Family Story: औलाद – क्यों कुलसूम अपने बच्चे को खुद से दूर करना चाहती थी?

Family Story: नरगिस की खूबसूरती के चर्चे आम होने लगे. गांवभर की औरतें नरगिस की मां से कहने लगीं कि उस की शादी की फिक्र करो जुबैदा. उम्र भले ही कम सही, लेकिन कुदरत ने इस को खूबसूरती ऐसी दी है कि बड़ेबड़ों का ईमान डोल जाए.

इस पर जुबैदा कहती, “तुम लोग मेरी बेटी की फिक्र में मत मरा करो. मेरे पास दौलत भले ही नहीं है, लेकिन बेटी ऐसी मिली है कि राजेमहाराजे तक आएंगे रिश्ता ले कर मेरे दरवाजे पर.”

एक दिन ऐसा हुआ भी. हवेली से बड़े नवाब के बड़े साहबजादे शाहरुख मिर्जा के लिए नरगिस का रिश्ता आ गया. जुबैदा की खुशी का ठिकाना न रहा.

नरगिस के अब्बा अब इस दुनिया में नहीं थे, इसलिए मंगनी की रस्म भी जुबैदा ने खुद पूरी की और अगले साल बेटी के निकाह का दिन तय कर दिया.

इस बीच बचपन का बिछड़ा जुबैदा का भांजा यानी नरगिस के मामा का बेटा खुर्रम पाकिस्तान से लौट आया. लोग कहते हैं कि वह बकरी चरातेचराते सरहद पार कर गया था और फिर वहां से लौट कर नहीं आया.

खुर्रम के साथ गांवभर में खुशियां भी लौट आईं, इसलिए कि बचपन में खुर्रम गांवभर का चहेता हुआ करता था. जुबैदा के भाईभाभी खुर्रम के साथ जुबैदा के घर मिलने आए और जुबैदा को उस का वादा याद दिलाया.

जुबैदा की जबान से आवाज नहीं निकल रही थी, “भाभी… वह… मैं ने तो… नरगिस का रिश्ता हवेली में शाहरुख मिर्जा के साथ तय कर दिया है. मैं नहीं जानती थी कि खुर्रम कभी लौट भी आएगा.”

यह सुन कर जुबैदा के भाईभाभी के अलावा खुर्रम भी हैरान रह गया. बच्चों के बचपन में किए गए उन के मांबाप के वादे को जुबैदा द्वारा तोड़े जाने का उन्हें बेहद अफसोस हो रहा था, लेकिन चूंकि गलती जुबैदा की नहीं, बल्कि हालात की थी, इसलिए उन्हें खामोश रह जाना पड़ा.

हालांकि खुर्रम के दिल में गांठ बैठ गई. उस ने नरगिस को अपने दिल से कभी नहीं निकालने का फैसला कर लिया. वह दिल से मनाया करता कि किसी तरह नरगिस का रिश्ता हवेली से टूट कर उस से तय हो जाता.

दोनों खानदान एक ही गांव में रहते थे, इसलिए नरगिस और खुर्रम का एकदूसरे के यहां आनाजाना लगा रहता था. एक दिन मौका पा कर खुर्रम ने नरगिस को घेर लिया, “देखो नरगिस, मैं जानता हूं कि तुम्हारा निकाह हवेली में तय हो चुका है, लेकिन मैं तुम्हें अपने दिल में बसा चुका हूं, इसलिए वहां से निकाल नहीं सकता.”

नरगिस पाक दामन लड़की थी. अकेले में खुर्रम की बातें सुन कर वह पसीनापसीना हो गई. उस के लब खुले, “तुम तो पाकिस्तान चले गए थे, फिर मैं कब दिल में बस गई?”

“मैं तुम्हें भुला ही कब था. बचपन में जब हमारा रिश्ता तय हुआ था, तब मैं होशमंद था और तुम नादान. उस वक्त मैं 8 साल का और तुम 5 साल की थी.”

नर्गिस बोली, “अच्छा तो अब मैं क्या कर सकती हूं?”

खुर्रम ने कहा, “तुम चाहो तो अब भी लौट सकती हो…”

नर्गिस ने कहा, “बेवा मां के अरमानों को तोड़ने की हिम्मत नहीं है मुझ में. उन्होंने मां की ममता के साथ बाप जैसी परवरिश भी दी है. पुराने लोग अपनी जबान पर मरते हैं. अम्मी हवेली वालों को जबान दे चुकी हैं.”

“फुफू तो मेरी अम्मी को भी जबान दे चुकी थीं…” खुर्रम बोला.

“लेकिन तब तुम गायब थे और गायब इनसान के भरोसे कोई अपनी बेटी को घर बिठा कर नहीं रख सकता,” नरगिस बोली.

बहरहाल बात आईगई हो गई. फिर तय वक्त पर नरगिस की बरात आई और अगली सुबह वह रुखसत भी हो गई.

हवेली में दुलहन की खूबसूरती एक कौंधती हुई बिजली की मानिंद झमाका बन कर गिरी. रात हुई. दूल्हा आया, लेकिन पलंग के बजाय सोफे पर सो गया. नरगिस घंटों इंतजार करती रही, लेकिन वह सेज तक नहीं आया और खुद उस के अंदर इतनी हिम्मत नहीं थी कि किसी अनजान मर्द के पास खुद चल कर जा सके.

सुबह जल्दी ही नरगिस जाग गई. हड़बड़ा कर कपड़े समेटे और पलंग से नीचे उतर आई और सोफर के पास गई जहां उस का शौहर सो रहा था.

शाहरुख का चेहरा देखते ही नरगिस गश खा कर वहीं गिर पड़ी. जब वह गिरी तब उस की आवाज पर शाहरुख जाग गया. अपनी दुलहन को ऐसे देख कर वह समझ गया कि उस की बदसूरती ने नरगिस को बेहोश कर दिया है.

फिर शाहरुख बाहर जा कर अपनी मां की गोद में सिर रख कर रोने लगा, “अम्मी, मैं न कहता था कि मेरी शादी किसी खूबसूरत लड़की से मत करना. देखो, मुझे देखते ही दुलहन गश खा कर गिर पड़ी है.”

मां दौड़ीदौड़ी दुलहन के कमरे में गई. पानी के छींटे मार कर उसे होश में लाया गया, फिर दुलहन के सामने अपना दामन फैलाते हुए अम्मी ने कहा, “बेटी, मैं तुम्हारी असल गुनहगार हूं. शाहरुख अपनी सूरत को ले कर बचपन से ही  परेशान रहा है. मैं ने ही उस से बारबार चांद सी दुलहन लाने का वादा किया था.

“बेटी, अब तुम इस हवेली की बड़ी बहू हो. मेरे इन आंसुओं का वास्ता… तुम मेरे शाहरुख को अपना लो, नहीं तो वह जीतेजी मर जाएगा.”

बहरहाल, नरगिस को हालात से समझौता करना पड़ा जैसा अकसर लड़कियों को करना पड़ता है. फिर शाहरुख के खुरदरे जीवन में बहार आ गई. शाहरुख की खुशी देख कर उस की मां आयशा फूली नहीं समाती. वह हवेली की औरतों में अपनी बहू की खूबसूरती के चर्चे बढ़ाचढ़ा कर करती.

देखतेदेखते एक साल, फिर 2 साल बीत गए, लेकिन नरगिस मां नहीं बनी. उस की सास आयशा को शक होने लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि नरगिस अपने शौहर के साथ हमबिस्तर ही नहीं होती. पर उन दोनों ने अपने हमबिस्तर होने का उसे यकीन दिलाया, फिर वह अपने वारिस को ले कर फिक्रमंद रहने लगी.

3 साल बीत गए. फिर डाक्टरों के यहां चक्कर लगने शुरू हो गए. डाक्टरों ने बताया कि नरगिस के अंदर कोई खराबी नहीं है. जो कमी है वह शाहरुख के अंदर ही है.

शाहरुख हवेली में सब से बड़ा लड़का था. उस के अंदर का खोट आयशा को अपना खोट महसूस होने लगा. उस की बहू को मारे जाने वाले ताने उस के जिगर पर नश्तर बन कर चुभने लगे. फिर पोतेपोतियों की चाहत में आयशा बीमार रहने लगी.

एक दिन आयशा ने नरगिस से अकेले में कहा, “दुलहन, एक औरत के लिए सब से बड़ा कलंक होता है उस का मां नहीं बनना. मैं जानती हूं कि मेरे बेटे में खोट है, लेकिन दुनिया तुम्हें ही हिकारत की नजर से देखेगी, बांझ कहेगी.

“मैं चाहती हूं कि तुम अपने मायके में कुछ दिनों तक रह लो. क्या पता वहीं कुदरत तुम्हारी गोद हरी कर दे और हमारे खानदान का चिराग रोशन हो जाए.”

नरगिस नादान और कम उम्र थी. उस ने हंसते हुए कहा, “अम्मां, मैं वहां अकेली रहूंगी, तो मेरी गोद हरी कैसे होगी?”

आयशा ने समझाया, “यह हंसने का समय नहीं, बल्कि सोचने का समय है. एक औरत दूसरी औरत का और एक मां दूसरी मां का दर्द समझती है. तुम वहां जा कर सोचना कि इस हवेली का चिराग कैसे रोशन होगा. औरत अपने अंदर बड़े से बड़ा तूफान भी जज्ब कर लेती है, यह बात तुम्हें समझनी पड़ेगी.”

नरगिस अपने घर चली आई. आते ही मां ने औलाद की खुशखबरी जाननी चाही, लेकिन उसे नाउम्मीदी हाथ लगी. फिर नर्गिस ने अपनी सास की कही बातों को मां से कहा. जुबैदा सब समझ गई.

जुबैदा ने बेटी को समझाया, “बीज गलत रहने से जमीन बंजर रह जाती है और सारा कुसूर जमीन के माथे मढ़ दिया जाता है, इसलिए बीज बदला जाता है. जब जानदार और दमदार बीज धरती की कोख में पड़ता है, तो धरती को फाड़ कर बाहर निकल आता है. थोड़ा दर्द सहने के बाद जब धरती पर फसल लहलहाने लगती है, तब धरती अपने सारे दर्द भूल जाती है.”

फिर जुबैदा को खुर्रम याद आया जो अभी भी कुंआरा बैठा था. अपने खानदान का देखाभाला लड़का था. उस ने उस तक खबर पहुंचा दी कि नरगिस आई हुई है.

खुर्रम दौड़ादौड़ा आ पहुंचा. दोनों को अकेला छोड़ कर जुबैदा अपना इलाज कराने शहर चली गई. नरगिस ने खुर्रम काफी देर तक आपस में बातें करते रहे.

उस दिन के बाद जब तक नरगिस मां के घर रही, खुर्रम का आनाजाना लगा रहा. जबजब खुर्रम आता, जुबैदा कभी अपना इलाज कराने शहर चली जाती तो कभी बाजार चली जाती, ताकि तनहाई में उम्मीदों के चिराग जल सकें.

2 महीने बीत गए. नरगिस ज्यादा दिनों तक यहां रह भी नहीं सकती थी. एक दिन जुबैदा ने उसे टटोला. नरगिस ने जवाब दिया, “अम्मां, पागल हो गई हो क्या… बिना मर्द के बच्चा कैसे होगा?”

जुबैदा ने पूछा, “खुर्रम मर्द नहीं है क्या?”

नरगिस को पहली बार मां और सास दोनों की बातें समझ में आईं. वह फूटफूट कर रोने लगी, “यह क्या कह रही हो आप… ऐसा कैसे हो सकता है…”

जुबैदा ने कहा, “ऐसा करने के लिए मैं कह रही हूं और तुम्हारी सास कह रही हैं. सारा गुनाह हमारे सिर होगा. मेरी बेटी को लोग बांझ कहें यह मैं कतई बरदाश्त नहीं कर सकती.”

नरगिस बोली, “लेकिन मैं आप लोगों के लिए खुर्रम को कुरबानी का बकरा नहीं बना सकती.”

जुबैदा ने कहा, “मर्द औरत के जिस्म प्यासा होता है. मर्द खुद को गिराने की ताक में लगा रहता है. खुर्रम के लिए यह कुरबानी नहीं, बल्कि फख्र की बात होगी.”

नरगिस ने कहा, “मेरे गुनाहों की सजा आप को या मेरी सास को नहीं मिल सकती…”

जुबैदा चिल्लाई, “फिर तो जाओ हवेली और अपने गुनाहों की सजा जिंदगीभर भुगतती रहो, “कह कर जुबैदा बाहर निकल गई और नरगिस किसी कमजोर दीवार की तरह वहीं ढह गई.

अगली सुबह नरगिस ने हवेली का रुख किया. सास ने उम्मीदों के साथ उस का स्वागत किया. शाम होते ही आयशा ने उम्मीद से होने की बात पूछी, पर नरगिस ने इनकार कर दिया.

आयशा ने कहा, “तुम्हारी तरह तुम्हारी मां भी बेवकूफ ठहरी. क्या उस ने तुम्हें दुनियादारी नहीं सिखाई…”

नर्गिस ने कहा, “सिखाई थी, बल्कि आप से ज्यादा बेहतर ढंग से सिखाई थी, लेकिन मैं ने मोहरा बनने से साफ इनकार कर दिया.”

आयशा मुंह बना कर रह गई.

रात में नरगिस ने अपने शौहर को सारी बातों से आगाह किया. नरगिस की बातें सुन कर शाहरुख हैरान रह गया. उस ने अपनी मां और अपनी सास को बुराभला कहना शुरू किया, लेकिन नरगिस ने उसे समझाया कि एक को अपने बेटे की कमी पर परदा डालना है तो दूसरी को अपनी बेटी की कमी पर परदा डालना है.

दोनों अपनीअपनी औलाद की खातिर इस हद तक गिरने के लिए तैयार हैं. दोनों मां हैं और मां अपनी औलाद की खातिर कुछ भी करगुजरने के लिए ऐसे ही तैयार रहती है, लेकिन अफसोस कि दोनों ही गलत हैं.

फिर नरगिस ने शाहरुख को एक प्लान समझाते हुए कहा कि शायद इस तरह हमारे लिए कोई राह निकल आए.

सुबह होते ही शाहरुख ने अपनी मां से कहा कि फलां डाक्टर का पता चला है जो बेऔलाद लोगों के लिए मसीहा साबित हो रहा है.

आयशा ने उन्हें उस डाक्टर के पास जाने के लिए कहा. वे दोनों डाक्टर के पास गए. जब वापस लौटे तो औलाद की भूखी आयशा दरवाजे पर नजरें गड़ाए बैठी थी. आते ही फौरन सवाल किया, “क्या कहा डाक्टर ने?”

वे दोनों अपने प्लान के मुताबिक मुंह लटकाए अपने कमरे में चले गए. मां का मन नहीं माना और वह भी पीछेपीछे उन के कमरे में गई, “आखिर क्या कहा डाक्टर ने? कुछ तो बताओ?”

शाहरुख ने जवाब दिया, “मां, डाक्टर ऐसी तरकीब बता रहा है जो मुमकिन ही नहीं है.”

आयशा ने परेशान होते हुए पूछा, “कुछ मुझे भी तो पता चले कि क्या कहा डाक्टर ने?”

शाहरुख ने कहा, “आप नरगिस से ही पूछ लो.”

यह सुन कर आयशा बोली, “क्या ड्रामा है. आखिर कोई कुछ बता क्यों नहीं रहा है. बताओगे नहीं तो कैसे समझ में आएगा कि मुमकिन है या नहीं. तुम लोगों से ज्यादा दुनिया मैं ने देख रखी है. कौन सा काम है जो मुमकिन नहीं…”

नरगिस ने आखिरकार बताया, “डाक्टर का कहना है कि शौहरबीवी दोनों को एक साल कश्मीर घाटी में गुजारना पड़ेगा. वहां की बर्फीली आबोहवा और क़ुदरती खानपान में एक साल गुजारने के बाद शाहरुख की अंदरूनी कमी दूर होने की पूरी उम्मीद है. और अगर कश्मीर घाटी में हमल ठहरता है तो बच्चा दूध का धुला पैदा होगा.”

आयशा ने तड़पते हुए कहा, “सचमुच ऐसा कहा डाक्टर ने?”

शाहरुख बोला, “जी बिलकुल.”

आयशा ने पूछा, “तो फिर दिक्कत क्या है?”

शाहरुख बोला, “एक साल तक वहां रहना कैसे मुमकिन होगा? वहां सर्दी भी जबरदस्त पड़ती है.”

आयशा ने कहा, “जिस आबोहवा में इनसान रहने लगता है आहिस्ताआहिस्ता उस का आदी हो जाता है. तुम लोग बस जाने की तैयारी करो. मैं और कुछ सुनना नहीं चाहती.”

यह कहते हुए आयशा उन के कमरे से बाहर निकल गई. उस के जाते ही दोनों शौहरबीवी खुशी से झूम उठे, इसलिए कि उन के प्लान का पहला हिस्सा आसानी से मुकम्मल हो चुका था.

ठीक 8 महीने बाद उन के प्लान का दूसरा हिस्सा शुरू हुआ. अफजल एक गरीब कश्मीरी था. वह रोज ताजा फल शाहरुख के डेरे पर ला कर पहुंचा जाता था. अफजल की बीवी कुलसूम दुबलीपतली, बला की खूबसूरत कश्मीरी औरत थी. पूरे कश्मीर का हुस्न उस के बदन में समाया हुआ लगता था. अफजल की गैरमौजूदगी में कभीकभी कुलसूम भी फल पहुंचा जाया करती थी.

एक दिन कुलसूम का निकला हुआ पेट देख कर नरगिस की उम्मीदों को पर लग गए. उस ने पूछा, “बहन, कितने महीने हो गए?”

कुलसूम ने बताया, “8 महीने हो गए बीबीजी.”

नर्गिस ने पूछा, “पहले से आप के कितने बच्चे हैं?”

कुलसूम शरमाते हुए बोली, “10 बच्चे हैं जी. पर आप ऐसा क्यों पूछ रही हैं?”

नरगिस ने अपनी पूरी कहानी कुलसूम को सुना दी. कहानी सुनातेसुनाते दोनों के दामन आंसुओं से भीग गए.

कुलसूम ने घर जा कर अपने शौहर अफजल से पूरी बात सुनाई और कहा कि क्यों न हम अपनी आने वाली औलाद उसे दे दें. वह लेने की ख्वाहिशमंद है.

कुलसूम की बातें सुन कर अफजल हैरान रह गया. उस ने कहा, “तुम कैसी मां हो जो अपना बच्चा दूसरी औरत को देने के लिए तैयार हो.”

कुलसूम बोली, “मां होने का सुख एक औरत के मुकम्मल होने का सुबूत होता है. मुझे मां होने का भरपूर सुख मिला है. क्यों न जो इस सुख से महरूम है उसे अपनी तरफ से औलाद की दौलत दे कर उसे भी मालामाल कर दिया जाए.”

अफजल अपनी बीवी की बातें सुन कर सोचने के लिए मजबूर हो गया और बोला, “ठीक है, जैसी तुम्हारी मरजी.”

फिर अगले महीने कुलसूम को एक नहीं, बल्कि जुड़वां बेटे हुए. उस ने एक बेटा नरगिस को दे कर उस की गोद हरी कर दी. बदले में नरगिस ने अपने गले में पड़ा हीरे का हार कुलसूम को देना चाहा, लेकिन उस ने लेने से साफ इनकार कर दिया.

फिर साल पूरा होते ही शाहरुख और नरगिस अपनी औलाद के साथ हवेली लौट आए. आयशा के तो पैर ही जमीन पर नहीं पड़ रहे थे.

शानदार दावत दी गई. नरगिस के मायके से भी लोग आए थे. मेहमानों की भीड़ से अलग शाहरुख और नरगिस एकदूसरे को एहसानमंद नजरों से देख रहे थे. उन की चतुराई से हवेली को वारिस और नरगिस को औलाद मिल गई थी.

Sexual Health: सैक्स न करने की वजह से हो सकते हैं आप के शरीर में नुकसान

Sexual Health: अपनी बौडी को हैल्दी और फिट रखने के लिए कई लोग जिम जाते हैं, पार्क जाते हैं, ऐक्सरसाइज करते हैं, हैल्दी डाइट लेते हैं और भी कई ऐसी चीजें करते हैं जिस से कि वे लंबे समय तक फिट रह सकें, लेकिन इन सब के साथ हमें फिट रखने के लिए एक और चीज की जरूरत पड़ती है. जी हां, सैक्स हमें फिजिकली और मैंटली दोनों तरीके से फिट रखने में मदद करता है.

कुछ लोग अपने काम की वजह से या अन्य किसी वजहों से अपनी सैक्स लाइफ को बिलकुल ही इग्नोर करने लगते हैं जो गलत है. लंबे समय तक सैक्स न करने से हमारे शरीर को काफी नुकसान पहंचता है. तो चलिए आज हम आप को बताएंगे कि सैक्स न करने से या कभीकभी करने से हमारे शरीर को किस तरह से नुकसान पहुंच सकता है.

स्ट्रैस का बढ़ना

सैक्स एक ऐसा प्रोसैस है जिसे चाहे महिला हो या पुरुष दोनों ही काफी ऐंजौय करते हैं और ऐसा माना भी गया है कि सैक्स करने से हमारे माइंड का जितना भी स्ट्रैस है, रिलीज हो जाता है. इसी के चलते अगर हम लंबे समय तक सैक्स नहीं करते हैं, तो हमारे शरीर और दिमाग में इस का गहरा असर होता है और तनाव बढ़ने के चांस ज्यादा हो जाते हैं.

स्किन का डल होना

सैक्स करने से हमारा मन काफी खुश रहता है और हैल्दी सैक्स लाइफ का मतलब है आप अपने शरीर के साथ साथ मन से भी खुश रहोगे और जो इनसान मन से खुश रहता है उस की त्वचा अपनेआप ही ग्लो करने लगती है. ऐसे में लंबे समय तक सैक्स न करने से आपकी स्किन डल और बेजान दिख सकती है.

दूसरों में बढ़ सकती है दिलचस्पी

पार्टनर्स को एकदूसरे के साथ समय जरूर बिताना चाहिए, क्योंकि अगर किसी कारण से महिला और पुरुष अपने काम के चलते अपने पार्टनर को टाइम नहीं दे पा रहे हैं और दोनों पार्टनर्स के बीच एक हैल्दी सैक्स लाइफ नहीं बन पा रही है, तो ऐसे में संभव है कि उन की दिलचस्पी बाहर किसी और में पैदा होने लगे. जब इनसान को सैक्स का सुख घर में नहीं मिलता है, तो उसे मजबूरन बाहर जाना ही पड़ता है.

इसी के साथ ही सैक्स न करने से या महीने में केवल एक या 2 बार ही सैक्स करने से इस के अलावा और भी कई समस्याएं पैदा हो सकती हैं जैसे कि प्राइवेट पार्ट्स में ड्राइनैस, ब्लड प्रैशर की प्रौब्लम, इम्यूनिटी का वीक होना, प्रोस्टैट कैंसर का खतरा आदि. ऐसे में जरूरी है कि आप अपने पार्टनर के साथ जितना हो सके उतना क्वालिटी टाइम बिताएं और अपनी सैक्स लाइफ को मजबूत बनाएं.

Talking Crow: इनसानों की तरह बोलता है यह कौआ

Talking Crow: दुनिया में अकसर ही कुछ अजीब घटित होता रहता है, जो काफी रोमांचकारी और आश्चर्यजनक लगता है. जी हां, सुनने में थोड़ा अजीब लगेगा, लेकिन यह सच है.

दरअसल, यह अनोखा और हैरान कर देने वाला मामला महाराष्ट्र के पालघर से सामने आया है. यहां एक कौआ इनसानों की तरह बोलता नजर आ रहा है. यह कौआ यहां रहने वाले एक परिवार को घायल हालत में मिला था, जो अब परिवार का सदस्य बन चुका है. इस का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. यह वाकई में एक अनोखी और दिलचस्प घटना लगती है. कौआ इनसानों की तरह बोल रहा है, जो सचमुच चौंकाने वाली बात है.

कौए की बुद्धिमानी और भाषाओं को समझने की ताकत पहले भी बहुत चर्चित रही है, लेकिन इनसान की तरह बोलने की यह घटना एक नई मिसाल पेश करती है.

लोगों ने पालतू तोता देखा होगा, पालतू बिल्ली और कुत्ता देखा होगा, लेकिन पालतू कौआ पहली बार देखा होगा. जानकारी के मुताबिक, यह मामला पालघर की वाडा तहसील के गारगांव गांव का है. यहां रहने वाले मांगल्या मुकने को कुछ समय पहले एक पेड़ के नीचे घायल अवस्था में एक कौआ मिला था. इन लोगों ने कौए की खूब देखभाल की और उस का उपचार भी किया. कौए को इस परिवार से इतना प्यार मिला कि वह अब इन के साथ ही रहता है. सुबह घूमने निकलता है और फिर वापस आ जाता है. इतना ही नहीं वह ‘पापा’, ‘मम्मी’ जैसे शब्दों को काफी स्पष्टता से बोलता है.

मुकने परिवार के बच्चों ने उसे प्यार से खाना खिलाना शुरू किया. धीरेधीरे वह कौआ उन के साथ घुलमिल गया और कंधों पर बैठ कर खेलने लगा.
तकरीबन डेढ़ साल के इस कौए ने पिछले कुछ महीनों से इनसानी शब्दों को बोलना शुरू कर दिया है. वह परिवार के सदस्यों को नाम से बुलाता है. अगर कोई किसी सदस्य को आवाज देता है, तो यह कौआ भी उसी नाम से आवाज लगाता है. इतना ही नहीं, जब घर में कोई अजनबी आता है, तो यह कौआ पूछता है कि क्या काम है? पापा को ‘आई लव यू’ भी बोलता है.

मुकने परिवार का कहना है कि यह कौआ अब न सिर्फ बोलता है, बल्कि घर की रखवाली भी करता है. दिनभर यह आसपास के जंगलों में दूसरे कौओं के साथ उड़ान भरता है और शाम होते ही घर वापस आ जाता है. कौए ने परिवार की दिनचर्या को अपना लिया है. उन की तरह ही सारे काम करता है. सुबह उठने से ले कर शाम को सोने तक.

इस बोलने वाले कौए का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका है. इस के बाद कौए को देखने के लिए आसपास के गांवों से ही नहीं, बल्कि दूरदराज से भी लोग भी पहुंच रहे हैं. यह परिवार बताता है कि यह कौआ अब उन के परिवार का अहम हिस्सा बन चुका है और उन के साथ रहने में उसे खुशी मिलती है.

Romantic Story: अभी नहीं तो कभी नहीं

Romantic Story: ‘‘मुझे यह बात सम झ नहीं आती कि मैं ने इतनी बड़ी गलती कैसे कर दी? सच कहती हूं प्रीतो, अब मैं इस रिश्ते को और नहीं निभा सकती. दे दूंगी तलाक गिरीश को, फिर सारा  झं झट खत्म हो जाएगा मेरी जिंदगी से,’’ अपनी दोस्त प्रीतो के घर आते ही सुमेधा ने बोलना शुरू कर दिया.

‘‘हूं, लगता है तेरी सासुमां पधार चुकी है तुम्हारे घर?’’ गैसचूल्हे पर चाय का पानी चढ़ाते हुए प्रीतो ने उसे कनखियों से देख कर मुसकराहट के साथ पूछा.

‘‘हां, अब तुम्हें तो सब पता ही है कि उन के यहां आते ही मैं अपने ही घर में बेगानी हो जाती हूं और दुख तो मु झे इस बात पर होता है कि गिरीश क्यों कुछ नहीं कहते? क्या उन्हें अपनी मां की गलती दिखाई नहीं देती. मेरे कुछ कहने से पहले ही मेरी सास उन के कान भर चुकी होती है मेरे खिलाफ. लेकिन इंसान में अपनी अक्ल तो होनी चाहिए न, पर नहीं. अरे, शादी ही क्यों की जब उन्हें अपनी पत्नी पर विश्वास ही नहीं है तो. रहते अपनी मां के पल्लू में ही छिप कर.

‘‘जानती हो प्रीतो, मेरी सास हमेशा यह कह कर मु झे ताना मारती रहती है कि मुसलमान के घर तो वह अपना पैर भी नहीं धरना चाहती, पर बेटे के मोह से खिंची चली आती है और मैं ने उन के बेटे पर कोई काला जादू कर दिया है वगैरहवगैरह. गिरीश से कहा मैं ने कि सम झाओ अपनी मां को कि वह मु झे मुसलिम लड़की कह कर संबोधित न करे. लेकिन वह कहता है कि बोलने दो, जो उन की मरजी है. ऐसे कैसे बोलने दूं, बता तो? क्या मेरा दिल छलनी नहीं होता उन की ऐसीवैसी बातों से?’’ एक सांस में ही सुमेधा इतनाकुछ बोल गई.

‘‘वैसे, यह बता कि चाय कैसी बनी, चीनी तो सही से है न?’’ बात को बदलने और माहौल को हलका करने के खयाल से प्रीतो ने कहा.

‘‘देख, तुम भी वैसी ही हो. सच कहते हैं लोग, जो दुखदर्द से गुजरता है वही दूसरे के दुखों का अंदाजा सही से लगा पाता है. लेकिन तुम क्या जानो मेरे दुखों को, क्योंकि तेरी तो कोई सास है ही नहीं न. तुम्हें अपना सम झ कर मैं यहां तुम से अपने दिल की बात कहने आई हूं और तुम हो कि… चल जाने दे, मैं चलती हूं,’’ कह कर वह जाने को उठने ही लगी कि प्रीतो ने उस का हाथ खींच कर फिर से सोफे पर बैठा दिया और कहने लगी, ‘‘तू क्या सम झती हो, मैं तुम्हारी पीड़ा नहीं सम झती. सब सम झती हूं, पर तुम्हें यह सम झाने की कोशिश कर रही हूं कि चाहे परिस्थिति कैसी भी हो, अगर तुम पतिपत्नी एक हो कर रहो तो फिर क्या मजाल जो कोई तुम्हारी जिंदगी में जहर घोल दे.

‘‘मैं कहती हूं कि क्यों तुम हमेशा गिरीश से उस को तलाक देने की बात करती रहती है? उस ने किया क्या है? क्या उसे बुरा नहीं लगता होगा जब उस की मां तुम्हारी इंसल्ट करती होगी. पर क्या करे बेचारा. लेकिन तुम सतर्क हो जाओ, क्योंकि तुम्हारी सास यही चाहती है कि किसी भी तरह तुम गिरीश को तलाक दे दो और फिर वह अपने बेटे की शादी अपनी पसंद की लड़की से और अपनी जात में करवा सके और इसलिए वह गिरीश की नजरों में तुम्हें नीचा व खुद को ऊंचा दिखाने की कोशिश करती रहती है. लेकिन तुम हो कि यह बात सम झती ही नहीं हो. अगर तुम्हारा यही रवैया रहा न, तो सच में गिरीश तुम्हें ही गलत सम झ कर तलाक की बात पर हामी भर देगा एक दिन, देखना तुम.

‘‘सच बताओ, क्या तुम दिल से चाहती हो कि तुम्हारा और गिरीश का तलाक हो जाए. नहीं न? तो फिर इग्नोर करो न अपनी सास की बातों को. जाने दो, वह जो करती है करने दो. अगर वह तुम्हारे हाथ का पानी तक नहीं पीना चाहती, तो न पिए, तुम्हें क्या. वह नहीं चाहती न कि उन के रहते तुम किचन में या पूजाघर में जाओ या उन का कोई भी काम करो? तो मत करो न.’’

‘‘तो फिर मैं क्या करूं प्रीतो, आखिर मैं भी तो इंसान हूं न. मु झे चिढ़ होती है. कितना, आखिर कितना बरदाश्त करूं मैं, बताओ? जब भी मेरी सास आती है गिरीश मु झ से दूरदूर रहने लगते हैं. कुछ कहतीपूछती हूं तो ठीक से जवाब नहीं देते. जाने क्या हो जाता है उन्हें अपनी मां के आने पर? लेकिन अपनी मां से तो प्यार से ही बातें करते हैं, फिर मु झ से ही उखड़ेउखड़े से क्यों रहते हैं?’’

‘‘हो सकता है वे अपनी मां के सामने तुम्हें वह प्यार न देना चाहते हों जो वे देते आए हैं. यह तो बताओ कि उन के जाने के बाद तो सब ठीक हो जाता है न? और फिर. तुम ने ही बताया था मु झे कि कितनी मुश्किल से तुम दोनों एक हो पाए हो. एक होने के लिए तुम दोनों ने अपने परिवार, यहां तक कि समाज की नाराजगी  झेली. क्या इसलिए कि छोटीछोटी बातों पर  झगड़ा करो, तलाक ले कर अलग हो जाओ? तुम्हारी सास का क्या है, वह तो आतीजाती रहती है. लेकिन जीवनभर साथ तो तुम्हीं दोनों को रहना है, तो फिर अनसुना कर दिया करो उन की बातों को. हो सके तो जीत लो अपनी सास के मन को, फिर देखना कैसे गिरीश को भी तुम ही सही लगने लगोगी,’’ प्रीतो ने जब सुमेधा को ये सब बातें सम झाईं तो उसे भी वही सही लगा और उस ने उस की कही बातें अपने मन में बैठा लीं.

सुमेधा एक सिंधी परिवार से है और गिरीश बिहार के ब्राह्मण परिवार का बेटा. दोनों के रहनसहन, खानपान बिलकुल भिन्न हैं. कोई समानता नहीं थी दोनों के बीच. लेकिन कहते हैं न, दिल लगे गधी से, तो फिर परी किस काम की. गिरीश के लिए उस की जाति ही से कितनी लड़कियों का रिश्ता आया पर उस का दिल तो सुमेधा से जा टकराया था. ऐसे में वह कैसे किसी और का बन सकता था.

एक दिन मैं ने सुमेधा से पूछा भी कि आखिर तुम दोनों कैसे मिले और कैसे प्यार पनपा तुम दोनो के बीच? तो वह बताने लगी कि कालेज के दौरान उस की मुलाकात गिरीश से हुई थी. वे यहां गुजरात के ही एक कालेज में प्रोफैसर की पोस्ट पर चयनित हुए थे और सुमेधा उसी कालेज में अंतिम वर्ष की छात्रा थी. अकसर सुमेधा पढ़ाई के सिलसिले में गिरीश से मिलती रहती थी. गिरीश भी सुमेधा को इसलिए पसंद करता था क्योंकि उसे पढ़ने और किसी चीज को जानने की बहुत जिज्ञासा रहती थी और यही बात गिरीश को अच्छी लगती थी.

फिर कैरियर और जिंदगी के शुरुआती दिनों में उस ने एक अच्छे दोस्त की तरह सुमेधा की काफी मदद भी की. वह गिरीश को ले कर बेकरार तो नहीं थी, पर एक सौफ्ट कौर्नर बनता जा रहा था उसे ले कर. शायद गिरीश भी सुमेधा की ओर आकर्षित होने लगा था, पर कहने में सकुचाता था. फिर एक दिन आगे बढ़ कर सुमेधा ने ही उसे प्रपोज कर दिया जिसे गिरीश ने तुरंत स्वीकार कर लिया. लेकिन जब दोनों के परिवारों को उन के प्यार की भनक लगी तो उन के घर में बवाल मच गया.

‘दिमाग खराब हो गया है इस लड़की का. अरे, तुम ने सोच भी कैसे लिया कि हम तुम्हारी शादी एक दूसरी जाति के लड़के से करने की इजाजत दे देंगे. समाज में हम कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे. निकाल देंगे लोग हमें सिंधी समाज से तो फिर हम कहां जाएंगे बताओ? गलती हो गई, गलती हो गई हम से जो हम ने तुम्हें इतनी छूट दे दी,’ कह कर सुमेधा के मातापिता ने उस का घर से निकलना बंद करवा दिया और उधर, गिरीश के मातापिता ने भी इस बात को सुन कर पूरा घर अपने सिर पर उठा लिया.

कहने लगे, ‘अरे, कौन सा पाप हो गया हम से जो तुम ऐसे दिन दिखा रहे हो? एक ब्राह्मण के घर मुसलिम लड़की. छीछीछी… सुनने से पहले मर क्यों नहीं गए, बहरे क्यों नहीं हो गए.’

‘पर मांपापा सुनो तो, वह लड़की मुसलिम नहीं है, सिंधी है. हां, उस के कुछ रिश्तेदारों ने मजबूरीवश ही मुसलिम धर्म अपना लिया पर उन के साथ तो अब इन का कोई संबंध ही नहीं रहा,’ गिरीश अपने मातापिता को सम झाते हुए बोला.

‘अब तुम मु झे सम झाओगे कि वह लड़की किस जात से है और अपने परिवार से संबंध रखती है या नहीं? हम ब्राह्मण हैं जो प्याजलहसुन भी हाथ नहीं लगाते और वह मांसमच्छी खाने वाली लड़की, छी… तुम ने सोच भी कैसे लिया कि हम उसे अपने घर की बहू बनाएंगे?’  िझड़कते हुए गिरीश के पिता बोले.

‘मां सम झाओ न पिताजी को कि वह लड़की शादी के बाद मांसमच्छी खाना छोड़ देगी और शादी के बाद तो वैसे भी वह हमारे कुल की बहू बन जाएगी न?’

‘नहीं बेटा, इस बार तुम्हारे बाबूजी सही हैं,’ कह कर गिरीश की मां ने भी अपना मुंह फेर लिया.

‘तो फिर ठीक है. अब मेरा भी फैसला सुन लीजिए आप दोनों, अगर मेरी शादी सुमेधा से नहीं हुई तो मैं किसी से भी शादी नहीं करूंगा और न ही कभी यहां आऊंगा,’ गुस्से से भर कर गिरीश ने भी अपना फैसला सुना दिया और उसी दिन ट्रेन पकड़ कर गुजरात आ गया. उधर सुमेधा की शादी के लिए लड़के देखे जाने लगे. सम झ नहीं आ रहा था उसे कि करे तो क्या करे? किसी तरह एक दिन मिलने पर दोनों ने विचार किया कि अभी नहीं तो कभी नहीं. ठान लिया उन्होंने कि चाहे परिवार की मरजी हो या न हो, वे एक हो कर ही रहेंगे. फिर क्या था, तय अनुसार उस रोज सुमेधा किसी जरूरी काम का बहाना बना कर घर से निकल गई और फिर दोनों ने कोर्ट में जा कर शादी कर ली. लेकिन उन्हें अपने परिवार से यह बताने की हिम्मत नहीं हो रही थी कि उन्होंने कोर्ट में शादी कर ली, पर बताना तो था ही.

सुनते ही गिरीश के मातापिता आगबबूला हो गए और उधर सुमेधा के परिवार ने भी कह दिया कि अब उन्हें अपनी बेटी से कोई लेनादेना नहीं है. इधर सिंधी समाज भी इस शादी का विरोध करने लगा. समाज वाले कहने लगे कि या तो सुमेधा के मातापिता लिखित में अपनी बेटी से रिश्ता तोड़ दें, या फिर सिंधी समाज से अलग हो जाएं. कोई भी मातापिता अपने बच्चे से गुस्सा तो हो सकते हैं पर उन से कभी रिश्ता तोड़ने की नहीं सोच सकते. सो कह दिया उन्होंने कि चाहे जो हो जाए, वे अपनी बेटी के साथ हैं और रहेंगे हमेशा.

भले ही पिता कितना भी सख्त हो जाए पर मां तो मां होती है न, गिरीश की मां ने भी सबकुछ भुला कर अपने बेटे को माफ कर दिया. लेकिन सुमेधा को नहीं, क्योंकि उसे लगता है कि उस ने ही बापबेटे के बीच खाई का काम किया है. आज तक उस ने सुमेधा को अपनी बहू के रूप में नहीं स्वीकारा है. लेकिन मैं जानती हूं कि सुमेधा भी एक ब्राह्मण परिवार से है, पर उस की सास यह मानने को कतई तैयार नहीं है.

सिंधियों का इतिहास पढ़ा है मैं ने, जानती हूं कि कैसे सिंधी से जबरन उन्हें मुसलमान बनाया गया. 700 ईस्वी में हिंदूब्राह्मण राजा दाहिर, सिंध के शासक थे. अरबी लुटेरों से लड़ते हुए वे शहीद हो गए. इस के बाद सिंध में इसलाम की घुसपैठ शुरू हो गई. अधिसंख्यक सिंधी मुसलमान बन गए. ब्राह्मण दाहिर के पुत्र भी मुसलिम बन गए. भयांक्रांतता के चलते हिंदू इसलाम को मानने के लिए मजबूर हो गए. ब्राह्मणवाद, इसलामाबाद हो गया. अरबी बहुत दिनों तक सिंध में रहे और हिंदुओं को इसलाम में लाते रहे. सिंध से ले कर बलूचिस्तान तक जितने शोषित, पीडि़त और दलित वर्ग के लोग थे, अरबों ने उन्हें मुसलमान बना दिया.

हिंदुओं में फूट, आपसी कलह और भेदभाव के चलते आखिरकार वे मतांतरित हुए. धीरेधीरे सिंध में मुसलमान अधिसंख्यक हो गए और बचेखुचे हिंदू अल्पसंख्यक हो गए. अब जो अल्पसंख्यक हिंदू बचे, वे या तो इसलाम धर्म कुबूल कर लें या फिर यह देश छोड़ कर चले जाएं. यही 2 विकल्प बचे थे उन के पास और तभी शायद सुमेधा के पूर्वज सिंध प्रांत छोड़ कर 1947 के बाद यहां भारत के गुजरात में आ बसे.

आज भी देश में हिंदुओं में पारस्परिक एकता का अभाव है. देश में जातपांत का बोलबाला है. अनेक जातिवादी घटक हैं. दलगत नीतियों का वर्चस्व है. ऐसी ही स्थिति सिंध में थी और इन्हीं दुर्बलताओं का फायदा अरबी लुटेरों ने उठाया था. जाति का कहर सहती जनता ने इसलाम धर्म कुबूलना ही सही सम झा और कुछ वहां से हिंदू राजाओं की शरण में भाग आए.

उफ्फ. मैं भी न, कौन से इतिहास के पन्ने पलटने लग गई. प्रीतो खुद से ही कहने लगी, चलो जल्दी करो प्रीतो, बच्चे स्कूल से आते ही होंगे और अगर उन्हें खाना नहीं मिला तो फिर तेरी खैर नहीं. और वह किचन में चली गई.

वैसे तो सुमेधा अकसर प्रीतो के घर आतीजाती रहती थी और वह भी, लेकिन अभी उस की सास आई हुई है, इस कारण प्रीतो उस के घर नहीं जाती थी. पर सुमेधा क्यों नहीं आ रही थी उस के घर, इस बात की उसे चिंता होने लगी. ‘कहीं उस दिन सुमेधा को मेरी बात बुरी तो नहीं लग गई होगी और इसी कारण वह…’ उस ने अपनेआप से कहा.

इतने दिन बाद सुमेधा को अपने घर आए देख प्रीतो बहुत खुश हो गई. कहने लगी, ‘‘अरे, सुमेधा, आआ, वैसे भी कहां थी इतने दिनों से? बड़ी मुसकरा रही है, लगता है तेरी सास चली गई.’’

‘‘नहीं प्रीतो, मेरी सास यहीं है और एक बात बताऊं, उन्होंने मु झे अपना लिया.’’

‘‘अच्छा, पर यह सब हुआ कैसे?’’ आश्चर्य से प्रीतो ने पूछा तो वह कहने लगी कि उस ने सास की फुजूल की बातों को दिल से लगाना छोड़ दिया. वह जो कहती, सुन लेती, उस की बातों पर कोई प्रतिक्रिया न देती. तो उस ने बोलना कम कर दिया और इस कारण घर में कलह होना बंद हो गया. कोई कारण ही नहीं होता उन्हें अपने बेटे से सुमेधा की शिकायत करने का. फिर एक रात उस की तबीयत बहुत खराब हो गई. सुबह जब डाक्टर से दिखाया तो डाक्टर ने बताया कि उस की सास को डेंगू हो गया और प्लेटलेट्स भी बहुत कम हो गए हैं. यह सुन कर गिरीश बहुत घबरा गए.

लेकिन सुमेधा ने उसे ढाढ़स बंधाते हुए कहा कि सब ठीक हो जाएगा. इस दौरान उस ने अपनी सास की बहुत सेवा की. 4-5 दिनों तक उस के साथ अस्पताल में ही रही और सुमेधा की सेवासुश्रूषा से उस की सास जल्द ही ठीक हो कर घर आ गई. अपनी आंखों में आंसू लिए वह कहने लगी कि उस ने अपनी बहू को पहचानने में गलती कर दी थी और अब उसे उस से कोई शिकायत नहीं है.

‘‘चलो, अच्छा हुआ. अंत भला सो सब भला, लेकिन अब तो तू गिरीश से तलाक नहीं लेगी न?’’

सुमेधा को छेड़ते हुए प्रीतो ने कहा तो वह भी हंस पड़ी,  ‘‘नहीं, कभी नहीं.’’

Family Story: घुटन – मैटरनिटी लीव के बाद क्या हुआ शुभि के साथ?

Family Story: शुभि ने 5 महीने की अपनी बेटी सिया को गोद में ले कर खूब प्यारदुलार किया. उस के जन्म के बाद आज पहली बार औफिस जाते हुए अच्छा तो नहीं लग रहा था पर औफिस तो जाना ही था. 6 महीने से छुट्टी पर ही थी.

मयंक ने शुभि को सिया को दुलारते देखा तो हंसते हुए पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘मन नहीं हो रहा है सिया को छोड़ कर जाने का.’’

‘‘हां, आई कैन अंडरस्टैंड पर सिया की चिंता मत करो. मम्मीपापा हैं न. रमा बाई भी है. सिया सब के साथ सेफ और खुश रहेगी, डौंट वरी. चलो, अब निकलते हैं.’’

शुभि के सासससुर दिनेश और लता ने भी सिया को निश्चिंत रहने के लिए कहा, ‘‘शुभि, आराम से जाओ. हम हैं न.’’

शुभि सिया को सास की गोद में दे कर फीकी सी हंसी हंस दी. सिया की टुकुरटुकुर देखती आंखें शुभि की आंखें नम कर गईं पर इस समय भावुक बनने से काम चलने वाला नहीं था. इसलिए तेजी से अपना बैग उठा कर मयंक के साथ बाहर निकल गई.

उन का घर नवी मुंबई में ही था. वहां से 8 किलोमीटर दूर वाशी में शुभि का औफिस था. मयंक ने उसे बसस्टैंड छोड़ा. रास्ते भर बस में शुभि कभी सिया के तो कभी औफिस के बारे में सोचती रही. अकसर बस में सीट नहीं मिलती थी. वह खड़ेखड़े ही कितने ही विचारों में डूबतीउतरती रही.

शुभि एक प्रसिद्ध सौंदर्य प्रसाधन की कंपनी में ऐक्सपोर्ट मैनेजर थी. अच्छी सैलरी थी. अपने कोमल स्वभाव के कारण औफिस और घर में उस का जीवन अब तक काफी सुखी और संतोषजनक था पर आज सिया के जन्म के बाद पहली बार औफिस आई थी तो दिल कुछ उदास सा था.

औफिस में आते ही शुभि ने इधरउधर नजरें डालीं, तो काफी नए चेहरे दिखे. पुराने लोगों ने उसे बधाई दी. फिर सब अपनेअपने काम में लग गए. शुभि जिस पद पर थी, उस पर काफी जिम्मेदारियां रहती थीं. हर प्रोडक्ट को अब तक वही अप्रूव करती थी.

शुभि की बौस शिल्पी उस की लगन, मेहनत से इतनी खुश, संतुष्ट रहती थी कि वह अपने भी आधे काम उसे सौंप देती थी, जिन्हें काम की शौकीन शुभि कभी करने से मना नहीं करती थी.

शिल्पी कई बार कहती थी, ‘‘शुभि, तुम न हो तो मैं अकेले इतना काम कर ही नहीं पाऊंगी. मैं तो तुम्हारे ऊपर हर काम छोड़ कर निश्चिंत हो जाती हूं.’’

शुभि को अपनी काबिलीयत पर गर्व सा हो उठता. नकचढ़ी बौस से तारीफ सुन मन खुश हो जाता था. शुभि उस के वे काम भी निबटाती रहती थी, जिन से उस का लेनादेना भी नहीं होता था.

औफिस पहुंचते ही शुभि ने अपने अंदर पहली सी ऊर्जा महसूस की. अपनी कार्यस्थली पर लौटते ही कर्तव्य की भावना से उत्साहित हो कर काम में लग गई. शिल्पी से मिल औपचारिक बातों के बाद उस ने अपने काम देखने शुरू कर दिए. 1 महीने बाद ही कोई नया प्रोडक्ट लौंच होने वाला था. शुभि उस के बारे में डिटेल्स लेने के लिए शिल्पी के पास गई तो उस ने सपाट शब्दों में कहा, ‘‘शुभि, एक नई लड़की आई है रोमा, उसे यह असाइनमैंट दे दिया है.’’

‘‘अरे, क्यों? मैं करती हूं न अब.’’

‘‘नहीं, तुम रहने दो. उस के लिए तो देर तक काम रहेगा. तुम्हें तो अब घर भागने की जल्दी रहा करेगी.’’

‘‘नहींनहीं, ऐसा नहीं है. काम तो करूंगी ही न.’’

‘‘नहीं, तुम रहने दो.’’

शुभि के अंदर कुछ टूट सा गया. सोचने लगी कि वह तो हर प्रोडक्ट के साथ रातदिन एक करती रही है. अब क्यों नहीं संभाल पाएगी यह काम? सिया के लिए घर टाइम पर पहुंचेगी पर काम भी तो उस की मानसिक संतुष्टि के लिए माने रखता है. पर वह कुछ नहीं बोली. मन कुछ उचाट सा ही रहा.

शुभि ने इधरउधर नजरें दौड़ाईं. अचानक कपिल का ध्यान आया कि कहां है. सुबह से दिखाई नहीं दिया. उसे याद करते ही शुभि को मन ही मन हंसी आ गई. दिलफेंक कपिल हर समय उस से फ्लर्टिंग करता था. शुभि को भी इस में मजा आता था. वह मैरिड थी, फिर प्रैगनैंट भी थी. तब भी कपिल उस के आगेपीछे घूमता था. कपिल उसे सीधे लंचटाइम में ही दिखा. आज वह लंच ले कर नहीं आई थी. सोचा था कैंटीन में खा लेगी. कल से लाएगी. कैंटीन की तरफ जाते हुए उसे कपिल दिखा, तो आवाज दी, ‘‘कपिल.’’

‘‘अरे, तुम? कैसी हो?’’

‘‘मैं ठीक हूं, सुबह से दिखे नहीं?’’

‘‘हां, फील्ड में था, अभी आया.’’

‘‘और सुनाओ क्या हाल है?’’

‘‘सब बढि़या, तुम्हारी बेटी कैसी है?’’

‘‘अच्छी है. चलो, लंच करते हैं.’’

‘‘हां, तुम चल कर शुरू करो, मैं अभी आता हूं,’’ कह कर कपिल एक ओर चला गया.

शुभि को कुछ अजीब सा लगा कि क्या यह वही कपिल है? इतना फौरमल? इस तरह तो उस ने कभी बात नहीं की थी? फिर शुभि पुराने सहयोगियों के साथ लंच करने लगी. इतने दिनों के किस्से, बातें सुन रही थी. कपिल पर नजर डाली. नए लोगों में ठहाके लगाते दिखा, तो वह एक ठंडी सांस ले कर रह गई. सास से फोन पर सिया के हालचाल ले कर वह फिर अपने काम में लग गई.

शाम 6 बजे शुभि औफिस से बसस्टैंड चल पड़ी. पहले तो शायद ही वह कभी 6 बजे निकली हो. काम ही खत्म नहीं होता था. आज कुछ काम भी खास नहीं था. वह रास्ते भर बहुत सारी बातों पर मनन करती रही… आज इतने महीनों बाद औफिस आई, मन क्यों नहीं लगा? शायद पहली बार सिया को छोड़ कर आने के कारण या औफिस में कुछ अलगअलग महसूस करने के कारण. आज याद आ रहा था कि वह पहले कपिल के साथ फ्लर्टिंग खूब ऐंजौय करती थी, बढि़या टाइमपास होता था. उसे तो लग रहा था कपिल उसे इतने दिनों बाद देखेगा, तो खूब बातें करेगा, खूब डायलौगबाजी करेगा, उसे काम ही नहीं करने देगा. इन 6 महीनों की छुट्टियों में कपिल ने शुरू में तो उसे फोन किए थे पर बाद में वह उस के हायहैलो के मैसेज के जवाब में भी देर करने लगा था. फिर वह भी सिया में व्यस्त हो गई थी. नए प्रोडक्ट में उसे काफी रुचि थी पर अब वह क्या कर सकती थी, शिल्पी से तो उलझना बेकार था.

घर पहुंच कर देखा सिया को संभालने में सास और ससुर की हालत खराब थी. वह भी पहली बार मां से पूरा दिन दूर रही थी. शुभि ने जैसे ही सिया कहा, सिया शुभि की ओर लपकी तो वह, ‘‘बस, अभी आई,’’ कह जल्दीजल्दी हाथमुंह धो सिया को कलेजे से लगा लिया. अपने बैडरूम में आ कर सिया को चिपकाएचिपकाए ही बैड पर लेट गई. न जाने क्यों आंखों की कोरों से नमी बह चली.

‘‘कैसा रहा दिन?’’ सास कमरे में आईं तो शुभि ने पूछा, ‘‘सिया ने ज्यादा परेशान तो  नहीं किया?’’

‘‘थोड़ीबहुत रोती रही, धीरेधीरे आदत पड़ जाएगी उसे भी, तुम्हें भी और हमें भी. तुम्हारा औफिस जाना भी तो जरूरी है.’’

अब तक मयंक भी आ गया था. रमा बाई रोज की तरह डिनर बना कर चली गई थी. खाना सब ने साथ ही खाया. सिया ने फिर शुभि को 1 मिनट के लिए भी नहीं छोड़ा.

मयंक ने पूछा, ‘‘शुभि, आज बहुत दिनों बाद गई थी, दिन कैसा रहा?’’

‘‘काफी बदलाबदला माहौल दिखा. काफी नए लोग आए हैं. पता नहीं क्यों मन नहीं लगा आज?’’

‘‘हां, सिया में ध्यान रहा होगा. खैर, धीरेधीरे आदत पड़ जाएगी.’’

अगले 10-15 दिनों में औफिस में जो भी बदलाव शुभि ने महसूस किए, उन से उस का मानसिक तनाव बढ़ने लगा. शिल्पी 35 साल की चिड़चिड़ी महिला थी. उस का पति बैंगलुरु में रहता था. मुंबई में वह अकेली रहती थी. उसे घर जाने की कोई जल्दी नहीं होती थी. 15 दिन, महीने में वीकैंड पर उस का पति आता रहता था. उस की आदत थी शाम 7 बजे के आसपास मीटिंग रखने की. अचानक 6 बजे उसे याद आता था कि सब से जरूरी बातें डिस्कस करनी हैं.

शुभि को अपने काम से बेहद प्यार था. वह कभी देर होने पर भी शिकायत नहीं करती थी. मध्यवर्गीय परिवार में पलीबढ़ी शुभि ने यहां पहुंचने तक बड़ी मेहनत की थी. 6 बजे के आसपास जब शुभि ने अपनी नई सहयोगी हेमा से पूछा कि घर चलें तो उस ने कहा, ‘‘मीटिंग है न अभी.’’

शुभि चौंकी, ‘‘मीटिंग? कौन सी? मुझे तो पता ही नहीं?’’

‘‘शिल्पी ने बुलाया है न. उसे खुद तो घर जाने की जल्दी होती नहीं, पर दूसरों के तो परिवार हैं, पर उसे कहां इस बात से मतलब है.’’ शुभि हैरान सी ‘हां, हूं’ करती रही. फिर जब उस से रहा नहीं गया तो शिल्पी के पास जा पहुंची. बोली, ‘‘मैम, मुझे तो मीटिंग के बारे में पता ही नहीं था… क्या डिस्कस करना है? कुछ तैयारी कर लूं?’’

‘‘नहीं, तुम रहने दो. एक नए असाइनमैंट पर काम करना है.’’

‘‘मैं रुकूं?’’

‘‘नहीं, तुम जाओ,’’ कह कर शिल्पी लैपटौप पर व्यस्त हो गई.

शुभि उपेक्षित, अपमानित सी घर लौट आई. उस का मूड बहुत खराब था. डिनर करते हुए उस ने अपने मन का दुख सब से बांटना चाहा. बोली, ‘‘मयंक, पता है जब से औफिस दोबारा जौइन किया है, अच्छा नहीं लग रहा है. लेट मीटिंग में मेरे रहने की अब कोई जरूरत ही नहीं होती… कहां पहले मेरे बिना शिल्पी मीटिंग रखती ही नहीं थी. मुझे कोई नया असाइनमैंट दिया ही नहीं जा रहा है.’’

फिर थोड़ी देर रुक कर कपिल का नाम लिए बिना शुभि ने आगे कहा, ‘‘जो मेरे आगेपीछे घूमते थे, वे अब बहुत फौरमल हो गए हैं. मन ही नहीं लग रहा है… सिया के जन्म के बाद मैं ने जैसे औफिस जा कर कोई गलती कर दी हो. आजकल औफिस में दम घुटता है मेरा.’’

मयंक समझाने लगा, ‘‘टेक इट ईजी, शुभि. ऐसे ही लग रहा होगा तुम्हें… जौब तो करना ही है न?’’

‘‘नहीं, मेरा तो मन ही नहीं कर रहा है औफिस जाने का.’’

‘‘अरे, पर जाना तो पड़ेगा ही.’’

सास खुद को बोलने से नहीं रोक पाईं. बोलीं, ‘‘बेटा, घर के इतने खर्चे हैं. दोनों कमाते हैं तो अच्छी तरह चल जाता है. हर आराम है. अकेले मयंक के ऊपर होगा तो दिक्कतें बढ़ जाएंगी.’’

शुभि फिर चुप हो गई. वह यह तो जानती ही थी कि उस की मोटी तनख्वाह से घर के कई काम पूरे होते हैं. अपने पैरों पर खड़े होने को वह भी अच्छा मानती है पर अब औफिस में अच्छा नहीं लग रहा है. उस का मन कर रहा है कुछ दिन ब्रेक ले ले. सिया के साथ रहे, पर ब्रेक लेने पर ही तो सब बदला सा है. दिनेश, लता और मयंक बहुत देर तक उसे पता नहीं क्याक्या समझाते रहे. उस ने कुछ सुना, कुछ अनसुना कर दिया. स्वयं को मानसिक रूप से तैयार करती रही.

कुछ महीने और बीते. सिया 9 महीने की हो गई थी. बहुत प्यारी और शांत बच्ची थी. शाम को शुभि के आते ही उस से लिपट जाती. फिर उसे नहीं छोड़ती जैसे दिन भर की कमी पूरी करना चाहती हो.

शुभि को औफिस में अपने काम से अब संतुष्टि नहीं थी. शिल्पी तो अब उसे जिम्मेदारी का कोई काम सौंप ही नहीं रही थी. 6 महीनों के बाद औफिस आना इतना जटिल क्यों हो गया? क्या गलत हुआ था? क्या मातृत्व अवकाश पर जा कर उस ने कोई गलती की थी? यह तो हक था उस का, फिर किसी को उस की अब जरूरत क्यों नहीं है?

ऊपर से कपिल की बेरुखी, उपेक्षा मन को और ज्यादा आहत कर रही थी. 1 बच्ची की मां बनते ही कपिल के स्वभाव में जमीनआसमान का अंतर देख कर शुभि बहुत दुखी हो जाती. कपिल तो जैसे अब कोई और ही कपिल था. थोड़ीबहुत काम की बात होती तो पूरी औपचारिकता से करता और चला जाता. दिन भर उस के रोमांटिक डायलौग, फ्लर्टिंग, जिसे वह ऐंजौय करती थी, कहां चली गई थी. कितना सूना, उदास सा दिन औफिस में बिता कर वह कितनी थकी सी घर लौटने लगी थी.

अपने पद, अपनी योग्यता के अनुसार काम न मिलने पर वह रातदिन मानसिक तनाव का शिकार रहने लगी थी. उस के मन की घुटन बढ़ती जा रही थी. शुभि ने घर पर सब को बारबार अपनी मनोदशा बताई पर कोई उस की बात समझ नहीं पा रहा था. सब उसे ही समझाने लगते तो वह वहीं विषय बदल देती.

औफिस में अपने प्रति बदले व्यवहार से यह घुटन, मानसिक तनाव एक दिन इतना बढ़ गया कि उस ने त्यागपत्र दे दिया. वह हैरान हुई जब किसी ने इस बात को गंभीरतापूर्वक लिया ही नहीं. औफिस से बाहर निकल कर उस ने जैसे खुली हवा में सांस ली.

सोचा, थोड़े दिनों बाद कहीं और अप्लाई करेगी. इतने कौंटैक्ट्स हैं… कहीं न कहीं तो जौब मिल ही जाएगी. फिलहाल सिया के साथ रहेगी. जहां इतने साल रातदिन इतनी मेहनत की, वहां मां बनते ही सब ने इतना इग्नोर किया… उस में प्रतिभा है, मेहनती है वह, जल्द ही दूसरी जौब ढूंढ़ लेगी.

उस शाम बहुत दिनों बाद मन हलका हुआ. घर आते हुए सिया के लिए कुछ खिलौने

खरीदे. घर में घुसते ही सिया पास आने के लिए लपकी. अपनी कोमल सी गुडि़या को गोद में लेते ही मन खुश हो गया. डिनर करते हुए ही

उस ने शांत स्वर में कहा, ‘‘मैं ने आज रिजाइन कर दिया.’’

सब को करंट सा लगा. सब एकसाथ बोले, ‘‘क्यों?’’

‘‘मैं इतनी टैंशन सह नहीं पा रही थी. थोड़े दिनों बाद दूसरी जौब ढूंढ़ूगी. अब इस औफिस में मेरा मन नहीं लग रहा था.’’

मयंक झुंझला पड़ा, ‘‘यह क्या बेवकूफी की… औफिस में मन लगाने जाती थी या काम करने?’’

‘‘काम ही करने जाती थी पर मेरी योग्यता के हिसाब से अब कोई मुझे काम ही नहीं दे रहा था… मानसिक संतुष्टि नहीं थी… मैं अब अपने काम से खुश नहीं थी.’’

‘‘दूसरी जौब मिलने पर रिजाइन करती?’’

‘‘कुछ दिन बाद ढूंढ़ लूंगी. मेरे पास योग्यता है, अनुभव है.’’

सास ने चिढ़ कर कहा, ‘‘क्या गारंटी है तुम्हारा दूसरे औफिस में मन लगेगा? मन न लगने पर नौकरी छोड़ी जाती है कहीं? अब एक की कमाई पर कितनों के खर्च संभलेंगे… यह क्या किया? थोड़ा धैर्य रखा होता?’’

ससुर ने भी कहा, ‘‘जब तक दूसरी जौब नहीं मिलेगी, मतलब एक ही सैलरी में घर चलेगा. बड़ी मुश्किल होगी… इतने खर्चे हैं… कैसे होगा?’’

शुभि सिया को गोद में बैठाए तीनों का मुंह देखती रह गई. उस के तनमन की पीड़ा से दूर तीनों अतिरिक्त आय बंद होने का अफसोस मनाए जा रहे थे. अब? मन की घुटन तो पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई थी.

Family Story: एक बेटी ऐसी भी – जब मंजरी ने उठाया माता-पिता का फायदा

Family Story: ‘‘नानी आप को पता है कि ममा ने शादी कर ली?’’ मेरी 15 वर्षीय नातिन टीना ने जब सुबहसुबह यह अप्रत्याशित खबर दी तो मैं बुरी तरह चौंक उठी.

मैं ने पूछा, ‘‘तुझे कैसे पता? फोन आया है क्या?’’

‘‘नहीं, फेसबुक पर पोस्ट किया है,’’ नातिन ने उत्तर दिया.

मैं ने झट से उस के हाथ से मोबाइल लिया और उस पुरुष के प्रोफाइल को देख कर सन्न रह गई. वह पाकिस्तान में रहता था. मैं अपना सिर पकड़ कर बैठ गई. ‘यह लड़की कब कौन सा दिन दिखा दे, कुछ नहीं कह सकते… इस का कुछ नहीं हो सकता.’ मैं मन ही मन बुदबुदाई.

टीना ने देखते ही अपनी मां को अनफ्रैंड कर दिया. 10वीं क्लास में है. छोटी थोड़ी है, सब समझती है.

पूरे घर में सन्नाटा पसर गया था. मेरे पति घर पर नहीं थे. वे थोड़ी देर बाद आए तो यह खबर सुन कर चौंके. फिर थोड़ा संयत होते हुए बोले, ‘‘अच्छा तो है. शादी कर के अपना घर संभाले और हमें जिम्मेदारी से मुक्ति दे. उस के नौकरी पर जाने के बाद उस के बच्चे अब हम से नहीं संभाले जाते… तुम इतनी परेशान क्यों हो?’’

मैं ने थोड़े उत्तेजित स्वर में कहा, ‘‘अरे, मुक्ति कहां मिलेगी? और जिम्मेदारी बढ़ गई है. जिस आदमी से शादी की है वह पाकिस्तानी है, अब वह वहीं रहेगी. इसीलिए तो उस ने नहीं बताया और चुपचाप शादी कर ली. अब बच्चे तो हमें ही संभालने पड़ेंगे… कम से कम मुझे शादी करने से पहले बताती तो… लेकिन जानती थी कि इस शादी के लिए हम कभी नहीं मानेंगे. मानते भी कैसे. अपने देश के लड़के मर गए हैं क्या? मुझ से तो बोल कर गई थी कि औफिस के काम से मुंबई जा रही है.’’

वे विस्फारित आंखों से अवाक से मेरी ओर देखते रह गए.

‘कोई मां इतनी स्वार्थी कैसे हो सकती है? उसे अपने बूढ़े मांबाप और बच्चों का जरा भी खयाल नहीं आया?’ मैं मन ही मन बुदबुदाई.

‘‘उफ, यह तो बहुत बुरी बात है. हमारे बारे में न सोचे, लेकिन अपने बच्चों की जिम्मेदारी तो उसे उठानी ही चाहिए… वैसे बच्चे तो हम ही संभाल रहे थे उस के बावजूद उस के यहां हमारे साथ रहने से घर में तनाव ही रहता था. अब कम से कम हम शांति से तो रह सकते हैं,’’ उन्होंने मुझे सांत्वना दी.

‘‘वह तो ठीक है, लेकिन हम भी कब तक संभालेंगे? हमारा शरीर भी थक रहा है. फिर इन का खर्चा कहां से आएगा?’’ मैं ने थके मन से कहा.

यह सुन उन्हें अपनी अदूरदर्शिता पर क्षोभ हुआ तो फिर सकारात्मक में सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘हूं.’’

हमारे कोई बेटा नहीं था. इकलौती बेटी मंजरी, जिसे हम ने कंप्यूटर इंजीनिरिंग की उच्च शिक्षा दिलाई थी, को जाने किस के संस्कार मिले थे. उस का जब दूसरा बच्चा हुआ था, तभी से हम अपना घर छोड़ कर उस के बच्चों को संभालने के लिए उस के साथ रह रहे थे. उस के पिता रिटायरमैंट के बाद भी उसे आर्थिक सहायता देने हेतु नौकरी कर रहे थे.

मंजरी के दोनों बच्चे हमारी ही देखरेख में पैदा हुए थे, पले थे. कई बार हम मंजरी के व्यवहार से आहत हो कर यह कह कर कि अब हम कभी नहीं आएंगे, अपने घर लौट जाते, फिर बच्चों की कोई न कोई समस्या देख कर लौट आते. मंजरी हमारी इस कमजोरी का पूरा लाभ उठाने में नहीं चूकती थी.

हम उसे समझाते तो वह कहती, ‘‘आप लोगों ने जिस तरह मेरी परवरिश की है वैसी मैं अपने बच्चों की नहीं होने दूंगी.’’

वास्तविकता तो यह थी कि वह बिना मेहनत के सब कुछ प्राप्त करना चाहती थी, यह हमें बहुत बाद में ज्ञात हुआ. औफिस से आ कर प्रतिदिन बताना कि आज उस की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई थी. झूठी बीमारियों की रिपोर्ट बनवा कर हमें डरा कर हम से इलाज के लिए पैसे भी ऐंठती थी.

हम सब को इमोशनली ब्लैकमेल करती थी. शुरू में तो मैं भी उस की रिपोर्ट्स देख कर घबरा जाती थी कि उस का और उस के बच्चों का क्या होगा, लेकिन उस के चेहरे पर शिकन भी नहीं होती थी. बाद में समझ आया कि अकसर वह गूगल पर बीमारियों के बारे में क्यों जानकारी लेती रहती थी. नौकरी छोड़ के बिजनैस करना, उस को बंद कर के फिर नौकरी करना यह उस की आदत बन गई थी. घर के कार्यों में तो उस की रत्ती भर भी रुचि नहीं थी. खाना बनाने वाली पर या बाजार के खाने पर ही उस के बच्चे पल रहे थे.

मंजरी ने पहली शादी नैट के द्वारा अमेरिका रहने के लोभ के कारण किसी अमेरिका निवासी से की, जिस में हम भी शामिल हुए थे. बिना किसी जानकारी के यह रिश्ता हमें समझ नहीं आ रहा था. हम ने उसे बहुत समझाया, लेकिन उस पर तो अमेरिका का भूत सवार था. फिर वही हुआ जिस का डर था. कुछ ही महीनों बाद वह गर्भवती हो कर इंडिया आ गई.

शादी के बाद अमेरिका जाने के बाद उसे पता लगा कि वह पहले से विवाहित था, तो उस के पैरों तले की जमीन खिसक गई थी. हम बेबस थे. उस ने एक बेटी को जन्म दिया. हम ने मंजरी की बेटी को अपने पास रख लिया और वह दिल्ली जा कर किसी कंपनी में नौकरी करने लगी.

एक दिन अचानक जब हम उस से मिलने पहुंचे तो यह देख कर सन्न रह गए कि वह एक पुरुष के साथ लिव इन रिलेशन में रह रही थी. हम ने अपना सिर पीट लिया. हमें देखते ही वह व्यक्ति वहां से ऐसा गायब हुआ कि फिर दिखाई नहीं दिया. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. 4 महीने का गर्भ उस के पेट में पल रहा था, असहाय से हम कर भी क्या सकते थे. अपना घर छोड़ कर उस के साथ रहने को मजबूर हो गए.

महरी ने जब डोर बैल बजाई तो मेरे विचारों का तारतम्य टूटा. किचन में जा कर बरतन खाली कर उसे दिए और डिनर की तैयारी में लग गई. लेकिन दिमाग पर अभी भी मंजरी ने ही कब्जा कर रखा था. सोच रही थी इनसान एक बार धोखा खा सकता है, 2 बार खा सकता है, लेकिन यह  तीसरी बार… मुसलमानों में तो 4 शादियों की स्वीकृति उन का धर्म ही देता है, तो क्या गारंटी है कि… और एक और बच्चा हो गया तो?

आगे की स्थिति सोच कर मैं कांप गई, लेकिन जो उस की पृष्ठभूमि थी, उस में कोई संस्कारी पुरुष तो उसे अपनाता नहीं. जो कदम उस ने उठाए हैं, उस के बाद क्या वह अपने परिवार को तथा अपनी किशोरावस्था की ओर अग्रसर होती बेटी को मुंह दिखा पाएगी? जरूर कोई बहुत बड़ा आसामी होगा, जिसे उस ने अपने चंगुल में फांस लिया होगा. पैसे के लिए वह कुछ भी कर सकती है, यह सर्वविदित था. बहुत जल्दी सारी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी, कब तक परदे के पीछे रहेगी.

टीना के द्वारा उस को फेसबुक पर अनफ्रैंड करते ही वह समझ गई कि सब को उस के विवाह की खबर मिल गई है और टीना उस से बहुत नाराज है. आए दिन उस का फोन आने लगा. लेकिन इधर की प्रतिक्रिया में कोई अंतर नहीं आया. मैं ने मन ही मन सोचा आखिर कब तक बात नहीं करूंगी? बच्चों के भविष्य के बारे में तो उस से बात करनी ही पड़ेगी.

एक बार उस का फोन आने पर जैसे ही मोबाइल को अपने कान से लगा कर मैं ने हैलो कहा, वह तुरंत बोली, ‘‘टीना को समझाओ… मुझे भी तो खुशी से जीने का हक है. मेरे विवाह से किसी को क्या परेशानी है. अभी भी मैं अपने बच्चों की जिम्मेदारी संभालूंगी. उन्हें किसी चीज की कमी नहीं होने दूंगी, क्योंकि जिस से मैं ने विवाह किया है उस का बहुत समृद्घ व्यवसाय है…’’

मुझे उस का कथन बड़ा ही हास्यास्पद लगा और मैं ने जो उस के वर्तमान पति की हैसियत के बारे में अनुमान लगाया था वह सत्य निकला. फिर एक दिन अचानक बहुत बड़ा सा कूरियर आया, जिस में बहुत महंगे मोबाइल और बच्चों के लिए कपड़े थे और औन लाइन बहुत सारा खाने का सामान, जिस में चौकलेट, केक, पेस्ट्री आदि भेजा था. सामान को देख कर चिंटू के अलावा कोई खुश नहीं हुआ.

एक दिन मंजरी ने हमें अपने बच्चों का वीजा बनवाने के लिए कहा कि एअर टिकट वह भेज देगी और हमारे लिए भी फ्लाइट के टिकट भेजेगी ताकि हम अपने घर लौट जाएं.

यह सुनते ही टीना आक्रोश में बोली, ‘‘नहीं जाना मुझे. आप के पास रहना है, आई हेट हर…’’ चिंटू बोला, ‘‘मुझे जाना है, ममा के पास, लेकिन वे यहां क्यों नहीं आतीं?’’

मैं तो शब्दहीन हो कर सन्न रह गई. थोड़ा मौन रहने के बाद कटाक्ष करते हुए बोली, ‘‘बहुत अच्छा संदेश दिया है तूने… तूने बच्चों को जन्म दिया है, तेरा पूरा अधिकार है उन पर, कानून भी तेरा ही साथ देगी. हम तो केयरटेकर मात्र हैं. हमारा कोई रिश्ता थोड़ी है बच्चों से… पूछे कोई तुम से रातरात भर जाग कर किस ने बच्चों को पाला है. वहां जाने के बाद तो हम इन से मिलने को तरस जाएंगे.

‘‘यदि तुम्हें बच्चों की इतनी चिंता होती तो ऐसा कदम उठाने से पहले सौ बार सोचती. बच्चे प्यार के भूखे होते हैं, पैसे के नहीं. हमारी भावनाओं की तो कद्र ही नहीं है, जाने किस मिट्टी की बनी है तू. मुझे अफसोस है कि  तू मेरी बेटी है, मुझे तुझ पर ही विश्वास नहीं है कि तू बच्चों को अच्छी तरह पालेगी, फिर मैं उस सौतेले बाप पर कैसे कर सकती हूं…’’

‘‘चिंटू जाना चाहे तो चला जाए, लेकिन टीना को तो मैं हरगिज नहीं भेजूंगी. जमाना वैसे ही बहुत खराब है… यदि मैं नहीं संभाल पाई तो होस्टल में डाल दूंगी,’’ मैं ने एक सांस में अपनी सारी व्यथा उगल दी. मेरे वर्चस्व का सब ने सम्मान कर के मेरे निर्णय का समर्थन किया. टीना के चेहरे पर खुशी झलक रही थी. वह मेरे गले से लिपट गई.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें