श्रीदेवी और बोनी कपूर की बड़ी बेटी जाह्नवी कपूर तो अपने स्टाइलिश अंदाज और फिल्मों में डेब्यू को लेकर चर्चा में रहती हैं, लेकिन उनकी छोटी बेटी खुशी कपूर भी कुछ कम ग्लैमरस नहीं हैं. हाल ही में खुशी ने एक हौट और ग्लैमरस फोटोशूट कराया है. उन्होंने खुद अपनी फोटोशूट की लेटेस्ट तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की है, जो काफी वायरल भी हो रही है.
आपको बता दें कि ऐसा पहली बार नहीं है जब खुशी अपनी हौट तस्वीरों को लोकर चर्चा में आई हों. इससे पहले भी वह अपनी ग्लैमरस तस्वीरों को लेकर सुर्खियां बटोर चुकी हैं. कुछ समय पहले उनकी बिकिनी तस्वीरें भी सामने आ चुकी हैं. जो काफी वायरल भी हुई थी.
भले ही खुशी इनदिनों अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे रही हो लेकिन वो अपने स्टाइल के लिए जानी जाती है. अब इन तस्वीरों के सामने आने के बाद खुशी के बौलीवुड में आने को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं, हालांकि खुशी कपूर ने अभी तक इसके बारें में कुछ भी नहीं कहा है. लेकिन तस्वीरों में उनके बेहतरीन हाइट और बेहद स्टाइलिश लुक को साफ देखा जा सकता है और कहा जा सकता है कि एक अच्छी एक्ट्रेस बनने के सारे गुण हैं उनमें.
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रिहायशी इलाकों में दुकानें चलाने का चलन कोई नया नहीं है. सदियों से कामगारों व दुकानदारों के घर, दुकानें अथवा कारखाने एक ही जगह होते थे. जब तक अरबनाइजेशन तेज न थी, यह पद्धति सुविधाजनक भी थी और सुरक्षात्मक भी. धीरेधीरे व्यापार व उद्योगधंधे बढ़ने से कारखाने, मार्केटें अलग बनने लगीं और घरों को अलग करा जाने लगा ताकि औरतें और बच्चे बाजारों और मजदूरों से अलग रहें. प्राकृतिक संरक्षण से वंचित शहरियों को यह सुरक्षित लगा कि रिहायशी इलाकों में दूसरों का दखल न हो.
हाल के सालों में शहरी जमीन की बढ़ती किल्लत और कीमत के कारण दुकानदारी रिहायशी इलाकों में घुसपैठ करने लगी है. हमारी नौकरशाही को उस में चांदी ही चांदी नजर आई. उस ने दुकानों को कहीं भी खोलने की मूक इजाजत देनी शुरू कर दी ताकि हर महीने कुछ अतिरिक्त कमाई अफसर व इंस्पैक्टर कर सकें. दिल्ली शहर तो लगभग पूरा नष्ट ही हो गया है. कुछ इलाकों को छोड़ कर यहां विशुद्ध रिहायशी कालोनियां न के बराबर रह गई हैं. 20-25 साल पुरानी कालोनियों में ढेरों दफ्तर और दुकानें नजर आ जाएंगी.
यह औरतों और बच्चों के हकों पर हमला है. कुछ लोग पैसा कमाने के लिए अपना घर दुकान में बदल दें या दुकानदार को बेच दें तो यह उन के संपत्ति के हक का दुरुपयोग है. यह पड़ोसियों के सुख व शांति के साथ जीने के हक को छीनता है. सुप्रीम कोर्ट पिछले कई सालों से दुकानदारों की इस भयंकर बमबारी से शहरियों को बचाने की कोशिश कर रहा है पर दुकानदार एकजुट हो जाते हैं और अफसरों व नेताओं को खरीद कर वे मनमाने फैसले करा रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी में एक कमेटी बना रखी है, जो दिल्ली जैसे विशाल शहर में लाखों दुकानों पर छापेमारी कर सीलिंग कर रही है पर हर तरह का हड़कंप मचाने के बावजूद अब तक मुश्किल से 3000 दुकानदफ्तर बंद कर पाई है.
यह ठीक है कि दिल्ली के मकानों के कानून बहुत जटिल हैं पर वे जटिल इसलिए हैं कि सरकारशाही चाहती है कि लोगों को कानून तोड़ने को मजबूर होना पड़े ताकि वह ऊपरी कमाई कर सके. नगर निगमों व डीडीए के हर अफसर को करोड़ों मिलते हैं या तो अवैध दुकानों को अनुमति देने पर या आंख मूंद लेने पर. वे कानूनों को लचीला बनाने को ही तैयार नहीं.
दिल्ली की सब से महंगी खान मार्केट में बनी पहली व दूसरी मंजिल केवल रिहायशी थी. सही था यह फैसला. आज शायद ही वहां कोई परिवार रहता हो. आसपास के मकानों के लिए राशनपानी मुहैया कराने के लिए बनी खान मार्केट का स्वरूप ही बदल गया है, बिना अनुमति के. यह अन्याय है उन पर जिन्होंने ‘खान मार्केट में नीचे दुकान होगी और ऊपर घर’ सोच कर दुकान ली थी.
कानून सब को बराबर देखे. आजकल कानून इसलिए बनता और बदलता है, क्योंकि जनता का एक वर्ग दूसरे वर्ग की कीमत पर कोई सहूलत चाहता है. सुप्रीम कोर्ट अभी तक तो दिल्ली की रिहायशी कालोनियों को केवल रहने लायक रखने में लगा है पर कब वह भी हथियार डाल दे पता नहीं.
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न तो बीफ खाना गलत है, न चुंबन लेना गुनाह. यकीन नहीं होता कि यह सचबयानी देश के उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू की है जिन्होंने ये कर्णप्रिय उद्गार मुंबई के आर ए पोद्दार कालेज औफ कौमर्स ऐंड इकोनौमिक्स के प्लैटिनम जुबली समारोह में व्यक्त किए. चूंकि ये दोनों ही बातें हिंदुत्व के सिद्धांतों व संस्कारों से मेल खाती नहीं हैं, शायद इसलिए बीफ और किसप्रेमियों को अभयदान देने के लिए उन्होंने शर्त यह जड़ दी कि ये दोनों काम फैस्टिवल मना कर यानी समारोहपूर्वक न किए जाएं.
गुड़ खाएं गुलगुलों से परहेज करें, के साथसाथ यह कहावत भी सहसा याद हो आई कि ऊंट की चोरी नोहरेनोहरे (घुटनों के बल) नहीं होती. वेंकैया नायडू बेहतर जानते हैं कि देश में हर काम समारोहपूर्वक करना धर्म और तीजत्योहारों की देन है. पूजापाठ व यज्ञहवन वगैरा लोग सामूहिक रूप से करते हैं तो इन दो इच्छाओं को चोरी से पूरी करने का मशवरा क्यों?
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कई सालों के बाद मुझे विदेश जाने का मौका मिला था. जाहिर है कि बाहर भी देशी आदतें दिलोदिमाग पर छाई हुई थीं. अपने देश की मिट्टी की बात ही निराली है और उस से ज्यादा निराले इस मिट्टी के लोग. हमारा तो कतराकतरा इस से बना हुआ है. देश की मिट्टी और यहां के लोगों को खूब याद किया.
आप कहेंगे कि इस में खास बात क्या है. आदमी घरपरिवार, राज्य, गांवखेड़े, कसबेशहर, देश से दूर जाएगा, तो इन की याद तो आएगी ही. वैसे ही जैसे पत्नी से दूर जाओ, तो उस की याद आती ही है.
यह बात अलग है कि पतिपत्नी साथसाथ ज्यादा देर बिना खटपट के रह नहीं सकते हैं. उस समय तो ऐसा लगता है कि कुंआरे रह कर अलग ही रहते, तो अच्छा रहता. यह हम अपनी नहीं आप की बात कर रहे हैं. हमारी तो शादीशुदा जिंदगी बहुत सुखी है. वैसे, हर आम पति यही सोचता है, आप भी और मैं भी. अब परदेश में देश की याद कैसेकैसे आई, यह थोड़ा सुन लें, तो आप के परदेश जाने पर काम आएगा.
परदेश में 15 दिन बीत गए थे. हमें यूरोप में एक भी आदमी ऐसा नहीं मिला, जो सड़क पर कहीं खड़े हो कर देशी ढंग से हलका हो रहा हो. कहां अपने देश में हर गलीनुक्कड़ में ऐसे लोगों के चाहे जब दर्शन हो जाते थे और यहां एक अदद आदमी का टोटा पड़ा था.
हम ने सोचा कि सच में भारत ऐसे ही ‘विश्व गुरु’ नहीं कहलाता है. ये देश भले ही अपने को धनी समझते हों, लेकिन कई मामलों में कितने दरिद्रनारायण हैं. यहां हमारे वहां जैसा एक भी आदमी नहीं है.
यहां के रेलवे स्टेशन का खालीपन देख कर जी भर आया. आदमी नहीं दिख रहे थे. रेलें खाली चलती थीं. एक कंपार्टमैंट में मुश्किल से 4-5 लोग मिलते थे. वे भी ऐसे बैठते थे कि एकदूसरे से कोई मतलब नहीं. जैसे दुश्मन देशों के नागरिक हों.
यह देख कर हम तो अंदर से टूट से गए. अपने यहां तो मूंगफली, पौपकौर्न बेचने वाले, कागज के टुकड़ों, बीड़ीसिगरेट के ठूंठों, पानी की खाली बोतलों, गुस्से से भरे लोगों से ठसाठस भरी ट्रेन में धक्कामुक्की करते, लड़तेभिड़ते, फिर दूसरे पल आपस में प्यार करते, बतियाते, ठहाके लगाते, सरकार को कोसते लोग हर जगह मिलते हैं.
हम ने देखा कि ट्रेन में टीटीई के पीछे एक भी आदमी नहीं भाग रहा था. सोचा कि यह टीटीई कैसे अपना व बच्चों का पेट पालता होगा. वैसे, हमारे पास टिकट था, लेकिन हम खुद को रोक नहीं पाए. हम ने अपने बटुए से सौ डौलर का एक नोट निकाल कर ऐसे हवा में लहराया कि उस की नजर पड़ जाए और वह आ कर अपना काम कर जाए, लेकिन वह तो उलटा नाराज हो गया.
हम ने किसी तरह अपनेआप को इस आफत से छुटकारा दिलाया.यहां की सड़कों पर घूमे तो मायूसी हुई. न चाट के ठेले, न पानसिगरेट के, न चाय के, न पापड़ बेचने वाला, न चना जोर गरम बाबू वाला कोई और. कोई भीड़भाड़ भी नहीं.
हमारे यहां जब तक भीड़ का रैला न दिखे, किसी रैली में सड़क जाम में न फंसे, तब तक मजा ही नहीं आए.
और तो और, ट्रैफिक सिगनल 2 मिनट का भी हो, तो कोई उसे तोड़ते हुए अपने यहां जैसा नहीं दिखा. पूरे 2 मिनट तक आराम से इंतजार करता. हम तो बड़े मायूस हुए.
यहां के लोग जानवर प्रेमी बिलकुल नहीं लगे. वजह, किसी सड़क पर कुत्ते, बकरियां, गायभैंस, बैल यहां तक कि सूअर भी नहीं मिले. जानवरों की इतनी अनदेखी हम ने नहीं देखी. हमारे लोग तो स्टेशन व बस स्टैंड पर बिना इन के रह ही नहीं सकते. ‘पीटा’ वाले पता नहीं, हमें अवार्ड देने में इतनी देर क्यों कर रहे हैं. असली ‘एनीमल लवर’ हम ही हैं.
वहां के बाजार में मुर्दनी छाई सी लगी. कोई खास भीड़ नहीं. कोई खुला सामान नहीं. हर सामान डब्बाबंद. कुछ खरीदो या कुछ दाम कम करने की बात करो, तो अजीब सा मुंह बनाए सेल्समैन. मजा ही नहीं आया खरीदारी करने में.
सर्दीखांसी होने पर हम एक मैडिकल स्टोर में दवा लेने गए, तो उस ने बिना डाक्टर की परची के दवा देने से इनकार कर दिया. हमें तुरंत अपने वतन की दुकानें याद आईं. चाहे जो दवा बिना परची के झट से ले लो और कैमिस्ट भी डाक्टर की कमी अपनी सलाह दे कर पूरी कर देता था. हम ने मन में फिर दोहराया कि हम यहां नहीं रह पाएंगे.
यहां के एक दफ्तर में हमें एक काम से जाना पड़ा, तो बड़ा अजीब सा लगा. यहां के साहब के कमरे के बाहर कोई चपरासी नहीं मिला, जो कान में पैन डाल कर मैल निकाल रहा हो या तंबाकू मलते पंजे बजा रहा हो. दफ्तरों में कहीं भी न कोई कागज दिखा, न फाइलों के अंबार, न टैग उलझे हुए, न धूल खाते बस्ते. न पान की पीक का निशान ही दिखा.
हम ने सोचा, ‘बहुत बंदिशें लगा रखी हैं. यहां जरूर तनाव में खुदकुशी के मामले ज्यादा तादाद में होते होंगे. हमारे यहां तो कोई बंदिश नहीं है, जिस को जो आता है, वह करने से उसे रोका नहीं जाता.
‘पान की पीक थूकने की, हलका होने की, गालीगलौज करने की, नाककान में उंगली डालने की, बाल व खोपड़ी खुजलाने की, सरकार व महंगाई को कोसने की कोई मनाही नहीं है.’
हम 20 दिन में ही विदेश से ऊब गए. सड़क के न तो बीचोंबीच में और न ही किनारे कहीं धार्मिक स्थल दिखे और न बतियाने वाले लोग. हम ने तो मन भर जाने से टिकट कैंसिल कर हफ्ते भर पहले का टिकट बनवा लिया और अपनी माटी की ओर लौट चले.
दिल्ली एयरपोर्ट से उतर कर हम ने अपने शहर की ट्रेन पकड़ने की सोची. दिल्ली स्टेशन पर पहुंचते ही भीड़ देख कर हमारा दिल बागबाग हो गया. रात में घर पहुंचे, तो और बागबाग हो गया. ट्रेन के चूहों ने सूटकेस में 2 जगह छेद कर अपनी भूख शांत कर ली थी. हमारा बटुआ भी किसी ने पार कर ‘वैलकम बैक’ की परची जेब में उस की जगह रख दी थी. हम अपने देश जो आ गए थे.
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‘दलित भाइयों पर अत्याचार मत करो. अगर गोली मारनी है, तो उन्हें नहीं मुझे मारो…’ जैसी जज्बाती और किताबी अपील प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद के एक जलसे में की थी. उस का उलटा असर यह हुआ कि देशभर में दलित अत्याचारों की बाढ़ सी आ गई.
दलितों पर कहर ढाने के लिए दबंग धर्म के नाम पर तरहतरह के नएनए तरीके ईजाद करते रहते हैं. गौरक्षा इन में से एक है. लेकिन मध्य प्रदेश के चंबल इलाके में तो दबंगों ने सारी हदें पार करते हुए ऐसा नजारा पेश किया था कि इनसानियत भी कहीं हो तो वह भी शर्मसार हो उठे.
लाश को भी नहीं बख्शा
यह मामला मुरैना जिले की अंबाह तहसील के गांव पाराशर की गढ़ी का है. 10 अगस्त, 2016 को इस गांव में एक दलित बाशिंदे बबलू की 25 साला बीवी पूजा की मौत हुई थी.
अपनी जवान बीवी की बेवक्त मौत का सदमा झेल रहा बबलू उस वक्त सकते में आ गया, जब दबंगों ने पूजा की लाश को श्मशान घाट में नहीं जलाने दिया.
इस पर बबलू हैरान रह गया और दबंगों के सामने गिड़गिड़ाता रहा कि वह लाश को कहां ले जा कर जलाए, पर दबंगों का दिल नहीं पसीजा. उन्होंने बबलू को डांट फटकार कर भगा दिया कि जो करना है सो कर लो, पर एक दलित औरत की लाश श्मशान घाट में जलाने की इजाजत हम नहीं दे सकते.
मौत के कुछ घंटे बीत जाने के बाद घर में पड़ी लाश भी भार लगने लगती है, इसलिए बबलू की हालत अजीब थी कि बीवी की लाश का क्या करे.
पाराशर की गढ़ी गांव में एक नहीं, बल्कि 3-3 श्मशान घाट हैं, पर तीनों पर रसूखदारों का कब्जा है, जिन में कोई दलित अंतिम संस्कार नहीं कर सकता.
बबलू को बुजुर्गों ने मशवरा यह दिया कि बेहतर होगा कि पूजा की लाश को किसी खेत में जला दो.
इस पर बबलू फिर गांव वालों के पास गया और बीवी की मिट्टी ठिकाने लगाने के लिए सभी जमीन वालों से 2 गज जमीन मांगी, पर किसी को उस पर तरस नहीं आया.
जब इस भागादौड़ी में पूरे 24 घंटे गुजर गए और लाश गलने लगी, तो बबलू घबरा उठा और थकहार कर बुझे मन से उस ने पूजा की लाश का दाह संस्कार अपने घर के सामने बनी कच्ची सड़क पर किया.
यह वही हिंदू धर्म है, जिस में किसी शवयात्रा के निकलते वक्त लोग सिर झुका कर किनारे हो जाते हैं और मरने वाले की अर्थी की तरफ देख कर हाथ जोड़ते हैं. लेकिन अगर शवयात्रा किसी दलित की हो, तो नफरत से मुंह फेर लेते हैं.
गांवों में यह नजारा आम है, जिस के तहत मरने के बाद भी दलितों से ऊंची जाति वालों की नफरत खत्म नहीं होती, उलटे उन्हें तंग करने के लिए श्मशान में भी जगह नहीं दी जाती.
इस हकीकत पर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी कहा था कि अब गांव में एक घाट एक श्मशान होगा, दलितों के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा.
अकेले ग्वालियरचंबल इलाके की नहीं, बल्कि देशभर के गांवों की यही हालत है कि दलितों के घर कोई मौत हो, तो उन्हें लाश बड़ी जाति वालों की तरह श्मशान में जलाने की सहूलियत नहीं है. इस का मतलब तो यह हुआ कि धर्म मानता है कि आत्मा भी दलित होती है और किसी ऊंची जाति वाले की आत्मा को दलित की आत्मा छू गई, तो वह भी अपवित्र हो जाएगी.
लेकिन हकीकत तो यह है कि इस तरह की ज्यादतियां दलितों को दबाए रखने के लिए जानबूझ कर की जाती हैं, जिस से वे दबंगों के सामने सिर नहीं उठा पाएं.
पाराशर की गढ़ी गांव की तरह दलितों को अपने वालों की लाश अपनी ही जमीन पर जलानी पड़ती है, लेकिन दिक्कत बबलू जैसे 95 फीसदी दलितों की होती है, जिन के पास अपनी जमीन नहीं होती. लिहाजा, वे लाश को किसी जंगल में या गांव के बाहर सरकारी जमीन पर जलाने के लिए मजबूर होते हैं.
कब्जा करने की मंशा
पाराशर की गढ़ी गांव के तीनों श्मशानों में केवल ऊंची जाति वालों की लाशें जलती हैं, पर हैरानी की बात यह है कि श्मशान की जमीनों पर दबंगों का कब्जा है और वे शान से इन जमीनों पर खेती करते हैं. उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है.
पूजा की लाश को जगह न देने पर जब ज्यादा होहल्ला मचा, तो आला अफसर भागेभागे पाराशर की गढ़ी गांव गए और हालात का जायजा लिया.
मुरैना के कलक्टर विनोद शर्मा और एसपी विनीत खन्ना ने फौरीतौर पर श्मशान घाट की जमीनों पर फैसिंग करवा दी, जो तय है कि जो कुछ दिनों या महीनों में हट जाएगी और दबंग फिर से इस सरकारी जमीन पर काबिज हो जाएंगे.
मंदिर बना कर जमीनें हड़पना आम बात है. इसी तर्ज पर अब श्मशानों की जमीनों पर भी ऊंची जाति वाले कब्जा करने लगे हैं. जिस तरह मंदिरों में पूजापाठ के लिए दलितों को दाखिल नहीं होने दिया जाता, ठीक उसी तरह श्मशानों में भी उन्हें जलाने की इजाजत नहीं है.
पाराशर की गढ़ी गांव में तहकीकात करने गए अफसर कुरसियों पर बैठे दलित बबलू की दास्तां सुनते रहे और बबलू समेत और दलित नीचे जमीन पर बैठे रिरियाते रहे.
प्रशासन ने बात सुनी, लेकिन किसी दोषी दबंग के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की. यह बात इस रिवाज को शह देने वाली नहीं तो क्या है?
ऐसा ही एक मामला इसी साल अप्रैल के महीने में नरसिंहपुर जिले की करेली तहसील में सामने आया था. वंदेसुर गांव के एक गरीब बुजुर्ग की मौत के बाद उस के घर वाले लाश को जलाने श्मशान घाट ले गए, तो दबंगों ने उन्हें लाश समेत वहां से भगा दिया था.
इस पर मरने वाले के भांजे गोपाल मेहरा ने हल्ला मचाया, तो गाडरवारा के तहसीलदार संजय नागवंशी गांव पहुंचे और मामले की जांच कर यह बयान दिया कि कायदेकानूनों के तहत कुसूरवारों पर कार्यवाही की जाएगी.
दरअसल, वंदेसुर गांव की श्मशान घाट की 3 एकड़ जमीन पर दबंगों भानुप्रताप राजपूत और छत्रसाल राजपूत का कब्जा है. इस मामले में भी मरे बुजुर्ग का अंतिम संस्कार तालाब किनारे सड़क पर किया गया था.
इन उजागर हुए मामलों से जाहिर सिर्फ इतना भर होता है कि जीतेजी तो दलित दबंगों का कहर झेलते ही हैं, पर मरने के बाद भी उन्हें बख्शा नहीं जाता.
गांव में पंचायती राज कहने भर की बात है, नहीं तो असल राज दबंगों का चलता है, जो श्मशान तक की जमीनें हथिया लेते हैं और दलितों की लाश को नहीं जलाने देते.
समस्या श्मशान घाटों की कमी की नहीं, बल्कि छुआछूत और दबंगई की है, जिस के तहत ऊंची जाति वाले श्मशान तक में छुआछूत मानते हैं. वे अगर दलितों को श्मशान में लाश जलाने की इजाजत दे देंगे, तो जमीनों पर बेजा कब्जा नहीं कर पाएंगे.
ज्यादातर दलितों के पास जमीनें नहीं हैं, इसलिए लाशों को ठिकाने लगाने के लिए वे यहांवहां भटकते रहते हैं. हालत यह है कि कुएं और नदी ऊंची जाति वालों के कब्जे में हैं, सड़कें उन के लिए हैं, मंदिर उन के लिए हैं और श्मशान घाट भी उन्हीं के हैं. ऐसे में भाईचारे और बराबरी की बात मजाक ही लगती है.
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30 साला छाया नागले भोपाल के न्यू मार्केट इलाके के एक होटल में रोटी बनाने का काम कर के अपने 2 बच्चों की परवरिश कर रही थी. अब से तकरीबन 3 साल पहले तक छाया की जिंदगी भी आम औरतों की तरह गुलजार थी. हालांकि उस के पति राजेश की आमदनी कोई खास नहीं थी, पर उस से घर की जरूरतें तो पूरी हो ही जाती थीं.
साल 2013 में राजेश की मौत ने छाया को हिला दिया था. तब उसे समझ आया था कि एक विधवा की जिंदगी कितनी परेशानियों से भरी होती है.
इंदौर छोड़ कर छाया भोपाल आई, तो टीटी नगर इलाके की एक झुग्गी बस्ती में रहने लगी. जमापूंजी खर्च हो चली थी, इसलिए छाया नौकरी के लिए भागादौड़ी करने लगी. ऐसे में होटल में रोटी बनाने का काम उसे मुफीद लगा, जिस से गुजारे लायक कमाई हो जाती थी.
धीरेधीरे छाया पति की मौत का दुख भूल चली थी, पर तनहाई में जब उस की याद आती थी, तो साथ ही कई दूसरी जरूरतें भी सिर उठाने लगती थीं. जब से उस की जिंदगी में अनजान शख्स राम आया था, तब से मन भी बेचैन रहने लगा था.
कहने की जरूरत नहीं है कि उसे राजेश से प्यार हो गया था, फिर धीरेधीरे यह प्यार परवान चढ़ा.
जब राम पर पूरी तरह भरोसा हो गया, तब छाया जिंदगी की एक नई शुरुआत के सपने देखने लगी. लेकिन जाने क्या हुआ कि 15 मई, 2016 की रात तकरीबन 11 बजे छाया ने खुद पर केरोसिन छिड़क कर आग लगा ली.
तुरंत पड़ोसी जमा हो गए और 100 नंबर पर फोन कर के अंबुलैंस बुला कर इलाज के लिए उसे अस्पताल ले गए, जहां इलाज के दौरान छाया ने दम तोड़ दिया.
भरोसा भी टूटा
पुलिस ने जब जांचपड़ताल की, तो छाया की झोंपड़ी से एक डायरी मिली, जिस में उस ने राम और खुद की मुहब्बत का जिक्र करते हुए यह भी अपने आशिक को लिखा था कि राम, तुम ने मुझ से प्यार का नाटक कर मुझे धोखा दिया. इस से मेरी बदनामी हो जाएगी और मैं कहीं की नहीं रहूंगी.
पुलिस ने इस मामले में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली, लेकिन जातेजाते छाया यह कड़वा सच उजागर कर गई कि विधवा की जिंदगी आज भी कटी पतंग जैसी ही है, जिसे हर कोई लूट सकता है.
ज्यों का त्यों नजरिया
विधवा चाहे छाया हो या कोई और, उस पर अनापशनाप बंदिशें इस तरह लगाई जाती हैं कि पति की मौत के बाद उस के लिए जिंदगी एक सजा बन कर रह जाती है. अगर वह हिम्मत जुटा कर नए सिरे से इसे जीना भी चाहे, तो उसे पता चलता है कि जिस में वह सहारा ढूंढ़ रही होती थी, उस की नजर तो उस के जिस्म पर थी और अगर पति पैसा छोड़ गया हो, तो दौलत पर भी थी.
समाज के नजरिए का विधवाओं पर लगाई जाने वाली बंदिशों से गहरा नाता है. अव्वल तो पति की मौत के साथ ही उन्हें बैठेबिठाए मनहूस होने का खिताब मिल जाता है. इस वजह से वे शादीब्याह जैसे शुभ कामों में नहीं जा सकतीं, गहने नहीं पहन सकतीं, साजसिंगार नहीं कर सकतीं और खास बात यह कि किसी पराए मर्द से बात करती नजर आएं, तो झट से उन्हें बदचलन कह दिया जाता है.
धार्मिक किताबों से आया यह नजरिया आज भी ज्यों का त्यों बरकरार है. बस थोड़ी सी छूट इस बात की मिली है कि अब सफेद साड़ी पहनना विधवाओं की मजबूरी नहीं रही.
धार्मिक किताबों में कहा गया है कि विधवा को कैसे रहना चाहिए और कैसे नहीं रहना चाहिए. अगर कोई विधवा पंडों के बनाए नियमों और उसूलों के खिलाफ जाती है, तो वे उस का चैन से रहना ही दूभर कर देते हैं.
घर में भी शोषण
34 साला प्रेमलता (बदला नाम) के शौहर की मौत अब से तकरीबन 8 साल पहले हुई थी. विदिशा के नजदीक एक कसबे में रहने वाली प्रेमलता के शौहर के हिस्से की 15 एकड़ जमीन उस के जेठ ने नाजायज तरीके से हड़प ली.
इस पर प्रेमलता ने एतराज जताया, तो एक दिन मौका पा कर जेठ ने उस की इज्जत लूट ली.
प्रेमलता तब से खून के आंसू पी रही है. जब जेठ की मरजी होती है, तब उसे न चाहते हुए भी वह काम करने को मजबूर होना पड़ता है, जो उजागर हो जाए, तो पाप कहलाने लगता है और इस का जिम्मेदार जेठ या कोई दूसरा मर्द नहीं, बल्कि विधवा ही ठहराई जाती है.
कुछ वजह से प्रेमलता मायके नहीं जा सकती थी. अपने दोनों बच्चों की परवरिश की चिंता उसे है, इसलिए जेठ की ज्यादतियां बरदाश्त कर रही है. इस की जानकारी उस की जेठानी को भी है.
यह वही समाज है और धर्म है, जो औरतों को देवी की हद तक पूजने की बातें करता है, पर सच एकदम उलट है. हर कोई विधवा को कलंक बता कर उस की दौलत और जिस्म को लूटना व भोगना चाहता है, जबकि इस में उस का कोई कुसूर नहीं होता.
भोपाल के पौश इलाके शिवाजी नगर में घर में झाड़ूपोंछा करने वाली 28 साला प्रियंका (बदला हुआ नाम) की मानें, तो शौहर की मौत के बाद ससुराल वालों ने कोई खास ज्यादती नहीं की, लेकिन यह फरमान जरूर जारी कर दिया कि खुद कमाओ और खाओ.
जब खुद कमानेखाने निकली, तो प्रियंका को उस समय मायूसी हाथ लगी, जब ज्यादातर घरों में उसे महज विधवा होने की वजह से काम नहीं मिला और जहां मिला, वहां से उसे जल्दी निकाल दिया गया. घर की मालकिनों को डर था, चूंकि प्रियंका विधवा है, इसलिए उन के शौहर को फंसा लेगी.
प्रियंका बताती है कि कोई ढंग का नौजवान उस से शादी करने को तैयार नहीं. जिन्होंने दिलचस्पी दिखाई, वे उम्र में 45-50 के ऊपर थे और 2-3 बच्चों के बाप भी, जिन की बीवियां नहीं थीं.
प्रियंका कहती है कि उन के बच्चों को तो मैं अपना समझ कर पाल लूंगी, पर 28 की उम्र में 45-50 की उम्र के मर्द से शादी करूंगी, तो फिर जल्दी ही विधवा हो जाऊंगी. वैसे भी उन की मंशा देख कर मुझे लगा कि उन्हें बीवी नहीं बिस्तर गरम करने वाली औरत चाहिए, जो दिन में नौकरानी बन कर रहे.
क्या होगा नतीजा
हालात सुधरेंगे, ऐसा इन विधवाओं की दास्तां सुन कर लग नहीं रहा. छाया ने प्यार में धोखा खाया और खुदकुशी कर ली.
प्रेमलता बच्चों की खातिर मन मार कर नरक में पड़ी है और प्रियंका किसी ऐसे सहारे की तलाश में है, जो उसे इज्जत और गैरत से रख सके.
अब तो हालत यह है कि विधवाओं की बदहाली पर चर्चा भी न के बराबर होती है, हां, वे विधवाएं जरूर धर्म और समाज के ठेकेदारों के निशाने पर रहती हैं, जो उन से डरती और दबती नहीं और अपनी मरजी से जिंदगी जी रही हैं.
विधवाएं कब तक अपनी जरूरतें दबा कर रख पाती हैं और समाज के कायदेकानूनों पर अमल कर पाती हैं, कह पाना मुश्किल है, पर इन मिसालों से लगता है कि वे हालात से ज्यादा नहीं जूझ सकतीं.
देर सवेर ही सही, झक मार कर उन्हें समझौता करना ही पड़ता है. अपनी हिफाजत और आबरू के लिए वे किसी भी ऐरेगैरे मर्द के पल्ले बंधने को मजबूर होती हैं और न बंधें, तो एक पूरी भीड़ उन्हें लूटने खसोटने के लिए तैयार खड़ी रहती है.
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बौलीवुड और साउथ की फिल्मों में धमाल मचा चुकी अदाकारा अदा शर्मा अब इन दिनों सोशल मीडिया पर अपने शानदार डांस मूव्स से धमाल मचा रही हैं. इस बार अदा ने सिंगर व रैपर बादशाह के मशहूर गाने ‘करेजा करेजा…’ पर हौट स्टाइट में कई स्टेप्स दिखाए. उन्होंने अपने इस वीडियो को इंस्टाग्राम पर भी शेयर किया है. सोशल मीडिया पर फैंस उनके इस डांस मूव्स को काफी पसंद कर रहे हैं. इस वीडियो को अब तक करीब 3 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं.
गौरतलब है कि अदा ने कुछ दिन पिछले अपनी दादी तुलसी सुंदर के साथ फिल्म ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ के गाने ‘बम डीगी डीगी बम’ पर डांस किया था. इस गाने पर अदा के साथ उनकी दादी पूरी मस्ती के साथ नाच रही थीं और अपनी पोती के एक्शंस के साथ मैच करने की कोशिश कर रही थीं. अदा के इस वीडियो को महज कुछ ही घंटों में 6 लाख से ज्यादा बार देखा गया था.
अगर अदा शर्मा के फिल्मी करियर की बात करें तो अदा शर्मा ने साल 2008 में विक्रम भट्ट की फिल्म ‘1920’ से बौलीवुड में डेब्यू किया था. अदा ने ‘हम हैं राही कार के’ और ‘हंसी तो फंसी’ जैसी फिल्मों में काम किया है लेकिन ये फिल्में ज्यादा चल नहीं सकीं. साल 2017 में वे विद्युत जमवाल के साथ ‘कमांडो 2’ में नजर आई थीं, और इस फिल्म में उनके रोल को काफी पसंद भी किया गया था.
अदा के अगर साउथ फिल्मी करियर की बात करें तो उन्होंने साउथ के सुपर स्टार अल्लू अर्जुन के साथ ‘सन औफ सत्यमूर्ति’ में भी किया है.
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20 साल की क्षमा प्रिया के हाथों की मेहंदी का रंग अभी सुर्ख ही था और उस का सुहाग उजड़ गया. कुछ समय पहले ही क्षमा ने दिवाकर के नाम की मेहंदी रचाई थी. उस के पति दिवाकर की मौत नक्सली हमले में हो गई. जैसे ही उस के भाई विपिन ने उसे दिवाकर की मौत के बारे में खबर दी कि समूचा घर चीखपुकार में डूब गया.
क्षमा रोतेबिलखते हुए बारबार यही कह रही थी, ‘‘मेरे दिवाकर को कुछ नहीं हुआ है… वह ठीक है… लोग हमारी शादी से जलते हैं, इसलिए झूठी बातें फैला रहे हैं… क्यों मार दिया मेरे पति को? ऐ नक्सली, हम ने आप का क्या बिगाड़ा था… बताइए…’’ इतना कहतेकहते वह फिर से बेहोश हो गई.
लोग उसे होश में लाने की कोशिश करते हैं. उसे चुप कराने की कोशिश करते रहे, पर उस की सिसकियां और हिचकियां रुकने का नाम ही नहीं ले रही थीं. वह आसपास खड़े हर किसी को उम्मीद भरी नजरों से देखती है कि कोई तो कह दे कि उस का पति जिंदा है. उस के बाद वह फिर से दहाड़ें मार कर रोने लगती.
दिवाकर कुमार की मां सुनीता देवी और पिता तुनकलाल तिवारी को तो मानो काठ मार गया है. 5 औलादों में से उन का एक बेटा शहीद हो गया था.
दिवाकर कुमार बिहार के खगडि़या जिले के परबत्ता ब्लौक के झंझरा गांव का रहने वाला था. 27 जून, 2016 को उस की शादी गोपालपुर मानसी टोला के रहने वाले राजेश्वर प्रसाद की बेटी क्षमा प्रिया से हुई थी.
इसी तरह 30 साल की मीरा की जिंदगी में भी नक्सलियों ने अंधेरा फैला दिया है. उस के पति अनिल कुमार सिंह ने नक्सली मुठभेड़ में अपनी जान गंवा दी है.
बिहार के बक्सर जिले के डुमरांव के ‘शहीद मर्द’ रोड पर बने अनिल का घर मातम में डूबा हुआ है. ‘शहीद मर्द’ महल्ले के रहने वाले अनिल ने मरतेमरते खुद को आखिर जांबाज ‘शहीद मर्द’ साबित कर डाला.
सीआरपीएफ के जवान अनिल कुमार सिंह का बचपन काफी परेशानियों में गुजरा था. परमेश्वरपुर गांव के रहने वाले रामचंद्र सिंह के 2 बेटों और 2 बेटियों में अनिल सब से छोटा था. बचपन में ही अनिल के सिर से पिता का साया उठ गया था. उस की मां चिंता देवी ने काफी परेशानियों से जूझते हुए बच्चों की परवरिश की थी.
साल 2000 में अनिल कुमार सिंह की सीआरपीएफ में बहाली हुई थी. अनिल की बेटी आकांक्षा 5 साल की और बेटा अभिनव 2 साल का है.
23 साल की नम्रता सिंह की आंखों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं. कोबरा बटालियन के कमांडो उस के पति रवि कुमार ने नक्सलियों से लोहा लेते हुए अपनी जान दे दी.
बिहार के सिवान जिले के असांव थाने के खरदरा गांव के मिथिलेश कुमार सिंह का 25 साला बेटा रवि कुमार 8 जुलाई, 2016 को 40 दिनों की छुट्टी बिता कर ड्यूटी पर लौटा था. रवि के पिता मिथिलेश भी सीआरपीएफ में हैं और फिलहाल वे अगरतला में तैनात हैं.
रवि ने 19 साल की उम्र में ही सीआरपीएफ जौइन कर ली थी और साल 2012 में उस की शादी असांव थाना इलाके के ही शिऊरी गांव की नम्रता सिंह से हुई थी. अभी उन के कोई औलाद नहीं है.
बिहार के 3 जवानों के अलावा प०ि०श्चम बंगाल के नदिया जिले के दीपक घोष, दक्षिणी दिनाजपुर के पोलाश मंडल, उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के हरविंदर पवार, आजमगढ़ के सिनोद कुमार, मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के मनोज कुमार, मणिपुर के थैवाल जिले के उपेंद्र सिंह, पंजाब के होशियारपुर जिले के रमेश कुमार भी नक्सली हमले में शहीद हो गए.
दरअसल, कैमूर की सोनदाहा पहाडि़यों पर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश की पुलिस ने मिल कर सर्च आपरेशन शुरू किया था.
19 जुलाई, 2016 की रात बिहार के रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, गया, उत्तर प्रदेश के सोनभद्र, चंदौली और झारखंड के गढ़वा, पलामू और चंपारण जिलों की पुलिस टीम मिल कर यह आपरेशन चला रही थी.
बिहार के गया और औरंगाबाद जिले की सरहद पर डुमरी नाला के पास दर्जनों लैंड माइंस धमाके और अंधाधुंध गोलीबारी कर के नक्सलियों ने सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन के 10 जवानों की जान ले ली.
एडीजी, हैडक्वार्टर सुनील कुमार ने बताया कि नक्सली हमले में कोबरा बटालियन के 10 जवान शहीद हुए हैं और 5 बुरी तरह से जख्मी हो गए है. जवानों की जवाबी कार्यवाही में 6 नक्सली मारे गए, जिन में से 3 की लाशें बरामद हुई हैं.
नक्सलियों की लाश के पास से 2 इंसास राइफल, एक एके-47, एक अंडर बैरल ग्रेनेड और एक रौकेट लौंचर बरामद हुआ.
गया जिले के आमस के डुमरी नाला के पास तकरीबन 340 आईईडी (इंप्रोवाइज्ड ऐक्सप्लौजिव डिवाइस) फटे थे. उसे 3 सौ मीटर के दायरे में लगाया गया था. 18 जुलाई, 2016 को हुई नक्सली वारदात के बाद चलाए गए इस सर्च आपरेशन में तकरीबन 50 आईईडी बरामद किए गए, जिन्हें जंगल में ही डिफ्यूज कर दिया गया.
नक्सलियों की ऐसी कार्यवाही से साफ हो जाता है कि उन्होंने कोबरा जवानों को अपने जाल में फंसाने की पूरी प्लानिंग कर रखी थी. आधी रात को सर्च आपरेशन पर निकले जवान अचानक हुए लैंड माइंस धमाके से घबरा गए और जब तक वे खुद को संभाल पाते, तब तक नक्सलियों ने गोलियों की बौछार शुरू कर दी.
नक्सली हमले में जख्मी हुए जवानों ने बताया कि नक्सलियों ने तकरीबन डेढ़ किलोमीटर के दायरे में लैंड माइंस बिछा रखी थीं और सभी एक के बाद एक फट रही थीं. ब्लास्ट में 15-20 जवान बुरी तरह से जख्मी हो गए.
जख्मी जवान खुद को संभालने की कोशिश में ही लगे थे कि उन के ऊपर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी गई. घायल जवान तड़पते हुए मौके पर ही दम तोड़ने लगे और गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच कोई कुछ नहीं कर पा रहा था. जवानों को अंदाजा है कि नक्सलियों की तादाद तकरीबन डेढ़ सौ रही होगी.
सिक्योरिटी एजेंसियों के होश इस बात को ले कर उड़े हुए हैं कि नक्सलियों ने एकसाथ 340 लैंड माइंस कैसे लगा दीं? इस तरह से लैंड माइंस बिछाने का काम श्रीलंका का उग्रवादी संगठन लिट्टे किया करता था. लिट्टे घातक तरीके से लैंड माइंस का इस्तेमाल करने के लिए बदनाम रहा है. नक्सलियों ने परत दर परत लैंड माइंस बिछा कर बड़ी तबाही की पूरी तैयारी कर रखी थी. सारी लैंड माइंस फटी नहीं, वरना और भी बड़ा नुकसान हो सकता था.
पुलिस सूत्रों के मुताबिक, नक्सलियों ने पुलिस को फंसाने के लिए यह जाल बिछाया था. एक करोड़ रुपए का इनामी नक्सली और झारखंड स्पैशल एरिया कमेटी के मुखिया मोतीलाल सोरेन उर्फ विजय यादव उर्फ संदीप के जंगल में छिपे होने की झूठी खबर उन्होंने फैला दी थी.
आमतौर पर बारिश के मौसम में नक्सलियों के खिलाफ आपरेशन रोक दिया जाता है. इस के बाद भी संदीप की खोज में पुलिस टीम को जंगल भेज दिया गया. वहीं पुलिस की लापरवाही यह भी रही कि संदीप के बारे में जानकारी मिलने पर उस की पुष्टि कराने की कोशिश नहीं की गई और आननफानन पुलिस टीम को जंगल में भेज दिया गया.
संदीप साल 2011 में चाईबासा जेल से फरार हुआ था. वह ज्यादातर समय अपने दस्ते के साथ सरांडा, कोल्हान और पोड़ाहाट के जंगलों में बिताता है. इस के अलावा वह झारखंड के रांची, लातेहार, पलामू, बुंडू, अड़की और ओडिशा के क्योंझर और सुंदरगढ़ जिलों के जंगलों में आताजाता रहता है. इस के अलावा बिहार के औरंगाबाद, गया और जमुई जिलों के जंगलों में भी उस की गहरी पैठ है.
अपने साथियों के बीच ‘बड़े सरकार’ के नाम से मशहूर संदीप साल 2013 में संकरा जंगल में पुलिस की घेराबंदी में बुरी तरह फंस गया था. इस के बाद भी वह बड़ी चालाकी से पुलिस पर फायरिंग करता हुआ बच निकला था.
संदीप बिहार, झारखंड, ओडिशा पुलिस के लिए सिरदर्द बना हुआ है. 45-46 साल का संदीप हिंदी, भोजपुरी, संथाली, मगही, सादरी, उडि़या, बंगला वगैरह बोलियां बेझिझक बोल लेता है. इस से वह हर राज्य के नक्सलियों और गांव वालों के साथ आसानी से घुलमिल जाता है.
सूत्रों ने बताया कि आईबी ने झारखंड पुलिस को सूचना दी थी कि संदीप का दस्ता डुमरी इलाके में है. उस के साथ पलामू का सबजोनल कमांडर पवन और श्रवण भी अपने साथियों के साथ डुमरी पहुंच चुका है. नक्सली बड़ी वारदात को अंजाम देने की कोशिश में लगे हुए हैं.
इस की सूचना बिहार के गया और औरंगाबाद के एसपी को भी दी गई थी. उसी सूचना के आधार पर औरंगाबाद पुलिस और सीआरपीएफ के कोबरा बटालियन के जवानों ने सर्च आपरेशन शुरू किया था.
पुलिस के आला अफसर मानते हैं कि नक्सलियों को पुलिस के आपरेशन की भनक लग गई थी, तभी उन्होंने पुलिस के आनेजाने के रास्तों पर लैंड माइंस बिछा दी थीं.
पुलिस सूत्रों के मुताबिक, 16 जुलाई, 2016 को औरंगाबाद के एसपी बाबूराम की अगुआई में कोबरा-205 बटालियन के 120 जवान मदनपुर थाने के बादम की ओर से सोनदाहा की पहाडि़यों और जंगल की ओर नक्सलियों की खोज में निकले थे और उसी दिन शाम तक उन्हें वापस लौटना था.
सर्च आपरेशन में नक्सलियों का कुछ पता नहीं चला, तो टीम को एक दिन और रुकने को कहा गया.
18 जुलाई, 2016 को 25-25 जवानों की टुकडि़यां बना कर डुमरी नाला के घने जंगल की ओर निकल गईं. इस की भनक नक्सलियों को लग गई.
2 टुकडि़यां तो आगे निकल गईं, पर पीछे से आ रही 2 टुकडि़यां नक्सलियों के जाल में फंस गईं. धमाकों की आवाज सुन कर आगे निकली दोनों टुकडि़यों ने मोरचा संभाला और नक्सलियों का जम कर मुकाबला किया.
पुलिस का दावा है कि उन के जवानों की जवाबी फायरिंग में 8-10 नक्सली मारे गए. पुलिस को 4 नक्सलियों की लाशें मिली हैं, जिन में से एक की पहचान इनामी नक्सली आजाद के रूप में हुई है.
नक्सलियों ने जिस जगह पर जवानों पर हमला किया, वहां किसी के लिए पहुंचना आसान नहीं है. डुमरी नाला तक पहुंचने के लिए पहाड़ और घने जंगल की पूरी जानकारी पुलिस और सुरक्षा बलों को भी नहीं थी. यह जगह गया से 80 किलोमीटर दूर है, वहीं औरंगाबाद से 60 किलोमीटर और झारखंड के डाल्टनगंज से सौ किलोमीटर दूर है.
बिहार के डीजीपी पीके ठाकुर डुमरी नाला के पास पुलिस पर हुए नक्सली हमले को बड़ी चूक मानते हुए कहते हैं कि इस से सुरक्षा बलों को कड़ा सबक मिला है. अब पुलिस को फूंकफूंक कर कदम उठाना होगा.
उन्होंने आगे कहा कि सीआरपीएफ के साथ बेहतर तालमेल बिठा कर सख्ती के साथ नक्सलियों के खिलाफ आपरेशन चलाया जाएगा.
20 जुलाई, 2016 को रांची में 4 राज्यों के पुलिस अफसरों की बैठक में नक्सली समस्या पर मंथन हुआ. बिहार समेत झारखंड, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ पुलिस के आला अफसरों ने नक्सली समस्या से निबटने के लिए तालमेल बिठाने की जुगत भिड़ाई.
आतंकियों से ज्यादा नुकसान करते नक्सली देशभर के नक्सली इलाकों में साल 2015 में 247 और साल 2014 में 221 नक्सली मुठभेड़ हुईं. देश के
9 राज्यों के 106 जिले नक्सली बैल्ट कहे जाते हैं. छत्तीसगढ़ राज्य के सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर सब से ज्यादा नक्सल असर वाले इलाके हैं.
आतंकी हमले से ज्यादा भयावह हालत नक्सली हमलों की है. साल 2015 में नक्सली हमलों में देशभर में कुल 155 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए, वहीं पूर्वोत्तर के उग्रवाद प्रभावित इलाकों में 57 जवानों ने जान गंवाई.
कश्मीर के आतंकी हमलों में देश ने 41 जवानों को खोया. पिछले साल नक्सली हमलों में 181 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी.
बिहार में जून, 2013 में 5 सौ से ज्यादा नक्सलियों ने जमुई में ‘धनबादपटना इंटरसिटी ऐक्सप्रैस’ ट्रेन को हाईजैक कर लिया था. ट्रेन में 3 लोगों की हत्या कर दी थी.
सितंबर, 2010 में नक्सलियों ने 4 पुलिस वालों को बंधक बना लिया था और एक पुलिस वाले को मार डाला था.
नवंबर, 2005 में जहानाबाद जेल पर नक्सलियों ने धावा बोल दिया था. इस हमले में 2 सुरक्षाकर्मी और एक कैदी मारे गए, पर जेल का फाटक टूटने से 250 कैदी फरार हो गए थे.
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वतन की हिफाजत के लिए अपने जिगर के टुकड़ों को कुरबान करने वाली मांएं खुद पर फख्र महसूस करती हैं. हालांकि बेटों के बिछोह का गम उन्हें कई बार टीस देता है, पर उस से ज्यादा अपने लोगों की बेरुखी तंग करती है.
इस दर्द के लिए शब्द नहीं
‘‘जवान बेटे के बिछोह के दर्द को कौन सी मां अपने शब्द दे सकती है…’’ कहतेकहते छाती में जमा दर्द उन की आंखों में आ कर पिघलने लगता है. तकरीबन सवा साल पहले अरुणाचल प्रदेश में 8 नक्सलियों से हुई मुठभेड़ में 34 साला मेजर आलोक माथुर मारे गए थे. पिछली 26 जनवरी को उन्हें मरणोपरांत वीरता सेना मैडल मिला था.
आलोक की मां मधु माथुर कहती हैं कि सरकारी नियमकायदों में मां की ममता के लिए कहीं कोई जगह नहीं है. अपने 2 नन्हे पोतों में उन्होंने बचपन के उस आलोक की इमेज को देखना चाहा था. जब वे रसोईघर में होती थीं और वह गलबहियां डालते हुए कहता, ‘मां, आज क्या पका रही हो?’
सरकार से जितनी भी रकम और दूसरी सुविधाएं मिलती हैं, वे सब मारे गए सैनिक की पत्नी के नाम से होती हैं. जवान पति की मौत के बाद ज्यादातर लड़कियां मायके में रहना पसंद करती हैं. मातापिता एक समय बाद उन की दूसरी शादी भी कर देते हैं, क्योंकि पहाड़ सी जिंदगी उन के सामने होती है.
हालांकि इस में कुछ गलत भी नहीं है. बहू को तो दूसरा जीवनसाथी मिल गया, मदद भी मिल गई, पर मां कहां ढूंढ़ेगी अपने खोए बेटे को?
बेटे की बहादुरी पर फख्र
राजस्थान के झुंझुनूं जिले के जयपहाड़ी गांव के जगदीश सिंह शेखावत को याद कर उन की मां अजय कंवर अपने आंसू नहीं रोक पाती हैं.
3 बेटों को सेना में भेज चुकीं अजय कंवर के लाड़ले ने दुश्मन को खत्म करने के बाद ही इस दुनिया को अलविदा कहा था. वह बचपन में पिता की टोपी लगा कर हमेशा सेना में जाने की ही बात करता था.
सीकर जिले के भैरूपुरा गांव की चावली देवी को अपने बेटे की कुरबानी पर गर्व है. वे चाहती हैं कि उन का पोता अरविंद भी फौज में ही भरती हो.
चावली देवी ने बताया कि उन का बेटा महेश कुमार जाट रैजीमैंट में जम्मूकश्मीर के लौगावा सैक्टर में तैनात था. पिछले साल 23 जनवरी की सुबह पहाड़ी पर आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में वह मारा गया.
लौटा तिरंगे में लिपट कर
किसी भी मां के लिए उस के बेटे की मौत से बड़ा शायद ही कोई गम हो. झुंझुनूं जिले के पिलानी कसबे के शहीद मेजर प्रदीप शर्मा की मां प्रेमलता का दामन भी आंसुओं से भरा है.
मेजर प्रदीप शर्मा अपनी बहन की सगाई की तैयारी के लिए आने का वादा कर के गए थे. वे लौटे तो सही, पर तिरंगे में लिपटे हुए.
मां के लिए यह सब से बड़ा सदमा था, जिस से वे अब तक नहीं उबर पाई हैं. प्रदीप शर्मा के शहीद होने के बाद उस का सामान संदूकों में घर लाया गया, लेकिन उन्होंने संदूकों को आज तक नहीं खोला है.
याद करो कुरबानी
हर 26 जनवरी और 15 अगस्त पर सवेरे से ही पूरे मुल्क में देशभक्ति से भरे गीतों के रेकौर्ड बजते हैं, ‘जो शहीद हुए हैं उन की, जरा याद करो कुरबानी…’ न चाहते हुए भी कमला देवी के सीने में छिपा दर्द उन की बूढ़ी आंखों में आ बैठता है.
वे कहती हैं, ‘‘मेरे बेटे ने तो देश के नाम पर अपने प्राणों की बलि दे दी, पर मेरे बहूपोते को मुझ से कोई मिला दे.’’
कमला देवी का बेटा रवींद्र साल 1975 में पाकिस्तान में गुप्तचरी के लिए नबी अहमद बन कर गया था. वहां सेना में भरती के लिए प्रवेश परीक्षा दी और उस का सलैक्शन भी हो गया.
अपने काम को अंजाम देते सेना को हथियार सप्लाई करने वाले एक शख्स की बेटी जाने कब उस की जिंदगी में चली आई और वे एकदूसरे को दिल दे बैठे, पता ही नहीं चला. जल्दी ही दोनों शादी के बंधन में बंध कर जिंदगीभर के साथी हो गए. उस दिन तो उन की खुशी का ठिकाना न रहा, जब वे एक बेटे के मातापिता बने.
पाकिस्तान में रहने के तकरीबन
8 साल बाद रवींद्र पकड़ा गया और फिर उस पर शुरू हुआ जोरजुल्म ढाने का ऐसा कहर, जो 18 साल तक चलता रहा. इस के चलते वह टीबी की बीमारी का शिकार हो गया. आखिरकार नवंबर, 2001 में उस की मौत हो गई.
कारगिल की लड़ाई पर रवींद्र के बारे में एक बड़े अफसर ने कहा था कि यह खूनखराबा न होता, अगर रवींद्र जैसा जांबाज जासूस हमारे खुफिया महकमे के पास होता.
आज रवींद्र का बेटा जवान हो गया है. उस की पाकिस्तानी मां भी उसे बताती होगी कि उस के पिता का परिवार हिंदुस्तान में रहता है, जहां उस की दादी है, बूआ है, भाईबहन हैं, चाचा हैं, पर सियासत के खूनी खेल के चलते वे चुप रहते होंगे और मन ही मन सोचते होंगे कि दुनिया की सारी दुश्मनी की दीवारें टूट जाएं और सभी अपने बिछड़े परिवारों से मिल सकें.
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जम्मू-कश्मीर के कठुआ में 8 साल की बच्ची आसिफा के साथ हुई बर्बरता को देखकर पूरा देश हैरान है. देश की पब्लिक के साथ ही बौलीवुड की अभिनेत्रियां भी इस घिनौनी हरकत पर नाराजगी जाहिर कर रही हैं. कठुआ में मासूम के साथ हुई घटना को लेकर सोशल मीडिया पर अभिनेत्रियों ने इंसाफ के लिए मुहिम छेड़ी है.
अभिनेत्री सोनाली बेंद्रे, कल्कि, सोनम कपूर, सिमी ग्रेवाल और प्रिया प्रकाश वारियर ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर नाराजगी जाहिर की है, वहीं अभिनेत्री कल्कि ने एक फोटो शेयर कर लिखा, ”मैं हिंदुस्तान हूं और मैं इस घटना से शर्मिंदा हूं.”
सोनाली बेंद्रे ने ट्वीट कर लिखा, “शर्मनाक, शर्मनाक है कि हम इंसानियत दिखाने की जगह धर्म और राजनीति मुद्दे पर उतर आए हैं. शर्मनाक है कि इस आपराधिक घटना पर हम बाद में जाग्रत होते हैं, जबकि विदेशी मीडिया इस खबर को प्रमुखता से ले रहा है. शर्मनाक है कि हम इस देश में बच्चियों को सुरक्षा नहीं दे पा रहे हैं.”
वहीं, अभिनेत्री कल्कि ने औफिशियल ट्विटर अकाउंट से एक फोटो शेयर किया है, जिसमें वह एक पोस्टर पकड़े हुए नजर आ रही हैं. पोस्टर में लिखा है – मैं हिंदुस्तान हूं और मैं शर्मिंदा हूं. 8 साल की बच्ची का मंदिर में गैंगरेप कर हत्या कर दी गई. अभिनेत्री सोनम कपूर ने लिखा, “फेक नेशनल्स और फेक हिंदुओं को शर्म आनी चाहिए, मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि यह हमारे देश में हो रहा है.”
Shame. Shame on us for letting religious & political issues come in the way of humanity. Shame on us for waking up to this heinous crime months later,after international media has highlighted it. Shame on us for not being able to protect the girls of our country. #JusticeForAsifa
अभिनेत्री सिमी ग्रेवाल ने लिखा, ”इस दुनिया में इससे ज्यादा बर्बर कोई जाति नहीं है, इतने शैतान आसिफा के रेपिस्ट. ऐसे लोगों के लिए इस अपराध की कोई सजा नहीं हो सकती है. सिर्फ 8 साल की बच्ची? मैं सिर्फ इतना पूछना चाहती हूं कि भगवान हैं कहां? ” प्रिया प्रकाश वारियर ने इंस्टाग्राम स्टोरी पर आसिफा के लिए इंसाफ की मांग की है. प्रिया ने लिखा, “यह हिंदू और मुस्लिम का मुद्दा नहीं है, एक बच्ची के साथ कई दिनों तक गैंगरेप किया गया. आसिफा को मिले दर्द के बारे में मैं सोच भी नहीं सकती. भगवान उसकी आत्मा को शांति दें.”
Ashamed appalled and disgusted by fake nationals and fake Hindus. I cannot believe this is happening in my country. https://t.co/V8tKoo6viX