आवाज बुलंद करनी ही होगी

बचपन से ही सुनते आ रहे हैं कि पुलिस की न तो दोस्ती अच्छी, न दुश्मनी. ज्यादातर लोग मानते हैं कि पुलिस भरोसे लायक नहीं है, फिर भी उस पर भरोसा किया, पर उस का नतीजा मनमाफिक नहीं रहा.

दरअसल, कुछ दिन पहले ही दिल्ली रोड पर बने हमारे फार्महाउस पर हम ने आम का बाग लगाने के मकसद से गजरौला की एक नर्सरी से आम के 50 पौधे खरीदे थे. 5000 रुपए में सौदा तय हुआ. नर्सरी वाला 3000 हजार रुपए एडवांस लेगा और 2000 हजार रुपए पौधे लगाने के बाद उसे दिए जाएंगे.

अभी उस नर्सरी वाले ने 30 ही पौधे लगाए थे कि वह हंगामा करने लगा कि उसे पूरे 5000 रुपए चाहिए, जबकि वह पहले ही 3000 रुपए ले चुका था.

आपस में बहस होने लगी, जिस पर उस ने पुलिस को बुला लिया.

हम ने पुलिस वालों को पूरी बात समझाई. लेकिन पुलिस वाले उलटा हमें ही समझाने लगे, ‘इतने बड़े आदमी हो… इतने पैसे वाले हो कर आप जरा से रुपयों के लिए लड़ रहे हो. आप इसे पूरे पैसे दे दो न.’

आनाकानी करने पर हमारे खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई. हमें नर्सरी वाले और पुलिस की मिलीभगत समझ आ रही थी. कोई दूसरा भी हमारा साथ देने को तैयार नहीं था. वजह थी, एक तरफ पुलिस वाले और निम्न वर्ग (नर्सरी वाला), दूसरी तरफ हम बेकुसूर.

नर्सरी वाले ने तो रुपए झटके ही, पुलिस वालों ने भी हम से रुपए झटक लिए. हमें मन मार कर रुपए देने पड़े. लेकिन हैरानी की बात यह थी कि 2 दिन बाद जब हम फार्महाउस पर गए तो वहां आम का एक भी पौधा नहीं था. उस आदमी ने रात को सारे पौधे चुरा लिए थे.

साफ दिख रहा था कि पुलिस वाले उस नर्सरी वाले से मिल गए थे. बिना पुलिस वालों की सरपरस्ती के ऐसा करना मुमकिन नहीं था.

अब हमारी बारी थी एफआईआर दर्ज कराने की, पर पुलिस वालों ने केस पर हाथ ही नहीं रखा. कोई सुबूत न होने की वजह से हम किसी भी तरह की कार्यवाही नहीं कर पाए.

जब हम ने अपने कुछ परिचितों को बुलाया तो उन लोगों ने कहा कि मामला लेदे कर निबटा लो. पुलिस वालों और इन लोगों से पंगा लेना सही नहीं है.

इस तरह की धोखाधड़ी और सीनाजोरी से हम जैसे सामान्य वर्ग के लोगों में हर समय अनजान डर का साया और सवालों का घेरा जीने के अहसास को और भी मुश्किल कर देता है. ऐसा लगता है जैसे मिडिल क्लास या सामान्य वर्ग होने का मतलब नए दौर के भारत में डर और खौफ के साए में जीना ही हो गया है.

हमारे देश के संविधान ने सभी वर्गों के लोगों को समान अधिकार दिए गए हैं. लेकिन सामान्य वर्ग के लिए इन अधिकारों का अहसास भी अलग है. मध्यमवर्गीय लोग सरकार से ले कर समाज और व्यवस्था तक कहीं भी और किसी भी वक्त अपना अधिकार खो सकते हैं.

आज हालात बद से बदतर हो गए हैं. लेकिन फिर भी देश में रह रहे एक बड़े वर्ग को हमारी कानून व्यवस्था में पक्का भरोसा है. लेकिन सब से बड़ी परेशानी यह है कि वे अपने अधिकारों के बारे में जागरूक नहीं हैं.

जागरूकता का सब से पहला सबक यह है कि पुलिस जोरजुल्म करती है, जबकि वह तानाशाह नहीं है, बल्कि सेवक है और लोगों की हिफाजत के लिए उसे बहाल किया गया है.

जनता की हिफाजत करना और दूसरे अपराधों के बारे में समझ पैदा करना और उन की रोकथाम के लिए असरदार उपाय करना पुलिस की कानूनन जिम्मेदारी है. इस से अलग अगर पुलिस कुछ भी करती है तो उस पर सवाल उठाने चाहिए.

अकसर कहा जाता है कि पुलिस की पकड़ में आने पर गूंगे के मुंह में भी जबान आ जाती है, अच्छेअच्छे बोलने लगते हैं, बेकुसूर गुनाहगार हो जाते हैं.

इस बात को इतनी बार कहा गया है कि अब यही अंतिम सत्य लगता है, जबकि सचाई कुछ और है. पुलिस बेगुनाहों को गुनाहगार बनाने के लिए नहीं बल्कि बेगुनाहों को बचाने के लिए बनाई गई है.

इसी तरह उत्तर प्रदेश में रामपुर जिले में कुछ लोगों द्वारा पीडि़त की जमीन पर गैरकानूनी निर्माण कराने की शिकायत करना पीडि़त को ही महंगा पड़ गया. पुलिस में शिकायत करने पर उसे ही हवालात में डाल दिया गया. इस पुलिसिया जोरजुल्म से तंग आ कर फरियादी ने मुख्यमंत्री से इच्छा मृत्यु की गुहार लगाई.

वैसे, पुलिस की काली करतूतों की घटनाओं से न जाने कितने ही पन्ने काले किए जा सकते हैं लेकिन इन घटनाओं से सबक लेते हुए अब कोशिश यह है कि अगर गलती से भी पुलिस ऐसे मामलों में किसी बेकुसूर को धकेलती है तो सावधान बरती जाए. अब हमें अपने अधिकारों को समझना होगा, उन्हें याद रखना होगा.

इस बात में कोई शक नहीं कि हमारे देश में बहुत से बेकुसूर पुलिस की पकड़ में आ कर गुनाहगार हो गए हैं. न उन्हें पुलिस ने माफ किया, न समाज ने. इस में पुलिस की गलती है लेकिन इस से बड़ी गलती हम सब की है क्योंकि हम चुप बैठ जाते हैं. हमारी चुप्पी हम से बहुतकुछ छीन लेती है. अब हमें अपनी आवाज बुलंद करनी ही होगी.

अगर कोई बेकुसूर पुलिस की पकड़ में आता है तो वह चुप नहीं बैठे, हर मुमकिन तरीके से अपनी आवाज उठाए क्योंकि कानून सो सकता है, लेकिन बहरा नहीं हो सकता. हमारी बुलंद आवाज को उसे सुनना ही पड़ेगा.

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वाचमैन के लिए घूस 500000, यह तो बेकारी की हद है

अपनी लच्छेदार बातों और जुमलेबाजी से लोगों को सब्जबाग दिखाते रहने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रोजगार के मोरचे पर कितने नाकाम साबित हुए हैं, यह बात अब किसी सुबूत की मुहताज नहीं रह गई है. उन के 4 साल के राज में बेरोजगारों की फौज में नौजवानों की तादाद 15 करोड़ का आंकड़ा छू रही है.

बढ़ती बेरोजगारी और बेकारी के इस दौर ने एक और नई बीमारी को जन्म दिया है कि जिस दाम पर भी मिले नौकरी खरीद लो. इस की एक मिसाल 31 मार्च, 2018 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में दिखी थी. इस दिन मुखबिरी की बिना पर ग्वालियर पुलिस ने शहर के पड़ाव इलाके के एक नामी होटल सिद्धार्थ पैलेस पर छापा मारते हुए तकरीबन 50 लड़कों को गिरफ्तार किया था. इन सभी की उम्र 25 साल से कम थी.

1 अप्रैल, 2018 को एफसीआई यानी फूड कारपोरेशन औफ इंडिया के वाचमैन पदों के लिए लिखित परीक्षा होनी थी. 271 पदों के लिए एक लाख से भी ज्यादा बेरोजगार नौजवानों ने इस पद के लिए फार्म भरे थे. यह परीक्षा अलगअलग राज्यों में अलगअलग तारीखों पर हो रही थी.

इतनी ज्यादा तादाद में अगर नौजवान वाचमैन जैसी छोटी नौकरी के लिए लाइन में लगे थे तो साफ दिख रहा है कि बेरोजगारी की जमीनी हकीकत क्या है. एक वक्त में वाचमैन के इसी पद के लिए न केवल एफसीआई बल्कि केंद्र सरकार की दूसरी एजेंसियां भी उम्मीदवारों के लिए तरस जाती थीं.

एक पद के मुकाबले 3 उम्मीदवारों का आना भी बड़ी बात समझी जाती थी. लिहाजा, मुंहजबानी इंटरव्यू, तालीम और कदकाठी देख कर ही उम्मीदवारों को नौकरी पर रख लिया जाता था.

पर अब हालात उलट हैं. उम्मीदवारों के हुजूम में से काबिल उम्मीदवारों को छांटने के लिए लिखित परीक्षा ली जाने लगी है जो कतई हर्ज की बात नहीं है. हर्ज की बात है इस परीक्षा के पेपरों की बिक्री और सौदेबाजी होना जिस से वे लोग नौकरी झटक ले जाते हैं जिन की जेब में पैसा होता है.

ग्वालियर शहर में पुलिस ने 48 उम्मीदवारों और 2 दलालों को दबोचा था जो दूसरे दिन होने वाली परीक्षा के प्रश्नपत्र हल करवा रहे थे. पकड़े गए उम्मीदवारों ने यह खुलासा किया था कि उन्होंने पेपर के लिए 5-5 लाख रुपए में सौदा किया था और बेचने वालों को 50-50 हजार रुपए एडवांस में भी दे दिए थे. बाकी बची रकम नौकरी मिलने के बाद देना तय हुई थी.

उम्मीदवार इस से मुकर न जाएं इसलिए दलालों ने उन के आधारकार्ड और मार्कशीटों की मूल प्रतियां अपने पास रख ली थीं.

हरीश और अभिषेक कुमार नामक जो दलाल पकड़े गए उन्हें प्रश्नपत्र मुहैया कराने वाले दिल्ली के मास्टरमाइंड किशोर कुमार ने 30-30 हजार रुपए दिए थे. धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार के इस एक और उजागर मामले में गिरोह ने सौदा तो 135 लोगों से किया था.

पकड़े गए महज 48 लोग तो सहज समझा जा सकता है कि दूसरे शहरों में कइयों ने यह पेपर खरीदा था पर कानून के बहुत लंबे हाथों की पकड़ से वे बाहर हैं. एफसीआई भी इस घोटाले पर लीपापोती करने में जुटी हुई है.

बदला कुछ खास नहीं

48 उम्मीदवारों में से 35 अकेले बिहार के और 13 दूसरे राज्यों के थे. जब उन्हें होटल से पकड़ा गया तो उन के पास कुछ खास सामान नहीं था. मसलन, न सूटकेस, न ब्रांडेड कपड़े और न ही वे नाइट डै्रस पहने हुए थे. नकल की सहूलियत के लिए गिरोह ने पूरा होटल ही बुक करा रखा था.

दरअसल, उन में से ज्यादातर उम्मीदवार छोटी जाति के और मामूली खातेपीते घरों के थे जिन्होंने पक्की सरकारी नौकरी के लालच में 5 लाख रुपए का दांव खेलना घाटे का सौदा नहीं समझा था. पहले भी छोटी जाति और गरीब तबके के ही लोग वाचमैन यानी चौकीदार की नौकरी करते थे और आज भी करते हैं. फर्क सिर्फ इतना आया है कि अब उन्हें भी लाखों रुपए की घूस देनी पड़ रही है.

जिंदगी का गुणाभाग

ऐसा भी नहीं है कि इन 48 या इन जैसे लाखों उम्मीदवारों के पास 5 लाख रुपए जैसी गैरमामूली रकम जमा होती है, बल्कि नौकरी के लालच में इस पैसे का जुगाड़ इन्हें तरहतरह से करना पड़ता है. कोई घर की औरतों के गहने बेचता है तो कई जमीन तक बेच देते हैं.

वाचमैन पद का पे स्केल 8100 रुपए  है यानी शुरुआत में ही उसे महंगाई और दूसरे भत्तों समेत तकरीबन 20 हजार रुपए महीने मिलते हैं.

लालच या सुकून देने वाली बात यह भी रहती है कि हर 6 महीने में महंगाई भत्ता बढ़ता है यानी एक साल में पगार में तकरीबन 900 रुपए का इजाफा होता है.

वक्त गुजरते 5-6 साल में 30 हजार रुपए महीना तक हो जाती है. इतमीनान की एक और बात सरकारी नौकरियों में दूसरी सहूलियतों का मिलना भी रहती है.

मिसाल एफसीआई की ही लें तो वाचमैन को भी रहने के लिए घर या इस का भत्ता मिलता है और इलाज के लिए भी पैसा मिलता है.

एफसीआई भोपाल के एमपी नगर जोन 2 के दफ्तर में काम कर रही 56 साला एक वाचमैन का कहना है कि उसे 28 साल पहले महज 4 हजार रुपए पगार मिलती थी जो अब बढ़तेबढ़ते 56 हजार रुपए हो गई है. इतनी तगड़ी पगार नए क्लर्कों और अफसरों को भी शुरू में नहीं मिलती.

इस वाचमैन के मुताबिक, हर साल पगार इन्क्रीमैंट के जरीए भी बढ़ती है और बोनस भी मिलता है. तकरीबन 30 छुट्टियां सीएल और ईएल की शक्ल में भी मिलती हैं.

इस वाचमैन के भविष्य निधि खाते में 18 लाख रुपए जमा हो चुके हैं जो रिटायरमैंट होतेहोते 20 लाख रुपए से भी ज्यादा हो जाएंगे. इस के बाद पैंशन मिलेगी सो अलग.

सरकारी नौकरी के फायदे गिनाते हुए इस वाचमैन ने एक दिलचस्प दलील यह भी दी कि अगर वह प्राइवेट नौकरी में होता तो पगार किसी भी सूरत में 15 हजार रुपए से ज्यादा नहीं होती. उस पर भी कभी भी नौकरी से हटाए जाने का डर बना रहता और बुढ़ापा फाका करते काटना पड़ता.

इस लिहाज से 48 उम्मीदवारों ने गलत हिसाबकिताब नहीं लगाया था कि नौकरी खरीदने के लिए दिया गया पैसा 2 साल में ही वसूल हो जाएगा इसलिए सरकारी नौकरी जो एक बेफिक्र व महफूज जिंदगी की गारंटी होती है जिस को हासिल करने के लिए अगर खुद को भी बेचना पड़े तो भी सौदा घाटे का नहीं.

इन्हीं वजहों के चलते अब सरकारी नौकरियों के लिए मारामारी बढ़ रही है तो बात महज इस लिहाज से चिंता की है कि ये बिकने लगी हैं यानी बेरोजगारी के साथसाथ भ्रष्टाचार भी बढ़ रहा है.

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नई कार खरीद कर डांस करने लगीं शर्लिन चोपड़ा

भारत की एक मात्र प्लेब्वौय मौडल और बौलीवुड एक्ट्रेस शर्लिन चोपड़ा कई बार कौन्ट्रोवर्सी के चलते सुर्खियों में रह चुकी हैं लेकिन इस बार वह काफी अलग कारण से चर्चाओं में हैं. दरअसल, शर्लिन ने हाल ही में खुद को एक कार गिफ्ट की है. उनके द्वारा किया गया यह काम वाकई में सराहनीय है.

शर्लिन ने अपने लिए जो कार खरीदी है उसकी कीमत 87 लाख रुपए है. शर्लिन ने अपनी नई कार के साथ कई सारी फोटो और वीडियो शेयर की हैं.

शर्लिन द्वारा शेयर की गई एक वीडियो में इस कार को खरीदने के बाद उनकी खुशी का साफ पता चल रहा है. इस वीडियो में जब एक रिपोर्टर उनसे कार को लेकर सवाल करती हैं तो वह जवाब देने से पहले ही नाचने लगती हैं और कहती हैं कि मैं ऐसा पूरा दिन कर सकती हूं.

Huge #thanks to the #universe 🙌🙏#mercedesgls350dgrandedition #sherlynchopra

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बता दें, शर्लिन चोपड़ा का जन्म 11 फरवरी 1984 को हैदराबाद में हुआ था. वह भारत की पहली ऐसी मौडल है जिन्होंने प्लेब्वौय मेगजीन के लिए न्यूड फोटोशूट करवाया था. उन्होंने अपने बौलीवुड करियर की शुरुआत फिल्म टाइमपास से की थी. जिसके बाद उन्होंने कई क्षेत्रिय फिल्मों में भी काम किया. हालांकि, उन्हें बौलीवुड में सफलता नहीं मिली.

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कम्यूनिस्ट पार्टी का हश्र

कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी का असर अब देशभर में खत्म सा हो गया है. केरल में इस की सरकार है पर त्रिपुरा में हार के बाद लगता नहीं कि 20 साल पहले के दिन लौटेंगे. फिर भी कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी काफी समय तक गरीबों, मजदूरों, दलितों, पिछड़ों की मसीहा होने का दावा करती रही है. अब सीताराम येचुरी ने बड़ी मुश्किल से पार्टी को मनाया है कि उस कांग्रेस के साथ हाथ जोड़ा जाए जिस की वह बरसों खिलाफत करती रही है क्योंकि उस के बिना धर्म की बातें करने वाली भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला नहीं करा जा सकता.

कम्यूनिस्ट आंदोलन दुनियाभर में अब इतिहास की बात रह गया है. चीन में कम्यूनिस्ट पार्टी का राज है पर उस पार्टी में कम्यूनिज्म नाम का सा है. चीन दुनिया का बड़ा कैपिटलिस्ट देश बनता जा रहा है और जिस तेजी से उस का विकास हो रहा है वह कल सेठ देशों को पीछे छोड़ देगा. चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी बहुत ही जमीनी है और उसे उत्पादन से मतलब है, कौनकैसे कर रहा है, से कम.

भारतीय कम्यूनिस्टों को भी यही सोचना होगा. देश के गरीबों, जिन में मजदूर, पिछड़े और दलित ही नहीं अच्छेखासे सवर्ण भी शामिल हैं, को असल में उत्पादन कर के ही गरीबी से निकाला जा सकता है. यह सोचना कि पैसे का बंटवारा सही है, सपनों की बात?है. बांटोगे तो तब जब होगा. कम्यूनिस्ट पार्टी ही इस में कुछ कर सकती है क्योंकि कांग्रेस पर तो अभी भी राज करने के पुश्तैनी हक का सुरूर छाया हुआ है और भारतीय जनता पार्टी सोचती है कि जब तक यज्ञ, हवन, पूजापाठ, मंदिर, आश्रम चल रहे हैं, सब ठीक है. आम गरीब की कहीं कोई सोच ही नहीं रहा.

कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी को चीनी रास्ते से सबक लेना चाहिए और गरीबों को मेहनत करना और अपनी मेहनत के पैसे का सही इस्तेमाल सीखना चाहिए. गरीबी तब दूर होगी जब लोग ज्यादा काम करेंगे, ज्यादा उगाएंगे, ज्यादा बनाएंगे.

भारत के गरीब नारों से नहीं कारखानों से खुशहाल होंगे. उन्हें पूजापाठ नहीं, नई तकनीक चाहिए. उन्हें सड़कों पर जुलूस नहीं, नए कारखाने चाहिए, नई खेती की मशीनें चाहिए. उन्हें कर्ज नहीं सही बाजार चाहिए.

कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी ही अकेली पार्टी है जो कहने के लिए ही सही, है तो गरीब कामगारों की पार्टी जिस में धर्म, जाति, भाषा, मूल क्षेत्र का कोई मतलब नहीं, वही कर्मठता का पाठ पढ़ा सकती है.

यह बात दूसरी है कि पूरी कम्यूनिस्ट पार्टी ऊंची जातियों के लोगों के हाथों में है जो गरीबों की बात तो करते हैं पर उत्पादन बढ़ाने में अड़चनें लगाते हैं. वे हड़तालों पर भरोसा करते हैं, नई तकनीक पर नहीं. वे गरीबों को गरीब बने रहने देते हैं ताकि उन को लाल झंडे उठाने वाले मिलते रहें. आज बदलाव की जरूरत है.

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रोटी बेटी के संबंध से टूटेगी दीवार

सुरभि अग्रवाल (बदला नाम) को साल 1990 में एक दलित नौजवान केदार (बदला नाम) से प्यार हो गया तो उस ने जातपांत, नातेरिश्तेदारी, घरपरिवार और समाज की परवाह न करते हुए केदार से शादी कर साबित कर दिया कि सच्चा प्यार वाकई ऊंचनीच नहीं देखता है.

लेकिन सुरभि यह भूल गई कि महज उस के देखने न देखने से कुछ नहीं होता, धर्मकानून और समाज कभी यह गवारा नहीं करता कि ऊंची जाति का कोई लड़का या लड़की छोटी जाति के लड़के या लड़की से शादी कर धर्म के बनाए नियमों को तोड़े. लिहाजा, ऐसे लोगों का पीछा शादी के बाद भी नहीं छोड़ा जाता.

शादी के बाद पति की जाति ही पत्नी की जाति हो जाती है इसलिए अकसर लड़कियां अपना सरनेम बदल कर पति का सरनेम अपना लेती हैं जो उन की नई पहचान बन चुका होता है.

केदार से शादी करने के बाद सुरभि ने बुलंदशहर के कलक्टर दफ्तर में पति की तरह अपने दलित होने का सर्टिफिकेट मांगा जो उन्हें दे भी दिया गया. इस सर्र्टिफिकेट की बदौलत सुरभि को सैंट्रल स्कूल में टीचर की नौकरी मिल गई.

अब चूंकि वे अनुसूचित जाति की हो चुकी थीं इसलिए उन्हें कोेटे के तहत प्रमोशन भी मिले और वे सैंट्रल स्कूल की वाइस प्रिंसिपल तक बन गईं.

सुरभि तो दुनिया की चालबाजियों से अनजान घरगृहस्थी में रम गई थीं लेकिन जलने वालों के कलेजे में ठंडक नहीं पड़ रही थी कि एक ऊंची जाति की लड़की दलित लड़के के साथ शादी कर धर्म और समाज के उसूल तोड़े.

उन्होंने स्कूल मैनेजमैंट से शिकायत कर दी कि सुरभि ने नाजायज तरीके से शैड्यूल कास्ट का सर्टिफिकेट हासिल किया है इसलिए वे नौकरी और प्रमोशन की हकदार नहीं हैं.

स्कूल वालों ने इस शिकायत पर कार्यवाही करते हुए सुरभि का जाति प्रमाणपत्र रद्द कर दिया तो वे इस के खिलाफ अदालत चली गईं. इलाहाबाद हाईकोर्ट में उन्हें अधूरा इंसाफ यह मिला कि उन की नौकरी तो कायम रहेगी लेकिन जाति प्रमाणपत्र फर्जी है.

सुरभि ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की. 20 जनवरी, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए यह कहा कि किसी भी औरत की जाति उस के जन्म से तय होती है न कि इस बात से कि उस ने दूसरी जाति के मर्द से शादी की है यानी एक अग्रवाल लड़की ने अनुसूचित जाति के लड़के से शादी की है इसलिए उसे अनुसूचित जाति का सर्टिफिकेट नहीं दिया जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि चूंकि सुरभि का नौकरी का रिकौर्ड बेहतर है इसलिए उन्हें नौकरी से बरखास्त न किया जाए. रिटायरमैंट दे दी जाए.

यह है गड़बड़झाला

दूसरी जाति में शादी करना अब बेहद आम बात है लेकिन ऐसा बराबरी की जाति वालों में ही हो रहा है. हजारों नहीं बल्कि करोड़ों में से एकाध मामला ऐसा सामने आता है जिस में किसी ऊंची जाति वाले ने दलित से शादी की हो.

हालात वही हैं जो आजादी और उस के पहले थे इसलिए संविधान बनाने वालों का ध्यान इस तरफ नहीं गया था कि अगर कभी किसी ऊंची जाति वाले लड़के या लड़की ने दलित से शादी की तो उस की जाति बदलेगी या नहीं और बच्चों की जाति क्या होगी और क्या उन्हें भी रिजर्वेशन का फायदा मिलेगा.

सुरभि के मामले में आए फैसले से एक बात तो साफ हो गई कि कोई ऊंची जाति की लड़की किसी दलित लड़के से शादी करती है तो वह रिजर्वेशन की हकदार नहीं होगी लेकिन चूंकि पिता दलित है इसलिए उन से पैदा हुए बच्चे को रिजर्वेशन का फायदा मिलेगा.

इस के उलट अगर ऊंची जाति का लड़का किसी दलित लड़की से शादी करता है तो उन के बच्चे को रिजर्वेशन का फायदा नहीं मिलेगा, फिर भले ही बच्चे की मां दलित तबके की क्यों न हो.

society

मतलब औरत या मां होने के कोई माने नहीं हैं. सरकार औरतों के लिए तरहतरह की योजनाएं ला रही है. बच्चे की मार्कशीट और तमाम सरकारी दस्तावेजों में मां का नाम लिखा जाना भी जरूरी कर दिया गया है पर साफ दिख रहा है कि यह एक बेतुकी और बेवजह ही पीठ थपथपाने वाली बात है. समाज पर मर्दों का दबदबा है इसलिए बच्चा भी उन्हीं की जाति का माना जाता है.

औंधे मुंह गिरी योजना

दलित व ऊंचे तबके की खाई पाटने के मकसद से सरकार ने साल 2013 में एक योजना शुरू की थी. इस योजना का नाम था ‘डाक्टर अंबेडकर स्कीम फौर सोशल इंटीगे्रशन टू इंटरकास्ट मैरिज स्कीम 2013’.

इस योजना के तहत अगर कोई गैरदलित किसी दलित से शादी करता है तो उसे सरकार की तरफ से ढाई लाख रुपए दिए जाएंगे. सालाना 500 जोड़ों को यह रकम देने का टारगेट रखा गया था.

इस योजना में एक बंदिश यह थी कि शादी करने वाले जोड़े की सालाना आमदनी 5 लाख रुपए से ज्यादा नहीं होनी चाहिए जिसे नरेंद्र मोदी की सरकार ने खत्म कर दिया है. पर जातपांत कितने गहरे तक जड़ें जमाए बैठी है, यह बात पहले ही साल में उजागर हो गई थी जब सवा सौ करोड़ की आबादी वाले हमारे देश मेें महज 5 जोड़ों को ही यह रकम मिली. साल 2015-16 में 72 और फिर साल 2016-17 में भी 72 जोड़ों को ही यह रकम मिली. साल 2017 में 74 जोड़ों को यह रकम मिली.

हमारे देश में किसी सरकारी योजना में अगर एक हजार रुपए भी मिल रहे हों तो लोग उस के लिए मधुमक्खी की तरह टूट पड़ते हैं. लेकिन दलितों से शादी करने की योजना में अगर सौ लोग भी ढाई लाख रुपए की तगड़ी रकम लेने को तैयार नहीं हैं तो आसानी से समझा जा सकता है कि कोई भी ऊंची जाति वाला छोटी जाति वालों से शादी नहीं करना चाहता.

ऐसा हो तो बात बने

केंद्र में सत्तारूढ़ होने से पहले ही भारतीय जनता पार्टी और उसे हांकने वाले हिंदूवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सामाजिक बराबरी का राग अलापा था जिस का मकसद जैसे भी हो दलितों को अपने पाले में करना था क्योंकि उस पर ऊंची जाति की पार्टी होने का ठप्पा लगा हुआ था.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में दलित समुदाय ने भाजपा के विकास के नारे पर भरोसा जताते हुए उसे वोट दिया जिस की दूसरी अहम वजह उस के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का छोटी जाति का होना था. नरेंद्र मोदी साहू तेली समुदाय से हैं जिस की हैसियत दलितों से थोड़ी ही ऊपर है.

दलितों को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी दलित तबके पर ध्यान देंगे, पर हुआ उलटा. नोटबंदी पर उन के फैसले से सब से ज्यादा परेशानियां इसी तबके के लोगों को झेलनी पड़ीं. सामाजिक बराबरी का टोटका दिल्ली और बिहार में नहीं चला लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में चला तो इस राग की ढपली गुजरात में भी जोरशोर से बजाई गई लेकिन वहां भाजपा को कोई खास फायदा नहीं हुआ. वह सत्ता मेें तो आ गई लेकिन सियासत के जानकारों को समझ आ गया कि दलित आदिवासी तबके के लोगों का जी अब भाजपा से उचट रहा है.

जातिगत बराबरी के नाम पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने उज्जैन कुंभ में एक दलित संत उमेशनाथ के साथ क्षिप्रा नदी में डुबकी लगाई थी और इस के पहले भी जगहजगह दलितों के घर जा कर उन के साथ खाना खाया था.

बराबरी के इन टोटकों की हकीकत अब दलितों को समझ आ रही है कि इन से उन्हें कोई फायदा नहीं हुआ है उलटे उन पर होने वाले जुल्मोसितम और बढ़ने लगे हैं. ऊना के दलितों की धुनाई की तरह जगहजगह गाय के चमड़े की आड़ में दलितों की ठुकाईपिटाई अब आम बात हो चली है. भीमा कोरेगांव के हादसे के बाद तो दलित और सहम गए हैं कि आखिर जाति के नाम पर यह हो क्या रहा है.

 

हकीकत यह है कि धर्म के बाद अब सत्ता की डोर भी पूरी तरह से ऊंची जाति वालों के हाथों में आ गई है. गौरतलब है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने हिंदू राष्ट्र के एजेंडे को अंजाम देने के लिए दलितों को अपने साथ लाने की बातें तो कर रहा है पर ऐसा कोई काम नहीं कर रहा जिस से दलितों को लगे कि यह उन के भले की बात है.

संघ और भाजपा से जुड़े दलित हिंदुओं को इस बाबत राजी किया जा रहा है कि वे वर्ण व्यवस्था को मंजूरी देते हुए उन की हिंदू राष्ट्र की मुहिम का हिस्सा बन जाएं यानी ऊंची जाति वालों की पालकी ढोएं.

ये बातें दलित जागरूकता के मद्देनजर भी काफी अहम हैं जो सरकारी नौकरियों में रिजर्वेशन हटाने को ले कर भी डरे हुए हैं. दलितों से शादी की योजना ढाई लाख रुपए की इमदाद मिलने के बाद भी परवान नहीं चढ़ रही है और सुरभि जैसी लड़कियां दलित से शादी करने का कानूनी खमियाजा रिटायरमैंट ले कर भुगत रही हैं तो जरूरी है कि अगर वाकई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा बराबरी चाहते हैं तो वे दलितों से रोटीबेटी के रिश्ते पर फोकस करें.

15 जनवरी, 2018 को उज्जैन में महाकाल सेना के मुखिया महेश पुजारी ने अपने दर्जनभर साथियों समेत सवर्ण संत अवधेशानंद और भाजपा नेताओं के साथ कुंभ की डुबकी लगाने वाले दलित संत उमेशनाथ से मिल कर साफसाफ कहा कि दलितों के घर खाना खाने और उन की झोंपड़ी में रात गुजारने से देश में बराबरी नहीं आने वाली. देश का माहौल तेजी से बिगड़ रहा है और सवर्णदलित संघर्ष बढ़ रहा है. ऐसे में इस परेशानी से बचने का एकलौता रास्ता यही है कि ऊंचे तबके के लोग दलितों के बेटेबेटियों से शादी की पहल करें.

ऐसा हो पाएगा यह कहने की कोई वजह नहीं पर यह मांग पहली दफा उठी है इसलिए इसे हर लैवल पर समर्थन मिलना जरूरी है. जब तक ऊंची जाति वाले दलितों से रोटीबेटी के संबंध कायम करना शुरू नहीं करेंगे तब तक समरसता के नाम पर धर्म और राजनीति की ढपली, जो खोखली हो चली है, बजती रहेगी.

सुरभि के मामले से अहसास होता है कि दलितों से शादी की योजना भी परवान चढ़ सकती है बशर्ते इन बातों को लागू करने की हिम्मत सरकार दिखाए और इस के बाबत दलित तबका भी सरकार पर दबाए बनाए:

* कोई भी गैरदलित अगर दलित तबके के लड़के या लड़की से शादी करता है तो उसे भी रिजर्वेशन का इस शर्त पर फायदा मिलना चाहिए कि वह अगर जीवनसाथी को छोड़ेगा तो यह सहूलियत उस से छिन जाएगी.

* दलितों से शादी करने वाली योजना की रकम बढ़ाई जानी चाहिए.

* अगर दलित से शादी करने पर सुरभि अग्रवाल जैसी लड़कियों की जाति नहीं बदली जा सकती तो उन के पति को ऊंची जाति का माना जाना चाहिए लेकिन उन से रिजर्वेशन की सहूलियत नहीं छीनी जानी चाहिए.

* जाति वाले तमाम संबोधनों पर कानूनी रोक लगनी चाहिए.

* दलितों के साथ हिंसा करने वाले और उन्हें बेइज्जत करने वालों पर तुरंत कार्यवाही होनी चाहिए और फैसला आने तक उन्हें जमानत भी नहीं मिलनी चाहिए.

ऐसी बातें धर्म के ठेकेदारों को नागवार गुरजेंगी जिन की रोजीरोटी ही जातपांत फैलाने और जातिगत भेदभाव से चलती हैं पर हर लैवल पर बराबरी का दर्जा देने वाले लोकतंत्र में अगर जाति की बिना पर ज्यादती होती है जिस से संविधान और लोकतंत्र दोनों ही खतरे में पड़ते हों और देश में जातिगत लड़ाई का माहौल बने तो धर्म की परवाह और लिहाज करना दलितों के साथ सब से बड़ी ज्यादती है.

देश की तरक्की धर्म से नहीं बल्कि जातिगत बराबरी से ही होना मुमकिन है जिस की राह में सब से बड़ा रोड़ा मनुवादी वर्ण व्यवस्था है जो ऊंची जाति वाले लोगों के दिलोदिमाग में दलितों के प्रति नफरत पैदा करती है. इसे दूर करने के लिए जरूरी है कि ऊंची जाति वाले दलित तबके से रोटीबेटी का रिश्ता कायम करें और इस बाबत उन्हें रिजर्वेशन समेत जो सहूलियतें चाहिए वे दी जाएं, ठीक उसी तरह जिस तरह दलितों कोे दी जाती हैं.

उज्जैन की महाकाल सेना ने मांग नहीं की है बल्कि कट्टर हिंदूवादियों के सामने एक चुनौती पेश कर दी है कि अगर उन की मंशा वाकई जातिगत बराबरी की है तो वे दलित तबके से रोटीबेटी के संबंध बना कर दिखाएं, नहीं तो उन्हें ठगने और छलने की गरज से बराबरी के नाम पर बहाना बनाना बंद करें.

सुरभि के मामले से भी हालात साफ नहीं हो रहे कि अदालतें आखिर चाहती क्या हैं. अगर उन का अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र वाकई फर्जी था तो उन्हें नौकरी क्यों करने दी गई और सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें फर्जीवाड़े का कुसूरवार मानते हुए सजा क्यों नहीं दी.

जाहिर है कि अदालतें भी इस मसले पर चकराई हुई हैं कि ऊंची जाति की ऐसी लड़कियों को दलित मानें या न मानें जिन्होंने दलित लड़के से शादी की हैं.

यह तय कर पाना भी मुश्किल है कि अगर कोई दलित लड़की ऊंची जाति के लड़के से शादी करती है तो उस की जाति क्या होगी? वह जो जन्म से है या फिर वह जो शादी के बाद हो गई है?

लगता ऐसा है कि कानून भी नहीं चाहता कि दलितसवर्ण शादी कर गैरबराबरी की खाई पाटें. अगर दलित लड़की की औलाद को रिजर्वेशन का फायदा न मिले तो उस की गिनती ऊंची जाति वालों में की जाएगी क्योंकि उस का पति ऊंची जाति का है. ऐसे में औलाद का गुनाह क्या है जिसे रिजर्वेशन से महरूम रखा जा रहा है?

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अंबेडकर के बहाने…

14 अप्रैल को देशभर में अंबेडकर जयंतियां मनाई गईं और दलित वोटों के खिसकने के डर की वजह से भारतीय जनता पार्टी ने कुछ ज्यादा जोरों से अंबेडकर की मूर्तियों को मालाएं पहनाईं. दलितों के एकलौते देवता के रूप में भीमराव अंबेडकर भी भारतीय जनता पार्टी के ही चेले थे, यह साबित करने की पूरी कोशिश राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, संघ प्रमुख से ले कर हर जिले के भाजपा अध्यक्ष ने की.

अफसोस यही रहा है कि भाजपा अंबेडकर पर वह एकलौता हक नहीं जमा पाई जो वह राम, कृष्ण, शिव, गणेश और हनुमान पर जमा पाती है. दलितों का छोटा वर्ग ही भाजपा के साथ दिखा. ज्यादातर दूसरी पार्टियों के साथ या अलगथलग थे.

अंबेडकर की मूर्तियों को मालाएं पहनाना ही दलितों और ऊंची जातियों के बीच सदियोें की खाई पाटने के लिए काफी नहीं है. जब तक वर्ण भेद मन से नहीं जाएगा कुछ फर्क नहीं पड़ेगा और यह तब तक न जाएगा जब तक ऊंची जातियों के हिंदू अपने कर्मकांड खत्म न करेंगे.

हिंदू जन्म से ही साबित करने लगते हैं कि वे कौन सी जाति के हैं. यह उन के नाम के साथ चिपका होता है. उन के जन्म के रीतिरिवाजों के साथ लगा होता है. हाथ में पहने कलेवे से जाहिर होता है. माथे पर तिलक इस का सार्वजनिक विज्ञापन करता है. निजी इंगलिश मीडियम स्कूल में दाखिला लेने का मतलब होता है कि बच्चा ऊंची जाति का है क्योंकि सिवा ईडब्लूएस कोटे के इन स्कूलों में यदाकदा ही दलित बच्चों को जगह मिलती है.

कालेजों में मैस में ऊंची जातियों और नीची जातियों के छात्रों का अलगअलग बैठना साबित करता है कि कौन क्या है. प्रेम विवाहों में ऊंचीनीची जातियों पर देशभर में हो रहे विवाद साबित करते हैं कि यह भेदभाव तो युवाओं तक में है. यह सब कोई पिछले जमाने की बात नहीं है.

भारतीय जनता पार्टी के तेजतर्रार नेता जो हवा देते हैं उस से साफ लगता है कि उन के दिलों पर जाति का अहम सवार है. पार्टी में काफी दलित है पर उन्हें क्या बराबर का सा स्तर मिलता है यह दिखता नहीं है. भारतीय जनता पार्टी का समाज सुधार का कोई प्रोग्राम नहीं है. जाति तोड़ने का कोई जिक्र नहीं है. मंदिर प्रेम छोड़ने का कोई इरादा नहीं है. ये सब गुजरे जमाने की बातें हैं जिन की मंगलयानों और कंप्यूटरों के युग में जरूरत नहीं. वे सिर्फ देवी जागरण की जगह अंबेडकर परिक्रमा कर के दलित वोटों को पटाना चाहते हैं पर उन्हें अलग करने वाली खाई को पाटना नहीं चाहते.

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इस वजह से बंद होने जा रहा है प्रियंका का शो क्वांटिको

बौलीवुड से हौलीवुड तक का सफर तय करने वाली अदकारा प्रियंका चोपड़ा पिछले काफी वक्त से हौलीवुड प्रोजेक्ट में ही व्यस्त थी. लेकिन अब खबरें आ रही हैं कि अमेरिकन शो क्वांटिको बंद होने वाला है. दरअसल, टीवी चैनल एबीसी प्रियंका के इस शो के तीसरे सीजन के बाद इसका प्रसारण नहीं करेगा. इस वजह से प्रियंका के शो क्वांटिको का यह आखिरी सीजन होगा.प्रियंका इस अमेरिकन टीवी शो के पिछले दो सीजन्स का हिस्सा रही हैं और अब तीसरे सीजन में भी एफबीआई एजेंट एलेक्स पैरिश की भूमिका निभा रही हैं. शो के तीसरे सीजन का प्रसारण इसी साल 26 अप्रैल से शुरू हुआ था.

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शो के पिछले दो सीजन में जहां 22 एपिसोड थे. वहीं इस सीजन में केवल 13 एपिसोड का ही प्रसारण किया जाएगा. बता दें कि क्वांटिको में प्रियंका चोपड़ा के अलावा जोश होप्किन्स, जैक मेक लाफ्लिंग, औनजन्यू एलिस, यासमिन अल मासरी, टेट एलिंग्टन, ग्राहम रोजर, एनाबेले एकोस्टा, रुसेल टौवी और एलन पौवेल जैसे एक्टर्स ने काम किया है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक इस शो के तीसरे सीजन के पहले एपिसोड की रेटिंग सिर्फ 0.5 रही थी. इस शो पर महज 30 लाख व्यूज मिले थे और इसी वजह से इस शो को आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया गया है.

हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक एबीसी द्वारा कई दूसरे शो की सीरीज को भी बंद कर दिया गया है. उन्होंने ऐसा इसलिए किया है ताकि नए शोज के लिए स्लौट खाली हो सकें. चैनल द्वारा इस फैसले को लिए जाने के बाद हौलीवुड एक्टर काल पेन ने इस खबर को सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए प्रियंका को टैग किया और लिखा, प्रियंका चोपड़ा चलो हम एक फिल्म बनाएंगे.

रेड कार्पेट पर गायब हुआ दीपिका का आरके वाला टैटू

दीपिका पादुकोण पिछले दो दिनों से फ्रेंच रिवेरा में चल रहे ‘कान्‍स फिल्‍म फेस्टिवल’ का हिस्‍सा बनने के लिए पहुंची हुई हैं. यहां दीपिका पादुकोण कई बेहद अलग-अलग अंदाज में नजर आ रही हैं. कभी पर्पल पेंट-सूट तो कभी पैरलर जींस और वाइट टीशर्ट लुक, दीपिका हर अंदाज में कान्‍स में छा रही हैं.

शुक्रवार को दीपिका ने कान्‍स के रेड कारपेट पर शिरकत की और उनका पिंक ड्रेस सोशल मीडिया पर छा गया. दीपिका ‘एश इज प्‍योरेस्‍ट वाइट’ फिल्‍म के प्रीमियर का हिस्‍सा बननें पहुंचीं. लेकिन जहां सभी का ध्‍यान दीपिका पादुकोण की इस खूबसूरत ड्रेस पर था, वहीं दीपिका के गायब टैटू ने सोशल मीडिया पर फैन्‍स को चौंका दिया.

बता दें कि दीपिका पादुकोण और रणबीर कपूर लंबे समय तक रिश्‍ते में रहे थे और उसी दौरान दीपिका ने आरके यानी रणबीर कपूर के नाम का यह टैटू बनवाया था. फिर ये जोड़ी अलग हो गई, लेकिन दीपिका ने अपने पर्सनल रिश्‍ते की दूरियों को अपने काम के बीच में नहीं आने दिया. ब्रेकअप के बाद दीपिका और रणबीर ‘ये जवान है दिवानी’ और ‘तमाशा’ जैसी फिल्‍मों में साथ नजर आ चुके हैं.

रणबीर कपूर से अलग हो कर दीपिका अब रणवीर सिंह के साथ हैं और इन दोनों की इसी साल के आखिर तक शादी की खबरें भी आ रही हैं. ऐसे में कान्‍स के रेड कारपेट पर दीपिका की गर्दन से गायब हुआ यह टैटू चर्चा का विषय बन गया है.

हालांकि यह पहला मौक नहीं है, जब दीपिका बिना इस टैटू के नजर आई हैं. एक साबुन के विज्ञापन में साड़ी पहने नजर आईं दीपिका की गर्दन से यह टैटू गायब दिखा था. उस समय भी दीपिका ने मेकअप से यह टैटू छिपाया था.

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दीपिका पादुकोण अक्‍सर अपने इस टैटू के साथ नजर आती रही हैं. यहां तक कि हाल ही में मनीष मल्‍होत्रा के एक चैरिटी शो में भी दीपिका पादुकोण ने रणबीर कपूर के साथ रैंपवौक किया और यह टैटू दीपिका के साथ ही नजर आया. यहां तक की पिछले साल कान्‍स में रेड कारपेट पर चलीं दीपिका इसी टैटू के साथ नजर आई थीं. लेकिन इस बार लगता है दीपिका ने इस टैटू को छिपाना ही जरूरी समझा.

दीपिका कान्‍स से पहले मैट गाला के रेड कारपेट पर नजर आ चुकी हैं. कान्‍स में दीपिका के लुक्‍स की काफी तारीफ हो रही है.

मुझे एक लड़की से प्यार हो गया है. वह हमेशा मेरी ओर देखा करती थी, जिस से मुझे लगा था कि वह भी मुझे पसंद करती है. मैं क्या करूं.

सवाल
मुझे अपने गांव के पास के ही एक गांव की कालेज की छात्रा से प्यार हो गया है. एक दिन उस के ट्यूशन पढ़ने के लिए जाते वक्त मैं ने उसे अपने प्यार के बारे में बताने के लिए आवाज दे कर रोका. मैं कुछ कह पाता, उस से पहले ही वह मुझे पागल कह कर चली गई. वह हमेशा मेरी ओर देखा करती थी, जिस से मुझे लगा था कि वह भी मुझे पसंद करती है. मैं क्या करूं?

जवाब
कोई राह चलती लड़की कभीकभार नजरें उठा कर देख ले तो उसे प्यार नहीं समझना चाहिए. बात साफ है कि वह आप से प्यार नहीं करती. आप से रहा न जाए, तो कोई बहाना निकाल कर एक बार उस से दोटूक बात कर लें. वह मान जाए तो आगे बढ़ें, वरना उस का पीछा करना छोड़ दें.

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तोहफा हो प्यार का, न कि उधार का

फरवरी माह आते ही हर युवा प्यार के रंगों में सराबोर नजर आने लगता है. कारण है इस माह में आने वाला त्योहार वैलेंटाइन डे. जो प्यार और प्यार के इजहार का दिन है. अपने जज्बातों को शब्दों में बयां करने के लिए हर युवा दिल को इस दिन का बेसब्री से इंतजार रहता है, और हो भी क्यों न, इस दिन प्रेमी अपने प्यार का इजहार एकदूसरे को तोहफे व फूल दे कर करते हैं. कुछ युवा तो महंगे तोहफे खरीदने के लिए उधारी तक कर लेते हैं.

तोहफे की अहमियत

हर प्रेमी की यह चाहत होती है कि वह अपने वैलेंटाइन डे को यादगार बनाए. ऐसे में इस दिन को यादगार बनाने के लिए तोहफे की अहमियत बढ़ जाती है. अपने वैलेंटाइन को महंगे से महंगा तोहफा देने के लिए प्रेमी अपनी जेब तो हलकी करते ही हैं, साथ ही उधार लेने से भी नहीं कतराते, जबकि प्यार का तोहफा दिल का तोहफा होना चाहिए न कि उधार का.

प्यार की उधार चढ़ी दुकान

प्यार एक खूबसूरत एहसास है. जब किसी को किसी से प्यार हो जाता है तो वह रिश्ते की शुरुआत में अकसर इतना एक्साइटेड हो जाता है कि अपने प्यार की फीलिंग्स व्यक्त करने और अपनी शान बघारने के चक्कर में महंगा गिफ्ट खरीद कर अपने वैलेंटाइन को देता है, चाहे इस के लिए उसे किसी से उधार लेना पड़े या फिर तोहफे की कीमत किस्तों में अदा करनी पड़े. आखिर मामला प्यार का जो है, पर यह कितना सही है?

जितनी चादर हो उतने पैर पसारें

यह जरूरी नहीं कि अपनी भावनाएं व्यक्त करने के लिए आप जरूरत से ज्यादा महंगा गिफ्ट खरीद कर अपने वैलेंटाइन को देंगे तभी उस से अपने दिल की बात कह पाएंगे. आप अपनी और उस की पसंद के अनुसार ही गिफ्ट देने की सोचें, नहीं तो बाद में समस्या आप को ही होगी और महंगे गिफ्ट की उधारी चुकातेचुकाते आप परेशान हो जाएंगे. इसलिए अपने बजट के अनुसार ही गिफ्ट का चुनाव करें.

आजकल मार्केट में हर रेंज के लव गिफ्ट्स मौजूद हैं. आप अपनी जेब के हिसाब से उन में से कोई भी चुन सकते हैं.

देखादेखी न करें

प्यार में गिफ्ट देने में कभी भी कंपीटिशन न करें. किसी दूसरे के पार्टनर ने अपने वैलेंटाइन को महंगा गिफ्ट दिया है तो आप को भी महंगा गिफ्ट देना है, यह जरूरी नहीं. अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार ही गिफ्ट का चयन करें. नहीं तो इस से आप को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की कम और गिफ्ट के बारे में चिंता ज्यादा रहेगी. ऐसे में आप के प्यार की शुरुआत ही बेकार होगी और जो प्यारभरी बात आप को अपने वैलेंटाइन से करनी है, वह भी अधूरी रह जाएगी. अत: अपनी जेब और आर्थिक स्थिति को ध्यान में रख कर ही गिफ्ट खरीदें. प्यार भरा गिफ्ट जब आप अपने वैलेंटाइन को देंगे तो बात बन जाएगी.

गिफ्ट हो कुछ इस तरह खास

– अगर आप अपने दिल के जज्बातों को अपने पार्टनर से शेयर करने के लिए कोई ऐसा गिफ्ट देना चाहते हैं जो हमेशा उसे आप की याद दिलाए तो दिल से निकला संदेश दें. इस के लिए आप कुछ ऐसा करें, जिस से आप की जेब भी हलकी न हो और आप अपनी भावनाओं को भी अच्छी तरह से व्यक्त कर सकें.

– सब से पहले अपने बिजी शैड्यूल में से कुछ समय निकालें, क्योंकि सब से कीमती उपहार है आप का साथ, जो आज के समय में कम ही मिल पाता है.

– अपने हाथों से ग्रीटिंग कार्ड बनाएं व उस पर अपनी भावनाओं को कविता के रूप में लिख कर व्यक्त करें, यह अनमोल उपहार आप के वैलेंटाइन को बहुत पसंद आएगा.

– उस के पंसदीदा फोटोग्राफ्स से भरी एक खूबसूरत स्क्रैप बुक बना कर उसे तोहफे में दें. यह नायाब तोहफा उस के दिल को छू जाएगा.

–  अपने वैलेंटाइन के साथ बिताए पलों की सुनहरी यादों को फिर से दोहराएं, ये पल वाकई उसे रोमांचित कर देंगे.- अगर आप का वैलेंटाइन पढ़ने का शौकीन है तो उसे अच्छी किताब गिफ्ट करें.

– यदि आप के वैलेंटाइन की संगीत में रुचि है या उसे पुरानी फिल्में देखने का शौक है, तो उसे उस के पसंदीदा गानों व मूवी की सीडी गिफ्ट कर सकते हैं.

– जरूरी नहीं कि उस दिन आप अपने वैलेंटाइन को किसी फाइव स्टार होटल में ही पार्टी दें. अगर आप उसे उस की पसंद के अनुसार अपने हाथों से कोई स्पैशल डिश बना कर खिलाएंगी तो उसे खुशी होगी और अपनापन लगेगा. जैस चौकलेट केक, ब्राउनी, कुकीज कप केक आदि.

– युवतियों को फंकी ज्वैलरी बहुत पंसद आती है, ऐसे में यह भी आप के बजट के अनुसार आसानी से मिल जाएगी.

– ज्यादातर युवकों को स्पोर्ट्स पसंद होता है. ऐसे में आप स्पोर्ट्स का कोई आइटम या स्पोर्ट्स क्लब की मैंबरशिप उसे गिफ्ट कर सकती हैं.

ऐसे बचाएं पैसा

हमारी जिंदगी में पैसे की अहमियत कितनी है, यह हर कोई जानता है. हर आदमी ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाना चाहता है और जल्द से जल्द अमीर बनना चाहता है. लेकिन हमारा मानना है कि जब तक आप पैसे बचाना शुरू नहीं करेंगे, तब तक आप कितना भी पैसा कमा लें, आप अमीर नहीं बन सकते हैं, क्योंकि पैसा बचाना भी पैसा कमाना होता है. अगर आप एक रुपया बचाते हैं, तो इस का मतलब है कि आप ने एक रुपया कमाया. पैसे कमाना हर कोई जानता है, लेकिन उन पैसों को कैसे बचाया जाता है, यह बहुत कम लोग जानते हैं. आइए, हम आप को बताते हैं पैसे बचाने के कुछ आसान उपाय:

अगर आप दोस्तों के साथ किसी होटल में ठहरने जा रहे हैं, तो सब से पीछे रहें, क्योंकि जो आगे रहेगा, मोलभाव वही करेगा. लिहाजा, भुगतान भी वही करेगा.

अगर आप दोस्तों के साथ होटल में खाना खा रहे हैं, तो धीरेधीरे सब से आखिर तक खाते रहें. तब तक कोई न कोई बिल दे देगा.

अगर आप रेलगाड़ी में सफर कर रहे हैं, तो टिकट न लें. अगर टिकट चैकर आता दिखे, तो सीट से खड़े हो कर बाथरूम की तरफ जाने लगें. वह टिकट नहीं मांगेगा. अगर टिकट मांग भी ले, तो ‘बाथरूम से आता हूं’ कह कर बाथरूम में ही कुछ देर आराम करें. टिकट चैकर आगे चला जाएगा. ॥ नईनई चीजों को खरीदने के बजाय आप जुगाड़ तकनीक का इस्तेमाल करें.

॥ रोजाना बाजार या दफ्तर जाने के लिए किसी दोस्त की घड़ी से अपना समय मिला लें और उस की गाड़ी पर बैठ कर जाने की कोशिश करें. ॥ अगर आप का बिजली का बिल ज्यादा आता है, तो दिन में मीटर का इस्तेमाल करें और रात में खंभे पर तार डाल कर बिजली जलाएं.

॥ घर में नमक, मसाला, मिर्च का उपयोग महीने में 2-4 दिन पड़ोसियों से मांग कर करें. इस से भी काफी बचत होती है. आप महीने में 1-2 दिन किसी से कुछ मांगेंगे, तो वह शर्म के मारे इनकार नहीं करेगा. ॥ अगर आप अखबार पढ़ने के शौकीन हैं और अखबार पर पैसे खर्च नहीं करना चाहते हैं, तो ऐसी जगहों पर जा कर बैठें, जहां लोग अखबार पढ़ रहे हों. वहीं अखबार पढ़ें. मुमकिन हो, तो उस अखबार को घर पर भी ले आएं. बाद में रद्दी में बेच दें.

॥ सब्जी खरीदनी हो, तो थोड़ीथोड़ी सब्जी कई जगहों से लें, क्योंकि आमतौर पर सब्जी वाले जब सब्जी तौलते हैं, तो थोड़ी ज्यादा ही तौलते हैं. अगर आप को हर बार 50 ग्राम सब्जी भी ज्यादा मिलती है, तो बहुत फायदा होगा. कैसे? यह गणित मैं समझाता हूं. अगर आप को 2 किलो एक ही सब्जी खरीदनी है, तो आधाआधा किलो सब्जी 4 दुकानों से खरीदें. अगर हर बार 50 ग्राम सब्जी भी ज्यादा मिलती है, तो आप को 200 ग्राम सब्जी का फायदा होगा.

॥ दाढ़ीमूंछ खुद बनाएं और बाल कटवाने के लिए किसी सड़कछाप सैलून में जाएं. कम पैसे में काम हो जाएगा. ॥ अगर रोजाना बस या आटोरिकशा से जाना हो, तो एक रुपया कम दें. पूरे पैसे मांगने पर खुले नहीं हैं का बहाना बनाएं. अगर वह न माने, तो 5 सौ रुपए का बड़ा नोट दिखाएं.

॥ अगर किसी पार्टी में जाना हो, तो घर के सभी सदस्यों के साथ जाएं. उस दिन का पूरा खाना बच जाएगा. ॥ अगर आप की किसी कार्यक्रम में उपहार देने की बारी आए, तो आप किसी बहाने से दूसरी जगह चले जाएं, फिर कार्यक्रम खत्म होने पर ही आएं.

॥ अगर किसी को उपहार देना जरूरी लगे, तो बड़े डब्बे में कम कीमत का उपहार देने की कोशिश करें. ॥ अगर मोबाइल फोन के खर्च से परेशान हैं, तो किसी से बात करने के लिए मिस काल करें. आप कई बार मिस काल करेंगे, तो दूसरी तरफ से फोन जरूर आएगा.

॥ अगर आप से कोई कुछ मांगे, तो बहाना बनाने की कोशिश करें. ॥ अगर कोई आप को किसी काम के लिए बारबार फोन कर रहा हो, तो फोन न उठाएं. काफी देर बाद उठाएं. अगर वह पूछे तो कह दें कि मोबाइल फोन साइलैंट मोड पर था. शोर के चलते मैं फोन को सुन नहीं सका.

हम ने इन उपायों को अपना कर पैसा बचाना शुरू कर दिया है और अमीर बनने की ओर अपना पहला कदम बढ़ा दिया है. हमें पूरा यकीन है कि जल्द ही हमारा नाम दुनिया के बड़ेबड़े अमीरों के साथ गिना जाने लगेगा.

क्या आप अमीर नहीं होना चाहेंगे? अगर हां, तो इन उपायों को आप भी आजमा सकते हैं.

VIDEO : मरीन नेल आर्ट

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