डिजिटल वर्ल्ड में सभी नंगे

फेसबुक,व्हाट्सऐप के बिना जिंदगी भी, क्या जिंदगी होगी. इन 2 ऐप्स ने युवाओं की जिंदगी बदल डाली है. अब दोस्तों के साथ गपें कौफीहाउसों में कम, डिजिटली ज्यादा होती हैं और होंठों की जगह कीबोर्डों पर उंगलियां ऐसे थिरकती हैं मानोे भरतनाट्यम कर रही हों. लेकिन फेसबुक और व्हाट्सऐप पर कुछ भी सीक्रेट नहीं, यह पक्का हो गया है. टैक्स्ट लिखा या पोस्ट किया हुआ चुन सकते हैं. फेसबुक, व्हाट्सऐप आदि चलाने वाली कंपनियां आप को, आप की पसंद को, आप के आर्थिक स्तर को, आप की छुट्टियों को बेच सकती हैं ताकि जानकारी के आधार पर आप की मार्केटिंग की जा सके.

‘आई एम औफ टु शिमला’ टाइप करते ही आप को शिमला के होटलों के विज्ञापन दिखने लग जाएं, तो कोई बड़ी बात नहीं. गूगल में शिमला होटल सर्च करते ही आप पर होटलों की बमवर्षा होने लगती है और आप की स्क्रीन ऐसे विज्ञापनों से भरने लगती है. जो युक्ति ऐप है, उस में तो पूरी स्क्रीन थोड़ी देर बाद ही इन विज्ञापनों से भर सकती है.

विज्ञापन तो बात दूसरी, आप के पास अब पार्टी, धर्म, विचारक विशेष के विज्ञापन भी आ सकते हैं. आप को दूसरे धर्म के खिलाफ उकसाने वाले मैसेज अनजान सोर्सों से मिल सकते हैं. आप को उकसाने की कोशिश की जा सकती है. आप की जाति, आप का धर्म, आप का देश खतरे में है, ऐसा कहकह कर आप को भ्रमित किया जा सकता है. अगर तर्क और सत्य कहने वालों को पैसा न मिल रहा हो तो वे कैसे महंगा डाटा खरीद कर आप को बहकाई जा रही सामग्री परोसते. इन में आप को एकतरफा जानकारी मिलेगी.

अमेरिका में हाउस औफ रिप्रजैंटेटिव और सीनेट की संयुक्त जांच कमेटी के सामने फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग ने बहुत ही गलतियां मानीं पर हर बात पर उन की डिफैंस भी थी कि हर यूजर को महीन शब्दों में हर बात बता दी जाती है. वे बारबार कहते रहे कि लोग अपनी प्राइवेसी को प्रोटैक्ट कर सकते हैं पर सांसदों ने यह नहीं पूछा कि कंपनी प्रोटैक्शन की दीवार भेद सकती है या नहीं? अगर दीवार बनाई ही जुकरबर्ग ने है तो क्या उसे नहीं मालूम कि प्राइवेसी चूज करने के बावजूद आप के मैसेज हरेक शातिर के लिए खुले हैं. हैकर वे सब तकनीक जानते हैं जो फेसबुक के निर्माता बनाते हैं.

डिजिटल वर्ल्ड में कुछ भी छिपा नहीं है. अपनी प्रेमिका के साथ बिना कपड़ों के मोबाइल से शूट की गई फिल्म की रिकौर्डिंग सैकड़ों को उपलब्ध है, चाहे आप ने किसी को भेजा न हो. ‘मुक्ता, आई लव यू’ का संदेश मुक्ता तक पहुंचने से पहले सैकड़ों को पता चल जाएगा और यह भी कि  उस समय आप कहां बैठे हैं, कौन से मोबाइल से मैसेज कर रहे हैं.

भारत सरकार यों ही आधार से मोबाइल को लिंक नहीं करा रही. वह आप को, हरेक नागरिक को ब्लैकमेल करने का हथियार ढूंढ़ रही है. जब सौफ्टवेयर तैयार होने लगेंगे तो सरकारों को कैंब्रिज एनालिटिका की जरूरत भी नहीं होगी. वे स्वदेशी हैकरों के जरिए हर नागरिक का कच्चा चिट्ठा रखेंगी, फेसबुक, ट्विटर या व्हाट्सऐप ही नहीं, ‘मेक माय ट्रिप’, ‘बुक माय शो’, ‘अमेजन’, ‘फ्लिपकार्ट’ सब आप के बारे में जानकारी जमा कर रहे हैं. आप आज की दुनिया में नंगे हैं. कपड़े, बस वर्चुअल हैं. आप का महत्त्व सिर्फ कुछ डिजिट्स का है. आप सरकार के मोहरे हैं और वही रहें. बिग ब्रदर आप को देख रहा है, यह न भूलें. आम आदमियों का व्यवहार धर्मसम्मत ही हो, यह अधर्मी तकनीक के सहारे तय किया जाएगा.

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लालू-मुलायम के बेटे बाप से बढ़ के

उत्तर प्रदेश के उपचुनाव में भाजपा की किरकिरी कर देने वाले अखिलेश यादव ने एक तरफ साबित किया है कि पिताजी आउटडेटेड हो गए थे, वे चापलूसों से छुटकारा पाने में खुद को असमर्थ पा रहे थे. दूसरी ओर यही बात बिहार की अररिया सीट से साबित की तेजस्वी यादव ने कि जेल में अपनी वृद्धावस्था काट रहे पिता लालू यादव की बादशाहत संभालने के लिए वे पूरी तरह फिट हैं. उत्तर प्रदेश में बूआभतीजे की जोड़ी ने भगवा रथ थामा तो बिहार में भतीजे ने चाचा नीतीश के कान कुतर डाले.

मुलायम और लालू इस बात पर गर्व भी कर सकते हैं कि बेटे नालायक नहीं निकले और भाजपा के पौराणिक मानस पुत्रों से बेहतर हैं जिन्होंने पूर्वजों को अज्ञातवास काटने के लिए ढकेल दिया था. पांडवों की याद कर लें कि युद्ध जीतने के बाद उन्हें कहांकहां भटकना पड़ा.

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तो इस दिन शुरू होगी ‘मेंटल है क्या’ की शूटिंग

बौलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत अपने अभिनय के बल पर बौलीवुड की सबसे सफल अभिनेत्रियों में अपना  नाम दर्ज करा चुकी हैं. वह फिल्म के लिए सबसे ज्यादा फीस लेने वाली अभिनेत्रियों में भी शामिल हैं. वह अपने बेबाक बयानों और कौन्ट्रोवर्सीज के चलते आए दिन चर्चा में रहती हैं. मौलूम हो कि ‘मणिकर्णिका- द क्वीन औफ झांसी’ के बाद अब वह राजकुमार राव के साथ ‘मेंटल है क्या’ में नजर आएंगी, जिसकी शूटिंग जल्द ही शुरू होने वाली है.

बता दें ‘मेंटल है क्या’ के जरिए एक बार फिर से राजकुमार राव और कंगना रनौत की जोड़ी बड़े पर साथ में देखने को मिलेगी. गौरतलब है कि  इससे पहले फिल्म ‘क्वीन’ में यह जोड़ी साथ नजर आ चुकी है. ‘मेंटल है क्या’ फिल्म की शूटिंग 13 मई से शुरू होगी. जिसकी जानकारी फिल्म की निर्माता एकता कपूर ने दी है. एकता कपूर ने बताया, ‘फिल्म को लेकर हम काफी उत्साहित हैं. यह फिल्म न ही कोई हास्यप्रद और न ही थ्रिलर फिल्म है. इसीलिए हम इसकी शैली तलाश रहे हैं. हमने इसके लिए फिल्म का पोस्टर भी जारी किया है.

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बता दे कि कंगना की फिल्म ‘मणिकर्णिका- द क्वीन औफ झांसी’ की शूटिंग लगभग खत्म ही हो चुकी है. फिल्म में सोनू सूद भी एक मुख्य भूमिका में होंगे. मणिकर्णिका की कहानी ‘विजेंद्र प्रसाद’ द्वारा लिखी गई है और इसका निर्देशन साउथ के डायरेक्टर कृष ने किया है.

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बदहाल अस्पतालों की बलि चढ़ती बेहाल जननी

साल 2016 में राजस्थान में उदयपुर के महाराणा भूपाल के सरकारी अस्पताल में पेट से हुई एक बीमार औरत 12 घंटे तक वार्ड की खींचतान में फंसी रही. डाक्टरों की लापरवाही की वजह से समय पर इलाज नहीं हो पाने के चलते आखिरकार उस ने दम तोड़ दिया. जानकारी के मुताबिक, उदयपुर के कोटडा इलाके के पिलका गांव की 35 साला मोहिनी गरासिया 8-9 महीने के पेट से थी. पेट में दर्द उठने पर उसे गांव के ही सामुदायिक अस्पताल में दिखाया गया, जहां इलाज नहीं होने पर जांच के बाद उसे उदयपुर के सब से बड़े सरकारी अस्पताल के जनाना वार्ड में भरती कराया गया. लेकिन डाक्टरों ने मामूली बुखार बताते हुए उसे मामूली बीमारी वाले वार्ड में रैफर कर दिया. मामूली बीमारी वाले वार्ड के डाक्टरों ने भी उस का इलाज किए बिना ही डिलीवरी का केस बताते हुए वापस जनाना वार्ड में भेज दिया, लेकिन वहां भी मामूली जांच के बाद उसे फिर से जनरल वार्ड में भेज दिया गया.

बारबार इधर से उधर वार्ड के चक्कर लगाने के दौरान मोहिनी की तबीयत ज्यादा खराब हो गई और उस ने वार्ड के बीच बरामदे में ही दम तोड़ दिया. बाद में जब पूरे मामल की जांच की गई, तो मोहिनी के मरने की वजह उस के पेट में पल रहे बच्चे की 12 घंटे पहले हुई मौत से उस के भी बदन में जहर फैलने को बताया गया. बूंदी जिले की नैनवां तहसील के गांव हीरापुरा की रहने वाली मंजू के साथ जो हुआ, उस तरह का दर्द हर दिन राजस्थान के गंवई इलाकों की सैकड़ों औरतों को झेलना पड़ता है. दरअसल, हर राज्य सरकार ने गंवई और कसबाई इलाकों के सरकारी अस्पतालों में जरूरतमंद पेट से हुई औरतों को खून चढ़ाने के लिए ब्लड स्टोरेज यूनिट तो बना दी है और बदोबस्त दुरुस्त रखने के लिए आपरेशन थिएटर भी बना दिए हैं, लेकिन इन को सही तरह से चलाने के मामले में सेहत महकमा फेल नजर आ रहा है.

कुछ चुनिंदा जगहों को छोड़ कर तमाम अस्पतालों की ब्लड स्टोरेज यूनिटें बंद पड़ी हैं, लाखों रुपए के औजार व सामान धूल खा रहे हैं. इन सब खामियों के चलते गंवई इलाके की पेट से हुई औरतों की जान पर आफत बनी हुई है. कुछ महीने पहले हीरापुरा गांव की मंजू को बच्चा जनने की हालत में नैनवां के सरकारी अस्पताल में भरती कराया गया था. बदन में खून की कमी के चलते डाक्टरों ने मंजू का आपरेशन करने से पहले 3 यूनिट खून की जरूरत बताई. डाक्टरों ने मंजू के परिवार वालों से खून का बंदोबस्त करने के लिए आधा घंटे का समय दिया. उन्होंने जब अस्पताल में बनी ब्लड स्टोरेज यूनिट से ही खून देने की मांग डाक्टरों से की, तो डाक्टरों ने ब्लड यूनिट के खराब होने की बात बताई.

ऐसे हालात में शहर का अस्पताल दूर होने के चलते खून का बंदोबस्त वक्त पर नहीं हो पाया. इस दौरान मंजू की तबीयत बिगड़ती देखी, तो डाक्टरों ने बिना खून चढ़ाए ही आननफानन उस का आपरेशन कर दिया. लेकिन इस आपरेशन के महज एक घंटे बाद ही मंजू की मौत हो गई

ऐसे होते हैं डाक्टर

तय है कि जब किसी औरत को बच्चा जनने का दर्द उठता है, तो उस के पैर सीधे अस्पताल की ओर ही उठते हैं और वहां डाक्टरों के हाथों में ही सबकुछ होता है. भारत में ज्यादातर 2 तरह के अस्पताल हैं, एक सरकारी व दूसरे गैरसरकारी. सरकारी अस्पतालों में कदम रखते ही दिल में चुभन करने वाली बातों का सामना करना होता है. जैसे ‘सीधे खड़ी रह’, ‘लाइन में लग जा’, ‘नाटक मत कर’ वगैरह.

फिर बारी आती है चैकअप की. मुंह पर कपड़ा बांधे जो औरत आती है, वह डाक्टर है भी या नहीं, यह पता करना बहुत मुश्किल होता है. वह चैकअप के दौरान जिन शब्दों का इस्तेमाल करती है, कानों में गरम सीसे की तरह पिघलते हैं और बच्चा जनने का ख्वाब खौफनाक बन जाता है. फिर नंबर आता है बच्चा जनने का. यहां भी डाक्टर अपनी ही सहूलियत का ध्यान रखते हैं. बात सिजेरियन की ही नहीं, बल्कि सामान्य डिलीवरी केस में भी कोशिश यही होती है कि बच्चा दिन में ही पैदा हो, ताकि रात को उन की नींद में कोई खलल न पड़े. वैसे, बच्चा पैदा करना एक आसान बात है. बच्चे के पैदा करने में खास रोल उस की मां का होता है. उस की अंदरूनी ताकत ही उसे बच्चा जनने को उकसाती है. डाक्टर, नर्स, दाई वगैरह का काम तो इस ताकत को बढ़ावा देना होता है.

जयपुर में एक जनाना अस्पताल की हैड विमला शर्मा की मानें, तो अगर बच्चा जनने के दौरान किसी औरत के साथ कठोर बरताव होता है, तो वह खुल कर दर्द सहन नहीं कर पाती और ज्यादातर केस इसी वजह से बिगड़ते हैं. फिर भी आम लोगों का डाक्टरों पर यकीन पूरी तरह से कायम है, लेकिन डाक्टरों के पास इतना समय नहीं होता कि वे औरत में बच्चा जनने के कुदरती दर्द का इंतजार कर सकें. वे अपनी सहूलियत के मुताबिक दर्द देने वाली दवाओं का इस्तेमाल करने की कोशिश में लग जाते हैं.

लापरवाही डाक्टरों की

लक्ष्मी एक पढ़ीलिखी औरत है. पहला बच्चा होने के समय घर वाले उसे गांव के अस्पताल ले आए. दर्द के झटके तो शुरू हो गए थे, पर पूरी तरह दर्द शुरू नहीं हुआ था. जिस यूनिट में वह भरती हुई थी, उस यूनिट की हैड को कुछ दिनों के लिए छुट्टी पर जाना था, इसलिए उसे दवाओं से दर्द उठाने के इंजैक्शन दिए गए. जो दर्द नौर्मल तरीके से उठना था, उसे जबरदस्ती तकलीफदेह बनाया गया. एक और दूसरे मामले में डाक्टर द्वारा दी गई बच्चा जनने की तारीख के बाद भी नमिता को दर्द शुरू नहीं हुआ, तो उसे दर्द देने वाली दवा का इंजैक्शन लगाया गया. इस से दर्द तो शुरू हो गया, पर यह दर्द शुरू होतेहोते रात हो गई. क्योंकि डाक्टर का अपना बच्चा छोटा था, इसलिए उस का घर पर जाना जरूरी था. नतीजतन, नमिता की ड्रिप बंद कर दी गई. मामला सिजेरियन आपरेशन तक पहुंच गया.

अगर बच्चा जनने के मामले में डाक्टर से ले कर पूरे स्टाफ तक का रवैया मरीज के प्रति सही नहीं होता है, तो डाक्टर की इतनी जरूरत क्यों? फिर एक सवाल यह भी उठता है कि क्या हमारी पुरानी व्यवस्था ही सही थी?

दिमागी तौर पर रहें तैयार

डाक्टर विमला शर्मा कहती हैं, ‘‘बच्चे को जनने वाली मां अपने मन से बच्चा जनने का डर बाहर निकाले. एक जान को अपने भीतर पालने वाली औरत में बहुत ताकत होती है. जरूरत है, तो बस उसे पहचानने की. बच्चे को नौर्मल तरीके से पैदा करने में मां को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती. बस, उसे खुद को दिमागी तौर पर तैयार करना होता है.’’

मोटरसाइकिल ने बदली गांव की दुनिया

शादी के बाद रमेश पहली बार अपनी दुलहन को फिल्म दिखाने गांव से तकरीबन 30 किलोमीटर दूर शहर ले जा रहा था. सवारी के लिए उस के पास मोटरसाइकिल थी. लोक रिवाजों के चलते घर के सामने से वह पत्नी को मोटरसाइकिल पर बैठा नहीं सकता था. पत्नी गांव से बाहर तक पैदल आई, फिर रमेश ने सड़क पर उसे मोटरसाइकिल पर बैठाया और फर्राटा भरते हुए शहर की ओर चल पड़ा. फिल्म देखने और शहर घूमने के बाद वे दोनों रात में अपने गांव वापस आ गए. केवल पत्नी को फिल्म दिखाने की ही बात नहीं है, किसी बीमार को अस्पताल ले जाना हो या घर और खेत के लिए जरूरी सामान लाना हो, तो मोटरसाइकिल सब से उपयागी सवारी हो गई है. हाल ही के कुछ सालों में मोटरसाइकिल गांव में रोजगार का आसान साधन बन कर उभरी है.

मोटरसाइकिल पर सवारी करने के साथसाथ जरूरत का सामान भी ले जाया जाता है. गांव के लोगों की ज्यादातर नातेरिश्तेदारी 50 से 60 किलोमीटर के बीच ही होती है. मोटरसाइकिल की सवारी से यह दूरी तय करना काफी आसान हो गया. शहर से 30 किलोमीटर दूर रह कर दूध की डेरी चलाने वाले नरेश यादव ने शुरुआत में मोटरसाइकिल पर दूध के डब्बे लाद कर शहर पहुंचाना शुरू किया था. वह अपनी मोटरसाइकिल पर दूध के 4 डब्बे ले कर शहर जाता था.

सब्जी का कारोबार करने वाले श्याम प्रसाद कहते हैं, ‘‘अब कम सब्जी पैदा होने पर भी मोटरसाइकिल से शहर की सब्जी मंडी में सब्जी को पहुंचाया जा सकता है. पहले इस के लिए ज्यादा सब्जी के तैयार होने का इंतजार करना पड़ता था या फिर बिचौलिए को ही बेच दिया जाता था.’’

दरअसल, हाल के कुछ सालों में गांवों को बड़े पैमाने पर सड़कों से जोड़ने का काम किया गया है. जहां पक्की सड़कें नहीं हैं, वहां भी खड़ंजा या ऐसा पक्का रास्ता जरूर बन गया है, जिस पर मोटरसाइकिल से आनाजाना आसान हो गया है. ज्यादातर गांव पक्की सड़कों से जुड़ चुके हैं.

पहले गांवों में पुराने टाइप की ज्यादा तेल की खपत वाली बुलेट, यजदी और राजदूत मोटरसाइकिलें चलती थीं, जिन को चलाना महंगा होता था, लेकिन अब 100 सीसी इंजन वाली कम पैट्रोल से चलने वाली मोटरसाइकिल आने से इन का इस्तेमाल करना किफायती होता है.

दिनोंदिन बदले दोपहिया

मोटरसाइकिल से पहले साइकिल गांव में आनेजाने का अहम साधन होती थी. पहले देश में साइकिलें बनाई नहीं जाती थीं. विदेशों से बन कर साइकिलें यहां आती थीं. साल 1944 में मुंजाल ब्रदर्स ने साइकिल के पार्ट बनाने की कंपनी खोली थी. साल 1951 में एटलस कंपनी ने भारत में साइकिलें बनानी शुरू की थीं. तब से ले कर अब तक तमाम तरह के बदलावों के बाद साइकिल मोटरसाइकिल हो गई है.

साधारण साइकिल से ले कर स्पोर्ट्स की साइकिल तक बहुत सारे प्रयोग किए गए. साल 1956 में मुंजाल ब्रदर्स से हीरो ग्रुप बनाया. साल 1975 तक हीरो कंपनी ने रोजाना 75 सौ साइकिल बनाने का रिकौर्ड बना लिया था. इस के बाद हीरो देश की सब से बड़ी साइकिल बनाने वाली कंपनी के रूप में उभरी थी.

इस समय तक देशभर में मोटरसाइकिल भी आ चुकी थी. साल 1955 में भारत सरकार ने पहली बार सेना और पुलिस के लिए ब्रिटेन से रौयल एनफील्ड मोटरसाइकिल को मंगवाया था. इन को चेन्नई में असैंबल किया जाता था. इन में बुलेट, जावा, यजदी और राजदूत प्रमुख थीं.

पुराने जमाने की ये मोटरसाइकिलें नए जमाने में नौजवानों को अपनी ओर खींच नहीं पा रही थीं. साल 1972 में लैंब्रैटा स्कूटर बाजार में आया. इस के बाद वैस्पा, बजाज सुपर और बजाज चेतक स्कूटर बाजार में आए. स्कूटरों को गांव में बाजार नहीं मिल सका.

साल 1984 में हीरो कंपनी ने जापानी होंडा कंपनी के साथ हाथ मिलाया और हीरो होंडा मोटरसाइकिल बाजार में उतारी. 100 सीसी इंजन वाली यह मोटरसाइकिलें एक लिटर पैट्रोल में 70 किलोमीटर की दूरी तय करती थी. उस समय तक भारत में चलने वाली मोटरसाइकिलें एक लिटर पैट्रोल में 35 किलोमीटर से ज्यादा नहीं जाती थीं. टीवीएस की विक्की भी इस दौर में आई, जिस को पैडल से स्टार्ट किया जाता था. इस की शुरुआती कीमत 35 सौ रुपए थी.

दमदार मोटरसाइकिल की मांग

हीरो होंडा ने मोटरसाइकिल को बहुत लोकप्रिय कर दिया. 100 सीसी की हीरो होंडा मोटरसाइकिल ज्यादा वजन उठाने में दमदार नहीं थी. इस को समझते हुए साल 1994 में हीरो होंडा ने स्प्लैंडर बनाई. इस के बाद दमदार मोटरसाइकिल को बाजार में उतारने की होड़ लग गई.

साल 2000 के बाद तो 100 सीसी पावर वाले इंजन की जगह पर 150 सीसी इंजन वाली मोटरसाइकिल को ज्यादा पसंद किया जाने लगा.

साल 2001 में बजाज पल्सर ने दमदार मोटरसाइकिल में अपना अलग बाजार बना लिया था. कुछ नौजवानों को 250 सीसी पावर वाली यमहा फेजर भी खूब पसंद की जाने लगी.

बजाज कंपनी ने 125 सीसी पावर वाली डिस्कवर को भी गांव के बाजार को ध्यान में रख कर तैयार किया. हीरो होंडा के बाद सब से कामयाब मोटरसाइकिल में डिस्कवर गिनी जाती है.

नए जमाने की मोटरसाइकिल सेल्फ स्टार्ट इंजन वाली आने लगी हैं. इस के बावजूद लोग किक स्टार्ट वाली मोटरसाइकिल को पसंद करते हैं.

वाहन बाजार पर लिखने वाले रजनीश राज कहते हैं, ‘‘पूरी दुनिया में तमाम तरह की मोटरसाइकिलों का कारोबार बढ़ रहा है. गांव के यातायात में मोटरसाइकिल तेजी से अपना दबदबा बढ़ाती जा रही है.

‘‘पिछले कुछ समय से यह भी देखा गया है कि केवल लड़के ही नहीं, लड़कियां भी मोटरसाइकिल का जम कर इस्तेमाल करने लगी हैं. स्कूटर के मुकाबले मोटरसाइकिल से सफर करना आसान होता है. थकान कम लगती है और खराब रास्तों पर भी यह स्कूटर से बेहतर चलती है.’’

जरूरत व शौक का बाजार

शौक के लिए मोटरसाइकिल रखने वाले लोग दमदार मोटरसाइकिल को पसंद करते हैं. जौन अब्राहम और दूसरे फिल्मी कलाकारों की तरह नौजवान मोटरसाइकिल का शौक रखते हैं.

लखनऊ शहर में ही बुलेट मोटरसाइकिल के 6 से ज्यादा शोरूम हैं. इस के बाद भी बुलेट खरीदने के लिए 4 से 6 महीने तक का इंतजार करना पड़ता है. रौयल एनफील्ड की एक लाख, 25 हजार से ले कर एक लाख, 75 हजार रुपए के बीच कीमत की मोटरसाइकिलें बाजार में मुहैया हैं.

दिल्ली के बाजार में स्पोर्टी और भारीभरकम मोटरसाइकिल देखने को मिलती हैं. दिल्ली के आसपास गुड़गांव, नोएडा के गांवों तक में अपने रईसी शौक के चलते लोगों ने लग्जरी मोटरसाइकिल भी खरीदी हैं.

पहाड़ों पर दमदार मोटरसाइकिल को ज्यादा पसंद किया जाता है. मोटरसाइकिल का बीमा और सर्विस दोनों ही जब से मोटरसाइकिल बेचने वाली एजेंसी से ही होने लगी है, तब से लोगों को आरटीओ दफ्तर के चक्कर नहीं लगाने पड़ते, जिस से इन की खरीदारी बढ़ी है

कारों से महंगी मोटरसाइकिलें

हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कुछ गांवों में महंगी मोटरसाइकिलें भी दिखने लगी हैं. थंडरबर्ड एलटी जैसी मोटरसाइकिल होंडा सिटी, फौक्सवैगन वैंटो, हुंडई वरना और स्कौडा रैपिड जैसी फुलसाइज सिडान कारों से महंगी है. 1699 सीसी की क्षमता वाली थंडरबर्ड 15 लाख, 75 हजार की कीमत वाली है. महंगी मोटरसाइकिल में कावासाकी, हार्ले डेविडसन और डुकाटी मौजूद हैं. अब इटली की बेनेली कंपनी ने 3 लाख से 11 लाख के बीच की कीमत वाली 5 मोटरसाइकिलों के मौडल लौंच किए हैं.

महंगी मोटरसाइकिल बनाने वाली कंपनियों की नजरें भी देश के गांवदेहात के बाजार पर हैं. जिस तरह से गांवों में फार्म हाउस कल्चर बढ़ रहा है, उस से इस तरह की महंगी मोटरसाइकिलों का चलन भी बढ़ने लगा है. महंगी कारों के बाद अब गांवों में महंगी मोटरसाइकिलें भी दिखने लगी हैं. जिन गांवों में पहले 100 सीसी इंजन वाली 35 से 40 हजार कीमत वाली मोटरसाइकिलें खरीदी जाती थीं, वहीं अब 150 से 250 सीसी इंजन वाली महंगी मोटरसाइकिलें खरीदी जाने लगी हैं.

बदलती लाइफ स्टाइल का असर

भोजपुरी फिल्मों की हीरोइन पूनम दुबे कहती हैं, ‘‘फिल्मों में भी लड़केलड़कियों को मोटरसाइकिल का इस्तेमाल करते दिखाया जाता है, जिस से नौजवानों में इस के प्रति रुझान बढ़ रहा है. अब छोटे शहरों और गांवों में भी सब से ज्यादा मोटरसाइकिलों का इस्तेमाल हो रहा है.’’

नौजवानों में बढ़ा है क्रेज

वाहन बाजार पर लिखने वाले रजनीश राज कहते हैं, ‘‘तकरीबन 70 फीसदी नौजवान मोटरसाइकिल का इस्तेमाल करते हैं. कम तेल के खपत वाली मोटरसाइकिल आने के बाद गांवों में लोगों का इस पर सवारी करना आसान हो गया. अब गांव के पास से सड़कें और हाईवे निकलने लगे हैं, जहां पर पैट्रोल की सुविधा मिलने लगी है. अब तो जगहजगह पैट्रोल पंप खुल गए हैं.’’

 

शरीरों के खेल में मासूम कार्तिक बना निशाना

परसराम महावर का परिवार हर तरह से खुशहाल था, जो भोपाल की सिंधी बाहुल्य बैरागढ़ स्थित राजेंद्र नगर के एक छोटे से मकान में रहता था. परसराम कपड़े की दुकान में काम करता था. बैरागढ़ का कपड़ा बाजार देश भर में मशहूर है, यहां देश के व्यापारी थोक और फुटकर खरीदारी करने आते हैं. परसराम सुबह 8-9 बजे दुकान पर चला जाता था और देर रात लौटना उस की दिनचर्या थी. घर में उस की 30 वर्षीय पत्नी कविता (बदला नाम) और 2 बच्चे 10 साल की कनक और 8 साल का बेटा कार्तिक था, जिसे भरत भी कहते थे.

सुबह के वक्त दोनों बच्चों को स्कूल भेज कर कविता घर के कामकाज में जुट जाती थी और दोपहर 12 बजे तक फारिग हो कर या तो पड़ोस में चली जाती थी या फिर अपने मोबाइल फोन पर गेम खेल कर वक्त गुजार लेती थी. दोपहर ढाई बजे बच्चे स्कूल से वापस आ जाते थे तो वह फिर उन के कामों में व्यस्त हो जाती थी. इस के बाद बच्चों के खेलने और ट्यूशन पढ़ने का वक्त हो जाता था.

एक लिहाज से परसराम और कविता का घर और जिंदगी दोनों खुशहाल थे, उस की पगार से घर ठीकठाक चल जाता था. शादी के 12 साल हो जाने के बाद पतिपत्नी का मकसद बच्चों को पढ़ालिखा कर कुछ बनाने भर का रह गया था. इन लोगों ने अपने बच्चों को नजदीकी क्राइस्ट स्कूल में दाखिल करा दिया था. हर मांबाप की तरह इन की इच्छा भी बच्चों को अंगरेजी स्कूल में पढ़ाने की थी, जिस वे फर्राटे से अंगरेजी बोलने लगें. कनक और कार्तिक जब स्कूल की यूनिफार्म के साथ टाई बेल्ट और जूते पहन कर जाते थे, तो परसराम के काम करने का उत्साह और बढ़ जाता था.

कपड़े की दुकान का काम कितना कठिन होता है, यह परसराम जैसे लोग ही बेहतर जानते हैं जो दिन भर ग्राहकों के सामने कपड़ों के थान और पीस खोल कर रखते हैं, फिर वापस तह बना कर उन्हें उन की जगह पर जमाते हैं. सीजन के दिनों में तो कर्मचारी कमर सीधी करने और बाथरूम जाने तक को तरस जाते हैं. सालों से कपड़े की दुकान में काम कर रहे परसराम को अपनी नौकरी से कोई शिकायत नहीं थी. रात को घर लौट कर उस की थकान बच्चों की बातों और खूबसूरत पत्नी के होंठों की मुसकराहट देख कर गायब हो जाती थी.

अच्छीभली गृहस्थी थी कविता और परसराम की

कविता कुशल गृहिणी थी, जो किफायत से खर्च कर के घर चला लेती थी. वह दूसरी औरतों की तरह फिजूलखर्ची नहीं करती थी. 12 साल के वैवाहिक जीवन में उस ने पति को किसी भी शिकायत का मौका नहीं दिया था. इस बात पर परसराम को गर्व भी होता था और पत्नी पर प्यार भी उमड़ आता था.

कुल जमा परसराम अपनी जिंदगी से खुश था, लेकिन बीती 8 जनवरी को उस की इन खुशियों को ऐसा ग्रहण लगा, जिस से शायद ही वह जिंदगी में कभी उबर पाए. उस दिन दोपहर करीब 3 बजे उस के पास कविता का फोन आया कि कनक तो आ गई है, लेकिन कार्तिक स्कूल से वापस नहीं लौटा है. फोन सुनते ही वह घबरा कर घर की तरफ भागा.

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कनक और कार्तिक दोनों एक ही औटो से स्कूल आतेजाते थे. दोनों के आनेजाने का वक्त तय था, सुबह 8 बजे जाना और दोपहर ढाई बजे लौट आना. लेकिन उस दिन कविता जब रोजाना की तरह घर के दरवाजे पर आई तो कविता ने कनक के साथ कार्तिक को नहीं देखा.

‘‘भाई कहां है?’’ पूछने पर कनक ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया कि वह तो नहीं आया. क्यों नहीं आया, इस सवाल का कनक कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाई तो कविता घबरा उठी.

इस पर उस ने औटो वाले से पूछा तो उस ने भी हैरानी से बताया कि आज तो कार्तिक स्कूल में दिखा ही नहीं और जल्दबाजी में उस ने भी ध्यान नहीं दिया.

इन जवाबों पर कविता को गुस्सा तो बहुत आया कि कार्तिक को छोड़ने की लापरवाही क्यों की, पर इस गुस्से को रोक कर उस ने पहले पति को फोन किया, फिर यह सोच कर बेचैन निगाहों से सड़क को निहारने लगी कि शायद कार्तिक आता दिख जाए.

हो न हो, वह बच्चों के साथ खेलने के कारण औटो में बैठना भूल गया हो या फिर स्कूल में ही किसी काम से रुक गया हो. कई तरह की शंकाओं, आशंकाओं से घिरी कविता परसराम के आने तक बेटे की सलामती की दुआ मांगती रही.

कोई खास वजह थी, जिस से परसराम और कविता दोनों जरूरत से ज्यादा आशंकित हो उठे थे. परसराम ने घर आतेआते फोन पर अपने भाई दिलीप को यह बात बताई तो वह भी चंद मिनटों में राजेंद्रनगर आ पहुंचा.

दोनों भाई भागेभागे क्राइस्ट मेमोरियल स्कूल पहुंचे और कार्तिक के बारे में पूछताछ की. वहां मौजूद सिक्योरिटी गार्ड और स्कूल स्टाफ ने बताया कि कार्तिक तो वक्त रहते चला गया था. इस जवाब पर परसराम का झल्लाना स्वाभाविक था, लेकिन स्कूल वालों से बहस करने के बजाय उस ने कार्तिक को ढूंढना ज्यादा बेहतर समझा और दोनों भाई उसे इधरउधर ढूंढने लगे. उन्होंने स्कूल से घर तक का रास्ता भी छाना. कई लोगों से कार्तिक के बारे में पूछताछ भी की लेकिन उस के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

एक घंटे की खोजबीन के बाद परसराम ने बैरागढ़ थाने जा कर बेटे की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवा दी, जो एक जरूरी औपचारिकता वाली बात थी. कार्तिक को जान से भी ज्यादा चाहने वाले परसराम को चैन नहीं मिल रहा था, इसलिए रिपोर्ट दर्ज करने के बाद वह फिर बेटे को तलाशने में लग गया. उस ने बैरागढ़ की कोई गली नहीं छोड़ी.

लाश बन कर मिला मासूम बेटा कार्तिक

बैरागढ़ थाने के टीआई सुधीर अरजरिया गुमशुदगी की रिपोर्ट पर कोई काररवाई कर पाते, उस के पहले ही उन के पास एक फोन आया. थाने से करीब 17 किलोमीटर दूर मुबारकपुर इलाके के टोल नाके के कर्मचारियों ने उन्हें फोन कर के बताया कि वहां संदिग्ध हालत में एक बोरी पड़ी है. बोरी के बारे में जो बताया गया था, उस से लग रहा था कि उस में किसी बच्चे की लाश है. मुबारकपुर, परवलिया थाना इलाके में आता है.

चूंकि परसराम ने कार्तिक के स्कूल से लापता होने की रिपोर्ट लिखाई थी, इसलिए पुलिस वालों को शक हुआ कि कहीं कार्तिक के साथ कोई हादसा न हो गया हो. पुलिस ने परसराम को फोन कर के तुरंत थाने बुलाया और जीप में बैठा कर मुबारकपुर की तरफ रवाना हो गए.

13 किलोमीटर का यह सफर परसराम के लिए 13 साल जैसा गुजरा. मन में आशंकाएं आजा रही थीं कि कार्तिक के साथ कहीं कोई अनहोनी न हुई हो.

मुबारकपुर पहुंच कर जब उन के सामने बोरी खोली गई तो परसराम की सांसें रुक सी गईं. बोरे में उन के मासूम बेटे कार्तिक की ही लाश थी. लाश स्कूल यूनिफार्म में ही थी और गले में आईकार्ड भी लटक रहा था. आईकार्ड में दर्ज पता देख कर ही परवलिया पुलिस ने बैरागढ़ थाने को इत्तला दी थी.

कार्तिक का कत्ल हुआ है, यह जान कर पूरे बैरागढ़ में हाहाकार मच गया. धीरेधीरे लोग बैरागढ़ थाने पहुंचने लगे. हर किसी की जुबान पर स्कूल प्रबंधन की लापरवाही की बात थी. थाने में कविता और परसराम का रोरो कर बुरा हाल था. ऐसे में उन से ज्यादा सवाल पूछा जाना मुनासिब नहीं था, लेकिन बढ़ती भीड़ और उस के गुस्से को देख कर जरूरी हो चला था कि मासूम के कत्ल की गुत्थी जल्द से जल्द सुलझे.

जब पतिपत्नी थोडे़ सामान्य हुए तो पुलिस ने उन से पूछा कि क्या उन्हें किसी पर शक है? इस पर कविता एकदम फट पड़ी और सीधे अपने पड़ोस में रहने वाले विशाल रूपानी उर्फ बिट्टू पर शक जता दिया.

कविता के बताए अनुसार, विशाल उस के दोनों बच्चों को घर पर ट्यूशन पढ़ाने के लिए आता था. धीरेधीरे कविता पर उस की नीयत खराब हो गई और वह उस के साथ गलत हरकतें करने लगा. यह बात जब परसराम को पता चली तो उस ने विशाल का घर आना बंद कर दिया. हादसे के 2 दिन पहले ही परसराम और उस का भाई दिलीप विशाल को ले कर थाने आए थे, जहां सुलह हो जाने पर मामला रफादफा हो गया था.

वजह कुछ और ही थी कार्तिक की हत्या की

पुलिस के सामने अब सारी कहानी आइने की तरह साफ थी, लेकिन हालात ऐसे नहीं थे कि कविता से विस्तार से पूछताछ की जाती. दूसरे दिन सुबह को गुस्साए लोगों ने स्कूल का घेराव किया. लेकिन भीड़ को किसी तरह समझाबुझा कर शांत कर दिया गया. पुलिस वालों ने बेहतर यही समझा कि पहले कार्तिक का अंतिम संस्कार हो जाए, उस के बाद छानबीन की जाए. एक तरह से यह साबित हो गया था कि हत्यारा विशाल ही है. पुलिस ने उसे हादसे की रात ही गिरफ्तार कर लिया था.

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इधर सुबह व्हाट्सऐप पर एक मैसेज वायरल हुआ तो हकीकत से अंजान भीड़ का गुस्सा स्कूल पर उतरने लगा. 9 जनवरी की सुबह भीड़ ने क्राइस्ट मेमोरियल स्कूल को घेर कर प्रदर्शन किया. स्कूल के सामने प्रदर्शन कर रहे लोग इस बात का जवाब चाहते थे कि कार्तिक के मामले में लापरवाही क्यों बरती गई. इसी दौरान परसराम की कहासुनी प्रिंसिपल डाक्टर मैनिज मैथ्यूज से भी हुई.

परसराम का आरोप था कि स्कूल प्रबंधन की लापरवाही के चलते ही कार्तिक का अपहरण हुआ. आरोप गलत नहीं था, लेकिन तब तक सच का कुछ हिस्सा भी वायरल होने लगा था. कार्तिक के पोस्टमार्टम और अंतिम संस्कार के बाद पुलिस ने पूरी छानबीन के बाद जो बताया वह इस लिहाज से चौंका देने वाला था कि कविता और विशाल के नाजायज संबंध थे.

दरअसल, विशाल बच्चों को पढ़ातेपढ़ाते खुद कविता से किसी और विषय की ट्यूशन लेने लगा था. यह विषय था एक नवयुवक और गृहिणी के बीच का दैहिक आकर्षण जो अकसर ऐसे हादसों की वजह बनता है.

विशाल और परसराम के परिवारों के बीच काफी घनिष्ठ संबंध थे. साल 1997 के आसपास विशाल की मां अपने पति को छोड़ कर पिता के पास आ कर रहने लगी थी. तब विशाल पेट में था. परसराम का घर पड़ोस में था और दोनों परिवारों के बीच संबंध घर जैसे थे. विशाल की मां का अपने पति से इतना गहरा विवाद था कि वह दोबारा कभी पति के पास नहीं गई. वह पिता के पास ही रही और गुजारे के लिए ट्यूशन पढ़ाने लगी थी. तब परसराम खुद एक स्कूली छात्र हुआ करता था.

गहरे और पुराने रिश्ते थे परसराम और विशाल के परिवार के

विशाल बड़ा हुआ और स्कूल होते हुए बैरागढ़ के ही साधु वासवानी कालेज में पढ़ने लगा. नौकरी के नाम पर वह बैरागढ़ के ही कृष्णा कौंप्लेक्स की एक दुकान में नौकरी करने लगा था. इधर कनक और कार्तिक को पढ़ाने के लिए परसराम ने उसे बतौर ट्यूटर रख लिया, क्योंकि एक तरह से वह घर के सदस्य जैसा था.

पहले तो परसराम के घर उस का कभीकभार ही आनाजाना होता था, लेकिन जब वह बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने आने लगा तो रोजरोज उस का सामना कविता से होने लगा. 2 बच्चों की मां बनने के बाद भी कविता का यौवन ढला नहीं था. विशाल रोजाना अपनी पड़ोसन भाभी को देखता तो उस के मन में कुछकुछ होने लगा.

यह प्यार था या शारीरिक आकर्षण, यह तय कर पाना मुश्किल है. 19 साल की उम्र आजकल के लिहाज से ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं होती. विशाल की चाहत कविता के प्रति बढ़ने लगी. जब भी वह कनक और कार्तिक को पढ़ाने के दौरान भाभी को देखता था तो उस के नाजुक अंग देख कर रोमांचित और उत्तेजित हो जाता था.

इस के पहले विशाल कभी किसी महिला के इतने नजदीक नहीं आया था, जितना पिछले कुछ दिनों के दौरान कविता के करीब आ गया था. आखिर एक दिन उस ने कविता के सामने अपना प्यार जता ही दिया. उम्मीद के मुताबिक कविता गुस्सा नहीं हुई तो नए जमाने और माहौल में बड़े हुए विशाल को समझ आ गया कि दांव खाली नहीं गया है.

कविता सब कुछ समझते हुए भी मुंहबोले देवर के साथ नाजायज संबंधों की ढलान पर फिसली तो इस की वजह एक नया अहसास था, जो उस के तन और मन दोनों को झिंझोड़ रहा था.

परसराम रोज सैकड़ों ग्राहकों को डील करता था, लिहाजा पत्नी के नए हावभाव उस से छिपे नहीं रहे. पहले तो उस ने खुद को समझाने की कोशिश की कि यह उस की गलतफहमी और फिजूल का शक है, पर कुछ था जो उस के शक को बारबार कुरेद रहा था.

विशाल कुछ और सोचता था, कविता कुछ और

इधर विशाल की हालत खस्ता थी, जिसे वाकई कविता से प्यार हो गया था. वह चाहता था कि कविता पति को छोड़ कर उस से शादी कर ले. इस बचकानी पेशकश से कविता वाकिफ हुई तो सकते में रह गई. विशाल संबंधों को इतनी गंभीरता से लेगा, इस का अंदाजा या अहसास उसे नहीं था.

उस ने अपने इस नासमझ आशिक को समझाने की कोशिश की, पर यह खुल कर नहीं कह पाई कि तुम्हारे मेरे संबंध सिर्फ मौजमस्ती के हैं. एक 2 बच्चों की मां और किसी की जिम्मेदार पत्नी सुख और संतुष्टि के लिए शारीरिक संबंध तो बना सकती है, पर उम्र में 11 साल छोटे प्रेमी से शादी नहीं कर सकती.

विशाल कविता पर पति की तरह हक जमाने लगा था. उसे दुनियादारी से ताल्लुक रखने वाली बातों से कोई मतलब नहीं था. उस ने कविता को एक तरह से चेतावनी दे दी थी कि या तो वह उस से शादी कर ले, नहीं तो ठीक नहीं होगा. जबकि कविता अपने आप को चक्रव्यूह से घिरा पा रही थी, जिस से बाहर निकलने का एकलौता रास्ता उसे अपने उस पति में दिखा, जिस के साथ वह बेवफाई कर चुकी थी.

परसराम को शक हुआ या खुद कविता ने उस से अपनी तरफ से विशाल के बारे में कुछ शिकायत की, यह तो अब राज ही रहेगा, लेकिन परसराम ने सख्ती से विशाल के अपने घर आने पर पाबंदी लगा दी. इस से विशाल तिलमिला उठा. परसराम उसे अब रिश्ते का पड़ोस वाला बड़ा भाई नहीं, बल्कि दुश्मन नजर आने लगा था.

कविता ने अपनी चाल तो चल दी, लेकिन विशाल की मजबूत गिरफ्त वह भूल नहीं पा रही थी. लिहाजा अब वह दूसरी गलती चोरीछिपे विशाल से मिलने और फोन पर लंबीलंबी बातें करने तथा उस से फिर से संबंध बनाने की कोशिश कर रही थी.

काश! कविता अपनी इच्छाओं पर अंकुश लगा लेती

एक पुरानी कहावत है कि चोरी के आम छांट कर नहीं खाए जाते, कविता की मंशा यह रहती थी कि विशाल उसे रौंदने के बाद चला जाए और विशाल था कि उस के साथ रोमांटिक बातें करता रहता था. मजबूरी में कविता को उस की रूमानी बातों की हां में हां मिलानी पड़ती थी.

इस से विशाल को लगा कि कविता उसे वाकई चाहती है, लिहाजा उस ने फिर अपनी शादी की पुरानी पेशकश दोहरा दी. दोनों कुछ तय कर पाते, इस के पहले ही परसराम ने दोनों को आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया.

6 जनवरी को भी विशाल और कविता घर के पीछे के खेत में मिल रहे थे. तभी परसराम और उस का भाई दिलीप वहां आ गए और विशाल की पिटाई कर दी. दोनों उसे थाने भी ले गए, जहां विशाल की बेइज्जती हुई.

उस वक्त कविता का रोल और बयान अहम थे, जिस ने विशाल पर परेशान करने का आरोप लगा डाला तो प्यार की परिभाषा और भाषा न समझने वाला यह नौजवान आशिक तिलमिला उठा. उसे अब समझ आया कि कविता दरअसल उसे मोहरा बनाए हुए थी. वह उस का प्रेमी नहीं, बल्कि हवस पूरी करने वाली एक मशीन भर था.

अब उसे याद आ रहा था कि जबजब भी उस ने शादी की बात कही थी, तबतब कविता पतिबच्चों और गृहस्थी की दुहाई दे कर मुकर जाती थी. लेकिन आज तो उस ने अपनी असलियत ही दिखा दी थी.

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थाने में खुद को बेइंतहा बेइज्जत महसूस कर के ही विशाल ने ठान लिया था कि कविता को सबक सिखा कर रहेगा. इधर विशाल की मां ने परसराम को सालों के पारिवारिक संबंधों का वास्ता दिया तो उस ने उस के खिलाफ रिपोर्ट नहीं लिखाई और माफ कर दिया.

पर विशाल ने कविता को माफ नहीं किया था. वह बुरी तरह खीझा हुआ था और बदले की आग में जल रहा था. 8 जनवरी को दोपहर में वह कार्तिक के स्कूल गया और उसे साथ ले आया. कार्तिक के मना करने की कोई वजह नहीं थी, क्योंकि उस मासूम को तो मालूम ही नहीं था कि क्याक्या हो चुका है.

विशाल का निशाना बना मासूम कार्तिक

कार्तिक को स्कूल से वह 200 मीटर की दूरी पर कृष्णा कौंप्लेक्स में ले आया. उस वक्त दुकान के मालिक सचिन श्रीवास्तव किसी जरूरी काम से गए हुए थे. विशाल के सिर पर इस तरह वहशीपन सवार था कि उसे बच्चे की मासूमियत पर कोई तरस नहीं आया. उस के दिलोदिमाग में तो कविता की बेवफाई और 2 दिन पहले थाने में किया गया उस का दोगलापन घूम रहे थे. इसी जुनून में उस ने अपने जूते का फीता खोला और उस से ही कार्तिक का गला घोंट दिया.

नन्ही सी जान फड़फड़ा कर शांत हो गई. अब समस्या उस की लाश को को ठिकाने लगाने की थी. सचिन के आने के पहले जरूरी था कि यह काम कर दिया जाए. लिहाजा उस ने कार्तिक की लाश को औफिस में पड़ी पार्सल की पुरानी बोरी में ठूंसा और उसे घसीटता हुआ औफिस से बाहर ले आया. लाश भरी बोरी को उस ने सामान की तरह मोटरसाइकिल पर बांधा और मुबारकपुर टोल नाके से कुछ दूर फेंक आया. यह सारा नजारा कौंप्लेक्स में लगे सीसीटीवी कैमरों में कैद हो गया था.

पकडे़ जाने के बाद विशाल ने कुछ छिपाया नहीं. जब थाने में उस का सामना कविता से हुआ तो वह बड़े खूंखार और सर्द लहजे में बोला, ‘‘तूने मुझे अपने इश्क में फंसा कर बरबाद कर दिया.’’

इस पर कविता ने कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि सिर झुकाए रोती रही. शायद अपनी हरकत और जान से प्यारे बेटे की हत्या पर, जिस की जिम्मेदार वह भी थी.

शुरुआत में गुनाह से अंजान बनते रहे विशाल ने पुलिस को यह भी बताया कि कविता कई बार उस के साथ सीहोर घूमने गई थी और कई दफा खुद फोन कर उसे प्यार करने यानी शारीरिक संबंध बनाने के लिए बुलाती थी.

विशाल अब जेल में है और उसे सख्त सजा मिलना तय है, पर जुर्म की इस वारदात में कविता की भूमिका भी अहम है. ऐसे नाजायज संबंधों पर बारीकी से सोचने की जरूरत है कि औरत को भी अभियुक्त क्यों न माना और बनाया जाए. यह ठीक है कि उस का प्रत्यक्ष संबंध अपराध से नहीं, पर कहीं न कहीं अपराधी को उकसाने की वजह तो वह थी ही.

हरियाणा का जज नियुक्ति घोटाला

पंचकूला के ऐतिहासिक नगर पिंजौर की वकील सुमन कुमारी प्रैक्टिस करने के साथसाथ जज बनने की तैयारी भी कर रही थीं. इस के लिए वह चंडीगढ़ के सेक्टर-24 स्थित ज्यूरिस्ट एकेडमी से कोचिंग ले रही

थीं. यह एकेडमी उन्होंने मई, 2017 में जौइन की थी. यहीं पर सुनीता और सुशीला नाम की युवतियां भी कोचिंग लेने आती थीं. सुशीला पंचकूला के सेक्टर-5 की रहने वाली थी, जबकि सुनीता चंडीगढ़ में ही रहती थी.

सुशीला और सुनीता पिछले कई सालों से सरकारी नौकरियों के लिए तैयारी कर रही थीं, लेकिन इन में से कोई भी नौकरी से संबंधित परीक्षा पास नहीं कर पा रही थी.

वैसे भी दोनों एवरेज स्टूडेंट की श्रेणी में आती थीं, कोचिंग सेंटर द्वारा लिए जाने वाले वीकली टेस्टों में दोनों के बहुत कम नंबर आते थे. इस के बावजूद इन का हौसला कभी पस्त नहीं हुआ था. दोनों अपने प्रयासों में निरंतर लगी हुई थीं. इन का सपना कोई बड़ी सरकारी नौकरी हासिल करना था.

रोजाना एक ही जगह आनेजाने की वजह से सुमन की इन लड़कियों से जानपहचान हो गई थी. तीनों ने अपने मोबाइल नंबर भी आपस में एक्सचेंज कर लिए थे. सुशीला वकील सुमन से ज्यादा मिक्सअप हो गई थी.

एकेडमी में कोचिंग कर रहे अन्य युवकयुवतियों की तरह ये तीनों भी अपनेअपने ढंग से तैयारी करते हुए सुनहरे भविष्य के सपने बुन रही थीं. वकील सुमन के साथ अब सुनीता और सुशीला का भी सपना जज की कुरसी पर बैठने का बन गया था.

हरियाणा की अदालतों में 109 जजों की नियुक्ति होनी थी. इस के लिए 20 मार्च, 2017 को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा विभिन्न समाचारपत्रों में एक विज्ञापन छपवाया गया, जिस के हिसाब से 16 जुलाई, 2017 को प्रारंभिक परीक्षा होनी थी. वांछित औपचारिकताएं पूरी कर के हजारों आवेदकों के साथसाथ इन तीनों युवतियों ने भी इस परीक्षा के लिए आवेदन किया.

सब के रोल नंबर समय पर आ गए, जिन के साथ परीक्षा सेंटरों की सूची भी संलग्न थी. ये सेंटर चंडीगढ़ के विभिन्न शिक्षा संस्थानों में थे.

वक्त के साथ जून का अंतिम सप्ताह आ गया. न्यायालय में जज नियुक्ति के प्रतिष्ठित एग्जाम एचसीएस (जुडिशियल) के परीक्षार्थी अपनी तैयारी में जीजान से जुटे थे. एकेडमी वाले भी इन की तैयारी करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे. कानून के विद्वान जानकारों द्वारा तैयार करवाए गए रिकौर्डेड लेक्चर तक उपलब्ध करवाए जा रहे थे.

27 जून को सुमन किसी कारण से एकेडमी नहीं आ पाई थीं. अगले रोज उन्होंने सुशीला को फोन कर के कहा, ‘‘कल के लेक्चर की रिकौर्डिंग भिजवा दे यार.’’

‘‘नो प्रौब्लम, अभी भिजवाए देती हूं.’’ सुशीला ने बेपरवाह लहजे में कहा.

इस के बाद सुमन के वाट्सऐप पर एक औडियो क्लिप आ गई. खोलने पर मालूम हुआ कि वह कोई लेक्चर न हो कर एक ऐसा वार्तालाप था, जो 2 महिलाओं के बीच हो रहा था. इन में एक आवाज सुशीला की ही लग रही थी.

सुमन को लालच में फंसाने की कोशिश की गई

इस बातचीत को सुमन ने ध्यान से सुना तो यह बात सामने आई कि कोई महिला सुशीला को जज बनने का आसान और पक्का रास्ता बता रही थी. वह महिला कह रही थी कि उस ने पक्का इंतजाम कर रखा है. डेढ़ करोड़ रुपया खर्च करने पर उस के पास संबंधित प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले ही पहुंच जाएगा. उस में दिए गए प्रश्नों की तैयारी कर के वह प्रारंभिक परीक्षा में अच्छी पोजीशन के साथ पास हो जाएगी. इस तरह वह मेन एग्जाम के लिए क्वालीफाइ कर लेगी.

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बाद में समयसमय पर उसे शेष 5 परीक्षाओं के प्रश्नपत्र भी मुहैया करवा दिए जाएंगे, जिन की तैयारी करने के बाद वह मुख्य परीक्षा में भी अच्छे मार्क्स हासिल कर लेगी. इस के बाद इंटरव्यू में कैसे भी अंक मिलें, उसे नियुक्ति पत्र देने से कोई नहीं रोक सकेगा. इस तरह महज डेढ़ करोड़ रुपए खर्च कर के वह जज का प्रतिष्ठित पद हासिल कर लेगी. इस के बाद तो ऐश ही ऐश हैं.

बातचीत में इस महिला ने यह भी कहा कि महंगी कोचिंग ले कर दिनरात मेहनत करने का कोई फायदा नहीं, जजों के सभी पद पहले ही बिके होते हैं.

मैं तो यही सब करने जा रही हूं, तुम चाहो तो किसी भी तरह पैसों का इंतजाम कर के अपनी नौकरी पक्की कर सकती हो. बाद में जिंदगी भर कमाना. समाज में जो प्रतिष्ठा बनेगी सो अलग. इतना जान लो कि मिडल क्लास से अपर क्लास में शिफ्ट होने में देर नहीं लगेगी.

यह सब सुन कर सुमन के पैरों तले की जमीन खिसक गई. अगर यह बात सच थी तो वह कभी जज नहीं बन सकती थीं. इतनी बड़ी रकम जुटा पाने की बात तो वह सपने में भी नहीं सोच सकती थीं. न तो प्रैक्टिस से उन्हें इतनी कमाई हो रही थी और न ही वह किसी अमीर घराने से संबंध रखती थीं. वह केवल अपनी कड़ी मेहनत के बूते पर जज बनने का सपना संजोए थीं.

सुमन ने इस बारे में सुशीला को फोन किया. उन की बात सुनते ही सुशीला बोली, ‘‘ओह सौरी, यह औडियो गलती से चला गया. तुम इसे अभी के अभी डिलीट कर दो. मैं भी डिलीट कर रही हूं.’’

‘‘ठीक है, कर देती हूं, लेकिन तुम मुझे लेक्चर वाली औडियो भेज दो.’’

‘‘अभी भेजती हूं, चिंता मत करो.’’ कहने के तुरंत बाद सुशीला ने पिछले दिन के लेक्चर की औडियो भेज दी.

वांछित औडियो का क्लिप तो सुमन को मिल गया लेकिन सुशीला ने गलती से भेजी गई औडियो को अपने फोन से डिलीट नहीं किया. यह औडियो उन के फोन की गैलरी में सुरक्षित थी. बाद में उन्होंने उसे कई बार सुना. जितनी बार सुना, उतनी बार वह परेशान होती रहीं. उन के भीतर यह डर गहराता जा रहा था कि ऐसे तो वह कभी जज नहीं बन पाएंगी.

2 दिन बाद सुमन की मुलाकात सुशीला से हुई तो उन्होंने उस औडियो की चर्चा छेड़ दी. इस पर सुशीला ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, ‘‘यह बात तो गलत है मैडम, जब मैं ने आप से कहा था कि गलती से चली गई औडियो को डिलीट कर दो तो आप को उसे डिलीट कर देना चाहिए था.’’

‘‘अरे नहीं नहीं,’’ बात संभालने का प्रयास करते हुए सुमन ने स्पष्टीकरण दिया, ‘‘तुम्हारे कहने के बाद मैं ने उसी समय वह औडियो डिलीट कर दी थी. लेकिन उसे डिलीट करने से पहले लेक्चर के मुगालते में मैं ने उस बातचीत को सुन ही लिया था.’’

‘‘सुन लिया तो कोई बात नहीं, लेकिन इस बारे में किसी को कुछ बताया तो नहीं न?’’

‘‘मैं ने इस बारे में किसी को कुछ नहीं बताया. लेकिन सुशीला, मैं तुम से एक बात की जानकारी चाहती हूं.’’

‘‘किस बात की?’’

‘‘यही कि क्या यह काम डेढ़ करोड़ दे कर ही हो सकता है, कुछ कम पैसे दे कर नहीं?’’

सुमन के इस सवाल का जवाब देने के बजाय सुशीला ने इधरउधर देखते हुए उल्टा उन्हीं से प्रश्न किया, ‘‘तुम इंटरेस्टेड हो क्या?’’

सुमन को अपनी मेहनत बेकार जाती लग रही थी

‘‘देखो सुशीला, सीधी सी बात है. इतनी बड़ी पोस्ट हासिल करने का सपना हजारों लोग देख रहे हैं. मैं भी उन्हीं में से एक हूं. लेकिन अगर उस औडियो में आई बातें सही हैं तो सच बता दूं कि मैं इतने पैसों का इंतजाम नहीं कर सकती. डेढ़ करोड़ रुपया बहुत होता है यार.’’

‘‘अब जब बात खुल ही गई है तो सीधेसीधे बता देती हूं कि यहां यही सब चल रहा है. फिर यह कोचिंग क्या मुफ्त में मिल रही है? मोटी फीस अदा करनी पड़ती है हर महीने. किताबों पर कितना खर्च हो रहा है. एकेडमी तक आनाजाना क्या फ्री में हो जाता है? सौ बातों की एक बात यह है कि सारी मेहनत और किया गया तमाम खर्च गड्ढे में चले जाना है.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब यही कि जज की ऊंची कुरसी पर बैठना है तो यह इनवैस्टमेंट करना ही पड़ेगा. इस के बाद जिंदगी भर इस पोस्ट से कमाना ही है, बड़ा रुतबा मिलेगा, सो अलग. इतने बड़े काम के लिए डेढ़ करोड़ रुपया भला कौन सी बड़ी रकम है.’’

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‘‘हमारे जैसे लोगों के लिए है न.’’ सुमन ने मायूस होते हुए कहा.

इस पर सुशीला चुप रह कर सोचने की मुद्रा में आ गई. कुछ देर सोचने के बाद उस ने सुमन का हाथ अपने हाथों में ले कर सधे हुए शब्दों में कहना शुरू किया, ‘‘देखो सुमन, तुम बहुत नाइस और मेहनती हो. मैं दिल से चाहती हूं कि अपने मकसद में कामयाब होते हुए जज की कुरसी तक पहुंचो. लेकिन तुम्हारी मजबूरी मुझे साफ दिख रही है. चलो, मैं कुछ करती हूं, तुम्हें रिलीफ दिलवाने के लिए.’’

इस के बाद इस बारे में दोनों के बीच होने वाली बात यहीं खत्म हो गई.

सुशीला के पति हरियाणा में सबइंसपेक्टर हैं. सुशीला पति को साथ ले कर 12 जुलाई को पिंजौर गई. मार्केट में एक जगह रुक कर उस ने सुमन को फोन कर के वहां बुलाया.

वह आ गईं तो सुशीला ने उन से सीधेसीधे कहा, ‘‘प्रश्नपत्र की कौपी सुनीता के पास है. उस ने यह कौपी डेढ़ करोड़ में खरीदी है. जो औडियो मैं ने गलती से तुम्हें भेज दिया था, उस में मेरी उसी से बात हो रही थी. सुनीता से मिल कर मैं ने तुम्हारे बारे में बात की है.’’

‘‘तो क्या कहा उस ने?’’ सुमन ने धड़कते दिल से पूछा.

‘‘देखो, मेरी बात का बुरा मत मानना, यह काम मुफ्त में तो होगा नहीं. आप 10-10 लाख कर के पैसे देती रहो. हर बार के 10 लाख पर तुम्हें प्रश्नपत्र में से 5-6 सवाल नोट करवा दिए जाएंगे. काम एकदम गारंटी वाला है, लेकिन बिना पैसों के होने वाला नहीं है. इतना जान लो कि इस तरह की सुविधा भी केवल तुम्हें दी जा रही है, वरना एकमुश्त डेढ़ करोड़ रुपया देने वालों की लाइन लगी है. पक्के तौर पर जज की पोस्ट उन्हीं लोगों से भरी जानी है.’’ सुशीला ने बताया.

‘‘ठीक है सुशीला, मैं सोचती हूं इस बारे में.’’ सुमन ने मायूस होते हुए कहा.

‘‘सोच लो, बस इस बात का ध्यान रखना कि टाइम बहुत कम है. एक बार मौका हाथ से निकल गया तो सिवाय पछताने के कुछ हासिल नहीं होगा.’’ एक तरह से चेतावनी देने के बाद सुशीला अपने पति के साथ वापस चली गई.

कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था सुमन को, पैसा उन के पास था नहीं

सुमन इस सब से काफी अपसेट सी हो गई थी. जितने जोशोखरोश से वह परीक्षा की तैयारी कर रही थी, अब उस तरह पढ़ाई कर पाना उस के लिए मुश्किल हो गया था. उस का मन यह सोचसोच कर अवसाद से भरता जा रहा था कि जब जजों की नियुक्ति पैसा दिए जाने के बाद ही होनी है तो फिर इस तरह जीतोड़ मेहनत करने का क्या फायदा. इस तरह 2 दिन का वक्त और निकल गया. 15 जुलाई को सुशीला ने सुमन को फोन कर के दोपहर 2, ढाई बजे चंडीगढ़ के सेक्टर-17 स्थित सिंधी रेस्टोरेंट पहुंचने को कहा.

निर्धारित समय पर सुमन वहां पहुंच गईं. वहां सुशीला के साथ सुनीता भी थी. इन लोगों ने रेस्टोरेंट के फर्स्ट फ्लोर पर बैठ कर बातचीत शुरू की. सुनीता ने कहा कि वह सुमन का काम डेढ़ करोड़ की बजाय केवल 1 करोड़ में कर देगी, सीधे 50 लाख का फायदा.

सुमन के लिए यह कतई संभव नहीं था. फिर भी उन्होंने जैसेतैसे 10 लाख रुपयों का इंतजाम कर के सुनीता से संपर्क किया, लेकिन उस ने एक भी प्रश्न दिखाने से मना कर दिया. सुमन ने सुशीला से मिल कर उसे बताया कि पता नहीं क्यों सुनीता उस पर शक करते हुए अजीब ढंग से बात कर रही थी.

अब टाइम नहीं बचा था. अगले रोज पेपर था. सुशीला व सुनीता के साथ सुमन ने भी परीक्षा दी.

सुमन पढ़ाई में होशियार थीं, वह पेशे से वकील भी थीं. फिर भी रिजल्ट घोषित होने पर जहां सुमन को निराशा मिली, वहीं सुशीला और सुनीता इस टफ एग्जाम को क्लीयर कर गईं. यह बात भी सामने आई कि सुनीता सामान्य वर्ग में और सुशीला रिजर्व कैटेगरी में न केवल प्रथम आई थीं, बल्कि दोनों इतने ज्यादा अंक हासिल किए थे, जिस की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी.

सुमन को इस परीक्षा के उत्तीर्ण न होने का इतना दुख नहीं था, जितना अफसोस इस बात का था कि जैसा सुशीला ने कहा था, वैसा ही हुआ था. यह एक बड़ी ज्यादती थी, जिस के बल पर जिंदगी में ऊंचा उठने के काबिल लोगों के भविष्य से सरेआम खिलवाड़ किया जा रहा था.

सुमन ने इस मुद्दे पर काफी गहराई से सोचा. उन के पास न केवल सुशीला द्वारा गलती से भेजी गई औडियो क्लिप थी, बल्कि बाद में भी उस के साथ हुई बात की कई टेलीफोनिक काल्स थीं, जो उन्होंने रेकौर्ड की थीं. आखिर उन से रहा नहीं गया और जुटाए गए सबूतों के साथ उन्होंने इस संबंध में अपनी एक याचिका पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में दायर कर दी. यह याचिका हाईकोर्ट के वकील मंजीत सिंह के माध्यम से दाखिल की गई थी.

आखिर सुमन ने उठा ही लिया कानूनी कदम

हाईकोर्ट ने इस याचिका को स्वीकार करते हुए इस की गोपनीय तरीके से गहन जांच करवाई तो यह बात सामने आई कि इस घोटाले में मुख्यरूप से हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार डा. बलविंदर कुमार शर्मा शामिल थे. उन्हीं के पास परीक्षापत्र थे, जिन में से एक की कौपी करवा कर उन्होंने सुनीता को मुहैया करवा दी थी.

सुनीता सुशीला से मिल कर परीक्षार्थियों से संपर्क कर के डेढ़ करोड़ रुपयों में इस डील को अंतिम रूप देने लगी थी. रजिस्ट्रार का पद जज के पद के समानांतर होता है.

अपनी गहन छानबीन के बाद हाईकोर्ट ने इस मामले में डा. बलविंदर कुमार शर्मा, सुनीता और सुशीला के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर के इन्हें गिरफ्तार करने की संस्तुति दे दी.

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इस तरह 19 सितंबर, 2017 को चंडीगढ़ के सेक्टर-3 स्थित थाना नौर्थ में भादंवि की धाराओं 409, 420 एवं 120बी के अलावा भ्रष्टाचार अधिनियम की धाराओं 8, 9, 13(1) व 13(2) के तहत तीनों आरोपियों के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज हो गई.

हाईकोर्ट के आदेश पर ही इस केस की जांच के लिए चंडीगढ़ पुलिस के नेतृत्व में स्पैशल इनवैस्टीगेशन टीम का गठन कर दिया गया. इस एसआईटी में डीएसपी कृष्ण कुमार के अलावा थाना नौर्थ की महिला एसएचओ इंसपेक्टर पूनम दिलावरी को भी शामिल किया गया था. एफआईआर दर्ज हो जाने के बाद डा. बलविंदर कुमार को उन के पद से हटा दिया गया. 28 दिसंबर, 2017 को उन के अलावा सुनीता को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

डा. बलविंदर जहां जज के पद का रुतबा हासिल किए हुए थे, वहीं सुनीता भी वकालत करती थी. लिहाजा पुलिस द्वारा इन से सख्त तरीके से पूछताछ करना संभव नहीं था. मनोवैज्ञानिक आधारों पर ही पूछताछ कर के इन्हें न्यायिक हिरासत में भिजवा दिया गया. सुशीला अभी तक पकड़ में नहीं आई थी.

14 जनवरी, 2018 को उसे भी उस के पंचकूला स्थित आवास से गिरफ्तार कर लिया गया. उसे अदालत में पेश कर के कस्टडी रिमांड में लिया गया. पुलिस ने उस से गहनता से पूछताछ की.

आज जहां हर केस की एफआईआर पुलिस की वेबसाइट पर उपलब्ध हो जाती है, इस मामले को सेंसेटिव केस की संज्ञा देते हुए इस की एफआईआर जगजाहिर नहीं की गई थी. पुलिस पत्रकारों से बचते हुए इस केस की छानबीन का काम निहायत होशियारी से करती रही. इस मामले में किस ने कितना पैसा लिया, किस ने दिया और किस से कितना रिकवर किया गया, आदि मुद्दों की जानकारी पुलिस ने सामने नहीं आने दी.

हाईकोर्ट के आदेश पर जज के पद की यह प्रारंभिक परीक्षा पहले ही रद्द कर दी गई थी. थाना पुलिस ने तीनों अभियुक्तों के खिलाफ अपनी 2140 पेज की चार्जशीट अदालत में पेश कर दी है. अन्य केसों के आरोपियों की तरह इस केस के आरोपी भी अपने को बेकसूर कह रहे हैं. किस का क्या कसूर रहा, इस घोटाले में किस की क्या भूमिका रही, इस का उत्तर तो केस का फैसला आने पर ही मिल पाएगा.

बहरहाल, जज जैसे अतिप्रतिष्ठित पद के साथ भ्रष्टाचार का ऐसा खिलवाड़ किसी त्रासदी से कम नहीं.

भारतीय युवाओं का टूटता अमेरिकी सपना

भारतीय युवाओं का अमेरिकी सपना अब धीरेधीरे टूट रहा है. जिन मूल भारतीयों को अमेरिकी नागरिकता मिल चुकी है उन्हें तो खैर कुछ नहीं हो रहा पर जिन्हें अमेरिका की नागरिकता नहीं मिली और एच-1-बी वीजा पर सालों से वहां कार्य कर रहे हैं उन का जीवनस्तर खतरे में है. इन इमीग्रैंटों को 2015 में बराक ओबामा ने तोहफे में पति या पत्नी के होने पर उन्हें भी अमेरिका में काम करने की टैंपरेरी इजाजत दे दी थी. नतीजतन, इन भारतीयों की आय दोगुनी हो गई थी.

पर जिन कारणों से नरेंद्र मोदी को भारत में जरूरत से ज्यादा वाहवाही मिली वही अमेरिका में मौजूद हैं. अमेरिका का गोरों का एक संपन्न वर्ग अपने को अमेरिका का पुश्तैनी मालिक समझता है और कालों, भूरों, पीलों, एशियाइयों, अफ्रीकियों,  लैटिनों आदि को गुलाम मानता है. यह वर्ग कहता है कि ये सब लोग अमेरिका आएं, पर न बराबरी मांगें, न सुविधाएं मांगे. वे केवल सेवा करें और जब सेवा करने लायक न रहें तो अपने मूल देश चले जाएं.

जैसे भारतीय सवर्णों ने जम कर हल्ला मचा कर वोटरों को भ्रमित किया, वैसे ही गोरे कट्टरों ने अमेरिकियों को या तो डरा दिया या बहका दिया और अल्पमत में होते हुए भी डोनाल्ड ट्रंप को जितवा दिया जो अब एच-1-बी वीजा के पर कतरने को उतारू है. अब एच-1-बी वीजा की संख्या ही कम नहीं हो रही, टैंपरेरी वीजा की सहूलियत खत्म भी की जा रही है. ऐसे में  हजारों पत्नियां और सैकड़ों पति अब नौकरी खो बैठेंगे.

अमेरिका अपने नागरिकों की बेरोजगारी का दोष इन बाहरी लोगों पर मढ़ रहा है ठीक वैसे ही जैसे भारत में ऊंची जातियां आरक्षण को योग्यता का हनन करने का दोषी मान रही हैं. अब अमेरिका जाने का सपना ही नहीं टूट रहा है, बल्कि जो अमेरिका में घर बना कर वर्षों से रह रहे हैं उन्हें लग रहा है कि उन्हें गंदे, बदबूदार, पिछड़े, भीड़भाड़ वाले देश में लौटना पड़ेगा जहां न नौकरियां है न इज्जत.

अमेरिका में दोयम दर्जे का निवासी होने पर भी उन्हें जो अवसर व स्तर प्राप्त था उस का अंश भी उन्हें अपने देश में न मिलेगा. यह भारतीयों के साथ ही नहीं, दूसरे कई कम विकसित देशों के साथ भी होगा. लेकिन, चूंकि भारतीयों को टैक्नोलौजी के क्षेत्र में बहुत सी नई नौकरियां मिली थीं, सो, उन्हें कुछ ज्यादा ही दर्द होगा.

अमेरिकी अपने फैसले में गलत नहीं हैं. अमेरिकी नागरिकता पाने के बाद भी बहुत से विदेशी मूल के लोग दोहरी मानसिकता में जीते हैं. वे अपनी संस्कृति अमेरिकियों पर थोपते हैं. मंदिर, मसजिद तो बनवाते ही हैं, दूसरों को कहते रहते हैं कि यह करो, यह न करो. भारतीय बीफ के खिलाफ तो मुसलिम हलाल मीट का हल्ला मचाते हैं. वे अपने अलग त्योहार मनाते हैं. वे अपने देशों के नेताओं, धर्मगुरुओं की अगवानी करते फिरते हैं. उन्हें अमेरिकी क्यों पालें जो 2-3 पीढि़यों के बाद भी अमेरिका के नहीं बन पाए.

इस केवट ने डुबोई भाजपा की नैया

सतयुग में एक केवट ने राम को नदी पार करा कर एहसान ही किया था लेकिन उस के एवज में शूद्र करार दी गई निषाद जाति का तिरस्कार और प्रताड़ना कलियुग और उस में भी लोकतंत्र की स्थापना तक जारी है. इस का प्रमाण इलाहाबाद हाईकोर्ट में चल रहे दर्जनों मुकदमे हैं जिन का सार यह है कि इस दौर के दबंग भी उन्हें उन के अधिकार के बजाय आशीर्वाद (वह भी सशुल्क) दे कर यह चौपाई गाते रहने की सलाह दे रहे हैं कि, कभीकभी भगवान को भी भक्तों से काम पड़े….यानी गंगा किनारे की रेत और बालू जैसे कीमती आइटमों पर मत्स्यजीवी यह जाति अपना हक न मांगे.

गोरखपुर लोकसभा सीट, जो संतमहंतों की जागीर बन गई थी, पर होनहार युवा पेशे से इंजीनियर प्रवीण निषाद ने भाजपा के उपेंद्र शुक्ला को धोबीपछाड़ दे कर क्या साबित कर दिया, यह भाजपा के चुनाव प्रबंधकों और आरएसएस के महानुभावों को समझ आ गया है कि अब दिखावे के दलितप्रेम की हांडी पर वोटों की डिश पकने वाली नहीं. अतिपिछड़े जागरूक हो रहे हैं और अब वे धर्म के नाम पर सवर्णों व ब्राह्मणों की पालकी ढोने या नैया पार लगाने को तैयार नहीं.

प्रियंका चोपड़ा के हाथ लगा एक और हौलीवुड प्रोजेक्ट

बौलीवुड से लेकर हौलीवुड स्‍टार तक का सफर तय करने वाली इंटरनेशनल सेलिब्रेटी प्रियंका चोपड़ा इन दिनों अपनी फिल्‍म ‘भारत’ को लेकर चर्चा में हैं. दो साल बाद बौलीवुड प्रोजेक्‍ट करने जा रहीं प्रियंका हौलीवुड की बिजी सेलिब्रेटीज में से एक हो गई हैं. बौलीवुड प्रोजेक्‍ट के अलावा प्रियंका के हाथ एक और बड़ा हौलीवुड प्रोजेक्‍ट लग गया है. प्रियंका चोपड़ा जल्‍द ही हौलीवुड स्‍टार विल स्‍म‍िथ के साथ काम करती नजर आएंगी.

दोनों एक्‍टर्स जल्‍द ही एक यू- ट्यूब सीरीज में साथ काम करेंगे. थ्रिलर सीरीज ‘क्‍वांटिको’ में लीड रोल करके चर्चा में आईं प्रियंका जल्‍द ही जल्‍द ही एक टौक शो को होस्‍ट करने जा रही हैं जिसमें वो रियल लाइफ हीरोज के बारे में बात करती दिखेगीं.

एक खबर के मुताबिक विल स्‍म‍िथ ने पिछले साल दिसंबर में यू-ट्यूब ज्‍वाइन किया था. अपने 50वें जन्‍मदिन पर विल ने एक स्‍टंट वीडियो यू-ट्यूब पर लाइव किया था जो एक चैरिटी इवेंट भी था. यू-ट्यूब के चीफ बिजनेस औफिसर रौबर्ट ने गुरुवार को इस शो के बारे में अनाउनसमेंट की.

द हौलीवुड रिपोर्ट से बात करते हुए रौबर्ट ने कहा कि हम इस शो के जरिए एक बहुत बड़ी संभावना देख रहे हैं जिसके जरिए लोगों की प्ररेक कहानियों से दूसरों को प्रेरित किया जा सकेगा.

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