धर्म के पाखंड को खोलने में फिल्मों की भी अहमियत है. फिल्मों के जरीए धर्म की गंदगी को उजागर किया जा सकता है. ऐसी फिल्में सामाजिक जागरूकता फैलाने का काम करती हैं. फिल्म ‘ये कैसा पेशा’ में पाखंडी समाज की सच्चाई को दिखाया गया है. इस फिल्म में बहुत सारे बोल्ड सीन को देखते हुए सैंसर बोर्ड ने इस को ‘ए’ सर्टिफिकेट के साथ पास किया है.
फिल्म ‘ये कैसा पेशा’ की कहानी पाखंडी महिला धर्मगुरु पर आधारित है, जो धर्म की आड़ में भोलेभाले लोगों को ठगते हुए धड़ल्ले से अपनी दुकान चला रही है. वह महिला धर्मगुरु कैसे सड़क से उठ कर करोड़पति बनती है, रात के अंधेरे में वह लोगों के मनोरंजन के लिए क्याक्या करती है, इस को दिखाया गया है. फिल्म में ‘गुरु मां’ का किरदार अर्पिता माली ने निभाया है. इस फिल्म के प्रोड्यूसर सुरेश कुमार मालाकार और डायरैक्टर आलोक श्रीवास्तव हैं.
पेश हैं, फिल्म में ‘गुरु मां’ का किरदार निभाने वाली अर्पिता माली से हुई बातचीत के खास अंश:
क्या फिल्म ‘ये कैसा पेशा’ राधे मां पर बनी है?
नहीं. यह ‘राधे मां’ की नहीं, बल्कि ‘गुरु मां’ की कहानी है. इस फिल्म में पाखंडी ‘गुरु मां’ की कहानी को दिखाया गया है. ‘गुरु मां’ धर्म के पाखंड में रईस लोगों को फंसा कर उन से पैसा वसूल करती है. रात के अंधेरे में वह ऐसे रईस लोगों के लिए बहुत सारे इंतजाम करती है. इस के जरीए वह कुछ ही दिनों में अमीर हो जाती है. फिल्म में ‘गुरु मां’ का रोल निभाते समय मुझे यह लगा कि यह सब समाज में होता आ रहा है.
फिल्म में बोल्ड सीन को देख कर लगता है, जैसे जबरन सैक्स दिखाने की कोशिश की गई है?
इस फिल्म का खास मकसद समाज को एक संदेश देना है, ताकि भोलेभाले लोग पाखंडी ‘गुरु मां’ जैसे किरदारों से बच सकें. फिल्म में दिखाया गया है कि रईस और दबदबे वाले लोग पाखंडी लोगों के पास दूसरी वजहों से भी आते हैं. ऐसे बड़ेबड़े आश्रमों में रात के अंधेरे में क्या कुछ होता है, यह दिखाने की कोशिश की गई है.
यह सही बात है कि इस के पहले मैं ने किसी फिल्म में इतने बोल्ड सीन नहीं किए हैं. इन को करने में परेशानी हुई. मैं एक हीरोइन हूं. कहानी की मांग पर सब करना पड़ा. सब से ज्यादा परेशानी मुझे किसिंग सीन को देने में हुई. फिल्म को देख कर यह कहीं नहीं लगेगा कि इस में सैक्स सीन जबरन डाले गए हैं.
क्या आप को इस फिल्म के विरोध का डर नहीं लगता है?
धर्म के पाखंड को उजागर करने वालों का हमेशा ही विरोध होता रहा है. हमारा मकसद समाज को जागरूक करने का है. फिल्म को सैंसर बोर्ड ने पास कर दिया है.
झारखंड से दिल्ली होते हुए सपनों की नगरी मुंबई आने का सफर कैसा रहा?
पहले लड़कियां दूरियों से घबरा कर कई बार बड़े शहरों में अपने सपनों को पूरा करने के लिए आने में हिचकती थीं, पर अब हालात बदल गए हैं. लड़कियों में समझदारी आ गई है. उन को यह पता है कि कैरियर को कैसे आगे ले जाना है.
मैं फैशन डिजाइनिंग सीखने दिल्ली आई, पर मेरे मन में यह विचार पहले से था कि मुझे फिल्मी दुनिया में अपना कैरियर बनाना है. मुझे दिल्ली में सब से पहले मौडलिंग करने का मौका मिला. मैं दिल्ली होते हुए मुंबई आई. अब तक का मेरा सफर जोश से भरा रहा है.
फिल्म ‘ये कैसा पेशा’ से आप को कैसी उम्मीदें हैं?
फिल्म ‘ये कैसा पेशा’ में भी मेरा मुख्य किरदार है. इस फिल्म में मुझे जिंदगी के हर रंग को दिखाने का मौका मिला है. यह मेरी जिंदगी का खास रोल है. मुझे ऐसे ही रोल पसंद हैं.
आप भोजपुरी और हिंदी फिल्मों में काम कर रही हैं. दोनों में क्या फर्क महसूस कर रही हैं?
हिंदी और भोजपुरी फिल्मों में बहुत फर्क है. फिल्म की कहानी, गाने और बनाने के तरीके सभी में फर्क होता है. आप ने 50 भोजपुरी फिल्में की हों और एक हिंदी फिल्म की, मामला बराबर का होता है. भोजपुरी फिल्मों में काम जल्दी मिल जाता है.
आप के दूसरे शौक क्या हैं?
मुझे घूमना और म्यूजिक सुनना बहुत पसंद है. मैं पूरी तरह से नौनवेज खाना पसंद करती हूं.
मैं कोशिश करती हूं कि हर रविवार को अपने घर में रह सकूं. इस दिन मैं अपने हाथ से खाना बनाना, खाना और खिलाना पसंद करती हूं.
पहले और आज की लड़की में क्या फर्क महसूस करती हैं?
आज की लड़की हर तरह से ज्यादा काबिल है. उसे पता है कि क्या और कैसे करना है. वह बहुत ही बेहतर तरीके से अपने कैरियर की योजना बनाती है. उस के पास मौके भी पहले से ज्यादा हैं.
आज मेरे लिए मेरे पापा मुंबई आ गए हैं. इसे देख कर लगता है कि पहले इस तरह का सहयोग परिवार को नहीं मिलता था. आजादी भी पहले से ज्यादा बढ़ी है. ऐसे में कुछ परेशानियां भी आई हैं, पर आज की लड़की काबिल है अपने को संभालने के लिए.
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साल 2014 में नेता जयप्रकाश नारायण के जन्मदिन के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के दोनों सदनों के सांसदों को 3-3 गांवों को ‘सांसद आदर्श गांव’ के रूप में चुन कर देशभर से तकरीबन 6 लाख गांवों में से 2500 गांवों में बुनियादी सुविधाओं समेत उन्हें हाईटैक बनाने का टारगेट दिया था.
इन गांवों को चुनने के पीछे कुछ शर्तें भी रखी गई थीं जिन के तहत कोई भी सांसद खुद का या पत्नी के मायके का गांव नहीं चुन सकता था. गांव की आबादी 3 से 5 हजार के बीच होनी थी.
इन गांवों में 80 से ज्यादा समस्याओं को ध्यान में रख कर तरक्की के काम किए जाने थे. सेहत, सफाई, पीने का साफ पानी, पढ़ाईलिखाई, ईलाइब्रेरी, कसरत, खेतीबारी, बैंकिंग, डाकघर समेत ऐसे तमाम मुद्दों पर तरक्की के काम होने थे.
इस से गांवों में शहरों की तरह सुविधाएं मिलना शुरू हो जातीं और वहां के लोगों को शहरों की तरफ नहीं भागना पड़ता. लेकिन सांसद आदर्श गांवों की हकीकत कुछ और ही है.
अगर सांसद आदर्श गांवों में हुए तरक्की के कामों की हकीकत की बात करें तो देश में तकरीबन 6 लाख गांवों में से अब तक 3 चरणों में 2500 गांवों को चुन लिया जाना था. लेकिन अभी पहले चरण में लोकसभा के 543 सांसदों में से केवल 500 सांसदों ने ही गांवों को चुना है यानी 43 सांसद ऐसे हैं जिन्हें गांवों की तरक्की से कुछ लेनादेना नहीं है.
राज्यसभा के सांसद तो गांवों को ले कर और भी उदासीन हैं. पहले चरण में 253 सांसदों में से केवल 203 सांसदों ने ही गांवों को चुना जबकि बाकी के 50 सांसद चुनने की जहमत तक नहीं उठा सके.
अगर इस योजना के दूसरे चरण की बात की जाए तो इस के हालात तो और भी खराब हैं. इस में 545 लोकसभा सांसदों में से केवल 323 सांसदों ने ही गांवों को चुना जबकि 222 सांसद गांवों को चुनने में नाकाम रहे.
राज्यसभा के 241 सांसदों में से केवल 120 सांसदों ने गांवों को चुना, बाकी सांसदों ने तो इस के बारे में सोचा तक नहीं.
जिन सांसदों ने दूसरे चरण में गांवों को चुना उन में से ज्यादातर सांसद तीसरे चरण के गांवों को चुनने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं. अभी तक तीसरे चरण में लोकसभा के 543 सांसदों में से केवल 93 सांसदों ने ही गांवों को चुना है. बाकी के सांसदों को गांवों के चुनने में कोई दिलचस्पी नहीं.
अगर राज्यसभा के सांसदों की बात की जाए तो 241 सांसदों में से केवल 24 सांसदों ने ही गांवों के चुनने में दिलचस्पी दिखाई यानी बाकी राज्यसभा सांसदों को गांव की तरक्की से कुछ भी लेनादेना नहीं है.
कई सांसद आदर्श गांवों का दौरा करने पर पता चलता है कि ऐसे गांवों के लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं. ज्यादातर सांसद ऐसे हैं जिन्होंने गांवों को चुन तो लिया है लेकिन तरक्की के कामों में वे फिसड्डी साबित हुए. जो छोटेमोटे काम हुए भी हैं, उस का फायदा सिर्फ अगड़ों तक ही सिमट कर रह गया.
बस्ती लोकसभा क्षेत्र के सांसद हरीश द्विवेदी ने पहले चरण में गांव अमोढ़ा को चुना. इस गांव के उत्तरी छोर पर हरिजन बस्ती व सोनकर बस्ती यानी खटीक लोग रहते हैं जो आज भी बुनियादी सुविधाओं से दूर हैं.
सरकार व प्रशासन बड़े जोरशोर से स्वच्छ भारत का राग अलाप रहे हैं और इस मुहिम के कामयाब होने का ढोल भी पीट रहे हैं, पर आज भी यहां के लोग खुले में शौच जाने को मजबूर हैं. यहां की पूरी दलित बस्ती ही खुले में शौच के लिए जाती है. तमाम औरतें अपनी जान जोखिम में डाल कर खुले में शौच के लिए जाने को मजबूर हैं.
सीतारुन्निसा जैसी कई औरतें विधवा पैंशन पाने के लिए सैकड़ों बार सरकारी अफसरों की चौखट पर नाक रगड़ चुकी हैं, लेकिन आज तक उन्हें विधवा पैंशन नसीब नहीं हुई है.
हरिजन बस्ती के लोग आज भी बिजली के लिए तरस रहे हैं, क्योंकि इस बस्ती में आज तक बिजली पहुंची ही नहीं है.
सड़कों पर बजबजाती नालियों का गंदा पानी व कूड़े का ढेर यहां की साफसफाई व्यवस्था की धज्जियां उड़ा रहा है. गांव के दलित परिवार आज भी फूस के घरों में रहने को मजबूर हैं.
उत्तर प्रदेश में एक दिन के लिए मुख्यमंत्री की कुरसी संभालने वाले सिद्धार्थनगर जिले की डुमरियागंज सीट के सांसद जगदंबिका पाल द्वारा चुने गए सांसद आदर्श गांव तरक्की का भी यही हाल है.
यहां भी दलित पुरवा तरक्की की योजनाओं का फायदा लेने के लिए तरस रहा है. इस गांव के पश्चिमी छोर पर हरिजन टोले में पहुंचने पर सब से पहले सड़क किनारे खुले में किया गया शौच आप का स्वागत करता हुआ मिल जाएगा.
मिश्रीलाल, रामफल शर्मा, मनोहर, मंजू देवी, नीरज, नंदू जैसे सैकड़ों परिवार हैं, जिन के पास रहने को घर तक नहीं हैं. शौचालय न होने के चलते ये लोग खुले में शौच करने को मजबूर हैं.
गांव में शौचालय, घर, बिजलीपानी की समस्या जैसे पहले थी वैसे ही आज भी बनी हुई है. गांव के लोगों में सांसद जगदंबिका पाल के खिलाफ गुस्सा है. उन का कहना है कि जब गांव को पिछड़ेपन के दलदल में ही धकेलना था तो फिर इस गांव को सांसद आदर्श गांव के रूप में क्यों चुना गया?
लोग नहीं पहचानते सांसद को
जिन सांसदों ने आदर्श गांवों को चुना, वे उस गांव में जाने की कोशिश ही नहीं करते. इस वजह से गांव के ज्यादातर लोग सांसदों को पहचानते ही नहीं हैं.
देश में ऐसे तमाम सांसद हैं जो सदन की बैठक तक में शामिल नहीं होते, ऐसे में गांवों में जाने की बात तो दूर की कौड़ी है. जिन गांवों की पड़ताल की गई वहां के ज्यादातर लोगों का यही कहना था कि वे सांसद को नहीं पहचानते.
क्रिकेटर रह चुके सचिन तेंदुलकर को ले कर सांसद आदर्श गांव के लिए बड़ी छीछालेदर हुई. इस के बाद वे पहली बार गोद लिए गांव में गए.
दलितों से वसूले जाते हैं पैसे
सरकार दलितों के लिए ऐसी तमाम योजनाएं चलाती है जिन में उन्हें मुफ्त में बुनियादी सुविधाओं का फायदा मिलना चाहिए. लेकिन सांसद आदर्श गांव की हकीकत तो कुछ और है. यहां गरीबों को खाना पकाने के लिए मुफ्त में उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनैक्शन मिलना था लेकिन जिन दलितों को इस योजना का फायदा दिया गया उस में 1-1 कनैक्शन के लिए 1600 रुपए वसूले गए.
जो दलित परिवार पैसा दे पाने में नाकाम थे उन को कनैक्शन के कागज ही नहीं दिए जा रहे थे. कुछ परिवारों ने उधार के पैसे से कनैक्शन लिए. सोना देवी, गुडि़या, रेनू, आशा जैसी तमाम औरतों ने बताया कि उन से उज्ज्वला गैस कनैक्शन के नाम पर 1600 रुपए वसूले गए.
2 और क्यों चुन लिए
जिन सांसदों ने प्रधानमंत्री के दबाव में तीनों चरणों के गांवों को चुन भी लिया, अभी उन के द्वारा चुने गए पहले चरण के गांवों में ही तरक्की को रफ्तार नहीं मिल पाई है, ऐसे में जब अगले साल यानी 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं, तो सांसद आदर्श गांवों में तय किए गए तरक्की के कामों को अमलीजामा पहनाना मुश्किल दिख रहा है.
आज जब देश और देश के 19 राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, उस के बाद 3 गांवों को चुन पाना और उन गांवों की तरक्की करने में पूरी तरह फेल हो जाने से सरकार की गांवों के प्रति अनदेखी का पता चलता है.
सांसद आदर्श गांवों को ले कर लोग यहां तक कह रहे हैं कि ये गांव 4 साल बाद भी गोदी में ही खेल रहे हैं. इस से जाहिर होता है कि सरकार गांव के लोगों को बेवकूफ बना कर अपना चुनावी उल्लू सीधा करना चाहती है.
सांसद आदर्श गांवों को आईना दिखाता एक गांव
उत्तर प्रदेश में सिद्धार्थनगर जिले के ब्लौक भनवापुर का हसुड़ी औसानपुर गांव अपनी तरक्की के कामों के चलते बड़ेबड़े शहरों तक को मात दे रहा है. यह सब सरकार, गांव के लोगों व ग्राम प्रधान दिलीप कुमार त्रिपाठी की कोशिशों के चलते मुमकिन हुआ है.
जिस समय दिलीप कुमार त्रिपाठी ने गांव की जिम्मेदारी संभाली थी, उस समय गांव में गंदगी थी. लोगों के घरों में शौचालय न होने के चलते हर कोई खुले में शौच करने को मजबूर था. गांव में बना प्राथमिक व जूनियर स्कूल बदहाली का शिकार था. बेरोजगारी के चलते लोग गांव से बाहर जाने को मजबूर थे.
