गुलाबचंद महीनेभर के सफर के बाद थकेमांदे घर वापस आए थे. अटैची को रख कर सोफे पर अधलेटे हुए ही थे कि मेज पर रखे शादी के एक न्योते पर नजर पड़ गई. गुलाबचंद ने पास बैठी अपनी श्रीमतीजी से पूछा, ‘‘यह न्योता किस का है?’’
श्रीमतीजी बोलीं, ‘‘आप के बचपन के लंगोटिया यार मंत्रीजी आज ही दे गए हैं. उन के लाड़ले की शादी अपने इलाके के सांसदजी की बेटी से चट मंगनी पट ब्याह वाली तर्ज पर तय हो गई है. आप को बरात में चलने के लिए कह गए हैं.’’ खुशी और हैरानी से न्योते के कार्ड को जैसे ही उठाया, लिफाफे पर लिखी गई इबारत पर नजर पड़ते ही गुलाबचंद के दिमाग में अजीब सी हलचल मच गई. उन के मुंह से निकल पड़ा, ‘‘छपाई में इतनी बड़ी गलती हो गई और मंत्रीजी का इस पर ध्यान ही नहीं गया…’’
श्रीमतीजी भी कुछ चौंक कर बोलीं, ‘‘क्या गलती हो गई? मैं ने तो इसे अभी तक छुआ भी नहीं है. आप के आने के तकरीबन घंटाभर पहले ही तो दे गए हैं मंत्रीजी.’’ गुलाबचंद ने वह कार्ड श्रीमतीजी को थमा दिया. देखते ही वे भी हैरानी से सन्न रह गईं.
बात थी ही कुछ ऐसी. लिफाफे के बाहर और भीतर ‘पाणिग्रहण संस्कार’ की जगह ‘गठबंधन संस्कार’ छपा था. इस कमबख्त एक शब्द के चलते गुलाबचंद महीनेभर की थकान भूल से गए और उन्होंने श्रीमतीजी से कहा, ‘‘मंत्रीजी को फोन मिलाओ.’’
श्रीमतीजी ने कहा, ‘‘अभीअभी थकेमांदे इतने दिनों बाद आए हो… पहले फ्रैश हो कर कुछ चायनाश्ता कर लो, बाद में आराम से मंत्रीजी से बात करना.’’ श्रीमतीजी की बात को तरजीह देते हुए गुलाबचंद फ्रैश होने चल दिए, लेकिन ‘गठबंधन संस्कार’ दिमाग से निकलने का नाम ही नहीं ले रहा था. उन्होंने मंत्रीजी को मोबाइल फोन से नंबर मिला ही डाला.
फोन पर मंत्रीजी का छोटा सा वाक्य कानों में पड़ा, ‘गुलाबचंदजी, इस समय पार्टी की एक जरूरी मीटिंग चल रही है, जो देर रात तक चलने की उम्मीद है. सुबह मुलाकात होगी…’
दूसरे दिन सुबह जब गुलाबचंद नाश्ता कर ही रहे थे कि मंत्रीजी का फोन आ गया, ‘हैलो गुलाबचंदजी, मैं आप का बेसब्री से इंतजार कर रहा हूं… जल्दी आ जाओ.’ मंत्रीजी का फोन सुन कर गुलाबचंद ने जल्दबाजी में नाश्ता किया और जैसेतैसे गरमगरम चाय पी. बड़े ही उतावलेपन के साथ, बिना कपड़े बदले, जिस हालत में थे, उसी हालत में वे मंत्रीजी के घर की ओर चल पड़े.
‘गठबंधन संस्कार’ शब्द उन्हें अब भी दुखी कर रहा था. ‘सोलह संस्कारों’ के बाद यह ‘सत्रहवां गठबंधन संस्कार’ कब से, कहां से आ गया है? जैसे नए जमाने के फिल्म वाले पुराने फिल्मी गीतों को ‘रीमिक्स’ कर के उन्हें मौडर्न बना रहे हैं, उसी तरह ‘सोलह संस्कारों’ को रीमिक्स कर के मौडर्न तो नहीं बनाया जा रहा है? इसी उधेड़बुन में गुलाबचंद मंत्रीजी के दरवाजे पर पहुंचे. देखा कि मंत्रीजी दरवाजे पर ही खड़ेखड़े अपनी पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं से बतिया रहे थे. गुलाबचंद को देखते ही मंत्रीजी कार्यकर्ताओं से विदा लेते हुए उन्हें घर के अंदर ले गए.
उन्होंने मंत्रानी को आवाज लगाई, ‘‘देखो, आज घर पर कौन पधारा है?’’ मंत्रानी ने रसोई से निकलते हुए जैसे ही गुलाबचंद को देखा, बड़ी खुश हो कर बोलीं, ‘‘इतने दिनों तक कहां रहे गुलाबचंदजी? हम लोग बड़ी बेसब्री से आप का इंतजार कर रहे थे…’’
मंत्रानी कुछ और कहने जा रही थीं कि गुलाबचंद बीच में बोल पड़े, ‘‘भाभीजी, मुझे तो भाई साहब से कुछ दूसरी ही शिकायत है और इतनी बड़ी है कि घर आ कर जैसे ही शादी के कार्ड पर नजर पड़ी…’’ ‘‘रहने दो गुलाबचंदजी…’’ मंत्रीजी ने उन की बात को काटते हुए कहा, ‘‘मैं जानता हूं कि तुम्हें किसकिस बात को ले कर मुझ से शिकायत है…’’
इसी बीच भाभीजी यानी मंत्रानी जलपान ले कर आ गईं. जलपान करते हुए मंत्रीजी ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘पहली बड़ी शिकायत तो यह है कि शादी के कार्ड को देखते ही तुम गुस्से में आपे से बाहर हो गए होंगे… और दूसरी शिकायत जिस में तुम उलझे हुए हो कि लड़की वाले विपक्षी पार्टी में होने के साथसाथ मेरे घोर राजनीतिक विरोधी ही नहीं, दुश्मन भी हैं. मेरा उन से हमेशा छत्तीस का ही आंकड़ा रहा है. क्यों, है न यही बात?
‘‘बात यह थी कि एक दिन हमारे भावी समधी सांसदजी ने अपने एक भरोसेमंद हमराज द्वारा बातोंबातों में राजनीतिक स्टाइल की चाशनी में मेरे सामने प्रस्ताव रखा कि अगर मैं सांसदजी की बेटी से अपने एकलौते लाड़ले की सगाई कर दूं तो सांसदजी अपने खास विधायकों से बिना शर्त मेरी पार्टी को समर्थन दिलवा देंगे. बाद में सही मौका आने पर वे अपनी पार्टी का मेरी पार्टी में विलय भी कर लेंगे. ‘‘तुम तो जानते ही हो कि मेरी पार्टी अल्पमत में रहते हुए कितनी मुश्किलों से सरकार चला रही है. मेरी सरकार की कुरसी के गठबंधन में इतनी बेमेल गांठें हैं कि अगर एक गांठ भी खुल जाए तो सबकुछ इस कदर बिखर जाएगा कि भविष्य में दोबारा कुरसी पर बैठने की शायद ही नौबत आए.
‘‘ऐसी मजबूर हालत में अगर समधी सांसदजी हमें समर्थन दे रहे हैं और वे अपनी पार्टी का मेरी पार्टी में विलय कर लेते हैं तो हमारी हालत ऐसी हो जाएगी कि गठबंधन की अगर 2-4 गांठें खुल भी जाएं, टूट जाएं तब भी सरकार चलाने में मेरी पार्टी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा. ‘‘और एक राज की बात तुम्हें चुपके से कह रहा हूं… मौका आने पर अपनी ही पार्टी में जोड़तोड़ करवा कर मैं खुद ही मुख्यमंत्री बनने के चक्कर में लग गया हूं. इन्हीं सब राजनीतिक पैतरों को ध्यान में रखते हुए उन का ‘औफर’ आते ही मैं ने तुरंत हां कर दी और शादी का मुहूर्त निकलवा लिया.
‘‘गठबंधन संस्कार… यही शब्द तुम्हें दुखी कर रहा है न? चूंकि यह शादी राजनीति की बिसात पर हो रही है, जहां हर वक्त अपने फायदे के लिए मौके की तलाश रहती है, आज का दोस्त कल का दुश्मन और आज का विरोधी, कल का समर्थक बन जाता है, इसी माहौल में यह रिश्ता तय हुआ है. ‘‘इन बातों के ध्यान में आते ही मेरे दिमाग में ‘पाणिग्रहण संस्कार’ की जगह ‘गठबंधन संस्कार’ का जन्म हुआ.
‘‘भावी समधी सांसदजी ने भी यह रिश्ता राजनीति की बिसात पर तय किया है और नेता का क्या भरोसा? काम सधने के बाद कब पलटी मार जाए? कौनसी नई शर्त थोप दे? इन्हीं सब बातों को ध्यान में रख कर ही मैं ने ‘गठबंधन संस्कार’ शब्द का इस्तेमाल किया है. ‘‘सांसदजी ने शर्त रखी थी कि अगर मैं उन की लड़की की सगाई अपने लड़के से कर दूं तो पहले वे अपने विधायकों का बिना शर्त समर्थन मेरी पार्टी को देंगे और मौका आने पर वे अपनी पार्टी का विलय मेरी पार्टी में करेंगे. अगर उन्हें सामान्य रूप में यह रिश्ता तय करना होता तो वे सीधेसीधे मुझ से कह सकते थे. राजनीति अपनी जगह, रिश्ता अपनी जगह. रिश्तों को तो राजनीति से संबंध रखना ही नहीं चाहिए. सामान्य रूप में मैं इस रिश्ते को नकार भी सकता था, लेकिन उन की इस बात पर मेरे नकारने की गुंजाइश ही न रही.
‘‘रही रिश्तों की राजनीति की बात. मान लो कि शादी हो जाने के बाद वे ऊपर से समर्थन तो करते रहते लेकिन विलय वाली बात को यह कह कर नकारते रहते कि अभी सही समय नहीं आया या विलय तभी करेंगे जब मैं मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने करीबियों की बलि दे कर उन के विधायकों को मलाईदार पदों पर बैठा दूं. अगर मैं ऐसा मजबूरन कर भी दूं तब भी वे मुझे चैन से नहीं रहने देंगे. हमेशा समर्थन वापसी का डर दिखाते हुए एक न एक नई शर्त मुझ से मनवाते रहेंगे. ‘‘इन हालात में मैं क्या करता? इन्हीं सब पैतरों की काट करने के लिए मैं ने ‘गठबंधन संस्कार’ लिखवाया है.
‘‘हिंदू धर्म में ‘पाणिग्रहण संस्कार’ होने के बाद आसानी के साथ रिश्ता तोड़ा नहीं जा सकता. भविष्य में सांसदजी के अडि़यलपन पर अगर रिश्ता तोड़ने के बारे में विचार करता तो दहेज के नाम पर सताने की तलवार आसानी से मेरा गला काट सकती है. मन मसोस कर समधीजी की ऊलजुलूल शर्त मुझे माननी पड़ती, लेकिन ‘गठबंधन संस्कार’ में ऐसा हरगिज नहीं हो सकता.
‘‘राजनीति में अलगअलग पार्टी की बेमेल गांठों का बंधन कब बंधे, कब खुले या टूटे, कहा नहीं जा सकता और इस जुड़ने, खुलने या टूटने में हमारा संविधान चुप है, कानून लाचार है… ‘‘इस समय हमारी पार्टी सरकार चला रही है, कल सुबह के अखबार में आप हैडिंग पढ़ सकते हैं कि कल की फलां विपक्षी पार्टी ने आज सत्ता हथिया ली है.
