जिसे मरा समझा, वह जिंदा थी

हरियाणा के जिला पानीपत के थाना नगर के मोहल्ला आजादनगर की रहने वाली 20 साल की सिमरन दुबे आर्य डिग्री कालेज में बीए के दूसरे साल में पढ़ रही थी. पढ़ाई के साथसाथ वह एनएसएस (नेशनल सर्विस स्कीम) यानी राष्ट्रीय सेवा योजना की सदस्य भी थी. यह संस्था अपने सदस्यों का कैंप लगवाती है, जिस में समाजसेवा कराई जाती है. इस में जिस लड़के या लड़की का काम अच्छा होता है, उसे कालेज की ओर से प्रमाण पत्र दिया जाता है.

एसडी कालेज का बीए फाइनल ईयर में पढ़ रहा कृष्ण देशवाल एनएसएस का अध्यक्ष था. इसी साल जनवरी महीने में एसडी कालेज का एनएसएस का कैंप आर्य डिग्री कालेज में लगा था. उसी दौरान सिमरन दुबे की मुलाकात कृष्ण देशवाल से हुई तो दोनों में अच्छी जानपहचान हो गई. थाना नगर के ही मोहल्ला बराना की रहने वाली ज्योति भी सिमरन के साथ आर्य डिग्री कालेज में पढ़ती थी. दोनों में पटती भी खूब थी. उस से भी कृष्ण की दोस्ती हो गई थी.

5 सितंबर, 2017 की शाम 4 बजे के करीब सिमरन के मोबाइल फोन की घंटी बजी. उस ने फोन रिसीव किया तो दूसरी ओर से कहा गया, ‘‘हैलो सिमरन, मैं एसडी कालेज से कृष्ण देशवाल बोल रहा हूं, तुम कैसी हो?’’

‘‘नमस्ते सर,’’ चहकते हुए सिमरन ने कहा, ‘‘मैं तो अच्छी हूं सर, आप बताइए आप कैसे हैं?’’

‘‘मैं भी ठीक हूं, यह बताओ कि तुम इस समय क्या कर रही हो?’’

‘‘घर पर हूं सर, कोई काम है क्या? अगर कोई काम हो तो कहिए, मैं आ जाती हूं.’’ सिमरन ने कहा.

‘‘दरअसल, मिलिट्री के कुछ अधिकारी शहर में आ रहे हैं. उन के लिए जीटी रोड पर स्थित गौशाला मंदिर परिसर में कैंप लगाना है. अगर तुम आ जाओ तो मेरा काम काफी आसान हो जाएगा. ज्योति भी आ रही है. कालेज के कुछ अन्य लड़के भी आ रहे हैं.’’

‘‘ठीक है सर, ऐसी बात है तो मैं भी आ जाती हूं.’’

‘‘ओके, मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं.’’ कृष्ण ने कहा और फोन काट दिया.

कृष्ण देशवाल से बात होने के बाद सिमरन जल्दी से तैयार हो कर घर वालों से कालेज जाने की बात कह कर निकल पड़ी. करीब घंटे भर बाद वह कृष्ण द्वारा बताए गौशाला मंदिर पहुंच गई. ज्योति वहां पहले से ही मौजूद थी. उसे देख कर सिमरन का चेहरा खिल उठा.

दोनों सहेलियां एकदूसरे के गले मिलीं और आपस में बातें करने लगीं. दोनों बातें कर रही थीं कि तभी कृष्ण सिमरन के लिए एक गिलास में कोल्डिड्रिंक ले आया. सिमरन ने उन्हें भी पीने को कहा तो दोनों ने एक साथ कहा कि उन्होंने अभीअभी पी है. इस के बाद सिमरन आराम से कोल्डड्रिंक पीने लगी.

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मंदिर के कमरे में लाश

कृष्ण देशवाल, सिमरन दुबे और ज्योति जिस कमरे में ठहरे थे, उस के बगल वाले कमरे में कंप्यूटर सिखाया जाता था. कंप्यूटर सिखाने का यह काम पशुपालन विभाग के उपनिदेशक डा. वाई.डी. त्यागी द्वारा चलाई जा रही एनजीओ के अंतर्गत होता था. कंप्यूटर सिखाने के लिए वंदना को रखा गया था.

जिस कमरे में कृष्ण, ज्योति और सिमरन ठहरे थे, वह अंदर से बंद था. इस से वंदना को थोड़ी हैरानी हो रही थी. उन से नहीं रहा गया तो उन्होंने दरवाजा खटखटाया. करीब 15 मिनट तक दरवाजा खटखटाने के बाद खुला तो उस में से एक लड़का और लड़की बैग लिए बाहर निकले.

दोनों बाहर से कमरा बंद करने लगे तो वंदना ने उन से उन के साथ की एक अन्य लड़की के बारे में पूछा. वे बिना कुछ कहे चले गए तो वंदना ने इस बात की सूचना मंदिर के पुजारी वेदप्रकाश तिवारी को दे दी. वेदप्रकाश को मामला गड़बड़ लगा तो उन्होंने अपने भतीजे अभिनव को हकीकत पता करने के लिए भेजा.

अभिनव हौल से होता हुआ उस कमरे पर पहुंचा, जिसे लड़का और लड़की बाहर से बंद कर गए थे. दरवाजा खोल कर जैसे ही वह अंदर पहुंचा, वहां की हालत देख कर वह चीखता हुआ बाहर आ गया. उस की चीख सुन कर वंदना भी घबरा गई. वह अभिनव के पास पहुंची. उस के पूछने पर अभिनव ने बताया कि कमरे में एक लड़की की लाश पड़ी है.

अब वंदना की समझ में सारा माजरा आ गया. अभिनव ने यह जानकारी पुजारी वेदप्रकाश तिवारी को दी तो उन्होंने पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर दिया. पुलिस कंट्रोल रूम द्वारा यह सूचना थाना चांदनी बाग पुलिस को दे दी गई. सूचना मिलते ही थाना चांदनीबाग के थानाप्रभारी संदीप कुमार पुलिस बल के साथ गौशाला मंदिर पहुंच गए. उन के पहुंचने से पहले पुलिस चौकी किशनपुरा के चौकीप्रभारी वीरेंद्र सिंह वहां पहुंच चुके थे. संदीप कुमार और वीरेंद्र सिंह ने घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया. मृतका के गले पर गला दबाने का स्पष्ट निशान था. इस का मतलब हत्या गला दबा कर की गई थी. उस के चेहरे को तेजाब डाल कर झुलसा दिया गया था. शायद हत्यारे ने पहचान मिटाने के लिए ऐसा किया था.

कमरे में एक लेडीज पर्स मिला.  पुलिस ने उस पर्स की तलाशी ली तो उस में से आर्य डिग्री कालेज का एक आईडी कार्ड मिला, जिस पर ज्योति लिखा था. उस पर पिता का नाम, पता और फोन नंबर भी लिखा था. पिता का नाम रामपाल था. वह थाना नगर के मोहल्ला बराना में रहते थे. एसआई वीरेंद्र सिंह ने फोन कर के रामपाल को वहीं बुला लिया.

रामपाल ने गौशाला मंदिर आ कर कमरे में मिली लाश को देखा तो फफकफफक कर रोने लगे. लाश उन की बेटी ज्योति की थी. शिनाख्त न हो सके, इस के लिए हत्यारों ने तेजाब डाल कर बड़ी बेरहमी से उस के चेहरे को झुलसा दिया था.

घटना की सूचना पा कर एसपी राहुल शर्मा, सीआईए-3 प्रवीण कुमार और डीएसपी जगदीश दूहन भी घटनास्थल पर आ गए थे. घटनास्थल के निरीक्षण के दौरान पुलिस ने देखा कि कमरे में पड़े डबल बैड का गद्दा उठा कर नीचे फर्श पर बिछाया गया था. लाश को उसी पर लिटा कर उस के चेहरे पर तेजाब डाला गया था. तेजाब से मृतका का चेहरा तो बुरी तरह झुलस ही गया था, गद्दा भी काफी दूर तक झुलस गया था.

मृतका की चुनरी और चप्पलें भी वहीं पड़ी थीं. बचाव के लिए मृतका ने हाथपांव चलाए थे, जिस से उस के चश्मे का एक शीशा टूट गया था. पुलिस ने कंप्यूटर की शिक्षा देने वाली वंदना से पूछताछ की तो उस ने बताया था कि शाम 4 बजे वह वहां आई तो कम्युनिटी हौल के दोनो दरवाजे अंदर से बंद थे. करीब 15 मिनट तक दरवाजा खटखटाने के बाद 19-20 साल की एक लड़की ने दरवाजा खोला.

लड़की के साथ एक लड़का भी था. वह हौल के कोने में बने कमरे का दरवाजा बंद कर रहा था. वंदना ने उस के साथ आई दूसरी लड़की के बारे में पूछा तो वह उसे धमका कर लड़की के साथ चला गया. लड़की सलवार सूट पहने थी, जबकि लड़का जींस और टीशर्ट पहने था.

फैल गई सनसनी

लड़के और लड़की के पास बैग थे. उन्होंने एकएक पौलीथीन भी ले रखी थी. लड़के के हाथ में ड्यू (कोल्डड्रिंक) की एक बोतल भी थी. वदंना को शक हुआ तो उस ने अपनी शंका पुजारी को बताई. इस के बाद पुजारी ने अपने भतीजे को भेजा तो कमरे में लाश होने का पता चला. इस तरह लाश बरामद होने से शहर में सनसनी फैल गई थी. क्योंकि गौशाला मदिर अति सुरक्षित माना जाता था. हैरानी की बात यह थी कि दोनों लड़कियों और लड़के के वहां आने की जानकारी पुजारी को नहीं थी. मंदिर में सीसीटीवी कैमरे भी नहीं लगे थे कि उसी से लड़के और लड़की के बारे में कुछ पता चलता.

पुलिस ने कमरे में मिला सारा सामान जब्त कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया था. इस के बाद रामपाल की ओर से हत्या का मुकदमा दर्ज कर के मामले की जांच शुरू कर दी गई थी. पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने ज्योति की लाश उस के पिता रामपाल को सौंप दी तो उन्होंने उस का अंतिम संस्कार कर दिया.

महिला आयोग भी सक्रिय

इस हत्याकांड की सूचना राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य रेखा शर्मा को मिली तो उन्होंने भी घटनास्थल की दौरा किया. वह पुलिस अधिकारियों से भी मिलीं और ज्योति के घर वालों से भी. उन्होंने उन्हें आश्वासन दिया कि पुलिस ने 48 घंटे के अंदर हत्यारे को गिरफ्तार करने का भरोसा दिया है. इस मामले में तेजाब का उपयोग किया गया था. जबकि कोर्ट ने तेजाब की बिक्री पर रोक लगा रखी है. यह भी जांच का विषय था कि रोक के बावजूद हत्यारे को तेजाब मिला कहां से?

अगले दिन पुलिस ने मृतका ज्योति के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस के नंबर पर अंतिम फोन अटावला गांव के रहने वाले राजेंद्र देशवाल के बेटे कृष्ण का आया था. काल लिस्ट देख कर पुलिस हैरान थी. दरअसल, दोनों के बीच 14 से 15 हजार सैकेंड बात की गई थी.

पुलिस तुरंत ज्योति के घर पहुंची और रामपाल से कृष्ण् के बारे में पूछा. उस ने बताया कि कृष्ण ज्योति के कालेज में आताजाता था, दोनों एकदूसरे को जानतेपहचानते थे. उन में अच्छी दोस्ती भी थी.

पुलिस को इस बात पर हैरानी हुई कि कृष्ण ज्योति का अच्छा दोस्त था और उस के घर भी आताजाता था. लेकिन उस की हत्या की बात सुन कर उस के घर नहीं आया था. कहीं ऐसा तो नहीं कि उसी ने ज्योति की हत्या की हो और फरार हो गया हो.

पुलिस को कृष्ण देशवाल पर शक हुआ तो उस के बारे में पता करने उस के घर पहुंच गई. घर वालों से पता चला कि वह 5 सितंबर से ही घर से 1 लाख 35 हजार रुपए ले कर गायब है. इस बात से पुलिस का शक यकीन में बदल गया. पुलिस को लगा कि ज्योति की हत्या में कृष्ण का ही हाथ है. घर वालों से पुलिस को पता चला कि कृष्ण के घर वाले भैंसों के खरीदने और बेचने का व्यवसाय करते थे. वे पैसे उसी के थे, जिन्हें कृष्ण ले कर भागा था.

इस बीच पुलिस को पता चल गया कि उस दिन कृष्ण के साथ जो लड़की थी, वह सिमरन दुबे थी. पुलिस दोनों के फोटो ले कर गौशाला मंदिर पहुंची तो फोटो देख कर वंदना ने बताया कि उस दिन यही दोनों कमरे से निकले थे.

इस से साफ हो गया कि ज्योति की हत्या कृष्ण और सिमरन ने ही की थी. इस के बाद पुलिस ने उन के फोटो अखबारों में छपवा कर उन के बारे में बताने वाले को ईनाम की भी घोषणा कर दी.