ग्राम प्रधान दिलीप कुमार त्रिपाठी ने पंचायत सदस्यों के साथ सलाहमशवरा कर गांव की तरक्की का खाका तैयार किया. लेकिन पता चला कि इस गांव के लिए सरकार के पास इतना भी बजट नहीं है जिस से एक भी काम पूरा किया जा सके. ऐसे में उन्होंने तय किया कि वे इस गांव को शहरों से भी ज्यादा सुविधाएं मुहैया कराएंगे. उन्होंने अपने मछलीपालन व सोलर के कारोबार से होने वाली कमाई को गांव की तरक्की में खर्च करने की ठान ली.
गांव हुआ डिजिटल
हसुड़ी औसानपुर गांव में बिजली के खंभों पर अब 23 सीसीटीवी कैमरे लग गए हैं. इन कैमरों से गांव में खुले में शौच रोकने की निगरानी किए जाने के साथसाथ दूसरी तमाम गलत हरकतों पर नजर रखी जाती है.
गांव वालों को फ्री में वाईफाई सुविधा देने के लिए बिजली के खंभों पर इंटरनैट राउटर लगाए गए हैं. हर खंभे पर लगे सिस्टम से उद्घोषक गांव वालों को जागरूक करने का काम करते हैं. गांव वालों को सरकार की औनलाइन सेवाओं के लिए शहर न जाना पड़े, इस के लिए गांव में कौमन सर्विस सैंटर बनाया गया है जहां से राशनकार्ड, जन्म प्रमाणपत्र, मृत्यु प्रमाणपत्र, खेतीबारी से जुड़े अनुदान, वृद्धावस्था पैंशन, विधवा पैंशन वगैरह की आवेदन सुविधाएं मुहैया कराई गई हैं.
यह प्रदेश का पहला ऐसा गांव है जहां की गांव से जुड़ी 18 सूचनाओं समेत जमीनजायदाद की सूचनाएं जियोग्राफिकल इनफौर्मेशन सिस्टम के जरीए गांव की वैबसाइट से सार्वजनिक की गई हैं.
हर घर में बिजली पहुंच चुकी है. गांव में बिजली की बचत के लिए एलईडी के बल्ब जलाए जाते हैं. बिजली के खंभों पर भी एलईडी की स्ट्रीट लाइटें लगाई गई हैं.
इस गांव को कैशलैस बनाने के लिए एक बैंक द्वारा गांव में ही ग्राहक सेवा केंद्र बनाने की कवायद की गई है.
बैंक से जुड़े अफसर हिमांशु टंडन ने बताया कि गांव की तरक्की में भागीदारी करते हुए गांव के सरकारी स्कूल में बच्चों के बैठने के लिए रंगबिरंगे बैंच व डिजिटल लाइब्रेरी समेत अनेक सुविधाएं देने की कवायद शुरू की गई है.
ग्राम प्रधान दिलीप कुमार त्रिपाठी ने राजस्थान के जयपुर से प्रभावित हो कर इस गांव के घरों की सभी दीवारों को गुलाबी रंग में रंगवा दिया है. अब तो इस गांव को ‘पिंक विलेज’ के नाम से जाना जाने लगा है.
इस गांव के स्कूल का ऐसा बदलाव किया गया है कि यह पढ़ाई और दूसरी सुविधाओं के मामले में प्राइवेट स्कूलों को भी मात दे रहा है. टाइल्स लगे फर्श, लड़केलड़कियों के लिए अलगअलग शौचालय, साफ पानी के लिए स्कूल में आरओ सिस्टम, बच्चों की सिक्योरिटी के लिए हर क्लास में सीसीटीवी कैमरे, प्रोजैक्टर और दूसरी तकनीकी सुविधाओं से लैस स्मार्ट क्लास, साफसुथरे भोजन का इंतजाम इस स्कूल को दूसरे स्कूलों से अलग बनाता है.
गांव में कोई बीमार न पड़े, इस के लिए सभी को सेहत व सफाई की आदतों को ले कर जागरूक किया गया है.
गांव को चारों ओर से खूबसूरती बढ़ाने वाले पौधों के साथसाथ फलदार व औक्सिजन बढ़ाने वाले पौधों को रोपा गया है. गांव के अंदर सड़कों को इंटरलौकिंग ईंटों से पक्का किया जा चुका है और गांव को शहर से जोड़ने वाली सड़क को कंक्रीट का बनाया जा चुका है.
इस गांव में किसानों को मजबूत किए जाने की कोशिश की जा रही है. उन्हें समयसमय पर ट्रेनिंग, जैविक खेती की तकनीक, उन्नत कृषि यंत्र व बीज वगैरह की जानकारी मुहैया कराई जाती है.
गांव के किसानों को सस्ती सिंचाई के लिए 6 सोलर पंप मुहैया कराए गए हैं. कृषि विज्ञान केंद्र, सोहना के वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को खेती के नुसखे दिए जाते हैं.
गांव के लोगों को मनरेगा के जरीए रोजगार भी दिया जा रहा है. गांव की लड़कियों, औरतों व नौजवानों के लिए कंप्यूटर व सिलाईकढ़ाई की मुफ्त ट्रेनिंग दी जा रही है.
इस गांव में छुआछूत का नामोनिशान तक नहीं मिलेगा. गांव की लड़कियों की शादी में ग्राम प्रधान की तरफ से 11 हजार रुपए की मदद भी दी जाती है.
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गांवों में चाहे किसान, छोटे काश्तकार, छोटी जमीनों के मालिक अपनेआप को यादव, जाट, गूजर, अहीर, कुर्मी, कारीगर आदि पिछड़ी ओबीसी जाति का समझ कर कल तक अछूत कहे जाने वाले दलित एससीएसटी लोगों से ऊपर समझते हैं, हिंदू वर्ण व्यवस्था में सवर्णों के लिए दोनों बराबर से हैं. दोनों को सदियों से समाज में सब से निचली जगह मिली है. दोनों का पैसा लूटा गया है, दोनों की औरतों को उठाया गया है, दोनों को साथ बैठने तक नहीं दिया गया है.
1947 के बाद के भूमि सुधार कानूनों की वजह से बहुत से किसानों के पास वे जमीनें आ गई हैं जो पहले ऊंची जातियों के जमींदारों के पास हुआ करती थीं पर उन से सवर्णों का व्यवहार वैसा ही है. ओबीसी आरक्षण का विरोध सवर्णों ने किया था तो इसलिए कि वे नहीं चाहते थे कि मंडल आयोग के जरीए कल तक दास और सेवक बने पर समझदार थोड़ी हैसियत वाले लोग बराबरी की जगह लेने लगें.
आज भी आरक्षण में ज्यादा गुस्सा इन ओबीसी जमातों के साथ है, दलित जमातों के साथ नहीं. जो भी ऊंचे पद मिले हैं उन में दलितों को आरक्षण का फायदा आज भी कम है पर ओबीसी बड़ी तेजी से उन पदों पर आ ही नहीं गए, बराबर के कुशल साबित हो रहे हैं.
धर्म की देन इस भेदभाव को खत्म करना भारत की आर्थिक प्रगति के लिए पहली जरूरत है. जो भारतीय मजदूरी करने विदेश गए वहां वे बराबर के से स्तर पर हैं क्योंकि जैसे ही सामाजिक भेदभाव से छूट मिलती है जन्मजात ऊंचनीच का भेदभाव खत्म हो जाता है.
भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी गणित के लिए पिछड़ों से बड़ा समझौता किया पर मराठों और राजपूतों की तरह उन्हें रखा अंगूठे के नीचे. असल राज की बागडोर मुख्य पुरोहितों के हाथ में रहती थी और राजा सेनापति की तरह हुक्म मात्र बजाते थे. आज के मंत्रिमंडल को नागपुर से ज्यादा चलाया जाता है, नौर्थ ब्लौक से कम. यह बात पिछड़े और दलित मंत्रियों और पार्टी सांसदों को न मालूम हो ऐसा नहीं है. दोनों बराबर का भेदभाव सह रहे हैं. लाख चरण स्पर्शों के बावजूद उन्हें वह सम्मान नहीं मिल रहा जो गुरु के अजीज को मिलता है.
