फुकरे रिटर्न : मनोरंजन की बजाय सिरदर्द

2013 में प्रदर्शित फिल्मकार मृगदीप सिंह लांबा की फिल्म ‘‘फुकरे’’ लोगों के दिलों में अपनी एक खास जगह बनाने में कामयाब हुई थी. अब मृगदीप सिंह अपनी उसी फिल्म का चार वर्ष बाद सिक्वअल ‘‘फुकरे रिटर्न’’ लेकर आए हैं, मगर यह फिल्म पहले की तरह आकर्षित नहीं करती.

फिल्म ‘फुकरे रिटर्न’ की कहानी वहीं से शुरू होती है, जहां ‘फुकरे’ की कहानी खत्म हुई थी. भोली पंजाबन (रिचा चड्ढा) एक वर्ष से दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद है और अब वह बाहर निकलने के लिए आतुर है. जेल की यातना से वह तंग आ चुकी है, इसलिए वह मंत्री बृजमोहन की हर तरह की शर्त मानने को तैयार हो जाती है. मंत्री की शर्त के अनुसार जेल से बाहर आते ही वह दस करोड़ रूपए उन्हे देगी. मंत्री के आश्वासन के चलते 24 घंटे के अंदर भोली पंजाबन जेल से बाहर आ जाती है. तो उसे पता चलता है कि उसका पूरा साम्राज्य खत्म हो चुका है. उसके साथ जुड़े रहे चारों फुकरे किस्म के युवक चूचा (वरुण शर्मा), लाली (मनजोत सिंह), जफर (अली फजल), हनी (पुलकित सम्राट) अब अपनी अपनी जिंदगी में मस्त हो चुके हैं.

चूचा अक्सर चिड़ियाघर में जाकर शेर के बच्चे के साथ खेलता रहता है. इस वजह से शेर से उसकी दोस्ती हो गयी है. लाली कालेज जाने लगा है. हनी को प्रिया शर्मा (प्रिया आनंद) से प्यार हो गया है. जफर फिर से संगीत की दुनिया में रम गया है और उसे नीतू (विशाखा सिंह) से प्यार हो गया है. भोली पंजाबन इन चारों को एक बार फिर डरा धमकाकर अपने लिए काम करने के लिए मजबूर कर देती है.

इतना ही नही वह पंडित जी (पंकज त्रिपाठी) को भी अगुवा कर अपने साथ कर लेती है. चूचा एक बार फिर सपने देखने लगा है. चूचा के सपने का गुणा भाग लगाकर हनी लाटरी का नंबर निकालने लगा है. भोली पंजाबन के कहने पर हनी अपने नाम पर एक लाटरी की कंपनी शुरू करता है. इसके तहत वह घोषणा करता है कि जिस इंसान का नंबर लाटरी में लगेगा, उसे उसकी रकम को दोगुना मिलेगा. इसके लिए एक लाख लगाने पर सौ रूपए के स्टैंप पेपर पर अग्रीमेंट लिखकर देते हैं. इसकी भनक मंत्री जी को लगती है, तो वह नंबर बदलवा देता है. क्योंकि मंत्री जी का अपना लाटरी का बहुत बडा धंधा है.

यदि हनी का नंबर सही हो जाता तो मंत्री जी की कंपनी को भी नुकसान होता. मंत्री की चालाकी के चलते यह चारों दिल्ली की जनता के दोषी हो जाते है और भागते हुए जमुना नदी में गिर जाते हैं. सभी मान लेते हैं कि यह सभी मर गए. पर यह बच जाते हैं. अब चूचा एक बार फिर सपना देखता है. यह सपना है एक खजाने का. खजाने को हथियाने के लिए भोली पंजाबन उनके साथ हो जाती है, पर मंत्री जी अपनी चालाकी में है. भोली पंजाबन जब मंत्री से मदद मांगती है, तो मंत्री बृजमोहन चारों लड़कों को अपने पास भेजने का आदेश देते हैं.

बृजमोहन की आवभगत और शर्त सुनने के बाद हनी का दिमाग चलता है, वह भोली पंजाबन को एक संदेश देता है. फिर भोली पंजाबन मुख्यमंत्री से मिलती है और बृजमोहन के अड्डों पर छापा पड़ता है. अब खजाने की तलाश में यह सभी जहां पहुंचते हैं, वह बृजमोहन का छिपा हुआ गोदाम है, जहां कामनवेल्थ खेलों के समय के घोटाले का सामान छिपाकर रख गया है. इसका लाइव टेलीकास्ट होता है. पुलिस व मुख्यमंत्री पहुंचते हैं. मंत्री की गिरफ्तारी सबूतों के साथ हो जाती है.

मृगदीप सिंह लांबा ने ‘‘फुकरे’’ की सफलता को भुनाने के लिए सिक्वल बनाने का निर्णय तो ले लिया, मगर वह इस बात को नजरंदाज कर गए कि ‘फुकरे’ की सफलता की वजहें क्या थी. ‘फुकरे’ में दिल्ली वाली भाषा, बात करने का तरीका और चार लड़कों द्वारा छोटी छोटी चोरियांकरना आदि सब कुछ बहुत वास्तविक लगता था, मगर ‘फुकरे रिर्टन’ में सब कुछ अति बनावटी नजर आता है. एक भी दृश्य ऐसा नही है,जिसके संग दर्शक रिलेट कर सकें.

इतना ही नहीं ‘फुकरे’ में दर्शक चारों लड़कों के साथ इस तरह रिलेट कर पाया था कि जब यह चारों भोली पंजाबन के चंगुल में फंसते हैं, तो इनसे दर्शक को सहानुभूति होती है, पर ‘‘फुकरे रिटर्न’’ यहां भी निराश करती है. फिल्म की लचर पटकथा के ही चलते फिल्म में तीन प्रेम कहानियां हैं, मगर सभी बहुत ही सतही स्तर पर हैं. फिल्म में जिस घोटाले का जिक्र किया गया है, उसे देखकर लोगों को पूर्व नेता सुरेशकलमाड़ी की याद आ सकती है. मगर इस घोटाले के मुद्दे को जिस तरह से फिल्म में पेश किया गया, उससे इसकी तरफ किसी का ध्यान नही जाता.

इंटरवल से पहले फिल्म घिसटती हुई आगे बढ़ती है. इंटरवल के बाद घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं, मगर वह दर्शक को अपनी तरफ खींच पाने में असमर्थ रहते हैं. दर्शक सोचना शुरू करता है कि फिल्म कब खत्म होगी. फिल्म का क्लायमेक्स भी दमदार नहीं है. फिल्मकार की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि उसने इस बार सारा ध्यान भोली पंजाबन, मंत्री ब्रजमोहन व चूजा पर ही लगाया, पर घटनाक्रम व हालात ठीक से गढ़े नहीं गए.

लाली व जफर के किरदारों को तवज्जो ही नहीं दी, जिसके चलते फिल्म काफी कमजोर हो जाती है. निर्देशक व पटकथा लेखक की अपनी कमजोरियों के चलते रिचा चड्ढा व पंकज त्रिपाठी जैसे बेहतरीन कलाकार भी फिल्म को संभाल नहीं पाते. फिल्म के कुछ दृश्य तो बहुत ही गलत है. आखिर चूचा वगैरह किस वजह से बार बार चिड़ियाघर में शेर के पिंजड़े के पास जाता रहता है, यह समझ से परे है. पूरी फिल्म देखने के बाद दर्शक को मनोरंजन की बजाय सिरदर्द ही मिलता है. फिल्म का गीत संगीत भी प्रभावित नहीं करता. संवाद भी कुछ खास नही है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो रिचा चड्ढा, पंकज त्रिपाठी व अली फजल ने अच्छी परफार्मेंस दी है. बाकी कलाकार बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं करते.

दो घंटे बीस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘फुकरे’’ का निर्माण फरहान अख्तर व रितेया सिद्धवानी की कंपनी ‘एक्सेल इंटरटेनमेंट’ ने किया है. निर्देशक मृगदीप सिंह लांबा, लेखक विपुल विग और मृगदीप सिंह लांबा, संगीतकार समीर उदीन, राम संपत, प्रेम हरदीप व सुमीत बेल्लारी,कैमरामैन अंद्रे मेंनेजीस तथा कलाकार हैं – रिचा चड्ढा, पंकज त्रिपाठी, अली फजल, वरूण शर्मा, पुलकित सम्राट, मंजोत सिंह, प्रिया आनंद,विशाखा सिंह, मकरंद देशपांडे व अन्य.

सोनू निगम का बयान, कहा भंसाली चमचों से घिरे हैं

संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती का पूरे देश में विरोध जारी है. बहुत से संगठन फिल्म पर पूरी तरह से बैन लगाने की मांग कर रहे हैं तो करणी सेना का कहना है कि बिना उन्हें दिखाए फिल्म को रिलीज नहीं होने दिया जाएगा.

1 दिसंबर को इस फिल्म को रिलीज होना था लेकिन आखिरी समय पर निर्माताओं ने अपना फैसला बदल लिया. आशंका जताई जा रही है कि फिल्म अब अगले साल की शुरुआत में रिलीज होगी. इस मामले पर न्यूज 18 ने गायक सोनू निगम से बातचीत की. उनका यह विडियो काफी वायरल हो रहा है.

सोनू निगम ने कहा कि संजय लीला भंसाली के साथ मैंने कभी काम तो नहीं किया लेकिन वो बहुत अच्छे इंसान हैं. फिल्म निर्माता के तौर पर उनका मकसद होता है कि पैशन के साथ ग्लैमराइज करके फिल्म को वे पेश करें. मैं आपको एक बात याद दिलाता हूं जो शायद आपको याद नहीं होगी. प्रोड्क्शन हाउस ने प्रमोशन के समय कहा था कि फिल्म में अलाउद्दीन का पद्मावती के साथ रोमांस दिखाया जाएगा, गलती दोनों तरफ से हुई हैं. पद्मावती की कहानी ऐतिहासिक है ना कि फिक्शन या माइथोलौजी पर आधारित.

पद्मावती पर विवाद बढ़ता देख संजय लीला भंसली आते हैं और यूट्यूब पर सफाई वाला एक वीडियो छोड़ जाते हैं, लोग ऐसा बोल रहे हैं कि यह उनकी मार्केटिंग रणनीति का हिस्सा है?  इस सवाल के जवाब में सोनू ने कहा- नहीं मेरे ख्याल से यह मार्केटिंग स्ट्रैटेजी का हिस्सा नहीं होगा. संजय भंसाली इससे ऊपर हैं. मेरे हिसाब से संजय भंसाली को गाइड करने वाले सहीं लोग नहीं हैं. या तो वे चमचो से घिरे हुए हैं या तो ऐसे लोग हैं जो उनसे कहते हैं कि चुप रहो.

सोनू ने आगे कहा- फतवा का जो चक्कर चल रहा है हमारे देश में, हर कोई फतवा जारी कर रहा है. इसका गला काट दो, इसके बाल काट दो. मैं इस बात पर नजर डालना चाहूंगा कि मीडिया ने ही मेरा पूरा साथ दिया जब मेरे ऊपर फतवा आए थे. इंडस्ट्री से बहुत कम लोग साथ में थे. बहुत कम लोगों ने इस बात को उठाने की जहमत कि यह जानते हुए भी कि मैं सही बात कह रहा हूं.

इस एक्ट्रेस ने किया देशभर को कामसूत्र सिखाने का दावा

बौलीवुड एक्ट्रेस और मिस इंडिया का खिताब जीत चुकी शोभिता धूलिपाला ने खुलेआम ऐलान कर दिया है कि वह पूरे देश को कामसूत्र सिखाएंगी.

आखिर ऐसा क्या हुआ जो शोभिता देशभर को कामसूत्र सिखाने पर उतारू हो गई हैं. तो आपको बता दें कि शोभिता ऐसा रियल में नहीं बल्कि उनकी आने वाली फिल्म ‘कालाकांडी’ में कहती नजर आ रही हैं.

A post shared by Sobhita Dhulipala (@sobhitad) on

अक्षत वर्मा के निर्देशन में बनी फिल्म ‘कालाकांडी’ का हाल ही में ट्रेलर रिलीज किया गया था. फिल्म के ट्रेलर में आपको एक से बढ़कर एक डायलाग सुनने को मिलेंगे.

ट्रेलर में शोभिता धूलिपाला के डायलाग “भाड़ में गई पीएचडी, भाड़ में गई स्कालरशिप. पूरे देश को कामसूत्र सिखा दूंगी.” को देखकर यह बात साफ हो जाता है कि फिल्म डार्क कामेडी और बोल्डनेस से भरपूर है.

इस फिल्म के साथ अक्षत वर्मा बतौर डायरेक्टर डेब्यू कर रहे हैं. अक्षत वर्मा ने ‘डेल्ही बैली’ की कहानी लिखी थी.  फिल्म में सैफ अली खान, शोभिता धूलिपाला, दीपक डोबरियाल, कुणाल राय कपूर, अक्षय ओबेराय, ईशा तलवार, अमायरा दस्तूर और नील भूपलम जैसे कलाकार शामिल हैं. यह फिल्म 12 जनवरी को रिलीज होगी.

A post shared by Sobhita Dhulipala (@sobhitad) on

आपकी जानकारी के लिए बता दें आंध्र प्रदेश की रहने वाली शोभिता धूलिपाला साल 2013 में मिस इंडिया का खिताब जीत चुकी हैं. 25 वर्षीय एक्ट्रेस किंगफिशर कैलेंडर 2014 में अपना जलवा दिखा चुकी हैं.

फैशन की दुनिया में अपनी खासी पहचान बनने के बाद शोभिता ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत अनुराग कश्यप की फिल्म ‘रमन राघव 2.0’ के जरिए साल 2016 में की थी. इसके अलावा शोभिता सैफ अभिनीत फिल्म ‘शेफ’ में भी नजर आ चुकी हैं. शोभिता रणवीर सिंह के साथ कंडोम ऐड में भी नजर आ चुकी हैं और अब वह ‘कालाकांडी’ में भी अपने हाटनेस का जलवा बिखेरने को तैयार हैं.

पाकिस्तान के लिए समझने, सतर्क होने का वक्त

सीआईए के निदेशक माइक पोम्पियो की बात सीधी और साफ है. पाकिस्तान अपनी सीमा के भीतर आतंकियों के आश्रयस्थल खत्म नहीं करता है, तो अमेरिका इन्हें नष्ट करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है. इसमें कुछ भी गोल-मोल नहीं है. संभव है, पोम्पियो के पास यह सब कहने का कोई खुफिया आधार हो.

इस टिप्पणी के कुछ ही घंटों के बाद अमेरिकी रक्षा सचिव जिम मैटिस अपनी एक दिनी सरकारी यात्र पर पाकिस्तान पहुंचे हैं. वे अफगानिस्तान संबंधी नई अमेरिकी रणनीति पर पाकिस्तान को मनाना चाहेंगे. शायद इसी दौरान वे पोम्पियो के बयान से अवगत कराए जाएं.

मैटिस सौहार्द के समर्थक रहे हैं. यात्रा के ठीक पहले एक पत्रकार से बातचीत में भी उन्होंने ऐसे ही संकेत दिए. अक्तूबर 2017 में उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान स्थित आतंकियों की शरणगाहों के मामले में अमेरिका एक मौका और देना चाहेगा. इसके बाद भी नतीजे न मिले, तो जो कुछ जरूरी होगा, किया जाएगा. वही बात फिर साफ हो रही है.

पाकिस्तान के पक्ष से सरकार इस दिशा में सकारात्मक है और अमेरिका से भी ऐसी ही उम्मीद है. पाकिस्तान में ड्रोन हमले सीमावर्ती फाटा क्षेत्र तक ही सीमित हैं, जबकि अमेरिका के पास देश में कहीं भी इसका इस्तेमाल करने की क्षमता है. इसमें कुछ खतरे भी अंतर्निहित हैं. मसलन, अमेरिका को लगता है कि उसे ऐसा करना चाहिए, तो वह वैसा ही करेगा. मगर यदि वह बिना पर्याप्त कारणों के पंजाब को लक्ष्य करता है, तो नतीजे गंभीर होंगे.

