Hindi Story: कैलेंडर गर्ल-कैसी हकीकत से रूबरू हुई मोहना

‘‘श्री…मुझे माफ कर दो…’’ श्रीधर के गले लग कर आंखों से आंसुओं की बहती धारा के साथ सिसकियां लेते हुए मोहना बोल रही थी.

मोहना अभी मौरीशस से आई थी. एक महीना पहले वह पूना से ‘स्कायलार्क कलेंडर गर्ल प्रतियोगिता’ में शामिल होने के लिए गई थी. वहां जाने से पहले एक दिन वह श्री को मिली थी.

वही यादें उस की आंखों के सामने चलचित्र की भांति घूम रही थीं.

‘‘श्री, आई एम सो ऐक्साइटेड. इमैजिन, जस्ट इमैजिन, अगर मैं स्कायलार्क कलेंडर के 12 महीने के एक पेज पर रहूंगी दैन आई विल बी सो पौपुलर. फिर क्या, मौडलिंग के औफर्स, लैक्मे और विल्स फैशन वीक में भी शिरकत करूंगी…’’ बस, मोहना सपनों में खोई हुई बातें करती जा रही थी.

पहले तो श्री ने उस की बातें शांति से सुन लीं. वह तो शांत व्यक्तित्व का ही इंसान था. कोई भी चीज वह भावना के बहाव में बह कर नहीं करता था. लेकिन मोहना का स्वभाव एकदम उस के विपरीत था. एक बार उस के दिमाग में कोई चीज बस गई तो बस गई. फिर दूसरी कोई भी चीज उसे सूझती नहीं थी. बस, रातदिन वही बात.

टीवी पर स्कायलार्क का ऐड देखने के बाद उसे भी लगने लगा कि एक सफल मौडल बनने का सपना साकार करने के लिए मुझे एक स्प्रिंग बोर्ड मिलेगा.

‘‘श्री, तुम्हें नहीं लगता कि इस कंपीटिशन में पार्टिसिपेट करने के लिए मैं योग्य लड़की हूं? मेरे पास एथलैटिक्स बौडी है, फोटोजैनिक फेस है, मैं अच्छी स्विमर हूं…’’

श्री ने आखिर अपनी चुप्पी तोड़ी और मोहना की आंखों को गहराई से देखते हुए पूछा, ‘‘दैट्स ओके, मोहना… इस प्रतियोगिता में शरीक होने के लिए जो 25 लड़कियां फाइनल होंगी उन में भी यही गुण होंगे. वे भी बिकनी में फोटोग्राफर्स को हौट पोज देने की तैयारी में आएंगीं. वैसी ही तुम्हारी भी मानसिक तैयारी होगी क्या? विल यू बी नौट ओन्ली रैडी फौर दैट लेकिन कंफर्टेबल भी रहोगी क्या?’’

श्री ने उसे वास्तविकता का एहसास करा दिया. लेकिन मोहना ने पलक झपकते ही जवाब दिया, ‘‘अगर मेरा शरीर सुंदर है, तो उसे दिखाने में मुझे कुछ हर्ज नहीं है. वैसे भी मराठी लड़कियां इस क्षेत्र में पीछे नहीं हैं, यह मैं अपने कौन्फिडैंस से दिखाऊंगी.’’

मोहना ने झट से श्री को जवाब दे कर निरुतर कर दिया. श्री ने उस से अगला सवाल पूछ ही लिया, ’’और वे कौकटेल पार्टीज, सोशलाइजिंग…’’

‘‘मुझे इस का अनुभव नहीं है लेकिन मैं दूसरी लड़कियों से सीखूंगी. कलेंडर गर्ल बनने के लिए मैं कुछ भी करूंगी…’’ प्रतियोगिता में सहभागी होने की रोमांचकता से उस का चेहरा और खिल गया था.

फिर मनमसोस कर श्री ने उसे कहा, ‘‘ओके मोहना, अगर तुम ने तय कर ही लिया है तो मैं क्यों आड़े आऊं? खुद को संभालो और हारजीत कुछ भी हो, यह स्वीकारने की हिम्मत रखो, मैं इतना ही कह सकता हूं…’’

श्री का ग्रीन सिगनल मिलने के बाद मोहना खुश हुई थी. श्री के गाल पर किस करते हुए उस ने कहा, ‘‘अब मेरी मम्मी से इजाजत लेने की जिम्मेदारी भी तुम्हारी ही है?’’

श्री ने भी ज्यादा कुछ न बोलते हुए हामी भर दी. श्री के समझाने के बाद मोहना की मम्मी भी तैयार हो गईं. मोहना आखिर सभी को अलविदा कह कर मौरीशस पहुंची. यहां पहुंचने के बाद उसे एक अलग ही दुनिया में आने का आभास हुआ था… उस के सदाशिवपेठे की पुणेरी संस्कृति से बिलकुल ही अलग किस्म का यहां का माहौल था. फैशनेबल, स्टाइल में फ्लुऐंट अंगरेजी बोलने वाली, कमनीय शरीर की बिंदास लड़कियां यहां एकदूसरे की स्पर्धी थीं. इन 30 खूबसूरत लड़कियों में से सिर्फ 12 को महीने के एकएक पन्ने पर कलेंडर गर्ल के लिए चुना जाना था.

शुरुआत में मोहना उन लड़कियों से और वहां के माहौल से थोड़ी सहमी हुई थी. लेकिन थोड़े ही दिनों में वह सब की चहेती बन गई.

सब से पहले सुबह योगा फिर हैल्दी बे्रकफास्ट, फिर अलगअलग साइट्स पर फोटोशूट्स… दोपहर को फिर से लाइट लंच… लंच के साथ अलगअलग फू्रट्स, फिर थोड़ाबहुत आराम, ब्यूटीशियंस से सलाहमशवरा, दूसरे दिन जो थीम होगी उस थीम के अनुसार हेयरस्टाइल, ड्रैसिंग करने के लिए सूचना. शाम सिर्फ घूमने के लिए थी.

दिन के सभी सत्रों पर स्कायलार्क के मालिक सुब्बाराव रेड्डी के बेटे युधि की उपस्थिति रहती थी. युधि 25 साल का सुंदर, मौडर्न हेयरस्टाइल वाला, लंदन से डिग्री ले कर आया खुले विचारों का हमेशा ही सुंदरसुंदर लड़कियों से घिरा युवक था.

युधि के डैडी भी रिसौर्ट पर आते थे, बु्रअरी के कारोबार में उन का बड़ा नाम था. सिल्वर बालों पर गोल्डन हाईलाइट्स, बड़ेबड़े प्लोटेल डिजाइन के निऔन रंग की पोशाकें, उन के रंगीले व्यक्तित्व पर मैच होती शर्ट्स किसी युवा को भी पीछे छोड़ देती थीं. दोनों बापबेटे काफी सारी हसीनाओं के बीच बैठ कर सुंदरता का आनंद लेते थे.

प्रतियोगिता के अंतिम दौर में चुनी गईं 15 लड़कियों में मोहना का नाम भी शामिल हुआ है, यह सुन कर उस की खुशी का ठिकाना ही न रहा. आधी बाजी तो उस ने पहले ही जीत ली थी, लेकिन यह खुशी पलक झपकते ही खो गई. रात के डिनर के पहले युधि के डैडी ने उसे स्वीट पर मिलने के लिए मैसेज भेजा था. मोहना का दिल धकधक कर रहा था. किसलिए बुलाया होगा? क्या काम होगा? उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था. लेकिन जाना तो पड़ेगा ही. आखिर इस प्रतियोगिता के प्रमुख का संदेश था.

श्री को छोड़ कर किसी पराए मर्द से मोहना पहली बार एकांत में मिल रही थी.

जब वह रेड्डी के स्वीट पर पहुंची थी तब दरवाजा खुला ही था. दरवाजे पर दस्तक दे कर वह अंदर गई. रेड्डी सिल्क का कुरता व लुंगी पहन कर सोफे पर बैठा था. सामने व्हिस्की की बौटल, गिलास, आइस फ्लास्क और मसालेदार नमकीन की प्लेट रखी थी.

‘‘कम इन, कम इन मोहना, माई डियर…’’ रेड्डी ने खड़े हो कर उस का हाथ पकड़ कर उसे सोफे पर बैठाया.

मोहना अंदर से सहम गई थी. रेड्डी राजकीय, औद्योगिक और सामाजिक सर्कल में मान्यताप्राप्त थे. इतना ही नहीं ‘कलेंडर गर्ल’ में सब से हौट सुपरमौडल का चुनाव तो यही करने वाले थे.

‘‘ड्रिंक,’’ उन्होंने मोहना से पूछा. मोहना ने ‘नो’ कहा, फिर भी उन्होंने दूसरे खाली गिलास में एक पैग बना दिया. थोड़ी बर्फ और सोडा डाल कर उन्होंने गिलास मोहना के सामने रखा.

‘‘कम औन मोहना, यू कैन नौट बी सो ओल्ड फैशंड, इफ यू वौंट टु बी इन दिस फील्ड,’’ उन की आवाज में विनती से ज्यादा रोब ही था.

मोहना ने चुपचाप गिलास हाथ में लिया. ‘‘चिअर्स, ऐंड बैस्ट औफ लक,’’ कह कर उन्होंने व्हिस्की का एक बड़ा सिप ले कर गिलास कांच की टेबल पर रख दिया.

मोहना ने गिलास होंठों से लगा कर एक छोटा सिप लिया, लेकिन आदत न होने के कारण उस का सिर दुखने लगा.

रेड्डी ने उस से उस के परिवार के बारे में कुछ सवाल पूछे. वह एक मध्यवर्गीय, महाराष्ट्रीयन युवती है, यह समझने के बाद तो उन्होंने कहा, ‘‘तुम्हारी हिम्मत की दाद देता हूं, मोहना… लेकिन अगर तुम्हें सचमुच कलेंडर गर्ल बनना है, तो इतना काफी नहीं है… और एक बार अगर तुम्हारी गाड़ी चल पड़ी, तब तुम्हें आगे बढ़ते रहने से कोई नहीं रोक सकता. सिर्फ थोड़ा और कोऔपरेटिव बनने की जरूरत है…’’

रेड्डी ने व्हिस्की का एक जोरदार सिप लेते हुए सिगार सुलगाई और उसी के धुएं में वे मोहना के चेहरे की तरफ देखने लगे.

रेड्डी को क्या कहना है यह बात समझने के बाद मोहना के मुंह से निकला, ‘‘लेकिन मैं ने तो सोचा था, लड़कियां तो मैरिट पर चुनी जाती हैं…’’

‘‘येस, मैरिट… बट मोर दैन रैंप, मोर इन बैड…’’ रेड्डी ने हंसते हुए कहा और अचानक उठ कर मोहना के पास आ कर उस के दोनों कंधों पर हाथ रखा और अपनी सैक्सी आवाज में कहा, ‘‘जरा सोचो तो मोहना, तुम्हारे भविष्य के बारे में… मौडलिंग असाइनमैंट… हो सकता है फिल्म औफर्स…’’

इतने में दरवाजे पर दस्तक हुई और वेटर खाने की टे्र ले कर अंदर आया. मोहना उन के हाथ कंधे से दूर करते हुए उठी और उन की आंखों में देख कर उस ने कहा, ‘‘आई एम सौरी, बट आई एम नौट दैट टाइप, रेड्डी साहब,’’ और दूसरे ही पल वह दरवाजा खोल कर बाहर आ गई.

उस रात वह डिनर पर भी नहीं गई. रात को नींद भी नहीं आ रही थी. बाकी लड़कियों के हंसने की आवाज रात को देर तक उसे आ रही थी. उस की रूममेट रिया रातभर गायब थी और वह सुबह आई थी.

दूसरे ही दिन उस के हाथ में स्कायलार्क का लैटर था, पहले तो अंतिम दौर के लिए उस का चुनाव हुआ था, लेकिन अब उस का नाम निकाल दिया गया था. वापसी का टिकट भी उसी लैटर के साथ था.

उस के सारे सपने टूट चुके थे. मनमसोस कर मोहना पूना आई थी और श्री के गले में लग कर रो रही थी, ‘‘मेरी… मेरी ही गलती थी, श्री… स्कायलार्क कलेंडर गर्ल बनने का सपना और सुपर मौडल बनने की चाह में मैं ने बाकी चीजों की तरफ ध्यान ही नहीं दिया. लेकिन यकीन करो मुझ पर, श्री… मैं ने वह लक्ष्मण रेखा कभी भी पार नहीं की… उस के पहले ही मैं पीछे मुड़ गई और वापस लौट आई, अपने वास्तव में, अपने विश्व में तुम्हारा भरोसा है न श्री?’’

श्री ने उसे बांहों में भर लिया…’’ अब 12 महीनों के पन्नों पर सिर्फ तुम्हारे ही फोटोज का कलेंडर मैं छापूंगा, रानी,’’ उस ने हंसते हुए कहा और मोहना रोतेरोते हंसने लगी.

उस की वह हंसी, उस के फोटोशूट की बनावटी हंसी से बहुत ही नैचुरल और मासूमियत भरी थी.

Hindi Story: बंपर ड्रा-बीवी के चंगुल में थानेदार

थानेदार साहब की पत्नी की फरमाइशें रोजाना बढ़ती जा रही थीं. वे परेशान थे, आखिर करें तो क्या करें? इधर लोगों में बहुत जागरूकता आ गई थी. थोड़ी भी आड़ीटेढ़ी बात होती कि ‘मानवाधिकार आयोग’ को फैक्स कर देते थे.

कुछ उठाईगीर तो आजकल मोबाइल फोन पर रेकौर्डिंग कर के उन्हें सुना भी देते थे. एक बार तो थानेदार साहब अपनी फेसबुक पर थे कि अचानक एक वीडियो दिखा. उन्हें लगा कि यह तो किस्सा कहीं देखा है.

उस वीडियो की असलियत यही थी कि थानेदार साहब एक शख्स को पंखा बना कर लात, जूतों, डंडे से मार रहे थे. थोड़ी देर बाद जब जूम कर के कैमरा थानेदार के चेहरे पर गया, तो पता चला कि अरे, यह तो वे खुद ही हैं.

कुछ महीने पहले उन्होंने एक अपराधी को जेब काटने पर मारा था और उस से जेबकटी का अपना हिस्सा मांगा था. पर उस ने नहीं दिया था, तब उसे पंखे पर लटका कर पिटाई की थी.

यह वीडियो वही था. इसी के चलते उन का तबादला हो गया था. वे तो शानदार सैटिंग वाले थे, हमेशा मंदिर में भिखारी से ले कर पुजारी और भगवान को चढ़ावा चढ़ाते थे, जिस की बदौलत लाइन हाजिर नहीं हो पाए थे. बात वैसे इतनी सी थी कि एक जेबकटी की रिपोर्ट आई थी. रिपोर्ट करने वाले बंदे ने बताया कि 6 हजार रुपए निकाले गए थे.

बाजार का दिन था और उस दिन जेबकटाई का ठेका पोटा को दिया गया था. उसे पकड़ कर जब पूछा गया, तो उस ने कसम खा कर कहा था कि कुल जमा 8 सौ रुपए थे. अब सच्चा कौन था और झूठा कौन था, पता नहीं.

बस, यही बात पता करने के लिए उसे पंखे पर लटका कर कुटाई की थी और सच की खोज को आम कर देने के चलते थानेदार साहब बदनाम हो गए थे.

बाद में पता चला कि जिस की जेब कटी थी, वही झूठ बोला था. उस की घर वाली ने साड़ी खरीदने के लिए रुपए जेब से निकाल लिए थे.

थानेदार साहब की बहुत इच्छा हुई कि पोटा से माफी मांग लें. लेकिन वरदी के घमंड के चलते वे ऐसा नहीं कर पाए, क्योंकि पोटा ने बारबार कहा था, ‘सर, बेईमानी के काम में ईमानदारी बहुत जरूरी है. मैं ईमानदारी से बता रहा हूं.’

लेकिन जो होना था, वह हो ही गया था. पर आज तक वे जान ही नहीं पाए थे कि आखिर किस ने वीडियो शूट किया था, क्योंकि आजकल तो पैन में भी शूटिंग की सहूलियत आने लगी है. जो नया थाना मिला था, वहां के भूखेनंगे, अमीर सब अच्छे दिनों की औलाद थे. उम्मीद से भरे हुए. महात्मा गांधी की बातों पर चलने वाले कि मामला आपस में सुलझा लो बेहतर है, इसलिए रिपोर्टारिपोर्टी कुछ होती नहीं थी.

थानेदार साहब को हैरत थी कि आखिर ऐसी अहिंसक जगह पर थाना खोलने की जरूरत क्या थी?

जिंदगी में अगर आप एक बार जो खर्चा करने लगें, उस पर लगाम लगाना अगले जन्म में ही मुमकिन है. पत्नीजी को जो खर्च की आदतें लग गई थीं, वे कम होने का नाम ही नहीं लेती थीं. रिश्तेदार भी भिखारियों की तरह आ कर जीजाजी, मामाजी कहते हुए महीनों तक पड़े रहते थे. ऐसे में माली हालत भिखारियों जैसी हो जाना जायज थी.

थानेदार साहब ने पुराने घाघ अपने हवलदार को बुला कर पूछा, ‘‘यहां कुछ महीने और रहा, तो पैंटशर्ट उतार कर तीरथ जाना होगा.’’

हवलदार ने उन्हें तसल्ली दी और अच्छे दिनों का वास्ता देते हुए कहा, ‘‘इतंजार का फल मीठा होता है. आप इंतजार करें.’’

बिल्ली के भाग्य से छींका टूट भी गया. मामला कुछ ऐसा हुआ कि कहीं एक लड़के और लड़की का चोंच लड़ाने का मामला था. कहानी में अमीरीगरीबी की जगह जातपांत आ गई. लड़की वालों ने कहा कि ‘प्राण जाए पर जाति न जाए’ और लड़के को प्यार से बुला कर समझाया, मनाया और जब उस के दिमाग में बात नहीं गई, तो एक लट्ठ जो दिया तो वह मजनू ऐसा गिरा कि खड़ा ही नहीं हो पाया.

उसी दिन एक रिपोर्ट और आई कि एक घर में सेठसेठानी के यहां 2 लोगों ने बंदूक की नोक पर लूटमार कर ली थी. दोनों की रिपोर्ट आ गई और थानेदार साहब ने जांच के लिए एक हवलदार को लगा दिया.

इधर पिछले हफ्ते घरवाली ने नोटिस दे दिया था कि अगर कुछ कमाई नहीं की, तो वह मायके चली जाएगी. उसी समय यह सुनहरे 2 केस हो गए.

थानेदार साहब ने हवलदार को अपने कमरे में बुला कर खास हिदायत दी, ‘‘पहले लूट वाले केस को सुलझाते हैं. हत्या वाला तो आईने की तरह साफ है.’’

हवलदार थानेदार से ज्यादा शातिर था और उस ने करतब दिखाना शुरू कर दिया. जहां डकैती हुई थी, उस गांव के और उस गांव से लगे 10 गांवों के उठाईगीरों, गुंडों के अलावा शरीफ घरों के एक दर्जन लड़कों को पकड़ लिया.

थाने के नाम से उन सब को ठंड लगने लगी थी. दिल्ली से और कुछ के लोकल विधायक, सांसद के फोन आने लगे. जिन के फोन आए, उन्हें एक अलग कमरे में बिठा कर ‘चाय का आर्डर’ करवा दिया. चाय के बाद उन से माफी मांगते हुए एक घंटे और रुक कर कानून की मदद करने की गुजारिश की.

चाय की रिश्वत से ही लड़के मान गए और शांति के साथ मोबाइल पर फिल्में देखने लगे. जिन के फोन नहीं आए थे, उन्हें एकएक कर के कमरे में ले गए और उन्हें बताया गया कि इस मुकदमे की जमानत नहीं होती है और वकील की फीस में 50 हजार खर्च होंगे, फोकट में बदनामी और होगी. टुच्चे पत्रकार चटकारे लेले कर खबर छापेंगे सो अलग.

हवलदार ने थानेदार साहब के सामने ऐसा दिल दहला देने वाला सीन पेश किया कि सब की घिग्घी बंध गई. कुछ प्रवचन सुन कर रोने लगे, कुछ थानेदार साहब के पैरों में गधे की तरह लोटपोट हो गए.

हैरत की बात यह थी कि 2 आदमियों ने लूटा और बुलाया गया था 80 को. 20 थाने में फोन से छूट गए थे. अब जो रकम थी, वह 60 लोगों से ही वसूल करनी थी. उन के मोबाइल, पैन, चश्मे सब उतार कर गुप्त जांच कर ली गई थी और थानेदार साहब कहीं से

2 नंगे तार ले आए, उन्हें बिजली के स्विच में डालते हुए बोले, ‘‘इसे छुआने के बाद जो 750 वोल्ट का करंट लगेगा, तो देश में आबादी रुक जाने में तुम सहयोगी हो जाओगे.’’

तार देख कर भविष्य की चिंता कर के आखिर वे सबकुछ देने को तैयार हो गए, जिस की मांग रखी गई थी. कुछ कमजोर, नंगे लोग भी थे. कुल जमा तकरीबन 3 लाख रुपए की कमाई हो गई और 20 हजार हवलदार, पत्रकारों को और ऊपर भिजवाने के बाद भी 2 लाख का मुनाफा हो गया था. जो 2 लुटेरे थे, वे अभी भी खोजे जाने बाकी थे. वैसे, पूरी लूट 10-20 हजार रुपए की हुई थी.

दूसरा केस तो इश्कमुहब्बत का था. शहर के सब आशिकों को पकड़ कर थाने ले आए और मर्डर केस के बारे में जो मुगलेआजम से ले कर प्रेम कहानी के आखिर तक कहानी सुनाई गई, तो आशिकों ने मां कसम खा कर कहा, ‘वह हमारी बहन जैसी हैं.’

‘‘तब ही तो सालो, तुम ने अपने जीजा का मर्डर कर दिया,’’ थानेदार साहब ने गुस्से में कहा.

सब प्रेमी माथा ठोंकने लगे, ‘कैसे मुंह से बहन शब्द निकल गया. मर्डर केस में मिली उम्रकैद में कैसे जवानी अंधेरे में डूब जाएगी…’

उस महाकाव्य को हवलदार ने पढ़ कर सुनाया, तो सब थरथर कांपने लगे और इस केस में भी थानेदार साहब ने 6 लाख रुपए दक्षिणा में लिए थे.

हत्यारे तो पहले से ही पता थे. उन का केस कमजोर करने के नाम पर एकएक लाख रुपए अलग से लिए और मामला मारने का नहीं, बल्कि एक हादसे का बना दिया गया था.

जिनजिन को थानेदार साहब ने लूट या हत्या में बुलवाया था और छोड़ दिया था, वह सब उन के गुण गाते थक नहीं रहे थे और कुछ ने जो चाय पी लेने के बाद घर का रास्ता नापा था, वे भी खुश थे. कुछ छोटीमोटी शिकायत हुई भी तो विधायक, सांसद ने वे शिकायतें कचरे के डब्बे में फेंक दीं. वे थानेदार साहब का एहसान भूले नहीं थे कि उन के फोन करते ही थानेदार साहब ने चाय पिला कर उन्हें इज्जत के साथ छोड़ दिया था.

थानेदार साहब बहुत खुश थे कि चलो, उन का लकी बंपर ड्रा खुल गया था. वे इंतजार कर रहे थे, ‘काश, ऐसी लौटरी हर महीने खुलती रहे, तो नीचे से ऊपर तक सब खुश रहेंगे. दुनियादारी निभाना इसी को तो कहते हैं.’

थानेदार साहब आजकल बहुत खुश हैं और नई बंपर लौटरी का इंतजार कर रहे हैं.

Hindi Kahani: सुकून-क्यों सोहा की शादी नहीं करवाना चाहते थे उसके माता-पिता

सुधाकरऔर सविता की शादी के 7 साल बाद सोहा का जन्म हुआ था. पतिपत्नी के साथ पूरे परिवार की खुशी की सीमा न रही थी. शानदार दावत का आयोजन कर दूरदूर के रिश्तेदारों को आमंत्रित किया गया था.

सोहा के 3 साल की होने पर उसे स्कूल में दाखिल करवा दिया. एक दिन सविता को बेटी के पैर पर व्हाइट स्पौट्स से दिखे. रात में सविता ने पति को बताया तो अगले दिन सोहा को डाक्टर के पास ले गए. डाक्टर ने ल्यूकोडर्मा कनफर्म किया. जान कर पतिपत्नी को गहरा आघात लगा. इकलौती बेटी और यह मर्ज, जो ठीक होने का नाम नहीं लेता.

डाक्टर ने बताया, ‘‘ब्लड में कुछ खराबी होने के कारण व्हाइट स्पौट्स हो जाते हैं. कभीकभी कोई दवा भी रीएक्शन कर जाती है. आप अधिक परेशान न हों. अब ऐसी दवा उपलब्ध है जिस के सेवन से ये बढ़ नहीं पाते और कभीकभी तो ठीक भी हो जाते हैं.’’

डाक्टर की बात सुन कर सुधाकर और सविता ने थोड़ी राहत की सांस ली. फिर स्किन स्पैशलिस्ट की देखरेख में सोहा का इलाज शुरू हो गया.

यौवन की दहलीज पर पांव रखते ही सोहा गुलाब के फूल सी खिल उठी. उस के सरल व्यक्तित्व और सौंदर्य में बेहिसाब आकर्षण था. मगर उस के पैरों के व्हाइट स्पौट्स ज्यों के त्यों थे. हां, दवा लेने के कारण वे बढ़े नहीं थे. सोहा को अपने इस मर्ज की कोई चिंता नहीं थी.

सविता और सुधाकर ने कभी इस बीमारी का जिक्र अथवा चिंता उस के समक्ष प्रकट नहीं की. अत: सोहा ने भी कभी इसे मर्ज नहीं समझा.

पढ़ाई पूरी करने के बाद फैशन डिजाइनर की ट्रेनिंग के लिए उस का चयन हो गया. वह कुशाग्रबुद्धि थी. अत: फैशन डिजाइनर का कोर्स पूर्ण होते ही उसे कैंपस से जौब मिल गई. बेटी की योग्यता पर मातापिता को गर्व की अनुभूति हुई.

सोहा को जौब करतेकरते 2 साल बीत गए. अब सविता को उस की शादी की चिंता होने लगी. सर्वगुणसंपन्न होने पर भी बेटी में एक भारी कमी के कारण पतिपत्नी की कहीं बात चलाने की हिम्मत नहीं पड़ती. दोनों जानते थे कि उस की योग्यता और खूबसूरती के आधार पर बात तुरंत बन जाएगी, लेकिन फिर उस की कमी आड़े आ जाएगी, सोच कर उन का मर्म आहत होता.

यद्यपि सुधाकर और सविता को पता था कि शरीर की सीमित जगहों पर हुए ल्यूकोडर्मा के दागों को छिपाने के लिए प्लास्टिक सर्जरी कराई जा सकती है, लेकिन पतिपत्नी 2 कारणों से इस के लिए सहमत नहीं थे. पहला यह कि वे अपनी प्यारी बेटी सोहा को इस तरह की कोई शारीरिक तकलीफ नहीं देना चाहते थे और दूसरा यह कि इस रोग को सोहा की नजरों में कुछ विशेष अड़चन अथवा शारीरिक विकृति नहीं समझने देना चाहते थे. इसी कारण सोहा अपने को हर तरह से नौर्मल ही समझती.

दोनों पतिपत्नी को पूरा विश्वास था कि उन की बेटी को अच्छा वर और घर मिल जाएगा. इसी विश्वास पर सुधाकर ने औनलाइन सोहा की शादी का विज्ञापन डाला.

कुछ दिनों के बाद यूएसए से डाक्टर अर्पित का ईमेल आया, साथ में उन का फोटो भी. उन्होंने अपना पूरा परिचय देते हुए लिखा था, ‘‘मैं डा. अर्पित स्किन स्पैशलिस्ट हूं. बैचलर हूं और स्वयं के लिए आप का प्रस्ताव पसंद है. आप ने अपनी बेटी में जिस कमी का वर्णन किया है, वह मेरे लिए कोई माने नहीं रखती है. मैं आप को पूर्ण विश्वास दिलाना चाहता हूं कि हमारी तरफ से आप को या आप की बेटी को कभी किसी शिकायत का मौका नहीं मिलेगा.

‘‘यदि आप को भी हमारा रिश्ता मंजूर हो तो आप लोग बैंगलुरु जा कर मेरे मातापिता से बात कर सकते हैं. बात पक्की होने पर मैं विवाह के लिए इंडिया आ जाऊंगा.’’

अर्पित का मैसेज सुधाकर और सविता को सुखद प्रतीत हुआ. सोहा से भी बात की. उसे भी अर्पित की जौब और फोटो पसंद आया. मातापिता के कहने पर उस ने अर्पित से बात भी की. सब कुछ ठीक लगा.

बैंगलुरु जा कर सुधाकर ने अर्पित के परिवार वालों से बातचीत की. बिना किसी नानुकुर के शादी पक्की हो गई. 1 माह का अवकाश ले कर अर्पित इंडिया आ गया. धूमधाम के साथ सोहा और अर्पित परिणयसूत्र में बंध गए. विवाहोपरांत कुछ दिन मायके और ससुराल में रह कर वह अर्पित के साथ यूएसए चली गई.

सबकुछ अच्छा होने पर भी सुधाकर और सविता को बेटी के शुभ भविष्य के प्रति मन में कुछ खटक रहा था.

यूएसए पहुंच कर सोहा रोज ही मां से फोन पर बातें करती. अपना,

अर्पित का और दिनभर कैसे व्यतीत हुआ, पूरा हाल बताती. अर्पित के अच्छे स्वभाव की प्रशंसा भी करती.

सविता को अच्छा लगता. वे पूछना चाहतीं कि उस के पैरों के बारे में कुछ बात तो नहीं होती, लेकिन पूछ नहीं पाती, क्योंकि अभी तक कभी उस से व्यक्तिगत रूप से इस पर बात कर के उस का ध्यान इस तरफ नहीं खींचा था ताकि बेटी को कष्ट की अनुभूति न हो.

सोहा ने भी कभी इस बाबत मां से कोई बात नहीं की, इस विषय में मां से कुछ कहना उसे कोई जरूरी बात नहीं लगती थी. बस इसी तरह समय सरकता रहा.

स्वयं स्किन स्पैशलिस्ट डाक्टर होने के कारण अर्पित को ल्यूकोडर्मा के बारे में पूरी जानकारी थी. वे इस से परिचित थे कि यह बीमारी आनुवंशिक होती है और न ही छूत से. अपितु शरीर में ब्लड में कुछ खराबी होने के कारण हो जाती है. एक लिमिट में रहने तक प्लास्टिक सर्जरी से छिपाया जा सकता है. उन्होंने सोहा के साथ भी वही किया. कुछ अन्य डाक्टरों से सलाहमशवरा कर के उन्होंने बारीबारी से सोहा के दोनों पैर प्लास्टिक सर्जरी द्वारा ठीक कर दिए.

कुछ समय और बीता तो सोहा को पता चला कि उस के पांव भारी हैं. उस ने अर्पित को इस शुभ समाचार से अवगत कराया.

अर्पित ने अपनी खुशी व्यक्त करते हुए उसे बांहों में भर लिया, ‘‘मां को भी इस शुभ समाचार से अवगत कराओ,’’ अर्पित ने कहा.

‘‘हां, जरूर,’’ सोहा ने मुसकराते हुए कहा.

दूसरे दिन सोहा ने फोन पर मां को बताया. सविता और सुधाकर को अपार हर्ष की

अनुभूति हुई. उन्हें विश्वास हो गया कि उन की बेटी का दांपत्य जीवन सुखद है.

दोनों पतिपत्नी ने शीघ्र यूएसए जाने की तैयारी भी कर ली. सोहा और अर्पित के पास मैसेज भी भेज दिया. यथासमय बेटीदामाद उन्हें रिसीव करने पहुंच गए. काफी दिनों बाद सोहा को देख कर सविता ने उसे गले से लगा लिया. घर आ कर विस्तृत रूप से बातचीत हुई.

सोहा के पैरों को सही रूप में देख कर सुधाकर और सविता को असीम खुशी हुई.

शिकायत करती हुई सविता ने सोहा से कहा, ‘‘अपने पैरों के बारे में तुम ने मुझे नहीं बताया?’’

‘‘हां मां, यह कोई ऐसी विशेष बात तो थी नहीं, जो तुम्हें बताती,’’ सोहा ने लापरवाही से कहा.

सविता के मन ने स्वीकार लिया कि बेटी की जिस बीमारी को ले कर वे लोग 24-25 सालों तक तनाव में रहे वह अर्पित के लिए कोई विशेष बात नहीं रही. ‘योग्य दामाद के साथ बेटी का दांपत्य जीवन और भविष्य उज्ज्वल रहेगा,’ सोच सविता को भारी सुकून मिला.

Hindi Story: एहसास

Hindi Story: बाहर दिन का उजलापन केंचुल बदल कर शाम की सुरमई चादर ओढ़ने लगा था. रंगबिरंगे पक्षियों के झुंड किलकारियां भरते अपने नीड़ की ओर दांडी मार्च कर रहे थे. सड़क और गलियों में कार्पोरेशन की लैड लाइटों की रोशनी का दूधिया शामियाना तन चुका था. प्रकाश बाबू का मन एक रोमांचक जोश से भरा हुआ था. शुभ्रा को लड़के वाले देखने रहे थे. वे पत्नी सहित अगवानी के लिए दरवाजे पर खड़े थे. 4 का समय तय था, घड़ी की सूइयां 5 बजा रही थीं. एकएक पल की देर से  दिल बैचेन हुआ जा रहा था. बड़े लोगों की मसरूफियत अलग किस्म की होती है. कोई जरूरी काम पड़ा हो और प्रोग्राम टाल दें. पत्नी के कहने पर मोबाइल से बात करना चाहते ही थे कि एक इनोवा कार सरपट लपकती इसी ओर आती दिखी. कार का नंबर देख कर सुकून मिला. लड़के वाले ही थे.

कार पास कर रुकते ही दोनों ने मेहमानों का स्वागत किया और उन्हें अंदर ड्राइंगरूम में ले आए.
वे 5 जन थे. अभिषेक, उस के मातापिता और बहन बहनोई. इसी शहर में उन का कपड़े का कारोबार था. अभिषेक कंप्यूटर इंजीनियर था और शुभ्रा एमबीए. दोनों ही बैंगलुरु में अलगअलग जगह जौब पर थे.
नाश्ताचाय देने के बाद पहलगाम कांड आपरेशन सिंदूर पर छोटे से पोस्टमार्टमी संवाद के बाद अभिषेक की बहन ने हंस कर कहा, ‘‘आंटीजी, अब सस्पैंस खत्म भी कीजिए और अपनी लाल परी के हमें दर्शन कराएं,’’ उस के नाटकीय अंदाज पर सभी खिलखिला पड़े. शुभ्रा अपने रूम में तैयार हो रही थी. उस की सहेली काजल हंसीमजाक करती सहयोग कर रही थी. बादामी रंग का सूट. गले, बांह दामन पर महीन बेलबूटों की हलकी कढ़ाई. बाएं कंधे पर सीधा दुपट्टा. साधारण सी ज्वैलरी.

आईने के सामने आई तो काजल चहकी, ‘‘वाह, देखते ही वह कार्टून गश खा कर कहीं गिर पड़े यार…’’ फिर शुभ्रा की दोनों भौंवों के बीच में नन्ही
सी काली बिंदी लगाती हुई बोली,
‘‘यह बिंदी नहीं है, उस कार्टून की
तिरछी नजरों से प्रोटैक्ट करने के लिए ठिठौना है…’’
दोनों ठहाका लगा कर हंस पड़ीं
कि ड्राइंगरूम से मम्मी की आवाज आई, ‘‘काजल, देर करो और शुभ्रा को
ले आओ…’’
‘‘सोच ले, साथ में चल रही हूं
मैं. कहीं तेरी जगह  दिल मचल गया उस कार्टून का तो…’’ काजल ने मजाक किया.
‘‘तो क्याउस पर अभी कौपीराइट थोड़े ही लगा है. ऐसे सौ कार्टून कुरबान मेरी यार पर. अभी यह देख कि अपनी शादी में वेटर का रोल ही करना पड़ रहा.’’
दोनों धीमी चाल से चलती ड्राइंगरूम में आईं. शुभ्रा आगेआगे और काजल पीछे उस के दुपट्टे का छोर थामे. जैसे राजकुमारी और बांदी.

शुभ्रा के हाथ में ड्राई फ्रूट्स की ट्रे थी. अभिषेक के पास जगह खाली रखी गई थी. ट्रे को टेबल पर रख कर शुभ्रा वहां बैठ गई. बैठते हुए नजर तितली सी उड़ती अभिषेक पर पड़ी तो एकदम से चौंक उठी. अरेइस चेहरे को कहीं देखा है पहले. वह चौकन्नी हो गई. भीतर बैठी छठी इंद्री तेजी से यादों के मलबे को कुरेदने में लग गई. कहां देखा होगाकालेज मेंमार्केट मेंया किसी दोस्ताना फंक्शन में. दोनों के शहरों के बीच सिर्फ 30 किलोमीटर का ही तो फासला है. परंपरागत इंटरव्यू एक घंटे चला. सामने तो वह खुश दिख रहा था, पर मन कश्मकश में था. यह तो बिलकुल तय है कि पहले मिल चुके हैं, पर कहांपरिचय का लिंक मिल ही नहीं रहाऊफउस की याद्दाश्त तो खूब तेज है. पढ़ाई में टौपर रही है. फिरलौटने के लिए सभी उठ खड़े हुए तो अभिषेक ने उसे एक ओर ले जा कर कहा, ‘‘ऐसा करते हैं कि कल
मैथान डैम चलते हैं. तफरीह भी हो जाएगी और एकदूसरे को भी लेंगे, ठीक?’’

‘‘बिलकुल,’’ शुभ्रा भी यही चाहती थी. जब तक इस कार्टून से पुरानी मुलाकात का लिंक याद नहीं जाता, रिश्ते के लिए हां नहीं करेगी.
‘‘कल सुबह 10 बजे आप गांधी मोड़ पर कीमाधुरी स्वीट्सके पास मिलें. मैं वहां पहुंच जाऊंगा, ओके…’’
चैन कमबख्त किसी भी तरह नहीं पड़ रहा था. टीवी देखते, बुक पढ़ते और फेसबुक ब्राउज करते. बहुत पुरानी बात तो हो नहीं सकती. फिर भी क्यों नहीं याद रही
रात के 9 बज गए. कल की एक अधूरी पढ़ी कहानी को पूरा करने की कोशिश करने लगी. पढ़ते हुए एक जगह रैगिंग का मामला आया तो अचानक उस कार्टून से जुड़ी घटना डौल्फिन मछली की तरह उछालें भरने लगी जेहन में
सुभाष इंस्टीट्यूट औफ इंजीनियरिंग एंड मैनेजमैंट. मेन गेट परवैलकम फै्रशर्सका बड़ा सा बैनर. कैंपस नएपुराने छात्रछात्राओं के शोर से गूंजता. कालेज में पहला दिन था, धड़कते दिल से ही भीतर गई. शहरी कालेज का मौडर्न माहौल मन में दहशत भर रहा था.
तभी जाने किस ओर से 3 लड़के जिन्न की तरह प्रकट हो गए.
‘‘हाई.. फर्स्ट ईयर की न्यू कमर हो ? हम तुम्हारे सीनियर्सपहला दिन दोस्ताना परिचय के नामठीक…’’

तीनों ने उस से हाथ मिलाया और हंसीमजाक करते दूसरी मंजिल के
एक रूम में गए. दरवाजा बंद सा
कर दिया.
‘‘घबराने का नहीं. बोले तो थोड़ा रैगिंग करने को मांगता बौस कोहलकाफुलका. पहला दिन का शगुन…’’ शांतनु नेमुन्नाभाईके अंदाज में
बोलते हुए पास खड़े मनोज की ओर संकेत किया.
मनोज की ठुड्डी के ऊपर बिंदु के शक्ल की दाढ़ी थी. बदन के कपड़े भी महंगे थे. चेहरे पर अलग रुआब. उस के बाद ऊलजुलूल सवालों का सिलसिला शुरू हुआ.
शुभ्रा शर्म से पानीपानी हुई जा रही थी, जबकि लड़कों के चेहरों पर पानी था ही नहीं, पर वह आत्मविश्वास के साथ जवाब देती गई.
‘‘वैलआज का रैगिंगवा का आखिरी इवैंट…’’ मनोज बोली में बिहारी लहजे का छौंक देता हिनहिनाया, ‘‘देखिए जे हमरा दोस्त अभिषेक आमिर खान जैसा दिखता. दिखता है ? बसआगे बढ़ कर छोटा सा किस करेगा आप को. उस के बाद फिनिश. होंठ पर नहीं, ललाट पर. एतना रियायत दे रहे, ठीक?’’
‘‘प्लीज, मु? जाने दें. रैगिंग के नाम पर ऐसी बेहूदगी ठीक नहीं, शुभ्रा ने बड़े अदब से कहा और
इस बात का ध्यान रखा
कि चेहरे पर डर के भाव उभर पाएं. अभी 3 साल गुजारने हैं यहां.
‘‘यह बेहूदगी हैअरेहम तो शराफत वाली रैगिंग कर रहे यार. लौक्ड कमरे की ओवरनाइट रैगिंग आप ने देखी कहां…’’ शांतनु फनफनाया, ‘‘रैगिंग तो सीनियर्स का हक है, जो अगले साल आप को भी मिल जाएगा.’’
‘‘प्लीज, माफ करें. मु? से यह सब नहीं हो सकेगा. ऐसा हक मु? नहीं चाहिए,’’ अंदर से बेहद डर भी गई थी.
अचानक मनोज तल्ख आवाज में चिल्ला पड़ा, ‘‘बहुत हुआ ड्रामाअभिषेक, आगे बढ़ो,’’ उस की कड़क आवाज पर सभी डर से सहम गए.
अभिषेक हड़बड़ा कर आगे बढ़ा और शुभ्रा के ललाट पर ?ाट से किस जड़ कर पीछे हट गया.
तो यह कार्टून उर्फ अभिषेक वही आमिर खान है. पूरी घटना आंखों के आगे जिंदा हो आई. कैसी तो हवस
टपक रही थी चेहरे से. जिस लड़के
के मन में औरतों के लिए जरा भी
इज्जत नहीं, जिस का चरित्र ढीला हो
उस से शादीकभी नहीं. परआसानी से नहीं छोड़ेगी. कल जरूर मिलेगी. पहले जम कर क्लास लेगी, फिर मना कर देगी.
दूसरे दिन तय समय परमाधुरी स्वीट्सके पास गया अभिषेक. ओला कार से उतरते देख कर मजाकिया हंसी, ‘‘इनोवा के रहते एक भाड़े की
कार से…’’
‘‘हांकभीकभी आम जन की भीड़ का हिस्सा बन कर भीड़ में चलने का मजा ही कुछ और होता है,’’ अभिषेक के होंठों पर मोहक मुसकान तितली सी नाच रही थी. शुभ्रा मन में हंसी, लफ्फाजी में भी अव्वल.
दोनों मैथान डैम पर गए. 2 गेट खुले हुए थे और बेग से गिरता दूधिया पानी सिहरन से भर रहा था. सैर के दौरान हर मुद्दे पर बातें होती रहीं. क्या अभिषेक को रैगिंग का वाकिआ याद नहीं आया? आया है तो असल मुद्दे पर क्यों नहीं रहे बरखुरदार.
दोनों पार्क में चले आए. वहां सैलानियों की खूब चहलपहल थी. अभिषेक पुचका यानी पानी पूरी के ठेले के पास गया.

‘‘शायद तुम्हारे मन में वह रैगिंग वाली घटना अभी भी गांठ बन कर जमी हुई है…’’
‘‘वह घटना साधारण लग रही है आप कोसाधारण. एक हफ्ते तक अपसैट रही थी मैं. उस लंपट के एक इशारे पर लपक कर किस कर बैठनाएक लड़की की इज्जत का जरा भी खयाल नहीं आया…’’ शुभ्रा फट पड़ी.
‘‘जैसा तुम सम? रही हो मैं वैसा नहीं हूं. लड़कियों और औरतों के लिए मेरे मन में खूब इज्जत है. छुटपन से ही ऐसे संस्कार मिले हैं. पूरी अकैडमिक लाइफ में लड़कियों की ओर बुरी नजर से कभी देखा ही नहीं, विश्वास करोपर उस समय मैं मजबूर था.’’
‘‘मजबूर…’’ पुचका मुंह में डालता हाथ थम गया.
‘‘हांमनोज का बाप एमएलए था. गवर्निंग बौडी का चेयरमैन भी. गंदी रैगिंग के कई रिकौर्ड थे मनोज के नाम. इन लोगों से पंगा ले कर कालेज में पढ़ पाना मुश्किल होता. तुम्हें 3 साल गुजारने थे. बात हलकी किस पर छूट रही थी, सो तुम्हारे फायदे के लिए करना पड़ा.’’
‘‘क्या बकवास हैउस समय आप की आंखों में लिजलिजी चमक देखी थी…’’ रूमाल से मुंह पोंछती शुभ्रा के लहजे में मजबूती थी, ‘‘मैं आप से शादी नहीं कर सकती…’’
‘‘लिजलिजी चमक नहीं धुआंता गुस्साकहो तो मां की कसम खा सकता हूं…’’ अभिषेक बोला.
‘‘चलिए, वहां कोन वाली कुल्फी खाते हैं,’’ थोड़ा आगे ही कुल्फी स्टौल था. शुभ्रा मामला बदलती स्टौल की ओर बढ़ गई. स्टौल से एक लड़की बाहर निकल रही थी कि 2 लड़के शरारत से जानबू? कर उस से टकरा गए. कुल्फी धप्प से नीचे.

‘‘सौरीसौरी…’’ बापी आंख मारते हुए बोला, ‘‘आइए, कौर्नैटो से भी अच्छी कुल्फी आइसक्रीम खरीद कर दूंगा…’’ और बेहिचक उस की कलाई थाम कर बाहर की ओर खींचने लगा.
लड़की डर से चीख पड़ी, ‘‘यह क्या कर रहे हो, हाथ छोडि़ए.’’
अभिषेक की नजर पड़ी, तो लड़के की हिमाकत पर हैरान रह गया. तेजी
से पास कर बोला, ‘‘अरे वाह, सरेआम गुंडई…’’
‘‘तुम बीच में क्यों टपक रहे हो? हम मैडम से बात कर रहे हैं ,’’ उस के साथी बकुल ने अभिषेक को धक्का दे कर कहा.
इस धक्के से अभिषेक नीचे गिर पड़ा. कोहनी छिल गई. शुभ्रा घबरा गई. वह लड़की कलाई छुड़ाते हुए बोली, ‘‘हर्जाने की कोई बात नहीं दादा. इट्स ओके.’’
कलाई छूटी तो बकुल ने लड़की का दुपट्टा खींच लिया, ‘‘कुल्फी तो हमारे संग खानी ही होगी मैडम.’’
यह देख कर अभिषेक की आंखों में खून उतर आया. लपक कर बापी का कौलर पकड़ कर चीखा, ‘‘दुपट्टा दीजिए इन का, नहीं तो…’’
‘‘ओहइतनी गरमी…’’ एक विलेन जैसी खिलखिलाहट के संग छाती पर एक जोरदार फाइट. अभिषेक की दर्दीली कराह निकल गई और सिर चकरा गया.
बापी उस लड़की की बांह पकड़ कर फिर से खींचने लगा. जोर से खींचने से लड़की कुछ कदम आगे घिसट गई.
शुभ्रा बड़बड़ा उठी, ‘‘किडनैपिंग…’’
वह लड़की डर से चिल्ला रही थी, ‘‘प्लीज हैल्पबचाओ…’’
इन लोगों की ?ाड़प से मजमा
जुट गया वहां. मजमे में मजा लेने वाले ज्यादा थे. लड़कों की मवाली वाली हरकतें लोगों के मन में खौफ भर
रही थीं.

शुभ्रा की बड़बड़ाहट अभिषेक ने
सुन ली. सचमुचलड़कों के इरादे खतरनाक हैं. लड़की को यों खतरे में छोड़ देना गवारा नहीं हुआ उसे.
शुभ्रा का कलेजा किसी अनजाने डर से धकधक कर रहा था, पर आगे बढ़ते अभिषेक को रोकने की हिम्मत भी कर सकी. अभिषेक के दिमाग में कभी के सीखे कराटे के एकमुश्त दांव जुगुनू से चिलक उठे. खड़ी हथेलियों को क्रौस में ला कर टांग घुमाते हुए बापी की गरदन और बकुल की जांघों पर सीधी चोट की. बापी की आंखों के आगे तारे नाच गए, जबकि बकुल मांमांचिल्लाता दोनों हाथों से अपनी जांघ के कोमल हिस्से को पकड़े उकड़ू ढह गया.
शुभ्रा उस लड़की का हाथ पकड़ कर भीड़ की ओर दौड़ गई. अभिषेक भी उस ओर दौड़ना चाह रहा था कि तभी बापी के हाथ में धारदार छूरा चमक उठा. अभिषेक थम गया. भागना नहीं सामना करना होगा अब. छुरे पर नजर जमाए पैंतरा तौल रहा था कि बापी का हाथ लहराया और बांह पर गहरा जख्म बन गया.
दर्द से अभिषेक की चीख निकल गई. वहां से लहू बहने लगा. गुस्से से चेहरे और गरदन की नसें खिंच गईं. दांत भींचते हुए पगलाया सा बापी पर खड़ी हथेलियों और टांगों से यों कराटे फेंके  कि छुरे समेत बापी दूर जा गिरा.
तभी पुलिस वैन का सायरन गूंज गया. दोनों लड़के लंगड़ाते हुए किसी तरह उठे और पलक ?ापकते गायब हो गए. उन के जाते ही भीड़ की हमदर्दी तीनों के नजदीक सिमट आई.
आननफानन शुभ्रा ने एक आटोरिकशा रोका. लोगों की मदद से घायल अभिषेक को आटोरिकशा में चढ़ाया. आटोरिकशा घर की ओर तेजी से दौड़ चला.
शुभ्रा की नम आंखों में अभिषेक के लिए अथाह प्यार हिलोरें मार रहा था. अगर आज अभिषेक होता तोदुपट्टे को उस की बांह के जख्म पर बांधती बुदबुदाई, ‘‘माय लवमाय हीरो…’’

महावीर अग्रवाल

Social Media Influence: दो कौड़ी के इन्फ्लुएंसर्स करोड़ों कचरा फौलोअर्स

Social Media Influence: जो इन्फ्लुएंसर्स सोशल मीडिया पर सिर्फ कचरा फैलाते हैं उन के करोड़ों फौलोअर्स कैसे हो जाते हैं? लोग घंटों रील्स देखने में लगा देते हैं लेकिन उन्हें कुछ हासिल नहीं होता फिर भी वे क्यों जोंक की तरह फोन से चिपके रहते हैं?

आजकल कई बड़े सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के पास मिलियंस व्यूज और फौलोअर्स हैं लेकिन उन का कंटैंट इतना घटिया, टौक्सिक और बेकार है कि उन के व्यूअर्स पर तरस आता है. लोगों के पास कितना फालतू समय है जो ऐसे कंटैंट देखते हैं. ऐसे इन्फ्लुएंसर्स दर्शकों का कीमती समय तो बरबाद करते ही हैं, उन की मानसिकता भी खराब करते हैं.

एल्विश यादव को यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर करोड़ों व्यूज मिलते हैं और फौलोअर्स भी मिलियंस में हैं. बिग बौस जीतने के बाद यह बंदा और ज्यादा उद्दंड हो गया. औरतों के बारे में कुछ भी बोलता है. एल्विश का ज्यादातर गालीगलौज, बेवकूफीभरा चैलेंज और सनसनी फैलाने वाला कंटैंट बनाता है. यह सब देख कर युवा घंटों स्क्रौल करते हैं, हंसते हैं, लेकिन बाद में उन्हें कुछ हासिल नहीं होता. न कोई स्किल, न ज्ञान, न प्रेरणा. एलविश को फौलो करना, बस, समय की बरबादी है.

सवाल यह है कि इस तरह के इन्फ्लुएंसर्स, जो सोशल मीडिया पर सिर्फ कचरा फैलाते हैं, के करोड़ों फौलोअर्स कैसे हो गए? इस का कारण है डोपामीन. शौर्ट वीडियो, ड्रामा और सनसनी तुरंत खुशी देती है. ब्रेन इसे ‘फास्ट फूड’ की तरह एडिक्टिव मान लेता है. कई लोग तो बिना सोचे फौलो करते हैं कि ‘सब देख रहे हैं तो ठीक होगा.’ वे नहीं पाते कि इस से उन की लाइफ में क्या वैल्यू ऐड हो रही है.

कुछ नौजवान, रियल लाइफ की टैंशन, पढ़ाई, जौब या प्रौब्लम्स से भागने के लिए ऐसे कंटैंट का शिकार होते हैं. लगता है, मजा आ रहा है लेकिन साल बीतने पर पछतावा होता है कि समय कहां गया?

इसे फोमो यानी फेयर औफ मिसिंग आउट कहते हैं. अगर नहीं देखा तो पीछे रह जाऊंगा जबकि हकीकत में ये इन्फ्लुएंसर्स खुद का प्रोडक्ट बेच रहे हैं न कि आप का भला कर रहे हैं. जब सब फौलो कर रहे हैं तो लगता है सही होगा लेकिन भीड़ में शामिल होना ही समय की सब से बड़ी बरबादी है.

समय आप की सब से बड़ी संपत्ति है. अगर आप इन से दूर रह कर किताब पढ़ें, स्किल सीखें या असल रिश्ते बनाएं तो जिंदगी कहीं बेहतर हो सकती है. ऐसे इन्फ्लुएंसर्स को अनफौलो कर के आप खुद को समय और मानसिक शांति दे सकते हैं. या फिर बने रहिए बेवकूफ.

आप जैसे बेवकूफ फौलोअर्स की वजह से ही ऐसे फालतू क्रिएटर्स करोड़पति बन रहे हैं. स्क्रीन पर कोई भी फालतू इंसान, जो न पढ़ालिखा है, न स्किल्ड है और न ही वह समाज को कोई वैल्यू देता है, बस गालीगलौज करता है, बेवकूफीभरे चैलेंज करता है या ‘अल्फा मेल’ बन कर मर्दानगी बेचता है उस के पास लाखोंकरोड़ों फौलोअर्स इकट्ठा हैं. यूट्यूब पर मिलियंस व्यूज, इंस्टाग्राम पर रील्स वायरल, एक्स पर ट्रैंडिंग. क्यों, क्योंकि बेवकूफ लोग ऐसे क्रिएटर्स की गंदगी में डूबते रहते हैं.

पहले  इन फालतू क्रिएटर्स के फौलोअर्स इतने ज्यादा क्यों हैं? तुम्हारा ब्रेन डोपामीन का जंकफूड खा रहा है. शौर्ट वीडियो, ड्रामा,  गालीगलौज ये सब 15-30 सैकंड में तुम्हारे दिमाग को खुशी का तुरंत शौट देते हैं. असल में ये तुम्हारे अंदर की मोरैलिटी को नीचे गिराने वाले कंटैंट हैं लेकिन तुम्हारा ब्रेन इसे रिवार्ड  है. तुम्हें लगता है, बस, एक और वीडियो, और फिर घंटों बीत जाते हैं. ये क्रिएटर्स जानते हैं कि तुम्हारी एकाग्रता 8 सैकंड से ज्यादा नहीं चलती, इसलिए वे लगातार क्लिकबेट डालते रहते हैं. थंबनेल ऐसे ही क्लिक किए बिना न रह पाओ लेकिन यह भ्रम की दुनिया है, बरबादी का रास्ता है. बच सकते हो तो बच जाओ.

लोगों की कमजोरी का फायदा उठाता है एल्गोरिदम

यूट्यूब, टिकटौक, इंस्टाग्राम जैसे तमाम प्लेटफौर्म्स को ज्यादा वाच टाइम चाहिए. अगर तुम किसी वीडियो पर रुकते हो, लाइक करते हो, कमैंट करते हो, शेयर करते हो तो वह कंटैंट और लोगों तक पहुंचता है. फालतू क्रिएटर जानबू?ा कर विवाद पैदा करते हैं क्योंकि विवाद से ज्यादा इंगेजमैंट मिलती है. ज्यादा इंगेजमैंट से ज्यादा रीच मिलती है और ज्यादा रीच मिलने से ज्यादा फौलोअर्स पैदा होते हैं. तुम्हारी हर हाहा या ‘भाई सही कहा’ कमैंट उन के लिए पैसा है.

तुम्हें एस्केप की जरूरत है और वे उसे बेच रहे हैं. पढ़ाई/जौब/लाइफ में मेहनत करने के बजाय तुम इन के चक्कर में पड़ जाते हो क्योंकि इन का कंटैंट आसान है, सोचने की जरूरत नहीं. बस, हंसो, गुस्सा करो या कूल फील करो. ये तुम्हें सिस्टम के खिलाफ होने का नशा देते हैं जबकि असल में ये तुम्हारा समय चूस रहे होते हैं.

जब सब फौलो कर रहे हैं तो तुम भी सोचते हो, शायद कुछ तो होगा, फोमो यानी फियर औफ मिसिंग आऊट तुम्हें खींचता है. अगर मैं नहीं देखूंगा तो पीछे रह जाऊंगा. हकीकत में तुम पीछे ही रह जाते हो. लाइफ में, कैरियर में और स्किल्स में भी.

बेवकूफ फौलोअर्स की वजह से ही ये लोग करोड़ों कमा रहे हैं, लग्जरी कारें दिखा रहे हैं. वे अपने फौलोअर्स को सपने बेच रहे हैं, फौलोअर्स को कोई वैल्यू नहीं मिल रही. क्या ऐसे फौलोअर्स की जिंदगी का कोई मकसद है? या बस इन फालतू इंसानों के ड्रामे में जी रहे हैं ये लोग?

फौलोअर्स को यह बात  होगी कि उम्र का सब से कीमती समय बरबाद हो रहा है. ऐसे क्रिएटर्स दिमाग को सुन्न और सुस्त कर रहे हैं. क्रिटिकल थिंकिंग खत्म हो रही है. ध्यान खत्म, प्रोडक्टिविटी जीरो.

ऐसे फालतू क्रिएटर्स के ज्यादातर फौलोअर्स वे लोग हैं जिन्होंने कभी किताब नहीं पढ़ी, कोई कोर्स नहीं किया या जिंदगी में कभी असली मेहनत नहीं की.

तुम इन के लिए प्रोडक्ट हो. ये तुम्हें एड दिखा कर स्पौंसरशिप ले कर पैसा कमा रहे हैं. तुम उन के लिए सिर्फ एक नंबर हो. अगर तुम्हें मजा चाहिए तो किताब पढ़ो, स्किल सीखो, जिम जाओ, असली दोस्तों से मिलो, सोशल बनो. लेकिन असल में सोशल बनने के लिए सोशल मीडिया से दूर होना होगा वरना जिंदगीभर पछताओगे कि वह समय कहां गया?

अगर तुम सच में बदलना चाहते हो तो आज ही शुरू करो. वरना ये फालतू क्रिएटर्स तुम्हारे जैसे लाखों लोगों से ही अमीर होते रहेंगे और तुम गरीब से गरीब बने रहोगे. ये क्रिएटर तुम्हारा समय, दिमाग और आत्मसम्मान सब बरबाद कर देंगे.

सोशल मीडिया की दुनिया में एक तरफ वे लोग हैं जो सालों की मेहनत से कुछ सार्थक कंटैंट बनाते हैं और दूसरी तरफ कुछ दो कौड़ी के इन्फ्लुएंसर्स हैं जिन के वीडियो देख कर ऐसा प्रतीत होता है कि ये समाज को खोखला करने वाले दीमक हैं, फिर भी इन दीमकों के फौलोअर्स की संख्या करोड़ों में है.

दरअसल इंस्टाग्राम, टिकटौक या यूट्यूब जैसे तमाम सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स के एल्गोरिदम क्वालिटी पर नहीं बल्कि इंट्रस्ट पर बेस्ड होते हैं. जो इन्फ्लुएंसर्स जानते हैं कि एल्गोरिदम को कैसे अपने पक्ष में करना है, वे एल्गोरिदम का इस्तेमाल अच्छी तरह कर लेते हैं. एल्गोरिदम को सच्चाई नहीं बल्कि सैंसेशनल कंटैंट चाहिए. ये झूठे और अफवाहजनक थम्बनेल बना कर मूर्खों की भीड़ इकट्ठा करते हैं और ऐसे दो कौड़ी के इन्फ्लुएंसर्स के वीडियो वायरल होते हैं व फौलोअर्स बढ़ते जाते हैं.

-शकील

 

 

Bhojpuri Cine Award night: पटना में सजी सितारों की महफिल

15 मार्च, 2026 की पटना की वह शाम कुछ अलग ही थी. हवा में एक खास तरह की उत्सुकता घुली हुई थी. ऐसा लग रहा था कि पटना शहर किसी बड़े उत्सव का इंतजार कर रहा हो. जैसे ही सूरज ढला, बिहार की राजधानी का दिल बापू सभागार रोशनी, रंगों और रौनक से जगमगाने लगा. हर ओर सजीधजी भीड़, कैमरों की चमक, रैड कार्पेट पर कदम रखते कलाकार और उन के स्वागत में गूंजती तालियां, सब मिल कर एक ऐसा नजारा बना रहे थे, जिसे शब्दों में बांधना आसान नहीं.

इस बार के अवार्ड्स शो में एक खास बदलाव देखने को मिला. डिजिटल प्लेटफार्म्स को ध्यान में रखते हुए पुरस्कारों को 3 भागों में बांटा गयाथिएटर रिलीज, ओटीटी कंटैंट और यूट्यूब/टीवी रिलीज. यह बदलाव इस बात का संकेत था कि भोजपुरी सिनेमा अब समय के साथ कदम से कदम मिला कर चल रहा है. डिजिटल माध्यमों ने सिर्फ कलाकारों को नया मंच दिया है, बल्कि दर्शकों तक अपनी पहुंच को भी कई गुना बढ़ा दिया है.
शाम के तकरीबन 6 बजते ही सभागार के दरवाजे पूरी तरह खुल चुके थे. अंदर प्रवेश करते ही ऐसा लगता था मानो आप किसी भव्य फिल्मी सैट पर गए हों. दीवारों पर ?िलमिलाती रोशनी, मंच की शानदार सजावट और हर सीट पर बैठा एक उत्साहित दर्शक, हर कोई उस पल का इंतजार कर रहा था जब भोजपुरी फिल्मों के सितारे मंच पर उतरेंगे. धीरेधीरे पूरा हाल खचाखच भर गया. दर्शकों में नौजवान से ले कर बुजुर्ग तक शामिल थे, हर उम्र का आदमी भोजपुरी सिनेमा के इस उत्सव का हिस्सा बनने आया था.

अतिथियों के कमैंट्स के साथ भव्य शुरुआत 7वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स शो की शुरुआत बेहद गरिमामय और भव्य अंदाज में हुई, जहां मंच पर आए अतिथियों के कमैंट्स ने कार्यक्रम को एक नई दिशा और ऊंचाई दे दी. इस भव्य समारोह के मुख्य अतिथि बिहार विधानसभा के अध्यक्ष डाक्टर प्रेम कुमार रहे, जबकि विशिष्ट अतिथियों में भोजपुरी जगत के जानेमाने गीतकार संगीतकार और लौरिया विधायक विनय बिहारी, बैकुंठपुर विधायक मिथिलेश तिवारी, ओबरा विधायक डाक्टर प्रकाश चंद्रा, डेहरी विधायक राजीव रंजन सिंह उर्फ सोनू सिंह, फिल्म फैडरेशन औफ इंडिया एंड इंडियन मोशन पिक्चर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के वर्तमान अध्यक्ष अभय सिन्हा और फिल्म फैडरेशन औफ इंडिया के उपाध्यक्ष
इंडियन मोशन पिक्चर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के जनरल सैक्रेटरी निशांत उज्ज्वल समेत कई गणमान्य हस्तियां मौजूद रहीं.

इस 7वें सीजन के अवार्ड समारोह के मुख्य प्रायोजक सवेरा फर्नीचर और सहप्रायोजक सेन्को गोल्ड एंड डायमंड्स के वरिष्ठ अधिकारी भी इस अवसर पर उपस्थित रहे, जिस से कार्यक्रम की भव्यता और भी बढ़ गई. अपने संबोधन में डाक्टर प्रेम कुमार ने कहा, ‘‘भोजपुरी सिनेमा हमारी संस्कृति, परंपरा और लोकजीवन का सशक्त माध्यम है. आज यह इंडस्ट्री जिस मुकाम पर पहुंची है, वह कलाकारों की मेहनत और दर्शकों के प्रेम का परिणाम है. ऐसे आयोजनों से सिर्फ कलाकारों का मनोबल बढ़ता है, बल्कि हमारी भाषा और संस्कृति को भी नई पहचान मिलती है.’’ विनय बिहारी ने अपने भावुक और जोशीले अंदाज में कहा, ‘‘भोजपुरी सिर्फ एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी आत्मा है. सिनेमा के माध्यम से हम अपनी मिट्टी की खुशबू पूरे देश और दुनिया तक पहुंचा रहे हैं. सरस सलिल का यह प्रयास काबिले तारीफ है, जो कलाकारों को सम्मान दे कर उन्हें और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है.’’

मिथिलेश तिवारी ने कहा, ‘‘भोजपुरी सिनेमा तेजी से विकास कर रहा है और अब यह सीमाओं से बाहर निकल कर वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है. हमें इसे और सशक्त बनाने के लिए सकारात्मक और पारिवारिक कंटैंट पर ध्यान देना होगा.’’ दिल्ली प्रैस के संपादक और प्रकाशक परेश नाथ ने अपने संबोधन में  कहा, ‘‘दिल्ली प्रैस हमेशा से समाज को मजबूत करने वाले प्रयासों के साथ खड़ा रहा है. सरस सलिल के माध्यम से हम भोजपुरी सिनेमा और उस से जुड़े कलाकारों को एक सशक्त मंच देने का कार्य कर रहे हैं.’’ दिल्ली प्रैस के कार्यकारी प्रकाशक अनंत नाथ ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा, ‘‘हम सभी गणमान्य अतिथियों और कलाकारों का हृदय से स्वागत करते हैं. यह मंच सिर्फ अवार्ड देने का नहीं, बल्कि भोजपुरी सिनेमा की उपलब्धियों को सैलिब्रेट करने का अवसर है. हमें गर्व है कि हम इस यात्रा का हिस्सा हैं.’’

स्टेज पर छाया शुभम और माही का जादू 7वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स की चमचमाती शाम में वैसे तो सितारों की कोई कमी नहीं थी, लेकिन जैसे ही मंच पर शो के एंकर और दमदार अभिनेता शुभम तिवारी और ग्लैमरस अदाकारा माही खान की एंट्री हुई तो पूरा माहौल ही बदल गया. तालियों की गड़गड़ाहट, सीटियों की आवाज और दर्शकों का उत्साह साफ बता रहा था कि अब शो का असली मजा शुरू हो चुका है.

आर्यन बाबू की धमाकेदार परफौर्मैंस
सितारों की मौजूदगी, उन के चेहरे की मुसकान, दर्शकों की ओर हाथ हिलाना और कैमरों के सामने उन की सहजताइस पूरी शाम को किसी फिल्मी क्लाइमैक्स जैसा बना रही थी. लेकिन इन सब के बीच जिस ने सच में महफिल लूट ली, वे थेलिटिल स्टारआर्यन बाबू. जैसे ही आर्यन बाबू ने स्टेज पर कदम रखा, माहौल पूरी तरह बदल गया. अपने चुलबुले अंदाज और जोशीले गानों के साथ उन्होंने दर्शकों को ?ामने पर मजबूर कर दिया. उन की हर बीट पर लोग खुद खुद ठुमके लगाने लगे. उन की मासूमियत, एनर्जी और मंच पर पकड़ इतनी शानदार थी कि हर कोई उन की परफौर्मैंस में खो गया.

मोबाइल फ्लैश से जगमगा उठा हाल परफौर्मैंस के दौरान एक खास पल ऐसा आया, जब पूरे आडिटोरियम की लाइट्स अचानक बु? दी गईं. अंधेरे के उस माहौल में दर्शकों ने अपने मोबाइल के फ्लैश औन कर दिए और देखते ही देखते पूरा हाल तारों की तरह जगमगा उठा. अतिथि भी खुद को रोक पाए
आर्यन बाबू ने जैसे ही अपने ठेठ बिहारी अंदाज में गाना शुरू किया, मंच के सामने बैठे विशिष्ट अतिथि भी खुद को रोक नहीं पाए. बिहार विधानसभा के अध्यक्ष डाक्टर प्रेम कुमार ने अपने अंदाज में गमछा लहराते हुए शुरू कर दिया. उन के साथसाथ अन्य अतिथि और दर्शक भी इस मस्ती में शामिल हो गए. पूरा माहौल ऐसा बन गया मानो यह सिर्फ एक अवार्ड शो नहीं, बल्कि एक भव्य उत्सव हो, जहां हर कोई संगीत की धुन पर एकसाथ थिरक रहा हो.

रंगारंग प्रस्तुतियां, गीत, संगीत और डांस ने बांध दिया समां 7वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स की यह शाम सिर्फ पुरस्कारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि एक भव्यस्टार नाइटमें तबदील हो गई, जहां हर प्रस्तुति अपने आप में एक उत्सव बन कर सामने आई. मंच पर जैसेजैसे कलाकारों की एंट्री होती गई, माहौल और भी रंगीन होता चला गया. दर्शकों की उत्सुकता, तालियों की गूंज और रोशनी से जगमगाता मंच, सबकुछ मिल कर इस शाम को खास बना रहा था. चाइल्ड एक्ट्रेस चाहत राज, दिव्या सिंह, आर्यन बाबू, ढोलू यादव और स्वास्तिका राय ने अपने शानदार और ऊर्जा से भरपूर डांस परफौर्मैंस से कार्यक्रम की शुरुआत को ही यादगार बना दिया. उन की मासूम अदाओं और जबरदस्त स्टेज प्रेजैंस ने दर्शकों का दिल जीत लिया.

कार्यक्रम में इस के अलावा भी कई सितारों ने अपनी प्रस्तुतियों से समां बांध दिया. गायिका अनुपमा यादव की सुरीली आवाज, दीपक दिलदार का जोश, माही खान का ग्लैमरस अंदाज, पल्लवी गिरि की शानदार प्रस्तुति और सीपी भट्टढेला बाबाऔर ईशिका सिंह का अनोखा अभिनय और डांस, हर कलाकार ने अपने अंदाज में दर्शकों का दिल जीत लिया. यहां गीत, संगीत, नृत्य और अभिनय का ऐसा अद्भुत संगम देखने को मिला, जहां हर प्रस्तुति पिछली से बेहतर नजर रही थी. कलाकारों ने अपने हिट गीतों पर जिस ऊर्जा और जुनून के साथ प्रस्तुति दी, उस ने पूरे माहौल को जीवंत बना दिया. तालियों की गूंज, दर्शकों की सीटियों की आवाज और मंच पर कलाकारों की शानदार अदाएं, ये सब मिल कर उस रात को एक अविस्मरणीय अनुभव बना रहे थे.

‘कल्लू’ के गानों पर उठा हाल
इस के बाद जैसे ही भोजपुरी स्टार अरविंद अकेलाकल्लूने अपने सुपरहिट गानों की धुन छेड़ी, पूरा माहौल ही बदल गया. दर्शक अपनी सीटों से उठ कर लगे और पूरे सभागार में एक कौन्सर्ट जैसा नजारा देखने को मिला. इसी बीच जब एक्ट्रेस रक्षा गुप्ता मंच पर उन के साथ जुड़ीं, तो तालियों की गड़गड़ाहट ने पूरे हाल को गुंजा दिया. दोनों की कैमिस्ट्री और लाइव परफौर्मैंस ने दर्शकों को बांधे रखा. कार्यक्रम की सब से खास बात यह रही कि इस में आधुनिकता के साथसाथ भोजपुरी लोक संस्कृति भी पूरी तरह जिंदा रही. लोकगीतों और पारंपरिक नृत्य प्रस्तुतियों ने दर्शकों को अपनी जड़ों से जोड़ दिया. यह सिर्फ मनोरंजन नहीं था, बल्कि एक सांस्कृतिक अनुभव था, जहां हर गीत और हर ताल में मिट्टी की खुशबू महसूस हो रही थी.

हर नाम के साथ गूंज उठा सभागार
सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स शो की इस भव्य शाम में जहां एक ओर रंगारंग प्रस्तुतियों ने माहौल को ऊर्जा से भर रखा था, वहीं दूसरी ओर अवार्ड्स की घोषणाएं पूरे आडिटोरियम में रोमांच की नई लहर पैदा कर रही थीं. जैसे ही मंच पर एंकर शुभम तिवारी और माही खान की जोड़ी एकएक कर विभिन्न श्रेणियों के विजेताओं के नामों की घोषणा करती थी, पूरे हाल में सन्नाटा और उत्सुकता एकसाथ महसूस होती थी. हर कोई अपनी सांसें थामे बैठा था, इस इंतजार में कि अगला नाम किस का होगा.
वह पल किसी फिल्मी सीन से कम नहीं था, जब किसी कलाकार या टैक्नीशियन का नाम पुकारा जाता और पूरा सभागार तालियों की गूंज से भर उठता. सीटों पर बैठे कलाकार अचानक मुसकान के साथ खड़े हो जाते.

इस भव्य आयोजन में तकरीबन
75 विभिन्न श्रेणियों में पुरस्कार दिए गए, जो यह दिखाता है कि भोजपुरी सिनेमा अब कितनी तेजी से विस्तार और विविधता की ओर बढ़ रहा है. यह इस बात का संकेत था कि अब सिर्फ परदे पर दिखने वाले चेहरों को ही नहीं, बल्कि परदे के पीछे काम करने वाले हर शख्स की मेहनत को भी बराबर पहचान मिल रही है.
ओवरआल कैटेगरी में ये रहे बैस्ट
सब से बड़ा आकर्षण रहा बैस्ट एक्टर (ओवरआल) का खिताब, जिसे  हीरो अरविंद अकेलाकल्लूने फिल्ममेरी बीवी से बचाओके लिए जीता. इसी फिल्म ने बाकी कई कैटेगरी में भी अपना दबदबा बनाए रखा. इस फिल्म के लिए निशांत उज्ज्वल के प्रोडक्शन में बैस्ट फिल्म (ओवरआल) का अवार्ड मिला, जबकि रोहित सिंहमटरूने इसी फिल्म के लिए बैस्ट कौमिक एक्टर (ओवरआल) का अवार्ड जीत कर दर्शकों को हंसी से सराबोर करने की अपनी कला को साबित किया.
संगीत के क्षेत्र में भीतोहार कातिल बा फिगरगीत का जादू सिर चढ़ कर बोला. अरविंद अकेलाकल्लूको बैस्ट वायरल सिंगर मेल (ओवरआल), आशुतोष तिवारी को बैस्ट गीतकार (ओवरआल) और प्रियांशु सिंह को बैस्ट म्यूजिक डायरैक्टर (अल्बम, ओवरआल) का अवार्ड मिला. वहीं मीरा म्यूजिक को बैस्ट म्यूजिक कंपनी (ओवरआल) का अवार्ड दे कर इस गीत की कामयाबी को बढ़ा दिया.

फिल्मघर का बंटवाराने भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई. इस फिल्म के लिए संजय कुमार श्रीवास्तव को बैस्ट डायरैक्टर (ओवरआल) और रिंकू भारती को बैस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस (ओवरआल) का अवार्ड मिला. इस के अलावा विद्या मौर्य को इसी फिल्म के लिए बैस्ट कौस्ट्यूम डिजाइनर (ओवरआल) का अवार्ड दिया गया.
एक्टिंग के दूसरे क्षेत्रों में भी कई कलाकारों ने अपनी छाप छोड़ी. सीपी भट्ट को फिल्मपुनर्जन्म
के लिए बैस्ट नैगेटिव एक्टर (ओवरआल) और संजय पांडेय को भी इसी फिल्म के लिए बैस्ट सपोर्टिंग एक्टर (ओवरआल) का अवार्ड मिला.
वहीं अंजना सिंह कोबड़की दीदी छोटकी दीदीके लिए बैस्ट एक्ट्रेस (ओवरआल) का खिताब मिला और आलोक कुमार को इसी फिल्म के लिए बैस्ट मेल प्लेबैक सिंगर (ओवरआल) के रूप में सम्मानित किया गया. प्रियंका सिंह कोमातृ देवो भव:’ के लिए बैस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर (ओवरआल) का अवार्ड मिला.
नई प्रतिभाओं में बाल कलाकारों ने भी शानदार प्रदर्शन किया. ‘बिन पिया डोली बिन पिया गवनाके लिए आर्यन बाबू को बैस्ट चाइल्ड एक्टर (ओवरआल) और स्वास्तिका राय को बैस्ट चाइल्ड एक्ट्रेस (ओवरआल) को सम्मान मिला.
तकनीकी और रचनात्मक क्षेत्रों में भी बैस्ट काम को सराहा गया. प्रसून यादव को बैस्ट कोरियोग्राफर (ओवरआल), जनार्दन पांडेयबबलूको बैस्ट लाइन प्रोड्यूसर (ओवरआल) और सुरेंद्र मिश्रा विवेक मिश्रा को मेरी बीवी से बचाओके लिए बैस्ट राइटर (ओवरआल) का अवार्ड मिला. वहीं मनोज भावुक कोदुलहनिया नाच नचाएके लिए बैस्ट लिरिसिस्ट (ओवरआल) चुना गया.
डिजिटल प्लेटफार्म की बढ़ती लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुएजान लेगी सोनमको बैस्ट भोजपुरी वैब सीरीज (ओवरआल) का खिताब दिया गया. इस के अलावा रंजन सिन्हा को बैस्ट पीआरओ (ओवरआल) के रूप में सम्मानित किया गया, जिन्होंने भोजपुरी सिनेमा के प्रचारप्रसार के क्षेत्र में अपना अहम योगदान दिया है.
अवार्ड शो को कामयाब बनाने में इन का रहा बड़ा रोल
7वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स शो को कामयाब बनाने में जिन का खास योगदान रहा उन में गायक और एक्टर विवेक पांडेय एक नाम थे, जिन्होंने आयोजन को कामयाब बनाने के लिए दिनरात एक कर दिया. उन्होंने केवल फिल्म हस्तियों से तालमेल किया, बल्कि उन्हें अवार्ड में निमंत्रित करने का जिम्मा भी संभाला.

अरविंद
अकेलाकल्लूने कहा, ‘‘यह अवार्ड मेरे लिए सिर्फ सम्मान नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है. सरस सलिल जैसे प्रतिष्ठित मंच से बैस्ट एक्टर का सम्मान मिलना मेरे कैरियर का खास पल है. मैं अपने दर्शकों और टीम का दिल से धन्यवाद करता हूं.’’
अंजना सिंह बोलीं, ‘‘यह सम्मान मेरे लिए बेहद खास है. सरस सलिल के इस अवार्ड शो ने जो पहचान दी है, वह और बेहतर काम करने की प्रेरणा देती है. यह अवार्ड मेरी पूरी टीम और मेरे दर्शकों को समर्पित है.’’
संजय पांडेय ने यह अवार्ड मिलने पर कहा, ‘‘सहायक अभिनेता के रूप में यह सम्मान मिलना मेरे लिए गर्व की बात है. यह साबित करता है कि मेहनत और ईमानदारी से किया गया काम कभी व्यर्थ नहीं जाता. सरस सलिल का मैं दिल से आभारी हूं.’’
कुणाल सिंह बोले, ‘‘भोजपुरी सिनेमा ने एक लंबा और संघर्षपूर्ण सफर तय किया है. आज यह इंडस्ट्री जिस मुकाम पर है, वह इस के कलाकारों, निर्माताओं और दर्शकों की लगातार कोशिश का नतीजा है. आने वाला समय भोजपुरी सिनेमा के लिए और भी स्वर्णिम होगा.’’
इंपा के अध्यक्ष अभय कुमार सिन्हा बोले, ‘‘बिहार भोजपुरी सिनेमा की आत्मा है. यहीं से इस इंडस्ट्री की शुरुआत हुई और आज भी इस की जड़ें यहीं मजबूत हैं. यहां के दर्शकों का प्यार ही इस सिनेमा की असली ताकत है.
‘‘भोजपुरी सिनेमा अब सिर्फ क्षेत्रीय सिनेमा नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान
बना रहा है. इस तरह के अवार्ड शो इंडस्ट्री को आगे बढ़ाने में खास रोल निभाते हैं.’’

निशांत उज्ज्वल ने अपनी बात रखते हुए कहा, ‘‘भोजपुरी सिनेमा तेजी से आगे बढ़ रहा है. कंटैंट और टैक्नोलौजी दोनों में सुधार हो रहा है. हमें अब वर्ल्ड लैवल पर अपनी पहचान बनाने के लिए और बेहतर कहानियों और क्वालिटी पर ध्यान देना होगा.’’
संजना पांडेय बोलीं, ‘‘इस मंच से सम्मानित होना मेरे लिए सपने जैसा है. यह और मेहनत करने और अपने दर्शकों के लिए बेहतर प्रदर्शन करने की प्रेरणा देता है.’’
अपर्णा मलिक ने बताया, ‘‘यह अवार्ड मेरे संघर्ष और मेहनत का नतीजा है. सरस सलिल जैसे प्रतिष्ठित मंच से मिला यह सम्मान मेरे कैरियर में नई ऊर्जा भरता है. मैं अपने दर्शकों और पूरी टीम का धन्यवाद करती हूं.’’
देव सिंह बोले, ‘‘7वां सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स जिस भव्यता और गरिमा के साथ आयोजित किया गया, वह वाकई काबिल तारीफ है. मंच सज्जा से ले कर प्रस्तुति तक हर चीज में एक प्रोफैशनल टच दिखाई दिया. यह आयोजन भोजपुरी सिनेमा के बढ़ते स्तर और उस की पहचान को दर्शाता है.’’
7वें सीजन में ये रहे प्रायोजक
सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स शो के 7वें सीजन में मुख्य प्रायोजक सवेरा फर्नीचर रहा जो एक भरोसेमंद फर्नीचर ब्रांड है. यह मौडर्न डिजाइन, मजबूत क्वालिटी और किफायती कीमतों के लिए जाना जाता है.
इस अवार्ड शो का सह प्रायोजक सेन्को गोल्ड एंड डायमंड्स रहा जो सेन्को गोल्ड लिमिटेड (कंपनी) का
एक ब्रांड है और जिस का 80 से ज्यादा साल का शानदार इतिहास है. कंपनी ने कार्यक्रम में कई गिफ्ट हैंपर भी इनाम के रूप में दिए.

सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स का ओटीटी पार्टनर भोजपुरी सिनेमा के नामचीन
सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स के 7वें सीजन में डिजिटल दुनिया की मजबूत मौजूदगी भी देखने को मिली. इस भव्य आयोजन का आधिकारिक ओटीटी पार्टनर स्टेज ऐप रहा, जो आज क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों और वैब सीरीज के लिए तेजी से उभरता हुआ सब से लोकप्रिय प्लेटफार्म बन चुका है.
स्टेज ऐप ने कम समय में ही अपने अनूठे कंटैंट और क्षेत्रीय भाषाओं पर खास फोकस के चलते दर्शकों के दिलों में खास जगह बना ली है. भोजपुरी, हरियाणवी, राजस्थानी समेत कई भाषाओं में मुहैया कंटैंट इसे दूसरे ओटीटी प्लेटफार्मों से अलग पहचान दिलाता है.
सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स जैसे बड़े मंच से जुड़ कर स्टेज ऐप ने सिर्फ अपनी पहुंच को और मजबूत किया, बल्कि क्षेत्रीय सिनेमा को वर्ल्ड लैवल पर पहचान दिलाने की दिशा में भी एक अहम कदम उठाया है.
आज के डिजिटल समय में जहां दर्शक अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़े कंटैंट को अहमियत दे रहे हैं, वहीं स्टेज ऐप उन की इस मांग को बेहतरीन तरीके से पूरा कर रहा है.                  

    

Genz: जेनजी-टैक जीनियस, स्किल में जीरो

जेनजी ऐसी पीढ़ी है जिस की बुद्धि स्मार्टफोन की तरह है लेकिन विवेक एयरोप्लेन मोड पर है. यह वह पीढ़ी है जिस के पास हर सवाल का जवाब एक गूगल क्लिक पर मौजूद है लेकिन जीवन में क्या करना है, स्ट्रगल किसे कहते हैं और अनुशासन किस चिडि़या का नाम है? ये जरूरी सवाल जेनजी की जिंदगी से कोसों दूर हैं.

ज  नरेशन जेड या जेनजी एक ऐसी पीढ़ी है जिसे भ्रम है कि वह टैक्नोलौजी को उंगलियों पर नचाती है. सच तो यह है कि यह पीढ़ी टैक्नोलौजी के इशारों पर नाच रही होती है. सोशल मीडिया ने इस पीढ़ी को इतना कनैक्टेड बना दिया कि इस पीढ़ी का असली दुनिया से कनैक्शन ही टूट गया. यह वह पीढ़ी है जो 15 सैकड के शौर्ट वीडियोज में टिपिकल डांस को कौपी कर लेती है लेकिन 15 मिनट की मीटिंग में बोर हो जाती है. जेनजी वह पीढ़ी है जो स्क्रीन पर ग्लोबल सिटिजन बन जाती है लेकिन घर में पेरैंट्स को नहीं पहचान पाती.

टैक्नोलौजी में अव्वल लेकिन स्किल्स में पिछड़े हुए चैंपियन हैं ये युवा. जेन जेड को देख कर लगता है जैसे ये लोग जन्म से ही एआई और रील्स के साथ पैदा हुए हों. डिलौयट की 2025 रिपोर्ट के मुताबिक, 74 प्रतिशत जेन जेड मानते हैं कि दुनिया में जीने के लिए सिर्फ सोशल मीडिया का साथ काफी है. धूमकेतु आ जाए, सुनामी आ जाए या 12 स्केल का भूकंप आ जाए, जेन जी के हाथों से मोबाइल नहीं छूट सकता. यही वजह है कि दुनिया के 70 प्रतिशत बिजनैस लीडर्स यह मानते हैं कि जेन जी में कम्युनिकेशन स्किल्स जीरो है. 41 प्रतिशत बिजनैस लीडर्स कहते हैं जेन जेड ग्रेजुएट्स वर्कफोर्स के लिए तैयार ही नहीं है. गार्टनर के अनुसार, 51 प्रतिशत जेन जेड खुद मानते हैं कि वे रियल जौब के लिए तैयार नहीं हैं.

असल में इस पीढ़ी को सोशल मीडिया ने अपंग बनाया है. यह जहर धीमेधीमे नसों में समा चुका है. मांबाप भी दोषी हैं. शुरुआत में परवा नहीं की. मोबाइल में घंटों बिताते रहे पेरैंट्स को लगा कि चलो, बच्चा कहीं तो बिजी है. लेकिन यही मोबाइल की लत धीरेधीरे जहर बन गई. ऐसा जहर जिस ने जेन जी के दिमाग को पूरी तरह खोखला बना दिया. स्क्रौलिंग, शौर्ट वीडियो और 2× स्पीड ने ध्यान का स्पैन इतना छोटा कर दिया कि 51 प्रतिशत युवाओं का फोकस ही खत्म हो गया.

प्यू रिसर्च 2025 की रिपोर्ट कहती है, 48 प्रतिशत टीनऐजर्स के पीयर्स पर सोशल मीडिया नैगेटिव असर डाल रहा है. नतीजा? सौफ्ट स्किल्स, एम्पैथी, लीडरशिप में जीरो हो गए. जेन जी को ये सब बूढ़ों की बातें लगती हैं. समय की कोई कीमत नहीं, स्क्रीन ही सबकुछ है. हालत यह है कि औसतन जेनजी रोज 4 से

9 घंटे स्क्रीन पर बिताता है. साइबर स्माइल 2025 रिपोर्ट के अनुसार, 60 प्रतिशत जेन जेड 4 घंटे से ज्यादा सोशल मीडिया पर बिताते हैं. जबकि सर्जन जनरल की चेतावनी है कि 3 घंटे से ज्यादा स्क्रीनटाइम हो तो डिप्रैशन व एंग्जाइटी का रिस्क डबल हो जाता है.

ये लोग समय को स्टोरी सम?ाते हैं. 24 घंटे में 24 स्टोरी पोस्ट लेकिन इन के पास पेरैंट्स के लिए 24 मिनट भी नहीं होते. असल में सोशल मीडिया ने समय को इतना सस्ता कर दिया कि जेन जेड को लगता है कि लाइफ एक इन्फिनिटी स्क्रौल है और पैसा फोमो. सो, खर्च करो, कल देखेंगे.

हैल्पेज इंडिया और दूसरी स्टडीज दिखाती हैं कि जेन जेड अपने पेरैंट्स को ‘आउटडेटेड’ मानता है, इसलिए पेरैंट्स के साथ इंटरैक्शन जीरो है. 52 प्रतिशत भारतीय जेन जेड पेरैंट्स से बात करने के बजाय चैटजीपीटी से पूछ लेते हैं. हालांकि भारत में 82 प्रतिशत जेन जी घर में रहते हैं और पूरी तरह पेरैंट्स की कमाई पर निर्भर हैं. फिर भी रिस्पैक्ट के नाम पर बस इतना काफी है कि वो पौकेटमनी देते हैं. पेरैंट्स की सुनें क्यों? क्योंकि मेरी जिंदगी मेरी मरजी. सोशल मीडिया ने इन्हें इतना आत्मकेंद्रित बना दिया है कि परिवार सैकंडरी हो गया है.

जेनजी वह पीढ़ी है जिस में इंटैलिजैंस तो भरपूर है लेकिन बेसिक व्यावहारिक ज्ञान से वह कोसों दूर है. ये युवा किसी भी ऐप को 47 सैकंड में क्रैक कर लेते हैं. एआई से बेहतर प्रौम्प्ट लिख देते हैं, 15 सैकंड की रील में पूरी फिलौसफी समझा देते हैं लेकिन समझदारी थोड़ी बफरिंग में अटकी हुई है. बुद्धि तेज है बिलकुल 5जी वाली लेकिन समझदारी अभी 2जी नैटवर्क पर है. कुल मिला कर बात यह है कि जेनजी वह पीढ़ी है जो दुनिया बदलने की क्षमता तो रखती है लेकिन पहले यह तय करना भूल जाती है कि बदलाव किस दिशा में करना है. गलतियां ये इतनी तेजी से करते हैं कि सीखने की स्पीड स्लो हो जाती है.

बरबाद पीढ़ी जेनजी
जेनजी टैक्नोलौजी में अव्वल है, इस बात में कोई शक नहीं लेकिन स्किल्स, सम्मान, व्यावहारिकता, समय और पैसे के मामले में यह पीढ़ी पूरी तरह बरबाद है. यह पीढ़ी स्क्रीन के पीछे परफैक्ट लाइफ जी रही है लेकिन असल में एंग्जाइटी, शौर्ट अटैंशन और इमोशनल डिसकनैक्ट का शिकार है. सोशल मीडिया ने इन्हें कनैक्टेड जरूर बनाया लेकिन खुद से, परिवार से और रियलिटी से सब से जरूरी कनैक्शन तोड़ दिया है. सब से बड़ा सवाल यह है कि जेनजी खुद जागेगी या स्क्रौल करतेकरते नैक्स्ट जनरेशन को भी यही विरासत देगी?

लेखक  शकील प्रेम

Filmi Actress: सोशल मीडिया की ग्लैमरस सैंसेशन रश्मिका मंदाना

हिंदी सिनेमा हो या साउथ, हर जगह रश्मिका मंदाना अपना जलवा बिखेर रही हैं. ‘एनिमल’, ‘पुष्पा 2 द रूल’ या ‘छावा’ हो इन फिल्मों में उन के अभिनय के बजाय उन के ग्लैमरस लुक की ही चर्चा हुई है. लेकिन  हिंदी एक्सैंट को ले कर अकसर उन्हें ट्रोल किया जाता है.
रश्मिका मंदाना ऐसी अदाकारा हैं जिन के नाम का जादू सोशल मीडिया से ले कर बौक्स औफिस तक सिर चढ़ कर बोल रहा है. उन की लोकप्रियता का आलम यह है कि उन की एक मुसकान करोड़ों दिलों की धड़कनें तेज कर देती है. अकसर आलोचक कहते हैं कि उन्हें फिल्में अभिनय से ज्यादा उन के ग्लैमरस लुक व सुंदरता की वजह से मिलीं, लेकिन रश्मिका ने हर बार अपनी मेहनत और स्क्रीन प्रेजैंस से इन धारणाओं को चुनौती दी है.
5 अप्रैल, 1996 को कर्नाटक के कोडागु (कूर्ग) जिले के एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मी रश्मिका मंदाना की प्रारंभिक शिक्षा कूर्ग पब्लिक स्कूल में हुई. बाद में बेंगलुरु के एम एस रमैया कालेज औफ आर्ट्स, साइंस एंड कौमर्स से सायकोलौजी, पत्रकारिता और अंगरेजी साहित्य में स्नातक की डिग्री हासिल की.
यों बनीं अदाकारा
रश्मिका ने अभिनेत्री बनने के बारे में कभी सोचा नहीं था. कालेज में पढ़ाई के दौरान अपनी सहेलियों के उकसाने पर 2014 में रश्मिका ने ‘क्लीन एंड क्लियर फै्रश फेस औफ इंडिया’ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और यह खिताब उन्हें ही मिल गया. फिर एक एड फिल्म मिली तो मजाकमजाक में वह एड भी कर लिया. इस एड को देख कर 2-3 फिल्म निर्देशकों ने रश्मिका को फिल्मों में अभिनय करने का औफर दे दिया तो रश्मिका ने ठान लिया कि अब वे सफल अभिनेत्री बन कर ही रहेंगी.
उन्होंने रिषभ शेट्टी निर्देशित कन्नड़ भाषा की फिल्म ‘किरिक पार्टी’ में रक्षित शेट्टी के अपोजिट अभिनय किया. उन की मातृभाषा कन्नड़ के बजाय ‘कोडावा’ होने के कारण शुरुआती दौर में उन्हें कन्नड़ बोलने में ड्ढकाफी कठिनाई हुई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. 2016 में फिल्म ‘किरिक पार्टी’ रिलीज हुई और बौक्स औफिस पर यह फिल्म ब्लौकबस्टर साबित हुई.
डेट, इंगेजमैंट और फिर टूट
फिल्म की शूटिंग के दौरान ही रश्मिका मंदाना ने इस फिल्म के हीरो रक्षित शेट्टी संग डेट करना भी शुरू कर दिया था. यहां तक कि 3 जुलाई, 2017 को दूसरी फिल्म के रिलीज से पहले ही रश्मिका ने रक्षित संग अपनी इंगेजमैंट की भी घोषणा कर दी थी. फिर 21 दिसंबर, 2017 को रश्मिका की कन्नड़ भाषा में ही पुनीत राजकुमार के साथ ‘अंजनी पुत्रा’ और 29 दिसंबर, 2017 को गणेश के साथ ‘चमक’ के बौक्स औफिस पर सफलता के परचम लहराते ही रश्मिका मंदाना कन्नड़ भाषी फिल्मों की स्टार अभिनेत्री बन गईं.
इस के बाद रश्मिका मंदाना को विजय देवरकोंडा संग तेलुगू भाषा की फिल्म ‘गीता गोविंदम’ मिली. 16 अगस्त, 2018 को इस फिल्म के रिलीज होते ही रश्मिका के कैरियर के साथ ही जीवन में भी तूफान आया. इस फिल्म की सफलता ने उन्हें तेलुगू की स्टार अभिनेत्री बना दिया तो 20 दिनों बाद सितंबर 2018 में रश्मिका मंदाना ने रक्षित शेट्टी के साथ अपनी सगाई यह कह कर तोड़ दी कि दोनों के बीच सामंजस्य नहीं बैठ रहा है.
‘गीता गोविंदम’ से बदला कैरियर
रश्मिका मंदाना ने विजय देवरकोंडा के साथ सफल फिल्म ‘गीता गोविंदम’ क्या की, कि वे देखते ही देखते कन्नड़, तमिल व तेलुगू फिल्मों में छा गईं. यहां तक कि 2022 में वे अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म ‘गुडबाय’ में भी नजर आईं. यह अलग बात है कि ‘गुडबाय’ उन्हें हिंदी फिल्मों में स्थापित करने में विफल रही.
हालांकि वर्ष 2021 में अल्लू अर्जुन के साथ तेलुगू फिल्म ‘पुष्पा द राइज’ में श्रीवल्ली के किरदार में उन का जादू लोगों के सिर चढ़ कर बोल चुका था और इस फिल्म के हिंदी डब वर्जन ने उन्हें हिंदीभाषी दर्शकों के दिलों तक पहुंचा दिया था. बाद में हिंदी फिल्म ‘मिशन मजनूं’ में भी वे नजर आईं लेकिन हिंदी फिल्मों में वे नाम नहीं बना पाईं.
वर्ष 2023 में रणबीर कपूर के साथ फिल्म ‘एनिमल’ उन के कैरियर के लिए टर्निंग पौइंट साबित हुई, जिस ने बौक्स औफिस पर रिकौर्डतोड़ कमाई की. ‘एनिमल’ ने सोने पे सुहागा वाला काम किया.
लेकिन वहीं, 5 दिसंबर, 2024 को जब ‘पुष्पा द राइज’ का सीक्वअल ‘पुष्पा 2 द रूल’ तेलुगू के साथ ही हिंदी में भी डब हो कर एकसाथ रिलीज हुई तो इस ने सफलता के सारे पुराने कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए. 2025 में प्रदर्शित हिंदी फिल्म ‘छावा’ में भी रश्मिका मंदाना ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई.
ग्लैमरस गुडि़या
रश्मिका मंदाना को सोशल मीडिया पर ‘ग्लैमरस गुडि़या’ ही माना जा रहा है क्योंकि ‘एनिमल’ हो या ‘ पुष्पा 2 द रूल’ या हो ‘छावा’, इन दोनों ही फिल्मों में उन के अभिनय के बजाय उन के ग्लैमरस लुक की ही चर्चा हुई. इस में कोई दोराय नहीं कि उन का स्क्रीन प्रेजैंस और सुंदरता बेजोड़ है.
रश्मिका की सब से बड़ी खूबी उन की नैचुरल ब्यूटी और संक्रामक मुसकान है. चाहे वह रेड कारपेट पर डिजाइनर गाउन हो या फिल्म ‘पुष्पा’ में एक गांव की गोरी का लुक, वे हर लिबास में सहज दिखती हैं. उन की फिटनैस और फैशन सैंस आज की युवा पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा है. यही वजह है कि सोशल मीडिया की वे रानी बनी हुई हैं. फरवरी 2026 तक इंस्टाग्राम पर उन के 50.7 मिलियन से अधिक फौलोअर्स हैं.
लाइक्स का रिकौर्ड
हाल ही में रश्मिका की एक पोस्ट ने विराट कोहली का रिकौर्ड तोड़ते हुए भारत में सब से अधिक लाइक पाने (लगभग 25 मिलियन लाइक्स) वाली पोस्ट का खिताब हासिल किया है. वे सोशल मीडिया पर अपनी निजी जिंदगी और फिल्मों की शूटिंग के पीछे की ?ालकियां शेयर कर अपने प्रशंसकों के साथ निरंतर जुड़ी रहती हैं.
निजी जिंदगी की निजता
वे अपनी निजी जिंदगी पर सोशल मीडिया को हावी नहीं होने देतीं. उन्होंने 2020 में ही विजय देवरकोंडा संग प्रेम की रासलीला रचानी शुरू कर दी थी मगर सार्वजिनक रूप से कभी भी इस बात को जाहिर नहीं होने दिया और न ही रश्मिका व विजय सार्वजनिक जगहों पर कभी एकसाथ नजर आए. आखिरकार, इन दोनों ने
26 फरवरी, 2026 को उदयपुर के ‘आईटीसी मेमेन्टोज’ में एक भव्य समारोह में एक नहीं 2 रीतिरिवाजों के साथ शादी कर ली. उन की शादी की फोटो ने इंटरनैट पर हंगामा बरपा रखा है. द्य
मुक्ता के स्वामित्व व अन्य विवरण संबंधी जानकारी फौर्म 4, देखिए नियम 8

Readers Problem: मेरा बौयफ्रैंड शक करता है हर बात पर सवाल पूछता है. 

मैं नौकरी करती हूं और औफिस में कई लोगों से बात करनी पड़ती है. मेरा बौयफ्रैंड शक करता है हर बात पर सवाल पूछता है. मुझे घुटन को महसूस कर रही हैं

आप जिस घुटन को महसूस कर रही हैं, वह प्यार की कमी से नहीं, भरोसे की कमी से पैदा होती है. नौकरी करना, लोगों से बात करना और प्रोफैशनल रिश्ते निभाना आज की जरूरत है, इसे शक की नजर से देखना किसी भी रिश्ते को धीरेधीरे थका देता है. आप के बौयफ्रैंड का शक शायद उस के डर और असुरक्षा से आता हो, लेकिन यह वजह आप के हर कदम पर सवाल उठाने का अधिकार नहीं देती.

उसेके लिए बहस या सफाई देने के बजाय शांत और स्पष्ट बातचीत जरूरी है. उसे बताइए कि भरोसा रिश्ते की नींव है और अगर हर बात पर जांचपड़ताल होगी तो प्यार का दम घुटने लगेगा. यह भी साफ कहें कि आप पारदर्शिता रख सकती हैं, लेकिन अपनी स्वतंत्रता नहीं खो सकतीं. रिश्ते में प्यार का मतलब निगरानी नहीं, सम्मान और विश्वास होता है.

अगर वह सच में आप को समझना चाहता है तो आप की बात सुनेगा और अपने व्यवहार पर काम करेगा लेकिन अगर शक के नाम पर कंट्रोल बढ़ता जाए तो यह आप के आत्मसम्मान और मानसिक शांति के लिए खतरे की घंटी है. याद रखिए, सच्चा रिश्ता वह होता है जहां आप खुद को साबित करने में नहीं, खुद होने में सुरक्षित महसूस करें.

मैं और मेरा बौयफ्रैंड फिजिकल रिलेशनशिप में हैं, लेकिन सैक्स के बाद वह भावनात्मक रूप से दूरदूर रहने लगता है. इस से अकेलापन महसूस होता है. मैं क्या करूं?

आप जो महसूस कर रही हैं, वह सिर्फ अकेलापन नहीं है, बल्कि भावनात्मक असंतुलन की पीड़ा है. जब किसी रिश्ते में शारीरिक नजदीकी तो हो, लेकिन उस के बाद भावनात्मक दूरी आ जाए तो मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या मैं सिर्फ एक जरूरत बन कर रह गई हूं? यह सोचना आप की कमजोरी नहीं, आप की संवेदनशीलता का प्रमाण है.

हर व्यक्ति को अलग तरह से जीना है. संभव है कि आप के बौयफ्रैंड के लिए फिजिकल क्लोजनैस अपनेआप में पूरी हो जाती हो, जबकि आप के लिए उस के बाद का अपनापन, बातचीत और स्नेह ज्यादा मायने रखता हो. समस्या वहां पैदा होती है, जहां यह अंतर खुल कर कहा नहीं जाता. चुप रह कर सहते जाना धीरेधीरे आप को भीतर से खाली कर देगा.

शांत मन से, बिना आरोप लगाए, उस से यह कहना जरूरी है कि शारीरिक रिश्ते के बाद उस की दूरी आप को असुरक्षित और अकेला महसूस कराती है. यह कोई मांग नहीं, आप की भावनात्मक जरूरत है. अगर वह आप को सम?ाने की कोशिश करता है तो वह अपने व्यवहार में बदलाव भी लाएगा. लेकिन अगर वह आप की भावना को हल्का समझे या टालता रहे तो आप को खुद से यह ईमानदार सवाल पूछना होगा कि क्या यह रिश्ता आप को सिर्फ शरीर से जोड़ रहा है, दिल से नहीं.

याद रखिए इंटीमेसी का मतलब सिर्फ पास आना नहीं, पास रहना भी होता है और जिस रिश्ते में आप बारबार खुद को भावनात्मक रूप से अकेला महसूस करें, वहां ठहर कर सोचना जरूरी हो जाता है क्योंकि प्यार वह है, जो आप को भरा हुआ महसूस कराए, खाली नहीं.

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Hindi Story: कुंआरी ख्वाहिशें-हवस के चक्रव्यूह में फंसी गीता

‘‘गीता, ओ गीता. कहां है यार, मैं लेट हो रहा हूं औफिस के लिए. जल्दी चल… तुझे कालेज छोड़ने के चक्कर में मैं रोज लेट हो जाता हूं.’’

‘‘आ रही हूं भाई, तैयार तो होने दो, कितनी आफत मचा कर रखते हो हर रोज सुबह…’’

‘‘और तू… मैं हर रोज तेरी वजह से लेट हो जाता हूं. पता नहीं, क्या लीपापोती करती रहती है. भूतनी बन जाती है.’’

इतने में गीता तैयार हो कर कमरे से बाहर आई, ‘‘देखो न मां, आप की परी जैसी बेटी को एक लंगूर भूतनी कह रहा है… आप ने भी न मां, क्या मेरे गले में मुसीबत डाल दी है. मैं अपनेआप कालेज नहीं जा सकती क्या? मैं अब छोटी बच्ची नहीं हूं, जो मुझे हर वक्त सहारे की जरूरत पड़े.’’

मां ने कहा, ‘‘तू तो मेरी परी है. यह जब तक तेरे साथ न लड़े, इसे खाना हजम नहीं होता. और अब तू बड़ी हो गई है, इसलिए तुझे सहारे की जरूरत है. जमाना बहुत खराब है बच्चे, इसलिए तो कालेज जाते हुए तुझे भाई छोड़ता जाता है और वापसी में पापा लेने आते हैं. अब जा जल्दी से, भाई कब से तेरा इंतजार कर रहा है.’’

‘‘हांहां, जा रही हूं. पता नहीं ये मांएं हर टाइम जमाने से डरती क्यों हैं?’’ गीता बड़बड़ाते हुए बाहर चली गई.

गीता बीबीए के पहले साल में पढ़ रही थी. उस का भाई बंटी उस से 6 साल बड़ा था और नौकरी करता था. गीता का छोटा सा परिवार था. मम्मीपापा और एक बड़ा भाई, जो पंजाबी बाग, दिल्ली में रहते थे.

गीता के पापा का औफिस नारायणा में था और भाई नेहरू प्लेस में नौकरी करता था. गीता का राजधानी कालेज पंजाबी बाग में ही था, मगर घर से तकरीबन 10-15 किलोमीटर दूर, इसीलिए बस से जाने के बजाय वह भाई के साथ जाती थी.

वैसे भी जब से गीता ने कालेज में एडमिशन लिया था, मां ने सख्त हिदायत दी थी कि उसे अकेला नहीं छोड़ना, जमाना खराब है. कल को कोई ऊंचनीच हो गई, तो कौन जिम्मेदार होगा, इसलिए अपनी चीज का खयाल तो खुद ही रखना होगा न.

गीता को कालेज छोड़ने के बाद बंटी रास्ते से अपने औफिस के साथी सागर को नारायणा से ले लेता था.

एक दिन सागर ने कहा, ‘‘यार, मुझे अच्छा नहीं लगता कि तू रोज मुझे ले कर जाता है. तू परेशान न हुआ कर, मैं बस से चला जाऊंगा.’’

इस पर बंटी बोला, ‘‘यार, मेरा तो रास्ता है इधर से. मैं अकेला जाता हूं, अगर तू पीछे बाइक पर बैठ जाता है, तो क्या फर्क पड़ता है…’’

‘‘फिर भी यार, तुझे परेशानी तो होती ही है.’’

‘‘यार भी कहता है और ऐसी बातें भी करता है. देख, अगर बस के बजाय मेरे साथ जाएगा तो बस का किराया बचेगा न, वह तेरे काम आएगा. मैं जानता हूं, तेरा बड़ा परिवार है और तनख्वाह कम पड़ती है.’’

यह सुन कर सागर चुप हो गया.

इसी तरह यह सिलसिला चलता रहा. एक बार बंटी बहुत बीमार हो गया और लगातार कुछ दिनों तक औफिस नहीं गया.

सागर ने तो फोन कर के हालचाल पूछा, मगर उसे मिले बिना चैन कहां, यारी जो दिल से थी. एक दिन छुट्टी के बाद वह पहुंच गया बंटी से मिलने.

इधर जब बंटी बीमार था, तो गीता को कालेज छोड़ने कौन जाता, क्योंकि पापा तो सुबहसुबह ही काम पर चले जाते थे. लिहाजा, गीता बस से कालेज जाने लगी. बंटी ने समझा दिया था कि किस जगह से और कौन से नंबर की

बस पकड़नी है. वापसी में तो उसे पापा ले आते.

सागर ने बंटी के घर की डोरबैल बजाई, तो दरवाजा गीता ने खोला. अपने सामने 6 फुट लंबा बंदा, जो थोड़ा सांवला, मगर तीखे नैननक्श, घुंघराले बाल, जिस की एक लट माथे पर झूलती हुई, भूरी आंखें… देख कर गीता खड़ी की खड़ी रह गई.

यही हाल सागर का था. जैसे ही उस ने गीता को देखा तो हैरान रह गया. उसे लगा मानो कोई शहजादी हो या कोई परी धरती पर उतर आई हो.

सागर ने गीता को अपने बारे में बताया, तो वह उसे भीतर ले गई.

सागर बंटी के साथ बैठ कर बातें कर रहा था. मां और गीता चायपानी का इंतजाम कर रही थीं, मगर बीचबीच में सागर गीता को और गीता सागर को कनखियों से देख रहे थे. घर जा कर सागर सारी रात नहीं सो सका, इधर गीता उस के खयालों में खोई रही.

अगले दिन गीता को न जाने क्या सूझा कि बस से कालेज न जा कर नारायणा बस स्टैंड पर उतर गई, क्योंकि शाम को वह बातोंबातों में जान चुकी थी कि सागर नारायणा में रहता है, जिसे बंटी अपने साथ नेहरू प्लेस ले जाता था.जैसे ही गीता नारायणा बस स्टैंड पर उतरी, तकरीबन 5 मिनट बाद ही सागर भी वहां आ गया.

‘‘हैलो…’’ सागर ने औपचारिकता दिखाते हुए कहा.

‘‘हाय, औफिस जा रहे हैं आप?’’ गीता ने ‘हैलो’ का जवाब देते हुए और बात आगे बढ़ाते हुए कहा.

‘‘जी हां, जा तो रहा था, मगर अब मन करता है कि न जाऊं,’’ सागर आंखों में शरारत और होंठों पर मुसकान लाते हुए बोला.

‘‘कहते हैं कि मन की बात माननी चाहिए,’’ गीता ने भी कुछ ऐसे अंदाज से कहा कि सागर ने मस्ती में आ कर उस का हाथ पकड़ लिया.

‘‘अरे सागरजी, छोडि़ए… कोई देख न ले…’’ गीता ने घबरा कर कहा.

‘‘ओफ्फो, यहां कौन देखेगा… चलिए, कहीं चलते हैं,’’ सागर ने कहा और गीता चुपचाप उस के साथ चल दी.

‘‘आज आप भी कालेज नहीं गईं?’’ सागर ने गीता के मन की थाह पाने

की कोशिश करते हुए कहा.

‘‘बस, आज मन नहीं किया,’’ कह कर गीता ने शरमा कर आंखें झुका लीं.

सागर और गीता सारा दिन घूमते रहे, लेकिन शाम होते ही गीता बोली, ‘‘सागर, मुझे जाना है. पापा कालेज

लेने आएंगे. अगर मैं न मिली तो वे परेशान होंगे.’’

‘ठीक है जाओ, लेकिन कल ज्यादा देर रुकना. पापा से कहना कि ऐक्स्ट्रा क्लास है,’’ सागर ने कहा.

‘‘मैं ने आप को यह तो नहीं कहा कि मैं कल आऊंगी…’’ गीता ने चौंक कर कहा.

‘‘मैं जानता हूं कि तुम कल भी आओगी. जैसे मुझे पता था कि तुम आज मुझ से मिलने आओगी…. तो ठीक है फिर कल मिलते हैं.’’

‘‘ठीक है,’’ कह कर गीता कालेज चली गई और इतने में उस के पापा आ गए. अगले दिन फिर वही सिलसिला शुरू हो गया.

बंटी ठीक हो गया और इत्तिफाक से उसे वहीं पंजाबी बाग में ही अच्छी नौकरी मिल गई. गीता की तो बल्लेबल्ले. अब तो अकेले ही बस पर जाने की छूट. उधर सागर भी फ्री हो गया कि अब न बंटी मिलेगा और न ही उसे पता चलेगा कि सागर कब औफिस गया और कब नहीं.

सागर और गीता के प्यार की पेंग ऊंची और ऊंची चढ़ने लगी. दोनों को एकदूसरे के बिना एक पल भी चैन नहीं.

सागर तो प्यासा भंवरा कली का रस चूसने को उतावला, लेकिन गीता अभी तक डर के मारे बची हुई थी और उसे ज्यादा करीब आने का मौका नहीं दिया.

गीता चाहती कि सागर भाई से शादी की बात करे, क्योंकि गीता नहीं जानती थी कि सागर शादीशुदा है, पर बंटी जानता था.

सागर हर बार गीता को कहता, ‘‘तुम बंटी से अभी कुछ मत बताना, क्योंकि उस का सपना है कि वह तुम्हें बहुत बड़े घर में ब्याहे और मैं ठहरा मिडिल क्लास… वह नहीं मानेगा हमारी शादी के लिए, इसलिए मौका देख कर मैं खुद अपने तरीके से बात करूंगा, ताकि वह मान जाए.’’गीता सागर की बातों में आ गई.एक दिन भंवरे ने कली का रस चूस लिया… सागर ने प्यार से गीता को बहलाफुसला कर उस का कुंआरापन खत्म कर दिया और कर ली अपने मन की पूरी.

कुछ दिनों तक यह खेल फिर चलता और एक दिन गीता बोली, ‘‘सागर, ऐसा न हो कि भाई को कहीं किसी और से हमारे बारे में पता चले. इस से अच्छा है कि हम खुद ही बता दें. भाई फिर मम्मीपापा से खुद बात कर लेगा.’’

सागर बोला, ‘‘गीता, अगर तुम मेरी बात मानो तो हम कोर्ट मैरिज कर लेते हैं और फिर मैं आऊंगा तुम्हारे घर और दोनों बात करेंगे. जब हमारे पास कोर्ट मैरिज का सर्टिफिकेट होगा, फिर कोई मना ही नहीं कर पाएगा.

‘‘और सोचो, तुम्हें अगर बच्चा ठहर गया, तब क्या कोई तुम से शादी करेगा… तुम्हें तो तुम्हारे घर वाले मार ही डालेंगे. फिर क्या मैं जी सकूंगा तुम्हारे बिना… मुझे मौत से डर नहीं लगता, बस मेरी छोटी बहन, बूढ़े मांबाप बेचारे किस के सहारे जिएंगे…’’

इस तरह सागर ने गीता को समझा दिया और वह बेचारी एक दिन घर से मां के जेवर और कुछ नकदी ले कर अपने सागर के पास चली गई.

‘‘सागर, चलो कोर्ट और अभी इसी समय शादी कर के फिर घर चलते हैं… और ये लो पैसे और जेवर, जितना खर्च हो कर लो.’’

सागर इन सब के लिए पहले से तैयार था. उस ने अपना परिवार कहीं और शिफ्ट कर दिया था. नौकरी से भी इस्तीफा दे दिया था. गीता को वह अपने किराए वाले घर में ले गया.

गीता ने देखा कि घर पर कोई नहीं है, तो उस ने पूछा, ‘‘सागर, मांबाबूजी और तुम्हारी बहन कहां हैं? यह घर खालीखाली क्यों है?’’

‘‘ओहो गीता, मैं तो तुम्हें बताना ही भूल गया, मुझे दूसरे औफिस से अच्छा औफर आया है और मैं नौकरी बदल रहा हूं, इसलिए सारा सामान नए घर में शिफ्ट कराया है. मांबाबूजी और छुटकी हमारे रिश्ते के चाचा की बेटी की शादी मेंगए हैं.

तुम चिंता मत करो. आज शादी होना मुश्किल है, क्योंकि अभी तक हमारी अर्जी पास नहीं हुई. कल हो जाएगी. आज रात तुम यहीं रुको, कल शादी करते ही हम तुम्हारे घर चलेंगे.’’

अभी भी न समझ पाई गीता और सबकुछ सौंप दिया सागर को. 2 दिन बाद कमरा भी बदल लिया. इस तरह सागर कई दिनों तक गीता को बेवकूफ बनाता रहा.

इधर शाम को गीता के कालेज में न मिलने पर उस के पापा परेशान हो गए. उस की सहेली से पूछा तो पता चला कि गीता तो पिछले कुछ दिनों से कालेज में कम ही आई है. बस शाम के समय बाहर नजर आती थी. उसे एक लड़का छोड़ने आता था.

पापा सारा माजरा समझ गए. उन्होंने बंटी को बताया. वे अब मान चुके थे कि कोई गीता को बहलाफुसला कर ले गया है.

गीता के साथियों से पूछने पर अंदाजा लगाया कि ये सब शायद सागर की बात कर रहे हैं. सागर को फोन मिलाया तो फोन बंद मिला. सागर ने वह नंबर बंद कर के दूसरा नंबर ले लिया था.

बंटी जा पहुंचा सागर के घर. वहां से पूछताछ की तो मकान मालिक ने बताया कि बीवी को पहले ही मायके भेज दिया था. वह एक लड़की लाया था. 2 दिन बाद उसे ले कर कहां गया, पता नहीं.

लड़की के हुलिए से वे समझ गए कि गीता ही थी. बंटी को अपनी दोस्ती पर अफसोस होने लगा कि उस ने आस्तीन में सांप पाल लिया था.

इधर गीता भी असलियत जान चुकी थी. अब वह सागर से छुटकारा पाना चाहती थी. सागर सुबह काम पर जाता तो बाहर से ताला लगा कर जाता. इधर गीता का परिवार उसे ढूंढ़ कर थक चुका था. इश्तिहार छपवा दिए गए, ताकि गीता का कहीं से कोई तो सुराग मिले.

एक दिन सागर तैयार हो रहा था कि औफिस से फोन आया कि अभी पहुंचो. वह जल्दी में ताला लगाना भूल गया. गीता के लिए यह अच्छा मौका था. वह भाग निकली और जा पहुंची अपने घर. उस ने अपने किए की माफी मांगी.

घर वालों से तो गीता को माफी मिल गई, पर आसपड़ोस के लोगों ने उस का जीना मुहाल कर दिया था.

गीता के पापा ने यह घर बेच कर रोहिणी में जा कर नए सिरे से जिंदगी की शुरुआत की, मगर वहां भी वे जिल्लत की जिंदगी जिए. न कहीं गीता का रिश्ता तय होता था और न ही कहीं बंटी का.

साल बीतते गए. पहले तो पापा इस सदमे से बीमार हो गए और फिर उन की मौत हो गई. मां दिनरात चिंता में घुलती रहती थीं. घरबार सब बिक गया, इज्जत चली गई.

गीता के एक मामा करनाल में रहते थे. एक दिन वे बोले, ‘‘दीदी, करनाल तो मैं आप को लाऊंगा नहीं, मेरी भी यहां इज्जत खराब होगी, पर आप कुरुक्षेत्र में शिफ्ट हो जाओ, कम से कम दिल्ली जितना महंगा तो नहीं है.’’

वे सब कुरुक्षेत्र में शिफ्ट हो गए. वहां मामा ने जैसेतैसे छोटीमोटी नौकरी का इंतजाम करवा दिया था. इस से किसी तरह गुजारा चल निकला.

गीता अब 35 साल की और बंटी 40 साल का हो गया. गीता का रिश्ता तो न हुआ. अलबत्ता, बंटी का रिश्ता वहां किसी जानकार ने करा दिया.

अब बंटी की तो शादी हो गई. क्या करता, कब तक गीता के लिए इसे भी कुंआरा रखते, आगे परिवार भी तो बढ़ाना था.

गीता का रिश्ता न होने की वजह एक और भी थी कि उसे शराब पीने की लत लग गई थी. टैंशन में होती और औफिस के स्टाफ के साथ पीने लग जाती और पी कर फिर होश कहां रहता. कभीकभी तन की आग भी सताती और कोई न कोई अपनी भी आग इस से बुझा लेता.

लेकिन ऐसा भी कब तक चलता. भाई के बच्चे भी हो गए हैं, सब समझने लगे हैं. भाभी को भी अब बुरा लगता है कि कब तक शराबी बहन उन के सिर पर मंडराएगी. उम्र भी तो कम नहीं, 45 साल की हो गई.

आखिरकार एक रिश्ता मिला शाहबाद में. लड़का क्या आदमी था, अधेड़ था. सूरज विधुर था, मगर कोई बच्चा नहीं, इसलिए सोचा कि दूसरी शादी कर के वंश आगे बढ़ाया जाए. बात बन गई तो शादी कर दी.

गीता ने भी सोचा कि अब एक अच्छी बीवी बन कर दिखाऊंगी. शराब की लत छोड़ दी धीरेधीरे. तकरीबन 6 महीने सब सही रहा.

इसी बीच पड़ोसी की बेटी रीमा दुबई से आई. 2-3 महीने यहां रही. दोनों परिवारों में अच्छाखासा लगाव भी था. रीमा जितने समय तक शाहबाद में रही, गीता संग अच्छी दोस्ती रही. वह सारा दिन ‘भाभीभाभी’ करती रहती.

जातेजाते रीमा गीता को बोल गई, ‘‘भाभी, मैं आप दोनों को दुबई बुला लूंगी. वहां की लाइफ यहां से अच्छी है. वहां सैट करूंगी आप को.’’

गीता और सूरज भी खुश थे कि वे दोनों दुबई में सैट होंगे. वैसे भी आगेपीछे कोई नहीं, दोनों ही तो हैं, तो कहीं भी रहें.

2 महीने बाद रीमा का फोन आया, ‘‘भाभी, यहां के नियम बहुत सख्त हैं, इसलिए हमें यहां के नियम से चलना होगा. मैं ने आप के पेपर सब तैयार कर दिए हैं. मैं आप को अपने बच्चे की नैनी यानी आया के रूप में बुलाऊंगी, फिर आप यहां सैट हो कर सूरज भैया को बुला लेना.’’

कुछ समय बाद गीता खुशीखुशी दुबई चली गई, लेकिन वहां के तो रंग ही कुछ और थे. सुबह 5 बजे से रात के

12 बजे तक सारे घर का काम करे, उस पर बच्चा इतना बिगड़ा हुआ था कि कभी उसे गाली दे, कभी चप्पल उठा कर मारे, खाना भी ढंग से न दे, बस जो बचाखुचा वही दे दे, चाहे उस से पेट भरे या न भरे.

गीता न तो बच्चे को डांट सके, न ही कहीं जा सके और न कोई पैसा उस के पास. खून के आंसू रोए बेचारी.

4 साल तक न तो परिवार वालों से कोई बातचीत, न ही सुख की सांस ली.

आखिरकार गीता ने एक दिन हिम्मत की, जब रीमा और उस का पति औफिस गए हुए थे. वह चुपचाप एक खिड़की

से भाग निकली और पहुंची सीधा पुलिस के पास और सबकुछ बताया. पुलिस जा पहुंची रीमा के घर.

हां, गीता भागी जरूर, पुलिस में उस के खिलाफ शिकायत भी की, मगर उस ने धोखा नहीं दिया रीमा को, जिस तरह रीमा ने उसे दिया था. वह तब भागी, जब रीमा के आने का समय हो चला था, ताकि रीमा का बेटा ज्यादा समय अकेला न रहे. पूरे घर का काम कर के तब.

जब पुलिस रीमा के घर आई, तब भी उस ने यह कहा कि उसे रीमा से अपने पासपोर्ट और पेपर वगैरह दिलवा दें और उसे वर्क परमिट मिल जाए… और उसे कुछ नहीं चाहिए, गीता अपने पति को बुलाना चाहती है.

रीमा ने उस के सब पेपर उसे सौंप दिए. गीता ने रीमा पर कोई केस नहीं किया. गीता अब दुबई में अलग काम करती है, अलग घर में शांति से रहती  है.

गीता इस समय सूरज के कागजात तैयार करवा रही है, ताकि सूरज को वहां बुला ले.

गीता सारी उम्र एक गलती की सजा भुगतती रही, वह सच्चे प्यार के लिए तरसती रही. एक छोटी सी गलती ने पूरा परिवार बिखेर दिया, लेकिन अब बुढ़ापे में कोई न कोई तो सहारा चाहिए हर एक को. कम से कम सूरज और गीता एकदूसरे का सहारा तो बनेंगे. कुंआरी ख्वाहिशें झुलस कर दम तोड़ चुकी थीं.

लेकिन गीता एक अच्छा काम और कर रही थी कि कोई भी लड़की अगर इस तरह की भूल करती, तो वह उसे समझाबुझा कर उस के घर पहुंचा आती.

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