार ने कहा- अगर कोई इस सिद्धांत के साथ रहता है कि आपको काम के बदले उसके साथ सोना है तो यह सबसे घटिया चीज है. मैंने इस तरह की कोई बात नहीं सुनी है. अगर कोई महिला या पुरुष मेरे पास आकर मुझे इस तरह की किसी घटना के बारे में बताता है तो मैं उस शख्स को क्लीनर्स के पास ले जाउंगा.

पिछले कुछ समय से बौलीवुड और हौलीवुड से सेक्सुअल अब्यूज के बारे में खबरें सामने आ रही हैं. इसकी शुरुआत हौलीवुड मुगल हार्वे विंस्टीन के एक्सपोज होने से हुई थी. जिसपर आरोप था कि उसने अपने पद का फायदा उठाकर महिलाओं का शोषण किया है.

सलमान की बात करें तो उन्होंने 1988 में आई फिल्म ‘बीवी हो तो ऐसी’ के जरिए अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत की थी. लेकिन उन्हें कामयाबी मिली 1989 में रिलीज हुई फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ से. जिसमें उनके साथ भाग्यश्री ने लीड रोल निभाया था.

सलमान ने इस बातचीत के दौरान पद्मावती को सपोर्ट किया. उन्होंने कहा- फिल्म पर विवाद से किसी को भी फायदा नहीं होगा. इससे सिर्फ नुकसान हो सकता है. फिल्म की रिलीज में देरी और लोग थियेटरों में जाने से डरेंगे. यहां तक कि थियेटर के मालिक भी इस फिल्म को रिलीज करने से घबराएंगे. इस कारण सिनेमा हौल के बाहर विरोध प्रदर्शन हो सकते हैं.

Saturday vibes! Black rocks!

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कुछ दिन पहले ही टीवी की एक एक्ट्रेस सुलग्ना चटर्जी को कुछ ऐसा ही औफर हुआ था, जिसमें काम के बदले एक्ट्रेस को समझौता करने के लिये कहा गया था. सुलग्‍ना चटर्जी को उनके एजेंट ने एक प्रोजेक्‍ट का औफर देते हुए कहा कि यह ‘कौम्‍प्रो (कौम्‍प्रोमाइज) प्रोजेक्‍ट है’ और उन्‍हें पूरा पैसा मिलने के बाद यह करना होगा. इस चैट में एजेंट ने यह भी साफ किया कि यह डायरेक्‍टर की डिमांड है. ऐसे में सुलग्‍ना ने मिले इस औफर को बड़े शांतिपूर्ण ढंग से रिजेक्ट कर दिया.

When such offers are so common that you are not even affected anymore!

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सुलग्ना ने फोन पर मैसेज से हुई इस बातचीत का स्क्रीन शौट सोशल मीडिया पर भी शेयर किया. दरअसल कास्टिंग काउच ग्लैमर इंडस्ट्री का एक कड़वा सच है. कई जानी-मानी ऐक्ट्रेसेज इससे गुजरी हैं, लेकिन ऐसा बहुत कम हुआ है जब किसी ऐक्ट्रेस ने कास्टिंग काउच की सच्चाई को कबूला हो. सुलग्ना ने इस इंस्टाग्राम पोस्ट को शेयर करते हुए लिखा है, ‘इस तरह के औफर्स इतने कौमन होते हैं कि फिर इनसे फर्क पड़ना बंद हो जाता है.’

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