गोरखपुर और फूलपुर की भाजपा की हार को इसी नजर से देखा जाना चाहिए. भाजपा ने न केवल व्यापारियों पर लात मारी, साधारण गांव में काम करने वाले और दूध वगैरह का व्यापार करने वालों को भी सकते में डाल दिया. उन के भगवे झंडे उठाने की कीमत दी नहीं गई उलटे उन्हें झंडे पकड़ने की इजाजत देने की दक्षिणा वसूल कर ली गई. यही गुस्सा अब इन उपचुनावों में सामने आया है. गुस्सा तो 2014 के बाद 2017 में भी था जब विधानसभा चुनाव हुए पर तब तक अखिलेश यादव और राहुल गांधी बहुजन समाज पार्टी की मायावती को मना नहीं पाए थे. अब भगवा आतंक पौराणिक युग के स्तर पर पहुंचने लगा है और इसलिए मायावती को अखिलेश यादव से हाथ मिलाना पड़ा. पहले दलित व पिछड़े नेताओं की हठधर्मी के कारण ही उन के बहुत से नेता अपने पर जुल्म ढाने वालों के साथ ही मिल गए थे. दोनों और जिद्दी बने रहते तो वे अपनी जमातों को खो बैठते. यह चुनाव नतीजे का परिणाम है.
यह समझ लेना चाहिए जैसे पैसा मेहनत से मिलता है इज्जत के लिए भी मेहनत करनी पड़ती है और इज्जत के बिना मेहनत नहीं होती और मेहनत के बिना पैसा नहीं मिलता.
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जनता को बेहतर डाक्टरी इलाज मुहैया कराने की तमाम सरकारी योजनाओं के बड़ेबड़े होर्डिंग भले ही लोगों का ध्यान खींचते हों, पर इन योजनाओं को असरदार तरीके से लागू न करने के चलते मरीजों का हाल बेहाल है.
अगस्त, 2017 में गोरखपुर के बीआरडी मैडिकल कालेज में औक्सिजन की कमी से हुई सैकड़ों बच्चों की मौतें सरकारी अस्पतालों के बुरे हालात को उजागर करती हैं.
गौरतलब है कि गोरखपुर और फर्रुखाबाद के जिला अस्पताल में मरने वाले बच्चे उन गरीब परिवारों के थे, जो इलाज के लिए केवल सरकारी अस्पतालों की ओर ताकते हैं.
इसी तरह राजस्थान के बांसवाड़ा में महात्मा गांधी चिकित्सालय में 51 दिनों में 81 बच्चों की मौतें कुपोषण की वजह से हो गईं.
वहीं दूसरी ओर जमशेदपुर के महात्मा गांधी मैमोरियल अस्पताल में बीते चंद महीनों में 164 मौतें हुईं तो झारखंड के 2 अस्पतालों में इस साल अब तक 800 से ज्यादा बच्चों की मौतें हो गईं. इन में से ज्यादातर मौतें मैनेजमैंट की कमी की वजह से हुईं.
स्वास्थ्य सेवाएं वैंटीलेटर पर
मध्य प्रदेश के 51 जिलों में 8,764 प्राथमिक उपस्वास्थ्य केंद्र, 1,157 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 334 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 63 सिविल अस्पताल और 51 जिला अस्पताल हैं, पर स्वास्थ्य सेवाएं वैंटीलेटर पर हैं.
सरकार नई स्वास्थ्य योजनाएं लागू कर रही है, लेकिन हकीकत में इस के नतीजे निराशाजनक ही रहे हैं.
सरकारी योजनाओं में फैला भ्रष्टाचार भी इस में अहम रोल निभा रहा है. गांवों में ठेके पर बहाल किए गए स्वास्थ्य कार्यकर्ता हफ्ते में एक दिन जा कर पंचायत भवन या स्कूल में थोड़ी देर बैठ कर बच्चों को टीके लगा कर या मरीजों को नीलीपीली गोलियां बांट कर अपने फर्ज को पूरा करना समझ लेते हैं.
कहने को तो सरकारी अस्पतालों में हजारों बिस्तर और मशीनें हैं, लेकिन इन का इंतजाम बदहाल है. कई अस्पतालों में 1-1 बिस्तर पर 2-2 मरीज भरती कर इलाज की रस्म अदायगी हो रही है.
मैदान में पोस्टमार्टम
मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में पोस्टमार्टम हाउस में मवेशी मरे पड़े रहते हैं और डाक्टर खुले मैदान में पोस्टमार्टम कर देते हैं.
ऐसी ही एक घटना मई, 2017 में नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा अस्पताल में सामने आई थी. यहां करंट लगने से मरी 14 साल की एक किशोरी का पोस्टमार्टम डाक्टरों ने मैदान में किया.
परिवार वाले डाक्टरों के आगे गिड़गिड़ाते रहे कि उन की बेटी का पोस्टमार्टम करने के लिए कम से कम किसी कपड़े या धोती की आड़ तो बना लीजिए, लेकिन डाक्टर नहीं माने और खुले में ही पोस्टमार्टम कर दिया.
बताया गया कि इस की वजह पोस्टमार्टम हाउस में गंदगी फैली थी. एक मवेशी की सड़ रही लाश से परेशानी हो रही थी. उस में से बदबू आ रही थी.
उजड़ी 600 कोखें
नरसिंहपुर जिला अस्पताल में पिछले 9 महीने में तकरीबन 600 औरतों की बच्चेदानी के आपरेशन किए जाने के पीछे एक रैकेट के होने के शक से हड़कंप मच गया.
अगर कोई औरत पेटदर्द से पीडि़त होती और वह जिला अस्पताल पहुंच जाती तो डाक्टर उसे पेटदर्द के लिए कोई दवा दें या न दें, उस का ब्लड एचआईवी व ईसीजी जांच के लिए पैथोलौजी सैंटर जरूर भेज देते. जब रिपोर्ट आ जाती तो बताया जाता है कि मरीज की बच्चेदानी का आपरेशन किया जाएगा.
आपरेशन बगैर सोनोग्राफी जांच के कर दिए जाते. इक्कादुक्का मामलों में अगर सोनोग्राफी कराई भी जाती तो बता दिया जाता कि बच्चेदानी में सूजन है या फिर उस में गांठ है, जिस से तकलीफ है. यह कह कर बच्चेदानी का आपरेशन कर दिया जाता.
हैरानी की बात है कि जिन का आपरेशन किया गया उन में कम उम्र की औरतें ज्यादा थीं. 25 से 35 साल की औरतों की तादाद 200 से ज्यादा थी जबकि 35 से 45 साल की औरतों की तादाद 250 थी.
निजी अस्पताल मालामाल
मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान वगैरह योजनाओं के तहत प्रदेश के 2 दर्जन से ज्यादा निजी क्लिनिक को मरीजों के इलाज के लिए चिह्नित किया गया है. इन में कैंसर, हृदय रोग समेत दूसरी गंभीर बीमारियों से पीडि़त मरीजों का इलाज होता है और राज्य सरकार इलाज का खर्च उठाती है. पर जब मरीज इन निजी क्लिनिकों में इलाज के खर्च का लेखाजोखा तैयार करवाने जाता है तो बीमारी से कई गुना ज्यादा का लेखाजोखा तैयार कर सरकार से लाखों रुपए की भरपाई ये निजी अस्पताल कराते हैं.
बेदम सरकारी अस्पताल
गांवदेहात के स्वास्थ्य केंद्रों में डाक्टरों की बेहद कमी है. वजह, मैडिकल कालेजों से डिगरी लेने के बाद डाक्टरों की वहां जाने में कोई दिलचस्पी नहीं है.
शहरों में बड़ी तादाद में चल रहे निजी अस्पतालों में इन डाक्टरों को नौकरी के अलावा सीनियर डाक्टरों के साथ काम करने का मौका मिल जाता है.
प्रदेश सरकार द्वारा आबादी की बढ़ती रफ्तार के साथ नए मैडिकल कालेज खोलने या मैडिकल कालेजों में सीटों की तादाद बढ़ाए जाने में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई गई है.
सरकारी अस्पतालों में काम कर रहे डाक्टर ओपीडी में बैठने के बजाय निजी प्रैक्टिस कर पैसा कमाने में लगे हैं. एक मरीज से फीस के नाम पर 200 से ले कर 500 रुपए वसूलने वाले इन डाक्टरों को महीनेभर में मिलने वाली तनख्वाह नाकाफी लगती है.
कसबाई इलाकों के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में महिला डाक्टर के न होने से स्वास्थ्य विभाग की जननी सुरक्षा योजना का फायदा गरीब तबके को सही ढंग से नहीं मिल पा रहा है. अस्पतालों में बच्चा पैदा कराने का काम नर्सों व दाइयों के जिम्मे है. यही वजह है कि निजी नर्सिंगहोम गरीबों की जेब पर डाका डाल कर नोट बटोर रहे हैं. मलेरिया के लिए की जाने वाली खून की जांच के लिए 2-3 बार भटकना पड़ता है. मजबूरन लोग मैडिकल स्टोर पर मिलने वाली किट का सहारा लेते हैं.
गरीब के पास वोट रूपी हथियार होता है. कभी व्यवस्था से नाराज हो कर वह सरकार बदलने का कदम उठाता भी है तो अगली सरकार का रवैया भी वैसा ही रहता है. ऐसे में गरीब तबका सरकारी अस्पतालों में मिल रही आधीअधूरी सुविधाओं से काम चला लेता है.
लोगों द्वारा चुनी जाने वाली सरकारें जनता के दुखदर्द को महसूस न कर के उन्हें पूजापाठ के रास्ते पर चलाने में बिजी हैं.
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साल 1989 में आई सलमान खान और भाग्यश्री की सुपरहिट फिल्म ‘मैं ने प्यार किया’ का एक गाना ‘कबूतर जाजाजा, कबूतर जा…’ बहुत मशहूर हुआ था, जिस में भाग्यश्री अपना लव लैटर एक खूबसूरत सफेद कबूतर की मारफत दूर गए सलमान खान तक भिजवाती है. वह समझदार कबूतर सलमान खान तक चिट्ठी पहुंचा कर कर अपना फर्ज निभाता है.
पर कुछ कबूतर समझदार नहीं, बल्कि शातिर होते हैं. उन की सरपरस्ती करने वाले कबूतरबाज तो और भी चालबाज. यहां कबूतर कोई पक्षी नहीं, बल्कि वे लालची लोग होते हैं जो पौंड, डौलर में कमाई करने की खातिर गैरकानूनी तरीके से विदेशों की धरती पर पैर रखते ही वहां ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे गधे के सिर से सींग. लोगों को इस तरह एक देश से दूसरे देश में भेजने को ‘कबूतरबाजी’ का नाम दिया गया है.
साल 2003 में पंजाबी गायक दलेर मेहंदी कबूतरबाजी के मामले में फंसे थे. तब उन पर और उन के बड़े भाई शमशेर सिंह पर आरोप लगा था कि वे प्रशासन को धोखे में रख कर कुछ लोगों को अपनी सिंगिंग टीम का हिस्सा बता कर विदेश ले गए थे और उन्हें वहीं छोड़ दिया था. इस के एवज में उन्होंने काफी मोटी रकम भी वसूली थी.
मामला कुछ यों है कि साल 1998 और 1999 में दलेर मेहंदी 2 बार अमेरिका गए थे. इस दौरान वे 10 ऐसे लोगों को भी अपने साथ ले गए थे, जो लौटे ही नहीं.
साल 2003 में बख्शीश सिंह नाम के एक शख्स ने दलेर मेहंदी के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी. पंजाब की पटियाला पुलिस ने जानकारी के आधार पर दलेर मेहंदी के भाई शमशेर मेहंदी को गिरफ्तार किया था. पर तब पूरी पुलिस टीम का ही तबादला कर दिया गया था. ऐसा माना जाता है कि किसी भारी दबाव के चलते ऐसा फैसला लिया गया था.
लेकिन अब 15 साल के बाद पटियाला कोर्ट ने दलेर मेहंदी को गैरकानूनी तरीके से लोगों को विदेश ले जाने के मामले में कुसूरवार बताया है. दलेर मेहंदी को 2 साल की सजा सुनाई गई है. साथ ही, उन पर 2 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है.
हालांकि, दलेर मेहंदी को फौरन जमानत भी मिल गई और उन के वकील ने कहा कि वे निचली अदालत के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देंगे.
चूंकि यह हाईप्रोफाइल मामला पंजाबी गायक दलेर मेहंदी से जुड़ा हुआ है, इसलिए जल्दी ही सुर्खियों में आ गया, लेकिन देश के दूसरे हिस्सों में भी मानव तस्करी के नाम पर कबूतरबाजी का खेल खेलने का सिलसिला बेरोकटोक जारी है.
नवंबर, 2017 में मुंबई की सहार इलाके की पुलिस ने 40 साल के बल्लू कानू भाई को गुजरात से गिरफ्तार किया था. उस पर जाली पासपोर्ट के जरीए लोगों को अमेरिका और कनाडा भेजने का आरोप लगा था. पुलिस के मुताबिक यह आरोपी अब तक फर्जी तरीके से 53 लोगों को विदेश भेज चुका था.
कबूतरबाजी के सिलसिले में पुलिस की यह धरपकड़ मई महीने से ही शुरू हो गई थी. तब सहार पुलिस ने लोगों को जाली पासपोर्ट के आधार पर अमेरिका और कनाडा भेजने वाले एक कबूतरबाज गैंग का परदाफाश किया था. उस समय कुल 19 लोगों को गिरफ्तार किया गया था. पुलिस ने इस गोरखधंधे से जुड़े 3 इमिग्रेशन अफसरों को भी पकड़ा था.
पुलिस की पूछताछ में बल्लू कानू भाई ने बताया कि साल 2015 से साल 2017 के दौरान उस ने कुल 53 लोगों को गलत तरीके से विदेश भेजा था. इस के एवज में हर शख्स से 50 लाख से 60 लाख रुपए लिए गए थे. इस काम में उस का पूरा गिरोह मदद करता था. लोगों से लिए गए पैसे में गैंग के हर सदस्य की हिस्सेदारी बंधी होती थी.
अगस्त, 2016 में दिल्ली पुलिस ने कबूतरबाजी के ऐसे गिरोह का परदाफाश किया था जो दुबई में अच्छी नौकरी दिलाने के नाम पर लोगों से ठगी करता था. यह गिरोह पौश एरिया में आलीशान दफ्तर खोल कर कबूतरबाजी के काले कारोबार को अंजाम दे रहा था.
इस गिरोह के सदस्य ऐसे बेरोजगार नौजवानों को ठगते थे जिन को नौकरी की तलाश होती थी. वे उन्हें दुबई समेत कई दूसरे देशों में नौकरी दिलाने का लालच दे कर उन से लाखों रुपए की रकम ऐंठ लेते थे.
ऐसा ही एक मामला दिल्ली से सटे राज्य उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले का भी था. वहां कैला भट्टा इलाके का रहने वाला फुरकान कविनगर में एक शख्स से मिला था. उस ने दुबई के एक होटल में नौकरी लगवाने का झांसा दे कर उस से 50 हजार रुपए ऐंठ लिए थे. इस के एवज में फुरकान को जो वीजा दिया गया था वह फर्जी निकला.
उस शख्स ने फुरकान के साथसाथ 4 नेपाली लोगों से भी इसी काम के नाम पर 50-50 हजार रुपए हड़प लिए थे. केरल का वह धोखेबाज इस करतूत को अंजाम दे कर फरार हो गया था.
कुछ लोगों के साथ तो इस से भी ज्यादा बुरा होता है. मध्य प्रदेश के भिंड इलाके का रहने वाला नरेंद्र सिंह विदेश में नौकरी कर के अपने घर की माली हालत सुधारना चाहता था. इस सिलसिले में उस की मुलाकात धर्मेंद्र सिंह से हुई जिस ने उस से सऊदी अरब में नौकरी दिलाने का वादा किया और उस से तकरीबन पौने 2 लाख रुपए ले लिए.
इस के बाद एक फर्जी पासपोर्ट बनवा कर नरेंद्र सिंह को किसी तरह सऊदी अरब भेज दिया गया. अभी एक साल भी नहीं बीता था कि नरेंद्र सिंह ने अपने परिवार वालों को फोन कर के बताया कि उसे भूखा रखा जाता है और तय की गई तनख्वाह भी नहीं दी जाती है.
तब नरेंद्र सिंह के परिवार वालों ने धर्मेंद्र सिंह से उसे वापस लाने को कहा तो उस ने उन से दोबारा ढाई लाख रुपए ले लिए, पर नरेंद्र सिंह वापस नहीं लौटा. पुलिस की मदद से धर्मेंद्र सिंह को पकड़ लिया गया और उस से की गई पूछताछ में पता चला कि वह एक कबूतरबाज गिरोह से जुड़ा था जिस ने 12 से ज्यादा लोगों को विदेश भेज कर लाखों रुपए की ठगी की थी. विदेश भेजे गए लोग नरेंद्र सिंह की तरह नरक की सी जिंदगी जी रहे थे.
ऐसा बहुत से मामलों में होता है कि यूरोप या दूसरे अमीर देशों में भेजने के नाम पर लोगों को अफ्रीका के गरीब देशों में भेज दिया जाता है. कई लोग पकड़े जाते हैं तो वे जिंदगीभर जेलों में सड़ते रहते हैं. बहुतों को तो ढंग से अंगरेजी भी नहीं बोलनी आती है जिस से वे अपनी बात विदेशी अफसरों से कह सकें. लिहाजा, वे न तो इधर के रहते हैं और न ही उधर के.
सवाल उठता है कि काबिल न होने के बाद भी बेरोजगारों में विदेश जाने का चसका क्यों लगता है? दरअसल, किसी परिवार से अगर कोई शख्स विदेश जा कर अच्छी कमाई करता है तो उस के परिवार के दूसरे सदस्य भी वहां जा कर पैसा बनाने का ख्वाब देखने लगते हैं. जब कानूनी तौर पर वे विदेश जा कर वहां रहने या रोजगार करने के लायक नहीं होते हैं तो वे किसी भी तरह अपना सपना पूरा करने की जुगत भिड़ाने लगते हैं.
पंजाब जैसे राज्यों में तो बहुत से नौजवान अपनी बेशकीमती जमीन बेच कर विदेश जाने की योजनाएं बनाते हैं, चाहे वहां जा कर उन्हें होटलों में बरतन ही क्यों न मांजने पड़ें. इस के लिए कानूनी नहीं तो गैरकानूनी तरीका ही उन्हें आसान लगता है, जिस का फायदा कबूतरबाज उठाते हैं.
गलीमहल्ले में बैठे ऐसे क्लियरिंग एजेंट बेरोजगारों से बहुत सी बातें छिपा जाते हैं. वे आसान तरीके से विदेश में घुसने के सब्जबाग दिखा कर लोगों को बरगलाते हैं ताकि उन्हें अपने जाल में फंसा कर पैसे ऐंठ सकें.
छोटी नौकरियों से जुड़े सरकारी नियमों की बात करें तो प्रवासी भारतीय मामलों के मंत्रालय के तहत प्रोटैक्टर जनरल औफ इमिग्रैंट्स के पास बिना कोई भी एजेंसी या विदेशी ऐंप्लौयर भारतीय श्रमिकों की सेवाएं नहीं ले सकता. इस औफिस द्वारा वैलिड परमिट जारी किए जाने के बाद ही एजेंट या विदेशी ऐंप्लौयर भारतीय श्रमिकों से काम ले सकता है.
आप का एजेंट फर्जी तो नहीं है, इस के लिए आप नजदीकी प्रोटैक्टर के औफिस में मिल कर तसल्ली कर सकते हैं. बिना पढ़े किसी भी एग्रीमैंट पर दस्तखत न करें. खुद कोई बात समझ न आए तो किसी पढ़ेलिखे से समझ लें. एजेंट को दिए जाने वाले पैसों की रसीद लें. अगर आप विदेश पहुंच जाएं तो अपने ऐंप्लौयर से किसी तरह के नए एग्रीमैंट पर दस्तखत न करें.
विदेश जा कर पैसा कमाने में कोई बुराई नहीं है पर वहां किसी गैरकानूनी तरीके से जाना बहुत बड़ा जुर्म है, जिस की सजा में पूरी उम्र तक जेल में गुजर सकती है.
बरतें ये सावधानियां
विदेश जा कर पैसा कमाने का ख्वाब देखना बुरा नहीं है, लेकिन किसी पर भी अंधा विश्वास कर के अपनी गाढ़ी कमाई उसे सौंप देना किसी लिहाज से ठीक बात नहीं है. ऐसा करने से पहले इन बातों पर जरूर ध्यान दें :
* विदेश जाने से पहले उस देश की एंबैसी से बात जरूर कर लें.
* अगर कोई आप को विदेश में पढ़ाईलिखाई से जुड़ा कोई कोर्स कराने के नाम पर वहां भेजने की बात करता है तो उस कोर्स के संबंध में कंप्यूटर वगैरह पर पूरी जानकारी ले लें.
* जो शख्स या एजेंसी आप को विदेश भेजना चाहती है उस की पूरी तहकीकात कर लें. ज्यादा जरूरी हो तो उन लोगों से भी बातचीत कर लें जो उस शख्स या एजेंसी की सेवाएं ले चुके हैं.
* अपनी तसल्ली करने के बाद ही पैसा दें.
* जरा सी भी भनक लगे, तो उन लोगों से फौरन दूर हो जाएं.
क्रिकेटर निकला कबूतरबाज
भारत की ओर से 10 इंटरनैशनल वनडे मैच खेलने वाले क्रिकेटर जैकब मार्टिन को साल 2011 में कबूतरबाजी के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था. वह वडोदरा रणजी टीम का कप्तान रह चुका था और 138 रणजी मैच भी खेल चुका था.
जैकब मार्टिन को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था. उस पर आरोप था कि वह युवा खिलाडि़यों को विदेशी टीमों की ओर से क्रिकेट मैच खिलाने के नाम पर उन्हें दूसरे देशों में ले जाता था और कई खिलाडि़यों को वहीं छोड़ देता था. इस के लिए वह फर्जी क्रिकेट टीम बनाता था. एक ऐसे ही फर्जी क्रिकेटर की गिरफ्तारी के बाद इस मामले का खुलासा हुआ था.
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पिछले कुछ दिनों से इंटरनेट पर छाईं एक्ट्रेस प्रिया प्रकाश वारियर का आए दिन एक नया वीडियो हमें देखने को मिल रहा है. इसी क्रम में उनका एक और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें एक शख्स प्रिया के अंदाज में उन्हें कौपी करता हुआ नजर आ रहा है. बता दें, प्रिया का वीडियो इतनी तेजी से वायरल होता है कि लोग उन्हें अब ‘वायरल गर्ल’ के नाम से जानने लगे हैं.
इंस्टाग्राम पर शेयर किया गया वीडियो
इस नए वीडियो में एक शख्स प्रिया की तरह अपने आंखों से निशारा करता हुआ नजर आ रहा है, लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस शख्स के एक्सप्रेशन इतने कौमेडी है कि इसे देख आप अपनी हंसी रोक नहीं पाएंगे. प्रिया का यह वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर किया गया है और 17 घंटे के अंदर इसे एक लाख से ज्यादा बार देखा गया है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार प्रिया ने अपने वीडियो के जरिए इंस्टाग्राम से कमाई करने वाली कई सेलिब्रिटी को पीछे छोड़ दिया है.
इंस्टाग्राम फौलोअर्स की संख्या 50 लाख से भी ज्यादा
दरअसल, प्रिया प्रकाश के कई वीडियो वायरल होने के बाद उनके इंस्टाग्राम फौलोअर्स की संख्या 50 लाख से भी ज्यादा हो चुकी है. इतनी बड़ी संख्या में फौलोअर होने के बाद प्रिया ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर कई बड़े ब्रैंड का प्रमोशन करना शुरू कर दिया है. एक रिपोर्ट के अनुसार प्रिया प्रकाश एक इंस्टाग्राम पोस्ट के लिए 8 लाख रुपये चार्ज लेती हैं.
इसके अलावा कई बड़े ब्रांड प्रिया प्रकाश के पास विज्ञापन का प्रस्ताव लेकर पहुंच रहे हैं. खबरों की मानें तो प्रिया सोशल मीडिया के माध्मय से कमाई करने वाली कई सेलिब्रिटी को पीछे छोड़ चुकी हैं. प्रिया प्रकाश की लोकप्रियता का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि इंटरनेट पर छाने के बाद उन्होंने गूगल सर्च के मामले में सबसे ज्यादा सर्च की जाने वाली सनी लियोनी और दीपिका पादुकोण को भी पीछे छोड़ दिया. एक ही दिन में उनके 6 लाख से भी ज्यादा फौलोअर बने थे. फिलहाल उनके फौलोअर की संख्या 51 लाख तक पहुंच गई है.
बेहद खुश हैं प्रिया प्रकाश
प्रिया फौलोअर के मामले में अमेरिकन रियल्टी टीवी स्टार काइली जेनर और फुटबौल स्टार क्रिस्टियानो रोनाल्डो की बराबरी कर ली है. यह दो सेलीब्रिटी ही एक दिन में 6 लाख से ज्यादा फैन्स बनाने में सफल रहे हैं. प्रिया प्रकाश के इंटरनेट स्टार बनने के बाद जब मीडिया ने उनसे बात की था तो उन्होंने कहा था, ‘मेरे लिए यह बहुत सुखद है. मुझे नहीं पता कि मैं अपनी खुशी का इजहार कैसे करूं. उन्होंने बताया इस कामयाबी के बाद खुशी मनाने के लिए मेरे कौलेज में एक इवेंट आर्गेनाइज किया गया था. यह मेरे लिए नया अनुभव है. मैं यही उम्मीद करती हूं कि सभी लोगों का सपोर्ट मेरे साथ बना रहे.’
आपको बता दें कि वीडियो वायरल होने के बाद प्रिया को कई बड़ी फिल्मों के औफर की गईं, लेकिन उन्होंने उस फिल्म का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया. बता दें कि प्रिया प्रकाश मलयालम फिल्म ‘उरु अदार लव (Oru Adaar Love)’ के वीडियो में नजर आने के बाद उनके आंखों के एक्सप्रेशन की जमकर तारीफ हुई थी. इसके बाद ही वह इंटरनेट पर छा गई थीं.
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श्रीदेवी और बोनी कपूर की बड़ी बेटी जाह्नवी कपूर तो अपने स्टाइलिश अंदाज और फिल्मों में डेब्यू को लेकर चर्चा में रहती हैं, लेकिन उनकी छोटी बेटी खुशी कपूर भी कुछ कम ग्लैमरस नहीं हैं. हाल ही में खुशी ने एक हौट और ग्लैमरस फोटोशूट कराया है. उन्होंने खुद अपनी फोटोशूट की लेटेस्ट तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की है, जो काफी वायरल भी हो रही है.
आपको बता दें कि ऐसा पहली बार नहीं है जब खुशी अपनी हौट तस्वीरों को लोकर चर्चा में आई हों. इससे पहले भी वह अपनी ग्लैमरस तस्वीरों को लेकर सुर्खियां बटोर चुकी हैं. कुछ समय पहले उनकी बिकिनी तस्वीरें भी सामने आ चुकी हैं. जो काफी वायरल भी हुई थी.
भले ही खुशी इनदिनों अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे रही हो लेकिन वो अपने स्टाइल के लिए जानी जाती है. अब इन तस्वीरों के सामने आने के बाद खुशी के बौलीवुड में आने को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं, हालांकि खुशी कपूर ने अभी तक इसके बारें में कुछ भी नहीं कहा है. लेकिन तस्वीरों में उनके बेहतरीन हाइट और बेहद स्टाइलिश लुक को साफ देखा जा सकता है और कहा जा सकता है कि एक अच्छी एक्ट्रेस बनने के सारे गुण हैं उनमें.
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रिहायशी इलाकों में दुकानें चलाने का चलन कोई नया नहीं है. सदियों से कामगारों व दुकानदारों के घर, दुकानें अथवा कारखाने एक ही जगह होते थे. जब तक अरबनाइजेशन तेज न थी, यह पद्धति सुविधाजनक भी थी और सुरक्षात्मक भी. धीरेधीरे व्यापार व उद्योगधंधे बढ़ने से कारखाने, मार्केटें अलग बनने लगीं और घरों को अलग करा जाने लगा ताकि औरतें और बच्चे बाजारों और मजदूरों से अलग रहें. प्राकृतिक संरक्षण से वंचित शहरियों को यह सुरक्षित लगा कि रिहायशी इलाकों में दूसरों का दखल न हो.
हाल के सालों में शहरी जमीन की बढ़ती किल्लत और कीमत के कारण दुकानदारी रिहायशी इलाकों में घुसपैठ करने लगी है. हमारी नौकरशाही को उस में चांदी ही चांदी नजर आई. उस ने दुकानों को कहीं भी खोलने की मूक इजाजत देनी शुरू कर दी ताकि हर महीने कुछ अतिरिक्त कमाई अफसर व इंस्पैक्टर कर सकें. दिल्ली शहर तो लगभग पूरा नष्ट ही हो गया है. कुछ इलाकों को छोड़ कर यहां विशुद्ध रिहायशी कालोनियां न के बराबर रह गई हैं. 20-25 साल पुरानी कालोनियों में ढेरों दफ्तर और दुकानें नजर आ जाएंगी.
यह औरतों और बच्चों के हकों पर हमला है. कुछ लोग पैसा कमाने के लिए अपना घर दुकान में बदल दें या दुकानदार को बेच दें तो यह उन के संपत्ति के हक का दुरुपयोग है. यह पड़ोसियों के सुख व शांति के साथ जीने के हक को छीनता है. सुप्रीम कोर्ट पिछले कई सालों से दुकानदारों की इस भयंकर बमबारी से शहरियों को बचाने की कोशिश कर रहा है पर दुकानदार एकजुट हो जाते हैं और अफसरों व नेताओं को खरीद कर वे मनमाने फैसले करा रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी में एक कमेटी बना रखी है, जो दिल्ली जैसे विशाल शहर में लाखों दुकानों पर छापेमारी कर सीलिंग कर रही है पर हर तरह का हड़कंप मचाने के बावजूद अब तक मुश्किल से 3000 दुकानदफ्तर बंद कर पाई है.
यह ठीक है कि दिल्ली के मकानों के कानून बहुत जटिल हैं पर वे जटिल इसलिए हैं कि सरकारशाही चाहती है कि लोगों को कानून तोड़ने को मजबूर होना पड़े ताकि वह ऊपरी कमाई कर सके. नगर निगमों व डीडीए के हर अफसर को करोड़ों मिलते हैं या तो अवैध दुकानों को अनुमति देने पर या आंख मूंद लेने पर. वे कानूनों को लचीला बनाने को ही तैयार नहीं.
दिल्ली की सब से महंगी खान मार्केट में बनी पहली व दूसरी मंजिल केवल रिहायशी थी. सही था यह फैसला. आज शायद ही वहां कोई परिवार रहता हो. आसपास के मकानों के लिए राशनपानी मुहैया कराने के लिए बनी खान मार्केट का स्वरूप ही बदल गया है, बिना अनुमति के. यह अन्याय है उन पर जिन्होंने ‘खान मार्केट में नीचे दुकान होगी और ऊपर घर’ सोच कर दुकान ली थी.
कानून सब को बराबर देखे. आजकल कानून इसलिए बनता और बदलता है, क्योंकि जनता का एक वर्ग दूसरे वर्ग की कीमत पर कोई सहूलत चाहता है. सुप्रीम कोर्ट अभी तक तो दिल्ली की रिहायशी कालोनियों को केवल रहने लायक रखने में लगा है पर कब वह भी हथियार डाल दे पता नहीं.
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न तो बीफ खाना गलत है, न चुंबन लेना गुनाह. यकीन नहीं होता कि यह सचबयानी देश के उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू की है जिन्होंने ये कर्णप्रिय उद्गार मुंबई के आर ए पोद्दार कालेज औफ कौमर्स ऐंड इकोनौमिक्स के प्लैटिनम जुबली समारोह में व्यक्त किए. चूंकि ये दोनों ही बातें हिंदुत्व के सिद्धांतों व संस्कारों से मेल खाती नहीं हैं, शायद इसलिए बीफ और किसप्रेमियों को अभयदान देने के लिए उन्होंने शर्त यह जड़ दी कि ये दोनों काम फैस्टिवल मना कर यानी समारोहपूर्वक न किए जाएं.
गुड़ खाएं गुलगुलों से परहेज करें, के साथसाथ यह कहावत भी सहसा याद हो आई कि ऊंट की चोरी नोहरेनोहरे (घुटनों के बल) नहीं होती. वेंकैया नायडू बेहतर जानते हैं कि देश में हर काम समारोहपूर्वक करना धर्म और तीजत्योहारों की देन है. पूजापाठ व यज्ञहवन वगैरा लोग सामूहिक रूप से करते हैं तो इन दो इच्छाओं को चोरी से पूरी करने का मशवरा क्यों?
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कई सालों के बाद मुझे विदेश जाने का मौका मिला था. जाहिर है कि बाहर भी देशी आदतें दिलोदिमाग पर छाई हुई थीं. अपने देश की मिट्टी की बात ही निराली है और उस से ज्यादा निराले इस मिट्टी के लोग. हमारा तो कतराकतरा इस से बना हुआ है. देश की मिट्टी और यहां के लोगों को खूब याद किया.
आप कहेंगे कि इस में खास बात क्या है. आदमी घरपरिवार, राज्य, गांवखेड़े, कसबेशहर, देश से दूर जाएगा, तो इन की याद तो आएगी ही. वैसे ही जैसे पत्नी से दूर जाओ, तो उस की याद आती ही है.
यह बात अलग है कि पतिपत्नी साथसाथ ज्यादा देर बिना खटपट के रह नहीं सकते हैं. उस समय तो ऐसा लगता है कि कुंआरे रह कर अलग ही रहते, तो अच्छा रहता. यह हम अपनी नहीं आप की बात कर रहे हैं. हमारी तो शादीशुदा जिंदगी बहुत सुखी है. वैसे, हर आम पति यही सोचता है, आप भी और मैं भी. अब परदेश में देश की याद कैसेकैसे आई, यह थोड़ा सुन लें, तो आप के परदेश जाने पर काम आएगा.
परदेश में 15 दिन बीत गए थे. हमें यूरोप में एक भी आदमी ऐसा नहीं मिला, जो सड़क पर कहीं खड़े हो कर देशी ढंग से हलका हो रहा हो. कहां अपने देश में हर गलीनुक्कड़ में ऐसे लोगों के चाहे जब दर्शन हो जाते थे और यहां एक अदद आदमी का टोटा पड़ा था.
हम ने सोचा कि सच में भारत ऐसे ही ‘विश्व गुरु’ नहीं कहलाता है. ये देश भले ही अपने को धनी समझते हों, लेकिन कई मामलों में कितने दरिद्रनारायण हैं. यहां हमारे वहां जैसा एक भी आदमी नहीं है.
यहां के रेलवे स्टेशन का खालीपन देख कर जी भर आया. आदमी नहीं दिख रहे थे. रेलें खाली चलती थीं. एक कंपार्टमैंट में मुश्किल से 4-5 लोग मिलते थे. वे भी ऐसे बैठते थे कि एकदूसरे से कोई मतलब नहीं. जैसे दुश्मन देशों के नागरिक हों.
यह देख कर हम तो अंदर से टूट से गए. अपने यहां तो मूंगफली, पौपकौर्न बेचने वाले, कागज के टुकड़ों, बीड़ीसिगरेट के ठूंठों, पानी की खाली बोतलों, गुस्से से भरे लोगों से ठसाठस भरी ट्रेन में धक्कामुक्की करते, लड़तेभिड़ते, फिर दूसरे पल आपस में प्यार करते, बतियाते, ठहाके लगाते, सरकार को कोसते लोग हर जगह मिलते हैं.
हम ने देखा कि ट्रेन में टीटीई के पीछे एक भी आदमी नहीं भाग रहा था. सोचा कि यह टीटीई कैसे अपना व बच्चों का पेट पालता होगा. वैसे, हमारे पास टिकट था, लेकिन हम खुद को रोक नहीं पाए. हम ने अपने बटुए से सौ डौलर का एक नोट निकाल कर ऐसे हवा में लहराया कि उस की नजर पड़ जाए और वह आ कर अपना काम कर जाए, लेकिन वह तो उलटा नाराज हो गया.
हम ने किसी तरह अपनेआप को इस आफत से छुटकारा दिलाया.यहां की सड़कों पर घूमे तो मायूसी हुई. न चाट के ठेले, न पानसिगरेट के, न चाय के, न पापड़ बेचने वाला, न चना जोर गरम बाबू वाला कोई और. कोई भीड़भाड़ भी नहीं.
हमारे यहां जब तक भीड़ का रैला न दिखे, किसी रैली में सड़क जाम में न फंसे, तब तक मजा ही नहीं आए.
और तो और, ट्रैफिक सिगनल 2 मिनट का भी हो, तो कोई उसे तोड़ते हुए अपने यहां जैसा नहीं दिखा. पूरे 2 मिनट तक आराम से इंतजार करता. हम तो बड़े मायूस हुए.
यहां के लोग जानवर प्रेमी बिलकुल नहीं लगे. वजह, किसी सड़क पर कुत्ते, बकरियां, गायभैंस, बैल यहां तक कि सूअर भी नहीं मिले. जानवरों की इतनी अनदेखी हम ने नहीं देखी. हमारे लोग तो स्टेशन व बस स्टैंड पर बिना इन के रह ही नहीं सकते. ‘पीटा’ वाले पता नहीं, हमें अवार्ड देने में इतनी देर क्यों कर रहे हैं. असली ‘एनीमल लवर’ हम ही हैं.
वहां के बाजार में मुर्दनी छाई सी लगी. कोई खास भीड़ नहीं. कोई खुला सामान नहीं. हर सामान डब्बाबंद. कुछ खरीदो या कुछ दाम कम करने की बात करो, तो अजीब सा मुंह बनाए सेल्समैन. मजा ही नहीं आया खरीदारी करने में.
सर्दीखांसी होने पर हम एक मैडिकल स्टोर में दवा लेने गए, तो उस ने बिना डाक्टर की परची के दवा देने से इनकार कर दिया. हमें तुरंत अपने वतन की दुकानें याद आईं. चाहे जो दवा बिना परची के झट से ले लो और कैमिस्ट भी डाक्टर की कमी अपनी सलाह दे कर पूरी कर देता था. हम ने मन में फिर दोहराया कि हम यहां नहीं रह पाएंगे.
यहां के एक दफ्तर में हमें एक काम से जाना पड़ा, तो बड़ा अजीब सा लगा. यहां के साहब के कमरे के बाहर कोई चपरासी नहीं मिला, जो कान में पैन डाल कर मैल निकाल रहा हो या तंबाकू मलते पंजे बजा रहा हो. दफ्तरों में कहीं भी न कोई कागज दिखा, न फाइलों के अंबार, न टैग उलझे हुए, न धूल खाते बस्ते. न पान की पीक का निशान ही दिखा.
हम ने सोचा, ‘बहुत बंदिशें लगा रखी हैं. यहां जरूर तनाव में खुदकुशी के मामले ज्यादा तादाद में होते होंगे. हमारे यहां तो कोई बंदिश नहीं है, जिस को जो आता है, वह करने से उसे रोका नहीं जाता.
‘पान की पीक थूकने की, हलका होने की, गालीगलौज करने की, नाककान में उंगली डालने की, बाल व खोपड़ी खुजलाने की, सरकार व महंगाई को कोसने की कोई मनाही नहीं है.’
हम 20 दिन में ही विदेश से ऊब गए. सड़क के न तो बीचोंबीच में और न ही किनारे कहीं धार्मिक स्थल दिखे और न बतियाने वाले लोग. हम ने तो मन भर जाने से टिकट कैंसिल कर हफ्ते भर पहले का टिकट बनवा लिया और अपनी माटी की ओर लौट चले.
दिल्ली एयरपोर्ट से उतर कर हम ने अपने शहर की ट्रेन पकड़ने की सोची. दिल्ली स्टेशन पर पहुंचते ही भीड़ देख कर हमारा दिल बागबाग हो गया. रात में घर पहुंचे, तो और बागबाग हो गया. ट्रेन के चूहों ने सूटकेस में 2 जगह छेद कर अपनी भूख शांत कर ली थी. हमारा बटुआ भी किसी ने पार कर ‘वैलकम बैक’ की परची जेब में उस की जगह रख दी थी. हम अपने देश जो आ गए थे.
VIDEO : टेलर स्विफ्ट मेकअप लुक
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