इस नये गाने में ब्वौयज ट्रेंड को बदलते दिखीं सोनम और करीना

बौलीवुड एक्ट्रेस सोनम कपूर, करीना कपूर, स्वरा भास्कर और शिखा तल्सानिया की मोस्ट अवेटेड फिल्म ‘वीरे दी वेडिंग’ का पहला गाना रिलीज हो गया है. पहले फिल्म के ट्रेलर ने ही दर्शकों के बीच अलग तरह का माहौल बना दिया, जिसके बाद अब फिल्म के इस पहले गाने ‘तारीफां’ में भी सोनम और करीना ब्वौयज ट्रेंड को बदलते हुए नजर आ रही हैं. दरअसल, फिल्म का ट्रेलर काफी बोल्ड है और ट्रेलर में दर्शकों को कई सारी गालियां भी सुनने को मिल रही हैं. जिसके बाद अब इस गाने में चारों लड़कियां अपना बोल्ड लुक दिखा रही हैं.

हालांकि, यह गाना एक और तरह से भी अलग है. जब आप इस गाने की वीडियो देखेंगे तो इसमें आपको दिखेगा कि किस तरह से चारों लड़कियों के आस पास लड़के नजर आ रहे हैं. देखा जाए तो यह एक आइटम सौन्ग की तरह ही है लेकिन बौलीवुड फिल्मों में अब तक हर आइटम सौन्ग में लीड एक्टर के इर्द गिर्द कई सारी लड़कियां नजर आती रही हैं. जबकि इस गाने में लड़कियों के इर्द गिर्द लड़के दिख रहे हैं. हालांकि, वीडियो में आपको सोनम, करीना, स्वरा और शिखा का अंदाज पसंद आने वाला है.

वहीं अगर गाने के लिरिक्स और म्यूजिक की बात करें तो यह आपको ज्यादा मजेदार नहीं लगेगा. फिल्म के इस गाने को बदाशाह ने गाया है. बता दें, इस फिल्म का निर्देशन सोनम कपूर की बहन रिया कपूर ने किया है और यह फिल्म 1 जून को रिलीज होगी. इस फिल्म से करीना कपूर इंडस्ट्री में कमबैक करने वाली हैं

VIDEO : हॉलीवुड सेलेब्रिटी सिंगर सेलेना गोमेज़ लुक

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

पकौडों का सैंपल फेल

दोस्तो, मुझे पकौड़े बनाने का कोई तजरबा नहीं है. मैं ने तो कभी घर में भी पकौड़े नहीं बनाए थे. पर जब सरकार ने कहा है कि पकौड़ों में लखपति बनाने की ताकत है तो मैं ने सरकार के पकौड़ों का हिस्सा होने के लिए आव देखा न ताव, घर के स्टोर से टूटीफूटी कड़ाही निकाली, दादा के वक्त का कैरोसिन का चूल्हा साफ किया और एक परात में बेसन के बदले मक्के का आटा, नमक, मिर्च पता नहीं किस के स्वाद के हिसाब से मिला, सड़े आलू काट अपने महल्ले के किनारे की सरकारी जमीन पर शान से पकौड़ा भंडार खोल दिया और उस का नाम रखा ‘सरकारी पकौड़ा भंडार’. पकौड़ों के उस भंडार का नाम सरकारी था इसलिए किसी भी सरकारी मुलाजिम की मुझ से यह पूछने की हिम्मत न हुई कि सरकारी जमीन पर पकौड़ा भंडार क्यों खोला? मुझे पता था कि कोई सरकारी मुलाजिम सब से पंगा ले सकता है पर अपनी सरकार के बंदों से नहीं.

दोस्तो, सरकारी जमीन पर सरकारी नाम का पकौड़ा भंडार नहीं खुलेगा, तो क्या अपने घर में खुलेगा? सरकार के नाम की दुकानें सरकार की गैरकानूनी तौर पर कब्जाई जगह पर ही खुल कर शोभा पाती हैं. नियमानुसार सरकारी जमीन पर सरकारी बंदे ही कब्जा कर सकते हैं. आम आदमी सरकारी जमीन पर कब्जा करना तो दूर, उस ओर देखने की भी हिम्मत करे तो उस की आंखें निकाल दी जाएं.

अपने पकौड़ा भंडार का ‘सरकारी पकौड़ा भंडार’ नाम रखने के चलते सब ने यही सोचा कि मैं सरकार का राइट नहीं तो लैफ्ट हैंड जरूर हूं, बल्कि थानेदार साहब ने तो मेरे कच्चे पकौड़ों की तारीफ करते हुए मेरी पीठ थपथपा कर यहां तक कह डाला कि ‘सरकारी पकौड़ा भंडार’ के लिए फर्नीचर की जरूरत हो तो बता देना. आधे रेट में दिलवा दूंगा. अगर कोई विपक्ष वाला मेरे ‘सरकारी पकौड़ा भंडार’ की ओर आंख उठा कर भी देखे तो वह थानेदार उस की आंख तो आंख, आंत तक निकाल कर हाथ में दे देगा.

हफ्तेभर में ही सरकार के पकौड़ों के साथ अपने अधकच्चे, अधपके पकौड़ों का कदमताल करवाने का यह फायदा हुआ कि हर कोई अपने को सरकारी पकौड़ों का ग्राहक बताने के चक्कर में मेरे पकौड़ों को बिन दांतों के भी चटकारे लेले कर अपने पेट में धकियाता रहा. सब को यही लगता रहा कि जैसे वे मेरे पकौड़े नहीं, बल्कि सरकार के पकौड़े खा रहे हों. मुझ से किसी की यह भी कहने की हिम्मत नहीं हुई कि पकौड़ों में नमक नहीं है, पकौड़ों में मिर्च ज्यादा है. मैं देखते ही देखते सरकारी पकौड़ों का अहम हिस्सा हो गया. विपक्ष वाले भी अपने को सरकार का हिस्सा साबित करने के बहाने अपने मुंह पर नकाब लगाए आते और मेरे पकौड़ों को सरकारी पकौड़ों का हिस्सा मान कर अपने को सरकार के बंदे घोषित करवा कर चुपचाप पकौड़े खा जाते.

चटनी की जगह पानी होता तो उसे भी चटकारे लेले पीते. यह सरकार की मुहर का प्रोडक्ट भी बड़ा अजीब होता है दोस्तो, सरकार के प्रेमी उसे यों चाटते हैं कि… मैं मजे से बेखौफ हो कर जितना मन करता, पकौड़ों में बेसन के बदले मक्के का आटा मिला देता. तेल हुआ तो हुआ, वरना खाली कड़ाही में ही पकौड़े तल दिए. महीनेभर से इसी तरह सरकारी पकौड़ों के नाम पर जनता को ठगने का अपना काम बुलंदियों पर था. सौ ग्राम के बदले 75 ग्राम तोलो तो भी कोई पूछने वाला नहीं. सरकार अपनी, तो तराजू भी अपनी. सरकार अपनी, तो मिर्च भी अपनी. सरकार अपनी, तो सड़े आलू भी अपने. सब मजे से ठीकठाक चल रहा था कि पता नहीं कहां से एक हाथी पर, दूसरा साइकिल पर, तो तीसरा दिन में ही लालटेन जलाए अपने को सैंपल भरने वाले बता कर आ धमके.

सैंपल भरने वाले पहले भी आते थे पर ‘सरकारी पकौड़ा भंडार’ का मुकुट मेरी दुकान के माथे पर लगा पढ़ दुम दबाए माफी मांगते आगे हो लेते थे. सैंपल भरने वालों में से एक ने मेरी सरकारी पकौड़ों की परात को घूरते हुए पूछा, ‘‘यह क्या है?’’

‘‘सरकारी पकौड़े हैं और क्या…’’ मैं ने गुर्राते हुए कहा. ‘‘कच्चे? जनता को बीमार करना है क्या?’’ ‘‘जनता तो जन्मजात ही बीमार है सर, इसलिए इस व्यवस्था में उस के सेहतमंद होने की सोचना भी फुजूल है. अब रही बात मेरे पकौड़ों की, तो सरकारी मुहर और नाम वाले पकौड़े चाहे कैसे भी हों, वे पके ही होते हैं. हर कोण से सेहत के लिए बढि़या ही होते हैं,’’ मैं ने सरकार के पक्ष में कहा, पर फिर भी वे चुप न हुए.

मन किया सरकार को फोन लगा दूं कि ये बेतुके से सैंपल भरने वाले कहां से भेज दिए आप ने जो सरकारी मुलाजिम होने के चलते सरकार के ‘मेड इन इंडिया’ पकौड़ों पर ही सवाल उठा रहे हैं. ‘‘पकौड़ों के नाम पर जनता को ठगते हो?’’ लालटेन वाले ने मुंह में पकौड़ा डाल कर मुंह बिचकाते हुए पूछा.

‘‘सर, लुट चुकी जनता का अब और क्या ठगना…’’ मैं ने दोनों हाथ जोड़े कहा तो साइकिल पर बैठा सैंपल भरने वाला नीचे उतरा और बोला, ‘‘अब ये पकौड़े नहीं चलेंगे,’’ फिर उस ने हाथी पर से पकौड़ों की क्वालिटी चैक करने वाली मोबाइल किट निकाली और उस में 2 सरकारी पकौड़े डाले.

5 मिनट तक वह उस किट में उन पकौड़ों को हिलाता रहा. उस के बाद पकौड़ों का घोल देख कर उस ने कहा, ‘‘पकौड़ों का सैंपल फेल…’’ ‘‘पर सर, ये मेरे निजी नहीं, सरकारी पकौड़े हैं.’’

‘‘होते रहें. बहुत खिला लिए जनता को कच्चे, मिलावटी पकौड़े. कल से पकौड़ों की दुकान बंद.’’ ‘‘तो मेरा क्या होगा साहब?’’

‘‘सरकार की जनता को उल्लू बनाने वाली अगली स्कीम का इंतजार करो,’’ उन में से एक ने कहा और वे तीनों मदमाते आगे हो लिए.

VIDEO : हॉलीवुड सेलेब्रिटी सिंगर सेलेना गोमेज़ लुक

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

सावित्रीबाई फुले : भाजपा की मायावती

चुनावी साल में नेताओं को वोट पाने के लिए जुगाड़ करना जरूरी हो जाता है. यही वजह है कि धर्म और जाति के मुद्दे हावी हो जाते हैं.

‘दलित ऐक्ट’ पर हुए प्रदर्शन को विपक्षी दलों ने हथियार बनाना शुरू किया तो भाजपा ने अपनी पार्टी के दलित सांसदों को भी मुखर होने का संकेत दे दिया.

दलित ऐक्ट पर बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने यूटर्न तभी ले लिया था जब वे उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं.

‘दलित ऐक्ट’ को मुद्दा बनते देख भाजपा ने अपनी रणनीति को बदल दिया है. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस के नेता सरदार वल्लभभाई पटेल को अपने पाले में लिया था. लगता है कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने संविधान निर्माता डाक्टर भीमराव अंबेडकर को अपने साथ रखने की योजना बनाई है. अगले एक साल के दौरान वह डाक्टर भीमराव अंबेडकर को महिमामंडित करेगी.

विरोधी दलों की परेशानी यह है कि उन्होंने आम दलितों की कभी चिंता नहीं की. जिस मनुवाद की बुराई होती है, दलित धीरेधीरे उसी मनुवाद की पूजा पद्धति से जुड़ गए.

दलितों की अगुआई करने वाले दल भी उन को यह बताने में पिछड़ गए कि इसी पूजा और जाति की सोच से उन को गैरबराबरी का दर्जा मिला है. जातीय भेदभाव केवल अगड़ों और दलितों के बीच ही नहीं है, बल्कि दलितों में आपस में भी ऐसे बहुत सारे भेदभाव हैं.

‘दलित ऐक्ट’ में बदलाव को ले कर हुए विरोधप्रदर्शन और उस के बाद शुरू हुई राजनीति में भाजपा के सांसद उदित राज, अशोक कुमार दोहरे और सावित्रीबाई फुले की नाराजगी को बसपा नेता मायावती ने निजी फायदे की राजनीति और मौकापरस्ती बताया है.

भाजपा के सांसद कौशल किशोर ने आरोप लगाया कि मायावती केवल दलितों को अपना वोट बैंक समझती हैं. वे खुद कांशीराम और डाक्टर अंबेडकर की नीतियों से दूर हो चुकी हैं.

भाजपा दलित नेताओं को आगे कर के ‘दलित ऐक्ट’ पर हो रही राजनीति पर खुद का बचाव कर रही है. सावित्रीबाई फुले की ‘भारतीय संविधान और आरक्षण बचाओ महारैली’ के बाद भाजपा उत्तर प्रदेश में मुखर हो कर दलित मुद्दों पर बात कर रही है. भाजपा उन में मायावती की इमेज देख रही है.

सावित्रीबाई फुले भगवा से दिखने वाले कपड़े ही पहनती हैं जिस की वजह से हिंदुत्व की छाप भाजपा को अच्छी लग रही है. यह बगावत नहीं है. यह तरकीब है कि दलित भाजपा में ही बने रहें, यह सोच कर कि भाजपा उन के हितों का ध्यान रखेगी.

रूढि़वादी सोच के खिलाफ

सावित्रीबाई फुले भी रूढि़वादी सोच से पीडि़त रही हैं. इन्हीं वजहों से ऊब कर उन्होंने संन्यास लिया था. वे जो भगवा कपड़े पहनती हैं, उन्हें वे हिंदू धर्म से न जोड़ कर बौद्ध से जोड़ती हैं. वैसे वे बसपा प्रमुख मायावती को अपना रोल मौडल मानती हैं.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ‘नमो बुद्धाय जन सेवा समिति’ के तत्त्वावधान में आयोजित ‘भारतीय संविधान और आरक्षण बचाओ महारैली’ में सावित्रीबाई फुले शामिल हुईं, तो ऐसा लगा जैसे वे केंद्र सरकार के खिलाफ कुछ बोलेंगी. पर उन्होंने भाजपा या केंद्र्र सरकार के खिलाफ  कुछ भी नहीं बोला.

सावित्रीबाई फुले भाजपा के साथ रहें या अलग, वे डाक्टर अंबेडकर के बहाने दलित तबके को अपने साथ करने में जितना कामयाब होंगी बसपा का उतना नुकसान होगा.

भाजपा की पहली रणनीति यही है कि सपाबसपा के गठबंधन में दलित वोटों को जितना भी तोड़ा जा सके, तोड़ लिया जाए.

सावित्रीबाई फुले दलित हैं, औरत हैं, दलित मुद्दों को ले कर मुखर हैं, उन को जानकारी है, वे अच्छा भाषण दे लेती हैं. भाजपा के लिए सब से अहम बात यह है कि वे भी भगवा कपड़े पहनती हैं. भगवा कपड़े पहनने का अर्थ है कि दलित भगवा पहनने वालों को जैसेतैसे चढ़ावा चढ़ाते रहें.

सावित्रीबाई फुले मनुवाद पर हमला कर रही हैं पर भाजपा पर वे चुप हैं. भाजपा के ही टिकट से वे पहले विधायक, बाद में सांसद चुनी गईं. साल 2012 से ले कर अब तक वे विधानसभा और लोकसभा की सदस्य रही हैं. इस दौरान उन की ओर से मनुवाद की बात सामने नहीं रखी गईं.

साल 2019 के लोकसभा चुनाव और सपाबसपा गठबंधन की आहट के बाद जिस तरह से उन्होंने मनुवाद के खिलाफ बोलना शुरू किया उस से साफ हो गया कि दलित वोट को ध्यान में रख कर किसी बड़ी योजना पर काम हो रहा है.

सावित्रीबाई फुले दलित वोट को भाजपा के पक्ष में भले ही न लाएं पर अगर वे बसपा के वोट काटने में कामयाब रहीं तो भाजपा की योजना कामयाब हो जाएगी.

भाजपा की यह नीति साफसाफ पौराणिक है जिस में ब्राह्मणवाद की खिलाफत करने वाले को खुद देवता घोषित कर दिया जाता है. भाजपा ने इसी के चलते अंबेडकर को बेचना शुरू किया और सरदार पटेल को अपनाया है.

कुरीतियों से लड़ाई

सावित्रीबाई फुले बहराइच जिले की बलहा सुरक्षित विधानसभा सीट से विधायक हैं. उन के पिता रेलवे में मुलाजिम हैं. जब वे 6 साल की थीं तब उन की शादी कर दी गई थी. वे बड़ी हुईं तो शादी का मतलब पता चला. तब तक वे दूसरा रास्ता तय कर चुकी थीं. उन्होंने अपनी बहन की शादी अपने पति से करा दी और खुद समाजसेवा के कामों में लग गईं. वे कभी भी शादी न करने का फैसला ले चुकी हैं.

सावित्रीबाई फुले क्योंकि मायावती को अपना रोल मौडल मानती हैं, इस पर वे बताती हैं, ‘‘उस समय मैं 8वीं क्लास में पढ़ रही थी. अच्छे नंबरों से पास होने के चलते मुझे 480 रुपए की छात्रवृत्ति मिली थी. स्कूल के टीचर ने छात्रवृत्ति न देने के लिए कक्षा 9वीं जमात में मुझे दाखिला नहीं लेने दिया.

‘‘उस समय उत्तर प्रदेश में बसपा की सरकार थी. मायावती मुख्यमंत्री थीं. मैं उन से मिली और अपनी परेशानी बताई.

‘‘मायावती ने शिक्षा विभाग के अफसर से कह कर न केवल पैसे दिलवाए बल्कि मेरा दाखिला भी स्कूल में कराया. इस के बाद मैं मायावती के कार्यक्रमों में जाने लगी. साल 2000 में मैं बसपा से अलग हो कर भाजपा में शामिल हो गई.’’

सावित्रीबाई फुले गरीब औरतों की तरक्की के लिए नानपारा, बहराइच में ‘अक्षम जनसेवा आश्रम’ चलाती हैं. इस के अलावा वे ‘सखी समाज उत्थान सेवा समिति’ भी चलाती हैं, जिस में एक लाख, 65 हजार औरतें सदस्य हैं.

वे बताती हैं, ‘‘मेरा पूरा समय इन लोगों के बीच ही बीतता है. कोई भी कभी भी मुझ से मिल सकता है. मैं गांव के विकास पर पूरा ध्यान देती हूं.

‘‘मेरा मानना है कि गांव, गरीब और किसान का भला जिस दिन हो जाएगा, समाज खुशहाल हो जाएगा.

‘‘मेरा प्रयास लड़कियों की शिक्षा पर ज्यादा रहता है. लड़कियां पढ़ें और आगे बढ़ें, इस के लिए मैं उन की हर तरह से मदद करने को तैयार हूं. अपने क्षेत्र के लोगों से मिलने और उन की परेशानियों से निबटने के लिए भी मैं हमेशा तैयार रहती हूं.’’

सांसद बनने के बाद सावित्रीबाई फुले ने अपनी ही पार्टी के खिलाफ मोरचा खोल दिया. वे कहती हैं, ‘‘हम पार्टी का विरोध नहीं कर रहे, पर आरक्षण और दलित हितों के मुद्दों पर कोई समझौता नहीं कर सकते.

‘‘जहां जैसी जरूरत पड़ेगी वहां अपनी बात रखते रहेंगे. मायावती को दलितों की बेहतरी के लिए बहुत अच्छा मौका मिला था, पर वे उस का फायदा नहीं उठा पाईं.’’

VIDEO : हॉलीवुड सेलेब्रिटी सिंगर सेलेना गोमेज़ लुक

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

इज्जत, हक और हिंसा

2 अप्रैल, 2018 को देशभर में खासतौर से हिंदीभाषी राज्यों में जो हिंसा हुई वह हर लिहाज से चिंता वाली बात है. दरअसल, 20 मार्च, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए फैसले में कहा था कि एससीएसटी ऐक्ट के तहत अब किसी आरोपी को तुरंत गिरफ्तार नहीं किया जा सकता और उसे अग्रिम जमानत का हक भी दिया जाता है.

इस फैसले से दलित समुदाय में गुस्सा फैलना कुदरती बात थी तो इस की अपनी वजहें भी हैं, लेकिन हिंसा के बाद 3 अप्रैल, 2018 को केंद्र सरकार की अपील पर सुप्रीम कोर्ट दोबारा इस मामले पर सुनवाई के लिए राजी हुआ तो कई अहम बातें खुल कर सामने आईं.

हिंसा से थर्राई केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से गुजारिश की थी कि वह अपने पुराने फैसले पर स्टे लगाए. इस बाबत केंद्र सरकार की तरफ से अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने जो दलीलें रखीं उन के सुप्रीम कोर्ट के जजों यूयू ललित और एके गोयल की बैंच ने तुरंत सटीक जवाब दिए.

सवालजवाब

केके वेणुगोपाल : कोर्ट के फैसले से देशभर के दलित नाराज हैं. दंगों में 10 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. कोर्ट अपने फैसले पर अंतरिम रोक लगाए.

कोर्ट : हम एससीएसटी ऐक्ट के खिलाफ नहीं हैं. पर यह देखना होगा कि बेगुनाह को सजा न मिले. सरकार क्यों चाहती है कि लोग बिना जांच के गिरफ्तार कर लिए जाएं? अगर सरकारी कर्मचारी पर कोई आरोप लगाएगा तो वह कैसे काम करेगा? हम ने एससीएसटी ऐक्ट नहीं बदला है बल्कि सीआरपीसी की व्याख्या की है.

केके वेणुगोपाल : अदालत के 20 मार्च के फैसले से एससीएसटी ऐक्ट कमजोर हुआ है. तत्काल गिरफ्तारी पर रोक से पुलिस मामले को टालेगी. मामले दर्ज ही नहीं होंगे.

कोर्ट : झूठी शिकायत पर कोई बेगुनाह जेल नहीं जाना चाहिए. जेल जाना भी एक सजा है. संविधान के अनुच्छेद 21 में मिले जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार पर विचार करते हुए बेगुनाहों को बचाने के लिए कोर्ट ने फैसला दिया है.

केके वेणुगोपाल : लेकिन एसीएसटी ऐक्ट के इंतजामों में किसी गाइडलाइन की जरूरत ही नहीं है.

कोर्ट : इस कानून में आरोपों की पुष्टि मुश्किल है, इसलिए गाइडलाइन जारी की.

केके वेणुगोपाल : पीडि़तों को मुआवजा भी एफआईआर दर्ज होने पर ही मिलता है. एफआईआर नहीं होगी तो मुआवजा नहीं दे पाएंगे.

कोर्ट : पीडि़त बेहद जरूरतमंद हैं तो एफआईआर के बिना भी जिला मजिस्ट्रेट उसे मुआवजा दे सकता है.

केके वेणुगोपाल : कोर्ट ने जो 7 दिन का समय दिया है उस दौरान पीडि़त को धमकाया भी जा सकता है.

कोर्ट : 7 दिन का समय अधिकतम है. यह नहीं कहा कि जांच 7 दिन में ही पूरी करनी है. यह 15 मिनट, आधा घंटा या एक दिन में भी पूरी हो सकती है.

केके वेणुगोपाल : यह ऐक्ट पहले से ही मजबूत है. इस में बदलाव की जरूरत नहीं है.

कोर्ट : सब से बड़ी खामी यह है कि इस ऐक्ट में अग्रिम जमानत का इंतजाम ही नहीं है. जमानत हर आरोपी का हक है. अगर किसी को जेल भेजते हैं और बाद में वह बेगुनाह साबित होता है तो उस के नुकसान की भरपाई नहीं कर सकते. आंकड़े बताते हैं कि कानून का अकसर बेजा इस्तेमाल होता है.

केके वेणुगोपाल : कई मामलों में बेजा इस्तेमाल का पता चला है, पर उस की बिना पर कानून में बदलाव जरूरी नहीं है.

कोर्ट : क्या किसी बेगुनाह को सुने बिना जेल भेजा जाना सही है? अगर किसी सरकारी मुलाजिम के मामले में ऐसा होता है तो वह काम कैसे करेगा? कानून सजा की बात करता है. गिरफ्तारी जरूरी नहीं.

यह अकेला ऐसा कानून है जिस में किसी को कानूनी इलाज नहीं मिलता. मामला दर्ज होते ही आदमी को तुरंत गिरफ्तार कर जेल भेज देते हैं. झूठे इलजाम लगा कर किसी की आजादी छीनने का हक किसी को नहीं दे सकते.

कार्यवाही का सार

एक तरह से केके वेणुगोपाल ने अदालत के सामने वे सारी दलीलें पेश कर दीं जो शक या डर बन कर दलितों के मन में उमड़घुमड़ रही थीं. पर अदालत ने इन दलीलों से कोई इत्तिफाक न रखते हुए सारा ध्यान बेगुनाहों की गिरफ्तारी पर रखा तो साफ है कि इंसाफ तो हुआ है, पर वह कानूनी लैवल पर ही हुआ है.

society

खुली अदालत में चली इस कार्यवाही में कहीं भी दलितों की बदतर हालत का जिक्र नहीं हुआ और न ही यह सच सामने आया कि दबंग उन पर आज भी कैसेकैसे कहर ढाते हैं.

सरकार चाह रही थी कि 2 अप्रैल, 2018 की हिंसा के मद्देनजर अदालत अपना 20 मार्च, 2018 का फैसला रद्द कर दे, लेकिन उस के पास इस बाबत सटीक दलीलें नहीं थीं.

मामला जिस ने ऐक्ट बदला

इस सारे बवंडर की वजह महाराष्ट्र का एक मामला था. शिक्षा विभाग के एक दलित स्टोरकीपर ने महकमे के डायरैक्टर सुभाष काशीनाथ महाजन के खिलाफ यह रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि वे अपने उन 2 मातहतों के खिलाफ कार्यवाही में अड़ंगा डाल रहे हैं जिन्होंने उस की सीआर यानी गोपनीय रिपोर्ट में जातिसूचक बात कही थी.

नियम के मुताबिक पुलिस ने सुभाष महाजन से इन दोनों आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही के लिए इजाजत मांगी तो उन्होंने इजाजत देने से मना कर दिया.

इस अफसर की दलील थी कि अगर किसी अनुसूचित जाति के मुलाजिम के खिलाफ ईमानदारी से बात करना गुनाह हो जाएगा तो इस से काम करना मुश्किल हो जाएगा. इस पर पुलिस ने उन के खिलाफ भी मामला दर्ज कर लिया.

5 मई, 2017 को सुभाष महाजन ने हाईकोर्ट की पनाह ली. हाईकोर्ट ने उन के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की राह पकड़ी.

20 मार्च, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने इस अफसर के खिलाफ एफआईआर हटाने का आदेश दिया और अपने फैसले में यह इंतजाम भी किया कि अब एससीएसटी ऐक्ट में तुरंत गिरफ्तारी नहीं होगी और इस ऐक्ट के तहत दर्ज होने वाले मामलों में अग्रिम जमानत भी मिलेगी. पुलिस को 7 दिन में इस ऐक्ट के तहत दर्ज मामलों की जांच करनी होगी और किसी सरकारी अफसर की गिरफ्तारी के लिए महकमे के मुखिया से इजाजत लेनी पड़ेगी. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी जोड़ा था कि जांच डीएसपी लैवल का कोई अफसर ही करेगा.

कितना असरदार ऐक्ट

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला वाकई चौंका देने वाला था. एससीएसटी ऐक्ट यानी अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम साल 1989 में बना था, तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी.

इस ऐक्ट में साफतौर पर इंतजाम था कि दलितआदिवासियों को जातिगत संबोधनों से बेइज्जत करने वालों, गालीगलौज और मारपीट करने वालों, दलित दूल्हों को घोड़ी पर न बैठने देने वालों, उन्हें सार्वजनिक जगहों से पानी न भरने देने वालों और दूसरे जुल्म करने वालों पर कानूनी शिकंजा कसा जाना जरूरी है. आरोपियों की तुरंत गिरफ्तारी और अग्रिम जमानत न देने के इंतजाम इस ऐक्ट में किए गए थे जिस के पीछे मंशा यह थी कि अगर आरोपी, जो आमतौर पर दबंग होता है, गिरफ्तार नहीं हुआ तो वह पीडि़तों को और डराएगा और समझौते के लिए दबाव डालेगा.

तब इस ऐक्ट का दलित समुदाय ने स्वागत किया था क्योंकि यह उन की इज्जत और गैरत का बचाव करता हुआ था. देखते ही देखते इस ऐक्ट के तहत मामले दर्ज होने लगे और दलितों पर कहर ढाने वालों की शामत आ गई.

मगर हर कानून की तरह इस में भी कुछ खामियां थीं. पीडि़त को मुआवजा मिलने के इंतजाम इस में हैं. लिहाजा 90 के दशक में ही झूठे मामले भी सामने आने लगे और कई मामले ऐसे भी सामने आए जिन में दलितों ने ऊंची जाति वालों को फंसाने की गरज से झूठी रिपोर्टें दर्ज कराना शुरू कर दी थीं. लेकिन इस ऐक्ट का अच्छा असर यह भी हुआ कि दबंग पहले की तरह दलितों को सताने से डरने लगे थे.

इस का मतलब यह नहीं था कि दलितों पर जोरजुल्म कम हो गए थे. वे बदस्तूर जारी थे और हर जगह थे. रिपोर्ट दर्ज होने के बाद गिरफ्तारियां होती थीं, कुछ दिनों बाद आरोपियों को जमानत मिल जाती थी और फिर मामला अदालत में चलता रहता था. कुछेक मामलों में आरोपियों को सजा भी होती थी. पर ज्यादातर में वे छूट जाते थे. वजह, आरोप का साबित न होना, कुछ लेदे कर समझौता हो जाना और दलितों पर दबाव भी रहता था.

मौजूद ताजा आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2016 में एससीएसटी ऐक्ट के तहत दर्ज मामलों की तादाद 47,370 थी. उन में से तकरीबन 70 फीसदी में ही कार्यवाही हुई और 26 फीसदी आरोपियों को सजा हुई.

ये आंकड़े इस बात की तो गवाही देते हैं कि इस ऐक्ट का बेजा इस्तेमाल वाकई होने लगा था, जिस की सजा उन बेकुसूर लोगों को भुगतनी पड़ती थी जिन्होंने कोई जुल्म या जोरजबरदस्ती दलितों के साथ नहीं की थी. लेकिन साबित यह भी हो रहा था कि साल 1989 के पहले जो सौ फीसदी लोग बच कर निकल जाते थे उन में से तकरीबन 25 फीसदी लोगों को सबक भी मिला था.

यों बिगड़ी बात

सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च, 2018 के फैसले के बाद दलितों को यह डर सताने लगा कि उन की हिफाजत के लिए जो एकलौता ऐक्ट वजूद में था, वह खत्म सा कर दिया गया है तो वे इस फैसले का विरोध करने लगे.

23 मार्च, 2018 को एक पोस्ट वायरल हुई जिस में कहा गया था कि 2 अप्रैल, 2018 को इस फैसले के खिलाफ भारत बंद का आयोजन किया गया है. लिहाजा, सभी दलितआदिवासी इकट्ठा हो कर सड़कों पर आएं और भारत बंद में सहयोग करें.

कई पोस्टों में भीमराव अंबेडकर का भी हवाला दिया गया और दलित सांसदों और विधायकों को भी कोसा गया था.

हिंसा या भड़ास

2 अप्रैल, 2018 को तयशुदा प्रोग्राम के मुताबिक दलित समुदाय के लोग सड़कों पर उतरे. उन के हाथों में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध जताती तख्तियां, हाथों में नीले झंडे और जबान पर तरहतरह के नारे थे. सब से ज्यादा हिंसक वारदातें मध्य प्रदेश में हुईं.

चंबल में बंद के लिए प्रदर्शनकारियों ने जम कर तोड़फोड़ की, जबरन दुकानें बंद कराईं और हिंसा पर उतारू हो आई भीड़ पर पुलिस ने भी जम कर लाठियां भांजी.

हिंसा से उत्तर प्रदेश भी अछूता नहीं रहा. हिंसक वारदातें मेरठ, आगरा, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, हापुड़ और गाजियाबाद में हुईं. हिंसा में 3 लोगों की जानें गईं.

राजस्थान के अलवर में पुलिस की गाडि़यां प्रदर्शनकारियों ने जलाईं. यहां पुलिस फायरिंग में एक नौजवान की मौत भी हुई. जोधपुर में भी जम कर उपद्रव हुआ और इसी दौरान एक पुलिस इंस्पैक्टर को दिल का दौरा पड़ गया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के गृह राज्य गुजरात में जम कर हिंसा हुई पर किसी की मौत नहीं हुई.

बिहार में प्रदर्शनकारियों का गुस्सा अलग तरीके से फूटा. जगहजगह ट्रेनें रोकी गईं और रोड जाम किए गए.

हरकत में आए नेता

2 अप्रैल, 2918 की दोपहर होतेहोते जब यह तय हो गया कि दलितों का विरोधप्रदर्शन कामयाब रहा है और दलितों ने गजब की एकजुटता दिखाई है तो जल्द ही सभी दलों के नेता, जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर चुप थे, अपने दड़बों के बाहर आ कर हिंसा की आग में अपनी सियासी रोटियां सेंकने लगे.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने दलितों के इस आंदोलन को न केवल समर्थन दिया बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी को जम कर लताड़ा भी. उन का कहना था कि भारतीय समाज में दलितों के सब से निचले पायदान पर रखना संघ और भाजपा का डीएनए है. जो इस सोच को चुनौती देता है कि वे उसे हिंसा से दबा देते हैं. हजारों दलित भाईबहन सड़कों पर उतर कर अपने हक के लिए लड़ रहे हैं, हम उन्हें सलाम करते हैं.

बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने भी लखनऊ में प्रैस कौंफ्रैंस कर भाजपा पर हमला बोला, लेकिन दलितों ने उन्हें पहले सा भाव नहीं दिया. वजह, साल 2007 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहते खुद मायावती ने यह फरमान जारी किया था कि एससीएसटी ऐक्ट के तहत बगैर जांचपड़ताल के किसी की गिरफ्तारी नहीं होगी क्योंकि इस ऐक्ट का बेजा इस्तेमाल होता है.

भाजपा के सहयोगी दलों के दलित नेता रामविलास पासवान, रामदास अठावले और उदित राज इस हिंसा को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए एक तरह से दलितों से अपना मुंह ही छिपाते रहे. इस के उलट लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने भाजपा के साथसाथ बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार पर भी हमला करते हुए जेल में बैठे अपने पिता को दलितों का मसीहा बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

समरसता की खुली पोल

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में दलितों ने देशभर में भाजपा का साथ दिया था तो इस की वजह उस का और संघ का समरसता का ड्रामा था.

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जगहजगह दलितों के घर जा कर खाना खाते हुए यह जताने की कोशिश की थी कि भाजपा अब बदल रही है. इतना ही नहीं, उज्जैन के कुंभ के मेले में वे दलित संतों के साथ खुद भी नहाए थे और सवर्ण संतों को भी नहलाया था. तब भाजपा की भरसक कोशिश यह जताने की थी कि दलितों ने उस पर भरोसा कर कोई घाटे का सौदा नहीं किया है.

मंशा यह जताने की भी थी कि भाजपा अब ब्राह्मण और बनियों की पार्टी नहीं रह गई है. तब दलितों ने इस बात पर भरोसा भी किया था जो 4 साल में पूरी तरह टूट गया है.

दलित समुदाय सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिम्मेदार केंद्र सरकार को मान रहा है. हालांकि फुरती दिखाते हुए केंद्र सरकार ने हिंसा के तुरंत बाद सुप्रीम कोर्ट में दोबारा सुनवाई के बाबत गुहार लगाई, लेकिन जब 3 अप्रैल, 2018 को कोर्ट ने साफ कर दिया कि वह अपने फैसले से टस से मस नहीं होगा तो दलितों में फिर मायूसी छा गई.

बात का दूसरा पहलू भाजपा राज में  दलितों पर होने वाले जोरजुल्म भी हैं जिन के बाबत सरकार कभी कुछ नहीं बोली. दलितों के हक और भले के लिए कोई दमदार योजना भी नरेंद्र मोदी सरकार ने नहीं बनाई है.

इस हिंसा की जड़ में धर्म भी था जिस का जिक्र किसी ने नहीं किया. धार्मिक किताबों में जगहजगह दलितों को दोयम दर्जे का बता कर उन्हें परेशान करने की हिदायतें भी दी गई हैं. भाजपा राज में जोरजुल्म बढ़े तो दलित समुदाय का गुस्सा अपनी जगह जायज था जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बहाने फूटा तो इस का खमियाजा भाजपा को कर्नाटक समेत इस साल होने वाले 3 अहम राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए.

पिछड़ों का डबल रोल

2 अप्रैल, 2018 के विरोध प्रदर्शन में दलितों ने यह जता दिया कि अपनी लड़ाई लड़ने में वे अब किसी के मुहताज नहीं हैं लेकिन एससीएसटी ऐक्ट के खिलाफ उन्हें पिछड़े तबके का साथ न मिलना इस लिहाज से हैरानी की बात रही कि सियासी तौर पर दलित पिछड़ों की जुगलबंदी फिर जोर पकड़ रही है.

दलितआदिवासियों की तरह पिछड़ों का भी एक डर आरक्षण छिनने का है. इस मसले पर तो वे दलितों के साथ हैं, पर एससीएसटी ऐक्ट पर नहीं क्योंकि इस कानून के तहत दर्ज होने वाले तकरीबन 50 फीसदी मामलों में आरोपी पिछड़े तबके के ही लोग होते हैं. इन में भी रसूखदार पिछड़ों की तादाद ज्यादा रही.

आरक्षण पर साथ, लेकिन ऐक्ट पर एतराज है तो लगता नहीं कि दलितपिछड़ा गठजोड़ ज्यादा दूर तक चल पाएगा. ऊंची जाति वालों की तरह पिछड़े भी दलितों पर कहर ढाते हैं, लेकिन सत्ता में साथ चाहते हैं. यह उन का दोहरापन है. पिछड़ा तबका कभी खुद भी ऊंची जाति वालों के कहर का शिकार रहा है लेकिन तालीम और जागरूकता के चलते अब अपने दम पर खड़ा है.

दरअसल, दलितों को दबाए रखना अगड़ेपन की निशानी हो गई है. आरक्षण पर अगर कोई पहल हुई तो पिछड़े दलितों के मुहताज रहेंगे तब शायद उन्हें अपने इन सियासी भाइयों की याद आए, पर तब तक बात काफी बिगड़ चुकी होगी.

भगवा होते अंबेडकर

2 अप्रैल की हिंसा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जोर दे कर यह बात कही कि कुछ लोग भीमराव अंबेडकर के नाम पर राजनीति करते हुए समाज में भेदभाव फैला रहे हैं तो हैरानी होना कुदरती बात थी.

अंबेडकर पर सियासत की शुरुआत का जिम्मा भाजपा को ही जाता है जो सत्ता में आने के बाद से लगातार अंबेडकर की बातें करते हुए उन की जन्मतिथि और पुण्यतिथि पर बड़ेबड़े जलसे करती है. वह अंबेडकर की दुहाई देते थकती नहीं, पर इस में छिपा दोहरापन सभी को नजर नहीं आता.

भाजपा इस हकीकत से हमेशा कतराती रही है कि अंबेडकर हिंदू धर्म में पसरी जातिगत छुआछूत, भेदभाव और पाखंडों के खिलाफ थे इसीलिए उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया था और हिंदू धर्मग्रंथों को बहा देने की बात कही थी.

अंबेडकर की पूछपरख के पीछे भाजपा की मंशा उन के हिंदू धर्म से ताल्लुक रखते विचारों को भुला देने की है, पर दलित इस पर खबरदार हैं उसे मालूम है कि हिंदूवादी अब उन के मसीहा को भी हथियाने की फिराक में हैं. इसलिए वह भी अंबेडकर की जयंती और पुण्यतिथि पहले से ज्यादा धूमधड़ाके से मनाने लगा है. यह सियासत नहीं बल्कि ठीक वैसी ही आस्था है जैसी ऊंची जाति वालों की शंकर, राम, कृष्ण और हनुमान में है. फर्क इतना है कि अभी अंबेडकर के नाम पर पूजापाठ और चढ़ावे का रिवाज कम है, जो अगर बढ़ा तो वह दलितों के लिए ही नुकसानदेह साबित होगा और यही भाजपा चाहती है.

VIDEO : हॉलीवुड सेलेब्रिटी सिंगर सेलेना गोमेज़ लुक

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

सामंती सोच की शिकार, फेल राजस्थान सरकार

सामंती सोच की शिकार वसुंधरा राजे सरकार पानी नाक तक आने के बाद ही जागती है. हालात को समय रहते नहीं भांपने का खमियाजा आज राजस्थान के आमजन को भुगतना पड़ रहा है.

थोड़ा सा पीछे चलते हैं. समूचे प्रदेश में तकरीबन 3 महीने चली डाक्टरों की हड़ताल आखिरकार खत्म हो गई. सरकार की ओर से सभी मांगें माने जाने के बाद वे काम पर लौट आए.

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब सरकार को डाक्टरों की मांगें माननी ही थीं तो 3 महीने तक प्रदेश के मैडिकल इंतजाम को किस के भरोसे छोड़ा गया?

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब वसुंधरा सरकार की सुस्ती की वजह से बेवजह आंदोलन लंबा खिंचा हो. बीते एक साल का यह तीसरा बड़ा आंदोलन था, जिस ने सरकार की सुस्ती की वजह से तूल पकड़ा और आखिर में वह उस के लिए सिरदर्द बन गया.

बेवजह की हठ

राज्य के सरकारी अस्पतालों में काम कर रहे डाक्टरों का संगठन अपनी 33 मांगों को ले कर 3 महीने तक काम छोड़ कर बैठा था. इस बीच सरकार ने 4 नवंबर, 2017 को संगठन के पदाधिकारियों को बातचीत के लिए बुलाया.

इस बैठक में चिकित्सा मंत्री कालीचरण सराफ और चिकित्सा सचिव की मौजूदगी में चिकित्सा महकमे के अतिरिक्त निदेशक के डाक्टरों के खिलाफ टिप्पणी करने से माहौल बिगड़ गया. संगठन के पदाधिकारी न सिर्फ बैठक बीच में ही छोड़ कर आ गए, बल्कि प्रदेश के सभी डाक्टरों ने अपने इस्तीफे भी सरकार को भेज दिए.

अगले दिन चिकित्सा मंत्री कालीचरण सराफ ने डाक्टरों को बातचीत के लिए तो बुलाया लेकिन संगठन के पदाधिकारियों के बजाय अपने चहेते डाक्टरों को न्योता दिया.

इस बैठक के बाद सराफ ने बयान दिया कि सरकार ने डाक्टरों की सभी मांगें मान ली हैं, लेकिन उन के संगठन के पदाधिकारी समझौते पर दस्तखत करने नहीं आ रहे.

दरअसल, डाक्टरों के संगठन के पदाधिकारियों को यह डर हो गया कि सरकार समझौता करने के बजाय ‘फूट डालो और राज करो’ की चाल पर काम कर रही है. इस में उलझने के बजाय वे 6 नवंबर, 2017 से हड़ताल पर चले गए.

इस से समूचे प्रदेश की मैडिकल व्यवस्था चरमरा गई. इस दौरान सरकार पूरी तरह से भरम में नजर आई. कभी डाक्टरों को बातचीत के लिए बुलाया गया तो कभी उन्हें राजस्थान आवश्यक सेवा कानून यानी रेसमा का डर दिखाया गया.

इस बीच सरकार ने प्रदेश के लड़खड़ाते मैडिकल इंतजाम को सुधारने के लिए कोई दूसरे फौरी इंतजाम भी नहीं किए. सरकार ने हड़ताल कर रहे डाक्टरों के खिलाफ सख्ती अपनाई. दर्जनभर डाक्टरों को आवश्यक सेवा कानून के तहत गिरफ्तार किया.

कुछ डाक्टरों पर दबाव बना कर उन्हें अस्पतालों में भी भेजा, लेकिन इस से हालात नहीं सुधरे. समय पर इलाज न मिलने से 125 लोगों की मौतें हो गईं और हजारों मरीज दरदर भटकते रहे. सरकार पर इतना दबाव आ गया कि आखिरकार उसे झुकना पड़ा.

चिकित्सा मंत्री कालीचरण सराफ ने डाक्टरों के संगठन के पदाधिकारियों को बातचीत के लिए न सिर्फ बुलाया, बल्कि उन्हें रेसमा के तहत गिरफ्तार नहीं करने का आश्वासन भी दिया. तब समझौता हो गया.

इसी तरह सीकर में हुए किसान आंदोलन और गैंगस्टर आनंदपाल सिंह के ऐनकाउंटर की सीबीआई जांच की मांग को ले कर हुए आंदोलन से भी सरकार समय रहते नहीं निबट पाई.

इन तीनों आंदोलनों की गंभीरता को न तो सरकार का खुफिया तंत्र भांप पाया और न ही इन को खत्म करने के लिए सरकार समय रहते कारगर नीति बना पाई. इस का अंजाम यह हुआ कि ये आंदोलन बड़े पैमाने पर फैल गए और इन से आम जनजीवन पर भी असर पड़ा. आखिरकार सरकार को आंदोलनकारियों की मांगों के सामने झुकते हुए समझौता करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

सितंबर, 2017 में सीकर में हुए किसान आंदोलन के समय भी सरकार का लचर रवैया सामने आया था. अखिल भारतीय किसान सभा के बैनर तले कर्जमाफी और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने सरीखी मांगों को ले कर शुरू हुआ यह आंदोलन 13 दिन तक चला, लेकिन इस की तैयारी 6 महीने से चल रही थी.

आंदोलन की शुरुआत में किसानों ने सीकर में महापड़ाव डाला तो भी सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगी. सरकार ने इस आंदोलन को इस कदर नजरअंदाज किया कि कई दिनों तक आंदोलनकारियों से बातचीत करना भी जरूरी नहीं समझा. सरकार से किसानों का ही नहीं, सीकर के कारोबार व दूसरे संगठनों का गुस्सा बढ़ गया.

इस का नतीजा यह हुआ कि आंदोलन पूरे जिले में फैल गया. सड़क, बाजार, मंडी… सब बंद हो गए. बाकी जिलों में भी यह आंदोलन पैर पसारने लगा. विपक्ष के नेता भी आंदोलन के समर्थन में उतर आए.

इतना सब होने के बाद सरकार को आंदोलनकारी किसानों से बातचीत की सूझी. आखिरकार समझौता हुआ और आंदोलन खत्म हुआ.

ऐनकाउंटर से बवाल

आनंदपाल सिंह के ऐनकाउंटर की सीबीआई जांच के लिए हुए आंदोलन से निबटने में भी सरकार की लेटलतीफी सामने आई थी. इस कुख्यात गैंगस्टर का ऐनकाउंटर 24 जून, 2017 को हुआ था.

आनंदपाल के परिवार वालों और राजपूत समाज के नेताओं ने ऐनकाउंटर को फर्जी बताते हुए सीबीआई जांच की मांग की. परिवार वालों ने सीबीआई जांच के आदेश नहीं होने तक अंतिम संस्कार नहीं करने की जिद पकड़ ली. इस के बावजूद सरकार टस से मस नहीं हुई.

गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया ने तो यहां तक कह दिया कि पुलिस ने बहादुरी से मुकाबला करते हुए अपराधी का ऐनकाउंटर किया है.

उन का कहना था, ‘‘अगर हम इस की सीबीआई जांच कराते हैं तो उन के मनोबल पर असर पड़ेगा और पुलिस काम नहीं करेगी. अगर लोग ऐनकाउंटर की सीबीआई जांच कराना चाहते हैं तो कोर्ट का दरवाजा खुला है. वे कोर्ट जाएं.’’

सरकार के इस रुख से राजपूतों का गुस्सा बढ़ता गया. 12 जुलाई, 2017 को आनंदपाल के गांव सांवराद में एक सभा हुई. सभा खत्म होने के बाद भीड़ हिंसक हो गई. इस में एक आदमी की मौत हुई और कई पुलिस वाले घायल हो गए. सरकार ने सख्ती दिखाते हुए इलाके में कर्फ्यू लगा दिया.

इस बीच मानवाधिकार आयोग ने अंतिम संस्कार के आदेश दे दिए. पुलिस ने अंतिम संस्कार भी करा दिया, लेकिन राजपूतों का गुस्सा शांत नहीं हुआ.

बवाल थमता न देख कर सरकार ने 17 जुलाई, 2017 को सीबीआई जांच की मांग मान ली. अगर सरकार शुरू में ही इस मांग को मान लेती तो इतना बवाल नहीं होता.

काले कानून से फजीहत

सरकारी मुलाजिमों को बचाने वाले बिल सीआरपीसी संशोधन विधेयक, 2017 को ले कर भी वसुंधरा राजे सरकार को मुंह की खानी पड़ी. विधानसभा के अंदर और बाहर भारी विरोध के बावजूद राजस्थान सरकार ने इस बिल को विधानसभा में पेश किया था.

गौरतलब है कि राजस्थान सरकार के इस विवादित अध्यादेश को कांग्रेस ने काला कानून बताते हुए जोरदार विरोध किया था. इस बिल के खिलाफ कांग्रेस ने जहां सदन से वाकआउट किया, वहीं कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट की अगुआई में विधानसभा के बाहर प्रदर्शन किया गया.

प्रशासन ने कांग्रेस के विरोध मार्च की इजाजत नहीं दी तो कांग्रेस ने गिरफ्तारियां दीं. सचिन पायलट ने इसे काला कानून बताते हुए कहा कि जब तक यह बिल वापस नहीं होगा तब तक हम चैन से नहीं बैठेंगे.

इस बिल को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी गई. एडवोकेट एके जैन ने याचिका दायर कर दंड विधि राजस्थान संशोधन अध्यादेश, 2017 में अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन बताते हुए इस की वैधता को चुनौती दी.

नीति और नीयत में खोट

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने राज्य की भाजपा सरकार पर चुनावी वादे पूरे नहीं करने का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि इस के लिए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए. सरकार हर मोरचे पर नाकाम रही है.

प्रदेश में लगातार बिगड़ती कानून व्यवस्था के चलते बलात्कार, हत्या, अपहरण और दलितों पर जोरजुल्म करने के मामले भी बढ़ रहे हैं.

सचिन पायलट ने कहा कि दलितों के शोषण के मामले में देश में राजस्थान पहले नंबर पर आ गया है जबकि महिला शोषण और बलात्कार में तीसरे नंबर पर आ गया है. इसी तरह हत्या व अपहरण के मामलों में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है.

राज्य में कई कर्मचारी संगठन अपनी मांगों को ले कर आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन सरकार को उन की समस्याओं के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं है. यही वजह है कि सरकार संगठनों के साथ किसी तरह की बातचीत भी नहीं कर रही है.

VIDEO : हॉलीवुड सेलेब्रिटी सिंगर सेलेना गोमेज़ लुक

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

ठगी का मकड़जाल

पिछले साल सितंबर महीने की बात है. एक शख्स राजस्थान पुलिस के स्पैशल औपरेशन ग्रुप यानी एसओजी के थाने में पहुंचा. आंखों पर चश्मा लगाए अच्छी कदकाठी के उस व्यक्ति ने बताया कि उस का नाम संदीप घोष है और वह अजमेर का रहने वाला है. वह पश्चिम बंगाल की पिनकौन स्पिरिट समूह की कंपनी में काम करता है. पिनकौन समूह की कंपनियां विभिन्न योजनाओं में लोगों से निवेश कराती हैं.

संदीप घोष ने बताया कि अब यह कंपनी लोगों से ली गई रकम वापस नहीं लौटा रही है. इस संबंध में उस ने कई बार कंपनी के टौप मैनेजमेंट और चेयरमैन तक बात पहुंचाने की कोशिश की लेकिन उसे हर जगह से नेगेटिव रिस्पौंस मिला.

संदीप घोष ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा कि पिनकौन कंपनी की विभिन्न योजनाओं में हजारों गरीबों ने अपनी खूनपसीने की कमाई निवेश की है. तमाम लोगों ने उस के भरोसे पर कंपनी में पैसा लगाया है. अब वे पैसा मांग रहे हैं तो कंपनी उन निवेशकों का पैसा नहीं लौटा रही है. आशंका है कि इस कंपनी ने निवेशकों के साथ धोखाधड़ी की है.

एसओजी के अधिकारियों ने संदीप से पूछा कि धोखाधड़ी कैसे की गई तो उस ने बताया कि कंपनी ने लोगों को 4 साल में रकम दोगुनी करने और 14 फीसदी तक ब्याज देने का वादा किया था. पिनकौन ग्रुप की कंपनियां राजस्थान में करीब 7 साल से चल रही हैं. अच्छे मुनाफे के लालच में पूरे राजस्थान के हजारों लोगों ने हमारी कंपनियों में पैसा निवेश किया है. यह रकम सैकड़ों करोड़ रुपए बनती है.

संदीप घोष ने बताया कि वह भी 14 फीसदी ब्याज के लालच में आ गया और उस ने अपने खुद के और अपनी जानपहचान वालों के 76 लाख रुपए पिनकौन ग्रुप की कंपनियों में निवेश करवा दिए. पहले तो कुछ लोगों को पैसा वापस मिल गया था, कुछ निवेशकों को ब्याज की राशि भी मिली थी, लेकिन अब कई महीनों से ब्याज तो दूर लोगों को अपनी मूल रकम भी नहीं मिल रही है. निवेशक कंपनी के औफिसों के चक्कर लगा रहे हैं.

संदीप से आवश्यक पूछताछ के बाद एसओजी ने पिनकौन स्पिरिट कंपनी समूह के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया. एसओजी के एडीशनल डीजीपी उमेश मिश्रा ने आईजी दिनेश एम.एन. को इस मामले की जांच के लिए टीम गठित करने के निर्देश दिए. आईजी दिनेश एम.एन. ने संजय श्रोत्रिय के नेतृत्व में विशेष जांच दल यानी एसआईटी का गठन किया.

संजय श्रोत्रिय के नेतृत्व में एसओजी की टीम ने जांच शुरू की. एसओजी के अधिकारियों ने सब से पहले पिनकौन ग्रुप की सभी कंपनियों की जानकारी जुटाई. इस के बाद इन कंपनियों के काम करने के तरीकों का पता लगाया, तब जा कर पुलिस अफसरों को फरजीवाड़े का यह मामला समझ में आया.

हालांकि इस तरह के वित्तीय फरजीवाड़े के मामलों की जांच आमतौर पर सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी या रिजर्व बैंक आदि करती है, लेकिन यह मामला सीधे निवेशकों से ठगी का था, इसलिए एसओजी ने गहराई से मामले की जांच की.

रोजाना 3 करोड़ रुपए का टैक्स दे रही थी कंपनी

जांचपड़ताल में सामने आया कि पिनकौन स्पिरिट लिमिटेड कंपनी देश की नामी कंपनी है. पश्चिम बंगाल की इस कंपनी को पीएसएल के नाम से भी जाना जाता है. यह कंपनी बौंबे स्टौक एक्सचेंज, नैशनल स्टौक एक्सचेंज व सेबी में सूचीबद्ध है. सन 1978 में इस कंपनी की स्थापना कोलकाता में हुई थी.

society

पिनकौन समूह की कई अन्य कंपनियां भी हैं. इन कंपनियों में एलआरएन फाइनैंस लिमिटेड, एएसके फाइनैंशियल सर्विसेज, यूनिवर्सल मल्टीस्टेट क्रैडिट कोऔपरेटिव सोसायटी, ग्रिनेज फूड प्रोडक्ट लिमिटेड, बंगाल पिनकौन हाउसिंग इंफ्रा लिमिटेड और एलआरएन यूनिवर्स प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड शामिल हैं.

जांच में पता चला कि पिनकौन ग्रुप के चेयरमैन और मैनेजिंग डाइरेक्टर मनोरंजन राय हैं. पिनकौन स्पिरिट लिमिटेड कंपनी शराब का उत्पादन करने वाली प्रमुख कंपनी है. इस कंपनी की शराब पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, झारखंड और ओडिशा सहित कई राज्यों में सप्लाई की जाती है.

यह बात भी सामने आई कि पिनकौन कंपनी सरकार को रोजाना करीब करीब 3 करोड़ रुपए का टैक्स दे रही थी. मार्च 2016 में पिनकौन ग्रुप ने अपने उत्पाद को बढ़ाने के लिए सिंगापुर की और्बिटोल सोल्यूशन कंपनी का अधिग्रहण किया था. मई, 2017 में पिनकौन कंपनी ने लंदन स्टौक एक्सचेंज में 30 मिलियन डौलर कैपेक्स के  फौरन करेंसी कनवर्टबल बौंड्स जारी किए थे.

एसओजी के अधिकारियों को जब पिनकौन ग्रुप की सभी कंपनियों की जानकारी मिल गई तो यह पता लगाया गया कि राजस्थान और देश में किसकिस राज्य में पिनकौन ने अपनी कंपनी की शाखाएं खोल रखी हैं. इस में पता चला कि राजस्थान में कंपनी की 11 शाखाएं हैं.

इन में से अजमेर, जयपुर, कोटा, निवाई व चौमूं शाखाएं अजमेर रीजनल औफिस के तहत आती थीं और अलवर, भरतपुर, कामां, धौलपुर, बांदीकुई व हिंडौन की शाखाएं आगरा रीजनल औफिस के तहत. अजमेर के रीजनल औफिस में एक ही कमरे में पिनकौन ग्रुप की 6 कंपनियां चलती थीं.

इस औफिस में सभी 6 कंपनियों का लेखाजोखा भी एक ही रजिस्टर में रखा जाता था. इस के अलावा पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश आदि राज्यों के प्रमुख शहरों में भी पिनकौन ग्रुप ने अपनी कंपनी की 105 शाखाएं खोल रखी थीं.

पिनकौन ग्रुप की कंपनियों की राजस्थान की सभी 11 शाखाओं को सीज कर एसओजी के अधिकारियों ने वहां से कंपनी के दस्तावेज जब्त किए. इन दस्तावेजों की जांचपड़ताल के साथसाथ कंपनी की शाखाओं में काम करने वाले कर्मचारियों से भी पूछताछ की गई. पता चला कंपनी ने एकमुश्त पैसा जमा कराने पर 4 साल में रकम दोगुनी करने का वादा किया था.

इस के अलावा अन्य जमा राशियों पर 14 फीसदी तक ब्याज देने की बात थी. लोगों से निवेश के नाम पर प्रतिमाह या 4 साल के लिए एकमुश्त रकम ली जाती थी. निवेश 500 रुपए से शुरू किया जा सकता था. मोटे मुनाफे के इसी लालच में लोगों ने पिनकौन ग्रुप की कंपनियों में रकम जमा कराई थी.

3 लाख लोगों से की ठगी

एसओजी की जांच में पता चला कि लोगों में भरोसा जमाने के लिए शुरू में अजमेर स्थित एक्सिस बैंक में एक खाता खोला गया था. निवेशकों का पैसा इसी बैंक में जमा करवाया जाता था. बाद में उस रकम को पिनकौन ग्रुप के अधिकारी दूसरे खातों में स्थानांतरित करवा कर रकम निकलवा लेते थे. अजमेर के एक्सिस बैंक का खाता सन 2014 में बंद करा दिया गया था.

जांच में पता चला कि जब निवेशकों की रकम की अवधि पूरी हो जाती थी और वे अपना पैसा वापस मांगते थे तो कंपनी के कर्मचारी उन्हें निश्चित ब्याज के अलावा 2 फीसदी अतिरिक्त ब्याज देने का लालच दे कर उस राशि को पिनकौन समूह की ही दूसरी कंपनी में निवेश करवा लेते थे.

दस्तावेजों का गहन अध्ययन करने पर सामने आया कि पिनकौन ग्रुप की एलआरएन कंपनी ने निवेशकों से 31 करोड़ रुपए जमा करने के बाद केवल 7 करोड़ रुपए ही लौटाए थे. बाकी राशि ग्रुप की दूसरी कंपनियों में निवेश कर दी गई थी. इसी तरह ग्रुप की अन्य कंपनियों के नाम पर निवेशकों से लिया गया पैसा वापस नहीं लौटाया गया था.

एसओजी की जांचपड़ताल में यह स्पष्ट हो गया कि पिनकौन ग्रुप ने मोटे मुनाफे का लालच दे कर राजस्थान में करीब 25 हजार लोगों से लगभग 56 करोड़ रुपए की ठगी की थी. अनुमान लगाया गया कि पिनकौन ग्रुप की कंपनियों ने देश भर के करीब 3 लाख लोगों से ठगी की थी.

इस के बाद एसओजी के अधिकारियों ने 3 नवंबर, 2017 को पिनकौन ग्रुप के चेयरमैन मनोरंजन राय और उस के साथी निदेशक बिनय सिंह को बेंगलुरु से गिरफ्तार कर लिया. ये दोनों कोलकाता के रहने वाले थे. दोनों से पूछताछ के बाद कंपनी के अधिकारी बेंगलुरु निवासी एकाउंट्स हैड रघु शेट्टी और आगरा के रहने वाले निदेशक हरि सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

चारों आरोपियों को एसओजी ट्रांजिट रिमांड पर जयपुर ले आई. उन्हें जयपुर न्यायालय में पेश कर के रिमांड पर लिया गया. इन लोगों से पूछताछ में पता चला कि ये लोग निवेशकों से पिनकौन गु्रप की 6 फरजी कंपनियों में प्राइवेट प्लेसमेंट के तहत डिबेंचर इश्यू कर के निवेश करवाते थे. निवेशकों के डिबेंचर्स का भुगतान कभी नहीं किया गया था. एक कंपनी के डिबेंचर परिपक्व होने पर उस में वर्चुअल रोकड़ भुगतान दिखा दिया जाता था और दूसरी कंपनी में वर्चुअल रोकड़ प्राप्ति दिखा कर नए डिबेंचर का निर्गमन दिखा कर पुन: निवेश करा दिया जाता था.

society

पिनकौन ग्रुप की कंपनी एलआरएन फाइनैंस लिमिटेड, एएसके फाइनैंशियल सर्विसेज, ग्रिनेज फूड प्रोडक्ट लिमिटेड, बंगाल पिनकौन हाउसिंग इंफ्रा लिमिटेड द्वारा अपने परिपक्व दावों के करीब 39 करोड़ रुपए को अवैध तरीके से वर्चुअल भुगतान दिखा कर एलआरएन यूनिवर्स प्रोड्यूसर कंपनी में वर्चुअल आधार पर प्राप्ति दिखा कर पुन: निवेश किया गया.

पूछताछ में यह बात भी सामने आई कि पिनकौन ग्रुप ने 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी की घोषणा के बाद भी अपनी कंपनियों के जरिए पुरानी करेंसी का लेनदेन किया. इस के लिए कोलकाता में बाकायदा मीटिंग कर के नोटबंदी की अवधि में विशेष योजना बना कर सभी शाखाओं को भेजी गई थी.

नोटबंदी के दौरान करीब 45 करोड़ रुपए की पुरानी करेंसी ली गई. इस करेंसी को ग्रुप के चेयरमैन मनोरंजन राय ने अपनी कंपनियों के कर्मचारियों के माध्यम से बैंक से बदलवा लिया. राजस्थान के अकेले अजमेर में 8 नवंबर से 26 नवंबर, 2016 तक करीब 22 करोड़ रुपए की पुरानी करेंसी लोगों से ली गई.

105 शाखाओं में बना रखे थे एडवाइजर

यह भी पता चला कि पिनकौन ग्रुप की ये 6 कंपनियां फरजी थीं. आरोपियों ने ये कंपनियां कागजों में बना रखी थीं. इन फरजी कंपनियों में ये लोग पहले डाइरेक्टर बन जाते थे और लोगों से निवेश कराने के बाद डाइरेक्टर पद से हट जाते थे. इस के बाद इन कंपनियों के डमी संचालक और एडवाइजर बना दिए जाते थे.

पिनकौन ग्रुप के प्रबंधन ने देश भर की सभी 105 शाखाओं में एडवाइजर बना रखे थे. इन एडवाइजरों के माध्यम से ही लोगों से पैसा निवेश कराया जाता था. निवेशकों को ठगी का अहसास न हो, इस के लिए चेयरमैन मनोरंजन राय अपने संचालकों के साथ मिल कर मोटी रकम के निवेशकों को कोलकाता घुमाता था. ऐसे निवेशकों को पिनकौन ग्रुप की शराब फैक्ट्री, गोदाम, औफिस व अन्य कारखानों का भ्रमण कराया जाता था. इन निवेशकों को 5 सितारा होटलों में पार्टी दी जाती थी.

कंपनी प्रबंधन ने लोगों से ठगी गई रकम पश्चिम बंगाल में शराब बनाने वाली कंपनी में लगाई. शराब कंपनी के उत्पादों में लगातार विस्तार होता रहा. इस के अलावा अन्य व्यापार बढ़ाया गया. चेयरमैन ने राजस्थान में भी शराब कंपनी खोलने का मन बना कर इस के लिए जमीन तलाशनी शुरू कर दी थी. इस के अलावा आरोपियों ने ठगी की रकम से उत्तर प्रदेश के आगरा, गोरखपुर और अन्य शहरों में करीब 50 करोड़ रुपए की प्रौपर्टी खरीदी थीं.

पिनकौन ग्रुप के चेयरमैन सहित अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद कंपनी की ठगी के शिकार अनेक लोग जयपुर में एसओजी के आईजी दिनेश एम.एन. के पास पहुंचे. इन पीडि़तों ने आईजी को अपनी व्यथा सुनाई. पीडि़तों ने बताया कि ठगी का अहसास होने पर वे कोलकाता स्थित पिनकौन ग्रुप के मुख्यालय भी गए थे. लेकिन कंपनी के चेयरमैन ने फिर से ज्यादा मुनाफा देने का झांसा दे कर उन्हें लौटा दिया था.

कंपनी के एजेंट भी मिले एसओजी से

कंपनी के एजेंट भी पीडि़तों के साथ एसओजी से मिले. एजेंटों ने बताया कि निवेशक उन से पैसा वापस दिलाने का तगादा कर रहे हैं. पीडि़तों का एसओजी मुख्यालय जा कर अपनी ब्यथा बताने का सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा.

दूसरी ओर पिनकौन कंपनी के प्रमोटर्स पर पुलिस की काररवाई के बाद शेयर बाजार में सूचीबद्ध पिनकौन स्पिरिट लिमिटेड कंपनी का शेयर गिर गया.

कंपनी के दस्तावेजों की जांच के लिए जयपुर से एसओजी की टीम कोलकाता गई. एसओजी की एक टीम उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों में कंपनी की प्रौपर्टी का पता लगाने के लिए भेजी गई. इस टीम ने कंपनी के आगरा व वाराणसी औफिस से निवेशकों का रिकौर्ड व प्रौपर्टी के कागजात जब्त किए. वहीं जयपुर में कंपनी की राजस्थान की ब्रांचों के मैनेजरों को एसओजी कार्यालय बुला कर पूछताछ की गई.

एसओजी ने रिमांड अवधि पूरी होने पर 9 नवंबर, 2017 को चारों आरोपियों को अदालत में पेश कर के फिर से 7 दिन का रिमांड मांगा. इस पर पिनकौन के चेयरमैन मनोरंजन राय के अधिवक्ता राजेश महर्षि ने तर्क दिया कि यह मामला आपराधिक नहीं है. संबंधित कंपनी रजिस्ट्रार औफ कंपनीज में पंजीकृत है. शेयर बाजार में लिस्टेड होने के कारण सेबी इस की नियामक संस्था है. ऐसे में आरोपों की जांच होनी भी है तो कंपनी अधिनियम के तहत होगी.

आरोपी बिनय सिंह के अधिवक्ता दीपक चौहान ने फिर से रिमांड मांगने का विरोध किया. उन्होंने दलील दी कि कंपनी के दस्तावेज पब्लिक डोमेन में हैं. अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद चारों आरोपियों की रिमांड अवधि 7 दिन के लिए बढ़ा दी. बाद में 16 नवंबर, 2017 को अदालत के आदेश पर न्यायिक अभिरक्षा में सभी को जेल भेज दिया गया.

ठगी के जाल का पता लगाने के लिए एसओजी की एक टीम इसी साल जनवरी के पहले हफ्ते कोटा पहुंची. कोटा में एक ही दिन में एसओजी अधिकारियों के समक्ष डेढ़ सौ से ज्यादा पीडि़तों ने अपनी शिकायतें दर्ज कराईं. एसओजी की जांच में पता चला कि कोटा में करीब डेढ़ हजार और राजस्थान के हाड़ौती इलाके में करीब 4 हजार लोगों से ठगी की गई थी.

कंपनी का निदेशक भी हुआ गिरफ्तार

पिनकौन ग्रुप की एलआरएन यूनिवर्स प्रोड्यूसर कंपनी के निदेशक दीपक पुंडीर को एसओजी ने 11 जनवरी को गिरफ्तार कर लिया. पुंडीर ने रिमांड के दौरान पूछताछ में बताया कि आगरा की पीएनबी शाखा में खाता खोला गया था. उस खाते को दीपक ही औपरेट करता था. इस बैंक खाते में राजस्थान के लोगों से एकत्र राशि जमा की जाती थी. दीपक ने बताया कि बाद में कंपनी के चेयरमैन मनोरंजन राय से लेनदेन को ले कर उस का झगड़ा हो गया था. इस के बाद वह पिनकौन कंपनी से अलग हो गया था.

व्यापक जांचपड़ताल के बाद एसओजी ने 29 जनवरी, 2018 को पिनकौन घोटाले के 4 आरोपियों चेयरमैन मनोरंजन राय, निदेशक बिनय सिंह, हरि सिंह और एकाउंट्स हैड रघु शेट्टी के खिलाफ जयपुर की अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर दिया. चारों आरोपियों के खिलाफ भादंसं की धारा 420, 406, 409, 466, 468, 471, 477ए व 201 और आईटी एक्ट की धारा 54 के तहत आरोपपत्र दाखिल किया गया.

एसओजी अधिकारियों ने अदालत को बताया कि आरोपियों ने कंपनी कानून का उल्लंघन कर के लोगों से निवेश के नाम पर रकम ली. बाद में इस रकम को कागजी कंपनियों के खातों में डाल कर हड़प लिया. कंपनी ने डिबेंचर के नाम पर लोगों से 796 करोड़ रुपए जुटाए थे. आरोपियों ने मोटे तौर पर 500 करोड़ रुपए की देनदारी स्वीकार भी की है.

मामले के खुलासे के बाद कंपनी के सौफ्टवेयर से निवेशकों का डाटा डिलीट किया गया, जिसे संबंधित सौफ्टवेयर कंपनी के जरिए रिकवर करने का प्रयास किया जा रहा है. डाटा मिलने की स्थिति में यह आंकड़ा बढ़ सकता है. एसओजी को पिनकौन ग्रुप की 40 कंपनियां होने का पता चला. इन में से 22 कंपनियों की जानकारी ही मिल सकी.

6 हजार से ज्यादा पेज की बनी चार्जशीट

खास बात यह रही कि 796 करोड़ रुपए की ठगी की जो चार्जशीट अदालत में पेश की गई थी, वह 6249 पेज की थी. इस में सहायक दस्तावेजों के साथ कुल 37 हजार पेज लगाए गए. इतनी भारीभरकम चार्जशीट के लिए एसओजी ने विशेष अनुमति ले कर 2 लाख रुपए केवल फोटोकौपी, बाइंडिंग व फाइल संबंधी काम पर खर्च किए.

society

कथा लिखे जाने तक इस मामले में एसओजी राजकुमार राय, दीपांकर बासु, सिद्धार्थ राय, राणा सरकार, अरुण ठाकुर, राजीव पाल आदि आरोपियों को तलाश रही थी, जबकि न्यायिक अभिरक्षा में चल रहे दीपक पुंडीर के खिलाफ जांच अभी लंबित रखी गई थी.

शिकायत दर्ज कराने वाले कंपनी के पूर्व रीजनल सेल्स मैनेजर संदीप घोष का कहना है कि वह मार्च 2012 में ग्रुप से जुड़ा था. कंपनी के चेयरमैन मनोरंजन राय और टौप मैनेजमेंट में शामिल हरि सिंह ने आगरा में उस की जौइनिंग रीजनल सेल्स मैनेजर के रूप में करवाई थी.

कोटा में इस से पहले ही कंपनी की ब्रांच खुल चुकी थी. संदीप को बाद में अजमेर की जिम्मेदारी सौंप दी गई. संदीप के अधीन अजमेर, जयपुर, कोटा, निवाई व चौमूं ब्रांच थीं.

2017 में जब संदीप को कंपनी के फ्रौड का पता चला तो उस ने चेयरमैन और टौप मैनेजमेंट से बात करने का प्रयास किया लेकिन उसे रेस्पौंस नहीं मिला. जुलाई, 2017 तक सब खुल कर बोलने लगे कि कुछ नहीं हो सकता. इस के बाद उस ने खुद आगे आ कर कंपनी के खेल का भंडाफोड़ करने की ठानी.

संदीप ने एसओजी में शिकायत की. एसओजी ने मामला दर्ज कर जांचपड़ताल के बाद कंपनी के चेयरमैन सहित 5 आरोपियों को गिरफ्तार किया. एसओजी ने अपनी जांच में पिनकौन ग्रुप द्वारा 796 करोड़ रुपए की ठगी करने की बात आरोपपत्र में कही है. यह अलग बात है कि इस सब के बाद भी पीडि़तों को उन की खूनपसीने की कमाई का पैसा शायद ही वापस मिल पाएगा.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

VIDEO : हॉलीवुड सेलेब्रिटी सिंगर सेलेना गोमेज़ लुक

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

‘मरद अभी बच्चा बा..’ गाने ने यूट्यूब पर मचाया धमाल

इस साल सुपरस्टार अभिनेता खेसारी लाल यादव के बैक टू बैक गाने यूट्यूब पर तहलका मचा रहे हैं. उनकी फिल्म ‘दुलहिन गंगा पार के’ गाने लोगों को खूब रास आ रहे हैं. ‘धुकुर धुकुर’ के बाद अब इसी फिल्म का गाना ‘मरद अभी बच्चा..’ भी आनलाइन यूजर्स के बीच वायरल हो चुका है. इसमें खेसारी लाल यादव के साथ भोजपुरी की सुपरहिट हीरोइन आम्रपाली दूबे नजर आ रही हैं.

बताया जा रहा है कि ‘मरद अभी बच्चा..’ पिछले साल नवंबर महीने में रिलीज किया गया था, लेकिन बीते 6 महीने से लगातार इस गानें को यूट्यूब पर जमकर सुना जा रहा है. और अब भी लोग इस गाने को काफी पसंद कर रहे हैं. बता दें कि यशी फिल्म्स के यूट्यूब चैनल द्वारा रिलीज किये गये इस गाने कुछ ही घंटों में 2.5 लाख लोग देख चुके हैं. ‘धुकुर धुकुर’ की तरह इस गाने को भी वीडियो में डालकर बल्कि आडियो और इमेज से रिलीज किया गया है.

बता दें कि इस गाने को खेसारी लाल यादव के अलावा प्रियंका सिंह ने भी गाया है. इस गाने के लिरिक्स को पवन पांडे ने लिखा है. बात करें खेसारी लाल यादव की फिल्म ‘दुलहिन गंगा पार के’ तो इस फिल्म को ब्रांड विला प्रोडक्शन प्राइवेट लिमिटेड के बैनर तले बनाया जा रहा है. इस फिल्म में खेसारी लाल यादव और आम्रपाली दुबे के अलावा काजल राघवानी और मनोज टाइगर जैसे मशहूर कलाकार भी मौजूद हैं. फिल्म के डायरेक्टर असलम शेख और प्रोड्यूसर डाक्टर अरविंद आनंद हैं.

VIDEO : हॉलीवुड सेलेब्रिटी सिंगर सेलेना गोमेज़ लुक

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

102 नौट आउट : ज्यादा उम्मीद नजर नहीं आती

गुजराती भाषा के नाटकों की बदौलत बौलीवुड में ‘आंखे’ और ‘‘ओह माई गौड’’ सहित कई बेहतरीन व अति उत्कृष्ट फिल्में आयी हैं, मगर सौम्या जोशी लिखित गुजराती भाषा के नाटक‘‘102 नौट आउट’’ पर बनी फिल्म ‘‘102 नौट आउट’’ को उत्कृष्ट फिल्म नहीं कहा जा सकता.

मूर्खतापूर्ण हंसाने वाले दृश्यों के साथ रुलाने वाली इस फिल्म के बाक्स आफिस पर कमाल दिखाने की बहुत ज्यादा उम्मीद नजर नहीं आती है. जबकि तीन किरदारों वाली इस फिल्म में अमिताभ बच्चन व ऋषि कपूर जैसे महान कलाकारों के संग जिमित त्रिवेदी हैं.

फिल्म की कहानी मुंबई के एक गुजराती परिवार की है. यह कहानी है 102 वर्षीय दत्तात्रय वखारिया (अमिताभ बच्चन) और उनके 75 वर्षीय बेटे बाबूलाल वखारिया (ऋषि कपूर) की. इनके साथ एक दवा की दुकान पर काम करने वाला युवक धीरु (जिमित त्रिवेदी) भी जुड़ा हुआ है, जो कि हर दिन इन्हे दवा आदि देने आता रहता है. दत्तात्रय ने छह माह के लिए धीरु की विशेष सेवाएं ले रखी हैं.

फिल्म शुरू होती है सूत्रधार से, जो कि फिल्म के किरदारों का परिचय करवाता है. बाबूलाल वखारिया उर्फ बाबू 75 वर्ष के हैं और उन्होंने मान लिया है कि वह बूढे़ हो गए हैं. जिसके चलते बुढ़ापा उन पर झलकने लगा है. अब वह कंधा सीधा करके खडे़ भी नहीं होते हैं. दवाओं पर चल रहे हैं. हर दिन डाक्टर मेहता के पास अपना चेकअप कराने जाते हैं. बहुत कम बोलते हैं. गुपचुप रहते हैं. उनकी जिंदगी में खुशी का कोई नामोनिशान नहीं है. उन्हे लगता है कि वह बहुत जल्द सब कुछ भूल जाते हैं. इसलिए हर जगह उन्होंने लिख रखा है कि क्या करना है. मसलन – बाथरूम में लिखा है – गीजर बंद करें.’ पत्नी चंद्रिका की मौत हो चुकी है. अब बाबू इस उम्मीद में जी रहे हैं कि 21 वर्ष से विदेश में बसा, वहीं शादी कर चुका उनका बेटा अमोल एक न एक दिन अपनी पत्नी व बच्चों को लेकर उनके पास आएगा.

बाबूलाल वखारिया को अपने पोते पोती का चेहरा देखने की हसरत है. इसी हसरत के चलते वह अपने नालायक बेटे अमोल की हर बात को भुला चुके हैं. वह यह भी याद नहीं करना चाहते कि उनकी पत्नी चंद्रिका पूरे 28 दिन तक बीमार रहीं और बेटे अमोल को याद करती रही, पर अमोल  छुट्टी न मिलने की बात कर भारत नहीं आया.

अपने बेटे बाबूलाल वखारिया की इस आदत व स्वभाव से दत्तात्रय परेशान हैं. वह 102 की उम्र में छब्बीस वर्ष के युवक की तरह जिंदगी जीते हैं और वह चाहते हैं कि उनका बेटा बाबू लाल भी अपने नालायक बेटे को भुलाकर अपनी जिंदगी जिए. दतात्रय हमेशा खुश रहते हैं, फन करते रहते हैं. एक दिन दत्तात्रय को अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सच पता चलता है,तब वह एक बूढ़े चीनी का कटआउट लेकर घर पहुंचते है और बताते हैं कि यह चीनी 114 वर्ष तक जिंदा रहा, तो अब दत्तात्रय इसका रिकार्ड तोड़ेंगे.

उसके बाद वह बाबूलाल को बदलने के लिए एक एक कर छह शर्त रखते हैं. शर्त न मानने पर उसे वृद्धाश्रम भेजने की धमकी देते हैं. अब यह छह शर्ते क्या हैं और बाबू लाल में बदलाव आता है या नहीं, इसके लिए फिल्म देखनी पड़ेगी.

फिल्म गुजराती नाटक पर आधारित है. और इंटरवल से पहले फिल्म जिस ढंग से आगे बढ़ती है, उसे देखते हुए दर्शक यही सोचता रहता है कि नाटक को फिल्म में बदलने की क्या जरुरत थी. इंटरवल से पहले फिल्म प्रभावित नहीं करती है. इंटरवल तक फिल्म मूर्खतापूर्ण हास्य चुटकलों के अलावा कुछ नहीं है. मगर इंटरवल के बाद फिल्म सही मायनों में न सिर्फ गति पकड़ती है, बल्कि अति संवेदनशील व भावुकता वाली फिल्म बन जाती है, जो कि हर इंसान को सिखाती है कि महज संपत्ति के लिए मां बाप से रिश्ता रखने वाले बच्चों को घर से बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए.

इतना ही नहीं फिल्म में एक खूबसूरत संवाद है-‘‘औलाद नालायक निकले, तो उसे भूल जाना चाहिए. सिर्फ उसका बचपन याद रखना चाहिए.’’ फिल्म की कमजोर कड़ी है बेतुके दृश्यों से भरी पटकथा. फिल्म में एक सीन है, जहां दत्तात्रय अपने बेटे बाबू को हर दिन डाक्टर से मिलने पर रोक लगाने के लिए डाक्टर पर 250 रूपए से भरा बटुआ चुराने का आरोप लगाने की सलाह देता है. यह पटकथा लेखक के खाली दिमाग का परिचायक है. इसी तरह कई जगह पटकथा लेखक की कमजोरी उजागर होती है.

फिल्मकार उमेश शुक्ला यह साबित करने के लिए संघर्ष करते नजर आते हैं कि तीन पुरुष पात्रों के साथ, बिना हीरोईन के भी बेहतर फिल्म बन सकती है. इंटरवल से पहले तो निर्देशक के तौर पर वह काफी निराश करते हैं, मगर इंटरवल के बाद वह फिल्म पर अपनी पकड़ बनाने में कामयाब होते हैं. फिल्म में पिता पुत्र के बीच के आत्मीय व भावुक संबंध बड़ी खूबसूरती के साथ उकेरे गए हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर दोनों ही अभिनय के महारथी हैं. अमिताभ बच्चन अपने अभिनय से भावनाओं का ऐसा सैलाब उकेरते हैं कि दर्शक हंसने के साथ साथ रोता भी है. मगर उनकी सभी धारणात्मक अति उत्साही प्रकृति एक सीमा के बाद असहनीय हो जाती हैं. इतना ही नहीं अमिताभ बच्चन इस फिल्म में खुद को बार बार दोहराते हुए नजर आए हैं. उन्हे देख दर्शकों को अमिताभ बच्चन की कुछ पुरानी फिल्मों की याद आती रहती है.

बाबूलाल के किरदार को निभाने में ऋषि कपूर को कड़ी मेहनत करने की जरुरत नहीं पड़ी. वह बिना संवादों के, महज अपने चेहरे के भाव से बहुत कुछ कह जाते हैं. अमिताभ बच्चन व ऋषि कपूर बड़ी सहजता से पिता पुत्र के किरदारों में लोगों के दिलों में समा जाते हैं. इन दो महान कलाकारों के साथ ही धीरू का किरदार निभाने वाले अभिनेता जिमित त्रिवेदी ने ठीक ठाक अभिनय किया है. फिल्म में यह तीसरा किरदार भी काफी अहम है, क्योंकि पिता पुत्र के किरदार और उनके बीच हो रही बातचीत को अंतःदृष्टि देने का काम तो धीरू ही करता है, पर जिमित त्रिवेदी घर की बैठक में नाटक करते हुए लगते हैं.

फिल्म में पुराने लोकप्रिय गीतों की कुछ पंक्तियों को नजरंदाज कर दें, तो फिल्म का गीत संगीत साधारण है. कैमरामैन लक्ष्मण उटेकर ने  प्रशंसा बटोरने वाला काम किया है.

एक घंटा 42 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘102 नौट आउट’’ का निर्माण ट्रीटौप इंटरटेनमेंट, बेंचमार्क पिक्चर्स, सोनी पिक्चर्स इंटरटेनमेंट फिल्मस ने मिलकर किया है. फिल्म के निर्देशक उमेश शुक्ला, लेखक सौम्या जोशी, पटकथा लेखक विकास पाटिल,  कैमरामैन लक्ष्मण उटेकर, संगीतकार सलीम सुलेमान और पार्श्व संगीतकार जौर्ज जोसेफ  तथा फिल्म के कलाकार हैं – अमिताभ बच्चन, ऋषि कपूर, जिमित त्रिवेदी, धर्मेंद्र गोहिल व अन्य.

VIDEO : हॉलीवुड सेलेब्रिटी सिंगर सेलेना गोमेज़ लुक

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

आपने देखा नोरा फतेही का यह मजाकिया वीडियो

‘बिग बौस सीजन 9’ में नजर आईं एक्ट्रेस नोरा फतेही ने फिल्म ‘बाहुबली’ से अपने करियर की शुरुआत की थी. नोरा ने बिग बौस से काफी सुर्खियां बटोरीं थी और शो में उन्होंने अपने डांस का हुनर भी दिखाया था. जिसके बाद से ही नोरा सोशल मीडिया पर अपनी डांसिंग वीडियो शेयर करती रहती हैं. जिसके बाद हाल ही में उनका एक वीडियो सामने आया है. इस वीडियो में वह डबल रोल में नजर आ रही हैं. वह एक मां और बेटी बनी दिखाई दे रही हैं.

दरअसल, नोरा इस वीडियो में मां और बेटी बनी हुई हैं और वह एक बेहद फनी अंदाज में दिख रही हैं. वीडियो में मां उनको शादी के लिए लड़कों की तस्वीरें दिखाती हैं लेकिन नोरा मना कर देती है लेकिन इसके बाद वीडियो में जो होता है उसे देख आप भी अपनी हंसी नहीं रोक पाएंगे. इसलिए देर मत कीजिए और यह वीडियो देखिए-

हालांकि, यहां आपको यह भी बता दें कि यह नोरा का एक पुराना वीडियो है जो उन्होंने काफी वक्त पहले अपने इंस्टाग्राम पर शेयर किया था. वहीं फिल्मों की बात करें तो इस साल की शुरुआत में नोरा फिल्म ‘माई बर्थडे सौन्ग’ में नजर आईं थी.

नोरा बेहद खूबसूरत एक्ट्रेस है, यह अक्सर अपने डांस वीडियों सोशल मीडिया पर शेयर करती रहती हैं, कुछ वक्त पहले नोरा एमटीवी ट्रोल पुलिस में गई थीं. यह शो ट्रोलर्स को मद्देनजर रखकर बनाया गया है. यहां नोरा को ट्रोल करने वाले एक शख्स को बुलाया गया था लेकिन उसे इस बात का अंदाजा भी नहीं था तभी नोरा वहां आती हैं और फिर क्या थोड़ी देर बाद बातों बातों में नोरा उस ट्रोलर की क्लास लगा देती हैं और बहुत ही ज्यादा डांटती हैं क्योंकि उस शख्स ने नोरा के पैरों को लेकर अभद्र टिप्पणी की थी.

VIDEO : कलरफुल स्ट्रिप्स नेल आर्ट

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

खुदकुशी : मेरी बेटी भागी तब मुझे महसूस हुआ

मेरी नजरें पंखे की ओर थीं. मुझे ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे मैं पंखे से झूल रहा हूं और कमरे के अंदर मेरी पत्नी चीख रही है. धीरेधीरे उस की चीख दूर होती जा रही थी.

सालों के बाद आज मुझे उस झुग्गी बस्ती की बहुत याद आ रही थी जहां मैं ने 20-22 साल अपने बच्चों के साथ गुजारे थे.

मेरे पड़ोसी साथी चमनलाल की धुंधली तसवीर आंखों के सामने घूम रही थी. वह मेरी खोली के ठीक सामने आ कर रहने लगा था. उसी दिन से वह मेरा सच्चा यार बन गया था. उस के छोटेबड़े कई बच्चे थे.

समय का पंछी तेजी से पंख फैलाए उड़ता जा रहा था. देखते ही देखते बच्चे बड़े हो गए. चमनलाल का बड़ा बेटा जो 20-22 साल का था, बुरी संगत में पड़ कर आवारागर्दी करने लगा. घर में हुड़दंग मचाता. छोटे भाईबहनों को हर समय मारतापीटता.

चमनलाल उसे समझाबुझा कर थक चुका था. मैं ने भी कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ. जब भी चमनलाल से इस बारे में बात होती तो मैं उसे ही कुसूरवार मान कर लंबाचौड़ा भाषण झाड़ता. शायद उस के जख्म पर मरहम लगाने के बजाय और हरा कर देता.

सुहानी शाम थी. सभी अपनेअपने कामों में मसरूफ थे. तभी पता चला कि चमनलाल की बेटी अपने महल्ले के एक लड़के के साथ भाग गई.

चमनलाल हांफताकांपता सा मेरे पास आया और यह खबर सुनाई तो उस के जख्म पर नमक छिड़कते हुए मैं बोला, ‘‘कैसे बाप हो? अपने बच्चों की जरा भी फिक्र नहीं करते. कुछ खोजखबर ली या नहीं? चलो साथ चल कर ढूंढ़ें. कम से कम थाने में तो गुमशुदगी की रिपोर्ट करा ही दें.’’

चमनलाल चुपचाप खड़ा मेरी ओर देखता रहा. मैं ने उस का हाथ पकड़ कर खींचा लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ.

मैं ने अपनी पत्नी से जब यह कहा तो वह रोनी सूरत बना कर बोली, ‘‘गरीब अपनी बेटी के हाथों में मेहंदी लगाए या उस के अरमानों की अर्थी उठाए…’’

मैं अपनी पत्नी का मुंह देखता रह गया, कुछ बोल नहीं पाया. जंगल की आग की तरह यह खबर फैल गई. लोग तरहतरह के लांछन लगाने लगे. जिस के मुंह में दांत भी नहीं थे, वह भी अफवाहें उड़ाने और चमनलाल को बदनाम कर के मजा लूट रहा था. किसी ने भी एक गरीब लाचार बाप के दर्द को समझने की कोशिश नहीं की. किसी ने आ कर हमदर्दी के दो शब्द नहीं बोले.

चमनलाल अंदर ही अंदर टूट गया था. उस ने चिंताओं के समंदर से निकलने के लिए शराब पीना शुरू कर दिया. गम कम होने के बजाय और बढ़ता गया. घर की सुखशांति छिन गई.

रोज शाम को वह नशे की हालत में घर आता और घर से चीखपुकार, गालीगलौज, लड़ाईझगड़ा शुरू हो जाता. चमनलाल जैसा हंसमुख आदमी अब पत्नी को पीटने भी लगा था. वह गंदीगंदी गालियां बकता था.

इधर, मिल में हड़ताल हो गई थी. दूसरे मजदूरों के साथसाथ चमनलाल की गृहस्थी का पत्ता धीरेधीरे पीला होने लगा था. आधी रात को चमनलाल ने मेरा दरवाजा खटखटाया. मेरे बच्चे सो रहे थे.

मैं ने दरवाजा खोला और चमनलाल को बदहवास देखा तो घबरा गया.

‘‘क्या बात है चमनलाल?’’ मैं ने हैरानी से पूछा.

चमनलाल उस वक्त बिलकुल भी नशे में नहीं था. वह रोनी सूरत बना कर बोला, ‘‘मेरा बड़ा बेटा दूसरी जात की लड़की को ब्याह लाया है और उसे इसी घर में रखना चाहता है लेकिन मैं उसे इस घर में नहीं रहने दे सकता.’’

मैं ने कहा, ‘‘उसे कहा नहीं कि दूसरी जगह ले कर रखे?’’

‘‘नहीं, वह इसी घर में रहना चाहता है. मेरी उस से बहुत देर तक तूतू मैंमैं हो चुकी है,’’ चमनलाल बोला.

मैं ने कहा, ‘‘रात में हंगामा खड़ा मत करो. अभी सो जाओ. सुबह देखेंगे.’’

अगली सुबह मैं जरा देर से उठा. बाहर भीड़ जमा थी. मैं हड़बड़ा कर उठा. बाहर का सीन बड़ा भयावह था. चमनलाल की पंखे से लटकी हुई लाश देख कर मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया.

उस के बाद से पुलिस का आनाजाना शुरू हो गया. कभी भी, किसी भी समय आती और लोगों से पूछताछ कर के लौट जाती. चमनलाल की मौत से लोग दुखी थे वहीं पुलिस से तंग आ गए थे.

मेरे मन में कई बुरे विचार करवट लेते रहे. क्या चमनलाल ने खुदकुशी की थी या किसी ने उस की… फिर… किस ने…? कई सवाल थे जिन्होंने मेरी नींद चुरा ली थी.

मेरी पत्नी और बच्चे डरेसहमे थे. पुलिस बारबार आती और एक ही सवाल दोहराती. हम लोग इस हरकत से परेशान हो गए थे.

इस बेजारी के चलते और बच्चों की जिद पर मैं उस महल्ले को छोड़ कर दूसरे शहर चला गया और उस कड़वी यादों को भुलाने की कोशिश करने लगा.

लेकिन सालों बाद चमनलाल की याद और उस की रोनी सूरत आंखों के सामने घूमने लगी. उस का दर्द आज मुझे महसूस होने लगा, क्योंकि आज मेरी बड़ी बेटी पड़ोसी के अवारा लड़के के साथ… वह मेरी… नाक कटा गई थी. मैं खुद को कितना मजबूर महसूस कर रहा था. आज मैं चमनलाल की जगह खुद को पंखे से लटका हुआ देख रहा था.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें