पीएनबी घोटाला : मिलीभगत की असली कहानी

किसी हिंदी फिल्म की शुरुआत के लिए भी शायद यह अति नाटकीय सीन लगे और निर्देशक आंख में इतने धूलझोंकू सीन को फिल्माने से मना कर दे, जैसी हकीकत पंजाब नैशनल बैंक की मुंबई स्थित ब्रेडी हाउस ब्रांच घोटाले से सामने आई है. जैसा कि बैंक के एमडी सुनील मेहता बताते हैं, ‘यह सब 2011 से ही चल रहा था और 3 जनवरी 2018 को 11,360 करोड़ रुपए के घोटाले के रूप में सामने आया.’

अब सामने कैसे आया, जरा यह भी देख लीजिए. कई महीने पहले नीरव मोदी के कुछ अधिकारी पंजाब नैशनल बैंक की ब्रैंडी हाउस शाखा पहुंचे. उन्होंने बैंक के मैनेजर से कहा कि उन्हें हांगकांग से कुछ सामान मंगाना है. सामान मंगाने के लिए उन्होंने बैंक से एलओयू यानी लेटर औफ अंडरटेकिंग जारी करने को कहा. उन्होंने ये लेटर औफ अंडरटेकिंग हांगकांग में मौजूद इलाहाबाद बैंक और एक्सिस बैंक के नाम पर जारी करने की गुजारिश की.

भारत में लेटर औफ अंटरटेकिंग का मतलब यह होता है कि किसी अंतरराष्ट्रीय बैंक या किसी भारतीय बैंक की अंतरराष्ट्रीय शाखा कारोबारी का अपना बैंक का साखपत्र जारी करता है, जिस का मतलब यह होता है कि आप इन साहब को इन की बताई हुई पार्टी को इतनी रकम का भुगतान कर दें. ये यह रकम 90 दिनों या अधिकतम 180 दिनों में लौटा देंगे. अगर ऐसा नहीं होता तो इस की भरपाई हम (यानी एलओयू या साखपत्र जारी करने वाला वाला बैंक) कर देंगे. यह शौर्ट टर्म लोन होता है.

इस लेटर के आधार पर कोई भी कंपनी दुनिया के किसी भी हिस्से में राशि को निकाल सकती है. इन एलओयू का इस्तेमाल ज्यादातर आयात करने वाली कंपनियां, विदेशों में भुगतान के लिए करती हैं. लेटर औफ अंडरटेकिंग किसी भी कंपनी को लेटर औफ कंफर्ट के आधार पर दिया जाता है. लेटर औफ कंफर्ट का मतलब होता है कि उसे कंपनी के स्थानीय बैंक की ओर से जारी किया गया है,यह उस कारोबार के लिए होता है, जो हो रहा होता है. यहां पीएनबी से यह गारंटी देने को कहा गया कि वह हांगकांग स्थित उन बैंकों को दे दे जिन का नाम ऊपर लिखा गया है.

पीएनबी ने हांगकांग में मौजूद इलाहाबाद बैंक को 5 और एक्सिस बैंक को 3 लेटर औफ अंडरटेकिंग जारी कर दिए. हांगकांग से करीब 280 करोड़ रुपए का सामान इंपोर्ट किया गया. कुछ महीने गुजर गए यानी वह पीरियड निकल गया, जितने दिनों बाद एलओयू के आधार पर भुगतान होना था.

अब 18 जनवरी को नीरव मोदी के कुछ अधिकारियों के साथ जिन बैंकों को एलओयू जारी किया गया था, उन के कुछ लोग बैंक पहुंचते हैं. वे अपने इंपोर्ट दस्तावेज दिखाते हुए कहते हैं कि पैसों का भुगतान कर दिया जाए. लेकिन अब वह बैंक मैनेजर नहीं है, जो इन के जारी करने के समय था. अत: वह कहता है कि जितना भी पैसा विदेश में भेजना है, उतना नकद जमा करना पड़ेगा.

कंपनियों के अधिकारियों ने फिर लेटर औफ अंडरटेकिंग दिखाया और उस के आधार पर पेमेंट करने को कहा. बैंक ने जब इन एलओयू की जांच शुरू की तो उन के होश उड़ गए. क्योंकि बैंक के रिकौर्ड में तो इन 8 लेटर औफ अंडरटेकिंग का कहीं जिक्र ही नहीं था. मतलब बैंक ने बिना कोई गारंटी लिए, बिना कुछ गिरवी रखे लेटर औफ अंडरटेकिंग जारी कर दिए थे. संक्षेप में यही पीएनबी घोटाला है, जिसे हीरा व्यापारी नीरव मोदी और उस के मामा मेहुल चौकसी ने अंजाम दिया है.

हकीकत पता चली तो मालूम हुआ घोटाला अरबों का है

बहरहाल, इस हकीकत के उजागर होने के बाद पीएनबी को तात्कालिक रूप से 280 करोड़ और जब पूरे मामले को खंगाला गया तो पता चला कि 11,360 करोड़ रुपए की चपत लग चुकी थी. इस के पता चलते ही पीएनबी के एमडी के मुताबिक, तुरंत संबंधित जांच एजेंसियों को इस की जानकारी दी गई. मगर सवाल यह है कि जब एलओयू मुंहजुबानी वायदे पर नहीं जारी किए जाते, बल्कि इस के पीछे कोई मजबूत गारंटी होती है तो फिर नीरव मोदी के मामले में ऐसा कैसे हुआ? आखिर कौन है ये नीरव मोदी?

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नीरव मोदी हीरे की ज्वैलरी का बहुत बड़ा कारोबारी है, जोकि इस खुलासे के पहले ही समझा जाता है कि 1 जनवरी 2018 को 4 बड़े बड़े सूटकेसों के साथ हिंदुस्तान छोड़ चुका है, जिस के बारे में भारत सरकार के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें नहीं पता कि वह गया कहां या कहां है?

यह अलग बात है कि वह बैंक को लेटर भी लिख रहा है और धमकी भी दे रहा है. बहरहाल, ग्लैमर की दुनिया में भी इस 48 वर्षीय शख्स की खूब धाक थी. उस के नाम यानी ‘नीरव मोदी’ के नाम से हीरों का बड़ा ब्रांड है. कहा जाता है कि मेहमानों को लुभाने के लिए वह पेड़ों को भी हीरों से जड़ देता है. मौडल्स नीरव मोदी के करोड़ों के गहने पहन कर इतराती हैं. फिल्म एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा से ले कर सिद्धार्थ मल्होत्रा तक नीरव मोदी के लिए विज्ञापन कर चुके हैं.

48 साल के नीरव की तीन कंपनियां हैं, जिन में एक हीरों का कारोबार करने वाली ‘फायरस्टार डायमंड’और दूसरी खुद उसी के नाम की ‘नीरव मोदी’. इन्हीं 2 कंपनियों के जरिए ये घोटाला हुआ, जिस की तह में है महत्त्वाकांक्षा.

नीरव अपने ब्रांड, नीरव मोदी को दुनिया का सब से बड़ा लग्जरी ब्रांड बनाना चाहता था. वह दुनिया की डायमंड कैपिटल कहे जाने वाले बेल्जियम के एंटवर्प शहर के मशहूर डायमंड ब्रोकर परिवार से ताल्लुक रखता है. एक वक्त ऐसा था कि वह खुद ज्वैलरी डिजाइन नहीं करना चाहता था, लेकिन पहली ज्वैलरी डिजाइन करने के बाद उस ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

नीरव मोदी भारत की उस एकमात्र भारतीय ज्वैलरी ब्रांड का मालिक है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित है. उस के डिजाइन किए गए गहने हौलीवुड की हस्तियों से ले कर देशी धनकुबेरों की पत्नियों तक की शोभा बढ़ाते रहे हैं. उस के द्वारा डिजाइन किया गया गोलकोंडा नेकलेस 2010 में नीलामी के जरिए 16.29 करोड़ में बिका था. जबकि 2014 में उस के द्वारा डिजायन किया एक हीरा 50 करोड़ रुपए में नीलाम हुआ था.

अपनी ज्वैलरी ब्रांड के दम पर ही वह फोर्ब्स की भारतीय धनकुबेरों की 2017 की सूची में 84वें नंबर पर मौजूद था. उस की माली हैसियत लगभग 12 हजार करोड़ रुपए की है, जबकि माना जा रहा है कि उस की निजी कंपनी 149 अरब रुपए के आसपास की है. दिल्ली में नीरव मोदी का शोरूम डिफेंस कालोनी में है.

इस धनकुबेर ने जो घोटाला किया, उस के संबंध में पंजाब नैशनल बैंक से जो हकीकत बाहर आई है, वह यह है कि बैंक ने एलओयू जारी नहीं किए, बल्कि बैंक के 2 कर्मचारियों ने चोरी से फरजी एलओयू बना कर दिए. इन कर्मचारियों के पास स्विफ्ट सिस्टम का कंट्रोल था, जो 200 देशों की बैंकिंग गतिविधियों के लिए आधिकारिक तकनीक है.

बैंकों की दुनिया का यह एक अति सीक्रेट अंतरराष्ट्रीय कम्युनिकेशन सिस्टम है. यह दुनिया के सभी बैंकों को आपस में जोड़ता है. इस स्विफ्ट सिस्टम से जो संदेश जाते हैं, वो उत्कृष्ट तकनीक का इस्तेमाल करते हुए कोड में भेजे जाते हैं. एलओयू भेजना, खोलना, उस में बदलाव करने का काम इसी सिस्टम के जरिए किया जाता है. इसी कारण से जब इस सिस्टम के जरिए किसी बैंक को संदेश मिलता है तो उस बैंक को पता होता है कि ये आधिकारिक और सही संदेश है.

लेकिन नीरव को भेजे गए दस्तावेजों में असल में बैंक का कोई दस्तावेज था ही नहीं यानी इस के साथ बैंक ने उस व्यापारी को कोई लिमिट नहीं दी थी, ब्रांच मैनेजर ने स्विफ्ट सिस्टम से इसे भेजने वाले को कोई कागज हस्ताक्षर कर के नहीं दिया कि इसे आगे भेजा जाए. उन्होंने चुपचाप एलओयू भेज दिया. जबकि इस माध्यम से आए किसी संदेश पर कभी कोई बैंक शक नहीं करता. लेकिन बात यह है कि किसी सिस्टम को संभालने वाला आखिर कोई न कोई व्यक्ति ही तो होता है.

सब कुछ हुआ बैंककर्मियों की मदद से

माना जा रहा है कि पीएनबी में इस काम को करने वाले 2 लोग थे, एक क्लर्क जो इस में डेटा डालता था और दूसरा अधिकारी जो इस जानकारी की आधिकारिक पुष्टि करता था. दोनों मिल कर नीरव के लिए काम करते थे. यही नहीं अब पता चला है कि ये दोनों कई सालों तक इसी डेस्क पर काम कर रहे थे, जोकि नहीं होना चाहिए था. इस पद पर काम करने वालों की अदलाबदली होती रहनी चाहिए.

एक और बात है कि स्विफ्ट सिस्टम कोर बैंकिंग से नहीं जुड़ा था. क्योंकि कोर बैंकिंग में पहले एलओयू बनाया जाता है और फिर वह स्विफ्ट के मैसेज से चला जाता है. इस कारण कोर बैंकिंग में एक कौन्ट्रा एंट्री बन जाती है कि अमुक दिन बैंक ने अमुक राशि का कर्ज देने की मंजूरी दी है तो अगले दिन जब बैंक का मैनेजर अपनी फाइलें यानी बैलेंसशीट देखता तो उसे पता चल जाता है कि बैंक ने बीते दिन कितने कर्जे की मंज़ूरी दी है.  लेकिन इस मामले में स्विफ्ट कोर बैंकिंग से जुड़ा हुआ नहीं था.

इन दोनों ने फरजी मैसेज को स्विफ्ट से भेजा, मैसेज भी गायब कर दिया और इस की कोर बैंकिंग में एंट्री नहीं की तो कुछ पता भी नहीं चला.  बैंक का पूरा सिस्टम कैसे बाईपास हो गया, अगर कोई चोर कोई निशान या सबूत ना छोड़े तो उसे पकड़ना बहुत मुश्किल होता है. खासकर तब जब कोई संदेह भी नहीं कर रहा है.

कोई संदेह करे तो इस मामले में जांच की जा सकती है, लेकिन ऐसा कुछ हुआ ही नहीं. वो एक बैंक से पैसे लेते रहे और दूसरे को चुकाते रहे. आज 50 मिलियन के एलओयू खोले, जब तक अगले साल इसे चुकाने की बारी आई तो उन्होंने तब तक 100 मिलियन के और करा लिए. अब उन्होंने पहले लिए गए 50 मिलियन चुका दिए और अगला कर्ज़ किसी और बैंक से ले लिया गया.  इस प्रकार से ये लेनदेन महीनों तक चलता रहा.

सवाल है कि इस पूरे खेल का माटरमाइंड कौन है? जैसेजैसे जांच आगे बढ़ रही है पता चल रहा है कि इस घोटाले का सूत्रधार नीरव मोदी नहीं बल्कि कोई और ही था. यह नीरव की अमेरिकन पत्नी एमी थी, जिस ने इस बड़े घोटाले की साजिश रची. यही नहीं, घोटाले का मास्टरमाइंड होने के साथ साथ नीरव के अमेरिका भागने के साजिश के पीछे भी एमी का ही दिमाग बताया जा रहा है.

माना जा रहा है कि यह बैंकिंग घोटाला हनीट्रैप के जरिए अंजाम दिया गया है. कुछ मौडल्स के जरिए बैंक के उच्च अधिकारियों को घोटाले में शामिल किया गया था. इन मौडल्स को हनीट्रैप के लिए कोऔर्डिनेट करने का काम एमी मोदी का था, जो नीरव मोदी और बौलीवुड के बीच एक कड़ी का काम कर रही थी.

वास्तव में पीएनबी की ब्रेडी फोर्ड ब्रांच के जिस पूर्व डिप्टी मैनेजर गोकुलनाथ शेट्टी को 17 फरवरी, 2018 को गिरफ्तार किया गया, 2013 में उस का ट्रांसफर इस ब्रांच से किया जाना था, जिसे रुकवा दिया गया. इस के बाद  2015 में 5 साल पूरे होने पर भी उस का ट्रांसफर ब्रांच से नहीं किया गया. सीबीआई अब ये पता लगाने की कोशिश कर रही है कि किस के इशारे पर शेट्टी का ट्रांसफर रोका गया.

वास्तव में गोकुलनाथ शेट्टी के ट्रांसफर को रुकवाने में भी मौडल्स और हनीट्रैप का इस्तेमाल हुआ. गोकुलनाथ शेट्टी ने एक बड़ा खुलासा किया है. उस के मुताबिक यह पूरा मामला पीएनबी के बड़े अधिकारियों की जानकारी में था. सीबीआई की तरफ से डायमंड किंग नीरव मोदी और गीतांजलि जेम्स के प्रमोटर मेहुल चौकसी के खिलाफ शिकायत के बाद एफआईआर दर्ज की गई है.

नीरव मोदी और मेहुल चौकसी इस घोटाले के मुख्य आरोपी हैं और उन्हें देखते ही पकड़ने के लिए लुकआउट नोटिस भी जारी किया जा चुका है. विदेश मंत्रालय ने नीरव मोदी और मेहुल चौकसी का पासपोर्ट निलंबित कर दिया है और इन के विदेशों के आउटलेट्स पर भी कारोबार न करने का आदेश दिया जा चुका है. रिजर्व बैंक ने स्पष्ट कर दिया है कि इस घोटाले में फंसी राशि का बोझ पीएनबी को खुद उठाना पड़ेगा.

सीबीआई जांच तो कर सकती है, पर पैसा नहीं ला सकती

यह मामला जनवरी में पकड़ा गया और 29 जनवरी, 2018 को इस की जांच सीबीआई से करवाने का अनुरोध किया गया. दूसरे सभी बैंकों ने सारी जिम्मेदारी पीएनबी पर ही डाली है कि उस की तरफ से जारी लेटर औफ अंडरटेकिंग (एलओयू) को सही मानते हुए नियमों के मुताबिक, संबंधित उद्योगपतियों की कंपनियों को फंड उपलब्ध कराए जा रहे थे. ऐसे में घाटा पूरी तरह से पीएनबी को उठाना पड़ेगा.

आरबीआई के सूत्रों का कहना है कि पीएनबी पर सख्ती दिखा कर देश के सभी बैंकों के सामने एक उदाहरण पेश करने की जरूरत है.

अगर यह मान भी लिया जाए कि दूसरे बैंक इस में शामिल थे, तब भी इस की शुरुआत पीएनबी की उस शाखा से हो रही थी, जहां से नीरव मोदी व अन्य रत्न व आभूषण कारोबारियों को नियमों की अनदेखी कर के हीरेमोती आयात करने के लिए लेटर औफ अंडरटेकिंग (एलओयू) जारी किए जा रहे थे. इसलिए यह घाटा पीएनबी को ही उठाना चाहिए. घोटाले की राशि 11,360 करोड़ रुपए की है, जो पीएनबी के पूरे बाजार पूंजीकरण का तकरीबन एक तिहाई है.

नीरव ने राजस्थान में बिखेरी हीरों की चमक

देश के सब से बड़े बैंकिंग घोटाले को अंजाम देने वाले नीरव मोदी का राजस्थान से गहरा नाता रहा है. नीरव मोदी की कंपनी गीतांजलि जेम्स की जयपुर में 3 फैक्ट्रियां हैं. इन में 2 फैक्ट्रियां जयपुर के सीतापुरा औद्योगिक क्षेत्र में और एक सीतापुरा सेज में है. इन में आभूषण बनाने का काम होता है.

इस कंपनी के प्रमोटर मेहुल चौकसी हैं. इन फैक्ट्रियों पर 15 फरवरी को ईडी ने छापे मारे. इस के अगले दिन जयपुर में 2 अन्य ठिकानों पर ईडी ने छापे मारे. इन पांचों जगहों से 10 करोड़ 44 लाख करोड़ रुपए के हीरे, रंगीन रत्न, जवाहरात और आभूषण जब्त किए गए. साथ ही महत्त्वपूर्ण दस्तावेज भी जब्त किए गए. कंपनी का एक बैंक खाता फ्रीज किया गया. इस खाते में एक करोड़ से ज्यादा की रकम जमा थी.

इस बैंकिंग घोटाले में भरतपुर की लक्ष्मण मंदिर शाखा के मुख्य प्रबंधन आर.के. जैन और सर्किल कार्यालय में कार्यरत अधिकारी पी.सी. सोनी को भी निलंबित कर दिया गया है. ये दोनों अधिकारी मुंबई की ब्रेडी हाउस शाखा में कार्यरत रहे थे. बैंक प्रबंधन उन सभी अधिकारियों पर काररवाई कर रहा है, जो 2011 से अब तक मुंबई की ब्रेडी हाउस शाखा में कार्यरत रहे हैं.

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बैंक प्रबंधन को शक है कि इन में कोई अधिकारी भले ही घोटाले में शामिल न हो, लेकिन जांच को प्रभावित कर सकता है. आर.के. जैन ब्रेडी हाउस शाखा में सन 2012 से 2015 तक सेकंड इंचार्ज के रूप में कार्यरत रहे थे. वे भरतपुर की रणजीत नगर कालोनी के रहने वाले हैं. पी.सी. मीणा अप्रैल, 2011 से नवंबर 2011 तक मुंबई की इसी शाखा में कार्यरत थे. वहां वे कौन्ट्रैक्टर औडिटर के पद पर कार्यरत थे. ये दोनों अधिकारी स्केल 4 के थे.

हीरे के कारोबार में पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाने वाला नीरव मोदी भव्य पार्टियों व रईसों के साथ रहने का शौकीन है. उस ने करीब 2 साल पहले जोधपुर में अपने हीरों की चमक से लोगों को चकाचौंध कर दिया था. नीरव मोदी ने अपने ब्रांड के 5 साल पूरे होने पर मारवाड़ के ताज के रूप में मशहूर जोधपुर के उम्मेद भवन में देशविदेश की नामी हस्तियों के साथ 2 दिन के जश्न का आयोजन किया था.

इस आयोजन में फैशन डिजाइनर राघवेंद्र, कविता राठौड़, मनीष मल्होत्रा, योहानन, मिशेल पूनावाला, इशिता, राज, दीप्ति सालगांवकर, चिराग, तनाज जोशी, लीजा हेडन, निखिल व इलिना मेशवानी सहित देशविदेश की नामी मौडल्स ने भाग लिया था. इस जश्न में जोधपुर के पूर्व महाराजा गज सिंह भी खासतौर से शरीक हुए थे. नीरव मोदी ने इस मौके पर अपने ब्रांड के तहत तैयार किए गए हीरों के आभूषणों की प्रदर्शनी भी लगाई थी. इस प्रदर्शनी के दौरान देशविदेश की टौप मौडल्स ने नीरव के हीरे के आभूषण पहन कर कैटवाक किया था.

काश ! तभी चेत जाते

वैसे देश के बैंकिंग क्षेत्र को हिला देने वाले पीएनबी घोटाले की शुरुआत 2013 में इलाहाबाद बैंक की निदेशक मंडल की बैठक में ही हो गई थी. नई दिल्ली में हुई उस बैठक में गीतांजलि ज्वैलर्स के मालिक मेहुल चौकसी को 550 करोड़ रुपए देने को मंजूरी दी गई थी. मेहुल चौकसी रिश्ते में घोटालेबाज नीरव मोदी के मामा हैं.

बाद में मामाभांजे ने मिल कर बैकों को हजारों करोड़ का चूना लगाया. चौकसी को बैंक की हांगकांग शाखा से भुगतान किया गया था. इलाहाबाद बैंक पीएनबी सहित देश के 4 अन्य सरकारी बैंकों को लीड करता है. आभूषण कारोबारी नीरव मोदी और गीतांजलि, नक्षत्र और गिन्नी ज्वैलरी चेन चलाने वाले मेहुल चौकसी मूलत: गुजरात के हैं. दोनों मुंबई में रहते हैं.

नई दिल्ली के होटल रेडिसन में 14 सितंबर, 2013 को इलाहाबाद बैंक के निदेशक मंडल की बैठक हुई. इस में भारत सरकार की ओर से नियुक्त निदेशक दिनेश दुबे ने चौकसी को 550 करोड़ लोन देने का विरोध किया.

16 सितंबर को इस बैठक की जानकारी दुबे ने भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन डिप्टी गवर्नर के.सी. चक्रवर्ती को दी. इस के बाद बैंक अधिकारियों को तलब भी किया गया, लेकिन इस के बावजूद मेहुल चौकसी को बैंक की हांगकांग शाखा से भुगतान कर दिया गया.

सवाल है अब पीएनबी एक झटके में इस राशि को किस तरह से उठाएगा. पीएनबी को इस राशि को इसी तिमाही में अपनी बैलेंसशीट में दिखाना होगा. इस बारे में पीएनबी, वित्त मंत्रालय और आरबीआई के बीच विचारविमर्श शुरू हो चुका है.

सूत्रों के मुताबिक एक सीधा उपाय यह है कि फिलहाल सरकार की तरफ से पीएनबी को दी जाने वाली पूंजीकरण की राशि बढ़ा दी जाए. दूसरा रास्ता यह है कि केंद्रीय बैंक की तरफ से पीएनबी के लिए विशेष उपाय किए जाएं.

क्योंकि छापों से जो 5100 और इस के बाद 650 करोड़ पकडे़ जाने के दावे किए गए वे सब झूठे हैं. मुश्किल से 1000 करोड़ ही बरामद होंगे.

रोटोमैक कंपनी के मालिक विक्रम कोठारी भी आए सीबीआई के शिकंजे में

डायमंड कारोबारी नीरव मोदी और मेहुल चौकसी के बाद कानपुर की रोटोमैक कंपनी के मालिक विक्रम कोठारी भी अचानक सुर्खियों में आ गए. आरोप है कि उन्होंने कई बैंकों को अरबों रुपए का चूना लगाया था.

रोटोमैक एक जानीमानी कंपनी है. इस कंपनी के मालिक विक्रम कोठारी ने इलाहाबाद बैंक, यूनियन बैंक, बैंक औफ इंडिया सहित कई सरकारी बैंकों से करीब 2919 करोड़ रुपए का लोन लिया था. यह लोन लेने के बाद उन्होंने न तो इस का ब्याज चुकाया और न ही मूलधन. बल्कि वह खुद भी सामने आने से बचते रहे. पिछले कुछ दिनों से इस बात की भी खबरें आनी शुरू हो गई थीं कि विक्रम कोठारी देश छोड़ कर जा चुके हैं.

सूद और मूलधन न मिलने पर पिछले साल बैंक औफ बड़ौदा ने विक्रम कोठारी को विलफुल डिफाल्टर घोषित कर दिया था. जब विक्रम कोठारी को इस बात की जानकारी हुई तो वह इलाहाबाद हाईकोर्ट चले गए. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डी.बी. भोसले और जस्टिस यशवंत वर्मा की खंडपीठ ने उन की याचिका मंजूर कर ली.

इस याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्होंने बैंक को आदेश दिया कि विक्रम कोठारी की कंपनी को विलफुल डिफाल्टर लिस्ट से बाहर किया जाए. बैंक को माननीय हाईकोर्ट का आदेश मानने के लिए बाध्य होना पड़ा.

विक्रम कोठारी के खिलाफ बैंक द्वारा सीबीआई में शिकायत दर्ज कराई जा चुकी थी. सीबीआई को कोठारी की तलाश थी. 18 फरवरी को विक्रम कोठारी कानपुर में एक वैवाहिक समारोह में शामिल होने के लिए आए थे. सीबीआई को पता चला तो उस ने 19 फरवरी की रात 1 बजे उन के घर पर छापा मार कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

2500 करोड़ का विलफुल डिफाल्टर चढ़ा सीबीआई के हत्थे

बैंकों से हजारों करोड़ रुपए का कर्ज लो और विदेश भाग जाओ. इस तरह की प्रवृत्ति वाले उद्योगपतियों की संख्या भारत में बढ़ती जा रही है. ऐसे उद्योगपति यह काम एक सोचीसमझी साजिश के तहत करते हैं. उन के फरार हो जाने के बाद बैंक और सरकार लकीर पीटती रह जाती हैं.

जिस तरह विजय माल्या बैंकों के 5600 करोड़ रुपए ले कर फरार हो गया, उसी तरह भारत के ही एक और उद्योगपति कैलाश अग्रवाल भी बैंकों से करीब ढाई हजार करोड़ रुपए का कर्ज ले कर फरार हो गए थे. देश के सब से बड़े विलफुल डिफाल्टर्स में से एक कैलाश अग्रवाल को सीबीआई ने 5 अगस्त, 2017 को गिरफ्तार किया था.

वरुण इंडस्ट्रीज के प्रमोटर्स कैलाश अग्रवाल और उन के पार्टनर किरण मेहता ने चेन्नै स्थित इंडियन बैंक से 330 करोड़ रुपए का कर्ज लिया था. इस के अलावा उन्होंने एक सोचीसमझी साजिश के तहत अन्य बैंकों से भी 1593 करोड़ रुपए कर्ज लिए. सन 2007 से 2012 के बीच इन्होंने कई बैंकों से वरुण इंडस्ट्रीज और इस की सहयोगी कंपनी वरुण जूल्स के नाम पर 10 सरकारी बैंकों से करीब 1242 करोड़ रुपए का कर्ज लिया.

कैलाश अग्रवाल और किरण मेहता ने सरकारी बैंकों के अलावा प्राइवेट बैंक्स, फाइनेंस कंपनियों से भी लोन लिया. शेयर्स के बदले बाजार से भी इन्होंने काफी पैसा उठा लिया. लोन की राशि उन्होंने नहीं चुकाई, जिस से सन 2013 में ये डिफाल्टर हो गए. बैंकों ने इन के पास कई नोटिस भेजे, पर ये दोनों यहां होते, तब तो मिलते. दोनों कभी के विदेश जा चुके थे. मार्च 2013 में इंडियन बैंक एंप्लाइज एसोसिएशन द्वारा तैयार की गई विलफुल डिफाल्टर्स की सूची में इन दोनों उद्योगपतियों का नाम भी शामिल था. इंडियन बैंक की शिकायत पर सीबीआई ने वरुण इंडस्ट्रीज के प्रमोटर कैलाश अग्रवाल और किरण मेहता के खिलाफ आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और फरजीवाड़े का केस दर्ज कर लिया.

सीबीआई ने जांच की तो पता चला कि ये दोनों सब से बड़े विलफुल डिफाल्टर्स में से हैं. सब से बड़े विलफुल डिफाल्टर सूरत के डायमंड कारोबारी हैं, जिन पर 7 हजार करोड़ रुपए का कर्ज है. दूसरे नंबर पर लंदन भागे विजय माल्या का नाम आता है, जिन पर 5600 करोड़ रुपए का कर्ज है. कैलाश अग्रवाल भी अपने साथी किरण मेहता के साथ दुबई भाग गए थे. तब से सीबीआई इन के पीछे लगी थी. 5 अगस्त, 2017 को कैलाश अग्रवाल जब दुबई से भारत लौटे, तो सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

सरकार बैंकों को दे चुकी है ढाई लाख करोड़ से ज्यादा

कारपोरेट फ्रौड और बैड लोन की वजह से बैंकों की हालत दिनोंदिन खराब होती जा रही है. पब्लिक सेक्टर बैंकों को एनपीए से उबारने के लिए सरकार प्रयासरत है. सरकार पिछले 11 सालों में बैंकों को ढाई लाख करोड़ से ज्यादा दे चुकी है, इस के बावजूद बैंक एनपीए से उबर नहीं पा रहे हैं.

बजट बनाते समय वित्त मंत्रियों के सामने 2 बड़ी समस्याएं होती हैं. पहली खर्च की जरूरत पूरी करना जिस से सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं को सुधारा जा सके और दूसरी  राजकोषीय घाटे को कम करना. क्योंकि टैक्स का कलेक्शन काफी नहीं होता. इन के अलावा हाल के सालों में वित्त मंत्रालय के सामने एक और नई चुनौती उभर कर सामने आई है और वह चुनौती है सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को संभालने की.

पिछले 11 सालों में देश के 3 वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी, पी. चिदंबरम और अरुण जेटली पब्लिक सेक्टर बैंकों को एनपीए से उबारने के लिए 2.6 लाख करोड़ रुपए दे चुके हैं. यह राशि सरकार द्वारा इस साल ग्रामीण विकास के लिए आवंटित की गई राशि के दोगुने से ज्यादा है.

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एसबीआई सहित अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक एनपीए के कारण पिछले 2 वित्त वर्ष से घाटे में हैं. बताया जाता है कि इस वित्त वर्ष में भी बैंकों के हालात सुधरते नहीं दिख रहे. भारतीय स्टेट बैंक ने पिछले 18 सालों में पहली बार तिमाही घाटा दर्ज किया.

यही हाल बैंक औफ बड़ौदा का है. सरकारी बैंकों का मानना है कि मुद्रा समेत कई सरकारी योजनाओं के लिए कर्ज देना पड़ रहा है, इस से भी स्थिति बिगड़ी है. जबकि आम लोगों का मानना है कि जब करोड़ों रुपए कर्ज के बकाएदार बैंकों को कर्ज नहीं लौटाएंगे तो बैंकों की स्थिति दयनीय तो होगी ही.

हिना खान को मिली MMS लीक करने की धमकी

बिग बौस 11 भले ही खत्म हो गया हो, लेकिन शिल्पा शिंदे और हिना खान की कैटफाइट अभी भी जारी है. जब से शिल्पा ने ट्विटर पर एक MMS वीडियो शेयर किया है, तब से दोनों आमने-सामने हैं. अब दोनों अभिनेत्रियों की इस लड़ाई में उनके फैंस भी कूद पड़े हैं. ताजा अपडेट ये है कि शिल्पा के फैन ने हिना खान का MMS सोशल मीडिया पर लीक करने की धमकी दी है. मालूम हो कि शिल्पा शिंदे ने अपने एमएमएस पर पिछले साल उड़ी खबरों पर सफाई देने के लिए हाल ही में अपने ट्विटर अकाउंट पर एक पोर्न वीडियो अपलोड किया था. जिसके बाद हिना खान ने एक सेलिब्रिटी होने के नाते शिल्पा की इस हरकत को गलत ठहराया. इसके बाद शिल्पा के फैंस ने हिना को बुरी तरह से ट्रोल करना शुरू कर दिया.

अब यह बात इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि शिल्पा के एक फैन ने हिना के किसी फेक एमएमएस को आनलाइन लीक करने की धमकी दे डाली. उसने हिना को निशाना बनाते हुए सोशल मीडिया पर लिखा, हिना जैसे लोगों के फैंस नहीं क्लाइंट होते हैं. जैसे ही ये ट्वीट वायरल हुआ हिना के बौयफ्रेंड रौकी जायसवाल का गुस्सा फुट पड़ा. उन्होंने इस कमेंट को गलत ठहराते शिल्पा के प्रशंसक को आड़े हाथ लिया और एक ट्विट किया गंदगी को छुपाने के लिए वे हर जगह गंदगी फैला रहे हैं. बकवास तर्क और तुलनाएं हो रही हैं. लेकिन मैं बता दूं कि ऐसी ओछी हरकतों से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता. तुम अपने आइडल को पसंद करो. जिसे अभी भी कोई समझ नहीं है और जिसका इस मुद्दे पर कोई सेंसिबल स्पष्टीकरण नहीं है.

इसके बाद रौकी ने दूसरे ट्वीट में लिखा- आपके आइडल और उनके मीडिया हैंडलर्स नफरत और दुर्व्यहार को प्रमोट कर रहे हैं. जैसे कि अभी तक बिग बौस-11 चल रहा हो. आपके गुनाह को छिपाने के लिए अब कोई पर्दा नहीं है. अब ये शुरू ना करें कि कौन प्रमोशन चाहता है और कैसे.

रौकी नें इसके बाद एक और ट्वीट यानी कि तीसरा ट्वीट करते हुए लिखा- चलो अब आपस में हमारी बुराई करो और खुश रहो. जैसा कि तुम कर सकते हो. बेहतर जिंदगी जियो. डियर ट्रोल्स, हम असल में आप पर और आपके घटिया कमेंट्स पर हंसते हैं. हालांकि जब फीमेल फैन ने हिना का MMS वायरल करने की बात कही थी, तब शिल्पा के भाई आशुतोष ने फैन से इन सब चीजों से दूर रहने को कहा था.

बंगलादेश के बोल

जिस बंगलादेश को भारत ने 1971 में बनवाया था और उस की साढ़े 7 करोड़ जनता को पाकिस्तान के जुल्मों के कहर से मुक्ति दिलाई थी वही अब भारत को आंख दिखा रहा है. मई 2014 में अपने राजसिंहासन पर चढ़ते समय सफलतापूर्वक सातों पड़ोसी देशों के अध्यक्षों को बुला कर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो आशा बंधाई थी, वह बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में डूब सी गई है.

बंगलादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद ने साफसाफ कह दिया है कि भारत को बंगलादेशचीन संबंधों के बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं है.  बंगलादेश का हक है कि वह अपने विकास के लिए कहीं से भी और किसी से भी सहायता ले सकता है. पाकिस्तान, मालदीव, श्रीलंका, नेपाल और यहां तक कि भूटान भी हमारी विदेश नीति को झटका दे चुके हैं जबकि भारत का साउथ ब्लौक केवल हार पहनाने और झूला झुलाने का काम कर सका था, दोस्त बनाने का नहीं.

भारत जैसे देश के लिए पड़ोसियों से बना कर रखना हमेशा ही कठिन रहा है. नेहरू के जमाने से भारत के पड़ोसी भारत से खार खाए हुए हैं क्योंकि हमारे विदेश मंत्रालय की नाक हमेशा टेढ़ी रही है. जेब में पैसा न होने के बावजूद हम विशाल भूमि, नदियों और निकम्मी व गरीब जनसंख्या के बल पर रोब झाड़ने की कोशिश करते रहे हैं, पर इसी विदेश मंत्रालय के राजनयिक जब गोरों के आगे सहायता के लिए चिरौरियां करते दिखते थे तो उस की कलई खुल जाती थी.

एक देश की विदेश नीति तब सफल होती है जब लेनदेन बराबरी के स्तर पर किए जाएं. देश के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री सदा छोटे देशों पर अपना रोब, बिना कुछ दिए, गांठते रहते थे जो उन देशों को खलता था. चीन ने हाल के सालों में भरपूर कमाया है और उस की मेहनती जनता ने दूसरे कई देशों की जनता के मुकाबले कई गुना काम कर के सिद्ध कर दिया कि धर्म, जाति, रीतिरिवाजों और संकीर्णता से ज्यादा उत्पादन नहीं होता और किसी को कुछ देने लायक बचता भी नहीं.

बंगलादेश की इस बंदर घुड़की को चेतावनी समझना चाहिए. देश के प्रधानमंत्री या सत्तारूढ़ पार्टी के बिछाए जाल के बावजूद हम सब को कड़ी मेहनत करनी चाहिए ताकि अगर हम चीन, अमेरिका, ब्रिटेन पर रोब न गांठ सकें तो कम से कम पाकिस्तान, बंगलादेश को तो जता सकें कि भारत से अलग हो कर उन्होंने भयंकर भूल की है. फिलहाल तो उन्हें लगता है कि 1947 में वे अलग न होते तो भारत धर्मयुद्ध की आग में जल रहा होता और जनता भूखी मर रही होती.

मोदी राज में बोलना मना नहीं है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एकलौती बड़ी ताकत उनका वाकचातुर्य है, वे शब्दों को पिरोना जानते हैं और उनका कारोबार भी कर लेते हैं, उनके इसी हुनर को विपक्षी जुमलेबाजी कहते हैं. बोलना बिलाशक एक कला है जो किसी भी राजनेता को आना अनिवार्य है लेकिन ज्यादा और अनावश्यक बोलने बालों के प्रति आम राय अच्छी नहीं होती. नरेंद्र मोदी का कुछ भी बोलना इसलिए भी खास होता है कि वे शीर्ष संवैधानिक पद पर हैं, लेकिन उनकी खूबी यह है कि वे भाषा और विचारों में एक ऐसा तालमेल बैठालते हैं कि सुनने वालों के पास कोई तर्क नहीं रह जाता.

मोदी कितने और कहां से शिक्षित हैं, यह तो वही जाने पर उनके भाषणों में फिलासफी भी होती है और विकट का आत्मविश्वास भी होता है.  वे अपने आप को वैचारिक रूप से समृद्ध दिखाने की भरपूर कोशिश करते हैं और इसी वक्त में वे बेहद अपरिपक्व भी लगते हैं. यह और बात है कि उनके प्रशंसक यानि भक्त गण उनकी इन्हीं अदाओं पर बलैयां लिए जाते हैं. अभी तक के अधिकांश प्रधानमंत्री आमतौर पर जरूरत के मुताबिक ही बोलते रहे हैं, लेकिन मनमोहन सिंह जरूरत के मुताबिक भी नहीं बोलते थे और नरेंद्र मोदी जरूरत हो न हो बोलने से खुद को रोक नहीं पाते.

मनमोहन सिंह का कम बोलना अगर कमी या कमजोरी थी तो आनुपातिक और संख्यकीय लिहाज से नरेंद्र मोदी का बड़बोलापन कोई खूबी नहीं, बल्कि और बड़ी कमजोरी है, जिससे कभी कभी हीनता की बू भी आती है. यह क्या मानसिकता है और क्या असर लोगों पर डाल रही है इसे समझा जाना बेहद जरूरी है.

मनमोहन सिंह ने आदत के मुताबिक शांत लहजे में कहा कि नरेंद्र मोदी को खुलकर बोलना चाहिए. संदर्भ प्रसंग कठुवा गेंग रेप और उन्नाव गेंग रेप थे, जिन पर मोदी खामोश रहे थे और जो बोले वह सिर्फ एक राजनैतिक रस्म अदायगी भर थी. मनमोहन सिंह ने ताना मारा कि जो सलाह वह मुझे देते थे उसका अनुसरण उन्हें करना चाहिए. इस पर भगवा खेमा तिलमिला उठा.

केंद्रीय मंत्री रविशंकर सिंह ने तो निष्ठा निभाते बात का रुख ही पलटने की असफल कोशिश यह कहते कर डाली कि मोदी राज में देश की ताकत बढ़ी है, इसलिए हमेशा चुप रहने वाले मनमोहन सिंह सवाल नहीं करें.

भाजपा मीडिया सहित हर किसी का मुंह बंद करना चाहती है खासतौर से कोई नरेंद्र मोदी के खिलाफ कुछ बोलता है तो वह अक्षम्य अपराध हो जाता है और यही मोदी राज की असल बढ़ती और बढ़ी ताकत है जिसमें सच देखने, कहने और बोलने की मुमानियत है. कठुवा और उन्नाव में जो हुआ वह देश भर में अब रोज हो रहा है. इसे देख कर आहत होने वाला गुनहगार और देशद्रोही है, क्योंकि वह नरेंद्र मोदी से सवाल करता है कि भाजपा नेताओं और आम राक्षसी प्रवृत्ति के मुजरिमों में फर्क क्या रह गया है. क्या सत्तारूढ़ दल के नेताओं को बलात्कार जैसे जघन्य अपराध करने पर भी कोई घोषित या अघोषित डिस्काउंट मिला हुआ है.

मनमोहन सिंह वरिष्ठ कांग्रेसी नेता, पूर्व प्रधानमंत्री और रिजर्व बैंक के मुखिया रहे हैं, अगर उन्होंने प्रधानमंत्री को बोलने के मामले पर नसीहत दे डाली तो यह उनका सियासी हक था, जिसका अभिप्राय यह था कि नरेंद्र मोदी लच्छेदार भाषण छोड़ जमीनी बात करें और कठुवा और उन्नाव कांडों पर अपना रुख स्पष्ट करें.

ऐसा नरेंद्र मोदी ने शर्मिंदगी जाहिर करते किया भी और यह न कहते उपकार ही किया कि बलात्कारों से तो वैदिक साहित्य भी भरा पड़ा है, धर्मग्रंथों की मिसाल लें तो ऋषि मुनि वगैरह तो बात बात पर गरीब और छोटी जाति की कन्याओं का शील भंग करना अपना हक समझते थे. यही कुछ भाजपा नेताओं ने कर दिया तो उन्होंने गौरवशाली सनातनी परम्परा का ही निर्वाह किया है.

चूंकि दौर कथित लोकतन्त्र का है इसलिए बात घुमाफिराकर कही गई कि बात वाकई  खेद और शर्म की है जिसे दूर करने भक्तगन हरकत में आ गए हैं कि वो मंदिर जहां उस पीड़िता (जिस का नाम और पहचान उजागर करने की सजा जुर्माने की शक्ल में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ मीडिया संस्थानों को दी) का रेप होना बताया जा रहा है, वहां तकनीकी तौर पर पर बलात्कार होना मुमकिन ही नहीं है. पुराने जमाने के जासूसी उपन्यासों के नायक भी इन दलीलों पर सर पीट लेते कि यह हो क्या हो रहा है. हम तो उपन्यासों में ही दफन होकर रह गए और यहां सस्पेंस की हद देखिये कि सरासर हुये बलात्कार की थ्योरी ही उल्टी जा रही है.

कुछ दिनों बाद मुमकिन है यह साबित ही कर दिया जाए कि उन्नाव और कठुवा के गेंग रेप हिंदुवादियों को बदनाम करने की साजिश थी, तो बात कतई हैरानी की नहीं होगी और फिर मनमोहन सिंह जैसे मौनी नेताओं के पास बोलने कुछ रह भी नहीं जाएगा. जैसे अहिल्या की इज्जत लूटकर इंद्र साफ बच निकला था वैसे ही ये देवतुल्य नेता मूंछों पर ताव देते नजर आएंगे कि मोदी राज में कानून व्यवस्था भी मजबूत थी.

दासदेव : फिल्म की कमजोर कड़ी है पटकथा

रोमांटिक, पोलीटिकल व रोमांचक फिल्म ‘‘दास देव’’ लंबे इंतजार के बाद सिनेमाघरों तक पहुंच पाई है. पृष्ठभूमि बदली है, मगर कहानी के केंद्र में राजनीति और प्यार ही है. चाहत, पावर और लत की कहानी के साथ ही हमारे देश की राजनीति का स्तर किस हद तक गिरा हुआ है, इसका नमूना है फिल्म ‘‘दासदेव’’. क्योंकि फिल्म ‘‘दास देव’’ में प्रेम कहानी या हारे हुए प्रेमी की मासूमियत नहीं, बल्कि यह फिल्म गंदी राजनीति के साथ अपनी राजनीतिक विरासत को बढ़ाते रहने की महत्वाकांक्षा की काली दलदल मात्र है.

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की देवदास फिल्मकारों के लिए एक पसंदीदा विषय रहाहै. इस पर 1928 में बनी मूक फिल्म ‘देवदास’ से लेकर अब तक कई फिल्में बनचुकी हैं. इसका आधुनिक वर्जन अनुराग कश्यप की फिल्म ‘देवडी’ थी. और अब तक कहा जा रहा था कि सुधीर मिश्रा की फिल्म ‘‘दास देव’’ भी शरतचंद्र के उपन्यास ‘देवदास’ का आधुनीकरण है. मगर फिल्म की शुरूआत में ही फिल्मकार सुधीर मिश्रा ने स्वीकार किया है कि यह फिल्म शरतचंद्र के उपन्यास ‘देवदास’ के साथ साथ शेक्सपियर के हेलमेट और उनके नाना द्वारिका प्रसाद मिश्रा, जो कभी राजनीति में थे, द्वारा सुनाई गई कहानियों से प्रेरित है. ज्ञातब्य है कि मशहूर लेखक, पत्रकार, कवि द्वारिका प्रसाद मिश्रा 30 सिंतबर 1963 से 29 जुलाई 1967 तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे. पं. जवाहर लाल नेहरू से मतभेद के चलते द्वारिका प्रसाद मिश्रा को 13 वर्ष का राजनीतिक वनवास झेलना पड़ा था. सुधीर मिश्रा की फिल्म ‘‘दास देव’’.

फिल्म की कहानी 1997 में उत्तरप्रदेश के जहानाबाद से शुरू होतीहै, जब राजनेता विश्वंभर चैहाण(अनुराग कश्यप) एक राजनीतिक सभा को संबोधित करते हुए ऐलान करते हैं कि वह किसानों को उनकी जमीन का सही मुआवजा दिलवाकर रहेंगे और अपने छोटे भाई अवधेश(सौरभ शुक्ला) को अगला मुख्यमंत्री बनाने की बात करते हैं. उस वक्त उनका छह सात वर्ष का बेटा देव उनके साथ चलने की जिद करता है, पर वह कहते हैं कि वह अपने चाचा अवधेश व पारो के पिता के साथ रहे. वह जल्द वापस आ जांएगे. भाषण खत्मकर जैसे ही हेलीकोप्टर में बैठकर विश्वंभर चैहाण उड़ते हैं, वैसे ही आसमान में उनका हेलीकोप्टर जलकर स्वाहा हो जाता है. उसके बाद कहानी पूरे 21 वर्ष बाद दिल्ली से शुरू होती है, जहां एक पब में देव(राहुल भट्ट) व पारो(रिचा चड्ढा) दोनों हैं. दोनों एक दूसरे के बचपन के साथी होने के साथ ही एक दूसरे से प्यार करते हैं. देव को ड्रग्स की लत लग चुकी है. ड्रग्स व शराब के नशे में देव कुछ लोगों से मारामारी कर लेता है, तो गुस्से में पारो पब से बाहर आ जाती है, फिर गाड़ी में एक साथ जाते हुए रास्ते में देव, पारो को मनाने की कोशिश करता है. पर कुछ दूर आगे चलने पर सूनी सड़क पर चड्ढा की कार देव की कार को रोकती है.

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चड्ढा ने देव को करोड़ो रूपए कर्ज दे रखा है, जो कि उन्हें वापस चाहिए. इसलिए चड्ढा अपने साथ देव को लेकर जाती हैं. उधर उसी वक्त अवधेश को हृदयाघात होता है और वह अस्पताल पहुंच जाते हैं. इधर पारो, सहाय(दिलीप ताहिल) को फोन करके सारी बात बताती है, उस वक्त सहाय के सामने चांदनी (अदिति राव हैदरी) बैठी होती है. सहाय किसी तरह देव को छुड़ा लेते हैं. अवधेश, सहाय से कहते हैं कि वह देव को संभाले. देव की मां सुशीला को यकीन है कि अवधेश, देव के साथ गलत नही होने देंगे. धीरे धीरे पता चलता है कि चांदनी भी देव से प्यार करती है. पर वह सहाय की गुलाम सी बनी हुई है, क्यांकि सहाय बार बार उसे याद दिलाते रहते हैं कि सहाय की मौत के बाद सारी संपत्ति की मालकिन चांदनी होंगी. चांदनी बहुत ताकतवर है. देश के हर राजनेता से उसके अच्छे संबंध है.

सहाय के कहने पर चांदनी, देव को संभालती है और देव के साथ हम बिस्तर भी होती है. पारो के साथ साथ अवधेश भी चाहते हैं कि देव ड्रग्स व शराब से तौबा कर ले. अवधेश चाहते हैं कि देव उनकी राजनीतिक विरासत को संभाले. मगर यह बात उभरकर आती है कि विश्वंभर को पारो के पिता (अनिल जौर्ज) पर यकीन था और उन्होंने ही पारों के परिवार को रहने के अपनी कोठी के अंदर ही कमरे दिए थे. पर अवधेश पारो के पिता व पारो को पसंद नहीं करते. उन्हें देव व पारो का साथ भी पसंद नहीं है. पर फिलहाल वह अपनी राजनीतिक चालें चलने में मस्त है.

एकदिन गुस्से में पारो, देव से कह देती है कि वह दिल्ली छोड़कर जलाना जा रही है. पारो गांव पहुंचकर अपने पिता के साथ मिलकर किसानों के लिए काम करना शुरू करती है. उधर अपने चाचा अवधेश, सहाय, चांदनी व मां सुशीला के रचे चक्रव्यूह में फंसकर देव भी परिवार की राजनीतिक विरासत को संभालने व राज्य का अगला मुख्यमंत्री बनने के मकसद से जलाना पहुंचकर किसानों के बीच काम करना शुरू करते हैं. बहुत जल्द वह अति लोकप्रिय हो जाते है. मुख्यमंत्री भी देव की सराहना करते हैं.

फिर देव को चमकाने के लिए और पारो के परिवार को फंसाने के मकसद से चांदनी, सहाय व अवधेश मिलकर एक खेल रचते हैं, जिसमें अब तक किसानों के हिमायती माने जाने वाले पारो के पिता पर ही किसानों की जमीन हथियाने से लेकर किसानों की हत्या करने तक का आरोप लग जाता है. और खुद को बीमार बताकर अवधेश अस्पताल में भर्ती होकर वहीं से अपनी गंदी राजनीतिक चाले चलता है.

देव, पारो के पिता को छुडाने में असमथर्ता व्यक्त करते हुए कह देता है कि देव के पिता ने उसके पिता की तरह ऐसा काम कभी न करते. इससे पारो नाराज होकर देव से रिश्ता खत्म कर अपनी उम्र से काफी बड़ी उम्र व विपक्ष के नेता रामाश्रय शुक्ला (विपिन शर्मा) के साथ शादी कर चुनाव लड़ने की तैयारी शुरूकर देती है.

अब शुरू होता है राजनीति का अति गंदा खेल और धीरे धीरे अतीत के काले अध्याय खुलते हैं. पता चलता है कि देव की मां सुशीला व अवधेश के बीच अवैध रिश्ते हैं. अवधेश व रामाश्रय शुक्ला ने मिलकर ही देव के पिता विश्वंभर की हत्या की योजना बनाई थी, जिसमें उद्योगपति सहाय ने मदद की थी. पारो के पिता को जेल व जेल में उनकी हत्या के पीछे भी अवधेश ही है. अवधेश के ही इशारे पर पारो की हत्या की कोशिश की गई.

यह सारा सच पारो के साथ साथ देव को पता चलता है. तब देव अपने चाचा अवधेश के साथ ही रामाश्रय शुक्ला व अन्य दोषियों की हत्या कर देता है. पूरे एक वर्ष बाद देव व पारो नदी किनारे मिलते हैं.

विचारोत्तेजक फिल्म ‘‘हजारों ख्वाहिषें ऐसी’’ के अलावा जुनूनी रोमांचक प्रेम कहानी प्रधान फिल्म ‘ये साली जिंदगी’ के निर्देशक सुधीर मिश्रा इस कदर अपनी नई फिल्म ‘‘दास देव’’ में निराश करेंगे, यह उम्मीद तो किसी को नहीं थी.

फिल्म की कहानी चांदनी के नजरिए से कही जाना शुरू होती है. चांदनी कहानी की सूत्रधार के रूप में भी नजर आती है, मगर क्लायमैक्स पर पहुंचते पहुंचते निर्देशक सुधीर मिश्रा खुद इस बात को भूल गए. फिल्म में आगजनी व हिंसा अपनी चरम सीमा पर है. फिल्मकार राजनीति व प्रेम के बीच सामंजस्य बैठाने में बुरी तरह से विफल रहे हैं. फिल्म में रोमांस तो कहीं है ही नहीं, सिर्फ गंदी राजनीति हावी है. राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए हर रिश्ते का खून किया गया है.

फिल्म इंटरवल से पहले रोचक है, मगर तब उसकी गति धीमी है. इंटरवल के बाद कहानी गति पकड़ती है, पर जिस तरह से पूरा कथानक गड़बड़ होता है, उससे दर्शक कन्फ्यूज हो जाता है. उसकी समझ में ही नहीं आता कि आखिर किस किरदार का किसके साथ क्या रिश्ता है, कौन सा किरदार किसके साथ है और क्यों? वास्तव में ‘देवदास’ और शेक्सपियर के हेमलेट के ग्रे विश्वासघाती रंग का मिश्रण करते हुए फिल्मकार कहानी को फैलाते चले गए, पर वह भूल गए कि किसे प्रमुखता देनी है, कथा किसके नजरिए से शुरू हुई और फिर वह कहानी को समेट नही पाए. फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी इसकी पटकथा है. यानी कि फिल्मकार फिल्म के कथानक के साथ न्याय करने में पूर्णरूपेण विफल रहे हैं.

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फिल्म के कैमरामैन सचिन के कृष्ण बधाई के पात्र है. निर्देशक ने फिल्म की लोकेशन बहुत सही चुनी है. जहां तक अभिनय का सवाल है तो देव के किरदार में राहुल भट्ट फिट ही नहीं बैठते हैं, वह अपने अभिनय से भी निराश करते हैं. भावों की अभिव्यक्ति करने में असमर्थ रहते हैं. पारो के किरदार में रिचा चड्ढा ने जानदार अभिनय किया है. चांदनी के किरदार में अदिति राव हैदरी अपनी प्रतिभा का जलवा ठीक से नहीं दिखा पाईं, शायद फिल्म की पटकथा ने उन्हें ऐसा अवसर नहीं दिया. यूं तो वह कहानी की नायिका है, मगर जैसे ही कई उपकहानियां आती हैं, कई किरदार आते हैं, तो उनका किरदार हाशिए पर पहुंच जाता है.

यह लेखक व निर्देशक की कमजोरी का नतीजा है. भ्रष्ट व अति महत्वाकांक्षी राजनेता अवधेश के किरदार में सौरभ शुक्ला से बेहतर कोई हो ही नहीं सकता था. उन्होंने जबरदस्त परफार्मेंस दी है. उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिखाया कि वह अति बेहतरीन अभिनेता हैं. पारो के पिता के किरदार में अनिल जौर्ज जमे हैं. दिलीप ताहिल, विपिन शर्मा, विनीत कुमार सिंह, अनिल जौर्ज भी अपने अभिनय से प्रभावित करते हैं.

दो घंटे बीस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘दास देव’’ का निर्माण संजीव कुमार, गौरव शर्मा व मनोहर पी कानुनगो ने किया है. फिल्म के निर्देशक सुधीर मिश्रा, पटकथा लेखक सुधीर मिश्रा व जयदीप सरकार, संगीतकार संदेश शांडिल्य, विपिन पटवा, शमीर टंडन, अनुपम राग, सत्य माणिक अफसर, कैमरामैन सचिन के कृष्ण व कलाकार हैं- राहुल भट्ट, रिचा चड्ढा, अदिति राव हैदरी, सौरभ शुक्ला, विनीत कुमार सिंह, दिलीप ताहिल, विपिन शर्मा, दीपराज राणा,  अनिल जौर्ज, सोहेला कपूर, जयशंकर पांडे, योगेश मिश्रा, श्रुति शर्मा व अनुराग कश्यप.

लोगों को काफी पसंद आ रहा है खेसारी लाल यादव का नया गाना

इन दिनों इंटरनेट पर हिंदी गानों की तरह अब भोजपुरी गानों को भी काफी पसंद किया जा रहा है. इसी क्रम में भोजपुरी फिल्मों के मशहूर एक्टर खेसारीलाल यादव के एक गाने को यूट्यूब पर 18 दिन के अंदर 46 लाख से ज्यादा लोगों ने देखा है. इस गाने में खेसारीलाल का साथ भोजपुरी एक्ट्रेस चांदनी सिंह भी ठुमके लगाती हुई नजर आ रही हैं. ‘सलवार धरा गइल पेटी में’ गाने में खेसारीलाल चांदनी पर गुस्सा करते नजर आ रहे हैं, क्योंकि इस वीडियो वह हाफ पेंट में नजर आ रही हैं. पूरे गाने में खेसारीलाल संस्कार की बात करते नजर आ रहे हैं. इस गाने को इसी महीने 8 अप्रैल को यूट्यूब पर अपलोड किया गया था.

बता दें, बहुत ही जल्द खेसारीलाल 65 कास्‍ट वाली भोजपुरी की सबसे महंगी फिल्‍म ‘दबंग सरकार’ में नजर आने वाले हैं. ‘दबंग सरकार’ की शूटिंग लखनऊ के विभिन्‍न खूबसूरत लोकेशन पर पूरी हो चुकी है और अब यह पोस्‍ट प्रोडक्‍शन फेज में है. निर्देशक योगेश राज मिश्रा ने कहा, “यह फिल्‍म भोजपुरी इंडस्‍ट्री में काफी कुछ बदलने वाली है. फिल्‍म काफी अच्‍छी बनी है, जो लोगों को खूब इंटरटेन करेगी. फिल्‍म ‘दबंग सरकार’ लोगों के बीच भोजपुरी के लिए सकारात्‍मक सोच लाने की कोशिश है.”

मिश्रा ने सेट पर एक हादसे के बारे में जिक्र करते हुए खेसारीलाल के साथ अगली फिल्‍म करने की भी बात कही. उन्‍होंने बताया, “एक बार सेट पर खेसारीलाल घायल हो गए. इस दौरान उनके हाथों में गहरी चोट लगी. हमने तब शूट रोकना का फैसला किया, मगर उन्‍होंने कुछ दवाई लगाकर शूट को चालू रखने को कहा. यह उनकी जीवटता और प्रोफेसनलिज्‍म को दर्शाता है, जो अन्‍य कलाकारों के लिए एक मिसाल भी है. हालांकि बाद में उनका पैर काफी सूज गया था.”

वहीं, ‘दबंग सरकार’ के निर्माता दीपक कुमार और निर्देशक योगेश राज मिश्रा ने भोजपुरी सुपरस्‍टार खेसारीलाल यादव को परफेक्‍शनिस्‍ट बताया. उन्‍होंने कहा, “खेसारलाल यादव इंडस्‍ट्री के पावरफुल अभिनेता हैं. हमने उनकी मेहनत को ‘दबंग सरकार’ की शूटिंग के दौरान करीब से देखा, जिसके आधार पर हम कह सकते हैं कि वे आने वाले दिनों में काफी आगे जाने वाले हैं. उनमें काम के प्रति गजब का जुनून है, जो हमें हर शौट में देखने को मिला.”

दीपक कुमार ने कहा, “खेसारीलाल यादव काफी डाउन टू अर्थ हैं और आज भी उन्‍हें अपना पास्‍ट याद है, जो उन्‍हें स्‍टारडम के बाद भी सामान्‍य बनाता है. आज भी वे फुर्सत के पलों में पुराने दिनों की बातें करते हैं. साथ ही वे अपनी बेबाकी और हाजिर जवाबी से लोगों को हंसाते रहते हैं. वे काफी जौली मूड के इंसान हैं.”

अवेंजर्स इन्फीनिटी वार : एक्शन से भरपूर फिल्म

अच्छाई व बुराई की लड़ाई  के साथ ही पृथ्वी को बचाने की कवायद की कहानी है हौलीवुड फिल्मकार एंथोनी रोसो और जौय रोसो की रोमांचक एक्शन प्रधान साइंस फिक्शन फिल्म‘‘एवेंजर्स इन्फीनिटी वार’’. जो कि मार्वेल कामिक्स के सुपर हीरो अवेंजर्स पर आधारित है. एक पंक्ति की कहानी के साथ कई उप कहानियों के साथ साथ तकरीबन 76 किरदारों और एक नहीं कई जगहों से (न्यूयार्क, वकांडा, टाइटन, नोव्हेअर ) युक्त यह फिल्म दर्शकों को बांधकर रखती है.

फिल्म की कहानी का केंद्र असीम शक्तियां रखने वाली छह मणियां हैं. इनके नाम हैं-शक्ति मणि, अंतरिक्ष मणि, समय मणि, स्मृति मणि, वास्तविकता मणि, आत्मा मणि. इनमें से चार मणियां पृथ्वी ही नहीं पूरे ब्रम्हांड को खत्म करने पर उतारू थैनौस के पास हैं और वह अपनी शक्ति के बल पर अन्य दो मणियों को हासिल कर सर्वाधिक ताकतवर बनकर पृथ्वी सहित पूरे ब्रम्हांड को खत्म कर नए सिरे से अपने मनमाफिक नए ब्रम्हांड की रचना करना चाहता है. अपने मकसद में कामयाब होने के लिए थैनौस अपनी सौतली दत्तक पुत्री गमोरा (जौय सल्डाना) की हत्या करने से भी बाज नहीं आता है. जबकि दो मणियों को थैनौस के हाथ न लगने देने के साथ ही थैनौस को खत्म करने के लिए आयरन मैन, थोर, द हल्क व अन्य अवेंजर्स एक साथ आ जाते हैं. इतना ही नही पृथ्वी व ब्रम्हांड को बचाने के लिए ब्लैक विडो, स्पाइडरमैन व ब्लैक पैंथर भी इनके साथ आ जाते हैं. यह सभी  थैनौस के पास मौजूद चार मणि भी छीनना चाहते हैं.

फिल्म ‘‘अवेंजर्स इन्फीनिटी वार’’ की शुरुआत वहीं से होती है, जहां पर मार्वल्स की पिछली फिल्म ‘‘थोरः रगनारोक’’ खत्म हुई थी. इस फिल्म में स्पेस यान से उतरने वाले असगार्डियन भाईयों  थोर व लोकी को जहां छोड़ा था. उधर टाइटन ग्रह के निवासी थैनौस (जोश ब्रोलिन) ने सिर्फ अपने काफिले बल्कि अपने शिल्प को भी बर्बाद कर दिया है. वह लोगों पर अत्याचार करने के साथ ही उन्हे मौत के घाट उतार रहा है. अब थैनौस की योजना दो अन्य मणि को हासिल कर पूरे ब्रम्हांड को बर्बाद करने की है. थैनौस की योजना की जानकारी मिलते ही द हल्क वापस धरती पर आते हैं. फिर जबरदस्त एक्शन के अवेंजर्स व उनके साथी थैनौस को रोकने की मुहीम में जुट जाते हैं.

फिल्म की कहानी लार्जर देन लाइफ से भरपूर होते हुए भी काफी दिलचस्प है. अदभुत व अति तेज गति से भागती कहानी व जबरदस्त एक्शन दृश्यों से भरपूर यह एक ‘एपिक’ फिल्म है. पिछली अवेंजर फिल्मों के मुकाबले इस फिल्म में इंसानी भावनाओं को ज्यादा उकेरा गया है. इतना ही नहीं इस फिल्म में कहानी के साथ ही कुछ दार्शनिक बातें भी की गयी हैं. फिल्म में कई अनुत्तरित सवाल भी हैं. फिल्म का क्लायमेक्स आश्चर्यचकित कर जाता है. फिल्म की पटकथा जबरदस्त है. इस फिल्म को देखने का असली मजा तो बड़े परदे पर ही आएगा और वह भी थ्री डी में.

फिल्म की लोकेशन व संवाद जबरदस्त हैं. हिंदी में अनुवादित फिल्म के संवादो में तो कुछ हिंदी फिल्मों के नाम भी जोड़े गए हैं, जिससे भारतीय दर्शक इस फिल्म के साथ जुड़ सकें. भारत में यह फिल्म अंगेजी व हिंदी के अलावा तमिल, तेलगू, मलयालम में भी प्रदर्शित हो रही है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो फिल्म के हर कलाकार /किरदार ने बुराई से जीत हासिल करने की जद्दोजेहाद के साथ ही मानवीय जीवन व संवेदना को भी बेहतर तरीके से उकेरा है. कलाकारों की भीड़ में कुछ कलाकार अपनी अभिनय प्रतिभा के बल पर अपना एक अलग वजूद बनाने में कामयाब होते हैं. मसलन – टोनी स्टार्क उफ आयरन मैन के किरदार में राबर्ट डाउनी ज्यूनियर, कैप्टन अमेरिका के किरदार में क्रिस इवान्स, ब्लैक विडो के किरदार में स्करलेट जोहान्सन, थोर के किरदार में क्रिस हैमस्वर्थ आदि. मगर थैनौस के किरदार में जोशब्रोलिन सर्वाधिक प्रभावित करते हैं. गमोरा जैसे अति भावुक व अति जटिल किरदार को जौय सलडाना ने काफी बेहतरीन तरीके से निभाया है.

दो घंटे 29 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘अवेंजर्सःइन्फीनिटी वार’’ का निर्माण: ‘‘मार्वल्र्स स्टूडियो ने किया है. फिल्म के निर्देशक एंथेनी रोसो व जो रोसो, लेखक स्टीफन मैकफिली और क्रिस्टाफर मार्कस हैं. कहानी मार्वेल कामिक्स पर आधारित है. कलाकार हैं- राबर्ट डाउनी ज्यूनियर, क्रिस हैमस्वर्थ, मार्क रफ्लो, क्रिस इवांस, स्कार्लेट जोहान्सन, बेनेडिक्ट कम्बरबैच व अन्य.

रैंपवौक के बाद चुपके चुपके बात करते दिखें रणबीर और दीपिका

रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण का भले ही ब्रेकअप हो चुका हो लेकिन आज भी दोनों को एकसाथ देखना फैंस को भाता है. पिछले कुछ समय से दोनों सुर्खियों में बने हुए हैं. हाल ही में दोनों ने ‘मिजवान फैशन’ शो में रैंपवौक किया था. दोनों ने फैशन डिजाइनर मनीष मल्‍होत्रा के लिए रैंपवौक किया. दोनों शो स्टौपर थे और एक दूसरे का हाथ थाम चलते नजर आये. अब एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें दोनों चुप-चुपके एकदूसरे से बात करते नजर आ रहे हैं.

रणबीर दीपिका का सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है जिसमें शबाना आजमी पत्रकारों से रू-ब-रू हो रही हैं और उनके पीछे खड़े रणबीर और दीपिका चुपके-चुपके एकदूसरे से बात करते दिख रहे हैं.

वीडियो में रणबीर, दीपिका के कानों में कुछ कह रहे हैं और दीपिका हल्‍की सी स्‍माइल कर दूसरी तरफ देखने लगती हैं. रणबीर ने एक बातचीत में कहा, ‘ मैंने दीपिका के साथ फिल्‍में की है, टीवी में भी नजर आया हूं. लेकिन फैशन शो में पहली बार साथ हूं. यह मजेदार है.’

बातचीत में दीपिका ने रणबीर की तारीफ करते हुए कहा,’  मुझे लगता है वो जो भी पहनते हैं अच्‍छे लगते हैं. मुझे लगता है ये उनकी बौडी लैंग्‍वेज है, उनके लिए यह बहुत आसान है. मुझे लगता है वे जो भी पहनते हैं वे उसे आसानी से पेश कर पाते हैं.’

रणबीर और दीपिका का भले ही ब्रेकअप हो चुका है लेकिन दोनों अच्‍छे दोस्‍त की तरह पेश आते हैं. ब्रेकअप के बाद भी दोनों ने ‘तमाशा’ और ‘ये जवानी है दीवानी’ जैसी फिल्‍मों में साथ काम कर चुके हैं.

रणबीर इनदिनों अपनी आनेवाली फिल्‍म ‘संजू’ को लेकर बिजी हैं. राजकुमार हिरानी के निर्देशन में बनी इस फिल्‍म का टीजर रिलीज हो चुका है जिसे दर्शक बे‍हद पसंद कर रहे हैं. फिल्‍म संजय दत्‍त की बायोपिक फिल्‍म हैं.

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अब मलाइका ने बताए अपने बेडरूम सीक्रेट्स

बौलीवुड सितारे आजकल अपनी निजी जिंदगी को लेकर खुल कर बात करने में जरा भी नहीं हिचकिचाते. उनके लिए अपनी निजी जिंदगी के बारे में बात करना बेहद ही आम बात हो गई है. वह अपनी जिंदगी से जुड़ी पर्सनल बातों को यूं ही चैट शो या इंटरव्यूज के दौरान शेयर करना पसंद करते हैं.

बता दें कि सैलेब्स अपने बेडरूम के सीक्रेट को बेपर्दा करने में जरा भी नहीं शर्माते और ना ही हिचकिचाते हैं. आपको याद होगा कि हाल ही में विद्या बालन ने करण जौहर के शो पर अपने बेडरुम सीक्रेट्स बता कर किस तरह से सनसनी मचा दी थी. विद्या बालन के बाद मीरा राजपूत और शाहिद कपूर ने अपने बेडरूम सीक्रेट के राज खोले थे. अब इस कड़ी में एक और हसीना का नाम जुड़ गया है. वो हसीना कोई और नहीं बल्कि मलाइका अरोड़ा है.

जी हां मलाइका नें अपने बेडरूम सीक्रेट की कई ऐसी बातें बताई हैं जिसे सुनकर आप भी काफी हैरान हो जाएंगे. आपकी जानकारी के लिए बता दे कि मलाइका हाल ही में अपनी बहन अमृता अरोड़ा के साथ चैट शो BFFs With Vogue में नजर आई थीं. जब मलाइका से इस चैट शो के दौरान पूछा गया कि उनकी फेवरेट बेडरूम पोजिशन कौन सी है. तो उन्होंने बिना शर्माएं इस सवाल का जवाब देते हुए कहा- “ON TOP”. इतना ही नही उन्होंने इस चैट शो पर अपनी पर्सनल लाइफ को लेकर कई बड़े खुलासे भी किए थे.

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कैसा होगा 2050 का धार्मिक नक्शा

आज से 32 साल बाद यानी 2050 में विभिन्न धार्मिक समुदायों के हिसाब से कैसा होगा दुनिया का नक्शा, अमेरिका की जानीमानी सर्वेक्षण संस्था ‘पीयू’ द्वारा दुनिया के प्रमुख धर्मों की आबादी के ट्रैंड्स के बारे में कुछ समय पहले जारी की गई रिपोर्ट काफी चौंकाने वाली है. रिपोर्ट ने कई देशों की नींद उड़ा दी है. यदि ये ट्रैंड्स सही साबित हुए तो दुनिया के कई देशों का भूगोल बदल जाएगा. आज विश्व का हर देश इस बदलाव से अपने देश पर होने वाले असर के बारे में सोच रहा है. ऐसा स्वाभाविक भी है क्योंकि आज के लोकतांत्रिक युग में जनसंख्या धर्मों की ताकत नापने का प्रमुख पैमाना है. जनसंख्या के अनुपात  में धर्मों की राजनीतिक शक्ति बढ़ती या घटती है.

पीयू की रिपोर्ट में वर्ष 2010 को आधार मान कर वर्ष 2050 तक 8 प्रमुख धार्मिक समुदायों की जनसंख्या का आकलन और विश्लेषण किया गया है. विश्व तथा भारत के संदर्भ में इस के निष्कर्ष चौंकाने वाले हैं. इन 40 सालों में विश्व की जनसंख्या में 35 प्रतिशत की वृद्धि होगी, जिस में प्रमुख समुदायों में मुसलमानों की जनसंख्या सर्वाधिक यानी 73 प्रतिशत, ईसाई समाज की 35 प्रतिशत तथा हिंदुओं की जनसंख्या 34 प्रतिशत बढ़ेगी, इस हिसाब से आबादी के मामले में ईसाई पहले, मुसलमान दूसरे तथा हिंदू तीसरे नंबर पर होंगे.

भारत के हिंदुओं के लिए बुरी खबर यह है कि साल 2050 में भारत की कुल आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी में 2.8 फीसदी तक कमी आने की संभावना है. वर्ष 2050 में देश की कुल आबादी 1.7 अरब होगी. इस में 76.7 फीसदी हिंदू होंगे, जबकि साल 2010 में यह आंकड़ा 79.5 फीसदी था. 2010 में देश में हिंदुओं की कुल आबादी 97.37 करोड़ थी, जबकि साल 2050 में संभावित तौर पर यह 129.79 करोड़ होगी, इस प्रकार इस दौरान कुल हिंदू आबादी में मात्र 32.42 करोड़ की वृद्धि होगी. एक भ्रम फैलाया जा रहा है कि 2050 तक हिंदू 50 फीसदी से कम होंगे.

जबकि साल 2050 में कुल आबादी में मुसलमानों की साझेदारी साल 2010 के 14.4 फीसदी से बढ़ कर 18.4 फीसदी हो जाएगी. इस दौरान उन की कुल आबादी 17.62 करोड़ से बढ़ कर संभावित तौर पर 31.06 करोड़ हो जाएगी. इस प्रकार इन 40 वर्षों के दौरान, उन की आबादी में 13.44 करोड़ की वृद्धि होगी. यह रपट बौद्ध धर्म के लिए भी चिंताजनक है कि उस की आबादी कम होगी या उतनी ही रहेगी.

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भारत के संदर्भ में बताया गया है कि 2050 में  भारत में विश्व के सब से ज्यादा हिंदू और सब से ज्यादा मुसलमान होंगे. इस के बाद पाकिस्तान तथा इंडोनेशिया में. दूसरी तरफ ज्यादातर हिंदू भारत, नेपाल और मौरीशस में रहते हैं.

इस प्रोजैक्शन मौडल को 2050 से आगे ले जाने पर नतीजा निकलता है कि 2070 में दुनिया में मुसलिमों और ईसाइयों की जनसंख्या लगभग बराबर होगी यानी दोनों विश्व की आबादी के 32-32 प्रतिशत होंगे. इस के बाद दोनों धर्मों की आबादी  बढ़ेगी मगर वर्ष 2100 में मुसलिमों की आबादी 1 प्रतिशत ज्यादा

हो जाएगी. मुसलिम 35 प्रतिशत होंगे तो ईसाई 34 प्रतिशत. यह वृद्धि मुख्यरूप से अफ्रीका के कारण होगी जो उच्च प्रजनन दर वाला महाद्वीप है. इस के कारण दोनों धर्म विश्व जनसंख्या में अपना प्रतिशत बढ़ाएंगे.

बदलता धार्मिक चरित्र

धर्मों की आबादी में आने वाले इस बदलाव से कई देशों का धार्मिक चरित्र बदल जाएगा. वर्ष 2050 में आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, बेनिन, फ्रांस, रिपब्लिक औफ मैसिडोनिया, बोस्नियाहर्जेगोविना, नीदरलैंड्स ईसाई बहुसंख्य नहीं रह जाएंगे. अमेरिका में भी ईसाइयों की संख्या में कमी आएगी. 2010 में वे आबादी के तीनचौथाई से ज्यादा थे. 2050 में दोतिहाई रह जाएंगे. वहां दूसरी सब से ज्यादा आबादी यहूदियों की नहीं, मुसलमानों की होगी.

ईसाइयों की संख्या भले ही अमेरिका और ब्रिटेन में घट रही हो मगर रूस, चीन और दक्षिण कोरिया में ईसाई धर्म तेजी से अपनी जड़ें जमा रहा है. वर्ष 1900 से दक्षिण कोरिया में 1 प्रतिशत लोग ही ईसाई थे लेकिन ईसाइयत वहां तेजी से बढ़ी और आज 30 प्रतिशत दक्षिण कोरियाई ईसाई हैं. रूस में कम्युनिज्म की समाप्ति के बाद ईसाइयत को अपनाने वालों की तादाद बढ़ी है. 1991 से 2008 के बीच रूसी वयस्कों में ईसाइयों की संख्या 31 प्रतिशत से बढ़ कर 72 प्रतिशत हो गई है. चीन के धर्मों के विशेषज्ञ परजू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री फेंगांग यांग के मुताबिक, 1950 से 2010 के बीच ईसाइयत 7 प्रतिशत की दर से बढ़ी.

इस समय इसलाम दुनिया में सब से तेजी से बढ़ने वाला धर्म है और इस की वजह यह है कि वैश्विक स्तर पर मुसलमानों की प्रजनन दर सब से  ज्यादा यानी 3.1 प्रति महिला है, जबकि 2.7 प्रतिशत प्रजनन दर से ईसाई दूसरे नंबर पर हैं और 2.4 की प्रजनन दर के साथ हिंदू तीसरे नंबर पर. दूसरा निर्धारक तत्त्व है हर धर्म का वर्तमान आयु विभाजन यानी उस धर्म के अनुयायी कितने युवा हैं और उन के सामने कितने प्रजनन के वर्ष बाकी हैं. 2050 में 27 प्रतिशत आबादी 15 वर्ष से कम उम्र की होगी. इन में मुसलिम 34 प्रतिशत, हिंदू 30 प्रतिशत और ईसाई 27 प्रतिशत हैं. यह युवा आबादी मुसलिम आबादी के तेजी से बढ़ने की सब से बड़ी वजह बनेगी.

इस सर्वेक्षण में जो मुद्दे सामने आए, उन के अनुसार साल 2050 में यानी 21वीं सदी के मध्यबिंदु पर विश्व में अलगअलग मतावलंबियों के आंकड़े इस प्रकार होंगे : आज विश्व में मुसलिम 160 करोड़ हैं, वे 120 करोड़ से बढ़ कर 280 करोड़ होंगे. यह बताना कठिन है कि 40 वर्षों में 40 प्रतिशत की यह वृद्धि व्यावहारिक है या अतिरंजित है. उन का ईसाइयों के लिए जो आंकड़ा है वह बताता है कि अगले 35 वर्षों में उन का 70 करोड़ से बढ़ कर 290 करोड़ होना संभव है.

इस में मजे की बात यह है कि इस दौरान यूरोप, अमेरिका आदि देशों में ईसाइयों की संख्या 30 करोड़ से कम होगी. इसलिए रिपोर्ट में जो 70 करोड़ की वृद्धि दिखाई गई है वह वास्तव में 100 करोड़ की है, लेकिन यूरोप के लोगों में ईसाई धर्म त्यागने की संभावना के कारण वास्तव में यह जोड़ केवल 70 करोड़ का होगा. इसी दौरान हिंदुओं की संख्या 105 करोड़ से 130 करोड़ हो जाएगी, लेकिन भारत में मुसलिम जनसंख्या का अनुपात काफी बढ़ा हुआ होगा.

अमेरिका में बढ़ती हिंदू आबादी

पीयू ने 10 वर्ष पूर्व निष्कर्ष निकाला था कि  अमेरिका और यूरोप में हिंदुओं का प्रभाव बढ़ेगा. 10 वर्ष पूर्व विश्व की ख्यातिप्राप्त साप्ताहिक ‘न्यूजवीक’ ने तो एक विशेषांक भी प्रकाशित किया था. उस में संपादिका लिशा मिलर ने तो उस समय यह संकेत दिया था कि पूरा अमेरिका धीरेधीरे भारतीय जीवनपद्धति को स्वीकारने की दिशा में बढ़ रहा है. लेकिन यह कहना थोड़ा मुश्किल है कि यह निष्कर्ष हिंदुओं को खुश करने के लिए था या अतिशयोक्ति के सहारे ईसाइयों को सचेत करने वाला था.

पीयू रिसर्च सैंटर की नई रपट ‘रिलीजियस लैंडस्केप स्टडी’ के मुताबिक अमेरिका की हिंदू आबादी बढ़ कर 22.3 लाख हो गई है और आबादी के लिहाज से हिंदू धर्म मानने वाले लोग यहां चौथे पायदान पर पहुंच गए हैं. साल 2007 से ले कर अब तक इस में 85.8 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. अमेरिकी जनसंख्या में हिंदुओं की आबादी साल 2007 में 0.4 फीसदी से बढ़ कर पिछले साल 0.7 फीसदी हो गई. अध्ययन कुल आबादी में हिंदुओं की प्रतिशतता को दर्शाता है, लेकिन संख्या नहीं बताता.

इस रिपोर्ट को देखने से एक बात तो साफ होती है कि अगले 30-35 वर्षों में विश्व में मुसलिम जनसंख्या तेजी से बढ़ेगी. इंडोनेशिया में आज 20 करोड़ 50 लाख और भारत में 17 करोड़ 70 लाख मुसलिम हैं. भारत में 35 वर्षों बाद मुसलमानों का आंकड़ा 20 करोड़ 50 लाख से अधिक होगा. वर्ष 2050 में विश्व में 31 प्रतिशत ईसाई होंगे और 30 प्रतिशत मुसलिम होंगे, लेकिन बाद के 20 वर्षों में दोनों में उसी अनुपात में वृद्धि हो कर विश्व में 31 प्रतिशत मुसलिम तथा 30 प्रतिशत ईसाई होने की संभावना उन्होंने व्यक्त की है.

इस रिपोर्ट में यूरोप स्थित मुसलिमों की संख्या को ले कर वृद्धि के काफी विवरण दिए गए हैं. उन के मत में 2010 में यूरोप में 5.9 प्रतिशत मुसलिम थे, जो 2050 में 10 प्रतिशत होंगे. इस से भी अधिक उन की ही एक गंभीर चेतावनी है, वह यह कि यूरोप में सभी अन्य धर्मावलंबी तथा सैकुलर आदि लोगों की तुलना में ईसाई 45 प्रतिशत यानी अल्पसंख्यक होंगे. ब्रिटेन में भी यही स्थिति होगी. यूरोप में मुसलिमों की जो वृद्धि होगी वह मुख्यतया फ्रांस, जरमनी और बेल्जियम में होगी.

रिपोर्ट में दिए हुए आंकड़े जनसंख्या की वृद्धि, प्रजनन संख्या से जुड़े अनुमान पर आधारित हैं. इस में फिलहाल विश्वभर में चल रहे धर्मांतरण अभियानों से बढ़ने वाली संभावित संख्या का अनुमान नहीं है, जबकि भारत, अफ्रीका का सहारा रेगिस्तान इलाका और लैटिन अमेरिका में धर्मांतरण जोरों पर है. कई जगह तो ईसाइयत और इसलाम के बीच धर्मांतरण की होड़ मची है. अब तो चीन में भी धर्मांतरण के चलते ईसाई मिशनरी और चीन की कम्युनिस्ट सरकार के बीच आमनेसामने की लड़ाई चल रही है.

रपट का यह मानना है कि धर्मांतरण भी किसी धार्मिक समुदाय की संख्या वृद्धि में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. लेकिन धर्मांतरण काफी जटिल प्रक्रिया है. कुछ देशों में वयस्कों के लिए एक धर्म छोड़ कर दूसरा धर्म अपनाना सामान्य बात है लेकिन कई देशों में धर्म बदलना बहुत मुश्किल और कानूनी वजहों से पेचीदा है. कई देशों में तो इसे गैरकानूनी माना गया है. ज्यादातर मुसलिम देशों और हमारे पड़ोसी नेपाल में इसे गैरकानूनी माना जाता है. सर्वे कहता है बहुत से लोग, जिन का किसी धर्म से वास्ता नहीं था, ईसाई बन जाते हैं तो बहुत लोग जिन की परवरिश ईसाई के तौर पर हुई वे नास्तिक या अधर्मी बन जाते हैं. भारत के बारे में सर्वे कहता है कि धर्मांतरण के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं.

रपट की प्रामाणिकता कितनी आव्रजन भी देशों के धार्मिक चरित्र को बदलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. आबादी बढ़ने के अन्य कारणों के साथ आव्रजन को भी जोड़ने के बाद यूरोप में मुसलिम आबादी 2010 के 5.9 प्रतिशत से बढ़ कर 2050 में 10.2 प्रतिशत हो जाएगी, जबकि आव्रजन को न जोड़ने पर यह आंकड़ा 8.4 प्रतिशत ही रह जाता है. अमेरिका में 2010 में हिंदू आबादी 0.7 प्रतिशत थी जो आव्रजन को जोड़ने पर 2050 में 1.3 प्रतिशत हो जाएगी पर आव्रजन को न जोड़ने पर लगभग 0.8 प्रतिशत रहेगी.

उपरोक्त आंकड़ों के आधार पर पीयू रिसर्च सैंटर की रपट चौंकाने वाली अवश्य है. वस्तुत: जनगणना एक बड़ी पेचीदा प्रक्रिया है जो किसी भी देश के सामाजिक तथा आर्थिक कारणों, भौगोलिक तथा प्रकृति विज्ञान का परिणाम होती है. मानव व्यवहार के बारे में ऐसे निष्कर्ष पूरी तरह से सही नहीं होते हैं तथा वक्त की कसौटी पर पूरी तरह से खरे नहीं उतरते. कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह  रपट पश्चिम समर्थक और ईसाई समर्थक नजरिए से लिखी गई है. वह विश्व में बढ़ रहे इसलामी वर्चस्व को उठाती है जबकि सारी दुनिया में चल रहे ईसाई धर्मांतरण पर चुप्पी साध लेती है.

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