पुलिस कृष्ण और सिमरन दुबे की तलाश में जीजान से जुटी थी कि सिमरन के पिता अतुल दुबे थाना नगर पहुंचे और उन्होंने कृष्ण देशवाल के खिलाफ सिमरन के अपहरण की तहरीर दे दी. उन का कहना था कि उन की बेटी के चरित्र पर जो लांछन लगाया गया है, वह सरासर गलत है. सिमरन ऐसी घिनौनी हरकत कतई नहीं कर सकती.

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उन का यह भी कहना था कि उस दिन कमरे में जो लाश मिली थी, वह ज्योति की नहीं, बल्कि सिमरन की थी. लेकिन उन की बात कोई मानने को तैयार नहीं था. उन का कहना था कि मृतका के कान की बाली और हाथ में बंधा धागा सिमरन का नहीं था. इस पर पुलिस का कहना था कि कृष्ण और सिमरन को साथ जाते वंदना ने देखा था, इसलिए उन की बात पर विश्वास नहीं किया जा सकता.

पुलिस पहुंची शिमला

पुलिस कृष्ण और सिमरन की लोकेशन पता कर रही थी. लेकिन फोन बंद होने से उन की लोकेशन नहीं मिल रही थी. जैसे ही फोन चालू हुआ, उन की लोकेशन शिमला की मिल गई. लोकेेशन मिलते ही सीआईए-3 प्रवीण कुमार टीम के साथ शिमला रवाना हो गए. स्थानीय पुलिस की मदद से उन्होंने होटलों की तलाशी शुरू कर दी. सैकड़ों होटल की तलाशी के बाद पुलिस टीम उस होटल तक पहुंच गई, जहां दोनों ठहरे थे.

लेकिन जब होटल की रजिस्टर चैक किया गया तो कृष्ण और सिमरन के नाम से यहां कोई नहीं ठहरा था. पुलिस की निगाह श्याम और राधा नाम के उन दो ग्राहकों पर टिक गई, जिन का पता पानीपत का था.

यहीं दोनों से चूक हो गई थी. उन्होंने होटल के रजिस्टर में नाम तो श्याम और राधा लिखाए थे, लेकिन पता नहीं बदला था. बस इसी से पुलिस को शक हुआ, इस के बाद पुलिस कमरे पर पहुंची तो पुलिस को देख कर दोनों सन्न रह गए. कृष्ण नीचे फर्श पर बैठा था, जबकि ज्योति बैड पर लेटी थी.

मरने वाली ज्योति नहीं सिमरन

जिस ज्योति को लोग मरा समझ रहे थे, दरअसल वह जिंदा थी. मंदिर के कमरे से जो लाश मिली थी, वह ज्योति की नहीं, बल्कि सिमरन दुबे की थी. पुलिस दोनों को गिरफ्तार कर के पानीपत ले आई. उन्हें जब एसपी राहुल शर्मा के सामने पेश किया गया तो वह भी हैरान रह गए.

राहुल शर्मा ने ज्योति के पिता रामपाल को बुला कर ज्योति को उन के सामने खड़ा किया तो बेटी को जिंदा देख कर वह सिर थाम कर बैठ गए. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में कृष्ण और ज्योति ने सिमरन की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद 8 तिसंबर को अदालत में पेश कर के विस्तारपूर्वक पूछताछ एवं सबूत जुटाने के लिए पुलिस ने उन्हें 4 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड के दौरान की गई पूछताछ में सिमरन की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

20 साल की सिमरन दुबे हरियाणा के जिला पानीपत के थाना नगर के मोहल्ला आजादनगर के रहने वाले आलोक दुबे की बेटी थी. वह 4 भाईबहनों में सब से बड़ी थी. वह आर्य डिग्री कालेज में बीए के दूसरे साल में पढ़ रही थी. उसी के साथ थाना नगर के ही बराना की रहने वाली ज्योति भी पढ़ती थी. दोनों पक्की सहेलियां तो थीं ही, एनएसएस की सदस्य भी थीं.

बात इसी साल जनवरी की है. एसडी डिग्री कालेज का एनएसएस का कैंप आर्य डिग्री कालेज में लगा था. कैंप का अध्यक्ष एसडी कालेज में पढ़ने वाला कृष्ण देशवाल था, जो बीए फाइनल ईयर में पढ़ रहा था. वह गांव अटावला का रहने वाला था. उस के पिता राजेंद्र देशवाल भैंसे खरीदनेबेचने का काम करते थे.

कृष्ण 2 बहनों का एकलौता भाई था. बहनें उस से छोटी थीं. घर में बड़ा और एकलौता बेटा होने के बावजूद वह जिम्मेदारी से काम नहीं करता था. पुलिस के अनुसार, जब कृष्ण स्कूल में पढता था, तब उस ने खुद के अपहरण का ड्रामा रचा था. वह दिन भर इधरउधर घूमा करता था. आर्य कालेज में लगे कैंप के दौरान ही उस की मुलाकात सिमरन और ज्योति से हुई थी. पहली ही नजर में ज्योति उस के मासूम चेहरे पर दिल दे बैठी.

कृष्ण ने ज्योति की आंखों से उस के दिल की बात पढ़ ली.  छरहरे बदन और तीखी नयननक्श वाली ज्योति भी उसे भा गई थी. इस के बाद अकसर दोनों की मुलाकातें होने लगीं. जल्दी ही उन की ये मुलाकातें प्यार में बदल गईं.

दोनों एकदूसरे से दीवानगी की हद तक प्यार करने लगे. जल्दी ही हालात यह हो गई कि अब वे एकदूसरे को देखे बिना नहीं रह सकते थे. अब इस का आसान तरीका था, वे शादी कर लें जिस से दोनों एकदूसरे की आंखों के सामने बने रहें.

ज्योति और कृष्ण की जातियां अलगअलग थीं. इसलिए ज्योति जानती थी कि उस के घर वाले कभी भी कृष्ण से उस की शादी नहीं करेंगे.

जबकि वह कृष्ण के बिना रह नहीं सकती थी. यही हाल कृष्ण का भी था. इसलिए उस ने ज्योति से भाग चलने को कहा. लेकिन ज्योति ने उस के साथ इसलिए भागने से मना कर दिया, क्योंकि इस से उस के घर वालों की बदनामी होती.

सहेली को बनाया शिकार

इस के बाद उन्होंने एक साथ रहने के बारे में सोचाविचारा तो उन के दिमाग में आया कि क्यों न वे अपनी कदकाठी के 2 लोगों की हत्या कर के उन के चेहरे तेजाब से इस तरह झुलसा दें कि कोई उन्हें पहचान न पाए. इस के बाद वे उन्हें अपने कपड़े पहना कर अपने आईकार्ड, फोन वगैरह वहां छोड़ देंगे, ताकि लोगों को लगे कि उन की हत्या हो चुकी है.

ज्योति की सहेली सिमरन दुबे उसी की कदकाठी की थी. वे उसे जहां बुलाते, वह वहां आ भी जाती. इसलिए सिमरन की हत्या की योजना बन गई. अब कृष्ण की कदकाठी के लड़के को ढूंढना था.

कृष्ण के लिए यह कोई मुश्किल काम नहीं था. 5 सितंबर को एनएसएस के कैंप के बहाने कृष्ण ने सिमरन और रमेश को फोन कर के गौशाला मंदिर के पहली मंजिल स्थित कमरे पर बुला लिया.

कृष्ण दाढ़ी नहीं रखे था, जबकि रमेश रखे था. इसलिए कृष्ण ने उस से दाढ़ी बनवा कर आने को कहा. लेकिन वह गोहाना मोड़ पर पहुंचा तो वहां कोई सैलून नहीं था, इसलिए उस ने फोन कर के कृष्ण को यह बात बताई तो उस ने उसे आने से मना कर दिया. रमेश वहीं से लौट गया. लेकिन सिमरन कृष्ण और ज्योति के जाल में फंस गई.

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सिमरन दुबे गौशाला मंदिर पहुंची तो कृष्ण और ज्योति वहां पहले से ही मौजूद थे. ज्योति को देख कर सिमरन बहुत खुश हुई. उस ने यह खुशी उस के गले मिल कर जाहिर की. गौशाला मंदिर पहुंचने से पहले ही कृष्ण ने कोल्डड्रिंक, नींद की गोलियां और तेजाब की व्यवस्था कर रखी थी. इन्हें वह अपने साथ लाए बैग में छिपा कर लाया था.

नींद की गोली मिली कोल्डड्रिंक पिलाई

कृष्ण ने सिमरन को नींद की गोलियां मिली कोल्डड्रिंक पीने को दी तो उस ने उन से भी कोल्डड्रिंक पीने को कहा. दोनों ने कहा कि उन्होंने अभीअभी पी है. कोल्डिड्रिंक पीने के कुछ देर बाद सिमरन की आंखें मुंदने लगीं. फिर वह बेहोश सी हो कर नीचे फर्श पर लेट गई. इस के बाद ज्योति ने उस के दोनों पैर पकड़ लिए तो कृष्ण ने उस का गला घोंट दिया.

इस तरह सिमरन को मौत के घाट उतार कर ज्योति ने उसे अपने कपड़े पहना दिए और उस के चेहरे पर तेजाब डाल कर झुलसा दिया. वह ज्योति है, यह साबित करने के लिए उस ने अपना आईकार्ड और मोबाइल फोन उस के पास छोड़ दिया, ताकि लोग इसे ज्योति समझें.

सिमरन की हत्या करने के बाद ज्योति और कृष्ण कमरे से बाहर आए और औटो से पानीपत रेलवे स्टेशन पहुंचे. उस समय वहां कोई टे्रन नहीं थी, इसलिए वे बसस्टैंड गए. वहां से चंडीगढ़ की बस पकड़ कर वे अगले दिन जीरकपुर पहुंच गए. अगले दिन अखबार में ज्योति की हत्या का समाचार छपा तो दोनों निश्चिंत हो गए कि हत्या का शक सिमरन पर किया जाएगा.

उन्होंने आराम से जीरकपुर के एक मौल में शौपिंग की और शिमला जा कर बसस्टैंड के नजदीक होटल रौयल में कमरा ले कर ठहर गए.

पुलिस उन के पीछे पड़ी है, इस का अंदाजा उन्हें बिलकुल नहीं था. पुलिस ने उन की तलाश में शिमला में 2 घंटे में सैकड़ों होटल छान मारे थे. जब पुलिस रौयल होटल में पहुंची तो पुलिस को देख कर सारा स्टाफ भाग गया. पुलिस को कमरा नंबर भी पता नहीं था. आखिर आधे घंटे की मशक्कत के बाद एक कमरे का दरवाजा तोड़ा गया तो अंदर कृष्ण और ज्योति मिले.

ज्योति के जिंदा बरामद होने के बाद सिमरन के घर वाले बेटी की हत्या के शोक में डूब गए थे. जबकि आलोक दुबे घटना वाले दिन से ही कह रहे थे कि मरने वाली ज्योति नहीं, उन की बेटी सिमरन है. लेकिन कोई उन की बात मानने को तैयार नहीं था.

ज्योति के जिंदा बरामद होने के बाद पुलिस आलोक दुबे और उन की पत्नी ऊषा को मधुबन ले गई, जहां डीएनए टेस्ट के लिए सैंपल लिए गए. रिपोर्ट आने के बाद निश्चित हो जाएगा कि गौशाला मंदिर के कमरे में मिली लाश सिमरन की ही थी.

पुलिस की लापरवाही

सिमरन हत्याकांड के आरोपियों को पकड़ कर पुलिस भले ही अपनी पीठ थपथपा रही हो, लेकिन इस में पुलिस की लापरवाही भी नजर आ रही है. शिमला के होटल में आईडी के रूप में कृष्ण और ज्योति ने अपने आधार कार्ड जमा कराए थे, वे आधार कार्ड श्याम और राधा के नाम से थे. साफ था कि वे फर्जी थे.

पुलिस ने जब कृष्ण से उन के बारे में पूछताछ की तो उस ने बताया कि आधार कार्ड उस के दोस्त देव कपूर ने जयपुर से बनवाए था. पुलिस ने उसे भी गिरफ्तार कर लिया है. अब पुलिस आधार कार्ड बनाने वाले को गिरफ्तार करना चाहती है.

पुलिस सिमरन का मोबाइल फोन बरामद करना चाहती है, जिस के बारे में कृष्ण और ज्योति कभी कहते हैं कि शिमला में झाडि़यों में फेंक दिया है तो कभी कहते हैं कि रास्ते में फेंक दिया था. इस के अलावा यह भी पता लगाया जा रहा है कि उन्होंने तेजाब और नींद की गोलियां कहां से खरीदी थीं.

इन के बारे में उन का कहना है कि तेजाब गुंड़मंडी से लिया था, जबकि नींद की गोलियां अपने एक रिश्तेदार के मैडिकल स्टोर से मंगवाई थीं.

रिमांड खत्म होने के बाद पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

प्रेम की अंधी गली में फंस कर ज्योति और कृष्ण ने जो कदम उठाया, आखिर उस से उन्हें क्या मिला. उन्होंने जो अपराध किया है, वे कानून की नजरों से बच नहीं पाएंगे. लेकिन अगर बच भी गए तो शायद ही समाज उन्हें सुकून से रहने दे.

VIDEO : कार्टून लिटिल टेडी बियर नेल आर्ट

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बेरोजगारी : छोटे ओहदों के लिए बड़ी मारामारी

28 जनवरी, 2018 को मध्य प्रदेश के मुरैना जिले की जिला अदालत में 8 हजार से भी ज्यादा नौजवानों का हुजूम इकट्ठा था. वहां बड़े पदों की भरती नहीं होनी थी, बल्कि ड्राइवर और चपरासी जैसे छोटे पदों के लिए भरती थी. इस के बावजूद ज्यादातर उम्मीदवार ग्रेजुएट या फिर पोस्ट ग्रेजुएट थे.

खाली पदों की तादाद महज 22 थी, पर जब 8 हजार नौजवान वहां आ गए तो अफरातफरी सी मच गई. दस्तावेजों की जांच में ही अफसरों का पूरा दिन गुजर गया.

इसी 28 जनवरी को यही हालत विदिशा जिले की अदालत में भी थी. वहां 52 पदों के लिए तकरीबन 7 हजार बेरोजगार लाइन में थे. खाली पद ड्राइवर, माली और जल वाहक के थे.

भीड़ उमड़ी तो उसे संभालने के लिए प्रशासन को अच्छीखासी मशक्कत करनी पड़ी. इस भीड़ में भी ज्यादातर बेरोजगारों के हाथों में बड़ीबड़ी डिगरियां थीं.

इसी दिन गुना जिले की अदालत में भी हजारों बेरोजगार लाइन लगाए खड़े थे. वहां भी भरती चपरासी, माली और ड्राइवर जैसे छोटे पदों के लिए होनी थी, जिन के लिए काबिलीयत 8वीं पास रखी गई थी, पर तकरीबन 70 फीसदी उम्मीदवार 12वीं जमात पास, ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट थे. दस्तावेजों की जांच और इंटरव्यू के लिए 6 जजों की ड्यूटी लगाई गई थी.

बदतर होते हालात

14 जनवरी, 2018 को ग्वालियर जिला अदालत में चपरासी के पद की 57 भरतियों के लिए तकरीबन 60 हजार उम्मीदवार लाइन लगा कर खड़े थे.

चपरासी की तनख्वाह महज साढ़े 7 हजार रुपए महीना होती है जिस के लिए इंजीनियरिंग, एमबीए और पीएचडी किए हुए नौजवान भी आए थे.

60 हजार अर्जियां देख कर इंटरव्यू लेने आए जज भी चकराए हुए थे. बढ़ती भीड़ और मचती अफरातफरी देख कर आखिरकार यह तय किया गया कि अब 14 जज 16 दिनों तक इंटरव्यू लेंगे. अर्जी की फीस से ही सरकार को एक करोड़, 20 लाख रुपए मिले थे.

मध्य प्रदेश में ही उस वक्त सनाका खिंच गया था जब सरकार ने पटवारी के 9,218 पद निकाले थे. इन पदों पर भरती के लिए रिकौर्ड 12 लाख बेरोजगारों ने फार्म भरे थे, जिन में पीएचडी किए हुए उम्मीदवारों की भी अच्छीखासी तादाद थी. लड़कियों ने भी खूब फार्म भरे थे.

इस पद के 5 लाख रुपए में फार्म बिकने की अफवाह भी उड़ी थी. कहा यह भी गया था कि मध्य प्रदेश की सरकार ने विधानसभा चुनावों के लिए तगड़े पैसों का इंतजाम कर लिया है.

हर जगह यही हाल

एक अंदाजे के मुताबिक, बेरोजगारी के लिए बदनाम बिहार में सब से ज्यादा 3 करोड़ बेरोजगार हैं. हालत तो यह है कि पिछले साल अक्तूबर महीने में जब पटना और उस के आसपास के इलाकों के लिए राशन की कुछ दुकानों के लिए अर्जियां मंगाई गई थीं तो उन में सौ से ज्यादा ग्रेजुएट और तकरीबन 20 पोस्ट ग्रेजुएट उम्मीदवार थे. कुछ पीएचडी किए नौजवान भी राशन की दुकान चलाने के लिए लाइन में लगे देखे गए.

राशन की दुकान कोई स्थायी रोजगार नहीं है, इस के बाद भी अच्छेखासे पढ़ेलिखे बेरोजगार भी इस के लिए भागादौड़ी करते दिखे तो समझा जा सकता है कि हालात कितने बदतर हो चुके हैं.

फरवरी महीने के तीसरे हफ्ते में रोजगार न मिलने से गुस्साए नौजवानों ने जबरदस्त प्रदर्शन कर अपनी भड़ास निकाली थी. आरा में प्रदर्शनकारी बेरोजगारों ने ट्रेनें रोक दी थीं. उन के हाथ में तख्तियां थीं जिन पर लिखा था कि वे पकौड़े नहीं बेचेंगे.

इन बेरोजगार नौजवानों का आरोप यह था कि केंद्र और राज्य सरकार के सेवा क्षेत्रों में नौकरियों की तादाद लगातार घट रही है.

ये नौजवान इम्तिहान की फीस में बढ़ोतरी और नौकरियों में आयु सीमा घटाने पर भी भड़के हुए थे.

हाल ही में रेलवे द्वारा निकाली गई बंपर नौकरियों से नौजवानों को उम्मीद बंधी थी लेकिन ऐजूकेशन क्वालिफिकेशन के नाम पर आईटीआई अनिवार्य किए जाने और नौकरियों में उम्र की सीमा घटाए जाने पर बेरोजगारों ने जो उग्र प्रदर्शन किया तो हालात काबू में करने के लिए पुलिस को हवाई फायरिंग तक करनी पड़ी थी.

उत्तर प्रदेश में भी बेरोजगार ‘करो या मरो’ के मूड में आ गए हैं. आंकड़ों के नजरिए से देखें तो बिहार के बाद सब से ज्यादा 1 करोड़, 30 लाख बेरोजगार उत्तर प्रदेश में हैं.

राज्य में बेरोजगारी की दर 8 फीसदी के आंकड़े को छूने जा रही है, जबकि बेरोजगारी का राष्ट्रीय औसत 5 फीसदी है यानी दूसरे राज्यों के मुकाबले उत्तर प्रदेश में 3 फीसदी ज्यादा बेरोजगार हैं.

साल 2016 में इस राज्य में प्रति 1000 नौजवानों में से 58 नौजवान बेरोजगार थे जबकि इस का राष्ट्रीय औसत 37 है. श्रम मंत्रालय के आंकड़े भी हकीकत बयां करते हैं, जो मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में 18 से 29 साल की उम्र वाले बेरोजगार नौजवानों की तादाद प्रति 1000 पर 148 है.

अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी की सरकार के वक्त हालत यह थी कि मध्य प्रदेश की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी चपरासी जैसी छोटी नौकरी के लिए पीएचडी किए हुए नौजवान भी लाइन में लगे थे.

आंकड़ा मध्य प्रदेश से भी ज्यादा शर्मनाक था जब चपरासी के महज 368 पदों के लिए तकरीबन 23 लाख से ज्यादा नौजवानों ने फार्म भरे थे. इन में 2 सौ से ज्यादा पीएचडी किए हुए थे.

चपरासी के जिस पद के लिए ऐजूकेशन क्वालिफिकेशन 5वीं पास चाहिए होती है उस के लिए लाखों ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट के अलावा टैक्निकल डिगरीधारी भी शामिल थे.

हालत यह थी कि अगर इंटरव्यू लेने के लिए 10 बोर्ड भी बनाए जाते तो पूरी प्रक्रिया में 4 साल से भी ज्यादा का वक्त लग जाता. बवंडर मचा तो इस मामले के लिए बनाई गई जांच कमेटी ने चपरासी पद की भरती ही रद्द कर दी थी.

यह मामला अखिलेश सरकार को कितना महंगा पड़ा था, विधानसभा चुनाव के नतीजे इस के सुबूत थे, लेकिन भाजपा सरकार भी हालात संभाल नहीं पा रही है.

बेरोजगारों का ध्यान बंटाने के लिए योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश यादव द्वारा दिया जाने वाला बेरोजगारी भत्ता तो जारी रखा ही, साथ ही नया शिगूफा प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का वे ले आए हैं, जिस के नाम पर जगहजगह रोजगार मेले लगाए जा रहे हैं. इन मेलों में बेरोजगारों की उमड़ती भीड़ राज्य सरकार से संभल नहीं पा रही है.

सरकार की नई दिक्कत यह है कि बेरोजगारों को यह समझ आने लगा है कि कौशल विकास जैसी योजनाएं बेवकूफ बनाए रखने का नया तरीका हैं. साढ़े 7 लाख नौकरियों का वादा वैसा ही खोखला साबित हो रहा है, जैसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक करोड़ नौकरियां देने का हुआ है.

बेरोजगारों ने राज्य में जगहजगह पकौड़े बेच कर अपना विरोध दर्ज कराया तो योगी आदित्यनाथ चौकन्ने हो उठे हैं और इन्वैस्टर्स मीट और स्किल डेवलपमैंट का झुनझुना ले कर नौजवानों को बरगला रहे हैं.

कौशल विकास योजना की पोल भी खुलने लगी है. राजस्थान में तकरीबन 20 लाख नौजवान कौशल विकास योजना से फायदा उठाने के बाद भी नौकरी की तलाश में दरदर भटक रहे हैं. अंदाजा है कि राजस्थान में कुल 60 लाख से भी ज्यादा बेरोजगार हैं.

राजस्थान एकीकृत बेरोजगार महासंघ के अध्यक्ष उपेन यादव की मानें तो राज्य में सरकारी नौकरियां निकल ही नहीं रही हैं. राज्य सरकार नौजवानों को टैक्निकल ट्रेनिंग देने की बात तो कर रही है, पर उन्हें रोजगार मुहैया नहीं करा पा रही है.

बात सच भी है क्योंकि अकेले विद्युत निगम में ही 8 हजार तकनीकी पद खाली पड़े हैं. ठेके पर काम कर रहा विद्युत निगम नौकरियां नहीं निकाल रहा है. राज्य के सार्वजनिक निर्माण विभाग ने साल 2013 से तकनीकी पदों की नौकरियां नहीं निकाली हैं.

राज्य में बेरोजगारों के कई संगठन बन कर नौकरियों और रोजगार के अपने हक की लड़ाई लड़ने लगे हैं. बेरोजगारों का गुस्सा पहले नोटबंदी को ले कर था जो अब मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की नाकामी पर फूटने लगा है.

हाल ही में अलवर और अजमेर के लोकसभा उपचुनावों में राजस्थान बेरोजगार संघ भी कूदा था. उस के निशाने पर वसुंधरा राजे थीं जिन्होंने 15 लाख बेरोजगारों को रोजगार देने का वादा किया था लेकिन राज्य के 8 फीसदी नौजवानों को भी रोजगार के बाबत बैंक कर्ज नहीं मिला जिस का खमियाजा उपचुनावों में भाजपा को हार कर भुगतना भी पड़ा था.

छोटी नौकरी पर रुझान

यह शर्म और चिंता की बात है कि देश के बहुत से नौजवान ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट, एमबीए और पीएचडी करने के बाद भी छोटे ओहदों के लिए लाइन में खड़े नजर आए. केंद्र सरकार ही इस हालत की जिम्मेदार है.

साल 2018-19 के सालाना बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली रोजगार के बाबत कुछ खास भरोसा नहीं दे पाए हैं और दुनियाभर की एजेंसियों के आंकड़े भी चिंता जता रहे हैं कि इस साल भी बेरोजगारी बजाय कम होने के और बढ़ेगी तो तय है कि रोजगार देने के मोरचे पर सरकार नाकाम रही है.

चायपकौड़ा बेचना तो फिर भी एक बेहतर काम है, लेकिन अगर कोई पोस्ट ग्रेजुएट या पीएचडी वाला बगीचे में घास खोदता नजर आए या फिर खुद से कम पढ़ेलिखे बाबुओं और साहबों की मेज साफ करे, दफ्तर में झाड़ू लगाए और उन्हें पानी पिलाता नजर आए तो यह बात फख्र की नहीं है. मगर सालोंसाल पढ़ाई कर के डिगरी हासिल करने के बाद भी चपरासी, माली या ड्राइवर की नौकरी ही करनी है तो ऐसी डिगरी से फायदा क्या?

बेरोजगार सेना के तेवर

जबजब बेरोजगारी हद से ज्यादा बढ़ती है, तबतब बेरोजगार संगठन बना कर अपना विरोध जताते रहे हैं. भोपाल के अक्षय हुंका नाम के नौजवान ने बेराजेगार सेना बनाई तो देखते ही देखते उस के सदस्यों की तादाद लाखों तक पहुंच गई.

अक्षय हुंका कहते हैं कि सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती बेरोजगारी किसी सुबूत की मुहताज नहीं है. इस में पढ़ेलिखे नौजवानों की भागीदारी 88 फीसदी है. अव्वल तो सरकार के पास बेरोजगारी का आंकड़ा न होना ही अचंभे की बात है, ऐसे में राज्य के डेढ़ करोड़ नौजवान क्या खा कर सरकार से उम्मीद रखें.

मध्य प्रदेश के अलगअलग रोजगार दफ्तरों के आंकड़ों पर नजर डालें तो यह जान कर हैरानी होती है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बेरोजगारी 53 फीसदी बढ़ी है. राज्य में दिसंबर, 2015 में रजिस्टर्ड पढ़ेलिखे बेरोजगारों की तादाद 15 लाख, 60 हजार थी, जो साल 2017 के आखिर तक 24 लाख का आंकड़ा छू रही है.

बेरोजगार सेना की खास मांग यह है कि सरकार मनरेगा की तरह पढ़ेलिखे नौजवानों के लिए रोजगार गारंटी कानून बनाए. इस सेना में ऐसे नौजवानों की भरमार है जिन्होंने अच्छी नौकरी मिलने के लालच में 2-3 डिगरियां और डिप्लोमा ले रखे हैं पर उन्हें माली, ड्राइवर या चपरासी तक की भी नौकरी नहीं मिल रही है.

भोपाल की 26 साला अनुप्रिया सिंह ने बीई करने के बाद एमबीए किया पर उन्हें नौकरी नहीं मिली. पटवारी के पद के लिए भी अनुप्रिया सिंह ने कोशिश की थी पर वहां भी बात बनती नजर नहीं आ रही है.

अच्छेखासे घर की अनुप्रिया सिंह की चिंता यह है कि आजकल के लड़के बेरोजगार लड़की से शादी करना पसंद नहीं करते. सभी को कामकाजी बीवी चाहिए, जिस से घर ठीकठाक तरीके से चल सके.

भोपाल के ही एमपी नगर इलाके के एक शोरूम में काम करने वाले 26 साला आदित्य के पास भी 2 डिगरियां हैं.

12 हजार महीने की तनख्वाह पर काम करने वाले आदित्य का रोना यह है कि समाज और रिश्तेदारी में उस की तालीम को ले कर ताने मारे जाते हैं. बड़ी तो बड़ी चपरासी जैसी छोटी नौकरी भी उसे नहीं मिल पा रही है.

आदित्य और अनुप्रिया सिंह जैसे लाखों नौजवान सरकारी नौकरी ही क्यों चाहते हैं? इस का जवाब साफ है कि सरकारी नौकरी परमानैंट होती है. इस में 14-15 साल बाद इतनी तनख्वाह तो मिलने लगती है कि जिंदगी सुकून से गुजरे.

क्या हुआ तेरा वादा

बेरोजगारों के लिए सरकार नौकरियां कहां से लाए? इस सवाल पर झल्लाए अक्षय हुंका कहते हैं, ‘‘हम एक हद तक इस बात से इत्तिफाक रखते हैं, पर मध्य प्रदेश सरकार के पास ढाई लाख पद खाली पड़े हैं, वे तो वह भर ही सकती है. नोटबंदी और जीएसटी के फैसले रोजगार कम होने की वजह हैं जिन के चलते कई प्राइवेट कंपनियों, कारखानों और फैक्टरियों को मजबूरी में मुलाजिमों की छंटनी करनी पड़ रही है.

‘‘बेरोजगारों को उद्योगधंधों या अपने कारोबार के बाबत लोन देने की बातें भी झुनझुना साबित हो रही हैं.’’

विदिशा के निरंजन सिंह कहते हैं कि उन्होंने साल 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को जातपांत, धर्म या हिंदुत्व की वजह से नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी के इस वादे पर वोट दिया था कि वे हर साल एक करोड़ नौकरियां देने का इंतजाम करेंगे.

निरंजन सिंह नरेंद्र मोदी को फेल बताते हुए कहते हैं कि अब भाजपा को खमियाजा भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए. बेरोजगार नौजवान गुस्से में हैं, क्योंकि नोटबंदी के फैसले से प्राइवेट नौकरियों के मौके भी उन से छिने हैं.

यह सोचना भाजपा की गलतफहमी ही साबित होगी कि मंदिरमसजिद या धर्मकर्म के नाम पर उसे वोट मिल जाएंगे. काठ की हांड़ी एक दफा ही चूल्हे पर चढ़ती है.

यह शिकायत या भड़ास किसी एक की नहीं, बल्कि देश के करोड़ों नौजवानों की है जिस से बच पाना भाजपा के लिए बहुत मुश्किल साबित होगा.

सच तो यह है कि जिस देश में एमए, बीई और पीएचडी किए हुए नौजवानों तक को चपरासी, माली, ड्राइवर और पटवारी की नौकरी के लिए एडि़यां रगड़नी पड़ती हों, वह क्या खा कर साल 2024 तक विश्वगुरु बनने की बात करता है.

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न्यूड मौडल : आसान नहीं राह

आर्ट कालेज में चित्रकला के पाठ्यक्रम का एक महत्त्वपूर्ण विषय है न्यूड स्टडी. मानव शरीर की पेंटिंग या स्कैच बनाने के लिए शरीर की तमाम बारीकियों को जानना जरूरी है. महिला और पुरुष के शरीर के तमाम उतार चढ़ाव, उस का गठन, अलग अलग होते हैं. आर्ट कालेज में गठनगत बारीकियों का अध्ययन लाइफ स्टडी कहलाता है. इस के अलावा अलगअलग शारीरिक भावभंगिमाओं का भी अध्ययन लाइफ स्टडी या न्यूड स्टडी में शामिल है. इस के लिए आमतौर पर एक जीतेजागते नग्न पुरुष या नग्न महिला मौडल की मदद ली जाती है. तब न्यूड स्टडी होती है.

एक समय था जब लाइफ  स्टडी के लिए मौडल मिलने मुश्किल हुआ करते थे. अब इस पेशे में जो भी लड़कियां या औरतें आती हैं, वे परिवार और समाज से छिप कर आती हैं और आमतौर पर गरीब घरों से होती हैं. ये मजबूरी में पेशे में आती हैं. कोलकाता आर्ट कालेज में बतौर न्यूड मौडल काम करने वाली कुछ गिनीचुनी ही मौडल हैं.

लतिका कर्मकार (बदला हुआ नाम) कोलकाता के चित्रकारों के लिए न्यूड पोज देने वाली मौडल है. वह एक निजी कंपनी में चायपानी पिलाने का काम करती है. कभीकभार कोलकाता के कुछ चित्रकारों के लिए न्यूड पोज भी देती है. पर यह काम लतिका किसी छुट्टी वाले दिन ‘प्राइवेटली’ ही करती है. वह बताती

है कि मौडलिंग की एक सिटिंग में उसे 1,000-5,000 रुपए मिल जाते हैं. उस के घर पर माता पिता के साथ उस की एक बेटी है. उस का पति 5 महीने की बेटी के साथ उसे छोड़ कर जा चुका है. पिता निजी कंपनी के दफ्तर में चपरासी थे. अब रिटायर्ड हैं. अपना और अपनी बेटी का खर्च चलाने के लिए वह एक निजी कंपनी में काम करती है. किसी पेंटर के आमंत्रण पर वह न्यूड पोज देती है.

बीना पुरकायस्त (बदला हुआ नाम) भी एक न्यूड मौडल है. और इस काम का उसे बहुत लंबा अनुभव है. 19 साल की उम्र से वह न्यूड पोज देती आ रही है. इस पेशे में उसे 23 साल हो गए हैं. बंगाल के कई नामी गिरामी पेंटरों के लिए उस ने न्यूड पोज दिए हैं. बीना का मानना है कि यह काम बहुत कठिन होता है. कई बार एक जैसे पोज में बैठे रहने पर पैर सुन्न हो जाते हैं. आमतौर पर पेंटर मौडल को बीच बीच में 15 मिनट का ब्रैक देते हैं.

वह बताती है कि कई बार आर्टिस्ट अपने काम में कुछ इतने मगन हो जाते हैं कि उन्हें ध्यान ही नहीं रहता कि एक जीता जागता इंसान एक ही भाव भंगिमा में कितनी देर तक बैठे रह सकता है. वहीं, वह यह भी बताती है कि अगर पोज देते हुए मौडल सकुचाए, शर्माए, हिलती डुलती रहे तो ऐसी मौडलों को अगली बार काम मिलने में परेशानी होती है. कभी कभी आर्टिस्ट की सहूलियत के अनुसार मौडल को बार बार पोज बदलना भी पड़ता है. वह बताती है कि आजकल एस्कौर्ट के पेशे में आई लड़कियां भी न्यूड पोज देने को तैयार हो जाती हैं. लेकिन इस के लिए वे मोटा मेहताना वसूलती हैं. इसीलिए, आम न्यूड मौडल की अब भी मांग है.

कोलकाता के जाने माने आर्टिस्ट जोगेन चौधरी कहते हैं कि हमारे देश में न्यूड स्टडी का चलन यूरोपीय पेंटिंग के प्रभाव में शुरू हुआ. वे कहते हैं, ‘‘मजेदार बात यह है कि हमारे देश में जब किसी पुरुष मौडल को न्यूड स्टडी के लिए बुलाया जाता है तो वह पूरी तरह से निर्वस्त्र नहीं होता है.’’ महिला मौडल को ज्यादातर न्यूड पोज देना होता है, ऐसा क्यों? उन का कहना है कि कला और नारीदेह सौंदर्य की दृष्टि से न्यूड पुरुष मौडल की अपेक्षा महिला मौडल कहीं अधिक उपयुक्त मानी जाती हैं.

आर्ट कालेज में अपने पहली लाइफ स्टडी के बारे में बताते हुए जोगेन चौधुरी अपनी फाइन आर्ट के तीसरे वर्ष की छात्रा वस्था के दिनों में लौट जाते हैं. ‘न्यूड स्टडी की वह पहली क्लास थी. बहुत तनाव में थे सारे छात्र. क्लास में एक दुबली पतली 14-15 साल की मौडल आई. क्लास के बाहर उस के माता पिता बैठे थे. हमारे प्रोफैसर थे देवकुमार राय चौधुरी, लाइफ स्टडी के विशेषज्ञ. हाल ही में इटली से लौटे थे. क्लास में केवल प्रोफैसर ही मौडल के बदन को हाथ लगा सकते थे. लड़की के बदन को छू कर प्रोफैसर ने उस के पोज को ठीक किया.’

जोगेन बताते हैं कि मौडल की मनोस्थिति को वे बखूबी समझ रहे थे. इसीलिए उन्हें उस की चिंता भी हो रही थी कि इतने सारे लड़कों के सामने बेचारी मौडल कैसे न्यूड बैठेगी? कितनी देर तक बैठना होगा? मन ही मन उस के प्रति बड़ी सहानुभूति हो रही थी. पर किया कुछ नहीं जा सका. 5 सालों के पाठ्यक्रम में बीच बीच में लाइफ  स्टडी चलती रही.

वे यह भी बताते हैं कि उस समय मौडल मिलना बहुत मुश्किल होता था. ज्यादातर बदनाम गलियों की लड़कियां या औरतें इस काम के लिए उपलब्ध हो पाती थीं. गौरतलब है कि जोगेन चौधुरी की एक विख्यात लाइफ  स्टडी है – सुंदरी. यह पेंटिंग ललित कला अकादमी से प्रकाशित हुई थी. पर आज यह आउट औफ  प्रिंट है. बंगाल के बहुत सारे पेंटर न्यूड स्टडी में महारत प्राप्त हैं. उन की न्यूड स्टडी की शैली भी अलगअलग हैं. प्रकाश कर्मकार ‘इरोटिक’ न्यूड पेंटिंग के लिए जाने जाते हैं तो परितोष सेन क्युबिस्टिक शैली के लिए.

एलिना बनिक कोलकाता की जानी मानी पेंटर हैं. आर्ट कालेज में अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहती हैं कि यह उन दिनों की बात थी जब उन्होंने स्कूल से सीधे आर्ट कालेज में दाखिला लिया था. लाइफ  स्टडी की क्लास में महिला और पुरुष मौडल के बीच होने वाले भेदभाव को ले कर वे अकसर मुखर हो जाया करती थीं.

वे कहती हैं कि पुरुषदेह के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था. समझ भी नहीं थी. लेकिन एक बार बहस के दौरान सहपाठी मित्र ने आ कर कान में झल्लाते हुए कहा कि पुरुष मौडल पूरी तरह से न्यूड नहीं हो सकता है. अरे, पुरुषांग कभी भी हिलडुल सकता है. एलिना को बात समझ नहीं आई और वे अपनी बात पर अड़ी रहीं कि महिला मौडल की तरह पुरुष मौडल को भी पूरी तरह से न्यूड रहना होगा और वह दिन तकरार में ही बीत गया. आज इस बात को याद कर के वे मुसकरा देती हैं.

बहरहाल, यह तो हुई लाइफ स्टडी में एक महिला पेंटर के सामने आने वाली दिक्कतों की बात. इसी तरह महिला मौडल भी कई तरह की परेशानियों से जूझती हैं. यहां कुछेक घटनाओं का जिक्र जरूरी समझती हूं ताकि समझा जा सके कि ये मौडल किस तरह की विपरीत परिस्थितियों में काम करती हैं.

नारीदेह की समस्याएं

कोलकाता आर्ट कालेज. एक बड़े कमरे में बहुत सारे आर्ट स्टूडैंट्स अपनेअपने कैनवस के साथ तैयार बैठे हैं. यह क्लास न्यूड स्टडी की है. क्लास में केवल एक स्टूडैंट लड़की के अलावा बाकी सभी लड़के हैं. क्लास चालू है. क्लास में एक नग्न महिला एक खास भावभंगिमा में बैठी है. उसे देखदेख कर स्टडी करने के साथ स्केचिंग की क्लास जारी है. अचानक क्लास में मौजूद लड़की ने देखा कि मौडल के लिए अपनी भावभंगिमा के साथ बुत बन कर बैठे रहना संभव नहीं हो पा रहा है. वह कुछ कुछ सकुचा सी रही है, सिमटती चली जा रही है.

आमतौर पर स्टडी क्लास में नियमानुसार मौडल को बुत बन कर बैठे रहना होता है. कहीं कुछ तो था कि मौडल सामान्य आचरण नहीं कर पा रही थी. और उस के सकुचाने सिमटने से क्लास में बैठे स्टूडैंट्स एक हद तक परेशान व नाराज हो रहे थे. पर मौडल थी कि बारबार भावभंगिमा से डिगती चली जा रही थी. ऐसे में तमाम स्टूडैंट्स के साथ क्लास में बैठी लड़की उठती है और मौडल के पास जाती है. कुछ देर मौडल के साथ फुसफुसाने के बाद वह लौट कर आती

है और क्लास के तमाम स्टूडैंट्स से मुखातिब हो कर कहती है, ‘तुम लोग जरा क्लास से बाहर जाओ.’

क्लास के स्टूडैंट्स भौचक रह जाते हैं और कुछ तो झल्ला तक जाते हैं. ‘क्यों, अब क्या हुआ? पहले ही इतना समय बरबाद हो चुका है.’

क्लास की वह स्टूडैंट बौखला कर अपने साथी स्टूडैंट को डपटते हुए कहती है, ‘मैं ने कहा, तुम लोग अभी क्लास से बाहर जाओ, तो बाहर जाओ, बिना बहस किए.’ धीरे धीरे क्लास खाली हो गई. इस के बाद उस लड़की ने क्लास का दरवाजा बंद किया.

दरअसल, निर्वस्त्र मौडल का अचानक पीरियड शुरू हो गया था. और ऐसे में वह अपनी लज्जा को भला कैसे ढकती. वहीं, क्लास में मौजूद इतनी सारी निगाहें केवल उस पर और उसी पर टिकी हुई थीं. इस कारण वह अपनी भावभंगिमा के साथ बुत बन कर बैठी नहीं रह पा रही थी. जाहिर है, उस दिन न्यूड स्टडी की क्लास नहीं हुई. मौडल अपने घर लौट गई.

मुश्किलभरा पेशा

एक न्यूड मौडल को अपने पेशे के लिए काम करते हुए क्या क्या नहीं करना पड़ता है. वाकया ऋतुपर्णो घोष की फिल्म ‘चोखेर बाली’ का भी है. कहानी की मांग पर शूटिंग के दौरान एक न्यूड मौडल की जरूरत पड़ी. दरअसल, फिल्म का सहनायक महेंद्र डाक्टरी पढ़ रहा था. एनोटौमी के क्लास का एक दृश्य था, जिस में एक मृतक महिला को टेबल पर सोना था. फिल्म के सहयोगी कला निर्देशक को एक न्यूड मौडल की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी दी गई. एक मौडल मिली, पर इस शर्त पर कि फिल्म में किसी भी सूरत में उस का चेहरा न दिखाया जाए और वह मौडल थी कांचन मित्रा (बदला हुआ नाम). कांचन कहती है कि मृत शरीर यानी मृतक को मेकअप की कोई जरूरत नहीं थी लेकिन एनोटौमी की क्लास दिखानी थी तो मौडल के लिए मृतक का मेकअप जरूरी था. मृत दिखाने के लिए मौडल के शरीर का मेकअप करवाया गया. यह मौडल के लिए सब से कठिन काम था. वहीं, फिल्म में लाइट की एक अहम भूमिका होती है. किस एंगल से कितनी रोशनी मृतक के शरीर पर पड़नी चाहिए, ताकि फिल्मांकन अच्छा हो, इस की जांच के लिए मौडल को बार बार मेकअप कर के एनोटौमी टेबल पर सोना जरूरी था. उस के नग्न शरीर को बार बार टचअप करना जरूरी हो जाता था. जाहिर है न्यूड मौडल को बहुत परेशानी पेश आ रही थी.

कांचन को 4 बजे घर जाना था. लेकिन शूटिंग अभी पूरी नहीं हुई थी. और उस के बेटे के स्कूल से आने का समय हो रहा था. कांचन ने सोचा था कि मृत शरीर की शूटिंग होनी है, इस में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा पर सुबह से ले कर 4 बज गए. ऋतुपर्णो घोष को जब पता चला कि मौडल घर जाना चाहती है तो वे एकदम से उखड़ गए. आखिर मौडल को छुट्टी नहीं मिली. काम पूरा होने के बाद ही उसे घर जाने दिया गया.

कुल मिला कर मौडलिंग पेशे की यह लाइन यानी न्यूड मौडलिंग अपना कर पैसा कमाना बहुत ही मुश्किल भरा काम है. वैसे, प्रकाशन या प्रसारण में मौडल का चेहरा तो नहीं दिखाया जाता लेकिन शूटिंग के दौरान स्टूडैंट्स, संबंधित विज्ञापन या फिल्म की यूनिट के सदस्य तो मौडल को साक्षात देखते ही हैं. बहरहाल, महिलाओं के लिए यह भी एक पेचीदा व अजीबोगरीब पेशा है.

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कुंठित बदजबान नेताओं के ओछे बोल

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‘‘मुझे लगता है कि यह बहुत नीच किस्म का आदमी है, इस में कोई सभ्यता नहीं है,’’ वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर के इस विवादित और घटिया बयान ने गुजरात में कांग्रेस के मुंह से जीत का निवाला छीन लिया. यह विश्लेषण कितना सटीक है, इस से ज्यादा अहम बात यह है कि यह बयान हकीकत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उन की जाति के आधार पर नीचा दिखाने के लिए दिया गया था जिस में हमेशा की तरह मणिशंकर अय्यर की नेहरूगांधी परिवार के प्रति निष्ठा और स्तुति थी.

मणिशंकर अय्यर शायद यह भूल गए थे कि नरेंद्र मोदी जातपांत और धर्म की राजनीति के मामले में उन से कहीं बडे़ विशेषज्ञ हैं. लिहाजा, पलटवार में उन्होंने औरंगजेब और मुगल मानसिकता का जिक्र करते हुए ऊंचनीच को वोटों में तबदील करने में कामयाबी हासिल कर ली. टीवी मीडिया ने भी इस एक शब्द पर घंटों दर्शकों को उलझाए रखा.

राजनीति और राजनीतिक निष्ठाओं से परे देखें तो मणिशंकर अय्यर जातिगत श्रेष्ठता और अहं की भावना यानी कुंठा से साफसाफ ग्रस्त नजर आते हैं. एक बार उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को नालायक तक कह डाला था और नरेंद्र मोदी को सांपबिच्छू कहने से भी वे खुद को रोक नहीं पाए थे.

घटिया और छिछोरी राजनीति का यह वह दौर है जिस में बदजबान नेताओं के मुंह में जो आ रहा है वे उसे बोले जा रहे हैं. बात कम हैरत की नहीं कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ऐसा ज्यादा हो रहा है. भाजपा नेता भी दूसरे नेताओं से बदजबानी के मामले में उन्नीस नहीं हैं. फर्क भाषा, स्तर और घटना का नजर आता है. यह तय कर पाना वाकई मुश्किल काम है कि बदजबानी के मामले में किस पार्टी के नेता भारी और किस पार्टी के कमजोर पड़ते हैं, ऐसी बेहूदी बयानबाजियां करने के पीछे उन की मंशा क्या रहती है.

अय्यर से कम नहीं अहीर

मणिशंकर अय्यर का बयान कांग्रेस को गुजरात में डुबो गया, लेकिन केंद्रीय गृह राज्यमंत्री हंसराज अहीर के एक बयान के माने भी साफतौर पर धर्म से ताल्लुक रखते हुए थे जिस में लोकतंत्र की दुहाई ही लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाते हुए दी जा रही थी. अभी साल की शुरुआत में केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर भी अपनी बदजबानी का शुभारंभ कर चुके हैं. नरेंद्र तोमर ने राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी की तुलना करते हुए कहा कि नरेंद्र मोदीजी और कांग्रेस के नेता में जो अंतर है, वह इतनी दूरी का है, जितना अंतर मूंछ के बाल और पूंछ के बाल में होता है. इस बयान में मंत्रीजी का दिमागी स्तर और मंशा समझी जा सकती है.

महाराष्ट्र में बीती 25 दिसंबर को क्रिसमस के दिन हंसराज अहीर चंद्रपुर के जिला अस्पताल पहुंचे तो अधिकांश डाक्टर क्रिसमस के चलते छुट्टी पर थे. बस, मंत्रीजी भड़क गए और बोले, ‘‘अगर डाक्टर लोकतंत्र में आस्था नहीं रखते तो नक्सलियों से जुड़ जाएं, हम उन्हें गोलियों से छलनी कर देंगे.’’ हंसराज अहीर की भड़ास इस बात को ले कर ज्यादा थी जिसे उन्होंने बाहर उगला भी कि जब डाक्टरों को मालूम था कि वे दौरे पर आ रहे हैं तो उन्होंने छुट्टी क्यों ली.

ऐसा लगा कि लोकतंत्र नाम की कोई चीज देश में बची ही नहीं है जिस के तहत ईसाई डाक्टरों को अपने त्योहार पर छुट्टी लेने की इजाजत या सहूिलयत नहीं. उलट इस के, दीवाली जैसे त्योहार पर देशभर के अस्पतालों में मरीज डाक्टरों के लिए कराहते रहते हैं जो लक्ष्मीपूजन और आतिशबाजी छुड़ाने में लगे रहते हैं. हिंदू डाक्टर इन मंत्रीजी की नजर में लोकतांत्रिक और बेगुनाह हैं जबकि ईसाई डाक्टर इन्हें अलोकतांत्रिक और गुनाहगार नजर आते हैं, जिन्हें नक्सली बनने का मशवरा दिया जाता है ताकि आसानी से उन्हें गोलियों से भूना जा सके.

बीमार दरअसल, ऐसे ही नेता हैं और उन्हें काउंसलिंग की सख्त जरूरत है. लोकतंत्र का मतलब ही इन के लिए धर्म होता है और वह भी हिंदू धर्म. दूसरी चिंताजनक बात मंत्रियों का तानाशाहों सरीखा होता रवैया और बोल हैं जो अघोषित आपातकाल का एहसास कराते हैं.

दोनों पर भारी अनंत

नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल के अधिकांश मंत्री धर्म और लोकतंत्र की आड़ में किस तरह बेलगाम और बदजबान हो कर बेहूदी बयानबाजी कर रहे हैं, इस की एक मिसाल 25 दिसंबर को ही कर्नाटक के कोप्पल जिले से उजागर हुई थी. इस दिन यलबुर्गा में केंद्र्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने ब्राह्मण युवा परिषद के कार्यक्रम में एक अजीब बात यह कही थी कि धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील होने का दावा वे लोग करते हैं जिन्हें अपने मांबाप के खून का पता नहीं होता है.

अनंत हेगड़े मणिशंकर अय्यर से भी दो कदम आगे निकल कर यह भी बोल बैठे कि लोगों को खुद की पहचान धर्मनिरपेक्ष होने के बजाय धर्म और जाति के आधार पर बतानी चाहिए. मसलन, लोग गर्व से कहें कि वे मुसलिम, ईसाई, लिंगायत, ब्राह्मण या हिंदू हैं. इस बाबत देश का संविधान बदलने की बात भी उन्होंने कही जिस पर विपक्ष ने 27 दिसंबर को संसद में हंगामा मचाने का अपना धर्म निभा दिया.

मणिशंकर अय्यर ने तो नरेंद्र मोदी को छोटी मानी जाने वाली साहू या तेली जाति के आधार पर नीच कहा था, लेकिन अनंत हेगड़े ने घुमाफिरा कर वह घटिया और छिछोरी बात कही जो सोशल मीडिया पर अकसर हिंदूवादी वायरल करते रहते हैं कि राहुल गांधी की मां ईसाई धर्म की और पिता अर्धहिंदू और उन के पूर्वज वगैरा मुसलमान, ईसाई थे. दूसरी अहम और सटीक बात इन मंत्रीजी के बयान में हिंदू और ब्राह्मण को अलगअलग बताना भी थी, लेकिन जाने क्यों यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाए कि ब्राह्मण दूसरे हिंदुओं से श्रेष्ठ हैं.

नरेंद्र मोदी के जातिगत अपमान का बदला कर्नाटक से ले कर अनंत हेगड़े ने जता दिया कि आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा किस रणनीति पर प्रचार करने का मन बना रही है. अनंत हेगड़े सरीखे कुंठित भाजपाइयों की पीड़ा अब अकसर सामने आने लगी है.

देशद्रोही विराट और अनुष्का

मध्य प्रदेश के गुना में भाजपा से विधायक पन्नालाल शाक्य को क्रिकेटर विराट कोहली और ऐक्ट्रैस अनुष्का शर्मा का इटली में शादी करना इतना बुरा लगा कि उन्होंने इन दोनों को देशद्रोही ही करार दे दिया. स्किल इंडिया के एक कार्यक्रम में इन विधायक महोदय ने कहा, ‘‘विवाह संस्कार करने के लिए हिंदुस्तान में कहीं जगह नहीं मिली. गजब हो गया, क्या हिंदुस्तान इतना अछूत है.’’

अपनी बात में दम लाने के लिए पन्नालाल ने राम, कृष्ण, विक्रमादित्य और युधिष्ठिर जैसे पौराणिक पात्रों का उदाहरण देते हुए अपनी मूल भड़ास भी व्यक्त कर दी कि विराट और अनुष्का पैसा और प्रसिद्धि यहां से कमा रहे हैं और अरबों रुपए शादी के कार्यक्रम में इटली में खर्च कर रहे हैं. इस से स्पष्ट होता है कि वे दोनों राष्ट्रभक्त नहीं हैं.

यानी अब शादी पर भी घटिया और छिछोरी बयानबाजी होने लगी है जिसे साबित करने की कोशिश की जाती है कि जो विदेश में शादी करे वह देशद्रोही है.

निहायत व्यक्तिगत बातों पर गैरजिम्मेदाराना और बेतुकी बयानबाजी बताती है कि अब कोई कुछ भी बोल सकता है. महिलाओं पर, जाति पर, धर्म पर और शादी पर भी. अच्छा होगा कि पन्नालाल जैसे नेताओं के बयानों को गंभीरता से लेते हुए सरकार विदेश जा कर शादी करने पर ही रोक लगा दे जिस से लोग राष्ट्रभक्त बने रहें.

शादी तो शादी, उस से भी ज्यादा व्यक्तिगत बात विराट व अनुष्का के हनीमून पर भी उंगली जम्मूकश्मीर के एक छुटभैए भाजपा नेता रफीक बानीने यह कहते उठाई कि उन्हें हनीमून के लिए फिनलैंड जाने के बजाय भारत की ही कोई खूबसूरत जगह चुननी चाहिए थी. यह बेहूदगी और बदजबानी की हद ही है जिस से मूर्खता, कुंठा और पूर्वाग्रह साफसाफ झलकते हैं.

कोई किसी से कम नहीं

बदजबानी और बेवजह के बयानों के मामलों में कोई किसी से पीछे या उन्नीस नहीं है. हां, अनुभव यह बताता है कि अकसर सत्तारूढ़ दल के नेता छिछोरी बयानबाजी ज्यादा करते हैं.

भाजपा नेता और उन्नाव के सांसद साक्षी महाराज के बारे में कह पाना मुश्किल है कि वे कब, क्या कह जाएंगे जो बकवास की श्रेणी में आता है. हालांकि साक्षी महाराज के अधिकांश विवादित बयान इसलाम और मुसलमानों के खिलाफ होते हैं जिस से उन की कट्टर हिंदूवादी छवि और पुख्ता होती है. एक तरह से वे वक्तवक्त पर अपनी भगवा इमेज का नवीनीकरण करते रहते हैं.

पिछले साल जनवरी में उन का 4 बीवी, 40 बच्चों वाला बयान खूब सुर्खियों में रहा था जिस पर चुनाव आयोग ने उन्हें नोटिस भी दिया था. संतों के एक आयोजन में बोलते साक्षी महाराज ने मेरठ में कहा था कि देश की आबादी हिंदुओं से नहीं, बल्कि 4 पत्नियां और 40 बच्चों वाले लोगों की वजह से बढ़ रही है.

इस बयान पर उन की सार्वजनिक खिंचाई हुई तो बेपेंदी के लोटे की तरह लुढ़कते हुए उन्होंने कृष्ण की 1,600 रानियों के साथ राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के कई बच्चे होने की बात भी कह डाली थी. कई दफा साक्षी महारानी माननीय मुसलमानों के खिलाफ जहर उगल चुके हैं. मसलन, इसलाम औरतों की इज्जत जूती की तरह होती है. एक बयान में तो उन्होंने हैरतअंगेज तरीके से खुद को सच्चा मुसलमान और मोहम्मद साहब को महान योगी तक बता डाला था.

गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को महान देशभक्त बताने वाले साक्षी महाराज की नजर में चूंकि मांस खाने वाले राहुल गांधी केदारनाथ के दर्शन करने गए थे, इसलिए नेपाल में कुदरती तबाही मची थी.

इन विरोधाभासी बयानों से तय करना मुश्किल है कि साक्षी महाराज जैसे नेता आखिरकार चाहते क्या हैं. जाहिर है वे कुछ नहीं कहना चाहते, वे अपनी कुंठा के चलते बस सुर्खियों में बने रहने के लिए बकवासभर करते रहते हैं.

साक्षी महाराज के नक्शेकदम पर चलने वाले एक और भाजपा नेता व केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने अप्रैल 2015 में हाजीपुर में एक बेतुकी बात यह कह डाली थी कि अगर राजीव गांधी ने किसी नाइजीरियन महिला से शादी की होती तो क्या कांग्रेस उस महिला का नेतृत्व स्वीकार करती.

भाजपा नेताओं का अनुसरण करते जद (यू) के मुखिया शरद यादव ने भी कभी संसद में दक्षिण भारतीय महिलाओं का जिक्र करते उन्हें सांवली और भरेपूरे बदन की कह कर सनसनी फैला दी थी. बीमा विधेयक पर चल रही चर्चा में एकाएक ही दक्षिण की महिलाओं की बौडी यानी देहयष्टि का जिक्र शरद यादव जैसे पके हुए नेता के मुंह से सुनना उम्मीद के बाहर की बात थी, जिस में उन्होंने फिल्म अभिनेत्रियों रेखा और हेमा मालिनी के नाम भी लिए थे.

शरद यादव अब सियासी तौर पर हाशिए पर हैं लेकिन यह बयान उन की कुंठा और दक्षिण भारतीय महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह ही माना गया था, जिस पर सांसद कनिमोझी ने एतराज जताया था. बात चूंकि महिलाओं की अस्मिता की भाजपा की तरफ से थी, इसलिए स्मृति ईरानी की भौंहें भी तनी थीं. इस पर शरद यादव ने उन्हें यह कहते हुए झिड़क दिया था कि मैं जानता हूं कि आप क्या हैं.

निशाने पर महिलाएं

नेताओं के कुंठित और विवादित बयान ज्यादातर महिलाओं को अपमानित करते हुए ही होते हैं, तो इस का सीधा संबंध उन की महिला विरोधी मानसिकता से भी प्रतीत होता है. पश्चिम बंगाल के पूर्व मंत्री और वरिष्ठ सीपीएम नेता अलीसुर रहमान ने एक वाहियात बात मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बारे में यह कही थी कि वे अपना बलात्कार करवाने का क्या चार्ज लेंगी.

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह इन दिनों अपनी दूसरी पत्नी अमृता राय के साथ मध्य प्रदेश में नर्मदा यात्रा करते आध्यात्म और धर्म का राग अलाप रहे हैं. इन्हीं दिग्विजय सिंह ने 2014 में लोकसभा चुनाव के दौरान अपनी ही पार्टी की नेत्री मीनाक्षी नटराजन को नीमच में मंच से ही सौ टंच का माल कह कर सनसनी मचा दी थी.

महिलाओं से ताल्लुक रखते इस तरह के बयानों से जाहिर हुआ था कि झुग्गीझोंपडि़यों से ले कर संसद तक सभी पुरुष कुंठित मानसिकता के शिकार हैं. कोई महिलाओं का सम्मान नहीं करता और न ही करना चाहता. औरतों को तरहतरह से बेइज्जत करना ये मर्दानगी समझते हैं.

इसी कड़ी में सपा नेता मुलायम सिंह का दिया गया यह बयान भी अकसर चर्चा में आ ही जाता है कि लड़के हैं, गलती हो ही जाती है. बलात्कारियों को फांसी दिए जाने के मुद्दे पर बोलते हुए मुलायम सिंह यादव ने अर्थपूर्ण ढंग से यह भी कहा था कि वे ऐसा कानून बनाएंगे जिस में बलात्कारियों को सजा भी हो और झूठे मामले भी दर्ज न हों. अब सियासी बेरोजगारी ढोते मुलायम सिंह शायद ही सोच पाएं कि ऐसे बेतुके बयानों से प्रचार तो मिला, पर वोट नहीं मिले.

भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी भी कभी अपनी हैसियत से गिरते हुए यह कहने से खुद को रोक नहीं पाए थे कि भाजपा के खिलाफ नारेबाजी कर रही महिलाओं और कश्मीर के आतंकवादियों में कोई खास फर्क नहीं है. वे लिपस्टिकपाउडर लगा कर क्या खाक विरोध करेंगी.

यानी एतराज भाजपा के विरोध के साथसाथ लिपस्टकपाउडर से भी नकवी को है, तो सहज समझा जा सकता है कि किसी भी स्तर पर हर पार्टी का नेता महिलाओं को हतोत्साहित करने का कोई मौका नहीं चूकता.

इसी तर्ज पर तृणमूल कांग्रेस के विधायकचिरंजीव चक्रवर्ती ने भी हास्यास्पद बयान देते कहा था कि बलात्कार के मामलों में एक हद तक लड़कियां ही जिम्मेदार हैं क्योंकि हर दिन उन की स्कर्ट छोटी हो रही हैं और लड़कियों से छेड़छाड़ कोई नई बात नहीं बल्कि प्राचीनकाल से ही ऐसा होता आ रहा है.

इन नेताओं के बयानों से साफ जाहिर होता है कि कहीं न कहीं ये यौन कुंठा और पुरुषोचित अहं के शिकार हैं जो उन की नजर लिपिस्टिकपाउडर और स्कर्ट पर रहती है. इन से महिलाओं की तरक्की और आत्मनिर्भरता बरदाश्त नहीं हो रही है, इसलिए महिलाओं के खिलाफ अनर्गलबाजी शाश्वतरूप से होती रहेगी.

खतरनाक है मंशा

बयानवीर नेताओं की एक मंशा मुद्दे की बातों से लोगों का ध्यान बंटाने और हटाने की भी रहती है. मणिशंकर अय्यर ने नरेंद्र मोदी को नीच कहा और जवाबी हमले में मोदी ने खुद को छोटी जाति का स्वीकारते बड़े काम करने की बात कही तो फिर आखिरी चरण के मतदान तक गुजरात में विकास की बात नहीं हुई. सारी बात जाति तक सिमट कर रह गई.

इस मामले से यह भी साबित हुआ कि विदेश सेवा में ढाई दशक गुजार चुके मणिशंकर अय्यर और कट्टर हिंदूवादी नेता साक्षी महाराज में कोई खास फर्क नहीं है. दोनों ही कुंठित हैं और मुद्दे की बात से कतराते हैं, इसलिए अपनीअपनी बौद्धिक क्षमता और शिक्षा के हिसाब से बयान देते रहते हैं.

अनंत हेगड़े और हंसराज अहीर दोनों आने वाले वक्त की राजनीति का खाका खींच रहे हैं कि वह भाजपा की तरफ से शुद्ध हिंदूवादी होगी और विपक्षी दलों को भी गुजरात चुनाव की तरह धर्म व जाति के इर्दगिर्द सिमट कर रहना पड़ेगा यानी जनहित के मुद्दे हाशिए पर होंगे, पन्नालाल गुना में बैठे विराट कोहली और अनुष्का शर्मा की इटली में हुई शादी पर झींकरहे हैं. उन्हें अपने क्षेत्र की बदहाली से कोई सरोकार नहीं.

दरअसल, ऐसी बेतुकी और बेहूदी बातों को मीडिया हाथोंहाथ लेते सुर्खियां बना देता है, जो आम लोगों का मनोरंजन तो करती है लेकिन इस से धर्म व जाति के अलावा महिलाओं के अपमान की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है, इस से वह कोई सरोकार नहीं रखता.

लोकतंत्र में बोलने की आजादी का बेजा फायदा सभी दलों के नेता कैसेकैसे उठा रहे हैं, यह पुराने और हालिया बयानों से उजागर हो रहा है जो लोकतंत्र के लिए ही चिंता की बात है क्योंकि ऐसे नेता कोई आदर्श नहीं गढ़ते.

कई दफा जनता की वाहवाही लूटने के लिए भी नेता ऐसे ऊटपटांग बयान दे डालते हैं जिन से उन पर तरस आने लगता है. पिछले साल जुलाई में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राजस्व अधिकारियों को नसीहत देते कहा था कि सुधर जाओ, नहीं तो उलटा लटका दूंगा.

धीरगंभीर माने जाने वाले शिवराज सिंह चौहान की जबान भी फिसली तो लगने लगा कि अपनी गलतियां और कमजोरियां ढकने के लिए भी बेतुके बयान दिए जाते हैं. इसी तर्ज पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने भी अपनी पार्टी के एजेंडे को उजागर करते कहा था कि जो गाय की हत्या करेगा उसे फांसी पर लटका दिया जाएगा.

यह धार्मिक उत्तेजनाभर थी, वरना छत्तीसगढ़ में गायों की बदहाली के जिम्मेदार भाजपा नेताओं की करतूतें आएदिन उजागर होती रहती हैं. लेकिन जब मकसद और मंशा कुछ और हो तो कौन ऐसे नेताओं की जबान पर लगाम लगाएगा जो जनहित की और तुक की बातें करने से कतराते हैं जबकि कानून, लोकतंत्र और संविधान को खुलेआम धता बताते बयानबाजी करते रहते हैं.

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चुंबन सीन मुश्किल होता है : यश कुमार

भोजपुरी फिल्मों में काम करने वाले ज्यादातर हीरो पहले गायक होते हैं, बाद में वे ऐक्टिंग करते हैं, पर उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के रहने वाले यश कुमार शुद्ध रूप से ऐक्टिंग करने वाले कलाकार हैं. साल 2014 में उन की पहली फिल्म ‘दिलदार सांवरिया’ रुपहले परदे पर आई थी. इस के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. 2 साल में ही वे कई कामयाब फिल्में कर चुके हैं. इन में ‘राजाजी आई लव यू’, ‘दिल लागल दुपट्टा वाली से’, ‘दरियादिल’, ‘सपेरा’, ‘बलम रसिया’, ‘लागी तोहसे लगन’, ‘हीरो गमछा वाला’ और ‘इच्छाधारी’ खास हैं.

आज अपनी मेहनत से यश कुमार ने भोजपुरी सिनेमा में ‘ऐक्शन किंग’ के रूप में अपनी पहचान बना ली है. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश:

कितनी जद्दोजेहद के बाद आप को कामयाबी मिली?

इस को बताना तो बहुत मुश्किल है. मुझे ऐक्टिंग का शौक स्कूल के समय से ही था. यह बात जब मेरे घर वालों को पता चली, तो वे नाराज हुए. फिल्मों में काम करने का उन की नजर में कोई कैरियर नहीं था.

अपनी इच्छा पूरी करने के लिए मैं साल 2002 में अपने घर से 150 रुपए ले करमुंबई चला गया. वहां जाना आसान काम था, पर काम मिलना बहुत ही मुश्किल था.

मुंबई में अपना खर्च उठाने के लिए मैं ने कई काम किए. इन में सब से बड़ा काम योग क्लास शुरू करने का था. यहीं से मौडलिंग का भी काम मिलने लगा.

साल 2012 में जब मुझे पहली फिल्म मिली और वह कामयाब रही, तो नई पहचान बनी.

अब आप के घरपरिवार के लोगों का बरताव कैसा है?

पहली फिल्म ‘दिलदार सांवरिया’ के बाद तो एक पहचान बन गई थी. अब तो कई फिल्मों की शूटिंग करने अपने शहर बलिया और आसपास जाना होता है. लोग मिलने आते हैं, मेरे काम की बहुत तारीफ करते हैं, जिसे सुन कर खुशी होती है.

आप का भोजपुरी फिल्मों में दूसरे कलाकारों के साथ मुकाबला कैसा है?

भोजपुरी फिल्मों का चलन अलग है. यहां गायक ही हीरो होता है. ऐसे में मेरे लिए पहचान बनाना आसान नहीं था. मैं ने अपनी ऐक्टिंग और ऐक्शन के बल पर नई शुरुआत की है, जिस से अब गायक के अलावा भी दूसरे कलाकार सोच सकते हैं कि मेहनत के बल पर भी यहां जगह बनाई जा सकती है.

किस हीरोइन के साथ आप की जोड़ी सब से अच्छी लगती है?

भोजपुरी फिल्मों में हीरोहीरोइन की जोड़ी बनाने का काम होता है. एक ही हीरोहीरोइन के साथ कईकई फिल्में बनती हैं. मैं ने इस से अलग सभी हीरोइनों के साथ काम किया.

कमाल की बात यह है कि सब के साथ मेरी जोड़ी को दर्शकों का पूरा प्यार मिला. रानी चटर्जी, अंजना सिंह, काजल राघवानी, पूनम दुबे सभी के साथ मेरी फिल्में हिट हुई हैं.

लोग आप को ऐक्शन हीरो के रूप में जानते हैं. ऐसे में आप के किसिंग सीन भी चर्चा में रहते हैं. इसे कैसे निभाते हैं?

काजल के साथ मेरे किसिंग सीन की बहुत चर्चा हुई. सही बात यह है कि ऐसे सीन कहानी की डिमांड पर होते हैं. इन को फिल्माने के अपने तरीके होते हैं. ऐसे सीन मेरे लिए ऐक्शन सीन करने से ज्यादा मुश्किल होते हैं.

आप का टारगेट क्या है?

मैं अपने चाहने वालों का मनोरंजन करना चाहता हूं. इस के लिए उन की पसंद की फिल्मों को करना है. मेरा भी टारगेट है कि हिंदी फिल्मों में ऐक्टिंग करूं. दर्शक अच्छे कलाकार के रूप में मुझे जानें.

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यौन संबंध पर बोल्डनैस की जरूरत

गुरमीतराम रहीम सिंह को एक लड़की से लगातार बलात्कार करने पर 20 साल की सजा सुनाई गई है. इस लड़की ने 2002 में एक पत्र लिख कर अधिकारियों, प्रधानमंत्री आदि से गुमनाम शिकायत की थी. उच्च न्यायालय के आदेश पर केंद्रीय जांच ब्यूरो ने उस लड़की को भी खोज लिया और दूसरी अन्य लड़कियों को भी खोज लिया जिन्हें राम रहीम ने बलात्कार का शिकार बनाया था.

लड़कियों का बलात्कार जबरन रात को उठा ले जा कर नहीं किया गया था बल्कि बाबा से माफी मांगने के लिए इन के मातापिता खुद रातरात भर के लिए उन्हें यहां छोड़ जाते थे. ये लड़कियां यौन संबंधों से उस समय खुश होती थीं या नहीं, यह नहीं कह सकते पर बलपूर्वक संबंध बनाए गए, इस के सुबूत नहीं हैं. बहलाफुसला कर, धोखा दे कर, गलत बात कह कर भी यौन संबंध बनाना बलात्कार ही है. हां, जब ऐसा व्यक्ति बलात्कार करने लगे जो लड़की की निगाह में आदर्श है, तो मामला गंभीर हो जाता है.

लड़कियां इतनी आसानी से यौन संबंध बनाने को तैयार क्यों हो जाती हैं, यह एक पहेली ही रहेगी. गुरमीत सिंह ही नहीं, सभी धर्मों के स्वामियों के इर्दगिर्द लड़कियां मंडराती रहती हैं. वे क्या सुख चाहती हैं और कौन सी तुष्टि उन्हें मिलती है?

यौन संबंध बनाना कोई सीखता नहीं है. यह तो प्रकृति की देन है. इस से बच तो कोई नहीं सकता. अफसोस यह है कि सभ्यता के आने के बाद अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी समाज ने लड़कियों पर डाल दी है. अगर वे एक पुरुष का संरक्षण चाहती हैं तो वे खुद एक पुरुष के खूंटे में बंध कर रहें और वह पुरुष, चाहे जितनी कुंआरियों या विवाहिताओं, विधवाओं के साथ संबंध बनाता रहे.

बलात्कार के बारे में लड़कियों को यही शिक्षा दी जाती है कि एक बार कुछ हो गया तो मुंह दिखाने मत आना. इसीलिए यौन संबंध चाहे प्रेम, भक्ति, आत्मसमर्पण, यौनसुख के लिए स्थापित हुए हों या जबरन, लड़कियां इस बारे में घर में चर्चा नहीं करतीं. वे इस बात को छिपाती हैं, क्योंकि समाज के नियमों से बंधे मातापिता सह नहीं पाएंगे.

यह सीख बलात्कार या विवाहपूर्व यौन संबंध को बढ़ावा ही देती है जिस में नुकसान लड़कियों का ही होता है. 21वीं सदी में औरतें आज उसी तरह वर्जिनिटी से सच्चरित्र मानी जाती हैं जैसी 2,500 वर्ष पूर्व. बलात्कार हुआ, इस बात को लड़की अगर अगली सुबह या जब मरजी चाहे खुल कर कह सके तो पुरुषों में इतना बल नहीं रहेगा कि वे लड़कियों को जबरन या फुसला कर बिस्तर तक ले जाएं.

राम रहीम नाम रख कर कोई दूध का धुला नहीं हो जाता, इस बलात्कार के मामले ने यह एक बार और साबित कर दिया है. यह लड़कियों पर है कि वे हिम्मत रखें और यौन संबंध सहर्ष स्वीकारें चाहे वह इच्छा से स्थापित हुए हों या अनिच्छा से.

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कहीं इसलिए तो नहीं आती आपको भी नींद

‘जो सोवत है सो खोवत है

जो जागत है सो पावत है.’

भारतीयों को उपरोक्त सीख विरासत में मिली है. लेकिन लगता है अब इस सीख की जरूरत नहीं है. न ही अब रात में जगने के लिए किसी को आह्वान किए जाने की दरकार है. चूंकि भूमंडलीकरण ने पूरी दुनिया को एक गांव में बदल दिया है, इसलिए अब इस गांव का सूरज कभी नहीं डूबता. जब गांव के एक कोने में रात होती है तो जाहिर है दूसरे कोने में दिन होता है. मगर चूंकि गांव एक ही हो गया है तो यह कहना सैद्धांतिक रूप से जरा मुश्किल हो गया है कि कब सोया जाए और कब जगा जाए? इस दुविधा ने वाकई नींद के सामने बड़ी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं.

यह अकारण नहीं है कि चाहे आधुनिक विकास हो, जीवनशैली हो या भूमंडलीकरण, सब ने हमारी नींद पर हमला किया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अनुमानित अध्ययन के मुताबिक, 70 के दशक से अगर तुलना करें तो आज की दुनिया की नींद औसतन 4.5 घंटा प्रति 24 घंटे कम हो गई है. वहीं  शहरी भारत में भी 4 से 5 घंटे तक प्रति 24 घंटे कम हो गई है. ग्रामीण भारत में भी 2 से 3 घंटे की नींद पर खलल पड़ा है. इस के कई कारण हैं पर सब से बड़ा कारण जीवन जीने का ढंग और कामकाज की बदलती जीवनशैली है.

आधुनिक अर्थव्यवस्था ने ज्यादातर लोगों के कामकाज टाइमटेबल को बदल दिया है. नाइट ड्यूटी करना अब महज उत्पादन बढ़ाने का जरियाभर नहीं है बल्कि भूमंडलीकरण की जरूरत भी बन गया है.

जाहिर है इस के कारण ऐसे लोगों की तादाद निरंतर बढ़ती जा रही है जिन को पर्याप्त नींद नहीं मिल पा रही है. हाल ही में किए गए एक सर्वे के अनुसार, महानगरों में लगभग एकतिहाई भारतीय पर्याप्त नींद से वंचित हैं. इस कारण वे चिड़चिड़े हो रहे हैं, कई किस्म की बीमारियों से ग्रस्त हो रहे हैं और बिना किसी बीमारी के भी स्वास्थ्य गिर रहा है. लेकिन इस का एक दूसरा पहलू भी है कि नींद की इस कमी ने लोगों की आर्थिक सेहत में इजाफा किया है.

हालांकि, नींद न आना कोई नई बात नहीं है. मतलब यह कि जब यह भूमंडलीकरण नहीं था, देररात तक होने वाली पार्टियों का चलन नहीं था, दिन जैसा माहौल पैदा करने वाली झकास रोशनी नहीं थी, तब भी कई लोग रातरातभर करवटें बदलते थे. लेकिन तब ऐसा व्यक्तिगत कारणों से था. तब नींद न आना बड़े पैमाने पर तमाम लोगों का रोग नहीं था, लेकिन आज ऐसा है. आज के युग में नींद न आना अलग बात है और तमाम वजहों से नींद में कमी हो जाना व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सार्वजनिक और न चाहने पर भी प्र्रभावित करने वाली वजह है. इस स्थिति में इसे एक महामारी की शक्ल में भी ढाल दिया गया है.

किशोरों व युवाओं के साथसाथ बच्चों तक को आज नींद न आने की या नींद में कमी होने की समस्या प्रभावित कर रही है. नींद न आने की वजहों में आज की जीवनशैली से पैदा हुए तनाव से ले कर इस के फायदे तक इस के कारण हैं. अति सक्रियता और हर चीज जानने के दबाव ने गैरजरूरी तनाव पैदा किया है. अति सक्रिय दिमाग व हाइपर टैक्नोलौजी वास्तव में अपर्याप्त नींद की बड़ी वजहें हैं.

पिछले एक दशक में एकतिहाई कामकाजी भारतीय पर्याप्त नींद से वंचित हुए हैं जिस कारण उन्हें स्वास्थ्य संबंधी तमाम समस्याएं पैदा हो गई हैं.

एक सर्वे के मुताबिक, 93 प्रतिशत भारतीय रात में 8 घंटे से भी कम की नींद ले पाते हैं. सवाल है क्या इन्हें इस कम नींद का खमियाजा भुगतना पड़ता है? जवाब है हां, ऐसा है. 58 प्रतिशत ऐसे लोग अपने कामकाज  के दौरान 100 फीसदी परफौर्मेंस नहीं दे पाते. इसी के चलते 38 प्रतिशत लोग अपने कार्यस्थल पर सोते पकड़े गए हैं.

पर्याप्त नींद न मिल पाने से स्वास्थ्य संबंधी अनेक समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं. स्लीप  डिसऔर्डर्स के 80 से अधिक प्रकार होते हैं. साथ ही, इस के कारण हार्ट अटैक, डिप्रैशन, हाई ब्लडप्रैशर, याददाश्त में कमी जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं. मोटापे को रोग समझने में दुनिया को तकरीबन 25 वर्ष लगे थे, अगर यही भूल नींद के सिलसिले में हुई तो निश्चित रूप से यह एक महामारी का रूप ले लेगी क्योंकि नींद में कमी एक खमोश कातिल की तरह है.

यह विडंबना ही है कि एक तरफ जहां नींद की कमी ने इसे बीमारी बना कर खरबों डौलर का खर्च पैदा कर दिया है वहीं इस अपर्याप्त नींद की समस्या ने अरबों डौलर का जबरदस्त नींदबहाली का कारोबार पैदा कर दिया है.

नींद को ले कर लोगों में सजगता, डर और इस के साथ जीनेमरने की आदत भी पैदा हो रही है, जैसे नींद पूरी न कर पाने की भरपाई आम कामकाजी लोग कार्यस्थल पर तरोताजा रहने के लिए एनर्जी ड्रिंक्स आदि लेने का प्रयास करते थे, लेकिन अब नींद न आने से परेशान लोग मैडिकल हस्तक्षेप को महत्त्व देने लगे हैं. यह इस समस्या के प्रति डर भी है और सजगता भी.

मगर कुछ भी हो, इस से देश में स्लीप क्लीनिक्स की बाढ़ सी आ गई है. नींद न आने से ऐसे रोगियों की भी संख्या बढ़ती जा रही है जिन को पोलीसोमोनोग्राम कराने की जरूरत पड़ती है. यह टैस्ट लगभग 15 से 20 हजार रुपए में होता है और इस टैस्ट से मालूम होता है कि नींद क्यों नहीं आ रही.

नींद की बीमारी से छुटकारा पाने के लिए विशेषरूप से तैयार किए गए गद्दों की मांग भी बढ़ती जा रही है. कुछ कस्टम मेड गद्दे, जिन के बारे में अच्छी नींद लाने का दावा किया जाता है, 1.8 लाख से 3.0 लाख रुपए तक में बिक रहे हैं.

ऐसा नहीं है कि नींद न आने के चलते सिर्फ नींद लाने वाले कारोबार ही फलफूल रहे हैं. हकीकत यह है कि कई दूसरे पेशे के लोग भी इस का फायदा उठा रहे हैं खासकर लेखन और इंटरनैट के जरिए अपनी कुशलता बेच कर पैसे कमाने वाले लोगों को इस से जबरदस्त फायदा हुआ है. ऐसे लोग इंटरनैट पर बैठ कर ब्लौगिंग व लेखन कर रहे हैं. अपनी विशेषज्ञता और कुशलता को दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक ले जा रहे हैं जिस से इन्हें भरपूर आर्थिक फायदा हो रहा है और वे बड़े मजे से कह रहे हैं जो जागत है सो पावत है…

इसलिए नहीं आती नींद

हम में से ज्यादातर लोग जानते हैं कि भरपूर नींद लेना स्वास्थ्य के लिए जरूरी है. बावजूद इस के, हम इसे अमलीजामा नहीं पहनाते. इस के लिए कभी पसंदीदा टीवी सीरियलों को दोषी मानते हैं तो कभी दोस्तों को और कभी फेसबुक में चैटिंग की लत को. हम खुद को इस बात के लिए दोषी कम ही ठहराते हैं कि अनुशासन के साथ हम नींद हासिल करने कोशिश नहीं करते, लेकिन नींद न आने या नींद न मिलने का रोना जरूर रोते हैं.

  • बेहतर नींद पाने के लिए अगर आप नींद की गोलियां लेते हैं तो उन्हें सोने से 1 घंटा पहले लें या जागने से 10 घंटे पहले. इस से दिन में होने वाले आलस से बचे रहेंगे.
  • सोने से पहले कोई रिलैक्स करने वाली ऐक्सरसाइज तो हम करते नहीं, ऊपर से आइस्क्रीम, डेजर्ट्स या गरम कौफी पीते हैं. इस से नींद में खलल पड़ता है. बेहतर है हलकीफुलकी ऐक्सरसाइज करें लेकिन इतनी मेहनत न करें कि थकान महसूस हो.
  • सोने से पहले डरावनी फिल्में, झकझोर देने वाली डौक्यूमैंट्रीज न देखें, न ही उथलपुथल मचा देने वाली कहानियां पढ़ें. इन से नींद प्रभावित होती है. बहुत प्रतिस्पर्धी खेलों को भी देखने से बचें.
  • शाम को कैफीन का सेवन न करें.
  • बिस्तर में बैठ कर किताब न पढ़ें.
  • नींद लाने के लिए शराब का सेवन न करें.
  • खाली पेट या बहुत ज्यादा खा कर सोने के लिए न जाएं.
  • दूसरे व्यक्ति की नींद की गोलियां न खाएं. बिना डाक्टर की सलाह के नींद की गोलियां न लें.
  • दिन में ज्यादा न सोएं.
  • अपने शरीर को सोने का आदेश न दें. ऐसा करने से आप का शरीर व मन अधिक सतर्क हो जाता है.
  • अगर आप बिस्तर पर लेटने के बाद 20-30 मिनट जागे रहते हैं तो दूसरे कमरे में जाएं, किसी खामोश गतिविधि में शामिल हों जैसे पढ़ना या टैलीविजन देखना और जब नींद आने लगे तो वापस बिस्तर पर लौट आएं. रात में जितनी बार भी ऐसा करने की जरूरत पड़े, करें.
  • अच्छी नींद के लिए तनावमुक्त रहना भी जरूरी है. इसलिए जो बातें आप को तनावग्रस्त कर सकती हैं उन से बचें और अगर जीवन में कोई तनाव उत्पन्न करने वाली समस्या है तो उस का समाधान करने का प्रयास करें.
  • कैसे पाएं अच्छी नींद
  • संपन्नता कई किस्म की होती है. भरपूर नींद मिलना भी स्वास्थ्य के नजरिए से संपन्न होना ही है. इस बात की गांठ बांध लें कि अच्छी नींद का अर्थ केवल आंखें बंद कर लेना भर नहीं है. अच्छी नींद में शामिल है शरीर को आराम मिलना व ऊर्जा स्तरों को फिर हासिल करना.
  • नींद का स्वभाव चक्रात्मक होता है. आमतौर पर मस्तिष्क 2 प्रकार की नींदों के दौर से गुजरता है. ये दोनों दौर तकरीबन 90 मिनट में 5 चरणों से संपन्न होते हैं. यही नींद की गुणवत्ता तय करते हैं. इस पूरी प्रक्रिया में 2 नींदें संपन्न होती हैं. रैपिड आई मूवमैंट स्लीप (आरईएम) और नौन रैपिड आई मूवमैंट स्लीप (एनआरईएम). यहां इन चक्रों की गहराई में जाने की जरूरत नहीं है, बस समझने की बात यह है कि अच्छी आरामदायक नींद के लिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए.
  • रोजाना सोने का समय निश्चित करें और उसी समय पर सोएं व जगें.
  • जैसे स्वस्थ रहने के लिए नियमित ऐक्सरसाइज जरूरी है उसी तरह अच्छी, खुशनुमा व गुणवत्तापूर्ण नींद के लिए भी नियमित ऐक्सरसाइज जरूरी है, खासकर यह सुबह की जानी चाहिए. नियमित ऐक्सरसाइज करने से आरामदायक नींद मिलने के साक्ष्य मौजूद हैं.
  • अच्छी नींद के लिए हवा, पानी और सूरज की रोशनी बहुत जरूरी है. दोपहर के बाद धूप का आनंद लें. इस से भी भरपूर नींद आती है.
  • बैडरूम में आरामदायक तापमान, शांति व अंधेरा रखें.

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मैं 23 साल की हूं. मेरी 3 साल की बेटी भी है. पर मैं एक लड़की से प्यार करती हूं. मुझे क्या करना चाहिए.

सवाल
मैं 23 साल की हूं. मेरी 3 साल की बेटी भी है. अजीब बात है, पर सच है कि मैं एक लड़की से प्यार करती हूं. वह लड़की कहती है कि मैं अपने पति को तलाक दे कर उस के साथ भाग जाऊं. मैं क्या करूं?

जवाब

आप पति व बच्चे का सुख भोग कर भी बेवकूफी की बात कर रही हैं. आप उस लड़की को बताएं कि पति का सुख कितना मजेदार होता है. आदमी का साथ पा कर वह लड़की भी लाइन पर आ जाएगी.

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इस खूबसूरत अभिनेत्री को अब नहीं मिल रहा काम

बौलीवुड में एक्टर्स और एक्ट्रेस की किस्मत पलटते देर नहीं लगती. किस्मत के सितारे किसे कब अर्श से फर्श पर और किसे फर्श से अर्श पर पहुंचा दें इसका कुछ भी कहा नहीं जा सकता. ऐसा ही कुछ हुआ एक्ट्रेस शमा सिकंदर के साथ. करियर के शुरुआती दिनों में एक्ट्रेस शमा सिकंदर ने आमिर खान तक के साथ काम किया था.

हालांकि आज उनकी हालत यह है कि वह काम के लिए तरस रही हैं और वह वेब सीरीज में काम करने को मजबूर हैं. शमा के बारे में बता दें कि उन्होंने साल 1998 में फिल्म प्रेम अगन से अपने करियर की शुरुआत की थी. इसके बाद वह 1999 में आई फिल्म ‘मन’ में आमिर खान के साथ नजर आईं.

छोटे पर्दे की बात करें तो साल 2003 में वह पहली बार सोनी टीवी के शो “ये मेरी लाइफ है” में नजर आई थीं. इसके बाद उन्होंने सीआईडी, काजल, मन में है विश्वास और बाल वीर जैसे धारावाहिकों में काम किया. रिएलिटी शो की बात करें तो शमा एक खिलाड़ी एक हसीना, जेट सेट गो और बूगी वूगी जैसे रिएलिटी शो का हिस्सा रहीं.

साल 2016 में वह पहली बार वेब सीरीज माया में नजर आईं. वर्तमान समय में उनकी किसी भी फिल्म या टीवी शो के बारे में कोई खबर नहीं है. साल 2016 में वह आखिरी बार शौर्ट फिल्म सेक्सोहौलिक में नजर आईं थीं.

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शमा ऐसी इकलौती एक्ट्रेस नहीं हैं जिनके करियर की शुरुआत शानदार रहा लेकिन फिर धीरे-धीरे उनका करियर ढलान की ओर बढ़ने लगा. इसी तरह से और भी कई एक्ट्रेस हैं जिन्होंने बौलीवुड के सुपरस्टार्स के साथ अपने करियर की शुरुआत की लेकिन फिर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाने के चलते या पब्लिक द्वारा उनको नकार दिए जाने के चलते निर्माताओं और निर्देशकों ने उन्हें मौका देने से इनकार कर दिया.

VIDEO : फंकी पाइनएप्पल नेल आर्ट

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