शौचालय की मुहिम गरीबों के लिए आफत

घरों में शौचालय बनाने की नरेंद्र मोदी की मुहिम चाहे जितनी अच्छी लगे, यह गरीबों के लिए असल में एक आफत हो गई है. शर्तें रखी गई हैं कि अगर घर में शौचालय नहीं है तो चुनाव नहीं लड़ सकते, नौकरी नहीं पा सकते, स्कूल में दाखिला में नहीं ले सकते.

हरियाणा ने गरीबी रेखा के नीचे वालों को तब तक राशन देना बंद करवा दिया, जब तक वे प्रमाणपत्र नहीं लाएंगे कि उन के घर में शौचालय है. लाखों गरीब मारेमारे फिरें कि पहले शौचालय के लिए सरकारी सहायता मिले, फिर सस्ता राशन. जितने दिन नहीं मिलेगा, उतने दिन क्या होगा? गरीब को महंगा राशन खरीदना होगा न? जिस का घर ही दूसरों की जमीन पर डंडे डाल कर फूस बिछा कर बना हो, वह कहां से शौचालय बनवाएगा, इस से राशन अफसरों को फर्क नहीं पड़ता.

बिहार सरकार ने शौचालय बनवाने के 12,000 रुपए दिए, पर क्या शौचालय असल में इतने में बन जाएगा? और अगर न बने तो उस से पंचायत का चुनाव लड़ने का हक छीन लिया गया है. वह दुहाई देने जाए भी तो कहां जाए, क्योंकि अदालत महंगी है और अफसर को तो आम आदमी का टेंटुआ पकड़ने का मौका भर चाहिए.

उलटे अफसरों और नेताओं ने तो शौचालय न होने पर घर में बाइक या टैलीविजन होने पर मजाक उड़ाना शुरू कर दिया. नेता भी नहीं सुनते, चाहे उन के घर वाले खुद बाहर शौच करने जाते हों. 5 बार मध्य प्रदेश से सांसद रहे अनूपपुर जिले के दलपत सिंह परस्ते की बेटी टांकी टोला गांव में रहती है, पर 50,000 दूसरे लोगों की तरह वह भी बाहर शौच के लिए जाने को मजबूर है.

शौचालय हर कोई चाहता है, पर यह बनाना उतना आसान नहीं है, जितना प्रधानमंत्री के भाषणों, पोस्टरों, नारों से लगता है. जो घर छोटे हैं, जिन में अपना अहाता या खुली जगह नहीं है, वे कहां बनाएंगे, जिस से बदबू न आए? शौचालय साफ कैसे होगा, अगर बहता पानी न आए? अगर 2 गड्ढे वाला शौचालय भी बनाया गया, तो भी वह महीनेभर में भर जाएगा, तो उस को साफ कैसे करेंगे? अगर लोगों का मल जमीन में जाएगा, तो जमीन का पानी मैला हो जाएगा और बीमारियां पैदा होंगी.

सरकार ने तो यज्ञ करा कर सुखशांति लाने का फैसला सुना दिया. शौचालय यज्ञ कराओ तभी तुम्हारे जीतेजी आत्मा को जिंदा रहने देंगे, वरना मरा समझो. शौचालय के लिए सीवर और लगातार आने वाला पानी दोनों बहुत जरूरी हैं, वरना घरों के बाहर ही सड़ता मल नजर आएगा.

घरों में शौच इसलिए भी कराई जा रही हैं, ताकि ऊंची जाति वालों के पैर नीची जातियों के लोगों के मल पर न पड़ें. वे अपना मल अपने घर में रखें. चाहे उन के घर में बदबू बनी रहे, गंद रहे, शौचालय लबालब भरता रहे. यह समाज सुधार तो है, पर बिना सोचेसमझे या दूर की सोच का, जिस में ऊंचनीच भी घुसी है.

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खूबसूरती की जलन का तेजाबी हमला

5 नवंबर, 2016 की शाम के यही कोई साढ़े 6-7 बजे थे. उत्तर प्रदेश के जिला इलाहाबाद के गंगापार स्थित थाना बहरिया के गांव रामगढ़ कोठारी के रहने वाले श्यामलोदत्त मिश्रा की बेटी रेखा अपनी चचेरी बहनों राधा और श्रेया के साथ खेतों से लौट रही थी. तीनों बहनें गांव के करीब पहुंची थीं कि उन के पास एक पल्सर मोटरसाइकिल आ कर रुकी. उस पर 2 लोग सवार थे. उन के पहनावे और कदकाठी से लग रहा था कि उन की उम्र ज्यादा नहीं थी.  पास में मोटरसाइकिल रुकने से तीनों बहनें ठिठक कर रुक गईं. मोटरसाइकिल सवार गांव के नहीं थे, इसलिए उन्हें लगा कि शायद वे उन से किसी के घर का रास्ता पूछेंगे. लेकिन रास्ता पूछने के बजाय मोटरसाइकिल पर पीछे बैठा युवक फुरती से उतरा. उस के हाथ में एक बोतल थी. तीनों बहनें कुछ समझ पातीं, उस के पहले ही उस ने बोतल का ढक्कन खोला और उस में जो भरा था, उसे तीनों बहनों की ओर उछाल दिया. बोतल का तरल जैसे ही उन के चेहरों पर पड़ा, जलन से तीनों बिलबिला उठीं.

मोटरसाइकिल स्टार्ट ही थी. युवक अपना काम कर के मोटरसाइकिल पर जैसे ही बैठा, मोटरसाइकिल एकदम से चल पड़ी. तीनों लड़कियां जलन से चीखनेचिल्लाने लगीं, क्योंकि उन के चेहरों पर फेंका तरल पदार्थ तेजाब था. उन की चीखपुकार पर पूरा गांव इकट्ठा हो गया और टार्च की रोशनी में जब उन के चेहरों को देखा गया तो देखने वालों के रोंगटे खडे़ हो गए.

लड़कियों की स्थिति काफी गंभीर थी. तुरंत सौ नंबर पर फोन कर के घटना की सूचना दी गई. सूचना मिलते ही थाना बहरिया पुलिस के अलावा पुलिस अधिकारी भी एंबुलैंस के साथ गांव कोठारी आ पहुंचे. थानाप्रभारी अश्विनी कुमार सिंह भदौरिया ने तुरंत तीनों लड़कियों को अस्पताल भिजवाया.

घटना की सूचना पा कर आईजी के.एस. प्रताप कुमार, डीआईजी विजय यादव, एसएसपी शलभ माथुर भी तीनों लड़कियों का हालचाल लेने अस्पताल पहुंच गए थे.

अधिकारियों ने पीडि़त बहनों के चेहरों पर नजर डाली तो यह देख कर आश्वस्त हुए कि उन की आंखें सलीसलामत थीं. उन के शरीर पर जहांजहां तेजाब पड़ा था, वहां की त्वचा झुलस गई थी. तीनों बहनों ने जो शाल ओढ़ रखी थी, तेजाब पड़ने से उन में जगहजगह छेद हो गए थे. अगर वे शाल न ओढे होतीं तो शायद और ज्यादा जल सकती थीं.

पुलिस अधिकारियों ने पीडि़त लड़कियों के घर वालों से पूछताछ की, ताकि हमलावरों के बारे में कुछ पता चल सके. इस पूछताछ में पता चला कि श्यामलोदत्त का अपने पड़ोसी से रास्ते को ले कर विवाद चल रहा था. इसी के साथ यह भी पता चला कि तेजाबी हमले से झुलसी श्रेया का पड़ोस की रहने वाली पिंकी मिश्रा से किसी बात को ले कर विवाद हो गया था. श्रेया, पिंकी और रेखा एक ही कालेज में पढ़ती थीं.

आईजी के निर्देश पर इन दोनों बिंदुओं पर जांच आगे बढ़ाई गई तो दोनों का ही इस घटना से कोई संबंध नहीं निकला. पुलिस अधिकारियों के जेहन में एक ही सवाल कौंध रहा था कि गांव में कोई तो ऐसा होगा, जो इन लड़कियों की हर गतिविधियों पर गिद्धदृष्टि जमाए था.

वही पलपल की जानकारी हमला करने वालों को देता रहा होगा. जिसजिस पर पुलिस को शक हुआ, उस से पूछताछ की गई, लेकिन पुलिस को सफलता नहीं मिली. एसएसपी शलभ माथुर ने मामले को सुलझाने में इंटेलीजेंस विंग के तेजतर्रार इंसपेक्टर अनिरुद्ध कुमार सिंह और एसआई नागेश कुमार सिंह को भी आवश्यक दिशानिर्देश दे कर लगा दिया.

अनिरुद्ध कुमार सिंह ने अस्पताल पहुंच कर तीनों बहनों से एक बार फिर पूछताछ की. श्रेया ने बताया कि उन के ऊपर तेजाब फेंकने के बाद एक हमलावर ने किसी को फोन कर के कहा था कि ‘काम हो गया है.’

इस पूछताछ के बाद उन्होंने अपनी टीम के तेजतर्रार हैडकांस्टेबल इंद्रप्रताप सिंह, जितेंद्र पाल सिंह, कांस्टेबल पवन सिंह, अभय कुमार सिंह, रविसेन सिंह बिसेन व स्वाट टीम प्रभारी नागेश कुमार सिंह, पंकज त्रिपाठी, हेमू पटेल, अनुराग, विजय यादव, दीपक कुमार आदि से इस विषय में गहन मंत्रणा कर सभी को सामान्य कपड़ों में कोठारी गांव के इर्दगिर्द लगा दिया. मुखबिरों को भी सतर्क कर दिया था.

इस के अलावा थाना बहरिया के थानाप्रभारी अश्विनी कुमार भदौरिया भी इस मामले का खुलासा करने में अपनी टीम के साथ लगे हुए थे. पुलिस यह मान कर चल रही थी कि कहीं यह हमला प्रेमप्रसंग को ले कर तो नहीं हुआ. हमलावर एक लड़की को निशाना बनाने आए होंगे, बाकी दोनों लड़कियां साथ होने की वजह से चपेट में आ गई होंगी.

यहां एक बात गौर करने वाली यह थी कि इन में से राधा अपनी ससुराल महेपुरा से कुछ दिनों पहले ही मायके आई थी. इसी साल 11 जुलाई, 2016 को उस का विवाह हुआ था.

इंसपेक्टर अनिरुद्ध कुमार सिंह की सोच यहीं आ कर टिक गई. उन्हें लगा कि हमलावर इन लड़कियों के आसपास रहते होंगे या जिस के इशारे पर यह वारदात की गई है, वह इन के आसपास रहता होगा. क्योंकि उस आदमी को इन बहनों की एकएक पल की जानकारी थी. और उचित मौका देख कर हमलावरों को मोबाइल द्वारा सटीक सूचना दे कर उन पर एसिड अटैक करवा दिया गया था.

इस दिशा में जांच की गई तो पता चला कि श्यामलोदत्त मिश्रा के पड़ोसी रामचंद्र मिश्रा की बेटी पिंकी की शादी सन 2012 में थाना बहरिया के गांव महेपुरा के योगेश तिवारी के साथ हुई थी. उसी गांव में राधा की ससुराल थी. सन 2014 में योगेश ने पिंकी पर बदचलनी और गहनों की चोरी का आरोप लगा कर उसे छोड़ दिया था. तब से वह मायके में ही रह रही थी.

पिंकी नहीं चाहती थी कि उस की ससुराल वाले गांव में राधा की शादी हो. शादी रोकने के लिए उस ने तरहतरह की बातें कहीं, पर उस की सारी कोशिश उस समय बेकार हो गई, जब राधा दुल्हन बन कर उसी गांव में पहुंच गई. पिंकी इस से जलभुन गई. शादी वाले दिन ही पिंकी ने उस से झगड़ा किया था.

इन बातों से पिंकी पुलिस के शक के दायरे में आ गई. पुलिस ने उसे थाने बुला कर पूछताछ शुरू की. पुलिस के सामने अपना दुखड़ा रोते हुए उस ने कहा कि वह तो खुद ही परेशान है. पति ने छोड़ रखा है, जिस का मुकदमा कोर्ट में चल रहा है. पुलिस ने उस की बातों पर विश्वास कर के उसे छोड़ दिया. मगर उस पर पुलिस की पैनी निगाह बराबर जमी रही. क्योंकि वह अभी भी शक के दायरे में थी.

अब तक की जांच में पुलिस को एक नई बात यह पता चली कि शादीशुदा होने के बावजूद पिंकी का थाना बहरिया के गांव राजेपुरा निवासी नफीस अहमद उर्फ जया से प्रेमसंबंध था. यह संबंध पिंकी की शादी से पहले से चला आ रहा था. इस बारे में उस के ससुराल वालों को पता चल गया था.

इस के बाद ही उस के पति योगेश तिवारी ने उस पर बदचलनी और गहनों की चोरी का आरोप लगा कर सन 2014 में उसे छोड़ दिया था. इस के बाद पिंकी के घर वालों ने योगेश और उस के घर वालों पर दहेज एक्ट और उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज करा दिया था, जो माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद में मिडिएशन पर चल रहा है. इस के बावजूद पिंकी और उस के घर वाले गांव के ही जगतनारायण मिश्रा, जिन्होंने पिंकी और योगेश की शादी कराई थी, पर बराबर दबाव बनाए हुए थे कि किसी प्रकार से दोनों पक्षों में समझौता करा दें. जगतनारायण मिश्रा समझौता तो नहीं करा सके, पर उन्होंने पिंकी की ससुराल वाले गांव में राधा का ब्याह जरूर करा दिया था.

यह जानकारी मिलने के बाद इंसपेक्टर अनिरुद्ध कुमार सिंह बिना समय गंवाए पिंकी के प्रेमी नफीस उर्फ जया को उस के घर पर छापा मार कर हिरासत में ले लिया. थाने में उस से पूछताछ की गई तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मैं निर्दोष हूं. मेरा इस मामले में कोई लेनादेना नहीं है. मेरे पास बोलेरो गाड़ी है और पिंकी के पिता के पास अरमादा की मार्शल, जिन्हें मैं ही किराए पर चलवाता हूं, इसी वजह से मेरा उन के यहां आनाजाना लगा रहता है. पिंकी से मेरा कोई लेनादेना नहीं है.’’

अनिरुद्ध कुमार सिंह को लग रहा था कि यह झूठ बोल रहा है, इसलिए उन्होंने उस के और पिंकी के फोन नंबरों की जो काल डिटेल्स निकलवाई थी, उसे उस के सामने रखा तो वह सकपका गया. इस से साफ था कि घटना वाले दिन 5 नवंबर, 2016 की शाम साढ़े 7 बजे पिंकी और उस की एसिड अटैक से पहले और बाद में बातें हुई थीं.

इस के बाद नफीस ने अपना गुनाह कबूल करते हुए बताया कि उसी ने अपने साथी के साथ मिल कर तीनों बहनों पर तेजाब फेंका था. इस के बाद उस ने एसिड अटैक के पीछे की जो कहानी बताई, इस प्रकार थी—

पिंकी और नफीस के बीच कालेज समय यानी सन 2008 से ही प्रेमसंबंध चले आ रहे थे. पिंकी ने नफीस पर शादी के लिए कई बार दबाव डाला था, लेकिन नफीस तैयार नहीं हुआ था. वह जानता था कि यह गांवदेहात का मामला है, इसलिए शादी के बाद बवाल हो सकता है.

योगेश से शादी हो जाने के बाद भी पिंकी प्रेमी नफीस से संबंध बनाए रही. इस का नतीजा यह निकला कि ससुराल वालों को उस के प्रेमसंबंधों का पता चल गया और पति ने उसे छोड़ दिया. उस की ससुराल वाले गांव में ब्याही राधा जब भी मायके आती, अपनी चचेरी बहनों से खूब हंसहंस कर बातें करती.

इस से पिंकी को लगता कि तीनों बहनें उसी के बारे में बातें कर के हंस रही हैं और उस का मजाक उड़ा रही हैं. पिंकी के मन में यह बात इस तरह बैठ गई कि वह राधा, रेखा तथा श्रेया को दुश्मन मान बैठी और उन्हें सबक सिखाने के बारे में सोचने लगी. वह उन्हें ऐसा कर देना चाहती थी कि लोग उन के चेहरे को देख कर नफरत करें.

उसी बीच रेखा की शादी प्रतापगढ़ के रानीगंज में तय गई. 2 दिनों बाद लड़के वाले उसे देखने के लिए आने वाले थे. पिंकी किसी भी हाल में तीनों बहनों को खुश नहीं देखना चाहती थी. वह अपने प्रेमी नफीस से मिली और उस के कंधे पर अपना सिर रख कर रोते हुए बोली, ‘‘नफीस, मैं तुम से कितनी बार कह चुकी हूं कि मेरी पड़ोसन दुश्मन उन तीनों बहनों पर तेजाब फेंक कर उन का चेहरा ऐसा कर दो कि जिस तरह मैं विरह की आग में झुलस रही हूं, वही हाल उन का भी हो.’’

‘‘मैं तुम्हारी पीड़ा को अच्छी तरह समझ रहा हूं. लेकिन तुम राधा और उस की बहनों के प्रति जो सोच रही हो, वह गलत है. मैं इस तरह का गलत काम नहीं कर सकता.’’ नफीस ने कहा.

‘‘नफीस, अगर तुम मुझ से सच्ची मोहब्बत करते हो तो तुम्हें मेरा यह काम करना ही पड़ेगा. मेरी खुशी के लिए तुम मेरा यह छोटा सा काम नहीं कर सकते? तुम कैसे मर्द हो, पिछले 8 सालों से मैं तुम्हें अपना सब कुछ सौंपती आ रही हूं और तुम मेरा इतना सा काम कर नहीं कर सकते तो क्या खाक प्यार करते हो?’’ कह कर वह अपनी आंखों में छलके आंसुओं को हथेली से पोंछने लगी.

‘‘नही, ऐसी बात नहीं है पिंकी. मैं तुम्हारी खुशी के लिए कुछ भी कर सकता हूं.’’ नफीस ने कहा.

प्रेमी के मुंह से यह सुन कर पिंकी के चेहरे पर मुसकान आ गई, वह चहकते हुए बोली, ‘‘यह हुई न मर्दों वाली बात. सुनो, इस समय राधा मायके में ही है. रेखा की शादी होने से पहले तुम मेरा काम कर दो, जिस से उस की शादी न हो सके. जिस दिन तुम्हें यह काम करना हो, मुझे बता देना. मैं तुम्हें पलपल की सूचना देती रहूंगी.’’

पूरी योजना तैयार कर के नफीस ने तेजाब खरीद लिया. इस के बाद उस ने राजेपुरा के रहने वाले अपने दोस्त शफीक (परिवर्तित नाम) को अपनी योजना में शामिल कर लिया. शफीक नाबालिग था.

5 नवंबर, 2016 को वह पिंकी के फोन का इंतजार करने लगा. शाम साढ़े 7 बजे पिंकी ने उसे बताया कि रेखा, राधा और श्रेया खेतों की तरफ जा रही हैं. फिर क्या था, नफीस शफीक को मोटरसाइकिल पर बैठा कर चल पड़ा और तीनों बहनों के चेहरों पर तेजाब डाल कर लौट आया.

नफीस की निशानदेही पर पुलिस ने पिंकी, शफीक और तेजाब बेचने वाले दुकानदार रमाकांत यादव को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने शफीक को बाल न्यायालय में पेश कर बालसुधार गृह भेज दिया, जबकि पिंकी और नफीस को भादंवि की धारा 326ए, 120बी के तहत अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

– कथा मीडिया व पुलिस सूत्रों पर आधारित

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ये है दुनिया की सबसे खतरनाक सेक्स पोजीशन

साइंटिस्ट्स ने सबसे कॉमन सेक्स पोजीशंस में से एक को सबसे खतरनाक बताया है. साइंटिस्ट्स के मुताबिक, आधे से ज्यादा पीनाइल फ्रैक्चर्स के लिए वूमन ऑन टॉप पोजीशन जिम्मेदार है. ब्राजील के रिसर्चर्स ने तीन हॉस्पिटल्स में केसेज की स्टडी के बाद ये खुलासा किया है.

इस पोजीशन में महिलाएं अपने पूरे बॉडी वेट के साथ पेनिस को कंट्रोल करती हैं. अगर पेनेट्रेशन में जरा भी गड़बड़ी हुई तो मर्द कुछ नहीं कर पाते. इसमें महिलाओं को तो दर्द नहीं होता लेकिन पेनिस को चोट पहुंचती है. डॉगी स्टाइल सेक्स भी 29 परसेंट फ्रैक्चर्स के लिए जिम्मेदार माना गया है.

रिसर्च में, मिशनरी पोजीशन सेक्स के लिए सेफेस्ट पोजीशन के तौर पर सामने आई है. रिसर्चर्स ने हॉस्पिटल में इलाज कराने आए 44 पुरुषों का अध्ययन किया. इनमें से 28 फ्रैक्चर्स हेट्रोसेक्सुअल सेक्स से हुए, 4 होमोसेक्सुअल से और 6 पेनिस मैनिपुलेशन से. हालांकि बाकी 4 फ्रैक्चर्स का कारण डॉक्टर्स को समझ नहीं आया.

रिसर्चर्स ने नोट किया कि केसेज में चोट अनकॉमन है और जिन्हें फ्रैक्चर होता है, वे बताने से डरते हैं. ऐसे में इस तरह के फ्रैक्चर्स की असल संख्या और ज्यादा हो सकती है. रिसर्च पेपर के कंक्लूजन में लिखा है, “हमारी स्टडी के मुताबिक, वूमन ऑन टॉप पोजीशन के साथ सेक्सुअल इंटरकोर्स पीनाइल फ्रैक्चर्स के लिए सबसे रिस्की है. जब एक मर्द मूवमेंट को कंट्रोल करता है तो वो पेनेट्रेशन के दौरान पेनिस में दर्द को रोकने की स्थिति में होता है.”

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सरकार के लिए आसान नहीं सामाजिक बराबरी

जाति के आधार पर नेताओं के लिए जनता के वोट लेना भले ही आसान काम हो, पर सरकार बनाने के बाद जातियों में बैलैंस बनाए रखना मुश्किल काम होता है. यही वजह है कि बहुमत से सरकार बनाने वाले दलों को 5 साल में ही हार का सामना करना पड़ता है. अब जातीयता राजनीतिक दलों को भी लंबे समय तक टिक कर राज नहीं करने देती है.

वोट लेते समय राजनीतिक दलों के लिए सामाजिक बराबरी बनाए रखना भले ही आसान काम हो, पर सरकार चलाते समय इस को बनाए रखना बहुत ही मुश्किल हो जाता है. मायावती की सोशल इंजीनियरिंग से ले कर योगी आदित्यनाथ की सामाजिक बराबरी तक यह बारबार साबित होता दिख रहा है.

उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले की तिलोई विधानसभा सीट से विधायक मयंकेश्वर शरण सिंह और योगी सरकार में आवास राज्यमंत्री सुरेश पासी के बीच छिड़ी लड़ाई इस का ताजा उदाहरण है.

सुरेश पासी जगदीशपुर विधानसभा सीट से विधायक हैं और वे उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री भी हैं. तिलोई और जगदीशपुर विधानसभा इलाके आसपास हैं.

अपनी राजनीति को मजबूत बनाए रखने के लिए विधायक मयंकेश्वर शरण सिंह और मंत्री सुरेश पासी एकदूसरे के इलाकों में दखलअंदाजी भी करते रहते हैं. अपने दबदबे को बढ़ाने के लिए कई बार आमनेसामने भी आ जाते हैं. सब से अहम बात यह है कि दोनों ही भारतीय जनता पार्टी के विधायक हैं.

मंत्री होने के चलते सुरेश पासी के पास ज्यादा हक हैं. सरकारी नौकर भी विधायक से ज्यादा मंत्री की बात को अहमियत देते हैं.

सुरेश पासी भले ही जगदीशपुर से चुनाव लड़ते हों, पर उन का अपना निजी घर तिलोई विधानसभा इलाके में पड़ता है. लगातार 3 बार से गांव की प्रधानी सुरेश पासी के परिवार के पास ही रही है. ऐसे में सुरेश पासी को तिलोई इलाके में भी पैरवी करनी पड़ती है. इस के चलते तिलोई के विधायक मयंकेश्वर शरण सिंह के साथ उन की होड़ सी बन जाती है.

एक ही पार्टी में होने के बाद दोनों नेताओं के बीच किसी किस्म का तालमेल नहीं है. दोनों के बीच झगड़ा इस कदर बढ़ गया था कि विधायक मयंकेश्वर शरण सिंह ने अपने पद से इस्तीफा तक देने का मन बना लिया. इस के बाद वे प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिले.

विधायक मयंकेश्वर शरण सिंह की नाराजगी के चलते अमेठी की पुलिस सुपरिंटैंडैंट पूनम का वहां से तबादला कर दिया गया. वे विधायक और मंत्री के बीच तालमेल बनाने में नाकाम रही थीं. भाजपा के सामने यह पहला मामला है जो खुल कर सामने आ गया है.

वैसे, पूरे प्रदेश में ऐसे तमाम मामले हैं जहां नेताओं की जमीनी लैवल पर अलगअलग खेमेबंदी है.

भाजपा ने विधानसभा चुनाव के समय अलगअलग दलों और जातीय नेताओं को अपने साथ जोड़ा था, अब इन को साथ ले कर चलना मुश्किल हो रहा है. इन नेताओं की आपसी खेमेबंदी का नुकसान पार्टी को चुकाना पड़ सकता है.

बहुत से विधायक और मंत्री अपने चहेते लोगों को पार्टी में अहम पदों पर बिठाना चाहते हैं. जातीय आधार पर देखें तो पता चलता है कि भाजपा हमेशा से ही अगड़ी जातियों की पार्टी रही है. ऐसे में अगड़ी जाति के नेता अपनी अलग अहमियत चाहते हैं.

भाजपा ने वोट के लिए दलित और पिछड़े तबके के नेताओं को पार्टी से जोड़ा था. चुनाव के बाद अब जमीनी लैवल पर इन के बीच तालमेल बनाए रखना मुश्किल काम हो गया है. जातीय आधार पर सब से ज्यादा परेशानी दलित तबके को हो रही है. उस के नेता से ले कर कार्यकर्ता तक को ज्यादा अहमियत नहीं मिल रही है. भाजपा में हिंदू धर्म को मानने वालों की तादाद ज्यादा है. वे लोग दलितों के साथ तालमेल नहीं बना पा रहे हैं और भाजपा बारबार इस मुद्दे को दबाने में लगी रहती है.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और संगठन मंत्री सुनील बंसल पार्टी कार्यकर्ताओं को परिवारवाद से दूर रहने और आपसी तालमेल बनाए रखने की बात समझाते हैं. इस के बाद भी नेता किसी न किसी मुद्दे को ले कर सामने आ ही जाते हैं.

ऐसा केवल भाजपा के ही साथ नहीं हुआ है. इस के पहले बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी को भी इसी बात का शिकार होना पड़ा था.

साल 2007 में बसपा सुप्रीमो मायावती ने ब्राह्मणदलित गठजोड़ के साथ सोशल इंजीनियरिंग की रणनीति तैयार की थी, जिस में दलितों के साथसाथ कई अगड़ी जातियों ने भी बसपा का साथ दिया था. इस के बल पर मायावती को पहली बार बहुमत से सरकार बनाने का मौका मिला था.

सरकार बनाने के बाद बसपा इस बैलैंस को बनाए रखने में नाकाम रही, जिस से सरकार के मंत्रियों और कार्यकर्ताओं के बीच दूरियां बढ़ने लगीं.

जो दलित तबका कभी बसपा का मजबूत खंभा होता था, वह खुद पार्टी से दूर जाने लगा. इस के चलते बसपा को विधानसभा और लोकसभा दोनों चुनावों में ही करारी हार मिली थी.

बसपा की ही तरह समाजवादी पार्टी के साथ भी यही हुआ था. पिछड़ों के बेस वोट के बाद मुसलिमों और अगड़ों को साथ ले कर सपा ने साल 2012 में बहुमत की सरकार बना ली थी.

अखिलेश यादव की युवा इमेज और मुलायम सिंह यादव की संगठन कूवत भी सरकार के समय जातीय बैलैंस साधने में नाकाम रही थी.

इस से अलगअलग जातियों के नेता सपा से नाराज हो गए. सब से ज्यादा परेशानी में अतिपिछड़े और दलित नेता थे. उन को लग रहा था कि अखिलेश सरकार में उन की सुनी नहीं जा रही है. ऐसे में जब 2014 के लोकसभा चुनाव आए तो यह तबका भाजपा के पक्ष में खड़ा हो गया और सपा को करारी हार देखनी पड़ी.

2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने भी अपने कैडर वोट के अलावा दलित और पिछड़ों को पार्टी के साथ जोड़ने में कामयाबी तो हासिल कर ली, पर अब इन को एकसाथ ले कर चलना भारी पड़ रहा है. भाजपा का मुख्य अगड़ा वोट बैंक पार्टी से खुश नहीं है खासकर बनिया और ब्राह्मण तबका.

भाजपा ने बाहरी नेताओं को भी पार्टी में शामिल किया है. ये नेता भाजपा के पुराने नेताओं के साथ सहज भाव से एक नहीं हो पा रहे हैं. इस का खमियाजा पार्टी को आने वाले चुनावों में भुगतना पड़ सकता है.

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धर्म का पाखंड उजागर किया : अर्पिता माली

धर्म के पाखंड को खोलने में फिल्मों की भी अहमियत है. फिल्मों के जरीए धर्म की गंदगी को उजागर किया जा सकता है. ऐसी फिल्में सामाजिक जागरूकता फैलाने का काम करती हैं. फिल्म ‘ये कैसा पेशा’ में पाखंडी समाज की सच्चाई को दिखाया गया है. इस फिल्म में बहुत सारे बोल्ड सीन को देखते हुए सैंसर बोर्ड ने इस को ‘ए’ सर्टिफिकेट के साथ पास किया है.

फिल्म ‘ये कैसा पेशा’ की कहानी पाखंडी महिला धर्मगुरु पर आधारित है, जो धर्म की आड़ में भोलेभाले लोगों को ठगते हुए धड़ल्ले से अपनी दुकान चला रही है. वह महिला धर्मगुरु कैसे सड़क से उठ कर करोड़पति बनती है, रात के अंधेरे में वह लोगों के मनोरंजन के लिए क्याक्या करती है, इस को दिखाया गया है. फिल्म में ‘गुरु मां’ का किरदार अर्पिता माली ने निभाया है. इस फिल्म के प्रोड्यूसर सुरेश कुमार मालाकार और डायरैक्टर आलोक श्रीवास्तव हैं.

पेश हैं, फिल्म में ‘गुरु मां’ का किरदार निभाने वाली अर्पिता माली से हुई बातचीत के खास अंश:

क्या फिल्म ‘ये कैसा पेशा’ राधे मां पर बनी है?

नहीं. यह ‘राधे मां’ की नहीं, बल्कि ‘गुरु मां’ की कहानी है. इस फिल्म में पाखंडी ‘गुरु मां’ की कहानी को दिखाया गया है. ‘गुरु मां’ धर्म के पाखंड में रईस लोगों को फंसा कर उन से पैसा वसूल करती है. रात के अंधेरे में वह ऐसे रईस लोगों के लिए बहुत सारे इंतजाम करती है. इस के जरीए वह कुछ ही दिनों में अमीर हो जाती है. फिल्म में ‘गुरु मां’ का रोल निभाते समय मुझे यह लगा कि यह सब समाज में होता आ रहा है.

फिल्म में बोल्ड सीन को देख कर लगता है, जैसे जबरन सैक्स दिखाने की कोशिश की गई है?

इस फिल्म का खास मकसद समाज को एक संदेश देना है, ताकि भोलेभाले लोग पाखंडी ‘गुरु मां’ जैसे किरदारों से बच सकें. फिल्म में दिखाया गया है कि रईस और दबदबे वाले लोग पाखंडी लोगों के पास दूसरी वजहों से भी आते हैं. ऐसे बड़ेबड़े आश्रमों में रात के अंधेरे में क्या कुछ होता है, यह दिखाने की कोशिश की गई है.

यह सही बात है कि इस के पहले मैं ने किसी फिल्म में इतने बोल्ड सीन नहीं किए हैं. इन को करने में परेशानी हुई. मैं एक हीरोइन हूं. कहानी की मांग पर सब करना पड़ा. सब से ज्यादा परेशानी मुझे किसिंग सीन को देने में हुई. फिल्म को देख कर यह कहीं नहीं लगेगा कि इस में सैक्स सीन जबरन डाले गए हैं.

क्या आप को इस फिल्म के विरोध का डर नहीं लगता है?

धर्म के पाखंड को उजागर करने वालों का हमेशा ही विरोध होता रहा है. हमारा मकसद समाज को जागरूक करने का है. फिल्म को सैंसर बोर्ड ने पास कर दिया है.

झारखंड से दिल्ली होते हुए सपनों की नगरी मुंबई आने का सफर कैसा रहा?

पहले लड़कियां दूरियों से घबरा कर कई बार बड़े शहरों में अपने सपनों को पूरा करने के लिए आने में हिचकती थीं, पर अब हालात बदल गए हैं. लड़कियों में समझदारी आ गई है. उन को यह पता है कि कैरियर को कैसे आगे ले जाना है.

मैं फैशन डिजाइनिंग सीखने दिल्ली आई, पर मेरे मन में यह विचार पहले से था कि मुझे फिल्मी दुनिया में अपना कैरियर बनाना है. मुझे दिल्ली में सब से पहले मौडलिंग करने का मौका मिला. मैं दिल्ली होते हुए मुंबई आई. अब तक का मेरा सफर जोश से भरा रहा है.

फिल्म ‘ये कैसा पेशा’ से आप को कैसी उम्मीदें हैं?

फिल्म ‘ये कैसा पेशा’ में भी मेरा मुख्य किरदार है. इस फिल्म में मुझे जिंदगी के हर रंग को दिखाने का मौका मिला है. यह मेरी जिंदगी का खास रोल है. मुझे ऐसे ही रोल पसंद हैं.

आप भोजपुरी और हिंदी फिल्मों में काम कर रही हैं. दोनों में क्या फर्क महसूस कर रही हैं?

हिंदी और भोजपुरी फिल्मों में बहुत फर्क है. फिल्म की कहानी, गाने और बनाने के तरीके सभी में फर्क होता है. आप ने 50 भोजपुरी फिल्में की हों और एक हिंदी फिल्म की, मामला बराबर का होता है. भोजपुरी फिल्मों में काम जल्दी मिल जाता है.

आप के दूसरे शौक क्या हैं?

मुझे घूमना और म्यूजिक सुनना बहुत पसंद है. मैं पूरी तरह से नौनवेज खाना पसंद करती हूं.

मैं कोशिश करती हूं कि हर रविवार को अपने घर में रह सकूं. इस दिन मैं अपने हाथ से खाना बनाना, खाना और खिलाना पसंद करती हूं.

पहले और आज की लड़की में क्या फर्क महसूस करती हैं?

आज की लड़की हर तरह से ज्यादा काबिल है. उसे पता है कि क्या और कैसे करना है. वह बहुत ही बेहतर तरीके से अपने कैरियर की योजना बनाती है. उस के पास मौके भी पहले से ज्यादा हैं.

आज मेरे लिए मेरे पापा मुंबई आ गए हैं. इसे देख कर लगता है कि पहले इस तरह का सहयोग परिवार को नहीं मिलता था. आजादी भी पहले से ज्यादा बढ़ी है. ऐसे में कुछ परेशानियां भी आई हैं, पर आज की लड़की काबिल है अपने को संभालने के लिए.

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जस के तस सांसद आदर्श गांव

साल 2014 में नेता जयप्रकाश नारायण के जन्मदिन के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के दोनों सदनों के सांसदों को 3-3 गांवों को ‘सांसद आदर्श गांव’ के रूप में चुन कर देशभर से तकरीबन 6 लाख गांवों में से 2500 गांवों में बुनियादी सुविधाओं समेत उन्हें हाईटैक बनाने का टारगेट दिया था.

इन गांवों को चुनने के पीछे कुछ शर्तें भी रखी गई थीं जिन के तहत कोई भी सांसद खुद का या पत्नी के मायके का गांव नहीं चुन सकता था. गांव की आबादी 3 से 5 हजार के बीच होनी थी.

इन गांवों में 80 से ज्यादा समस्याओं को ध्यान में रख  कर तरक्की के काम किए जाने थे. सेहत, सफाई, पीने का साफ पानी, पढ़ाईलिखाई, ईलाइब्रेरी, कसरत, खेतीबारी, बैंकिंग, डाकघर समेत ऐसे तमाम मुद्दों पर तरक्की के काम होने थे.

इस से गांवों में शहरों की तरह सुविधाएं मिलना शुरू हो जातीं और वहां के लोगों को शहरों की तरफ नहीं भागना पड़ता. लेकिन सांसद आदर्श गांवों की हकीकत कुछ और ही है.

अगर सांसद आदर्श गांवों में हुए तरक्की के कामों की हकीकत की बात करें तो देश में तकरीबन 6 लाख गांवों में से अब तक 3 चरणों में 2500 गांवों को चुन लिया जाना था. लेकिन अभी पहले चरण में लोकसभा के 543 सांसदों में से केवल 500 सांसदों ने ही गांवों को चुना है यानी 43 सांसद ऐसे हैं जिन्हें गांवों की तरक्की से कुछ लेनादेना नहीं है.

राज्यसभा के सांसद तो गांवों को ले कर और भी उदासीन हैं. पहले चरण में 253 सांसदों में से केवल 203 सांसदों ने ही गांवों को चुना जबकि बाकी के 50 सांसद चुनने की जहमत तक नहीं उठा सके.

अगर इस योजना के दूसरे चरण की बात की जाए तो इस के हालात तो और भी खराब हैं. इस में 545 लोकसभा सांसदों में से केवल 323 सांसदों ने ही गांवों को चुना जबकि 222 सांसद गांवों को चुनने में नाकाम रहे.

 

राज्यसभा के 241 सांसदों में से केवल 120 सांसदों ने गांवों को चुना, बाकी सांसदों ने तो इस के बारे में सोचा तक नहीं.

जिन सांसदों ने दूसरे चरण में गांवों को चुना उन में से ज्यादातर सांसद तीसरे चरण के गांवों को चुनने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं. अभी तक तीसरे चरण में लोकसभा के 543 सांसदों में से केवल 93 सांसदों ने ही गांवों को चुना है. बाकी के सांसदों को गांवों के चुनने में कोई दिलचस्पी नहीं.

अगर राज्यसभा के सांसदों की बात की जाए तो 241 सांसदों में से केवल 24 सांसदों ने ही गांवों के चुनने में दिलचस्पी दिखाई यानी बाकी राज्यसभा सांसदों को गांव की तरक्की से कुछ भी लेनादेना नहीं है.

कई सांसद आदर्श गांवों का दौरा करने पर पता चलता है कि ऐसे गांवों के लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं. ज्यादातर सांसद ऐसे हैं जिन्होंने गांवों को चुन तो लिया है लेकिन तरक्की के कामों में वे फिसड्डी साबित हुए. जो छोटेमोटे काम हुए भी हैं, उस का फायदा सिर्फ अगड़ों तक ही सिमट कर रह गया.

बस्ती लोकसभा क्षेत्र के सांसद हरीश द्विवेदी ने पहले चरण में गांव अमोढ़ा को चुना. इस गांव के उत्तरी छोर पर हरिजन बस्ती व सोनकर बस्ती यानी खटीक लोग रहते हैं जो आज भी बुनियादी सुविधाओं से दूर हैं.

सरकार व प्रशासन बड़े जोरशोर से स्वच्छ भारत का राग अलाप रहे हैं और इस मुहिम के कामयाब होने का ढोल भी पीट रहे हैं, पर आज भी यहां के लोग खुले में शौच जाने को मजबूर हैं. यहां की पूरी दलित बस्ती ही खुले में शौच के लिए जाती है. तमाम औरतें अपनी जान जोखिम में डाल कर खुले में शौच के लिए जाने को मजबूर हैं.

सीतारुन्निसा जैसी कई औरतें विधवा पैंशन पाने के लिए सैकड़ों बार सरकारी अफसरों की चौखट पर नाक रगड़ चुकी हैं, लेकिन आज तक उन्हें विधवा पैंशन नसीब नहीं हुई है.

हरिजन बस्ती के लोग आज भी बिजली के लिए तरस रहे हैं, क्योंकि इस बस्ती में आज तक बिजली पहुंची ही नहीं है.

सड़कों पर बजबजाती नालियों का गंदा पानी व कूड़े का ढेर यहां की साफसफाई व्यवस्था की धज्जियां उड़ा रहा है. गांव के दलित परिवार आज भी फूस के घरों में रहने को मजबूर हैं.

उत्तर प्रदेश में एक दिन के लिए मुख्यमंत्री की कुरसी संभालने वाले सिद्धार्थनगर जिले की डुमरियागंज सीट के सांसद जगदंबिका पाल द्वारा चुने गए सांसद आदर्श गांव तरक्की का भी यही हाल है.

यहां भी दलित पुरवा तरक्की की योजनाओं का फायदा लेने के लिए तरस रहा है. इस गांव के पश्चिमी छोर पर हरिजन टोले में पहुंचने पर सब से पहले सड़क किनारे खुले में किया गया शौच आप का स्वागत करता हुआ मिल जाएगा.

मिश्रीलाल, रामफल शर्मा, मनोहर, मंजू देवी, नीरज, नंदू जैसे सैकड़ों परिवार हैं, जिन के पास रहने को घर तक नहीं हैं. शौचालय न होने के चलते ये लोग खुले में शौच करने को मजबूर हैं.

गांव में शौचालय, घर, बिजलीपानी की समस्या जैसे पहले थी वैसे ही आज भी बनी हुई है. गांव के लोगों में सांसद जगदंबिका पाल के खिलाफ गुस्सा है. उन का कहना है कि जब गांव को पिछड़ेपन के दलदल में ही धकेलना था तो फिर इस गांव को सांसद आदर्श गांव के रूप में क्यों चुना गया?

लोग नहीं पहचानते सांसद को

जिन सांसदों ने आदर्श गांवों को चुना, वे उस गांव में जाने की कोशिश ही नहीं करते. इस वजह से गांव के ज्यादातर लोग सांसदों को पहचानते ही नहीं हैं.

 

देश में ऐसे तमाम सांसद हैं जो सदन की बैठक तक में शामिल नहीं होते, ऐसे में गांवों में जाने की बात तो दूर की कौड़ी है. जिन गांवों की पड़ताल की गई वहां के ज्यादातर लोगों का यही कहना था कि वे सांसद को नहीं पहचानते.

क्रिकेटर रह चुके सचिन तेंदुलकर को ले कर सांसद आदर्श गांव के लिए बड़ी छीछालेदर हुई. इस के बाद वे पहली बार गोद लिए गांव में गए.

दलितों से वसूले जाते हैं पैसे

सरकार दलितों के लिए ऐसी तमाम योजनाएं चलाती है जिन में उन्हें मुफ्त में बुनियादी सुविधाओं का फायदा मिलना चाहिए. लेकिन सांसद आदर्श गांव की हकीकत तो कुछ और है. यहां गरीबों को खाना पकाने के लिए मुफ्त में उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनैक्शन मिलना था लेकिन जिन दलितों को इस योजना का फायदा दिया गया उस में 1-1 कनैक्शन के लिए 1600 रुपए वसूले गए.

जो दलित परिवार पैसा दे पाने में नाकाम थे उन को कनैक्शन के कागज ही नहीं दिए जा रहे थे. कुछ परिवारों ने उधार के पैसे से कनैक्शन लिए. सोना देवी, गुडि़या, रेनू, आशा जैसी तमाम औरतों ने बताया कि उन से उज्ज्वला गैस कनैक्शन के नाम पर 1600 रुपए वसूले गए.

2 और क्यों चुन लिए

जिन सांसदों ने प्रधानमंत्री के दबाव में तीनों चरणों के गांवों को चुन भी लिया, अभी उन के द्वारा चुने गए पहले चरण के गांवों में ही तरक्की को रफ्तार नहीं मिल पाई है, ऐसे में जब अगले साल यानी 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं, तो सांसद आदर्श गांवों में तय किए गए तरक्की के कामों को अमलीजामा पहनाना मुश्किल दिख रहा है.

आज जब देश और देश के 19 राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, उस के बाद 3 गांवों को चुन पाना और उन गांवों की तरक्की करने में पूरी तरह फेल हो जाने से सरकार की गांवों के प्रति अनदेखी का पता चलता है.

सांसद आदर्श गांवों को ले कर लोग यहां तक कह रहे हैं कि ये गांव 4 साल बाद भी गोदी में ही खेल रहे हैं. इस से जाहिर होता है कि सरकार गांव के लोगों को बेवकूफ बना कर अपना चुनावी उल्लू सीधा करना चाहती है.

सांसद आदर्श गांवों को आईना दिखाता एक गांव

उत्तर प्रदेश में सिद्धार्थनगर जिले के ब्लौक भनवापुर का हसुड़ी औसानपुर गांव अपनी तरक्की के कामों के चलते बड़ेबड़े शहरों तक को मात दे रहा है. यह सब सरकार, गांव के लोगों व ग्राम प्रधान दिलीप कुमार त्रिपाठी की कोशिशों के चलते मुमकिन हुआ है.

जिस समय दिलीप कुमार त्रिपाठी ने गांव की जिम्मेदारी संभाली थी, उस समय गांव में गंदगी थी. लोगों के घरों में शौचालय न होने के चलते हर कोई खुले में शौच करने को मजबूर था. गांव में बना प्राथमिक व जूनियर स्कूल बदहाली का शिकार था. बेरोजगारी के चलते लोग गांव से बाहर जाने को मजबूर थे.

ग्राम प्रधान दिलीप कुमार त्रिपाठी ने पंचायत सदस्यों के साथ सलाहमशवरा कर गांव की तरक्की का खाका तैयार किया. लेकिन पता चला कि इस गांव के लिए सरकार के पास इतना भी बजट नहीं है जिस से एक भी काम पूरा किया जा सके. ऐसे में उन्होंने तय किया कि वे इस गांव को शहरों से भी ज्यादा सुविधाएं मुहैया कराएंगे. उन्होंने अपने मछलीपालन व सोलर के कारोबार से होने वाली कमाई को गांव की तरक्की में खर्च करने की ठान ली.

गांव हुआ डिजिटल

हसुड़ी औसानपुर गांव में बिजली के खंभों पर अब 23 सीसीटीवी कैमरे लग गए हैं. इन कैमरों से गांव में खुले में शौच रोकने की निगरानी किए जाने के साथसाथ दूसरी तमाम गलत हरकतों पर नजर रखी जाती है.

गांव वालों को फ्री में वाईफाई सुविधा देने के लिए बिजली के खंभों पर इंटरनैट राउटर लगाए गए हैं. हर खंभे पर लगे सिस्टम से उद्घोषक गांव वालों को जागरूक करने का काम करते हैं. गांव वालों को सरकार की औनलाइन सेवाओं के लिए शहर न जाना पड़े, इस के लिए गांव में कौमन सर्विस सैंटर बनाया गया है जहां से राशनकार्ड, जन्म प्रमाणपत्र, मृत्यु प्रमाणपत्र, खेतीबारी से जुड़े अनुदान, वृद्धावस्था पैंशन, विधवा पैंशन वगैरह की आवेदन सुविधाएं मुहैया कराई गई हैं.

यह प्रदेश का पहला ऐसा गांव है जहां की गांव से जुड़ी 18 सूचनाओं समेत जमीनजायदाद की सूचनाएं जियोग्राफिकल इनफौर्मेशन सिस्टम के जरीए गांव की वैबसाइट से सार्वजनिक की गई हैं.

हर घर में बिजली पहुंच चुकी है. गांव में बिजली की बचत के लिए एलईडी के बल्ब जलाए जाते हैं. बिजली के खंभों पर भी एलईडी की स्ट्रीट लाइटें लगाई गई हैं.

इस गांव को कैशलैस बनाने के लिए एक बैंक द्वारा गांव में ही ग्राहक सेवा केंद्र बनाने की कवायद की गई है.

बैंक से जुड़े अफसर हिमांशु टंडन ने बताया कि गांव की तरक्की में भागीदारी करते हुए गांव के सरकारी स्कूल में बच्चों के बैठने के लिए रंगबिरंगे बैंच व डिजिटल लाइब्रेरी समेत अनेक सुविधाएं देने की कवायद शुरू की गई है.

ग्राम प्रधान दिलीप कुमार त्रिपाठी ने राजस्थान के जयपुर से प्रभावित हो कर इस गांव के घरों की सभी दीवारों को गुलाबी रंग में रंगवा दिया है. अब तो इस गांव को ‘पिंक विलेज’ के नाम से जाना जाने लगा है.

इस गांव के स्कूल का ऐसा बदलाव किया गया है कि यह पढ़ाई और दूसरी सुविधाओं के मामले में प्राइवेट स्कूलों को भी मात दे रहा है. टाइल्स लगे फर्श, लड़केलड़कियों के लिए अलगअलग शौचालय, साफ पानी के लिए स्कूल में आरओ सिस्टम, बच्चों की सिक्योरिटी के लिए हर क्लास में सीसीटीवी कैमरे, प्रोजैक्टर और दूसरी तकनीकी  सुविधाओं से लैस स्मार्ट क्लास, साफसुथरे भोजन का इंतजाम इस स्कूल को दूसरे स्कूलों से अलग बनाता है.

गांव में कोई बीमार न पड़े, इस के लिए सभी को सेहत व सफाई की आदतों को ले कर जागरूक किया गया है.

गांव को चारों ओर से खूबसूरती बढ़ाने वाले पौधों के साथसाथ फलदार व औक्सिजन बढ़ाने वाले पौधों को रोपा गया है. गांव के अंदर सड़कों को इंटरलौकिंग ईंटों से पक्का किया जा चुका है और गांव को शहर से जोड़ने वाली सड़क को कंक्रीट का बनाया जा चुका है.

इस गांव में किसानों को मजबूत किए जाने की कोशिश की जा रही है. उन्हें समयसमय पर ट्रेनिंग, जैविक खेती की तकनीक, उन्नत कृषि यंत्र व बीज वगैरह की जानकारी मुहैया कराई जाती है.

गांव के किसानों को सस्ती सिंचाई के लिए 6 सोलर पंप मुहैया कराए गए हैं. कृषि विज्ञान केंद्र, सोहना के वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को खेती के नुसखे दिए जाते हैं.

गांव के लोगों को मनरेगा के जरीए रोजगार भी दिया जा रहा है. गांव की लड़कियों, औरतों व नौजवानों के लिए कंप्यूटर व सिलाईकढ़ाई की मुफ्त ट्रेनिंग दी जा रही है.

इस गांव में छुआछूत का नामोनिशान तक नहीं मिलेगा. गांव की लड़कियों की शादी में ग्राम प्रधान की तरफ से 11 हजार रुपए की मदद भी दी जाती है.

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राजनीति से बढ़ती जातपांत की खाई

गांवों में चाहे किसान, छोटे काश्तकार, छोटी जमीनों के मालिक अपनेआप को यादव, जाट, गूजर, अहीर, कुर्मी, कारीगर आदि पिछड़ी ओबीसी जाति का समझ कर कल तक अछूत कहे जाने वाले दलित एससीएसटी लोगों से ऊपर समझते हैं, हिंदू वर्ण व्यवस्था में सवर्णों के लिए दोनों बराबर से हैं. दोनों को सदियों से समाज में सब से निचली जगह मिली है. दोनों का पैसा लूटा गया है, दोनों की औरतों को उठाया गया है, दोनों को साथ बैठने तक नहीं दिया गया है.

1947 के बाद के भूमि सुधार कानूनों की वजह से बहुत से किसानों के पास वे जमीनें आ गई हैं जो पहले ऊंची जातियों के जमींदारों के पास हुआ करती थीं पर उन से सवर्णों का व्यवहार वैसा ही है. ओबीसी आरक्षण का विरोध सवर्णों ने किया था तो इसलिए कि वे नहीं चाहते थे कि मंडल आयोग के जरीए कल तक दास और सेवक बने पर समझदार थोड़ी हैसियत वाले लोग बराबरी की जगह लेने लगें.

आज भी आरक्षण में ज्यादा गुस्सा इन ओबीसी जमातों के साथ है, दलित जमातों के साथ नहीं. जो भी ऊंचे पद मिले हैं उन में दलितों को आरक्षण का फायदा आज भी कम है पर ओबीसी बड़ी तेजी से उन पदों पर आ ही नहीं गए, बराबर के कुशल साबित हो रहे हैं.

धर्म की देन इस भेदभाव को खत्म करना भारत की आर्थिक प्रगति के लिए पहली जरूरत है. जो भारतीय मजदूरी करने विदेश गए वहां वे बराबर के से स्तर पर हैं क्योंकि जैसे ही सामाजिक भेदभाव से छूट मिलती है जन्मजात ऊंचनीच का भेदभाव खत्म हो जाता है.

भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी गणित के लिए पिछड़ों से बड़ा समझौता किया पर मराठों और राजपूतों की तरह उन्हें रखा अंगूठे के नीचे. असल राज की बागडोर मुख्य पुरोहितों के हाथ में रहती थी और राजा सेनापति की तरह हुक्म मात्र बजाते थे. आज के मंत्रिमंडल को नागपुर से ज्यादा चलाया जाता है, नौर्थ ब्लौक से कम. यह बात पिछड़े और दलित मंत्रियों और पार्टी सांसदों को न मालूम हो ऐसा नहीं है. दोनों बराबर का भेदभाव सह रहे हैं. लाख चरण स्पर्शों के बावजूद उन्हें वह सम्मान नहीं मिल रहा जो गुरु के अजीज को मिलता है.

गोरखपुर और फूलपुर की भाजपा की हार को इसी नजर से देखा जाना चाहिए. भाजपा ने न केवल व्यापारियों पर लात मारी, साधारण गांव में काम करने वाले और दूध वगैरह का व्यापार करने वालों को भी सकते में डाल दिया. उन के भगवे झंडे उठाने की कीमत दी नहीं गई उलटे उन्हें झंडे पकड़ने की इजाजत देने की दक्षिणा वसूल कर ली गई. यही गुस्सा अब इन उपचुनावों में सामने आया है. गुस्सा तो 2014 के बाद 2017 में भी था जब विधानसभा चुनाव हुए पर तब तक अखिलेश यादव और राहुल गांधी बहुजन समाज पार्टी की मायावती को मना नहीं पाए थे. अब भगवा आतंक पौराणिक युग के स्तर पर पहुंचने लगा है और इसलिए मायावती को अखिलेश यादव से हाथ मिलाना पड़ा. पहले दलित व पिछड़े नेताओं की हठधर्मी के कारण ही उन के बहुत से नेता अपने पर जुल्म ढाने वालों के साथ ही मिल गए थे. दोनों और जिद्दी बने रहते तो वे अपनी जमातों को खो बैठते. यह चुनाव नतीजे का परिणाम है.

यह समझ लेना चाहिए जैसे पैसा मेहनत से मिलता है इज्जत के लिए भी मेहनत करनी पड़ती है और इज्जत के बिना मेहनत नहीं होती और मेहनत के बिना पैसा नहीं मिलता.

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बदहाल सरकारी अस्पताल, मरीज बेहाल

जनता को बेहतर डाक्टरी इलाज मुहैया कराने की तमाम सरकारी योजनाओं के बड़ेबड़े होर्डिंग भले ही लोगों का ध्यान खींचते हों, पर इन योजनाओं को असरदार तरीके से लागू न करने के चलते मरीजों का हाल बेहाल है.

अगस्त, 2017 में गोरखपुर के बीआरडी मैडिकल कालेज में औक्सिजन की कमी से हुई सैकड़ों बच्चों की मौतें सरकारी अस्पतालों के बुरे हालात को उजागर करती हैं.

गौरतलब है कि गोरखपुर और फर्रुखाबाद के जिला अस्पताल में मरने वाले बच्चे उन गरीब परिवारों के थे, जो इलाज के लिए केवल सरकारी अस्पतालों की ओर ताकते हैं.

इसी तरह राजस्थान के बांसवाड़ा में महात्मा गांधी चिकित्सालय में 51 दिनों में 81 बच्चों की मौतें कुपोषण की वजह से हो गईं.

वहीं दूसरी ओर जमशेदपुर के महात्मा गांधी मैमोरियल अस्पताल में बीते चंद महीनों में 164 मौतें हुईं तो झारखंड के 2 अस्पतालों में इस साल अब तक 800 से ज्यादा बच्चों की मौतें हो गईं. इन में से ज्यादातर मौतें मैनेजमैंट की कमी की वजह से हुईं.

स्वास्थ्य सेवाएं वैंटीलेटर पर

मध्य प्रदेश के 51 जिलों में 8,764 प्राथमिक उपस्वास्थ्य केंद्र, 1,157 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 334 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 63 सिविल अस्पताल और 51 जिला अस्पताल हैं, पर स्वास्थ्य सेवाएं वैंटीलेटर पर हैं.

सरकार नई स्वास्थ्य योजनाएं लागू कर रही है, लेकिन हकीकत में इस के नतीजे निराशाजनक ही रहे हैं.

सरकारी योजनाओं में फैला भ्रष्टाचार भी इस में अहम रोल निभा रहा है. गांवों में ठेके पर बहाल किए गए स्वास्थ्य कार्यकर्ता हफ्ते में एक दिन जा कर पंचायत भवन या स्कूल में थोड़ी देर बैठ कर बच्चों को टीके लगा कर या मरीजों को नीलीपीली गोलियां बांट कर अपने फर्ज को पूरा करना समझ लेते हैं.

कहने को तो सरकारी अस्पतालों में हजारों बिस्तर और मशीनें हैं, लेकिन इन का इंतजाम बदहाल है. कई अस्पतालों में 1-1 बिस्तर पर 2-2 मरीज भरती कर इलाज की रस्म अदायगी हो रही है.

मैदान में पोस्टमार्टम

मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में पोस्टमार्टम हाउस में मवेशी मरे पड़े रहते हैं और डाक्टर खुले मैदान में पोस्टमार्टम कर देते हैं.

ऐसी ही एक घटना मई, 2017 में नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा अस्पताल में सामने आई थी. यहां करंट लगने से मरी 14 साल की एक किशोरी का पोस्टमार्टम डाक्टरों ने मैदान में किया.

परिवार वाले डाक्टरों के आगे गिड़गिड़ाते रहे कि उन की बेटी का पोस्टमार्टम करने के लिए कम से कम किसी कपड़े या धोती की आड़ तो बना लीजिए, लेकिन डाक्टर नहीं माने और खुले में ही पोस्टमार्टम कर दिया.

बताया गया कि इस की वजह पोस्टमार्टम हाउस में गंदगी फैली थी. एक मवेशी की सड़ रही लाश से परेशानी हो रही थी. उस में से बदबू आ रही थी.

उजड़ी 600 कोखें

नरसिंहपुर जिला अस्पताल में पिछले 9 महीने में तकरीबन 600 औरतों की बच्चेदानी के आपरेशन किए जाने के पीछे एक रैकेट के होने के शक से हड़कंप मच गया.

अगर कोई औरत पेटदर्द से पीडि़त होती और वह जिला अस्पताल पहुंच जाती तो डाक्टर उसे पेटदर्द के लिए कोई दवा दें या न दें, उस का ब्लड एचआईवी व ईसीजी जांच के लिए पैथोलौजी सैंटर जरूर भेज देते. जब रिपोर्ट आ जाती तो बताया जाता है कि मरीज की बच्चेदानी का आपरेशन किया जाएगा.

आपरेशन बगैर सोनोग्राफी जांच के कर दिए जाते. इक्कादुक्का मामलों में अगर सोनोग्राफी कराई भी जाती तो बता दिया जाता कि बच्चेदानी में सूजन है या फिर उस में गांठ है, जिस से तकलीफ है. यह कह कर बच्चेदानी का आपरेशन कर दिया जाता.

हैरानी की बात है कि जिन का आपरेशन किया गया उन में कम उम्र की औरतें ज्यादा थीं. 25 से 35 साल की औरतों की तादाद 200 से ज्यादा थी जबकि 35 से 45 साल की औरतों की तादाद 250 थी.

निजी अस्पताल मालामाल

मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान वगैरह योजनाओं के तहत प्रदेश के 2 दर्जन से ज्यादा निजी क्लिनिक को मरीजों के इलाज के लिए चिह्नित किया गया है. इन में कैंसर, हृदय रोग समेत दूसरी गंभीर बीमारियों से पीडि़त मरीजों का इलाज होता है और राज्य सरकार इलाज का खर्च उठाती है. पर जब मरीज इन निजी क्लिनिकों में इलाज के खर्च का लेखाजोखा तैयार करवाने जाता है तो बीमारी से कई गुना ज्यादा का लेखाजोखा तैयार कर सरकार से लाखों रुपए की भरपाई ये निजी अस्पताल कराते हैं.

बेदम सरकारी अस्पताल

गांवदेहात के स्वास्थ्य केंद्रों में डाक्टरों की बेहद कमी है. वजह, मैडिकल कालेजों से डिगरी लेने के बाद डाक्टरों की वहां जाने में कोई दिलचस्पी नहीं है.

शहरों में बड़ी तादाद में चल रहे निजी अस्पतालों में इन डाक्टरों को नौकरी के अलावा सीनियर डाक्टरों के साथ काम करने का मौका मिल जाता है.

प्रदेश सरकार द्वारा आबादी की बढ़ती रफ्तार के साथ नए मैडिकल कालेज खोलने या मैडिकल कालेजों में सीटों की तादाद बढ़ाए जाने में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई गई है.

सरकारी अस्पतालों में काम कर रहे डाक्टर ओपीडी में बैठने के बजाय निजी प्रैक्टिस कर पैसा कमाने में लगे हैं. एक मरीज से फीस के नाम पर 200 से ले कर 500 रुपए वसूलने वाले इन डाक्टरों को महीनेभर में मिलने वाली तनख्वाह नाकाफी लगती है.

कसबाई इलाकों के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में महिला डाक्टर के न होने से स्वास्थ्य विभाग की जननी सुरक्षा योजना का फायदा गरीब तबके को सही ढंग से नहीं मिल पा रहा है. अस्पतालों में बच्चा पैदा कराने का काम नर्सों व दाइयों के जिम्मे है. यही वजह है कि निजी नर्सिंगहोम गरीबों की जेब पर डाका डाल कर नोट बटोर रहे हैं. मलेरिया के लिए की जाने वाली खून की जांच के लिए 2-3 बार भटकना पड़ता है. मजबूरन लोग मैडिकल स्टोर पर मिलने वाली किट का सहारा लेते हैं.

गरीब के पास वोट रूपी हथियार होता है. कभी व्यवस्था से नाराज हो कर वह सरकार बदलने का कदम उठाता भी है तो अगली सरकार का रवैया भी वैसा ही रहता है. ऐसे में गरीब तबका सरकारी अस्पतालों में मिल रही आधीअधूरी सुविधाओं से काम चला लेता है.

लोगों द्वारा चुनी जाने वाली सरकारें जनता के दुखदर्द को महसूस न कर के उन्हें पूजापाठ के रास्ते पर चलाने में बिजी हैं.

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कबूतरबाजी का काला धंधा

साल 1989 में आई सलमान खान और भाग्यश्री की सुपरहिट फिल्म ‘मैं ने प्यार किया’ का एक गाना ‘कबूतर जाजाजा, कबूतर जा…’ बहुत मशहूर हुआ था, जिस में भाग्यश्री अपना लव लैटर एक खूबसूरत सफेद कबूतर की मारफत दूर गए सलमान खान तक भिजवाती है. वह समझदार कबूतर सलमान खान तक चिट्ठी पहुंचा कर कर अपना फर्ज निभाता है.

पर कुछ कबूतर समझदार नहीं, बल्कि शातिर होते हैं. उन की सरपरस्ती करने वाले कबूतरबाज तो और भी चालबाज. यहां कबूतर कोई पक्षी नहीं, बल्कि वे लालची लोग होते हैं जो पौंड, डौलर में कमाई करने की खातिर गैरकानूनी तरीके से विदेशों की धरती पर पैर रखते ही वहां ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे गधे के सिर से सींग. लोगों को इस तरह एक देश से दूसरे देश में भेजने को ‘कबूतरबाजी’ का नाम दिया गया है.

साल 2003 में पंजाबी गायक दलेर मेहंदी कबूतरबाजी के मामले में फंसे थे. तब उन पर और उन के बड़े भाई शमशेर सिंह पर आरोप लगा था कि वे प्रशासन को धोखे में रख कर कुछ लोगों को अपनी सिंगिंग टीम का हिस्सा बता कर विदेश ले गए थे और उन्हें वहीं छोड़ दिया था. इस के एवज में उन्होंने काफी मोटी रकम भी वसूली थी.

मामला कुछ यों है कि साल 1998 और 1999 में दलेर मेहंदी 2 बार अमेरिका गए थे. इस दौरान वे 10 ऐसे लोगों को भी अपने साथ ले गए थे, जो लौटे ही नहीं.

साल 2003 में बख्शीश सिंह नाम के एक शख्स ने दलेर मेहंदी के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी. पंजाब की पटियाला पुलिस ने जानकारी के आधार पर दलेर मेहंदी के भाई शमशेर मेहंदी को गिरफ्तार किया था. पर तब पूरी पुलिस टीम का ही तबादला कर दिया गया था. ऐसा माना जाता है कि किसी भारी दबाव के चलते ऐसा फैसला लिया गया था.

लेकिन अब 15 साल के बाद पटियाला कोर्ट ने दलेर मेहंदी को गैरकानूनी तरीके से लोगों को विदेश ले जाने के मामले में कुसूरवार बताया है. दलेर मेहंदी को 2 साल की सजा सुनाई गई है. साथ ही, उन पर 2 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है.

हालांकि, दलेर मेहंदी को फौरन जमानत भी मिल गई और उन के वकील ने कहा कि वे निचली अदालत के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देंगे.

चूंकि यह हाईप्रोफाइल मामला पंजाबी गायक दलेर मेहंदी से जुड़ा हुआ है, इसलिए जल्दी ही सुर्खियों में आ गया, लेकिन देश के दूसरे हिस्सों में भी मानव तस्करी के नाम पर कबूतरबाजी का खेल खेलने का सिलसिला बेरोकटोक जारी है.

नवंबर, 2017 में मुंबई की सहार इलाके की पुलिस ने 40 साल के बल्लू कानू भाई को गुजरात से गिरफ्तार किया था. उस पर जाली पासपोर्ट के जरीए लोगों को अमेरिका और कनाडा भेजने का आरोप लगा था. पुलिस के मुताबिक यह आरोपी अब तक फर्जी तरीके से 53 लोगों को विदेश भेज चुका था.

कबूतरबाजी के सिलसिले में पुलिस की यह धरपकड़ मई महीने से ही शुरू हो गई थी. तब सहार पुलिस ने लोगों को जाली पासपोर्ट के आधार पर अमेरिका और कनाडा भेजने वाले एक कबूतरबाज गैंग का परदाफाश किया था. उस समय कुल 19 लोगों को गिरफ्तार किया गया था. पुलिस ने इस गोरखधंधे से जुड़े 3 इमिग्रेशन अफसरों को भी पकड़ा था.

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पुलिस की पूछताछ में बल्लू कानू भाई ने बताया कि साल 2015 से साल 2017 के दौरान उस ने कुल 53 लोगों को गलत तरीके से विदेश भेजा था. इस के एवज में हर शख्स से 50 लाख से 60 लाख रुपए लिए गए थे. इस काम में उस का पूरा गिरोह मदद करता था. लोगों से लिए गए पैसे में गैंग के हर सदस्य की हिस्सेदारी बंधी होती थी.

अगस्त, 2016 में दिल्ली पुलिस ने कबूतरबाजी के ऐसे गिरोह का परदाफाश किया था जो दुबई में अच्छी नौकरी दिलाने के नाम पर लोगों से ठगी करता था. यह गिरोह पौश एरिया में आलीशान दफ्तर खोल कर कबूतरबाजी के काले कारोबार को अंजाम दे रहा था.

इस गिरोह के सदस्य ऐसे बेरोजगार नौजवानों को ठगते थे जिन को नौकरी की तलाश होती थी. वे उन्हें दुबई समेत कई दूसरे देशों में नौकरी दिलाने का लालच दे कर उन से लाखों रुपए की रकम ऐंठ लेते थे.

ऐसा ही एक मामला दिल्ली से सटे राज्य उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले का भी था. वहां कैला भट्टा इलाके का रहने वाला फुरकान कविनगर में एक शख्स से मिला था. उस ने दुबई के एक होटल में नौकरी लगवाने का झांसा दे कर उस से 50 हजार रुपए ऐंठ लिए थे. इस के एवज में फुरकान को जो वीजा दिया गया था वह फर्जी निकला.

उस शख्स ने फुरकान के साथसाथ 4 नेपाली लोगों से भी इसी काम के नाम पर 50-50 हजार रुपए हड़प लिए थे. केरल का वह धोखेबाज इस करतूत को अंजाम दे कर फरार हो गया था.

कुछ लोगों के साथ तो इस से भी ज्यादा बुरा होता है. मध्य प्रदेश के भिंड इलाके का रहने वाला नरेंद्र सिंह विदेश में नौकरी कर के अपने घर की माली हालत सुधारना चाहता था. इस सिलसिले में उस की मुलाकात धर्मेंद्र सिंह से हुई जिस ने उस से सऊदी अरब में नौकरी दिलाने का वादा किया और उस से तकरीबन पौने 2 लाख रुपए ले लिए.

इस के बाद एक फर्जी पासपोर्ट बनवा कर नरेंद्र सिंह को किसी तरह सऊदी अरब भेज दिया गया. अभी एक साल भी नहीं बीता था कि नरेंद्र सिंह ने अपने परिवार वालों को फोन कर के बताया कि उसे भूखा रखा जाता है और तय की गई तनख्वाह भी नहीं दी जाती है.

तब नरेंद्र सिंह के परिवार वालों ने धर्मेंद्र सिंह से उसे वापस लाने को कहा तो उस ने उन से दोबारा ढाई लाख रुपए ले लिए, पर नरेंद्र सिंह वापस नहीं लौटा. पुलिस की मदद से धर्मेंद्र सिंह को पकड़ लिया गया और उस से की गई पूछताछ में पता चला कि वह एक कबूतरबाज गिरोह से जुड़ा था जिस ने 12 से ज्यादा लोगों को विदेश भेज कर लाखों रुपए की ठगी की थी. विदेश भेजे गए लोग नरेंद्र सिंह की तरह नरक की सी जिंदगी जी रहे थे.

ऐसा बहुत से मामलों में होता है कि यूरोप या दूसरे अमीर देशों में भेजने के नाम पर लोगों को अफ्रीका के गरीब देशों में भेज दिया जाता है. कई लोग पकड़े जाते हैं तो वे जिंदगीभर जेलों में सड़ते रहते हैं. बहुतों को तो ढंग से अंगरेजी भी नहीं बोलनी आती है जिस से वे अपनी बात विदेशी अफसरों से कह सकें. लिहाजा, वे न तो इधर के रहते हैं और न ही उधर के.

सवाल उठता है कि काबिल न होने के बाद भी बेरोजगारों में विदेश जाने का चसका क्यों लगता है? दरअसल, किसी परिवार से अगर कोई शख्स विदेश जा कर अच्छी कमाई करता है तो उस के परिवार के दूसरे सदस्य भी वहां जा कर पैसा बनाने का ख्वाब देखने लगते हैं. जब कानूनी तौर पर वे विदेश जा कर वहां रहने या रोजगार करने के लायक नहीं होते हैं तो वे किसी भी तरह अपना सपना पूरा करने की जुगत भिड़ाने लगते हैं.

पंजाब जैसे राज्यों में तो बहुत से नौजवान अपनी बेशकीमती जमीन बेच कर विदेश जाने की योजनाएं बनाते हैं, चाहे वहां जा कर उन्हें होटलों में बरतन ही क्यों न मांजने पड़ें. इस के लिए कानूनी नहीं तो गैरकानूनी तरीका ही उन्हें आसान लगता है, जिस का फायदा कबूतरबाज उठाते हैं.

गलीमहल्ले में बैठे ऐसे क्लियरिंग एजेंट बेरोजगारों से बहुत सी बातें छिपा जाते हैं. वे आसान तरीके से विदेश में घुसने के सब्जबाग दिखा कर लोगों को बरगलाते हैं ताकि उन्हें अपने जाल में फंसा कर पैसे ऐंठ सकें.

छोटी नौकरियों से जुड़े सरकारी नियमों की बात करें तो प्रवासी भारतीय मामलों के मंत्रालय के तहत प्रोटैक्टर जनरल औफ इमिग्रैंट्स के पास बिना कोई भी एजेंसी या विदेशी ऐंप्लौयर भारतीय श्रमिकों की सेवाएं नहीं ले सकता. इस औफिस द्वारा वैलिड परमिट जारी किए जाने के बाद ही एजेंट या विदेशी ऐंप्लौयर भारतीय श्रमिकों से काम ले सकता है.

आप का एजेंट फर्जी तो नहीं है, इस के लिए आप नजदीकी प्रोटैक्टर के औफिस में मिल कर तसल्ली कर सकते हैं. बिना पढ़े किसी भी एग्रीमैंट पर दस्तखत न करें. खुद कोई बात समझ न आए तो किसी पढ़ेलिखे से समझ लें. एजेंट को दिए जाने वाले पैसों की रसीद लें. अगर आप विदेश पहुंच जाएं तो अपने ऐंप्लौयर से किसी तरह के नए एग्रीमैंट पर दस्तखत न करें.

विदेश जा कर पैसा कमाने में कोई बुराई नहीं है पर वहां किसी गैरकानूनी तरीके से जाना बहुत बड़ा जुर्म है, जिस की सजा में पूरी उम्र तक जेल में गुजर सकती है.

बरतें ये सावधानियां

विदेश जा कर पैसा कमाने का ख्वाब देखना बुरा नहीं है, लेकिन किसी पर भी अंधा विश्वास कर के अपनी गाढ़ी कमाई उसे सौंप देना किसी लिहाज से ठीक बात नहीं है. ऐसा करने से पहले इन बातों पर जरूर ध्यान दें :

* विदेश जाने से पहले उस देश की एंबैसी से बात जरूर कर लें.

* अगर कोई आप को विदेश में पढ़ाईलिखाई से जुड़ा कोई कोर्स कराने के नाम पर वहां भेजने की बात करता है तो उस कोर्स के संबंध में कंप्यूटर वगैरह पर पूरी जानकारी ले लें.

* जो शख्स या एजेंसी आप को विदेश भेजना चाहती है उस की पूरी तहकीकात कर लें. ज्यादा जरूरी हो तो उन लोगों से भी बातचीत कर लें जो उस शख्स या एजेंसी की सेवाएं ले चुके हैं.

* अपनी तसल्ली करने के बाद ही पैसा दें.

* जरा सी भी भनक लगे, तो उन लोगों से फौरन दूर हो जाएं.

क्रिकेटर निकला कबूतरबाज

भारत की ओर से 10 इंटरनैशनल वनडे मैच खेलने वाले क्रिकेटर जैकब मार्टिन को साल 2011 में कबूतरबाजी के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था. वह वडोदरा रणजी टीम का कप्तान रह चुका था और 138 रणजी मैच भी खेल चुका था.

जैकब मार्टिन को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था. उस पर आरोप था कि वह युवा खिलाडि़यों को विदेशी टीमों की ओर से क्रिकेट मैच खिलाने के नाम पर उन्हें दूसरे देशों में ले जाता था और कई खिलाडि़यों को वहीं छोड़ देता था. इस के लिए वह फर्जी क्रिकेट टीम बनाता था. एक ऐसे ही फर्जी क्रिकेटर की गिरफ्तारी के बाद इस मामले का खुलासा हुआ था.

VIDEO : नेल आर्ट

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प्रिया प्रकाश का यह नया वीडियो हो रहा वायरल, कर रही हैं हंसी मजाक

पिछले कुछ दिनों से इंटरनेट पर छाईं एक्ट्रेस प्रिया प्रकाश वारियर का आए दिन एक नया वीडियो हमें देखने को मिल रहा है. इसी क्रम में उनका एक और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें एक शख्स प्रिया के अंदाज में उन्हें कौपी करता हुआ नजर आ रहा है. बता दें, प्रिया का वीडियो इतनी तेजी से वायरल होता है कि लोग उन्हें अब ‘वायरल गर्ल’ के नाम से जानने लगे हैं.

इंस्टाग्राम पर शेयर किया गया वीडियो

इस नए वीडियो में एक शख्स प्रिया की तरह अपने आंखों से निशारा करता हुआ नजर आ रहा है, लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस शख्स के एक्सप्रेशन इतने कौमेडी है कि इसे देख आप अपनी हंसी रोक नहीं पाएंगे. प्रिया का यह वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर किया गया है और 17 घंटे के अंदर इसे एक लाख से ज्यादा बार देखा गया है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार प्रिया ने अपने वीडियो के जरिए इंस्टाग्राम से कमाई करने वाली कई सेलिब्रिटी को पीछे छोड़ दिया है.

इंस्टाग्राम फौलोअर्स की संख्या 50 लाख से भी ज्यादा

दरअसल, प्रिया प्रकाश के कई वीडियो वायरल होने के बाद उनके इंस्टाग्राम फौलोअर्स की संख्या 50 लाख से भी ज्यादा हो चुकी है. इतनी बड़ी संख्या में फौलोअर होने के बाद प्रिया ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर कई बड़े ब्रैंड का प्रमोशन करना शुरू कर दिया है. एक रिपोर्ट के अनुसार प्रिया प्रकाश एक इंस्टाग्राम पोस्ट के लिए 8 लाख रुपये चार्ज लेती हैं.

विज्ञापन का प्रस्ताव भी मिल रहे हैं

इसके अलावा कई बड़े ब्रांड प्रिया प्रकाश के पास विज्ञापन का प्रस्ताव लेकर पहुंच रहे हैं. खबरों की मानें तो प्रिया सोशल मीडिया के माध्मय से कमाई करने वाली कई सेलिब्रिटी को पीछे छोड़ चुकी हैं. प्रिया प्रकाश की लोकप्रियता का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि इंटरनेट पर छाने के बाद उन्होंने गूगल सर्च के मामले में सबसे ज्यादा सर्च की जाने वाली सनी लियोनी और दीपिका पादुकोण को भी पीछे छोड़ दिया. एक ही दिन में उनके 6 लाख से भी ज्यादा फौलोअर बने थे. फिलहाल उनके फौलोअर की संख्या 51 लाख तक पहुंच गई है.

बेहद खुश हैं प्रिया प्रकाश

प्रिया फौलोअर के मामले में अमेरिकन रियल्टी टीवी स्टार काइली जेनर और फुटबौल स्टार क्रिस्टियानो रोनाल्डो की बराबरी कर ली है. यह दो सेलीब्रिटी ही एक दिन में 6 लाख से ज्‍यादा फैन्‍स बनाने में सफल रहे हैं. प्रिया प्रकाश के इंटरनेट स्टार बनने के बाद जब मीडिया ने उनसे बात की था तो उन्होंने कहा था, ‘मेरे लिए यह बहुत सुखद है. मुझे नहीं पता कि मैं अपनी खुशी का इजहार कैसे करूं. उन्होंने बताया इस कामयाबी के बाद खुशी मनाने के लिए मेरे कौलेज में एक इवेंट आर्गेनाइज किया गया था. यह मेरे लिए नया अनुभव है. मैं यही उम्मीद करती हूं कि सभी लोगों का सपोर्ट मेरे साथ बना रहे.’

आपको बता दें कि वीडियो वायरल होने के बाद प्रिया को कई बड़ी फिल्मों के औफर की गईं, लेकिन उन्होंने उस फिल्म का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया. बता दें कि प्रिया प्रकाश मलयालम फिल्म ‘उरु अदार लव (Oru Adaar Love)’ के वीडियो में नजर आने के बाद उनके आंखों के एक्सप्रेशन की जमकर तारीफ हुई थी. इसके बाद ही वह इंटरनेट पर छा गई थीं.

VIDEO : नेल आर्ट

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