बिहार में पटना से सटे मसौढ़ी इलाके के लखनौर गांव का रहने वाला 30 साला जितेंद्र रविदास पिछले 10 सालों से रोज सुबह पटना आ कर मजदूरी करता था और शाम को वापस गांव लौट जाता था. एक महीने पहले ही उस ने अपने 3 बच्चों को स्कूल में दाखिल कराया था.
जितेंद्र रविदास की बीवी फुमतिया देवी रोते हुए कहती है कि अब उन की देखभाल कौन करेगा? वजह, ट्रेन के ओवरहैड वायर की चपेट में आने से जितेंद्र रविदास की मौत जो हो गई है.
हरवंशपुर गांव का रहने वाला 50 साला नरेश प्रसाद अपने 3 बेटों के साथ मजदूरी करने रोज पटना जाता था. रोज की तरह वह अपने एक बेटे नीतीश के साथ मजदूरी करने पटना पहुंचा था. शाम को घर लौटते समय ट्रेन में काफी भीड़ होने की वजह से वह ट्रेन की छत पर जा बैठा. उस के साथ सैकड़ों दूसरे मुसाफिर भी ट्रेन की छत पर बैठे हुए थे.
नरेश प्रसाद को ट्रेन की छत पर बैठने का खमियाजा अपनी जान दे कर चुकाना पड़ा. इस हादसे में उस का बेटा नीतीश बच गया, क्योंकि वह डब्बे के अंदर बैठा हुआ था.
नालंदा जिले के हिलसा ब्लौक के दामोदरपुर गांव का रहने वाला 32 साला विजय कुमार 10 दिनों से पटना में अपनी बहन के घर पर रह रहा था. वह अपने बहनोई रवींद्र बिंद के साथ मजदूरी करने जाता था. वह अपने बहनोई के साथ ट्रेन की छत पर बैठा हुआ था. हाई वोल्टेज करंट लगने से विजय ने मौके पर ही दम तोड़ दिया, जबकि उस का बहनोई बुरी तरह से झुलस गया.
विजय की बीवी फुलमंती देवी पेट से है और वह गांव में ही रहती है. अब उस की जिंदगी में घोर अंधेरा छा गया है और उस का बेटा इस दुनिया में आने से पहले ही अनाथ हो गया है.
पटनागया रेलखंड पर 14 जुलाई, 2016 की रात पटनागया ममू ट्रेन में करंट दौड़ने से 3 मुसाफिरों की मौके पर ही मौत हो गई और 24 बुरी तरह से झुलस गए. चारों तरफ चीखपुकार और रोनाधोना मच गया.
अंधेरा होने की वजह से पहले तो लोगों की समझ में कुछ नहीं आया कि माजरा क्या है. ट्रेन की छत से गिरतेकूदते लोगों को देख प्लेटफार्म पर खड़े लोगों में भगदड़ मच गई.
नीमा हाल्ट के पास मोरहर नदी के पास ट्रेन का पेंटो ओवरहैड वायर में फंस कर ट्रेन की छत पर गिर गया, जिस से ट्रेन में सवार मुसाफिर हाई वोल्टेज करंट की चपेट में आ गए. ट्रेन पोटही स्टेशन से चली थी और नदवां स्टेशन की ओर जा रही थी.
मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि ओवरहैड वायर के टूटने से ट्रेन की छत पर बैठे लोग इस की चपेट में आ गए. इस से पूरी ट्रेन में करंट दौड़ गया. ट्रेन में सवार मुसाफिर इधरउधर भागने लगे और अफरातफरी मच गई.
रेलवे के मुताबिक, शाम के तकरीबन सवा 7 बजे ट्रेन के इंजन को बिजल सप्लाई करने वाला पेंटो टूट गया. इस का पता चलने पर ट्रेन के ड्राइवर सी. कुंजूर उसे अगले हाल्ट पर ले जाने लगे, ताकि उस की मरम्मत की जा सके. इसी दौरान ट्रेन की छत पर सवार लोग ओवरहैड वायर की चपेट में आ गए.
इतने बड़े हादसे के बाद वारदात वाली जगह पर कुहराम मचा हुआ था और हादसे के बारे में रेलवे पुलिस और रेलवे के अफसर अलगअलग बयान देने में लगे रहे.
रेलवे पुलिस का कहना है कि ट्रेन जब मोरहर नदी के पास पहुंची, तो पहले से झुका हुआ ओवरहैड वायर टूट कर गिर गया, जिस से हादसा हुआ. वहीं रेल अफसरों का कहना है कि मुसाफिर ओवरहैड वायर की चपेट में आए, जिस से खंभे पर लगे विटी इंसुलेटर को हैवी अर्थ मिला, जिस से वह टूट गया.
सीनियर सैक्शन इंजीनियर हरेंद्र सिंह के मुताबिक, इंसुलेटर के टूटने की तेज आवाज को सुन कर ड्राइवर ने ट्रेन रोकने की कोशिश की और टैंटोग्राफ को नीचे किया गया.
हादसे के खौफनाक मंजर को सुनते हुए कई मुसाफिरों के रोंगटे खडे़ हो जाते हैं. हादसे के समय ट्रेन में सवार मंगतू यादव ने बताया कि तकरीबन 4-5 मिनट तक ट्रेन में करंट दौड़ता रहा और मुसाफिर झटका दर झटका खाते रहे. हाई वोल्टेज तार ट्रेन के पीछे की 3 बोगियों में सटा हुआ था.
करंट के झटकों से किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अचानक क्या हो गया? लोग इधरउधर भागने लगे. डब्बे के अंदर भी चीखपुकार मची हुई थी.
हल्ला सुन कर ड्राइवर ने गाड़ी रोकी, तो लोग बदहवास गाड़ी से उतर कर भागने लगे, जिस से कई लोग गिर कर चोट खा बैठे. ट्रेन की छतों से कई सवारियां पके हुए फलों की तरह दनादन गिरने लगीं.
पटना जंक्शन के 10 नंबर प्लेटफार्म से पैसेंजर ट्रेनें चलती हैं और किसी भी पैसेंजर ट्रेन के प्लेटफार्म पर लगते ही सैकड़ों मुसाफिर धड़ाधड़ डब्बों की छतों पर चढ़ने लगते हैं.
मीठापुर रेल ओवरब्रिज के नीचे भी मुसाफिरों में छतों पर चढ़ने को ले कर अफरातफरी सी मची रहती है. यह रोज का वाकिआ है. मुसाफिरों को छतों पर बैठने से रोकने वाला कोई नहीं होता है. रेलवे पुलिस के जवान और अफसर देख कर भी अनदेखा कर चलते बनते हैं.
मुसाफिरों का कहना है कि पटना से ज्यादातर पैसेंजर ट्रेनें शाम 6 बजे से 7 बजे के बीच खुलती हैं. उस समय पटना के आसपास के 100-120 किलोमीटर की दूरी पर रहने वाले लोगों को घर लौटने की जल्दबाजी होती है. डब्बे के अंदर ज्यादा भीड़ होने की वजह से ज्यादातर मुसाफिर छतों पर सवार हो जाते हैं.
ट्रेनों में डेढ़ हजार मुसाफिरों के लिए ही जगह होती है और रोजाना उस में भेड़बकरियों की तरह ठूंस कर साढ़े 3 हजार से ज्यादा मुसाफिर सफर करते हैं. ऐसे में डब्बों के भीतर जगह मिलना नामुमकिन होता है. नतीजतन, सैकड़ों मुसाफिर जान पर खेल कर ट्रेन की छतों और 2 डब्बों के जौइंट पर बैठ कर सफर करते हैं.
सीनियर कमांडैंट संतोष कुमार कहते हैं कि ऐसी वारदात दोबारा न हो, इस के लिए पंचायतों के मुखिया के साथ मिल कर जागरूकता मुहिम चलाई जाएगी. मुखिया अपनीअपनी पंचायतों के लोगों को समझाएंगे कि ट्रेन की छतों पर सफर न करें.
ट्रेन के दरवाजे पर लटकना, बेवजह चेन खींच कर ट्रेन को जहांतहां रोक देना गैरकाननी के साथसाथ जानलेवा भी है.
उन्होंने दावा किया कि 1 जुलाई, 2016 से 15 जुलाई, 2016 के बीच ट्रेन की छत पर चढ़ कर सफर करने वाले 33 लोगों को पटना रेलवे स्टेशन पर पकड़ा गया था.
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विश्वप्रसिद्ध पर्यटनस्थल मांडू के नजदीक के एक गांव तारापुर में पैदा हुई पिंकी को देख कर कोई सहसा विश्वास नहीं कर सकता था कि वह एक आदिवासी युवती है. इस की वजह यह थी कि पिंकी के नैननक्श और रहनसहन सब कुछ शहरियों जैसे थे. इतना ही नहीं, उस की इच्छाएं और महत्वाकांक्षाए भी शहरियों जैसी ही थीं, जिन्हें पूरा करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठाने से कतराती नहीं थी.
बाज बहादुर और रानी रूपमती की प्रेमगाथा कहने वाले मांडू के आसपास सैकड़ों छोटेछोटे गांव हैं, जहां की खूबसूरत छटा और ऐतिहासिक इमारतें देखने के लिए दुनिया भर से प्रकृतिप्रेमी और शांतिप्रिय लोग वहां आते हैं. वहां आने वाले महसूस भी करते हैं कि यहां वाकई प्रकृति और प्रेम का आपस में गहरा संबंध है.
यहां की युवतियों की अल्हड़ता, परंपरागत और आनुवांशिक खूबसूरती देख कर यह धारणा और प्रबल होती है कि प्रेम वाकई प्रेम है, इस का कोई विकल्प नहीं सिवाय प्रेम के. नन्ही पिंकी जब मांडू आने वाले पर्यटकों को देखती और उन की बातें सुनती तो उसे लगता कि जैसी जिंदगी उसे चाहिए, वैसी उस की किस्मत में नहीं है, क्योंकि दुनिया में काफी कुछ पैसों से मिलता है, जो उस के पास नहीं थे.
मामूली खातेपीते परिवार की पिंकी जैसेजैसे बड़ी होती गई, वैसेवैसे यौवन के साथसाथ उस की इच्छाएं भी परवान चढ़ती गईं. जवान होतेहोते पिंकी को इतना तो समझ में आने लगा था कि यह सब कुछ यानी बड़ा बंगला, मोटरगाड़ी, गहने और फैशन की सभी चीजें उस की किस्मत में नहीं हैं. लिहाजा जो है, उसे उसी में संतोष कर लेना चाहिए.
लेकिन इस के बाद भी पिंकी अपने शौक नहीं दबा सकी. घूमनेफिरने और मौजमस्ती करने के उस के सपने दिल में दफन हो कर रह गए थे. घर वालों ने समय पर उस की शादी धरमपुरी कस्बे के नजदीक के गांव रामपुर के विजय चौहान से कर दी थी. शादी के बाद वह पति के साथ धार के जुलानिया में जा कर रहने लगी थी.
पेशे से ड्राइवर विजय अपनी पत्नी की इस कमजोरी को जल्दी ही समझ गया था कि पिंकी के सपने बहुत बड़े हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए बहुत दौलत चाहिए. उन्हें कमा कर पूरे कर पाना कम से कम इस जन्म में तो उस के वश की बात नहीं है. इस के बाद भी उस की हर मुमकिन कोशिश यही रहती थी कि वह हर खुशी ला कर पत्नी के कदमों में डाल दे.
इस के लिए वह हाड़तोड़ मेहनत करता भी था, लेकिन ड्राइवरी से इतनी आमदनी नहीं हो पाती थी कि वह सब कुछ खरीदा और हासिल किया जा सके, जो पिंकी चाहती थी. इच्छा है, पर जरूरत नहीं, यह बात विजय पिंकी को तरहतरह से समयसमय पर समझाता भी रहता था.
लेकिन अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की आदी होती जा रही पिंकी को पति की मजबूरी तो समझ में आती थी, लेकिन उस की बातों का असर उस पर से बहुत जल्द खत्म हो जाता था. शादी के बाद कुछ दिन तो प्यारमोहब्बत और अभिसार में ठीकठाक गुजरे. इस बीच पिंकी ने 2 बेटों को जन्म दिया, जिन के नाम हिमांशु और अनुज रखे गए.
विजय को जिंदगी में सब कुछ मिल चुका था, इसलिए वह संतुष्ट था. लेकिन पिंकी की बेचैनी और छटपटाहट बरकरार थी. बेटों के कुछ बड़ा होते ही उस की हसरतें फिर सिर उठाने लगीं. बच्चों के हो जाने के बाद घर के खर्चे बढ़ गए थे, लेकिन विजय की आमदनी में कोई खास इजाफा नहीं हुआ था.
अकसर अपनी नौकरी के सिलसिले में विजय को लंबेलंबे टूर करने पड़ते थे. इस बीच पिंकी की हालत और भी खस्ता हो जाती थी. पति इस से ज्यादा न कुछ कर सकता है और न कर पाएगा, यह बात अच्छी तरह उस की समझ में आ गई थी. अब तक शादी हुए 17 साल हो गए थे, इसलिए अब उसे विजय से ऐसी कोई उम्मीद अपनी ख्वाहिशों के पूरी होने की नहीं दिखाई दे रही थी.
लेकिन जल्दी ही पिंकी की जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आ गया, जो अंधा भी था और खतरनाक भी. यह एक ऐसा मोड़ था, जिस का सफर तो सुहाना था, परंतु मंजिल मिलने की कोई गारंटी नहीं थी. इस के बाद भी पिंकी उस रास्ते पर चल पड़ी. उस ने न अंजाम की परवाह की न ही पति और बच्चों की. इस से सहज ही समझा जा सकता है कि इच्छाओं और गैरजरूरी जरूरतों के सामने जिम्मेदारियों ने दम तोड़ दिया था. पिंकी को संभल कर चलने के बजाय फिसलने में ज्यादा फायदा नजर आया.
विजय का एक दोस्त था दिलीप चौहान. वह बेरोजगार था और काम की तलाश में इधरउधर भटक रहा था. काफी दिनों बाद दोनों मिले तो विजय को उस की हालत पर तरस आ गया. उस ने धीरेधीरे दिलीप को ड्राइविंग सिखा दी. धार, मांडू और इंदौर में ड्राइवरों की काफी मांग है, इसलिए ड्राइविंग सीखने के बाद वह गाड़ी चलाने लगा. दोस्त होने के साथसाथ विजय अब उस का उस्ताद भी हो गया था.
ड्राइविंग सीखने के दौरान दिलीप का विजय के घर आनाजाना काफी बढ़ गया था. एक तरह से वह घर के सदस्य जैसा हो गया था. जब विजय दिलीप को ड्राइविंग सिखा रहा था, तभी पिंकी दिलीप को जिस्म की जुबान समझाने लगी थी. उस के हुस्न और अदाओं का दीवाना हो कर दिलीप दोस्तीयारी ही नहीं, गुरुशिष्य परंपरा को भी भूल कर पिंकी के प्यार में कुछ इस तरह डूबा कि उसे भी अच्छेबुरे का होश नहीं रहा.
ऐसे मामलों में अकसर औरत ही पहल करती है, जिस से मर्द को फिसलते देर नहीं लगती. दिलीप अकेला था, उस के खर्चे कम थे, इसलिए वह अपनी कमाई पिंकी के शौक और ख्वाहिशों को पूरे करने में खर्च करने लगा. इस के बदले पिंकी उस की जिस्मानी जरूरतें पूरी करने लगी. जब भी विजय घर पर नहीं होता या गाड़ी ले कर बाहर गया होता, तब दिलीप उस के घर पर होता.
पति की गैरहाजिरी में पिंकी उस के साथ आनंद के सागर में गोते लगा रही होती. विजय इस रिश्ते से अनजान था, क्योंकि उसे पत्नी और दोस्त दोनों पर भरोसा था. यह भरोसा तब टूटा, जब उसे पत्नी और दोस्त के संबंधों का अहसास हुआ.
शक होते ही वह दोनों की चोरीछिपे निगरानी करने लगा. फिर जल्दी ही उस के सामने स्पष्ट हो गया कि बीवी बेवफा और यार दगाबाज निकला. शक के यकीन में बदलने पर विजय तिलमिला उठा. पर यह पिंकी के प्रति उस की दीवानगी ही थी कि उस ने कोई सख्त कदम न उठाते हुए उसे समझाया. लेकिन अब तक पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका था.
चूंकि पति का लिहाज और डर था, इसलिए पिंकी खुलेआम अपने आशिक देवर के साथ रंगरलियां नहीं मना रही थी. फिर एक दिन पिंकी कोई परवाह किए बगैर दिलीप के साथ चली गई. चली जाने का मतलब यह नहीं था कि वह आधी रात को कुछ जरूरी सामान ले कर प्रेमी के साथ चली गई थी, बल्कि उस ने विजय को बाकायदा तलाक दे दिया था और उस की गृहस्थी के बंधन से खुद को मुक्त कर लिया था.
कोई रुकावट या अड़ंगा पेश न आए, इस के लिए वह और दिलीप धार आ कर रहने लगे थे. पहले प्रेमिका और अब पत्नी बन गई पिंकी के लिए दिलीप ने धार की सिल्वर हिल कालोनी में मकान ले लिया था. मकान और कालोनी का माहौल ठीक वैसा ही था, जैसा पिंकी सोचा करती थी.
यह पिंकी के दूसरे दांपत्य की शुरुआत थी, जिस में दिलीप उस का उसी तरह दीवाना था, जैसा पहली शादी के बाद विजय हुआ करता था. पति इर्दगिर्द मंडराता रहे, घुमाताफिराता रहे, होटलों में खाना खिलाए और सिनेमा भी ले जाए, यही पिंकी चाहती थी, जो दिलीप कर रहा था. खरीदारी कराने में भी वह विजय जैसी कंजूसी नहीं करता था.
यहां भी कुछ दिन तो मजे से गुजरे, लेकिन जल्दी ही दिलीप की जेब जवाब देने लगी. पिंकी के हुस्न को वह अब तक जी भर कर भोग चुका था, इसलिए उस की खुमारी उतरने लगी थी. लेकिन पत्नी बना कर लाया था, इसलिए पिंकी से वह कुछ कह भी नहीं सकता था. प्यार के दिनों के दौरान किए गए वादों का उस का हलफनामा पिंकी खोल कर बैठ जाती तो उसे कोई जवाब या सफाई नहीं सूझती थी.
जल्दी ही पिंकी की समझ में आ गया कि दिलीप भी अब उस की इच्छाएं पूरी नहीं कर सकता तो वह उस से भी उकताने लगी. पर अब वह सिवाय किलपने के कुछ कर नहीं सकती थी. दिलीप की चादर में भी अब पिंकी के पांव नहीं समा रहे थे. गृहस्थी के खर्चे बढ़ रहे थे, इसलिए पिंकी ने भी पीथमपुर की एक फैक्ट्री में नौकरी कर ली. क्योंकि अपनी स्थिति से न तो वह खुश थी और न ही संतुष्ट.
इस उम्र और हालात में तीसरी शादी वह कर नहीं सकती थी, लेकिन विजय को वह भूल नहीं पाई थी, जो अभी भी जुलानिया में रह रहा था. पिंकी को लगा कि क्यों न पहले पति को टटोल कर दोबारा उसे निचोड़ा जाए. यही सोच कर उस ने एक दिन विजय को फोन किया तो शुरुआती शिकवेशिकायतों के बाद बात बनती नजर आई.
ऐसा अपने देश में अपवादस्वरूप ही होता है कि तलाक के बाद पतिपत्नी में दोबारा प्यार जाग उठे. हां, यूरोप जहां शादीविवाह मतलब से किए जाते हैं, यह आम बात है. विजय ने दोबारा उस में दिलचस्पी दिखाई तो पिंकी की बांछें खिलने लगीं. पहला पति अब भी उसे चाहता है और उस की याद में उस ने दोबारा शादी नहीं की, यह पिंकी जैसी औरत के लिए कम इतराने वाली बात नहीं थी.
वह 28 जुलाई की रात थी, जब दिलीप रोजाना की तरह अपनी ड्यूटी कर के घर लौटा. उसे यह देख हैरानी हुई कि उस के घर में धुआं निकल रहा है यानी घर जल रहा है. उस ने शोर मचाना शुरू किया तो देखते ही देखते सारे पड़ोसी इकट्ठा हो गए और घर का दरवाजा तोड़ दिया, जो अंदर से बंद था.
अंदर का नजारा देख कर दिलीप और पड़ोसी सकते में आ गए. पिंकी किचन में मृत पड़ी थी, जबकि विजय बैडरूम में. जाहिर है, कुछ गड़बड़ हुई थी. हुआ क्या था, यह जानने के लिए सभी पुलिस के आने का इंतजार करने लगे. मौजूद लोगों का यह अंदाजा गलत नहीं था कि दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं.
हैरानी की एक बात यह थी कि आखिर दोनों मरे कैसे थे? पुलिस आई तो छानबीन और पूछताछ शुरू हुई. दिलीप के यह बताने पर कि मृतक विजय उस की पत्नी पिंकी का पहला पति और उस का दोस्त है, पहले तो कहानी उलझती नजर आई, लेकिन जल्दी ही सुलझ भी गई.
दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. पुलिस वालों ने दिलीप से पूछताछ की तो उस की बातों से लगा कि वह झूठ नहीं बोल रहा है. उस ने पुलिस को बताया था कि वह काम से लौटा तो घर के अंदर से धुआं निकलते देख घबरा गया. उस ने मदद के लिए गुहार लगाई. इस के बाद जो हुआ, उस की पुष्टि के लिए वहां दरजनों लोग मौजूद थे.
दरवाजा सचमुच अंदर से बंद था, जिसे उन लोगों ने मिल कर तोड़ा था. सभी ने बताया कि पिंकी की लाश जली हालत में किचन में पड़ी थी और विजय की ड्राइंगरूम में. उस के गले में साड़ी का फंदा लिपटा था. पिंकी के चेहरे पर चोट के निशान साफ दिखाई दे रहे थे.
जल्दी ही इस दोहरे हत्याकांड या खुदकुशी की खबर आग की तरह धार से होते हुए समूचे निमाड़ और मालवांचल में फैल गई, जिस के बारे में सभी के अपनेअपने अनुमान थे. लेकिन सभी को इस बात का इंतजार था कि आखिर पुलिस कहती क्या है.
धार के एसपी वीरेंद्र सिंह भी सूचना पा कर घटनास्थल पर आ गए थे. उन्होंने घटनास्थल का बारीकी से जायजा लिया. पुलिस को दिए गए बयान में पिंकी की मां मुन्नीबाई ने बताया था कि पिंकी और विजय का वैवाहिक जीवन ठीकठाक चल रहा था, लेकिन दिलीप ने आ कर न जाने कैसे पिंकी को फंसा लिया.
जबकि दिलीप का कहना था कि उसे इस बात की जानकारी नहीं थी कि उस की गैरमौजूदगी में पिंकी पहले पति विजय से मिलतीजुलती थी या फोन पर बातें करती थी. पिंकी के भाई कान्हा सुवे ने जरूर यह माना कि उस ने पिंकी को बहुत समझाया था, पर वह नहीं मानी. पिंकी कब विजय को तलाक दे कर दिलीप के साथ रहने लगी थी, यह उसे नहीं मालूम था.
तलाक के बाद दोनों बेटे विजय के पास ही रह रहे थे. विजय के भाई अजय के मुताबिक हादसे के दिन विजय राजस्थान के प्रसिद्ध धार्मिकस्थल सांवरिया सेठ जाने को कह कर घर से निकला था.
वह छोटे बेटे अनुज को अपने साथ ले गया था. अनुज को उस ने एक परिचित की कार में बिठा कर अपनी साली के पास छोड़ दिया था, जो शिक्षिका है.
अब पुलिस के पास सिवाय अनुमान के कुछ नहीं बचा था. इस से आखिरी अंदाजा यह लगाया गया कि विजय पिंकी के बुलाने पर उस के घर आया था और किसी बात पर विवाद हो जाने की वजह से उस ने पिंकी की हत्या कर के घर में आग लगा दी थी. उस के बाद खुद भी साड़ी का फंदा बना कर लटक गया. फंदा उस का वजन सह नहीं पाया, इसलिए वह गिर कर बेहोश हो गया. उसी हालत में दम घुटने से उस की भी मौत हो गई होगी.
बाद में यह बात भी निकल कर आई कि विजय पिंकी से दोबारा प्यार नहीं करने लगा था, बल्कि उस की बेवफाई से वह खार खाए बैठा था. उस दिन मौका मिलते ही उस ने पिंकी को उस की बेवफाई की सजा दे दी. लेकिन बदकिस्मती से खुद भी मारा गया.
सच क्या था, यह बताने के लिए न पिंकी है और न विजय. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक दोनों की मौत दम घुटने से हुई थी, लेकिन पिंकी के पेट पर एक धारदार हथियार का निशान भी था, जो संभवत: तवे का था. विजय के सिर पर लगी चोट से अंदाजा लगाया गया कि खुद को फांसी लगाते वक्त वह गिर गया था, इसलिए उस के सिर में चोट लग गई थी.
यही बात सच के ज्यादा नजदीक लगती है कि विजय ने पहले पिंकी को मारा, उस के बाद खुद भी फांसी लगा ली. लेकिन क्यों? इस का जवाब किसी के पास नहीं है. क्योंकि वह वाकई में पत्नी को बहुत चाहता था, पर उस की बेवफाई की सजा भी देना चाहता था. जबकि पिंकी की मंशा उस से दोबारा पैसे ऐंठने की थी. शायद इसी से वह और तिलमिला उठा था.
पिंकी समझदारी से काम लेती तो विजय की कम आमदनी में करोड़ों पत्नियों की तरह अपना घर चला सकती थी. पर अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की जिद और ख्वाहिशें उसे महंगी पड़ीं, जिस से उस के बच्चे अनाथ हो गए. अब उन की चिंता करने वाला कोई नहीं रहा.
दिलीप कहीं से शक के दायरे में नहीं था. उस का हादसे के समय पहुंचना भी एक इत्तफाक था. परेशान तो वह भी पिंकी की बढ़ती मांगों से था, जिन से इस तरह छुटकारा मिलेगा, इस की उम्मीद उसे बिलकुल नहीं रही होगी.
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अफसर बेईमान हैं. चपरासीबाबू से ले कर कलक्टर और कमिश्नर तक बेईमान हैं. हमारी व्यवस्था पर रिश्वत दाग है. ऐसे में आम आदमी कहां जाए? किस का दरवाजा खटखटाए? छोटेबड़े काम के लिए पैसे मांगे जाते हैं. अफसरशाही समय के साथसाथ तानाशाह हो रही है
आजादी को मिले 68 साल हो गए हैं. देश ने तरक्की के डग तो भरे हैं, लेकिन हमारे अफसरों ने लोकतंत्र का बेजा फायदा उठाया है. वे कानून की लचीली गलियों, लालफीताशाही, लचर व्यवस्था के चलते सालों तक फाइलों को अटकातेदबाते रहते हैं.
बच्चों का जन्मतिथि प्रमाणपत्र बनवाने से ले कर वृद्धावस्था पैंशन, विधवा पैंशन और तमाम तरह के कामों में आम आदमी को प्रशासन के चक्कर लगाने पड़ते हैं, पर कहीं कोई सुनवाई नहीं होती है.
जनसुनवाई में मामले इस तरह अटकाए जाते हैं कि सालों तक नहीं सुलझते. अफसरों के खिलाफ कार्यवाही करने के दर्जनों कानून हैं, लेकिन जिन कानूनों को अफसर बनाते हैं, उन की तंग गलियों का सहारा ले कर वे बच निकलते हैं. अफसरशाही की चेन इतनी लंबी और मजबूत है कि अगर उन पर आंच भी आती है, तो सारे अफसर एक हो जाते हैं.
भ्रष्टाचार की शुरुआत गांव के पटवारी, ग्रामसेवक से शुरू होती है, जो बीडीओ, कोष अधिकारी, एसडीएम, एडीएम से ले कर कलक्टर, कमिश्नर तक एकदूसरे से जुड़ी रहती है.
एकएक जिले में जनसुनवाई के हजारों से ज्यादा मामले लंबित रहते हैं. अफसरों में इच्छाशक्ति की कमी है. वे काम करना ही नहीं चाहते हैं. अगर कोई अच्छा काम करता भी है, तो उसे छुटभैए मुलाजिम सहयोग नहीं करते हैं.
देश की आजादी के बाद भी गांवों की तसवीर नहीं बदली है. देश की 85 फीसदी जनता को पीने का साफ पानी नहीं मिलता है. 75 फीसदी लोग रोजाना 80 रुपए से कम की आमदनी वाले हैं.
रोजगार के लिए लोग फुटपाथों पर संघर्ष करते हैं और गैरकानूनी कह कर सालों की रोजीरोटी पर बुलडोजर व जेसीबी चला दी जाती है. बहुमंजिला इमारतों के खिलाफ कभी कोई कार्यवाही नहीं होती है. पैसा देने और लेने की संस्कृति ने जीना मुहाल कर दिया है.
अफसरशाही ने देश के संविधान का मखौल बना कर रखा है. कानून के दांवपेंच आम आदमी नहीं समझता. उसे तो काम से मतलब है, लेकिन बिना पैसों के लिएदिए काम नहीं होता है. 10 में से 7 लोग प्रशासन से पीडि़त हैं. लोग दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करते हैं, मगर अफसर उन से भी चौथ वसूल करते हैं.
लोग इज्जत के साथ जीना चाहते हैं, मगर उन्हें बेइज्जत होना पड़ता है. कलक्टर तक गरीब को पहुंचने ही नहीं दिया जाता है. कमिश्नर भी गरीब की कब सुनता है. नेता आते हैं, तो पूंछहिलाऊ प्रशासन उन के आगेपीछे घूमता है. तसवीर का दूसरा रूप बता कर हकीकत की अनदेखी की जाती है.
कहने को देश में शिक्षा के अधिकार का कानून है, पर अब तक कितने बच्चे पढ़े हैं? कानून बनने से ले कर अब तक 42 फीसदी बच्चे इस के लाभ से दूर हैं.
रोजीरोटी और रोजगार का संकट बरकरार है. अफसरों के बंगले बन रहे हैं. बैंक बैलैंस बढ़ रहे हैं. कलक्ट्रेट और इनकम टैक्स महकमे का चपरासी लखपतिकरोड़पति बन जाता है और आम आदमी जहर का घूंट पी कर रह जाता है.
अगर सरकार कोई कदम उठाती भी है, तो अफसरशाही उसे कामयाब नहीं होने देती. योजनाएं बनती हैं, पर कागजों पर. बंद कमरों में. उन्हें चलाने वाले मनमानी कर रहे हैं. ऐसी मनमानी से देश का भला होने वाला नहीं है.
जब बात कार्यवाही की आती है, तो अफसरशाही बचने का पिछला दरवाजा निकाल लेती है. कर्मचारी आंदोलन कर बेईमान कर्मचारियों को बचा लेते हैं. इस देश में सरकार चल रही है, मगर अफसरशाही की.
अफसरशाही देश के नेताओं को अपने इशारों पर नचा रही है. 15 अगस्त और 26 जनवरी पर नेताओं के भाषण नौकरशाह लिखते हैं. देश की सही तसवीर दिखाने वाले अफसर होते हैं, मगर वे ही गलत तसवीर पेश कर जनता के साथ धोखा करते हैं. सरकारी अफसरों से हर कोई परेशान है.
अफसरों और मुलाजिमों ने मिल कर देश का भला नहीं किया है. कमिश्नर मीटिंगों में मसरूफ रहते हैं. गरमी आती है और पानी की सुविधा को ले कर कलक्टर और कमिश्नर अफसरों और मुलाजिमों की क्लास लेते हैं, लेकिन करोड़ों का बजट सब मिल कर खा जाते हैं.
आज भी 45 फीसदी गांवों में बिजली नहीं पहुंची है. जंगल महकमा आजादी के इतने सालों में 0.15 फीसदी जमीन पर पेड़ नहीं लगा पाया है. हर महकमा भ्रष्ट है. जहां पैसों का बड़ा बजट, वहां बड़ी हेराफेरी. गांवों की तरक्की के नाम पर करोड़ों का बजट, मगर आम आदमी हमेशा की तरह आज भी परेशान है.
प्रधानमंत्री रह चुके राजीव गांधी कहा करते थे कि वे केंद्र से एक रुपया गांव की तरक्की के लिए भेजते हैं, मगर वह सही हाथों तक पहुंचतेपहुंचते 10 पैसे रह जाता है. यह हालत अच्छी नहीं है. प्रधानमंत्री रह चुके अटल बिहारी वाजपेयी का भी कहना है कि बेईमान अफसरशाही देश की राजनीति को खराब कर रही है.
किसान गेहूं पैदा करते हैं, लेकिन अफसर उन्हें उन का वाजिब दाम नहीं दिलाते. मुनाफा बिचौलिए खा जाते हैं. अन्नदाता किसान खुदकुशी करने को मजबूर हैं. विदेशों में निर्यात के नाम पर किसानों के साथ नाइंसाफी की जाती है. बिना जरूरत और बिना काम का सामान विदेशों से मंगा लिया जाता है. सब कमीशन का खेल है.
हालत यह है कि रक्षासुरक्षा से ले कर आम आदमी के काम की चीजों की खरीदफरोख्त में कमीशन खाने का खेल चलता है. अगर कहें कि अफसरशाही ने इस देश की राजनीति को खराब किया है, तो गलत नहीं होगा.
स्कूलों के लिए जमीन आवंटित होती है, तो कमीशन. होटलों के लिए जमीन आवंटित होती है, तो रिश्वत. हर छोटेमोटे काम के लिए लेनदेन की संस्कृति ने देश की इमेज तो खराब की ही है, साथ ही आम आदमी का भी नुकसान किया है.
आज भी महानगरों में लोग फुटपाथ पर जूते सिलने का काम करते हैं. पटरी पर पान की दुकानें चलती हैं. एकएक रुपए के लिए गरीब संघर्ष करता है, मगर उसे अपने बेटाबेटी को पढ़ाने का हक नहीं है. गरीब अपनी बेटी की धूमधाम से शादी करने का सपना नहीं देख सकता है. क्यों? क्योंकि देश में भ्रष्टाचार हद पर है.
इस भ्रष्टाचार की वजह भी अफसरशाही ही है. नेताओं को तो ये अफसर अपने इशारों पर नचाते हैं. जब तक अफसरशाही में फैला भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा, तब तक देश का भला नहीं हो सकता है.
डीके पुरोहित
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छोटे पर्दे पर रियलिटी शो ‘बिग बौस 11’ का हिस्सा बनने के बाद सपना चौधरी आज पूरे देशभर में एक जाना माना नाम है. हरियाणा की रहने वाली सपना बिग बौस के घर में आने से पहले भी अपने राज्य में काफी मशहूर थीं और अपने डांस के लिए जानी जाती थीं.
हालांकि, बिग बौस में आने के बाद उन्होंने अपनी पहचान को बतौर आर्टिस्ट बदला और अब वह अपनी नई पहचान के साथ देशभर में मशहूर हैं. हाल ही में उन्होंने अपने भाई की शादी में जमकर डांस किया और सोशल मीडिया पर उनका यह वीडियो काफी तेजी से वायरल हो रहा है.
इस वीडियो में सपना काफी मस्ती से डांस करती हुई नजर आ रही हैं. गौरतलब है कि सपना के भाई की शादी में ‘बिग बौस 11’ के दूसरे एक्स कंटेस्टेट्स भी शामिल हुए थे और सबने यहां जम कर मस्ती की थी. शादी में मेहजबी सिद्दीकी, अर्शी खान और आकाश ददलानी शामिल हुए थे और सोशल मीडिया पर सबने अपने-अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर अपनी तस्वीरें शेयर की हैं. इन तस्वीरों में सपना, मेहजबी और अर्शी के साथ मस्ती करती हुईं नजर आ रहीं हैं.
गौरतलब है कि सपना जल्द रिलीज होने वाली अभय देओल और पत्रलेखा की फिल्म ‘नानू की जानू’ में आइटम सौन्ग करते हुए नजर आएंगी. इसके अलावा कुछ वक्त पहले उन्होंने एक भोजपुरी फिल्म के गाने में डांस किया था. बिग बौस के घर से बाहर आने के बाद से सपना की जिंदगी पूरी तरह से बदल गई है और अब वह किसी बौलीवुड स्टार से कम नहीं हैं.
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लेदर की ब्लैक जैकेट, हाई हील बूट, जींस और सिर पर हिजाब पहन कर जब वह 250 सीसी वाली 2 लाख रुपए की होंडा सीबीआर स्पोर्ट्स बाइक ले कर सड़क पर निकलती है तो शायद ही कोई ऐसा हो जो उस की तरफ मुड़ कर न देखे. जी हां, यह है रोशनी मिसबाह. जामिया मिलिया इसलामिया यूनिवर्सिटी की एमए की छात्रा, गाजियाबाद की रहने वाली.
यह पढ़ कर आप एक बार जरूर सोचेंगे कि जिस इसलाम में महिलाओं पर तमाम तरह की पाबंदियां हैं, क्या उस इसलाम में ऐसा संभव है? लेकिन आप यह भूल रहे हैं कि खुली सोच वाला, पढ़ालिखा इसलामिक तबका बहुत तेजी से बदल रहा है. अपने बच्चों के भविष्य और कैरियर को ले कर उन्हें चिंता भी होने लगी है और उन्हें कुछ बनाने की दिल में चाह भी है.
इस तरह की सोच देश के लिए भी अच्छी है और इस्लाम के लिए भी. क्योंकि आगे बढ़ने वाले ही देश के लिए कुछ कर पाते हैं. लेकिन इस का मतलब यह कतई नहीं है कि इस विचार धारा के लोग अपने धर्म को भूलने या नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. रोशनी मिसबाह को ही ले लीजिए. वह बिना हिजाब पहने घर से नहीं निकलती, जिसे इसलाम में महिलाओं के जरूरी माना गया है. न ही वह दूसरी लड़कियों की तरह मौडर्न है.
अरेबिक एंड कल्चरल स्टडीज में एमए कर रही रोशनी मिसबाह अपने बाइकिंग शौक और अपनी रिलीजियस वैल्यू के चलते सोशल मीडिया पर तो चर्चित है ही, युवा लड़कियों के लिए भी प्रेरणा है. उसे हिजाबी बाइकर के नाम से जाना जाता है. वह बाइक राइडर्स ग्रुप जैसे विंड चेजर्स और दिल्ली रौयल एनफील्ड राइडर्स की मेंबर है. रोशनी मिसबाह का यह शौक एक तरह से बचपन में ही शुरू हो गया था.
दरअसल, उस के पिता को भी बाइक का शौक था. जब मिसबाह 9वीं क्लास में थी तो उस के पिता उसे अपनी बुलेट मोटरसाइकिल पर पीछे बैठा कर स्कूल छोड़ने जाया करते थे. तब रोशनी सोचा करती थी कि जिस बाइक पर पीछे बैठने में इतना मजा आता है, उसे चलाने में कितना आनंद आता होगा.
एक दिन उस के पिता उसे अपने दोस्त की पल्सर बाइक पर बैठा कर कहीं ले जा रहे थे तो रोशनी ने थोड़े संकोच से कहा, ‘मैं चलाऊं पापा.’ इस पर उस के पिता ने बिना किसी संकोच या डर के बेटी के हाथ में मोटरसाइकिल का स्टीयरिंग थमा दिया और खुद पीछे बैठ गए. बस, इस के बाद रोशनी बाइक चलाने लगी.
बहरहाल, 22 वर्षीय रोशनी दिल्ली के बाइकरनी ग्रुप की सब से कम उम्र की सदस्या है. यह ग्रुप महिला मोटरसाइकिलस्टों के जरिए लिंग समानता लाने का संदेश देने का प्रयास करता है.
रोशनी गाजियाबाद के बिजनैसमैन की बेटी है. उस का परिवार धार्मिक रूप से रुढि़वादी परिवार है. रोशनी बाइक जरूर चलाती है, लेकिन अपनी धार्मिक मान्यताओं को न केवल पूरी तरह मानती है, बल्कि निर्वाह भी करती है. बाइक की वजह से वह भले ही जींस, जैकेट पहने, हाई हील के लौंग बूट पहने, लेकिन उस के चेहरे के अलावा उस के शरीर का कोई भी अंग बेपरदा नहीं होता. यहां तक कि वह हेलमेट भी हिजाब के ऊपर पहनती है.
रोशनी का मानना है कि अगर आप की सोच आधुनिक नहीं है तो पहनावे से कुछ नहीं होता. आधुनिकता सोच में होनी चाहिए, कपड़ों में नहीं. कुछ लोगों ने हिजाब के ऊपर हेलमेट लगाने को ले कर रोशनी का मजाक उड़ाया तो उस ने कहा कि बाइकिंग उस का जुनून है और हिजाब उस की आस्था और दोनों को ही कोई चैलेंज नहीं कर सकता.
कुछ लोगों ने रोशनी के पिता से बेटी के बाइक चलाने पर विरोध जताते हुए कहा कि रोशनी के लिए यह ठीक नहीं है, उस से कौन शादी करेगा. इस पर उस के पिता ने जवाब दिया कि जब तक वह कोई गलत काम नहीं करती, तब तक वे उसे उस का शौक पूरा करने से नहीं रोकेंगे.
रोशनी की एक खास बात यह भी है कि वह ट्रैफिक का कोई रूल नहीं तोड़ती, बल्कि दूसरों को भी ऐसा करने से रोकती हैं. उन का कहना है कि अगर आप के पास स्पोर्ट्स बाइक है तो यह जरूरी नहीं है कि उसे अनियंत्रित तरीके से ही चलाया जाए. रफ्तार हमेशा नियंत्रण में होनी चाहिए और ट्रैफिक रूल्स को फालो करना चाहिए.
रोशनी मिसबाह ने जब जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया था तभी आनेजाने के लिए पिता से कह कर बजाज एवेंजर 220 खरीदवा ली थी. लेकिन 5 महीने बाद ही उस ने अपनी वह बाइक बेच कर रौयल एनफील्ड खरीद ली, क्योंकि उसे इस की आवाज इंप्रेस करती थी. इस के लिए उस ने अपने फैमिली बिजनैस में भी सहयोग किया और कुछ पार्टटाइम जौब भी किए ताकि सारा बोझ परिवार पर न पड़े.
कुछ महीने रौयल एनफील्ड चलाने से भी जब रोशनी का मन भर गया तो उस ने अपनी इस बाइक को बेच कर होंडा सीबीआर 250 रिप्सोल स्पोर्ट्स बाइक खरीद ली. जामिया मिलिया में लड़कियों सहित अन्य स्टूडेंट भी रोशनी को अपने आदर्श के रूप में देखते हैं.
इतना ही नहीं बल्कि यूनिवर्सिटी के प्रोफैसरों की ओर से रोशनी को पार्किंग में खास स्लौट मुहैया कराया गया है, जो इंडो अरेबिक सेंटर के पास कैंपस में ही है. रोशनी मिसबाह के प्रोफेसर और सेंटर फोर वेस्ट एशियन स्टडीज के डायरेक्टर जावेद खान के अनुसार रोशनी मिसबाह एक गंभीर स्टूडेंट है और उस का पूरा फोकस अपनी पढ़ाई पर रहता है. वह अपने बाइक प्रेम के चलते भी अपनी जड़ों से जुड़ी है.
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सवाल मेरी शादी को 3 साल हो चुके हैं. पति रोजाना मुझ से संबंध बनाते हैं. मना करने पर वे मारपीट कर के जबरन संबंध बनाते हैं. मैं क्या करूं?
जवाब
आप के पति कोई गुनाह नहीं कर रहे हैं, बस उन का तरीका गलत है. यही काम वे प्यार से भी कर सकते हैं. आप को भी अगर कोई तकलीफ होती है, तो उस बारे में पति को तसल्ली से बता सकती हैं. जब आप इतनी गहराई से जुड़ी हैं, तो बात करने में झिझकना नहीं चाहिए. वैसे, पति का हक है आप के साथ संबंध बनाना, लिहाजा मना न करें.
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घरों में शौचालय बनाने की नरेंद्र मोदी की मुहिम चाहे जितनी अच्छी लगे, यह गरीबों के लिए असल में एक आफत हो गई है. शर्तें रखी गई हैं कि अगर घर में शौचालय नहीं है तो चुनाव नहीं लड़ सकते, नौकरी नहीं पा सकते, स्कूल में दाखिला में नहीं ले सकते.
हरियाणा ने गरीबी रेखा के नीचे वालों को तब तक राशन देना बंद करवा दिया, जब तक वे प्रमाणपत्र नहीं लाएंगे कि उन के घर में शौचालय है. लाखों गरीब मारेमारे फिरें कि पहले शौचालय के लिए सरकारी सहायता मिले, फिर सस्ता राशन. जितने दिन नहीं मिलेगा, उतने दिन क्या होगा? गरीब को महंगा राशन खरीदना होगा न? जिस का घर ही दूसरों की जमीन पर डंडे डाल कर फूस बिछा कर बना हो, वह कहां से शौचालय बनवाएगा, इस से राशन अफसरों को फर्क नहीं पड़ता.
बिहार सरकार ने शौचालय बनवाने के 12,000 रुपए दिए, पर क्या शौचालय असल में इतने में बन जाएगा? और अगर न बने तो उस से पंचायत का चुनाव लड़ने का हक छीन लिया गया है. वह दुहाई देने जाए भी तो कहां जाए, क्योंकि अदालत महंगी है और अफसर को तो आम आदमी का टेंटुआ पकड़ने का मौका भर चाहिए.
उलटे अफसरों और नेताओं ने तो शौचालय न होने पर घर में बाइक या टैलीविजन होने पर मजाक उड़ाना शुरू कर दिया. नेता भी नहीं सुनते, चाहे उन के घर वाले खुद बाहर शौच करने जाते हों. 5 बार मध्य प्रदेश से सांसद रहे अनूपपुर जिले के दलपत सिंह परस्ते की बेटी टांकी टोला गांव में रहती है, पर 50,000 दूसरे लोगों की तरह वह भी बाहर शौच के लिए जाने को मजबूर है.
शौचालय हर कोई चाहता है, पर यह बनाना उतना आसान नहीं है, जितना प्रधानमंत्री के भाषणों, पोस्टरों, नारों से लगता है. जो घर छोटे हैं, जिन में अपना अहाता या खुली जगह नहीं है, वे कहां बनाएंगे, जिस से बदबू न आए? शौचालय साफ कैसे होगा, अगर बहता पानी न आए? अगर 2 गड्ढे वाला शौचालय भी बनाया गया, तो भी वह महीनेभर में भर जाएगा, तो उस को साफ कैसे करेंगे? अगर लोगों का मल जमीन में जाएगा, तो जमीन का पानी मैला हो जाएगा और बीमारियां पैदा होंगी.
सरकार ने तो यज्ञ करा कर सुखशांति लाने का फैसला सुना दिया. शौचालय यज्ञ कराओ तभी तुम्हारे जीतेजी आत्मा को जिंदा रहने देंगे, वरना मरा समझो. शौचालय के लिए सीवर और लगातार आने वाला पानी दोनों बहुत जरूरी हैं, वरना घरों के बाहर ही सड़ता मल नजर आएगा.
घरों में शौच इसलिए भी कराई जा रही हैं, ताकि ऊंची जाति वालों के पैर नीची जातियों के लोगों के मल पर न पड़ें. वे अपना मल अपने घर में रखें. चाहे उन के घर में बदबू बनी रहे, गंद रहे, शौचालय लबालब भरता रहे. यह समाज सुधार तो है, पर बिना सोचेसमझे या दूर की सोच का, जिस में ऊंचनीच भी घुसी है.
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5 नवंबर, 2016 की शाम के यही कोई साढ़े 6-7 बजे थे. उत्तर प्रदेश के जिला इलाहाबाद के गंगापार स्थित थाना बहरिया के गांव रामगढ़ कोठारी के रहने वाले श्यामलोदत्त मिश्रा की बेटी रेखा अपनी चचेरी बहनों राधा और श्रेया के साथ खेतों से लौट रही थी. तीनों बहनें गांव के करीब पहुंची थीं कि उन के पास एक पल्सर मोटरसाइकिल आ कर रुकी. उस पर 2 लोग सवार थे. उन के पहनावे और कदकाठी से लग रहा था कि उन की उम्र ज्यादा नहीं थी. पास में मोटरसाइकिल रुकने से तीनों बहनें ठिठक कर रुक गईं. मोटरसाइकिल सवार गांव के नहीं थे, इसलिए उन्हें लगा कि शायद वे उन से किसी के घर का रास्ता पूछेंगे. लेकिन रास्ता पूछने के बजाय मोटरसाइकिल पर पीछे बैठा युवक फुरती से उतरा. उस के हाथ में एक बोतल थी. तीनों बहनें कुछ समझ पातीं, उस के पहले ही उस ने बोतल का ढक्कन खोला और उस में जो भरा था, उसे तीनों बहनों की ओर उछाल दिया. बोतल का तरल जैसे ही उन के चेहरों पर पड़ा, जलन से तीनों बिलबिला उठीं.
मोटरसाइकिल स्टार्ट ही थी. युवक अपना काम कर के मोटरसाइकिल पर जैसे ही बैठा, मोटरसाइकिल एकदम से चल पड़ी. तीनों लड़कियां जलन से चीखनेचिल्लाने लगीं, क्योंकि उन के चेहरों पर फेंका तरल पदार्थ तेजाब था. उन की चीखपुकार पर पूरा गांव इकट्ठा हो गया और टार्च की रोशनी में जब उन के चेहरों को देखा गया तो देखने वालों के रोंगटे खडे़ हो गए.
लड़कियों की स्थिति काफी गंभीर थी. तुरंत सौ नंबर पर फोन कर के घटना की सूचना दी गई. सूचना मिलते ही थाना बहरिया पुलिस के अलावा पुलिस अधिकारी भी एंबुलैंस के साथ गांव कोठारी आ पहुंचे. थानाप्रभारी अश्विनी कुमार सिंह भदौरिया ने तुरंत तीनों लड़कियों को अस्पताल भिजवाया.
घटना की सूचना पा कर आईजी के.एस. प्रताप कुमार, डीआईजी विजय यादव, एसएसपी शलभ माथुर भी तीनों लड़कियों का हालचाल लेने अस्पताल पहुंच गए थे.
अधिकारियों ने पीडि़त बहनों के चेहरों पर नजर डाली तो यह देख कर आश्वस्त हुए कि उन की आंखें सलीसलामत थीं. उन के शरीर पर जहांजहां तेजाब पड़ा था, वहां की त्वचा झुलस गई थी. तीनों बहनों ने जो शाल ओढ़ रखी थी, तेजाब पड़ने से उन में जगहजगह छेद हो गए थे. अगर वे शाल न ओढे होतीं तो शायद और ज्यादा जल सकती थीं.
पुलिस अधिकारियों ने पीडि़त लड़कियों के घर वालों से पूछताछ की, ताकि हमलावरों के बारे में कुछ पता चल सके. इस पूछताछ में पता चला कि श्यामलोदत्त का अपने पड़ोसी से रास्ते को ले कर विवाद चल रहा था. इसी के साथ यह भी पता चला कि तेजाबी हमले से झुलसी श्रेया का पड़ोस की रहने वाली पिंकी मिश्रा से किसी बात को ले कर विवाद हो गया था. श्रेया, पिंकी और रेखा एक ही कालेज में पढ़ती थीं.
आईजी के निर्देश पर इन दोनों बिंदुओं पर जांच आगे बढ़ाई गई तो दोनों का ही इस घटना से कोई संबंध नहीं निकला. पुलिस अधिकारियों के जेहन में एक ही सवाल कौंध रहा था कि गांव में कोई तो ऐसा होगा, जो इन लड़कियों की हर गतिविधियों पर गिद्धदृष्टि जमाए था.
वही पलपल की जानकारी हमला करने वालों को देता रहा होगा. जिसजिस पर पुलिस को शक हुआ, उस से पूछताछ की गई, लेकिन पुलिस को सफलता नहीं मिली. एसएसपी शलभ माथुर ने मामले को सुलझाने में इंटेलीजेंस विंग के तेजतर्रार इंसपेक्टर अनिरुद्ध कुमार सिंह और एसआई नागेश कुमार सिंह को भी आवश्यक दिशानिर्देश दे कर लगा दिया.
अनिरुद्ध कुमार सिंह ने अस्पताल पहुंच कर तीनों बहनों से एक बार फिर पूछताछ की. श्रेया ने बताया कि उन के ऊपर तेजाब फेंकने के बाद एक हमलावर ने किसी को फोन कर के कहा था कि ‘काम हो गया है.’
इस पूछताछ के बाद उन्होंने अपनी टीम के तेजतर्रार हैडकांस्टेबल इंद्रप्रताप सिंह, जितेंद्र पाल सिंह, कांस्टेबल पवन सिंह, अभय कुमार सिंह, रविसेन सिंह बिसेन व स्वाट टीम प्रभारी नागेश कुमार सिंह, पंकज त्रिपाठी, हेमू पटेल, अनुराग, विजय यादव, दीपक कुमार आदि से इस विषय में गहन मंत्रणा कर सभी को सामान्य कपड़ों में कोठारी गांव के इर्दगिर्द लगा दिया. मुखबिरों को भी सतर्क कर दिया था.
इस के अलावा थाना बहरिया के थानाप्रभारी अश्विनी कुमार भदौरिया भी इस मामले का खुलासा करने में अपनी टीम के साथ लगे हुए थे. पुलिस यह मान कर चल रही थी कि कहीं यह हमला प्रेमप्रसंग को ले कर तो नहीं हुआ. हमलावर एक लड़की को निशाना बनाने आए होंगे, बाकी दोनों लड़कियां साथ होने की वजह से चपेट में आ गई होंगी.
यहां एक बात गौर करने वाली यह थी कि इन में से राधा अपनी ससुराल महेपुरा से कुछ दिनों पहले ही मायके आई थी. इसी साल 11 जुलाई, 2016 को उस का विवाह हुआ था.
इंसपेक्टर अनिरुद्ध कुमार सिंह की सोच यहीं आ कर टिक गई. उन्हें लगा कि हमलावर इन लड़कियों के आसपास रहते होंगे या जिस के इशारे पर यह वारदात की गई है, वह इन के आसपास रहता होगा. क्योंकि उस आदमी को इन बहनों की एकएक पल की जानकारी थी. और उचित मौका देख कर हमलावरों को मोबाइल द्वारा सटीक सूचना दे कर उन पर एसिड अटैक करवा दिया गया था.
इस दिशा में जांच की गई तो पता चला कि श्यामलोदत्त मिश्रा के पड़ोसी रामचंद्र मिश्रा की बेटी पिंकी की शादी सन 2012 में थाना बहरिया के गांव महेपुरा के योगेश तिवारी के साथ हुई थी. उसी गांव में राधा की ससुराल थी. सन 2014 में योगेश ने पिंकी पर बदचलनी और गहनों की चोरी का आरोप लगा कर उसे छोड़ दिया था. तब से वह मायके में ही रह रही थी.
पिंकी नहीं चाहती थी कि उस की ससुराल वाले गांव में राधा की शादी हो. शादी रोकने के लिए उस ने तरहतरह की बातें कहीं, पर उस की सारी कोशिश उस समय बेकार हो गई, जब राधा दुल्हन बन कर उसी गांव में पहुंच गई. पिंकी इस से जलभुन गई. शादी वाले दिन ही पिंकी ने उस से झगड़ा किया था.
इन बातों से पिंकी पुलिस के शक के दायरे में आ गई. पुलिस ने उसे थाने बुला कर पूछताछ शुरू की. पुलिस के सामने अपना दुखड़ा रोते हुए उस ने कहा कि वह तो खुद ही परेशान है. पति ने छोड़ रखा है, जिस का मुकदमा कोर्ट में चल रहा है. पुलिस ने उस की बातों पर विश्वास कर के उसे छोड़ दिया. मगर उस पर पुलिस की पैनी निगाह बराबर जमी रही. क्योंकि वह अभी भी शक के दायरे में थी.
अब तक की जांच में पुलिस को एक नई बात यह पता चली कि शादीशुदा होने के बावजूद पिंकी का थाना बहरिया के गांव राजेपुरा निवासी नफीस अहमद उर्फ जया से प्रेमसंबंध था. यह संबंध पिंकी की शादी से पहले से चला आ रहा था. इस बारे में उस के ससुराल वालों को पता चल गया था.
इस के बाद ही उस के पति योगेश तिवारी ने उस पर बदचलनी और गहनों की चोरी का आरोप लगा कर सन 2014 में उसे छोड़ दिया था. इस के बाद पिंकी के घर वालों ने योगेश और उस के घर वालों पर दहेज एक्ट और उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज करा दिया था, जो माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद में मिडिएशन पर चल रहा है. इस के बावजूद पिंकी और उस के घर वाले गांव के ही जगतनारायण मिश्रा, जिन्होंने पिंकी और योगेश की शादी कराई थी, पर बराबर दबाव बनाए हुए थे कि किसी प्रकार से दोनों पक्षों में समझौता करा दें. जगतनारायण मिश्रा समझौता तो नहीं करा सके, पर उन्होंने पिंकी की ससुराल वाले गांव में राधा का ब्याह जरूर करा दिया था.
यह जानकारी मिलने के बाद इंसपेक्टर अनिरुद्ध कुमार सिंह बिना समय गंवाए पिंकी के प्रेमी नफीस उर्फ जया को उस के घर पर छापा मार कर हिरासत में ले लिया. थाने में उस से पूछताछ की गई तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मैं निर्दोष हूं. मेरा इस मामले में कोई लेनादेना नहीं है. मेरे पास बोलेरो गाड़ी है और पिंकी के पिता के पास अरमादा की मार्शल, जिन्हें मैं ही किराए पर चलवाता हूं, इसी वजह से मेरा उन के यहां आनाजाना लगा रहता है. पिंकी से मेरा कोई लेनादेना नहीं है.’’
अनिरुद्ध कुमार सिंह को लग रहा था कि यह झूठ बोल रहा है, इसलिए उन्होंने उस के और पिंकी के फोन नंबरों की जो काल डिटेल्स निकलवाई थी, उसे उस के सामने रखा तो वह सकपका गया. इस से साफ था कि घटना वाले दिन 5 नवंबर, 2016 की शाम साढ़े 7 बजे पिंकी और उस की एसिड अटैक से पहले और बाद में बातें हुई थीं.
इस के बाद नफीस ने अपना गुनाह कबूल करते हुए बताया कि उसी ने अपने साथी के साथ मिल कर तीनों बहनों पर तेजाब फेंका था. इस के बाद उस ने एसिड अटैक के पीछे की जो कहानी बताई, इस प्रकार थी—
पिंकी और नफीस के बीच कालेज समय यानी सन 2008 से ही प्रेमसंबंध चले आ रहे थे. पिंकी ने नफीस पर शादी के लिए कई बार दबाव डाला था, लेकिन नफीस तैयार नहीं हुआ था. वह जानता था कि यह गांवदेहात का मामला है, इसलिए शादी के बाद बवाल हो सकता है.
योगेश से शादी हो जाने के बाद भी पिंकी प्रेमी नफीस से संबंध बनाए रही. इस का नतीजा यह निकला कि ससुराल वालों को उस के प्रेमसंबंधों का पता चल गया और पति ने उसे छोड़ दिया. उस की ससुराल वाले गांव में ब्याही राधा जब भी मायके आती, अपनी चचेरी बहनों से खूब हंसहंस कर बातें करती.
इस से पिंकी को लगता कि तीनों बहनें उसी के बारे में बातें कर के हंस रही हैं और उस का मजाक उड़ा रही हैं. पिंकी के मन में यह बात इस तरह बैठ गई कि वह राधा, रेखा तथा श्रेया को दुश्मन मान बैठी और उन्हें सबक सिखाने के बारे में सोचने लगी. वह उन्हें ऐसा कर देना चाहती थी कि लोग उन के चेहरे को देख कर नफरत करें.
उसी बीच रेखा की शादी प्रतापगढ़ के रानीगंज में तय गई. 2 दिनों बाद लड़के वाले उसे देखने के लिए आने वाले थे. पिंकी किसी भी हाल में तीनों बहनों को खुश नहीं देखना चाहती थी. वह अपने प्रेमी नफीस से मिली और उस के कंधे पर अपना सिर रख कर रोते हुए बोली, ‘‘नफीस, मैं तुम से कितनी बार कह चुकी हूं कि मेरी पड़ोसन दुश्मन उन तीनों बहनों पर तेजाब फेंक कर उन का चेहरा ऐसा कर दो कि जिस तरह मैं विरह की आग में झुलस रही हूं, वही हाल उन का भी हो.’’
‘‘मैं तुम्हारी पीड़ा को अच्छी तरह समझ रहा हूं. लेकिन तुम राधा और उस की बहनों के प्रति जो सोच रही हो, वह गलत है. मैं इस तरह का गलत काम नहीं कर सकता.’’ नफीस ने कहा.
‘‘नफीस, अगर तुम मुझ से सच्ची मोहब्बत करते हो तो तुम्हें मेरा यह काम करना ही पड़ेगा. मेरी खुशी के लिए तुम मेरा यह छोटा सा काम नहीं कर सकते? तुम कैसे मर्द हो, पिछले 8 सालों से मैं तुम्हें अपना सब कुछ सौंपती आ रही हूं और तुम मेरा इतना सा काम कर नहीं कर सकते तो क्या खाक प्यार करते हो?’’ कह कर वह अपनी आंखों में छलके आंसुओं को हथेली से पोंछने लगी.
‘‘नही, ऐसी बात नहीं है पिंकी. मैं तुम्हारी खुशी के लिए कुछ भी कर सकता हूं.’’ नफीस ने कहा.
प्रेमी के मुंह से यह सुन कर पिंकी के चेहरे पर मुसकान आ गई, वह चहकते हुए बोली, ‘‘यह हुई न मर्दों वाली बात. सुनो, इस समय राधा मायके में ही है. रेखा की शादी होने से पहले तुम मेरा काम कर दो, जिस से उस की शादी न हो सके. जिस दिन तुम्हें यह काम करना हो, मुझे बता देना. मैं तुम्हें पलपल की सूचना देती रहूंगी.’’
पूरी योजना तैयार कर के नफीस ने तेजाब खरीद लिया. इस के बाद उस ने राजेपुरा के रहने वाले अपने दोस्त शफीक (परिवर्तित नाम) को अपनी योजना में शामिल कर लिया. शफीक नाबालिग था.
5 नवंबर, 2016 को वह पिंकी के फोन का इंतजार करने लगा. शाम साढ़े 7 बजे पिंकी ने उसे बताया कि रेखा, राधा और श्रेया खेतों की तरफ जा रही हैं. फिर क्या था, नफीस शफीक को मोटरसाइकिल पर बैठा कर चल पड़ा और तीनों बहनों के चेहरों पर तेजाब डाल कर लौट आया.
नफीस की निशानदेही पर पुलिस ने पिंकी, शफीक और तेजाब बेचने वाले दुकानदार रमाकांत यादव को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने शफीक को बाल न्यायालय में पेश कर बालसुधार गृह भेज दिया, जबकि पिंकी और नफीस को भादंवि की धारा 326ए, 120बी के तहत अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.
– कथा मीडिया व पुलिस सूत्रों पर आधारित
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साइंटिस्ट्स ने सबसे कॉमन सेक्स पोजीशंस में से एक को सबसे खतरनाक बताया है. साइंटिस्ट्स के मुताबिक, आधे से ज्यादा पीनाइल फ्रैक्चर्स के लिए वूमन ऑन टॉप पोजीशन जिम्मेदार है. ब्राजील के रिसर्चर्स ने तीन हॉस्पिटल्स में केसेज की स्टडी के बाद ये खुलासा किया है.
इस पोजीशन में महिलाएं अपने पूरे बॉडी वेट के साथ पेनिस को कंट्रोल करती हैं. अगर पेनेट्रेशन में जरा भी गड़बड़ी हुई तो मर्द कुछ नहीं कर पाते. इसमें महिलाओं को तो दर्द नहीं होता लेकिन पेनिस को चोट पहुंचती है. डॉगी स्टाइल सेक्स भी 29 परसेंट फ्रैक्चर्स के लिए जिम्मेदार माना गया है.
रिसर्च में, मिशनरी पोजीशन सेक्स के लिए सेफेस्ट पोजीशन के तौर पर सामने आई है. रिसर्चर्स ने हॉस्पिटल में इलाज कराने आए 44 पुरुषों का अध्ययन किया. इनमें से 28 फ्रैक्चर्स हेट्रोसेक्सुअल सेक्स से हुए, 4 होमोसेक्सुअल से और 6 पेनिस मैनिपुलेशन से. हालांकि बाकी 4 फ्रैक्चर्स का कारण डॉक्टर्स को समझ नहीं आया.
रिसर्चर्स ने नोट किया कि केसेज में चोट अनकॉमन है और जिन्हें फ्रैक्चर होता है, वे बताने से डरते हैं. ऐसे में इस तरह के फ्रैक्चर्स की असल संख्या और ज्यादा हो सकती है. रिसर्च पेपर के कंक्लूजन में लिखा है, “हमारी स्टडी के मुताबिक, वूमन ऑन टॉप पोजीशन के साथ सेक्सुअल इंटरकोर्स पीनाइल फ्रैक्चर्स के लिए सबसे रिस्की है. जब एक मर्द मूवमेंट को कंट्रोल करता है तो वो पेनेट्रेशन के दौरान पेनिस में दर्द को रोकने की स्थिति में होता है.”
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जाति के आधार पर नेताओं के लिए जनता के वोट लेना भले ही आसान काम हो, पर सरकार बनाने के बाद जातियों में बैलैंस बनाए रखना मुश्किल काम होता है. यही वजह है कि बहुमत से सरकार बनाने वाले दलों को 5 साल में ही हार का सामना करना पड़ता है. अब जातीयता राजनीतिक दलों को भी लंबे समय तक टिक कर राज नहीं करने देती है.
वोट लेते समय राजनीतिक दलों के लिए सामाजिक बराबरी बनाए रखना भले ही आसान काम हो, पर सरकार चलाते समय इस को बनाए रखना बहुत ही मुश्किल हो जाता है. मायावती की सोशल इंजीनियरिंग से ले कर योगी आदित्यनाथ की सामाजिक बराबरी तक यह बारबार साबित होता दिख रहा है.
उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले की तिलोई विधानसभा सीट से विधायक मयंकेश्वर शरण सिंह और योगी सरकार में आवास राज्यमंत्री सुरेश पासी के बीच छिड़ी लड़ाई इस का ताजा उदाहरण है.
सुरेश पासी जगदीशपुर विधानसभा सीट से विधायक हैं और वे उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री भी हैं. तिलोई और जगदीशपुर विधानसभा इलाके आसपास हैं.
अपनी राजनीति को मजबूत बनाए रखने के लिए विधायक मयंकेश्वर शरण सिंह और मंत्री सुरेश पासी एकदूसरे के इलाकों में दखलअंदाजी भी करते रहते हैं. अपने दबदबे को बढ़ाने के लिए कई बार आमनेसामने भी आ जाते हैं. सब से अहम बात यह है कि दोनों ही भारतीय जनता पार्टी के विधायक हैं.
मंत्री होने के चलते सुरेश पासी के पास ज्यादा हक हैं. सरकारी नौकर भी विधायक से ज्यादा मंत्री की बात को अहमियत देते हैं.
सुरेश पासी भले ही जगदीशपुर से चुनाव लड़ते हों, पर उन का अपना निजी घर तिलोई विधानसभा इलाके में पड़ता है. लगातार 3 बार से गांव की प्रधानी सुरेश पासी के परिवार के पास ही रही है. ऐसे में सुरेश पासी को तिलोई इलाके में भी पैरवी करनी पड़ती है. इस के चलते तिलोई के विधायक मयंकेश्वर शरण सिंह के साथ उन की होड़ सी बन जाती है.
एक ही पार्टी में होने के बाद दोनों नेताओं के बीच किसी किस्म का तालमेल नहीं है. दोनों के बीच झगड़ा इस कदर बढ़ गया था कि विधायक मयंकेश्वर शरण सिंह ने अपने पद से इस्तीफा तक देने का मन बना लिया. इस के बाद वे प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिले.
विधायक मयंकेश्वर शरण सिंह की नाराजगी के चलते अमेठी की पुलिस सुपरिंटैंडैंट पूनम का वहां से तबादला कर दिया गया. वे विधायक और मंत्री के बीच तालमेल बनाने में नाकाम रही थीं. भाजपा के सामने यह पहला मामला है जो खुल कर सामने आ गया है.
वैसे, पूरे प्रदेश में ऐसे तमाम मामले हैं जहां नेताओं की जमीनी लैवल पर अलगअलग खेमेबंदी है.
भाजपा ने विधानसभा चुनाव के समय अलगअलग दलों और जातीय नेताओं को अपने साथ जोड़ा था, अब इन को साथ ले कर चलना मुश्किल हो रहा है. इन नेताओं की आपसी खेमेबंदी का नुकसान पार्टी को चुकाना पड़ सकता है.
बहुत से विधायक और मंत्री अपने चहेते लोगों को पार्टी में अहम पदों पर बिठाना चाहते हैं. जातीय आधार पर देखें तो पता चलता है कि भाजपा हमेशा से ही अगड़ी जातियों की पार्टी रही है. ऐसे में अगड़ी जाति के नेता अपनी अलग अहमियत चाहते हैं.
भाजपा ने वोट के लिए दलित और पिछड़े तबके के नेताओं को पार्टी से जोड़ा था. चुनाव के बाद अब जमीनी लैवल पर इन के बीच तालमेल बनाए रखना मुश्किल काम हो गया है. जातीय आधार पर सब से ज्यादा परेशानी दलित तबके को हो रही है. उस के नेता से ले कर कार्यकर्ता तक को ज्यादा अहमियत नहीं मिल रही है. भाजपा में हिंदू धर्म को मानने वालों की तादाद ज्यादा है. वे लोग दलितों के साथ तालमेल नहीं बना पा रहे हैं और भाजपा बारबार इस मुद्दे को दबाने में लगी रहती है.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और संगठन मंत्री सुनील बंसल पार्टी कार्यकर्ताओं को परिवारवाद से दूर रहने और आपसी तालमेल बनाए रखने की बात समझाते हैं. इस के बाद भी नेता किसी न किसी मुद्दे को ले कर सामने आ ही जाते हैं.
ऐसा केवल भाजपा के ही साथ नहीं हुआ है. इस के पहले बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी को भी इसी बात का शिकार होना पड़ा था.
साल 2007 में बसपा सुप्रीमो मायावती ने ब्राह्मणदलित गठजोड़ के साथ सोशल इंजीनियरिंग की रणनीति तैयार की थी, जिस में दलितों के साथसाथ कई अगड़ी जातियों ने भी बसपा का साथ दिया था. इस के बल पर मायावती को पहली बार बहुमत से सरकार बनाने का मौका मिला था.
सरकार बनाने के बाद बसपा इस बैलैंस को बनाए रखने में नाकाम रही, जिस से सरकार के मंत्रियों और कार्यकर्ताओं के बीच दूरियां बढ़ने लगीं.
जो दलित तबका कभी बसपा का मजबूत खंभा होता था, वह खुद पार्टी से दूर जाने लगा. इस के चलते बसपा को विधानसभा और लोकसभा दोनों चुनावों में ही करारी हार मिली थी.
बसपा की ही तरह समाजवादी पार्टी के साथ भी यही हुआ था. पिछड़ों के बेस वोट के बाद मुसलिमों और अगड़ों को साथ ले कर सपा ने साल 2012 में बहुमत की सरकार बना ली थी.
अखिलेश यादव की युवा इमेज और मुलायम सिंह यादव की संगठन कूवत भी सरकार के समय जातीय बैलैंस साधने में नाकाम रही थी.
इस से अलगअलग जातियों के नेता सपा से नाराज हो गए. सब से ज्यादा परेशानी में अतिपिछड़े और दलित नेता थे. उन को लग रहा था कि अखिलेश सरकार में उन की सुनी नहीं जा रही है. ऐसे में जब 2014 के लोकसभा चुनाव आए तो यह तबका भाजपा के पक्ष में खड़ा हो गया और सपा को करारी हार देखनी पड़ी.
2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने भी अपने कैडर वोट के अलावा दलित और पिछड़ों को पार्टी के साथ जोड़ने में कामयाबी तो हासिल कर ली, पर अब इन को एकसाथ ले कर चलना भारी पड़ रहा है. भाजपा का मुख्य अगड़ा वोट बैंक पार्टी से खुश नहीं है खासकर बनिया और ब्राह्मण तबका.
भाजपा ने बाहरी नेताओं को भी पार्टी में शामिल किया है. ये नेता भाजपा के पुराने नेताओं के साथ सहज भाव से एक नहीं हो पा रहे हैं. इस का खमियाजा पार्टी को आने वाले चुनावों में भुगतना पड़ सकता है.
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