जिंदगी के बाद भी दलितों पर होता जुल्म

‘दलित भाइयों पर अत्याचार मत करो. अगर गोली मारनी है, तो उन्हें नहीं मुझे मारो…’ जैसी जज्बाती और किताबी अपील प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद के एक जलसे में की थी. उस का उलटा असर यह हुआ कि देशभर में दलित अत्याचारों की बाढ़ सी आ गई.

दलितों पर कहर ढाने के लिए दबंग धर्म के नाम पर तरहतरह के नएनए तरीके ईजाद करते रहते हैं. गौरक्षा इन में से एक है. लेकिन मध्य प्रदेश के चंबल इलाके में तो दबंगों ने सारी हदें पार करते हुए ऐसा नजारा पेश किया था कि इनसानियत भी कहीं हो तो वह भी शर्मसार हो उठे.

लाश को भी नहीं बख्शा

यह मामला मुरैना जिले की अंबाह तहसील के गांव पाराशर की गढ़ी का है. 10 अगस्त, 2016 को इस गांव में एक दलित बाशिंदे बबलू की 25 साला बीवी पूजा की मौत हुई थी.

अपनी जवान बीवी की बेवक्त मौत का सदमा झेल रहा बबलू उस वक्त सकते में आ गया, जब दबंगों ने पूजा की लाश को श्मशान घाट में नहीं जलाने दिया.

इस पर बबलू हैरान रह गया और दबंगों के सामने गिड़गिड़ाता रहा कि वह लाश को कहां ले जा कर जलाए, पर दबंगों का दिल नहीं पसीजा. उन्होंने बबलू को डांट फटकार कर भगा दिया कि जो करना है सो कर लो, पर एक दलित औरत की लाश श्मशान घाट में जलाने की इजाजत हम नहीं दे सकते.

मौत के कुछ घंटे बीत जाने के बाद घर में पड़ी लाश भी भार लगने लगती है, इसलिए बबलू की हालत अजीब थी कि बीवी की लाश का क्या करे.

पाराशर की गढ़ी गांव में एक नहीं, बल्कि 3-3 श्मशान घाट हैं, पर तीनों पर रसूखदारों का कब्जा है, जिन में कोई दलित अंतिम संस्कार नहीं कर सकता.

बबलू को बुजुर्गों ने मशवरा यह दिया कि बेहतर होगा कि पूजा की लाश को किसी खेत में जला दो.

इस पर बबलू फिर गांव वालों के पास गया और बीवी की मिट्टी ठिकाने लगाने के लिए सभी जमीन वालों से 2 गज जमीन मांगी, पर किसी को उस पर तरस नहीं आया.

जब इस भागादौड़ी में पूरे 24 घंटे गुजर गए और लाश गलने लगी, तो बबलू घबरा उठा और थकहार कर बुझे मन से उस ने पूजा की लाश का दाह संस्कार अपने घर के सामने बनी कच्ची सड़क पर किया.

यह वही हिंदू धर्म है, जिस में किसी शवयात्रा के निकलते वक्त लोग सिर झुका कर किनारे हो जाते हैं और मरने वाले की अर्थी की तरफ देख कर हाथ जोड़ते हैं. लेकिन अगर शवयात्रा किसी दलित की हो, तो नफरत से मुंह फेर लेते हैं.

गांवों में यह नजारा आम है, जिस के तहत मरने के बाद भी दलितों से ऊंची जाति वालों की नफरत खत्म नहीं होती, उलटे उन्हें तंग करने के लिए श्मशान में भी जगह नहीं दी जाती.

इस हकीकत पर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी कहा था कि अब गांव में एक घाट एक श्मशान होगा, दलितों के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा.

अकेले ग्वालियरचंबल इलाके की नहीं, बल्कि देशभर के गांवों की यही हालत है कि दलितों के घर कोई मौत हो, तो उन्हें लाश बड़ी जाति वालों की तरह श्मशान में जलाने की सहूलियत नहीं है. इस का मतलब तो यह हुआ कि धर्म मानता है कि आत्मा भी दलित होती है और किसी ऊंची जाति वाले की आत्मा को दलित की आत्मा छू गई, तो वह भी अपवित्र हो जाएगी.

लेकिन हकीकत तो यह है कि इस तरह की ज्यादतियां दलितों को दबाए रखने के लिए जानबूझ कर की जाती हैं, जिस से वे दबंगों के सामने सिर नहीं उठा पाएं.

पाराशर की गढ़ी गांव की तरह दलितों को अपने वालों की लाश अपनी ही जमीन पर जलानी पड़ती है, लेकिन दिक्कत बबलू जैसे 95 फीसदी दलितों की होती है, जिन के पास अपनी जमीन नहीं होती. लिहाजा, वे लाश को किसी जंगल में या गांव के बाहर सरकारी जमीन पर जलाने के लिए मजबूर होते हैं.

कब्जा करने की मंशा

पाराशर की गढ़ी गांव के तीनों श्मशानों में केवल ऊंची जाति वालों की लाशें जलती हैं, पर हैरानी की बात यह है कि श्मशान की जमीनों पर दबंगों का कब्जा है और वे शान से इन जमीनों पर खेती करते हैं. उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है.

पूजा की लाश को जगह न देने पर जब ज्यादा होहल्ला मचा, तो आला अफसर भागेभागे पाराशर की गढ़ी गांव गए और हालात का जायजा लिया.

मुरैना के कलक्टर विनोद शर्मा और एसपी विनीत खन्ना ने फौरीतौर पर श्मशान घाट की जमीनों पर फैसिंग करवा दी, जो तय है कि जो कुछ दिनों या महीनों में हट जाएगी और दबंग फिर से इस सरकारी जमीन पर काबिज हो जाएंगे.

मंदिर बना कर जमीनें हड़पना आम बात है. इसी तर्ज पर अब श्मशानों की जमीनों पर भी ऊंची जाति वाले कब्जा करने लगे हैं. जिस तरह मंदिरों में पूजापाठ के लिए दलितों को दाखिल नहीं होने दिया जाता, ठीक उसी तरह श्मशानों में भी उन्हें जलाने की इजाजत नहीं है.

पाराशर की गढ़ी गांव में तहकीकात करने गए अफसर कुरसियों पर बैठे दलित बबलू की दास्तां सुनते रहे और बबलू समेत और दलित नीचे जमीन पर बैठे रिरियाते रहे.

प्रशासन ने बात सुनी, लेकिन किसी दोषी दबंग के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की. यह बात इस रिवाज को शह देने वाली नहीं तो क्या है?

ऐसा ही एक मामला इसी साल अप्रैल के महीने में नरसिंहपुर जिले की करेली तहसील में सामने आया था. वंदेसुर गांव के एक गरीब बुजुर्ग की मौत के बाद उस के घर वाले लाश को जलाने श्मशान घाट ले गए, तो दबंगों ने उन्हें लाश समेत वहां से भगा दिया था.

इस पर मरने वाले के भांजे गोपाल मेहरा ने हल्ला मचाया, तो गाडरवारा के तहसीलदार संजय नागवंशी गांव पहुंचे और मामले की जांच कर यह बयान दिया कि कायदेकानूनों के तहत कुसूरवारों पर कार्यवाही की जाएगी.

दरअसल, वंदेसुर गांव की श्मशान घाट की 3 एकड़ जमीन पर दबंगों भानुप्रताप राजपूत और छत्रसाल राजपूत का कब्जा है. इस मामले में भी मरे बुजुर्ग का अंतिम संस्कार तालाब किनारे सड़क पर किया गया था.

इन उजागर हुए मामलों से जाहिर सिर्फ इतना भर होता है कि जीतेजी तो दलित दबंगों का कहर झेलते ही हैं, पर मरने के बाद भी उन्हें बख्शा नहीं जाता.

गांव में पंचायती राज कहने भर की बात है, नहीं तो असल राज दबंगों का चलता है, जो श्मशान तक की जमीनें हथिया लेते हैं और दलितों की लाश को नहीं जलाने देते.

समस्या श्मशान घाटों की कमी की नहीं, बल्कि छुआछूत और दबंगई की है, जिस के तहत ऊंची जाति वाले श्मशान तक में छुआछूत मानते हैं. वे अगर दलितों को श्मशान में लाश जलाने की इजाजत दे देंगे, तो जमीनों पर बेजा कब्जा नहीं कर पाएंगे.

ज्यादातर दलितों के पास जमीनें नहीं हैं, इसलिए लाशों को ठिकाने लगाने के लिए वे यहांवहां भटकते रहते हैं. हालत यह है कि कुएं और नदी ऊंची जाति वालों के कब्जे में हैं, सड़कें उन के लिए हैं, मंदिर उन के लिए हैं और श्मशान घाट भी उन्हीं के हैं. ऐसे में भाईचारे और बराबरी की बात मजाक ही लगती है.

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कटी पतंग सी है विधवा की जिंदगी

30 साला छाया नागले भोपाल के न्यू मार्केट इलाके के एक होटल में रोटी बनाने का काम कर के अपने 2 बच्चों की परवरिश कर रही थी. अब से तकरीबन 3 साल पहले तक छाया की जिंदगी भी आम औरतों की तरह गुलजार थी. हालांकि उस के पति राजेश की आमदनी कोई खास नहीं थी, पर उस से घर की जरूरतें तो पूरी हो ही जाती थीं.

साल 2013 में राजेश की मौत ने छाया को हिला दिया था. तब उसे समझ आया था कि एक विधवा की जिंदगी कितनी परेशानियों से भरी होती है.

इंदौर छोड़ कर छाया भोपाल आई, तो टीटी नगर इलाके की एक झुग्गी बस्ती में रहने लगी. जमापूंजी खर्च हो चली थी, इसलिए छाया नौकरी के लिए भागादौड़ी करने लगी. ऐसे में होटल में रोटी बनाने का काम उसे मुफीद लगा, जिस से गुजारे लायक कमाई हो जाती थी.

धीरेधीरे छाया पति की मौत का दुख भूल चली थी, पर तनहाई में जब उस की याद आती थी, तो साथ ही कई दूसरी जरूरतें भी सिर उठाने लगती थीं. जब से उस की जिंदगी में अनजान शख्स राम आया था, तब से मन भी बेचैन रहने लगा था.

कहने की जरूरत नहीं है कि उसे राजेश से प्यार हो गया था, फिर धीरेधीरे यह प्यार परवान चढ़ा.

जब राम पर पूरी तरह भरोसा हो गया, तब छाया जिंदगी की एक नई शुरुआत के सपने देखने लगी. लेकिन जाने क्या हुआ कि 15 मई, 2016 की रात तकरीबन 11 बजे छाया ने खुद पर केरोसिन छिड़क कर आग लगा ली.

तुरंत पड़ोसी जमा हो गए और 100 नंबर पर फोन कर के अंबुलैंस बुला कर इलाज के लिए उसे अस्पताल ले गए, जहां इलाज के दौरान छाया ने दम तोड़ दिया.

भरोसा भी टूटा

पुलिस ने जब जांचपड़ताल की, तो छाया की झोंपड़ी से एक डायरी मिली, जिस में उस ने राम और खुद की मुहब्बत का जिक्र करते हुए यह भी अपने आशिक को लिखा था कि राम, तुम ने मुझ से प्यार का नाटक कर मुझे धोखा दिया. इस से मेरी बदनामी हो जाएगी और मैं कहीं की नहीं रहूंगी.

पुलिस ने इस मामले में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली, लेकिन जातेजाते छाया यह कड़वा सच उजागर कर गई कि विधवा की जिंदगी आज भी कटी पतंग जैसी ही है, जिसे हर कोई लूट सकता है.

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ज्यों का त्यों नजरिया

विधवा चाहे छाया हो या कोई और, उस पर अनापशनाप बंदिशें इस तरह लगाई जाती हैं कि पति की मौत के बाद उस के लिए जिंदगी एक सजा बन कर रह जाती है. अगर वह हिम्मत जुटा कर नए सिरे से इसे जीना भी चाहे, तो उसे पता चलता है कि जिस में वह सहारा ढूंढ़ रही होती थी, उस की नजर तो उस के जिस्म पर थी और अगर पति पैसा छोड़ गया हो, तो दौलत पर भी थी.

समाज के नजरिए का विधवाओं पर लगाई जाने वाली बंदिशों से गहरा नाता है. अव्वल तो पति की मौत के साथ ही उन्हें बैठेबिठाए मनहूस होने का खिताब मिल जाता है. इस वजह से वे शादीब्याह जैसे शुभ कामों में नहीं जा सकतीं, गहने नहीं पहन सकतीं, साजसिंगार नहीं कर सकतीं और खास बात यह कि किसी पराए मर्द से बात करती नजर आएं, तो झट से उन्हें बदचलन कह दिया जाता है.

धार्मिक किताबों से आया यह नजरिया आज भी ज्यों का त्यों बरकरार है. बस थोड़ी सी छूट इस बात की मिली है कि अब सफेद साड़ी पहनना विधवाओं की मजबूरी नहीं रही.

धार्मिक किताबों में कहा गया है कि विधवा को कैसे रहना चाहिए और कैसे नहीं रहना चाहिए. अगर कोई विधवा पंडों के बनाए नियमों और उसूलों के खिलाफ जाती है, तो वे उस का चैन से रहना ही दूभर कर देते हैं.

घर में भी शोषण

34 साला प्रेमलता (बदला नाम) के शौहर की मौत अब से तकरीबन 8 साल पहले हुई थी. विदिशा के नजदीक एक कसबे में रहने वाली प्रेमलता के शौहर के हिस्से की 15 एकड़ जमीन उस के जेठ ने नाजायज तरीके से हड़प ली.

इस पर प्रेमलता ने एतराज जताया, तो एक दिन मौका पा कर जेठ ने उस की इज्जत लूट ली.

प्रेमलता तब से खून के आंसू पी रही है. जब जेठ की मरजी होती है, तब उसे न चाहते हुए भी वह काम करने को मजबूर होना पड़ता है, जो उजागर हो जाए, तो पाप कहलाने लगता है और इस का जिम्मेदार जेठ या कोई दूसरा मर्द नहीं, बल्कि विधवा ही ठहराई जाती है.

कुछ वजह से प्रेमलता मायके नहीं जा सकती थी. अपने दोनों बच्चों की परवरिश की चिंता उसे है, इसलिए जेठ की ज्यादतियां बरदाश्त कर रही है. इस की जानकारी उस की जेठानी को भी है.

यह वही समाज है और धर्म है, जो औरतों को देवी की हद तक पूजने की  बातें करता है, पर सच एकदम उलट है. हर कोई विधवा को कलंक बता कर उस की दौलत और जिस्म को लूटना व भोगना चाहता है, जबकि इस में उस का कोई कुसूर नहीं होता.

भोपाल के पौश इलाके शिवाजी नगर में घर में झाड़ूपोंछा करने वाली 28 साला प्रियंका (बदला हुआ नाम) की मानें, तो शौहर की मौत के बाद ससुराल वालों ने कोई खास ज्यादती नहीं की, लेकिन यह फरमान जरूर जारी कर दिया कि खुद कमाओ और खाओ.

जब खुद कमानेखाने निकली, तो प्रियंका को उस समय मायूसी हाथ लगी, जब ज्यादातर घरों में उसे महज विधवा होने की वजह से काम नहीं मिला और जहां मिला, वहां से उसे जल्दी निकाल दिया गया. घर की मालकिनों को डर था, चूंकि प्रियंका विधवा है, इसलिए उन के शौहर को फंसा लेगी.

प्रियंका बताती है कि कोई ढंग का नौजवान उस से शादी करने को तैयार नहीं. जिन्होंने दिलचस्पी दिखाई, वे उम्र में 45-50 के ऊपर थे और 2-3 बच्चों के बाप भी, जिन की बीवियां नहीं थीं.

प्रियंका कहती है कि उन के बच्चों को तो मैं अपना समझ कर पाल लूंगी, पर 28 की उम्र में 45-50 की उम्र के मर्द से शादी करूंगी, तो फिर जल्दी ही विधवा हो जाऊंगी. वैसे भी उन की मंशा देख कर मुझे लगा कि उन्हें बीवी नहीं बिस्तर गरम करने वाली औरत चाहिए, जो दिन में नौकरानी बन कर रहे.

क्या होगा नतीजा

हालात सुधरेंगे, ऐसा इन विधवाओं की दास्तां सुन कर लग नहीं रहा. छाया ने प्यार में धोखा खाया और खुदकुशी कर ली.

प्रेमलता बच्चों की खातिर मन मार कर नरक में पड़ी है और प्रियंका किसी ऐसे सहारे की तलाश में है, जो उसे इज्जत और गैरत से रख सके.

अब तो हालत यह है कि विधवाओं की बदहाली पर चर्चा भी न के बराबर होती है, हां, वे विधवाएं जरूर धर्म और समाज के ठेकेदारों के निशाने पर रहती हैं, जो उन से डरती और दबती नहीं और अपनी मरजी से जिंदगी जी रही हैं.

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विधवाएं कब तक अपनी जरूरतें दबा कर रख पाती हैं और समाज के कायदेकानूनों पर अमल कर पाती हैं, कह पाना मुश्किल है, पर इन मिसालों से लगता है कि वे हालात से ज्यादा नहीं जूझ सकतीं.

देर सवेर ही सही, झक मार कर उन्हें समझौता करना ही पड़ता है. अपनी हिफाजत और आबरू के लिए वे किसी भी ऐरेगैरे मर्द के पल्ले बंधने को मजबूर होती हैं और न बंधें, तो एक पूरी भीड़ उन्हें लूटने खसोटने के लिए तैयार खड़ी रहती है.

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क्या आपने देखा अदा शर्मा का सेक्सी डांस वीडियो

बौलीवुड और साउथ की फिल्मों में धमाल मचा चुकी अदाकारा अदा शर्मा अब इन दिनों सोशल मीडिया पर अपने शानदार डांस मूव्स से धमाल मचा रही हैं. इस बार अदा ने सिंगर व रैपर बादशाह के मशहूर गाने ‘करेजा करेजा…’ पर हौट स्टाइट में कई स्टेप्स दिखाए. उन्होंने अपने इस वीडियो को इंस्टाग्राम पर भी शेयर किया है. सोशल मीडिया पर फैंस उनके इस डांस मूव्स को काफी पसंद कर रहे हैं. इस वीडियो को अब तक करीब 3 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं.

गौरतलब है कि अदा ने कुछ दिन पिछले अपनी दादी तुलसी सुंदर के साथ फिल्म ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ के गाने ‘बम डीगी डीगी बम’ पर डांस किया था. इस गाने पर अदा के साथ उनकी दादी पूरी मस्ती के साथ नाच रही थीं और अपनी पोती के एक्शंस के साथ मैच करने की कोशिश कर रही थीं. अदा के इस वीडियो को महज कुछ ही घंटों में 6 लाख से ज्यादा बार देखा गया था.

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अगर अदा शर्मा के फिल्मी करियर की बात करें तो अदा शर्मा ने साल 2008 में विक्रम भट्ट की फिल्म ‘1920’ से बौलीवुड में डेब्यू किया था. अदा ने ‘हम हैं राही कार के’ और ‘हंसी तो फंसी’ जैसी फिल्मों में काम किया है लेकिन ये फिल्‍में ज्‍यादा चल नहीं सकीं. साल 2017 में वे विद्युत जमवाल के साथ ‘कमांडो 2’ में नजर आई थीं, और इस फिल्म में उनके रोल को काफी पसंद भी किया गया था.

अदा के अगर साउथ फिल्मी करियर की बात करें तो उन्होंने साउथ के सुपर स्टार अल्लू अर्जुन के साथ ‘सन औफ सत्यमूर्ति’ में भी किया है.

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ऐ नक्सली हम ने आप का क्या बिगाड़ा था…

20 साल की क्षमा प्रिया के हाथों की मेहंदी का रंग अभी सुर्ख ही था और उस का सुहाग उजड़ गया. कुछ समय पहले ही क्षमा ने दिवाकर  के नाम की मेहंदी रचाई थी. उस के पति दिवाकर की मौत नक्सली हमले में हो गई. जैसे ही उस के भाई विपिन ने उसे दिवाकर की मौत के बारे में खबर दी कि समूचा घर चीखपुकार में डूब गया.

क्षमा रोतेबिलखते हुए बारबार यही कह रही थी, ‘‘मेरे दिवाकर को कुछ नहीं हुआ है… वह ठीक है… लोग हमारी शादी से जलते हैं, इसलिए झूठी बातें फैला रहे हैं… क्यों मार दिया मेरे पति को? ऐ नक्सली, हम ने आप का क्या बिगाड़ा था… बताइए…’’ इतना कहतेकहते वह फिर से बेहोश हो गई.

लोग उसे होश में लाने की कोशिश करते हैं. उसे चुप कराने की कोशिश करते रहे, पर उस की सिसकियां और हिचकियां रुकने का नाम ही नहीं ले रही थीं. वह आसपास खड़े हर किसी को उम्मीद भरी नजरों से देखती है कि कोई तो कह दे कि उस का पति जिंदा है. उस के बाद वह फिर से दहाड़ें मार कर रोने लगती.

दिवाकर कुमार की मां सुनीता देवी और पिता तुनकलाल तिवारी को तो मानो काठ मार गया है. 5 औलादों में से उन का एक बेटा शहीद हो गया था.

दिवाकर कुमार बिहार के खगडि़या जिले के परबत्ता ब्लौक के झंझरा गांव का रहने वाला था. 27 जून, 2016 को उस की शादी गोपालपुर मानसी टोला के रहने वाले राजेश्वर प्रसाद की बेटी क्षमा प्रिया से हुई थी.

इसी तरह 30 साल की मीरा की जिंदगी में भी नक्सलियों ने अंधेरा फैला दिया है. उस के पति अनिल कुमार सिंह ने नक्सली मुठभेड़ में अपनी जान गंवा दी है.

बिहार के बक्सर जिले के डुमरांव के ‘शहीद मर्द’ रोड पर बने अनिल का घर मातम में डूबा हुआ है. ‘शहीद मर्द’ महल्ले के रहने वाले अनिल ने मरतेमरते खुद को आखिर जांबाज ‘शहीद मर्द’ साबित कर डाला.

सीआरपीएफ के जवान अनिल कुमार सिंह का बचपन काफी परेशानियों में गुजरा था. परमेश्वरपुर गांव के रहने वाले रामचंद्र सिंह के 2 बेटों और 2 बेटियों में अनिल सब से छोटा था. बचपन में ही अनिल के सिर से पिता का साया उठ गया था. उस की मां चिंता देवी ने काफी परेशानियों से जूझते हुए बच्चों की परवरिश की थी.

साल 2000 में अनिल कुमार सिंह की सीआरपीएफ में बहाली हुई थी. अनिल की बेटी आकांक्षा 5 साल की और बेटा अभिनव 2 साल का है.

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23 साल की नम्रता सिंह की आंखों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं. कोबरा बटालियन के कमांडो उस के पति रवि कुमार ने नक्सलियों से लोहा लेते हुए अपनी जान दे दी.

बिहार के सिवान जिले के असांव थाने के खरदरा गांव के मिथिलेश कुमार सिंह का 25 साला बेटा रवि कुमार 8 जुलाई, 2016 को 40 दिनों की छुट्टी बिता कर ड्यूटी पर लौटा था. रवि के पिता मिथिलेश भी सीआरपीएफ में हैं और फिलहाल वे अगरतला में तैनात हैं.

रवि ने 19 साल की उम्र में ही सीआरपीएफ जौइन कर ली थी और साल 2012 में उस की शादी असांव थाना इलाके के ही शिऊरी गांव की नम्रता सिंह से हुई थी. अभी उन के कोई औलाद नहीं है.

बिहार के 3 जवानों के अलावा प०ि०श्चम बंगाल के नदिया जिले के दीपक घोष, दक्षिणी दिनाजपुर के पोलाश मंडल, उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के हरविंदर पवार, आजमगढ़ के सिनोद कुमार, मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के मनोज कुमार, मणिपुर के थैवाल जिले के उपेंद्र सिंह, पंजाब के होशियारपुर जिले के रमेश कुमार भी नक्सली हमले में शहीद हो गए.

दरअसल, कैमूर की सोनदाहा पहाडि़यों पर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश की पुलिस ने मिल कर सर्च आपरेशन शुरू किया था.

19 जुलाई, 2016 की रात बिहार के रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, गया, उत्तर प्रदेश के सोनभद्र, चंदौली और झारखंड के गढ़वा, पलामू और चंपारण जिलों की पुलिस टीम मिल कर यह आपरेशन चला रही थी.

बिहार के गया और औरंगाबाद जिले की सरहद पर डुमरी नाला के पास दर्जनों लैंड माइंस धमाके और अंधाधुंध गोलीबारी कर के नक्सलियों ने सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन के 10 जवानों की जान ले ली.

एडीजी, हैडक्वार्टर सुनील कुमार ने बताया कि नक्सली हमले में कोबरा बटालियन के 10 जवान शहीद हुए हैं और 5 बुरी तरह से जख्मी हो गए है. जवानों की जवाबी कार्यवाही में 6 नक्सली मारे गए, जिन में से 3 की लाशें बरामद हुई हैं.

नक्सलियों की लाश के पास से 2 इंसास राइफल, एक एके-47, एक अंडर बैरल ग्रेनेड और एक रौकेट लौंचर बरामद हुआ.

गया जिले के आमस के डुमरी नाला के पास तकरीबन 340 आईईडी (इंप्रोवाइज्ड ऐक्सप्लौजिव डिवाइस) फटे थे. उसे 3 सौ मीटर के दायरे में लगाया गया था. 18 जुलाई, 2016 को हुई नक्सली वारदात के बाद चलाए गए इस सर्च आपरेशन में तकरीबन 50 आईईडी बरामद किए गए, जिन्हें जंगल में ही डिफ्यूज कर दिया गया.

नक्सलियों की ऐसी कार्यवाही से साफ हो जाता है कि उन्होंने कोबरा जवानों को अपने जाल में फंसाने की पूरी प्लानिंग कर रखी थी. आधी रात को सर्च आपरेशन पर निकले जवान अचानक हुए लैंड माइंस धमाके से घबरा गए और जब तक वे खुद को संभाल पाते, तब तक नक्सलियों ने गोलियों की बौछार शुरू कर दी.

नक्सली हमले में जख्मी हुए जवानों ने बताया कि नक्सलियों ने तकरीबन डेढ़ किलोमीटर के दायरे में लैंड माइंस बिछा रखी थीं और सभी एक के बाद एक फट रही थीं. ब्लास्ट में 15-20 जवान बुरी तरह से जख्मी हो गए.

जख्मी जवान खुद को संभालने की कोशिश में ही लगे थे कि उन के ऊपर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी गई. घायल जवान तड़पते हुए मौके पर ही दम तोड़ने लगे और गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच कोई कुछ नहीं कर पा रहा था. जवानों को अंदाजा है कि नक्सलियों की तादाद तकरीबन डेढ़ सौ रही होगी.

सिक्योरिटी एजेंसियों के होश इस बात को ले कर उड़े हुए हैं कि नक्सलियों ने एकसाथ 340 लैंड माइंस कैसे लगा दीं? इस तरह से लैंड माइंस बिछाने का काम श्रीलंका का उग्रवादी संगठन लिट्टे किया करता था. लिट्टे घातक तरीके से लैंड माइंस का इस्तेमाल करने के लिए बदनाम रहा है. नक्सलियों ने परत दर परत लैंड माइंस बिछा कर बड़ी तबाही की पूरी तैयारी कर रखी थी. सारी लैंड माइंस फटी नहीं, वरना और भी बड़ा नुकसान हो सकता था.

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, नक्सलियों ने पुलिस को फंसाने के लिए यह जाल बिछाया था. एक करोड़ रुपए का इनामी नक्सली और झारखंड स्पैशल एरिया कमेटी के मुखिया मोतीलाल सोरेन उर्फ विजय यादव उर्फ संदीप के जंगल में छिपे होने की झूठी खबर उन्होंने फैला दी थी.

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आमतौर पर बारिश के मौसम में नक्सलियों के खिलाफ आपरेशन रोक दिया जाता है. इस के बाद भी संदीप की खोज में पुलिस टीम को जंगल भेज दिया गया. वहीं पुलिस की लापरवाही यह भी रही कि संदीप के बारे में जानकारी मिलने पर उस की पुष्टि कराने की कोशिश नहीं की गई और आननफानन पुलिस टीम को जंगल में भेज दिया गया.

संदीप साल 2011 में चाईबासा जेल से फरार हुआ था. वह ज्यादातर समय अपने दस्ते के साथ सरांडा, कोल्हान और पोड़ाहाट के जंगलों में बिताता है. इस के अलावा वह झारखंड के रांची, लातेहार, पलामू, बुंडू, अड़की और ओडिशा के क्योंझर और सुंदरगढ़ जिलों के जंगलों में आताजाता रहता है. इस के अलावा बिहार के औरंगाबाद, गया और जमुई जिलों के जंगलों में भी उस की गहरी पैठ है.

अपने साथियों के बीच ‘बड़े सरकार’ के नाम से मशहूर संदीप साल 2013 में संकरा जंगल में पुलिस की घेराबंदी में बुरी तरह फंस गया था. इस के बाद भी वह बड़ी चालाकी से पुलिस पर फायरिंग करता हुआ बच निकला था.

संदीप बिहार, झारखंड, ओडिशा पुलिस के लिए सिरदर्द बना हुआ है. 45-46 साल का संदीप हिंदी, भोजपुरी, संथाली, मगही, सादरी, उडि़या, बंगला वगैरह बोलियां बेझिझक बोल लेता है. इस से वह हर राज्य के नक्सलियों और गांव वालों के साथ आसानी से घुलमिल जाता है.

सूत्रों ने बताया कि आईबी ने झारखंड पुलिस को सूचना दी थी कि संदीप का दस्ता डुमरी इलाके में है. उस के साथ पलामू का सबजोनल कमांडर पवन और श्रवण भी अपने साथियों के साथ डुमरी पहुंच चुका है. नक्सली बड़ी वारदात को अंजाम देने की कोशिश में लगे हुए हैं.

इस की सूचना बिहार के गया और औरंगाबाद के एसपी को भी दी गई थी. उसी सूचना के आधार पर औरंगाबाद पुलिस और सीआरपीएफ के कोबरा बटालियन के जवानों ने सर्च आपरेशन शुरू किया था.

पुलिस के आला अफसर मानते हैं कि नक्सलियों को पुलिस के आपरेशन की भनक लग गई थी, तभी उन्होंने पुलिस के आनेजाने के रास्तों पर लैंड माइंस बिछा दी थीं.

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, 16 जुलाई, 2016 को औरंगाबाद के एसपी बाबूराम की अगुआई में कोबरा-205 बटालियन के 120 जवान मदनपुर थाने के बादम की ओर से सोनदाहा की पहाडि़यों और जंगल की ओर नक्सलियों की खोज में निकले थे और उसी दिन शाम तक उन्हें वापस लौटना था.

सर्च आपरेशन में नक्सलियों का कुछ पता नहीं चला, तो टीम को एक दिन और रुकने को कहा गया.

18 जुलाई, 2016 को 25-25 जवानों की टुकडि़यां बना कर डुमरी नाला के घने जंगल की ओर निकल गईं. इस की भनक नक्सलियों को लग गई.

2 टुकडि़यां तो आगे निकल गईं, पर पीछे से आ रही 2 टुकडि़यां नक्सलियों के जाल में फंस गईं. धमाकों की आवाज सुन कर आगे निकली दोनों टुकडि़यों ने मोरचा संभाला और नक्सलियों का जम कर मुकाबला किया.

पुलिस का दावा है कि उन के जवानों की जवाबी फायरिंग में 8-10 नक्सली मारे गए. पुलिस को 4 नक्सलियों की लाशें मिली हैं, जिन में से एक की पहचान इनामी नक्सली आजाद के रूप में हुई है.

नक्सलियों ने जिस जगह पर जवानों पर हमला किया, वहां किसी के लिए पहुंचना आसान नहीं है. डुमरी नाला तक पहुंचने के लिए पहाड़ और घने जंगल की पूरी जानकारी पुलिस और सुरक्षा बलों को भी नहीं थी. यह जगह गया से 80 किलोमीटर दूर है, वहीं औरंगाबाद से 60 किलोमीटर और झारखंड के डाल्टनगंज से सौ किलोमीटर दूर है.

बिहार के डीजीपी पीके ठाकुर डुमरी नाला के पास पुलिस पर हुए नक्सली हमले को बड़ी चूक मानते हुए कहते हैं कि इस से सुरक्षा बलों को कड़ा सबक मिला है. अब पुलिस को फूंकफूंक कर कदम उठाना होगा.

उन्होंने आगे कहा कि सीआरपीएफ के साथ बेहतर तालमेल बिठा कर सख्ती के साथ नक्सलियों के खिलाफ आपरेशन चलाया जाएगा.

20 जुलाई, 2016 को रांची में 4 राज्यों के पुलिस अफसरों की बैठक में नक्सली समस्या पर मंथन हुआ. बिहार समेत झारखंड, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ पुलिस के आला अफसरों ने नक्सली समस्या से निबटने के लिए तालमेल बिठाने की जुगत भिड़ाई.

आतंकियों से ज्यादा नुकसान करते नक्सली देशभर के नक्सली इलाकों में साल 2015 में 247 और साल 2014 में 221 नक्सली मुठभेड़ हुईं. देश के

9 राज्यों के 106 जिले नक्सली बैल्ट कहे जाते हैं. छत्तीसगढ़ राज्य के सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर सब से ज्यादा नक्सल असर वाले इलाके हैं.

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आतंकी हमले से ज्यादा भयावह हालत नक्सली हमलों की है. साल 2015 में नक्सली हमलों में देशभर में कुल 155 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए, वहीं पूर्वोत्तर के उग्रवाद प्रभावित इलाकों में 57 जवानों ने जान गंवाई.

कश्मीर के आतंकी हमलों में देश ने 41 जवानों को खोया. पिछले साल नक्सली हमलों में 181 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी.

बिहार में जून, 2013 में 5 सौ से ज्यादा नक्सलियों ने जमुई में ‘धनबादपटना इंटरसिटी ऐक्सप्रैस’ ट्रेन को हाईजैक कर लिया था. ट्रेन में 3 लोगों की हत्या कर दी थी.

सितंबर, 2010 में नक्सलियों ने 4 पुलिस वालों को बंधक बना लिया था और एक पुलिस वाले को मार डाला था.

नवंबर, 2005 में जहानाबाद जेल पर नक्सलियों ने धावा बोल दिया था. इस हमले में 2 सुरक्षाकर्मी और एक कैदी मारे गए, पर जेल का फाटक टूटने से 250 कैदी फरार हो गए थे.

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बहू पोतों से मिलने की आस में पथराई बूढ़ी आंखें

वतन की हिफाजत के लिए अपने जिगर के टुकड़ों को कुरबान करने वाली मांएं खुद पर फख्र महसूस करती हैं. हालांकि बेटों के बिछोह का गम उन्हें कई बार टीस देता है, पर उस से ज्यादा अपने लोगों की बेरुखी तंग करती है.

इस दर्द के लिए शब्द नहीं

‘‘जवान बेटे के बिछोह के दर्द को कौन सी मां अपने शब्द दे सकती है…’’ कहतेकहते छाती में जमा दर्द उन की आंखों में आ कर पिघलने लगता है. तकरीबन सवा साल पहले अरुणाचल प्रदेश में 8 नक्सलियों से हुई मुठभेड़ में 34 साला मेजर आलोक माथुर मारे गए थे. पिछली 26 जनवरी को उन्हें मरणोपरांत वीरता सेना मैडल मिला था.

आलोक की मां मधु माथुर कहती हैं कि सरकारी नियमकायदों में मां की ममता के लिए कहीं कोई जगह नहीं है. अपने 2 नन्हे पोतों में उन्होंने बचपन के उस आलोक की इमेज को देखना चाहा था. जब वे रसोईघर में होती थीं और वह गलबहियां डालते हुए कहता, ‘मां, आज क्या पका रही हो?’

सरकार से जितनी भी रकम और दूसरी सुविधाएं मिलती हैं, वे सब मारे गए सैनिक की पत्नी के नाम से होती हैं. जवान पति की मौत के बाद ज्यादातर लड़कियां मायके में रहना पसंद करती हैं. मातापिता एक समय बाद उन की दूसरी शादी भी कर देते हैं, क्योंकि पहाड़ सी जिंदगी उन के सामने होती है.

हालांकि इस में कुछ गलत भी नहीं है. बहू को तो दूसरा जीवनसाथी मिल गया, मदद भी मिल गई, पर मां कहां ढूंढ़ेगी अपने खोए बेटे को?

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बेटे की बहादुरी पर फख्र

राजस्थान के झुंझुनूं जिले के जयपहाड़ी गांव के जगदीश सिंह शेखावत को याद कर उन की मां अजय कंवर अपने आंसू नहीं रोक पाती हैं.

3 बेटों को सेना में भेज चुकीं अजय कंवर के लाड़ले ने दुश्मन को खत्म करने के बाद ही इस दुनिया को अलविदा कहा था. वह बचपन में पिता की टोपी लगा कर हमेशा सेना में जाने की ही बात करता था.

सीकर जिले के भैरूपुरा गांव की चावली देवी को अपने बेटे की कुरबानी पर गर्व है. वे चाहती हैं कि उन का पोता अरविंद भी फौज में ही भरती हो.

चावली देवी ने बताया कि उन का बेटा महेश कुमार जाट रैजीमैंट में जम्मूकश्मीर के लौगावा सैक्टर में तैनात था. पिछले साल 23 जनवरी की सुबह पहाड़ी पर आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में वह मारा गया.

लौटा तिरंगे में लिपट कर

किसी भी मां के लिए उस के बेटे की मौत से बड़ा शायद ही कोई गम हो. झुंझुनूं जिले के पिलानी कसबे के शहीद मेजर प्रदीप शर्मा की मां प्रेमलता का दामन भी आंसुओं से भरा है.

मेजर प्रदीप शर्मा अपनी बहन की सगाई की तैयारी के लिए आने का वादा कर के गए थे. वे लौटे तो सही, पर तिरंगे में लिपटे हुए.

मां के लिए यह सब से बड़ा सदमा था, जिस से वे अब तक नहीं उबर पाई हैं. प्रदीप शर्मा के शहीद होने के बाद उस का सामान संदूकों में घर लाया गया, लेकिन उन्होंने संदूकों को आज तक नहीं खोला है.

 याद करो कुरबानी

हर 26 जनवरी और 15 अगस्त पर सवेरे से ही पूरे मुल्क में देशभक्ति से भरे गीतों के रेकौर्ड बजते हैं, ‘जो शहीद हुए हैं उन की, जरा याद करो कुरबानी…’ न चाहते हुए भी कमला देवी के सीने में छिपा दर्द उन की बूढ़ी आंखों में आ बैठता है.

वे कहती हैं, ‘‘मेरे बेटे ने तो देश के नाम पर अपने प्राणों की बलि दे दी, पर मेरे बहूपोते को मुझ से कोई मिला दे.’’

कमला देवी का बेटा रवींद्र साल 1975 में पाकिस्तान में गुप्तचरी के लिए नबी अहमद बन कर गया था. वहां सेना में भरती के लिए प्रवेश परीक्षा दी और उस का सलैक्शन भी हो गया.

अपने काम को अंजाम देते सेना को हथियार सप्लाई करने वाले एक शख्स की बेटी जाने कब उस की जिंदगी में चली आई और वे एकदूसरे को दिल दे बैठे, पता ही नहीं चला. जल्दी ही दोनों शादी के बंधन में बंध कर जिंदगीभर के साथी हो गए. उस दिन तो उन की खुशी का ठिकाना न रहा, जब वे एक बेटे के मातापिता बने.

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पाकिस्तान में रहने के तकरीबन

8 साल बाद रवींद्र पकड़ा गया और फिर उस पर शुरू हुआ जोरजुल्म ढाने का ऐसा कहर, जो 18 साल तक चलता रहा. इस के चलते वह टीबी की बीमारी का शिकार हो गया. आखिरकार नवंबर, 2001 में उस की मौत हो गई.

कारगिल की लड़ाई पर रवींद्र के बारे में एक बड़े अफसर ने कहा था कि यह खूनखराबा न होता, अगर रवींद्र जैसा जांबाज जासूस हमारे खुफिया महकमे के पास होता.

आज रवींद्र का बेटा जवान हो गया है. उस की पाकिस्तानी मां भी उसे बताती होगी कि उस के पिता का परिवार हिंदुस्तान में रहता है, जहां उस की दादी है, बूआ है, भाईबहन हैं, चाचा हैं, पर सियासत के खूनी खेल के चलते वे चुप रहते होंगे और मन ही मन सोचते होंगे कि दुनिया की सारी दुश्मनी की दीवारें टूट जाएं और सभी अपने बिछड़े परिवारों से मिल सकें.

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कठुआ गैंगरेप के विरोध में आईं कई महिला सुपरस्टार्स

जम्मू-कश्मीर के कठुआ में 8 साल की बच्ची आसिफा के साथ हुई बर्बरता को देखकर पूरा देश हैरान है. देश की पब्लिक के साथ ही बौलीवुड की अभिनेत्रियां भी इस घिनौनी हरकत पर नाराजगी जाहिर कर रही हैं. कठुआ में मासूम के साथ हुई घटना को लेकर सोशल मीडिया पर अभिनेत्रियों ने इंसाफ के लिए मुहिम छेड़ी है.

अभिनेत्री सोनाली बेंद्रे, कल्कि, सोनम कपूर, सिमी ग्रेवाल और प्रिया प्रकाश वारियर ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर नाराजगी जाहिर की है, वहीं अभिनेत्री कल्कि ने एक फोटो शेयर कर लिखा, ”मैं हिंदुस्तान हूं और मैं इस घटना से शर्मिंदा हूं.”

सोनाली बेंद्रे ने ट्वीट कर लिखा, “शर्मनाक, शर्मनाक है कि हम इंसानियत दिखाने की जगह धर्म और राजनीति मुद्दे पर उतर आए हैं. शर्मनाक है कि इस आपराधिक घटना पर हम बाद में जाग्रत होते हैं, जबकि विदेशी मीडिया इस खबर को प्रमुखता से ले रहा है. शर्मनाक है कि हम इस देश में बच्चियों को सुरक्षा नहीं दे पा रहे हैं.”

वहीं, अभिनेत्री कल्कि ने औफिशियल ट्विटर अकाउंट से एक फोटो शेयर किया है, जिसमें वह एक पोस्टर पकड़े हुए नजर आ रही हैं. पोस्टर में लिखा है –  मैं हिंदुस्तान हूं और मैं शर्मिंदा हूं. 8 साल की बच्ची का मंदिर में गैंगरेप कर हत्या कर दी गई. अभिनेत्री सोनम कपूर ने लिखा, “फेक नेशनल्स और फेक हिंदुओं को शर्म आनी चाहिए, मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि यह हमारे देश में हो रहा है.”

अभिनेत्री सिमी ग्रेवाल ने लिखा, ”इस दुनिया में इससे ज्यादा बर्बर कोई जाति नहीं है, इतने शैतान आसिफा के रेपिस्ट. ऐसे लोगों के लिए इस अपराध की कोई सजा नहीं हो सकती है. सिर्फ 8 साल की बच्ची? मैं सिर्फ इतना पूछना चाहती हूं कि भगवान हैं कहां? ” प्रिया प्रकाश वारियर ने इंस्टाग्राम स्टोरी पर आसिफा के लिए इंसाफ की मांग की है. प्रिया ने लिखा, “यह हिंदू और मुस्लिम का मुद्दा नहीं है, एक बच्ची के साथ कई दिनों तक गैंगरेप किया गया. आसिफा को मिले दर्द के बारे में मैं सोच भी नहीं सकती. भगवान उसकी आत्मा को शांति दें.”

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आरक्षण खिलाफत का बदरंग आईना

सरकारी नौकरियों, स्कूलों व कालेजों में दाखिलों में सामाजिक पिछड़ों और दलितों व आदिवासियों को मिले आरक्षण को ढीला करने की कोशिशें लगातार चलती रहती हैं. अदालतों ने कुछ हद तक तो इस आरक्षण को जरूरी माना है, पर उस ने भी बहुत से अगरमगर लगा दिए हैं, जिस से सरकार में जमे, सत्ता पर कुंडली मारे बैठे ऊंची जातियों के लोग आरक्षण को एक हद तक रोक सके हैं.

सरकारी नौकरियों में मलाईदार और ताकतवर ओहदों पर ऊंची जातियों के ही लोग हैं. अगर कोई मंत्री पिछड़ी या दलित जाति का आ जाए, तो भी वह

5-7 को तो अच्छे पद दिला सकता है, पर बाद में उसे ऊंची जातियों के उन अफसरों पर भरोसा करना पड़ता है, जो अच्छी रिपोर्टें लिख सकें, अच्छी तरह अंगरेजी में बोल सकें और सभाओं व सम्मेलनों में अपनी बात कह सकें. इसीलिए जब अदालतें कहती हैं कि मलाईदार पदों को या पदोन्नतियों को आरक्षण की जरूरत नहीं है, तो पिछड़ों व दलितों के नुमाइंदे चुप हो जाते हैं.

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बड़ी बात यह है कि सही नजर की कमी के कारण पिछड़ों के नेता भी जानते नहीं कि वे कैसे अपने समाज का भला करें. बड़ी बात यह भी है कि वे खुद मानते हैं कि पिछड़ापन तो पिछले जन्म के पापों का फल है. इसीलिए सारे पिछड़े व दलित नेता जरा सा पैसा हाथ में आते ही पंडेपुजारियों को जम कर दान देने में लग जाते हैं. पिछड़ों के नेताओं ने पिछड़ों को सही ट्रेनिंग देने के बजाय पूजापाठ का रास्ता दिखाना शुरू कर दिया है.

पिछड़ों के नेता अपनी क्रीमी पोजीशन को उन देवीदेवताओं का परताप मानने लगे हैं, जिन के पास वे हर माह 2 माह में चक्कर लगा आते हैं. जो दलित या पिछडे़ पीछे रह गए, वे इन नेताओं या आरक्षण पाए अफसरों के हिसाब से पूजापाठ में कमजोर हैं.

पिछड़े और दलित यह बखूबी जानते हैं कि ऊंचे पूजापाठ का झुनझुना उन्हें दे कर खुश भर कर रहे हैं और उन्हें ऊंचे देवीदेवताओं के नौकर या नाजायज संतान पूजने को दे रहे हैं या आर्यों के पहले के देवीदेवताओं को किवदंतियों से निकाल कर दे रहे हैं, जो हिंदू व्यवस्था में दोयम दर्जे के भगवान हैं. पर आरक्षण पाए नेता और अफसर इस तरह कुंठित और कमजोर मन के हैं कि वे ठाकुरों और पंडों के लठैतों की तरह उसी से खुश हो रहे हैं.

पिछड़ों और दलितों में इस देश की उन्नति का राज छिपा है. दुनियाभर में जब तकनीक कम थी, तब इन की तकनीक के सहारे ही भारत सोने की चिडि़या कहलाया था. आज उन की पुरानी तकनीक बेकार हो गई है और उन की रीटूलिंग में आरक्षण व मनरेगा काम आ सकता था, पर उसे केवल प्रसाद कह कर बांट दिया गया. पिछड़े दलित वह तकनीक भी भूल गए, जो उन्हें 200 साल पहले मालूम थी.

आज आरक्षण का फायदा तभी है, जब पिछड़े और दलित उस से नई तकनीक समझें, यह क्रीमी लेयर–मलाई परत–को ज्यादा आसानी से समझ आएगी. यह न मायावती समझ रही हैं, न लालू प्रसाद यादव, न नीतीश कुमार, न एम. करुणानिधि. सब मान कर चल रहे हैं कि कुशलता तो पद मिलने पर आ ही जाएगी. जिन पिछड़ों व दलितों ने कुछ सीख भी लिया है, वे भी दूसरे पिछड़ों व दलितों को न सिखा कर अगड़ों को लिखापढ़ा कर पैसा बना रहे हैं. पिछड़ों व दलितों के लिए काम कर रही सेवाभावी संस्थाओं को कैलाश सत्यार्थी जैसे अगड़े चला रहे हैं.

जरूरत मलाईदार परत को खत्म करने की नहीं, पिछड़ों व दलितों द्वारा उस परत की पूरी जमात के लिए लाभ उठाने की है.

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औरत के देहजाल से बचें

आजकल लोगों के दिलों में पैसे और ऐशोआराम की चाहत इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि मां बेटी से जिस्मानी रिश्ते की बात करते समय अपने रिश्ते की मर्यादा को भी भूल चुकी है. एक मामला ऐसी ही मां का है. मां ने कालेज में पढ़ने वाली अपनी बेटी से कहा कि वह अधेड़ उम्र के लैक्चरर को घर पर कोचिंग देने के लिए आने को तैयार कर के उसे अपना दीवाना बना कर उस से पैसे ऐंठे. इस से सैक्स का मजा भी मिलेगा और शादी का दहेज जुटाने में मदद भी मिलेगी.

मां की इन बातों को सुन कर 18 साला बेटी खुशी से मुसकरा उठी. अपनी मां की बात सुन कर उस ने सोचा कि सैक्स का पूरा मजा तो अब अपने घर पर ही लिया जा सकता है. वजह, उस ने अपने एक बौयफ्रैंड से पार्क की झाडि़यों में सैक्स का मजा चोरीचुपके से लिया हुआ था. दूसरे दिन ही उस बेटी ने अपने कालेज के 50 साला लैक्चरर को अपने घर पर कोचिंग देने के लिए राजी कर लिया. उस ने छुट्टी के दिन लैक्चरर को अपने घर पर बुला लिया था. वह लैक्चरर को अपने घर की दूसरी मंजिल के कमरे में ले गई थी और उस के शरबत में शराब मिला कर उसे मदहोश कर दिया था.

वह लड़की फिल्म हीरोइन जैसी खूबसूरत तो थी ही, उस ने कपड़े भी बहुत छोटे पहन रखे थे. लैक्चरर उस के सुडौल उभारों की ओर देख रहे थे. तभी लड़की ने अपने कपड़ों को उतार कर उन को उन्हें पूरी तरह से दिखा दिया. इस के बाद लैक्चरर भी अपना आपा खो बैठे. कुछ ही देर में उन्होंने उस से जिस्मानी रिश्ता बनाया, तो वह लड़की भी सैक्स का मजा लेते हुए खुशी से मुसकरा उठी. उस के बाद तो यह रोज का सिलसिला बन गया. लेकिन उन्हें नहीं पता था कि लड़की की मां मोबाइल फोन से रोजाना उन के सैक्स संबंधों की वीडियो बना रही थी.

एक दिन मांबेटी की योजना के मुताबिक, लैक्चरर लड़की से सैक्स संबंध बनाने के लिए उसे अपने पास बुलाने लगे, तो उस ने उन से कहा कि वे उस के कपड़ों को फाड़ते हुए उस से जबरदस्ती करने का नाटक करें. ऐसा करने से सैक्स में ज्यादा मजा आता है. लैक्चरर साहब ऐसा ही करने लगे थे और मां उन की इन हरकतों की वीडियो बना रही थी. जैसे ही वे उस से जिस्मानी रिश्ता बनाने लगे कि तभी उस लड़की की मां ने अपने साथ आए पति से बोली, ‘‘देखा आज के कलयुगी टीचर को, जो अपनी बेटी समान शिष्या से कैसी घिनौनी हरकत कर रहा है. अभी इस की पिटाई कर के इसे पुलिस में देते हैं.’’

यह देख कर लैक्चरर साहब तो दंग रह गए थे. वे रोते हुए उन से इस भूल की माफी मांग रहे थे. यह देख कर लड़की की मां उन से बोली कि अगर अपनी बदनामी और पुलिस से बचना चाहते हो, तो 50 लाख रुपए अभी अपनी घरवाली से मंगवा लो. यह सुन कर लैक्चरर साहब ने अपने मकान के कागजात अपनी घरवाली से मंगवा कर उन को दे दिए और स्टांप पेपरों पर लिख दिया कि वे अपना मकान उन्हें बेच रहे हैं.लैक्चरर साहब ने उसी दिन प्रोपर्टी डीलर से कार्यवाही करा कर अपना मकान उन के नाम करा दिया और उन के जाल से जैसेतैसे छुटकारा पा कर राहत की सांस ली.

इसी तरह की जयपुर के एक 40 साला कुंआरे की भी कहानी है. वह भजनों का बेजोड़ गायक था. उस के मातापिता की मौत बचपन में ही हो गई थी. उसे उस की नानी ने पाला. उस के घर में एक 25 साला औरत अपने पति और 2 छोटे बच्चों के साथ किराए पर रहती है.

एक दिन उस औरत के पति ने मकान हड़पने की योजना बनाई. उस ने अपनी पत्नी से कह दिया कि वह इस आदमी को अपने प्रेमजाल में फांस ले. बूढ़ी नानी को आंखों से कम दिखाई देता है और वे सुनने में भी लाचार हैं. अपने पति की इस योजना के मुताबिक, जब उस का पति गार्ड की नौकरी पर चला गया और उस गायक की नानी भी कहीं बाहर चली गई, तो वह उस के कमरे जा कर उस से लिपटते हुए बोली, ‘‘मुझे आप से प्यार हो गया है. मैं अपने पति से परेशान हूं. वह रोजाना मुझे परेशान करता है.’’ उस की इन बातों को सुन कर वह गायक खुश हो गया. उस ने उसी समय मौके का फायदा उठा कर उस से जिस्मानी रिश्ता बना कर भरपूर मजा लिया. उस के बाद तो वह दिनरात उस से जिस्मानी सुख भोगने लगा था. रात में जब वह औरत उस के पास आती, तो वह उस से पूछता कि उस का पति जाग गया, तो परेशानी खड़ी कर देगा.यह सुन कर वह औरत उस से कहती, ‘‘मैं उसे नींद की गोलियां दे कर बेहोश कर देती हूं. अब तो वह सुबह ही उठेगा.’’

इस तरह से उन का यह खेल कई सालों तक चलता रहा.

एक बार वह औरत उस से बोली, ‘‘अब मेरा मन यहां नहीं लगता है. तुम मुझे कहीं दूर ले चलो.’’यह सुन कर वह गायक उसे कोलकाता ले गया. वह औरत अपने दोनों बच्चों को पति के पास छोड़ गई थी. कुछ दिन कोलकाता में रहने के बाद वे मथुरा में रहने लगे.योजना के मुताबिक, एक दिन उस औरत ने अपने पति और घर वालों को मथुरा फोन कर के बुलवा लिया और उसे गिरफ्तार करवा दिया. अब वह गायक जयपुर की जेल में अपने किए की सजा भुगत रहा है.जब उस औरत से समझौते की बात की जाती है, तो वह उस का मकान अपने नाम करने की बात करती है. उस की इस शर्त को सुन कर जेल में बंद वह गायक सोचता है कि अगर वह अपनी नानी के मकान को उस के नाम करने के लिए कहेगा, तो उस की 90 साला नानी जीतेजी मर जाएंगी. लिहाजा, वह जेल में ही अपनी जिंदगी बिताने को मजबूर है.

मामला राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय के एक 55 साला विधुर प्राचार्य का है. 30 साल की उम्र में ही दूसरे बच्चे को जन्म देने के 4 साल बाद ही उन की पत्नी की एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी. प्राचार्य ने जैसेतैसे बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ालिखा कर सरकारी नौकरी में लगवाया. उन के दोनों बेटों में से बड़े बेटे की शादी के कुछ दिन बाद ही उन के बड़े बेटे और बहू ने सोचा कि पिता की पैंशन के बाद उन्हें काफी पैसा मिलेगा. उस पैसे पर उन के छोटे बेटे का हक नहीं रहे और उन का खरीदा हुआ मकान भी उन के नाम हो जाए, इस के लिए उन्हें अपने काबू में किया जाए. वे दूसरी औरतों पर भी रोजाना पैसे लुटाते हैं, इसलिए वे पैसे अपने घर में ही आएं. इस के लिए एक ही उपाय है कि उन्हें औरत का सुख घर में दिया जाए. ‘‘लेकिन इस के लिए औरत लाएंगे कहां से?’’ बड़े बेटे की बीवी ने कहा, तो बेटा आंख मारते हुए बोला, ‘‘यह सुख तुम उन्हें दोगी.’’

‘‘मैं… यह तुम क्या कह रहे हो?’’ उस की बीवी ने हैरान हो कर उस से पूछा, तो वह बोला, ‘‘तुम तो सतीसावित्री जैसी बातें कर रही हो. कालेज में तुम ने अपने फ्रैंड्स को भी तो खूब मजे दिए थे. अपने बूढ़े ससुर को मजे देने में तो तुम्हें उन का आशीर्वाद और ढेर सारा पैसा भी मिलेगा.

‘‘तो यह बात है,’’ यह सुन कर वह बोली, ‘‘आने दो उन्हें, मैं आज से ही अपना काम शुरू करती हूं. तुम 2-3 दिन घर के बाहर ही रहना. मैं उन से कह दूंगी कि तुम किसी काम से बाहर गए हो, इसलिए उन्हें तुम से डर नहीं लगेगा.’’ बड़ा बेटा 3 दिन के लिए घर से बाहर चला गया था. प्राचार्य ससुर अपने विद्यालय से घर लौटे, तो वे अपनी बहू की सैक्सी ड्रैस में उस के जिस्म के दिखते हुए मादक अंगों को देख कर हैरान रह गए थे. जब वे अपने कमरे में खाना खाने का इंतजार कर रहे थे कि तभी बहू उन के कमरे में आ कर उन से लिपट गई.

वे उस की ओर हैरानी से देखने लगे, तो बहू उन से बोली, ‘‘आप का बेटा तो कई महीने से मुझ से दूर है. शायद उन का किसी और से इश्क का चक्कर चल रहा है. मैं भी औरत हूं. मेरा जिस्म भी मर्द के प्यार को तरसता है. अगर मैं कहीं बाहर अपनी जरूरत पूरी करूंगी, तो इस में हमारी बदनामी होगी. इसलिए मैं ने सोचा कि…’’ इतना कह कर वह अपने कपड़े उतारने लगी.

बहू के इस रूप को देख कर प्राचार्य खुश हो कर उस से जिस्मानी रिश्ता बना बैठे. सालों तक उन का यह सिलसिला चलता रहा. वे अपनी तनख्वाह भी बहू को देने लगे थे, पर बहू से खुश हो कर जब वे अपना मकान उस के नाम करने लगे, तो उन के छोटे बेटे को बहुत बुरा लगा. एक दिन जब उसे अपने पिता और भाभी की इस प्रेम कहानी के बारे में मालूम हुआ, तो उस ने उन्हें खूब फटकारा और अपने पड़ोसियों को भी बताने की धमकी दी. इस से प्राचार्य को इतना ज्यादा पछतावा हुआ कि उन्होंने खुदकुशी कर ली. औरत के देहजाल के नतीजे इतने भयानक होते हैं कि लोग अपनी धनदौलत लुटा देते हैं. कितने ही लोग इस सामाजिक बुराई के चलते आज देश की जेलों में नरक से भी बदतर जिंदगी बिताने को मजबूर हैं.

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मिली एक और आजादी

बात सन 1978 की है. शाहबानो नामक एक महिला थीं, जिन के 5 बच्चे थे. 3 तलाक के तहत बिना किसी खास वजह के उन के पति ने उन्हें तलाक दे दिया था. पति द्वारा इस तरह खुद से अलग कर देने के बाद शाहबानो के पास अपने और बच्चों के गुजरबसर करने का कोई जरिया नहीं रहा.

दूसरा कोई चारा न देख शाहबानो ने अदालत से गुहार लगाई कि उसे पति से गुजारे के लिए पैसा दिलाया जाए. यह मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा. इस सब में 7 साल का लंबा समय गुजर गया.

अंत में सर्वोच्च न्यायालय ने भादंसं की धारा 125 के तहत जो निर्णय लिया, उस के बारे में यह भी कहा कि यह निर्णय हर किसी पर लागू होता है, चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या संप्रदाय का हो. अपने निर्णय के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि शाहबानो को गुजारे के लिए खर्च दिया जाए. लेकिन इस फैसले का जो स्वागत होना चाहिए था, वह नहीं हुआ.

भारत के रूढि़वादी मुसलमानों ने इस का विरोध करते हुए कहा कि यह निर्णय उन की संस्कृति और विधानों पर अनाधिकार हस्तक्षेप है. इस में उन्हें असुरक्षा का भाव नजर आया. इस निर्णय को ले कर तमाम नेताओं ने भी विरोध प्रदर्शन किए. इस के बाद इस मामले की वजह से मुसलिमों ने आल इंडिया पर्सनल लौ बोर्ड नाम से अपनी एक संस्था बनाई. इस संस्था के कारकुनों ने इस निर्णय के खिलाफ देश के प्रमुख शहरों में आंदोलन करने की धमकी दी.

उन दिनों देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे, जिन्होंने इस बोर्ड के पदाधिकारियों की सभी शर्तें मान लीं. उस समय इस निर्णय को धर्मनिरपेक्षता के एक अहम उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया था. सन 1986 में कांग्रेस (आई) पार्टी ने, जिसे संसद में बहुमत प्राप्त था, इस मुद्दे पर मसौदा तैयार कर के एक कानून बनाया, जिस ने शाहबानो वाले मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को उलट दिया.

इस कानून के अनुसार, हर वह आवेदन, जो किसी तलाकशुदा महिला के द्वारा भादंसं की 1973 की धारा 125 के तहत देश की किसी भी कोर्ट में विचाराधीन है. इस कानून के लागू होते ही इसी कानून के अंतर्गत निपटाया जाएगा. चूंकि सरकार को पूर्ण बहुमत प्राप्त था, इसलिए धर्मनिरपेक्ष निर्णय को उलटने वाला मुसलिम महिला तलाक अधिकार सरंक्षण कानून 1986 आसानी से पास हो गया.

तय हुआ कि अब आगे यही कानून हर लिहाज से मान्य होगा. इस कानून के कारणों एवं प्रयोजनों की चर्चा करें तो यह बात सामने आई कि जब एक मुसलिम तलाकशुदा महिला इद्दत के समय के बाद अपना गुजारा नहीं कर सकती, तो न्यायालय उन सगेसंबंधियों को उसे उस की जरूरत के हिसाब से खर्चा देने का आदेश कर सकता है, जो मुसलिम कानून के अनुसर, उस की संपत्ति के उत्तराधिकारी हैं.

यहां ‘इद्दत’ का मतलब भी जान लेना जरूरी है. इद्दत का मतलब मुसलमानों में शौहर के मरने अथवा उस के द्वारा बीवी को तलाक देने के बाद का वह समय, जिस में विधवा अथवा तलाकशुदा औरत दूसरी शादी नहीं कर लेती.

बहरहाल, हम बात कर रहे हैं सन 1986 में बने कानून की. इस के तहत यह प्रावधान रखा गया कि अगर मुसलिम औरत के ऐेसे संबंधी नहीं हैं अथवा वे उसे उस के गुजारे लायक खर्च देने की स्थिति में नहीं हैं तो वक्फ बोर्ड को औरत के गुजारे की जिम्मेदारी उठाने का आदेश दिया जाएगा.

इस तरह पति द्वारा गुजाराभत्ता देने का उत्तरदायित्त्व इद्दत के समय तक के लिए सीमित कर दिया गया. लेकिन मर्दों ने इस पर कोई खास ध्यान नहीं दिया. 3 तलाक का सिलसिला उसी तरह जारी रहा. भारत में मुसलिम औरतों को कोई राहत नहीं मिली.

इसलाम में तलाक के कई स्वरूप हैं. इन के तहत कुछ की पहल स्त्रियों और कुछ की पुरुषों की तरफ से की जाती है. समय और स्थान के अनुसार, इसलाम में तलाक का बदला रूप भी पाया गया है. पहले तलाक में शरिया का इस्तेमाल किया जाता था. शरिया पारंपरिक इसलामी नीतियों पर चलती है, जो विभिन्न इसलामी कानूनी संस्थाओं में विभिन्न तरह की होती है.

पारंपरिक इसलामी नीति इसलामी ग्रंथों मसलन कुरान और हदीस से बनाई गई है. इन कानूनों की प्रणाली में अलगअलग इसलामी कानूनी संस्थाओं द्वारा नईनई चीजें जोड़ी जाती रही हैं. ये चीजें मुफ्तियों द्वारा निर्देशित और नियंत्रित होती हैं. ये मुफ्ती ही अक्सर इसलामी कानून न मानने वाले के खिलाफ अपना फतवा जारी करते हैं.

3 तलाक की बात करें तो यह मुसलिम समाज में वह जरिया था, जिस में एक मुसलमान पुरुष अपनी बीवी को 3 बार तलाक कह कर अपने निकाह को किसी भी समय रद्द कर सकता था. इस तरह से होने वाले तलाक से शादी पूरी तरह खत्म हो जाती थी. इस के बाद अगर वही आदमी अपनी बीवी से फिर से शादी करना चाहे तो बीवी को ‘हलाला’ की प्रक्रिया में से गुजरना पड़ता था. उस के बाद ही उनकी शादी हो सकती थी.

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‘हलाला’ एक ऐसी प्रक्रिया थी, जिस में तलाकशुदा औरत को किसी दूसरे मुसलमान पुरुष से शादी कर के उस के साथ कुछ दिन रह कर पत्नी धर्म निभाना पड़ता था. इस के बाद उस से तलाक ले कर वह अपने पुराने शौहर से निकाह कर सकती थी. 3 तलाक को प्राय: ‘तलाक उल बिद््दत’ भी कहा जाता था.

दुनिया में ऐसे भी तमाम बुद्धिजीवी हैं, जिन्होंने 3 तलाक को गैरइसलामिक घोषित करवाने के प्रयास किए हैं. उन का कहना है कि कुरान में इस तरह के तलाक का कहीं जिक्र नहीं है. शौहर और बीवी को तलाक से पहले कम से कम 3 महीने तक एक साथ रहना चाहिए और इस बीच अगर इरादा न बदले और तलाक लेने की स्थिति बनी रहे तो कानूनी सलाह से ही तलाक लिया जाना चाहिए. शौहर अपनी बीवी को तुहर (मासिक धर्म के बाद पवित्रता वाले समय) में ही तलाक दे सकता है. नियम था कि इस के पहले 3 महीनों में उन्हें अपने तमाम शुभचिंतकों, रिश्तेदारों की मदद से अपनी शादी को बचाने की कोशिश करनी चाहिए.

जो भी हो, पुरुष के 3 बार तलाक कह देने भर से हमेशा के लिए तलाक हो जाता था. पहले शौहर अपनी बीवी को सामने खड़ी कर के 3 बार तलाक कह देता था तो दोनों का वैवाहिक रिश्ता टूट जाता था. आज के आधुनिक दौर में यह काम फोन, टैक्स्ट मैसेज, फेसबुक, स्काइप और ईमेल वगैरह से भी होने लगा था. चूंकि इसलामी नियम में इसे कानूनन सही माना जाता था, इसलिए ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ती गईं.

इस सब से पुरुषों पर तो कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, लेकिन उन औरतों को परेशानी हो रही थी, जो आर्थिक रूप से पूरी तरह अपने शौहर पर निर्भर थीं. उन्हें इस तरह के तलाक से जिंदगी में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था. आर्थिक परेशानियों के साथ वे भावनात्मक रूप से भी टूट जाती थीं.

ऐसी महिलाओं को किसी भी तरह से निर्वाह का जरिया नहीं मिल पाता था. ये औरतें अकसर अकेली पड़ जाती थीं. इन के पास अपने बच्चों को पालने का कोई साधन तक नहीं रहता था. ऐसे अधिकतर मामलों में 3 तलाक के बाद आदमी अपने बच्चों की, खासकर बेटियों की जिम्मेदारी कभी नहीं लेता था.

मुसलिम समाज की तमाम महिलाएं इसी डर में अपनी जिंदगी गुजार देती थीं कि न जाने कब उन का शौहर 3 शापित शब्द कह दें. क्योंकि इस के बाद उन की जिंदगी खत्म होने के कगार पर आ जाती थी.

मुसलिम शौहर केवल 3 बार तलाक कह कर कभी भी अपनी शादी को तोड़ सकता था. भारत से पहले दुनिया के 22 देश ऐसे थे, जहां 3 तलाक की मान्यता खत्म कर दी गई थी. दुनिया का पहला देश मिस्र था, जहां 3 तलाक को पहली बार बैन किया गया था. हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान भी इस मामले में हम से आगे रहा. वहां सन 1956 में ही 3 तलाक खत्म कर दिया गया था.

हिंदुस्तान में भी अब बदलाव नजर आने लगा था. लेकिन गुजारेभत्ते के मामले में शाहबानो के फैसले के विरोध में राजीव गांधी सरकार के कानून से बनी बहुसंख्यक सांप्रदायिकता के दंश को यह देश झेल चुका था. लेकिन अब समय बदल चुका था. इलैक्ट्रौनिक एवं सोशल मीडिया के इस बदलते दौर में मुस्लिम महिलाओं के साथ समूचे समुदाय में काफी सकारात्मक मंथन होने लगा था.

इस सब का परिणाम यह रहा कि कुछ समय पहले केंद्र सरकार ने देश के सर्वोच्च न्यायालय से कहा कि ‘3 तलाक, निकाह, हलाला और बहुविवाह जैसी प्रथाओं से मुसलिम महिलाओं के सामाजिक स्तर और गरिमा को ठेस पहुंचती है. साथ ही उन्हें वो सारे मौलिक अधिकार भी नहीं मिल पाते, जिन्हें हमारा संविधान हमारे लिए लागू करता है.

सर्वोच्च न्यायालय में अपना लिखित मत देने से पहले सरकार ने कहा था कि ये सभी प्रथाएं मुसलिम महिलाओं को बराबरी का हक देने से रोकती हैं.

इस पर टिप्पणी करते हुए औल इंडिया मुसलिम पर्सनल लौ बोर्ड की ओर से कहा गया था कि कुछ लोग इस तरह का माहौल बनाने में लगे हैं कि इस मामले की सुनवाई समाज में तलाक की संख्या बढ़ रही है. लेकिन विश्व भर में इसलामी विद्वानों द्वारा इस की खिलाफत लगातार की जा रही है.

सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात को गंभीरता से लिया. इस सिलसिले में 16 अक्तूबर, 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने स्वत:संज्ञान ले कर जनहित याचिका दायर करने का आदेश दे दिया. तभी इसी तरह का एक मामला सुनवाई के लिए सर्वोच्च न्यायालय में गया.

बात फैली तो सब से पहले उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली शायरा बानो ने 3 तलाक के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपनी अपील दायर कर दी. याचिका में संबंधित मुद्दों पर प्रकाश डालने के अलावा शायरा ने अपने बारे में बताया था कि उस ने समाजशास्त्र में एमए किया था. सन 2001 में उस की शादी हुई और 10 अक्तूबर, 2015 को 3 बार तलाक कह कर उस के पति ने उस से रिश्ता तोड़ लिया. अब वह स्कूल जाने वाले बेटे और बेटी के साथ अपने मांबाप के यहां रह रही है. उन्हीं की मदद से वह दिल्ली आई थी और एडवोकेट बालाजी श्रीनिवासन से मिल कर कोर्ट में केस दायर कर दिया था.

शायरा की याचिका स्वीकार होने के बाद सुनवाई शुरू होते ही 4 अन्य मुस्लिम महिलाओं ने भी इसी तरह की याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दायर कर दीं. वे थीं जयपुर राजस्थान की रहने वाली बिजनैस ग्रैजुएट आफरीन रहमान, उत्तर प्रदेश के सहारनपुर की रहने वाली आतिया साबरी, अंग्रेजी से एमए की डिग्री हासिल करने वाली उत्तर प्रदेश के रामपुर की रहने वाली गुलशन परवीन और पश्चिम बंगाल के हावड़ा की रहने वाली इशरत जहां.

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शादी के 15 सालों बाद एक दिन अचानक  दुबई से इशरत के पति का फोन आया और उस ने फोन पर ही तलाक…तलाक…तलाक… कह कर उसे अपनी जिंदगी से निकाल दिया. इस के कुछ दिनों बाद ही पति ने दूसरी शादी कर ली थी.

गुलशन परवीन एक निजी स्कूल में टीचर थीं. उस के गर्भवती होने पर ससुराल वालों ने उसे मायके भेज दिया, जहां 8 महीने बाद उस ने बेटे को जन्म दिया. बच्चे को ले कर ससुराल लौटी तो पति ने उस के साथ मारपीट शुरू कर दी.

बाद में पति ने 3 तलाक का सहारा लेते हुए उस से रिश्ता तोड़ लिया. इसी तरह आफरीन रहमान और आतिया साबरी को उन के पतियों ने खत के जरिए तलाक दे दिया था. इस के बाद ये महिलाएं अपनीअपनी याचिकाओं के साथ देश की सर्वोच्च न्यायालय में पहुंची थीं.

इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की खंडपीठ ने की. केंद्र की ओर से कहा गया कि सभी पर्सनल कानून संविधान के दायरे में हों. शादी, तलाक संपत्ति और उत्तराधिकार के अधिकार को भी एक नजर से देखा जाना चाहिए. माननीय जजों ने 11 मई, 2017 से 18 मई, 2017 तक लगातार इस मामले में सभी पक्षों की दलीलें सुनीं.

सर्वोच्च न्यायालय की ओर से 2 मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया गया कि 3 तलाक क्या इसलाम का मौलिक हिस्सा है? इस के बिना क्या इसलाम का स्वरूप बिगड़ जाएगा? पुरुषों को प्राप्त 3 तलाक का आधार क्या मुसलिम महिलाओं के समानता और सम्मान के अधिकार के विरुद्ध हैं?

इस प्रकरण में जहां केंद्र सरकार का रवैया खासा उत्साहजनक था, वहीं इंडियन मुसलिम पर्सनल लौ बोर्ड के अलावा अन्य संगठन जमीयत उलेमा ए हिंद के पदाधिकारियों ने अदालत में व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि मुसलिम महिलाओं की हालत एक ऐसी असहाय चिडि़या जैसी है, जिसे सुनहरी बाज हमेशा दबोचने की फिराक में रहता है. इस पर सरकार की ओर से कहा गया कि यहां मुसलिम पुरुषों एवं महिलाओं के बीच के टकराव की बात हो रही है.

बहरहाल, 22 अगस्त, 2017 को पीठासीन जजों ने इस मुद्दे पर अपनी अलगअलग राय कुछ इस तरह से व्यक्त की.

चीफ जस्टिस जे.एस. खेहर और जस्टिस एस. अब्दुल नजीर का कहना था कि 3 तलाक धार्मिक प्रथा का हिस्सा है. संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत इसे संरक्षण प्राप्त है. लिहाजा न्यायपालिका इस में हस्तक्षेप नहीं कर सकती. इस मामले में सरकार को पहल करते हुए कानून बनाना चाहिए.

दूसरी ओर जस्टिस कुरियन जोसफ, जस्टिस रोहिंटन एफ नरीमन एवं जस्टिस यू्.यू. ललित ने उक्त दोनों जजों की राय से असहमति प्रकट करते हुए कहा कि यह असंवैधानिक है, इसलिए इसे निरस्त किया जाए.

इस के बाद उसी दिन सर्वोच्च न्यायालय ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मुसलिम समाज में एक बार में 3 तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) की इस 14 सौ साल पुरानी प्रथा को खारिज कर दिया. ऐसा संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 21 का उल्लंघन करार देते हुए किया गया था.

इस प्रथा की रोक पर सहमति के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केंद्र सरकार को 6 महीने के भीतर इस संबंध में कानून बनाने का निर्देश दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से भारतीय मुसलिम समाज की महिलाओं में खुशी की लहर दौड़ गई है. बहुत सी महिलाओं को तो यहां तक कहते सुना गया है कि भारत को 1947 के अगस्त माह में आजादी मिली थी, उन्हें एक तरह से यह दूसरी आजादी मिली है. देश आजाद होने के भले ही 70 साल बाद सही, पर मिली अगस्त में ही है.

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दर्द ने बढ़ाया हौसला

खूबसूरत आतिया साबरी एक अजीब सजा से रूबरू हो रही थी. शौहरबीवी के रिश्तों के उस के जज्बातों पर वक्त के साथ बंदिश लग चुकी थी. यह रिश्ता अब ऐतबार के काबिल भी नहीं रह गया था. रिश्तों की डोर पूरी तरह टूट चुकी थी और जिंदगी गमजदा हो गई थी. लेकिन वह अपनी 2 मासूम बेटियों की मुसकराहटों व शरारतों से खुश हो कर गम को हलका करने की कोशिश करती थी.

21 अगस्त, 2017 की शाम को आतिया के चेहरे पर भले ही चिंता की लकीरें थीं, लेकिन आंखों में उम्मीदों के चिराग रोशन थे. उसे देख कर पिता मजहर हसन ने बेटी के नजदीक आ कर पूछा, ‘‘क्यों परेशान है आतिया? तेरे इरादे नेक हैं और तू इंसाफ के लिए लड़ रही है. देखना तुम लोगों की मुहिम जरूर रंग लाएगी.’’

‘‘सोचती तो मैं भी यही हूं. आप तो जानते हैं, यह लड़ाई मैं सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि उन बहनों के लिए भी लड़ रही हूं, जो 3 तलाक के बाद जिल्लत की जिंदगी जी रही हैं. मैं सोचती हूं कि किसी को भी तलाक का ऐसा दर्द न झेलना पड़े.’’

‘‘जो होगा, ठीक ही होगा. बस, उम्मीद का दामन थामे रहो.’’ मजहर ने बेटी को समझाया तो आतिया की आंखों में चमक आ गई.

‘‘मुझे पूरी उम्मीद है अब्बू, अदालत औरतों के हक में फैसला दे कर इस 3 तलाक से निजात दिला देगी. कल का दिन शायद मेरे लिए खुशियां ले कर आए.’’ आतिया ने आत्मविश्वास भरे लहजे में कहा.

अब्बू से थोड़ी देर बात कर के आतिया सोने के लिए अपने कमरे में चली गई. उस की 2 मासूम बेटियां सादिया व सना तब तक सो चुकी थीं.

आतिया उत्तर प्रदेश के शहर सहारनपुर के नई मंडी कोतवाली के मोहल्ला आली की रहने वाली थी. वह तलाक पीडि़ता थी और उस ने इंसाफ के लिए देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रखी थी. वह देश की उन 5 मुसलिम महिलाओं में से एक थी, जो 3 तलाक के खिलाफ जंग लड़ते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई थीं.

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उन के मामलों पर लंबी सुनवाई हुई थी और फैसले के लिए 22 अगस्त की तारीख तय की गई थी. 5 जजों की संविधान पीठ को मुसलिम धर्म में शरीयत कानून के तहत दिए जाने वाले 3 तलाक पर फैसला सुनाना था. इस तरह के तलाक के खिलाफ देशभर में मुसलिम महिलाओं की लगातार आवाजें उठ रही थीं.

अगले दिन अदालत ने अपना फैसला सुनाया तो आतिया और उस के परिवार की खुशियों का ठिकाना नहीं रहा. अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में 3 तलाक की 14 सौ साल पुरानी प्रथा को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करार देते हुए खारिज कर दिया था. जजों की संविधान पीठ ने इस प्रथा को कुरान-ए-पाक के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ और शरीयत कानून का उल्लंघन बताया.

आतिया को इसलिए और भी खुशी हुई थी, क्योंकि वह भी इस लड़ाई का एक हिस्सा थी. दरअसल, उस की जिंदगी दुख के पहाड़ से टकराई थी. उस ने कभी सोचा भी नहीं था कि जिस शख्स को ताउम्र उस का साथ देना था, वह एक दिन उसे अकेला छोड़ देगा. आतिया अपनी मां मुन्नी व 3 बड़े भाइयों की लाडली थी.

आतिया विवाह के लायक हुई तो उस के घर वालों को उस के विवाह की चिंता हुई. वे चाहते थे कि उस का विवाह किसी अच्छे घर में हो, ताकि उस की जिंदगी खुशियों से आबाद रहे. उस के पिता मजहर मूलरूप से हरिद्वार जिले के सुलतानपुर गांव के रहने वाले थे. करीब 25 साल पहले वह सहारनपुर आ कर बस गए थे. उन के नातेरिश्तेदार वहीं आसपास रहते थे.

मजहर मियां ने रिश्ते की तलाश भी वहीं शुरू कर दी. खोजबीन के बाद उन्होंने बेटी का रिश्ता हरिद्वार के खानपुर थाना क्षेत्र के गांव जसोदरपुर निवासी सईद अहमद के बेटे वाजिद अली के साथ तय कर दिया. सारी बातें तय होने के बाद 25 मार्च, 2012 को उन्होंने आतिया का निकाह वाजिद के साथ कर दिया.

निकाह के बाद आतिया की जिंदगी खुशियों से भर गई. उस ने अपने भविष्य को ले कर तमाम ख्वाब देखे थे. एक साल बाद उस ने बेटी को जन्म दिया. यह उस का पहला बच्चा था. इस से सभी को खुश होना चाहिए था, लेकिन आतिया को पहली बार अहसास हुआ कि बेटी के जन्म से न सिर्फ उस का पति, बल्कि ससुराल के अन्य लोग भी खुश नहीं थे. वे लोग बेटे के ख्वाहिशमंद थे.

आतिया ससुराल वालों के रवैये पर हैरान तो थी, लेकिन उस ने सोचा कि यह सब वक्ती बातें हैं, जो वक्त के साथ खत्म हो जाएंगी. एक साल कब बीत गया, पता ही नहीं चला. आतिया दोबारा गर्भवती हुई. इस बार उस के ससुराल वालों को भरोसा था कि बेटा ही होगा. एक दिन वाजिद ने कहा भी, ‘‘मुझे उम्मीद है कि इस बार तुम बेटे को ही जन्म दोगी?’’

उस की बात सुन कर आतिया को हैरानी हुई. उस ने जवाब में कहा, ‘‘तुम जानते हो वाजिद, यह सब इंसान के हाथ में नहीं होता. लड़का हो या लड़की मैं दोनों में कोई फर्क महसूस नहीं करती. बच्चे गृहस्थी के आंगन के फूल होते हैं.’’

उस की बात पर वाजिद ने नाखुशी जाहिर करते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी सोच चाहे जो भी हो, लेकिन मैं बेटे की ख्वाहिश रखता हूं.’’

आतिया बहस नहीं करना चाहती थी. लिहाजा वह खामोश हो गई. लेकिन वह मन ही मन परेशान थी कि यह किस तरह की सोच है, जो बेटियों से परहेज किया जाता है. अपने शौहर की सोच उसे अच्छी नहीं लगी.

सन 2015 में आतिया ने एक और बेटी को जन्म दिया. इस पर उस की ससुराल में जैसे तूफान आ गया. कोई भी इस बात से खुश नहीं था. न उस का शौहर और न उस के घर वाले. आतिया ने सोचा कि वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा, लेकिन यह उस की भूल थी. सभी लोग उसे ताना मारने लगे. उन के तेवर भी बदल चुके थे.

इस के बाद ससुराल वाले दहेज को ले कर भी आतिया को ताना देने लगे थे. आतिया को सब से बड़ा झटका उस दिन लगा, जब वाजिद ने उस से तल्ख लहजे में कहा, ‘‘बेटी को जन्म दे कर तूने मेरे कंधे झुका दिए हैं.’’

उस की बात पर आतिया को गुस्सा आ गया. उस ने पलट कर जवाब दिया, ‘‘कैसी बात कर रहे हैं आप? कहीं अपने बच्चों के जन्म से भी किसी के कंधे झुकते हैं? आप को खुश होना चाहिए कि 2 बेटियों के पिता हैं. हम इन्हें पढ़ालिखा कर काबिल बनाएंगे.’’

‘‘यह सब ख्याली बातें हैं आतिया, तुम मेरी बात नहीं समझोगी.’’

‘‘मैं आप की सारी बातें समझती हूं.’’ आतिया ने भी तल्खी से जवाब दिया.

‘‘तुम्हें जो सोचना है, सोचती रहो. लेकिन सच यह है कि सिर बेटों से ही ऊंचा होता है.’’

आतिया की सोच और भावनाओं का किसी पर कोई असर नहीं हुआ. फलस्वरूप वक्त के साथ घर में कलह बढ़ती गई. पति की तानेबाजियों ने तल्खियों को और भी बढ़ा दिया. छोटीछोटी बातों पर कई बार विवाद बढ़ता तो आतिया के साथ मारपीट भी हो जाती. पानी सिर से ऊपर जाने लगा था.

आतिया ने ये बातें अपने मायके वालों को बताईं तो उन्होंने उसे सब्र से काम लेने की सलाह दी. लेकिन जब यह आए दिन की बात हो गई तो आतिया के मातापिता ने जा कर वाजिद व उस के घर वालों को समझाने की कोशिश की. इस से कुछ दिनों तक तो सब ठीक रहा, लेकिन जल्दी ही जिंदगी फिर से पुराने ढर्रे पर आ गई.

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धीरेधीरे आतिया की परेशानियों का सिलसिला बढ़ता गया. 12 नवंबर, 2015 को आतिया के साथ हद दर्जे तक मारपीट की गई. उस की तबीयत खराब होने लगी तो उसे उस के हाल पर छोड़ दिया गया. उसे यहां तक कह दिया गया कि वह चाहे तो ससुराल छोड़ कर जा सकती है.

अब आतिया को अपनी जान का खतरा महसूस होने लगा था. उसे जहर दे कर मारने की साजिश की जा रही थी. इसलिए अगले दिन वह दोनों बेटियों के साथ मायके चली आई. उस की हालत देख कर घर में सभी को धक्का लगा. आतिया ने आपबीती सुनाई तो उन्हें लगा कि बेटी जिंदा बच गई, यही बड़ी बात है.

आतिया को अस्पताल में भर्ती करा दिया गया. वह मानसिक व शारीरिक कमजोरी से उबर आई तो उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई. आतिया के साथ ज्यादती हुई थी, इसलिए उस ने पुलिस में जाने का मन बना लिया. ऐसा ही उस ने किया भी. उस ने स्थानीय थाने में अपनी ससुराल वालों के खिलाफ मारपीट व दहेज उत्पीड़न की तहरीर दे दी.

चंद रोज ही बीते थे कि आतिया की जिंदगी में भूचाल आ गया. वाजिद ने 10 रुपए के स्टांप पेपर पर लिख कर तलाकनामा भिजवा दिया. तलाक की तारीख 2 नवंबर लिखी गई थी. दरअसल, ससुराल पक्ष के लोगों को पता चल चुका था कि आतिया पुलिस में शिकायत दर्ज करा रही है, इसलिए उन्होंने चालाकी बरतते हुए तारीख पहले की लिखी थी.

आतिया को उम्मीद नहीं थी कि नौबत यहां तक आ जाएगी. वह महिलाओं को तलाक देने की मुसलिम धर्म की इस परंपरा के खिलाफ थी. वाजिद ने बेटियां पैदा होने और दहेज के लिए उसे सताया और फिर छुटकारा पाने के लिए एकतरफा तलाक भी भेज दिया.

धार्मिक कानून ऐसे तलाक को मान्यता देता था, इसलिए आतिया चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती थी. जबकि वह इस तरह की तलाक प्रक्रिया के खिलाफ थी. मामूली बातों पर दिए जाने वाले तलाक के किस्से वह सुनती आई थी. सारे हक मर्द के पास थे. वह जब चाहे, बीवी को अपनी जिंदगी से निकाल सकता था.

आतिया ने सोच लिया था कि वह खामोश नहीं बैठेगी, बल्कि अपने उत्पीड़न और तलाक के खिलाफ आवाज उठाएगी. उधर पुलिस ने उस की तहरीर के आधार पर मुकदमा दर्ज कर लिया. दिसंबर महीने में पुलिस ने आतिया के पति व ससुर को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. आतिया ने दोनों मासूम बेटियों में खुशियां ढूंढीं और तलाक को चुनौती देने की ठान ली.

आतिया का एक भाई रिजवान सामाजिक कार्यकर्ता था और फरीदी विकास समिति नामक संस्था चलाता था. उस ने भी इस लड़ाई में आतिया का साथ दिया. आतिया तलाक के खिलाफ थी, यह बात नातेरिश्तेदारों और समाज के लोगों को पता चली तो उन्होंने उसे मजहब का वास्ता दे कर समझाया. लेकिन आतिया उन की बात मानने को तैयार नहीं थी.

आतिया के मातापिता व घर वालों को भी लोगों ने समझाने की कोशिश की. लेकिन उन की नजर में आतिया कुछ गलत नहीं कर रही थी. उस की जिंदगी जिस तरह दोराहे पर आ गई थी, उस से वह भी आहत थे और इंसाफ चाहते थे.

आतिया ने ऐसी महिलाओं से मिलना शुरू किया, जो तलाक पीडि़ता थीं. उन की कहानियां उसे विचलित कर जाती थीं. उस ने मुसलिमों के बड़े धार्मिक केंद्र दारुल उलूम देवबंद में पति के तलाक के खिलाफ अर्जी लगाई. लेकिन उन्होंने तलाक को जायज ठहराया और धार्मिक कानून का हवाला भी दिया.

दरअसल, वाजिद वहां से अपने दिए तलाक के बारे में पहले ही फतवा ले चुका था. इस के बावजूद आतिया यह सब मानने को तैयार नहीं थी. क्योंकि उसे धोखे से तलाक दिया गया था. सारे हक एकतरफा थे यानी उस की रजामंदी के कोई मायने नहीं थे.

खास बात यह थी कि वाजिद इस बीच दूसरा निकाह भी कर चुका था. जब दारुल उलूम देवबंद से भी उसे निराशा मिली तो उस ने समाज से टकराते हुए 3 तलाक की परंपरा को बदलने के लिए न्यायालय की दहलीज तक पहुंचाने का मंसूबा बना लिया. 3 तलाक का मुद्दा देश के कई हिस्सों में बहस को जन्म दे रहा था और मुसलिम महिलाएं इस परंपरा के खिलाफ खड़ी हो रही थीं.

आतिया ने दिसंबर, 2016 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाल दी, जिसे स्वीकार कर लिया गया. 3 तलाक एक बड़ा मुद्दा बना ही हुआ था और कुछ याचिकाएं पहले से ही अदालत में थीं. देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था, जब मुसलिम महिलाओं ने 3 तलाक के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया था.

सुनवाई पर आतिया अदालत जाती रही. 3 तलाक का मामला चूंकि संवेदनशील और धार्मिक था, इसलिए सुनवाई के लिए अलगअलग धर्म के 5 जजों का समूह बना कर उन्हें 3 तलाक की सुनवाई और फैसले का जिम्मा दिया गया. इस के बाद ही अदालत ने सभी मामलों को जोड़ कर एक साथ सुनवाई कर के 22 अगस्त को फैसला सुना दिया.

आतिया कहती है कि अदालत के फैसले के बाद मुसलिम महिलाओं के लिए आजादी के दरवाजे खुल गए हैं. मामूली बातों पर भी तलाक को हथियार बना कर औरत से छुटकारा पाने की मनमानी वाली मानसिकता से उन्हें निजात मिलेगी और उत्पीड़न बंद होगा.

आतिया अपने पिता के घर रह रही है. वह अपनी बेटियों को पढ़ालिखा कर आगे बढ़ाना चाहती हैं. उस के पिता कहते हैं, ‘मैं ने बेटी के दर्द को करीब से महसूस किया है. समाज में किसी और बेटी के साथ नाइंसाफी न हो, इस लड़ाई का यही मकसद था.’

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अगले दिन ही तलाक

झारखंड के हजारीबाग में एक गांव है चितरपुर. 8 जून, 2012 को इस गांव की फातिमा सुरैया का निकाह बादमगांव के कैफी आलम से हुआ था.

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फातिमा का कहना है कि निकाह के समय 2 लाख रुपए नकद, 6 लाख रुपए के जेवरात और 2 लाख रुपए का अन्य सामान दहेज में दिया गया था. शादी के एक साल बाद फातिमा एक बेटी की मां बनी. उस के जन्म के 6 माह बाद फातिमा से कहा गया कि वह अपने मायके से 5 लाख रुपए लाए, उसे जमीन खरीदनी है.

वह पैसा लाई भी, लेकिन कैफी आलम ने जमीन अपने नाम खरीद ली. इस के कुछ दिनों बाद वह फातिमा के मायके वालों से 2 लाख रुपए की और मांग करने लगा. पैसे नहीं मिले तो ससुराल वाले सुरैया को प्रताडि़त करने लगे. सुरैया फिर भी सहती रही.

23 अगस्त को सब कुछ ठीक था. सुबह को सुरैया ने पति के साथ नाश्ता भी किया. लेकिन शाम को वह घर आया तो अचानक तीन बार तलाक कह कर उसे बेटे के साथ घर से निकाल दिया, साथ ही कहा भी, ‘थाना कोर्टकचहरी जहां भी जाना हो, जाओ.’

सुरैया अपने मायके चली गई. मायके वालों ने कैफी और उस के घर वालों को समझाने की काफी कोशिश की. लेकिन बात नहीं बनी. वे लोग रांची के अंजुमन कमेटी में गए, लेकिन कमेटी ने 20 दिनों बाद निर्णय लेने की बात कही.

आखिर सुरैया ने थाना कड़कागांव में अपने ससुर फकरे आलम, सास रोशन परवीन, ननद सुबैया आलम और ननदोई परवेज मलिक के खिलाफ दहेज के लिए प्रताडि़त करने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. फैसला तो एक दिन पहले ही आ गया था. अब शायद सुरैया को राहत मिले.

3 तलाक के चक्कर में जान तक लगा दी दांव पर

जिला बरेली के आंवला क्षेत्र के गांव कुड्डा की रहने वाली 3 तलाक पीडि़ता अजरुन्निसा जिल्लत की जिंदगी से इतनी तंग आ गई थी कि 12 मई, 2017 को उस ने जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर आत्मदाह की कोशिश की. उस ने अपने ऊपर मिट्टी का तेल डाल लिया था, गनीमत यह रही कि आग लगाने से पहले वहां मौजूद सिपाहियों ने उसे बचा लिया.

घटना से 4 महीने पहले ही अजरुन्निसा का निकाह बरेली के सीबीगंज निवासी तौफीक से हुआ था. शादी के बाद से तौफीक उस पर गलत काम के लिए दबाव डाल रहा था. वह नहीं मानी तो तौफीक उस के साथ मारपीट करने लगा. इस से भी उस का मन नहीं भरा तो शादी के 2 महीने बाद उस ने 3 बार तलाक कह कर अजरुन्निसा को घर से निकाल दिया.

इस के बाद अजरुन्निसा ने न्याय के लिए थाने से ले कर अधिकारियों तक के यहां गुहार लगाई. धर्म के ठेकेदारों के पास भी गई, पर हर जगह निराशा ही मिली. अंतत: उस ने आत्मदाह करने का फैसला किया. बहरहाल, वह बच तो गई, पर उसे न्याय कहीं से नहीं मिला. सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद भी वह न्याय की मुंतजिर है.

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