ऐसे में, यदि मैटिस ‘सुरक्षित ठिकानों’ की ऐसी कोई पुख्ता सूची साथ लाए हैं और पाकिस्तान उसका तार्किक खंडन न कर सका, तो चेहरा छिपाना मुश्किल होगा. क्योंकि जब कमान ट्रंप के हाथ में हो और व्हाइट हाउस शिकार पर उतारू हो, तो यह पाकिस्तान के लिए रूसी रूले खेलने का वक्त नहीं है.

मैटिस की मंशा निजी तौर पर भले ही सौहार्दपूर्ण हो, पर यह मानने में गुरेज नहीं कि यह बंद दरवाजों के पीछे चल रहे हार्ड बॉल के खेल को समझने का वक्त है. यह सोचने और स्वीकारने में कोई अतिरेक नहीं है कि हमारे संबंधों का यह संक्रमणकाल है. हम पूरी सकारात्मकता, लेकिन थोड़ी चिंता के साथ इसे देख रहे हैं.

‘पद्मावती’ विवाद : झूठी शान के नाम पर हंगामा

‘पद्मावती’ फिल्म को ले कर खड़ा किया विवाद अब थम जाएगा, क्योंकि एक तो ‘पद्मावती’ को रिलीज करने की तारीख बदल दी गई है और दूसरे, भारतीय जनता पार्टी गुजरात चुनावों में व्यस्त हो गई है. ‘पद्मावती’ को भाजपाई, भगवाई कट्टरों ने गुजरात में कट्टरपंथियों को एकजुट करने के लिए उकसाया था, जैसे 1991 में राममंदिर के नाम पर देशभर को उकसाया गया था. पहले जहां मुसलमान निशाने पर होते थे, इस बार भंसाली, दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह निशाने पर हैं.

राजपूती शान का नाम ले कर जो हल्ला मचाया गया वह निरर्थक व निरुद्देश्य था. फिल्म चाहे कोई भी, कैसा भी विषय हो, इस पर विवाद करना निरर्थक ही होता है. फिल्म बनाने पर कोई आपत्ति खड़ी करने का हक किसी को नहीं दिया जा सकता क्योंकि बनने के बाद अगर फिल्म से सहमत न हों तो उसे न देखने का हक हर किसी के पास है. फिल्मों के निर्माण पर इतना पैसा और इतनी मेहनत लगती है कि उस के न चलने का जोखिम हर कोई नहीं लेना चाहेगा.

फिल्मों को निशाना बनाना असल में नई सोच वालों पर अंकुश लगाना है. सरकार और धर्म के ठेकेदार नहीं चाहते कि फिल्मों या किताबों के जरिए कोई सच सामने आए या किसी सच की पोल खोली जाए. वे उसे देखने का हक छीनने की कोशिश करते हैं. फिल्म केवल निर्मातानिर्देशक का अपनी बात कहने का जरिया होती है. इस पर अंकुश लगाना वैसा ही है जैसा किसी हिंदू युवा का किसी मुसलिम युवती से विवाह करने की पेशकश करना.

नएपन से घबराने की कोशिश हर पुरानी सोच वाला करता है क्योंकि इसी में उस की शक्ति होती है. प्रौढ़ और वृद्ध कुछ भी, कहीं भी नया नहीं चाहते, क्योंकि उन्हें लगता है इस से कहीं उन का एकछत्र राज हिल न जाए. राजपूती गौरव की हांकने वालों को यह लग रहा था कि ‘पद्मावती’ में कुछ ऐसे राज न खुल जाएं जो राजपूती शौर्य और वीरता की पोल खोलते हैं. इतिहास को खंगालें तो यह बात साफ हो जाती है कि राजपूती आनबानशान के कसीदे फालतू में कढ़े जाते हैं वरना वे आम लोगों की तरह ही हैं जिन का समाज, रीतिरिवाजों, सोच, साहित्य, परंपराओं में गलत ज्यादा है सही कम, पर उन्होंने हल्ला कुछ ज्यादा मचा रखा है.

राजपूत राजसी इज्जत पाने के लिए अपने बारे में कुछ भी नहीं सुनना चाहते और किसी भी आवाज को, चाहे वह उन का समर्थन क्यों न करती हो, से घबराते हैं.  ‘पद्मावती’ की कहानी में कितना ही हल्ला मचा हो, यह तो स्पष्ट ही है कि राजपूत आक्रमणकारी मुसलिम राजा से हारे थे. यह बात परदे पर आएगी, ज्यादा लोग जानेंगे तो इस समय, जब हर जाति अपने अहंकार को श्रेष्ठता की चाशनी में डुबो रही है, उन पर कुछ असलियत दिखा ही जाएगी.

राजपूत युवाओं को इस फिल्म का स्वागत करना चाहिए था और यदि यह वास्तव में राजपूती शान का व्यर्थ का बखान करती है तो आलोचना भी करनी चाहिए. उन्हें अपना भविष्य बनाना है, भूत को छाती से चिपका कर अपनी श्रेष्ठता दिखाने से कुछ नहीं मिलेगा. आज का युग आगे चलने का है जब देश, धर्म, जाति, रंग, लिंग के भेद समाप्त होने चाहिए. करणी सेना के नाम पर उत्पात मचाने वाले दरअसल सभी राजपूतों को कौर्नर में सिमट जाने को मजबूर कर रहे हैं.

मेरे सपनों का कोई अंत नहीं : हुमा कुरैशी

हिंदी फिल्म ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ से सुर्खियों में आई अदाकारा हुमा कुरैशी ने धीरे धीरे अच्छीखासी शोहरत बटोर ली. उन की ‘एक थी डायन’ जैसी इक्कादुक्का फिल्मों को नजरअंदाज कर दें, तो अब तक आई सभी फिल्में सुपरहिट रही हैं. ‘बदलापुर’ जैसी फिल्म के बाद उन का कद काफी बढ़ गया था.

फिल्म ‘जौली एलएलबी 2’ में वे अक्षय कुमार के संग नजर आईं, जो काफी कामयाब रही. इस के बाद भारतपाकिस्तान के बंटवारे पर बनी फिल्म ‘पार्टीशन 1947’ में भी उन की ऐक्टिंग को काफी सराहा गया.

पेश हैं, हुमा कुरैशी के साथ हुई बातचीत के खास अंश.

आप अब तक के अपने फिल्मी कैरियर के सफर को किस तरह से देखती हैं?

मैं ने यह कभी सोचा नहीं था कि बौलीवुड में मुझे इतनी जल्दी कामयाबी मिल सकेगी, पर 5 साल के अंदर बहुतकुछ रोचक तरीके से बदल गया है.

सब से बड़ी बात यह है कि मुझे हर फिल्म में एकदम अलग तरह के किरदार निभाने के मौके मिले और हर बार लोगों ने मुझे पसंद किया. मैं ने हमेशा नईनई चुनौतियां स्वीकार की हैं. मेरे लिए हर दिन रोचक होना जरूरी है.

आप को जद्दोजेहद के दिन तो याद आते ही होंगे?

आज मैं जिस मुकाम पर हूं, वहां तक पहुंचने के लिए मुझे काफी मेहनत करनी पड़ी है. देखिए, मैं दिल्ली की रहने वाली हूं. मैं ने हिस्ट्री में औनर्स किया है. मेरे पिता दिल्ली के हैं और मां कश्मीरी हैं. मेरे 4 भाई हैं और उन के बीच अकेली बहन हूं.

मुझे अच्छी तरह से याद है कि मुंबई में अपना कैरियर बनाने के लिए मेरे पिता ने मुझे सिर्फ एक साल का समय दिया था. बौलीवुड के बारे में सभी को पता है कि यहां किस ढंग से काम होता है. मैं ने तमाम रिजैक्शन सहे. औडीशन के लिए लंबी कतारों में खड़ी हुई, पर मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है.

मुझे अपनी पहली फिल्म ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ पाने के लिए पूरे 3 साल का समय लगा था.

आप को नहीं लगता कि फिल्म ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ से जिस अंदाज में आप का कैरियर शुरू हुआ था, उसे देखते हुए तो आप को काफी आगे जाना चाहिए था?

पता नहीं, पर अगर आप को ऐसा लगता है, तो मैं इस से बहुत खुश हूं. मैं किसी भी तरह की प्लानिंग करने में यकीन नहीं करती. मेरे पास जिन फिल्मों के औफर आते हैं, उन में से जो फिल्में मुझे पसंद आती हैं, वे मैं कर लेती हूं. फिल्म ‘जौली एलएलबी 2’ के बाद हालात बदले हैं.

मगर फिल्म ‘जौली एलएलबी 2’ में तो आप का किरदार बहुत छोटा था?

इस फिल्म में नजर आने के पीछे मेरा मकसद अपने दर्शकों की तादाद को बढ़ाना था. दूसरी बात यह कि मुझे अक्षय कुमार जैसे स्टार हीरो के साथ परदे पर नजर आना था.

मैं अक्षय कुमार से काफी प्रभावित हूं. वे पिछले कुछ सालों से एक के बाद एक बहुत ही अच्छी अलग तरह की फिल्में कर रहे हैं.

मैं ने जितना सोचा था, इस फिल्म को करते हुए उस से कहीं ज्यादा बेहतर अनुभव हुए. मुझे लगता है कि मैं अपने मकसद में कामयाब रही.

आप भी मानती हैं कि जब एक कलाकार, एक स्टार कलाकार के साथ काम करता है, तभी उस फिल्म व उसे कामयाबी मिलती है?

मैं इस बात से सहमत नहीं हूं. जब मैं मुंबई आई थी, उस वक्त मैं थिएटर कर रही थी. मेरी तमन्ना महज एक फिल्म करने की थी. मुझे पहली फिल्म ‘गैंग्स आफ वासेपुर’ मिली, जो कि 2 हिस्सों में बनी थी. इस में 2 सौ कलाकार थे. उस वक्त मैं ने इस की कामयाबी की कल्पना नहीं की थी, पर यह सोच गलत है कि एक व्यावसायिक फिल्म या एक स्टार कलाकार के साथ फिल्म करने से कामयाबी मिल जाती है.

आप के अफेयर की खबरें उड़ती रहती हैं. इस में कितनी सचाई है?

वे लोग बेवकूफ हैं, जो बेवजह की खबरें उड़ाते रहते हैं. मैं अकेली लड़की हूं. मुंबई में मेरा अपना घर है, जिस में मैं अपने भाई साकिब सलीम के साथ रहती हूं. मेरे मातापिता मेरे साथ दीवार बन कर खड़े रहते हैं. पैसे के लिए मैं गलत काम नहीं कर सकती. जो काम मुझे पसंद आता है, मैं वही करती हूं.

आप के सपने क्या हैं?

मेरे कई सपने हैं. मुझे एक बायोपिक फिल्म करनी है. ऐक्शन फिल्में करनी हैं. मैं एक मैंटल लड़की का किरदार निभाना चाहती हूं. मैं इलाकाई फिल्मों में भी काम करना चाहती हूं. मेरे सपनों का कोई अंत नहीं है.

आइटम नंबर को ले कर आप की क्या सोच है?

मेरा मानना है कि अगर फिल्म में आइटम नंबर की जरूरत है, तो जरूर होना चाहिए. कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि आइटम नंबर की वजह से औरतों के साथ हिंसा हो रही है, उन के साथ बलात्कार हो रहे हैं, तो यह बात सरासर गलत है.

जेल में इस तरह हुई एक अनूठी शादी

दुलहन के लाल जोड़े में सजी देवकी बेहद खुश थी. उस की खुशियां छिपाए नहीं छिप रही थीं. खुश होती भी क्यों न, उस की शादी जो हो रही थी. शादी होना कोई नई बात नहीं थी. आमतौर पर हर युवती की शादी होती है. यह अलग बात है कि किसी की शादी जल्दी हो जाती है तो किसी की देर से होती है. देवकी की शादी में नई बात यह थी कि उस की शादी जेल में हो रही थी. वह महिला कैदी थी. जेल जाने के बाद उसे अपनी शादी की उम्मीद कम ही रह गई थी. आप ने शायद ही सुना हो कि किसी जेल में बारात आई है और शादी हुई है. लेकिन राजस्थान की कोटा जेल में इसी साल 9 मई को ऐसा ही हुआ है.

कोटा की सैंट्रल जेल में बाकायदा बारात आई, मंडप सजा और वरमाला भी हुई. पंडित ने विधिविधान से मंत्रोच्चार कर के फेरे भी कराए. जेल की ऊंची चारदीवारी में सलाखों के पीछे यह शादी राजस्थान उच्च न्यायालय के आदेश पर हुई थी.

बारां जिले के थाना कैथून के गांव गोल्याहेड़ी के रहने वाले बाबूलाल मेहर की 22 साल की बेटी देवकी अपनी भाभी ऊषा की दहेज हत्या के मामले में 27 अप्रैल, 2017 से कोटा की सैंट्रल जेल में बंद थी.

भाभी की दहेज हत्या के आरोप में उस की गिरफ्तारी होने से काफी पहले ही उस की शादी बारां जिले के थाना अंता के गांव बिशनखेड़ी के रहने वाले राधेश्याम के 23 साल के बेटे महेश से तय हो चुकी थी. दोनों की शादी 9 मई को बारां जिले में आयोजित होने वाले सामूहिक विवाह समारोह में होनी थी.

शादी के लिए दोनों परिवारों ने तैयारी भी शुरू कर दी थी. महेश जैसा जीवनसाथी मिलने पर देवकी खुश थी. वहीं महेश भी देवकी को जीवनसंगिनी के रूप में पा कर काफी खुश था. महेश रेलवे के सर्वे डिपार्टमेंट में प्राइवेट नौकरी करता था. दोनों परिवारों की सहमति से 26 अप्रैल, 2017 को लगन हो गया था, लेकिन इस के अगले ही दिन दोनों परिवारों की खुशियों पर ग्रहण सा लग गया.

पुलिस ने ऊषा की भाभी की दहेज हत्या के आरोप में उस की सास कमला देवी के अलावा ननद देवकी को 27 अप्रैल, 2017 को गिरफ्तार कर लिया था. पुलिस ने मांबेटी को गिरफ्तार कर के मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में कोटा की सैंट्रल जेल भेज दिया गया.

देवकी के भाई लड्डूलाल की शादी करीब 3 साल पहले ऊषा से हुई थी. ससुराल में संदिग्ध परिस्थितियों में उस की मौत होने से बूंदी जिले के इटोड़ा के रहने वाले ऊषा के भाई सत्यनारायण ने 24 अक्तूबर, 2016 को थाना कैथून में ऊषा की दहेज हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया था.

देवकी के जेल जाने से दोनों ही परिवारों की खुशियों पर ग्रहण लग गया था. देवकी को जमानत पर रिहा कराने के लिए उस के घर वालों के अलावा महेश के घर वाले भी कोशिश करते रहे, पर सफल नहीं हुए. स्थानीय अदालत ने जमानत देने से इनकार कर दिया.

इस के बाद देवकी की शादी को आधार बना कर राजस्थान उच्च न्यायालय में जमानत की अर्जी दाखिल की गई. लेकिन हाईकोर्ट ने भी जमानत देने से मना कर दिया. वहां से यह रियायत जरूर मिल गई कि देवकी की शादी जेल में हो सकती है.

हाईकोर्ट ने निर्देश दिए थे कि शादी के लिए वर एवं वधू दोनों पक्षों के 10 लोग 8 घंटे तक जेल में रह सकते हैं. कोटा नगर निगम के अधिकारियों को भी शादी का पंजीयन करने का आदेश दिया गया था, साथ ही कोटा सैंट्रल जेल प्रशासन को आदेश दिया गया था कि देवकी की शादी के आवश्यक इंतजाम जेल में किए जाएं.

उच्च न्यायालय के आदेश पर कोटा जेल में 9 मई को देवकी और महेश की शादी की जरूरी तैयारी की गई. मंडप सजाया गया. वर एवं वधू पक्ष के लोग जेल पहुंचे. दोनों पक्षों की महिलाओं ने देवकी को दुलहन के लाल जोड़े में सजाया. पंडित रमेशचंद्र शर्मा ने अग्नि के समक्ष मंत्रोच्चार के बीच देवकी और महेश के फेरे कराए.

सादगी से हुई इस शादी में पुलिस अधिकारी भी शामिल हुए. अधिकारियों और जेल में मौजूद सुरक्षाकर्मियों, कैदियों एवं अन्य लोगों ने नवदंपति को सुखी विवाहित जीवन का आशीर्वाद दिया. बंदी के रूप में मां कमला ने बेटी और दामाद महेश को आंसुओं के बीच आशीर्वाद दिया.

इस शादी में यह बात अजीब रही कि दूल्हा फेरे लेने के बाद भी दुलहन को अपने साथ नहीं ले जा सका. मां भी अपनी बेटी को विदा नहीं कर सकी. शादी के बाद दुलहन को जेल की बैरक में भेज दिया गया. दूल्हा महेश अकेला ही अपने घर वालों के साथ जेल से बाहर आ गया.

कोटा सैंट्रल जेल के अधीक्षक सुधीर प्रकाश पूनिया का कहना था कि किसी बंदी की जेल में शादी का शायद यह पहला मामला है. कथा लिखे जाने तक महेश अपनी दुलहन के जेल से बाहर आने का इंतजार कर रहा था.

देवकी को जमानत पर रिहा कराने के लिए दोनों ही पक्ष अदालतों के चक्कर काट रहे हैं. महेश को उम्मीद है कि देवकी को जल्द जमानत मिल जाएगी. इस के बाद दहेज हत्या के मथित मामले में देवकी के साथ अदालत इंसाफ करेगी.

प्यार का दुखद अंत

शिव सिंह उर्फ मक्कू कस्बा अकबरपुर में बन रहे अपने मकान पर पहुंचे तो उन्होंने वहां जो देखा, वह दिल दहला देने वाला था. मकान के अंदर एक लड़के और एक लड़की की लाश पड़ी थी. लाशों को देख कर ही लग रहा था कि वे प्रेमीप्रेमिका थे, क्योंकि मरने के बाद भी दोनों एकदूसरे का हाथ थामे हुए थे. शिव सिंह ने तुरंत इस बात की सूचना थाना अकबरपुर पुलिस को दी. उन्होंने यह बात कुछ लोगों को बताई तो जल्दी ही यह खबर अकबरपुर कस्बे में फैल गई. इस के बाद सैकड़ों लोग उन के मकान पर पहुंच गए. लोग तरहतरह की बातें कर रहे थे. यह 20 अप्रैल, 2017 की बात है.

थाना अकबरपुर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर ए.के. सिंह यह जानकारी अधिकारियों को दे कर तुरंत पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन के पहुंचने के थोड़ी देर बाद ही एसपी प्रभाकर चौधरी, एएसपी मनोज सोनकर तथा सीओ आलोक कुमार जायसवाल भी फील्ड यूनिट की टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

अधिकारियों के आते ही घटनास्थल का निरीक्षण शुरू हुआ. लड़की की उम्र 18-19 साल रही होगी तो लड़का 23-24 साल का था. लाशों के पास ही फिनाइल की 2 खाली बोतलें पड़ी थीं. इस से अंदाजा लगाया गया कि फिनाइल पी कर दोनों ने आत्महत्या की है. उन बोतलों को पुलिस ने जब्त कर लिया.

इस के बाद पुलिस ने वहां मौजूद लोगों से लाशों की शिनाख्त कराने की कोशिश की, लेकिन वहां इकट्ठा लोगों में से कोई भी उन की पहचान नहीं कर सका. लाशों की पहचान नहीं हो सकी तो एसपी प्रभाकर चौधरी ने एक सिपाही से लड़के की जेब की तलाशी लेने को कहा. सिपाही ने लड़के की पैंट की जेब में हाथ डाला तो उस में 2 सिम वाला एक मोबाइल फोन, बीकौम का परिचय पत्र, जो कुंदनलाल डिग्री कालेज, रनियां का था, मिला.

लड़की की लाश के पास एक बैग पड़ा था. पुलिस ने उस की तलाशी ली तो उस में से हाईस्कूल, इंटरमीडिएट की मार्कशीट, आधार कार्ड, कालेज का परिचय पत्र, बैंक की पासबुक, मोबाइल फोन, कुछ दवाएं तथा जिला अस्पताल की स्त्रीरोग विशेषज्ञ का ओपीडी का पर्चा मिला.

आधार कार्ड के अनुसार, लड़की का नाम रोहिका था. उस के पिता का नाम अजय कुमार था. वह जिला कानपुर देहात के आधू कमालपुर गांव की रहने वाली थी. लाशों की शिनाख्त के बाद एसपी प्रभाकर चौधरी ने रोहिका के आधार कार्ड में लिखे पते पर 2 सिपाहियों को घटना की सूचना देने के लिए भेज दिया.

इस के बाद लड़के की जेब से मिले मोबाइन फोन को उन्होंने जैसे ही औन किया, फोन की घंटी बज उठी. उन्होंने फोन करने वाले से बात की और उसे तुरंत अकबरपुर कस्बा स्थित जिला अस्पताल के पीछे आने को कहा.

अभी आधा घंटा भी नहीं बीता था कि एक आदमी वहां आ पहुंचा. लड़के की लाश देख कर वह सिर पीटपीट कर रोने लगा. पूछने पर उस ने अपना नाम राजेंद्र कुमार बताया. वह जिला कानपुर देहात के आधू कमालपुर गांव का रहने वाला था. वह लाश उस के बेटे अंकित उर्फ रामबाबू की थी.

एक दिन पहले यानी 19 अप्रैल, 2017 को सुबह 10 बजे अंकित कालेज जाने  की बात कह कर घर से निकला था. देर शाम तक वह घर नहीं लौटा तो उस की तलाश शुरू हुई. मोबाइल पर फोन किया गया तो वह बंद था. नातेरिश्तेदारों से पता किया गया, लेकिन अंकित का कुछ पता नहीं चला.

सवेरा होते ही उस की खोज फिर शुरू हुई. उसे कई बार फोन भी किया गया. उसी का नतीजा था कि उस का फोन मिल गया. राजेंद्र एसपी प्रभाकर चौधरी को बेटे अंकित के बारे में बता ही रहा था कि उस के साथ मरने वाली लड़की रोहिका के घर वाले भी आ गए. फिर तो वहां कोहराम मच गया.

रोहिका की मां सुनीता और बहन रितिका छाती पीटपीट कर रो रही थीं. रोहिका के पिता का नाम अजय था. उन के भी आंसू नहीं थम रहे थे. रोतेबिलखते घर वालों को सीओ आलोक कुमार जायसवाल ने किसी तरह शांत कराया और उन्हें हटा कर अपनी काररवाई शुरू की.

लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर पुलिस ने पूछताछ शुरू की. लाशों की स्थितियों से साफ था कि अंकित और रोहिका एकदूसरे को प्रेम करते थे. यह भी निश्चित था कि उन्होंने आत्महत्या की थी. उन्होंने आत्महत्या इसलिए की होगी, क्योंकि घर वालों ने उन की शादी नहीं की होगी. इस बारे में घर वालों से विस्तारपूर्वक पूछताछ की गई तो जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

कानपुर देहात के थानाकस्बा अकबरपुर का एक गांव है आधू कमालपुर. यह कस्बे से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर है. इसी गांव में अजय कुमार अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी सुनीता के अलावा 2 बेटियां रितिका और रोहिका थीं. बड़ी बेटी रितिका की शादी हो चुकी थी.

अजय सेना में नौकरी करते थे. इस समय वह असम में तैनात थे. सरकारी नौकरी होने की वजह से उन्हें अच्छा वेतन मिलता था, इसलिए घर में किसी चीज की कमी नहीं थी. उन की छोटी बेटी रोहिका काफी खूबसूरत थी. उस की इस खूबसूरती में चार चांद लगाता था उस का स्वभाव.

रोहिका अत्यंत सौम्य और मृदुभाषी थी. वह तनमन से जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही पढ़ने में भी तेज थी. अकबरपुर इंटरकालेज से इंटरमीडिएट करने के बाद वह वहीं स्थित डिग्री कालेज से बीएससी कर रही थी. पढ़ाईलिखाई और स्वभाव की वजह से वह मांबाप की आंखों का तारा थी.

अंकित भी रोहिका के ही गांव का रहने वाला था. उस के पिता राजेंद्र कुमार के पास खेती की ठीकठाक जमीन थी, इसलिए वह गांव का संपन्न किसान था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे और एक बेटी थी. संतानों में अंकित सब से छोटा था. कस्बे से इंटरमीडिएट कर के वह रानियां के कुंदनलाल डिग्री कालेज से बीकौम कर रहा था.

रोहिका और अंकित एक ही जाति के थे. उन के घर वालों में भी खूब पटती थी, इसलिए अंकित रोहिका के घर बेरोकटोक आताजाता था. इसी आनेजाने में रोहिका अंकित को भा गई. फिर तो वह कालेज आतेजाते समय उस का पीछा करने लगा.

अंकित रोहिका को तब तक चाहतभरी नजरों से ताकता रहता था, जब तक वह उस की आंखों से ओझल नहीं हो जाती थी. लेकिन रोहिका थी कि उसे भाव ही नहीं दे रही थी. धीरेधीरे अंकित के मन की बेचैनी बढ़ने लगी. हर पल उस के दिल में रोहिका ही छाई रहती थी. अब उस का मन पढ़ाई में भी नहीं लगता था.

रोहिका के करीब पहुंचने की तड़प जब अंकित के लिए बरदाश्त से बाहर हो गई तो वह उस के घर कुछ ज्यादा ही आनेजाने लगा. चूंकि घर वालों में अच्छा तालमेल था, इसलिए उस के घर आने और रोहिका से बातें करने पर किसी को ऐतराज नहीं था. उस के घर आने पर अंकित भले ही बातें दूसरों से करता रहता था, लेकिन उस की नजरें रोहिका पर ही टिकी रहती थीं.

अंकित की इस हरकत से जल्दी ही रोहिका ने उस के मन की बात भांप ली. अंकित के मन में अपने लिए चाहत देख कर रोहिका का भी मन विचलित हो उठा. अब वह भी उस के आने का इंतजार करने लगी. जब भी अंकित आता, वह उस के आसपास ही मंडराती रहती. इस तरह दोनों ही एकदूसरे की नजदीकी पाने को बेचैन रहने लगे.

अंकित की चाहतभरी नजरें रोहिका की नजरों से मिलतीं तो वह मुसकराए बिना नहीं रह पाती. इस से अंकित समझ गया कि जो बात उस के मन में है, वही रोहिका के भी मन में है. लेकिन वह दिल की बात रोहिका से कह नहीं पा रहा था.

अंकित ऐसे मौके की तलाश में रहने लगा, जब वह अपने दिल की बात रोहिका से कह सके. चाह को राह मिल ही जाती है. आखिर एक दिन अंकित को मौका मिल ही गया. उस दिन रोहिका को घर में अकेली पा कर अंकित ने कहा, ‘‘रोहिका, मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं. अगर तुम बुरा न मानो तो अपने मन की बात तुम से कह दूं.’’

‘‘बात ही कहनी है तो कह दो. इस में बुरा मानने वाली कौन सी बात है?’’ रोहिका आंखें नचाते हुए बोली. शायद उसे पता था कि वह क्या कहने वाला है.

‘‘रोहिका, तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. मुझे तुम्हारे अलावा कुछ अच्छा ही नहीं लगता.’’ नजरें झुका कर अंकित ने कहा, ‘‘हर पल मेरी नजरों के सामने तुम्हारी सूरत नाचती रहती है.’’

अंकित की बातें सुन कर रोहिका की धड़कनें बढ़ गईं. शरमाते हुए उस ने कहा, ‘‘अंकित, जो हाल तुम्हारा है, वही मेरा भी है. तुम भी मुझे बहुत अच्छे लगते हो.’’

‘‘सच…’’ कह कर अंकित ने रोहिका को अपनी बांहों में भर कर कहा, ‘‘यही सुनने का तो मैं कब से इंतजार कर रहा था.’’

उस दिन के बाद दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. रोहिका कालेज या कोचिंग जाने के बहाने घर से निकलती और अंकित से मिलने पहुंच जाती. अंकित उसे मोटरसाइकिल पर बैठा कर कानपुर शहर चला जाता, जहां दोनों फिल्में देखते, चिडि़याघर या मोतीझील घूमते और प्यार भरी बातें करते. कभी दोनों बिठूर पहुंच जाते, जहां गंगा में नौका विहार करते.

ऐसे में ही दोनों साथ जीनेमरने की कसमें खाते हुए भविष्य के सपने देखने लगे थे. मन से मन मिला तो दोनों के तन मिलने में देर नहीं लगी. समय इसी तरह बीतता रहा और इसी के साथ रोहिका और अंकित का प्यार गहराता गया. उन्होंने लाख कोशिश की कि उन के प्यार की जानकारी किसी को न हो, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया.

एक दिन रोहिका के चचेरे भाई रवि ने नहर के किनारे दोनों को इस हालत में देख लिया कि सारा मामला समझ में आ गया.

उस ने अपने परिवार की बेइज्जती महसूस की और तुरंत यह बात अपनी चाची सुनीता को बता कर चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘रोहिका और अंकित को समझा देना. अगर वे दोनों नहीं माने तो उन्हें मैं अपने ढंग से मनाऊंगा. तब बहुत महंगा पड़ेगा.’’

रोहिका की हरकत पता चलने पर सुनीता सन्न रह गई. वह घर आई तो सुनीता ने बेटी को आड़े हाथों लेते हुए कहा, ‘‘रोहिका, तुम पर तो मैं बहुत भरोसा करती थी. लेकिन तुम ने तो अभी से रंग दिखाना शुरू कर दिया. अंकित के साथ तेरा क्या चक्कर है?’’

‘‘मेरा किसी से कोई चक्कर नहीं है.’’ रोहिका ने दबी आवाज में कहा.

‘‘तू क्या सोचती है कि तेरी बात पर मुझे विश्वास हो जाएगा. जो बात मैं कह रही हूं, उसे कान खोल कर सुन ले. आज के बाद तू अंकित से बिलकुल नहीं मिलेगी और वह इस घर में कदम नहीं रखेगा. आज के बाद तूने कोई हरकत की तो तेरा बाप और चचेरा भाई तुझे जिंदा जमीन में गाड़ देंगे.’’ सुनीता ने चेतावनी देते हुए कहा.

मां ने जो कहा था, वह सच था. इसलिए रोहिका ने कोई जवाब नहीं दिया. मां बड़बड़ाती रही और वह चुपचाप उन की बातें सुनती रही. मां की चेतावनी से वह बुरी तरह डर गई थी. इस से साफ था कि मां उस के संबंधों को जान गई थी.

अजय असम में तैनात थे. कुछ दिनों बाद जब वह छुट्टी पर घर आए तो सुनीता ने उन्हें बेटी की करतूत बता दी. अजय ने उसे जम कर डांटा. चूंकि बात इज्जत की थी, इसलिए अजय ने अंकित को तो डांटा ही, उस के पिता राजेंद्र से भी उस की शिकायत की.

रोहिका पर अब कड़ी नजर रखी जाने लगी. उस का घर से निकलना भी लगभग बंद कर दिया गया था. अगर किसी जरूरी काम से कहीं जाना होता तो मां उस के साथ जाती थी. उसे अकेली कहीं नहीं जाने दिया जाता था.

कहते हैं, प्यार पर पहरा लगा दिया जाता है तो वह और बढ़ता है. शायद इसी से रोहिका और अंकित परेशान रहने लगे थे. दोनों एकदूसरे की एक झलक पाने को बेचैन रहते थे. रोहिका के प्यार में आकंठ डूबा अंकित तरहतरह के अपमान भी बरदाश्त कर रहा था.

कुछ समय बाद सुनीता को लगा कि बेटी सुधर गई है और अंकित के प्यार का भूत उस के सिर से उतर गया है तो उन्होंने उसे ढील दे दी.

ढील मिलते ही रोहिका और अंकित की प्रेमकहानी एक बार फिर शुरू हो गई. हां, अब मिलने में दोनों काफी सतर्कता बरतते थे. तमाम सतर्कता के बावजूद एक शाम रवि ने दोनों को एक साथ देख लिया. इस बार रवि आपा खो बैठा और अंकित के साथ मारपीट कर बैठा.

घर आ कर उस ने नमकमिर्च लगा कर चाची से रोहिका की शिकायत की. गुस्से में सुनीता ने रोहिका को भलाबुरा तो कहा ही, पिटाई भी कर दी. यही नहीं, उन्होंने फोन कर के सारी बात पति को भी बता दी.

अजय बेटी को ले कर परेशान हो उठा. उसे डर था कि कहीं रोहिका उस की इज्जत पर दाग न लगा दे. इसलिए किसी तरह छुट्टी ले कर वह घर आ गया. उस ने पत्नी सुनीता से इस गंभीर समस्या पर विचार किया. अंत में रोहिका का विवाह जल्द से जल्द करने का निर्णय लिया गया. दौड़धूप कर उन्होंने रोहिका का विवाह औरैया में तय कर दिया और अपनी ड्यूटी पर चले गए.

रोहिका को शादी तय होने की जानकारी मिली तो वह बेचैन हो उठी. किसी तरह इस बात की जानकारी अंकित को भी हो गई. एक दिन मौका मिलने पर वह रोहिका से मिला तो पहला सवाल यही किया, ‘‘रोहिका, मैं ने जो सुना है, क्या वह सच है?’’

‘‘हां अंकित, तुम ने जो सुना है, वह सच है. मेरे घर वालों ने मेरी मरजी के खिलाफ मेरी शादी तय कर दी है. लेकिन मैं बेवफा नहीं हूं. मैं तुम्हें जितना प्यार पहले करती थी, उतना ही आज भी करती हूं. मैं ने तुम्हारे साथ जीनेमरने की कसमें खाई हैं, उसे निभाऊंगी.’’

रोहिका की ये बातें सुन कर अंकित के दिल को थोड़ा सुकून मिला. लेकिन उस की बेचैनी खत्म नहीं हुई. अब तो उस का खानापीना तक छूट गया. उसे न दिन में चैन मिल रहा था न रात में. रोहिका पर हर तरह से पाबंदी थी, इसलिए वह उस से मिल भी नहीं सकता था. फिर भी जब कभी मौका मिलता था, वह फोन कर के बात कर लेता था.

15 मार्च, 2017 से रोहिका की परीक्षा शुरू हुई, इसलिए उस पर लगी पाबंदी हटानी पड़ी. वह परीक्षा देने अकबरपुर डिग्री कालेज जाने लगी. परीक्षा के दौरान उस की अंकित से मुलाकातें होने लगीं. लेकिन मिलते हुए दोनों काफी सतर्क रहते थे.

18 अप्रैल, 2017 को रोहिका का आखिरी पेपर था. उस दिन परीक्षा दे कर वह अंकित से मिली. तब उस ने उसे बताया कि कल उस के पापा असम से आ रहे हैं. उसे लगता है कि आते ही वह उस की शादी की तारीख तय कर देंगे. इस के पहले वह किसी और की हो जाए, वह उसे कहीं और ले चले. अगर उस ने ऐसा नहीं किया तो वह अपनी जान दे देगी. इतना कह कर वह रोने लगी.

रोहिका के गालों पर लुढ़के आंसुओं को पोंछते हुए अंकित ने कहा, ‘‘रोहिका, तुम्हें मुझ से कोई नहीं छीन सकता. हम कल ही सब छोड़ देंगे और तुम्हें ले कर अपनी अलग दुनिया बसाएंगे.’’

इस के बाद दोनों ने घर छोड़ने की योजना बना डाली. उसी योजना के तहत 19 अप्रैल, 2017 की सुबह रोहिका ने अपने बैग में शैक्षणिक प्रमाण पत्र, आधार कार्ड, बैंक की पासबुक तथा कालेज का परिचय पत्र और मोबाइल फोन रखा और मां से कालेज में जरूरी काम होने की बात कह कर घर से निकल पड़ी.

सड़क पर अंकित उस का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. उस के आते ही दोनों टैंपो में बैठ कर अकबरपुर कस्बा आ गए. रोहिका को हलका बुखार था और जी मितला रहा था. अंकित उसे जिला अस्पताल ले गया और ओपीडी में पर्चा बनवा कर महिला डाक्टर को दिखाया. महिला डाक्टर ने कुछ दवाएं रोहिका के पर्चे पर लिख दीं.

दवा लेने के बाद रोहिका कुछ सामान्य हुई तो उस ने कहा, ‘‘अंकित, हम भाग कर कहां जाएंगे? हमारे पास तो पैसे भी नहीं है. कहीं मुसीबत में फंस गए तो बड़ी परेशानी होगी. इसलिए भागना ठीक नहीं है.’’

‘‘भागने के अलावा कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं है हमारे पास.’’ अंकित ने मायूस हो कर कहा.

‘‘एक रास्ता है.’’ रोहिका बोली.

‘‘क्या?’’

‘‘घर वाले हमें साथ रहने नहीं देंगे और हम एकदूसरे के बिना रह नहीं सकते. हम साथ जीवित भले नहीं रह सकते, लेकिन साथ मर तो सकते हैं.’’

‘‘शायद तुम ठीक कह रही हो रोहिका.’’ इस के बाद दोनों ने जीवनलीला समाप्त करने की योजना बना डाली.

योजना के तहत रोहिका और अंकित अकबरपुर बाजार गए और वहां 2 बोतल फिनाइल खरीदी. इस के बाद देर शाम दोनों जिला अस्पताल के पीछे बन रहे शिव सिंह के मकान पर पहुंचे. वहां वे आधी रात तक बातें करते रहे. इस के बाद एकएक बोतल फिनाइल पी कर एकदूसरे का हाथ पकड़ कर लेट गए.

कुछ ही देर में फिनाइल ने अपना असर दिखाना शुरू किया तो दोनों तड़पने लगे. कुछ देर तड़पने के बाद उन की जीवनलीला समाप्त हो गई. दूसरी ओर शाम तक जब रोहिका घर नहीं लौटी तो सुनीता को चिंता हुई. उस ने उस के मोबाइल पर फोन किया, लेकिन फोन बंद मिला. अजय घर आए तो पतिपत्नी मिल कर रात भर बेटी की तलाश करते रहे, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला.

सुबह 10 बजे पुलिस द्वारा बेटी की मौत की सूचना मिली. इसी तरह अंकित के घर वाले भी उस की तलाश करते रहे. सुबह उन्हें भी फोन द्वारा उस के मौत की सूचना मिली. पोस्टमार्टम के बाद रोहिका और अंकित की लाशें उन के घर वालों को सौंप दी गईं. घर वालों ने अलगअलग उन का अंतिम संस्कार कर दिया. इस तरह एक प्रेमकहानी का अंत हो गया.

फिर एक बार इंटरनेट की सनसनी बनी सनी

पूर्व पोर्न स्टार और बौलीवुड एक्ट्रेस अपनी हौट अदाओं से हर दिल पर छा जाती हैं. फिल्में हो या फोटोशूट जिससे भी सनी लियोनी का नाम जुड़ता है वह खुद-ब-खुद हिट हो जाती हैं. सनी लियोनी हर युवा के दिलों की धड़कन बन गई हैं. अरे अरे ऐसा हम नहीं बल्कि उनके फैन्स कह रहे हैं. इसका सबूत है इंटरनेट.

हाल ही में आए ताजा आंकड़ों के अनुसार बताया जा रहा है कि सनी लियोनी इंटरनेट पर सबसे ज्यादा सर्च की जाने वाली बौलीवुड हीरोइन बन गईं हैं. सर्च इंजन ‘याहू’ पर इस साल सनी लियोनी को यूजर्स ने सबसे ज्यादा सर्च किया है.

बड़ी बात ये है कि लगातार दो साल से सनी लियोनी सबसे ज्यादा सर्च की जाने वाली बौलीवुड हीरोइन की लिस्ट में टाप पर हैं. जी हां, 2016 में भी ये रिकार्ड सनी लियोनी के ही नाम था.

सनी हमेशा ही अपनी बोल्ड तस्वीरों को लेकर सोशल मीडिया पर छाई रहती हैं. वह अपने फैंस को खुश रखने के लिए अपनी तस्वारें शेयर करती रहती हैं. बता दें कि जुलाई में सनी लियोनी ने बेटी निशा को गोद लिया तो अपनी बेबी गर्ल के साथ खूब सुर्खियां बटोरी तो वहीं दूसरी तरफ कुछ दिनों पहले अपने पति डेनियल के साथ सनी ने PETA के लिए न्यूड फोटोशूट करवा कर एक बार फिर से इंटनेट का गलियारा गुलजार कर दिया.

सनी लियोनी के बाद इस लिस्ट में दूसरा नंबर आता है देसी गर्ल प्रियंका चोपड़ा का. प्रियंका को सबसे ज्यादा सर्च करने का कारण उनका फिल्म ‘बेवाच’ के जरिए हौलीवुड डेब्यू करना माना जा रहा है. क्योंकि उनके हौलीवुड डेब्यू को लेकर देश के साथ साथ विदेशों में रहने वाले उनके फैंस के मन में उन्हे देखने का खास उत्साह पनप उठा था. इस लिस्ट में ही नहीं बल्कि प्रियंका चोपड़ा ने साल 2017 की सबसे शक्तिशाली महिलाओं की सूची में भी अपनी जगह बना ली है.

और अब इस लिस्ट में तीसरे पायदान पर हैं बच्चन परिवार की बहू यानी ऐश्वर्या राय बच्चन. अपनी बेटी अराध्या के साथ कांस फिल्म फेस्टिवल से मेलबर्न में तिरंगा फहराने तक हर जगह ऐश्वर्या का जादू हर तरफ बरकरार था. इसके साथ ही उनकी आने वाली फिल्म ‘फन्ने खां’ को लेकर भी ऐश्वर्या ने काफी लाइमलाइट बटोरी थीं.

चौथे नंबर पर इस लिस्ट में कैटरीना कैफ का नाम है. कैटरीना के रिलेशनशिप स्टेट्स के बारे में जानने के लिए फैंस सोशल मीडिया का रुख करते हैं. पहले एक्स व्बायफ्रेंड रणबीर कपूर के साथ ‘जग्गा जासूस’ करना तो अब सलमान खान के साथ ‘टाइगर जिंदा है’ की शूटिंग और फोटोशूट ने कैटरीना को स्पाटलाइट से हटने का मौका ही नहीं दिया.

लिस्ट में पांचवे नंबर पर है दीपिका पादुकोण. दीपिका का इंटरनेट पर सर्च किए जाने के कारण भी कम नहीं हैं. सबसे पहला कारण तो विवादों वो और उनकी फिल्म ‘पद्मावती’. दूसरा उनका हौलीवुड डेब्यू फिल्म ‘xXx: Return Of Xander Cage’. तीसरा, कांस में दीपिका के जलवे और इन सबके बाद रनबीर सिंह और रणबीर कपूर से ज्यादा फीस लेने वाली एक्ट्रेस के रूप में भी उनकी काफी चर्चा होती रही है.

करीना कपूर खान. बेटे तैमूर अली खान और प्रेग्नेंसी के बाद पहली फिल्म ‘वीरे दी वेडिंग’ को लेकर फैंस के बीच चर्चा की विषय बनी करीना इस लिस्ट में छठे स्थान पर हैं.

आपको बताते चलें की इस लिस्ट में करीना कपूर के बाद सातवें स्थान पर ममता कुलकर्णी, आठवें स्थान पर हैं दिशा पटानी, नौवें स्थान पर काव्या मधहावन और इस सूची में दसवे नंबर पर हैं ईशा गुप्ता.

किसको महंगी पड़ेगी ये जनेऊ पॉलिटिक्स

राहुल गांधी को उनके पिता राजीव गांधी की अन्त्येष्टि में जबरन जनेऊ पहनाया गया था, जो उन्होंने कपड़ों के ऊपर से पहन लिया था, यदि राहुल जनेऊ नहीं पहनते तो उन्हें अन्त्येष्टि में शामिल नहीं होने दिया जाता, भोपाल में जिस वक्त भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रमणयम  स्वामी पत्रकारों के सामने यह रहस्योद्घाटन कर रहे थे, लगभग उसी वक्त पटना में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी एक राज खोल रहे थे कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने एक सभा में सभी लोगों के जनेऊ उतरवा दिये थे. उनका कहना था कि हम लोगों के बीच गैर बराबरी नहीं होनी चाहिए.

जनेऊ से ताल्लुक रखते इन दोनों बयानों के अपने अलग सियासी माने हैं और विकट का विरोधाभास भी इनमे है. नीतीश ने बड़ी मासूमियत से यह भी पूछ डाला कि जो लोग जनेऊ नहीं पहनते हैं तो क्या वे हिन्दू नहीं. नीतीश को यह सवाल बजाय राहुल गांधी से पूछने के अपनी नई सहयोगी पार्टी भाजपा से करना चाहिए था क्योंकि जनेऊ पुराण के उठते ही वित्त मंत्री अरुण जेटली भाजपा को असली हिंदूवादी पार्टी करार देते विवाद को आहुति देने के मूड में थे, पर अपने ही खेमे के दूसरे, उनसे भी ज्यादा असली और महा हिंदूवादी नेता सुब्रमणयम स्वामी का मुंह तो वे भी पकड़ने की हिमाकत नहीं कर सकते थे, सो सोमनाथ मंदिर के रजिस्टर में कथित रूप से खुद का नाम गैर हिंदूवादियों के खाने में लिखाये जाने की राहुल गांधी की चालाकी या नासमझी कुछ भी कह लें राजीव गांधी की अन्त्येष्टि तक पहुंच गई. खुद स्वामी ने मान लिया कि राहुल गांधी जनेऊ धारी हिन्दू हैं.

इधर सोशल मीडिया पर एक दिलचस्प पोस्ट यह वायरल हो रही थी जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह रहे हैं कि अभी तो उसे जनेऊ पहनाया है, जल्द ही कांवड़ यात्रा पर भी भेज दूंगा. सोशल मीडिया की दुनिया से इतर बुद्धिजीवी खीझ  कर सोचने लगे थे कि क्या गुनाह हो गया जो राहुल गांधी सोमनाथ मंदिर चले गए और कौन से रजिस्टर के कौन से खाने में अपना नाम लिखा दिया, भगवान के मंदिरो में एंट्री रजिस्टर रखने की तुक क्या और जनेऊ … वह तो आजकल ब्राम्ह्ण भी नहीं पहनते.

असल में खुद भाजपा जनेऊ को लेकर डरी सहमी है कि यह जनेऊ का फंदा कहीं गले में न आ जाये, क्योंकि हर कोई जानता है कि जनेऊ सवर्णों और उनमे भी ब्रामहणों की पहचान हुआ करता था (और आज भी है). पिछड़ों और दलितों को जनेऊ पहनने की इजाजत नहीं है, जिसे लेकर वे कुंठित और क्रुद्ध रहते हैं और इस हद तक रहते हैं कि खुद ही जनेऊ नहीं पहनते. भीमराव अंबेडकर तो जनेऊ का खुलेआम विरोध यह कहते करते थे कि यह सूत का धागा बीस फीसदी ऊंची जाति वालों के दबदबे और पहचान की निशानी है. यह कथन भी सोशल मीडिया पर चला कि दलित आदिवासी और पिछड़े कैसे खुद को हिन्दू साबित करेंगे.

बात और विवाद इस मुकाम तक आने लगा कि हिन्दू वही है जिसके कान में ब्रम्हा, विष्णु और महेश के प्रतीक तीन धागे जनेऊ के लटके हों तो भगवा खेमे में खलबली मच गई, क्योंकि इस पैमाने पर तो सवर्ण ही हिन्दू बच रहे थे, जो गुजरात विधानसभा चुनाव के लिहाज से दलितों के गुस्से की आग में घी डालने जैसी बात थी, लेकिन धोखे से ही सही जनेऊ विवाद भगवा खेमे के गले की हड्डी बन गया है जिसे वह न उगल पा रहा न निगल पा रहा.

गैर जनेऊ धारी हिन्दू फिर हीनभावना से घिरते खुद के हिन्दू होने को लेकर असमंजस से घिर गया है जिसका तोड़ निकालने विशेषज्ञ सक्रिय हो गए हैं कि ऐसा कोई उदाहरण धर्मग्रन्थों से निकाल लाएं, जिससे यह साबित होता हो कि फलां शूद्र का यज्ञोपवीत संस्कार हुआ था. चूंकि तमाम संस्कार करवाने का ठेका ब्राह्मणों का होता है इसलिए ऐसा उदाहरण ढूँढे से नहीं मिल रहा है,  हां यह प्रचार जरूर जोर पकड़ रहा है कि धर्मग्रंथों में सभी को जनेऊ धारण करने की छूट है, लेकिन इस सवाल का जबाब नहीं मिल रहा है कि अगर ऐसा है तो छोटी जाति बाले जनेऊ क्यों नहीं पहनते.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें