आरक्षण खिलाफत का बदरंग आईना

सरकारी नौकरियों, स्कूलों व कालेजों में दाखिलों में सामाजिक पिछड़ों और दलितों व आदिवासियों को मिले आरक्षण को ढीला करने की कोशिशें लगातार चलती रहती हैं. अदालतों ने कुछ हद तक तो इस आरक्षण को जरूरी माना है, पर उस ने भी बहुत से अगरमगर लगा दिए हैं, जिस से सरकार में जमे, सत्ता पर कुंडली मारे बैठे ऊंची जातियों के लोग आरक्षण को एक हद तक रोक सके हैं.

सरकारी नौकरियों में मलाईदार और ताकतवर ओहदों पर ऊंची जातियों के ही लोग हैं. अगर कोई मंत्री पिछड़ी या दलित जाति का आ जाए, तो भी वह

5-7 को तो अच्छे पद दिला सकता है, पर बाद में उसे ऊंची जातियों के उन अफसरों पर भरोसा करना पड़ता है, जो अच्छी रिपोर्टें लिख सकें, अच्छी तरह अंगरेजी में बोल सकें और सभाओं व सम्मेलनों में अपनी बात कह सकें. इसीलिए जब अदालतें कहती हैं कि मलाईदार पदों को या पदोन्नतियों को आरक्षण की जरूरत नहीं है, तो पिछड़ों व दलितों के नुमाइंदे चुप हो जाते हैं.

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बड़ी बात यह है कि सही नजर की कमी के कारण पिछड़ों के नेता भी जानते नहीं कि वे कैसे अपने समाज का भला करें. बड़ी बात यह भी है कि वे खुद मानते हैं कि पिछड़ापन तो पिछले जन्म के पापों का फल है. इसीलिए सारे पिछड़े व दलित नेता जरा सा पैसा हाथ में आते ही पंडेपुजारियों को जम कर दान देने में लग जाते हैं. पिछड़ों के नेताओं ने पिछड़ों को सही ट्रेनिंग देने के बजाय पूजापाठ का रास्ता दिखाना शुरू कर दिया है.

पिछड़ों के नेता अपनी क्रीमी पोजीशन को उन देवीदेवताओं का परताप मानने लगे हैं, जिन के पास वे हर माह 2 माह में चक्कर लगा आते हैं. जो दलित या पिछडे़ पीछे रह गए, वे इन नेताओं या आरक्षण पाए अफसरों के हिसाब से पूजापाठ में कमजोर हैं.

पिछड़े और दलित यह बखूबी जानते हैं कि ऊंचे पूजापाठ का झुनझुना उन्हें दे कर खुश भर कर रहे हैं और उन्हें ऊंचे देवीदेवताओं के नौकर या नाजायज संतान पूजने को दे रहे हैं या आर्यों के पहले के देवीदेवताओं को किवदंतियों से निकाल कर दे रहे हैं, जो हिंदू व्यवस्था में दोयम दर्जे के भगवान हैं. पर आरक्षण पाए नेता और अफसर इस तरह कुंठित और कमजोर मन के हैं कि वे ठाकुरों और पंडों के लठैतों की तरह उसी से खुश हो रहे हैं.

पिछड़ों और दलितों में इस देश की उन्नति का राज छिपा है. दुनियाभर में जब तकनीक कम थी, तब इन की तकनीक के सहारे ही भारत सोने की चिडि़या कहलाया था. आज उन की पुरानी तकनीक बेकार हो गई है और उन की रीटूलिंग में आरक्षण व मनरेगा काम आ सकता था, पर उसे केवल प्रसाद कह कर बांट दिया गया. पिछड़े दलित वह तकनीक भी भूल गए, जो उन्हें 200 साल पहले मालूम थी.

आज आरक्षण का फायदा तभी है, जब पिछड़े और दलित उस से नई तकनीक समझें, यह क्रीमी लेयर–मलाई परत–को ज्यादा आसानी से समझ आएगी. यह न मायावती समझ रही हैं, न लालू प्रसाद यादव, न नीतीश कुमार, न एम. करुणानिधि. सब मान कर चल रहे हैं कि कुशलता तो पद मिलने पर आ ही जाएगी. जिन पिछड़ों व दलितों ने कुछ सीख भी लिया है, वे भी दूसरे पिछड़ों व दलितों को न सिखा कर अगड़ों को लिखापढ़ा कर पैसा बना रहे हैं. पिछड़ों व दलितों के लिए काम कर रही सेवाभावी संस्थाओं को कैलाश सत्यार्थी जैसे अगड़े चला रहे हैं.

जरूरत मलाईदार परत को खत्म करने की नहीं, पिछड़ों व दलितों द्वारा उस परत की पूरी जमात के लिए लाभ उठाने की है.

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औरत के देहजाल से बचें

आजकल लोगों के दिलों में पैसे और ऐशोआराम की चाहत इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि मां बेटी से जिस्मानी रिश्ते की बात करते समय अपने रिश्ते की मर्यादा को भी भूल चुकी है. एक मामला ऐसी ही मां का है. मां ने कालेज में पढ़ने वाली अपनी बेटी से कहा कि वह अधेड़ उम्र के लैक्चरर को घर पर कोचिंग देने के लिए आने को तैयार कर के उसे अपना दीवाना बना कर उस से पैसे ऐंठे. इस से सैक्स का मजा भी मिलेगा और शादी का दहेज जुटाने में मदद भी मिलेगी.

मां की इन बातों को सुन कर 18 साला बेटी खुशी से मुसकरा उठी. अपनी मां की बात सुन कर उस ने सोचा कि सैक्स का पूरा मजा तो अब अपने घर पर ही लिया जा सकता है. वजह, उस ने अपने एक बौयफ्रैंड से पार्क की झाडि़यों में सैक्स का मजा चोरीचुपके से लिया हुआ था. दूसरे दिन ही उस बेटी ने अपने कालेज के 50 साला लैक्चरर को अपने घर पर कोचिंग देने के लिए राजी कर लिया. उस ने छुट्टी के दिन लैक्चरर को अपने घर पर बुला लिया था. वह लैक्चरर को अपने घर की दूसरी मंजिल के कमरे में ले गई थी और उस के शरबत में शराब मिला कर उसे मदहोश कर दिया था.

वह लड़की फिल्म हीरोइन जैसी खूबसूरत तो थी ही, उस ने कपड़े भी बहुत छोटे पहन रखे थे. लैक्चरर उस के सुडौल उभारों की ओर देख रहे थे. तभी लड़की ने अपने कपड़ों को उतार कर उन को उन्हें पूरी तरह से दिखा दिया. इस के बाद लैक्चरर भी अपना आपा खो बैठे. कुछ ही देर में उन्होंने उस से जिस्मानी रिश्ता बनाया, तो वह लड़की भी सैक्स का मजा लेते हुए खुशी से मुसकरा उठी. उस के बाद तो यह रोज का सिलसिला बन गया. लेकिन उन्हें नहीं पता था कि लड़की की मां मोबाइल फोन से रोजाना उन के सैक्स संबंधों की वीडियो बना रही थी.

एक दिन मांबेटी की योजना के मुताबिक, लैक्चरर लड़की से सैक्स संबंध बनाने के लिए उसे अपने पास बुलाने लगे, तो उस ने उन से कहा कि वे उस के कपड़ों को फाड़ते हुए उस से जबरदस्ती करने का नाटक करें. ऐसा करने से सैक्स में ज्यादा मजा आता है. लैक्चरर साहब ऐसा ही करने लगे थे और मां उन की इन हरकतों की वीडियो बना रही थी. जैसे ही वे उस से जिस्मानी रिश्ता बनाने लगे कि तभी उस लड़की की मां ने अपने साथ आए पति से बोली, ‘‘देखा आज के कलयुगी टीचर को, जो अपनी बेटी समान शिष्या से कैसी घिनौनी हरकत कर रहा है. अभी इस की पिटाई कर के इसे पुलिस में देते हैं.’’

यह देख कर लैक्चरर साहब तो दंग रह गए थे. वे रोते हुए उन से इस भूल की माफी मांग रहे थे. यह देख कर लड़की की मां उन से बोली कि अगर अपनी बदनामी और पुलिस से बचना चाहते हो, तो 50 लाख रुपए अभी अपनी घरवाली से मंगवा लो. यह सुन कर लैक्चरर साहब ने अपने मकान के कागजात अपनी घरवाली से मंगवा कर उन को दे दिए और स्टांप पेपरों पर लिख दिया कि वे अपना मकान उन्हें बेच रहे हैं.लैक्चरर साहब ने उसी दिन प्रोपर्टी डीलर से कार्यवाही करा कर अपना मकान उन के नाम करा दिया और उन के जाल से जैसेतैसे छुटकारा पा कर राहत की सांस ली.

इसी तरह की जयपुर के एक 40 साला कुंआरे की भी कहानी है. वह भजनों का बेजोड़ गायक था. उस के मातापिता की मौत बचपन में ही हो गई थी. उसे उस की नानी ने पाला. उस के घर में एक 25 साला औरत अपने पति और 2 छोटे बच्चों के साथ किराए पर रहती है.

एक दिन उस औरत के पति ने मकान हड़पने की योजना बनाई. उस ने अपनी पत्नी से कह दिया कि वह इस आदमी को अपने प्रेमजाल में फांस ले. बूढ़ी नानी को आंखों से कम दिखाई देता है और वे सुनने में भी लाचार हैं. अपने पति की इस योजना के मुताबिक, जब उस का पति गार्ड की नौकरी पर चला गया और उस गायक की नानी भी कहीं बाहर चली गई, तो वह उस के कमरे जा कर उस से लिपटते हुए बोली, ‘‘मुझे आप से प्यार हो गया है. मैं अपने पति से परेशान हूं. वह रोजाना मुझे परेशान करता है.’’ उस की इन बातों को सुन कर वह गायक खुश हो गया. उस ने उसी समय मौके का फायदा उठा कर उस से जिस्मानी रिश्ता बना कर भरपूर मजा लिया. उस के बाद तो वह दिनरात उस से जिस्मानी सुख भोगने लगा था. रात में जब वह औरत उस के पास आती, तो वह उस से पूछता कि उस का पति जाग गया, तो परेशानी खड़ी कर देगा.यह सुन कर वह औरत उस से कहती, ‘‘मैं उसे नींद की गोलियां दे कर बेहोश कर देती हूं. अब तो वह सुबह ही उठेगा.’’

इस तरह से उन का यह खेल कई सालों तक चलता रहा.

एक बार वह औरत उस से बोली, ‘‘अब मेरा मन यहां नहीं लगता है. तुम मुझे कहीं दूर ले चलो.’’यह सुन कर वह गायक उसे कोलकाता ले गया. वह औरत अपने दोनों बच्चों को पति के पास छोड़ गई थी. कुछ दिन कोलकाता में रहने के बाद वे मथुरा में रहने लगे.योजना के मुताबिक, एक दिन उस औरत ने अपने पति और घर वालों को मथुरा फोन कर के बुलवा लिया और उसे गिरफ्तार करवा दिया. अब वह गायक जयपुर की जेल में अपने किए की सजा भुगत रहा है.जब उस औरत से समझौते की बात की जाती है, तो वह उस का मकान अपने नाम करने की बात करती है. उस की इस शर्त को सुन कर जेल में बंद वह गायक सोचता है कि अगर वह अपनी नानी के मकान को उस के नाम करने के लिए कहेगा, तो उस की 90 साला नानी जीतेजी मर जाएंगी. लिहाजा, वह जेल में ही अपनी जिंदगी बिताने को मजबूर है.

मामला राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय के एक 55 साला विधुर प्राचार्य का है. 30 साल की उम्र में ही दूसरे बच्चे को जन्म देने के 4 साल बाद ही उन की पत्नी की एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी. प्राचार्य ने जैसेतैसे बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ालिखा कर सरकारी नौकरी में लगवाया. उन के दोनों बेटों में से बड़े बेटे की शादी के कुछ दिन बाद ही उन के बड़े बेटे और बहू ने सोचा कि पिता की पैंशन के बाद उन्हें काफी पैसा मिलेगा. उस पैसे पर उन के छोटे बेटे का हक नहीं रहे और उन का खरीदा हुआ मकान भी उन के नाम हो जाए, इस के लिए उन्हें अपने काबू में किया जाए. वे दूसरी औरतों पर भी रोजाना पैसे लुटाते हैं, इसलिए वे पैसे अपने घर में ही आएं. इस के लिए एक ही उपाय है कि उन्हें औरत का सुख घर में दिया जाए. ‘‘लेकिन इस के लिए औरत लाएंगे कहां से?’’ बड़े बेटे की बीवी ने कहा, तो बेटा आंख मारते हुए बोला, ‘‘यह सुख तुम उन्हें दोगी.’’

‘‘मैं… यह तुम क्या कह रहे हो?’’ उस की बीवी ने हैरान हो कर उस से पूछा, तो वह बोला, ‘‘तुम तो सतीसावित्री जैसी बातें कर रही हो. कालेज में तुम ने अपने फ्रैंड्स को भी तो खूब मजे दिए थे. अपने बूढ़े ससुर को मजे देने में तो तुम्हें उन का आशीर्वाद और ढेर सारा पैसा भी मिलेगा.

‘‘तो यह बात है,’’ यह सुन कर वह बोली, ‘‘आने दो उन्हें, मैं आज से ही अपना काम शुरू करती हूं. तुम 2-3 दिन घर के बाहर ही रहना. मैं उन से कह दूंगी कि तुम किसी काम से बाहर गए हो, इसलिए उन्हें तुम से डर नहीं लगेगा.’’ बड़ा बेटा 3 दिन के लिए घर से बाहर चला गया था. प्राचार्य ससुर अपने विद्यालय से घर लौटे, तो वे अपनी बहू की सैक्सी ड्रैस में उस के जिस्म के दिखते हुए मादक अंगों को देख कर हैरान रह गए थे. जब वे अपने कमरे में खाना खाने का इंतजार कर रहे थे कि तभी बहू उन के कमरे में आ कर उन से लिपट गई.

वे उस की ओर हैरानी से देखने लगे, तो बहू उन से बोली, ‘‘आप का बेटा तो कई महीने से मुझ से दूर है. शायद उन का किसी और से इश्क का चक्कर चल रहा है. मैं भी औरत हूं. मेरा जिस्म भी मर्द के प्यार को तरसता है. अगर मैं कहीं बाहर अपनी जरूरत पूरी करूंगी, तो इस में हमारी बदनामी होगी. इसलिए मैं ने सोचा कि…’’ इतना कह कर वह अपने कपड़े उतारने लगी.

बहू के इस रूप को देख कर प्राचार्य खुश हो कर उस से जिस्मानी रिश्ता बना बैठे. सालों तक उन का यह सिलसिला चलता रहा. वे अपनी तनख्वाह भी बहू को देने लगे थे, पर बहू से खुश हो कर जब वे अपना मकान उस के नाम करने लगे, तो उन के छोटे बेटे को बहुत बुरा लगा. एक दिन जब उसे अपने पिता और भाभी की इस प्रेम कहानी के बारे में मालूम हुआ, तो उस ने उन्हें खूब फटकारा और अपने पड़ोसियों को भी बताने की धमकी दी. इस से प्राचार्य को इतना ज्यादा पछतावा हुआ कि उन्होंने खुदकुशी कर ली. औरत के देहजाल के नतीजे इतने भयानक होते हैं कि लोग अपनी धनदौलत लुटा देते हैं. कितने ही लोग इस सामाजिक बुराई के चलते आज देश की जेलों में नरक से भी बदतर जिंदगी बिताने को मजबूर हैं.

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मिली एक और आजादी

बात सन 1978 की है. शाहबानो नामक एक महिला थीं, जिन के 5 बच्चे थे. 3 तलाक के तहत बिना किसी खास वजह के उन के पति ने उन्हें तलाक दे दिया था. पति द्वारा इस तरह खुद से अलग कर देने के बाद शाहबानो के पास अपने और बच्चों के गुजरबसर करने का कोई जरिया नहीं रहा.

दूसरा कोई चारा न देख शाहबानो ने अदालत से गुहार लगाई कि उसे पति से गुजारे के लिए पैसा दिलाया जाए. यह मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा. इस सब में 7 साल का लंबा समय गुजर गया.

अंत में सर्वोच्च न्यायालय ने भादंसं की धारा 125 के तहत जो निर्णय लिया, उस के बारे में यह भी कहा कि यह निर्णय हर किसी पर लागू होता है, चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या संप्रदाय का हो. अपने निर्णय के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि शाहबानो को गुजारे के लिए खर्च दिया जाए. लेकिन इस फैसले का जो स्वागत होना चाहिए था, वह नहीं हुआ.

भारत के रूढि़वादी मुसलमानों ने इस का विरोध करते हुए कहा कि यह निर्णय उन की संस्कृति और विधानों पर अनाधिकार हस्तक्षेप है. इस में उन्हें असुरक्षा का भाव नजर आया. इस निर्णय को ले कर तमाम नेताओं ने भी विरोध प्रदर्शन किए. इस के बाद इस मामले की वजह से मुसलिमों ने आल इंडिया पर्सनल लौ बोर्ड नाम से अपनी एक संस्था बनाई. इस संस्था के कारकुनों ने इस निर्णय के खिलाफ देश के प्रमुख शहरों में आंदोलन करने की धमकी दी.

उन दिनों देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे, जिन्होंने इस बोर्ड के पदाधिकारियों की सभी शर्तें मान लीं. उस समय इस निर्णय को धर्मनिरपेक्षता के एक अहम उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया था. सन 1986 में कांग्रेस (आई) पार्टी ने, जिसे संसद में बहुमत प्राप्त था, इस मुद्दे पर मसौदा तैयार कर के एक कानून बनाया, जिस ने शाहबानो वाले मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को उलट दिया.

इस कानून के अनुसार, हर वह आवेदन, जो किसी तलाकशुदा महिला के द्वारा भादंसं की 1973 की धारा 125 के तहत देश की किसी भी कोर्ट में विचाराधीन है. इस कानून के लागू होते ही इसी कानून के अंतर्गत निपटाया जाएगा. चूंकि सरकार को पूर्ण बहुमत प्राप्त था, इसलिए धर्मनिरपेक्ष निर्णय को उलटने वाला मुसलिम महिला तलाक अधिकार सरंक्षण कानून 1986 आसानी से पास हो गया.

तय हुआ कि अब आगे यही कानून हर लिहाज से मान्य होगा. इस कानून के कारणों एवं प्रयोजनों की चर्चा करें तो यह बात सामने आई कि जब एक मुसलिम तलाकशुदा महिला इद्दत के समय के बाद अपना गुजारा नहीं कर सकती, तो न्यायालय उन सगेसंबंधियों को उसे उस की जरूरत के हिसाब से खर्चा देने का आदेश कर सकता है, जो मुसलिम कानून के अनुसर, उस की संपत्ति के उत्तराधिकारी हैं.

यहां ‘इद्दत’ का मतलब भी जान लेना जरूरी है. इद्दत का मतलब मुसलमानों में शौहर के मरने अथवा उस के द्वारा बीवी को तलाक देने के बाद का वह समय, जिस में विधवा अथवा तलाकशुदा औरत दूसरी शादी नहीं कर लेती.

बहरहाल, हम बात कर रहे हैं सन 1986 में बने कानून की. इस के तहत यह प्रावधान रखा गया कि अगर मुसलिम औरत के ऐेसे संबंधी नहीं हैं अथवा वे उसे उस के गुजारे लायक खर्च देने की स्थिति में नहीं हैं तो वक्फ बोर्ड को औरत के गुजारे की जिम्मेदारी उठाने का आदेश दिया जाएगा.

इस तरह पति द्वारा गुजाराभत्ता देने का उत्तरदायित्त्व इद्दत के समय तक के लिए सीमित कर दिया गया. लेकिन मर्दों ने इस पर कोई खास ध्यान नहीं दिया. 3 तलाक का सिलसिला उसी तरह जारी रहा. भारत में मुसलिम औरतों को कोई राहत नहीं मिली.

इसलाम में तलाक के कई स्वरूप हैं. इन के तहत कुछ की पहल स्त्रियों और कुछ की पुरुषों की तरफ से की जाती है. समय और स्थान के अनुसार, इसलाम में तलाक का बदला रूप भी पाया गया है. पहले तलाक में शरिया का इस्तेमाल किया जाता था. शरिया पारंपरिक इसलामी नीतियों पर चलती है, जो विभिन्न इसलामी कानूनी संस्थाओं में विभिन्न तरह की होती है.

पारंपरिक इसलामी नीति इसलामी ग्रंथों मसलन कुरान और हदीस से बनाई गई है. इन कानूनों की प्रणाली में अलगअलग इसलामी कानूनी संस्थाओं द्वारा नईनई चीजें जोड़ी जाती रही हैं. ये चीजें मुफ्तियों द्वारा निर्देशित और नियंत्रित होती हैं. ये मुफ्ती ही अक्सर इसलामी कानून न मानने वाले के खिलाफ अपना फतवा जारी करते हैं.

3 तलाक की बात करें तो यह मुसलिम समाज में वह जरिया था, जिस में एक मुसलमान पुरुष अपनी बीवी को 3 बार तलाक कह कर अपने निकाह को किसी भी समय रद्द कर सकता था. इस तरह से होने वाले तलाक से शादी पूरी तरह खत्म हो जाती थी. इस के बाद अगर वही आदमी अपनी बीवी से फिर से शादी करना चाहे तो बीवी को ‘हलाला’ की प्रक्रिया में से गुजरना पड़ता था. उस के बाद ही उनकी शादी हो सकती थी.

CRIME

‘हलाला’ एक ऐसी प्रक्रिया थी, जिस में तलाकशुदा औरत को किसी दूसरे मुसलमान पुरुष से शादी कर के उस के साथ कुछ दिन रह कर पत्नी धर्म निभाना पड़ता था. इस के बाद उस से तलाक ले कर वह अपने पुराने शौहर से निकाह कर सकती थी. 3 तलाक को प्राय: ‘तलाक उल बिद््दत’ भी कहा जाता था.

दुनिया में ऐसे भी तमाम बुद्धिजीवी हैं, जिन्होंने 3 तलाक को गैरइसलामिक घोषित करवाने के प्रयास किए हैं. उन का कहना है कि कुरान में इस तरह के तलाक का कहीं जिक्र नहीं है. शौहर और बीवी को तलाक से पहले कम से कम 3 महीने तक एक साथ रहना चाहिए और इस बीच अगर इरादा न बदले और तलाक लेने की स्थिति बनी रहे तो कानूनी सलाह से ही तलाक लिया जाना चाहिए. शौहर अपनी बीवी को तुहर (मासिक धर्म के बाद पवित्रता वाले समय) में ही तलाक दे सकता है. नियम था कि इस के पहले 3 महीनों में उन्हें अपने तमाम शुभचिंतकों, रिश्तेदारों की मदद से अपनी शादी को बचाने की कोशिश करनी चाहिए.

जो भी हो, पुरुष के 3 बार तलाक कह देने भर से हमेशा के लिए तलाक हो जाता था. पहले शौहर अपनी बीवी को सामने खड़ी कर के 3 बार तलाक कह देता था तो दोनों का वैवाहिक रिश्ता टूट जाता था. आज के आधुनिक दौर में यह काम फोन, टैक्स्ट मैसेज, फेसबुक, स्काइप और ईमेल वगैरह से भी होने लगा था. चूंकि इसलामी नियम में इसे कानूनन सही माना जाता था, इसलिए ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ती गईं.

इस सब से पुरुषों पर तो कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, लेकिन उन औरतों को परेशानी हो रही थी, जो आर्थिक रूप से पूरी तरह अपने शौहर पर निर्भर थीं. उन्हें इस तरह के तलाक से जिंदगी में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था. आर्थिक परेशानियों के साथ वे भावनात्मक रूप से भी टूट जाती थीं.

ऐसी महिलाओं को किसी भी तरह से निर्वाह का जरिया नहीं मिल पाता था. ये औरतें अकसर अकेली पड़ जाती थीं. इन के पास अपने बच्चों को पालने का कोई साधन तक नहीं रहता था. ऐसे अधिकतर मामलों में 3 तलाक के बाद आदमी अपने बच्चों की, खासकर बेटियों की जिम्मेदारी कभी नहीं लेता था.

मुसलिम समाज की तमाम महिलाएं इसी डर में अपनी जिंदगी गुजार देती थीं कि न जाने कब उन का शौहर 3 शापित शब्द कह दें. क्योंकि इस के बाद उन की जिंदगी खत्म होने के कगार पर आ जाती थी.

मुसलिम शौहर केवल 3 बार तलाक कह कर कभी भी अपनी शादी को तोड़ सकता था. भारत से पहले दुनिया के 22 देश ऐसे थे, जहां 3 तलाक की मान्यता खत्म कर दी गई थी. दुनिया का पहला देश मिस्र था, जहां 3 तलाक को पहली बार बैन किया गया था. हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान भी इस मामले में हम से आगे रहा. वहां सन 1956 में ही 3 तलाक खत्म कर दिया गया था.

हिंदुस्तान में भी अब बदलाव नजर आने लगा था. लेकिन गुजारेभत्ते के मामले में शाहबानो के फैसले के विरोध में राजीव गांधी सरकार के कानून से बनी बहुसंख्यक सांप्रदायिकता के दंश को यह देश झेल चुका था. लेकिन अब समय बदल चुका था. इलैक्ट्रौनिक एवं सोशल मीडिया के इस बदलते दौर में मुस्लिम महिलाओं के साथ समूचे समुदाय में काफी सकारात्मक मंथन होने लगा था.

इस सब का परिणाम यह रहा कि कुछ समय पहले केंद्र सरकार ने देश के सर्वोच्च न्यायालय से कहा कि ‘3 तलाक, निकाह, हलाला और बहुविवाह जैसी प्रथाओं से मुसलिम महिलाओं के सामाजिक स्तर और गरिमा को ठेस पहुंचती है. साथ ही उन्हें वो सारे मौलिक अधिकार भी नहीं मिल पाते, जिन्हें हमारा संविधान हमारे लिए लागू करता है.

सर्वोच्च न्यायालय में अपना लिखित मत देने से पहले सरकार ने कहा था कि ये सभी प्रथाएं मुसलिम महिलाओं को बराबरी का हक देने से रोकती हैं.

इस पर टिप्पणी करते हुए औल इंडिया मुसलिम पर्सनल लौ बोर्ड की ओर से कहा गया था कि कुछ लोग इस तरह का माहौल बनाने में लगे हैं कि इस मामले की सुनवाई समाज में तलाक की संख्या बढ़ रही है. लेकिन विश्व भर में इसलामी विद्वानों द्वारा इस की खिलाफत लगातार की जा रही है.

सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात को गंभीरता से लिया. इस सिलसिले में 16 अक्तूबर, 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने स्वत:संज्ञान ले कर जनहित याचिका दायर करने का आदेश दे दिया. तभी इसी तरह का एक मामला सुनवाई के लिए सर्वोच्च न्यायालय में गया.

बात फैली तो सब से पहले उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली शायरा बानो ने 3 तलाक के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपनी अपील दायर कर दी. याचिका में संबंधित मुद्दों पर प्रकाश डालने के अलावा शायरा ने अपने बारे में बताया था कि उस ने समाजशास्त्र में एमए किया था. सन 2001 में उस की शादी हुई और 10 अक्तूबर, 2015 को 3 बार तलाक कह कर उस के पति ने उस से रिश्ता तोड़ लिया. अब वह स्कूल जाने वाले बेटे और बेटी के साथ अपने मांबाप के यहां रह रही है. उन्हीं की मदद से वह दिल्ली आई थी और एडवोकेट बालाजी श्रीनिवासन से मिल कर कोर्ट में केस दायर कर दिया था.

शायरा की याचिका स्वीकार होने के बाद सुनवाई शुरू होते ही 4 अन्य मुस्लिम महिलाओं ने भी इसी तरह की याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दायर कर दीं. वे थीं जयपुर राजस्थान की रहने वाली बिजनैस ग्रैजुएट आफरीन रहमान, उत्तर प्रदेश के सहारनपुर की रहने वाली आतिया साबरी, अंग्रेजी से एमए की डिग्री हासिल करने वाली उत्तर प्रदेश के रामपुर की रहने वाली गुलशन परवीन और पश्चिम बंगाल के हावड़ा की रहने वाली इशरत जहां.

CRIME

शादी के 15 सालों बाद एक दिन अचानक  दुबई से इशरत के पति का फोन आया और उस ने फोन पर ही तलाक…तलाक…तलाक… कह कर उसे अपनी जिंदगी से निकाल दिया. इस के कुछ दिनों बाद ही पति ने दूसरी शादी कर ली थी.

गुलशन परवीन एक निजी स्कूल में टीचर थीं. उस के गर्भवती होने पर ससुराल वालों ने उसे मायके भेज दिया, जहां 8 महीने बाद उस ने बेटे को जन्म दिया. बच्चे को ले कर ससुराल लौटी तो पति ने उस के साथ मारपीट शुरू कर दी.

बाद में पति ने 3 तलाक का सहारा लेते हुए उस से रिश्ता तोड़ लिया. इसी तरह आफरीन रहमान और आतिया साबरी को उन के पतियों ने खत के जरिए तलाक दे दिया था. इस के बाद ये महिलाएं अपनीअपनी याचिकाओं के साथ देश की सर्वोच्च न्यायालय में पहुंची थीं.

इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की खंडपीठ ने की. केंद्र की ओर से कहा गया कि सभी पर्सनल कानून संविधान के दायरे में हों. शादी, तलाक संपत्ति और उत्तराधिकार के अधिकार को भी एक नजर से देखा जाना चाहिए. माननीय जजों ने 11 मई, 2017 से 18 मई, 2017 तक लगातार इस मामले में सभी पक्षों की दलीलें सुनीं.

सर्वोच्च न्यायालय की ओर से 2 मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया गया कि 3 तलाक क्या इसलाम का मौलिक हिस्सा है? इस के बिना क्या इसलाम का स्वरूप बिगड़ जाएगा? पुरुषों को प्राप्त 3 तलाक का आधार क्या मुसलिम महिलाओं के समानता और सम्मान के अधिकार के विरुद्ध हैं?

इस प्रकरण में जहां केंद्र सरकार का रवैया खासा उत्साहजनक था, वहीं इंडियन मुसलिम पर्सनल लौ बोर्ड के अलावा अन्य संगठन जमीयत उलेमा ए हिंद के पदाधिकारियों ने अदालत में व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि मुसलिम महिलाओं की हालत एक ऐसी असहाय चिडि़या जैसी है, जिसे सुनहरी बाज हमेशा दबोचने की फिराक में रहता है. इस पर सरकार की ओर से कहा गया कि यहां मुसलिम पुरुषों एवं महिलाओं के बीच के टकराव की बात हो रही है.

बहरहाल, 22 अगस्त, 2017 को पीठासीन जजों ने इस मुद्दे पर अपनी अलगअलग राय कुछ इस तरह से व्यक्त की.

चीफ जस्टिस जे.एस. खेहर और जस्टिस एस. अब्दुल नजीर का कहना था कि 3 तलाक धार्मिक प्रथा का हिस्सा है. संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत इसे संरक्षण प्राप्त है. लिहाजा न्यायपालिका इस में हस्तक्षेप नहीं कर सकती. इस मामले में सरकार को पहल करते हुए कानून बनाना चाहिए.

दूसरी ओर जस्टिस कुरियन जोसफ, जस्टिस रोहिंटन एफ नरीमन एवं जस्टिस यू्.यू. ललित ने उक्त दोनों जजों की राय से असहमति प्रकट करते हुए कहा कि यह असंवैधानिक है, इसलिए इसे निरस्त किया जाए.

इस के बाद उसी दिन सर्वोच्च न्यायालय ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मुसलिम समाज में एक बार में 3 तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) की इस 14 सौ साल पुरानी प्रथा को खारिज कर दिया. ऐसा संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 21 का उल्लंघन करार देते हुए किया गया था.

इस प्रथा की रोक पर सहमति के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केंद्र सरकार को 6 महीने के भीतर इस संबंध में कानून बनाने का निर्देश दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से भारतीय मुसलिम समाज की महिलाओं में खुशी की लहर दौड़ गई है. बहुत सी महिलाओं को तो यहां तक कहते सुना गया है कि भारत को 1947 के अगस्त माह में आजादी मिली थी, उन्हें एक तरह से यह दूसरी आजादी मिली है. देश आजाद होने के भले ही 70 साल बाद सही, पर मिली अगस्त में ही है.

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दर्द ने बढ़ाया हौसला

खूबसूरत आतिया साबरी एक अजीब सजा से रूबरू हो रही थी. शौहरबीवी के रिश्तों के उस के जज्बातों पर वक्त के साथ बंदिश लग चुकी थी. यह रिश्ता अब ऐतबार के काबिल भी नहीं रह गया था. रिश्तों की डोर पूरी तरह टूट चुकी थी और जिंदगी गमजदा हो गई थी. लेकिन वह अपनी 2 मासूम बेटियों की मुसकराहटों व शरारतों से खुश हो कर गम को हलका करने की कोशिश करती थी.

21 अगस्त, 2017 की शाम को आतिया के चेहरे पर भले ही चिंता की लकीरें थीं, लेकिन आंखों में उम्मीदों के चिराग रोशन थे. उसे देख कर पिता मजहर हसन ने बेटी के नजदीक आ कर पूछा, ‘‘क्यों परेशान है आतिया? तेरे इरादे नेक हैं और तू इंसाफ के लिए लड़ रही है. देखना तुम लोगों की मुहिम जरूर रंग लाएगी.’’

‘‘सोचती तो मैं भी यही हूं. आप तो जानते हैं, यह लड़ाई मैं सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि उन बहनों के लिए भी लड़ रही हूं, जो 3 तलाक के बाद जिल्लत की जिंदगी जी रही हैं. मैं सोचती हूं कि किसी को भी तलाक का ऐसा दर्द न झेलना पड़े.’’

‘‘जो होगा, ठीक ही होगा. बस, उम्मीद का दामन थामे रहो.’’ मजहर ने बेटी को समझाया तो आतिया की आंखों में चमक आ गई.

‘‘मुझे पूरी उम्मीद है अब्बू, अदालत औरतों के हक में फैसला दे कर इस 3 तलाक से निजात दिला देगी. कल का दिन शायद मेरे लिए खुशियां ले कर आए.’’ आतिया ने आत्मविश्वास भरे लहजे में कहा.

अब्बू से थोड़ी देर बात कर के आतिया सोने के लिए अपने कमरे में चली गई. उस की 2 मासूम बेटियां सादिया व सना तब तक सो चुकी थीं.

आतिया उत्तर प्रदेश के शहर सहारनपुर के नई मंडी कोतवाली के मोहल्ला आली की रहने वाली थी. वह तलाक पीडि़ता थी और उस ने इंसाफ के लिए देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रखी थी. वह देश की उन 5 मुसलिम महिलाओं में से एक थी, जो 3 तलाक के खिलाफ जंग लड़ते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई थीं.

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उन के मामलों पर लंबी सुनवाई हुई थी और फैसले के लिए 22 अगस्त की तारीख तय की गई थी. 5 जजों की संविधान पीठ को मुसलिम धर्म में शरीयत कानून के तहत दिए जाने वाले 3 तलाक पर फैसला सुनाना था. इस तरह के तलाक के खिलाफ देशभर में मुसलिम महिलाओं की लगातार आवाजें उठ रही थीं.

अगले दिन अदालत ने अपना फैसला सुनाया तो आतिया और उस के परिवार की खुशियों का ठिकाना नहीं रहा. अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में 3 तलाक की 14 सौ साल पुरानी प्रथा को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करार देते हुए खारिज कर दिया था. जजों की संविधान पीठ ने इस प्रथा को कुरान-ए-पाक के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ और शरीयत कानून का उल्लंघन बताया.

आतिया को इसलिए और भी खुशी हुई थी, क्योंकि वह भी इस लड़ाई का एक हिस्सा थी. दरअसल, उस की जिंदगी दुख के पहाड़ से टकराई थी. उस ने कभी सोचा भी नहीं था कि जिस शख्स को ताउम्र उस का साथ देना था, वह एक दिन उसे अकेला छोड़ देगा. आतिया अपनी मां मुन्नी व 3 बड़े भाइयों की लाडली थी.

आतिया विवाह के लायक हुई तो उस के घर वालों को उस के विवाह की चिंता हुई. वे चाहते थे कि उस का विवाह किसी अच्छे घर में हो, ताकि उस की जिंदगी खुशियों से आबाद रहे. उस के पिता मजहर मूलरूप से हरिद्वार जिले के सुलतानपुर गांव के रहने वाले थे. करीब 25 साल पहले वह सहारनपुर आ कर बस गए थे. उन के नातेरिश्तेदार वहीं आसपास रहते थे.

मजहर मियां ने रिश्ते की तलाश भी वहीं शुरू कर दी. खोजबीन के बाद उन्होंने बेटी का रिश्ता हरिद्वार के खानपुर थाना क्षेत्र के गांव जसोदरपुर निवासी सईद अहमद के बेटे वाजिद अली के साथ तय कर दिया. सारी बातें तय होने के बाद 25 मार्च, 2012 को उन्होंने आतिया का निकाह वाजिद के साथ कर दिया.

निकाह के बाद आतिया की जिंदगी खुशियों से भर गई. उस ने अपने भविष्य को ले कर तमाम ख्वाब देखे थे. एक साल बाद उस ने बेटी को जन्म दिया. यह उस का पहला बच्चा था. इस से सभी को खुश होना चाहिए था, लेकिन आतिया को पहली बार अहसास हुआ कि बेटी के जन्म से न सिर्फ उस का पति, बल्कि ससुराल के अन्य लोग भी खुश नहीं थे. वे लोग बेटे के ख्वाहिशमंद थे.

आतिया ससुराल वालों के रवैये पर हैरान तो थी, लेकिन उस ने सोचा कि यह सब वक्ती बातें हैं, जो वक्त के साथ खत्म हो जाएंगी. एक साल कब बीत गया, पता ही नहीं चला. आतिया दोबारा गर्भवती हुई. इस बार उस के ससुराल वालों को भरोसा था कि बेटा ही होगा. एक दिन वाजिद ने कहा भी, ‘‘मुझे उम्मीद है कि इस बार तुम बेटे को ही जन्म दोगी?’’

उस की बात सुन कर आतिया को हैरानी हुई. उस ने जवाब में कहा, ‘‘तुम जानते हो वाजिद, यह सब इंसान के हाथ में नहीं होता. लड़का हो या लड़की मैं दोनों में कोई फर्क महसूस नहीं करती. बच्चे गृहस्थी के आंगन के फूल होते हैं.’’

उस की बात पर वाजिद ने नाखुशी जाहिर करते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी सोच चाहे जो भी हो, लेकिन मैं बेटे की ख्वाहिश रखता हूं.’’

आतिया बहस नहीं करना चाहती थी. लिहाजा वह खामोश हो गई. लेकिन वह मन ही मन परेशान थी कि यह किस तरह की सोच है, जो बेटियों से परहेज किया जाता है. अपने शौहर की सोच उसे अच्छी नहीं लगी.

सन 2015 में आतिया ने एक और बेटी को जन्म दिया. इस पर उस की ससुराल में जैसे तूफान आ गया. कोई भी इस बात से खुश नहीं था. न उस का शौहर और न उस के घर वाले. आतिया ने सोचा कि वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा, लेकिन यह उस की भूल थी. सभी लोग उसे ताना मारने लगे. उन के तेवर भी बदल चुके थे.

इस के बाद ससुराल वाले दहेज को ले कर भी आतिया को ताना देने लगे थे. आतिया को सब से बड़ा झटका उस दिन लगा, जब वाजिद ने उस से तल्ख लहजे में कहा, ‘‘बेटी को जन्म दे कर तूने मेरे कंधे झुका दिए हैं.’’

उस की बात पर आतिया को गुस्सा आ गया. उस ने पलट कर जवाब दिया, ‘‘कैसी बात कर रहे हैं आप? कहीं अपने बच्चों के जन्म से भी किसी के कंधे झुकते हैं? आप को खुश होना चाहिए कि 2 बेटियों के पिता हैं. हम इन्हें पढ़ालिखा कर काबिल बनाएंगे.’’

‘‘यह सब ख्याली बातें हैं आतिया, तुम मेरी बात नहीं समझोगी.’’

‘‘मैं आप की सारी बातें समझती हूं.’’ आतिया ने भी तल्खी से जवाब दिया.

‘‘तुम्हें जो सोचना है, सोचती रहो. लेकिन सच यह है कि सिर बेटों से ही ऊंचा होता है.’’

आतिया की सोच और भावनाओं का किसी पर कोई असर नहीं हुआ. फलस्वरूप वक्त के साथ घर में कलह बढ़ती गई. पति की तानेबाजियों ने तल्खियों को और भी बढ़ा दिया. छोटीछोटी बातों पर कई बार विवाद बढ़ता तो आतिया के साथ मारपीट भी हो जाती. पानी सिर से ऊपर जाने लगा था.

आतिया ने ये बातें अपने मायके वालों को बताईं तो उन्होंने उसे सब्र से काम लेने की सलाह दी. लेकिन जब यह आए दिन की बात हो गई तो आतिया के मातापिता ने जा कर वाजिद व उस के घर वालों को समझाने की कोशिश की. इस से कुछ दिनों तक तो सब ठीक रहा, लेकिन जल्दी ही जिंदगी फिर से पुराने ढर्रे पर आ गई.

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धीरेधीरे आतिया की परेशानियों का सिलसिला बढ़ता गया. 12 नवंबर, 2015 को आतिया के साथ हद दर्जे तक मारपीट की गई. उस की तबीयत खराब होने लगी तो उसे उस के हाल पर छोड़ दिया गया. उसे यहां तक कह दिया गया कि वह चाहे तो ससुराल छोड़ कर जा सकती है.

अब आतिया को अपनी जान का खतरा महसूस होने लगा था. उसे जहर दे कर मारने की साजिश की जा रही थी. इसलिए अगले दिन वह दोनों बेटियों के साथ मायके चली आई. उस की हालत देख कर घर में सभी को धक्का लगा. आतिया ने आपबीती सुनाई तो उन्हें लगा कि बेटी जिंदा बच गई, यही बड़ी बात है.

आतिया को अस्पताल में भर्ती करा दिया गया. वह मानसिक व शारीरिक कमजोरी से उबर आई तो उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई. आतिया के साथ ज्यादती हुई थी, इसलिए उस ने पुलिस में जाने का मन बना लिया. ऐसा ही उस ने किया भी. उस ने स्थानीय थाने में अपनी ससुराल वालों के खिलाफ मारपीट व दहेज उत्पीड़न की तहरीर दे दी.

चंद रोज ही बीते थे कि आतिया की जिंदगी में भूचाल आ गया. वाजिद ने 10 रुपए के स्टांप पेपर पर लिख कर तलाकनामा भिजवा दिया. तलाक की तारीख 2 नवंबर लिखी गई थी. दरअसल, ससुराल पक्ष के लोगों को पता चल चुका था कि आतिया पुलिस में शिकायत दर्ज करा रही है, इसलिए उन्होंने चालाकी बरतते हुए तारीख पहले की लिखी थी.

आतिया को उम्मीद नहीं थी कि नौबत यहां तक आ जाएगी. वह महिलाओं को तलाक देने की मुसलिम धर्म की इस परंपरा के खिलाफ थी. वाजिद ने बेटियां पैदा होने और दहेज के लिए उसे सताया और फिर छुटकारा पाने के लिए एकतरफा तलाक भी भेज दिया.

धार्मिक कानून ऐसे तलाक को मान्यता देता था, इसलिए आतिया चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती थी. जबकि वह इस तरह की तलाक प्रक्रिया के खिलाफ थी. मामूली बातों पर दिए जाने वाले तलाक के किस्से वह सुनती आई थी. सारे हक मर्द के पास थे. वह जब चाहे, बीवी को अपनी जिंदगी से निकाल सकता था.

आतिया ने सोच लिया था कि वह खामोश नहीं बैठेगी, बल्कि अपने उत्पीड़न और तलाक के खिलाफ आवाज उठाएगी. उधर पुलिस ने उस की तहरीर के आधार पर मुकदमा दर्ज कर लिया. दिसंबर महीने में पुलिस ने आतिया के पति व ससुर को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. आतिया ने दोनों मासूम बेटियों में खुशियां ढूंढीं और तलाक को चुनौती देने की ठान ली.

आतिया का एक भाई रिजवान सामाजिक कार्यकर्ता था और फरीदी विकास समिति नामक संस्था चलाता था. उस ने भी इस लड़ाई में आतिया का साथ दिया. आतिया तलाक के खिलाफ थी, यह बात नातेरिश्तेदारों और समाज के लोगों को पता चली तो उन्होंने उसे मजहब का वास्ता दे कर समझाया. लेकिन आतिया उन की बात मानने को तैयार नहीं थी.

आतिया के मातापिता व घर वालों को भी लोगों ने समझाने की कोशिश की. लेकिन उन की नजर में आतिया कुछ गलत नहीं कर रही थी. उस की जिंदगी जिस तरह दोराहे पर आ गई थी, उस से वह भी आहत थे और इंसाफ चाहते थे.

आतिया ने ऐसी महिलाओं से मिलना शुरू किया, जो तलाक पीडि़ता थीं. उन की कहानियां उसे विचलित कर जाती थीं. उस ने मुसलिमों के बड़े धार्मिक केंद्र दारुल उलूम देवबंद में पति के तलाक के खिलाफ अर्जी लगाई. लेकिन उन्होंने तलाक को जायज ठहराया और धार्मिक कानून का हवाला भी दिया.

दरअसल, वाजिद वहां से अपने दिए तलाक के बारे में पहले ही फतवा ले चुका था. इस के बावजूद आतिया यह सब मानने को तैयार नहीं थी. क्योंकि उसे धोखे से तलाक दिया गया था. सारे हक एकतरफा थे यानी उस की रजामंदी के कोई मायने नहीं थे.

खास बात यह थी कि वाजिद इस बीच दूसरा निकाह भी कर चुका था. जब दारुल उलूम देवबंद से भी उसे निराशा मिली तो उस ने समाज से टकराते हुए 3 तलाक की परंपरा को बदलने के लिए न्यायालय की दहलीज तक पहुंचाने का मंसूबा बना लिया. 3 तलाक का मुद्दा देश के कई हिस्सों में बहस को जन्म दे रहा था और मुसलिम महिलाएं इस परंपरा के खिलाफ खड़ी हो रही थीं.

आतिया ने दिसंबर, 2016 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाल दी, जिसे स्वीकार कर लिया गया. 3 तलाक एक बड़ा मुद्दा बना ही हुआ था और कुछ याचिकाएं पहले से ही अदालत में थीं. देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था, जब मुसलिम महिलाओं ने 3 तलाक के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया था.

सुनवाई पर आतिया अदालत जाती रही. 3 तलाक का मामला चूंकि संवेदनशील और धार्मिक था, इसलिए सुनवाई के लिए अलगअलग धर्म के 5 जजों का समूह बना कर उन्हें 3 तलाक की सुनवाई और फैसले का जिम्मा दिया गया. इस के बाद ही अदालत ने सभी मामलों को जोड़ कर एक साथ सुनवाई कर के 22 अगस्त को फैसला सुना दिया.

आतिया कहती है कि अदालत के फैसले के बाद मुसलिम महिलाओं के लिए आजादी के दरवाजे खुल गए हैं. मामूली बातों पर भी तलाक को हथियार बना कर औरत से छुटकारा पाने की मनमानी वाली मानसिकता से उन्हें निजात मिलेगी और उत्पीड़न बंद होगा.

आतिया अपने पिता के घर रह रही है. वह अपनी बेटियों को पढ़ालिखा कर आगे बढ़ाना चाहती हैं. उस के पिता कहते हैं, ‘मैं ने बेटी के दर्द को करीब से महसूस किया है. समाज में किसी और बेटी के साथ नाइंसाफी न हो, इस लड़ाई का यही मकसद था.’

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अगले दिन ही तलाक

झारखंड के हजारीबाग में एक गांव है चितरपुर. 8 जून, 2012 को इस गांव की फातिमा सुरैया का निकाह बादमगांव के कैफी आलम से हुआ था.

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फातिमा का कहना है कि निकाह के समय 2 लाख रुपए नकद, 6 लाख रुपए के जेवरात और 2 लाख रुपए का अन्य सामान दहेज में दिया गया था. शादी के एक साल बाद फातिमा एक बेटी की मां बनी. उस के जन्म के 6 माह बाद फातिमा से कहा गया कि वह अपने मायके से 5 लाख रुपए लाए, उसे जमीन खरीदनी है.

वह पैसा लाई भी, लेकिन कैफी आलम ने जमीन अपने नाम खरीद ली. इस के कुछ दिनों बाद वह फातिमा के मायके वालों से 2 लाख रुपए की और मांग करने लगा. पैसे नहीं मिले तो ससुराल वाले सुरैया को प्रताडि़त करने लगे. सुरैया फिर भी सहती रही.

23 अगस्त को सब कुछ ठीक था. सुबह को सुरैया ने पति के साथ नाश्ता भी किया. लेकिन शाम को वह घर आया तो अचानक तीन बार तलाक कह कर उसे बेटे के साथ घर से निकाल दिया, साथ ही कहा भी, ‘थाना कोर्टकचहरी जहां भी जाना हो, जाओ.’

सुरैया अपने मायके चली गई. मायके वालों ने कैफी और उस के घर वालों को समझाने की काफी कोशिश की. लेकिन बात नहीं बनी. वे लोग रांची के अंजुमन कमेटी में गए, लेकिन कमेटी ने 20 दिनों बाद निर्णय लेने की बात कही.

आखिर सुरैया ने थाना कड़कागांव में अपने ससुर फकरे आलम, सास रोशन परवीन, ननद सुबैया आलम और ननदोई परवेज मलिक के खिलाफ दहेज के लिए प्रताडि़त करने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. फैसला तो एक दिन पहले ही आ गया था. अब शायद सुरैया को राहत मिले.

3 तलाक के चक्कर में जान तक लगा दी दांव पर

जिला बरेली के आंवला क्षेत्र के गांव कुड्डा की रहने वाली 3 तलाक पीडि़ता अजरुन्निसा जिल्लत की जिंदगी से इतनी तंग आ गई थी कि 12 मई, 2017 को उस ने जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर आत्मदाह की कोशिश की. उस ने अपने ऊपर मिट्टी का तेल डाल लिया था, गनीमत यह रही कि आग लगाने से पहले वहां मौजूद सिपाहियों ने उसे बचा लिया.

घटना से 4 महीने पहले ही अजरुन्निसा का निकाह बरेली के सीबीगंज निवासी तौफीक से हुआ था. शादी के बाद से तौफीक उस पर गलत काम के लिए दबाव डाल रहा था. वह नहीं मानी तो तौफीक उस के साथ मारपीट करने लगा. इस से भी उस का मन नहीं भरा तो शादी के 2 महीने बाद उस ने 3 बार तलाक कह कर अजरुन्निसा को घर से निकाल दिया.

इस के बाद अजरुन्निसा ने न्याय के लिए थाने से ले कर अधिकारियों तक के यहां गुहार लगाई. धर्म के ठेकेदारों के पास भी गई, पर हर जगह निराशा ही मिली. अंतत: उस ने आत्मदाह करने का फैसला किया. बहरहाल, वह बच तो गई, पर उसे न्याय कहीं से नहीं मिला. सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद भी वह न्याय की मुंतजिर है.

इलाज : जिस्म से खेलने को इलाज नहीं कहते

राम स्नेही और जसोदा की बेटी मीना को अकसर पागलपन के दौरे पड़ते थे. वह गोरीचिट्टी और खूबसूरत थी. मातापिता को सयानी हो चली मीना की शादी की चिंता सता रही थी. शादी की उम्र आने से पहले उस की बीमारी का इलाज कराना बेहद जरूरी था.

राम स्नेही का खातापीता परिवार था. उन की अच्छीखासी खेतीबारी थी. उन्होंने गांवशहर के सभी डाक्टरों और वैद्यों के नुसखे आजमाए, पर कोई इलाज कारगर साबित नहीं हुआ.

मीना को पागलपन के दौरे थमे नहीं. दौरा पड़ने पर उस की आवाज अजीब सी भारी हो जाती थी. वह ऊटपटांग बकती थी. चीजों को इधरउधर फेंकती थी. कुछ देर बाद दौरा थम जाता था और मीना शांत हो जाती थी और उसे नींद आ जाती थी. नींद खुलने पर उस का बरताव ठीक हो जाता था, जैसे कुछ हुआ ही नहीं था. उसे कुछ याद नहीं रहता था.

सरकारी अस्पताल का कंपाउंडर छेदीलाल राम स्नेही के घर आया था. राम स्नेही ने पिछले साल सरकारी अस्पताल के तमाम चक्कर लगाए थे. अस्पताल में डाक्टर हफ्ते में केवल 3 दिन आते थे. डाक्टर की लिखी परची के मुताबिक छेदीलाल दवा बना कर देता था.

छेदीलाल लालची था. वह मनमानी करता था. मरीजों से पैसे ऐंठता था. पैसे नहीं देने पर वह सही दवा नहीं देता था. वह मीना की बीमारी से वाकिफ था. उसे मालूम था कि मीना की हालत में कोई सुधार नहीं हो पाया है.

राम स्नेही ने डाक्टरी इलाज में पानी की तरह रुपया बहाया था, लेकिन निराशा ही हाथ लगी थी. छेदीलाल को इस बात की भी खबर थी. ‘‘मीना को तांत्रिक को दिखाने की जरूरत है. यह सब डाक्टर के बूते के बाहर है,’’ छेदीलाल ने जसोदा को सलाह दी.

‘‘झाड़फूंक जरूरी है. मैं कब से जिद कर रही हूं, इन को भरोसा ही नहीं है,’’ जसोदा ने हामी भरी.

‘‘मैं ने एक तांत्रिक के बारे में काफी सुना है. उन्होंने काफी नाम कमाया है. वे उज्जैन शहर से ताल्लुक रखते हैं. गांवशहर घूमते रहते हैं. अब उन्होंने यहां पहाड़ी के पुराने मंदिर में धूनी रमाई है,’’ ऐसा कहते हुए छेदीलाल ने एक छपीछपाई परची जसोदा को थमाई.

उस समय राम स्नेही अपने खेतों की सैर पर निकले थे. जब वे घर लौटे, तो जसोदा ने उन को छेदीलाल की दी हुई परची थमाई और मीना को तांत्रिक के पास ले जाने की जिद पर अड़ गईं.

दरअसल, जब मीना को दौरे पड़ते थे, तब जसोदा को ही झेलना पड़ता था. वे मीना के साथ ही सोती थीं. चिंता से देर रात तक उन्हें नींद नहीं आती थी. वे बेचारी करवटें बदलती रहती थीं.

जसोदा की जिद के सामने राम स्नेही को झुकना पड़ा. जसोदा और मीना को साथ ले कर वे पहाड़ी के एक पुराने मंदिर में पहुंचे. मंदिर के साथ 3 कमरे थे. वहां बरसों से पूजापाठ बंद था. तांत्रिक के एक चेले, जो तांत्रिक का सहयोगी और सैके्रटरी था, ने उन का स्वागत किया.

तांत्रिक के सैक्रेटरी ने अपनी देह पर सफेद भभूति मल रखी थी और चेहरे पर गहरा लाल रंग पोत रखा था. सैके्रटरी ने फीस के तौर पर एक हजार रुपए वसूले और तांत्रिक से मिलने की इजाजत दे दी.

तांत्रिक ने भी अपनी देह पर भभूति मल रखी थी. चेहरे पर काला रंग पोत रखा था. दाएंबाएं दोनों तरफ नरमुंड और हड्डियां बिखेर रखी थीं. वह हवन कुंड में लगातार कुछ डाल रहा था और मन ही मन कुछ बुदबुदा भी रहा था.

‘‘जल्दी बता, क्या तकलीफ है?’’ तांत्रिक ने सवाल किया.

‘‘बेटी को अकसर मिरगी के दौरे पड़ते हैं. इलाज से कोई फायदा नहीं हुआ,’’ जसोदा ने बताया.

‘‘शैतान दवा से पीछा नहीं छोड़ता. अतृप्त आत्मा का देह में बसेरा है. सब उसी के इशारे पर होता है,’’ कह कर तांत्रिक ने मीना को सामने बिठाया. हाथ में हड्डी ले कर उस के चेहरे पर घुमाई और जोरजोर से मंत्र बोले.

‘‘शैतान से कैसे नजात मिलेगी बाबा?’’ पूछते हुए जसोदा ने हाथ जोड़ लिए.

‘‘अतृप्त आत्मा है. उसे लालच देना होगा. बच्ची की देह से निकाल कर उसे दूसरी देह में डालना होगा,’’ तांत्रिक ने बताया.

‘‘हमें क्या करना होगा?’’ इस बार राम स्नेही ने पूछा.

‘‘अनुष्ठान का खर्च उठाना पड़ेगा… दूसरी कुंआरी देह का जुगाड़ करना होगा… आत्मा दूसरी देह में ही जाएगी,’’ तांत्रिक ने बताया और दोबारा पूरी तरह से तैयार हो कर आने को कहा.

राम स्नेही सुलझे विचारों के थे. उन्होंने अपनी ओर से मना कर दिया. वैसे, वे खर्च उठाने को तो तैयार थे, लेकिन दूसरी देह यानी दूसरे की बेटी लाने का जोखिम उठाने को तैयार नहीं थे. उन की मीना की बीमारी किसी दूसरे की बेटी को लगे, वे ऐसा नहीं चाहते थे.

लेकिन जसोदा जिद पर अड़ी थीं. अपनी बेटी के लिए वे हर तरह का जोखिम उठाने को तैयार थीं. राम स्नेही ने इस बाबत सोच कर जल्दी ही कुछ करने की बात कही.

एक रात को राम स्नेही और जसोदा अपनी बेटी मीना को साथ लिए बैलगाड़ी में सवार हो कर पहाड़ी मंदिर की ओर निकल पड़े. गाड़ी में उन के साथ एक कुंआरी लड़की और थी. बैलगाड़ी में टप्पर लगा था, जिस से सवारियों की जानकारी नहीं हो सकती थी. दोनों लड़कियों को चादर से लपेट कर बिठाया गया था.

तांत्रिक के सैक्रेटरी ने देह परिवर्तन अनुष्ठान के खर्च के तौर पर 10 हजार रुपए की मांग की. राम स्नेही तैयार हो कर आए थे. उन्होंने रुपए जमा करने में कोई आनाकानी नहीं की.

‘‘अनुष्ठान देर रात को शुरू होगा और यह 3 रातों तक चलेगा…’’ सैक्रेटरी ने बताया और अनुष्ठान पूरा होने के बाद आने को कहा.

राम स्नेही और जसोदा अपने घर वापस लौट आए. जसोदा को उम्मीद थी कि तांत्रिक के अनुष्ठान से मीना ठीक हो जाएगी.

दोनों लड़कियों को एक कमरे में बिछे बिस्तरों पर बिठाया गया. अनुष्ठान से पहले उन्हें आराम करने को कहा गया. तांत्रिक ने लड़कियों के सेवन के लिए नशीला प्रसाद और पेय भिजवाया. नशीले पेय के असर में दोनों लड़कियों को अपने देह की सुध नहीं रही. वे अपने बिस्तरों पर बेसुध लेट गईं.

तांत्रिक और उस के सैक्रेटरी ने देर तक दारूगांजे का सेवन किया. नशे में धुत्त वे दोनों लड़कियों के कमरे में घुस आए. अनुष्ठान के नाम पर उन का लड़कियों के साथ गंदा खेल खेलने का इरादा था. उन को कुंआरी देह की भूख थी. वे ललचाई आंखों से बेसुध लेटी कच्ची उम्र की लड़कियों को घूर रहे थे. थोड़ी ही देर में वे उन की देह पर टूट पड़े.

मीना के साथ आई दूसरी लड़की झटके से उठी. उस ने तांत्रिक के सैक्रेटरी को जोरदार घूंसा जमाया और जोरजोर से चिल्लाना शुरू किया.

मीना ने भी तांत्रिक को झटक कर जमीन पर गिरा दिया. नशे में धुत्त तांत्रिकों को निबटने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई. मौके पर पुलिस के कई जवान भी आ गए. उन्होंने उन दोनों को हथकड़ी पहना दी.

राम स्नेही को इस तरह के फरेब का पहले से ही डर था. उन्होंने थाने जा कर पूरी रिपोर्ट दी थी. थानेदार ने ही दूसरी देह का इंतजाम किया था. दूसरी लड़की सुनैना थाने में काम करने वाली एक महिला पुलिस की बेटी थी. उस ने जूडोकराटे की ट्रेनिंग ली हुई थी. वह इस मुहिम से जुड़ने के लिए फौरन तैयार हो गई थी.

सुनैना को नशीली चीज व पेय से बचने की हिदायत दी गई थी. उसे हमेशा सतर्क रहने और तांत्रिकों को भरमाने के लिए जरूरी स्वांग भरने की भी सलाह दी गई थी.

हथियारबंद जवानों को पहाड़ी मंदिर के आसपास तैनात रहने के लिए भेजा गया था. जवानों ने वरदी नहीं पहनी थी. जसोदा को इस मुहिम की कोई खबर नहीं थी.

सरकारी अस्पताल के कंपाउंडर छेदीलाल ने यह सारी साजिश रची थी. उस ने अपने ससुराल के गांव के 2 नशेड़ी आवारा दोस्तों चंदू लाल और मनोहर को नशे के लिए पैसे का जुगाड़ करने और जवानी के मजे लेने का आसान तरीका समझाया था.

थाने में पिटाई हुई, तो चंदू लाल और मनोहर ने सच उगल दिया. छेदीलाल को नशीली दवाओं व दिमागी मरीजों को दी जाने वाली दवाओं की अधकचरी जानकारी थी. उसे अस्पताल से गिरफ्तार कर लिया गया. तीनों को इस प्रपंच के लिए जेल की हवा खानी पड़ी. छेदीलाल को नौकरी से बरखास्त कर दिया गया. राम स्नेही को उन के रुपए वापस मिल गए.

थानेदार ने जयपुर के एक नामी मनोचिकित्सक का पता बताया. उन की सलाह के मुताबिक राम स्नेही ने मीना का इलाज जयपुर में कराने का इरादा किया. जसोदा ने हामी भरी. इस से मीना के ठीक होने की उम्मीद अब जाग गई थी.

VIDEO : टेलर स्विफ्ट मेकअप लुक

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रेस 3 के लिये स्पेशल ट्रेनिंग ले रहीं जैकलीन

बौलीवुड अभिनेत्री जैकलीन फर्नांडीस रेमो डिसूजा की फिल्म ‘रेस-3’ को लेकर चर्चा में हैं. फिल्म में जैकलीन एक्शन करते हुए भी नजर आएंगी, एक्शन सीक्वेंस को परफेक्ट तरीके से करने के लिए जैकलीन इन दिनों स्पेशल ट्रेनिंग ले रही हैं. ट्रेनिंग वीडियो को खुद जैकलीन ने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट से शेयर किया है. वीडियो में जैकलीन बैक फ्लिप करने की कोशिश करते हुए नजर आ रही हैं. कहा जा रहा है कि फिल्म में जबरदस्त एक्शन सीन देखने को मिलेंगे. फिल्म में सलमान खान के साथ जैकलीन भी एक्शन करते हुए नजर आएंगी.

वीडियो को शेयर करते हुए जैकलीन ने कैप्शन लिखा, ”यह कोई फिजिक की बात नहीं है, फिटनेस हमेशा से मेरे लिए चैलेंज के रूप में रहा है, लेकिन फाइनली मुझे अच्छा लग रहा है. ट्रेनिंग फौर लाइफ, रेस-3”.

जैकलीन के द्वारा शेयर किए गए वीडियो वह बैक फ्लिप करने की कोशिश करते हुए नजर आ रही हैं, पहली बार वह असफल हो जाती हैं, आखिरकार दूसरी बार में वह फ्लिप करने में सफल हो जाती हैं. जैकलीन एक्शन ट्रेनर कुलदीप शशि से ट्रेनिंग ले रही हैं.

सलमान खान स्टारर फिल्म ‘रेस-3’ में जैकलीन फर्नांडीस के साथ अभिनेत्री डेजी शाह, अभिनेता बौबी देओल और अनिल कपूर नजर आएंगे. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, फिल्म की शूटिंग आखिरी चरण में हैं. फिल्म के आखिरी शेड्यूल की शूटिंग अबू धाबी में हो रही है, कहा जा रहा है कि जल्द ही फिल्म की शूटिंग पूरी हो सकती है. फिल्म इस साल ईद के मौके पर 15 जून को रिलीज होगी. जैकलीन ने हाल ही में रिलीज हुई फिलम ‘बागी-2’ में आइटम नंबर कर सुर्खियां बटोरी थीं. फिल्म में माधुरी दीक्षित पर फिल्माए गए सुपरहिट गाने ‘एक दो दिन’ के रिक्रिएट वर्जन पर ठुमके लगाती हुई नजर आई थीं.

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तिकड़म से अमीर, गरीबों को मिली गरीबी

देश में जो भी अमीरी दिख रही है, वह साफसाफ गरीबों, मेहनतकश किसानों, छोटेमझोले व्यापारियों व उद्योगपतियों से लूटपाट कर जमा किए गए पैसों की है. 10-15 करोड़ के फ्लैट, 100 करोड़ के मकान, पर्सनल जैट, फाइवस्टार कल्चर, करोड़ों के जेवर पहने बीवियां अमीरों की सूझबूझ की देन कम, उन के संपर्कों की देन ज्यादा हैं. इस देश में सत्ताधारियों की आय जनता को कुछ नया, अनूठा, विलक्षण देने की नीयत नहीं है, बल्कि उसे लूटने के नए, अभिनव, उलझे हुए तरीके ढूंढ़ने की है.

देश में शुद्ध अमीर वे हैं जो जानते हैं कि अमीरी का रास्ता धर्म या राजनीति की देन है. नीरव मोदी, मेहुल चोकसी, विक्रम कोठारी, सुब्रत राय, यूनिटैक, किंगफिशर, आईपीएल, 2जी स्कैम, कौमनवैल्थ स्कैम, कोल स्कैम, व्यापमं स्कैम सभी घरघर मोदी की तरह घरघर की पहचान बने हुए हैं. दरअसल, सत्ता और श्रद्धा दोनों का पूरा उपयोग कर के  गैरकानूनी तरीके से पैसा बनाया जा रहा है, जनता को कुछ दे कर नहीं.

आम उत्पादक या व्यापारी सीमित पैसा ही कमा पाता है इस देश में. उस पर सरकार, बैंकों, इंस्पैक्टरों की इस बुरी तरह जकड़न रहती है कि वह न कुछ नया कर पाता है न संभल पाता है. उस के पास न नेताओं पर उड़ाने के लिए कुछ होता है, न बाबाओं पर. इन को मोटी आमदनी खास तिकड़मबाजों के माध्यम से होती है जो सिस्टम को अपने हिसाब से चला कर जनता की कमाई लूट लेते हैं. अगर 4-5 वर्षों में 100-200 में से एकदो पकड़े भी जाएं तो इसे आवश्यक रिस्क फैक्टर मान कर भुला दिया जाता है. मिलिट्री की भाषा में इसे कोलैट्रल डैमेज कहा जाता है. यह सिस्टम के उपयोग की खराबी नहीं, यह किसी के गड़्ढे में भूल से गिर जाने का मामला है.

वित्त मंत्री, प्रधानमंत्री चाहे चुप रहें, उपदेशात्मक या धमकीभरे शब्दों में कुछ कह दें, इस देश में यह चलता रहेगा क्योंकि हमारी संस्कृति में लूट, बेईमानी और भेदभाव रगरग में भरा है. यहां पूजा उन्हीं की होती है जो प्रपंचों से विजय पाते हैं. उन्हीं के नाम पर झगड़ा हो रहा है. हाल के ऐसे नाम पौराणिक युग के नामों की तरह के ही हैं.

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‘स्थापित नेताओं’ को दरकिनार करती भाजपा

दूसरे दलों में तोड़फोड़ करना भाजपा के लिये सरल हो सकता है, पर दलबदल करने वाले नेताओं को संभालना भारी पड़ रहा है. उन्नाव के बहुचर्चित रेप और हत्या कांड में विधायक कुलदीप सेंगर की किरकिरी होने से विपक्ष भाजपा पर भारी पड़ गया है. पिछले कुछ सालों से भाजपा में अपने दल के ‘स्थापित नेताओं’ को दरकिनार किया जा रहा है. अपनी पार्टी के ‘स्थापित नेताओं’ की जगह दूसरे दलों के दलबदलू नेताओं को तरजीह दी जा रही है. यह भाजपा के गले की फांस बन रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में भाजपा के 2 उपचुनाव हारने और सपा-बसपा के गठबंधन को देखते हुये इन दलबदल कर आये नेताओं का भी भाजपा से मोह भंग हो रहा है. उपेक्षा का शिकार चल रहे अब भाजपा के स्थापित नेता भी पार्टी के लिये काम करने से कतरा रहे हैं.

राज्यसभा चुनाव में भाजपा ने पार्टी में ‘स्थापित नेताओं’ को महत्व नहीं दिया. राज्यसभा चुनाव के बाद अब विधान परिषद के चुनाव में भी भाजपा अपने दल के ‘स्थापित नेताओं’ की जगह पर दूसरे दलबदलू नेताओं को महत्व दे रही है. भाजपा ने आधे से अधिक विधान परिषद के पदों पर दलबदलू नेताओं को टिकट देने की तैयार कर ली है. ऐसे में पार्टी के स्थापित नेताओं में असंतोष है. इसके बाद भी भाजपा तोड़फोड़ की राजनीति से बाज नहीं आ रही. इस बार भाजपा ने कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी के चुनाव क्षेत्र रायबरेली में उनके करीबी नेताओं को भाजपा में शामिल करने का काम करने जा रही है.

जानकार लोग बताते हैं कि भाजपा में ‘योगीशाह’ की जोड़ी अपनी पार्टी के ‘स्थापित नेताओं’ को दरकिनार करना चाहती है. जिससे सभी उनकी हां में हां मिलाते रहे. दूसरी पार्टी से आने वाले दलबदलू नेता अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं. कई बदलबदलू नेता ऐसे हैं जो चुनाव जीतने की हालत में नहीं थे, पर भाजपा की हवा में चुनाव जीत गये. अब भाजपा के खिलाफ माहौल बनता देख यह नेता सबसे पहले पार्टी छोड़ने और विद्रोह पर उतर आये हैं. उत्तर प्रदेश के 2 उपचुनाव में भाजपा विपक्षी एकता से कम अपनी पार्टी के अंतरकलह से अधिक हारी है. अब पार्टी स्तर पर इस बात को स्वीकार किया जा रहा है.

पार्टी के जिन लोगों को जमीनी सच की बात हाई कमान को देनी होती है वह भी नहीं बोलते हैं. जानकार लोग कहते हैं कि पार्टी के नेता तमाम सच को जानते हुये चुप हैं क्योंकि उनकी बात को हाईकमान के विरोध से जोड़ दिया जाता है. उन्नाव के विधायक कुलदीप सिंह के मामले में कुछ लोगों ने मामले की गंभीरता से पार्टी को अवगत कराने की कोशिश हुई थी पर सरकार में शामिल लोगों ने इन बातों को कोई तवज्जों नहीं दी. जिसकी वजह से समय पर विधायक पर अंकुश नहीं लगाया जा सका. ऐसे बहुत से मामले हैं जो गुटबाजी का शिकार हो रहे हैं. इसकी प्रमुख वजह यह है कि पार्टी अपने ‘स्थापित नेताओं’ की जगह पर दूसरे दलों के मौका परस्त लोगों पर भरोसा कर रही है.

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बहन जाह्नवी की ड्रेस पर भद्दे कमेंट से भड़के अर्जुन कपूर

बौलीवुड अभिनेता अर्जुन कपूर जितने हंसमुख फिल्मों में दिखाई देते हैं, असल जिंदगी में वह उतने ही गंभीर हैं. हाल ही में अर्जुन कपूर का गुस्सा सोशल मीडिया पर भी देखने को मिला. उन्होंने एक औनलाइन पोर्टल को ट्वीट कर जमकर लताड़ा है.

दरअसल, उस पोर्टल ने उनकी बहन जाह्नवी कपूर के ड्रेस पर भद्दा कमेंट किया था. जाह्नवी अपनी बहन खुशी और पापा बोनी के साथ अर्जुन के घर गई थीं. वहां उन्होंने पिंक कलर की एक ड्रेस पहन रखी थी. उनकी पिंक कलर की ड्रेस पर कमेंट करते हुए पोर्टल ने लिखा कि जाह्नवी ने इतनी सेक्सी ड्रेस पहनी थी कि सब कुछ दिख रहा था. इस कमेंट के बाद अर्जुन खुद को रोक नहीं पाए और वेब पोर्टल पर गलत तरीके से खबरों को मढ़ने पर भड़क उठे.

अर्जुन ने इस खबर को शेयर करते हुए काफी गुस्से में ट्वीट किया, क्या आपको पता है… एक वेबसाइट ने अटेंशन पाने के लिए ऐसी ओछी हरकत की है.. ये शर्मनाक है कि आपकी आंखें यही सब देखती है. इसी तरह हमारा देश एक यंग वुमेन को देखता है. हालांकि उनके ट्वीट के बाद पोर्टल ने खबर को डिलीट कर दिया है.

बता दें कि जाह्नवी की फिल्म ‘धड़क’ की शूटिंग शेड्यूल खत्म हो चुका है तो वहीं अर्जुन इन दिनों परिणीति चोपड़ा के साथ अपनी फिल्म ‘नमस्ते इंग्लैंड’ की शूटिंग कर रहे हैं. फिलहाल वो मुंबई में हैं जिनसे मिलने बोनी बेटी जाह्नवी और खुशी के साथ पहुंचे थे.

आपको बता दें कि पहले अर्जुन और उनकी बहन अंशुला के रिश्ते जाह्नवी और खुशी के साथ ठीक नहीं थे, लेकिन श्रीदेवी के निधन के बाद चारों भाई बहन बहुत करीब आ गए. अर्जुन की तरह ही कुछ समय पहले अंशुला ने भी इंस्टाग्राम पर एक यूजर को जाह्नवी और खुशी के बारे में अपशब्द कहने के लिए फटकार लगाई थी.

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अक्टूबर : दर्शकों के सब्र का इम्तहान

फिल्म की कहानी दिल्ली के एक फाइव स्टार होटल से शुरू होती है, जहां होटल मैनेजमेंट का कोर्स करने के बाद कुछ लड़के व लड़कियां ट्रेनी के रूप में काम कर रहे हैं. इनके साथ शर्त है कि इन्हे ट्रेनी के दौरान उपस्थित बनाए रखते हुए शिकायत का मौका नहीं देना है. बीच में खुद छोड़ कर गए या होटल प्रबंधक ने उन्हे निकाल दिया, तो उनके माता पिता को होटल प्रबंधक को तीन लाख रूपए चुकाने पड़ेंगे.

इन ट्रेनी लड़के व लड़कियों में 21 साल का दानिश वालिया उर्फ डैन (वरुण धवन) और शिवली अय्यर (बंदिता संधू) भी हैं. डैन करियर ओरिएंटेड है और ट्रेनीशिप खत्म होने के बाद वह अपना रेस्टारेंट खोलने का सपना देख रहा है. हर दिन उससे कुछ न कुछ ऐसी गड़बडी होती रहती है कि उसे डांट सुननी पड़ती है. शिवली को अक्टूबर माह में खिलने वाले एक खास फूल से काफी लगाव है. डैन व शिवली के बीच कोई अच्छी दोस्ती भी नहीं है.

31 दिसंबर की रात होटल में नए वर्ष की पार्टियां हो रही हैं. यह सारे ट्रेनी भी तीसरी मंजिल की छत पर पार्टी मना रहे हैं. कुछ लड़के व लड़कियों ने शराब पी है.शिवली ने शराब नहीं ली. अचानक वह पूछती है कि ‘डैन कहां है?’ और फिर वह छत की दीवार पर जाकर बैठ जाती है. बैठते ही वह नीचे गिर जाती है. डाक्टर व एम्बूलेंस आती है, बुरी तरह से घायल शिवली को अस्पताल ले जाया जाता है. डाक्टर घोष उसका आपरेशन करते हैं. पर वह कोमा में चली जाती है. उसे वेंटीलेटर पर रखा गया है. पता चलता है कि शिवली की मां प्रोफेसर है और उसकी एक छोटी बहन व एक भाई भी है.

पिता का आठ वर्ष पहले ही देहांत हो गया था. शिवली के चाचा नहीं चाहते कि अब शिवली के इलाज पर पैसे खर्च किए जाएं, डाक्टरों को भी शिवली के कोमा से बाहर आने व जिंदा होने की उम्मीदें कम हैं. पर मां का दिल नहीं मानता. इधर डैन भी शिवली को देखने आता है. एक दिन उसके साथी बताते हैं कि छत से गिरने से पहले शिवली ने पूछा था था कि ‘डैन कहां है?’ इस बात से डैन को लगता है कि शिवली उसे चाहती है. उसके बाद वह हर दिन अस्पताल में शिवली के पास रहने का प्रयास करता है.October Movie Review story about love

डैन बार बार कहता है कि शिवली के इलाज के लिए डाक्टरों को कुछ वक्त दिया जाना चाहिए. खैर, शिवली कोमा से बाहर आ जाती है. पर अपाहिज हो गयी है. होटल में डैन की अनुपस्थिति व गलत व्यवहार के कारण उसे होटल से निकाल दिया जाता है. इससे उसकी मां बहुत नाराज होती हैं. उन्हे तीन लाख रूपए भी चुकाने पड़ते हैं. इसी के चलते होटल वाले उसे निकाल देते हैं. डैन की मां इस बात से नाराज है कि डैन ने सही ढंग से अपनी ट्रेनिंग नहीं पूरी की और अब उन्हे तीन लाख रूपए भी चुकाने पड़ेंगे. उसके बाद शिवली की मां डैन को समझाकर काम करने के लिए कहती है.

डैन को कुलू के एक होटल में मैनेजर की नौकरी मिल जाती है. इधर शिवली हिंसक हो जाती है. अंततः डैन वापस आता है. और फिर से अस्पताल में शिवली के आस पास रहने लगता है. कुछ दिन बाद अस्पताल से शिवली को घर ले जाया जाता है. अब डैन, शिवली के घर जाकर उसकी देखभाल करता है, कभी कभी व्हील चेअर पर शिवली को बैठाकर गार्डेन में घुमाने ले जाता है. मगर कुछ दिन बाद शिवली इस संसार को छोड़कर चली जाती है. शिवली की मां अक्टूबर माह में खिलने वाले फूल का पौधा डैन को सौंपकर दिल्ली छोड़कर चेन्नई चली जाती हैं.

फिल्मकार शुजीत सरकार की फिल्म  ‘अक्टूबर’ एक अनकहे और पैशनेट प्यार की कहानी है. मगर कहानी में बहुत ज्यादा नवीनता नहीं है. इस फिल्म को देखते हुए दर्शक की नजरों के सामने 27 मई 2016 को प्रदर्शित फिल्म ‘‘वेटिंग’’ जरुर घूमती है, जिसमें नसिरूद्दीन शाह व कलकी कोचलीन की अहम भूमिकाएं थी. कहानी लगभग वही है, सिर्फ पात्रों की अदला बदली है.

खैर, शुजीत सरकार ने भी अपनी इस फिल्म में बिना शर्त वाले प्यार की बात की है, पर फिल्म उदासी लिए हुए धीमी गति से चलती है. फिल्म का क्लायमेक्स अवसाद के अलावा कुछ नहीं देता. प्यार को रूह से महसूस करने व प्यार को गहराई से समझने के लिए एक लघु फिल्म के रूप में यह फिल्म अच्छी बन सकती थी,मगर फीचर फिल्म के लिए जिस तरह से कहानी धीमी गति से बढ़ती है, जिस तरह से फिल्म में दर्द, गम व उदासी को पिरोया गया है, उससे  भी दर्शक के सब्र का बांध टूटता है. वैसे कुछ भावनात्मक दृश्य काफी अच्छे बन पड़े हैं.

आम हिंदी फिल्मों से एकदम भिन्न और पूरी फिल्म जिस तरह से सुस्त गति से आगे बढ़ती है, उसके चलते फिल्म को देखते रहने का दर्शकों का सब्र का बांध टूट जाता है. परिणामतः फिल्मकार दर्शकों को किरदारों की जिंदगी की तह में जाकर निश्छल जज्बातों से जोड़ नही पाते हैं. पैशनेट प्यार को दर्शाते समय निर्देशक व लेखक यह भूल गए कि आज तेज गति से भागती जिंदगी के दौर में दर्शक इतना सब्र नहीं दिखा सकता, जितना उन्हे दर्शकों से अपेक्षा है.October Movie Review story about love

‘कौफी डे से शुरू और कौफी डे पर खत्म होने वाले प्यार’ के युग में प्यार की गहराई को समझने का किसके पास वक्त है. इसलिए बेहतरीन कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद इस फिल्म को बाक्स आफिस पर दर्शक मिलेंगे, ऐसी उम्मीद कम है. इतना ही नहीं फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि फिल्म का एक भी किरदार दर्शक की रूह को हिलाने का काम भी नहीं करता. कोई भी किरदार दर्शकों के दिलो दिमाग पर अमिट छाप नहीं छोड़ता है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो वरुण धवन ने एक बार फिर बाजी मार ली है. डैन के किरदार को वरुण धवन ने अपने अभिनय से जीवंत कर दिया है. शिवली के किरदार में बंदिता संधू ने अपनी आंखों के भावों से काफी कुछ कहने का प्रयास किया है और एक कलाकार के रूप में वह काफी उम्मीदें जगाती है. शिवली की मां के किरदार में गीतांजली राव ने भी बेहतरीन अभिनय किया है.

कैमरामैन अविक मुखोपाध्याय की भी प्रशंसा की जानी चाहिए जिन्होंने दिल्ली को भी अति खूबसूरत तरीके से परदे पर उकेरा है.

एक घंटा पचपन मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘अक्टूबर’’ का निर्माण ‘राइजिंग सन फिल्मस’ के बैनर तले रौनी लाहिरी और शील कुमार ने किया है. फिल्म के निर्देशक शुजीत सरकार, लेखक जूही चतुर्वेदी, संगीतकार शांतनु मोयत्रा, कैमरामैन अविक मुखोपाध्याय तथा कलाकार हैं – वरुण धवन, बंदिता संधू, गीतांजली राव, साहिल वेंडालिया, प्रशांत सिंह व अन्य.

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