‘‘अब अगर राजनीति में इस ‘गठबंधन’ शब्द का इस्तेमाल न होता तो सत्ता का जोड़तोड़ भी इतनी आसानी से न होता. कानून इजाजत ही नहीं देता. ‘‘ठीक यही बात ‘गठबंधन संस्कार’ में है. ‘गठबंधन संस्कार’ कब तक दांपत्य जीवन में जुड़ा रहे और कब यह संस्कार दांपत्य जीवन से अलग हो जाए… इस पर कानून या समाज या फिर सरकार का कोई बंधन नहीं है, जबकि ‘पाणिग्रहण संस्कार’ में बंधन ही बंधन हैं. धर्म, समाज, कानून सब ‘पाणिग्रहण संस्कार’ को जकड़े हुए हैं.
‘‘अब अगर समधी सांसदजी पार्टी का समर्थन वापसी का जरा सा भी तेवर भविष्य में दिखाएंगे तो उन के तेवर को उन्हीं के ऊपर साधते हुए मैं भी ‘गठबंधन संस्कार’ को भंग करने, तोड़ देने की चेतावनी दूंगा. यह एक ऐसा हथियार होगा जिस के बलबूते मैं समधी सांसदजी को जब तक जीवन में राजनीति रहेगी, तब तक उन पर ताने रहूंगा और वे बेबस बने रहेंगे, चुप रह कर समर्थन देते रहेंगे. ‘‘मुख्यमंत्री बनने के बाद मैं ‘गठबंधन संस्कार’ को सदन में एक नया विधेयक पास करा कर कानूनी जामा पहना दूंगा.’’ अपने नेता दोस्त के ऐसे विचार सुन कर गुलाबचंद सन्न रह गए और उलटे पैर घर लौट गए.
सिनेमा से जुड़े लोगों के लिए ‘‘कान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’’ कुंभ माना जाता है. ‘कान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ में पूरे विश्व का सिनेमा व फिल्मकार जुटता है. भारतीय सिनेमा से जुड़ा हर इंसान किसी न किसी तरह कान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का हिस्सा बनना चाहता है. मगर ‘शाहिद’, ‘अलीगढ़’, ‘न्यूटन’ और ‘ओमेर्टा’ जैसी फिल्मों में अभिनय कर बतौर अभिनेता अपनी अलग पहचान रखने वाले राज कुमार राव को अब तक के अपने करियर में कभी भी ‘कान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ में जाने का अवसर नही मिला. पर अब जब उन्हें यह अवसर मिल रहा है, तो वह कान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल नहीं जाएंगे.
वास्तव में भारतीय मूल की अमरीकन फिल्मकार नम्रता गुजराल के निर्देशन में राज कुमार राव ने एक फिल्म ‘‘ 5 वेडिंग्स’’ की है, जिसमें उनके साथ नरगिस फाखरी भी हैं. अंग्रेजी भाषा में बनी यह फिल्म भारत में ही फिल्मायी गयी है. अब ‘‘71 वें कान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’’ में फिल्म ‘‘ 5 वेडिंग्स’’ का विश्व प्रीमियर होना है, इसलिए इस फिल्म से जुड़े हर शख्स को ‘कान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ का हिस्सा बनने का गौरव मिलने जा रहा है, मगर राज कुमार राव इस मौके का फायदा नहीं उठाएंगे.
खुद राज कुमार राव कहते हैं- ‘‘हर कलाकार का सपना होता है, कान फिल्म फेस्टिवल का हिस्सा बनना. यह मेरी खुश किस्मती है कि मेरी फिल्म ‘फाइव वेडिंग्स’ कान फिल्म फेस्टिवल में जा रही है. पर अफसोस मैं खुद नहीं जा पाउंगा. क्योंकि उस वक्त मैं अपनी फिल्म की शूटिंग में व्यस्त रहूंगा.’’
फिल्म ‘‘ 5 वेडिंग्स’’ जीवन मृत्यु, खोए हुए प्यार, हिजड़ों, सभ्यता व संस्कृति के टकराव के साथ साथ राजनीति की भी बात करती है.
बौलीवुड की खूबसूरत अभिनेत्री ऐश्वर्या राय बच्चन यूं तो अपनी फिल्मों को लेकर हमेशा ही चर्चा में रहती हैं, लेकिन इस बार वो अपनी कुछ तस्वीरों को लेकर चर्चा में आ गई हैं. दरअसल, ऐश्वर्या ने हाल ही में एक फैशन मैगजीन के लिए फोटोशूट कराया है. इसमें वह हौलीवुड सिंगर फैरेल विलियम्स के साथ स्टनिंग पोज देती दिखाई दे रही हैं. वैसे तो मैग्जीन के कवर पेज पर नीले रंग के गाउन में ऐश्वर्या राय काफी खूबसूरत लग रही हैं, लेकिन फैरल के साथ कराए गये अपने इस फोटोशूट की वजह से वह सोशल मीडिया पर काफी ट्रोल की जा रही हैं. फैन्स उनकी तस्वीरों पर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं.
इसमें कोई दो राय नहीं है कि ग्लोबल आइकौन फैरेल विलियम्स के साथ ऐश्वर्या की खूबसूरती देखते ही बन रही है. कुछ लोगों को इस फोटोशूट में ऐश्वर्या और फैरेल का यह अंदाज काफी पसंद आ रहा है जबकि कई सोशल मीडिया यूजर्स इसकी कड़ी आलोचना कर रहे हैं. कुछ लोगों ने इसे फोटोशौप करार दिया है तो कई लोग उनकी इस फोटो को लेकर मजाक भी बना रहे हैं और इनकी जोड़ी को औकवर्ड बता रहे हैं.
आपकी जानकारी के लिए बता दें, आखिरी बार फिल्म ‘ऐ दिल है मुश्किल (2016)’ में नजर आईं ऐश्वर्या इन दिनों फिल्म ‘फन्ने खां’ में बिजी हैं. इस फिल्म में वह एक सिंगर की भूमिका अदा कर रही है. औस्कर नामांकित डच फिल्म ‘एव्रीबडीज फेमस’ की आधिकारिक रीमेक ‘फन्ने खां’ अतुल मांजरेकर द्वारा निर्देशित होगी और इसमें ऐश्वर्या राय बच्चन और राजकुमार राव जैसे सितारे महत्वपूर्ण भूमिकाओं में होंगे.
VIDEO : कार्टून लिटिल टेडी बियर नेल आर्ट
ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTubeचैनल.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश में ‘औपरेशन ग्रीन योजना’ की शुरुआत करना चाहते हैं. इस योजना को प्रधानमंत्री ने ‘टौप’ कहा है. खेती से जुड़ी इस योजना में टी यानी टमाटर, ओ मतलब ओनियन और पी मतलब पोटैटो को शामिल कर इसे टौप कहा गया है.
देश में इस से पहले श्वेतक्रांति और हरितक्रांति किसानों के लिए बनी थीं. श्वेतक्रांति में दूध और डेयरी को प्राथमिकता दी गई थी तो हरितक्रांति में अनाज उत्पादन पर जोर था. दोनों ही योजनाओं का प्रभाव यह पड़ा कि देश के किसानों ने अपनी मेहनत व लगन से इन को सफल बनाया. देश को अनाज और दूध के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया. देश के किसान की सब से बड़ी त्रासदी यह है कि जैसे ही वह पैदावार को बढ़ाता है, फसल के दाम घट कर माटी के मोल हो जाते हैं, जिस से उसे लागत मूल्य भी नहीं मिल पाता है.
सरकार हर बार समर्थन मूल्य दे कर यह दिखाती है कि वह किसानों पर बहुत बड़ा उपकार कर रही है. समर्थन मूल्य की घोषणा सरकार एक राजा के अंदाज में करती है जिस से लगता है कि वह किसानों पर उपकार कर रही है. सरकार के पास समर्थन मूल्य को घोषित करने का कोई फार्मूला नहीं है. समर्थन मूल्य लागू करने को ले कर कोई भी सरकार स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू नहीं करना चाहती. भाजपा ने अपने चुनावी वादे में कहा था कि वह स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करेगी. किसानों को एक झुनझुना देने के लिए सरकार ने कहा कि साल 2022 तक किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी. यह एक ऐसी बात है जिस को न समझा जा सकता है, न समझाया जा सकता है.
केंद्र की भाजपा सरकार नारे देने में माहिर है. उसे पता है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में किसानों की समस्याएं बड़ा मुद्दा होंगी. आलू, प्याज और टमाटर के किसान सब से अधिक परेशान हैं. किसानों के लिए ये ‘कैश क्रौप’ हैं. इन में भी अब किसानों को मुनाफा नहीं मिल रहा. ऐसे किसानों के लिए नरेंद्र मोदी का नया नारा टौप है. औपरेशन ग्रीन योजना के तहत इस को बढ़ाया जाना है. प्रधानमंत्री ने कहा कि इस के तहत फसल का डेढ़गुना समर्थन मूल्य देना ऐतिहासिक फैसला है. हाल के कुछ सालों में पूरे देश में प्याज, आलू और टमाटर उगाने वाले किसानों की संख्या तेजी से बढ़ी है. इन किसानों की परेशानियां कम करने के लिए यह नारा दिया गया है ताकि वे स्वामीनाथन आयोग की बातों को भूल जाएं.
लागत से कम समर्थन मूल्य
सरकार लागत मूल्य को ले कर अपनी खूब वाहवाही करती है. जितना पैसा किसानों को राहत देने में नहीं लगता उस से अधिक योजना की वाहवाही बखान करने वाले विज्ञापनों व कार्यक्रमों में बरबाद हो जाता है. समर्थन मूल्य के खेल को समझने के लिए आलू की खेती की लागत को देखना जरूरी है. एक बीघा खेत में आलू की बोआई करने में किसान का करीब 23 हजार रुपया खर्च होता है. बहुत अच्छी फसल हो, तो 20 से
25 क्विंटल के बीच आलू की पैदावार होती है. सरकार का आलू पर समर्थन मूल्य 487 रुपए प्रति क्विंटल है. अगर एक खेत में 25 क्ंिवटल आलू की पैदावार मानें, तो 12 हजार रुपए आलू की पूरी फसल का सरकार से समर्थन मूल्य मिलेगा. ऐसे में किसान को 11 हजार रुपए प्रति बीघा का नुकसान साफ दिखता है (देखें बौक्स). इस के अलावा सरकारी खरीद में तमाम तरह की परेशानियां हैं, सो अलग.
सरकारी क्रय केंद्रों पर केवल 30 से 55 एमएम का आलू ही खरीदा जाता है. कई बार अच्छी फसल होने से आलू का आकार बढ़ भी जाता है. खराब फसल होने पर आलू का आकार घट जाता है. ऐसे में आधी से अधिक फसल क्रय योग्य ही नहीं मानी जाती . यह भी किसानों की परेशानी की बड़ी वजह है. सरकार किसानों पर उपकार जताते हुए आलू को 300 किलोमीटर दूर से मंडी तक लाने के लिए 50 रुपए क्ंिवटल की छूट, मंडी शुल्क में 2 प्रतिशत और सेस में आधा प्रतिशत छूट देने की बात भी करती है. यह प्रक्रिया बेहद जटिल है, जिस की वजह से छोटे किसान को इस का लाभ नहीं मिलता है.
आलू की लागत और सरकार द्वारा दिए जा रहे समर्थन मूल्य की तुलना से साफ होता है कि 1 बीघा की आलू खेती में किसान को तकरीबन 11 हजार रुपए का नुकसान होता है.
पैदावार ज्यादा, नुकसान ज्यादा
आलू की लागत और बिक्री को देखने से साफ है कि टौप योजना का किसानों को क्या लाभ होने वाला है. इस योजना के तहत आने वाली तीनों फसलों टमाटर, प्याज, आलू की एकसी कहानी है. जब किसानों के खेत से इन की खरीदारी होती है तो वह बहुत सस्ती होती है. जब ये चीजें बाजार से उपभोक्ता तक पहुंचती हैं तो इन की कीमतें दोगुना से अधिक हो जाती हैं.
जिस आलू को सरकार 5 रुपए प्रतिकिलो के भाव से कम में खरीदती है वह उसी समय बाजार में 10 रुपए प्रतिकिलो से अधिक का बिक रहा होता है. कुछ समय के बाद यही आलू 20 से 30 रुपए प्रतिकिलो तक बिकता है. एक तरफ किसान कोल्डस्टोर में रखे अपने आलू को सड़क पर फेंकने को मजबूर होता है तो दूसरी तरफ किसान के पैदा किए आलू से ही बिचौलिया मालामाल होता है.
टमाटर और प्याज को ले कर भी यही कहानी है. ये फसलें इस तरह की हैं कि जिन को कुछ दिनों तक बाजार में जाने से रोका जा सकता है. जिस की वजह से बिचौलियों को इन के दाम बढ़ानेघटाने का मौका मिल जाता है. उत्तर प्रदेश में आलू सब से अधिक पैदा होता है. गन्ना के बाद आलू किसानों के लिए सब से बड़ी ‘कैश क्रौप’ है. आलू के किसानों की बदहाली को सरकार सामने नहीं आने देना चाहती.
किसानों ने जब विरोधस्वरूप लखनऊ में विधानसभा रोड पर एक रात आलू फेंक कर सरकार का ध्यान अपनी परेशानी की ओर दिलाया तो सरकार ने आलू फेंकने वालों को जेल भेज दिया. उन के इस कदम को विरोधी पार्टी की साजिश करार दिया.
आलू, टमाटर और प्याज की खेती करने वाले किसानों की परेशानी यह है कि उन की पैदावार जितनी बढ़ती है, फसल की कीमत उतनी ही घटती जाती है. किसान फसल को रोके रखने की हालत में नहीं होता. वह किसी भी कीमत पर पैदावार को बेचने को मजबूर रहता है. इस का लाभ बिचौलिए उठाते हैं. वे किसानों से कम कीमत पर खरीद कर महंगी कीमत पर बाजार में बेचते हैं. प्रधानमंत्री की ‘औपरेशन ग्रीन योजना’ यानी टौप में इस को हल करने का कोई फार्मूला नहीं सुझाया गया है.
केवल नारों से भला नहीं होगा
सरकार को किसानों की परेशानियों को जमीनी स्तर पर देखना चाहिए. केवल नारे देने से किसानों का भला नहीं होने वाला. सरकार को लागत के अनुपात में फसल का मूल्य किसानों को देना चाहिए. आज किसान महंगाई बढ़ने, छुट्टा जानवरों द्वारा फसल को बरबाद करने और बाजार में फसल की कम कीमत मिलने से परेशान हैं. घर बनाने से ले कर खेती के दूसरे प्रबंध करने तक में उसे महंगाई का सामना करना पड़ रहा है. बढ़ती महंगाई का असर किसानों पर भी पड़ता है. सरकार किसानों को महंगाई से बचाने के लिए कुछ नहीं कर रही है. एक के बाद एक नएनए नारे दे कर सरकार किसानों को केवल बरगलाने का काम कर रही है.
VIDEO : कार्टून लिटिल टेडी बियर नेल आर्ट
ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTubeचैनल.
सुप्रीम कोर्ट ने एक नए फैसले में मरने का हक भी बुनियादी हकों में शामिल कर लिया है. इस का मतलब है कि अब न तो आत्महत्या एक जुर्म रहेगा और न ही बीमार पड़े हिलनेडुलने लायक न रहे आदमियों को मरने देने पर डाक्टरों को कातिल माना जाएगा. इस नए हक के बारे में बहुतकुछ अभी धुंधला है पर धीरेधीरे कानून और नियम बनने लगेंगे तो साफ हो जाएगा कि कब कौन सा मरना सम्मानजनक माना जाएगा और कब डाक्टर मरीज को जहालत व जिल्लत की जिंदगी से आसानी से छुटकारा दिला सकेंगे.
पहले कानून साफ था कि अस्पताल, डाक्टर, मातापिता या बच्चे किसी बीमार को अपनेआप मरने नहीं दे सकते थे और जहां तक कोशिश हो सके उसे बचाने के लिए लगना पड़ेगा. अब यदि किसी ने अपनी वसीयत कर रखी है कि उसे शांति से मरने दिया जाए तो डाक्टर वैसा फैसला ले सकते हैं.
ऐसा नहीं कि डाक्टर पहले ऐसा नहीं करते थे. जब मरीज को ठीक न किया जा सके तो हर अस्पताल में डाक्टर अपनेआप मरीज का इलाज बंद कर देते हैं. कई बार पूरा पैसा न मिलने पर ऐसा कर दिया जाता है.
यह मुसीबत आमतौर पर कैंसर, एचआईवी, दिल, किडनी, फालिज, याददाश्त खोने जैसी बीमारियों के मरीजों के साथ होती है जिन के ठीक होने की उम्मीद बहुत कम होती?है जब मरीज अपनेआप मर भी न रहा हो या बहुत धीरेधीरे तड़पतड़प कर मर रहा हो. डाक्टरों और घर वालों के लिए सांपछछूंदर की सी हालत हो जाती है न छोड़ते बनता है, न मरने देने के लिए हां करते बनता है. यदि थोड़ीबहुत जमीनजायदाद हो तो वह डाक्टरों या देखभाल करने में स्वाहा हो जाती है. बेहद बीमार जने की देखभाल एक आफत हो जाती है और घर वाले बेहद थक जाते हैं.
इस तरह के बीमारों से छुटकारा क्या मिल सकेगा, यह इस फैसले को ढंग से पढ़ने पर और सरकार के इसे लागू करने के तौरतरीकों पर तय होगा. इतना जरूर है कि सुप्रीम कोर्ट ने संविधान में दिए गए अनुच्छेद 21 में जीने के हक को और फैला दिया है.
दुनिया के कम ही देशों में इस हक का इस्तेमाल हो रहा है. आज जहां भी अपने हकों की जागरूकता है वहां इतना पैसा है कि बरसों तक डाक्टर बेहोश पड़े जने को जिंदा रख सकते हैं. जिन देशों में गरीब ही गरीब हैं, जैसे भारत, वहां जिंदगी की कीमत ही क्या है?
इस हक का सब से बड़ा फायदा धर्म से जुड़े लोग उठाएंगे. जैन धर्म में तो यह प्रथा बाकायदा मौजूद है जिस में लोग खानापीना छोड़ कर मौत का इंतजार करने लगते हैं. बनारस में मुक्ति घाट में रह कर लोग अपनी इच्छा से मरने का इंतजार करते हैं. क्या इस तरह के पागलपनों को अब कानूनी हक मिलेगा? क्या बाबा स्वामी लोग अमीर भक्तों को बहलाफुसला कर राजी कर लेंगे कि उन का आखिरी समय आ गया है और बजाय तिलतिल कर के मृत्युदान कर के पैसा उन्हें दे कर विदा हो जाएं?
हमारे यहां कानूनों का गलत इस्तेमाल बहुत होता है. छेड़छाड़ के बारे में कानून को जम कर पैसा लूटने के लिए आजमाया जा रहा है. दहेज कानून का डर दिखा कर औरतें पतियों और उन के घर वालों को जम कर धमकाती हैं.
इस नए कानून में भी लोभ हो सकते हैं फिर भी यह अच्छा है. जैसे पेट गिराने का कानून करोड़ों औरतों के लिए वरदान साबित हुआ कि उन्हें अनचाहे बच्चों का बोझ नहीं सहना पड़ रहा वैसे ही लाखों घर वाले आखिरी सालों में अपने सगों से छुटकारा आसानी से पा सकेंगे और उन्हें तड़पना नहीं पड़ेगा.
साल 1994 में रिलीज हुई सुपरहिट फिल्म ‘मोहरा’ दर्शकों के बीच काफी पौपुलर रही थी. फिल्म में अक्षय कुमार और रवीना टंडन लीड रोल में थे, तो वहीं अभिनेता सुनील शेट्टी, नसीरुद्दीन शाह और परेश रावल अहम भूमिकाओं में थे. फिल्म में गाना ‘तू चीज बड़ी है मस्त मस्त’ और ‘टिप टिप बरसा पानी’ लोगों के बीच काफी पौपुलर रहा था.
हाल ही में रवीना टंडन ने एक बार फिर से ‘तू चीज बड़ी है मस्त मस्त’ गाने पर जलवा बिखेरा है और वीडियो को खुद रवीना ने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट से शेयर किया है. रवीना के द्वारा शेयर किए गए वीडियो में दो स्लाइड हैं, एक स्लाइड में फिल्म मोहरा का गाना दिखाया गया है तो वहीं दूसरे पार्ट में ग्रीन कलर के गाउन में नजर आ रहीं रवीना उसी गाने पर ठुमके लगाते हुए नजर आ रही हैं. वीडियो को देखने के बाद फैन्स कमेंट बौक्स में प्रतिक्रियाएं जाहिर कर रहे हैं.
वीडियो को शेयर करते हुए रवीना ने कैप्शन लिखा, ‘पुराने दिनों का फन’. वीडियो एक दिन में लगभग 1 लाख 15 हजार से ज्यादा बार देखा जा चुका है. एक यूजर ने कमेंट बौक्स में लिखा, फाइनली राजकुमारी ने क्वीन का अवतार लिया. वहीं एक अन्य यूजर ने लिखा, मुझे यह गाना बेहद पसंद है और आप मुझे बहुत पसंद है, आप इसमें भी बहुत अच्छी लग रही हैं.
एक फैन ने लिखा, समय का आप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा आप आज भी पहली जैसी ही लगती हैं. वहीं एक अन्य फैन ने कमेंट बौक्स में लिखा, रवीना जी आपके जैसा कोई नहीं है. भावेश कालरा नाम के यूजर ने कमेंट बौक्स में लिखा, ”यह गाना और यह फिल्म मैं कभी नहीं भूल सकता. आपके डांस स्टेप पागल कर देने वाले हैं. मैं 90 के दशक और बचपन की यादों को बहुत मिस करता हूं. उस समय इस फिल्म को देखना ही फन हुआ करता था.”
रवीना टंडन ने साल 1991 में रिलीज हुई फिल्म ‘पत्थर के फूल’ से बौलीवुड में डेब्यू किया था, हालांकि रवीना को पहचान फिल्म ‘मोहरा’ ने ही दिलाई थी. रवीना फिलहाल लाइमलाइट से दूर हैं. पिछले कई सालों से रवीना किसी फिल्म में नजर नहीं आईं फिल्मों से दूर रवीना सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं और फैंस के लिए तस्वीरें शेयर करती रहती हैं.
VIDEO : कार्टून लिटिल टेडी बियर नेल आर्ट
ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTubeचैनल.
हरियाणा के जिला पानीपत के थाना नगर के मोहल्ला आजादनगर की रहने वाली 20 साल की सिमरन दुबे आर्य डिग्री कालेज में बीए के दूसरे साल में पढ़ रही थी. पढ़ाई के साथसाथ वह एनएसएस (नेशनल सर्विस स्कीम) यानी राष्ट्रीय सेवा योजना की सदस्य भी थी. यह संस्था अपने सदस्यों का कैंप लगवाती है, जिस में समाजसेवा कराई जाती है. इस में जिस लड़के या लड़की का काम अच्छा होता है, उसे कालेज की ओर से प्रमाण पत्र दिया जाता है.
एसडी कालेज का बीए फाइनल ईयर में पढ़ रहा कृष्ण देशवाल एनएसएस का अध्यक्ष था. इसी साल जनवरी महीने में एसडी कालेज का एनएसएस का कैंप आर्य डिग्री कालेज में लगा था. उसी दौरान सिमरन दुबे की मुलाकात कृष्ण देशवाल से हुई तो दोनों में अच्छी जानपहचान हो गई. थाना नगर के ही मोहल्ला बराना की रहने वाली ज्योति भी सिमरन के साथ आर्य डिग्री कालेज में पढ़ती थी. दोनों में पटती भी खूब थी. उस से भी कृष्ण की दोस्ती हो गई थी.
5 सितंबर, 2017 की शाम 4 बजे के करीब सिमरन के मोबाइल फोन की घंटी बजी. उस ने फोन रिसीव किया तो दूसरी ओर से कहा गया, ‘‘हैलो सिमरन, मैं एसडी कालेज से कृष्ण देशवाल बोल रहा हूं, तुम कैसी हो?’’
‘‘नमस्ते सर,’’ चहकते हुए सिमरन ने कहा, ‘‘मैं तो अच्छी हूं सर, आप बताइए आप कैसे हैं?’’
‘‘मैं भी ठीक हूं, यह बताओ कि तुम इस समय क्या कर रही हो?’’
‘‘घर पर हूं सर, कोई काम है क्या? अगर कोई काम हो तो कहिए, मैं आ जाती हूं.’’ सिमरन ने कहा.
‘‘दरअसल, मिलिट्री के कुछ अधिकारी शहर में आ रहे हैं. उन के लिए जीटी रोड पर स्थित गौशाला मंदिर परिसर में कैंप लगाना है. अगर तुम आ जाओ तो मेरा काम काफी आसान हो जाएगा. ज्योति भी आ रही है. कालेज के कुछ अन्य लड़के भी आ रहे हैं.’’
‘‘ठीक है सर, ऐसी बात है तो मैं भी आ जाती हूं.’’
‘‘ओके, मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं.’’ कृष्ण ने कहा और फोन काट दिया.
कृष्ण देशवाल से बात होने के बाद सिमरन जल्दी से तैयार हो कर घर वालों से कालेज जाने की बात कह कर निकल पड़ी. करीब घंटे भर बाद वह कृष्ण द्वारा बताए गौशाला मंदिर पहुंच गई. ज्योति वहां पहले से ही मौजूद थी. उसे देख कर सिमरन का चेहरा खिल उठा.
दोनों सहेलियां एकदूसरे के गले मिलीं और आपस में बातें करने लगीं. दोनों बातें कर रही थीं कि तभी कृष्ण सिमरन के लिए एक गिलास में कोल्डिड्रिंक ले आया. सिमरन ने उन्हें भी पीने को कहा तो दोनों ने एक साथ कहा कि उन्होंने अभीअभी पी है. इस के बाद सिमरन आराम से कोल्डड्रिंक पीने लगी.
मंदिर के कमरे में लाश
कृष्ण देशवाल, सिमरन दुबे और ज्योति जिस कमरे में ठहरे थे, उस के बगल वाले कमरे में कंप्यूटर सिखाया जाता था. कंप्यूटर सिखाने का यह काम पशुपालन विभाग के उपनिदेशक डा. वाई.डी. त्यागी द्वारा चलाई जा रही एनजीओ के अंतर्गत होता था. कंप्यूटर सिखाने के लिए वंदना को रखा गया था.
जिस कमरे में कृष्ण, ज्योति और सिमरन ठहरे थे, वह अंदर से बंद था. इस से वंदना को थोड़ी हैरानी हो रही थी. उन से नहीं रहा गया तो उन्होंने दरवाजा खटखटाया. करीब 15 मिनट तक दरवाजा खटखटाने के बाद खुला तो उस में से एक लड़का और लड़की बैग लिए बाहर निकले.
दोनों बाहर से कमरा बंद करने लगे तो वंदना ने उन से उन के साथ की एक अन्य लड़की के बारे में पूछा. वे बिना कुछ कहे चले गए तो वंदना ने इस बात की सूचना मंदिर के पुजारी वेदप्रकाश तिवारी को दे दी. वेदप्रकाश को मामला गड़बड़ लगा तो उन्होंने अपने भतीजे अभिनव को हकीकत पता करने के लिए भेजा.
अभिनव हौल से होता हुआ उस कमरे पर पहुंचा, जिसे लड़का और लड़की बाहर से बंद कर गए थे. दरवाजा खोल कर जैसे ही वह अंदर पहुंचा, वहां की हालत देख कर वह चीखता हुआ बाहर आ गया. उस की चीख सुन कर वंदना भी घबरा गई. वह अभिनव के पास पहुंची. उस के पूछने पर अभिनव ने बताया कि कमरे में एक लड़की की लाश पड़ी है.
अब वंदना की समझ में सारा माजरा आ गया. अभिनव ने यह जानकारी पुजारी वेदप्रकाश तिवारी को दी तो उन्होंने पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर दिया. पुलिस कंट्रोल रूम द्वारा यह सूचना थाना चांदनी बाग पुलिस को दे दी गई. सूचना मिलते ही थाना चांदनीबाग के थानाप्रभारी संदीप कुमार पुलिस बल के साथ गौशाला मंदिर पहुंच गए. उन के पहुंचने से पहले पुलिस चौकी किशनपुरा के चौकीप्रभारी वीरेंद्र सिंह वहां पहुंच चुके थे. संदीप कुमार और वीरेंद्र सिंह ने घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया. मृतका के गले पर गला दबाने का स्पष्ट निशान था. इस का मतलब हत्या गला दबा कर की गई थी. उस के चेहरे को तेजाब डाल कर झुलसा दिया गया था. शायद हत्यारे ने पहचान मिटाने के लिए ऐसा किया था.
कमरे में एक लेडीज पर्स मिला. पुलिस ने उस पर्स की तलाशी ली तो उस में से आर्य डिग्री कालेज का एक आईडी कार्ड मिला, जिस पर ज्योति लिखा था. उस पर पिता का नाम, पता और फोन नंबर भी लिखा था. पिता का नाम रामपाल था. वह थाना नगर के मोहल्ला बराना में रहते थे. एसआई वीरेंद्र सिंह ने फोन कर के रामपाल को वहीं बुला लिया.
रामपाल ने गौशाला मंदिर आ कर कमरे में मिली लाश को देखा तो फफकफफक कर रोने लगे. लाश उन की बेटी ज्योति की थी. शिनाख्त न हो सके, इस के लिए हत्यारों ने तेजाब डाल कर बड़ी बेरहमी से उस के चेहरे को झुलसा दिया था.
घटना की सूचना पा कर एसपी राहुल शर्मा, सीआईए-3 प्रवीण कुमार और डीएसपी जगदीश दूहन भी घटनास्थल पर आ गए थे. घटनास्थल के निरीक्षण के दौरान पुलिस ने देखा कि कमरे में पड़े डबल बैड का गद्दा उठा कर नीचे फर्श पर बिछाया गया था. लाश को उसी पर लिटा कर उस के चेहरे पर तेजाब डाला गया था. तेजाब से मृतका का चेहरा तो बुरी तरह झुलस ही गया था, गद्दा भी काफी दूर तक झुलस गया था.
मृतका की चुनरी और चप्पलें भी वहीं पड़ी थीं. बचाव के लिए मृतका ने हाथपांव चलाए थे, जिस से उस के चश्मे का एक शीशा टूट गया था. पुलिस ने कंप्यूटर की शिक्षा देने वाली वंदना से पूछताछ की तो उस ने बताया था कि शाम 4 बजे वह वहां आई तो कम्युनिटी हौल के दोनो दरवाजे अंदर से बंद थे. करीब 15 मिनट तक दरवाजा खटखटाने के बाद 19-20 साल की एक लड़की ने दरवाजा खोला.
लड़की के साथ एक लड़का भी था. वह हौल के कोने में बने कमरे का दरवाजा बंद कर रहा था. वंदना ने उस के साथ आई दूसरी लड़की के बारे में पूछा तो वह उसे धमका कर लड़की के साथ चला गया. लड़की सलवार सूट पहने थी, जबकि लड़का जींस और टीशर्ट पहने था.
फैल गई सनसनी
लड़के और लड़की के पास बैग थे. उन्होंने एकएक पौलीथीन भी ले रखी थी. लड़के के हाथ में ड्यू (कोल्डड्रिंक) की एक बोतल भी थी. वदंना को शक हुआ तो उस ने अपनी शंका पुजारी को बताई. इस के बाद पुजारी ने अपने भतीजे को भेजा तो कमरे में लाश होने का पता चला. इस तरह लाश बरामद होने से शहर में सनसनी फैल गई थी. क्योंकि गौशाला मदिर अति सुरक्षित माना जाता था. हैरानी की बात यह थी कि दोनों लड़कियों और लड़के के वहां आने की जानकारी पुजारी को नहीं थी. मंदिर में सीसीटीवी कैमरे भी नहीं लगे थे कि उसी से लड़के और लड़की के बारे में कुछ पता चलता.
पुलिस ने कमरे में मिला सारा सामान जब्त कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया था. इस के बाद रामपाल की ओर से हत्या का मुकदमा दर्ज कर के मामले की जांच शुरू कर दी गई थी. पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने ज्योति की लाश उस के पिता रामपाल को सौंप दी तो उन्होंने उस का अंतिम संस्कार कर दिया.
महिला आयोग भी सक्रिय
इस हत्याकांड की सूचना राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य रेखा शर्मा को मिली तो उन्होंने भी घटनास्थल की दौरा किया. वह पुलिस अधिकारियों से भी मिलीं और ज्योति के घर वालों से भी. उन्होंने उन्हें आश्वासन दिया कि पुलिस ने 48 घंटे के अंदर हत्यारे को गिरफ्तार करने का भरोसा दिया है. इस मामले में तेजाब का उपयोग किया गया था. जबकि कोर्ट ने तेजाब की बिक्री पर रोक लगा रखी है. यह भी जांच का विषय था कि रोक के बावजूद हत्यारे को तेजाब मिला कहां से?
अगले दिन पुलिस ने मृतका ज्योति के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस के नंबर पर अंतिम फोन अटावला गांव के रहने वाले राजेंद्र देशवाल के बेटे कृष्ण का आया था. काल लिस्ट देख कर पुलिस हैरान थी. दरअसल, दोनों के बीच 14 से 15 हजार सैकेंड बात की गई थी.
पुलिस तुरंत ज्योति के घर पहुंची और रामपाल से कृष्ण् के बारे में पूछा. उस ने बताया कि कृष्ण ज्योति के कालेज में आताजाता था, दोनों एकदूसरे को जानतेपहचानते थे. उन में अच्छी दोस्ती भी थी.
पुलिस को इस बात पर हैरानी हुई कि कृष्ण ज्योति का अच्छा दोस्त था और उस के घर भी आताजाता था. लेकिन उस की हत्या की बात सुन कर उस के घर नहीं आया था. कहीं ऐसा तो नहीं कि उसी ने ज्योति की हत्या की हो और फरार हो गया हो.
पुलिस को कृष्ण देशवाल पर शक हुआ तो उस के बारे में पता करने उस के घर पहुंच गई. घर वालों से पता चला कि वह 5 सितंबर से ही घर से 1 लाख 35 हजार रुपए ले कर गायब है. इस बात से पुलिस का शक यकीन में बदल गया. पुलिस को लगा कि ज्योति की हत्या में कृष्ण का ही हाथ है. घर वालों से पुलिस को पता चला कि कृष्ण के घर वाले भैंसों के खरीदने और बेचने का व्यवसाय करते थे. वे पैसे उसी के थे, जिन्हें कृष्ण ले कर भागा था.
इस बीच पुलिस को पता चल गया कि उस दिन कृष्ण के साथ जो लड़की थी, वह सिमरन दुबे थी. पुलिस दोनों के फोटो ले कर गौशाला मंदिर पहुंची तो फोटो देख कर वंदना ने बताया कि उस दिन यही दोनों कमरे से निकले थे.
इस से साफ हो गया कि ज्योति की हत्या कृष्ण और सिमरन ने ही की थी. इस के बाद पुलिस ने उन के फोटो अखबारों में छपवा कर उन के बारे में बताने वाले को ईनाम की भी घोषणा कर दी.
पुलिस कृष्ण और सिमरन दुबे की तलाश में जीजान से जुटी थी कि सिमरन के पिता अतुल दुबे थाना नगर पहुंचे और उन्होंने कृष्ण देशवाल के खिलाफ सिमरन के अपहरण की तहरीर दे दी. उन का कहना था कि उन की बेटी के चरित्र पर जो लांछन लगाया गया है, वह सरासर गलत है. सिमरन ऐसी घिनौनी हरकत कतई नहीं कर सकती.
उन का यह भी कहना था कि उस दिन कमरे में जो लाश मिली थी, वह ज्योति की नहीं, बल्कि सिमरन की थी. लेकिन उन की बात कोई मानने को तैयार नहीं था. उन का कहना था कि मृतका के कान की बाली और हाथ में बंधा धागा सिमरन का नहीं था. इस पर पुलिस का कहना था कि कृष्ण और सिमरन को साथ जाते वंदना ने देखा था, इसलिए उन की बात पर विश्वास नहीं किया जा सकता.
पुलिस पहुंची शिमला
पुलिस कृष्ण और सिमरन की लोकेशन पता कर रही थी. लेकिन फोन बंद होने से उन की लोकेशन नहीं मिल रही थी. जैसे ही फोन चालू हुआ, उन की लोकेशन शिमला की मिल गई. लोकेेशन मिलते ही सीआईए-3 प्रवीण कुमार टीम के साथ शिमला रवाना हो गए. स्थानीय पुलिस की मदद से उन्होंने होटलों की तलाशी शुरू कर दी. सैकड़ों होटल की तलाशी के बाद पुलिस टीम उस होटल तक पहुंच गई, जहां दोनों ठहरे थे.
लेकिन जब होटल की रजिस्टर चैक किया गया तो कृष्ण और सिमरन के नाम से यहां कोई नहीं ठहरा था. पुलिस की निगाह श्याम और राधा नाम के उन दो ग्राहकों पर टिक गई, जिन का पता पानीपत का था.
यहीं दोनों से चूक हो गई थी. उन्होंने होटल के रजिस्टर में नाम तो श्याम और राधा लिखाए थे, लेकिन पता नहीं बदला था. बस इसी से पुलिस को शक हुआ, इस के बाद पुलिस कमरे पर पहुंची तो पुलिस को देख कर दोनों सन्न रह गए. कृष्ण नीचे फर्श पर बैठा था, जबकि ज्योति बैड पर लेटी थी.
मरने वाली ज्योति नहीं सिमरन
जिस ज्योति को लोग मरा समझ रहे थे, दरअसल वह जिंदा थी. मंदिर के कमरे से जो लाश मिली थी, वह ज्योति की नहीं, बल्कि सिमरन दुबे की थी. पुलिस दोनों को गिरफ्तार कर के पानीपत ले आई. उन्हें जब एसपी राहुल शर्मा के सामने पेश किया गया तो वह भी हैरान रह गए.
राहुल शर्मा ने ज्योति के पिता रामपाल को बुला कर ज्योति को उन के सामने खड़ा किया तो बेटी को जिंदा देख कर वह सिर थाम कर बैठ गए. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में कृष्ण और ज्योति ने सिमरन की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद 8 तिसंबर को अदालत में पेश कर के विस्तारपूर्वक पूछताछ एवं सबूत जुटाने के लिए पुलिस ने उन्हें 4 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड के दौरान की गई पूछताछ में सिमरन की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—
20 साल की सिमरन दुबे हरियाणा के जिला पानीपत के थाना नगर के मोहल्ला आजादनगर के रहने वाले आलोक दुबे की बेटी थी. वह 4 भाईबहनों में सब से बड़ी थी. वह आर्य डिग्री कालेज में बीए के दूसरे साल में पढ़ रही थी. उसी के साथ थाना नगर के ही बराना की रहने वाली ज्योति भी पढ़ती थी. दोनों पक्की सहेलियां तो थीं ही, एनएसएस की सदस्य भी थीं.
बात इसी साल जनवरी की है. एसडी डिग्री कालेज का एनएसएस का कैंप आर्य डिग्री कालेज में लगा था. कैंप का अध्यक्ष एसडी कालेज में पढ़ने वाला कृष्ण देशवाल था, जो बीए फाइनल ईयर में पढ़ रहा था. वह गांव अटावला का रहने वाला था. उस के पिता राजेंद्र देशवाल भैंसे खरीदनेबेचने का काम करते थे.
कृष्ण 2 बहनों का एकलौता भाई था. बहनें उस से छोटी थीं. घर में बड़ा और एकलौता बेटा होने के बावजूद वह जिम्मेदारी से काम नहीं करता था. पुलिस के अनुसार, जब कृष्ण स्कूल में पढता था, तब उस ने खुद के अपहरण का ड्रामा रचा था. वह दिन भर इधरउधर घूमा करता था. आर्य कालेज में लगे कैंप के दौरान ही उस की मुलाकात सिमरन और ज्योति से हुई थी. पहली ही नजर में ज्योति उस के मासूम चेहरे पर दिल दे बैठी.
कृष्ण ने ज्योति की आंखों से उस के दिल की बात पढ़ ली. छरहरे बदन और तीखी नयननक्श वाली ज्योति भी उसे भा गई थी. इस के बाद अकसर दोनों की मुलाकातें होने लगीं. जल्दी ही उन की ये मुलाकातें प्यार में बदल गईं.
दोनों एकदूसरे से दीवानगी की हद तक प्यार करने लगे. जल्दी ही हालात यह हो गई कि अब वे एकदूसरे को देखे बिना नहीं रह सकते थे. अब इस का आसान तरीका था, वे शादी कर लें जिस से दोनों एकदूसरे की आंखों के सामने बने रहें.
ज्योति और कृष्ण की जातियां अलगअलग थीं. इसलिए ज्योति जानती थी कि उस के घर वाले कभी भी कृष्ण से उस की शादी नहीं करेंगे.
जबकि वह कृष्ण के बिना रह नहीं सकती थी. यही हाल कृष्ण का भी था. इसलिए उस ने ज्योति से भाग चलने को कहा. लेकिन ज्योति ने उस के साथ इसलिए भागने से मना कर दिया, क्योंकि इस से उस के घर वालों की बदनामी होती.
सहेली को बनाया शिकार
इस के बाद उन्होंने एक साथ रहने के बारे में सोचाविचारा तो उन के दिमाग में आया कि क्यों न वे अपनी कदकाठी के 2 लोगों की हत्या कर के उन के चेहरे तेजाब से इस तरह झुलसा दें कि कोई उन्हें पहचान न पाए. इस के बाद वे उन्हें अपने कपड़े पहना कर अपने आईकार्ड, फोन वगैरह वहां छोड़ देंगे, ताकि लोगों को लगे कि उन की हत्या हो चुकी है.
ज्योति की सहेली सिमरन दुबे उसी की कदकाठी की थी. वे उसे जहां बुलाते, वह वहां आ भी जाती. इसलिए सिमरन की हत्या की योजना बन गई. अब कृष्ण की कदकाठी के लड़के को ढूंढना था.
कृष्ण के लिए यह कोई मुश्किल काम नहीं था. 5 सितंबर को एनएसएस के कैंप के बहाने कृष्ण ने सिमरन और रमेश को फोन कर के गौशाला मंदिर के पहली मंजिल स्थित कमरे पर बुला लिया.
कृष्ण दाढ़ी नहीं रखे था, जबकि रमेश रखे था. इसलिए कृष्ण ने उस से दाढ़ी बनवा कर आने को कहा. लेकिन वह गोहाना मोड़ पर पहुंचा तो वहां कोई सैलून नहीं था, इसलिए उस ने फोन कर के कृष्ण को यह बात बताई तो उस ने उसे आने से मना कर दिया. रमेश वहीं से लौट गया. लेकिन सिमरन कृष्ण और ज्योति के जाल में फंस गई.
सिमरन दुबे गौशाला मंदिर पहुंची तो कृष्ण और ज्योति वहां पहले से ही मौजूद थे. ज्योति को देख कर सिमरन बहुत खुश हुई. उस ने यह खुशी उस के गले मिल कर जाहिर की. गौशाला मंदिर पहुंचने से पहले ही कृष्ण ने कोल्डड्रिंक, नींद की गोलियां और तेजाब की व्यवस्था कर रखी थी. इन्हें वह अपने साथ लाए बैग में छिपा कर लाया था.
नींद की गोली मिली कोल्डड्रिंक पिलाई
कृष्ण ने सिमरन को नींद की गोलियां मिली कोल्डड्रिंक पीने को दी तो उस ने उन से भी कोल्डड्रिंक पीने को कहा. दोनों ने कहा कि उन्होंने अभीअभी पी है. कोल्डिड्रिंक पीने के कुछ देर बाद सिमरन की आंखें मुंदने लगीं. फिर वह बेहोश सी हो कर नीचे फर्श पर लेट गई. इस के बाद ज्योति ने उस के दोनों पैर पकड़ लिए तो कृष्ण ने उस का गला घोंट दिया.
इस तरह सिमरन को मौत के घाट उतार कर ज्योति ने उसे अपने कपड़े पहना दिए और उस के चेहरे पर तेजाब डाल कर झुलसा दिया. वह ज्योति है, यह साबित करने के लिए उस ने अपना आईकार्ड और मोबाइल फोन उस के पास छोड़ दिया, ताकि लोग इसे ज्योति समझें.
सिमरन की हत्या करने के बाद ज्योति और कृष्ण कमरे से बाहर आए और औटो से पानीपत रेलवे स्टेशन पहुंचे. उस समय वहां कोई टे्रन नहीं थी, इसलिए वे बसस्टैंड गए. वहां से चंडीगढ़ की बस पकड़ कर वे अगले दिन जीरकपुर पहुंच गए. अगले दिन अखबार में ज्योति की हत्या का समाचार छपा तो दोनों निश्चिंत हो गए कि हत्या का शक सिमरन पर किया जाएगा.
उन्होंने आराम से जीरकपुर के एक मौल में शौपिंग की और शिमला जा कर बसस्टैंड के नजदीक होटल रौयल में कमरा ले कर ठहर गए.
पुलिस उन के पीछे पड़ी है, इस का अंदाजा उन्हें बिलकुल नहीं था. पुलिस ने उन की तलाश में शिमला में 2 घंटे में सैकड़ों होटल छान मारे थे. जब पुलिस रौयल होटल में पहुंची तो पुलिस को देख कर सारा स्टाफ भाग गया. पुलिस को कमरा नंबर भी पता नहीं था. आखिर आधे घंटे की मशक्कत के बाद एक कमरे का दरवाजा तोड़ा गया तो अंदर कृष्ण और ज्योति मिले.
ज्योति के जिंदा बरामद होने के बाद सिमरन के घर वाले बेटी की हत्या के शोक में डूब गए थे. जबकि आलोक दुबे घटना वाले दिन से ही कह रहे थे कि मरने वाली ज्योति नहीं, उन की बेटी सिमरन है. लेकिन कोई उन की बात मानने को तैयार नहीं था.
ज्योति के जिंदा बरामद होने के बाद पुलिस आलोक दुबे और उन की पत्नी ऊषा को मधुबन ले गई, जहां डीएनए टेस्ट के लिए सैंपल लिए गए. रिपोर्ट आने के बाद निश्चित हो जाएगा कि गौशाला मंदिर के कमरे में मिली लाश सिमरन की ही थी.
पुलिस की लापरवाही
सिमरन हत्याकांड के आरोपियों को पकड़ कर पुलिस भले ही अपनी पीठ थपथपा रही हो, लेकिन इस में पुलिस की लापरवाही भी नजर आ रही है. शिमला के होटल में आईडी के रूप में कृष्ण और ज्योति ने अपने आधार कार्ड जमा कराए थे, वे आधार कार्ड श्याम और राधा के नाम से थे. साफ था कि वे फर्जी थे.
पुलिस ने जब कृष्ण से उन के बारे में पूछताछ की तो उस ने बताया कि आधार कार्ड उस के दोस्त देव कपूर ने जयपुर से बनवाए था. पुलिस ने उसे भी गिरफ्तार कर लिया है. अब पुलिस आधार कार्ड बनाने वाले को गिरफ्तार करना चाहती है.
पुलिस सिमरन का मोबाइल फोन बरामद करना चाहती है, जिस के बारे में कृष्ण और ज्योति कभी कहते हैं कि शिमला में झाडि़यों में फेंक दिया है तो कभी कहते हैं कि रास्ते में फेंक दिया था. इस के अलावा यह भी पता लगाया जा रहा है कि उन्होंने तेजाब और नींद की गोलियां कहां से खरीदी थीं.
इन के बारे में उन का कहना है कि तेजाब गुंड़मंडी से लिया था, जबकि नींद की गोलियां अपने एक रिश्तेदार के मैडिकल स्टोर से मंगवाई थीं.
रिमांड खत्म होने के बाद पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.
प्रेम की अंधी गली में फंस कर ज्योति और कृष्ण ने जो कदम उठाया, आखिर उस से उन्हें क्या मिला. उन्होंने जो अपराध किया है, वे कानून की नजरों से बच नहीं पाएंगे. लेकिन अगर बच भी गए तो शायद ही समाज उन्हें सुकून से रहने दे.
VIDEO : कार्टून लिटिल टेडी बियर नेल आर्ट
ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTubeचैनल.
28 जनवरी, 2018 को मध्य प्रदेश के मुरैना जिले की जिला अदालत में 8 हजार से भी ज्यादा नौजवानों का हुजूम इकट्ठा था. वहां बड़े पदों की भरती नहीं होनी थी, बल्कि ड्राइवर और चपरासी जैसे छोटे पदों के लिए भरती थी. इस के बावजूद ज्यादातर उम्मीदवार ग्रेजुएट या फिर पोस्ट ग्रेजुएट थे.
खाली पदों की तादाद महज 22 थी, पर जब 8 हजार नौजवान वहां आ गए तो अफरातफरी सी मच गई. दस्तावेजों की जांच में ही अफसरों का पूरा दिन गुजर गया.
इसी 28 जनवरी को यही हालत विदिशा जिले की अदालत में भी थी. वहां 52 पदों के लिए तकरीबन 7 हजार बेरोजगार लाइन में थे. खाली पद ड्राइवर, माली और जल वाहक के थे.
भीड़ उमड़ी तो उसे संभालने के लिए प्रशासन को अच्छीखासी मशक्कत करनी पड़ी. इस भीड़ में भी ज्यादातर बेरोजगारों के हाथों में बड़ीबड़ी डिगरियां थीं.
इसी दिन गुना जिले की अदालत में भी हजारों बेरोजगार लाइन लगाए खड़े थे. वहां भी भरती चपरासी, माली और ड्राइवर जैसे छोटे पदों के लिए होनी थी, जिन के लिए काबिलीयत 8वीं पास रखी गई थी, पर तकरीबन 70 फीसदी उम्मीदवार 12वीं जमात पास, ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट थे. दस्तावेजों की जांच और इंटरव्यू के लिए 6 जजों की ड्यूटी लगाई गई थी.
बदतर होते हालात
14 जनवरी, 2018 को ग्वालियर जिला अदालत में चपरासी के पद की 57 भरतियों के लिए तकरीबन 60 हजार उम्मीदवार लाइन लगा कर खड़े थे.
चपरासी की तनख्वाह महज साढ़े 7 हजार रुपए महीना होती है जिस के लिए इंजीनियरिंग, एमबीए और पीएचडी किए हुए नौजवान भी आए थे.
60 हजार अर्जियां देख कर इंटरव्यू लेने आए जज भी चकराए हुए थे. बढ़ती भीड़ और मचती अफरातफरी देख कर आखिरकार यह तय किया गया कि अब 14 जज 16 दिनों तक इंटरव्यू लेंगे. अर्जी की फीस से ही सरकार को एक करोड़, 20 लाख रुपए मिले थे.
मध्य प्रदेश में ही उस वक्त सनाका खिंच गया था जब सरकार ने पटवारी के 9,218 पद निकाले थे. इन पदों पर भरती के लिए रिकौर्ड 12 लाख बेरोजगारों ने फार्म भरे थे, जिन में पीएचडी किए हुए उम्मीदवारों की भी अच्छीखासी तादाद थी. लड़कियों ने भी खूब फार्म भरे थे.
इस पद के 5 लाख रुपए में फार्म बिकने की अफवाह भी उड़ी थी. कहा यह भी गया था कि मध्य प्रदेश की सरकार ने विधानसभा चुनावों के लिए तगड़े पैसों का इंतजाम कर लिया है.
हर जगह यही हाल
एक अंदाजे के मुताबिक, बेरोजगारी के लिए बदनाम बिहार में सब से ज्यादा 3 करोड़ बेरोजगार हैं. हालत तो यह है कि पिछले साल अक्तूबर महीने में जब पटना और उस के आसपास के इलाकों के लिए राशन की कुछ दुकानों के लिए अर्जियां मंगाई गई थीं तो उन में सौ से ज्यादा ग्रेजुएट और तकरीबन 20 पोस्ट ग्रेजुएट उम्मीदवार थे. कुछ पीएचडी किए नौजवान भी राशन की दुकान चलाने के लिए लाइन में लगे देखे गए.
राशन की दुकान कोई स्थायी रोजगार नहीं है, इस के बाद भी अच्छेखासे पढ़ेलिखे बेरोजगार भी इस के लिए भागादौड़ी करते दिखे तो समझा जा सकता है कि हालात कितने बदतर हो चुके हैं.
फरवरी महीने के तीसरे हफ्ते में रोजगार न मिलने से गुस्साए नौजवानों ने जबरदस्त प्रदर्शन कर अपनी भड़ास निकाली थी. आरा में प्रदर्शनकारी बेरोजगारों ने ट्रेनें रोक दी थीं. उन के हाथ में तख्तियां थीं जिन पर लिखा था कि वे पकौड़े नहीं बेचेंगे.
इन बेरोजगार नौजवानों का आरोप यह था कि केंद्र और राज्य सरकार के सेवा क्षेत्रों में नौकरियों की तादाद लगातार घट रही है.
ये नौजवान इम्तिहान की फीस में बढ़ोतरी और नौकरियों में आयु सीमा घटाने पर भी भड़के हुए थे.
हाल ही में रेलवे द्वारा निकाली गई बंपर नौकरियों से नौजवानों को उम्मीद बंधी थी लेकिन ऐजूकेशन क्वालिफिकेशन के नाम पर आईटीआई अनिवार्य किए जाने और नौकरियों में उम्र की सीमा घटाए जाने पर बेरोजगारों ने जो उग्र प्रदर्शन किया तो हालात काबू में करने के लिए पुलिस को हवाई फायरिंग तक करनी पड़ी थी.
उत्तर प्रदेश में भी बेरोजगार ‘करो या मरो’ के मूड में आ गए हैं. आंकड़ों के नजरिए से देखें तो बिहार के बाद सब से ज्यादा 1 करोड़, 30 लाख बेरोजगार उत्तर प्रदेश में हैं.
राज्य में बेरोजगारी की दर 8 फीसदी के आंकड़े को छूने जा रही है, जबकि बेरोजगारी का राष्ट्रीय औसत 5 फीसदी है यानी दूसरे राज्यों के मुकाबले उत्तर प्रदेश में 3 फीसदी ज्यादा बेरोजगार हैं.
साल 2016 में इस राज्य में प्रति 1000 नौजवानों में से 58 नौजवान बेरोजगार थे जबकि इस का राष्ट्रीय औसत 37 है. श्रम मंत्रालय के आंकड़े भी हकीकत बयां करते हैं, जो मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में 18 से 29 साल की उम्र वाले बेरोजगार नौजवानों की तादाद प्रति 1000 पर 148 है.
अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी की सरकार के वक्त हालत यह थी कि मध्य प्रदेश की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी चपरासी जैसी छोटी नौकरी के लिए पीएचडी किए हुए नौजवान भी लाइन में लगे थे.
आंकड़ा मध्य प्रदेश से भी ज्यादा शर्मनाक था जब चपरासी के महज 368 पदों के लिए तकरीबन 23 लाख से ज्यादा नौजवानों ने फार्म भरे थे. इन में 2 सौ से ज्यादा पीएचडी किए हुए थे.
चपरासी के जिस पद के लिए ऐजूकेशन क्वालिफिकेशन 5वीं पास चाहिए होती है उस के लिए लाखों ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट के अलावा टैक्निकल डिगरीधारी भी शामिल थे.
हालत यह थी कि अगर इंटरव्यू लेने के लिए 10 बोर्ड भी बनाए जाते तो पूरी प्रक्रिया में 4 साल से भी ज्यादा का वक्त लग जाता. बवंडर मचा तो इस मामले के लिए बनाई गई जांच कमेटी ने चपरासी पद की भरती ही रद्द कर दी थी.
यह मामला अखिलेश सरकार को कितना महंगा पड़ा था, विधानसभा चुनाव के नतीजे इस के सुबूत थे, लेकिन भाजपा सरकार भी हालात संभाल नहीं पा रही है.
बेरोजगारों का ध्यान बंटाने के लिए योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश यादव द्वारा दिया जाने वाला बेरोजगारी भत्ता तो जारी रखा ही, साथ ही नया शिगूफा प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का वे ले आए हैं, जिस के नाम पर जगहजगह रोजगार मेले लगाए जा रहे हैं. इन मेलों में बेरोजगारों की उमड़ती भीड़ राज्य सरकार से संभल नहीं पा रही है.
सरकार की नई दिक्कत यह है कि बेरोजगारों को यह समझ आने लगा है कि कौशल विकास जैसी योजनाएं बेवकूफ बनाए रखने का नया तरीका हैं. साढ़े 7 लाख नौकरियों का वादा वैसा ही खोखला साबित हो रहा है, जैसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक करोड़ नौकरियां देने का हुआ है.
बेरोजगारों ने राज्य में जगहजगह पकौड़े बेच कर अपना विरोध दर्ज कराया तो योगी आदित्यनाथ चौकन्ने हो उठे हैं और इन्वैस्टर्स मीट और स्किल डेवलपमैंट का झुनझुना ले कर नौजवानों को बरगला रहे हैं.
कौशल विकास योजना की पोल भी खुलने लगी है. राजस्थान में तकरीबन 20 लाख नौजवान कौशल विकास योजना से फायदा उठाने के बाद भी नौकरी की तलाश में दरदर भटक रहे हैं. अंदाजा है कि राजस्थान में कुल 60 लाख से भी ज्यादा बेरोजगार हैं.
राजस्थान एकीकृत बेरोजगार महासंघ के अध्यक्ष उपेन यादव की मानें तो राज्य में सरकारी नौकरियां निकल ही नहीं रही हैं. राज्य सरकार नौजवानों को टैक्निकल ट्रेनिंग देने की बात तो कर रही है, पर उन्हें रोजगार मुहैया नहीं करा पा रही है.
बात सच भी है क्योंकि अकेले विद्युत निगम में ही 8 हजार तकनीकी पद खाली पड़े हैं. ठेके पर काम कर रहा विद्युत निगम नौकरियां नहीं निकाल रहा है. राज्य के सार्वजनिक निर्माण विभाग ने साल 2013 से तकनीकी पदों की नौकरियां नहीं निकाली हैं.
राज्य में बेरोजगारों के कई संगठन बन कर नौकरियों और रोजगार के अपने हक की लड़ाई लड़ने लगे हैं. बेरोजगारों का गुस्सा पहले नोटबंदी को ले कर था जो अब मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की नाकामी पर फूटने लगा है.
हाल ही में अलवर और अजमेर के लोकसभा उपचुनावों में राजस्थान बेरोजगार संघ भी कूदा था. उस के निशाने पर वसुंधरा राजे थीं जिन्होंने 15 लाख बेरोजगारों को रोजगार देने का वादा किया था लेकिन राज्य के 8 फीसदी नौजवानों को भी रोजगार के बाबत बैंक कर्ज नहीं मिला जिस का खमियाजा उपचुनावों में भाजपा को हार कर भुगतना भी पड़ा था.
छोटी नौकरी पर रुझान
यह शर्म और चिंता की बात है कि देश के बहुत से नौजवान ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट, एमबीए और पीएचडी करने के बाद भी छोटे ओहदों के लिए लाइन में खड़े नजर आए. केंद्र सरकार ही इस हालत की जिम्मेदार है.
साल 2018-19 के सालाना बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली रोजगार के बाबत कुछ खास भरोसा नहीं दे पाए हैं और दुनियाभर की एजेंसियों के आंकड़े भी चिंता जता रहे हैं कि इस साल भी बेरोजगारी बजाय कम होने के और बढ़ेगी तो तय है कि रोजगार देने के मोरचे पर सरकार नाकाम रही है.
चायपकौड़ा बेचना तो फिर भी एक बेहतर काम है, लेकिन अगर कोई पोस्ट ग्रेजुएट या पीएचडी वाला बगीचे में घास खोदता नजर आए या फिर खुद से कम पढ़ेलिखे बाबुओं और साहबों की मेज साफ करे, दफ्तर में झाड़ू लगाए और उन्हें पानी पिलाता नजर आए तो यह बात फख्र की नहीं है. मगर सालोंसाल पढ़ाई कर के डिगरी हासिल करने के बाद भी चपरासी, माली या ड्राइवर की नौकरी ही करनी है तो ऐसी डिगरी से फायदा क्या?
बेरोजगार सेना के तेवर
जबजब बेरोजगारी हद से ज्यादा बढ़ती है, तबतब बेरोजगार संगठन बना कर अपना विरोध जताते रहे हैं. भोपाल के अक्षय हुंका नाम के नौजवान ने बेराजेगार सेना बनाई तो देखते ही देखते उस के सदस्यों की तादाद लाखों तक पहुंच गई.
अक्षय हुंका कहते हैं कि सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती बेरोजगारी किसी सुबूत की मुहताज नहीं है. इस में पढ़ेलिखे नौजवानों की भागीदारी 88 फीसदी है. अव्वल तो सरकार के पास बेरोजगारी का आंकड़ा न होना ही अचंभे की बात है, ऐसे में राज्य के डेढ़ करोड़ नौजवान क्या खा कर सरकार से उम्मीद रखें.
मध्य प्रदेश के अलगअलग रोजगार दफ्तरों के आंकड़ों पर नजर डालें तो यह जान कर हैरानी होती है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बेरोजगारी 53 फीसदी बढ़ी है. राज्य में दिसंबर, 2015 में रजिस्टर्ड पढ़ेलिखे बेरोजगारों की तादाद 15 लाख, 60 हजार थी, जो साल 2017 के आखिर तक 24 लाख का आंकड़ा छू रही है.
बेरोजगार सेना की खास मांग यह है कि सरकार मनरेगा की तरह पढ़ेलिखे नौजवानों के लिए रोजगार गारंटी कानून बनाए. इस सेना में ऐसे नौजवानों की भरमार है जिन्होंने अच्छी नौकरी मिलने के लालच में 2-3 डिगरियां और डिप्लोमा ले रखे हैं पर उन्हें माली, ड्राइवर या चपरासी तक की भी नौकरी नहीं मिल रही है.
भोपाल की 26 साला अनुप्रिया सिंह ने बीई करने के बाद एमबीए किया पर उन्हें नौकरी नहीं मिली. पटवारी के पद के लिए भी अनुप्रिया सिंह ने कोशिश की थी पर वहां भी बात बनती नजर नहीं आ रही है.
अच्छेखासे घर की अनुप्रिया सिंह की चिंता यह है कि आजकल के लड़के बेरोजगार लड़की से शादी करना पसंद नहीं करते. सभी को कामकाजी बीवी चाहिए, जिस से घर ठीकठाक तरीके से चल सके.
भोपाल के ही एमपी नगर इलाके के एक शोरूम में काम करने वाले 26 साला आदित्य के पास भी 2 डिगरियां हैं.
12 हजार महीने की तनख्वाह पर काम करने वाले आदित्य का रोना यह है कि समाज और रिश्तेदारी में उस की तालीम को ले कर ताने मारे जाते हैं. बड़ी तो बड़ी चपरासी जैसी छोटी नौकरी भी उसे नहीं मिल पा रही है.
आदित्य और अनुप्रिया सिंह जैसे लाखों नौजवान सरकारी नौकरी ही क्यों चाहते हैं? इस का जवाब साफ है कि सरकारी नौकरी परमानैंट होती है. इस में 14-15 साल बाद इतनी तनख्वाह तो मिलने लगती है कि जिंदगी सुकून से गुजरे.
क्या हुआ तेरा वादा
बेरोजगारों के लिए सरकार नौकरियां कहां से लाए? इस सवाल पर झल्लाए अक्षय हुंका कहते हैं, ‘‘हम एक हद तक इस बात से इत्तिफाक रखते हैं, पर मध्य प्रदेश सरकार के पास ढाई लाख पद खाली पड़े हैं, वे तो वह भर ही सकती है. नोटबंदी और जीएसटी के फैसले रोजगार कम होने की वजह हैं जिन के चलते कई प्राइवेट कंपनियों, कारखानों और फैक्टरियों को मजबूरी में मुलाजिमों की छंटनी करनी पड़ रही है.
‘‘बेरोजगारों को उद्योगधंधों या अपने कारोबार के बाबत लोन देने की बातें भी झुनझुना साबित हो रही हैं.’’
विदिशा के निरंजन सिंह कहते हैं कि उन्होंने साल 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को जातपांत, धर्म या हिंदुत्व की वजह से नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी के इस वादे पर वोट दिया था कि वे हर साल एक करोड़ नौकरियां देने का इंतजाम करेंगे.
निरंजन सिंह नरेंद्र मोदी को फेल बताते हुए कहते हैं कि अब भाजपा को खमियाजा भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए. बेरोजगार नौजवान गुस्से में हैं, क्योंकि नोटबंदी के फैसले से प्राइवेट नौकरियों के मौके भी उन से छिने हैं.
यह सोचना भाजपा की गलतफहमी ही साबित होगी कि मंदिरमसजिद या धर्मकर्म के नाम पर उसे वोट मिल जाएंगे. काठ की हांड़ी एक दफा ही चूल्हे पर चढ़ती है.
यह शिकायत या भड़ास किसी एक की नहीं, बल्कि देश के करोड़ों नौजवानों की है जिस से बच पाना भाजपा के लिए बहुत मुश्किल साबित होगा.
सच तो यह है कि जिस देश में एमए, बीई और पीएचडी किए हुए नौजवानों तक को चपरासी, माली, ड्राइवर और पटवारी की नौकरी के लिए एडि़यां रगड़नी पड़ती हों, वह क्या खा कर साल 2024 तक विश्वगुरु बनने की बात करता है.
VIDEO : कार्टून लिटिल टेडी बियर नेल आर्ट
ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTubeचैनल.
आर्ट कालेज में चित्रकला के पाठ्यक्रम का एक महत्त्वपूर्ण विषय है न्यूड स्टडी. मानव शरीर की पेंटिंग या स्कैच बनाने के लिए शरीर की तमाम बारीकियों को जानना जरूरी है. महिला और पुरुष के शरीर के तमाम उतार चढ़ाव, उस का गठन, अलग अलग होते हैं. आर्ट कालेज में गठनगत बारीकियों का अध्ययन लाइफ स्टडी कहलाता है. इस के अलावा अलगअलग शारीरिक भावभंगिमाओं का भी अध्ययन लाइफ स्टडी या न्यूड स्टडी में शामिल है. इस के लिए आमतौर पर एक जीतेजागते नग्न पुरुष या नग्न महिला मौडल की मदद ली जाती है. तब न्यूड स्टडी होती है.
एक समय था जब लाइफ स्टडी के लिए मौडल मिलने मुश्किल हुआ करते थे. अब इस पेशे में जो भी लड़कियां या औरतें आती हैं, वे परिवार और समाज से छिप कर आती हैं और आमतौर पर गरीब घरों से होती हैं. ये मजबूरी में पेशे में आती हैं. कोलकाता आर्ट कालेज में बतौर न्यूड मौडल काम करने वाली कुछ गिनीचुनी ही मौडल हैं.
लतिका कर्मकार (बदला हुआ नाम) कोलकाता के चित्रकारों के लिए न्यूड पोज देने वाली मौडल है. वह एक निजी कंपनी में चायपानी पिलाने का काम करती है. कभीकभार कोलकाता के कुछ चित्रकारों के लिए न्यूड पोज भी देती है. पर यह काम लतिका किसी छुट्टी वाले दिन ‘प्राइवेटली’ ही करती है. वह बताती
है कि मौडलिंग की एक सिटिंग में उसे 1,000-5,000 रुपए मिल जाते हैं. उस के घर पर माता पिता के साथ उस की एक बेटी है. उस का पति 5 महीने की बेटी के साथ उसे छोड़ कर जा चुका है. पिता निजी कंपनी के दफ्तर में चपरासी थे. अब रिटायर्ड हैं. अपना और अपनी बेटी का खर्च चलाने के लिए वह एक निजी कंपनी में काम करती है. किसी पेंटर के आमंत्रण पर वह न्यूड पोज देती है.
बीना पुरकायस्त (बदला हुआ नाम) भी एक न्यूड मौडल है. और इस काम का उसे बहुत लंबा अनुभव है. 19 साल की उम्र से वह न्यूड पोज देती आ रही है. इस पेशे में उसे 23 साल हो गए हैं. बंगाल के कई नामी गिरामी पेंटरों के लिए उस ने न्यूड पोज दिए हैं. बीना का मानना है कि यह काम बहुत कठिन होता है. कई बार एक जैसे पोज में बैठे रहने पर पैर सुन्न हो जाते हैं. आमतौर पर पेंटर मौडल को बीच बीच में 15 मिनट का ब्रैक देते हैं.
वह बताती है कि कई बार आर्टिस्ट अपने काम में कुछ इतने मगन हो जाते हैं कि उन्हें ध्यान ही नहीं रहता कि एक जीता जागता इंसान एक ही भाव भंगिमा में कितनी देर तक बैठे रह सकता है. वहीं, वह यह भी बताती है कि अगर पोज देते हुए मौडल सकुचाए, शर्माए, हिलती डुलती रहे तो ऐसी मौडलों को अगली बार काम मिलने में परेशानी होती है. कभी कभी आर्टिस्ट की सहूलियत के अनुसार मौडल को बार बार पोज बदलना भी पड़ता है. वह बताती है कि आजकल एस्कौर्ट के पेशे में आई लड़कियां भी न्यूड पोज देने को तैयार हो जाती हैं. लेकिन इस के लिए वे मोटा मेहताना वसूलती हैं. इसीलिए, आम न्यूड मौडल की अब भी मांग है.
कोलकाता के जाने माने आर्टिस्ट जोगेन चौधरी कहते हैं कि हमारे देश में न्यूड स्टडी का चलन यूरोपीय पेंटिंग के प्रभाव में शुरू हुआ. वे कहते हैं, ‘‘मजेदार बात यह है कि हमारे देश में जब किसी पुरुष मौडल को न्यूड स्टडी के लिए बुलाया जाता है तो वह पूरी तरह से निर्वस्त्र नहीं होता है.’’ महिला मौडल को ज्यादातर न्यूड पोज देना होता है, ऐसा क्यों? उन का कहना है कि कला और नारीदेह सौंदर्य की दृष्टि से न्यूड पुरुष मौडल की अपेक्षा महिला मौडल कहीं अधिक उपयुक्त मानी जाती हैं.
आर्ट कालेज में अपने पहली लाइफ स्टडी के बारे में बताते हुए जोगेन चौधुरी अपनी फाइन आर्ट के तीसरे वर्ष की छात्रा वस्था के दिनों में लौट जाते हैं. ‘न्यूड स्टडी की वह पहली क्लास थी. बहुत तनाव में थे सारे छात्र. क्लास में एक दुबली पतली 14-15 साल की मौडल आई. क्लास के बाहर उस के माता पिता बैठे थे. हमारे प्रोफैसर थे देवकुमार राय चौधुरी, लाइफ स्टडी के विशेषज्ञ. हाल ही में इटली से लौटे थे. क्लास में केवल प्रोफैसर ही मौडल के बदन को हाथ लगा सकते थे. लड़की के बदन को छू कर प्रोफैसर ने उस के पोज को ठीक किया.’
जोगेन बताते हैं कि मौडल की मनोस्थिति को वे बखूबी समझ रहे थे. इसीलिए उन्हें उस की चिंता भी हो रही थी कि इतने सारे लड़कों के सामने बेचारी मौडल कैसे न्यूड बैठेगी? कितनी देर तक बैठना होगा? मन ही मन उस के प्रति बड़ी सहानुभूति हो रही थी. पर किया कुछ नहीं जा सका. 5 सालों के पाठ्यक्रम में बीच बीच में लाइफ स्टडी चलती रही.
वे यह भी बताते हैं कि उस समय मौडल मिलना बहुत मुश्किल होता था. ज्यादातर बदनाम गलियों की लड़कियां या औरतें इस काम के लिए उपलब्ध हो पाती थीं. गौरतलब है कि जोगेन चौधुरी की एक विख्यात लाइफ स्टडी है – सुंदरी. यह पेंटिंग ललित कला अकादमी से प्रकाशित हुई थी. पर आज यह आउट औफ प्रिंट है. बंगाल के बहुत सारे पेंटर न्यूड स्टडी में महारत प्राप्त हैं. उन की न्यूड स्टडी की शैली भी अलगअलग हैं. प्रकाश कर्मकार ‘इरोटिक’ न्यूड पेंटिंग के लिए जाने जाते हैं तो परितोष सेन क्युबिस्टिक शैली के लिए.
एलिना बनिक कोलकाता की जानी मानी पेंटर हैं. आर्ट कालेज में अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहती हैं कि यह उन दिनों की बात थी जब उन्होंने स्कूल से सीधे आर्ट कालेज में दाखिला लिया था. लाइफ स्टडी की क्लास में महिला और पुरुष मौडल के बीच होने वाले भेदभाव को ले कर वे अकसर मुखर हो जाया करती थीं.
वे कहती हैं कि पुरुषदेह के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था. समझ भी नहीं थी. लेकिन एक बार बहस के दौरान सहपाठी मित्र ने आ कर कान में झल्लाते हुए कहा कि पुरुष मौडल पूरी तरह से न्यूड नहीं हो सकता है. अरे, पुरुषांग कभी भी हिलडुल सकता है. एलिना को बात समझ नहीं आई और वे अपनी बात पर अड़ी रहीं कि महिला मौडल की तरह पुरुष मौडल को भी पूरी तरह से न्यूड रहना होगा और वह दिन तकरार में ही बीत गया. आज इस बात को याद कर के वे मुसकरा देती हैं.
बहरहाल, यह तो हुई लाइफ स्टडी में एक महिला पेंटर के सामने आने वाली दिक्कतों की बात. इसी तरह महिला मौडल भी कई तरह की परेशानियों से जूझती हैं. यहां कुछेक घटनाओं का जिक्र जरूरी समझती हूं ताकि समझा जा सके कि ये मौडल किस तरह की विपरीत परिस्थितियों में काम करती हैं.
नारीदेह की समस्याएं
कोलकाता आर्ट कालेज. एक बड़े कमरे में बहुत सारे आर्ट स्टूडैंट्स अपनेअपने कैनवस के साथ तैयार बैठे हैं. यह क्लास न्यूड स्टडी की है. क्लास में केवल एक स्टूडैंट लड़की के अलावा बाकी सभी लड़के हैं. क्लास चालू है. क्लास में एक नग्न महिला एक खास भावभंगिमा में बैठी है. उसे देखदेख कर स्टडी करने के साथ स्केचिंग की क्लास जारी है. अचानक क्लास में मौजूद लड़की ने देखा कि मौडल के लिए अपनी भावभंगिमा के साथ बुत बन कर बैठे रहना संभव नहीं हो पा रहा है. वह कुछ कुछ सकुचा सी रही है, सिमटती चली जा रही है.
आमतौर पर स्टडी क्लास में नियमानुसार मौडल को बुत बन कर बैठे रहना होता है. कहीं कुछ तो था कि मौडल सामान्य आचरण नहीं कर पा रही थी. और उस के सकुचाने सिमटने से क्लास में बैठे स्टूडैंट्स एक हद तक परेशान व नाराज हो रहे थे. पर मौडल थी कि बारबार भावभंगिमा से डिगती चली जा रही थी. ऐसे में तमाम स्टूडैंट्स के साथ क्लास में बैठी लड़की उठती है और मौडल के पास जाती है. कुछ देर मौडल के साथ फुसफुसाने के बाद वह लौट कर आती
है और क्लास के तमाम स्टूडैंट्स से मुखातिब हो कर कहती है, ‘तुम लोग जरा क्लास से बाहर जाओ.’
क्लास के स्टूडैंट्स भौचक रह जाते हैं और कुछ तो झल्ला तक जाते हैं. ‘क्यों, अब क्या हुआ? पहले ही इतना समय बरबाद हो चुका है.’
क्लास की वह स्टूडैंट बौखला कर अपने साथी स्टूडैंट को डपटते हुए कहती है, ‘मैं ने कहा, तुम लोग अभी क्लास से बाहर जाओ, तो बाहर जाओ, बिना बहस किए.’ धीरे धीरे क्लास खाली हो गई. इस के बाद उस लड़की ने क्लास का दरवाजा बंद किया.
दरअसल, निर्वस्त्र मौडल का अचानक पीरियड शुरू हो गया था. और ऐसे में वह अपनी लज्जा को भला कैसे ढकती. वहीं, क्लास में मौजूद इतनी सारी निगाहें केवल उस पर और उसी पर टिकी हुई थीं. इस कारण वह अपनी भावभंगिमा के साथ बुत बन कर बैठी नहीं रह पा रही थी. जाहिर है, उस दिन न्यूड स्टडी की क्लास नहीं हुई. मौडल अपने घर लौट गई.
मुश्किलभरा पेशा
एक न्यूड मौडल को अपने पेशे के लिए काम करते हुए क्या क्या नहीं करना पड़ता है. वाकया ऋतुपर्णो घोष की फिल्म ‘चोखेर बाली’ का भी है. कहानी की मांग पर शूटिंग के दौरान एक न्यूड मौडल की जरूरत पड़ी. दरअसल, फिल्म का सहनायक महेंद्र डाक्टरी पढ़ रहा था. एनोटौमी के क्लास का एक दृश्य था, जिस में एक मृतक महिला को टेबल पर सोना था. फिल्म के सहयोगी कला निर्देशक को एक न्यूड मौडल की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी दी गई. एक मौडल मिली, पर इस शर्त पर कि फिल्म में किसी भी सूरत में उस का चेहरा न दिखाया जाए और वह मौडल थी कांचन मित्रा (बदला हुआ नाम). कांचन कहती है कि मृत शरीर यानी मृतक को मेकअप की कोई जरूरत नहीं थी लेकिन एनोटौमी की क्लास दिखानी थी तो मौडल के लिए मृतक का मेकअप जरूरी था. मृत दिखाने के लिए मौडल के शरीर का मेकअप करवाया गया. यह मौडल के लिए सब से कठिन काम था. वहीं, फिल्म में लाइट की एक अहम भूमिका होती है. किस एंगल से कितनी रोशनी मृतक के शरीर पर पड़नी चाहिए, ताकि फिल्मांकन अच्छा हो, इस की जांच के लिए मौडल को बार बार मेकअप कर के एनोटौमी टेबल पर सोना जरूरी था. उस के नग्न शरीर को बार बार टचअप करना जरूरी हो जाता था. जाहिर है न्यूड मौडल को बहुत परेशानी पेश आ रही थी.
कांचन को 4 बजे घर जाना था. लेकिन शूटिंग अभी पूरी नहीं हुई थी. और उस के बेटे के स्कूल से आने का समय हो रहा था. कांचन ने सोचा था कि मृत शरीर की शूटिंग होनी है, इस में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा पर सुबह से ले कर 4 बज गए. ऋतुपर्णो घोष को जब पता चला कि मौडल घर जाना चाहती है तो वे एकदम से उखड़ गए. आखिर मौडल को छुट्टी नहीं मिली. काम पूरा होने के बाद ही उसे घर जाने दिया गया.
कुल मिला कर मौडलिंग पेशे की यह लाइन यानी न्यूड मौडलिंग अपना कर पैसा कमाना बहुत ही मुश्किल भरा काम है. वैसे, प्रकाशन या प्रसारण में मौडल का चेहरा तो नहीं दिखाया जाता लेकिन शूटिंग के दौरान स्टूडैंट्स, संबंधित विज्ञापन या फिल्म की यूनिट के सदस्य तो मौडल को साक्षात देखते ही हैं. बहरहाल, महिलाओं के लिए यह भी एक पेचीदा व अजीबोगरीब पेशा है.
VIDEO : करीना कपूर मेकअप लुक फ्रॉम की एंड का मूवी
ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTubeचैनल.