‘बेटी और बहू में कोई फर्क नहीं होता. शादी के बाद बेटी घर से विदा होती?है तो घर में बहू के रूप में बेटी आ जाती है.’
यह एक आदर्श परिवार की आदर्श सोच है. पर ऐसा कितने घरों में होता है, यह देखने की बात है, क्योंकि जब कोई लड़की किसी घर में बहू बन कर जाती है तो यह पाया गया है कि वहां सासससुर, ननददेवर, जेठजेठानी उस पर हुक्म बजाते नजर आते हैं.
गीता के साथ भी ऐसा हुआ. उस की शादी मुकेश के साथ कुछ दिन पहले ही हुई थी. एक शाम को जब मुकेश घर लौटा तो देखा कि गीता का मूड उखड़ा हुआ था.
वजह पूछी तो गीता सुबकने लगी और बताया, ‘‘आज सुबह आप के छोटे भाई को चाय देने में थोड़ी देर हो गई तो सासू मां मुझ पर बरस पड़ीं. उन की देखादेखी देवरजी भी मुझ पर राशनपानी ले कर चढ़ गए. अब बताओ इस में मेरी क्या गलती है?’’
महेश कुढ़ कर रह गया. उस ने गीता को ही समझाने की कोशिश की कि इतनी छोटीछोटी बातों को दिल से मत लगाया करो लेकिन उस ने गीता के इस सवाल को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया कि घर की बहू पर हर छोटेबड़े का हुक्म चलाना कहां तक जायज है?
महेश का फर्ज बनता था कि देवर के चाय मांगने को ले कर अपनी मां की नाराजगी को उसे हलके में नहीं लेना चाहिए था क्योंकि यही छोटीछोटी बातें बाद में बड़ी तकरार की वजह बन जाती हैं.
अजीब सा लगता है पर बेटे की बीवी पर ससुराल वालों खासकर सास का हुक्म चलने की एक अहम वजह रसोई होती है. यहां वास्तुदोष की बात नहीं हो रही है कि रसोई को किस दिशा में करने से इस तरह के झगड़े नहीं होंगे, बल्कि जब कोई लड़की ब्याह कर अपनी ससुराल आती है तो वह रसोई को अपने तरीके से चलाना चाहती है. अगर कहीं गलती से वह लजीज खाना बनाना जानती है तो सास को लगता है कि गई रसोई हाथ से. इस से वह बहू के खाने में कमी निकालने की कोशिश करती है ताकि उस का मनोबल टूट जाए. जब कभी कोई दूसरा बहू के खाने में कमी बताता है तो सास की पौबारह हो जाती है. वह हुक्म भी ताने देदे कर सुनाती है जिस से शह पा कर देवरननद या कभीकभी तो ससुर भी इस तकरार में शामिल हो जाते हैं.
रसोई से ही एक और चीज जुड़ी होती है, घर का बजट. बजट यानी पैसे का लेनदेन. बेटे की कमाई, जो कल तक मां के हाथ में जा रही होती है, वे बंट जाती है. बहू के हाथ में बेटे की आधी कमाई का जाना सास को अपनी हार लगती है. लिहाजा, वह छोटीछोटी बातों को मुद्दा बनाने लगती है. खुद का बस नहीं चलता तो अपने पति या बेटे के कान भरने लगती है. चूंकि कई घरों में बहू भी कमाती है तो सास को वह अपने से अमीर लगने लगती है.
प्रिया एक कंप्यूटर इंजीनियर है. उस का पति राजन भी एक मल्टीनैशनल कंपनी में काम करता है. चूंकि उन की लव मैरिज हुई थी इसलिए राजन ने बिना दहेज के शादी की थी जो उस के मांबाप को रास नहीं आई.
कुछ दिन तो घर का माहौल ठीक रहा पर बाद में प्रिया को लगने लगा कि उस के सासससुर उस पर बेवजह के हुक्म चलाते हैं. एक बार तो हद हो गई. प्रिया दफ्तर से लेट हो गई थी. सास ने ताना दे मारा, ‘‘अगर तुम ही घर देर से लौटोगी तो राजन की शादी से मुझे क्या फायदा हुआ. इस बुढ़ापे में घर का सारा कामकाज मुझे ही देखना पड़ता है. तुम नौकरी छोड़ कर घर बैठो और मुझे मुक्ति दो.’’
प्रिया ने झुंझलाते हुए कहा, ‘‘मांजी, आज मैं पहली बार लेट हुई हूं और आप ने यह तुगलकी फरमान सुना दिया. अगर आप से घर का काम नहीं होता तो मैं एक नौकरानी लगा देती हूं जो आप का हाथ बंटा दिया करेगी.’’
इतना सुनते ही सास बिफर पड़ी, ‘‘अब कल की आई लड़की हमें समझाएगी कि इस घर में कौन क्या काम करेगा. घर में बैठ नहीं तो अपनी रसोई अलग कर ले.’’
बात आगे न बढ़े इसलिए प्रिया चुप्पी साध गई. राजन के आने पर उन दोनों ने मां से फिर बात की लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा. इस के बाद वे दोनों उसी कालोनी में किराए के एक घर में रहने लगे.
आज के जमाने में बहू अगर नौकरी नहीं करती है तो इस का मतलब यह कतई नहीं है कि वह पढ़ीलिखी नहीं है या वह अपने मांबाप के घर से कुछ भी सीख कर नहीं आई है. अगर कोई सास या ससुर अपने बच्चों पर हुक्म नहीं चलाते हैं तो उन्हें बेटे की बीवी पर हुक्म चलाने का भी कोई हक नहीं है. इस से परिवार में कलह बढ़ती है जो उसे तोड़ने का काम करती है.
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उत्तर प्रदेश में लखीमपुर के एक गांव में रहने वाली देविका की शादी देवेश से तय हो गई. देवेश सरकारी नौकरी करता था. ऐसे में देविका के घर वालों ने उस की तकरीबन हर डिमांड पूरी की थी. दोनों ने एकदूसरे को देखा था और पसंद भी किया था. सभी को जोड़ी अच्छी लग रही थी.
देविका अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी कर रही थी. अपने भविष्य को ले कर उस ने सपने देखे थे. शादी के दिन जब फेरे हो रहे थे, उस समय देवेश नशे की हालत में था. उस के पैर लड़खड़ा रहे थे और मुंह से बदबू आ रही थी.
देविका को अच्छा नहीं लगा. उस ने आगे के फेरे लेने बंद कर दिए और अपने परिवार को बुला कर फैसला सुना दिया कि वह नशा करने वाले लड़के के साथ शादी नहीं करेगी.
देविका के लिए यह फैसला लेना आसान नहीं था. घरपरिवार, नातेरिश्तेदार सभी उस को समझाने में लग गए. हर तरह से समझाया पर देविका ने अपने फैसले को बदलना ठीक नहीं समझा.
देविका ने कहा, ‘‘अगर आप लोग नहीं माने तो मैं मुकदमा दर्ज करा दूंगी.’’
देविका के दबाव के आगे सभी को झुकना पड़ा. देवेश को शादी किए बिना ही अपने घर वापस आना पड़ा.
यह घटना एक उदाहरण भर है. ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं जहां लड़की ने शादी करने से इनकार कर दिया, क्योंकि उस का होने वाला पति नशा करता था.
नशे की लत
गांव में खेतीकिसानी ही अहम पेशा होता है. हाल के कुछ सालों में खेतीकिसानी बेहाल होती जा रही है. गांव के आसपास शहरों का विकास होने लगा है. गांव की जमीन महंगी होती जा रही है. गांव के आसपास सड़क बनने से सरकार गांव से जमीन खरीद कर अच्छाखासा मुआवजा देने लगी है. घर और रिसोर्ट बनाने वाले भी गांवों की जमीन की खरीदारी कर रहे हैं. शहरों में रहने वाले लोग भी गांव की जमीनें खरीदने लगे हैं. ऐसे में गांव के लोगों के पास जमीन बेचने के बाद पैसा आने लगा है. पैसा आने के बाद ये लोग उस का इस्तेमाल ऐशोआराम में करने लगे हैं. ऐेसे में नशे की आदत सब से ज्यादा बढ़ती है.
गांवों में रहने वाले नौजवान उम्र के 90 फीसदी लोग नशे के शिकार हैं. वे शराब, भांग और गांजा समेत तंबाकू का सेवन करने लगे हैं. पढ़नेलिखने से दूर ऐसे बेराजगार नौजवानों से लोग अपनी लड़की की शादी नहीं करना चाहते हैं.
नशे के आदी इन नौजवानों की इमेज बेहद खराब है. लड़कियों को लगता है कि ये लोग शादी के बाद मारपीट और गालीगलौज ज्यादा करते है. ऐसे में इन के पास जमीनजायदाद होते हुए भी लड़कियां शादी के लिए तैयार नहीं होती हैं. कई बार अगर मातापिता के दबाव में लड़की शादी करने को राजी हो भी जाए तो शादी टूट जाती है. नशे और स्वभाव के चलते गंवई लड़के लड़कियों को पसंद नहीं आते. गांव के माहौल में पली लड़कियां तो किसी तरह से अपने को ढाल भी लें पर शहर की रहने वाली लड़की तो कभी भी ऐसा नहीं कर पाती है.
बेरोजगारी से बड़ा दाग
अब लड़कियां लड़कों से ज्यादा पढ़ीलिखी होने लगी हैं. ऐसे में वे लड़कों की बेरोजगारी से तो समझौता कर भी लेती हैं पर नशेड़ी होने की हालत में समझौता करने को तैयार नहीं होती हैं.
कविता नामक लड़की कहती है, ‘‘रोजगार नहीं होगा तो कोई भी धंधा किया जा सकता है. आज गांवों में हर तरह की सुविधा और साधन हो गए हैं पर अगर पति में नशे की लत होगी तो वह हमेशा परेशान करेगा. नशे के लिए पैसा चाहिए. पैसे का इंतजाम करने के लिए वह जमीनजायदाद और गहने तक बेचने की कोशिश करता है. नशे के हावी होने से शादी के बाद की खुशनुमा जिंदगी बरबाद हो जाती है.’’
नशे के शिकार नौजवान उम्र से पहले ही बूढ़े हो जाते हैं. तमाम बीमारियों के शिकार हो जाते हैं. एक तरफ गरीबी होती है तो दूसरी तरफ पैसा जो पहले नशे पर खर्च होता है और बाद में नशेड़ी के इलाज में. ऐसे में अगर पहले से नशेड़ी लोगों को सबक मिले तो भविष्य में गांव के नौजवान नशे से दूर रहेंगे.
ज्यादातर नौजवानों को नशे की लत आपस के लोगों से ही लगती है. कई बार यह भी होता है कि अगर आप का कोई दुश्मन है तो वह आप के लड़के को नशे की लत लगा देगा, जिस से पूरी पीढ़ी बरबाद हो जाती है.
कई बार नशा करने वाला यह स्वीकार ही नहीं करता कि वह नशा करता है. ऐसे में समस्या को हल करने का कोई जरीया ही नहीं बचता है. गांव में रहने वालों को खुद का भविष्य सुधारना है तो नशे के खिलाफ खड़ा होना होगा.
नशे से बढ़ते हैं घरेलू झगड़े
नौजवान पीढ़ी नशे की सब से ज्यादा शिकार बनती जा रही है. नशे की लत और मात्रा बढ़ती जा रही है. पहले गांव में गिनेचुने लोग ही नशा करते थे, अब आप गिन नहीं सकते कि कितने लोग नशा कर रहे हैं. अपनी मेहनत से कमाया गया पैसा नशे में उड़ा रहे हैं. इस से पैसा और शरीर दोनों खराब हो रहे हैं. गांव में स्कूल के बच्चों से बात करने पर पता चलता है कि पिता बच्चे के स्कूल से ज्यादा अहमियत अपने नशे को देता
है. जिस घर में नशा करने वाले लोग होते हैं वहां लड़ाई जरूर होती है. नशे के खिलाफ सामाजिक जागरूकता बढ़नी चाहिए.
– आईपी सिंह, समाजसेवी टीचर.
बीमारियों की वजह है नशा
पिछले कुछ सालों में कैंसर, टीबी जैसी बीमारियों ने गांवों में तेजी से पैर पसार लिए हैं. हम लखनऊ के मैडिकल कालेज में कैंसर पीडि़त परिवारों की मदद करते समय यह समझ पाते हैं कि हालात बहुत खराब हैं. ऐसी बीमारियां केवल नशा करने वाले को ही नहीं होतीं, बल्कि उस के परिवार में दूसरों को भी होती हैं. परिवार में कोई एक बीमारी का शिकार हो गया तो पूरा परिवार बरबाद हो जाता है.
अगर नशे का विरोध हो और इस को बंद किया जा सके तो समाज और परिवार का बहुत भला हो सकता है. बीमारी के बाद इलाज में लगने वाला पैसा घरपरिवार की खुशहाली में लग सकता है.
– सपना उपाध्याय, ईश्वर चाइल्ड केयर फाउंडेशन
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बिहार में हथियारों के शौकीनों का एक नया गैरकानूनी शौक सामने आया है. वे लाइसैंसी हथियारों के डिजाइन में फेरबदल कर उसे नया रूप देने लगे हैं. यह एक महज शौक नहीं बल्कि रुपए कमाने का नया तरीका भी बन चुका है.
गृह विभाग का मानना है कि पिछले कुछ महीनों के दौरान जब्त हथियारों को देखने के बाद यह पता चला है कि हथियारों में फेरबदल करने का शौक खतरनाक हद तक बढ़ चुका है.
30 मार्च, 2018 को पटना के ऐक्जीबिशन रोड चौराहे के पास पकड़े गए लोगों के पास से 10 हथियार बरामद किए गए. इन में से 3 हथियारों के मूल डिजाइन को बदल दिया गया था.
तड़के सुबह साढ़े 3 बजे गाडि़यों की चैकिंग के दौरान पुलिस ने एक गाड़ी से इन हथियारों को बरामद किया. इन में .315 की 5 राइफलें, 12 बोर की 2 एसबीबीएल राइफलें और 12 बोर की 3 डीबीबीएल राइफलें थीं.
मामले की छानबीन करने वाले डीएसपी एसए हाशिमी ने बताया कि लाइसैंसी हथियारों के डिजाइन में किसी भी तरह का बदलाव करना गैरकानूनी है जबकि कई लोग पुराने हथियारों को नया रंगरूप दे कर रोब गांठते हैं.
सब से ज्यादा .315 बोर की राइफल के मूल डिजाइन में बदलाव करने का मामला देखने को मिला है. यह राइफल मूल रूप से और्डिनैंस फैक्टरी में बनाई जाती है और इस की एक ही डिजाइन मार्केट में है.
इस मौडल की राइफल में पूरा बट लकड़ी का होता है. कुछ लोग लकड़ी के बट को हटा कर छोटा बट लगा देते हैं. इस से राइफल का साइज छोटा हो कर एके-47 जैसा लगने लगता है. बट को बदलवाने में ढाई हजार रुपए और उस में दूरबीन लगवाने के लिए 15 हजार रुपए खर्च करने पड़ते हैं.
आर्म्स ऐक्ट-1959 कहता है कि किसी भी हथियार के मूल डिजाइन में किसी भी तरह का बदलाव नहीं किया जा सकता है. इस से हथियार गैरकानूनी हो जाता है. ऐसे हथियारों को पुलिस जब्त कर सकती है और आरोपी को 7 साल की कैद हो सकती है.
पुलिस सूत्रों के मुताबिक कानपुर के स्टैंड रोड पर पुराने हथियारों को नया डिजाइन और लुक देने का काम धड़ल्ले से होता है. इस के अलावा बिहार की राजधानी पटना के अलावा मुंगेर, गया, भागलपुर, बेतिया, मुजफ्फरपुर वगैरह जिलों में भी हथियारों को नया रंगरूप देने का धंधा खूब फलफूल रहा है.
इस मामले में गिरफ्तार किए गए 13 लोगों से जब पुलिस ने पूछताछ की तो हथियारों और सिक्योरिटी एजेंसी चलाने वालों के एक नए ही खेल का खुलासा हुआ है. बाजार में अपनी पैठ बनाने के लिए कुछ एजेंसियां कई तरह के गैरकानूनी काम करती हैं. इन में पुराने हथियारों के मूल डिजाइन में बदलाव कर उन्हें मौडर्न लुक देने का खेल धड़ल्ले से चलाया जाता है.
मौडर्न हथियारों के नाम पर कंपनी के गार्ड को अच्छीखासी रकम मिलने लगती है. साधारण राइफल वाले गार्ड मुहैया कराने के लिए जहां एजेंसी 12 से 15 हजार रुपए वसूलती है, वहीं मौडर्न हथियारों से लैस गार्ड मुहैया कराने के नाम पर 20 से 30 हजार रुपए तक की वसूली की जाती है.
वैसे, एजेंसी संचालक गार्ड को तनख्वाह के नाम पर महज 8 से 10 हजार रुपए ही देती है, बाकी रकम एजेंसी की जेब में जाती है.
गांधी मैदान थानाध्यक्ष दीपक कुमार ने बताया कि गिरफ्तार गार्डों से पूछताछ के बाद यह भी खुलासा हुआ कि सिक्योरिटी एजेंसियां जमीन विवाद को निबटाने का भी ठेका लेती हैं. किसी जमीन पर विवाद के निबटारे के लिए कोई जमीन मालिक किसी सिक्योरिटी एजेंसी से संपर्क करता है तो संचालक उस से मोटी रकम ले कर 15-20 हथियारबंद गार्डों को मौके पर भेज देता है और ताबड़तोड़ आसमानी फायर कर के जमीन पर दावा करने वालों को डराधमका कर भगा देता है, जबकि ऐसा करना पूरी तरह से गैरकानूनी है.
इस के अलावा बड़ी शादियों या बड़ी पार्टियों में मौडर्न हथियारों से लैस गार्डों को बुलाना हाईप्रोफाइल लोगों का शगल बन गया है. पार्टियों में गार्डों से अंधाधुंध आसमानी फायर करवा कर आसपास के लोगों और अपने परिवार वालों के बीच रोब गांठने का काम किया जाता है. इस के लिए भी सिक्योरिटी एजेंसियां मोटी रकम वसूलती हैं.
सरकारी बंदूक का गैरकानूनी इस्तेमाल
प्रदेश के कई इलाकों में सरकारी हथियारों को भाड़े पर अपराधियों को दे कर मोटी कमाई की जाती है. पटना से तकरीबन 30 किलोमीटर दूर मनेर के दियारा इलाके की एक बड़ी खासीयत यह है कि वहां के तकरीबन हर घर में एक फौजी है. फौज में रहने के दौरान उन की पोस्टिंग जब जम्मूकश्मीर में होती है तो वे वहां अपने नाम से राइफल या बंदूक का लाइसैंस जारी करवा लेते हैं. हथियार ले कर वे बड़ी आसानी से अपने गांव आ जाते हैं और इस की सूचना वे लोकल थाने में नहीं देते हैं.
बालू के गैरकानूनी खनन में लगे अपराधी गिरोहों को वे 3 हजार के मासिक किराए पर हथियार दे देते हैं. बालू घाटों पर कब्जा करने में ज्यादातर ऐसे ही हथियारों का इस्तेमाल हो रहा है. पुलिस का कहना है कि जम्मूकश्मीर में जारी हथियारों के लाइसैंस का बगैर बिहार में ऐंट्री कराए इस्तेमाल करना गैरकानूनी है. इस के बाद भी पुलिस ऐसे लोगों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठा पाती है.
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नवीन को बाजार में बेकार घूमने का शौक कभी नहीं रहा, वह तो सामान खरीदने के लिए उसे मजबूरी में बाजारों के चक्कर लगाने पड़ते हैं. घर की छोटीछोटी वस्तुएं कब खत्म होतीं और कब आतीं, उसे न तो कभी इस बात से सरोकार रहा, न ही दिलचस्पी. उसे तो हर चीज व्यवस्थित ढंग से समयानुसार मिलती रही थी.
हर महीने घर में वेतन दे कर वह हर तरह के कर्तव्यों की इतिश्री मान लेता था. शुरूशुरू में वह ज्यादा तटस्थ था लेकिन बाद में उम्र बढ़ने के साथ जब थोड़ी गंभीरता आई तो अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी समझने लगा था.
बाजार से खरीदारी करना उसे कभी पसंद नहीं आया था. लेकिन विडंबना यह थी कि महज वक्त काटने के लिए अब वह रास्तों की धूल फांकता रहता. साइन बोर्ड पढ़ता, दुकानों के भीतर ऐसी दृष्टि से ताकता, मानो सचमुच ही कुछ खरीदना चाहता हो.
दफ्तर से लौट कर घर जाने को उस का मन ही नहीं होता था. खाली घर काटने को दौड़ता. उदास मन और थके कदमों से उस ने दरवाजे का ताला खोला तो अंधेरे ने स्वागत किया. स्वयं बत्ती जलाते हुए उसे झुंझलाहट हुई. कभी अकेलेपन की त्रासदी यों भोगी नहीं थी. पहले मांबाप के साथ रहता था, फिर नौकरी के कारण दिल्ली आना पड़ा और यहीं विवाह हो गया था.
पिछले 8 वर्षों से रुचि ही घर के हर कोने में फुदकती दिखाई देती थी. फिर अचानक सबकुछ उलटपुलट हो गया. रुचि और उस के संबंधों में तनाव पनपने लगा. अर्थहीन बातों को ले कर झगड़े हो जाते और फिर सहज होने में जितना समय बीतता, उस दौरान रिश्ते में एक गांठ पड़ जाती. फिर होने यह लगा कि गांठें खुलने के बजाय और भी मजबूत सी होती गईं.
सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए नवीन ने फ्रिज खोला और बोतल सीधे मुंह से लगा कर पानी पी लिया. उस ने सोचा, अगर रुचि होती तो फौरन चिल्लाती, ‘क्या कर रहे हो, नवीन, शर्म आनी चाहिए तुम्हें, हमेशा बोतल जूठी कर देते हो.’
तब वह मुसकरा उठता था, ‘मेरा जूठा पीओगी तो धन्य हो जाओगी.’
‘बेकार की बकवास मत किया करो, नाहक ही अपने मुंह की सारी गंदगी बोतलों में भर देते हो.’
यह सुन कर वह चिढ़ जाता और एकएक कर पानी की सारी बोतलें निकाल जूठी कर देता. तब रुचि सारी बोतलें निकाल उन्हें दोबारा साफ कर, फिर भर कर फ्रिज में रखती.
जब बच्चे भी उस की नकल कर ऐसा करने लगे तो रुचि ने अपना अलग घड़ा रख लिया और फ्रिज का पानी पीना ही छोड़ दिया. कुढ़ते हुए वह कहती, ‘बच्चों को भी अपनी गंदी आदतें सिखा दो, ताकि बड़े हो कर वे गंवार कहलाएं. न जाने लोग पढ़लिख कर भी ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं?’
बच्चों का खयाल आते ही उस के मन के किसी कोने में हूक उठी, उन के बिना जीना भी कितना व्यर्थ लगता है.
रुचि जब जाने लगी थी तो उस ने कितनी जिद की थी, अनुनय की थी कि वह बच्चों को साथ न ले जाए. तब उस ने व्यंग्यपूर्वक मुंह बनाते हुए कहा था, ‘ताकि वे भी तुम्हारी तरह लापरवाह और अव्यवस्थित बन जाएं. नहीं नवीन, मैं अपने बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकती. मैं उन्हें एक सभ्य व व्यवस्थित इंसान बनाना चाहती हूं. फिर तुम्हारे जैसा मस्तमौला आदमी उन की देखभाल करने में तो पूर्ण अक्षम है. बिस्तर की चादर तक तो तुम ढंग से बिछा नहीं सकते, फिर बच्चों को कैसे संभालोगे?’
नवीन सोचने लगा, न सही सलीका, पर वह अपने बच्चों से प्यार तो भरपूर करता है. क्या जीवन जीने के लिए व्यवस्थित होना जरूरी है?
रुचि हर चीज को वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत करने की आदी थी.
विवाह के 2 वर्षों बाद जब स्नेहा पैदा हुई थी तो वह पागल सा हो गया था. हर समय गोदी में लिए उसे झुलाता रहता था. तब रुचि गुस्सा करती, ‘क्यों इस की आदत बिगाड़ रही हो, गोदी में रहने से इस का विकास कैसे होगा?’
रुचि के सामने नवीन की यही कोशिश रहती कि स्नेहा के सारे काम तरतीब से हों पर जैसे ही वह इधरउधर होती, वह खिलंदड़ा बन स्नेहा को गुदगुदाने लगता. कभी घोड़ा बन जाता तो कभी उसे हवा में उछाल देता.
वह सोचने लगता कि स्नेहा तो अब 6 साल की हो गई है और कन्नू 3 साल का. इस साल तो वह कन्नू का जन्मदिन भी नहीं मना सका, रुचि ने ही अपने मायके में मनाया था. अपने दिल के हाथों बेबस हो कर वह उपहार ले कर वहां गया था पर दरवाजे पर खड़े उस के पहलवान से दिखने वाले भाई ने आंखें तरेरते हुए उसे बाहर से ही खदेड़ दिया था. उस का लाया उपहार फेंक कर पान चबाते हुए कहा था, ‘शर्म नहीं आती यहां आते हुए. एक तरफ तो अदालत में तलाक का मुकदमा चल रहा है और दूसरी ओर यहां चले आते हो.’
‘मैं अपने बच्चों से मिलना चाहता हूं,’ हिम्मत जुटा कर उस ने कहा था.
‘खबरदार, बच्चों का नाम भी लिया तो. दे क्या सकता है तू बच्चों को,’ उस के ससुर ने ताना मारा था, ‘वे मेरे नाती हैं, राजसी ढंग से रहने के अधिकारी हैं. मेरी बेटी को तो तू ने नौकरानी की तरह रखा पर बच्चे तेरे गुलाम नहीं बनेंगे. मुझे पता होता कि तेरे जैसा व्यक्ति, जो इंजीनियर कहलाता है, इतना असभ्य होगा, तो कभी भी अपनी पढ़ीलिखी, सुसंस्कृत लड़की को तेरे साथ न ब्याहता, वही पढ़ेलिखे के चक्कर में जिद कर बैठी, नहीं तो क्या रईसों की कमी थी. जा, चला जा यहां से, वरना धक्के दे कर निकलवा दूंगा.’
वह अपमान का घूंट पी कर बच्चों की तड़प मन में लिए लौट आया था. वैसे भी झगड़ा किस आधार पर करता, जब रुचि ने ही उस का साथ छोड़ दिया था. वैसे उस के साथ रहते हुए रुचि ने कभी यह नहीं जतलाया था कि वह अमीर बाप की बेटी है, न ही वह कभी अपने मायके जा कर हाथ पसारती थी.
रुचि पैसे का अभाव तो सह जाती थी, लेकिन जब जिंदगी को मस्त ढंग से जीने का सवाल आता तो वह एकदम उखड़ जाती और सिद्धांतों का पक्ष लेती. उस वक्त नवीन का हर समीकरण, हर दलील उसे बेमानी व अर्थहीन लगती. रुचि ने जब अपने लिए घड़ा रखा तो नवीन को महसूस हुआ था कि वह चाहती तो अपने पिता से कह कर अलग से फ्रिज मंगा सकती थी पर उस ने पति का मान रखते हुए कभी इस बारे में सोचा भी नहीं.
नवीन ने रुचि की व्यवस्थित ढंग से जीने की आदत के साथ सामंजस्य बैठाने की कोशिश की पर हर बार वह हार जाता. बचपन से ही मां, बाबूजी ने उसे अपने ऊपर इतना निर्भर बना कर रखा था कि वह अपनी तरह से जीना सीख ही न पाया. मां तो उसे अपनेआप पानी भी ले कर नहीं पीने देती थीं. 8 वर्षों के वैवाहिक जीवन में वह उन संस्कारों से छुटकारा नहीं पा सका था.
वैसे भी नवीन, रुचि को कभी संजीदगी से नहीं लेता था, यहां तक कि हमेशा उस का मजाक ही उड़ाया करता था, ‘देखो, कुढ़कुढ़ कर बालों में सफेदी झांकने लगी है.’
तब वह बेहद चिढ़ जाती और बेवजह नौकर को डांटने लगती कि सफाई ठीक से क्यों नहीं की. घर तब शीशे की तरह चमकता था, नौकर तो उस की मां ने जबरदस्ती कन्नू के जन्म के समय भेज दिया था.
सुबह की थोड़ी सब्जी पड़ी थी, जिसे नवीन ने अपने अधकचरे ज्ञान से तैयार किया था, उसी को डबलरोटी के साथ खा कर उस ने रात के खाने की रस्म पूरी कर ली. फिर औफिस की फाइल ले कर मेज पर बैठ गया. बहुत मन लगाने के बावजूद वह काम में उलझ न सका. फिर दराज खोल कर बच्चों की तसवीरें निकाल लीं और सोच में डूब गया, ‘कितने प्यारे बच्चे हैं, दोनों मुझ पर जान छिड़कते हैं.’
एक दिन स्नेहा से मिलने वह उस के स्कूल गया था. वह तो रोतेरोते उस से चिपट ही गई थी, ‘पिताजी, हमें भी अपने साथ ले चलिए, नानाजी के घर में तो न खेल सकते हैं, न शोर मचा सकते हैं. मां कहती हैं, अच्छे बच्चे सिर्फ पढ़ते हैं. कन्नू भी आप को बहुत याद करता है.’
अपनी मजबूरी पर उस की पलकें नम हो आई थीं. इस से पहले कि वह जीभर कर उसे प्यार कर पाता, ड्राइवर बीच में आ गया था, ‘बेबी, आप को मेम साहब ने किसी से मिलने को मना किया है. चलो, देर हो गई तो मेरी नौकरी खतरे में पड़ जाएगी.’
उस के बाद तलाक के कागज नवीन के घर पहुंच गए थे, लेकिन उस ने हस्ताक्षर करने से साफ इनकार कर दिया था. मुकदमा उन्होंने ही दायर किया था पर तलाक का आधार क्या बनाते? वे लोग तो सौ झूठे इलजाम लगा सकते थे, पर रुचि ने ऐसा करने से मना कर दिया, ‘अगर गलत आरोपों का ही सहारा लेना है तो फिर मैं सिद्धांतों की लड़ाई कैसे लड़ूंगी?’
तब नवीन को एहसास हुआ था कि रुचि उस से नहीं, बल्कि उस की आदतों से चिढ़ती है. जिस दिन सुनवाई होनी थी, वह अदालत गया ही नहीं था, इसलिए एकतरफा फैसले की कोई कीमत नहीं थी. इतना जरूर है कि उन लोगों ने बच्चों को अपने पास रखने की कानूनी रूप से इजाजत जरूर ले ली
थी. तलाक न होने पर भी वे दोनों अलगअलग रह रहे थे और जुड़ने की संभावनाएं न के बराबर थीं.
नवीन बिस्तर पर लेटा करवटें बदलता रहा. युवा पुरुष के लिए अकेले रात काटना बहुत कठिन प्रतीत होता है. शरीर की इच्छाएं उसे कभीकभी उद्वेलित
कर देतीं तो वह स्वयं को पागल सा महसूस करता. उसे मानसिक तनाव घेर लेता और मजबूरन उसे नींद की गोली लेनी पड़ती.
उस ने औफिस का काफी काम भी अपने ऊपर ले लिया था, ताकि रुचि और बच्चे उस के जेहन से निकल जाएं. दफ्तर वाले उस के काम की तारीफ में कहते हैं, ‘नवीन साहब, आप का काम बहुत व्यवस्थित होता है, मजाल है कि एक फाइल या एक कागज, इधरउधर हो जाए.’
वह अकसर सोचता, घर पहुंचते ही उसे क्या हो जाया करता था, क्यों बदल जाता था उस का व्यक्तित्व और वह एक ढीलाढाला, अलमस्त व्यक्ति बन जाता था?
मेजकुरसी के बजाय जब वह फर्श पर चटाई बिछा कर खाने की फरमाइश करता तो रुचि भड़क उठती, ‘लोग सच कहते हैं कि पृष्ठभूमि का सही होना बहुत जरूरी है, वरना कोई चाहे कितना पढ़ ले, गांव में रहने वाला रहेगा गंवार ही. तुम्हारे परिवार वाले शिक्षित होते तो संभ्रांत परिवार की झलक व आदतें खुद ही ही तुम्हारे अंदर प्रकट हो जातीं पर तुम ठहरे गंवार, फूहड़. अपने लिए न सही, बच्चों के लिए तो यह फूहड़पन छोड़ दो. अगर नहीं सुधर सकते तो अपने गांव लौट जाओ.’
उस ने रुचि को बहुत बार समझाने की कोशिश की कि ग्वालियर एक शहर है न कि गांव. फिर कुरसी पर बैठ कर खाने से क्या कोई सभ्य कहलाता है.
‘देखो, बेकार के फलसफे झाड़ कर जीना मुश्किल मत बनाओ.’
‘अरे, एक बार जमीन पर बैठ कर खा कर देखो तो सही, कुरसीमेज सब भूल जाओगी.’
नवीन ने चम्मच छोड़ हाथ से ही चावल खाने शुरू कर दिए थे.
‘बस, बहुत हो गया, नवीन, मैं हार गई हूं. 8 वर्षों में तुम्हें सुधार नहीं पाई और अब उम्मीद भी खत्म हो गई है. बाहर जाओ तो लोग मेरी खिल्ली उड़ाते हैं, मेरे रिश्तेदार मुझ पर हंसते हैं. तुम से तो कहीं अच्छे मेरी बहनों के पति हैं, जो कम पढ़ेलिखे ही सही, पर शिष्टाचार के सारे नियमों को जानते हैं. तुम्हारी तरह बेवकूफों की तरह बच्चों के लिए न तो घोड़े बनते हैं, न ही बर्फ की क्यूब निकाल कर बच्चों के साथ खेलते हैं. लानत है, तुम्हारी पढ़ाई पर.’
नवीन कभी समझ नहीं पाया था कि रुचि हमेशा इन छोटीछोटी खुशियों को फूहड़पन का दरजा क्यों देती है? वैसे, उस की बहनों के पतियों को भी वह बखूबी जानता था, जो अपनी टूटीफूटी, बनावटी अंगरेजी के साथ हंसी के पात्र बनते थे, पर उन की रईसी का आवरण इतना चमकदार था कि लोग सामने उन की तारीफों के पुल बांधते रहते थे.
शादी से पहले उन दोनों के बीच 1 साल तक रोमांस चला था. उस अंतराल में रुचि को नवीन की किसी भी हरकत से न तो चिढ़ होती थी, न ही फूहड़पन की झलक दिखाई देती थी, बल्कि उस की बातबात में चुटकुले छोड़ने की आदत की वह प्रशंसिका ही थी. यहां तक कि उस के बेतरतीब बालों पर वह रश्क करती थी. उस समय तो रास्ते में खड़े हो कर गोलगप्पे खाने का उस ने कभी विरोध नहीं किया था.
नींद की गोली के प्रभाव से वह तनावमुक्त अवश्य हो गया था, पर सो न सका था. चिडि़यों की चहचहाहट से उसे अनुभव हुआ कि सवेरा हो गया है और उस ने सोचतेसोचते रात बिता दी है.
चाय का प्याला ले कर अखबार पढ़ने बैठा, पर सोच के दायरे उस की तंद्रा को भटकाने लगे. प्लेट में चाय डालने की उसे इच्छा ही नहीं हुई, इसलिए प्याले से ही चाय पीने लगा.
शादी के बाद भी सबकुछ ठीक था. उन के बीच न तो तनाव था, न ही सामंजस्य का अभाव. दोनों को ही ऐसा नहीं लगा था कि विपरीत आदतें उन के प्यार को कम कर रही हैं. नवीन भूल से कभी कोई कागज फाड़ कर कचरे के डब्बे में फेंकने के बजाय जमीन पर डाल देता तो रुचि झुंझलाती जरूर थी पर बिना कुछ कहे स्वयं उसे डब्बे में डाल देती थी. तब उस ने भी इन हरकतों को सामान्य समझ कर गंभीरता से नहीं लिया था.
अपने सीमित दायरे में वे दोनों खुश थे. स्नेहा के होने से पहले तक सब ठीक था. रुचि आम अमीर लड़कियों से बिलकुल भिन्न थी, इसलिए स्वयं घर का काम करने से उसे कभी दिक्कत नहीं हुई.
हां, स्नेहा के होने के बाद काम अवश्य बढ़ गया था पर झगड़े नहीं होते थे. लेकिन इतना अवश्य हुआ था कि स्नेहा के जन्म के बाद से उन के घर में रुचि की मां, बहनों का आना बढ़ गया था. उन लोगों की मीनमेख निकालने की आदत जरूरत से ज्यादा ही थी. तभी से रुचि में परिवर्तन आने लगा था और पति की हर बात उसे बुरी लगने लगी थी. यहां तक कि वह उस के कपड़ों के चयन में भी खामियां निकालने लगी थी.
उन का विवाह रुचि की जिद से हुआ था, घर वालों की रजामंदी से नहीं. यही कारण था कि वे हर पल जहर घोलने में लगे रहते थे और उन्हें दूर करने, उन के रिश्ते में कड़वाहट घोलने में सफल हो भी गए थे.
काम करने वाली महरी दरवाजे पर आ खड़ी हुई तो वह उठ खड़ा हुआ और सोचने लगा कि उस से ही कितनी बार कहा है कि जरा रोटी, सब्जी बना दिया करे. लेकिन उस के अपने नखरे हैं. ‘बाबूजी, अकेले आदमी के यहां तो मैं काम ही नहीं करती, वह तो बीबीजी के वक्त से हूं, इसलिए आ जाती हूं.’
नौकर को एक बार रुचि की मां ले गई थी, फिर वापस भेजा नहीं. तभी रुचि ने यह महरी रखी थी नवीन के बाबूजी को गुजरे 7 साल हो गए थे. मां वहीं ग्वालियर में बड़े भाई के पास रहती थीं. भाभी एक सामान्य घर से आई थीं, इसलिए कभी तकरार का प्रश्न ही न उठा. उस के पास भी मां मिलने कई बार आईं, पर रुचि का सलीका उन के सरल जीवन के आड़े आने लगा. वे हर बार महीने की सोच कर हफ्ते में ही लौट जातीं. वह तो यह अच्छा था कि भाभी ने उन्हें कभी बोझ न समझा, वरना ऐसी स्थिति में कोई भी अपमान करने से नहीं चूकता.
वैसे, रुचि का मकसद उन का अपमान करना कतई नहीं होता था, लेकिन सभ्य व्यवहार की तख्ती अनजाने में ही उन पर यह न करो, वह न करो के आदेश थोपती तो मां हड़बड़ा जातीं. इतनी उम्र कटने के बाद उन का बदलना सहज न था. वैसे भी उन्होंने एक मस्त जिंदगी गुजारी थी, जिस में बच्चों को प्यार से पालापोसा था, हाथ में हर समय आदेश का डंडा ले कर नहीं.
रुचि के जाने के बाद उस ने मां से कहा था कि वे अब उसी के पास आ कर रहें, लेकिन उन्होंने साफ इनकार कर दिया था, ‘बेटा, तेरे घर में कदम रखते डर लगता है, कोई कुरसी भी खिसक जाए तो…न बाबा. वैसे भी यहां बच्चों के बीच अस्तव्यस्त रहते ज्यादा आनंद आता है. मैं वहां आ कर क्या करूंगी, इन बूढ़ी हड्डियों से काम तो होता नहीं, नाहक ही तुझ पर बोझ बन जाऊंगी.’
रुचि के जाने के बाद नवीन ने उस के मायके फोन किया था कि वह अपनी आदतें बदलने की कोशिश करेगा, बस एक बार मौका दे और लौट आए. पर तभी उस के पिता की गर्जना सुनाई दी थी और फोन कट गया था. उस के बाद कभी रुचि ने फोन नहीं उठाया था, शायद उसे ऐसी ही ताकीद थी. वह तो बच्चों की खातिर नए सिरे से शुरुआत करने को तैयार था पर रुचि से मिलने का मौका ही नहीं मिला था.
शाम को दफ्तर से लौटते वक्त बाजार की ओर चला गया. अचानक साडि़यों की दुकान पर रुचि नजर आई. लपक कर एक उम्मीद लिए अंदर घुसा, ‘हैलो रुचि, देखो, मैं तुम्हें कुछ समझाना चाहता हूं. मेरी बात सुनो.’
पर रुचि ने आंखें तरेरते हुए कहा, ‘मैं कुछ नहीं सुनना चाहती. तुम अपनी मनमानी करते रहे हो, अब भी करो. मैं वापस नहीं आऊंगी. और कभी मुझ से मिलने की कोशिश मत करना.’
‘ठीक है,’ नवीन को भी गुस्सा आ गया था, ‘मैं बच्चों से मिलना चाहता हूं, उन पर मेरा भी अधिकार है.’
‘कोई अधिकार नहीं है,’ तभी न जाने किस कोने से उस की मां निकल कर आ गई थी, ‘वे कानूनी रूप से हमारे हैं. अब रुचि का पीछा छोड़ दो. अपनी इच्छा से एक जाहिल, गंवार से शादी कर वह पहले ही बहुत पछता रही है.’
‘मैं रुचि से अकेले में बात करना चाहता हूं,’ उस ने हिम्मत जुटा कर कहा.
‘पर मैं बात नहीं करना चाहती. अब सबकुछ खत्म हो चुका है.’
उस ने आखिरी कोशिश की थी, पर वह भी नाकामयाब रही. उस के बाद कभी उस के घर, बाहर, कभी बाजार में भी खूब चक्कर काटे पर रुचि हर बार कतरा कर निकल गई.
नवीन अकसर सोचता, ‘छोटीछोटी अर्थहीन बातें कैसे घर बरबाद कर देती हैं. रुचि इतनी कठोर क्यों हो गई है कि सुलह तक नहीं करना चाहती. क्यों भूल गई है कि बच्चों को तो बाप का प्यार भी चाहिए. गलती किसी की भी नहीं है, केवल बेसिरपैर के मुद्दे खड़े हो गए हैं.
‘तलाक नहीं हुआ, इसलिए मैं दोबारा शादी भी नहीं कर सकता. बच्चों की तड़प मुझे सताती रहेगी. रुचि को भी अकेले ही जीवन काटना होगा. लेकिन उसे एक संतोष तो है कि बच्चे उस के पास हैं. दोनों की ही स्थिति त्रिशंकु की है, न वापस बीते वर्षों को लौटा सकते हैं न ही दोबारा कोशिश करना चाहते हैं. हाथ में आया पछतावा और अकेलेपन की त्रासदी. आखिर दोषी कौन है, कौन तय करे कि गलती किस की है, इस का भी कोई तराजू नहीं है, जो पलड़ों पर बाट रख कर पलपल का हिसाब कर रेशेरेशे को तौले.
वैसे भी एकदूसरे पर लांछन लगा कर अलग होने से तो अच्छा है हालात के आगे झुक जाएं. रुचि सही कहती थी, ‘जब लगे कि अब साथसाथ नहीं रह सकते तो असभ्य लोगों की तरह गालीगलौज करने के बजाय एकदूसरे से दूर हो जाएं तो अशिक्षित तो नहीं कहलाएंगे.’
रुचि को एक बरस हो गया था और वह पछतावे को लिए त्रिशंकु की भांति अपना एकएक दिन काट रहा था. शायद अभी भी उस निपट गंवार, फूहड़ और बेतरतीब इंसान के मन में रुचि के वापस आने की उम्मीद बनी हुई थी.
वह सोचने लगा कि रुचि भी तो त्रिशंकु ही बन गई है. बच्चे तक उस के खोखले सिद्धांतों व सनक से चिढ़ने लगे हैं. असल में दोषी कोई नहीं है, बस, अलगअलग परिवेशों से जुड़े व्यक्ति अगर मिलते भी हैं तो सिर्फ सामंजस्य के धरातल पर, वरना टकराव अनिवार्य ही है.
क्या एक दिन रुचि जब अपने एकांतवास से ऊब जाएगी, तब लौट आएगी? उम्मीद ही तो वह लौ है जो अंत तक मनुष्य की जीते रहने की आस बंधाती है, वरना सबकुछ बिखर नहीं जाता. प्यार का बंधन इतना कमजोर नहीं जो आवरणों से टूट जाए, जबकि भीतरी परतें इतनी सशक्त हों कि हमेशा जुड़ने को लालायित रहती हों. कभी न कभी तो उन का एकांतवास अवश्य ही खत्म होगा.
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अब तक पंडेपुजारी शादी की तारीख निकालने से ले कर शादी कराने तक का काम करते थे पर अब उत्तर प्रदेश सरकार यह काम कर रही है. शादी की तारीख सरकार के हिसाब से निकलेगी. अगर आप ने अपने पंडित द्वारा निकाले गए मुहूर्त के मुताबिक शादी कर ली तो ‘मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना’ का लाभ आप को नहीं मिलेगा. आप की अर्जी रद्द कर दी जाएगी.
उत्तर प्रदेश सरकार ने हर जिले में तकरीबन 10 हजार शादियां कराने का टारगेट रखा है. पूरे प्रदेश में 75 हजार शादियों के हिसाब से बजट बनाया गया है. ये शादियां नगरनिगम और ब्लौक लैवल पर होंगी.
सामूहिक शादी में सब से पहले आप को समाज कल्याण अधिकारी कार्यालय में जा कर अपने आधारकार्ड और आय प्रमाणपत्र के जरीए अर्जी देनी होगी. अर्जी के बाद अनुदान की प्रक्रिया शुरू होगी.
लखनऊ नगरनिगम के पास 28 जोड़ों ने सामूहिक विवाह के लिए अर्जी दी थी. पहले जनवरी महीने में सामूहिक विवाह की तारीख तय हुई. शादी में भी सरकारी लेटलतीफी चलने लगी. सरकार ने बाद में 9 मार्च को सामूहिक विवाह की तरीख तय की. शादी के लिए अर्जी देने वाले 11 जोड़ों ने 9 मार्च का इंतजार नहीं किया. उन सब ने पहले ही शादी कर ली. इन लोगों ने शादी के सरकारी मुहूर्त का इंतजार नहीं किया.
नगरनिगम ने ऐसे जोड़ों का नाम ‘मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना’ से बाहर कर दिया. ऐसे में ये लोग सरकारी विवाह योजना का लाभ नहीं ले पाए.
सरकारी मुहूर्त
‘मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना’ में लाभ लेने के लिए शादी करने वाले को अपने पंडित के बताए मुहूर्त पर नहीं सरकारी मुहूर्त के हिसाब से शादी करनी होगी. इस योजना में उन लोगों को ही शामिल किया जा सकेगा, जिस के शहरी परिवार की सालाना आमदनी 54,460 रुपए और गांवदेहात के परिवारों की आमदनी 46,080 रुपए सालाना होगी. आवेदक का खाता नैशनल लैवल के बैंक में होना चाहिए.
‘सामूहिक विवाह योजना’ में रिश्ता घर वालों को खुद तय करना होता है. उस के बाद शादी के लिए अर्जी देनी होगी. सरकार एक तय तारीख पर शादी की योजना तैयार करती है.
‘सामूहिक विवाह योजना’ में सरकार 35 हजार रुपए खर्च करेगी. इस में से 20 हजार रुपए लड़की के खाते में जाते हैं. 10 हजार रुपए का घरेलू सामान और 5 हजार रुपए का टैंट व भोजन में हुए खर्च के लिए दिया जाता है. इस का भुगतान शादी कराने वाली संस्था को किया जाता है. एक बार में जब 10 जोड़ों की एकसाथ शादी होगी, तब उस को ही ‘सामूहिक विवाह योजना’ ही माना जाएगा.
उत्तर प्रदेश समाज कल्याण विभाग के डायरैक्टर जगदीश प्रसाद ने कहा, ‘‘हर जिले में 10,000 शादियां कराने का टारगेट रखा गया है. इस की तादाद ज्यादा होने पर भी सरकार मदद करेगी. इस सामूहिक विवाह योजना का मकसद माली तौर से कमजोर परिवारों की लड़कियों की शादी कराना है.’’
इस योजना में सभी धर्मों के लोगों को शामिल किया गया है. लखनऊ में 9 मार्च को ‘सामूहिक विवाह योजना’ के तहत 8 मुसलिम जोड़ों ने भी अपने जीवनसाथी को चुना था.
पूरे उत्तर प्रदेश में चली ‘सामूहिक विवाह योजना’ में भ्रष्टाचार की शिकायतें भी आईं. शादी में दिए जाने वाले गहनों और बरतनों में क्वालिटी का खयाल नहीं रखा गया. ऐसे में घटिया किस्म के बरतन और जेवर दिए गए.
विधवा विवाह में…
विवाह की इस योजना में जहां 35 हजार रुपए खर्च करने हैं, वहीं विधवा और तलाकशुदा मामले में यह खर्च 25 हजार खर्च का ही बजट रखा गया है. विवाह संस्कार के लिए पहली बार वाली शादी में 10,000 रुपए का जरूरी सामान, जिस में कपड़े, बिछिया, चांदी की पायल और 7 बरतन दिए जाते हैं. विधवा और तलाकशुदा में यह सामान 5 हजार का रखा गया है.
इस योजना में शामिल हुए लोगों के लिए जरूरी है कि वे गरीब हों. कन्या के मातापिता उत्तर प्रदेश के मूल निवासी हों. अभिभावक निराश्रित, निर्धन और जरूरतमंद हों. विवाह का पंजीकरण और विवाह प्रमाणपत्र जारी करने का काम सहायक महानिबंधक स्टांप को करना है.
सरकार की योजना में सब से बड़ी खामी यह है कि जहां तलाकशुदा और विधवा विवाह को बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है वहीं दूसरी ओर इन को कम मदद दी जा रही है.
शादी में मुहूर्त की अपनी अलग अहमियत होती है. ‘सामूहिक विवाह योजना’ में सरकार एक दिन शादी के लिए तय करती है. ऐसे में कम लोग ही सरकारी मुहूर्त पर शादी करने को तैयार होते हैं. सरकारी सहायता लेने के लिए लोग अपने मुहूर्त के हिसाब से पहले शादी कर लेते हैं. इस के बाद सरकारी सामूहिक शादी योजना में शादी करने चले जाते हैं.
बिचौलियों की चांदी
सरकार का काम शादी कराना नहीं होना चाहिए. शादी योजना के जरीए सरकार पंडों वाला काम कर रही है. सरकार अब अपना दखल परिवारों के अंदर तक बढ़ाना चाहती है जिस से शादी, बच्चे, जन्म, मृत्यु सब पर सरकार का दखल रहे. परोक्ष रूप से पैसा पंडों को मिलता रहे.
इस योजना के जरीए शादी में बिचौलियों का रोल बढ़ रहा है जिस से सरकारी अमले और बिचौलियों की आमदनी शुरू हो रही है.
‘सामूहिक विवाह योजना’ में नाम शामिल कराने के लिए आय प्रमाणपत्र बनवाने से ही सरकारी अमले का शोषण शुरू हो जाता है. आय प्रमाणपत्र बनवाने के लिए तहसील जाना पड़ता है. वहां लेखपाल की रिपोर्ट के बाद आय प्रमाणपत्र मिलता है. इस के लिए पैसा देना पड़ता है.
हर जिले में एक सीमित तादाद में शादी के लिए जोड़ों का चयन किया जाता है. ऐसे में अर्जी देने के बाद अपना नाम लिस्ट में शामिल कराना मुश्किल काम होता है. सरकारी अमले के दखल में एक भी काम बिना किसी चढ़ावे के नहीं होता है.
‘सामूहिक विवाह योजना’ में धार्मिक रीतिरिवाजों के मुताबिक शादी होती है. ऐसे में बिना दहेज के होने वाली कोर्ट मैरिज को दरकिनार किया जा रहा है.
बेहतर होता कि बिना दहेज और आडंबर के शादी करने वालों को मदद दी जाती. वैसे, उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ‘मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना’ के जरीए पंडावाद को बढ़ावा दे रही है.
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नकदी की एक बार फिर कमी ने जनता की जान आफत में डाल दी है. एटीएमों के बाहर लाइनें लगने लगी हैं और व्यापार ढीला पड़ गया है क्योंकि नकदी की कमी में लेनदेन कम होने लगा है. जब लोगों को काम करने के बजाय लाइन में अपना ही पैसा निकालने के लिए खड़ा होने की मुसीबत झेलनी पड़े तो सरकार को कोसने के अलावा बचता ही क्या है. ‘नो कैश’ के बोर्डों का मतलब है ‘नो सरकार’.
नकदी की कमी का कारण वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक की गलती है. वित्त मंत्री लगातार कोशिश कर रहे हैं कि देश में सारा व्यापार, लेनदेन, जमा कैशलैस हो, चाहे इस से आम आदमी को जो मरजी कठिनाई हो. उन को लगता है कि अगर कैशलैस अर्थव्यवस्था होगी तो काला धन न होगा, बेईमानी न होगी.
वे यह याद ही नहीं रखना चाहते कि बैंकों के मारफत ही नीरव मोदी, मेहुल चौकसी, विजय माल्या जैसे बीसियों धन्ना सेठों ने पैसे निकाले ही नहीं, विदेश भी ले गए. कम नकदी असल में आम व्यापारी, किसान, मजदूर, छोटे कर्मचारी को परेशान करती है जिसे हर खर्च के लिए बैंक का मुंह ताकना पड़ता है.
जेब में नकदी हो तो सामान खरीदा और मामला खत्म. चैक, क्रैडिट कार्ड से खरीद का मतलब है कि महीने के आखिर तक इंतजार करो कि लेनदेन का ब्योरा आए और फिर एकएक खर्च को जांचो. कोई गड़बड़ी हो तो सिर धुनो, क्योंकि बैंक तो आप की सुनने वाला नहीं है. बैंक क्रैडिट कार्ड देते समय आप को लुभावने सपने दिखाएगा पर बाद में वह आप को दिन में तारे गिनवा देगा. कोई बैंक न अपने किसी अधिकारी का नाम बताने को तैयार होता है न नंबर.
कैश की कमी बताती है कि सरकार अब संभल ही नहीं रही है और देश धीरेधीरे अराजकता की ओर बढ़ रहा?है. यहां कैसे भी बलात्कार, मारपीट, जातीय झगड़ों का माहौल बन गया है. अच्छे दिन तो भूलिए, आम दिन भी दिख नहीं रहे.
आप का कैश आप का हक है. इसे किसी को जबरन रखने का हक नहीं है. सरकार हर बार आप को बैंकों के सामने कतार लगाने को मजबूर नहीं कर सकती. एक निकम्मी जनता ही इस तरह का अन्याय सह सकती है. जिस कौम को अपने ही लूट ले जाते हैं वह कभी भी देश को नहीं बना सकती, देश को नहीं बचा सकती. अगर जनता इस जबरन लूट पर चुप है तो इस का मतलब है कि वह बेजबान जानवरों की भीड़ ही है.
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आज के समय में सोशल मीडिया के जरिए लोग खुद को लाइमलाइट में रखते हैं. अक्सर ही बौलीवुड अभिनेत्रियां सोशल मीडिया पर खुद की हौट तस्वीरें और वीडियोज डालने से जरा भी नही कतराती. इसका एक कारण यह भी है कि इन अदाकाराओं को सुर्खियों में रहना पसंद है. आपने देखा होगा कि किस तरह से बौलीवुड अभिनेता संजय दत्त की बेटी त्रिशाला दत्त सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरों के माध्यम से अक्सर छाई रहती हैं. त्रिशाला आए दिन अपनी नई नई तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर करती रहती हैं.
त्रिशाला दत्त ने भले ही बौलीवुड में एंट्री नहीं की है. लेकिन उनकी पौपुलैरिटी सोशल मीडिया पर किसी स्टार से कम नहीं है. हाल ही में त्रिशाला दत्त ने समर लुक की एक तस्वीर इंस्टाग्राम पर शेयर की हैं. इस तस्वीर में वो व्हाइट टु पीस और नेट गाउन में नजर आ रही हैं. उनका ये तस्वीर काफी तेजी से वायरल हो रहा है. उन्होंने तस्वीर के साथ कैप्शन लिखा है, I can’t wait for summer.
फिट बौडी और बोल्ड अवतार के लिए जानी जाने वाली त्रिशाला को उनके ट्रान्सफौर्मेशन के बाद से काफी नोटिस की जाने लगा है. त्रिशाला दत्त को लेकर खबरें थीं कि जल्द संदय दत्त की बेटी बौलीवुड में डेब्यू कर सकती हैं. त्रिशाला को फैंस उनके बौलीवुड एंट्री का इंतजार कर रहे हैं. लेकिन इस एंट्री पर उनके पापा संजय दत्त ने रोक लगा रखी है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक संजय नहीं चाहते कि उनकी बेटी इस लाइन में आएं.
बता दें कि त्रिशाला संजय दत्त की पहली पत्नी रिचा शर्मा की बेटी हैं जो कि विदेश अपने नाना-नानी के साथ रहती हैं. त्रिशाला ने न्यूयौर्क के कौलेज औफ क्रिमिनल जस्टिस से अपनी ग्रेजुएशन पूरी की है. वहीं संजय दत्त और ऋचा शर्मा की बेटी त्रिशाला इस वक्त फैशन डिजाइनिंग में अपना हाथ आजमा रही हैं.
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एक लड़की और एक लड़का साइबर कैफे के काउंटर पर पहुंचे. लड़के की उम्र 18 से 20 साल के बीच की थी. लड़की ने दुपट्टे से अपना चेहरा ढक रखा था. लड़का भी कैप और बड़ा सा काला चश्मा लगाए हुए था.
काउंटर पर बैठे शख्स ने उन्हें देखा और पूछा, ‘‘कितने घंटे?’’
लड़का बोला, ‘‘एक घंटा.’’
इस के बाद लड़के ने अपनी जेब से सौ रुपए का एक नोट उसे थमाया और वह जोड़ा एक छोटे से कमरे में दाखिल हो गया और अंदर से किवाड़ बंद कर लिया.
काउंटर पर बैठे आदमी ने उस जोड़े से न तो पहचानपत्र लिया और न ही रजिस्टर में उन का नामपता दर्ज किया, जबकि आईटी ऐक्ट के तहत यह जरूरी है.
हर साइबर कैफे के नोटिस बोर्ड पर पहचानपत्र की फोटोकौपी जमा करने, पोर्न साइट नहीं देखने और न डाउनलोड करने की हिदायत लिखी रहती है, लेकिन उस पर शायद ही अमल किया जाता हो.
बिहार की राजधानी पटना समेत हर शहर में ज्यादातर साइबर कैफे में सैक्स का खेल धड़ल्ले से चल रहा है. अगस्त महीने में एक लड़की के साथ हुए गैंग रैप के मामले में एक साइबर कैफे को चलाने वाले अनिल कुमार की गिरफ्तारी हो चुकी है.
पटना में कंकड़बाग, एक्जिबिशन रोड, अशोक राजपथ, राजेंद्र नगर, राजा बाजार के तकरीबन 15 साइबर कैफे का मुआयना करने के बाद यह साफ हो गया कि कैफे संचालक रुपयों के लालच में साइबर कैफे के बंद केबिनों में रंगरलियां मनाने की खुली छूट दे रहे हैं.
आमतौर पर साइबर कैफे में एक घंटे की फीस 20 रुपए होती है, लेकिन जोड़े एक घंटे के लिए केबिन में बंद होने के सौ रुपए तक दे देते हैं.
पटना में तो पुलिस की सख्ती की वजह से ज्यादातर कैफे वालों ने केबिनों से दरवाजे और परदे तो हटा दिए हैं, पर बाकी शहरों में ऐसा नहीं हो सका है.
पटना कालेज में पढ़ने वाले एक प्रेमी जोड़े का दर्द है कि बड़े शहरों में तो प्रेमी जोड़े पार्कों, मैट्रो, मल्टीप्लैक्सों, सुपर मार्केट वगैरह में 2-3 घंटे साथ गुजार लेते हैं. लेकिन पटना जैसे छोटे शहरों में इस तरह की सुविधा नहीं है.
छोटा शहर होने की वजह से किसी न किसी गली, सड़क, मार्केट में जोड़ों के पहचान वाले या रिश्तेदार घूमते मिल जाते हैं. इस डर से प्रेमी बेखौफ हो कर साथ समय नहीं गुजार पाते हैं.
कुछ जोड़ों से पूछा गया कि पुलिस की रोक के बाद भी वे क्यों साइबर कैफे के केबिनों में बैठते हैं और उस में क्या करते हैं?
इस सवाल पर एक छात्र तैश में आ कर बोला कि लड़का और लड़की साइबर कैफे में जाते हैं, तो पुलिस को इस से क्यों एतराज है? यह जरूरी नहीं है कि साइबर कैफे में जाने वाला हर नौजवान जोड़ा प्रेम करने के लिए ही वहां जाता है. कई जोड़ों के घरों पर कंप्यूटर और इंटरनैट की सुविधा नहीं है, तो वे किसी इम्तिहान का नतीजा देखने, नौकरियों के बारे में पता करने या पढ़ाई से जुड़ी किसी भी तरह की जानकारी हासिल करने के लिए साइबर कैफे जाते हैं, पर पुलिस छापामारी के दौरान कैफे में मौजूद हर जोड़े को एक ही डंडे से हांकने लगती है.
इस बारे में पटना के सिटी एसपी चंदन कुशवाहा कहते हैं कि आईटी ऐक्ट (सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000) के तहत साइबर कैफे में सैक्स करने, सैक्स वीडियो या आपत्तिजनक सामग्री डाउनलोड या अपलोड करने पर कानूनी कार्यवाही की जाती है. इस ऐक्ट की धारा 78 के तहत इंस्पैक्टर लैवल के अफसर को जांच का हक मिला हुआ है. धारा 80 के तहत आईटी ऐक्ट का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ पुलिस को बगैर वारंट के किसी को गिरफ्तार करने या छापा मारने का अधिकार मिला हुआ है.
आईटी मामलों के जानकार मयंक बताते हैं कि आईटी ऐक्ट की धाराएं इतनी लचीली और पेचीदा हैं कि पुलिस किसी भी साइबर मामले को अपराध बता कर उस के खिलाफ कार्यवाही कर सकती है.
मगध महिला कालेज की बीए सैकंड ईयर की एक छात्रा पुलिस के इस रवैए पर तैश में कहती है कि पुलिस बड़े और खतरनाक अपराधियों को तो पकड़ नहीं पाती है, जिस की भड़ास वह साइबर कैफे या पार्कों में बैठे जोड़ों पर निकालती है.
अपराधियों को पकड़ने में अकसर नाकाम रहने वाली पुलिस साथ घूम रहे या पार्कों या कैफे में बैठे जोड़ों के साथ अपराधियों से भी बदतर सुलूक करती है. यह क्या गैरकानूनी नहीं है?
बालिग लड़का और लड़की अगर एकसाथ घूम रहे हैं, तो पुलिस को क्या परेशानी है? किसी पब्लिक प्लेस पर बैठ कर किसी तरह का भोंड़ा या भड़काऊ प्रदर्शन गैरकानूनी है. साइबर कैफे के केबिन में अगर कोई जोड़ा प्यार के गीत गा रहा हो, तो पता नहीं पुलिस को क्या परेशानी होने लगती है?
साइबर कैफे के केबिन में बैठना किसी भी नजर से गैरकानूनी नहीं है. आईटी ऐक्ट के तहत कैफे में बैठने वाले हर किसी से उस के पहचानपत्र की फोटोकौपी रिकौर्ड में रखना जरूरी है. अमूमन कैफे चलाने वाले लोगों से न तो उन के पहचानपत्र की फोटोकौपी लेते हैं और न ही उन का नामपता रजिस्टर में लिखते हैं.
रिटायर्ड पुलिस अफसर एके सिंह कहते हैं कि साइबर कैफे में आए हर आदमी से उस का पहचानपत्र लेना संचालक का काम है. अगर किसी का पहचानपत्र नहीं लिया गया है, तो इस के लिए संचालक खुद ही जिम्मेदार है, न कि ग्राहक. पैसों के लालच में संचालक पहचानपत्र नहीं लेते हैं.
पुलिस अफसरों का कहना है कि अपराधी किसी भी साइबर कैफे से किसी शख्स को जान से मारने की धमकी देने, रंगदारी वसूलने और किसी भी तरह के अपराध से जुड़ा ईमेल कर सकते हैं.
पहचानपत्र की फोटोकौपी और उन के आनेजाने का समय रिकौर्ड में नहीं रखने पर कैफे संचालक भी फंस सकते हैं. सभी तरह का रिकौर्ड रखने पर कैफे संचालक तो कानून के फंदे में फंसेंगे ही, साथ ही पुलिस को भी मुजरिम तक पहुंचने में आसानी होती है.
पुलिस ने सभी साइबर कैफे संचालकों को केबिन और परदे हटाने का आदेश दिया है, इस के बाद भी केबिन के अंदर और परदों के पीछे इश्कबाजी का खेल बेधड़क चल रहा है.
एक साइबर कैफे के स्टाफ ने बताया कि पुलिस साइबर कैफे के संचालकों को नियमकायदों पर अमल करने की घुट्टी तो पिलाती है, लेकिन करारे नोट की चमक के आगे खुद ही कानून को भूल जाती है. हर कैफे वाले को हर महीने ‘चढ़ावा’ चढ़ाने के लिए मजबूर किया जाता है और इस के लिए इलाके के हिसाब से ‘चढ़ावा’ भी फिक्स कर रखा है.
पहले मैं इस भरम में जीता था कि हर इनसान इज्जत के साथ अपनी जिंदगी बिताना चाहता है लेकिन बाद में मेरी इस सोच में बदलाव तब आया जब मुझे अपनी खुद की आंखों से बेइज्जती के साथ जीनेमरने की कसमें खाने वाले धुरंधरों के दर्शन करने का मौका मिला.
भारत की खोज बड़े ही मौज के साथ वास्को डी गामा ने की थी, लेकिन बेइज्जती के बोझ की खोज किस रोज और किस ने की थी, यह बता पाना उतना ही मुश्किल है जितना मुश्किल आम आदमी के लिए बिना रीचार्ज किए स्मार्ट फोन की बैटरी को पूरा दिन चलाना है.
कुछ लोग बेइज्जत होने को अपना बुनियादी हक मानते हैं और इसे पाने के लिए वे लगातार अपनी इज्जत को तारतार करते हुए इसी जद्दोजेहद में लगे रहते हैं. ‘बेइज्जती पिपासु’ लोगों को अपनी पूरी उम्र इज्जत की प्राणवायु हजम नहीं होती है. इज्जत भरी जिंदगी की इच्छा से ही ‘बेइज्जती प्रिय’ लोग सहम जाते हैं और इज्जत जैसी नुकसान पहुंचाने वाली और मारक चीज से उचित दूरी बना कर चलते हैं. बेइज्जत होना इन के लिए रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी जरूरतों में शुमार होता है.
बेइज्जती के नशेड़ी उलट हालात में भी बेइज्जती का हरण कर उस का वरण करने में कामयाब हो जाते हैं. आम का सीजन हो या केले का, ये लोग हमेशा से ही सरेआम बेइज्जती से गले मिलना पसंद करते हैं ताकि सार्वजनिक जिंदगी में ट्रांसपेरैंसी बनी रहे.
इसी ट्रांसपेरैंसी और ईमानदारी के चलते ये जल्द ही बेइज्जती के वामन रूप से विराट रूप धर लेते हैं. हर देश, काल और हालात में ‘बेइज्जती उपासक’ अपनी निष्ठा और निष्ठुरता से बेइज्जती हासिल कर ही लेते हैं.
बेइज्जती के इस धंधे में कभी मंदी नहीं आती है क्योंकि बेइज्जती में हमेशा नकद से ही आप का कद बढ़ता रहता है और उधार से बेइज्जती की धार कुंद होती चली जाती है.
विजय माल्या और नीरव मोदी ने भले ही बैंक से कर्ज ले कर बैंक को चूना लगा दिया हो, लेकिन देश से भाग कर, बेइज्जत होने की दौड़ में सब को पछाड़ कर ‘बेइज्जती उद्योग’ को चार चांद लगा दिए हैं.
कुछ लोगों में बेइज्जत होने का जुनून ही उन के सुकून की वजह होता है. बेइज्जती का घूंट वे कहीं से भी लूट लेते हैं. गलती से मिली इज्जत की वाह, इन की धमनियों में होने वाली बेइज्जती के नियमित बहाव को नहीं रोक पाती है.
बेइज्जती प्रदेश के मूल निवासी, चाहे अपने निवास पर हों या दूसरी किसी जगह के प्रवास पर, वे बेइज्जती की लौजिंग बोर्डिंग हमेशा अपने शरीर पर धारण किए रहते हैं.
इस प्रदेश के मूल निवासी हमेशा बेइज्जत होने के नएनए मौके और तरीके खोजने की कोशिश करते रहते हैं ताकि बेइज्जती की बोरियत से बचा कर इसे समाज की मुख्यधारा में लाया जा सके.
लगातार बेइज्जत होना भी एक ऐसी कला है जिसे आम आदमी के लिए अंजाम देना मुश्किल होता है. बेइज्जती के फील्ड में पेशेवर फील्डिंग करने वालों की कमी महसूस की जाती रही है.
डिमांड के मुकाबले सप्लाई न होने से बैलैंस गड़बड़ा रहा?है. लेकिन फिर भी देख कर संतोष और कुछकुछ होता है कि कुछ लोगों ने बेइज्जत होने को अपनी जिंदगी का मिशन और सहारा बना लिया है और वे बेइज्जती के सामने मुसाफिर की तरह ट्रैफिक के नियमों का पालनपोषण कर, इस रास्ते पर दांडी मार्च रहे हैं.
इन्हीं लोगों द्वारा उपजी क्वालिटी के चलते क्वांटिटी की कमी महसूस नहीं हो पाती है और क्वांटिटी की कमी के खिलाफ उठने वाली संगठित आवाज बेइज्जती के बोझ के नीचे दब जाती है.
बेइज्जती उद्योग में अभी भी बहुत उम्मीदें हैं जिन पर बेइज्जत हो कर गंभीरता से विचार करना जरूरी है. समाज के फायदे के लिए इस क्षेत्र में लोगों को बढ़ावा देने की जरूरत है क्योंकि आज की गलाकाट होड़ में जहां लोगों को इज्जत और नाम के लिए दरदर भटकने के बाद भी बेइज्जती ही हाथ लगती है, वहीं अगर उन्हें सीधे ही बेइज्जत होने के लिए बढ़ावा दिया जाए तो उन का यह भटकाव काफी हद तक कम होगा और नतीजतन समाज में इज्जत पाने की अंधी दौड़ में भागने वाले, उसेन बोल्ट जैसे धावक की आवक भी कम हो जाएगी.
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अदाकारा शिल्पा शिंदे और कौमेडियन सुनील ग्रोवर इन दिनों कौमेडी शो ‘धन धना धन’ से दर्शकों को गुदगुदा रहे हैं. इसी बीच शिल्पा और सुनील के बीच फिल्माया गया रोमांटिक डांस वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं. बता दें कि सैफ अली खान-रानी मुखर्जी की फिल्म ‘हम-तुम’ के टाइटल ट्रैक ‘सांसों को सांसों में’ पर ये दोनों रेन डांस करते हुए नजर आ रहे हैं.
वीडियों में लाल रंग की शिफौन साड़ी और हल्टर नेक ब्लाउज में शिल्पा काफी ग्लैमरस नजर आरही हैं. तो वहीं काले रंग के कपड़ो में सुनील ग्रोवर काफी स्मार्ट और रोमांटिक अंदाज में दिख रहे हैं.
आपको याद होगा कि रानी और सैफ ने किस तरह से ‘सांसों को सांसों में’ गाने पर रोमांटिक डांस किया था. उनके बीच की केमेस्ट्री आज भी हमारे दिमाग में है. ठीक इसीतरह सुनील और शिल्पा के बीच की केमेस्ट्री भी जबरदस्त है. शिल्पा के एक्सप्रेशन कमाल के हैं.
गौरतलब है कि शिल्पा और सुनील का नया कौमेडी शो ‘धन धना धन’ क्रिकेट पर आधारित शो है. शो में सुनील ग्रोवर प्रोफेसर एलबीडब्ल्यू तो वहीं शिल्पा गुगली भाभी के रोल में न
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