ओमेर्टा : राज कुमार राव का जीवंत अभिनय

इटालियन शब्द ‘ओमेर्टा’ का अर्थ होता है माफिया. मगर हंसल मेहता की फिल्म ‘ओमेर्टा’ इटालियन माफिया की कहानी नहीं है. बल्कि हंसल मेहता की बायोग्राफिकल अपराध कथा वाली फिल्म ‘‘ओमेर्टा’’ मशहूर आतंकवादी अहमद उमर सईद शेख के जीवन पर बनायी गयी है. इसे कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में  काफी सराहा जा चुका है. पर यह फिल्म फीचर फिल्म की बजाय डाक्यू ड्रामा वाली फिल्म है.

फिल्म की कहानी पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश नागरिक अहमद उमर सईद शेख (राज कुमार राव) के इर्द गिर्द घूमती है. लंदन में पढ़ाई कर रहा अहमद उमर सईद शेख एक अच्छे मध्यमवर्गीय परिवार से है. लेकिन 1994 में सीरिया व बोसनिया में जो कुछ होता है, उससे उसका ब्रेन वाश हो जाता है. फिर उमर एक गलत राह पकड़ लेता है. वह ‘कश्मीर स्वतंत्रता’ की मुहिम का हिस्सा बन जाता है. फिर उमर पाकिस्तानी कट्टर पंथियों और आई एस आई के इशारे पर रोहित वर्मा बनकर भारत आता है. और दिल्ली में कुछ विदेशीपर्यटकों को अगवा कर उनकी हत्या कर देता है.

पकड़े जाने पर उमर सईद को दिल्ली की तिहाड़ जेल में काफी टार्चर किया जाता है. फिर पाकिस्तानी आकाओं के इशारे पर कुछ आतंकवादी भारतीय जहाज आई सी -184 का अपहरण कर कंधार ले जाते हैं और विमान के यात्रियों को रिहा करने के बदले जेल से उमर सईद शेख व मसूद अजहर सहित चार आतंकवादी साथियों की रिहाई की मांग करते हैं. उमर सईद रिहा होकर पाकिस्तान चला जाता है और उन पर आतंकवादी का ठप्पा लग जाता है. जबकि उमर के पिता (केवल अरोड़ा) चिल्लाते रहते हैं कि उनका बेटा आतंकवादी नहीं है. पर उमर तो पाकिस्तानी सेना व जासूसी संस्था के इशारे पर काम करता रहता है.Omerta Movie Review

फिर 9/11 यानी कि ‘वर्ल्ड ट्रेड सेंटर’ पर आतंकवादी हमले और मुंबई के 26/11 से उसके जुड़े होने की बात की गयी है. 2002 में उमर सईद, बशीर बनकर अमरीकन पत्रकार डैनियल पर्ल (तिमोथी रायन) से मिलता है और फिर उसकी हत्या करता है. अमरीकन सरकार के दबाव के चलते पाकिस्तानी सरकार को उमर को गिरफ्तार कर सजा सुनानी पड़ती है. उमर सईद शेख अभी भी पाकिस्तानी जेल में बंद है.

हंसल मेहता ने पहली बार एक खलनायक पर फिल्म बनायी है. कुछ लोगों की राय में एक खूंखार आतंकवादी का महिमा मंडन करना गलत है. जबकि हंसल मेहता का दावा है किउन्होंने नकारात्मक सोच वाले इंसान का महिमा मंडन नहीं किया है, बल्कि यह बताने की कोशिश की है कि आज की पीढ़ी आतंकवादी संगठनों की तरफ क्यों आकर्षित हो रही है? मगर पूरी फिल्म देखने के बाद हंसल मेहता का तर्क सही नजर नहीं आता.

नब्बे के दशक में सीरिया व बोसनिया में मुस्लिमों के साथ जो कुछ हो रहा था, उस वजह से उमर सईद आतंकवादी बनता है. इसे जायज नहीं ठहराया जा सकता. उमर सईद को निजी स्तर पर या उनके परिवार या उनके बहुत करीबी रिश्तेदार या दोस्त के साथ ऐसा कुछ नहीं होता, जिसकी वजह से उसके अंदर का गुस्सा फूटता और वह आतंकवाद की राह पकड़ता. एक साधारण इंसान आतंकवादी क्यों बनता है, वह कई कारनामों को अंजाम क्यों देता है, इस पर यह फिल्म कोई बात नहीं करती. हां! हंसल मेहता ने पाकिस्तान द्वारा चलाए जा रहे आंतकवादी कैंप, उनकी ट्रेनिंग आदि का सजीव चित्रण किया है.

हंसल मेहता ने अपनी फिल्म में इस बात को जोरदार तरीके से रेखांकित किया है कि पाकिस्तानी हुकूमत आतंकवादियों को शरण देने के साथ उनकी मददगार बनी हुई है. हंसल मेहता ने फिल्म को कई वास्तविक लोकेशन पर फिल्माने के साथ ही कुछ घटनाक्रमों के वास्तविक वीडियो फुटेज भी उपयोग किए हैं. इससे यह फीचर फिल्म की बजाय डाक्यू ड्रामा बन जाती है.

फिल्म की पटकथा के अलावा इसमें जिस तरह से वास्तविक वीडियो जोड़े गए हैं, उसके चलते उमर सईद की कहानी से पूरी तरह ना वाकिफ दर्शक की समझ में नहीं आता कि क्या हो रहा है? फिल्म के कुछ दृश्य दर्शकों को विचलित जरुर करते हैं, मगर फिल्म दर्शकों को बांधने में पूरी तरह से विफल रहती है. फिल्मकार ने विदेशी पयर्टकों के अपहरण व उनकी हत्या के अलावा अमरीकी पत्रकार डैनियल पर्ल की हत्या को बेवजह काफी विस्तार से चित्रित किया है.

फिल्म में उमर सईद की शादी सहित कई  घटना क्रम हैं, मगर कमजोर पटकथा के चलते कई घटनाक्रम सही अनुपात में उकेरे नहीं जा सके. हंसल मेहता की पिछली फिल्मों की ही तर्ज पर बनी यह फिल्म दर्शकों को पसंद आए, इसकी उम्मीदें काफी कम हैं. फिल्म में अंग्रेजी भाषा /संवादों का काफी उपयोग किया गया है, जिसके चलते यह फिल्म काफी सीमित दर्शक वर्ग के लिए बनकर रह गयी.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो बेहद शांत नजर आने वाले खूंखार व जालिम आतंकवादी उमर सईद शेख के किरदार को राज कुमार राव ने अपने अभिनय से जीवंत किया है. कुछदृश्यों में राज कुमार राव महज कैरी केचर/काफी बनावटी बनकर उभरते हैं, फिर भी राज कुमार राव ने एक बार फिर खुद को बेहतरीन अभिनेता साबित किया है. ईशान छाबड़ा कापार्श्व संगीत ठीक ठाक है.

एक घंटा 36 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘ओमेर्टा’’ का निर्माण ‘स्विस इंटरटेनमेंट’ और ‘कर्मा फीचर्स’ ने मिलकर किया है. फिल्म के निर्देशक हंसल मेहता, संगीतकार ईशान छाबड़ा,लेखक मुकुल देव व हंसल मेहता, कैमरामैन अनुज राकेश धवन तथा कलाकार हैं – राज कुमार राव, राजेश तैलंग, रूपिंदर नागरा, केवल अरोड़ा, तिमोथी रायन, हरमीत सिंह व अन्य.

भोजपुरी फिल्मों में इस एक्ट्रेस ने मचाया धमाल

इन दिनों भोजपुरी की फिटनेस गर्ल गार्गी पंडित की दिलकश अदाओं का जलवा खूब देखने को मिल रहा है. रील लाइफ से रियल लाइफ तक गार्गी पंड़ि‍त निर्माता–निर्देशकों को पसंद आ रही हैं, यही वजह है कि नये जेनरेशन की अभिनेत्रियों में गार्गी का कोई मुकाबला नहीं है. गार्गी के लुक्‍स के चर्चे उनके काम की तरह ही सुर्खियां बटोर रहे हैं. यानी पर्दे पर गार्गी अपनी हसीन अदाओं और चुलबुले अंदाज से सबको इंप्रेस करती नजर आती हैं तो रियल लाइफ में भी उनकी हाजिर जवाबी और बिंदास राय खबरों में है.

हाल ही में गार्गी ने महिलाओं के साथ होने वाली यौन शोषण की घटनाओं पर खुलकर अपनी बात रखी. गार्गी ने देश में छोटी बच्चियों के साथ होने वाली बलात्‍कार की घटनाओं पर गुस्‍सा जताया था. गार्गी ने ऐसे बलात्‍कारियों को फांसी की सजा देने की बात की थी. अपनी बेबाकी और इस अंदाज के चलते ही गार्गी को किसी भी अभिनेता के साथ अपनी केमेस्‍ट्री बनाने में ज्‍यादा देर नहीं लगती. अभी हाल ही में उन्‍होंने राजकुमार आर. पांडेय की मल्‍टीस्‍टारर फिल्‍म ‘दुल्हन चाही पाकिस्तान से – 2’ की शूटिंग पूरी की है, जिसमें उनकी केमेस्‍ट्री चिंटू पांडेय के साथ खूब जमी है.

entertainment

गार्गी ने इस फिल्‍म की शूट के शुरूआती दिनों में कहा भी था कि उन्‍हें किरदार में डूब कर काम करना पसंद है, इसलिए उनकी कोशिश जल्‍द से जल्‍द माहौल में घुलने की होती है. वहीं, इंडस्‍ट्री के अनुभवी फिल्‍मकार राजकुमार आर पांडेय ने भी माना है कि गार्गी में सीखने की क्षमता और उसे कर दिखाने का जुनून कमाल का है.

वहीं, गार्गी के पर्सनल पीआरओ संजय भूषण पटियाला की मानें तो गार्गी काफी मेहनती हैं और वे किसी भी रोल को छोटा नहीं मानती हैं. साथ ही जब तक उनका किरदार किसी फिल्‍म में उनको संतुष्‍ट नहीं करता है तो उससे तौबा कर लेती हैं. उनकी मानें तो गार्गी की कई फिल्‍में आज फ्लोर पर हैं, जिसमें अभी ‘दुल्हन चाही पाकिस्तान से – 2’ पूरी की है. इसके अलावा अरविंद अकेला कल्‍लू के साथ आवारा बलम ,पावर स्‍टार संजीव मिश्रा के साथ ‘बदरीनाथ’, ‘तोड़ दे दुश्‍मन की नली, राम और अली’ फ्लोर पर हैं.

सौ बरस और : बाबरा के सामने आया सच

मर्चेंट नेवी में सेफ्टी औफिसर के पद का 3 महीनों का कौंट्रैक्ट खत्म कर के मैं हिंदुस्तान लौटने वाला था. साइन औफ के समय जरमन स्टाफ कैप्टन ने कंधे पर आत्मीयता से हाथ रख दिया. पिछले 15 सालों से हम अलगअलग शिपिंग कंपनियों में कई बार साथ काम कर चुके थे.

‘‘आई वौंट अ फेवर फ्रौम यू, जैंटलमैन,’’ मिस्टर जेम्स बोले.

‘‘ओ श्योर, इट्स माई प्लेजर.’’

‘‘माई डौटर वौंट्स टू विजिट इंडिया. बट ड्यू टू लास्ट बिटर एक्सपीरियंस, आई डौंट वौंट टू सेंड हर अलोन.’’

‘‘डौंट वरी सर, यू सेंड हर. मी ऐंड माई औल फैमिली मैंबर्स विल टेक केयर औफ हर.’’ मैं ने उन के कड़वे अनुभव को कुरेदने की कोशिश नहीं की.

‘‘थैंक्स. आई बिलीव औन यू, बिकौज आई नो यू सिंस लौंग बैक.’’

हिंदुस्तान पहुंचने के एक हफ्ते बाद मिस्टर जेम्स की बेटी का मेल आ गया.

देहरादून एयरपोर्ट से रिसीव कर के मैं बाबरा को घर ले आया. अम्मी और मेरी छोटी बहन अर्शी ने उस का बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया.

20 वर्षीया, फोटोजैनिक चेहरे वाली बाबरा की आंखें नीली और बाल भूरे थे. जरमन मर्द और औरतें अपनी फिगर के लिए बहुत सचेत रहते हैं. बाबरा दुबलीपतली लेकिन पूरी तरह स्वस्थ थी. वह जरमन भाषा के अलावा अंगरेजी और फ्रैंच बोल सकती थी.

अम्मी को अंगरेजी नहीं आती थी, लेकिन अर्शी ने अंगरेजी में ही घर, महल्ले, शहर के आसपास के दर्शनीय स्थलों के बारे में उसे पूरी जानकारी दे दी थी. बाबरा के रहने, खाने के जरमन तरीके की पूरी व्यवस्था की थी मैं ने.

मेरा मकान शहर की एक पौश कालोनी में था जिस में ड्यूप्लैक्स और फ्लैट्स मिला कर लगभग 50 घर थे. वाचमैन, जमादार, माली की बाकायदा व्यवस्था थी. संपन्न लोग ही हमारी कालोनी में मकान खरीद सकते थे. कालोनी में ज्यादातर उच्च पद वाले सरकारी अधिकारी और बड़े बिजनैस वाले किराएदार थे.

रात का खाना खाने के बाद मैं बाबरा के साथ कालोनी की ही सड़क पर टहलते हुए उसे भारत के ऐतिहासिक नगरों की जानकारी देने लगा. उस वक्त कालोनी के कुछ लोग भी इवनिंग वाक कर रहे थे. हम लोगों को क्रौस कर के वे आगे तो निकल जाते, लेकिन बारबार पलट कर हमें देखने लगते. उन में से एक 45 साल का व्यक्ति, जो शायद किसी सरकारी महकमे में क्लासवन औफिसर था, हमारे साथसाथ चलते हुए हमारी बातें सुनने का प्रयास करने लगा. थोड़ी दूर चल कर फिर तेजी से चहलकदमी करता अपने ग्रुप से जा मिला.

दूसरे दिन सुबह ही कालोनी की दबंग मिसेज वशिष्ठ का फोन मेरी मम्मी के मोबाइल पर आया. औपचारिक बातों में उन्होंने उलाहना दी, ‘‘आजकल आप फौरेनर्स की मेहमाननवाजी में व्यस्त हैं, इसीलिए कल मिसेज मल्होत्रा के यहां किटी पार्टी में दिखाई नहीं दीं.’’

‘‘जी, जरमनी से अनीस के दोस्त की बेटी इंडिया घूमने आई है. बस, उसी के साथ व्यस्त हो गई हूं.’’

‘‘दोस्त की बेटी, या खुद अनीस की दोस्त? बेटे की उम्र हो गई है शादी की. देशविदेश घूमता रहता है. अगर यह लड़की तैयार है तो कर दीजिए चट मंगनी पट ब्याह.’’ नौनस्टौप बोलने के बाद वे खुद ही हो…हो…कर के हंसने लगीं.

‘‘नहींनहीं, ऐसी कोई बात नहीं है.’’ मम्मी इस अप्रत्याशित सवाल पर बौखला सी गईं.

‘‘है कैसे नहीं, अंगरेज लड़की के साथ घूमनाफिरना, कुछ तो मतलब रखता है. अरे, अपनी कालोनी के सेन साहब के बेटे के बारे में तो सुना ही होगा न आप ने?’’

‘‘नहींनहीं, मैं ने कुछ नहीं सुना. मुझे वक्त कहां मिलता है जो कालोनी के घरों के बारे में जानकारियां रख सकूं. किसी के निजी मामलों में दखल देने का मेरा मिजाज भी नहीं है.’’ मम्मी की आवाज में हलकी तल्खी महसूस की मैं ने.

‘‘अरे, तो हमें कौन सी पड़ी है किसी के घर में झांकने की? अब अगर सामने ही कुछ हो रहा है तो आंखें और कान तो बंद नहीं किए जा सकते न. हुआ यों था कि सेन साहब का बेटा पढ़ने के लिए अमेरिका गया था. वापसी पर वह विदेशी गिफ्ट्स के साथ एक अंगरेज लड़की भी ले आया. ये विदेशी लड़कियां हैंडसम लड़कों और उन के बैंकबैलेंस पर ही अपना ईमान खराब करती हैं. न धर्म देखती हैं न जाति. बस, लड़का मालदार हो तो चिपक जाती हैं जोंक सी. जब तक खून से पूरा पेट नहीं भर लेती हैं तब तक नहीं छोड़ती हैं ये.

‘‘सेन भाभी ने बड़ी धूमधाम से उस के साथ बेटे की मंगनी कर दी. कालोनी में, रिश्तेदारी में उन का तो मान बढ़ाती थी अंगरेजन. सगाई के बाद सेन साहब का बेटा स्टूडैंट वीजा पर दोबारा अमेरिका गया. लेकिन क्या बताएं भाभीजी, मुआ 6 महीने में ही लौट आया.’’

‘‘सेन भाभी रोरो कर बतला रही थीं, ‘अंगरेज लड़की के परिवार वाले तकरीबन रोज ही उस पर क्रिश्चियन धर्म अपना लेने के लिए दबाव डालने लगे.’ खालिस पंजाबी परिवार का बेटा भला कैसे ईसाई हो जाता. बेचारा बैरंग लौट आया. धोबी का कुत्ता बन गया- न घर का रहा न घाट का.

‘‘अब वह रोज शराब के प्यालों में अंगरेजन को भुलाने की कोशिश में बोतल पर बोतल खाली कर देता है. सेन साहब तो सदमे से आधे रह गए. बुढ़ापे में उन्हें जवान बेटे का खर्चा उठाना पड़ रहा है. इसीलिए कहती हूं, आप भी जरा आंखें और कान खुले रखना.’’ पूरी कालोनी का पुराण कंठस्थ कर के दूसरी महिलाओं को सुनाना उन के अजीब से असामाजिक व्यवहार में शामिल हो गया था.

दूसरे दिन मोटरसाइकिल पर सवार होने के लिए बाबरा मेरे साथ निकल ही रही थी कि आसपास के घरों की खिड़कियां खुलनेबंद होने लगीं. उस ने मोटरसाइकिल के दोनों तरफ पैर डाल दिए थे, उस की छोटी स्कर्ट थोड़ी और ऊंची हो गई थी.

दोपहर को वह सनबाथ लेने के लिए बिकिनी पहन कर जैसे ही छत की आरामकुरसी पर बैठी, पड़ोसियों की हमेशा सूनी पड़ी छतों पर कपड़े सुखाने और सफाई करने के बहाने आने वालों की संख्या बढ़ने लगी.

कहां फिल्मों और टीवी स्क्रीन पर दिखलाया जाने वाला गौर वर्ण का अर्धनग्न नारी शरीर और कहां साक्षात अंगरेज लड़की का आधा नंगा संगमरमरी बदन, जिस की ताब में पड़ोसियों की आंखें सिंकने लगीं. मर्दों के मुंह से तो लार टपकतेटपकते बची और खुद महिलाएं, लड़कियां नारी स्वतंत्रता आंदोलन की प्रचारक तो बन गईं लेकिन जरमन लड़की की आजादी आपत्तिजनक साबित करने लगीं. वस्तुस्थिति तो यह थी कि वे भीतर ही भीतर जरमन लड़की से ईर्ष्या कर रही थीं.

मर्चेंट नेवी जौइन करने से पहले मैं भी विदेशियों को कम कपड़ों में धूप सेंकने के तौरतरीकों को आपत्तिजनक और बेशर्मी का शगल मानता था लेकिन यूरोप महाद्वीप के बाशिंदे वहां की हाड़ कंपा देने वाली सर्दी और माइनस जीरो डिगरी से भी कम तापमान में रह कर काम करते हुए धूप की जरूरत शिद्दत से महसूस करने लगते हैं. पूरे 10 महीनों की भीषण सर्दी में रहते हुए उन के शरीर को विटामिन डी की काफी जरूरत होती है. गोरी चमड़ी को त्वचा रोग से बचाने के लिए पूरे शरीर को सूर्य की किरणों से नहलाना, विलासिता या शरीर प्रदर्शन का शौक नहीं, बल्कि शरीर की जबरदस्त मांग के कारण यह बेहद जरूरी होता है.

बाबरा भारतीय खाने और व्यंजनों के प्रति आकर्षित रही और उन की रैसिपी के लिए भी बेहद उत्सुक व जिज्ञासु दिखलाई दी. घूमनेफिरने के बाद जितने वक्त भी घर में रहती, मम्मी के साथ किचन में ही खड़ी हो कर उन की पाकविद्या को सीखने का भरसक प्रयत्न करती रहती. हमारे साथ रह कर उस ने नमस्ते, आदाब और शुक्रिया कहना सीख लिया था. उस के जरमन लहजे में बोले गए हिंदी-उर्दू शब्द सुन कर मम्मी खुश होतीं.

3-4 दिनों तक मसूरी, धनौल्टी, ऋषिकेश, हरिद्वार, हरकी पौड़ी घूमते हुए हरिद्वार के मंदिर में रोज होने वाली हजारों दीयों की आरती को देख कर बाबरा बहुत ही अचंभित और खुश हुई.

उस दिन शाम को कौलबैल बजी तो दरवाजे पर खड़े मिस्टर व मिसेज नेगी को देख कर हैरान रह गईं मम्मी. किटी पार्टी या ईदबकरीद में बारबार बुलाने पर भी कभी उन्होंने हमारे घर का पानी तक नहीं छुआ था. स्वयं को वे उच्च कुलीन ब्राह्मण की मानसिकता के कंटीले दायरे से निकाल नहीं पाए थे.

बाबरा ड्राइंगरूम में ही बैठी थी. उन्हें देख कर नमस्ते करने के लिए उस ने दोनों हाथ जोड़ दिए और चांदनी सी मुसकराहट बिखेरती हुई उन के सामने बैठी रही. गरमी से बेहाल बाबरा ने उस वक्त स्लीवलैस, डीप गले का टौप और जांघों तक की पैंट पहन रखी थी. मिस्टर नेगी की नजर बारबार उस के गोरे चेहरे से फिसलते हुए कुछ देर तक उस के उन्नत उरोजों पर ठहर कर, खुले चिकने पेट से हो कर उस की गुलाबी जांघों पर आ कर ठहर जाती.

पूरे 1 घंटे तक मिसेज नेगी पूरी कालोनी की खबरों का चलताफिरता, सब से तेज चैनल बनी रहीं. मम्मी बारबार पहलू बदलने लगी थीं क्योंकि उन्हें रात के खाने की तैयारी करनी थी और बाबरा की डिशेज के लिए सामान लाने के लिए मुझे बाहर जाना था.

मिसेज नेगी अपने मन का अवसाद निकाल कर जब बाबरा की तरफ पलटीं तो सवालों की झड़ी लगा दी, ‘‘कहां से आई हो? क्या करती हो, शादी हुई या नहीं? अनीस के परिवार को कब से जानती हो?’’

जवाब देने के लिए छोटी बहन अर्शी को शिष्टाचारवश मध्यस्थता के लिए अपनी पढ़ाई छोड़ कर आना पड़ा. यूरोपियन संस्कृति में व्यक्तिगत प्रश्न पूछे जाने को बेहद ही अशिष्ट माना जाता है. कभीकभी तो लोग झुंझला कर पूछने वाले के व्यक्तिगत जीवन पर नाहक दखलंदाजी की तोहमत लगा कर केस भी कर देते हैं. लेकिन सौम्य, सुसंस्कृत बाबरा अंदरअंदर खीझती हुई भी बड़ी ही शालीनता से उन के बेसिरपैर के प्रश्नों का जवाब दे रही थी.

‘‘हमारे देश का खाना कैसा लगता है?’’

‘‘इट्स फाइन, बट आई कुड नौट ईट. इट इज सो मच औयली ऐंड स्पाइसी,’’ बाबरा ने कंधे उचका कर अंगरेजी में जवाब दिया.

‘‘अपने देश में आप क्या खाती हैं?’’

‘‘वैल, वी ईट चीज, बटर, ब्रैड, मीट, एग्स, वेजीटेबल्स, फिश, बट औल थिंग्स आर बौयल्ड.’’

‘‘मीट किस का खाती हैं? हम ने सुना है, सूअर का मांस…’’ बुरा सा मुंह बना कर बोलीं मिसेज नेगी, जैसे अभी उलटी कर देंगी.

‘‘यस, औब्वियस्ली, इट कंटेन्स मोर प्रोटींस ऐंड विटामिंस,’’ बाबरा ने बड़े ही संयत ढंग से कुबूल किया.

बाबरा का जवाब सुनते ही मिसेज नेगी ने दोनों हाथों से कान पकड़ लिए. ‘‘भाभीजी, आप ऐसे लोगों को कैसे बरदाश्त कर रही हैं जो आप के मजहब में भी एतराज की गई चीजें खाते हैं,’’ कहती हुई मिसेज नेगी मुंह पर हाथ रख कर बाहर निकल गईं. पीछेपीछे मिस्टर नेगी भी कनखियों से बाबरा की सुडौल और खूबसूरत पिंडलियों को देखते हुए बाहर निकल गए.

बाबरा उन के बरताव पर हतप्रभ रह गई और विस्फारित नेत्रों से हम तीनों को बारीबारी से देखने लगी.

हम निरुत्तर हो कर एकदूसरे को शर्मिंदगी से देखने लगे.

क्या बताते बाबरा को कि मिसेज नेगी जिन सूअरों का मांस खाने की बात समझ रही थीं, वे भारत में गंदी नालियों में लोटते और मैला खाते हैं. हम मिसेज नेगी को समझाते भी कैसे कि यूरोपियन जिन सूअरों का मांस खाते हैं, वे बहुत ही साफसुथरे ढंग से गेहूं और सोयाबीन खिला कर पाले जाते हैं. यही विदेशियों का सब से पसंदीदा खाना होता है और फिर हमारी दोस्ती तो इंसानी संबंधों के चलते कायम हुई. इस में खानपान की शर्तें कहां.

इसलामी बंदिशों और यूरोपियन संस्कृति की जरूरतें कभी आपस में टकरा नहीं सकतीं क्योंकि हमारा परिवार इस तंग सोच से ऊपर, बहुत ऊपर उठ कर केवल इंसानी जज्बों को सिरआंखों पर बैठाता है.

बाबरा के भारत आने पर सूरज भी शायद खुश हो कर अपनी उष्मा दिनबदिन बढ़ाता ही चला जा रहा था. एसी, कूलर, पंखे, सारी व्यवस्थाओं के बावजूद बाबरा गरमी से बेहाल थी. मम्मी उस के लिए 2 जोड़ी सूती गहरे रंग के सलवारकुरते ले आईं. कालोनी में ही बुटीक चलाती मिसेज सिद्दीकी के पास नाप दिलवाने बाबरा को ले गईं.

जरमन लड़की को इतने करीब से देखने और उस से मुखातिब होने का सुअवसर सिद्दीकी की बेटियों को जब अनजाने ही मिल गया तो वे बौरा सी गईं. खि…खि…खिखियाती हुई वे एकदूसरे को कोहनी मार कर कहने लगीं, ‘‘तू पूछ न…’’

‘‘नहीं, तू पूछ.’’ बस, इसी नोकझोंक में एक ने हिम्मत कर के पूछा, ‘‘इन की शादी हो गई है?’’ मम्मी ने पूछने वाली को आश्चर्य से देखा. मानो हर लड़की की जिंदगी का मकसद सिर्फ शादी करना है. इस से आगे और इस से ज्यादा वे सोच भी नहीं सकतीं क्योंकि सदियों से शायद उन्हें जन्मघुट्टी के साथ यही पिलाया जाता है, ‘तुम्हें दूसरे के घर जाना है. सलीका, तरीका, खाना बनाना, सीनापिरोना, उठनेबैठने का कायदा सीख लो. तुम्हारी जिंदगी का फसाना सिर्फ शादी, बच्चे, शौहर की गालियां, लातघूंसे और घुटघुट के तिलतिल मरने के बाद ही खत्म होगा.’

‘‘मुझे नहीं मालूम,’’ मम्मी ने जवाब दिया.

‘‘ये लो, आप की मेहमान है और आप ने पूछा ही नहीं. कोई जवान बेटे के घर में किसी की जवान बेटी को ऐसे कैसे रख सकता है? परदेदारी भी कोई चीज है इसलाम में,’’ मिसेज सिद्दीकी की कुंठा को जबान मिल गई.

‘‘नहीं, किसी के पर्सनल मामले में सवाल पूछना तहजीब के खिलाफ है. जहां तक परदेदारी की बात है, तो बदलते जमाने के साथ अपनी सोच को भी खुला रखना चाहिए. इसलाम में गैरों से परदे का हुक्म दिया गया है, अपनों से नहीं. बाबरा तो अर्शी की तरह ही है अनीस के लिए.’’ मम्मी का टका सा जवाब सुन कर मिसेज सिद्दीकी बुरा सा मुंह बना कर बाबरा की नाप लेने लगीं.

2 दिनों बाद उन का फोन आया, ‘‘कपड़े सिल गए हैं. आप आ कर फिटिंग देख लीजिए.’’

मम्मी बाबरा को ले कर उन के घर पहुंचीं तो बाबरा ने मिसेज सिद्दीकी के सामने ही टीशर्ट उतार कर कुरता पहन लिया. मिसेज सिद्दीकी शर्म से गड़ गईं, ‘‘हाय रे, यह तो बड़ी बेशर्म और बेबाक है.’’ इतने दिनों में बाबरा हिंदुस्तानी हावभाव समझने लगी थी.

‘‘आप भी तो औरत हैं, आप से कैसी शर्म?’’ बाबरा हंस कर अंगरेजी में बोली.

‘‘फिर भी लाजशर्म तो औरत का गहना है, यों खुलेआम कपड़े उतारना, तोबातोबा. ऐसे खुलेपन पर ही तो हिंदुस्तानी मर्द मरमर जाते हैं.’’

मैं जानता था, मिसेज सिद्दीकी की दोनों बेटियां घर में सलवारकुरता पहन, हिजाब कर के बाहर निकलती थीं, लेकिन कालेज के बाथरूम में टाइट टीशर्ट और टाइट जींस पहन लेतीं और बौयफ्रैंड के साथ मोटरसाइकिल पर बैठ घंटों किसी रेस्तरा में बतियातीं या पार्क में उन के कंधे पर सिर रख कर बैठी रहतीं.

बाबरा के हमारे घर आने की खबर जंगल की आग की तरह कालोनी में फैलने लगी. तभी नीलू भाई, जो एक करोड़पति बाप की बिगड़ी संतान हैं, का फोन मेरे मोबाइल पर आ गया. मैं बाबरा और अर्शी को ले कर आगरा जाने की तैयारी कर रहा था.

‘‘यार बड़े बेवफा हो, शिप से लौट आए हो, इतने दिन हो गए लेकिन कोई खबर तक नहीं की. अच्छा चलो, छोड़ो, शिकवाशिकायत. मैं अभी हाजिर होता हूं. खालाजान से कहना तुलसीअदरक वाली उन के हाथ की चाय पीने की ख्वाहिश हो रही है.’’ मैं लिहाजन चुप रह कर उन का इंतजार करने के लिए विवश था.

ड्राइंगरूम में घुसते ही उन की नजरें इधरउधर घूम कर कुछ तलाशने लगीं. सोफे पर धंसते ही उन का पहला जुमला सुनाई पड़ा, ‘‘सुना है अंगरेज लड़की साथ लाए…’’ सुनते ही मेरी कनपटी सुलगने लगी और मिलने के बहाने मेरे घर आने का मकसद भी साफ समझ में आ गया. गोश्त की महक को गिद्धों के नथुने तक पहुंचने में कितनी देर लगती है भला?

‘‘जी, मेरे सीनियर की बेटी जरमन से आई है,’’ मैं बोला.

‘‘तो हमें मिलवाओ, यार,’’ सोफे के हत्थे पर जोर से हथेली पटकते हुए लपलपाती जीभ से वे बोले. आवाजें सुन कर बाबरा खुद ही कमरे से ड्राइंगरूम में आ गई और अजनबी को सामने बैठा देख कर दोनों हाथ जोड़ दिए.

दिन की शुरुआत चायकौफी की जगह शराब से शुरू करने वाले नीलू भाई की आंखों में बाबरा को देखते ही सुरूर के लाल डोरे उतर आए. अद्वितीय जरमन सुंदरता को प्रत्यक्ष देख कर नीलू भाई कुछ पलों के लिए पलकें झपकाना भूल गए.

‘‘बाबरा, आइए बैठिए,’’ मैं उन के कुतूहल का मोहभंग कर के बोला.

‘‘यू हैव कम फर्स्ट टाइम टू इंडिया?’’

‘‘आई केम टू एशिया, बट आई वाज नौट इंटर्ड इन इंडिया. आई वाज गोइंग टू सिंगापुर, दैट टाइम. आई क्रौस्ड इंडिया बाय शिप,’’ बाबरा बड़ी सहजता से बोली.

‘‘इट मींस यू हैव कैच्ड माई यंगर ब्रदर ऐट द शिप,’’ नीलू भाई चुटकी लेते हुए बोले.

‘‘नो, नोनो, आई नेवर मीट विद हिम बिफोर. ही इज माई फादर्स कलीग, लाइक माई ऐल्डर ब्रदर.’’ बाबरा इस भद्दे मजाक को बरदाश्त नहीं कर पाई. उत्तेजना से उस का चेहरा लाल हो गया था.

‘‘ब्रदर, मैं चाहता हूं कि तुम्हारे मेहमान को इंडियन फूड का जायका चखाया जाए,’’ मेरी पीठ पर धौल जमाते हुए अधिकारपूर्वक वे बोले. मैं जानता था कि नीलू भाई औरतों को जूतियों की तरह बदलते हैं. उन की आंखों में उतर आई छद्मता को पढ़ने में ज्यादा वक्त नहीं लगा मुझे.

‘‘बाबरा का पेट कुछ गड़बड़ है.’’

‘‘कोई बात नहीं, हम इन की प्लेट में सिर्फ राइस और बनाना (केला) रख देंगे,’’ बाबरा का सान्निध्य पाने का हर संभव प्रयास करते हुए पासा फेंका उन्होंने. मैं ने प्रश्नवाचक निगाहों से बाबरा की तरफ देखा तो वह दोनों हाथ हिला कर बोली, ‘‘नोनो…नोनो, आई हैड माई लंच जस्ट नाऊ.’’

अपने औफर को बाबरा द्वारा नकारे जाने पर हताश नहीं हुए नीलू भाई क्योंकि शायद वे इस जवाब का पहले ही कयास लगा चुके थे. वे बाबरा का सान्निध्य ज्यादा से ज्यादा देर तक पाने के लिए अपना पारिवारिक इतिहास बताने लगे.

‘‘माई फादर वाज फ्रीडमफाइटर. ही वर्क्ड विद सुभाष चंद्र बोस. ही लाइक्ड हिटलर मैथोलौजी.’’

‘‘मगर हम उसे पसंद नहीं करते क्योंकि उस ने पूरी जरमनी को तबाह कर डाला था. उसी की वजह से हमारे चर्च नेस्तनाबूद हो गए. हमारी आर्थिक व्यवस्था क्षतविक्षत हो गई. उस पागल आदमी की वजह से हमारे देश के 2 टुकड़े हो गए. प्लीज आई डोंट वौंट टू लिसन ईवन हिज नेम,’’ बाबरा गुस्से से बोली.

बाबरा की तीखी आवाज ने नीलू भाई को निरुत्तर कर दिया. बाबरा सोचने लगी कि इन हिंदुस्तानियों के पास कितना फालतू वक्त होता है? 2 घंटे से बैठ कर फुजूल की बातों में वक्त जाया कर रहे हैं. टाइम की कोई कीमत ही नहीं है इन के पास. जरमनी में रोटी, कपड़ा और जीने की जद्दोजेहद में हमें सिर्फ रात में 6-7 घंटे ही बैठनेसोने के लिए वक्त मिल पाता है. इन्हीं जैसे लोगों के कारण इंडिया अभी तक विकासशील देशों की लाइन में ही खड़ा हुआ है.

अपना पत्ता साफ होते देख नीलू भाई उठ खड़े हुए, ‘‘सो, नाइस मीटिंग विद यू, यंग लेडी,’’ कह कर बाबरा की तरफ हाथ बढ़ा दिया. बाबरा ने भी छुटकारा पाने की दृष्टि से अपनी तहजीब के मुताबिक हाथ बढ़ा दिया. नीलू भाई ने उस की हथेलियों को धीरे से दबा दिया और देर तक उस का हाथ थामे हुए मुझ से मेरी अगली जौइनिंग के बारे में बेमकसद बातें करने लगे. बाबरा उन की धूर्तता को समझ गई और झटके से अपना हाथ खींच कर घर के अंदर चली गई.

‘‘शरमा गई,’’ कह कर, खिसियानी हंसी हंसते हुए नीलू भाई बाहर चले गए. माहौल बहुत ही बोझिल हो गया था, इसलिए मैं भी चुपचाप अपने कमरे में जा कर लेट गया.

शाम को अर्शी ने बतलाया कि बाबरा ने इंटरनैट पर अपनी वापसी का टिकट बुक कर लिया. मैं ने झिझकते हुए इतनी जल्दी वापस जरमनी जाने की वजह पूछी तो वह बिफर पड़ी, ‘‘इट इज रियली स्ट्राइकिंग, आप के देश में गंगा जैसी पावन नदी है. एवरेस्ट जैसी दुनिया की सब से ऊंची चोटी है. दूर तक फैला रेगिस्तान है. आसमान छूने वाली इमारत कुतुबमीनार है. प्यार और कुर्बानी का प्रतीक ताजमहल है. गांधी, गौतम, विवेकानंद का बर्थप्लेस है यह. एशिया का सब से ज्यादा पापुलेटेड कंट्री है यह. लेकिन हकीकत में एशिया का सब से घटिया देश है.

‘‘यहां के आलसी और धूर्त लोग मुफ्त में मिली चीजों का भोग करने में ही खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं. आजादी मिले आधी सदी से ज्यादा हो गए लेकिन आज भी दोतिहाई हिंदुस्तानियों को पेटभर रोटी, तनभर कपड़ा, सिर पर छत मयस्सर नहीं है. 21वीं सदी में पहुंच कर भी यहां के मर्द, औरत को बराबरी का दरजा नहीं दे सके हैं. उन की महत्तवाकांक्षाओं को पूरा करने के बजाय वे उसे सिर्फ भोग की वस्तु समझते हैं. ऐंड यू नो, स्टिल इंडियंस नीड हंड्रैड ईयर्स टू कम विद द लैवल औफ यूरोपियन पीपल.’’

‘‘बट औल आर नौट लाइक दैट, बाबरा.’’ मैं ने ठंडी सांस भर कर बेबुनियाद सफाई देते हुए उसे समझाने की कोशिश की तो वह और आगबबूला हो गई. वह बोली, ‘‘मिस्टर अनीस, माई फादर वाज टोटली डिस्एग्री टू सेंड मी इंडिया. नोइंग औल द फैक्ट्स बाय माई फ्रैंड्स, आई वौंट टू सी एवरीथिंग बाय माई ओन आइज.’’ यह कहते हुए उस की नीली आंखों में समंदर उतर आया और वह फफक कर रो पड़ी. भरे गले से जो कुछ उस ने बताया, सुन कर मेरी काटो तो खून नहीं जैसी हालत हो गई, शर्मिंदगी से कई फुट पैर जमीन में धंस गए.

‘‘20 साल पहले उस की इकलौती फूफी इंडिया घूमने आई थी. अल्हड़, बिंदास फूफी हिंदी न समझने और अंगरेजी न बोल सकने के कारण जरमन में ही बोलती थी.

‘‘आगरा में ताजमहल देखने जाते वक्त टैक्सी वाले ने गाड़ी गांव की तरफ मोड़ दी. अपने 2 साथियों के साथ मिल कर उस का कीमती कैमरा और पर्स छीन लिया. वह रिपोर्ट करने जब पुलिस स्टेशन पहुंची तो राहजन को पहचानने का बहाना बना कर पुलिस वालों ने उसे पुरानी कोठी में 3 दिनों तक रखा और लगभग 10 लोगों ने उस के साथ बलात्कार किया.

‘‘जरनम ऐंबैसी की मदद से वह किसी तरह विक्षिप्त हालत में हैम्बर्ग पहुंच तो गई लेकिन एड्स की घातक बीमारी ने उसे आखिरकार 5 सालों में निगल लिया. मेरे डैडी अभी तक इस सदमे से उबर नहीं पाए हैं,’’ बाबरा के मुंह से यह सुन कर मेरी जबान तालू से चिपक गई. हताश, निराश मैं तीसरे दिन बाबरा को एयरपोर्ट पहुंचाने के लिए गाड़ी निकाल रहा था कि मिस्टर जेम्स का फोन आ गया, ‘‘थैंक्यू फौर सेंडिंग माई डौटर सेफली, थैंक्यू वेरी मच.’’ यह वाकई शुक्रिया था या करारा चांटा, मैं आज तक समझ नहीं पाया हूं.

इंजीनियरिंग से दूरी, फिर भी मेक इन इंडिया

देश को महान बनाने का सपना कोई देख रहा है, ऐसा सोचना भूल जाएं. वह रामायण और महाभारत की परीकथाओं की बात कर सकता है, समुद्र पर पुल और लाक्षागृह बनाने का बखान कर सकता है पर असल में, कुछ बड़ा नहीं कर सकता. महान बनाने के लिए देश को इंजीनियर चाहिए जो नया सोच सकें, दूर की सोच सकें. यह गुण हमारे यहां है लेकिन कितनों में, यह इस बात से साफ है कि देश के इंजीनियरिंग कालेज फटाफट बंद हो रहे हैं.

जिस देश के पगपग पर नए निर्माण की जरूरत है वहां हर दिन एक इंजीनियरिंग कालेज बंद हो रहा है. खरपतवार की तरह खुले कालेज अब लगातार कम हो रहे हैं और उन की विशाल बिल्डिंगें सायंसायं कर रही हैं. 4 वर्षों में 3 लाख सीटें कम हो गई हैं. इसी साल मेक इन इंडिया के नारों के बावजूद, 80,000 सीटें और 200 कालेज कम हो गए हैं. जो कालेज चल रहे हैं उन में कितने घिस रहे हैं, यह अंदाजा लगाना कठिन है. एक समय देश में 20 लाख इंजीनियरिंग छात्रों की जगह थी, आज केवल 7.9 लाख छात्रों ने 2016-17 में प्रवेश लिया.

इंजीनियरिंग से मोहभंग होने का कारण यह है कि हमारे यहां हाथ से काम करने की आदत ही नहीं. हमारे इंजीनियरों की दफ्तरों में बैठ कर काम करने की आदत है. वे कंप्यूटरों पर दक्ष तो हैं पर धूप, पानी, धुएं या अंधेरी खानों के नहीं. ये काम तो हमारे यहां हमेशा नीची जाति के लोग करते रहे हैं और वे इन 20 लाख सीटों के लायक फीस भर ही नहीं सकते. उन की पहले की शिक्षा ऐसी नहीं कि वे आज की कठिन तकनीक को समझ सकें. विदेशों में मिलने वाली नौकरियां भी कम होने लगी हैं क्योंकि चीन से इंजीनियर भारी संख्या में मिल रहे हैं. चीन हर साल 47 लाख छात्रों को साइंस, टैक्नोलौजी, इंजीनियरिंग और मैथमैटिक्स के विशेषज्ञ बना रहा है जो हमारे छात्रों से कहीं ज्यादा योग्य, तेज, दक्ष, मेहनती व दूरदर्शी हैं. हमारे छात्र तो ‘थ्री इडियट’ फिल्म की तरह पूजापाठी हैं, अंगूठियां पहनने वाले हैं, दानदक्षिणा के भरोसे पास होने वाले हैं.

इस तरह के इंजीनियर स्वाभाविक है कि काम पर आते ही निकम्मे साबित हो जाते हैं. कुछ हजार जरूर वर्ल्डक्लास होंगे पर बाकी बस किसी तरह कामचलाऊ हैं. यह किसी भी सड़क पर 4 मील चलने पर पता चल जाएगा, विदेशी गाड़ी में चलने पर भी, सड़क की खराब बनावट के चलते, खड़खड़ आवाज आएगी, 4 में से 3 ट्रैफिक लाइटें काम नहीं कर रही होंगी, बिजली के तार लटके या टूटें दिखेंगे, सड़क के किनारे खराब हालत में भारी भरकम क्रेन ट्रेलर दिख जाएंगे, गुजरते ट्रक आड़ेतिरछे चल रहे होंगे और सड़क की बत्तियां आमतौर पर गुल होंगी.

हालत तो यहां तक है कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के कार्यालयों के सामने का राजपथ भी इंजीनियरिंग की फेल्योर का महान नमूना है जहां हर कोने पर कुछ न कुछ बेतरतीब नजर आएगा. देश में इंजीनियरों की नहीं, पुजारियों की भरमार हो रही है. हम मेक इन इंडिया में केवल हवनकुंड बनाएंगे, ऐसा महसूस किया जा रहा है.

भाजपा के निशाने पर मायावती और अखिलेश

गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में मिली करारी हार के बाद भाजपा को सपाबसपा की दोस्ती किसी भी तरह से हजम नहीं हो रही है.

भाजपा को अखिलेश यादव और मायावती के बीच दोस्ती की उम्मीद नहीं लग रही थी, पर उन दोनों नेताओं ने जिस तरह से बहुत सारे विवादों को किनारे कर के दोस्ती का हाथ आगे बढ़ाया है, वह भाजपा के लिए खतरे की घंटी है.

साल 2019 के लोकसभा चुनाव की नजर से उत्तर प्रदेश सब से अहम राज्य है. पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा और उस के सहयोगी दलों को वहां की कुल 80 सीटों में से 72 सीटें मिली थीं. 2 उपचुनाव हार कर यह तादाद अब 70 हो गई है.

पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को तकरीबन 42 फीसदी वोट मिले थे. इस चुनाव में सपा को 22 और बसपा को 20 फीसदी वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस को तकरीबन 7 फीसदी वोट हासिल हुए थे. ऐसे में सपाबसपा और कांग्रेस के गठबंधन का वोट फीसदी मिला कर 49 फीसदी हो जाता है. इस से उत्तर प्रदेश से भाजपा का सूपड़ा साफ हो सकता है.

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के पास नरेंद्र मोदी का चेहरा भले हो, पर ‘मोदी मैजिक’ असरकारक नहीं रहेगा. पिछले 4 साल के दौरान ‘शाहमोदी’ की जोड़ी ने भाजपा के अंदर भी लोकतंत्र को खत्म कर दिया है. ऐसे में विरोध की आवाजें वहां भी उभरने लगी हैं.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने ‘दलित, अतिपिछड़ा और सवर्ण’ समीकरण के साथ हिंदुत्व का सहारा ले कर कामयाबी हासिल की थी. तब ‘दलित और अतिपिछड़ा वर्ग’ हिंदुत्व के नाम पर अपनी पुश्तैनी पार्टियों से किनारा कर के भाजपा में शामिल हो गया था. पर नवहिंदुत्व का शिकार हुए इस तबके को चुनाव के बाद कुछ हासिल नहीं हुआ. यही वजह है कि इन जातियों के नेता अब भाजपा के खिलाफ मुखर होने लगे हैं.

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में तकरीबन एक साल बाकी है. इस बीच भाजपा को कई तरह की चुनौतियों से निबटना है. भाजपा को अपनी पार्टी के दलित और अतिपिछड़ा तबके के नेताओं के असंतोष को खत्म करना है. पार्टी के मूल कैडर में भी बाहरी नेताओं को अहमियत दिए जाने से नाखुशी है. उत्तर प्रदेश और केंद्र में भाजपा मंत्रिमंडल का विस्तार कर इन तबकों के नेताओं को साधने की कोशिश होगी.

गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में मिली हार उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए बानगीभर है. इस तरह के नतीजों से भाजपा के दलित नेताओं के होश उड़ गए हैं. वे भी चुनाव करीब देख कर विरोध करने लगे हैं.

सपा बसपा की दोस्ती से डर

भाजपा को दोहरा डर है. एक तो उसे यह लग रहा कि सपाबसपा की दोस्ती से लड़ना पड़ेगा. दूसरे, उसे अपनी पार्टी के दलित नेताओं के बयानों को भी रोकना है.

ऐसे में भाजपा अनुसचित जाति मोरचा के प्रदेश अध्यक्ष सांसद कौशल किशोर कहते हैं, ‘‘भाजपा की केंद्र सरकार बाबा साहब के मिशन को पूरा करेगी. वह गरीबी के खिलाफ लड़ रही है. साल 2022 तक हर गरीब के पास अपना मकान होगा. उस के पास अपना रोजगार होगा. समाज में दलित गरीब और पिछड़ा वर्ग तभी भेदभाव मुक्त रह पाएगा जब वह मालीतौर पर मजबूत होगा.’’

भाजपा अपने बचाव में 2 बातें कह रही है. एक तो यह कि उस के किए गए कामों का असर साल 2022 में दिखेगा. दूसरा, सपाबसपा निजी फायदे की दोस्ती कर के उस को कुरसी से हटा कर भ्रष्टाचार और भाईभतीजावाद को बढ़ावा देगी.

सपाबसपा की हिंदुत्व से लड़ाई नई नहीं है. साल 1990 के बाद जब रामलहर में चुनाव हो रहे थे तो भाजपा ने हिंदी बोली वाले प्रदेशों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान में अपनी सरकार बना ली थी.

उस के बाद उत्तर प्रदेश में सपाबसपा ने एकजुट हो कर भाजपा का मुकाबला किया था और साल 1993 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को उत्तर प्रदेश की सत्ता से दूर कर दिया था.

सपा के मुलायम सिंह यादव और बसपा के कांशीराम के बीच हुई इस दोस्ती को ‘मिले मुलायमकांशीराम हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ के नारे से बधाई दी गई थी.

भाजपा को यह दोस्ती रास नहीं आई थी. वह इस गठबंधन को तोड़ने में जुट गई थी.

बसपा नेता मायावती के कंधे पर बंदूक रख कर इस गठबंधन को तोड़ दिया गया. सपाबसपा के बीच ‘गैस्ट हाउस कांड’ की दरार पड़ गई. ‘गैस्ट हाउस कांड’ को मायावती के मानसिक और शारीरिक अपमान के रूप में जाना जाता है.

साल 1995 के ‘गैस्ट हाउस कांड’ के बाद साल 2018 में सपाबसपा पहली बार एकसाथ आती दिखी हैं.

23 साल के बाद बसपा और सपा में नई पीढ़ी आ चुकी है, जिस ने ‘गैस्ट हाउस कांड’ के बारे में केवल सुना है. ‘गैस्ट हाउस कांड’ की शिकार खुद मायावती भी इस कांड को भूल कर आगे बढ़ चुकी हैं.

राज्यसभा चुनाव में यह साफ देखने को मिला. भाजपा को लग रहा था कि राज्यसभा चुनावों में अगर बसपा उम्मीदवार भीमराव अंबेडकर चुनाव हार जाएंगे तो सपाबसपा की दोस्ती टूट सकती है. राज्यसभा चुनाव में हार के बाद भी बसपा ने साफ कर दिया कि सपा के साथ दोस्ती नहीं टूटेगी.

बसपा के साथ संबंधों पर सपा नेता अखिलेश यादव ने कहा, ‘‘हमें मायावती के तजरबे पर यकीन है. हम उन के तजरबे का फायदा लेंगे. समाजवादियों का दिल बड़ा है. मौका लगेगा तो जो देना होगा देंगे.’’

अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ समेत भाजपा के नेताओं के बयानों की आलोचना करते हुए कहा, ‘‘हमारी दोस्ती पर जिस तरह के बयान मुख्यमंत्री दे रहे हैं, ये उन को शोभा नहीं देते. भाजपा के लोग हमें तरहतरह से परेशान करने के उपाय निकालेंगे.’’

अखिलेश यादव की ही तर्ज पर बसपा प्रमुख मायावती ने भी अपने कार्यकर्ताओं को बुला कर मीटिंग की. उन्हें समझाया कि किसी तरह की बयानबाजी में न पड़ें. मीडिया की खबरों से दूर रहें. भाजपा उन को लड़ाने का काम कर सकती है.

जमीनी लैवल पर देखें तो अगड़ों से ज्यादा दलित और पिछड़े एकदूसरे के खिलाफ दिखते हैं. दलितों के मुकाबले पिछड़े और अतिपिछड़े ज्यादा धार्मिक होते हैं. ऐसे में बसपा और सपा के बीच बनने वाला गठबंधन राजनीतिक फायदा तो दे सकता है, पर सामाजिक फायदा नहीं देगा.

उत्तर प्रदेश में साल 2007 से ले कर साल 2012 के बीच मायावती की सरकार में सब से ज्यादा परेशानी पिछड़ों को ही थी. यही वजह है कि जब साल 2012 के चुनाव हुए तो पिछड़ों ने पूरी तरह से बसपा से दूरी बना कर सपा को वोट दे दिया था और मायावती चुनाव हार गई थीं.

मायावती अपने कार्यकाल में दलितों का भला नहीं कर पाईं. दलित ऐक्ट और दलित महापुरुषों की मूर्तियों के सहारे ही वे चुनाव जीतना चाहती थीं. जब तक सामाजिक लैवल पर कोई काम नहीं होगा, बदलाव होना मुश्किल है.

धार्मिक रूप से दलित और पिछड़ों की सोच में बहुत फर्क है. दलित ऐक्ट के विरोध के समय हुए आंदोलन में यह देखने को मिला कि जब कुछ आंदोलन करने वालों ने भगवान से अभद्रता करने वाले फोटो सोशल मीडिया पर वायरल किए तो आंदोलन का समर्थन करने वाले पिछड़ों ने दलितों की बुराई शुरू कर दी.

यह बात भी सामने आ गई कि दलित ऐक्ट में जिस संशोधन की बात अदालत कर रही है, उत्तर प्रदेश में मायावती ने अपने कार्यकाल में उस में संशोधन कर दिया था. यह उस समय की बात है जब वे सोशल इंजीनियरिंग का नाम ले कर सत्ता में आई थीं.

मायावती के समय दलित ऐक्ट में संशोधन जरूर हो गया था, पर उस का असर न के बराबर था.

कांग्रेस का पेंच

दलितों में भी कई मुद्दों को ले कर एक राय नहीं है. दलित पिछड़ों में भी आपसी भेदभाव कायम है. ऐसे में सपाबसपा की दोस्ती से सामाजिक लैवल पर कोई बदलाव होगा, यह सोचना सही नहीं है.

साल 2019 में लोकसभा का अगला चुनाव है. ऐसे में सपाबसपा कांग्रेस को कितनी सीटें देंगी, इस पर यह गठबंधन तय होगा. अभी तक की बातचीत के मुताबिक कांग्रेस और दूसरे दलों को केवल 20 सीटें देने की बात हो रही है. बाकी बची 30-30 सीटें सपाबसपा आपस में लेना चाहती हैं. इस तरह से कांग्रेस के पक्ष में मुश्किल से 15 सीटें आएंगी.

कांग्रेस राष्ट्रीय लैवल पर भाजपा के मुकाबले सब से बड़ी पार्टी है. वह सपाबसपा के बराबर सीटें चाहती है. अगर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनावों में कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन कर जीत हासिल करती है तो उस का दबाव और बढ़ेगा.

कांग्रेस उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भले ही सपाबसपा को ज्यादा अहमियत देने दे, पर लोकसभा चुनाव में वह कम सीटों पर समझौता नहीं करेगी.

मायावती साल 2017 के विधानसभा चुनाव में प्रदर्शन के आधार पर तालमेल करना चाहती हैं जबकि कांग्रेस 2014 के लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन के आधार पर सीटों का समझौता करना चाहती है.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली थी, पर कांग्रेस के पास 2 सीटें थीं. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सीटें बसपा की सीटों के मुकाबले आधी ही थीं. अपनी मांग को मजबूती से रखने के लिए दोनों ही दल समझौते की शर्त अपने मुताबिक रखना चाहते हैं.

कांग्रेस का मानना है कि जब चुनाव लोकसभा के हैं तो आधार लोकसभा चुनाव ही होना चाहिए. कांग्रेस का पेंच सपा के लिए भी हल करना जरूरी है, क्योंकि कांग्रेस और सपा का समझौता विधानसभा चुनाव में होे चुका है.

राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच आपसी तालमेल है. मायावती दोनों के बीच कैसे जगह बना पाएंगी, यह देखने वाली बात होगी.

जब फिल्म रिलीज से पहले ही लीक हो गए ये 6 HOT सीन

बौलीवुड फिल्मों में सेक्सी सीन आम बात है. ज्यादातर फिल्मों में सेक्सी सीन डाले जाते हैं ताकि फिल्मों के दर्शक बढ़े. आज के समय में लगभग हर फिल्म में इंटीमेट सीन दिखाए जाते हैं. कई बार तो ऐसे सीन की जरुरत नहीं होती है फिर भी ऐसे सीन डाले जाते हैं.

बौलीवुड की कई फिल्मों में फिल्माए गए सेक्सी सीन फिल्म रिलीज होने से पहले ही लीक हो गए. आज के समय में फिल्म का लीक हो जाना उतनी बड़ी खबर नहीं है जितना की फिल्म का इंटीमेट सीन लीक होना. फिल्म के प्रोमो में सेक्सी सीन की झलक डाली जाती है ताकि लोग उसे देख सिनेमाघरों तक खींचे चले आएं. ऐसे में इंटिमेट सीन लीक होने फिल्म की कमाई पर असर पड़ता है.

आज हम आपको ऐसी ही कुछ सेक्सी सीन के बारे में बता रहे हैं जो फिल्म के रिलीज होने से पहले ही लीक हो गए.

पार्च्ड

राधिका आप्टे की इस फिल्म ने जितनी सुर्खियां नहीं बटोरी उस से ज्यादा तो राधिका आप्टे की लीक हुई न्यूड फोटोज और वीडियो ने सुर्खियां बटोरी थी.

जिंदगी 50-50

इस फिल्म में पाकिस्तानी अभिनेत्री वीना मलिक एक वैश्या का भूमिका निभा रही हैं. इस फिल्म में वीना का एक इंटीमेट सीन फिल्म के रिलीज से पहले ही इंटरनेट पर वायरल हो जाता है.

रंग रसिया

पेंटर राजा रवि वर्मा पर आधारित यह फिल्म वैसे तो पूरी तरह से सेक्सी सीन्स से भरा हुआ है लेकिन फिल्म के रिलीज से पहले इसका एक सीन इंटरनेट पर लीक हो गया. इस सीन में अपनी पेंटिंग बनवाने के लिए नन्दिता सेन न्यूड हो जाती हैं.

बाबूमोशाय बंदूकबाज

हाल ही में रिलीज होने वाली फिल्म बाबूमोशाय बंदूकबाद का एक सीन सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. इसके बाद से ही नवाजुद्दीन सिद्दीकी और बिदीता बाग के इस इंटीमेट सीन को लेकर चर्चा शुरू हो गया.

डर्टी पौलिटिक्स

राजनीति पर आधारित इस फिल्म में ओम पूरी और मल्लिका शेरावत के बीच हुए इंटीमेट सीन फिल्म के रिलीज होने से पहले ही लीक हो गया. यह फिल्म साल 2015 में रीलिज हुआ था.

लिपस्टिक अंडर माई बुर्का

इस फिल्म के एक सीन के लीक होने का इतना बड़ा इम्पेक्ट पड़ा कि सेंसर बोर्ड ने इसे सर्टिफिकेट देने से ही मना कर दिया.

दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच लाने के लिए फिल्मों में सेक्स सीन्स का भरपूर तड़का लगाया जाता है. इस तरह के हौट और सेक्स सीन्स के जरिए डायरेक्टर और प्रोड्यूसर अपनी फिल्मों को बौक्स आफिस पर हिट कराने की पूरी कोशिश करते हैं. अगर ये कहा जाए कि सेक्स सीन्स फिल्मों को हिट कराने का एक बेहतरीन फंडा बन गया है तो ये गलत नहीं होगा.

चंदन को नहीं मिला शहीद का दर्जा

कासगंज की आग ठंडी हो चुकी है. इस के साथ ही साथ चंदन गुप्ता के परिवार के साथ खड़े होने वालों की तादाद भी अब नहीं के बराबर है. दंगे के समय जिस चंदन के शव को तिरंगे में लपेट कर शहीद का दर्जा दिया गया, उस पर उत्तर प्रदेश सरकार चुप है. चंदन की मां को लगता है कि अगर कासगंज में सांप्रदायिक आग नहीं भड़की होती तो उस के घर का चिराग नहीं बुझा होता. देश कासगंज की घटना को भूल सकता है, पर चंदन के परिवार को कासगंज का दंगा कलंक बन कर जीवन भर याद रहेगा.

25 जनवरी को चंदन गुप्ता अपने कुछ साथियों के साथ घर के बाहर बैठा था. वह जुझारू किस्म का युवक था, राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के नाम पर कुछ भी कुरबान करने को तैयार रहने वाला था. 26 जनवरी की पूर्वसंध्या पर वह सोच रहा था कि तिरंगा यात्रा कैसे निकाली जाएगी. शहर में धारा 144 लागू थी. कासगंज में मंदिर के सामने बैरिकेडिंग की वजह से 2 समुदायों के बीच तनाव था. चंदन ने अपने साथियों को समझाते हुए कहा कि अब प्रदेश में हमारी सरकार है. हम तिरंगा यात्रा निकालेंगे. हर युवक के मन में अपने देश और राष्ट्रीय झंडे को ले कर सम्मान था. चंदन की बात पर सब तैयार हो गए.

कासगंज के अमापुर में सुशील गुप्ता का परिवार रहता था. उन का घर गली के अंदर था. सुशील गुप्ता के परिवार में पत्नी संगीता और बेटी वंदना सहित 22 साल का बेटा अभिषेक था. सुशील गुप्ता का अपना बिजनैस है. बेटा अभिषेक गुप्ता उर्फ चंदन गुप्ता ‘संकल्प’ नाम की संस्था चलाता था.

वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ा हुआ था. हिंदूवादी विचारधारा का प्रबल समर्थक. उस की संस्था में 20 से 30 युवक सक्रिय रूप से जुडे़ थे. ये सभी शहर में तमाम तरह की सामाजिक गतिविधियां चलाते थे.

26 जनवरी, 2018 को चंदन गुप्ता और उस के साथियों ने मोटरसाइकिल से तिरंगा यात्रा निकालने का संकल्प लिया. शुक्रवार को दिन में करीब 10 बजे चंदन गुप्ता और उस के कुछ साथी युवकों ने हिंदूवादी संगठनों के साथ तिरंगा यात्रा निकालने की शुरुआत की. ये लोग पूरे कासगंज में तिरंगा यात्रा निकालना चाहते थे. सरकार का प्रभाव होने के कारण तिरंगा यात्रा निकालने के लिए प्रशासन से अनुमति लेने की जरूरत नहीं समझी गई.

असल में अनुमति न लेने के पीछे जिले में फैला तनाव भी था. कासगंज में ही चामुंडा मंदिर है. यहां पर  बैरिकेडिंग लगाने को ले कर 22 जनवरी से विवाद चल रहा था, जिस के चलते दोनों पक्षों में तनाव बढ़ा हुआ था. कासगंज जिला प्रशासन ने इस तनाव को गंभीरता से नहीं लिया था.

SOCIETY

ऐसे में जब 26 जनवरी को 40-50 मोटरसाइकिलों के साथ तिरंगा यात्रा निकाली गई और उस में उत्तेजक नारे लगाए गए तो बडुनगर में दूसरे पक्ष के साथ तकरार शुरू हो गई. तकरार के कारणों पर लोगों के अलगअलग मत थे. कुछ लोगों का कहना था कि तिरंगा यात्रा में शामिल युवकों का यहां के लोगों से नारेबाजी को ले कर विवाद हुआ. पथराव के बाद तिरंगा यात्रा वाले लोग वापस चले गए.

ये लोग बडुनगर मोहल्ले से 500 मीटर दूर जा कर रुक गए और वहां से आधे घंटे के बाद फिर वापस आए. इस बार ये 20-25 लोग थे. नारेबाजी करते इन युवकों पर हमला शुरू हो गया, जिस में चंदन के कंधे पर और नौशाद नामक युवक के पैर में गोली लगी. चंदन की अस्पताल ले जाते समय ही मौत हो गई.

खबरों की गरमी ने बिगाड़ा माहौल

इस खबर के फैलते ही माहौल गर्म हो गया. पूरे कासगंज और हाईवे पर आगजनी, तोड़फोड़ और हिंसा की घटनाएं बढ़ गईं. स्थानीय लोगों के अनुसार यहां इस से पहले कभी भी ऐसा भयानक दंगा नहीं हुआ था. राममंदिर आंदोलन के दौरान भी ऐसी हिंसक घटनाएं नहीं घटी थीं.

यहां के लोग 25 साल के इतिहास में इसे सब से बड़ा दंगा मानते हैं. चंदन के पोस्टमार्टम से पता चला कि गोली कंधे की तरफ से लगी थी, जो शरीर में धंस गई. गोली किडनी में धंसी मिली, इस से लगता था कि गोली छत जैसी किसी ऊंची जगह से चलाई गई थी.

कासगंज दंगों को ले कर 2 मुकदमे दर्ज हुए. पहला मुकदमा इंसपेक्टर कासगंज की तरफ से आईपीसी की धारा 147/148/149/307/336/436/295/427/323/504 व 7 सीएल एक्ट के तहत 4 नामजद और करीब 150 अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज हुआ.

दूसरा मुकदमा फायरिंग में मारे गए चंदन गुप्ता के पिता सुशील गुप्ता की तरफ से आईपीसी की धारा 147/148/149/341/336/307/302/504/506/12ए व राष्ट्रीय ध्वज अधिनियम के तहत दर्ज कराया गया.

चंदन की हत्या में वसीम नामक युवक का नाम आया, जो समाजवादी पार्टी से जुड़ा था. वसीम के पिता भी बिजनैसमैन हैं. कासगंज पुलिस ने सलीम नाम के युवक को पकड़ा. उस के बारे में भी कहा जा रहा है कि चंदन की हत्या में वह शामिल था.

कासगंज उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा जिला है. 2011 की जनगणना के अनुसार, लगभग 2 हजार वर्ग किलोमीटर वाले कासगंज में मिश्रित आबादी है. यहां पर 66 फीसदी हिंदू और 32 फीसदी मुसलिम आबादी है. कासगंज शहर में रहने वाले ज्यादातर लोग  कारोबारी हैं.

कासगंज स्टेट हाइवे-33, आगरा बदायूं और बरेली राजमार्ग पर बसा है. लोकल बोली में इसे मथुरा बरेली हाइवे कहते हैं. 1992 और उस के बाद 1994 में यहां सांप्रदायिक तनाव की वजह से तोड़फोड़ और आगजनी हुई थी. 2010 में तहसील परिसर में प्रशासन के द्वारा एक मंदिर के तोड़े जाने से तनाव फैला था. तिरंगा यात्रा का तनाव इन सब पर भारी पड़ गया. इस की वजह चामुंडा मंदिर में भड़का विवाद था. विवाद की यह आग अंदर ही अंदर सुलग रही थी.

पुलिस और प्रशासन इस की लपटों को समझने में असफल रहे. दोनों ही पक्ष किसी अवसर की तलाश में थे. चामुंडा मंदिर विवाद का गुस्सा तिरंगा यात्रा में खुल कर बाहर आ गया. अगर जिला प्रशासन ने चामुंडा मंदिर विवाद को देखते हुए सतर्कता बरती होती तो तिरंगा यात्रा में हिंसक वारदात नहीं होती.

दंगे के बाद खूब दिखा राजनीतिक ड्रामा

तिरंगा यात्रा में चंदन गुप्ता की मौत के बाद भड़काऊ राजनीति का दूसरा दौर चला, जिस के तहत चंदन गुप्ता के शरीर को तिरंगे से लपेटा गया और इसे सोशल मीडिया पर वायरल किया गया और 26 जनवरी को अखबारों के औफिस बंद रहते हैं. ऐसे में कासगंज और बाहर के लोगों को इस समाचार के बारे में सोशल मीडिया और खबरिया चैनलों से खबरें मिलनी शुरू हुईं. इन में तमाम खबरें बिना किसी आधार के चल रही थीं.

जिला प्रशासन ने सोशल मीडिया पर देर से काबू किया. तब तक आग भड़क चुकी थी. खबरिया चैनलों ने भी अपने हिसाब से खबरों को दिखाना शुरू किया. सब से अहम बात यह थी कि हर निष्पक्ष खबर या संदेश को राष्ट्रवादी विचारधारा के खिलाफ जोड़ दिया गया. इस में कासगंज गए मीडियाकर्मियों से ले कर प्रशासनिक अधिकारियों के सोशल मीडिया पर दिए गए संदेश शामिल थे. कुछ लोगों ने सही बात को रखने का प्रयास भी किया तो उन की बात को सुना ही नहीं गया.

कासगंज के पड़ोसी जिले बरेली के डीएम राघवेंद्र विक्रम सिंह ने अपने फेसबुक एकाउंट पर अपना दर्द बयान करते हुए सामाजिक संदेश में लिखा, ‘अजीब रिवाज बन गया है. पहले मुसलिम मोहल्ले में पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाते घुस जाओ. क्या वे पाकिस्तानी हैं? बरेली के अलीगंज खैलम में ऐसा ही हुआ. इस के बाद मुकदमे कायम हुए.’

डीएम बरेली का यह संदेश कट्टरपंथियों को रास नहीं आया. सत्तापक्ष से ले कर कट्टरवादी संगठनों तक ने इस का विरोध करना शुरू कर दिया. ऐसे में मजबूर हो कर डीएम बरेली को फेसबुक से अपना संदेश हटाना पड़ा.

SOCIETY

हालांकि जो बात बरेली के डीएम राघवेंद्र विक्रम सिंह ने कही, उस से कहीं कठोर शब्दों में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाइक ने कासगंज के दंगे को कलंक बताया. राज्यपाल खुद भाजपा के हैं. ऐसे में कट्टरवादी संगठन उन का विरोध नहीं कर पाए. हर बार की तरह कासगंज में भी सत्ता और विपक्ष ने अपनीअपनी राजनीतिक रोटियां सेंकनी शुरू कर दीं.

राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए जुलूस निकाल कर लोगों को उकसाने का काम हुआ. इस तरह की घटनाओं में शामिल युवाओं को यह देखनासमझना चाहिए कि प्रशासन कुछ दिनों के बाद सब कुछ भूल जाता है.

कासगंज के दंगों को ले कर बरेली के डीएम से ले कर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल ने जो कहा, वह सच है. राज्यपाल ने कासगंज के दंगों को कलंक कहा तो कोई नहीं बोला लेकिन डीएम के खिलाफ सत्ता से ले कर कट्टरवादी संगठनों ने मोर्चा खोल दिया. देखा जाए तो उत्तर प्रदेश के राज्यपाल की टिप्पणी कुछ वैसी ही है, जैसी गुजरात में हुए दंगों के समय भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने तब के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘राजधर्म’ के पालन की बात कही थी.

भाजपा के लोग डीएम की टिप्पणी को ले कर मुखर थे. लेकिन वे सांसद राजवीर सिंह, साध्वी निरंजन और विनय कटियार के बयानों पर चुप्पी साध गए. कासगंज में हुए हादसे को राष्ट्रधर्म से जोड़ कर जिस तरह से प्रचारित किया गया, उस से भावनाओं को भड़काने में मदद मिली.

लखीमपुर में रहने वाले अकरम की पत्नी अलीगढ़ में रहती थी. उस की पत्नी को बच्चा होने वाला था. अकरम कार से अलीगढ़ जा रहा था. कासगंज हाइवे पर दंगाइयों ने अकरम की कार को घेर कर तोड़फोड़ शुरू कर दी. अकरम को खूब मारापीटा, जैसेतैसे वह चोट लगने के बाद अस्पताल पहुंचा तो पता चला कि उस की दाहिनी आंख की रोशनी चली गई.

कासगंज के कलंक को कभी नहीं भूल पाएंगे चंदन के घर वाले

ऐसे लोगों की संख्या काफी है, जिस में बेगुनाह लोगों से मारपीट कर उन की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया. कासगंज की घटना को सांप्रदायिक रंग दे कर वोट बैंक की राजनीति करने से पूरे समाज को नुकसान हो रहा है. देश प्रेम के प्रदर्शन में जोरजबरदस्ती का कोई स्थान नहीं होना चाहिए. तिरंगा यात्रा के दौरान कार्यकर्ताओं का रंगढंग मुसलिम मोहल्ले के लोगों को रास नहीं आया. छोटी सी यह घटना दंगे में बदल कर ‘कासगंज का कलंक’ बन गई.

कासगंज में मारे गए चंदन गुप्ता के मातापिता और बहन दुखी हैं. मां संगीता गुप्ता को यकीन ही नहीं होता कि चंदन नहीं रहा. बहन वंदना ने पिता से साफ कह दिया है कि अगर वह सरकारी सहायता के 25 लाख रुपए लेंगे तो वह आत्महत्या कर लेगी.

चंदन की तरह तमाम युवक धार्मिक प्रचार में झोंक दिए जाते हैं, जो धर्म के नाम पर दोनों समुदायों की तरफ से जीनेमरने को तैयार रहते हैं. ऐसे युवकों को समझना चाहिए कि धर्म की घुट्टी अफीम के नशे से कम नहीं होती. चंदन गुप्ता के परिवार के साथ दिखी संवेदनाएं धीरेधीरे खत्म हो गईं, जिस के बाद साल दर साल पूरा परिवार केवल चंदन की याद में अंदर ही अंदर सुलगता रहेगा.

चंदन गुप्ता की मौत पर रोटियां सेंकने वाले तो बहुत थे, पर असल में मदद करने वाले नहीं दिखे. घटना के 10 दिन के अंदर ही चंदन के घर जाने वाले लोगों की संख्या कम होने लगी थी. जो नेता सहानुभूति के लिए उस के दरवाजे पर हर सूरत में आने को तैयार थे, अब उन की बात तक सुनने को तैयार नहीं हैं.

चंदन की मां अपनी बेटी के साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने गईं. मुख्यमंत्री के साथ उन दोनों की मीटिंग हुई तो चंदन की मां और बहन ने दो मांगें रखीं. एक उन के परिवार की सुरक्षा, दूसरे चंदन को शहीद का दर्जा दिया जाना. मुख्यमंत्री ने सुरक्षा का वादा तो किया पर शहीद का दर्जा देने के सवाल पर कुछ नहीं क हा. इसे ले कर चंदन की मां और बहन दुखी हैं.

SOCIETY

चंदन की मां और बहन का मानना है कि चंदन ने अपनी किसी लड़ाई में जान नहीं दी है. उस ने राष्ट्र और तिरंगे के सम्मान में जान दी है. मरते समय भी उस ने तिरंगे को अपने बदन से लपेट रखा था. ऐसे में सरकार को उसे शहीद का दर्जा दे देना चाहिए. लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से इस बात का कोई भरोसा नहीं दिया गया.

कासगंज की आग भले ही बुझ गई हो, पर एक मां के दिल में दर्द की आग जिंदगी भर धधकती रहेगी. उस के मन में जीवन भर चंदन की याद बनी रहेगी.

वह सोचती है कि कासगंज की आग की ही तरह नफरत की आग बुझ जाए तो किसी मां की कोख सूनी नहीं होगी, किसी के घर का चिराग नहीं बुझेगा.

विभा ने खुद ही चुनी कांटों भरी राह

सीतापुर और लखीमपुरी खीरी की सीमा पर बहने वाली शारदा नहर पर बने रिक्शा पुल के नीचे एक लावारिस काला बैग पड़ा था. चूंकि नहर में पानी ज्यादा नहीं था, इसलिए वह जगह सूखी थी. यह क्षेत्र सीतापुर जनपद के हरगांव थाना क्षेत्र में आता है.

14 जनवरी की सुबह 7 बजे कबीरपुर गांव के बच्चों ने वहां बैग पड़ा देखा तो उत्सुकतावश खोल कर देखा. उस के अंदर एक बच्ची की लाश थी. यह देख बच्चे घबरा गए और गांव जा कर लोगों को बताया. गांव के लोग तुरंत वहां पहुंच गए.

लाश देख कर गांव वालों के साथ पहुंचे कबीरपुर गांव के चौकीदार ने इस मामले की सूचना हरगांव थाने को दे दी. हरगांव थाने के थानाप्रभारी अश्विनी कुमार पांडेय ने एक दिन  पहले ही थाने का चार्ज संभाला था. उन्होंने सोचा भी नहीं था कि आते ही उन का वास्ता किसी बड़ी घटना से पड़ जाएगा. सूचना मिलते ही वह सबइंसपेक्टर राजकिशोर यादव और पुलिस टीम के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गए.

घटनास्थल पर पहुंच कर अश्विनी कुमार ने लाश का निरीक्षण किया. मृतक बच्ची की उम्र करीब 10-11 साल रही होगी. उस की लाश काले बैग के अंदर एक टाट के बोरे में लिपटी हुई थी. बैग में 2 ईंटों के साथ नमक भी पड़ा हुआ था. मृतका के मुंह पर 2 इंच चौड़ा टेप चिपका था. गले पर कसे जाने के निशान मौजूद थे.

लाश का निरीक्षण करने के बाद पुलिस ने अनुमान लगाया कि किसी चीज से बच्ची का गला घोंटने के बाद लाश को किसी वाहन से यहां ला कर डाला गया होगा. नमक इसलिए डाला गया ताकि लाश जल्दी गल जाए. जबकि ईंटें डालने का सबब यह रहा होगा कि लाश पानी की सतह पर ऊपर न आ पाए. अनुमान था कि हत्यारों ने लाश रात में फेंकी होगी. जल्दबाजी या कोहरे के कारण वे यह नहीं देख सके होंगे कि जिस जगह पर लाश फेंक रहे हैं, वहां पानी नहीं है.

इसी बीच पुलिस को रिक्शा पुल से 3 किलोमीटर दूर शारदा नहर पर बने उमरिया पुल के पास एक और बच्ची की लाश मिलने की सूचना मिली. इस पर थानाप्रभारी अश्विनी कुमार ने 2 सिपाहियों को घटनास्थल पर छोड़ा और बाकी सिपाहियों के साथ उमरिया पुल के पास पहुंच गए. वहां उन्हें टाट के एक बोरे में लिपटी हुई एक बच्ची की लाश मिली.

society

मृतका की उम्र करीब 8 साल रही होगी. उस के पूरे चेहरे पर टेप लगा हुआ था और गले पर भी गहरे निशान थे. उन्होंने दोनों लाशों की शिनाख्त करानी चाही, लेकिन लाशों की शिनाख्त नहीं हो सकी. इस पर पुलिस ने दोनों लाशों के फोटो करवा लिए और लाशों को सीलमुहर करवा कर पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया.

थाने लौट कर उन्होंने एसआई राजकिशोर यादव की लिखित तहरीर पर अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धाराओं 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.

देर रात 3 डाक्टरों के पैनल ने दोनों लाशों का पोस्टमार्टम किया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि दोनों बच्चियों की हत्या प्लास्टिक की किसी पतली रस्सी या तार से गला घोंट कर की गई थी. साथ ही पहले मिली बच्ची के साथ रेप किए जाने की भी पुष्टि हुई. डाक्टरों ने विस्तृत जांच के लिए स्लाइड तैयार कर के रख ली थी.

बेटियों के साथ मां विभा भी लापता, आखिर क्या था रहस्य?

कुछ लोगों ने लाश व घटनास्थल के वीडियो बना कर वाट्सऐप पर डाल दिए थे, जिन के वायरल होते देर नहीं लगी. वीडियो देख कर सीतापुर के आलमनगर, गदियाना मोहल्ले के कुछ लोग शहर कोतवाली पहुंचे और कोतवाली का कार्यभार देख रहे एसएसआई अनिल तिवारी को बताया कि दोनों लाशें आलमनगर, गदियाना मोहल्ले में रह रही विभा पांडेय की बेटियों काव्या और कामना (परिवर्तित नाम) की हैं.

12 जनवरी की रात से विभा और उस की दोनों बेटियां घर से लापता थीं. विभा का भी पता नहीं चल रहा था. एसएसआई तिवारी ने इस संबंध में हरगांव थानाप्रभारी अश्विनी कुमार को अवगत कराया. इस के बाद इस बारे में उच्चाधिकारियों को सूचना दे दी गई.

कुछ ही देर में डौग स्क्वायड के साथ पुलिस टीम विभा के घर पहुंच गई. एसपी आनंद कुलकर्णी और एएसपी मधुबन सिंह ने वहां पहुंच कर घर का निरीक्षण किया. विभा का भाई नवीन, जोकि तरीनपुर मोहल्ले में रहता था, से भी पूछताछ की गई. उस ने बताया कि वह पहले इसी मकान के दूसरे हिस्से में रहता था. लेकिन बहन विभा से विवाद होने के बाद काफी समय से वह तरीनपुर में किराए के मकान में रह रहा था.

नवीन ने यह भी बताया कि विभा का पति प्रवीन पांडेय विभा को 4 साल पहले छोड़ कर चला गया था. तब से वह एक बार भी विभा या बच्चों को देखने नहीं आया. विभा के साथ अधिकतर उस का करीबी दोस्त नवीन उर्फ विमल गुप्ता रहता था. विमल का खुद का घर आवास विकास कालोनी में है, लेकिन वह अधिकांश समय विभा के साथ ही गुजारता था. इसी मकान में विभा ब्यूटीपार्लर चलाती थी और विमल ने सीसीटीवी कैमरे लगाने की दुकान खोल रखी थी.

विमल से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि 12 जनवरी की शाम को विभा उस के साथ कुछ सामान खरीदने बाजार गई थी. शाम 7 बजे तक वह उस के साथ रही. उस के बाद वह औटो से घर चली गई तो वह अपने घर लौट आया. बाद में उस ने विभा को फोन मिलाया तो उस का फोन बंद मिला.

लेकिन सवाल यह उठता था कि जब 2 दिन से मांबेटियां घर से लापता थीं तो उन के करीबियों व घर वालों ने पुलिस को इस की सूचना क्यों नहीं दी? घर वालों से भी ज्यादा विभा का करीबी विमल था. उसे विभा और बच्चियों की चिंता क्यों नहीं हुई.

उस ने विभा को तलाशने या थाने में सूचना देने की जहमत भी नहीं उठाई थी. पुलिस के शक के दायरे में आने वाला सब से पहला शख्स विमल ही था. इस के अलावा पुलिस ने विभा के कुछ और करीबियों को भी पूछताछ के लिए हिरासत में लिया.

खुले मिजाज की विभा पति से अलग रह कर स्वतंत्र जिंदगी जीती थी

पुलिस को यह भी पता चला कि विभा खुले मिजाज की युवती थी, वह किसी से भी बात करने या मिलनेजुलने में गुरेज नहीं करती थी. उस के पास कई ऐसे लोग आते थे, जो उस की छवि को दागदार बनाते थे. लेकिन विभा को इस सब की कोई चिंता नहीं थी.

विभा के करीबियों में सलीम नाम का एक व्यक्ति भी शामिल था. पुलिस ने उस से भी पूछताछ की. सभी से पूछताछ के बाद पुलिस ने एक बार फिर से विमल को निशाने पर लिया. इस पूछताछ के दौरान विमल कुछ ऐसा बोल गया, जिस ने उसे संदिग्ध बनाने में और इजाफा किया.

उस ने जो कहा वह विभा की हत्या से संबंधित था. इस के बाद पुलिस ने सख्ती दिखाई तो उस ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. उस ने विभा की भी हत्या कर देने की बात बताई. इस तिहरे हत्याकांड को अंजाम देने में उस का साथ उस के 5 दोस्तों ने दिया था. जबकि एक अन्य व्यक्ति ने लाशों को ठिकाने लगाने में मदद की थी.

society

अन्य हत्याभियुक्तों में दिलीप शर्मा निवासी भवनापुर थाना कोतवाली शहर, राहुल निवासी आनंद नगर थाना कोतवाली शहर, मुकेश निवासी रमपुरा थाना कोतवाली शहर, जुबेर निवासी महमूदपुर थाना खैराबाद, पंकज निवासी गणेशपुर थाना खैराबाद शामिल थे. लाशों को ठिकाने लगाने के लिए जाइलो कार का इस्तेमाल किया गया था. उस कार का मालिक राजेश लोध निवासी ग्राम नानकारी थाना खैराबाद था.

विमल को पूछताछ के बाद गिरफ्तार कर लिया गया. दिलीप शर्मा और जुबेर को 16 जनवरी को गिरफ्तार किया गया. इस के बाद 17 जनवरी को विमल की निशानदेही पर विभा की लाश सीतापुर के थाना कोतवाली शहर के अंतर्गत आने वाले खुजरिया गांव के पास सरायन नदी से बरामद कर ली गई. लाश का पोस्टमार्टम कराया गया तो पता चला कि उस की मौत भी गला घोंटने से हुई थी. उस के साथ रेप किए जाने की पुष्टि नहीं हुई, लेकिन आशंका के चलते विस्तृत जांच हेतु स्लाइड बना कर रख ली गई थी.

18 जनवरी को पुलिस द्वारा शेष अभियुक्तों राहुल, मुकेश, पंकज और राजेश को भी गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस की पूछताछ के बाद जो कहानी निकल कर सामने आई, वह कुछ इस तरह थी—

खुल गया मांबेटियों की हत्या का राज

सीतापुर के थाना कोतवाली शहर के अंतर्गत आने वाले आलमनगर, गदियाना मोहल्ले में अशोक कुमार गोयल अपनी पत्नी अनीता, बेटे नवीन और 2 बेटियों विभा और रजनी के साथ रहते थे. अशोक प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करते थे.

उन के बेटे नवीन का विवाह हो चुका था. नवीन लाइटिंग का काम करता था. विभा ने इंटरमीडिएट तक शिक्षा प्राप्त की, उस के बाद उस का मन पढ़ाई में नहीं लगा. विभा काफी खूबसूरत और खुले विचारों की युवती थी. वह किसी को भी बहुत जल्दी अपना दोस्त बना लेती थी. लेकिन उस दोस्ती को वह अपने मतलब के लिए इस्तेमाल करने से भी पीछे नहीं रहती थी.

खूबसूरत युवती की दोस्ती हर कोई पाने की चाहत रखता है. विभा इसी चाहत का फायदा उठाती थी. मोहल्ले के कई लड़के उस के आगेपीछे घूमते थे. मांबाप व भाई उसे रोकतेटोकते भी थे, लेकिन उस पर इस का कोई असर नहीं होता था.

एक दिन वह भी आया जब मोहल्ले में रहने वाले प्रवीण पांडेय से उस की आंखें लड़ गईं. प्रवीण पेशे से ड्राइवर था. दोनों का प्यार इस तरह परवान चढ़ा कि दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया. इस की भनक उन्होंने अपने घर वालों तक को नहीं लगने दी. विवाह कर के विभा प्रवीण के साथ रहने लगी.

कालांतर में विभा ने 2 बेटियों काव्या और कामना को जन्म दिया. फिलहाल काव्या 10 साल की थी और कामना 8 साल की. काव्या कक्षा 4 में और कामना कक्षा 2 में पढ़ रही थीं.

विवाह और 2 बेटियों के जन्म के बाद भी विभा के स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया था. वह पहले की तरह अपने दोस्तों से मिलतीजुलती, हंसतीबोलती थी. विभा की यह हरकत प्रवीण को बहुत नागवार गुजरती थी. इसी को ले कर दोनों में लगभग हर रोज झगड़ा होता था. धीरेधीरे बात इतनी बढ़ गई कि 5 साल पहले प्रवीण उसे हमेशा के लिए छोड़ कर चला गया. जाने के बाद उस ने कभी भी विभा और अपनी बेटियों का हाल जानने की कोशिश नहीं की.

पति के छोड़ देने के बाद विभा अपने मायके वाले मकान में आ कर रहने लगी. मकान के एक हिस्से में वह अपनी बेटियों के साथ रहती थी, जबकि दूसरे हिस्से में उस का भाई नवीन मातापिता के साथ रहता था.

विभा ने खोला ब्यूटीपार्लर

घर चलाने के लिए विभा ने अपने घर में ब्यूटीपार्लर खोल लिया और अपना काम करने लगी. यहीं काम करने के दौरान उस की मुलाकात विमल उर्फ नवीन गुप्ता से हुई, जो आवास विकास कालोनी में रहता था. वह सीसीटीवी कैमरे लगाने का काम करता था. विमल के पिता विजय कुमार गुप्ता भारतीय खाद्य निगम में नौकरी करते थे. विमल का एक भाई था कमल, वह एफसीआई के पास चाय की कैंटीन चलाता था.

विमल से मुलाकात के बाद तो विभा की लौटरी ही लग गई. विमल उस पर खूब पैसे खर्च करने लगा. इस की वजह यह थी कि वह विभा को पहली ही नजर में दिल दे बैठा था. वह विभा की हर जरूरत का खयाल रखता था. दूसरी ओर विभा की जान अपनी बेटियों में बसती थी. वह घर से किसी काम के लिए निकलती थी तो जल्दी से जल्दी काम निपटा कर अपनी बेटियों के पास लौट आती थी.

वह कभी भी उन्हें ज्यादा देर तक अकेला नहीं छोड़ती थी. बेटियों की खुशी के लिए वह कुछ भी कर सकती थी. बेटियों की खुशी के लिए ही उस ने विमल का हाथ थामा था. विभा जानती थी कि विमल उस से क्या चाहता है. उस ने विमल की जरूरत को पूरा किया तो विमल उस की जरूरत पूरी करने लगा.

विभा इसे सिर्फ ‘गिव ऐंड टेक’ का मामला समझ कर चल रही थी लेकिन विमल कुछ और ही सोच रहा था. वह विभा और उस की दोनों बेटियों की जिम्मेदारियां इसलिए उठा रहा था ताकि विभा से शादी कर के अपना परिवार बसा सके.

विमल ने विभा से बात करने के बाद उस के मकान में ही अपनी दुकान खोल ली. दोनों ने एकदूसरे के काम में हिस्सेदारी भी कर ली. हालांकि विमल जो भी कमाता था, वह सब विभा और उस की बेटियों पर ही खर्च कर देता था.

society

विभा के चाहने वालों की कमी नहीं थी. दिन भर कोई न कोई उस के घर आता रहता था. विभा भी उन से ऐसे बात करती थी कि कोई भी शरीफ इंसान उसे गलत समझ सकता था. मोहल्ले के लोग भी तरहतरह की बातें करते थे. विभा के भाई व मांबाप को यह सब बहुत बुरा लगता था.

इसी बात को ले कर विभा और उस के भाई नवीन में विवाद होता रहता था. एक दिन ऐसा भी आया, जब नवीन मांबाप के साथ घर छोड़ कर चला गया. वह तरीनपुर मोहल्ले में किराए का मकान ले कर रहने लगा. उस ने फिर कभी उस मोहल्ले में झांकने तक की जहमत नहीं उठाई.

विभा से सलीम की नजदीकियां पसंद नहीं थीं विमल को 

विभा की नजदीकियां सलीम नाम के युवक से भी थी. विमल को विभा और सलीम का मिलना नागवार गुजरता था. उस ने विभा को कई बार समझाया, लेकिन वह अपनी मनमानी करती थी. अपने अलावा वह अपनी बेटियों के अलावा किसी की परवाह नहीं करती थी. उस ने अपने पति, मांबाप अथवा  भाई की नहीं सुनी तो विमल क्या चीज था. वह तो सिर्फ उस की जरूरतों को पूरा करने का एक जरिया मात्र था. सलीम की पत्नी को सलीम और विभा के संबंधों की भनक लगी तो वह भी पति को छोड़ कर चली गई.

विमल ने विभा पर पानी की तरह पैसा बहाया था. यहां तक कि उस की बड़ी बेटी काव्या के दिमागी बुखार से पीडि़त होने पर उस ने उस के इलाज पर हैसियत से ज्यादा पैसा खर्च किया था. इस के बाद भी विभा किसी और के साथ नजदीकियां बढ़ा रही थी. उस ने विभा से शादी की बात की तो उस ने शादी करने से साफ इनकार कर दिया. इस पर विमल का माथा ठनक गया. वह अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहा था. आखिर उस ने विभा को सबक सिखाने की ठान ली.

उस ने सोच लिया कि विभा उस की नहीं हुई तो वह उसे किसी और की भी नहीं होने देगा. विभा की हरकतें उस के दिमाग में कौंधती रहती थीं. वह विभा की हत्या को कैसे अंजाम दे, यह सोच कर उस ने कई हौलीवुड फिल्में और टीवी पर क्राइम बेस्ड सीरियल देखे. उन्हीं सब के आधार पर उस ने सोचविचार कर विभा की बरबादी की पूरी योजना तैयार की. उसे इस काम के लिए दोस्तों की मदद की जरूरत थी. उन्हें इस सब के लिए कैसे राजी करना है, यह भी उस ने सोच लिया था.

उस ने अपने शहर के ही भवनापुर में रहने वाले अपने दोस्त दिलीप शर्मा से बात की. दिलीप अपने घर में ही मोबाइल शौप चलाता था. इस से पहले वह फार्मासिस्ट का काम कर चुका था. दिलीप का भी विभा के साथ पैसों के लेनदेन का कोई विवाद था. विमल के कहने पर वह उस का साथ देने को तैयार हो गया. इस के बाद विमल ने उसे पूरी योजना बता दी.

फिर उस ने अपने दूसरे दोस्तों राहुल, मुकेश, जुबेर और पंकज से अलगअलग बात कर के उन्हें भी अपनी योजना में शामिल कर लिया. इस के लिए उस ने हर दोस्त को 10 हजार रुपए देने की बात कही थी. कुछ दोस्ती के नाते और कुछ 10 हजार रुपए के लालच में वे लोग उस का साथ देने को तैयार हो गए.

सारे दोस्तों को तैयार कर के उस ने सब के साथ बैठ कर इस योजना पर काम किया. इस बैठक में यह बात भी उठी कि विभा की हत्या के बाद उस की बेटियां उन के लिए खतरा बन सकती हैं, जबकि वे लोग कोई भी खतरा नहीं उठाना चाहते थे. इसलिए विभा के साथ उस की बेटियों की हत्या करने की बात भी तय हो गई. दिलीप ने अस्पताल के कुछ पुराने परिचितों के जरिए 2 इंच चौड़े टेप का इंतजाम कर लिया.

ऐसे दिया गया तिहरे हत्याकांड को अंजाम

12 जनवरी की शाम 7 बजे दुकान का कुछ सामान खरीदने के बहाने विमल विभा को बाइक से दिलीप की दुकान पर ले गया. वहां विमल के सभी दोस्त मौजूद थे. उन्होंने विभा को दबोच लिया और उस के मुंह को टेप से बंद कर दिया, जिस से वह चिल्ला न सके. फिर उन लोगों ने कंप्यूटर के केबल से विभा का गला घोंट कर उस की हत्या कर दी.

इस के बाद विमल फिर विभा के घर गया और उस की दोनों बेटियों को अपने साथ ले आया. उन दोनों को दबोच कर उन के मुंह पर भी टेप लगा दिया गया. इस के बाद विभा की तरह ही उस की बेटियों काव्या और कामना की भी कंप्यूटर केबल से गला घोंट कर हत्या कर दी गई. विमल के दोस्त मुकेश ने मासूम काव्या के शव के साथ संबंध बनाए.

society

सुबह होने पर विमल और दिलीप ने आधेआधे पैसे मिलाए और बाजार जा कर एक बैग, 3 टाट के बोरे, रस्सी और नमक खरीद कर ले आए. आगे की योजना यह थी कि तीनों लाशों को जमीन में दफना दिया जाए. इस के लिए पंकज के खैराबाद थाना क्षेत्र के गांव गणेशपुर स्थित खेत को चुना गया. आननफानन में गड्ढा खोदने के लिए जेसीबी भी तय कर ली गई. इस के बाद खेत में खुदाई का काम चालू कर दिया गया. यह देख कर पंकज के घर वालों और गांव वालों ने पूछताछ की तो पंकज ने बताया कि खाद बनाने के लिए गड्ढा खुदवा रहा है.

लोगों द्वारा की गई इस पूछताछ के बाद पंकज की हिम्मत जवाब दे गई. उस ने अपने खेत में लाशों को दफनाने से साफ इनकार कर दिया. घटना का पहला दिन इसी सब में गुजर गया. तीनों लाशें दिलीप की दुकान में पड़ी रहीं. पंकज के विरोध के बाद विमल और उस के अन्य दोस्तों को अपना प्लान बदलने को मजबूर होना पड़ा.

इसी बीच विमल को याद आया कि उस के साथी राहुल की रिश्तेदारी में जाइलो कार है, जिस का इस्तेमाल किया जा सकता है. जाइलो कार सीतापुर के खैराबाद थाना क्षेत्र के नानकारी गांव निवासी राजेश की थी. चूंकि वह राहुल का रिश्तेदार था, इसलिए वह इस काम के लिए तैयार हो गया. उस ने 10 हजार रुपए के एवज में यह काम अपने हाथ में ले लिया.

कार में डाल कर तीनों लाशें लगाईं ठिकाने

योजना बदलने के बाद विभा और कामना की लाश को टाट के बोरे में लपेटा गया. साथ ही काव्या की लाश को बोरे में लपेट कर बैग में रखा गया. तीनों लाशों के साथ नमक और 2-2 ईंटें भी रख दी गईं. इस तैयारी के बाद तीनों लाशों को कार में लाद दिया गया. रात में कोहरा अधिक था, जिस की वजह से उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई.

सभी कार में बैठ कर थाना कोतवाली शहर के अंतर्गत आने वाले खजुरिया गांव के पास सरायन नदी पर पहुंचे. विभा की लाश नदी में डाल दी गई. इस के बाद ये लोग बारीबारी से शारदा नहर के रिक्शा पुल और उमरिया पुल पर पहुंचे और काव्या और कामना की लाश को नहर में डाल दिया.

लेकिन यहां कोहरा उन के लिए विलेन बन गया. कोहरे के कारण ये लोग ठीक से नहीं देख सके. नहर में ज्यादा पानी नहीं था, वह सूखी थी. नहर में पानी होता तो लाश पानी में डूब जातीं, लेकिन सूखी होने के कारण ऐसा न हो सका. अपने काम को अंजाम देने के बाद सब दोस्त अपनेअपने घर लौट आए.

लेकिन अगले दिन 14 जनवरी की सुबह काव्या व विभा की लाशें मिलते ही उन की उल्टी गिनती शुरू हो गई. आखिर जल्द ही वे सभी पुलिस की गिरफ्त में आ गए.

राजेश की जाइलो कार यूपी53ए एल2905 भी उस के घर के बाहर से बरामद हो गई. हत्या में इस्तेमाल कंप्यूटर केबल भी पुलिस ने बरामद कर लिया. थानाप्रभारी अश्विनी कुमार ने मुकदमे में भादंवि की धाराएं 147, 376 व 34 और बढ़ा दीं.

सातों अभियुक्तों का मैडिकल कराने के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश किया, जहां से सब को न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक सभी अभियुक्त जेल में थे.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

रोडसाइड टैटूइंग के साइडइ फैक्ट्स

इंडियन एसोसिएशन औफ लिवर द्वारा किए गए शोध के मुताबिक देश में हैपेटाइटिस का औसत प्रसार 4.7 प्रतिशत है. दुनियाभर में हैपेटाइटिस से 40 करोड़ लोग प्रभावित होते हैं जो एचआईवी रोगियों के मुकाबले दसगुना अधिक हैं.

आज के युवा हैल्थ से ज्यादा स्टाइल को तवज्जुह देते हैं. कभी अपनी प्रेमिका के नाम को तो कभी अपने फेवरेट कैरेक्टर को अपनी बौडी पर टैटू के जरिए दर्ज करने के चक्कर में वे इस के साइडइफैक्ट्स तक भूल जाते हैं. एक हद तक ऐक्सपरिमैंट करने या नई चीजों को तलाशने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन टैटू एक ऐसी जोखिमभरी प्रक्रिया है जो आप के स्वास्थ्य को सीधे खतरे में डालती है. आजकल हर मौल, शौपिंग कौंप्लैक्स या स्ट्रीट मार्केट में टैटू पार्लर्स खुल गए हैं जो आप की पसंद का टैटू बनाने के लिए अच्छीखासी फीस तो लेते हैं, लेकिन युवाओं को यह कोई नहीं बताता कि इन पार्लर्स में कितने लोग सुरक्षित तरीके से इंकिंग करते हैं. कई बार इन की लापरवाही किसी की जान भी ले सकती है.

हैपेटाइटिस का खतरा

स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि बिना सावधानी के टैटू बनवाने से हैपेटाइटिस हो सकता है. हैपेटाइटिस लिवर की सूजन यानी इनफ्लेमेशन है. यह विभिन्न किस्मों में होती है. हैपेटाइटिस बी और सी दुनियाभर में बढ़ते संक्रमण और मौत के प्रमुख कारण हैं. अनस्टाइल सुइयों या फिर एक ही सुई के इस्तेमाल से यह वायरस, आप के भीतर प्रवेश कर सकता है. हैपेटाइटिस बी बहुत शक्तिशाली है और एचआईवी की तुलना में 0.3 एमएल रक्त की जरूरत के मुकाबले 0.03 मिलीलिटर रक्त ही वायरस फैलाने के लिए पर्याप्त है.

इसी तरह रोडसाइड खुले सैलून में भी लापरवाही बरती जाती है जो स्वास्थ्य पर भारी पड़ती है. एक ही शेविंग ब्लेड के इस्तेमाल से वायरस संचरण यानी ट्रांसमिशन हो सकता है. खास कर जब संक्रमित व्यक्ति को कोई कट लग जाए और घाव खुला हो. इस्तेमाल किए गए ब्लेड से संक्रमित रक्त का संपर्क होता है जिस से यह किसी दूसरे में फैल सकता है. हैपेटाइटिस बी और सी स्थायी लिवर क्षति के कारण घातक हैं क्योंकि यह लिवर कैंसर की बढ़ती आशंका का कारण होता है. यह न सिर्फ आप को बल्कि आप की संतान को खतरे में डालता है. यह रोग वंशानुगत भी होता है. लोगों को ब्रिमिंग लक्षणों के बारे में बहुत सावधान रहना चाहिए, क्योंकि हैपेटाइटिस बी और सी का पता लगाना मुश्किल होता है. उन पर किसी का ध्यान नहीं जाता है या जब तक आप अस्पताल में ग्लूकोज चढ़वाने नहीं जाते तब तक इस के बारे में पता नहीं लग पाता है.

ब्यूटी सैलून और टैटूइंग दे सकते हैं हैपेटाइटिस

हैपेटाइटिस बी और सी वायरस के कारण होते हैं. इन से हैपेटाइटिस, सिरोसिस और लिवर कैंसर भी हो सकता है. हैपेटाइटिस बी और सी में संक्रमण, दूषित खून से फैलता है. आमतौर पर सैक्सुअल इंटरकोर्स, ड्रग्स की लत वाले किसी व्यक्ति में इस्तेमाल की गई सूई से और उच्च वायरल से पीडि़त मांओं से उन के नवजात बच्चे में यह संक्रमण फैल सकता है. लंबे समय से नाई की दुकानों को भारत में संक्रमण का स्रोत माना जाता है, जहां कई ग्राहकों के लिए एक ही रेजर ब्लेड का इस्तेमाल करना आम बात है. यदि उस दूषित रेजर से किसी को एक छोटी सी खरोंच भी लग जाए तो वायरस फैल सकता है.

हाल के वर्षों में हेयर और ब्यूटी सैलून कुकुरमुत्तों की तरह फैले हैं, ये भी हैपेटाइटिस बी या सी फैलाते हैं. चूंकि हैपेटाइटिस बी वायरस हैपेटाइटिस सी वायरस या एचआईवी से अधिक संक्रामक है, इसलिए हैपेटाइटिस बी के संचरण की अधिक आशंका रहती है.

क्या कहते हैं मैडिकल जर्नल

आजकल युवाओं में मैनीक्योर, पेडीक्योर और हेयरकट्स के अलावा कईर् तरह के ब्यूटी ट्रीटमैंट लेने का चलन है. इस के लिए वे कहीं भी, किसी भी पार्लर में जाने से परहेज नहीं करते. नतीजतन, उन के साथ कई तरह की लापरवाही बरती जाती है. यह हाल न सिर्फ भारत का बल्कि पूरी दुनिया का है. वाशिंगटन में अमेरिकन कालेज औफ गैस्ट्रोऐंट्रोलौजी के जर्नल के मुताबिक, मैनीक्योर, पेडीक्योर और हेयरकट्स के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले कुछ सामान्य उपकरणों के माध्यम से हैपेटाइटिस फैलने का एक संभावित जोखिम होता है. नेल फाइल्स, नेल ब्रश, फिंगर बाउल्स, फुट बेसिन, रेजर, क्लिपर्स और कैंची इन सब के बीच महत्त्वपूर्ण है. यदि इन्हें ठीक से साफ या औटोक्लेव्ड नहीं किया जाता है तो हैपेटाइटिस बी और सी के संचरण होने का संभावित खतरा रहता है. इस तरह के ट्रांसमिशन के सटीक जोखिम के बारे में अभी तक बेहतर तरीके से स्टडी नहीं हुई है विशेष रूप से भारत में जहां ऐसे सैलून के लिए नियम पश्चिमी दुनिया के मुकाबले बहुत कम हैं.

टैटू बनवाने से पहले

हैपेटाइटिस बी और सी दोनों को टैटू द्वारा प्रेषित किया जा सकता है. यदि किसी को हैपेटाइटिस बी के खिलाफ टीका लगाया जाता है तो संक्रमण होने का जोखिम काफी कम हो जाता है. हैपेटाइटिस सी के लिए कोई टीका नहीं है लेकिन दोनों को काफी हद तक रोका जा सकता है. टैटू की प्रक्रिया स्याही की छोटी बूंदों के इंजैक्शन के दोहराइए जाने से होती है. इस में सूई को कईर् बार चुभोया जाता है. यदि आप कोई पार्लर चुनते हैं जो उचित संक्रमण नियंत्रण प्रक्रियाओं का पालन नहीं करता है तो यह इस तरह के संक्रमण होने की आशंका को बढ़ाएगा. ऐसे टैटू पार्लर का उपयोग करें जिन के पास उचित परमिट हैं और निवारण जहां सभी संक्रमण का पालन किया जाता है. ऐसे पार्लर का उपयोग करें जो सूइयों, स्याही कप का सही तरीके से इस्तेमाल करता हो. सुनिश्चित करें कि टैटू बनाने वाले व्यक्ति ने अच्छी क्वालिटी के दस्ताने पहने हों. यदि वहां स्वच्छता नहीं है तो टैटू पार्लर को तुरंत छोड़ दें.

क्या कहते हैं टैटू आर्टिस्ट

सीनियर टैटू आर्टिस्ट चार्ली भी इस बात को मानते हैं कि देश में करीब 50 प्रतिशत टैटू पार्लर्स असुरक्षित तरीके से टैटू बनाने का काम कर रहे हैं. उन के मुताबिक, अगर आप टैटू आर्टिस्ट हैं तो आप को युवाओं की स्किन और हैल्थ से समझौता नहीं करना चाहिए. जिस जगह पर भी टैटू पार्लर हैं, वह जगह अच्छे तरीके से साफ होनी ही चाहिए लेकिन शरीर के जिस हिस्से में टैटू बनाना है उसे साफ रखना सब से जरूरी काम है.

युवा जब भी टैटू पार्लर जाएं तो आंख बंद कर टैटू आर्टिस्ट की बातों में आने के बजाय खुद देखें कि वहां टैटू बनाने में इस्तेमाल होने वाली स्पैशल नीडल का प्रयोग हो और मशीन भी स्तरीय हो. नीडल की सील खुली न हो और उसे रखने की जगह भी प्रौपरली सैनिटाइज हो वरना कईर् जगहों पर खास कर मेलों और स्ट्रीट मार्केट में जुगाड़ मशीनों का इस्तेमाल कर युवाओं की स्किन से खिलवाड़ किया जाता है. हैंडग्लव्स भी यूज ऐंड थ्रो यानी लोकल क्वालिटी के बजाय अच्छी वाले हों, इस का भी ध्यान रखें.

चार्ली बताते हैं कि टैटू में इस्तेमाल होने वाली इंक भी प्रौपर वेजीटेबल पिगमैंट वाली हो, न कि लोकल फैब्रिक या कैमल इंक वरना स्किन एलर्जी और इन्फैक्शन होने का खतरा रहता है. जिस तरह हम डाक्टर के पास जाने से पहले उस की डिगरी और काबिलीयत के बारे में जान व समझ लेते हैं.

वैसे टैटू पार्लर और आर्टिस्ट का रजिस्ट्रेशन, सर्टिफिकेट और उस का पिछला रिकौर्ड आदि देख कर ही जाएं. डाक्टर को 100-200 रुपए देते समय हम इतनी सावधानी दिखाते हैं तो फिर टैटू में तो हजारों खर्च होते हैं. आखिर में चार्ली कहते हैं कि टैटू, पियर्सिंग एक कला है और इस से समझौता नहीं होना चाहिए.

मुख्य स्रोत और उन की रोकथाम

शराब के ज्यादा सेवन से अल्कोहौलिक हैपेटाइटिस हो सकता है. कुछ दवाएं भी हैपेटाइटिस का कारण बन सकती हैं. इन में सब से आम आंट ट्यूबरकुलर दवाओं का उपयोग है. पूरक और वैकल्पिक दवाइयां (सीएएम) हमारे देश में हैपेटाइटिस का एक अन्य कारण है. वायरस के कारण हैपेटाइटिस ई शामिल हैं. हैपेटाइटिस ए और ई के वायरस दूषित पानी में पैदा होते हैं.

हैपेटाइटिस ए और ई के विपरीत, हैपेटाइटिस बी, सी और डी को फैलाने वाला वायरस दूषित रक्त द्वारा संक्रमित होता है. इसलिए किसी व्यक्ति को असुरक्षित संभोग से और इंजैक्शन में इस्तेमाल असुरक्षित सूइयों से संक्रमण हो सकता है.

गर्भवती मां से नवजात शिशु को भी यह संक्रमण हो सकता है. इस में सी के मुकाबले हैपेटाइटिस बी होने की अधिक आशंका रहती है.

इस से पहले ब्लड ट्रांसफ्यूजन के कारण भी हैपेटाइटिस बी और सी के वायरस फैलते थे, लेकिन अब ब्लडबैंक हैपेटाइटिस बी और सी के लिए रक्तदाता की जांच करते हैं, ऐसे ट्रांसमिशन असामान्य हैं. ट्रांसमिशन के अन्य तरीकों में ब्यूटी सैलून, नाई की दुकान, टैटूइंग, हैमोडायलिसिस आदि शामिल हैं.

कुल मिला कर स्टाइल और टशन अपनी जगह है, टैटू बनवाना है तो जल्दबाजी न दिखाएं. उपरोक्त सावधानियों और निर्देशों का पालन जरूर करें वरना आप की एक छोटी सी लापरवाही जिंदगी भर का रोग दे सकती है.

(यह लेख डा. वी के मिश्रा, गैस्ट्रोएंट्रोलौजिस्ट, द गैस्ट्रोलिवर अस्पताल, कानपुर, टैटू आर्टिस्ट चार्ली और ब्यूटी ऐक्सपर्ट्स से बातचीत पर आधारित है.)

नोबेल की दौड़ में हम पीछे क्यों

राइनर वाइस, बैरी बैरिश और किप थोर्ने को इस साल का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया है. गुरुत्त्वीय तरंगों की खोज करने वाले वैज्ञानिकों को इस साल भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला है. वैज्ञानिक अमेरिका के हैं. इस बार भौतिकी का नोबेल पुरस्कार 3 लोगों को संयुक्त रूप से दिया गया है. पुरस्कार की आधी रकम जरमनी में पैदा हुए वाइस को मिलेगी जबकि आधी रकम थोर्ने और बैरिश में बांटी जाएगी. राइनर वाइस मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट औफ टैक्नोलौजी से जुड़े हैं जबकि बैरी बैरिश और किप थोर्ने कैलिफोर्निया इंस्टिट्यूट औफ टैक्नोलौजी से जुड़े हैं. सितंबर में गुरुत्वीय तरंगों की खोज में इन तीनों वैज्ञानिकों की अहम भूमिका थी. कई महीनों बाद जब इस खोज का ऐलान किया गया था तब न सिर्फ भौतिक विज्ञानियों में बल्कि आम लोगों में भी सनसनी फैल गई थी. इन तीनों अमेरिकी वैज्ञानिकों ने गुरुत्वीय तरंगों के अस्तित्व का पता लगाया और अल्बर्ट आइंस्टाइन के सदियों पुराने सिद्धांत को सच साबित किया.

गुरुत्वीय तरंगों की जिस खोज के लिए 3 अमेरिकी वैज्ञानिकों को फिजिक्स के नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया है, उस खोज में भारतीय वैज्ञानिकों का भी बड़ा हाथ है. कुल 37 भारतीय वैज्ञानिकों ने गुरुत्वीय तरंगों की खोज का पेपर तैयार करने में अपना योगदान दिया है. हम आज भी नोबेल पुरस्कार पाने में बहुत पीछे हैं, चाहे वह विज्ञान का क्षेत्र हो या साहित्य का. लगभग सवा अरब आबादी और करीब 800 भाषाओं वाले देश के खाते में अब तक साहित्य का सिर्फ एक ही नोबेल पुरस्कार मिला है, सौ साल से भी ज्यादा समय बीत गया जब भारत को साहित्य का पहला और इकलौता नोबेल पुरस्कार मिला था. तब से रवींद्रनाथ टैगोर साहित्य के क्षेत्र में भारत के अकेले नोबेल विजेता हैं.

साहित्य के क्षेत्र में भारत में नोबेल पुरस्कार के सूखे की क्या वजह है. क्या भारत में ऐसा कुछ नहीं लिखा जा रहा है जो दुनिया को अपनी तरफ खींच पाए या फिर भारत में जो लिखा जा रहा है वह दुनिया तक नहीं पहुंच रहा है? क्या कारण है कि भारत में इतने साहित्य लिखे जाने के बावजूद किसी को नोबेल पुरस्कार नहीं मिल पाता.

कुछ रोचक तथ्य

नोबेल फाउंडेशन द्वारा स्वीडन के वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल की याद में वर्ष 1901 में शुरू किया गया यह शांति, साहित्य, भौतिकी, रसायन, चिकित्सा विज्ञान और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में विश्व का सर्वोच्च पुरस्कार है. इस पुरस्कार के रूप में प्रशस्तिपत्र के साथ 14 लाख डौलर की राशि प्रदान की जाती है. अल्फ्रेड नोबेल ने कुल 355 आविष्कार किए जिन में 1867 में किया गया डायनामाइट का आविष्कार भी था. नोबेल को डायनामाइट तथा इस तरह के विज्ञान के अनेक आविष्कारों की विध्वंसक शक्ति की बखूबी समझ थी. साथ ही, विकास के लिए निरंतर नए अनुसंधान की जरूरत का भी उन्हें भरपूर एहसास था.

दिसंबर 1896 में मृत्यु से पहले8 अपनी विपुल संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा उन्होंने एक ट्रस्ट के लिए सुरक्षित रख दिया. उन की इच्छा थी कि इस पैसे के ब्याज से हर साल उन लोगों को सम्मानित किया जाए जिन का काम मानव जाति के लिए सब से कल्याणकारी पाया जाए. स्वीडिश बैंक में जमा इसी राशि के ब्याज से नोबेल फाउंडेशन द्वारा हर वर्ष शांति, साहित्य, भौतिकी, रसायन, चिकित्सा विज्ञान और अर्थशास्त्र में सर्वोत्कृष्ट योगदान के लिए यह पुरस्कार दिया जाता है. नोबेल फाउंडेशन की स्थापना 29 जून, 1900 को हुई तथा 1901 से नोबेल पुस्कार दिया जाने लगा. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार की शुरुआत 1968 से की गई. पहला नोबेल शांति पुरस्कार 1901 में रेड क्रौस के संस्थापक ज्यां हैरी दुनांत और फ्रैंच पीस सोसाइटी के संस्थापक अध्यक्ष फ्रेडरिक पैसी को संयुक्तरूप से दिया गया.

अल्फ्रेड नोबेल की मौत के बाद जब उन का वसीयतनामा खोला गया तो उन के परिवार वाले दंग रह गए. उन्हें उम्मीद नहीं थी कि नोबेल अपनी सारी संपत्ति इन पुरस्कारों के नाम कर जाएंगे. 5 वर्षों तक उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया. लेकिन 1901 में नोबेल पुरस्कार की शुरुआत की गई. पिछले 112 सालों में नोबेल पुरस्कारों की दुनिया में बहुत कुछ हो गया है. यह पुरस्कार केवल जीवित लोगों को ही दिया जा सकता है.

मरणोपरांत पुरस्कार

3 व्यक्ति ऐसे हैं जिन्हें मरणोपरांत पुरस्कार दिया गया. सब से पहले 1931 में एरिक एक्सल कार्लफेल्ट को साहित्य के लिए और फिर 30 वर्षों बाद 1961 में डाग हामरशोल्ड को शांति पुरस्कार दिया गया. इन दोनों की ही मौत नामांकन और पुरस्कार दिए जाने के बीच हुई. मगर 1974 से नियम बदल कर ऐसा होने की संभावना भी मिटा दी गई. 2011 में कनाडा के राल्फ स्टाइनमन को चिकित्सा के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. लेकिन जब उन का नाम चुना गया उस वक्त नोबेल कमेटी को इस बात का अंदाजा नहीं था कि स्टाइनमन की 3 दिन पहले ही मौत हो चुकी है. इस मामले को नोबेल कमेटी ने अपवाद करार दिया.

1948 में महात्मा गांधी का नाम भी नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुना जाना था, लेकिन नामांकन से 2 दिन पहले ही उन की हत्या कर दी गई. उस समय भी कमेटी ने मरणोपरांत पर चर्चा तो की, लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं. कमेटी ने कई बार इस पर खेद भी जताया. महात्मा गांधी को आज तक नोबेल पुरस्कार नहीं मिला. उन्हें यह पुरस्कार न दिया जाना नोबेल पुरस्कारों के इतिहास की सब से बड़ी भूल है. हालांकि महात्मा गांधी 5 बार इस पुरस्कार के लिए नामित किए जा चुके हैं.

17 वर्ष की उम्र में नोबेल

2014 में नोबेल पाने वाली मलाला यूसुफजई इस पुरस्कार की अब तक की सब से युवा विजेता हैं. नोबेल पुरस्कार विजेताओं को चुनने वाली कमेटी इस बात का विशेष ध्यान रखती है कि नोबेल पुरस्कार योग्य काम करने वाले व्यक्ति की उम्र जितनी कम हो उतना अधिक अच्छा होता है. साल 2014 में पाकिस्तान की मलाल यूसुफजई को जब नोबेल पुरस्कार मिला तब उन की उम्र महज 17 साल थी. कैमिस्ट्री में नोबेल पुरस्कार मिलने वाले लोगों की औसत उम्र 58 साल है. जहां अर्थशास्त्र और साहित्य में नोबेल पुरस्कार मिलने वाले लोगों की उम्र क्रमश: 67 और 65 साल है वहीं भौतिकी और शांति में नोबेल पुरस्कार मिलने वाले लोगों की औसत उम्र 56 साल और 61 साल की है. गौरतलब है कि सिर्फ शांति के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वालों की औसत उम्र में गिरावट के अलावा बाकी सभी पुरस्कार वालों की औसत उम्र में वृद्धि देखने को मिली है.

2 बार नोबेल पाने वाले इसी तरह 4 ऐसे लोग भी हैं जिन्हें 2 बार नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है. अमेरिका के जौन बारडेन को 2 बार भौतिकी के लिए पुरस्कार मिला. पहली बार 1956 में ट्रांजिस्टर के आविष्कार के लिए और दूसरी बार 1972 में सुपरकंडक्टिविटी थ्योरी के लिए. कैमिस्ट्री में 2 बार पुरस्कार मिला ब्रिटेन के फ्रेडेरिक सैंगर को. पहली बार 1958 में इंसुलिन की संरचना को समझने के लिए और दूसरी बार 1980 में.

एक शख्स ऐसे भी हैं जिन्हें 2 अलगअलग क्षेत्रों में पुरस्कार दिया गया है. अमेरिका के लाइनस पौलिंग को 1954 में कैमिस्ट्री के लिए और फिर 1962 में शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उन्होंने परमाणु बम के परीक्षण के खिलाफ आवाज उठाई थी.

दौड़ में महिलाएं पीछे

नोबेल पुरस्कार के क्षेत्र में महिलाएं अभी भी बहुत पीछे हैं. मैरी क्यूरी एकमात्र महिला हैं जिन्हें 2 बार नोबेल पुरस्कार मिला, 1903 में रेडियोऐक्टिविटी समझने के लिए फिजिक्स में और 1911 में पोलोनियम और रेडियम की खोज करने के लिए कैमिस्ट्री में. 2012 तक कुल 44 महिलाओं को ही नोबेल पुरस्कार दिया गया है. इन में से 16 विज्ञान के क्षेत्र में हैं, भौतिकी में 2, रसायन शास्त्र में 4 और चिकित्सा में 10. साल 1901 में शुरू हुए नोबेल पुरस्कारों में अभी तक सिर्फ 48 महिलाओं को ही नोबेल पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है.

नोबेल पुरस्कार लेने से इनकार

कुछ ऐसे भी लोग थे जिन्होंने नोबेल पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया था. 1964 में फ्रांस की ज्यां पौल सार्त्र ने पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया था. उन का कहना था, ‘‘एक लेखक को खुद को संस्थान नहीं बनने देना चाहिए.’’ इस के बाद 1973 में विएतनाम के ले डुक थो ने देश के राजनीतिक हालात के चलते पुरस्कार लेने से मना कर दिया था. इस के अलावा हिटलर के शासन के दौरान वैज्ञानिकों को नोबेल पुरस्कार स्वीकारने की अनुमति नहीं थी. 1038 में रिचर्ड कून, 1939 में अडोल्फ बूटेनांट और गेरहार्ड डोमाक को नामांकित किया गया था. दूसरे विश्व युद्ध के समाप्त होने के बाद ही उन्हें पुरस्कार दिया जा सका, हालांकि पुरस्कार की राशि उन्हें नहीं दी गई.

ज्यादा पुरस्कार किसे

सब से अधिक नोबेल पुरस्कार अमेरिकी लोगों को मिले हैं. भौतिकी में अमेरिका के कुल 222 लोगों को नोबेल पुरस्कार मिल चुके हैं जोकि 47 प्रतिशत के आसपास है. मैडिसिन में कुल 219 अमेरिकी लोगों को नोबेल पुरस्कार मिले हैं जो कुल 51 प्रतिशत है. कैमिस्ट्री में 194 अमेरिकी लोगों को नोबेल मिल चुके हैं जो कुल 41 प्रतिशत के आसपास है. साहित्य में अब तक कुल 111 अमेरिकी लोगों को नोबेल पुरस्कार मिले हैं जो 6 प्रतिशत के आसपास है. इसी तरह शांति और अर्थशास्त्र में क्रमश: 102 और 83 अमेरिकी हस्तियों को नोबेल पुरस्कार मिले हैं.

अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर जरमनी है. इस के बाद ब्रिटेन और फ्रांस का नंबर आता है. इसे संयोग ही कहेंगे कि पुरस्कार लेने वाले अधिकतर लोगों का जन्मदिन 21 मई और 28 फरवरी को होता है. इसलिए ऐसा माना जाता है कि इस दिन विद्वान जन्म लेते हैं. नोबेल पुरस्कारों का चयन करने वाली स्वीडिश कमेटी के अनुसार, किसी भी क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार किसी भी स्थिति में 3 से अधिक लोगों को नहीं दिया जा सकता.

साहित्य की खुशबू

भारत में साहित्यिक भाषा बोलने वालों की तादाद 55 करोड़ से ज्यादा है. 10 सब से ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में उडि़या 10वें नंबर पर आती है जिसे 3 करोड़ से ज्यादा लोग बोलते हैं. यह भाषायी विविधता सांस्कृतिक विविधता की कोख से जन्मी है. इस लिहाज से देखें तो साहित्य सृजन के लिए भारत में बहुत अच्छा माहौल है. लेकिन नए साहित्य की खुशबू दुनिया तक नहीं पहुंच रही है. दुनिया का सवाल तो बाद में आता है, पहले यह सोचने की जरूरत है कि भारत के एक कोने में रहने वाले लोग दूसरे कोने में रचे जा रहे साहित्य को कितना जानते हैं या उस में कितनी दिलचस्पी लेते हैं? एक भाषा के लोगों तक दूसरी भाषा के साहित्य को पहुंचाने के लिए अनुवाद ही अकेली कड़ी है. इसी के सहारे दुनिया तक भी पहुंच सकते हैं. फिलहाल भारत में यह कड़ी उतनी मजबूत नहीं दिखती, जितनी होनी चाहिए. रवींद्रनाथ टैगोर की जिस कृति ‘गीतांजलि’ ने उन्हें नोबेल दिलाया, वह भी दुनिया तक अनुवाद के जरिए ही पहुंची थी.

भारत में न कहानियों की कमी है और न ही कहने वालों की. सवाल यह है कि भारत के लोग खुद अपने साहित्य और उसे दुनिया तक पहुंचाने को ले कर कितना गंभीर हैं. यहां जरूरत भारत के साहित्य को इस तरह पेश करने की है कि भाषा और संस्कृति के बंधनों से परे दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाला शख्स उन्हें महसूस कर सके. अगर साहित्य समाज का आईना है तो भारत में बहुतकुछ ऐसा है जो दुनिया को अपनी तरफ खींचने की ताकत रखता है. लेकिन खींचने वाली इस डोर को और मजबूत करना होगा.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें