नहीं खुला भोजपुरी अभिनेत्री की मौत का राज

उत्तर प्रदेश के शहर इलाहाबाद के थाना अतरसुइया के रहने वाले प्रेमप्रकाश श्रीवास्तव ने 19 जून, 2017 को अपनी बेटी अंजलि को फोन किया. अंजलि मुंबई में रह कर फिल्मों में काम करती थी. वह अंधेरी वेस्ट के जुहू लेन स्थित परिमल सोसाइटी की 5वीं मंजिल पर रहती थी. सन 2011 में वह अपने घर से एक्टिंग करने मुंबई गई थी. उस के पिता प्रेमप्रकाश श्रीवास्तव इलाहाबाद में अपना बिजनैस करते हैं और मां शीला हाउसवाइफ हैं. पतिपत्नी समयसमय पर अंजलि को फोन कर के उस की खैरखबर लेते रहते थे. वैसे वे नहीं चाहते थे कि अंजलि मुंबई जा कर रहे और एक्टिंग करे. लेकिन बेटी की इच्छा को ध्यान में रखते हुए उन्हें उस की बात माननी पड़ी थी.

अंजलि को उस के मातापिता प्यार से ‘लवी’ कहते थे. मुंबई में अंजलि ने अपने बातव्यवहार से अपने काम के लोगों से अच्छे संपर्क बना लिए थे. कोशिश कर के उसे कुछ फिल्मों में काम भी मिल गया था. उन में सब से प्रमुख भोजपुरी फिल्म ‘कच्चे धागे’ थी. इस के बाद उस की कुछ और भी फिल्में आईं, जिन में ‘दम होई जेकरा में ओही गाड़ी खूंटा’, ‘लहू के दो रंग’, ‘दीवानगी हद से’, ‘केहू ता दिल में बा’, ‘अब होई बगावत’ और ‘ठोक देब’ प्रमुख थीं.

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अंजलि ने हिंदी फिल्म ‘धानी का डीजे कैम’ में भी काम किया था. उस ने करीब आधा दरजन हिंदी फिल्मों में काम किया था, बावजूद इस के उस की ऐसी कोई पहचान नहीं बन पाई थी, जिस से उसे किसी अच्छे बैनर की फिल्म मिलती.

अंजलि इस कोशिश में थी कि उसे कोई लीड रोल वाली फिल्म मिल जाए, पर उसे ऐसी फिल्म नहीं मिल रही थी. ज्यादातर फिल्मों में उसे साइड रोल ही मिल रहे थे. घर वालों से मिलने वह 4-5 महीने में इलाहाबाद आती रहती थी.

फरवरी, 2017 में जब वह घर आई थी तो काफी खुश थी. उसे उम्मीद थी कि अब उस के घर वाले गर्व से कह सकेंगे कि उन की बेटी फिल्म एक्ट्रेस है. कुछ लोगों ने कई फिल्मों में अंजलि के काम को देखा तो उस की काफी तारीफ की. इस से उसे उम्मीद थी कि अब उसे बड़ी फिल्में मिल जाएंगी. कुछ दिन घर में रह कर वह मुंबई चली गई थी. जब भी उसे टाइम मिलता था, वह घर वालों से फोन पर बात कर लेती थी.

फिल्मों की दुनिया का ग्लैमर तो हर किसी को दिखता है, लेकिन परदे के पीछे का दर्द कम ही लोग जानते हैं. वह दर्द कई बार कलाकार को हताश और निराश कर देता है. उस हताशा और निराशा में कुछ कलाकार संयम से काम ले कर खुद को उबार लेते हैं तो कुछ उसी में उलझ कर दम तोड़ देते हैं. कहने को अपनी मौत का वह खुद ही जिम्मेदार होता है, पर असल में इस के लिए समाज की व्यवस्था जिम्मेदारी होती है.

भोजपुरी फिल्मों की दुनिया भी कुछ ऐसी ही रचीबसी है. छोटेछोटे शहरों के बहुत सारे युवा तरहतरह के सपने ले कर मुंबई पहुंचते हैं. वहां पहुंच कर कोई हीरो बनना चाहता है तो कोई हीरोइन, कोई विलेन बनना चाहता है तो कोई पुलिस वाला. किसी को गायक बनना होता है तो कोई डायरेक्टर बनने की कोशिश में रहता है.

लेकिन मुंबई आने वाले हर कलाकार की ख्वाहिशें पूरी नहीं हो पातीं. अगर हर साल बनने वाली फिल्मों की संख्या की बात करें तो यहां हर साल 100 से अधिक फिल्में बनती हैं. अपनी कहानी, गानों और द्विअर्थी संवादों के कारण ज्यादातर फिल्मों को ए-सर्टिफिकेट दिया जाता है.

वैसे भोजपुरी फिल्मों का सब से बड़ा बाजार बिहार, झारखंड ही है. अब उत्तर प्रदेश, पंजाब, दिल्ली और मुंबई में भी ये फिल्में चलने लगी हैं. मुंबई में हर साल हीरो और हीरोइन बनने वाले लड़केलड़कियों की लंबी कतार लगी होती है. फिल्में बनाने वाले ऐसे निर्मातानिर्देशक ज्यादा हैं, जो कम बजट की फिल्में बनाते हैं.

इन में अधिकांश फिल्में तो सिनेमाघरों तक पहुंच ही नहीं पातीं. ऐसे में इन फिल्मों में काम करने वाले कलाकारों को बड़ी निराशा होती है. क्योंकि वह यही सोचते हैं कि उन की फिल्म रिलीज होगी तो लोग उन के काम को देखेंगे और पसंद करेंगे. इस के बाद उन्हें और फिल्मों में काम मिलेगा.

भोजपुरी फिल्मों पर आज भी पुरुष प्रधान समाज का कब्जा है. ज्यादातर गायक, जो फिल्मों में हीरो बनते हैं, वही कब्जा किए हुए हैं. ये लोग अपने साथ काम करने वालों की एक लौबी बनाए होते हैं, जिस से नए कलाकार के लिए काम करना मुश्किल हो जाता है.

अंजलि फेसबुक के जरिए अपने घर वालों से जुड़ी थी. उस की मां समयसमय पर मुंबई में उस के पास रहने के लिए जाती रहती थीं. अंजलि मां को घुमाने के लिए कभी बीच पर ले जाती थी तो कभी सिद्धिविनायक मंदिर. 6 जून को अंजलि के मातापिता की शादी की सालगिरह थी. उस ने फेसबुक पर अपनी यादों का एक एलबम शेयर करते हुए मम्मीपापा को बधाई दी थी.

29 साल की अंजलि की नई फिल्म ‘केहू ता दिल में बा’ रिलीज हो चुकी थी. वह अब नए प्रोजैक्ट की तैयारी में थी. 8 जून को अंजलि ने अपने फेसबुक पेज पर एक शेर लिखा था, ‘उस के साथ जीने का एक मौका दे दे खुदा, तेरे साथ तो मरने के बाद भी रह लेंगे.’

अंजलि की इस पोस्ट को उस समय दोस्तों ने ऐसे ही समझा था. कई ने पूछा भी था कि कौन है वह, जिस के लिए उस ने यह शेर लिखा है.

19 जून, 2017 की बात है. अंजलि के मोबाइल पर उस की मां शीला ने फोन किया. घंटी बजने के बाद भी अंजलि ने फोन रिसीव नहीं किया तो शीला ने कई बार फोन किया. हर बार उस के फोन की घंटी बजी, पर फोन नहीं उठा. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. जब कभी अंजलि व्यस्त होती थी तो फोन रिसीव कर के कह देती कि ‘मम्मी मैं अभी बिजी हूं. बाद में काल कर लूंगी.’

बेटी द्वारा फोन न उठाने से शीला परेशान हो गईं. उन्होंने उसी समय पति प्रेमप्रकाश श्रीवास्तव को पूरी बात बताई. प्रेमप्रकाश ने भी अंजलि को फोन किया. पूरी घंटी बजने के बाद भी फोन नहीं उठा तो परेशान हो कर उन्होंने उस की सोसाइटी के नंबर पर संपर्क किया.

सोसाइटी वालों ने डुप्लीकेट चाबी से अंजलि का कमरा खोला तो कमरे के अंदर अंजलि पंखे से लटकी मिली. सोसाइटी वालों ने यह जानकारी फोन द्वारा पुलिस को दी और अंजलि को लीला कपूर अस्पताल ले गए, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

अंजलि के घर वालों को जैसे ही यह खबर मिली, वे मुंबई पहुंचे. मुंबई पुलिस की एसीपी रश्मि कारदिंकर ने बताया कि मृतका के पास से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है. पुलिस को अपनी जांच में हत्या से संबंधित कोई सबूत नहीं मिला. ऐसे में इस मामले को आत्महत्या ही माना गया.

एक युवा अभिनेत्री, जो कुछ साल पहले बहुत सारे सपने ले कर मुंबई गई थी, उन सपनों का अंत हो चुका था. अंजलि के साथ काम करने वाले कई कलाकार इस घटना से बहुत आहत थे. वे कह रहे थे कि अंजलि बहुत ही मिलनसार और हंसमुख थी. उस में फिल्मनगरी वाली चालाकियां नहीं थीं. शायद यही वजह रही कि वह इस दुनिया की चालबाजियों को समझ नहीं पाई.

अंजलि को अपने काम और टैलेंट पर भरोसा था. वह इस उम्मीद में थी कि एक बार उसे अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिल जाए तो वह दुनिया को दिखा देगी कि उस में भी अभिनय क्षमता है. फिल्म जगत के कई लोगों ने उसे भरोसा दिलाया था कि वह उसे अपनी फिल्म में काम देंगे. जब अंजलि के भरोसे को ठेस लगी तो उस के सामने दुनिया के रंगमंच को अलविदा कहने के अलावा कोई रास्ता नहीं दिखा.

अंजलि के इस फैसले से भोजपुरी फिल्मों की दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ा. वहां हर काम अपनी गति से चल रहा है. प्रभाव पड़ा है तो अंजलि के परिवार, उस के मातापिता और भाईबहन पर. वह इस हादसे से टूट गए हैं. घटना के कई महीने बीत जाने के बाद भी वे अभी कुछ बोलनेसमझने की हालत में नहीं हैं. उन्हें आज भी अपनी प्यारी बेटी की याद आती है तो लगता है लवी अभी आने वाली है.

अंजलि के बिना मुंबई से वापस आते समय उस की मां ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा था, ‘मुंबई कभी दोबारा आना नहीं होगा’. बेटी की याद पूरे परिवार को बारबार सताती है. 13 जुलाई को अंजलि के जन्मदिन पर उस की मां ने फेसबुक पर बेटी को बधाई देते हुए पूछा था, ‘क्या अब तुझ को मेरी याद नहीं आती?’

मां के लिए बेटी बहुत बड़ा सहारा थी. बेटी ऐसे हार जाएगी, यह कभी उन्होंने सोचा भी नहीं था. यही वजह है कि मां को इस बात का विश्वास नहीं हो रहा कि अंजलि अब इस दुनिया में नहीं है.

धर्मों के स्वार्थी ठेकेदार

लव जिहाद का नाम ले कर शादियों में अड़चनें डालने वाले यह नहीं समझ पा रहे हैं कि आज से नहीं, सदियों से दूसरी संस्कृतियों, भाषाओं, सीमाओं और धर्मों में विवाह किया जाना असल में समाज को एक नई दिशा देता है. जब अलग संस्कृतियों और देशों के बीच विवाह होते हैं तो बहुत से पुल बन जाते हैं.

जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के चचेरे भाई इसाओ आबे की पत्नी कल्पना दक्षिण भारतीय हैं जो पहले वाशिंगटन में थीं और अब जापान की पेंट कंपनी कानसाई पेंट में वाइस प्रैसिडैंट हैं. वे अब दोनों देशों के बीच पुल बन रही हैं. शिंजो आबे उन की राय भारतीय मामलों तक में लेते हैं.

हमारे कट्टरपंथियों के आदर्श सुभाष चंद्र बोस की आस्ट्रियन पत्नी एमिली शेंकल थीं जिन से सुभाष चंद्र बोस ने 1937 में विवाह किया था. उन की पुत्री अनीता बोस ने भी एक विदेशी मार्टिन पफ से विवाह किया था.

महापंडित राहुल सांकृत्यायन का बाल विवाह हुआ था पर उन्होंने फिर मंगोल मूल की रूसी एलेना नार्वे नारवेरतोवना कोजेरोवसकाया से शादी की थी. बाद में राहुल ने नेपाली लड़की से भी विवाह किया.

धर्म के दुकानदार यह भी नहीं चाहते कि विधर्मी से विवाह कर के विवाह, बच्चे होने या विवाहित युगल के बच्चों की शादियों के समय मिलने वाली मोटी दक्षिणा उन के हाथ से निकले.

संस्कृति का नाम ले कर जो हल्ला मचाया जा रहा है वह कोरी दुकानदारी है. वैसे तो हिंदू धर्म के सभी ठेकेदार समयसमय पर विदेशों में जा कर विदेशी संस्कृति से दूषित हो गए क्योंकि वे वहां विदेशी नागरिकता प्राप्त भारतीयों को बुला कर हिंदुत्व पर घंटों भाषण देने से कतराते नहीं. बस, उन्हें रहने की सुविधा, आनेजाने का टिकट और मोटी दक्षिणा मिलती रहे. हिंदू संस्कृति के अनुसार तो समुद्र पार करना भी निषेध है.

पहले इस तरह के मामले केवल धर्म की दुकानदारी के नाम पर होते थे पर अब, इसलामी देशों की देखादेखी, धर्म और राजनीति में मिक्सर चल गया है और यह कंक्रीट देश पर थोपी जा रही है. यह कंक्रीट मजबूत तो हो सकती है पर इस पर कुछ उगता नहीं है, न उत्पादन, न सोचविचार.

भोजपुरी फिल्म की ये एक्ट्रेस ‘निमकी मुखिया’ में लगाएंगी ठुमके

भोजपुरी फिल्म की सुपरस्टार एक्ट्रेस मोनालिसा अब जल्द ही टीवी शो पर दिखाई देने वाली हैं. जी हां, मोनालिसा अब भोजपुरी फिल्मों में अपना जादू चलाने के बाद स्टार भारत पर आने वाले शो ‘निमकी मुखिया’ में भी जलवा बिखेरते नजर आएंगी. ‘निमकी मुखिया’ में वह डांस करती हुई नजर आने वाली हैं.

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‘निमकी मुखिया’ का प्रसारण टेलीविजन चैनल स्टार भारत पर होता है. फिलहाल वह सिर्फ एक या दो एपिसोड के लिए वहां पहुंचने वाली हैं.

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बता दें कि मोना का असली नाम अंतरा बिस्वास है- वह निमकी (भूमिका गुरूंग) और बब्बू सिंह (अभिषेक शर्मा) की सगाई समारोह में गीत ‘आ रे प्रीतम प्यारे’ पर थिरकती नजर आएंगी.

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अंतरा बिस्वास ने कहा कि मैं केवल एक गीत के लिए इस धारावाहिक में शामिल हुई हूं. शूटिंग के दौरान मेरा पूरा अनुभव बेहद ही अद्भुत रहा. ‘निमकी मुखिया’ की पूरी टीम उत्साहजनक और स्वागत करने वाली थी. मुझे उनका पूरा सेटअप पसंद आया, खासतौर पर डांस के लिए तैयार की गई मेरी पोशाक. उम्मीद है मेरा डांस नंबर दर्शकों को पसंद आएगा.

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बता दें कि पिछले साल मोनालिसा बिग बौस 10 में नजर आईं थी, जहां से उन्हें काफी पौपुलरिटी मिली. अंतरा ने 125 से भी ज्यादा भोजपुरी फिल्मों में काम किया है.

टाइगर जिंदा हैः सलमान खान का शानदार अभिनय

पिछले कुछ वर्षों से सलमान खान की हर फिल्म में कोई न कोई संदेश जरुर होता है. उसी परिपाटी का निर्वाह एक्शन प्रधान फिल्म ‘‘टाइगर जिंदा’’ है में भी किया गया है. अली अब्बास जफर निर्देशित फिल्म ‘‘टाइगर जिंदा है’’ 2012 की कबीर खान निर्देर्शित सफल फिल्म ‘‘एक था टाइगर’’ का सिक्वअल है. ‘‘ट्यूबलाइट’’ से निराश हुए सलमान खान के प्रशंसकों को फिल्म ‘टाइगर जिंदा है’ पसंद आएगी.

फिल्म की कहानी अविनाश सिंह राठौर उर्फ टाइगर (सलमान खान) और उनकी पत्नी जोया (कटरीना कैफ) के इर्द गिर्द घूमती है. दोनों खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं. फिल्म की शुरूआत में टाइगर अपने बेटे के साथ भेड़ियो के एक दल से लड़ रहा है. उधर सीरिया में चल रहे युद्ध की पृष्ठभूमि में इराक में आईएसी नामक आतंकवादी संगठन के मुखिया अबू उस्मान(सज्जाद डेलफ्रूज) घायल हो जाता है,तब उसका इलाज करने के लिए नर्सों को ले जा रही एक बस का अपहरण कर इन नर्सों को एक अस्पताल में बंदी बना लिया जाता है. इन नर्सों में 15 पाकिस्तानी और 25 भारतीय नर्सें हैं. दुनिया की इस खतरनाक आतंकवादी संगठन के चंगुल से अब इन नर्सों को बचाना असंभव माना जा रहा है. तब रौ के उच्चाधिकारी शेनाय (गिरीष कर्नाड), टाइगर को इराक में बंधक बनायी गयी 25 नर्सों को बचाने के मिशन पर भेजते हैं.

टाइगर के साथ मेजर नवीन(अंगद बेदी) सहित तीन चार लोग हैं. अस्पताल के अंदर घुसने की फिराक में टाइगर घायल हो जाता है, तो वहां पर जोया आकर उसकी मदद करती है. उधर जोया के ही कारण पाकिस्तानी आईएसआइ एजेंट जहीर(सुदीप) से टाइगर मिलता है और दोनों मिलकर आतंकवादियों का सफाया करने का निर्णय लेते हैं.

जहां तक कहानी का सवाल है, तो फिल्म में कहानी का घोर अभाव है, मगर फिल्म में एक्शन इतना अधिक और बेहतरीन है कि एक्शन ही दर्शकों को बांधकर रखता है. फिल्म में एक्शन दृष्य भारी मात्रा में है. हौलीवुड एक्शन निर्देशक टौम स्टूथर्स ने कार का पीछा करना, बम विस्फोट, तेल टैंकरों में आग लगाना,  गोलियों का चलना जैसे एक्शन दृश्यों का कुशल निर्देशन कर एक्षन दृश्यों को देखने योग्य बनाया है. बेहतरीन स्पेशल इफेक्ट्स व वीएफ एक्स की वजह से यह सारे एक्शन दृश्य काफी बेहतर बन पड़े हैं.

फिल्म का क्लायमेक्स अस्वाभाविक लगता है. जहां टाइगर अकेले ही अपनी गन से सौ से अधिक आईएससी के आतंकवादियों को भूनकर रख देता है. इसी तरह यह बात गले नहीं उतरती कि आईएसी के ढेर सारे आतंकी टाइगर की छोटी टीम से लड़ नही पाते.

फिल्म में सलमान खान है, तो स्वाभाविक तौर पर देशभक्ति की बात तो होनी ही है. वह समय समय पर अपने साथियों को इस बात की याद दिलाते रहते हैं. फिल्म में भारतीय रौ एजेंट और पाकिस्तानी आइएसआइ एजेंट मिलकर लड़ते हैं, यानी कि रौ व आईएसआइ के बीच प्रेम मोहब्बत दिखायी गयी है. फिल्म में मानवता की भी बात की गयी है.

निर्देशक अली अब्बास जफर का काम कुछ ढीला ढाला सा है. फिल्म के कैमरामैन मार्किन लास्कावी और पार्श्व संगीतकार ज्यूलियस पक्कियम बधाई के पात्र हैं. कैमरामैन मार्किन लास्कावी ने उम्दा काम किया है, जिसके चलते रेगिस्तान के दृश्य हों या पहाड़ के दृश्य हों, सभी बहुत खूबसूरत बने हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो सलमान खान ने अपनी पिछली फिल्म ‘‘सुल्तान’’ से भी कहीं ज्यादा बेहतरीन परफार्मेंस दी है. एक्शन दृष्यों में कटरीना कैफ प्रभावित करती हैं, मगर भावना प्रधान दृश्यों में उनका चेहरा पत्थर की मूर्ति की तरह नजर आता है. परेश रावल, कुमुद मिश्रा, अंगद बेदी ने भी काफी अच्छी परफार्मेंस दी है. अबू उस्मान के किरदार में सज्जाद डेलफ्रूज एकदम सही बैठे हैं.

दो घंटे 41 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘टाइगर जिंदा है’’ का निर्माण ‘‘यशराज फिल्मस’’ के बैनर तले आदित्य चोपड़ा ने किया है. फिल्म के निर्देशक अली अब्बास जफर, कहानी व पटकथा लेखक अली अब्बास जफर व नीलेष मिश्रा, संगीतकार विशाल शेखर, पार्श्व संगीतकार ज्यूलियस पक्कियम, कैमरामैन मार्किन लास्कावी तथा फिल्म को अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं- सलमान खान, करीना कैफ, सज्जाद डेलफ्रूज, संदीप अंगद बेदी, कुमुद मिश्रा, गिरीश कर्नाड, अंजली गुप्ता, नेहा हिंगे, इवान रौड्रिग्स व नवाब शाह हैं. फिल्म को आबू धाबी, आस्ट्रीया, ग्रीस और मरक्को में फिल्माया गया है.

बिहार : सृजन घोटाला, सरकार का मुंह काला

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 18 अगस्त को सृजन घोटाले की जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश कर दी. इस घोटाले में कई सरकारी बैंक भी लिप्त हैं. मामले में अब तक 10 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं. 9 एफआईआर भागलपुर में और 1 सहरसा में दर्ज की गई हैं. 12 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है और अब तक 1,200 करोड़ रुपए से ज्यादा के घोटाले का पता चला है. जांच में लगे अफसरों को घोटाले की रकम के और बढ़ने की आशंका हैं.

18 अगस्त को बैंक औफ बड़ौदा के सहायक मैनेजर अतुल रमण को गिरफ्तार किया गया. साल 2013 में अतुल की बहाली हुईर् थी. एसआईटी की टीम ने भागलपुर के परबत्ती इलाके में स्थित उस के घर से उसे उठाया.

अतुल ने एसआईटी को बताया कि वह सृजन महिला विकास समिति भागलपुर की संचालिका मनोरमा देवी के इशारों पर काम कर रहा था. उस की नौकरी नई थी, इस वजह से उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था और वह मनोरमा देवी के निर्देशों का पालन भर कर रहा था.

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अतुल पर आरोप है कि वह सरकारी रकम को सृजन के खाते में ट्रांसफर करवाने में मुख्य भूमिका अदा करता था. उस के बदले उसे मनोरमा देवी से मोटा कमीशन मिलता था.

अप्रैल महीने में उस ने तिलकामांझी खानपट्टी में रहने वाली बीबी हुजमान निगार नाम की महिला से इशाकचक थाना के बरहपुरा महल्ले में 51 लाख रुपए में एक मकान खरीदा था. अतुल की पत्नी जूली के नाम पर बैंक औफ बड़ौदा के खाते में 5 लाख 12 हजार रुपए जमा हैं. इस के अलावा तिलकामांझी के बैंक औफ इंडिया में 1 लाख रुपए समेत ततारपुर और स्टेट बैंक के सिटी ब्रांच और यूको बैंक में उस के और उस की पत्नी के नाम पर काफी रुपए जमा हैं. अतुल और उस की पत्नी के पास 10 लाख 5 हजार रुपए के गहने हैं.

अतुल ने एसआईटी के सामने कुबूल किया कि बैंक औफ बड़ौदा के सीनियर मैनेजर वरुण कुमार सिन्हा और रिटायर सहायक संत कुमार सिन्हा बैंक के सरकारी खातों को देखते थे और वही दोनों सृजन के खाते में रुपए ट्रांसफर करते थे.

अतुल का दावा है कि सरकारी खातों में कई गड़बडि़यां देख कर उस ने वरुण कुमार सिन्हा से इस की शिकायत की थी तो कहा गया कि खातों को देखने का काम उस का नहीं है. जैसा कहा जाता है, वैसा करते रहो. अतुल ने घोटाले में बैंक के पूर्व मैनेजर जी पी पांडा, सरफराउद्दीन, अरुण कुमार सिंह, इंडियन बैंक के अजय कुमार पांडे, मनोरमा देवी का ड्राइवर अंसार और वंशीधर समेत कई नामों का खुलासा किया है.

सृजन की सचिव प्रिया कुमार और उस के पति अमित कुमार की गिरफ्तारी के लिए पुलिस पटना, दिल्ली, रांची और बेंगलुरु में छापामारी कर रही है. मनोरमा देवी की बहू प्रिया कुमार रांची के एक बड़े कांग्रेसी नेता की बेटी है. उस नेता का एक रिश्तेदार केंद्र सरकार में मंत्री भी है. केंद्र में उन के मंत्री रहते हुए सृजन को केंद्र सरकार की कई योजनाएं मिली थीं. पुलिस इस की भी छानबीन कर रही है. मनोरमा के बेटे अमित कुमार के बारे में पुलिस को जानकारी मिली है कि दिल्ली में अमित कोई कार्यक्रम करता तो केंद्रीय मंत्री उस में शामिल होते थे.

सृजन घोटाले की किंगपिन मनोरमा देवी के बेटे अमित कुमार और उस की पत्नी प्रिया पुलिस को लगातार चकमा देने में कामयाब रहे हैं. दोनों अपने करीबियों से फोन के बजाय व्हाट्सऐप से बातें कर रहे हैं, जिस से पुलिस को उन का लिंक नहीं मिल रहा है. बिहार पुलिस के अनुरोध पर अमित और प्रिया के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया गया है.

हैरत की बात यह है कि पद्म सम्मान के लिए भी मनोरमा देवी दावा कर चुकी थी. 1,200 करोड़ रुपए के महाघोटाले की मास्टरमाइंड और सृजन की संस्थापिका मनोरमा ने वर्ष 2016 के पद्म सम्मान के लिए गृह मंत्रालय को आवेदन भेजा था. 13 फरवरी, 2017  को मनोरमा की मौत हो गई. सृजन एनजीओ को बनाना और उस से 6 हजार महिलाओं को जोड़ कर उन्हें स्वरोजगार मुहैया कराने का आधार बना कर आवेदन किया गया था.

घोटाले का खेल

सृजन महिला विकास सहयोग समिति नाम के एनजीओ के जरिए घोटाले का खेल साल 2006-07 में ही शुरू हो चुका था. घोटाले से परदा हटने में करीब 10 वर्ष लग गए और घोटालेबाज चांदी काटते रहे. भागलपुर जिला प्रशासन को विभिन्न योजनाओं की रकम सरकार द्वारा भेजी जाती थी. भागलपुर जिला प्रशासन के बैंक खातों में पहुंची रकम को प्रशासन द्वारा विभिन्न योजनाओं के लिए खोले गए सरकारी बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिया जाता था. घोटाले की नींव वहीं से पड़ी.

अफसरों के फर्जी हस्ताक्षर से इन बैंकों के खातों से रुपए सृजन के खातों में ट्रांसफर कर दिए जाते थे. एनजीओ द्वारा रुपयों को बाजार में ब्याज पर लगाया जाता था. जब किसी योजना के लिए राशि की निकासी का चैक जारी होता तो उतना रुपया एनजीओ द्वारा संबंधित खाते में डाल दिया जाता था. यह खेल पिछले 10-11 सालों से चल रहा था.

एनजीओ की संचालिका मनोरमा देवी की फरवरी 2017 में मौत हो गई. उस के बाद सरकार द्वारा लाभार्थियों को देने वाले चैक बाउंस होने लगे. जांच में पता चला कि सरकारी खातों में तो रुपए हैं ही नहीं, जबकि बैंक स्टेटमैंट में रुपया होने की बात कही जाती थी. मनोरमा देवी की मौत के बाद खेल बिगड़ गया और सारे मामले का खुलासा होने लगा. जांच में पाया गया है कि भागलपुर सैंट्रल कोऔपरेटिव बैंक का इंडियन बैंक के खाते में रखे 30 करोड़ 17 लाख 52 हजार रुपए और बैंक औफ बड़ौदा में रखे 17 करोड़ 94 लाख 85 हजार रुपए गायब हैं. दोनों बैंकों के स्टेटमैंट में तो रुपया दिखा रखा है, लेकिन खाते से रुपया गायब है.

एडीजी (हैडक्वार्टर) संजीव कुमार सिंघल ने बताया, ‘‘मनोरमा देवी की मौत के बाद सृजन से जुड़े अकाउंट डिसऔर्डर होने लगे, तो हंगामा खड़ा हो गया. जब मामले की जांच की गई तो पिछले 10 वर्षों से हो रहे घोटाले का भंडाफोड़ होने लगा.’’

बैंक और प्रशासनिक अफसरों की मिलीभगत से हुए इस घोटाले में दर्जनों अफसरों और सृजन महिला विकास सहयोग समिति लिमिटेड के तमाम पदधारकों के खिलाफ जालसाजी, धोखाधड़ी और फर्जी निकासी के मामले भागलपुर के तिलकामांझी थाने में दर्ज कराए गए.

एफआईआर में भागलपुर के 3 पूर्व जिलाधीशों नर्मदेश्वर लाल, संतोष कुमार मल्ल और विपिन कुमार के जाली हस्ताक्षर से बैंक प्रबंधकों द्वारा सृजन के खाते में रकम ट्रांसफर करने का आरोप लगाया गया है. नर्मदेश्वर लाल के फर्जी दस्तखत से 20 करोड़ रुपए और संतोष मल्ल व विपिन कुमार के जाली दस्तखतों से 5-5 करोड़ रुपए की निकासी की गई थीं.

आर्थिक अपराध इकाई के आईजी जितेंद्र सिंह गंगवार कहते हैं, ‘‘जिला भू अर्जन विभाग और जिला नजारत के खातों से सरकारी रकम का गोलमाल हुआ है. इन विभागों के लेखा अधिकार और मुलाजिम घोटाले में शामिल हैं. इस के साथ ही इंडियन बैंक और बैंक औफ बड़ौदा के मुलाजिम भी इस में शामिल हैं. सृजन घोटाला के जरिए जहां दोनों बैंकों को मोटा बिजनैस मिल रहा था वहीं बैंक के अफसरों और मुलाजिमों की जेबें भी गरम हो रही थीं.’’

अफसरों की मिलीभगत

सवाल उठता है कि इतने बड़े घोटाले का खेल पिछले एक दशक से चल रहा था और किसी को भनक तक नहीं लगी? सरकारी खाते में रकम जाते ही उसे तुरंत कैसे सृजन के खाते में ट्रांसफर कर दिया जाता था? सालाना औडिट में भी इस घोटाले का पता क्यों नहीं लग पाता था?

मुख्यमंत्री नगर विकास योजना की 12 करोड़ 20 लाख रुपए की राशि जब इंडियन बैंक के सरकारी खाता नंबर-6268727981 में जमा होनी थी तो किस ने और कैसे उस राशि को सृजन महिला विकास सहयोग समिति के खाते में जमा करवा दिया? प्रशासन और बैंक अफसरों की सांठगांठ के बगैर ऐसा मुमकिन ही नहीं है. वहीं दूसरी ओर, सृजन की ओर से करीब ढाई वर्षों बाद उसी सरकारी खाते में 20 करोड़ रुपए जमा कर दिए गए. आखिर सरकारी खाते में आरटीजीएस के जरिए इतनी बड़ी रकम क्यों जमा की गई?

सृजन के जरिए करोड़ों रुपयों के घोटाले का पैसा रियल स्टेट कारोबार में लगाया गया है. सरकारी खातों से सृजन के खाते में जमा की गई रकम में से करोड़ों रुपए दूसरे राज्यों में भी ट्रांसफर किए गए हैं. आरटीजीएस और चैक के जरिए दिल्ली, गाजियाबाद, गुड़गांव, ओडिशा और झारखंड के रियल स्टेट कंपनियों को रुपए दिए गए हैं.

घोटाले से भरी तिजोरियां

सृजन घोटाले की रकम की सूंड़ धीरेधीरे बढ़ती ही जा रही है. यह 1,200 करोड़ रुपए के आसपास पहुंच चुकी हैं और इस के अभी भी बढ़ने की आशंका है. घोटाले में शामिल भागलपुर जिला कल्याण पदाधिकारी अरुण कुमार का मासिक वेतन 60 हजार रुपए हैं जबकि वह करोड़ों की संपत्ति का मालिक बन बैठा है.

पटना के श्रीकृष्णपुरी महल्ले के भगवान कुंज अपार्टमैंट के फ्लैट नंबर 205 में ईओयू ने छापा मारा तो 45 लाख रुपए नकद, करोड़ों रुपए के गहने, अलगअलग बैंकों की 19 पासबुकें बरामद की गईं. पटना के शास्त्रीय महल्ले के आदर्श नगर में अरुण के नाम से जमीन है और बारीपथ में 1 करोड़

15 लाख रुपए की 2 दुकानें हैं. फ्रेजर रोड के डुंडा शाही कमर्शियल कौंपलैक्स में 2 दुकानें उस के नाम से हैं, जिन की कीमत 2 करोड़ रुपए के करीब है. अरुण की पत्नी इंदू देवी करोड़ों रुपए की दौलत की मालकिन है.

भागलपुर के पूर्व एसडीओ कुमार अनुज की पत्नी दिव्या सिन्हा सृजन से जुड़ी हुई थी. उन्होंने अनुज को 8 लाख रुपए की हार्ले डैविंसन मोटरसाइकिल गिफ्ट में दी थी. अनुज के घर का खर्च भी सृजन के पैसे से चल रहा था क्योंकि पिछले 10 महीने में उस ने अपने वेतन की निकासी ही नहीं की थी.

एनजीओ सृजन की स्थापना 1996 में हुई थी. दावा किया गया था कि संस्था गांव की औरतों के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और नैतिक विकास का काम करती है. इस का कार्य क्षेत्र भागलपुर जिला के सबौर, गौरडीह, कहलगांव, जगदीशपुर, सन्हौला समेत 16 प्रखंडों तक फैला हुआ है.

इस का मकसद औरतों को एकजुट करना, उन्हें स्वरोजगार के लिए ट्रेनिंग देना, बचत करने का गुर सिखाना, उत्पादन और मार्केटिंग की जानकारी देना, साक्षरता को बढ़ाना और प्राथमिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करना है. अपने मकसद से भटक कर संस्था प्रशासनिक अफसरों और बैंकों के अफसरों के साथ मिल कर सरकारी फंड का बंदरबांट करने में लग गई थी.

किसानों को मुआवजा देने के लिए केंद्र और राज्य सरकार के रुपए जिले में जाते थे, उन्हें फर्जी तरीके से सृजन के खाते में ट्रांसफर कर दिया जाता था. जांच में खुलासा हुआ है कि जिलाधीश और दूसरे अफसरों के हस्ताक्षर वाले चैक को पहले सरकारी खातों में जमा कराया जाता था, उस के बाद उस रकम को सृजन के खाते में ट्रांसफर कर दिया जाता था.

सृजन उन रुपयों को खुलेबाजार में कर्र्ज पर लगाती, व्यापारियों को उधार देती, रियल स्टेट के कारोबार में लगाती, अफसरों को कर्ज बांटती थी. सरकारी खातों में जब जितने रुपयों की जरूरत होती तो सृजन उतने रुपए सरकारी खातों में डाल देती थी. इस मामले में बैंक अफसर सृजन को जानकारी देते थे कि किसी योजना के लिए रुपए निकासी का चैक आया है और सृजन के संचालक उतने रुपए सरकारी खाते में डाल देते थे. इस वजह से सृजन की कारस्तानी पकड़ में नहीं आती थी. सृजन की मुख्य संचालिका मनोरमा देवी की मौत के बाद सारे गोरखधंधे से परदा हटने लगा.

नेताओं और सरकारी अफसरों के साथ मिल कर ही सृजन ने घोटाले के पौधे को सींचसींच कर बड़ा पेड़ बना दिया था. समाज कल्याण विभाग की मानें तो वर्ष 2002-03 में जब अमिताभ वर्मा सहकारिता विभाग के सचिव थे तो उन्होंने भी सृजन को काफी मदद पहुंचाई थी. 1988 से ले कर 2003 तक सरकार ने तमाम कोऔपरेटिव बैंकों के अधिकार छीन लिए थे और उन के सभी पदों के लिए होने वाले चुनाव पर रोक लगा रखी थी. उस के बाद भी सृजन की संचालिका मनोरमा देवी को बिहार स्टेट कोऔपरेटिव बैंक का डायरैक्टर बना दिया गया था.

डायरैक्टर बनने के बाद जब डैलिगेट्स के चुनाव हुए तो उस में मनोरमा हार गई थी. कुल 17 वोट का इस्तेमाल हुआ था और मनोरमा 2 वोट से चुनाव हार गई थी. उस समय भागलपुर के सैंट्रल कोऔपरेटिव बैंक के एमडी रहे कवींद्र नाथ ठाकुर ने हद से बाहर जा कर मनोरमा की मदद की. उन्होंने जीते हुए डैलीगेट्स के नाम सहकारिता विभाग के हैडक्वार्टर को भेजे ही नहीं और मनोरमा पूरे 5 वर्षों तक डायरैक्टर बनी रह गई और बेधड़क हो कर घोटाले का खेल खेलती रही.

कोऔपरेटिव बैंक की डायरैक्टर बनने के बाद मनोरमा का संपर्क बड़े नेताओं और अफसरों के बीच बढ़ने लगा. बैंक के नियमों और भारतीय रिजर्व बैंक की गाइडलाइन की अनदेखी कर मनोरमा ने अपने ही एनजीओ सृजन को बड़ेबड़े लोन दे दिए थे. सृजन के जरिए सरकारी रकम कई नेताओं को भी कर्ज के रूप में दी गई थी.

वर्ष 2007 से ले कर 2014 तक भागलपुर सैंट्रल कोऔपरेटिव बैंक के एमडी रहे पंकज झा ने भी खुलेदिल और हाथों से मनोरमा की अवैध तरीके से मदद की. बैंक के अकाउंट्स मैनेजर हरिशंकर उपाध्याय के साथ मिल कर पंकज ने सरकारी खाते को स्टेट बैंक से हटा कर इंडियन बैंक में खुलवा लिया. उस के बाद कोऔपरेटिव बैंक में रखे किसानों के रुपए सृजन के खाते में ट्रांसफर होने लगे. उस के बाद घोटाले ने काफी तेज रफ्तार पकड़ ली थी. हरिशंकर की पहुंच व पैरवी इतनी दमदार थी कि उस की बहाली भागलपुर सैंट्रल कोऔपरेटिव बैंक में हुई और वहीं से वह रिटायर भी हुआ. कभी भी उस का तबादला नहीं हुआ.

सृजन महाघोटाला को छिपाने और दबाने के लिए घोटालेबाजों ने एक के बाद एक कई घोटाले कर डाले. घोटाले का परतदरपरत खुलना साबित करता है कि अभी इस की कई परतें खुलनी बाकी हैं. 1996 में हुए 960 करोड़ रुपए के चारा घोटाले को इस ने काफी पीछे छोड़ दिया है. सरकारी खजाने का जम कर दुरुपयोग हुआ और उस से करोड़ों रुपए बनाए गए. सरकारी अफसरों के साथ सृजन के लोगों की ऐसी सांठगांठ थी कि नियमों के खिलाफ जा कर प्रखंडों के सरकारी खाते सृजन में खोले गए. वर्ष 2006 में उस समय भागलपुर के जिलाधीश विपिन कुमार ने सृजन में खोले गए सभी सरकारी खातों को बंद करने का आदेश दिया था. जिलाधीश के आदेश के बाद 2-4 खातों को तो बंद कर दिया गया पर बाकी खाते चलते रहे.

सृजन के जरिए घोटाले का खेल साल 2000 से ही शुरू हो गया था. उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी कहते हैं कि लालूराबड़ी के राज से ही सृजन का खेल शुरू हो गया था. संस्था को दफ्तर के लिए साल 2000 में ही ट्राइसेम भवन 30 साल के लिए लीज पर दे दिया गया था. राबड़ी के शासनकाल में ही उसे साबौर में 24 डिसमिल जमीन दी गई. सरकारी रकम को सृजन के खाते में जमा करने का आदेश 2003 में ही जारी किया गया था.

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सृजन घोटाले में गिरफ्तार नाजिर महेश मंडल की हिरासत में मौत हो जाने के बाद और भी हंगामा खड़ा हो गया है. पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव कहते हैं कि सृजन घोटाला मध्य प्रदेश के व्यापमं घोटाले से भी बड़ा है. घोटाले के आरोपियों को मारा जा रहा है, ताकि सचाईर् सामने नहीं आ सके. मंडल की मौत पर पुलिस सफाई दे रही है कि उस की मौत बीमारी की वजह से हुई है.

बिहार के डीजीपी पी के ठाकुर कहते हैं कि 14 अगस्त को गिरफ्तार किया गया महेश मधुमेह और किडनी का मरीज था. उसे न्यायिक हिरासत में भेजते समय बीमारी के सारे कागजात साथ भेजे गए थे. जेल अस्पताल के अलावा मायागंज के अस्पताल में भी उस का इलाज कराया गया. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मापदंड के मुताबिक कैदी का पूरा ध्यान रखा गया था.

भागलपुर के पूर्व जिलाधीश के पी रमैया ने 20 दिसंबर, 2003 को चिट्ठी लिख कर सभी बीडीओ को आदेश दिया था कि सृजन के खाते में सरकारी योजनाओं की रकम जमा की जाए. रमैया की वह चिट्ठी जिला प्रशासन के रिकौर्ड से गायब है. 24 अगस्त को एसआईटी ने जब चिट्ठी की मूल कौपी की मांग की तो वह चिट्ठी नहीं मिली. चिट्ठी की एंट्री जिस रजिस्टर में की जाती है, वह भी गायब है. एसआईटी और ईओयू के पास चिट्ठी की फोटोकौपी है और वे मूल कौपी पाना चाहते हैं.

ऐसे उजागर हुआ महाघोटाला

भागलपुर भू अर्जन कार्यालय ने 74 करोड़ रुपए का बैंक औफ बड़ौदा का चैक बिहार सरकार के खाते में ट्रांसफर करने के लिए भेजा. रिकौर्ड के मुताबिक, भू अर्जन के खाते में 175 करोड़ रुपए जमा थे. चैक को ट्रेजरी से चालान के साथ स्टेट बैंक भेजा गया. स्टेट बैंक ने चैक के खाते को क्लीयरैंस के लिए बैंक औफ बड़ौदा को भेजा.

बैंक औफ बड़ौदा ने विभिन्न कारण बता कर 3 बार चैक को स्टेट बैंक को वापस कर दिया. स्टेट बैंक ने उस चैक को भू अर्जन विभाग को लौटा दिया. बैंक द्वारा अलगअलग वजहें बता कर एक ही चैक को 3 बार वापस लौटाने से प्रशासन के कान खड़े हो गए.

प्रशासन ने बैंक औफ बड़ौदा को पत्र भेज कर रकम देने को कहा और एफआईआर दर्ज कराने की धमकी दी तो बताया गया कि खाते में पर्याप्त रकम नहीं है. इस की जानकारी 30 जुलाई को जिलाधीश को दी गई. मामले की जांच की गई तो महाघोटाला सामने आया.

कई सवालों का जवाब देना है सरकार को

सृजन घोटाले की भनक सीए संजीत कुमार को 2013 में लगी थी और उन्होंने आरबीआई से इस की शिकायत भी की थी. आरबीआई ने सहयोग समिति के रजिस्ट्रार को जांच का आदेश दिया था पर उस पर कोई कार्यवाही नहीं की गई. भागलपुर, बांका और सहरसा जिलों के प्रशासन ने सृजन घोटाले को दबाने की खूब कोशिश की. 2003 में तब के डी एम रमैया ने भी बीडीओ को सृजन के खाते में सरकारी रकम जमा कराने का निर्देश दिया था. 2008 में तब के डीएम ने उस आदेश पर रोक तो लगा दी पर मामले की जांच नहीं की. अगर जांच की गई होती तो मुमकिन है कि उसी समय घोटाले का भंडाफोड़ हो जाता. इस के साथ ही, कभी इस बात की पड़ताल किसी ने नहीं की कि सहरसा जिला के भू अर्जन विभाग का खाता भागलपुर के बैंक औफ बड़ौदा में क्यों रखा गया था?

वर्ष 2013 में जयश्री ठाकुर का 7 करोड़ 32 लाख रुपए का चैक सृजन में क्यों जमा कराया गया जबकि सृजन कोईर् बैंक नहीं था और न ही उसे आरबीआई से लाइसैंस मिला था? बांका जिला की भू अर्जन पदाधिकारी रही जयश्री ठाकुर के घर पर आर्थिक अपराध इकाई ने आय से अधिक संपति के मामले में छापा मारा था. उस समय भी प्रशासन ने मामले की जांच क्यों नहीं की?

खास बात यह है कि सृजन का हर साल औडिट होता था. औडिट रिपोर्ट में साफ था कि वहां बैंक चलाया जाता है, जबकि उसे केवल कोऔपरेटिव सोसाइटी चलाना था. औडिट रिपोर्ट सहकारिता विभाग और जिलाधीश को भेजी जाती थी पर कभी किसी ने जांच की जरूरत नहीं समझी.

उबलते लालू यादव

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव कहते हैं कि नीतीश कुमार और सुशील मोदी के संरक्षण में घोटाला हुआ है. यह पशुपालन से भी बड़ा घोटाला है. दोनों ने घोटाले को छिपाने के लिए ही सरकार बनाई है. घोटाले की शुरुआत साल 2005 में हुई और उसी साल नीतीश मुख्यमंत्री और सुशील मोदी उपमुख्यमंत्री बने थे.

लालू कहते हैं कि सृजन घोटाला करीब 2 हजार करोड़ रुपए का है और इस के मास्टरमाइंड सुशील कुमार मोदी हैं. वर्ष 2005 से ले कर 2013 तक वही वित्त मंत्री थे. उन के साथ ही भाजपा नेता और भागलपुर के पूर्व सांसद शाहनवाज हुसैन, गिरिराज सिंह और सुशील कुमार मोदी की बहन समेत 20 आईएएस अफसर भी फंसेंगे. 25 जुलाई, 2012 को केंद्र सरकार को इस घोटाले के बारे में चिट्ठी लिख कर जानकारी दी गई थी और जांच करने की अपील की गई थी, लेकिन कोईर् जांच नहीं कराई गई. लालू दावा करते हैं कि पूरा घोटाला नीतीश कुमार की जानकारी में था, पर वे चुप्पी साधे रहे.

वर्णव्यवस्था की शिकार साफसफाई

6 अगस्त, 2017, दिल्ली के लाजपत नगर में गटर की सफाई कर रहे 3 मजदूरों की जहरीली गैस के रिसाव के चलते मौत हो गई. यह पहली घटना नहीं है. इस से पहले दक्षिणी दिल्ली के घिटोरनी इलाके में सैप्टिक टैंक में मजदूरी करने उतरे 4 लोग भी मौत के मुंह में समा चुके हैं. इसी तरह 3 मई, 2017 को पटना, बिहार में सफाई करने के दौरान गटर में गिरने से 2 सफाईकर्मियों की मौत हो गई.

स्वच्छ भारत अभियान के तहत नेता व अफसर हाथों में झाड़ू ले कर फोटो खिंचवा लेते हैं और इश्तिहारी ढोल बजा कर मीडिया में गाल भी बजा लेते हैं. लेकिन सचाई यह है कि साफसफाई के मामले में हम आज भी अमीर मुल्कों से कोसों पीछे हैं. सही व्यवस्था नहीं होने के कारण 1 सितंबर को दिल्ली के गाजीपुर में कचरे का पहाड़ का एक हिस्सा धंस जाने से 2 लोगों की मौत हो गई. ज्यादातर गांवों, कसबों व शहरों में आज भी गंदगी के ढेर दिखाई देते हैं.

वर्णव्यवस्था का जाल

हमारी धार्मिक, सामाजिक व्यवस्था ने हमें अपनी गंदगी, कूड़ाकरकट स्वयं साफ करने की सीख नहीं दी. हमें सिखाया गया है कि आप अपनी गंदगी वहीं छोड़ दें या बाहर फेंक दें. कोई दूसरा वर्ग है जो इसे उठाएगा. गंदगी उठाने वाले वर्ग को यह कार्य उस के पूर्वजन्म के कर्मों का फल बताया गया. गंदगी को उस की नियति करार दिया गया. इसलिए निचले वर्गों को बदबूदार गंदगी के ढेर में रहने की आदत है.

society

वर्णव्यवस्था में शूद्रों यानी पिछड़ों का काम ऊपर के 3 वर्णों की सेवा करना, उन का बचा हुआ भोजन खाना और उतरा हुआ कपड़ा पहनना बताया गया. इस व्यवस्था की वजह से यह वर्ग भी गंदगी को त्याग नहीं पाया. वहीं इन चारों वर्णों से बाहर का एक पांचवां वर्ण था दलित. उसे गांव, शहर से बाहर रहने का आदेश दिया गया. उसी का काम गंदगी उठाना, साफसफाई करना और मरे हुए पशुओं को ठिकाने लगाना था. सदियों बाद भी यह वर्ग इस सब से उबर नहीं पाया है.

आबादी का बड़ा हिस्सा पुलों के नीचे, सड़कों व नालों के किनारे, उड़ती धूल व कीचड़ के पास बनी झुग्गी बस्तियों में रहता है. गंदगी के कारण बहुत से लोग बीमारियों से भरी जिंदगी जीते हैं. ठेलेखोमचों पर चाटपकौड़ी व खानेपीने की दूसरी बहुत सी चीजें खुली हुई बिकती रहती हैं और लोग बड़े आराम से उन्हें खातेपीते रहते हैं.

सिर्फ एअरपोर्ट, महानगरों की पौश कालोनियों, रईसों के बंगले, अमीरों के फार्महाउस व नेताओं की कोठियों आदि कुछ अपवादों को छोड़ कर देश के ज्यादातर इलाकों में गंदगी की भरमार है. नदी, नाले, गली, महल्ले, बसअड्डे, रेलवेस्टेशन, रेल की पटरियां, प्लेटफौर्म, सिनेमाघर, सड़कें, पार्क, सरकारी दफ्तर, स्कूल, अस्पताल आदि सार्वजनिक इमारतों में जहांतहां गंदगी पसरी रहना आम बात है.

भारी गंदगी के कारण देश में तरक्की के बजाय पिछड़ापन, निकम्मापन व बदइंतजामी दिखती है. इस वजह से विदेशी सैलानी भारतके नाम पर नाकभौं सिकोड़ते हैं. वे हमारे देश में आने से हिचकते हैं. सो, हमारे रोजगार के मौके घटते हैं. गंदगी से बहुत सी बीमारियां फैलती हैं. इस के चलते इंसान की कम वक्त में बेहतर व ज्यादा काम करने की कूवत घटती है. परिणामस्वरूप, उस की आमदनी कम होती है.

हक से बेदखल बहुत से लोग आज भी गंदे रहते हैं क्योंकि हमारे समाज में धर्म के ठेकेदारों ने अपनी चालबाजियों से जातिवाद के जहरीले बीज बोए. सारे अच्छे काम अपने हाथों में ले कर शूद्रों को सिर्फ सेवा करने का काम दिया. जानबूझ कर इन को हर तरह से कमजोर बनाया गया. धर्म की आड़ में चालें चली गईं कि सेवाटहल करने वाले माली व अन्य पिछड़े वर्ग सामाजिक तौर पर ऊपर न उठने पाएं. नियम बना कर उन्हें गंदा व गांवों से बाहर गंदी जगहों में जानवरों के साथ व जानवरों की तरह जीने, रहने पर मजबूर किया गया.

दलितों व पिछड़ों को बुनियादी हकों से बेदखल रखा गया. इसी कारण ज्यादातर लोग आज भी गंदगी में ही रहने, खाने व जीने के आदी हैं. आबादी का बड़ा हिस्सा दलितों व पिछड़ों का है और उन्हें सदियों से गंदा रहने के लिए मजबूर किया जाता रहा है. जहांतहां पसरी भयंकर गंदगी की असली वजह यही है. इस में सब से बड़ी व खास बात यह है कि निचले तबके के लोग अपनी मरजी से नहीं, बल्कि उन पर जबरदस्ती थोपे गए सामाजिक नियमों के कारण गंदगी में रहते हैं.

सब से बड़ी खोट तो अगड़ों की उस गंदी व पुराणवादी हिंदू पाखंडी सोच में है जिस में वे खुद को सब से आगे व ऊपर रखने के लिए दूसरों, खासकर कमजोरों, को जबरदस्ती धकेल कर नीचे व पीछे रखा जाता है. बेशक, आगे बढ़ना अच्छा है लेकिन यह हक सभी का है. सिर्फ अपनी बढ़त के लिए दूसरों को उन के अधिकारों से बेदखल करना सरासर गलत तथा समाज, संविधान व इंसानियत के खिलाफ है. इसलिए सफाई के लिए दिमाग के जाले साफ करने भी जरूरी हैं.

ऊंची जातियों की साजिश

मुट्ठीभर ऊंची जातियों वाले अमीर दबंग वर्णव्यवस्था के नाम पर अपनी दबंगई, अमीरी व बाहुबल पर सदियों से दलितों व पिछड़ों पर राज करते रहे हैं. अपने हक में तरहतरह के नियम बना कर निचले तबकों को नीचे व पीछे रखने की साजिशें रचते रहे हैं. उन्हें कुओं पर चढ़ने, मंदिरों में घुसने व बरात निकालने व मरने पर आम रास्ते से लाश ले जाने तक से वंचित किया गया. पिछले दिनों बिहार में दलितों को अपने संबंधी की लाश को तालाब से हो कर ले जाना पड़ा था.

मंदिर कोई पैसा कमा कर नहीं देते पर उन में घुसने न देना दलितों में हीनभावना भर देता है. पंडेपुजारियों की मदद से अगड़ों द्वारा दलितों व पिछड़ों के खिलाफ बनाए गए सामाजिक नियमों की फेहरिस्त बहुत लंबी है. पुनर्जन्म और पिछले जन्म के कर्मों का फल बताने के साथ नीच व मलेच्छ बता कर उन के नहानेधोने, नल से पानी लेने, साफसुथरे रहने, अच्छे कपड़े पहनने, पक्के घर बनाने व पढ़नेलिखने तक पर पाबंदियां लगाई गईं. गंदगी में रह कर जानवरों से बदतर जिंदगी जीने पर उन्हें मजबूर किया गया ताकि वे ऊपर उठ कर या उभर कर किसी भी तरह मजबूत न होने पाएं.

धर्मग्रंथों में अगड़ों के कुल वंश में जन्म लेने को पुण्य का परिणाम व दलितों को पाप की पैदाइश बताया गया है. हालांकि हमारे संविधान में सभी को बराबरी का दरजा हासिल है लेकिन दलित व पिछड़े आज भी गंदगी में रहते हैं क्योंकि वे अगड़े, अमीरों व दबंगों के रहमोकरम पर जीते हैं. आज कुछ को मंदिरों में जाने दिया जा रहा है लेकिन उन्हें दूसरे दरजे के देवीदेवता दिए गए हैं.

साफसुथरे रह कर कहीं वे सामने आ कर मुकाबला करने लायक न हो जाएं, इस डर से अगड़ों ने दलितों व पिछड़ों को सदियों तक किसी भी तरह उबरने नहीं दिया. उन का खुद पर से यकीन तोड़ने के लिए ही उन्हें उतरन व जूठन की सौगातें बख्शिश में दी जाती हैं. इतना ही नहीं, ऊपर से उन्हीं के सामने जले पर नमक बुरकते हुए यह भी कहा जाता है कि ये तो गंदगी में रहने के ही आदी हैं.

दोषी कौन?

आम आदमी की जिंदगी में जो कुछ भरा गया, जहां जैसे खराब माहौल में उन्हें रखा गया, सामाजिक नियमों के चलते जो गंदे हालात उन्होंने देखे, उसी के मुताबिक वे आज भी गंदगी में जीते, खाते व रहते हैं. इस में दोष उन का नहीं है. असल दोषी तो वे हैं जिन्होंने अपने मतलब की वजह से समाज में उन्हें

गंदा बनाए रखने के नियम बनाए. उन्हें साफसफाई की अहमियत नहीं जानने दी. साफसुथरा नहीं रहने दिया. सो, जागरूक हो कर इन चालबाजियों को समझना बेहद जरूरी है ताकि जिंदगी दुखों की गठरी न साबित हो.

ज्यादातर अगड़े, अमीर खुद साफसफाई जैसे किसी भी काम को हाथ नहीं लगाते. दरअसल, उन की नजर में काम करना तो सिर्फ दलितों व पिछड़ों का फर्ज व जिम्मेदारी है. अमीर मुल्कों में नेता, अफसर व अमीर सब खुद अपनी मेज आदि साफ करने में जरा भी नहीं हिचकते, जबकि यहां इसे हिमाकत समझा जाता है. हर काम के लिए दलितों का सहारा लिया जाता है. इसलिए हमारे देश में गंदगी की समस्या भयंकर होती जा रही है.

समाज में आज भी ऐसे घमंडी सिरफिरों की कमी नहीं है जो जाति के आधार पर ऊंचनीच का फर्क करते हैं, कमजोरों के साथ भेदभाव करते हैं. उन्हें दलितों व पिछड़ों की खुशहाली खटकती है. दलितों, पिछड़ों के पास वाहन व पक्के घर होना, उन का साफसुथरे रहना भी अगड़ों को जरा नहीं सुहाता. सो, वे उन्हें पीछे और नीचे रखने की सारी कोशिशें करते हैं.

बदलें हालात

अपवाद के तौर पर पुरानी लीक, अंधविश्वास, गरीबी व दबंगों के चंगुल से दूर रहने वाले कुछ दलित व पिछड़े पढ़लिख कर आगे निकले और वे शहरों में बस गए. लेकिन ज्यादातर आज भी गंदगी व गरीबी के शिकार हैं. उन की दुनिया आज भी जस की तस है. वे आज भी घासफूंस व खपरैल की छत वाली कच्ची झोंपडि़यों में अपने जानवरों के साथ रहते हैं. जरूरत उन की जिंदगी में सुखद बदलाव लाने की, उन्हें हिम्मत व हौसला देने की है.

साफसुथरा रहना महंगा, मुश्किल या नामुमकिन नहीं है. कम खर्च में भी साफसुथरा रहा जा सकता है, अपने आसपास का माहौल बेहतर बनाया जा सकता है. उत्तराखंड के पंतनगर के पास एक गांव है नंगला. वहां बंगालियों के बहुत से परिवार रहते हैं. उन में से बहुतों की आर्थिक हालत अच्छी नहीं है, लेकिन उन के घरों के अंदरबाहर साफसफाई व सजावट देखते ही बनती है. इसलिए आज जरूरत गंदगी से उबर कर ऐसी ही मिसाल कायम करने की है.

हर इलाके में रहने वालों को अब खुद तय करना होगा कि कूड़ा, मलबा आदि इधरउधर बिलकुल नहीं फैलाना है. कचरे का निबटारा हमेशा ठीक तरीके से करना है. नालेनालियों में गोबर व पौलिथीन आदि नहीं फेंकने हैं. साफसफाई के लिए सरकारी कर्मचारियों का इंतजार किए बिना खुद अपने हाथपैरों को भी हिलाना है.

यह नजरिया बदलना होगा किसफाई करना दलितों, पिछड़ों व सफाई कर्मचारियों की जिम्मेदारी है. यह भी जरूरी है कि उन्हें गंदगी में रहने को मजबूर न किया जाए. उन्हें भी साफसुथरा रहने का हक है. इसलिए पहले दिमाग में बसी ऊंचनीच व गैरबराबरी की गंदगी दूर करें, तभी समाज में बाहरी गंदगी दूर होगी. वरना गंदगी रुकने वाली नहीं है. और ऐसे में स्वच्छता अभियान भी सिर्फ एक ढकोसला बन कर रह जाएगा.

तलाक और कानूनी जाल

सुखेंदु दास और रीता मुखर्जी पतिपत्नी तो थे ही, दोनों न्यायाधीश भी थे. उन का काम दूसरों के मामले सुलझाने का था. पर अफसोस, उन्होंने अपना विवाद सुलटाने में 17 साल लगा दिए और वह भी तब सुलटा जब सुप्रीम कोर्ट ने रीता मुखर्जी की गैरहाजिरी में 24 साल की बेटी के पिता के मां से तलाक होने पर मुहर लगा दी जो 17 वर्षों से अलग रह रही थीं.

उन दोनों का विवाह प्रेमविवाह ही था क्योंकि दोनों ने स्पैशल मैरिज एक्ट में विवाह किया था जिस में या तो भागे हुए प्रेमीप्रेमिका विवाह करते हैं या अलग धर्मों के. 1993 के विवाह से एक बेटी पैदा हुई पर 2000 आने तक दोनों के संबंध में खटास पैदा हो गई और पत्नी घर छोड़ कर चली गईं. सुखेंदु दास ने जज पत्नी के खिलाफ दूसरी अदालत में गुहार लगाई. पर 2009 के फैसले में अदालत ने तलाक नहीं होने दिया.

उच्च न्यायालय ने भी अर्जी खारिज कर दी पर उस अदालत में रीता मुखर्जी न हाजिर हुईं, न उन का वकील आया. तब तक दोनों की नियुक्तियां अलगअलग शहरों में हो रही थीं. 2012 के फैसले में भी उच्च न्यायालय ने तलाक मंजूर नहीं किया जबकि दोनों ही 2000 से अलग रह रहे थे.

सुखेंदु दास को हार कर सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा. वहां 2017 में उन्हें न्याय मिला और सुप्रीम कोर्ट ने इसी बात को घर छोड़ना यानी डैजर्शन मान लिया कि पत्नी अदालतों में भी खुद या वकील के माध्यम से पेश नहीं हुई.

तलाक के मामलों में एक पक्ष के जिद पर उतर आने पर मामला, महीनों नहीं, वर्षों तक अदालतों की धूल चाटता रहता है. यह हमारे विवाह कानून की सब से बड़ी ट्रैजिडी है. शायद हमारी अदालतों को लगता है कि तलाक आसानी से दे देंगे तो हिंदू संस्कारों का जनाजा निकल जाएगा जहां विवाह को देवत–?ाओं की उपस्थिति में सात जन्मों का बंधक माना जाता है. असल में विवाह भी एक समझौता मात्र है और यदि एक पक्ष न माने तो दूसरा कुछ ज्यादा नहीं कर सकता.

जैसे कुछ घंटों के मंत्रों आदि से विवाह हो सकता है वैसे ही अगर विवाहविच्छेद हो तो कोई हर्ज नहीं. पर सभी अदालतों के दिमाग में शायद रामसीता का उदाहरण रहता है जिस में राम ने अकारण सीता को छोड़ दिया पर दूसरा विधिवत विवाह नहीं किया. अदालतें नरेंद्र मोदी और जसोदाबेन की तरह 2 जनों को उन के विवाह करने की गलती का पछतावा भोगने को मजबूर करती हैं ताकि हिंदू संस्कृति कायम रहे.

जहां झगड़ालू पतिपत्नी समझदार जज हों वहां भी अगर समय पर सही न्याय न मिले तो देश की स्थिति क्या है, यह स्वत: समझा जा सकता है.

अर्शी खान के आलमारी से मिला कंडोम

बिग बौस 11 की कंटेस्टेंट अर्शी खान शो में जाने से पहले भी कई बार सुर्खियां बटोर चुकी हैं. हालांकि ये बात अलग है कि वह हर बार विवादों के चलते ही सुर्खियों में रही हैं. बिग बौस के घर में जाने के बाद भी वह किसी ना किसी कारण से सोशल मीडिया पर चर्चा में बनी रहती हैं. इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ.

अभी हाल ही में बिग बौस के एक अनसीन वीडियो में दिखा था कि वह बार-बार अपने साथी कंटेस्टेंट विकास गुप्ता से शिलाजीत खाने की बात पूछ रही थीं. इससे पहले वह शो में आकाश डडलानी की पैंट भी खींच चुकी हैं. अब अर्शी ने अपने बारे में एक बात बताकर सबको सोच में डाल दिया है.

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दरअसल वूट के अनसीन वीडियो में अर्शी घर के सदस्य विकास और पुनीश से बात करते हुए एक फनी वाकया शेयर किया. अर्शी ने बताया कि एक बार उनके आलमारी में उनके पापा को ऐसी चीज मिली जिसके बाद शर्म के मारे वो पूरी रात अपने घर नहीं आ पाई. हालांकि इस बातचीत के दौरान अर्शी ने उस चीज का जिक्र तो नहीं किया. लेकिन अर्शी की दोस्त और एक्ट्रेस महिमा सिंह ने एक इंटरव्यू में बताया कि वो कंडोम था.

दरअसल अर्शी विकास गुप्ता और पुनीश शर्मा को बताती है कि उनके पापा मुंबई में मेरे घर आए थे. उन्होंने मेरी अलमारी साफ करने के लिए खोली, उस दौरान मैं काम से बाहर थीं. अलमारी साफ करते हुए पापा को एक डिब्बा मिला. जिसके बाद तुरंत अर्शी को उनकी मम्मी का फोन आया और उन्होंने मुझसे पूछा यह सब क्या है? जिसके बाद अर्शी पूरी रात अपने घर नहीं गई. अगले दिन वह अपनी दोस्त को लेकर घर गईं और पापा को बताया कि जो चीज मिली है वो मेरी इस फ्रेंड की है.

महिमा ने अर्शी की पोल खोलते हुए इस इंटरव्यू में कहा, मुझे सारा आरोप अपने सिर लेना पड़ा था. जबकि मेरा इन सभी चीजों से कोई लेना-देना नहीं था.

क्या है शाहरुख की बेटी सुहाना के चुपचाप क्लीिनिक जाने की वजह

बौलीवुड के बादशाह शाहरुख खान की बेटी सुहाना खान स्टार किड्स की लिस्ट में टौप पर शुमार सुहाना हैं. वह अक्सर ही अपनी हौट तस्वीरों की वजह से सुर्खियों में छाई रहती हैं. शायद यही वजह है कि, लाखों लोग आज उनके फैन्स है और सोशल मीडिया पर उनकी तस्‍वीरें आते ही वायरल हो जाती हैं. सोशल मीडिया पर इतनी चर्चित होने की वजह से अक्सर ही खबरे आती रहती हैं कि सुहाना जल्द ही बौलीवुड में एंट्री लेने वाली हैं.

हाल ही में सुहाना को एक ऐसी जगह देखा गया है जहां पर कोई भी लड़की बेवजह नहीं जाती. दरअसल हाल ही में उन्‍हें मुंबई के बांद्रा इलाके में बने स्किन क्‍लीनिक के बाहर देखा गया था.

स्किन क्‍लीनिक के बाहर देखे जाने की वजह से सुहाना पर लगातार कई तरह के सवाल खड़े किये जा रहे हैं. हालांकि ये तो पता नहीं चल सका है कि सुहाना वहां क्यों गई थीं लेकिन सूत्रों की मानें तो वो अपने मेकओवर के चलते वहां गई थीं. खबरे तो यह भी हैं कि बौलीवुड में आने के लिए सुहाना काफी जोरो शोरो से तैयारियां कर रही हैं. खैर सच्चाई क्या है यह तो सुहाना ही बता सकती है.

आपको बता दें कि हाल ही में सुहाना को उनके छोटे भाई अबराम के स्‍कूल में शाहरुख खान के साथ देखा गया था. ज्यादतर समय सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने वाली सुहाना की पिछले दिनों कई बोल्‍ड तस्‍वीरें सामने आईं थी. इंस्‍टाग्राम अकाउंट से शेयर की गई इन फोटो पर लोगों के हौट, वेरी हौट जैसे कमेंट आएं थे.

मै किसी को फौलो नही करता, अनुराग कश्यप

लेखक, निर्माता, निर्देशक अनुराग कश्यप इन दिनों मीडिया, फिल्मर्सजकों और दर्शकों पर जमकर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं. उनकी राय में फिल्मकार का काम महज सवाल उठाना है. उनका दावा है कि वह सोशल मीडिया पर किसी को भी फौलो नहीं करते. वह सोशल मीडिया पर कुछ भी नहीं पढ़ते, सिर्फ अपनी बात कहने में यकीन रखते हैं. ‘बांबे वेल्वेट’ की असफलता के बाद अब वह नए कलाकारों वाली उत्तर प्रदेश की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘‘मुक्काबाज’’लेकर आ रहे हैं. 12 जनवरी 2018 को प्रदर्शित होने वाली फिल्म‘‘मुक्काबाज’’को अनुराग कश्यप स्पोर्ट्स और प्रेम कहानी वाली फिल्म मानते हैं. पर इसमें उन्होने जातिवाद सहित कई मुद्दे उठाए हैं.

फैंटम फिल्मस के बिखराव की काफी बातें हो रही है. सच क्या है?

ऐसा कुछ नहीं है. मीडिया में जो भी खबरे छप रही हैं, वह गलत है. किसी भी पत्रकार ने किसी खबर को छापने से पहले सत्यता की जांच नही की. आजकल पत्रकार सूत्र के नाम पर कोई भी खबर छाप देता है.

तो आप बता दें कि सच क्या है?

पिछले डेढ़ वर्ष से मैं और विक्रमादित्य मोटवानी हम दोनो नेटफिलिक्स की वेब सीरीज में व्यस्त हैं. इसी बीच हमने ‘मुक्काबाज’ और उसने ‘भावेश जोशी’ का भी निर्देशन किया. हम दोनों नेटफिलिक्स को मौलिक कंटेंट बनाकर देने के लिए मार्च 2018 तक काफी व्यस्त रहेंगे. फैंटम के अंदर काफी काम हो रहा है, पर बहुत शांति से हो रहा है.

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हम लोग शोर शराबा करके काम करने में यकीन ही नहीं रखते. बाजार में जो अटकलें चलती रहती हैं, हम उन्हे हवा नही देते. विकास अपनी फिल्म बना रहा है. मधु मेंटेना कुछ प्रोजेक्ट डेवलप कर रहे हैं. तो वहीं हमारी कुछ दूसरी फिल्मों पर लगातार काम चल रहा है. हम लोग काफी बड़े बड़े काम कर रहे है, पर सभी काम अभी वर्किंग स्तर पर है. फिलहाल हमारा सारा ध्यान नेटफिलिक्स पर है. यह भारत का पहला बहुत बड़ा व अति महंगा मौलिक सीरीज ‘शिखर गेम’ है. इस सीरीज में सैफ अली खान, नवाजुद्दीन सिद्दिकी, राधिका आप्टे वगैरह हैं. इसके आठ एपीसोड हैं. हर एपीसोड एक घंटे का होगा.

‘‘मनमर्जिया’’के दो निर्देशक बदल गए. कुछ कलाकार बदल गए. ऐसे में आप किस तरह इस फिल्म को आगे ले जाएंगे?

मैं इस तरह से नहीं सोचता हूं. इस फिल्म के निर्देशक क्यों फिल्म छोड़कर चले गए. कलाकार क्यों चले गए. इसकी अलग कहानी है. उस पर मेरा बात करना सही नहीं होगा. उस पर आनंद एल राय ही बात करें, तो सही होगा. जहां तक मेरे अपने काम करने का सवाल है, तो मैंने ‘मनमर्जिया’की कहानी व पटकथा पढ़ी. मुझे पसंद आयी. मैंने इस फिल्म को बनाने का निर्णय लिया. सच यह है कि इस फिल्म की कहानी में मुझे कुछ रोचक दिखा, इसलिए मैंने इससे जुड़ने का निर्णय लिया. मैं हमेशा वही फिल्म बनाता हूं, जिसकी कहानी में मुझे कुछ नजर आ जाता है. हो सकता है कि बहुतों को कुछ नजर ना आया हो. मैंने आनंद राय जी से कहा कि मुझे यह कहानी इस ढंग से नजर आ रही है और इसको इस ढंग से बनाने के लिए मुझे कलाकारों के चयन की पूरी छूट मिलनी चाहिए. उन्होंने इजाजत दे दी. मैंने कहा कि यदि काम करने की आजादी होगी, तो मैं काम करूंगा. किसी निर्देशक की जगह लेने का मतलब यह नही होता है कि आपने उसे धक्का दे दिया. एक फिल्म से निर्देशक या कलाकार के अलग होने या दूसरे के जुड़ने की कई वजहें होती हैं. सच कहूं तो ‘मनमर्जिया’ की कहानी इतनी आसान नही है. इसे बनाना भी आसान नही है. यह बहुत कठिन फिल्म है.

आनंद एल राय खुद भी एक माहिर निर्देशक हैं. ऐसे में उनकी तरफ से दखलंदाजी भी तो हो सकती है?

ऐसा सोचना ही नहीं चाहिए. वास्तव में एक अच्छा निर्देशक ही अच्छा निर्माता होता है. क्योंकि उसे पता होता है कि निर्देशक को कहां, किस तरह से काम करने की छूट देनी चाहिए. निर्देशक जब निर्माता बनता है, तो उसे पता होता है कि क्या नहीं करना चाहिए. आनंद एल राय काफी सुलझे हुए फिल्मकार व इंसान हैं. उन्हें दूसरों के साथ किस तरह काम किया जाना चाहिए, इसकी समझ है. लोगों को लगता है कि आनंद एल राय अपने निर्देशकों को तंग करते हैं, जबकि ऐसा कदापि नहीं है. वह तो अपने निर्देशकों को ताकत देते हैं. सारी बातचीत होने के बाद उन्होंने मुझसे आज तक नही पूछा कि आप किस किस कलाकार को ले रहे हो? इसी तरह ‘मुक्काबाज’ के दौरान भी उन्होंने मुझसे कोई सवाल नहीं किया. जब भी मैंने उनसे कहा कि एक दिन सेट पर आ जाएं, एक सीन देख लीजिए, उन्होंने मुझे एक ही बात कही कि, ‘मैं कहां आउंगा. मैं तो शाहरूख खान के साथ फिल्म को लेकर व्यस्त हूं. ’पर कुछ लोगों को समझ नहीं आता कि मीडिया में किस तरह की बातें उछल जाती है और वह फालतू की बातें करते रहते हैं. इस तरह कि बातें वह लोग करते हैं, जिनके अंदर ईष्या और जलन होती है. कुछ लोगों को हजम ही नहीं होता कि दो लोग एक साथ कैसे काम कर रहे हैं? जबकि हर कोई तसल्ली के साथ अपनी फिल्म बनाना चाहता है. कुछ लोग बांट कर काम करना पसंद नहीं करते. हम लोग तो शुरू से ही बांट कर काम करते आए हैं.

आपकी कुछ फिल्में लगातार असफल हुई, जिसके बाद आपके करियर को काफी धक्का लगा?

किसने कहा.. फिल्मों की सफलता या असफलता पर मैं कभी नहीं सोचता. देखिए‘ बौंबे वेल्वेट’ जैसी बड़े बजट की फिल्म के असफल होने पर मैंने सोचा कि मुझे कम बजट की अच्छी फिल्में बनाते रहना चाहिए.

आपने अपनी नई फिल्म का नाम ‘‘मुक्काबाज’’ क्यों रखा?

आपने सही पकड़ा. ‘मुक्काबाज’ तो एक गाली है. पर आपके इस सवाल का जवाब आपको फिल्म देखने पर जरुर मिलेगा. यदि आपने फिल्म का ट्रेलर देखा है तो ट्रेलर में यह बात आयी है कि, ‘आपको मुक्केबाज बनना है या मुक्काबाज बनना है. मुक्काबाज यानी की अपनी ताकत या हैसियत के आधार पर दूसरों को दबाने वाला. यह मानकर चलें कि हमारी इस फिल्म की कहानी किसी मुक्केबाज/बाक्सर की नहीं हैं. यदि ऐसा होता, तो हम फिल्म का नाम बौक्सर रखते.

फिल्म‘‘मुक्काबाज’’क्या है?

यह बौक्सिंग के खेल पर एक प्रेम कहानी प्रधान फिल्म है. इसमें हमने किसी एक खिलाड़ी की नहीं, बल्कि रिसर्च करके कई खिलाड़ियों की कहानी को समाहित किया है. हमारे यहां सिस्टम एक अच्छा खिलाड़ी पैदा ही नहीं करता है. जो भी खिलाड़ी उभरे हैं, वह निजी पैशन के चलते ही उभरे हैं. तो मैने उस प्रोसेस को फिल्म में हाई लाइट किया है. इसमें नेपोटिजम और जातिवाद का भी जिक्र है. मगर यह फिल्म किसी एक राजनीतिक पार्टी को लेकर नहीं,  बल्कि पूरे समाज को लेकर है. हमारी फिल्म की कहानी उस बौक्सर की है, जिसे भारत के लिए खेलने का मौका हीं नहीं मिला. इसलिए वह गरीब बच्चों को बौक्सिंग सिखाता है. यह फिल्म कई बाक्सरों/मुक्केबाजों की कहानी है. किनारे पर खड़े उन तमाम खिलाडिय़ों की कहानी है, जिनका भविष्य नौकरशाहों के हाथों में है.

स्पोर्ट्स को लेकर सिस्टम की क्या भागीदारी होनी चाहिए?

देखिए, मैं अभी सब कुछ बता दूंगा, तो कैसे चलेगा, मैं चाहता हूं कि आप लोग फिल्म देंखें. उसके बाद सवाल करें? हमारे यहां उंगली उठाने की बहुत जल्दबाजी रहती है. पर हम यह समझने की कोशिश कभी नहीं करते कि यदि यह चीज नही हो रही है, तो उसकी क्या वजह हैं? हम फिल्मकार हैं.

स्पोर्ट्स के क्षेत्र में दो लोगों ने मैडल जीता, तो हमने तुरंत उन दोनों पर बायोपिक फिल्म बना दी. मीडिया को लगता है कि यह बायोपिक का सीजन है. इसलिए मीडिया हर किसी से बायोपिक को लेकर सवाल कर रही है? मीडिया जब खिलाड़ी से इंटरव्यू करती है, तो उससे पूछती है कि यदि आप के उपर कोई बायोपिक फिल्म बने, तो आप किस कलाकार को चाहेंगे कि वह आपका किरदार फिल्म में निभाए? जबकि बायोपिक बनने का कोई मसला है ही नहीं. पर जब मीडिया ने सवाल पूछा, तो उस खिलाड़ी को लगता है कि वह बहुत बड़ा हीरो हो गया है. हर कोई अपने आपको हीरो समझने लगा है. ऐसे में सफल खिलाड़ी सीधे कह देते हैं कि सिनेमा के परदे पर उनके किरदार को सलमान खान, आमिर खान या शाहरूख खान निभाएं. हकीकत में हमारे यहां माहौल ऐसा हो गया है कि कोई किसी भी चीज को यथार्थ से देखता ही नहीं है.

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यानी कि आपको लगता है कि मैरी कौम’’सहित जो 2-3 बायोपिक फिल्में बनी हैं,वह यथार्थ से दूर हैं?

देखिए, बहुत सी चीजें इन फिल्मों में यथार्थ से परे भी होती हैं. इसकी वजह यह है कि हम फिल्मों में सब कुछ इतना अधिक सेलीब्रेट करते हैं, इतना सब कुछ अच्छा दिखा देते हैं कि हम असली चीजों को नजरंदाज कर देते हैं. हम बायोपिक फिल्म बनाते समय खामियों को उकेरते ही नहीं हैं. उनकी चर्चा ही नही करते. सिर्फ सेलीब्रेट करते हैं. हमारा देश सेलीब्रेशन में यकीन करता है. हम लोग सेलीब्रेट करने में इतना मशगूल हैं कि हमें जो बात कहनी चाहिए, वह हम भूल गए हैं. यदि हमारी फिल्मों के हिसाब से जाया जाए, तो इंसान को पैदा होते ही हीरो बन जाना चाहिए. यानी कि हमारी फिल्में इंसान की पूरी यात्रा खत्म कर देती हैं. हमने कभी इस बात पर फिल्मों में गौर नही किया कि हमारे यहां बौक्सर कहां से आते हैं? खिलाड़ी कहां से आते हैं? यह सब मिडल या निचले तबके से आते हैं. कोई भी बौक्सर या खिलाड़ी अमीर घरों या हाईफाई सोसायटी से नहीं आते.

निचले या मध्यमवर्गीय परिवारों से खिलाड़ियों के आने की वजहें क्या हैं?

इसी मुद्दे को मैंने फिल्म ‘‘मुक्काबाज’’में उठाया है. हमारी मीडिया बाहर जाकर इस बारे में जांच पड़ताल नही करती. लोग जानना ही नही चाहते कि एक फुटबौलर कहां से आता है? रोनाल्डो कहां से आया? रोनाल्डो भी स्लम से आया. हमारे जो दुनिया भर के रैप आर्टिस्ट हैं,  वह भी स्लम से ही आते हैं. यह सभी लोग संघर्ष करते हैं, अपनी हैसियत बढ़ाने के लिए और फिर किसी न किसी क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं. हमारे यहां लोग क्रिकेट के बाद फुटबौल के दीवाने हैं. पर वह यह नहीं जानते होंगे कि फुटबौल का जन्म ही हैसियत बढ़ाने के लिए हुआ था. पेले भी निचले तबके से आया था. आज लोग सचिन तेंदुलकर को सर्वसुविधा संपन्न देख रहे हैं. पर वह भी मध्यमवर्गीय परिवार से है. लोग सचिन तेंदुलकर की जड़ कहां है, इस पर गौर नही करते हैं. उसकी क्या यात्रा रही? यह कोई नही जानना चाहता है.

पर जो सर्वसुविधा सम्पन्न होते हैं, उन्हें किसी चीज की चाहत नहीं होती है. इसलिए वह आगे नहीं आते?

आपने बिलकुल सही बात पकड़ी. लेकिन हमारा सिस्टम ऐसे ही लोगों को पालता है. उन्हें ही आगे बढ़ाता है. सिस्टम उन्हें एक्सप्लौइट करता है. यह पूरा ताकत का खेल हो जाता है. यह सारा काम रिसर्च का है, जो कि मीडिया को करना चाहिए. सिनेमा या फिल्मकार का काम रिसर्च करना नहीं है. यह एक अलग बात है कि फिल्मकार अपनी फिल्म को सत्य के नजदीक लाने के लिए रिसर्च करता है. एक फिल्मकार को अपनी फिल्म के विषय से संबंधित जानकारी अखबार से पता चलनी चाहिए, पर ऐसा नही होता. हमारे अखबार क्रिकेट को दो पन्ने देते हैं, किंतु दूसरे खेलों को वह तव्वजों नहीं देते. समस्या हर तबके में और हर व्यापार में है. इससे मीडिया अछूता नही है. हमारी फिल्म में एक संवाद हैं- ‘‘किसी खिलाड़ी पर पिक्चर बनाओ, तो 40 करोड़ कमा लेगी, पर टुर्नामेंट देखने के लिए 40 लोग नही आते. ’’सभी टुर्नामेंट के स्टेडियम खाली होते है. जबसे पीवी सिंधू चर्चा में आयी हैं और मैडल जीते हैं, तब से बैडमिंटन के टुर्नामेंट के स्टेडियम भरने लगे हैं. आप प्रकाश पादुकोण से पूछिए कि वह किन हालातों में बैडमिंटन खेलते थे.

हमारे देश में सिनेमा और क्रिकेट को बिकाउ माना जाता है?

हकीकत में सिनेमा और क्रिकेट दो ऐसे साफ्ट कौर्नर हैं, जिन्हें हर कोई एक्सप्लौइट करता है. उन्हें ही बेचा जाता है. पर अब आप खुद बताएं कि अब बैडमिंटन कैसे बिकने लगा?  सीधी सी बात है. जब कोई खिलाड़ी अपनी मेहनत, लगन, परिश्रम के बल पर कहीं चमक जाता है, तो सबको उसके बारे में, उसके खेल के बारे में पता चल जाता है. पर मीडिया का काम होता है कि वह खिलाड़ियों को चमकाएं. उनके बारे में बात करे. मगर मीडिया अपने इस कर्म को अंजाम ही नहीं देता. अखबार का संपादक तय करता है कि वह किसे अपने अखबार के पहले पेज पर कितनी बड़ी जगह देगा. आज का संपादक जो बिकता है, उसको उपर बहुत बड़ी जगह पर लगाता है, जो नहीं बिकता है, उसे कोने में डाल देता है. क्योंकि सब कुछ बाजार के आधीन हो रहा है.

आपने मुक्काबाजबनाने से पहले किस तरह कि रिसर्च की और क्या पाया?

मैं फिल्म के प्रदर्शन से पहले इन चीजों पर बात नही करना चाहता. मैं अपनी बात को फिल्म के माध्यम से कहना चाहता हूं. मैंने सारा रिसर्च वीडियो रिकौर्डिंग के साथ किया है. इन वीडियो रिकौर्डिंग से हमें पता चला की सिस्टम किस तरह से खिलाड़ियों को परेशान करता है.

आप खुद दिल्ली में जाकर देखिए. खेल गांव बनाया गया था. पर क्या वहां पर खेल के मैदान पर खेल होते हैं? मीडिया को जाकर देखना चाहिए कि खेल के मैदानों की क्या स्थिति है? बिहार में भी बहुत बड़ा स्टेडियम बनाया गया. रांची में बनाया गया. मगर इन स्टेडियम को खेल के लिए नहीं बल्कि प्रवचन के लिए, भाषण बाजी के लिए, कन्वोकेशन के लिए किराए पर दिया जाता है. आप पैसे देकर इन मैदान में खेलने जा सकते हैं, अन्यथा नहीं. हम विदेश जाते हैं, और यदि हमें कोई खेल खेलना हो या स्वीमिंग करना हो, तो गूगल सर्च करने पर हम जिस जगह खड़े होते हैं, वहां से 5 मिनट की दूरी पर सुविधाएं मिल जाती हैं. भारत में यह सब संभव नही है. वहां आप किसी को भी नहीं जानते, तो भी खेल के मैदान में घुस सकते हैं. पर भारत में बिना जान पहचान के आप खेल के मैदान में नहीं जा सकते. हमारे देश में ऐसे लोग नही हैं, जो कि असली खिलाड़ी को पहचान कर उसे उठाने का काम करें. सरकार में बैठे लोग अपने किसी मंत्री या रिश्तेदार के लड़के को खेल में आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं, भले ही उसे खेलना ना आता हो.

मगर अभिषेक बच्चन सहित कुछ फिल्म कलाकारों ने कबड्डी व कुछ अन्य खेलों को आगे बढ़ाने के लिए टीमें खरीदी. प्रतियोगिताएं की. इसके बावजूद कबड्डी या दूसरे खेल लोकप्रिय क्यों नहीं हुए?

यह सभी लोग मार्केटिंग कर रहे हैं, खेल को बेच रहे हैं. खेल को लोकप्रियता तभी मिलती है, जब उसे एक सही प्लेटफार्म मिलता है. यहां पर प्लेटफार्म दिया नहीं जाता. हमारे यहां कोई बौक्सर ही नही है. हमारे यहां बेचारा सही खिलाड़ी सायकल पर घूमता रहता है.

एक खिलाड़ी को सिस्टम की जरूरत क्यों पड़नी चाहिए?

हर खिलाड़ी को सिस्टम की जरूरत पड़नी चाहिए और पड़ती है. सिस्टम इसीलिए है. हम सरकार चुनते है, जिससे वह हमें सुख सुविधा उपलब्ध कराए. हम जिस सरकार को चुनते हैं, उसकी हमारे प्रति कुछ जिम्मेदारियां है. हकीकत में हमारे देश में हम स्पोर्ट्स की इज्जत ही नहीं करते हैं. मुझे एक ऐसा आदमी बताइए,  जो स्पोर्ट्स से ना जुड़ा हो और उसे स्पोर्ट्स के बारे में जानकारी हो.

हमारी सायकोलौजी बचपन से ही सरकारी नौकरी ढूंढ़ने की होती है. हम सोचते हैं कि आईएएस या आईपीएस बन जाएं, हमारी सरकारी नौकरी लग जाए और हमारी जिंदगी सकून से बीत जाएगी.

यह हालात स्पोर्ट्स को लेकर भी है. निचले या मध्यम वर्गीय परिवार से जुड़े लोग सरकारी नौकरी पाने की इच्छा के तहत स्पोर्ट्स को पार्ट कट मानकर स्पोर्ट्स से जुड़ते हैं.

यदि मैं लोगों कि सोच के हिसाब से चलूंगा, तो कभी कुछ नहीं हो पाएगा. कम से कम मैं तो लोगों की सोच के हिसाब से काम नहीं करता. देखिए, मीडिया का काम गौसिप सुनकर सवाल पूछना नहीं, बल्कि शोध करने के बाद सवाल करना है. हमें सोचना यह होगा कि हम लोगों की सोच को कैसे बदलें? जिस पर हम सोचते ही नहीं है.

हमारे देश में जिस तरह से फिल्म का प्रमोशन होता है, उस तरह से मैं प्रमोशन नहीं करता. क्योंकि इस तरह के प्रमोशन में मीडिया बिना फिल्म देखे सवाल करती है. मैंने अपनी फिल्म ‘‘मुक्काबाज’’में एक ही सवाल उठाया है कि हमारा देश जनसंख्या के मामले में चीन के बाद दूसरे नंबर पर है, इसके बावजूद हम ओलपिंक खेलों में दो से ज्यादा मैडल क्यों नहीं ला पाते. इस सवाल में सारे मुद्दे आ जाते हैं. वह सारी बातें आ गयीं, जिन पर हर भारतीय को सोचना चाहिए. अब आपको जवाब चाहिए, तो आप फिल्म देंखे. फिर सोचिए. मेरा काम है इंसान का ध्यान उस तरफ ले जाना. फिर जिसे उस बात से परेशानी हुई हो वह सवाल करे.

इन दिनों सिनेमा के विकास के नाम पर हर राज्य सरकार सब्सिडी दे रही है. क्या इससे सिनेमा को फायदा हो रहा है?

सरकार की सब्सिडी योजना के ही चलते सिनेमा में काफी काम हो रहा है. अब सामाजिक राजनैतिक सिनेमा बनने लगा है. हमारी फिल्म ‘मसान’ के बाद अब ‘मुक्काबाज’ को भी उत्तर प्रदेश सरकार की ‘फिल्म बंधु’’ से आर्थिक मदद मिली है. इस तरह की मदद से हम बेहतर सिनेमा बनाते हैं. सरकारों को ऐसा करना भी चाहिए. आप दूसरे देशों में जाइए, वहां हमारे देश के मुकाबले अधिक सुविधाएं मिलती हैं. हिंदी तमिल, मलयालम और तेलगू को सुविधाएं कम मिलती हैं, क्योंकि इन भाषाओं के सिनेमा के दर्शक काफी हैं. मैं हर राज्य के बारे में नहीं जानता, पर उत्तर प्रदेश में फिल्म बंधू बहुत अच्छे ढंग से काम कर रहा है.

हर सरकार को यह समझना चाहिए कि सिनेमा हमारे राज्य या देश का ‘कल्चरल अम्बेसेडर’/‘सांस्कृतिक दूत’है. जो देश इस बात को समझ गया, वह तरक्की कर रहा है. आप खुद सोचिए कि भारतीय फिल्म ‘‘जिदंगी ना मिलेगी दोबारा’’ को स्पेन में फिल्माया जा रहा था, तो फिल्म के सेट पर स्पेन के राजा ने आकर फिल्मकार व कलाकारों का सम्मान किया था. वह जानते है कि सिनेमा की वजह से उस देश को टूरिज्म मिलता है. लोग सिनेमा के माध्यम से उस देश की सभ्यता, संस्कृति व घूमने वाली जगहों के बारे में जान पाते हैं.

आपकी राय में भारत में सिनेमा को तवज्जों नहीं दी जा रही है. यदि ऐसा है, तो इसकी वजहें क्या है?

आपको यह सवाल सरकार से पूछना चाहिए. मेरा काम सिर्फ सिनेमा बनाना है.

फिल्मकार के रूप में क्या सवाल उठाना ही आपका काम है,उसका हल बताना नहीं?

जी हां! फिल्मकार के तौर पर मेरा काम समाज व देश में जो कुछ हो रहा है, उसका आइना सिनेमा के माध्यम से दिखाना मात्र है. फिल्मकार के तौर पर उन सवालों को उठाना है, जिन्हें कोई पूछ नहीं रहा है. सवालों का जवाब ढूंढ़ना मेरा काम नहीं है. एक वक्त वह था, जब हमारे यहां ‘सुजाता’ व ‘बंदिनी’जैसा सिनेमा बनता था. हम इसी तरह के सिनेमा को देखकर बड़े हुए हैं. मगर अब इस तरह का सिनेमा क्यों नहीं बनता?

आप फिल्मकार हैं, तो आपने सोचा होगा कि इस तरह का सिनेमा क्यों नही बन रहा है?

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मीडिया की यही समस्या है. मीडिया मेन स्ट्रीम सिनेमा के फिल्मकारो से कभी नहीं पूछता कि वह सामाजिक फिल्में क्यों नहीं बना रहा? हम जैसे लोग जो कि नए तरह का सिनेमा बना रहे हैं, उन्ही से पूछते हैं कि हम यह क्यों बना रहे हैं? क्या कभी मीडिया ने मेनस्ट्रीम सिनेमा बनाने वालों से सवाल किया कि आप लोग हमारे समाज में जो कुछ हो रहा है, उस पर फिल्में क्यों नहीं बनाते?

आपने यह कैसे सोच लिया कि मैंने या दूसरे पत्रकार ने मेनस्ट्रीम सिनेमा बनाने वालों से सवाल नहीं किया होगा?

इसकी वजह यह है कि मैंने आज तक इस तरह के सवाल पढ़े नहीं है. आप लोगों को चाहिए कि मेन स्ट्रीम सिनेमा बनाने वालों से पूछिए कि वह अपना हिंदी सिनेमा लंदन या जापान में जाकर क्यों फिल्माते हैं? आखिर हमारे अपने देश में लंदन, फ्रांस, पेरिस या स्पेन कहां है? मीडिया ने कभी किसी दर्शक से नहीं पूछा कि भारत में रहते हुए आप वह सिनेमा क्यों देखते हैं, जो लंदन या स्पेन में फिल्माया जाता है.

आप खुद मराठी भाषा की फिल्म का निर्माण कर चुके हैं. आपके अनुसार मराठी सिनेमा कितनी प्रगति कर रहा हैं?

मराठी सिनेमा प्रगति कर रहा था. अच्छी मराठी फिल्में बन रही थीं. अब क्या स्थिति है, पता नहीं. जब कोई मूवमेंट शुरू होता है, तो अच्छा लगता है, अच्छा काम होता है. फिर लोग उसका दुरूपयोग करने लगते हैं. जैसे कि जब सोशल मीडिया का प्रादुर्भाव हुआ था, तो काफी अच्छा था. अब यह गलत राह पर है. मराठी सिनेमा को जब महाराष्ट्र सरकार से सब्सिडी मिलनी शुरू हुई, तो लोगों ने अच्छा सिनेमा बनाया. पर बाद में लोगों ने महज सब्सिडी हासिल करने के लिए सिनेमा बनाना शुरू कर दिया.

आप कहते हैं कि सोशल मीडिया गलत राह पर है, मगर आप खुद सोशल मीडिया पर काफी व्यस्त रहते हैं?

मैं किसी को फौलो नहीं करता. मैं अपनी बात कह देता हूं. बस..सोशल मीडिया पर कुछ भी पढ़ता ही नहीं. शुरू में सही ही था उपयोगी था. अब सोशल मीडिया में सबसे अधिक गौसिप होने लगा है. पता ही नहीं चलता कि सच क्या है. मीडिया भी सोशल मीडिया की खबरें उठाकर बिना सच जाने छापने लगा है. मैंने एक अखबार को इंटरव्यू दिया, वही इंटरव्यू कई अखबार में छपा हुआ मिलता है. मजेदार बात यह है कि धीर धीरे उस इंटरव्यू में कई चीजें उलटफेर होती जाती हैं. पत्रकार अब नई हेडलाइन के चक्कर में रहता है. मैं जिन पत्रकारो से नियमित मिलता हूं, वह भी यही कर रहे हैं. अब पत्रकारिता काफी बदल गयी है. अब हर इंसान को एक आसान सी जिंदगी चाहिए. सब कुछ अर्थ के अधीन है. मोबाइल कंपनियां अपने सिस्टम से एक साल बाद आपके मोबाइल को खराब कर देती हैं, जिससे आप उनका नया मोबाइल खरीदें. अब गारंटी नहीं, वारंटी मिलती है. अब मुझे आपका पैसा चाहिए, तो मुझे आपको कुछ बेचना पड़ेगा. इसलिए जरुरत पैदा की जाती है. अब लोगो को सच नहीं बताया जाता.

क्या यह सब शिक्षा की कमी का असर है?

यह सब शिक्षा की कमी के अलावा लोगों को बर्गला कर किया जाता है.

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