मां बनना औरत की मजबूरी नहीं

मातृत्व का एहसास औरत के लिए कुदरत से मिला सब से बड़ा वरदान है. औरत का सृजनकर्ता का रूप ही उसे पुरुषप्रधान समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान देता है. मां वह गरिमामय शब्द है जो औरत को पूर्णता का एहसास दिलाता है व जिस की व्याख्या नहीं की जा सकती. यह एहसास ऐसा भावनात्मक व खूबसूरत है जो किसी भी स्त्री के लिए शब्दों में व्यक्त करना शायद असंभव है.

वह सृजनकर्ता है, इसीलिए अधिकतर बच्चे पिता से भी अधिक मां के करीब होते हैं. जब पहली बार उस के अपने ही शरीर का एक अंश गोद में आ कर अपने नन्हेनन्हे हाथों से उसे छूता है और जब वह उस फूल से कोमल, जादुई एहसास को अपने सीने से लगाती है, तब वह उस को पैदा करते समय हुए भयंकर दर्द की प्रक्रिया को भूल जाती है.

लेकिन भारतीय समाज में मातृत्व धारण न कर पाने के चलते महिला को बांझ, अपशकुनी आदि शब्दों से संबोधित कर उस का तिरस्कार किया जाता है, उस का शुभ कार्यों में सम्मिलित होना वर्जित माना जाता है. पितृसत्तात्मक इस समाज में यदि किसी महिला की पहचान है तो केवल उस की मातृत्व क्षमता के कारण. हालांकि कुदरत ने महिलाओं को मां बनने की नायाब क्षमता दी है, लेकिन इस का यह मतलब कतई नहीं है कि उस पर मातृत्व थोपा जाए जैसा कि अधिकांश महिलाओं के साथ होता है.

विवाह होते ही ‘दूधो नहाओ, पूतो फलो’ के आशीर्वाद से महिला पर मां बनने के लिए समाज व परिवार का दबाव पड़ने लगता है. विवाह के सालभर होतेहोते वह ‘कब खबर सुना रही है’ जैसे प्रश्नचिह्नों के घेरे में घिरने लगती है. इस संदर्भ में उस का व्यक्तिगत निर्णय न हो कर परिवार या समाज का निर्णय ही सर्वोपरि होता है, जैसे कि वह हाड़मांस की बनी न हो कर, बच्चे पैदा करने की मशीन है.

समाज का दबाव

महिला के शरीर पर समाज का अधिकार जमाना नई बात नहीं है. हमेशा से ही स्त्री की कोख का फैसला उस का पति और उस के घर वाले करते रहे हैं. लड़की कब मां बन सकती है और कब नहीं, लड़का होना चाहिए या लड़की, ये सभी निर्णय समाज स्त्री पर थोपता आया है. वह क्या चाहती है, यह कोई न तो जानना चाहता है और न ही मानना चाहता है, जबकि सबकुछ उस के हाथ में नहीं होता है, फिर भी ऐसा न होने पर उस को प्रताडि़त किया जाता है.

यह दबाव उसे शारीरिक रूप से मां तो बना देता है परंतु मानसिक रूप से वह इतनी जल्दी इन जिम्मेदारियों के लिए तैयार नहीं हो पाती है. यही कारण है कि कभीकभी उस का मातृत्व उस के भीतर छिपी प्रतिभा को मार देता है और उस का मन भीतर से उसे कचोटने लगता है.

कैरियर को तिलांजलि

परिवार को उत्तराधिकारी देने की कवायद में उस के अपने कैरियर को ले कर देखे गए सारे सपने कई वर्षों के लिए ममता की धुंध में खो जाते हैं. यह अनचाहा मातृत्व उस की शोखी, चंचलता सभी को खो कर उसे एक आजाद लड़की से एक गंभीर महिला बना देता है.

लेकिन अब बदलते समय के अनुसार, महिलाएं जागरूक हो ई हैं. आज कई ऐसे सवाल हैं जो घर की चारदीवारी में कैद हर उस औरत के जेहन में उठते हैं, जिस की आजादी व स्वर्णिम क्षमता पर मातृत्व का चोला पहन कर उसे बाहर की दुनिया से महरूम कर दिया गया है.

आखिर क्यों औरत की ख्वाहिशों को ममता के खूंटे से बांध कर बाहर की दुनिया से अनभिज्ञ रखा जाता है? जैसे कि अब उस का काम नौकरी या उन्मुक्त जिंदगी जीना नहीं, बल्कि अपने बच्चे की परवरिश में अपना अस्तित्व ही दांव पर लगा देना मात्र रह गया हो.

बच्चे को अपने रिश्ते का जामा पहना कर उस पर अपना अधिकार तो सभी जमाते हैं, लेकिन जो बच्चे के पालनपोषण से संबंधित कर्तव्य होते हैं, उन का निर्वाह करने के लिए तो पूरी तरह से मां से ही अपेक्षा की जाती है. क्या परिवार में अन्य कोई बच्चे का पालनपोषण नहीं कर सकता. यदि हां, तो फिर इस की जिम्मेदारी अकेली औरत ही क्यों ढोती है?

निर्णय की स्वतंत्रता

दबाव में लिया गया कोई भी निर्णय इंसान पर जिम्मेदारियां तो लाद देता है परंतु उन का वह बेमन से वहन करता है. जब हम सभी एक शिक्षित व सभ्य समाज का हिस्सा हैं तो क्यों न हर निर्णय को समझदारी से लें तथा जिम्मेदारियों के मामले में स्त्रीपुरुष का भेद मिटा कर मिल कर सभी कार्य करें. ऐसे वक्त में यदि उस का जीवनसाथी उसे हर निर्णय की आजादी दे व उस का साथ निभाए तो शायद वह मां बनने के अपने निर्णय को स्वतंत्रतापूर्वक ले पाएगी.

एक पक्ष यह भी

कानून ने भी औरत के मां बनने पर उस की अपनी एकमात्र स्वीकृति या अस्वीकृति को मान्यता प्रदान करने पर अपनी मुहर लगा दी है.

मातृत्व नारी का अभिन्न अंश है, लेकिन यही मातृत्व अगर उस के लिए अभिशाप बन जाए तो? वर्ष 2015 में गुजरात में एक 14 साल की बलात्कार पीडि़ता ने बलात्कार से उपजे अनचाहे गर्भ को समाप्त करने के लिए उच्च न्यायालय से अनुमति मांगी थी, लेकिन उसे अनुमति नहीं दी गई. एक और मामले में गुजरात की ही एक सामूहिक बलात्कार पीडि़ता के साथ भी ऐसा हुआ. बरेली, उत्तर प्रदेश की 16 वर्षीय बलात्कार पीडि़ता को भी ऐसा ही फैसला सुनाया गया. ऐसी और भी अन्य दुर्घटनाएं सुनने में आई हैं.

बलात्कार पीडि़ता के लिए यह समाज कितना असंवेदनशील है, यह जगजाहिर है. बलात्कारी के बजाय पीडि़ता को ही शर्म और तिरस्कार का सामना करना पड़ता है. ऐसे में अगर कानून भी उस की मदद न करे और बलात्कार से उपजे गर्भ को उस के ऊपर थोप दिया जाए तो उस की स्थिति की कल्पना कीजिए, वह कानून और समाज की चक्की के 2 पाटों के बीच पिस कर रह जाती है. लड़की के पास इस घृणित घटना से उबरने के सारे रास्ते खत्म हो जाते हैं और ऐसे बच्चे का भी कोई भविष्य नहीं रह जाता जिसे समाज और उस की मां स्वीकार नहीं करती.

पिछले साल तक आए इस तरह के कई फैसलों ने इस मान्यता को बढ़ावा दिया था कि किस तरह से महिला के शरीर से जुड़े फैसलों का अधिकार समाज और कानून ने अपने हाथ में ले रखा है. वह अपनी कोख का फैसला लेने को आजाद नहीं है. अनचाहा और थोपा हुआ मातृत्व ढोना उस की मजबूरी है.

लेकिन 1 अगस्त, 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार की शिकार एक नाबालिग लड़की के गर्भ में पल रहे 24 हफ्ते के असामान्य भू्रण को गिराने की इजाजत दे दी. कोर्ट ने यह आदेश इस आधार पर दिया कि अगर भू्रण गर्भ में पलता रहा तो महिला को शारीरिक व मानसिक रूप से गंभीर खतरा हो सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम 1971 के प्रावधान के आधार पर यह आदेश दिया है. कानून के इस प्रावधान के मुताबिक, 20 हफ्ते के बाद गर्भपात की अनुमति उसी स्थिति में दी जा सकती है जब गर्भवती महिला की जान को गंभीर खतरा हो. 21 सितंबर, 2017 को आए मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले ने स्थिति को पलट दिया.

न्यायालय ने महिला के शरीर और कोख पर सिर्फ और सिर्फ महिला के अधिकार को सम्मान देते हुए यह फैसला दिया है कि यह समस्या सिर्फ अविवाहित स्त्री की नहीं है, विवाहित स्त्रियां भी कई बार जरूरी कारणों से गर्भ नहीं चाहतीं.

कोई भी महिला चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित, अवांछित गर्भ को समाप्त करने के लिए स्वतंत्र है, चाहे वजह कोई भी हो. इस अधिकार को गरिमापूर्ण जीवन जीने के मूल अधिकार के साथ सम्मिलित किया गया है. महिलाओं के अधिकारों और स्थिति के प्रति बढ़ती जागरूकता व समानता इस फैसले में दिखाई देती है. अविवाहित और विवाहित महिलाओं को समानरूप से यह अधिकार सौंपते हुए उच्च न्यायालय ने लिंग समानता और महिला अधिकारों के पक्ष में एक मिसाल पेश की है.

सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

28 अक्तूबर, 2017 को गर्भपात को ले कर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के मुताबिक, अब किसी भी महिला को अबौर्शन यानी गर्भपात कराने के लिए अपने पति की सहमति लेनी जरूरी नहीं है. एक याचिका की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यह फैसला लिया है. कोर्ट ने कहा कि किसी भी बालिग महिला को बच्चे को जन्म देने या गर्भपात कराने का अधिकार है. गर्भपात कराने के लिए महिला को पति से सहमति लेनी जरूरी नहीं है. बता दें कि पत्नी से अलग हो चुके एक पति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. पति ने अपनी याचिका में पूर्व पत्नी के साथ उस के मातापिता, भाई और 2 डाक्टरों पर अवैध गर्भपात का आरोप लगाया था. पति ने बिना उस की सहमति के गर्भपात कराए जाने पर आपत्ति दर्ज की थी.

इस से पहले पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने भी याचिकाकर्ता की याचिका ठुकराते हुए कहा था कि गर्भपात का फैसला पूरी तरह महिला का हो सकता है. अब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस ए एम खानविलकर की बैंच ने यह फैसला सुनाया है. फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गर्भपात का फैसला लेने वाली महिला वयस्क है, वह एक मां है, ऐसे में अगर वह बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती है तो उसे गर्भपात कराने का पूरा अधिकार है. यह कानून के दायरे में आता है.

हम यह स्वीकार करते हैं कि आज कानून की सक्रियता ने महिलाओं को काफी हद तक उन की पहचान व अधिकार दिलाए हैं परंतु आज भी हमारे देश की 40 प्रतिशत महिलाएं अपने इन अधिकारों से महरूम हैं, जिस के कारण आज उन की हंसतीखेलती जिंदगी पर ग्रहण सा लग गया है.

बच्चे के जन्म का मां और बच्चे दोनों के जीवन पर बहुत गहरा और दूरगामी प्रभाव पड़ता है. इसलिए मातृत्व किसी भी महिला के लिए एक सुखद एहसास होना चाहिए, दुखद और थोपा हुआ नहीं.

हर सिक्के के दो पहलू

बच्चा पैदा करना पूरी तरह से महिलाओं के निर्णय पर निर्भर होने से परिवार में कई विसंगतियां पैदा होंगी.

बच्चे की जरूरत पूरे परिवार को होती है, और उसे पैदा एक औरत ही कर सकती है. ऐसे में उस के नकारात्मक रवैए से पूरा परिवार प्रभावित होगा.

मातृत्व का खूबसूरत एहसास मां बनने के बाद ही होता है. नकारात्मक निर्णय लेने से महिला इस एहसास से वंचित रह जाएगी.

सरोगेसी इस का विकल्प नहीं है, मजबूरी हो तो बात अलग है.

अपनी कोख से पैदा किए गए बच्चे से मां के जुड़ाव की तुलना, गोद लिए बच्चे या सरोगेसी द्वारा पैदा किए गए बच्चे से की ही नहीं जा सकती.

आज के दौर में महिलाएं मातृत्व से अधिक अपने कैरियर को महत्त्व देती हैं. उन की इस सोच पर कानून की मुहर लग जाने के बाद अब परिवार के विघटन का एक और मुद्दा बन जाएगा और तलाक की संख्या में बढ़ोतरी होनी अवश्यंभावी है.

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जनधन पर बैंकों की लूट

4 वर्ष पहले 15 अगस्त, 2014 को दिल्ली के लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी उद्घोषणा से लोगों को एकबारगी चौंका दिया था. सब के चहरे पर मुसकान थी, नारा था ‘मेरा खाता भाग्य विधाता.’ लोगों में आशा की किरण हिलोरें लेने लगी थी, 15  नहीं, तो 5 लाख रुपए तो मिल ही जाएंगे. जितने मुंह उतनी बातें होती थीं. केंद्र सरकार ने 28 अगस्त, 2014 को आधिकारिक तौर पर प्रधानमंत्री जनधन योजना के नाम से इस योजना का शुभारंभ कर दिया.

देखते ही देखते 5 सप्ताह के अंदर ही 5 करोड़ से अधिक खाते खोले जा चुके थे. इस बीच, खाते खोलने में जो अड़चनें आईं उन को दूर करने के लिए नियमों में ढिलाई दी गई, दस्तावेजों से समझौता किया गया. परिणामस्वरूप, अक्तूबर 2017 में वित्तीय सेवा विभाग के जारी आंकड़ों के अनुसार, 30.60 करोड़ लोगों ने इस योजना के तहत अपने खाते खुलवाए हैं और इन खातों में कुल 67,687.72 करोड़ रुपए जमा किए जा चुके हैं. वास्तव में गरीबों के लिए यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है, इस में दोराय नहीं. उन के नाम एक खाता तो हो गया वरना वे महीनों बैंकों के चक्कर लगाते रहते थे खाता खुलवाने के लिए, फिर भी कागजी कार्यवाही पूरी नहीं कर पाते थे और फिर थकहार कर घर बैठ जाते थे.

अब सही बात यह है कि खाता खुल गया तो बैंकों ने उन की गाढ़ी कमाई पर कैंची चलाना चालू कर दिया है. मैसेज, आहरण, बचत खाते में निर्धारित जमा से कम की राशि आदि और न जाने कितने नियमों का हवाला बैंक वाले आएदिन इन खाताधारकों को देते रहते हैं और उन के खातों में जमा रुपयों पर कैंची चलाते रहते हैं. बैंकों की मनमानी आज गरीब व्यक्ति साहूकारों व सूदखोरों से कहीं ज्यादा, अपने बैंकों से पीडि़त है. ब्याज तो कम है लेकिन बैंकों का मासिक चार्ज बहुत ज्यादा है. अब मजदूरगरीब जाए तो कहां जाए. सूदखोरों से मुक्ति के लिए तो वह न्यायालय का दरवाजा खटखटा लेता था किंतु बैंकों की मनमानी लूट ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा. सरकार का शासकीय आदेश जीरो बैलेंस, निशुल्क रुपे कार्ड के नारे आदि धरे के धरे रह गए, जैसे भजनों से मिलने वाला सुख, शांति व समृद्धि. जनधन खाते के कुछ खातेदार ऐसे हैं जो 1,000-500 तो दूर, 100-200 रुपए भी जमा नहीं कर पा रहे हैं.

ऐसे में बैंक नितनए नियमों का हवाला देते हुए सैकड़ों का चूना खाताधारकों को हर महीने लगाएं, यह उचित नहीं है. एक ओर जहां सरकार कैशलैस भुगतान की योजना चला रही है, वहीं दूसरी तरफ विभिन्न प्राइवेट और सरकारी बैंकों ने खाताधारकों के खाते से 1 अप्रैल, 2017 से भारीभरकम कटौती करने लगे हैं.  बचत खाते में महानगरों में रहने वालों को 3 हजार, शहरी व कसबाई इलाकों में रहने को 2 हजार और ग्रामीण इलाकों में 1 हजार रुपए खाते में औसतन रखना जरूरी होगा. ऐसा न करने पर बैंक 50 से 100 रुपए तक सर्विस चार्ज की वसूली ग्राहक के खाते से करता है. यदि एटीएम कार्ड आप के बताए पते से वापस चला जाता है तो इस के एवज में कूरियर चार्ज के रूप में 100 रुपए व सर्विस टैक्स वसूल किया जाता है.

डैबिट कार्ड के सालाना चार्ज में भी बढ़ोतरी की गई है. क्लासिक डैबिट कार्ड पर 125 रुपए व सर्विस टैक्स खाते से कटते हैं. सिल्वर, ग्लोबल, युवा व गोल्ड डैबिट कार्ड पर 175 रुपए व सर्विस टैक्स खाते से कटते हैं. प्लैटिनम डैबिट कार्ड वालों के खाते से 250 रुपए व सर्विस टैक्स तो प्राइड व प्रीमियम बिजनैस डैबिट कार्ड वालों से 350 रुपए व सर्विस टैक्स वसूल किए जाते हैं.  अगर एटीएम कार्ड रिप्लेस करना है तो बैंक इस के एवज में खाते से 300 रुपए वसूल करता है. एटीएम पिन भूल जाते हैं और फिर डुप्लीकेट या रीजनरेट कराते हैं तो बैंक आप के खाते से 50 रुपए व सर्विस टैक्स वसूल करता है. इंटरनैशनल ट्रांजैक्शन खास कर बैलेंस इन्क्वायरी पर 25 रुपए व सर्विस टैक्स, कैश विथड्राअल ट्रांजैक्शन पर 100 रुपए मिनिमम कटौती किए जाने का नियम है. वह भी साढ़े 3 प्रतिशत सर्विस चार्ज के साथ. 5 बार ही टैक्सफ्री ट्रांजैक्शन की सुविधा मिलती है.

5 से ज्यादा ट्रांजैक्शन करने पर प्रति ट्रांजैक्शन ग्राहक को 10 से 15 रुपए देने होते हैं. गाढ़ी कमाई से कटौती न्यूनतम जमाराशि के नाम पर खाताधारक के खाते में निर्धारित राशि का होना अनिवार्य है. जिन के खाते में इस से कम राशि है और वे अपने खाते में बेगारी के चलते रुपए जमा नहीं कर पा रहे हैं तो वे अपनी गाढ़ी कमाई, जो आड़े वक्त के लिए बचा कर रखी थी, उस से भी हाथ धोने को मजबूर हैं. कमलेश कुमार, निवासी कसबा हरगांव, जिला सीतापुर, पेशे से राजगीर हैं. वे अपनी आपबीती सुनाते हुए भावुक हो जाते हैं, कहते हैं कि उन के खाते में 1,173 रुपए थे जो अब कटपिट कर मात्र 630 रुपए रह गए हैं, जिस में उन का प्रधानमंत्री बीमा योजना का चार्ज 312 रुपए भी शामिल है.

वे कहते हैं कि एक गरीब आदमी, जिस के सिर पर 5 जनों का बोझ हो और रोज की मजदूरी ही जीने का एकमात्र सहारा हो, वह बैंक में 2 हजार रुपए की न्यूनतम जमाराशि हमेशा कैसे रख सकता है. वे पारिवारिक खर्च के चलते बच्चे के स्कूल की मासिक फीस जमा नहीं कर पा रहे हैं, ऐसे में बैंक में पैसा कहां से जमा करें.  रहीस के खाते में 600 रुपए की जमाराशि पर 150 रुपए की कटौती की गई है. उन से बैंक में 2,000 रुपए की जमा के बारे में पूछने पर वे बताते हैं कि यदि घर में 4 लोगों का खाता हो और सारे खातों में मिला कर 8,000 रुपए जमा कर दिए जाएं तो वह रुपया गरीब आदमी के किस काम का जिस का वह ऐनवक्त पर इस्तेमाल न कर सके. राकेश कुमार लखीमपुरखीरी में अध्ययनरत एक छात्र हैं. उन की शहरी क्षेत्र के एक राष्ट्रीयकृत बैंक खाते में 2,120 रुपए की जमाराशि थी, लेकिन अब मात्र, 1,675 रुपए ही शेष हैं और वह भी बैंक की भेंट चढ़ता जा रहा है.

वे दुखी हैं, बेरोजगारी में खाते को कैसे मेंटेन करें.  विधवा गुड्डी देवी अपनी आपबीती सुनाते हुए कहती हैं कि वे अपने खाते में पैंशन के शेष 1,500 रुपए में से 1,000 रुपए लेने आई थीं दवा खरीदने के लिए, पर यहां पता चला कि खाते से 185 रुपए कट गए हैं. बैंककर्मी ने खाते में और रुपए डालने की बात कह कर उन्हें चलता कर दिया.  कांति सिंह लखनऊ में रह कर परीक्षा की तैयारी कर रही हैं, उन का स्टूडैंट खाता है. उन के खाते में 2,560 रुपए थे जो एकदिवसीय परीक्षाओं की फीस आदि के लिए रखे हुए थे. वे तब दंग रह गईं जब डैबिट कार्ड से फीस जमा कर रही थीं. पता चला खाते से 540 रुपए कम हो गए हैं. बैंक से पता करने पर मालूम हुआ कि खाते से 540 रुपए की राशि डैबिट कार्ड, एसएमएस चार्ज व मासिक खाता मेंटिनैंस आदि के काट लिए गए हैं.

किस काम का खाता आमजन खाते को चालू रखने के लिए रुपए जमा कर तो दें किंतु बैंककर्मी निर्धारित से कम की राशि होने पर चलता कर देते हैं. ऐसे में लोग अपने खाते को संचालित करने के स्थान पर अपना बैंक खाता बंद करवाना ही उचित समझते हैं. यह नमूना तो मात्र मेरे अपने आसपास के लोगों का है, देश में न जाने ऐसे कितने लाखोंकरोड़ों लोग होंगे जो बैंकों की इस अप्रत्याशित लूट का शिकार होते रहते हैं. ऐसे में प्रधानमंत्री का नारा ‘अपना खाता भाग्य विधाता’ एक मजाक बन कर रह गया है. बेचारा जनधन का मारा खाताधारक अब अपने घर की दालरोटी चलाने की जुगत करे या अपने खाते को मेंटेन करे. परिवार चलाने के लिए महंगाई की मार वह अलग से झेल रहा है. कामधंधा के नाम पर केंद्र सरकार ने कोई नया काम अभी तक नहीं किया.

4 वर्षों से सरकार अपने प्रचार में ही लगी हुई है. अब बेचारा खाताधारक अपने खाते को मेंटेन करने के लिए चोरीडकैती करे या फिर जेब काटे, वरना बैंक से अपनी जेब कटवाए. असुरक्षित खाताधारक गरीब मजदूर खाताधारक जहां बैंक में जमा कटौती से परेशान हैं वहीं बड़े खाताधारक असुरक्षा से परेशान हैं. देश के सभी सरकारी, अर्धसरकारी, शहरी, ग्रामीण बैंक खाते से आधार जोड़ने का अभियान चला रहे हैं. क्या यह पूरी तरह सुरक्षित है? इस का उत्तर न सरकार के पास है न बैंकों के पास, खुद आधार जारी करने वाली संस्था यूआईडीएआई ने भी इसे सुरक्षित नहीं माना है. यूआईडीएआई ने बताया है कि अब तक 210 बार आधार से जुड़े लोगों की गोपनीय जानकारी जन्मतिथि, पता आदि को लीक किया जा चुका है. इस बात का खुलासा नहीं किया गया कि ऐसा कबकब घटित हुआ है. साइबर हमले का भ्रम लोगों के बीच बना हुआ है. इस प्रकार की घटनाएं वहां तक घटित हो रही हैं जो राष्ट्र तकनीकी मामलों में भारत से कहीं ज्यादा विकसित हैं.

आएदिन बैंक साइबर हमले के शिकार हो जाते हैं और अपने साथसाथ लोगों को आर्थिक पंगु बना देते हैं. ऐसे में हम खुद को साइबर हमलों से कितना सुरक्षित पाएंगे जबकि साइबर अपराधी को आधार कार्डों का एक मजबूत मंच मिल जाएगा. राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो के अनुसार, साइबर अपराध का मामला देश में सालदरसाल बढ़ता ही जा रहा है. 2014 में यह  आंकड़ा 3,622 था, जो 2015 में बढ़ कर 11,592 और 2016 में 12,317 के स्तर को पार कर गया है. आईटी विशेषज्ञ रामानुज पांडे कहते हैं कि साइबर अपराधों को रोकने के लिए बड़े स्तर पर कोई खास तकनीकी अभी तक ईजाद नहीं की गई है. इस के बचाव हेतु आमजन के मध्य में डिजिटल जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए. तभी हम सब को साइबर अपराधियों से सुरक्षित रख सकते हैं. हैकरों का सब से पसंदीदा निशाना बैंक, इनवैस्टमैंट एजेंसियां और बीमा कंपनियां हैं. साइबर सिक्योरिटी फर्म सिमैनटेक के मुताबिक, 2015 में हैकरों ने 35 फीसदी हमले इन्हीं क्षेत्रों पर किए. हैकरों ने न्यूयौर्क फैडरल रिजर्व में सेंध लगा कर बंगलादेश के बैंकों से 8.1 करोड़ डौलर उड़ा दिए थे.

12 मई, 2017 को वैश्विक रैनसमवेयर हमला हुआ. हैकर्स ने अमेरिका की नैशनल सिक्योरिटी एजेंसी जैसी तकनीक का इस्तेमाल कर साइबर अटैक किया. रैनसम अंगरेजी शब्द है, जिस का अर्थ है, फिरौती.  इस साइबर हमले के बाद संक्रमित कंप्यूटरों ने काम करना बंद कर दिया. उन्हें फिर से खोलने के लिए बिटकौइन के रूप में 300 से 600 डौलर तक की फिरौती की मांग की गई. ब्रिटेन, अमेरिका, चीन, रूस, स्पेन, इटली, वियतनाम समेत लगभग 74 देशों में रैनसमवेयर साइबर हमले हुए थे. साइबर सुरक्षा शोधकर्ताओं के मुताबिक, बिटकौइन मांगने के 36 हजार मामलों का पता चला. परिणामतया, 2,30,000 से ज्यादा कंप्यूटर प्रभावित हो गए थे. बंगलादेश में 2015 के साइबर हमले ने बैंक तो बैंक, लोगों को भी दिवालिया बना दिया था.

फिर भी हम नहीं चेत रहे हैं और बिना किसी पुख्ता सुरक्षा के आधार कार्ड को बैंक से जोड़ रहे हैं. लोगों की खूनपसीने की कमाई को लूटने का एक खुला मंच तैयार कर रहे हैं.  भविष्य में अगर इस प्रकार की घटनाएं देश में कहीं घट जाती हैं तो उन का जिम्मेदार कौन होगा? यह देश के सामने बहुत बड़ा प्रश्न है. सरकार को इस तरफ गंभीरता से सोचना होगा. और जब पूरा विश्वास हो जाए कि अब हम सुरक्षित हैं तभी लोगों के बैंक खातों को आधार कार्ड से जोड़ने के कार्य को अमल में लाया जाना चाहिए.

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दोस्त बना जीजा, खतरनाक नतीजा

सुबह का उजाला अभी फैलना शुरू हुआ था कि ‘बचाओ बचाओ’ की मर्मभेदी चीख ने वहां मौजूद लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था. चीखने वाले पर तेजधार हथियार से एक युवक ने हमला किया था, जिस से गंभीर रूप से घायल हो कर वह चीखा था. चीखने के साथ ही वह सड़क पर गिर पड़ा था और गिरते ही बेहोश हो गया था.

उस युवक के गिरते ही उस पर हमला करने वाला युवक लंबे फल का खून सना चाकू हाथ में लिए भागा था. सुबह का समय होने की वजह से वहां बहुत कम लोग थे, लेकिन जो भी थे, वे उस का पीछा करने या पकड़ने की हिम्मत नहीं कर सके थे.

पर उन लोगों ने इतना जरूर किया कि हमलावर के भागने के बाद सड़क पर घायल पड़े युवक को पंचकूला के सैक्टर-6 स्थित जनरल अस्पताल पहुंचा दिया था. उसे देखते ही डाक्टरों ने मृत घोषित करने के साथ इस की सूचना पुलिस को दे दी थी.

सूचना मिलते ही थाना मौलीजागरां के एएसआई गुरमीत सिंह सुबह 7 बजे के करीब अस्पताल पहुंच गए थे. घटना की जानकारी ले कर उन्होंने थानाप्रभारी इंसपेक्टर बलदेव कुमार को सूचित किया तो सिपाही अमित कुमार के साथ वह भी अस्पताल पहुंच गए थे.

जरूरी काररवाई कर के बलदेव कुमार ने उन लोगों से बात की, जो मृतक को अस्पताल ले कर आए थे. वे 2 लोग थे, जिन में एक 19 साल का मोहम्मद चांद था और दूसरा था ड्राइवर अशोक कुमार. पूछताछ में चांद ने बताया था कि वह पंचकूला के सैक्टर-16 की इंदिरा कालोनी के मकान नंबर 1821 में रहता था और सैक्टर-17 की राजीव कालोनी स्थित शरीफ हलाल मीट शौप पर नौकरी करता था.

सुबह जल्दी जा कर चांद ही दुकान खोलता था. मृतक को ही नहीं, उस पर हमला करने वाले को भी वह अच्छी तरह से पहचानता था. वह सुबह 5 बजे दुकान पर पहुंचा तो मुर्गा सप्लाई करने वाली गाड़ी आ गई. गाड़ी के ड्राइवर अशोक कुमार ने मोहम्मद चांद को आवाज दे कर गाड़ी से मुर्गे उतारने को कहा.

मोहम्मद चांद गाड़ी के पीछे पहुंचा तो गाड़ी में बैठा ड्राइवर का सहायक इरफान उतर कर उस के पास आ गया. जैसे ही वह जाली वाला दरवाजा खोल कर मुर्गे निकालने के लिए आगे बढ़ा, शाहबाज हाथ में चाकू लिए वहां आया और इरफान के सिर पर उसी चाकू से वार कर दिया.

वार होते ही इरफान पीछे की ओर घूमा तो शाहबाज ने कहा, ‘तुम ने मेरी भोलीभाली बहन को अपनी मीठीमीठी बातों में फंसा कर मेरी मरजी के खिलाफ उस से शादी की है न? तो आज मैं तुझे उसी का सबक सिखा रहा हूं. आज मैं तुझे जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’

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इस के बाद शाहबाज ने इरफान की छाती, आंख के नीचे और कमर तथा पेट पर लगातार कई वार किए. इरफान ‘बचाओ…बचाओ’ की गुहार लगाते हुए नीचे गिर गया. शाहबाज का गुस्सा और उस के हाथ में चाकू देख कर कोई भी उस के पास जाने की हिम्मत नहीं कर सका.

लेकिन जैसे ही शाहबाज चला गया, मोहम्मद चांद और अशोक कुमार ने किसी तरह इरफान को अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उसे देखते ही मरा हुआ बताया. ऐसा ही कुछ अशोक कुमार ने भी बताया था, लेकिन उस का कहना था कि वह आगे था. शोर सुन कर पीछे आया. तब तक शाहबाज अपना काम कर के जा चुका था.

इंसपेक्टर बलदेव कुमार ने हत्याकांड के चश्मदीद मोहम्मद चांद के बयान के आधार पर शाहबाज के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करने की अनुशंसा कर के तहरीर थाना भेज दी, जहां एफआईआर नंबर 101 पर भादंवि की धारा 302 के तहत यह केस दर्ज कर लिया गया. यह घटना 4 जून, 2016 की है.

उसी दिन पुलिस की एक टीम शाहबाज की तलाश में जुट गई. उस के बारे में पता करने के लिए विश्वस्त मुखबिर भी सक्रिय कर दिए गए थे. मुखबिर की ही सूचना पर शाहबाज को उसी दिन रात में गांव मक्खनमाजरा से गिरफ्तार कर लिया गया.

अदालत से कस्टडी रिमांड ले कर सब से पहले शाहबाज से उस चाकू के बारे में पूछा गया, जिस से उस ने इरफान का कत्ल किया था. 6 जून को उस की निशानदेही पर वह चाकू मौलीजागरां की एक कब्रगाह से बरामद कर लिया गया. उस ने वहां चाकू को पत्थरों के नीचे दबा कर रखा था. लेकिन उस पर लगा खून उस ने साफ कर दिया था.

इस के बाद शाहबाज से इरफान की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के रहने वाले शाहबाज और इरफान एक ही गांव के रहने वाले थे, इसलिए वे एक साथ खेलकूद कर बड़े हुए थे. कुछ दिनों पहले कामधंधे की तलाश में दोनों चंडीगढ़ आ गए. इरफान जहां अपने बड़े भाई के साथ आया था, वहीं शाहबाज अपने पूरे परिवार के साथ आया था. उस के परिवार में अब्बूअम्मी के अलावा एक छोटी बहन साहिबा थी.

चंडीगढ़ में दोनों पंचकूला की सीमा पर बसे गांव मौलीजागरां में थोड़ी दूरी पर अलगअलग किराए के मकान ले कर रहने लगे थे. मौलीजागरां जहां चंडीगढ़ में पड़ता है, वहीं मुख्य सड़क के उस पार की दुकानें हरियाणा के जिला पंचकूला के सैक्टर-17 की राजीव कालोनी के अंतर्गत आती हैं. उन्हीं में से एक दुकान पर शाहबाज जहां मुर्गे काटने का काम करने लगा था, वहीं इरफान को मुर्गे सप्लाई करने वाली गाड़ी पर सहायक की नौकरी मिल गई थी.

अपने हिसाब से दोनों का काम ठीकठाक चल रहा था. शाहबाज के अब्बू को भी नौकरी मिल गई थी. इरफान और शाहबाज हमउम्र थे. दोनों इतने गहरे दोस्त थे कि उन में सगे भाइयों जैसा प्यार था. एक दिन भी दोनों एकदूसरे से मिले बिना नहीं रह पाते थे. एकदूसरे के यहां आनाजाना, खाना खा लेना या फिर कभीकभार सो जाना आम बात थी.

साहिबा भी दोनों के साथ बचपन से खेलतीकूदती आई थी. मगर अब वह जवान हो चुकी थी. घर वाले उस के निकाह के बारे में सोचने लगे थे. देखनेदिखाने की बात चली तो साहिबा ने हिम्मत कर के शरमाते हुए घर वालों से कहा कि वह इरफान से प्यार करती है और उसी से निकाह करना चाहती है.

साहिबा की इस बात से शाहबाज के घर में तूफान सा आ गया. घर का कोई भी आदमी इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं था. शाहबाज ने साफ कहा, ‘‘इस से बड़ी जिल्लत मेरे लिए और क्या होगी कि लोग यह कह कर मेरा मजाक उड़ाएंगे कि अपनी बहन का निकाह करने के लिए ही मैं ने इरफान से दोस्ती की थी. क्या निकाह के लिए सिर्फ वही रह गया है? दुनिया में और कोई लड़का नहीं है? मैं यह निकाह किसी भी कीमत पर नहीं होने दूंगा.’’

शाहबाज ने साहिबा को तो लताड़ा ही, इरफान से भी झगड़ा किया. इरफान ने उसे समझाने की कोशिश करते हुए कहा कि जो भी होगा, घर वालों की रजामंदी से होगा. लेकिन शाहबाज ने साफ कह दिया कि वह साहिबा को भूल जाए और किसी अन्य लड़की से निकाह कर ले, वरना उस के लिए ठीक नहीं होगा.

शाहबाज की इस धमकी का नतीजा यह हुआ कि कुछ दिनों बाद इरफान साहिबा को भगा ले गया और एक धार्मिक स्थल पर दोनों ने निकाह कर लिया. वह वापस आया तो साहिबा को शरीकेहयात बना कर आया. शाहबाज को इस मामले में सारी गलती इरफान की नजर आ रही थी. उस ने अपने दिलोदिमाग में बैठा लिया कि इरफान ने साहिबा के भोलेपन का फायदा उठा कर उसे अपनी बातों में फंसा लिया है.

शाहबाज इरफान से पहले से ही नाराज था, जलती पर घी का काम किया उस ने साहिबा को भगा कर. उस के अब्बू ने इस से बहुत ज्यादा शर्मिंदगी महसूस की. इसी की वजह उन्होंने 2 दिनों बाद ही मौलीजागरां का अपना निवास छोड़ दिया था और वहां से 20 किलोमीटर दूर जा कर कस्बा डेराबस्सी में किराए का मकान ले कर रहने लगे थे. उन्होंने उधर जाना ही छोड़ दिया था. शाहबाज को नौकरी की वजह से उधर जाना पड़ता था.

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जिस मीट की दुकान पर शाहबाज काम करता था, इरफान रोजाना उधर मुर्गे की सप्लाई करने आता था. लेकिन निकाह के बाद वह उधर दिखाई नहीं दिया था. पता चला कि निकाह के दिन से ही उस ने छुट्टी ले रखी है.

4 जून, 2016 की बात है. साहिबा से इरफान को निकाह किए 5 दिन हो गए थे. सुबह के 5 बजे शाहबाज दुकान पर पहुंच कर मुर्गा काटने वाला चाकू तेज कर रहा था. तभी मुर्गेवाली गाड़ी आ कर उस की दुकान से थोड़ी दूरी पर सड़क के किनारे रुकी. इरफान उतर कर गाड़ी के पीछे की ओर आया.

शाहबाज ने उसे आते देखा तो उसे देख कर उस की आंखों में खून उतर आया. उस के पास सोचनेविचारने का वक्त नहीं था. वह मीट काटने वाला चाकू ले कर तेजी से भागता हुआ इरफान के पास पहुंचा और जरा सी देर में उसे मौत के घाट उतार कर भाग गया.

पहले तो उस ने कब्रिस्तान के पास एक जगह चाकू को साफ कर के पत्थरों के नीचे छिपा दिया. उस के बाद बचने के लिए इधरउधर छिपता रहा. लेकिन पुलिस ने उसे पकड़ लिया. उस ने कहा कि इरफान ने काम ही ऐसा किया था, जिस से उसे मारने का कोई अफसोस नहीं है. इरफान ने जो किया था, उस की उसे यही सजा मिलनी चाहिए थी.

पूछताछ के बाद पुलिस ने शाहबाज को फिर से अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में बुड़ैल जेल भेज दिया गया.

बलदेव कुमार ने उस के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर समय से निचली अदालत में दाखिल कर दिया, जहां से सैशन कमिट हो कर 13 सितंबर, 2016 से मामले की सुनवाई चंडीगढ़ के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश अतुल कसाना की अदालत में शुरू हुई.

6 अक्तूबर को अदालत ने शाहबाज के खिलाफ धारा 302 का चार्ज फ्रेम कर दिया. उस ने अदालत में खुद को बेकसूर बताते हुए दरख्वास्त की थी कि पुलिस ने एक झूठी कहानी गढ़ कर इस केस में उसे बिना मतलब फंसा दिया है. वह अपने उन बयानों से भी मुकर गया, जो उस ने कस्टडी रिमांड के दौरान पुलिस को दिए थे.

मामले की विधिवत सुनवाई शुरू होते ही अभियोजन पक्ष ने डा. अमनदीप सिंह, डा. गौरव, मोहम्मद चांद, इंतजाम अली, अशोक कुमार, इंसपेक्टर बलदेव कुमार, फोटोग्राफर फूला सिंह, हवलदार सतनाम सिंह, रमेशचंद, धर्मपाल एवं यशपाल के अलावा सीनियर कांस्टेबल कृष्णकुमार, एसआई गुरमीत सिंह, एसआई गुरनाम सिंह और डा. मनदीप सिंह के रूप में 15 गवाह अदालत में पेश किए.

इस के बाद अतिरिक्त पब्लिक प्रौसीक्यूटर ने अभियोजन पक्ष की गवाहियों के पूरी होने के बाद सीआरपीसी की धारा 293 के तहत फोरैंसिक साइंस लैबोरेटरी की रिपोर्ट के अलावा विसरा रिपोर्ट भी पेश की.

अभियोजन पक्ष की काररवाई पूरी होने के बाद 20 जनवरी, 2017 को कोड औफ क्रिमिनल प्रोसीजर की धारा 313 के तहत अभियुक्त शाहबाज का स्टेटमैंट रिकौर्ड किया गया. अभियुक्त ने उक्त सभी गवाहों को झूठ करार देते हुए यही कहा कि वह बेकसूर है. उसे झूठा फंसाया गया है.

बचाव पक्ष की ओर से साहिबा को पेश किया गया. कोड औफ क्रिमिनल प्रोसीजर की धारा 315 के अधीन दर्ज अपने बयान में साहिबा ने अदालत को बताया कि उस ने इरफान से प्रेम विवाह किया था, जिस का परिवार वालों ने पहले तो विरोध किया, लेकिन बाद में मान गए थे.

इरफान ने उसे बताया था कि उस की कुछ गलत लोगों से ऐसी दुश्मनी हो गई है कि वे मौका मिलने पर उस की जान ले सकते हैं. ऐसे में हो सकता है, इरफान को उन्हीं लोगों ने मारा हो, न कि शाहबाज ने.

बचाव पक्ष की ओर से अशोक कुमार को अविश्वसनीय करार देते हुए अदालत ने उसे मुकरा गवाह घोषित करने की गुहार लगाई गई, जो अदालत ने मान भी ली. यह भी दलील दी गई कि पुलिस द्वारा बरामद चाकू पर डाक्टर की रिपोर्ट के मुताबिक मानवीय खून नहीं लगा था.

31 जनवरी, 2017 को विद्वान जज अतुल कसाना ने इस मामले का फैसला सुनाते हुए खुली अदालत में कहा कि उन्होंने दोनों पक्षों को ध्यानपूर्वक सुनने के अलावा सभी साक्ष्यों को गौर से जांचापरखा है, जिन से यह केस शीशे की तरह साफ है. अशोक कुमार को भले मुकरा गवाह करार दिया गया है, लेकिन उस की गवाही को नकारा नहीं जा सकता.

वह भी एक तरह से इस केस का चश्मदीद गवाह था. भले ही उस की गवाही में बाद में कुछ विपरीत बातें सामने आईं, जिस वजह से उसे मुकरा गवाह घोषित किया गया. लेकिन उस की शुरू की गवाही अभियोजन पक्ष को पूरी तरह मजबूती देने में सहायक सिद्ध हुई है.

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चाकू पर मानवीय खून का अंश होने की बात रिपोर्ट में पहले ही आ चुकी है. हालांकि अभियुक्त ने उसे फेंकने से पहले साफ कर दिया था. साहिबा को बचाव पक्ष ने गवाह के रूप में पेश कर के केस की दिशा बदलने का प्रयास किया. लेकिन उस की प्रेम विवाह वाली बात मान लेने से ही प्रौसीक्यूशन की कहानी को बल मिल जाता है.

लिहाजा यह अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में कामयाब रहा है और अभियुक्त शाहबाज खान मृतक मोहम्मद इरफान का कत्ल करने का दोषी पाया गया है. अभी वह जेल में है. सजा की बाबत सुनने के लिए उसे अगले दिन अदालत में पेश किया जाए.

अगले दिन शाहबाज को ला कर अदालत में पेश किया गया तो माननीय एडीजे अतुल कसाना ने उसे उम्रकैद के अलावा 10 हजार रुपए जुरमाने की सजा सुनाई.

– कथा अदालत के फैसले पर आधारित 

बेरोजगारी और मानसिकता

आंकड़ों के अनुसार देश में बेरोजगारी बढ़ रही है. सरकार के इस दावे के बावजूद कि भारत दुनिया की सब से तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है, बेरोजगारी के संकट में कोई कमी नहीं आने वाली. देश में छिपी बेरोजगारी तो बहुत ज्यादा है क्योंकि हमारे यहां 1 कमाए 5 खाएं की परंपरा आज भी चल रही है. बहुत से बेरोजगार आधाअधूरा काम कर के अपनेआप को कमाऊ मान लेते हैं.

बेरोजगारी बढ़ने की जिम्मेदार सरकार ही हो, जरूरी नहीं. किसी भी अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी की जड़ उस की उत्पादकता में होती है. यदि जनसंख्या उत्पादक होगी तो थोड़े से लोग बहुतों के लायक खाना, मकान, कपड़ा जुटा सकते हैं और बाकी व्यर्थ के विलासिता वाले कामों में लग कर अपने को कामकाजी मान सकते हैं, लेकिन यदि उत्पादकता कम होगी तो ज्यादा लोग उसी जमीन या उन्हीं कारखानों में लगेंगे और वे केवल अपने लायक ही सामान पैदा कर सकेंगे या बना सकेंगे.

अमीर देशों में प्रतिव्यक्ति उत्पादकता कृषि, औद्योगिक व सेवा क्षेत्रों में बहुत ज्यादा है और वहां जनसंख्या की 2 से 5 प्रतिशत लोगों की बेरोजगारी भी सरकार के लिए चिंता का विषय होती है. इस के उलट हमारे यहां स्पष्ट व अस्पष्ट बेरोजगारी के आंकडे़ भयावह हैं और गांवों में कृषि पर आधारित बेरोजगारी भी बढ़ रही है. इस का अर्थ है कि देश में ह्यूमन कैपिटल का बेहद नुकसान हो रहा है. देश की अर्थव्यस्था में 10 प्रतिशत से कम योगदान देने वाली कृषि पर 50 प्रतिशत आबादी निर्भर है.

कठिनाई यह है कि देश में सोच है कि यहां रोजगार उसे माना जाता है जहां बिना काम किए पैसा मिले. यहां सरकारी नौकरी ही सर्वोत्तम मानी जाती है चाहे उस का अर्थव्यवस्था के लिए कुछ लाभ न हो. यहां लूट के माल में बंटवारा सर्वोत्तम काम माना जाता है और वही सफल रोजगार माना जाता है जो मुफ्त की खा सके. यह हमारी उस पौराणिक संस्कृति की देन है जिस में काम करने वाले लोग समाज के सब से निम्न हैं और लूटने वाले पंडेपुजारी सब से ऊंचे.

इस समस्या का हल आसान नहीं है क्योंकि मानसिकता बदलने में कई पीढि़यां लगती हैं. अंगरेज हमें बदल नहीं पाए और हमारे नेताओं का तो कहना ही क्या है? वे तो लूट के देवताओं के पुजारी हैं.

VIDEO : फंकी लेपर्ड नेल आर्ट

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हार्दिक पंड्या को लेकर ये क्या कह गई उर्वशी रौतेला

बौलीवुड अभिनेत्रियों की अदाओं पर क्रिकेटर्स अक्सर ही क्लीन बोल्ड हो जाते हैं. अब तक कई क्रिकेटर का नाम बौलीवुड हीरोइनों से जुड़ चुका है. अब इस लिस्ट में एक और नाम शामिल हो गया है. जी हां, आज-कल क्रिकेटर हार्दिक पंड्या का नाम बौलीवुड हीरोइनों से जुड़ रहा है और वो पिछले कुछ समय से रिलेशनशिप की खबरों को लेकर चर्चा में हैं.

कुछ दिन पहले खबर आयी थी कि हार्दिक बौलीवुड अभिनेत्री एली अवराम के हाथों अपना दिल गंवा चुके हैं. वहीं अब चर्चा है कि उर्वशी रौतेला के साथ हार्दिक की नजदीकियां बढ़ रही हैं.

उर्वशी हाल ही में एक बिजनेसमैन की पार्टी में शामिल हुई थीं. पार्टी में उर्वशी और हार्दिक की मुलाकात हुई थी. हार्दिक के साथ उनके भाई भी मौजूद थे. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पार्टी में उर्वशी और हार्दिक के बीच केमिस्ट्री भी देखने को मिली. हालांकि, उर्वशी ने शेयर की गई फोटो में क्रिकेटर को भाई बता दिया.

उर्वशी ने अपने इंस्टाग्राम एकाउंट पर एक फोटो शेयर किया. फोटो में उर्वशी हार्दिक और उनके भाई क्रुणाल के साथ हैं और कैप्शन में लिखा है- ”भाई के प्यार से बढ़कर कोई दूसरा प्यार नहीं है. मुझे अपने भाई यशराज रौतेला की याद आ रही है. पंड्या भाई. फोटो में हार्दिक बंधुओं को टैग करते हुए उर्वशी ने आईपीएल के लिए शुभकामनाएं भी दी हैं.”

दरअसल, पिछले कुछ समय से हार्दिक और उर्वशी के रिलेशनशिप की खबरें आ रही थीं. हालांकि, उर्वशी की पोस्ट से लव स्टोरी में एक नया मोड़ आ गया है. इस पोस्ट के बाद उर्वशी और हार्दिक के रिश्ते पर चर्चा होने लगी और हार्दिक के साथ उनके डेटिंग करने की अफवाहों पर विराम लग गया.

मेरी निम्मो : एक बेहतरीन बाल फिल्म

बाल हठ और बाल प्रेम की इस कहानी के केंद्र में हैं-आठ वर्ष का बालक हेमू (करण दवे) और युवा लड़की निम्मो( अंजली पाटिल). आठ वर्षीय बालक हेमू को निम्मो से प्यार हो जाता है. कहानी जबलपुर, मध्यप्रदेश के एक गांव की है. इस गांव के लोग आपस में एक परिवार की तरह रहते हैं. हेमू के पिता नहीं है. उसकी मां काम करती है.

गांव के एक अन्य परिवार की लड़की निम्मो, हेमू की देखभाल करती है. हेमू जब स्कूल से आता है, तो उसे स्नान कराकर उसे खाना खिलाने का काम निम्मो ही करती है. हेमू भी निम्मो के साथ हर जगह जाता है. निम्मो अकेले कहीं नहीं जाती. हेमू चित्रकारी करने में माहिर है. निम्मो की बहनों को भी जब स्कूल के किसी प्रोजेक्ट के लिए चित्रकारी करवानी होती है, तो वह हेमू को ही पकड़ती है. एक दिन निम्मो की शादी तय हो जाती है, तो हेमू का एक दोस्त उससे कहता है कि निम्मो उससे बहुत प्यार करती है, मगर वह हेमू से ‘वह’ वाला प्यार नहीं करती. क्योंकि हेमू, निम्मो से बहुत छोटा है. इसीलिए निम्मो शादी करके इस गांव से जाने वाली है.

उसके बाद हेमू एक बदलाव आने लगता है. वह जब भी निम्मो के पास होता है, तो कुछ अलग कल्पना करने लगता है. धीरे धीरे हेमू, निम्मो से प्यार करने लगता है. हेमू पर ‘बड़ा’ होने का भूत सवार होता है. यहां तक कि सगाई के वक्त जब निम्मो के पति को बेड़ाघाट घुमाने हेमू ले जाता है, तो वह निम्मो के होने वाले पति से कह देता है कि निम्मो से उसकी शादी नहीं हो पाएगी. उसके बाद जब निम्मो मंदिर पूजा करने जाती है, तो हेमू भी साथ में जाता है और चाहता है कि निम्मो की शादी टूट जाए.

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इतना ही नहीं एक दिन हेमू, निम्मो को रूद्राक्ष, एक बटन और मैगनेट को धागे में पिरोकर मंगलसूत्र बनाकर पहना देता है. जबकि हेमू की मां और निम्मो के माता पिता व बहनों को निम्मो व हेमू पर पूरा विश्वास है. इसलिए मंगलूसत्र की इस घटना को सभी हेमू का बचपना समझते हैं.

उधर गांव का एक लड़का महेंद्र की निगाहें निम्मो पर है. पर महेंद्र ही नहीं महेंद्र के माता पिता भी जानते हैं कि महेंद्र की आदतों के चलते निम्मों के माता पिता निम्मो की शादी महेंद्र के साथ कभी नहीं करेंगे. इसी बीच महेंद्र कुछ ऐसी हरकत करता है कि निम्मो नाराज होकर हेमू से कहती है कि महेंद्र नीच है. उसके साथ न रहा करे. तब हेमू, महेंद्र को सबक सिखाने के लिए बाल सुलभ ऐसी हरकत करता है, जिसकी सजा के तौर पर महेंद्र को उसके पिता पढ़ने के लिए गांव से बाहर होस्टल भेज देते हैं.

इधर हेमू से निम्मो कह देती है कि वह शादी नहीं कर रही है. कुछ दिन बाद शादी टूटने की खबर आती है, तो हेमू को लगता है कि ईश्वर ने उसकी सुन ली. अब हेमू अपनी मां से कहता है कि उसकी शादी निम्मो से करा दे. मां उसे समझाती है कि निम्मो से उसकी शादी नहीं हो सकती, वह तो बहुत छोटा है. पर अब हेमू नाराज रहने लगता है. वह निम्मो की बात नहीं सुनता.

अंततः निम्मो की शादी टूटने की खबर गलत निकलती है. निम्मो की शादी हो जाती है. मासूम हेमू का दिल टूट जाता है. वह बाल हठ में कुछ उल्टी सीधी हरकतें भी करता है. विदाई के वक्त वह निम्मो से नहीं मिलना चाहता. जबरन मिलाया जाता है. फिर वह भागकर अपने दोस्तों के सग क्रिकेट खेलने चला जाता है.

कुछ फिल्मो में आनंद एल राय के सहायक रहे राहुल गनोर शंकाल्य की बतौर लेखक व निर्देशक पहली फिल्म है. उन्होंने फिल्म में कुछ दृश्य बहुत अच्छे ढंग से रचे हे. मसलन एक दृश्य है, जहां बच्चे बल्ब की रोशनी में शाहरुख खान की फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ देख रहे हैं. एक दृश्य है जहां हेमू फिल्म के कुछ दृश्यों की नकल करते हुए निम्मों के साथ चिपकता है. मंगलसूत्र पहनाने का दृश्य भी अच्छा बना है. निर्देशक ने फिल्म के लिए लोकेशन भी कहानी के अनुरूप ही चुनी है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो बाल कलाकार करण दवे ने कमाल का अभिनय किया है. पूरी फिल्म में वह बहुत प्यारा लगा है. उसके बाल हठ वाली हकरतें भी ध्यान खींचती हैं. धीरे धीरे उसे प्यार व बड़े होने का मतलब भी समझ में आता है. निम्मो के किरदार में अंजली पाटिल ने भी जानदार अभिनय किया है.

यह फिल्म 27 अप्रैल से डिजिटल माध्यम ‘ईरोज नाउ’ पर उपलब्ध होगी. लगभग डेढ़ घंटे की अवधि वाली फिल्म ‘‘मेरी निम्मो’’ के निर्माता आनंद एल राय, निर्देशक राहुल गनोर शंकाल्य तथा कलाकार हैं-अंजली पाटिल,करण दवे व अन्य.

नारी खतना : क्या है वास्तविकता

विश्वभर में नारी के अधिकारों व उन के विकास की चर्चा है. उन के सम्मान में विश्व में 8 मार्च को महिला दिवस मनाया जाता है. नारी सम्मान की चर्चा के बीच हैरानी यह है कि कई देशों में नारी खतना जैसी क्रूर प्रथा जारी है. यह प्रथा नारी विकास को अंगूठा दिखाती साबित हो रही है. यह प्रथा आज भी इंडोनेशिया व कई अफ्रीकी देशों के पिछड़े इलाकों और कबीलाई क्षेत्रों में चलन में है.

संकीर्ण मानसिकता

इस में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि यह प्रथा नारी को शारीरिक व मानसिक क्षति पहुंचाती है. इस की असहनीय पीड़ा नारी को जीवनपर्यंत झेलनी पड़ती है. पति के प्रति वफादार बने रहने की पुरुषों की संकीर्ण मानसिकता ने इस प्रथा को जन्म दिया है.

इस प्रथा के समर्थकों का इस विषय पर कहना है कि उन के जीवन में उन की अपनी संस्कृति का बहुत महत्त्व है. अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो पश्चिमी संस्कृति के गुलाम बन जाएंगे. भले ही इस कारण लाखों नारियों को असहनीय पीड़ा झेलनी पड़े. धिक्कार है ऐसी पुरुषवादी सोच पर जो हर समस्या की जड़ नारी को ही मानती है.

क्या है नारी खतना

नारी खतना को अंगरेजी में फीमेल जैनिटल म्यूटिलेशन यानी एफजीएम कहते हैं. इस के अंर्तगत नारी के जननांगों के क्लिटोरिस (जिसे भगनासा भी कहते हैं) का तकरीबन सारा भाग काट दिया जाता है, केवल मूत्रत्याग और मासिकधर्म के लिए छोटा सा द्वार छोड़ दिया जाता है.

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इसलाम में खतना प्रथा

खतना एक स्वीकार्य प्रथा है जो केवल पुरुष खतना के नाम से जानी जाती है. इसे इसलाम में सही भी कहा जाता है. यह एक प्रकार की शल्यक्रिया होती है, जिसे अच्छे स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से किया जाता है. यइ इसलाम से पहले भी अफ्रीका में होती रही है. सर्वप्रथम इस प्रथा का विवरण हमें रोमन साम्राज्य और मिस्र की प्राचीन सभ्यता में देखने को मिलता है.

इसलाम धर्म में जिस पुरुष का खतना नहीं होता वह मुसलमान नहीं कहलाता है. यही कारण है कि लगभग हर देश में मुसलमानों द्वारा अपनाई जाने वाली यह एक साधारण प्रक्रिया है.

अक्षत योनि की लालसा

इस में कोई संदेह नहीं है कि इस प्रथा की उत्पत्ति पुरुषवादी मानसिकता के कारण हुई है. पुरुष नारी को केवल भोग्या और संतानोत्पत्ति का माध्यम समझता है.

नारी की विवाह से पूर्व तक, अक्षत योनि बने रहे और वह विवाह से पूर्व किसी अन्य पुरुष से शारीरिक संबंध स्थापित न कर पाए, विवाह के बाद वह केवल अपने पति को यौनसंतुष्टि प्रदान करे. यही विशेष कारण रहा कि कुछ खुदपरस्त बाहुबली कठमुल्लाओं ने इसलाम धर्म की आड़ में इस प्रथा को विस्तार दिया.

इस प्रथा को मानने वाले देशों के पिछड़े इलाकों से संबंध रखने वाले अशिक्षित व बहुत गरीब हैं. उन की गरीबी व अज्ञानता का अवसरवादी लोग नाजायज फायदा उठाते हैं.

क्या है वास्तविकता

हमेशा से विवादास्पद नारी खतना की प्रथा को धर्म से जोड़ कर देखा जाता रहा है जबकि वास्तविकता में इस का धर्म से कोई लेनादेना नहीं है.

बड़े अफसोस के साथ इस बात को स्वीकारना होगा कि इस अमानवीय कुप्रथा को बढ़ावा देने में खुद नारीवर्ग अहम भूमिका निभाता है.

एक नारी की दूसरी नारी के प्रति द्वेष की भावना का ही परिणाम है कि इस प्रथा को नारी आधार प्रदान कर रही है. मां के न चाहने पर भी घर की बड़ीबुजुर्ग औरतें, जो दादी, नानी, चाची, ताई आदि होती हैं, बेटियों का जबरन खतना करवा देती हैं. इस प्रकार वे अपने साथ हुए शोषण का बदला लेती हैं. वे अपनी पोती, नातिन, भतीजी को जीवनभर असहनीय पीड़ा झेलने को विवश कर देती हैं.

जागरूकता की जरूरत

वर्तमान में नारी खतना की प्रथा के खिलाफ पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई ने ब्रिटेन में महिला जननांग विकृति के विरुद्ध छेड़े गए अभियान का समर्थन किया है.

वास्तव में यह नारी के प्रति होने वाली आपराधिक घटनाओं में से एक जघन्य अपराध है. वहीं, यह मानवाधिकारों का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन भी है. इस समस्या के समाधान के लिए व्यापक जागरूकता की आवश्यकता है. इस नृशंस प्रथा का अंत होना बहुत जरूरी है.

अब वक्त आ गया है कि नारी को नारी खतना जैसी वीभत्स प्रथा से मुक्ति मिले और धर्म के नाम पर नारी का शोषण पूरी तरह खत्म किया जाए.

VIDEO : प्रियंका चोपड़ा लुक फ्रॉम पीपुल्स चॉइस अवार्ड मेकअप टिप्स

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बुढ़ापे का इश्क : चंपा ने पूरी की मदन की इच्छा

संजय वर्मा का परिवार दिल्ली के हुमायूंपुर में रहता था, लेकिन उस के पिता मदनमोहन वर्मा रिटायरमेंट  के बाद उत्तरपूर्वी दिल्ली के भजनपुरा में अकेले ही रहते थे. पिता और पुत्र अपनीअपनी दुनिया में मस्त थे.

22 जुलाई, 2017 की सुबह भजनपुरा में मदनमोहन के पड़ोस में रहने वाले विजय ने संजय वर्मा को फोन कर के बताया, ‘‘आप के पिता के कमरे का कल सुबह से ताला बंद है. उन के कमरे से तेज बदबू आ रही है.’’

विजय की बात सुन कर संजय वर्मा को पिता की चिंता हुई. उन्होंने उसी समय पिता का नंबर मिलाया, तो उन का फोन स्विच्ड औफ मिला. फोन बंद मिलने पर उन की चिंता और बढ़ गई. इस के बाद वह भजनपुरा के सी ब्लौक स्थित अपने पिता के तीसरी मंजिल स्थित कमरे पर पहुंच गए.

संजय को भी पिता के कमरे से तेज दुर्गंध आती महसूस हुई. उस के मन में तरहतरह की आशंकाएं आने लगीं. कहीं उन के साथ कोई अनहोनी तो नहीं घट गई, यह सोच कर उस ने अपने मोबाइल फोन से दिल्ली पुलिस के कंट्रोलरूम को फोन कर के पिता के बंद कमरे से आ रही बदबू की सूचना दे दी. यह क्षेत्र थाना भजनपुरा के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोलरूम से यह सूचना थाना भजनपुरा को प्रेषित कर दी गई.

सूचना पा कर एएसआई हरकेश कुमार हैडकांस्टेबल सतेंदर कुमार को अपने साथ ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. जैसे ही वह भजनपुरा के सी ब्लौक स्थित मकान नंबर 412 की तीसरी मंजिल पर पहुंचे, वहां बालकनी पर कुछ लोगों की भीड़ लगी दिखाई दी. उन्हीं के बीच संजय परेशान हालत में मिला.

एएसआई हरकेश कुमार को अपना परिचय देते हुए संजय ने बताया, ‘‘सर, मैं ने ही पीसीआर को फोन किया था.’’

जिस कमरे से बदबू आ रही थी, उस के बाहर ताला लगा था. इस से उन्होंने सहज ही अनुमान लगा लिया कि जरूर कोई अप्रिय घटना घटी है. इसलिए उन्होंने इस की जानकारी थानाप्रभारी अरुण कुमार को दे दी.

कुछ ही देर में थानाप्रभारी अन्य स्टाफ के साथ वहां आ पहुंचे. कमरे के बाहर लटके ताले की चाबी संजय के पास नहीं थी, इसलिए पुलिस ने ताला तोड़ दिया. दरवाजा खुलते ही दुर्गंध का झोंका आया. पुलिस कमरे में दाखिल हुई तो पूरब दिशा की ओर की दीवार से सटे दीवान के अंदर एक अधेड़ आदमी की सड़ीगली लाश एक कार्टून में बंद मिली.

लाश देख कर संजय रोने लगा, क्योंकि वह लाश उस के पिता मदनमोहन वर्मा की थी. अरुण कुमार ने मौके पर क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को भी बुला लिया. क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम का काम निपट गया तो पुलिस लाश का निरीक्षण करने लगी. मृतक के सिर के पीछे चोट का गहरा निशान था.

दीवान के बौक्स में और उस के नीचे कमरे के फर्श पर खून फैला था, जो सूख चुका था. इस से अनुमान लगाया कि यह हत्या 2-3 दिन पहले की गई थी. कमरे में मौजूद सारा सामान अपनी जगह मौजूद था. इस से इस बात की पुष्टि हो गई कि हत्यारे का मकसद लूटपाट नहीं था.

हत्या क्यों की गई, यह जांच के बाद ही पता चल सकता था. पुलिस ने मौके की जरूरी काररवाई निपटाने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए जीटीबी अस्पताल भेज दिया. इस के बाद थाने आ कर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. इस मामले की जांच अतिरिक्त थानाप्रभारी राजीव रंजन को सौंपी.

इंसपेक्टर राजीव रंजन ने इस हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने के लिए संभावित सुराग की तलाश में दोबारा घटनास्थल का निरीक्षण किया. उन्होंने मृतक के बेटे संजय वर्मा और वहां रहने वाले पड़ोसियों से काफी देर तक पूछताछ की. पड़ोसी विजय ने बताया कि उन्होंने आखिरी बार मदनमोहन वर्मा को 20 जुलाई की रात साढ़े 10 बजे कमरे के बाहर देखा था.

संजय ने उन्हें बताया था कि उस के पिता शुरू से ही अलग मिजाज के व्यक्ति थे. घर के लोगों में वह ज्यादा रुचि नहीं लेते थे. रिटायरमेंट के बाद बेटे और बहुओं के होते हुए भी वह यहां भजनपुरा में अलग रहते थे. उन की देखभाल करने नौकरानी चंपा आती थी. वह घर की साफसफाई, खाना बनाने के साथ उन के कपड़े भी धोती थी.

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नौकरानी चंपा का जिक्र आते ही इंसपेक्टर राजीव रंजन उस में रुचि लेने लगे. उन्होंने विजय को थाने में बुला कर पुन: पूछताछ की. उन्होंने नौकरानी के स्वभाव और उस के मदनमोहन के यहां आने और घर जाने के समय के बारे में पूछा. विजय ने बताया कि चंपा मदनमोहन वर्मा के काफी करीब थी. जिस दिन से उन के दरवाजे के बाहर ताला लगा था, पिछली रात को नौकरानी चंपा के जवान बेटे प्रेमनाथ को एक अन्य लड़के के साथ मकान के नीचे टहलते देखा था.

इंसपेक्टर राजीव रंजन विजय से चंपा का पता हासिल कर वह करावलनगर स्थित उस के घर पहुंच गए. चंपा और उस का पति कल्लन घर पर ही मिल गए.

इंसपेक्टर राजीव रंजन ने चंपा से पूछताछ की तो उस ने बताया, ‘‘कल सुबह मदनमोहन वर्मा के यहां काम करने गई थी, लेकिन कमरे का दरवाजा बंद होने के कारण लौट आई थी.’’

उस वक्त चंपा का बेटा प्रेमनाथ घर पर मौजूद नहीं था. राजीव रंजन चंपा से उस के बेटे का मोबाइल नंबर ले कर थाने आ गए.

अगले दिन जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो पता चला कि मदनमोहन का पहले गला घोंटा गया था, उस के बाद में सिर पर घातक चोट पहुंचाई गई थी. इस से इंसपेक्टर राजीव रंजन सोचने लगे कि ऐसी क्रूर हरकत तो कोई दुश्मन ही कर सकता है. यह दुश्मन कौन हो सकता है?

जांच में पुलिस को पता चला था कि सरकारी नौकरी के रिटायर होने के बाद का सारा पैसा मदनमोहन के बैंक एकाउंट में जमा था. वह किसी से पैसा न तो उधार लेते थे और न ही किसी को देते थे. और तो और, बेटों को भी उन्होंने उस में से कोई रकम नहीं दी थी.

राजीव रंजन ने चंपा के बेटे प्रेमनाथ का नंबर मिलाया तो वह स्विच्ड औफ मिला. इस से उन्हें उस पर शक हुआ. उस का नंबर सर्विलांस पर लगाने और काल डिटेल्स रिपोर्ट निकलवाने पर पता चला कि घटना वाली रात उस के फोन की लोकेशन उसी इलाके की थी, जहां मदनमोहन वर्मा रहते थे.

फिलहाल उस की लोकेशन उत्तर प्रदेश के मथुरा शहर की थी. प्रेमनाथ के बारे में गुप्तरूप से पता किया गया तो जानकारी मिली कि वह नशेड़ी होने के साथसाथ एक बार जेल भी जा चुका था. भजनपुरा थाने की एक पुलिस टीम प्रेमनाथ की तलाश में मथुरा भेजी गई. पुलिस टीम मथुरा पहुंची तो खबर मिली कि प्रेमनाथ दिल्ली चला गया है. पुलिस ने 24 जुलाई को मुखबिर की सूचना पर प्रेमनाथ को करावलनगर, दिल्ली के कजरी चौक से हिरासत में ले लिया.

थाने में जब उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने अपने एक दोस्त के साथ मिल कर मदनमोहन वर्मा की हत्या की थी. उस ने हत्या की जो वजह बताई, वह इस प्रकार थी—

मदनमोहन वर्मा सपरिवार दिल्ली के सफदरजंग एनक्लेव के पास हुमायूंपुर में रहते थे. उन का भरापूरा परिवार था. उन के परिवार में पत्नी यशोधरा के अलावा 3 बेटे और एक बेटी थी. बड़ा बेटा संजय वर्मा है, जो दिल्ली की एक प्राइवेट फर्म में नौकरी करता है.

मदनमोहन वर्मा मिंटो रोड स्थित गवर्नमेंट प्रैस में नौकरी करते थे. अच्छे पद पर होने की वजह से उन के घर की आर्थिक स्थिति ठीकठाक थी. घर में सब कुछ होने के बावजूद वह परिवार के सदस्यों में कम रुचि लेते थे. पत्नी यशोधरा से भी उन का रिश्ता बहुत अच्छा नहीं था. दांपत्य जीवन में पति की बेरुखी यशोधरा को हमेशा परेशान करती रही.

वह चाहती थीं कि पति घरपरिवार की जरूरतों को समझें. बेटों के सुखदुख के मौके पर उन का साथ दें. पर उन की यह ख्वाहिश कभी पूरी नहीं हो सकी. आखिरकार पति की बेजा हरकतों और दांपत्य जीवन की कड़वाहट से तंग आ कर 4 साल पहले उन्होंने अपने कमरे में पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली.

उन की मौत के बाद मदनमोहन वर्मा ने घरेलू कामकाज के लिए नौकरानी चंपा को 9 हजार रुपए वेतन पर रख लिया. गोरे रंग और भरे बदन की चंपा की उम्र करीब 35 साल थी. वह सुबह 9 बजे उन के घर आती और सारा काम निपटा कर शाम को अपने घर चली जाती.

चंपा के काम से घर के सारे सदस्य संतुष्ट थे. कभीकभार चंपा को रुपएपैसों की जरूरत होती तो मनमोहन उस की मदद कर देते थे. बाद में वह चंपा पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो गए. वह उस से कुछ ज्यादा ही हमदर्दी जताने लगे. चंपा भी अपने मालिक के दयालु स्वभाव से खुश थी.

जिस दिन मदनमोहन औफिस से जल्दी घर आ जाते या उन की छुट्टी होती तो चंपा बहुत खुश रहती. वह पूरे दिन उन के आसपास ही मंडराती रहती. घर के सदस्यों को चंपा की ये हरकतें नागवार गुजरने लगीं. संजय ने चंपा से साफ कह दिया कि वह पापा के कमरे में ज्यादा न जाया करे.

चंपा को नौकरी करनी थी, इसलिए उस ने संजय की बात मानते हुए उन के कमरे में आनाजाना कम कर दिया. मदनमोहन को इस बात का पता नहीं था कि चंपा को उन के  कमरे में आने के लिए रोक दिया गया है.

जब मदनमोहन को महसूस हुआ कि चंपा उन से दूर रहने लगी है तो एक दिन उन्होंने उस से पूछ लिया. तब चंपा ने बताया, ‘‘आप के बेटे और बहुओं की नाराजगी की वजह से मैं ने यह दूरी बनाई है.’’

चंपा की बात सुन कर मदनमोहन वर्मा को अपने परिवार वालों पर गुस्सा बहुत आया. वह अपने घर वालों के प्रति और कठोर हो गए. करीब 1 साल पहले जब वह रिटायर हुए तो उन्होंने घर में यह कह कर सब को चौंका दिया कि अब वह उन लोगों से अलग भजनपुरा में अकेले ही रहेंगे.

उन्होंने भजनपुरा में किराए पर कमरा ले भी लिया. रिटायरमेंट के बाद उन्हें करीब 20 लाख रुपए मिले थे. इस में से उन्होंने अपने बेटों को कुछ भी नहीं दिया, जबकि तीनों बेटों और बहुओं को उम्मीद थी कि ससुर के रिटायरमेंट के बाद जो पैसे मिलेंगे, उस में से कुछ उन्हें भी मिलेंगे.

मदनमोहन का तुगलकी फैसला सुन कर बेटों ने उन्हें समझाने की कोशिश की, पर उन के दिमाग में तो कुछ और ही खिचड़ी पक रही थी. दरअसल, उन के दिमाग में चंपा का यौवन मचल रहा था. अब वह अपनी बाकी की जिंदगी चंपा के साथ गुजारना चाहते थे. चंपा की खातिर उन्होंने खून के सभी रिश्तेनातों को दूर कर दिया.

इस उम्र में मदनमोहन के इस फैसले से उन के बेटों की कितनी बदनामी होगी, इस बात की भी उन्हें परवाह नहीं थी. उन्होंने किसी की एक नहीं सुनी और बेटों का साथ छोड़ कर भजनपुरा के सी-ब्लौक में कमरा ले कर अकेले रहने लगे.

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चंपा भजनपुरा के पास स्थित करावलनगर में रहती थी. उस के परिवार में पति कल्लन के अलावा बेटे भी थे. मूलरूप से मथुरा का रहने वाला कल्लन कामचोर प्रवृत्ति का था. हरामखोर कल्लन बीवी की कमाई पर ऐश कर रहा था. जब कभी उसे पैसों की जरूरत होती, वह चंपा को ही मालिक से कर्ज मांगने के लिए उकसाता था.

अब चंपा रोज सुबह मदनमोहन के भजनपुरा स्थित कमरे पर आती और सारा दिन वहां का काम निपटा कर शाम को घर जाती थी. कुछ दिनों तक तो ऐसे ही चला, पर जब वह रात में भी वह मदनमोहन के कमरे में रुकने लगी तो आसपड़ोस के लोगों के बीच उन के रिश्तों को ले कर तरहतरह की चर्चाएं होने लगीं.

कुछ लोगों ने उस के पति कल्लन को भी उस की हरकतों की जानकारी दी, पर कल्लन को तो पहले से ही सब कुछ पता था. इसलिए उस ने लोगों की बातों को अनसुना कर दिया. इस तरह चंपा और मदनमोहन मौजमस्ती करते रहे.

धीरेधीरे चंपा के पड़ोसियों को भी पता चल गया कि चंपा ने किसी बुड्ढे को फांस लिया है. इस के बाद चंपा और मदनमोहन की चर्चा चंपा के मोहल्ले में होने लगी. चंपा का बेटा प्रेमनाथ 21 साल का हो चुका था. वह अब कोई बच्चा नहीं था, जो मोहल्ले के लोगों की बातों को न समझता.

कोईकोई तो उसे यह तक कह देता कि तेरे 2-2 बाप हैं. प्रेमनाथ कुछ करताधरता नहीं था. साथियों के साथ गांजा और कई अन्य नशे करता था. वह अपनी मां के मदनमोहन वर्मा की रखैल होने के ताने सुनसुन कर परेशान रहने लगा था. धीरेधीरे बात बरदाश्त से बाहर होती जा रही थी.

एक दिन तो एक दोस्त ने उस पर तंज कसते हुए कहा, ‘‘अरे तुझे कामधंधे की क्या चिंता है, तेरे तो 2-2 बाप हैं. तुझे भला किस बात की कमी है?’’

दोस्त की यह बात प्रेमनाथ के कलेजे में नश्तर की तरह चुभी. जवानी का खून उबाल मारने लगा. उस ने अपने एक नाबालिग दोस्त सुमित (बदला हुआ नाम) को अपना सारा दर्द बताते हुए कहा, ‘‘सारे फसाद की जड़ बुड्ढा मदनमोहन वर्मा है. उसी के कारण लोग मुझे ताना देते हैं. अगर तुम मेरा साथ दो तो मैं आज ही उसे ठिकाने लगा दूं.

इस उम्र की दोस्ती बड़ी खतरनाक होती है. दोस्त का दुख अपना दुख होता है. प्रेमनाथ की बात सुन कर सुमित उस का साथ देने को तैयार हो गया. 20 जुलाई, 2017 की रात दोनों दोस्त पूर्व नियोजित योजना के अनुसार, मदनमोहन के घर के आसपास तब तक चक्कर लगाते रहे जब तक कि वहां लोगों की लाइटें बंद नहीं हो गईं.

सड़क से मदनमोहन का कमरा साफ दिखाई देता था. जब मदनमोहन के पड़ोसी कमरा बंद कर के सोने चले गए तो दोनों नशा कर के सीढि़यों से तीसरी मंजिल स्थित मदनमोहन के कमरे के सामने पहुंच गए. उस रात अत्याधिक गरमी होने के कारण मदनमोहन ने कमरे का दरवाजा खोल दिया था. वह सोने की तैयारी में थे.

वह प्रेमनाथ को जानते थे, क्योंकि 2-3 बार वह मां के साथ उन के कमरे पर आ चुका था. इतनी रात को प्रेमनाथ को अपने कमरे के बाहर देख कर मदनमोहन कांप उठे. हिम्मत जुटा कर उन्होंने उसे बाहर जाने के लिए को कहा. लेकिन प्रेमनाथ और सुमित ने 61 साल के मदनमोहन वर्मा को संभलने का मौका दिए बगैर साथ लाया अंगौछा उस की गरदन में लपेट कर दोनों ने पूरी ताकत से कस दिया.

मदनमोहन ने बचने के लिए हाथपांव मारे, लेकिन उन की कोशिश नाकाम रही. कुछ ही देर में उन की मौत हो गई. वह जीवित न बच जाएं, इसलिए प्रेमनाथ ने वहां पड़ा डंडा उठा कर उन के सिर पर मारा, जिस से सिर से खून बहने लगा.

इतना करने के बाद उन्होंने लाश को कमरे में रखे एक कार्टून में बंद कर के उसे दीवान के बौक्स में रख दिया और बाहर आ गए. प्रेमनाथ ने दरवाजे में ताला लगाया और नीचे उतर कर दोनों फरार हो गए.

अतिरिक्त थानाप्रभारी राजीव रंजन ने पूछताछ के बाद प्रेमनाथ को 25 जुलाई को अदालत में पेश कर एक दिन के रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में उस से वह अंगौछा भी बरामद कर लिया गया, जिस से मदनमोहन वर्मा का गला घोंटा गया था. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. अगले दिन पुलिस ने उस के साथी सुमित को भी गिरफ्तार कर उसे बाल न्यायालय में पेश कर उसे बाल सुधार गृह भेज दिया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

चुनाव आयोग बना सरकारी

पहले गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए नरेंद्र मोदी के कहने पर तारीखें देने में ढीलढाल कर और उस से पहले दिल्ली के 20 विधायकों की सदस्यता रद्द करने में जल्दबाजी दिखा कर चुनाव आयोग ने अपनी साख को गहरा धक्का लगा लिया है. सरकार की आंखों का तारा बने रहने की इच्छा हरेक की होती है और अकसर लोग अपने महत्त्वपूर्ण पद की गरिमा का ध्यान न रखते हुए भी किसी पक्ष का साथ दे देते हैं.

चुनाव आयोग ने 2016 में दिल्ली के 20 विधायकों की सदस्यता रद्द कर दी थी कि अरविंद केजरीवाल की सरकार ने उन्हें संसदीय सचिव नियुक्त कर दिया था. चुनाव आयोग के इस फैसले से भाजपा को लाभ होना था क्योंकि नरेंद्र मोदी की 2014 के लोकसभा चुनाव में भारी जीत के तुरंत बाद अरविंद केजरीवाल ने 67-3 से विधानसभा चुनाव जीत कर भाजपा के रंग में भंग डाल दिया था.

अब दिल्ली उच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग का फैसला पलट दिया है और चुनाव आयोग को मनमानी करने पर फटकार भी लगाई है. मामला हालांकि फिर चुनाव आयोग की गोद में चला गया है पर पूरी प्रक्रिया जब तक चलेगी तब तक 2019 के लोकसभा चुनाव आ जाएंगे और 20 विधायकों पर फैसला चाहे जो भी हो, वह बेकार हो जाएगा.

इस मामले में अफसोस इस बात का है कि जिस चुनाव आयोग ने बड़ी मुश्किल से संवैधानिक स्वतंत्रता पाई थी उस ने यह स्वतंत्र छवि अपने हाल के फैसलों से खो दी और लगने लगा है कि यह संस्था अब केंद्र की भाजपाई सरकार के इशारे पर नाच रही है.

सुप्रीम कोर्ट पर आज वैसे भी शक हो रहा है क्योंकि 4 जजों ने खुल्लमखुल्ला प्रैस कौन्फ्रैंस कर के पहली बार न्यायिक तंत्र के अन्यायपूर्ण रवैए को जनता के सामने खोल डाला है.

लोकतंत्र में भारी विजय एक बात है पर इस विजय का दुरुपयोग करते हुए देश की विश्वसनीय संस्थाओं को कमजोर कर रूस और चीन की तरह देश में लोकतंत्र की हत्या करना किसी तरह से भी ठीक नहीं है. ये संस्थाएं केवल कुशल, लोकप्रिय प्रशासनिक प्रबंध के लिए जरूरी ही नहीं हैं, बल्कि इन्हीं के सहारे देश की प्रगति संभव है.

चुनाव आयोग और न्यायालय जैसी स्वतंत्र संस्थाओं पर सरकार अंकुश लगाएगी तो उन की स्वतंत्रता खत्म हो जाएगी. ऐसे में देशवासी इन संस्थाओं पर भी विश्वास नहीं कर सकेंगे. सो, वे पूरा काम न करेंगे, न पूरा टैक्स देंगे, न भविष्य की सोचेंगे.

जब भी किसी समाज या देश में कल के बारे में संदेह होता है, तो लोग 5, 10 या 15 साल में परिणाम देने वाले काम नहीं करते. सोवियत संघ लगातार पिछड़ता चला गया था क्योंकि भारी जनशोषण के चलते वहां के नागरिक अपनी पूरी क्षमता, पूरे विश्वास से काम न कर सके थे.

चीन का नागरिक फिलहाल मेहनत कर रहा है क्योंकि उसे यह विश्वास है कि सरकार चीन को गरीब, पिछड़े, भिखारी देश के अपमानित स्थान से निकाल रही है. चीनी 10-15 या 20 सालों की सोच रहे हैं क्योंकि उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी की निष्ठा पर भरोसा है. हम भारत में सत्तारूढ़ पार्टी की निष्ठा पर विश्वास नहीं कर सकते कि वह हर नागरिक को बराबर समझती है, बराबर के अवसर देने को तैयार है.

हमारा विश्वास देश की स्वतंत्र संस्थाओं में है और इसीलिए सत्तारूढ़ पार्टी कोशिश कर रही है कि ये संस्थाएं कमजोर हों. यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन, आर्केयोलौजिकल सर्वे औफ इंडिया हो, साहित्य अकादमी हो, चुनाव आयोग हो या अदालतें, आज सब पर प्रश्नचिह्न लग रहा है तो भारत जैसे विविध जातियों वाले देश में असुरक्षा का एहसास होगा ही.

उच्च न्यायालय के फैसले से चुनाव आयुक्त और राष्ट्रपति जैसे सम्मानित पदों की छवि को धक्का लगा है. आज ये दोनों मोहरे नजर आ रहे हैं, अंधे मोहरे.

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फिल्म “संजू” में रणबीर को देख इनसिक्योर हुए संजय दत्त

निर्देशक राजकुमार हिरानी अपनी अपकमिंग फिल्म ‘संजू’ के साथ बौक्स औफिस में धमाका करने के लिए एक बार फिर से तैयार हैं, संजय दत्त के जीवन पर आधारित फिल्म ‘संजू’ इन दिनों चर्चा में है. फिल्म का टीजर 24 अप्रैल यानी मंगलवार को रिलीज हो चुका है. फिल्म में रणबीर कपूर लीड रोल में नजर आ रहे हैं.

फिल्म का टीजर रिलीज होते ही दर्शकों के बीच छा गया है, रणबीर कपूर को देखकर पहचाना मुश्किल है कि वह संजय दत्त नहीं है. फिल्म में रणबीर कपूर की एक्टिंग को देखकर संजय दत्त इनसिक्योर हो गए फिल्म के डायरेक्टर राजकुमार हिरानी से उन्होंने कुछ ऐसा कहा कि वहां पर मौजूद सभी लोग हंस पड़े. विदेश में शूटिंग करने के कारण टीजर लौन्च के वक्त संजय दत्त मौजूद नहीं थे, इसलिए संजय दत्त के साथ वीडियो चैट की गई.

सोशल मीडिया पर उपलब्ध वीडियो में संजय फिल्म ‘संजू’ को लेकर कहते हैं, ”टीजर नहीं देखा तो अभी देख लेना और बताना कैसा लगा? मुझे तो अभी तक विश्वास नहीं हो रहा है कि मेरी लाइफ पर पिक्चर बन रही है. मेरी इच्छा थी मैं भी वहां पर आप सभी के साथ होता लेकिन मैं इस वक्त भारत से बाहर शूटिंग कर रहा हूं.

मैंने फिल्म के कई सीन देखें, मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि रणबीर मेरे जैसा लग रहा है. संजय हंसते हुए कहते हैं, राजू मुन्नाभाई में रणबीर कपूर को मत ले लेना. एन्जौय करिए, शुक्रिया फिल्म के टीजर को देखने के लिए.”

टीजर में संजय दत्त के जीवन के हर एक पहलू को बड़ी खूबसूरती के साथ दिखाया गया है. फिल्म में स्टारकास्ट की बात करें तो सोनम कपूर, दिया मिर्जा और मनीषा कोइराला नजर आएंगी. फिल्म में अनुष्का शर्मा भी जर्नलिस्ट की भूमिका में नजर आएंगी, तो वहीं सोनम कपूर संजय दत्त की गर्लफ्रेंड का रोल अदा करेंगी. अभिनेत्री मनीषा कोइराला संजय दत्त की मां नरगिस का रोल निभा रही हैं. फिल्म 29 जून को सिनेमाघरों में रिलीज होने जा रही है. फिल्म को विधू विनोद चोपड़ा ने प्रोड्यूस किया है.

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