Press Confrence: 7th Bhojpuri Cine Awards- पटना में सजेगा भोजपुरी सिनेमा का महोत्सव

7वां सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स समारोह का 15 मार्च, 2026 को पटना के बापू सभागार में डिजिटल युग के साथ नए स्वरूप में होगा आयोजन

बस्ती: भोजपुरी सिनेमा के प्रतिष्ठित और बहुप्रतीक्षित 7वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स शो का आयोजन 15 मार्च को सायं 6 बजे से बिहार की राजधानी पटना के ऐतिहासिक बापू सभागार में किया जाएगा। यह समारोह भोजपुरी फिल्म उद्योग के लिए एक बड़े सांस्कृतिक उत्सव के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें सिनेमा जगत की नामचीन हस्तियां शिरकत करेंगी।
इस संबंध में मिश्रौलिया स्थित बृहस्पति पाण्डेय के आवास पर आयोजित प्रेस वार्ता में जानकारी देते हुए दिल्ली प्रेस के कार्यकारी प्रकाशक अनंत नाथ ने कहा कि यह अवॉर्ड शो अब बिहार की राजधानी पटना में हो रहा है, जो एक नए अध्याय की शुरुआत है. इस बार इसे और भव्य और बड़े स्तर पर किया जाएगा और दर्शकों के लिए यह मनोरंजन का शानदार अनुभव रहेगा।

सरस सलिल (दिल्ली प्रेस समूह) से जुड़े भानु प्रकाश राणा ने बताया कि इस अवॉर्ड शो में नामांकित फिल्मों और कलाकारों को जूरी द्वारा चयनित कर विभिन्न श्रेणियों में सम्मानित किया जाएगा। कार्यक्रम के दौरान रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, लाइव म्यूजिकल परफॉर्मेंस और स्टार नाइट मुख्य आकर्षण रहेंगे।
डिजिटल युग के साथ बदला अवॉर्ड शो का स्वरूप
इस वर्ष के आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता इसका परिवर्तित फॉर्मेट है। बदलते समय और डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार को ध्यान में रखते हुए इस बार अवॉर्ड शो को तीन प्रमुख वर्गों में बांटा गया है—सिनेमा (थिएटर रिलीज फिल्में), ओटीटी प्लेटफॉर्म और यूट्यूब/टीवी कंटेंट के आधार पर बेस्ट अवॉर्ड्स दिए जाएंगे।

आयोजन समिति से जुड़े बृहस्पति कुमार पांडेय ने बताया कि भोजपुरी कंटेंट अब केवल सिनेमाघरों तक सीमित नहीं है, बल्कि ओटीटी और डिजिटल माध्यमों के जरिए विश्वभर में देखा जा रहा है। ऐसे में इन प्लेटफॉर्म पर कार्य करने वाले कलाकारों और तकनीशियनों को समान मंच देना समय की आवश्यकता है।
2020 से शुरू हुआ सम्मान का यह सिलसिला

सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स शो की शुरुआत वर्ष 2020 में बस्ती जिले से हुई थी जिसका उद्देश्य था भोजपुरी सिनेमा को एक व्यवस्थित और प्रतिष्ठित मंच प्रदान करना। लोकप्रिय पत्रिका सरस सलिल द्वारा शुरू की गई इस पहल ने कुछ ही वर्षों में भोजपुरी फिल्म उद्योग में अपनी विशेष पहचान बना ली।
इसके बाद अयोध्या में 3 बार, बस्ती में 2 बार, इसका आयोजन हुआ था। लगातार इस आयोजन की भव्यता और सहभागिता में वृद्धि होती गई।

लखनऊ में हुआ था छठा भव्य आयोजन
पिछले वर्ष ‘छठा सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स’ शो का आयोजन लखनऊ के प्रतिष्ठित इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में हुआ था। यह अब तक का सबसे बड़ा और व्यवस्थित समारोह माना गया।
उस समारोह में 50 से अधिक श्रेणियों में पुरस्कार प्रदान किए गए। बेस्ट फिल्म, बेस्ट अभिनेता, बेस्ट अभिनेत्री, बेस्ट निर्देशक, बेस्ट सिंगर, बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर और लाइफटाइम अचीवमेंट जैसी प्रमुख श्रेणियों में कलाकारों को सम्मानित किया गया।

अब तक हुए अवॉर्ड समारोह में यह अवॉर्ड दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’, अरविंद अकेला ‘कल्लू’, प्रदीप पांडे ‘चिंटू’, अंजना सिंह, आम्रपाली दुबे, ऋचा दीक्षित, संजय पांडेय, देव सिंह, अवधेश मिश्रा, रक्षा गुप्ता, मनोज टाइगर, प्रियंका सिंह, सीपी भट्ट, संजय कुमार श्रीवास्तव,विजय खरे, केके गोस्वामी, शुभम तिवारी, माही खान, मनोज भावुक, प्रसून यादव, कविता यादव, अनुपमा यादव, अंतरा सिंह ‘प्रियंका’, समर सिंह, सहित कई नामचीन एक्टरों को मिल चुका है।

पिछले वर्ष लखनऊ में हुए अवॉर्ड शो में लोकप्रिय अभिनेता अरविंद अकेला ‘कल्लू’, अभिनेत्री अंजना सिंह, निर्देशक रजनीश मिश्रा सहित कई चर्चित हस्तियों को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मान मिला। समारोह में बड़ी संख्या में दर्शकों और मीडिया की उपस्थिति ने इसे ऐतिहासिक बना दिया।

इस बार पटना में और भी भव्य तैयारी
अभिनेता और गायक विवेक पांडेय ने पटना में आयोजित हो रहे सातवें संस्करण को और भी भव्य और आकर्षक बनाने की तैयारी की गई है। रेड कार्पेट एंट्री, सेलिब्रिटी इंटरैक्शन, लाइव डांस परफॉर्मेंस और विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए इसे यादगार बनाने की योजना है।

भोजपुरी सिनेमा के चर्चित सितारे, निर्माता-निर्देशक, संगीतकार, गायक और तकनीकी विशेषज्ञ इस समारोह में भाग लेंगे। आयोजकों का कहना है कि यह मंच केवल सितारों को सम्मानित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्दे के पीछे काम करने वाले तकनीकी कलाकारों को भी बराबर की पहचान देता है।
क्षेत्रीय सिनेमा को नई ऊंचाई आयोजकों ने बताया कि सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स शो का मुख्य उद्देश्य भोजपुरी फिल्म उद्योग के प्रतिभाशाली कलाकारों और तकनीशियनों को प्रोत्साहित करना तथा क्षेत्रीय सिनेमा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना है।

भोजपुरी सिनेमा ने पिछले कुछ वर्षों में कंटेंट, तकनीक और प्रस्तुति के स्तर पर उल्लेखनीय प्रगति की है। डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार के साथ इसकी पहुंच देश-विदेश तक बढ़ी है। ऐसे में यह अवॉर्ड समारोह उद्योग को एक सकारात्मक प्रतिस्पर्धा और गुणवत्ता की दिशा में प्रेरित करता है।

सिने प्रेमियों से अपील
आयोजन समिति ने पटना और आसपास के जिलों के सिने प्रेमियों से अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर इस भव्य समारोह की शोभा बढ़ाने की अपील की है। जब बापू सभागार में रोशनी, कैमरा और तालियों की गूंज होगी, तब यह केवल कलाकारों का सम्मान नहीं बल्कि पूरी भोजपुरी संस्कृति का उत्सव होगा।

7वां सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स शो एक बार फिर यह साबित करने जा रहा है कि भोजपुरी सिनेमा अब क्षेत्रीय दायरे से निकलकर राष्ट्रीय और वैश्विक मंच पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है।

दिल्ली प्रेस पिछले 86 वर्षों से भारत का एक अग्रणी प्रकाशन समूह रहा है और इसकी 9 भाषाओं में प्रकाशित होने वाली 30 पत्रिकाओं के जरिए देश-भर के पाठकों तक सीधी पहुंच है। हमारे यहां देश की सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली हिंदी पत्रिकाओं ‘सरिता’, ‘गृहशोभा’, ‘चंपक’, ‘सरस सलिल’, ‘मुक्ता’, मनोहर कहानियां’, ‘सत्यकथा’ का निरंतर सफल प्रकाशन किया जा रहा है, जिन्हें करोड़ों पाठक बड़े चाव से पढ़ते हैं।

दिल्ली प्रेस समूह की ‘सरस सलिल’ पत्रिका वर्ष 1993 से निरंतर प्रकाशित हो रही है और आमजन को जानकारी देने के साथ-साथ उनका मनोरंजन भी कर रही है।

Hindi Short Story : क्या जादू कर दिया

Hindi Short Story : चंपा इस गांव के बाशिंदे भवानीराम की बेटी थी. वे चंपा को कालेज पढ़ाना नहीं चाहते थे, मगर चंपा की इच्छा थी और उस के टीचरों के दबाव देने पर वे उसे पढ़ाने के लिए शहर भेजने को राजी हो गए.

जैसे ही चंपा का कालेज में दाखिला हुआ, उस की सहेलियों ने खुशियां मनाईं. वे सब चंपा को पढ़ाकू समझती थीं और उसे चाहती भी खूब थीं.

जब चंपा गांव के हायर सैकेंडरी स्कूल में पढ़ती थी, तब पूरी जमात में उस का दबदबा था. अगर कोई लड़का ऊंची आवाज में बोल देता था, तब वह उसे ऐसी नसीहत देती थी कि वह चुप हो जाता था. इसी वजह से वह अपनी सहेलियों की चहेती बनी हुई थी.

गांव में भी चंपा की धाक थी. कोई भी बदमाश लड़का उस से कुछ नहीं कहता था. कहने वाले दबी जबान में कहते थे कि यह चंपा नहीं, बल्कि ‘चंपालाल’ है.

अभी चंपा गली का नुक्कड़ पार कर ही रही थी कि दिनेश, जो गांव का एक आवारा लड़का था और शहर के कालेज में पढ़ता था, न जाने कब से उस के पीछेपीछे आ रहा था.

दिनेश उस का रास्ता रोकते हुए बोला, ‘‘कहां जा रही हो चंपा?’’

‘‘अपने घर,’’ हंसते हुए चंपा बोली.

‘‘कभी हमारे घर भी चलो,’’ उस के जिस्म को घूरते हुए दिनेश बोला.

‘‘तुम्हारे घर क्यों भला?’’ चंपा ने हैरानी से पूछा.

‘‘मेरा कहना मानोगी, तो मैं तुम्हें मालामाल कर दूंगा,’’ दिनेश ने लालच देते हुए कहा.

चंपा जानती थी कि दिनेश गांव के रईस मांगीलाल का बिगड़ैल बेटा है. उसे पैसों का खूब घमंड है, इसलिए सारा दिन गांव में आवारागर्दी करता है. लड़कियों को छेड़ना उस की आदत है. उस की करतूत जगजाहिर है, मगर अपनी इज्जत के डर से कोई भी गांव का आदमी उस के मुंह नहीं लगता है.

चंपा को चुप देख कर दिनेश बोला, ‘‘क्या सोच रही हो चंपा? मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया?’’

चंपा ने देखा कि जिस मोड़ पर वे दोनों खड़े थे, उस के आसपास जितने भी मर्दऔरत अपने घरों में बैठ कर बातें कर रहे थे, उन्होंने अपने दरवाजेखिड़कियां बंद कर ली थीं. दिनेश का डर उन के भीतर बैठा हुआ था. ऐसा लग रहा था कि कर्फ्यू लगा हुआ है.

दिनेश जब भी शहर से गांव में आता था और वहां की गलियों में घूमता था, तो उस के डर से सन्नाटा छा जाता था.

आज चंपा का उस से पहली बार सामना हुआ था, इसलिए उस ने भीतर ही भीतर उस से सामना करने के लिए अपने को तैयार कर लिया था.

‘‘चंपा, तू क्या सोचने लगी?’’ उसे चुप देख कर दिनेश ने फिर कहा, ‘‘तू ने जवाब नहीं दिया?’’

‘‘मैं ने जवाब दे तो दिया, शायद तुम ने सुना नहीं. बहरे हो क्या?’’

‘‘क्या कहा, मैं बहरा हूं? शायद तू मुझे जानती नहीं है?’’

‘‘अरे, तुझे तो सारा गांव जानता है,’’ चंपा ने कहा.

‘‘तब फिर क्यों तू दादागीरी कर रही है?’’

‘‘मैं एक लड़की हूं. मैं क्या दादागीरी करूंगी. गांव का दादा तो तू है,’’ चंपा उसी तरह से जवाब देते हुए बोली.

‘‘जैसा मैं ने सुना था, तू वैसी ही निकली. सुना है, कालेज में भी तू दादा बन कर रहती है?’’ दिनेश ने पूछा.

‘‘मैं ने पहले ही कहा, मैं क्या दादागीरी करूंगी. मगर अब लड़कियां इतनी कमजोर भी नहीं हैं कि हर कोई उन की कमजोरी का फायदा उठा सके,’’ कह कर चंपा ने अपने इरादे जाहिर कर दिए.

दिनेश कोई जवाब नहीं दे पाया. गली में पूरी तरह सन्नाटा था. मगर फिर भी लोग खिड़की खोल कर झांकने की कोशिश कर रहे थे. उन के भीतर एक डर बैठा हुआ था कि आज चंपा दिनेश के सामने आ गई है.

दिनेश बोला, ‘‘बहुत अकड़ कर बात कर रही है. मैं तेरी यह अकड़ निकाल दूंगा. चल, मेरे साथ. बहुत जवानी का जोश है तुझ में,’’ कह कर दिनेश ने चंपा का हाथ पकड़ लिया.

चंपा गुस्से में चीखते हुए बोली, ‘‘छोड़ दे मेरा हाथ. मैं वैसी लड़की नहीं हूं, जैसा तू समझ रहा है.’’

‘‘मैं एक बार जिस लड़की का हाथ पकड़ लेता हूं, फिर छोड़ता नहीं हूं,’’ दिनेश ने कहा.

‘‘ये फिल्मी डायलौग मत बोल. चुपचाप मेरा हाथ छोड़ दे.’’

‘‘यह तू नहीं, तेरी जवानी बोल रही है. चल मेरे साथ, जवानी का सारा जोश ठंडा कर देता हूं,’’ कह कर दिनेश उस को घसीट कर ले जाने लगा.

तब चंपा चिल्ला कर बोली, ‘‘मर्द है तो मर्द की तरह बात कर. यों कमरे में बंद कर के क्यों अपनी मर्दानगी दिखा रहा है. अगर तुझे अपनी मर्दानगी दिखानी है, तो यहीं दिखा. उतारूं कपड़े?’’ कहते हुए उस ने अपनी टीशर्ट उतार दी.

दिनेश थोड़ा ढीला पड़ गया. तब चंपा अपना हाथ छुड़ाते हुए बोली, ‘‘क्या सोच रहा है, और उतारूं कपड़े? बुझा ले अपनी प्यास,’’ कहते हुए उस ने टीशर्ट घुमा कर दिनेश को दे मारी.

‘‘मगर एक बात याद रख, गांव की किसी लड़की पर बुरी नजर नहीं रखनी चाहिए. लड़की कमजोर नहीं है. छोड़ दे बुरी नजर. फिर हर औरत को कमजोर भी मत समझ. इसलिए कहती हूं कि पैसों का घमंड छोड़ दे. यह एक दिन तुझे ले डूबेगा,’’ चंपा ने समझाते हुए कहा.

सारा महल्ला देखता रह गया. लोग बाहर निकल आए. लड़की के हाथों पिटे दिनेश का मुंह छोटा हो गया.

इतना कह कर चंपा वहां से चली गई.

दिनेश गुस्से से भरा वहीं खड़ा रह गया. आज एक लड़की से हार गया, जो उसे चुनौती दे गई. चुनौती भी ऐसी, जिसे वह पूरा नहीं कर सके. आज तक गांव वालों में से किसी की भी हिम्मत नहीं थी कि कोई उस के खिलाफ बोले, उसे चुनौती दे, मगर आज चंपा ने इस कदर उस को चुनौती दे डाली. वह उस का विरोध नहीं कर सका.

दिनेश ने जब गली की तरफ देखा, तो सभी मर्दऔरत दरवाजा खोल कर उसे हैरत भरी नजरों से देख रहे थे. वह उन से नजरें नहीं मिला सका और चुपचाप अपनी हवेली की तरफ चल दिया.

सारे गली वाले मानो एक ही सवाल अपनेआप से पूछ रहे थे कि चंपा ने दिनेश पर ऐसा क्या जादू किया, जो नीची गरदन कर के चला गया? सभी एकदूसरे से आंखों ही आंखों में इशारा कर रहे थे, मगर कुछ समझ नहीं पा रहे थे. सभी के दिमाग में एक ही बात बैठ चुकी थी कि चंपा की अब खैर नहीं. उस ने दिनेश से पंगा ले कर अपने ऊपर मुसीबत मोल ले ली है. वह गांव का बहुत बड़ा गुंडा है. पैसों के बल पर वह कुछ भी कर सकता है.

इस घटना से गांव में दहशत फैल गई. सभी गांव वाले खामोश हो गए.

अगले दिन चंपा कालेज पहुंची, तो हीरो बन गई थी. दिनेश की हिम्मत अब टूट चुकी थी.

चंपा कालेज नहीं छोड़ना चाहती थी, इसलिए उस ने भी हालात से समझौता कर लिया.

इस घटना के कुछ दिनों बाद दिनेश में बहुत बड़ा बदलाव दिखा. पहले वह हमेशा गुंडा बन कर रहा करता था, अपने को सब से बड़ा समझता था.

आमतौर पर अब वह चंपा के साथ कैंटीन में चाय पीता दिखता. वह अपने दोस्तों से कहता, ‘‘यह रही टीशर्ट… मार चंपा.’’

यह सुन कर चंपा शर्म से लाल हो जाती.

दिनेश शरीफ हो चुका था. गांव की किसी लड़की या किसी बहू को अब वह बुरी नजर से नहीं देखता था. उस पर चंपा ने उस दिन ऐसा क्या जादू कर दिया, यह आज तक राज बना हुआ था.

Short Story : इंसाफ हम करेंगे

Short Story : माही बेहाल पड़ी थी, रहरह कर शरीर में दर्द उभर रहा था. पूरे शरीर पर मारपीट के निशान पड़ चुके थे. मारते वक्त कभी सोचता भी तो नहीं था निहाल सिंह.

माही का पति निहाल सिंह कभी उसे बालों से पकड़ कर खींचता, तो कभी मारने के लिए छड़ी उठा लेता. शराब पीने के बाद तो वह बिलकुल जानवर बन जाता था. फिर तो उसे यह भी ध्यान नहीं रहता था कि उस के बच्चे अब बड़े हो चुके हैं. जब कभी उस की बेटी रूबी मां माही को बचाने के लिए आगे आती, तो वह भी पिट जाती.

2 दिन पहले जब वह शराब पी कर घर में सब को गालियां देने लगा था, तो माही ने उसे समझाते हुए कहा था, ‘‘बस करो, अब खाना खा लो. सुबह काम पर भी जाना है.‘‘

माही के इतना बोलने पर वह चीखते हुए बोला, ‘‘अब तुम रोकोगी मुझे. अभी बताता हूं तुझे,’’ फिर तो उस का हाथ ना थमा. आखिर रूबी दोनों के बीच में आ गई और उस का हाथ पकड़ कर झटकते हुए बोली, ‘‘पापा अब बस भी कीजिए, गलती तो आप की है, मम्मी को क्यों मार रहे हो?‘‘

‘‘कितनी बार कहा है कि तू बीच में ना बोला कर. जा यहां से,‘‘ रूबी को पीछे धकेलता हुआ वह बोला, ‘‘जाओ निकलो मेरे घर से.‘‘

यह सुन कर माही घबरा गई. इस से पहले भी तो वह कई बार उसे घर से निकाल चुका था. लड़खड़ाता हुआ वह बेड पर गिरा और सो गया.

रूबी ने मां को उठाया और दूसरे कमरे में ले गई. उस के जख्मों को साफ कर दवा लगाई और बोली, ‘‘मम्मी, अब बहुत हो गया, पापा नहीं सुधरेंगे. यह रोजरोज के झगडे जीने नहीं देंगे हमें.‘‘

माही दर्द से कराहते हुए बोली, ‘‘हां रूबी, मैं भी अब थक चुकी हूं. मुझे समझ में आ चुका है. अब मैं इन्हें कभी माफ नहीं करूंगी. बेशक रोए या गिड़गिड़ाए, मैं इन की बातों में नहीं आऊंगी.‘‘

अपने सिर पर लगी चोट को सहलाते हुए माही दृढ़ निश्चय के साथ बोली, ‘‘तुम बुलाओ पुलिस को, अब मैं दूंगी बयान इन के खिलाफ.‘‘

रूबी ने झट से पुलिस का नंबर डायल किया और सारी घटना बता दी.

माही और निहाल सिंह की लव मैरिज हुई थी. घर वालों के खिलाफ जा कर माही ने निहाल सिंह का हाथ थामा था. दोनों भारत से यूरोप आ कर बस गए थे. माही ने जब काम करना चाहा, तो उस ने कहा, ‘‘तुम मेरे घर की रानी हो, तुम घर संभालो, मैं बाहर संभालता हूं.‘‘

कुछ समय तो बहुत अच्छा बीता, मगर धीरेधीरे माही को महसूस होने लगा कि निहाल सिंह का स्वभाव दिन ब दिन बदलता जा रहा है. काम से आते ही वह शराब पीने लग जाता. तब तक बच्चे भी हो चुके थे. उस ने खुद को बच्चों में व्यस्त कर लिया था.

जब कभी माही उसे बाहर जाने को कहती, वह मना कर देता. निहाल सिंह अब छोटीछोटी बातों में भी माही पर शक करने लगा था. जब कभी काम का लोड बढ़ जाता, वह झल्ला कर कहता, ‘‘मुझ से नहीं होता इतना काम, मैं नहीं उठा सकता इतना बोझ.‘‘

अगर माही नौकरी करने को कहती, तो वह उसे पीटने लगता. शराब पी कर मारपीट तो उस के लिए रोज की बात हो गई थी. बच्चे डरते मां के पीछे छिप जाते थे. वह अब थोड़े बड़े भी हो गए थे. उन का स्कूल में दाखिला करवाना जरूरी हो गया था. खर्चा बढ़ गया था तो माही ने निहाल सिंह को किसी तरह नौकरी के लिए मना लिया. वह घर का सारा काम निबटा कर ही नौकरी पर जाती और वापस आते ही बच्चों और घर को देखती.

माही ने कभी किसी से अपने साथ हुई मारपीट का जिक्र नहीं किया था. हां, कभीकभी उस के घर से आती मारपीट और चीखने की आवाजों से परेशान हो कर पड़ोसी ही पुलिस में रिपोर्ट कर देते. पुलिस आती तो वह झूठ बोल कर उसे बचा लेती. ऐसे ही समय निकल रहा था.

निहाल सिंह का मन करता उसे प्यार करता, नहीं तो आधी रात को उसे मारपीट कर कमरे से बाहर निकाल देता. वह अपनी तकदीर को कोसती बच्चों के पास आ कर सो जाती.

इतना सबकुछ होने के बावजूद भी वह निहाल सिंह का पूरा ध्यान रखती. हर काम वह समय से करती. सुबह उठते ही सब से पहले उस का टिफिन तैयार करती. किसी तरह उस ने निहाल सिंह को मना कर बच्चों को साथ वाले बड़े शहरों में पढ़ने के लिए भेज दिया था, ताकि वह दोनों पढ़लिख कर अच्छी नौकरियों पर लग सकें. असल बात तो यह थी कि माही उन दोनों पर पिता की गलत हरकतों का असर नहीं पड़ने देना चाहती थी.

1-2 बार ऐसे ही किसी बात पर गुस्सा हो कर निहाल सिंह ने माही को आधी रात में घर से बाहर निकाल दिया था. माही की मौसी का बेटा इसी शहर में रहता था. वह उसे फोन करती और वह उसे ले कर अपने घर चला जाता. फिर उस ने माही को समझाया कि ऐसे तो यह कभी नहीं सुधरेगा. तुम कब तक इस की मारपीट बरदाश्त करोगी? मौसी के बेटे ने खुद ही पुलिस में उस की रिपोर्ट लिखवा दी.

जब पुलिस निहाल सिंह को घर से उठा कर ले गई, तब माही डर गई और उस ने भाई को रिपोर्ट वापस लेने के लिए मना लिया. जब ऐसा 2-3 बार हुआ, तो वह भी पीछे हट गया.

माही इसे अपनी किस्मत समझ कर समझौता कर रही थी. उसे पता था कि निहाल सिंह क्रोधी है, पर उस के बच्चों का पिता है. वह भले ही अब उसे पहले जैसा प्यार नहीं करता, मगर वह उस के लिए तो आज भी वही उस का प्यार है.

तभी एक दिन निहाल सिंह काम से आते वक्त अपने साथ एक जवान औरत को घर ले आया. माही ने उसे देखते ही निहाल सिंह से उस के बारे में पूछा कि यह कौन है तो उस ने बताया, ‘‘यह प्रीति है. इस का पति मेरे साथ काम करता था. ज्यादा शराब पीने से वह मर गया. मैं इस की मदद कर रहा हूं, क्योंकि उस के बीमे और पैंशन के बारे में इसे कुछ नहीं पता.‘‘

माही भोली थी. वह बोली, ‘‘अच्छा है, आप इन की मदद कर रहे हो वरना कौन बेगाने देश में किसी की मदद करता है.‘‘

अब तो जब भी प्रीति का फोन आता, निहाल सिंह भागाभागा उस के पास पहुंच जाता.

एक दिन माही काम से वापस आई, तो घर का दरवाजा खोलते ही बेडरूम से किसी के हंसने की आवाज आई. अंदर अंधेरा था. बिजली का स्विच औन करते ही माही की आंखें खुली की खुली रह गईं.

जब माही ने उन दोनों को बेड पर आपत्तिजनक हालत में देखा. शर्मिंदा होने के बजाय दोनों हंसने लगे. इस के बाद तो उस के सामने ही सबकुछ चलने लगा.

यह देख माही का दिल टूट चुका था. इतना सब होने के बावजूद भी उस ने कभी नहीं सोचा था कि वह उसे इस तरह धोखा देगा. जब एक दिन उस को पास बिठा कर वह बोला, ‘‘तू हां करे, तो मैं इसे भी साथ रख लूं.

माही को तो काटो खून नहीं. उस ने पक्का मन बना लिया कि अब वह उस के साथ नहीं रहेगी.

बच्चे पढ़लिख कर अब अच्छी नौकरियों पर लग चुके थे. सिर्फ छुट्टियों में ही वे घर आते थे. वे मां को अपने साथ चलने को कहते, मगर वह जानती थी कि निहाल सिंह बीमारी का शिकार है. उस के खानेपीने का ध्यान उस ने ही रखना है, इसलिए वह सबकुछ बरदाश्त कर के भी उसी के साथ रह रही थी.

आजकल छुट्टियों में बेटी रूबी घर आई हुई थी. कल की हुई मारपीट के बाद माही ने रूबी को निहाल सिंह और प्रीति के संबंधों के बारे में भी बता दिया.

रूबी को अपने पिता पर बहुत गुस्सा आ रहा था. उस ने अपने पिता के खिलाफ रिपोर्ट लिखवा दी थी. थोड़ी ही देर में पुलिस आ गई. रूबी और माही ने बयान दे दिया. माही की चोटें उस के साथ हुए अत्याचारों की साफ गवाही दे रही थीं.

माही ने यह भी बताया कि जब वह पेट से थी, तो निहाल सिंह ने उसे बहुत बार पीटा था.

रिपोर्ट को मजबूत बनाने के लिए पुलिस वालों ने माही की चोटों के फोटो भी खींच कर साथ लगा दिए. पुलिस निहाल सिंह को साथ ले गई. वहां उसे 2 दिन हिरासत में रखा, फिर वार्निंग दे कर छोड़ दिया गया कि वह माही के आसपास भी नहीं फटकेगा. अगर उस ने माही को तंग किया तो उस पर कार्यवाही की जाएगी और 2 साल की जेल भी हो सकती है. उसे एक अलग घर में रहने के लिए कहा गया.

निहाल सिंह फोन कर के बारबार माही से माफी मांगने लगा. उसे पता था कि माही का दिल पिघल जाता है. वह उसे अब भी प्यार करती है, मगर रूबी ने मां को साफसाफ कह दिया, ‘‘मम्मी इस बार अगर तुम ने पापा को माफ किया, तो मैं कभी आप से बात नहीं करूंगी.”

माही ने निहाल सिंह का अब फोन उठाना बंद कर दिया.

रूबी पिता को फोन पर धमकी देते हुए बोली, ‘‘आज के बाद अगर आप ने मम्मी को फोन किया, तो पुलिस आप को 2 साल के लिए जेल में डाल देगी. मम्मी अब अकेली नहीं हैं. आज तक जो आप ने उन के साथ किया, उस के लिए हम तीनों आप से कोई रिश्ता नहीं रखेंगे. आज तक जो बेइज्जती मम्मी की हुई है, उस की सजा तो आप को भुगतनी पड़ेगी. मम्मी को उस के बच्चे इंसाफ दिलवाएंगे.‘‘

पहले निहाल सिंह गिड़गिड़ाया, फिर बेशर्मी से बोला, ‘‘मैं भी तुम लोगों से कोई रिश्ता नहीं रखना चाहता. आज तक मैं ने तुम दोनों की पढ़ाई पर जो भी खर्चा किया है, वह मुझे वापस चाहिए.‘‘

यह सुनते ही रूबी की आंखों में आंसू आ गए, उस का पिता इतना गिर सकता है, उस ने कभी नहीं सोचा था, मगर फिर भी वह हिम्मत कर अपने आंसुओं को साफ करते हुए बोली, ‘‘पापा कोई बात नहीं, हमारी नौकरी लग चुकी है, हम दोनों हर महीने आप को खर्चा भेज दिया करेंगे, पर अब मम्मी की और बेइज्जती बरदाश्त नहीं करेंगे,‘‘ कहते हुए रूबी ने फोन रख दिया और मां माही को अपने गले से लगा लिया.

Hindi Story : फर्ज की याद

Hindi Story : जब से सुनील शर्मा इस दफ्तर में प्रमोशन ले कर आए हैं तब से वे कभी चपरासी गणेशी से पानी नहीं मंगाते हैं. वे खुद ही उठ कर पी आते हैं, चाहे मेज पर कितना भी काम हो.

गणेशी कई दिनों से सुनील शर्मा की इस आदत को देख रहा था. आज भी जब वे पानी पी कर अपनी मेज पर आ कर बैठे तब गणेशी आ कर बोला, ‘‘बाबूजी, एक बात कहूं…’’

‘‘कहो,’’ सुनील शर्मा ने नजर उठा कर गणेशी की तरफ देखा.

‘‘जब से आप आए हो, उठ कर पानी पीते हो.’’

‘‘हां, पीता हूं,’’ सुनील शर्मा ने सहजता से जवाब दिया.

‘‘आप मुझे आदेश दे दिया करें न, मैं पिला दिया करूंगा. आखिर मेरी ड्यूटी पानी पिलाने की ही है,’’ गणेशी ने सवालिया निगाहों से पूछा.

‘‘देखो गणेशी, मेरा उसूल है कि अपना काम खुद करना चाहिए,’’ सुनील शर्मा ने अपनी बात रखी.

‘‘ऐसी बात नहीं है बाबूजी, आप मेरे हाथ का पानी पीना नहीं चाहते हैं,’’ गणेशी ने यह कह कर गुस्से से सुनील शर्मा को देखा.

सुनील शर्मा तुरंत कोई जवाब नहीं दे पाए. गणेशी फिर बोला, ‘‘मगर, मैं सब जानता हूं बाबूजी, आप मेरे हाथ का पानी क्यों नहीं पीना चाहते हैं.’’

‘‘क्या जानते हो?’’

‘‘मैं अछूत हूं, इसलिए आप मेरा दिया पानी नहीं पीना चाहते हो.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है गणेशीजी, मैं छुआछूत को नहीं मानता हूं.’’

‘‘फिर मुझ से पानी मंगा कर क्यों नहीं पीते हो?’’

‘‘देखो गणेशीजी, आप चपरासी हो. मैं जब से इस दफ्तर में आया हूं, किसी को आप ने अपनी मरजी से पानी नहीं पिलाया. जिस बाबू ने पानी पीने के लिए कहा तब कहीं जा कर आप ने पिलाया…’’ समझाते हुए सुनील शर्मा बोले, ‘‘इसी बात को मैं कई दिनों से देख रहा था, जबकि तुम्हारा यह फर्ज बनता है कि बाबुओं को बिना मांगे पानी पिलाना चाहिए.’’

‘‘बाबूजी, जब प्यास लगती है तभी तो पानी पिलाना चाहिए.’’

‘‘नहीं, यही तो आप गलती कर रहे हो. बिना मांगे पानी ले कर हर मेज पर पहुंच जाना चाहिए. यही एक चपरासी का फर्ज होता है…’’ समझाते हुए सुनील शर्मा बोले, ‘‘यही वजह है कि मैं खुद उठ कर पानी पीता हूं. आप ने आज तक अपनी मरजी से मुझे पानी नहीं पिलाया है.’’

‘‘अरे बाबूजी, आप ही पहले ऐसे आदमी हो वरना सभी बाबू मांग कर पानी पीते हैं. आप ही ऐसे हैं जो मुझे अछूत समझ कर पानी नहीं मंगाते हो,’’ गणेशी ने आरोप लगाते हुए कहा.

सुनील शर्मा सोच में डूब गए. गणेशी उन की बात का उलटा मतलब ले रहा है. वे कुछ और जवाब दें, इस से पहले ही साहब की घंटी बज उठी. गणेशी साहब के केबिन में चला गया.

सुनील शर्मा मन ही मन झुंझला उठे. पास की मेज पर बैठे मुकेश भाटी बोले, ‘‘शर्माजी, देख लिए गणेशी के तेवर. आप की बात का उस पर कोई असर नहीं पड़ा.’’

‘‘हां भाटीजी, असर तो नहीं पड़ा,’’ उन्होंने भी स्वीकार करते हुए कहा.

‘‘इसलिए मैं कहता हूं कि अपने उसूल छोड़ दो वरना यह आप पर छुआछूत बरतने का केस दायर कर देगा…’’ समझाते हुए मुकेश भाटी बोले, ‘‘फिर कचहरी के चक्कर काटते रहना क्योंकि कानून भी इस का ही पक्ष लेगा.’’

‘‘देखो भाटीजी, मैं तो उस को अपने फर्ज की याद दिला रहा था.’’

‘‘कोई जरूरत नहीं है शर्माजी. जिस को अपना फर्ज समझना ही नहीं है उसे याद दिलाना फुजूल है. उस से बहस कर के खुद का सिर फोड़ना है. फिर मेरा काम था समझाने का समझा दिया. आप अपने उसूलों पर ही रहना चाहते हो तो रहो. कल को कुछ हो जाए, तो फिर मुझे कुछ मत कहना,’’ कह कर मुकेश भाटी अपने काम में लग गए.

सुनील शर्मा के भीतर इन बातों को सुन कर हलचल मच गई. अब पहले वाला जमाना नहीं है. सरकार भी रिजर्वेशन के तहत सब महकमों में इन की भरती करती जा रही है, इसलिए चपरासी से ले कर अफसर तक ये ही मिलेंगे.

जिस परिवार में सुनील शर्मा का जन्म हुआ है, वह ब्राह्मण परिवार है. 1970 के पहले उन का ठेठ देहाती गांव था. छुआछूत का जोर था. किसी अछूत को छूना भी पाप समझा जाता था, इसलिए वे गांव में ही अलग बस्ती में रहते थे.

सुनील शर्मा के पिता गंगा सागर गांव में शादीब्याह कराने और कथा बांचने का काम करते थे. वे यह काम केवल ऊंची जाति वालों के यहां किया करते थे. निचली जाति के लोगों के यहां कर्मकांड के लिए वे मना कर दिया करते थे.

गांव की दलित बस्ती गंगा सागर से बहुत नाराज रहती थी. मगर वे कर कुछ नहीं पाते थे, क्योंकि उन की चलती ही नहीं थी.

जब कोई दलित किसी काम से गंगा सागर के पास आता था, तो वे उन्हें बाहर बिठा कर संस्कार करा देते थे. बदले में वे कुछ सिक्के देते थे, जिन्हें वे जमीन पर ही रखवा देते थे. तब यजमान मखौल उड़ा कर कहते थे, ‘पंडितजी, यह कैसा नियम. मेरे हाथ से नहीं लिया, मगर हाथ से अपवित्र सिक्के को आप ने ग्रहण कर लिया तो अपवित्र नहीं हुए.’

बदले में गंगा सागर संस्कृत में शुद्धीकरण के श्लोक पढ़ कर उसे शुद्धी का पाठ पढ़ा देते थे.

उस समय दलितों में कूटकूट कर अपढ़ता भरी थी. विरोध करने के बजाय वे सबकुछ सच मान लेते थे. गांव में कोई गंगा सागर को दलित दिख जाता, तो वे उस से बच कर निकलते थे.

मगर जैसेजैसे दिन बीतते रहे, छुआछूत की यह परंपरा शहरों में खत्म होने के साथसाथ गांवों में भी खत्म होने लगी थी. अब तो न के बराबर रही है. अब भी कुछ पुराने लोग हैं जो छुआछूत को मानते हैं क्योंकि वे उसी जमाने में जी रहे हैं.

सुनील शर्मा को आज नौकरी करते हुए 32 साल हो गए हैं. इन 32 सालों में उन्होंने बहुतकुछ देख लिया है. रिटायरमैंट में 3 साल बचे हैं. गणेशी जैसे कितने ही लोग हैं जो इस दलित अवसर को भुनाना चाहते हैं. इन को सामान्य वर्ग के प्रति हमेशा से नफरत थी, जो विष बीज बन कर वट वृक्ष

बन गई है. सरकार ने साल 1989 में इन के लिए जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल करने पर बैन लगा दिया है, तब से ही इन के हौसले बढ़ने लगे हैं.

‘‘अरे शर्माजी, पानी पीयो,’’ इस आवाज से सुनील शर्मा की सारी विचारधारा भंग हो गई.

गणेशी गिलास लिए उन के सामने खड़ा था. उन्होंने गटागट पानी पी कर वापस उसे गिलास थमा दिया.

गणेशी बोला, ‘‘बाबूजी, आप ने मुझे मेरा फर्ज याद दिला दिया.’’

‘‘वह कैसे गणेशीजी?’’ हैरानी से सुनील शर्मा ने पूछा.

‘‘देखिए बाबूजी, अब तक जो मांगता था, उसे ही मैं पानी पिलाता था, मगर आप ने यह कह कर मेरी आंखें खोल दीं कि पानी तो हर मेज पर जा कर पिलाना चाहिए, इसलिए आज से ही मैं ने आप से शुरुआत की है.’’

‘‘यह तो बहुत अच्छा काम किया गणेशीजी. चलो, मेरी बात पर आप ने गौर तो किया.’’

‘‘हां बाबूजी, अब मुझे किसी को फर्ज की याद दिलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी,’’ कह कर गणेशी चला गया.

मगर सुनील शर्मा उस में अचानक आए इस बदलाव को देख कर हैरान थे.

Hindi Story : दिल में लगा न कर्फ्यू

Hindi Story : दुनियाभरमें तहलका मचा था. कोरोना नाम की महामारी की वजह से दुनिया का हर शहर, हर गली, हर घर लौक डाउन हो रहा था. उधर मासूम निकहत के घर में लगातार टीवी चालू था और उस की मां टीवी स्क्रीन पर ऐसे नजरें गड़ाए थी जैसे कि उस के परिवार को टीवी ही इस मुसीबत से बाहर निकालेगा.

निकहत 5वीं कक्षा में थी. स्कूल बंद था. अब्बा पुलिस में थे तो ‘वर्क फ्रौम होम’ का सवाल ही नहीं था, जैसा कि अन्य विभागों में सरकार की ओर से लागू किया गया था. आसपास के सारे माहौल पर बंद का सन्नाटा छाया था. निकहत की मां बीचबीच में अपना फोन चैक कर रही थी और बीचबीच में किसी को काल भी करती थी. एक कौल आया, निकहत की मां ने दौड़ कर फोन उठाया. शायद वह इस फोन के इंतजार में थी.  ‘‘क्या हुआ भैया? कुछ इंतजाम हुआ? चार दिन से लगातार कोशिश कर रही हूं कि कहीं से ब्लड मिल जाए, लेकिन कहीं कोई राह नहीं. ब्लड कहीं उपलब्ध ही नहीं है, कोई डोनर नहीं मिला क्या भैया?’’

अनिश्चित आशंका से आखरी शब्द गले में ही लड़खड़ा गए थे निकहत की मां के. ‘‘दीदी हम ने भी बहुतों से पूछने की कोशिश की, कई परिचितों से तो संपर्क ही नहीं हो पा रहा है. अपने ही शहर में अकेले ऐसे बच्चों के ही केस डेढ़ सौ से ऊपर हैं, और आप तो जानती हैं उन्हें खून की कितनी जरूरत पड़ती है.’’

‘‘भैया पिछली ही बार मैं ने अपने पति को अपना ब्लड दिया था जब वे सरकारी काम में भीड़ के साथ मुठभेड़ में जख्मी हुए थे. मुझ में अभी प्लेटलेट्स और हीमोग्लोबिन की कमी है, मेरा खून अभी काम न आ सकेगा, कोई उपाय देखो भैया.’’ उस के करुण स्वर ने उस तरफ के व्यक्ति को भी आद्र कर दिया. ‘‘देखता हूं दीदी. कर्फ्यू और कोरोना के डर से तो कोई किसी काम में हाथ डालने को तैयार नहीं. कोशिश करता हूं.’’ बातचीत खत्म होने पर निकहत की मां पहले से ज्यादा परेशान हो गई. निकहत जब छोटी सी थी अचानक एक बार बुखार आया था. फिर तो वह ठीक होने का नाम ही नहीं ले रही थी.

टैस्ट पर टैस्ट के बाद आखिर उस की बीमारी का पता चला तो नन्हीं निकहत को ले कर सारे घर वाले परेशान हो गए. नन्हीं निकहत को थैलेसीमिया था यानी ब्लड कैंसर. हर पंद्रह दिन में उस के शरीर में खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है, क्योंकि इस बीमारी में खून बनना बंद हो जाता है. यदि मरीज को निश्चित अंतराल पर खून न चढ़ाया जाए तो उस की लाख जीने की इच्छा भी उस का जीवन नहीं बचा सकती. निकहत की मां का यह अंतहीन सिलसिला शुरू हो चुका था. और ऐसे में आया था यह कोरोना का कहर. शहरों की तालाबंदी से रोजमर्रा की जिंदगी जहां बाधित होने लगी है, जहां जीने की होड़ में लोग मृत्यु से रोजाना भिड़ रहे हैं, वहां पहले से ही जीवन पर काल बनी बीमारियों का सामना कैसे करें. जिन के घर के बच्चे पहले से ही असाध्य बीमारियों से जूझ रहे, उन का उपाय इस लौक डाउन शहर की कानीगूंगी गलियों में कैसे होगा?

जब देश में अचानक फैली इस महामारी से लड़ कर जीतने के लिए न तो पर्याप्त मैडिकल स्टाफ हैं, न वैंटिलेटर, न हाइजीन के लिए पर्याप्त सामान और न इस रोग की जांच के लिए अधिक हौस्पिटल. खून की बीमारी से जूझते बच्चों की तो ऐसे भी इम्यून शक्ति कमजोर होती है. कैसे बचाए प्यारी सी निकहत को उस की मां. अचानक पड़ोस के कल्याण ने निकहत के घर का दरवाजा खटखटाया. अब कोई भी घटना निकहत की मां को अच्छी नहीं लग रही है. खास कर लोगों से बोलनाबतियाना. 30 साल की उम्र में ही उस ने अपने मन को बांध कर रखना सीख लिया है और अभी तो निकहत को ले कर उस का मन बहुत ही आशंकित है. बाहर आ कर देखा बाजू में रहने वाला कल्याण है, एमटैक की स्टूडैंट.

वह और भी घबरा गई. अभीअभी इस का इस के पिता से जोरदार कहासुनी हो रही थी, पता नहीं क्या हुआ था और अब यह यहां. निकहत में खून की जबरदस्त कमी हो रही है, उस का किसी बाहरी से मिलनाजुलना ठीक नहीं. कोरोना वायरस की वजह से चेतावनी है कि लोग दूसरे के घरों में न जाएं. सभी ओर कर्फ्यू तो इसी वजह लगा है, फिर यह यहां क्यों? परेशान सी निकहत की अम्मी ने कल्याण पर प्रश्नसूचक निगाहें डाली. भाभी, अभी न्यूज पेपर में पढ़ा थैलेसीमिया के बच्चों को समय पर खून नहीं मिल पा रहा है, इस से उन की जिंदगी पर खतरा बढ़ गया है. लौकडाउन की वजह से कोई खून देने वाला नहीं मिल पा रहा है, ऊपर से रक्त कालाबाजारी भी तो होने लगती है, ऐसी आपदा में. क्या निकहत का इंतजाम हो गया है?

‘‘नहीं भाई, शुक्रिया तुम्हें याद रहा निकहत का.’’ ‘‘इस में शुक्रिया कहने की कोई बात नहीं. यदि आप को कोई ऐतराज न हो तो आप निकहत को ले कर अभी मेरे साथ कालोनी के ब्लड बैंक चल सकती हैं. कालोनी के बाहर जो ब्लड बैंक है वहां मैं ने फोन से पूछ रखा है, वे चढ़ा देंगे मेरा खून निकहत को.’’ निकहत की अम्मी को लगा जैसे कल्याण को वह दौड़ कर गले लगा ले. 23 वर्ष का यह नौजवान कितना संवेदनशील और समझदार है. बात तो सभी कर लेते हैं, लेकिन विपत्ति में पूछने वाले मिल जाएं तो दूर रह कर भी यह दुख झेला जा सकता है. ‘‘भाई बड़े मुसीबत में थी, इस के अब्बू ड्यूटी में हैं, कौन इंतजाम करे. इस करम का शुक्रिया अदा कर दूं. इतनी औकात नहीं मेरी, हां दुआ करती हूं परवरदिगार तुम्हें हजार नियामत बख्शे. भाई बुरा न मानो, एक बात पूछना चाहती हूं, अभी कुछ देर पहले तुम्हारे घर से तुम्हारे पिताजी के चीखने की आवाजें आ रही थीं, सब खैरियत तो है?’’

‘‘अरे बाबूजी को डर था कि खून देने गया तो मुझे कोरोना हो जाएगा. बिना समझे न डरें वही बता रहा था जब पूरे हाइजीन का खयाल रखा जाएगा, तो यह क्यों होगा. और बच्चों की जिंदगी भी तो बचानी है.’’ निकहत की मां कल्याण के साथ ब्लड बैंक जाती है, और औपचारिकताएं पूरी कर निकहत को खून चढ़ा दिया जाता है. खून के कतरों के साथ प्यार, विश्वास और कोरोना नहीं, करुणा की धार स्थानांतरित होती रही बच्ची में. निकहत की मां सोच रही थी, शहर में लाख कर्फ्यू लगा हो, मगर यदि दिल में कर्फ्यू नहीं लगा तो मुश्किल की घड़ी में एकदूसरे के काम आया जा सकता है.

Hindi Story : अनुभव – गरिमा के साथ परेश को क्या महसूस हुआ

Hindi Story : पहाड़ियों पर कार सरपट भागी जा रही थी. ड्राइवर को शायद घर पहुंचने की ज्यादा जल्दी थी, वरना सांप जैसे टेढ़ेमेढ़े रास्तों पर इस तरह कौन खतरा मोल लेता है? सूरज तेजी से डूबने वाला था. परेश का मन भी शायद सूरज की तरह ही बैठा हुआ था, लेकिन पहाड़ों की जिंदगी उसे बहुत सुकून देती आई थी. जब भी छुट्टी मिलती वह भागा चला जाता था.

परेश की जिंदगी बहुत अजीब थी. नाम, पैसा, शोहरत सब था लेकिन मन के अकेलेपन को दूर करने वाला साथी कोई नहीं था. पहाड़ों पर सूरज छिपते ही अंधेरा तेजी से पसरने लगता है. जल्दी ही रात जैसा माहौल छाने लगता है. अचानक एक मोड़ पर जैसे ही कार तेजी से घूमी, परेश की नजर घाटी की एक चट्टान पर पड़ी. एक लड़की वहां खड़ी थी. इस मौसम में अकेली लड़की की यह हालत परेश को खटक गई.

उस ने ड्राइवर को कार रोकने को कहा. ड्राइवर ने फौरन कार रोक दी. ‘चर्र… चर्र…’ की तेज आवाज पहाड़ों के शांत माहौल को चीर गई. ड्राइवर ने हैरानी से परेश की ओर देखा और पूछा, ‘‘क्या हुआ साहबजी?’’

परेश ने बिना कोई जवाब दिए कार का दरवाजा खोला और बिजली की रफ्तार से उस ओर भागा जहां वह लड़की खड़ी दिखी थी. परेश ज्यों ही वहां पहुंचा लड़की ने नीचे छलांग लगा दी. लेकिन परेश ने गजब की फुरती दिखाते हुए उसे नीचे गिरने से पहले ही पकड़ लिया.

परेश ने फौरन उस लड़की को पीछे खींचा. वह पलटी तो परेश की ओर अजीब सी नजरों से देखने लगी. ‘‘क्या कर रही थी?’’ परेश ने उस लड़की का हाथ पकड़े हुए पूछा.

‘‘कुछ नहीं…’’ लड़की बोली. ‘‘कहां जाना है? इस वक्त सुनसान इलाके में इतनी खतरनाक जगह… क्या करना चाहती थी?’’ परेश ने फिर गुस्से से पूछा.

‘‘अरे, मैं तो सैरसपाटे के लिए… बस यों ही… पैर फिसल गया शायद…’’ कहते हुए लड़की ने वाक्य अधूरा छोड़ दिया. परेश उस लड़की को अपनी कार की ओर ले आया. लड़की ने कोई विरोध भी नहीं किया. ड्राइवर उस लड़की को शक भरी नजरों से घूरने लगा. परेश की पूछताछ अभी भी जारी थी. थोड़ी देर बाद वह लड़की अपने मन का गुबार निकालने लगी.

परेश यह जान कर हैरान हुआ कि वह घर से भागी हुई थी और किसी भी कीमत पर वापस लौटने को तैयार नहीं थी. उस के अशांत मन का गुस्सा साफ झलक रहा था. ‘‘अब कहां ठहरी हो आप?’’ परेश ने पूछा.

‘‘मैं… अरे, मुझे मरना है, जीना ही नहीं, इसलिए ठहरने की क्या बात आई?’’ इतना कह कर वह लड़की खिलखिला कर हंस पड़ी. ‘‘यह क्या बात हुई. आप को पता है कि आप के मातापिता कितना परेशान होंगे…’’ परेश ने शांत लहजे में उसे समझाते हुए कहा.

‘‘मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता,’’ वह लड़की बेतकल्लुफ अंदाज से बोली. ‘‘मैं परेश… लेखक. यहां किताब पूरी करने आया हूं.’’

‘‘अच्छा, आप लेखक हैं? फिर तो मेरी कहानी भी जरूर लिखना… एक पागल लड़की, जिस ने किसी की खातिर खुद को मिटा दिया.’’ ‘‘आप ऐसी बातें न करें. जिंदगी बेशकीमती है, इसे खत्म करने का हक किसी को नहीं,’’ परेश ने कहा.

‘‘मेरा नाम है गरिमा सिंह… एक हिम्मती लड़की जिसे कोई नहीं हरा सकता, पर नकार जरूर दिया.’’ ‘‘आप ऐसा मत कहिए…’’ परेश अपनी बात पूरी करता उस से पहले ही गरिमा ने उस की बात काट दी, ‘‘आप मुझे यहीं उतार दीजिए…’’

‘‘मैं आप को अब कहीं नहीं जाने दूंगा. क्या आप मेरे साथ रहेंगी?’’ गरिमा ने पहले परेश की तरफ देखा, फिर अचकचा कर हंस पड़ी, ‘‘देख लीजिए, कोई नई कहानी न बन जाए?’’

परेश को शायद ऐसे सवाल की उम्मीद न थी. उस की सोच अचानक बदल गई. आखिर था तो वह भी मर्द ही. जोश को दबाते हुए वह बोला, ‘‘कोई नहीं जो कहानी बने, लेकिन अब अपने साथ और खिलवाड़ मत कीजिए.’’ ‘‘मरने वाला कभी किसी चीज से डरा है क्या सर…?’’ इस बार गरिमा की आवाज में गंभीरता झलक रही थी.

अचानक ड्राइवर ने कार रोकी. दोनों ने सवालिया नजरों से उसे देखा. कार में कोई खराबी आ गई थी जिसे वह ठीक करने में जुटा था. अब रात होने लगी थी. तभी ड्राइवर ने परेश को आवाज लगाई, ‘‘साहब, बाहर आइए.’’

परेश हैरानी से कार से बाहर निकला. ड्राइवर बोनट खोले इंजन को दुरुस्त करने में बिजी था. उस ने गरदन ऊपर उठाई और परेश के कान में फुसफुसा कर कहा, ‘‘साहबजी, कार को कुछ नहीं हुआ है. आप को एक बात बतानी थी, इसलिए यह ड्रामा किया.’’ ‘‘क्या?’’ परेश ने पूछा.

‘‘साहबजी, यह लड़की मुझे सही नहीं लग रही. आजकल पहाड़ों में… मुझे डर है कि कहीं आप के साथ कुछ गलत न हो जाए.’’ ‘‘अरे, तुम चिंता मत करो… मैं सब समझता हूं.’’

‘‘ठीक है साहब, आप की जैसी मरजी,’’ ड्राइवर ने लाचारी से कहा. ‘‘अच्छा, हमें ऐसी जगह ले चलो जहां भीड़भाड़ न हो,’’ परेश ने कहा.

सीजन नहीं होने से भीड़भाड़ नहीं थी. शहर से थोड़ा दूर एक बढि़या लोकेशन पर उन्हें ठहरने की शानदार जगह मिल गई. ड्राइवर उन्हें होटल में छोड़ कर वापस चला गया. कमरे में आते ही गरिमा का अल्हड़पन दिखने लगा था. अब ऐसा कुछ नहीं था जिस से लगे कि वह थोड़ी देर पहले जान देने जा रही थी.

रात के 9 बज रहे थे. डिनर आ गया था. गरिमा बाथरूम में थी. थोड़ी देर बाद परेश की ड्रैस पहन कर वह बाहर निकली तो एकदम तरोताजा लग रही थी. उस की खूबसूरती परेश को मदहोश करने लगी. डिनर निबट गया. एक बैड पर लेटे दोनों उस मुद्दे पर चर्चा कर रहे थे जिस की वजह से गरिमा इतनी परेशान थी.

गरिमा की कहानी बड़ी अजीब थी. कालेज के बाद उस ने जिस कंपनी में काम शुरू किया वहीं उस के बौस ने उसे प्यार के जाल में ऐसा फंसाया कि वह अभी तक उस भरम से बाहर नहीं निकल पा रही थी. अधेड़ उम्र का बौस उसे सब्जबाग दिखाता रहा और उस से खेलता रहा. जब गरिमा के मम्मीपापा को इस बात की भनक लगी तो उन्होंने उसे बहुत समझाया. सख्ती भी की लेकिन एक बार तीर कमान से निकल जाए तो फिर उसे वापस कमान में लौटाना मुमकिन नहीं होता. कुछ परवरिश में भी कमी रही. न पापा को फुरसत और न मम्मी को.

गरिमा को पुलिस का डर नहीं था. वह पहले भी 4 बार ऐसा कर चुकी थी, इसलिए उस के मातापिता अब पुलिस में शिकायत करा कर अपनी फजीहत नहीं कराना चाहते थे. गरिमा सो चुकी थी. परेश उस के बेहद करीब था. उस की सांसों की उठापटक एक अजीब सा नशा दे रही थी. आहिस्ता से उस का हाथ गरिमा की छाती पर चला गया. कोई विरोध नहीं हुआ. कुछ पल ऐसे ही बीत गए.

परेश कुछ और करता, उस से पहले ही गरिमा ने अचानक अपनी आंखें खोल दीं, ‘‘आप की क्या उम्र है सर?’’ ‘‘यही कोई 40 साल…’’ परेश ने जवाब दिया.

‘‘गुड, मैच्योर्ड पर्सन… अच्छा, एक बात बताओ… मैं कैसी लग रही हूं?’’ मुसकराते हुए गरिमा ने पूछा. ‘‘बहुत ज्यादा खूबसूरत,’’ परेश ने जोश में कहा.

इस में कोई शक नहीं था कि गरिमा की अल्हड़ जवानी, मासूमियत से लबरेज खूबसूरती सच में बड़ी दिलकश लग रही थी. ‘‘सच में…?’’

‘‘सच में आप बहुत खूबसूरत हैं,’’ परेश ने अपनी बात दोहराई. ‘‘लेकिन मैं खूबसूरत ही होती तो वह मुझे क्यों छोड़ता… दूध में से मक्खी की तरह निकाल बाहर किया उस ने…’’

‘‘प्लीज गरिमा, आप हकीकत को मान क्यों नहीं लेतीं? जो हुआ सही हुआ. पूरी जिंदगी पड़ी है आप की. वहां उस के साथ क्या फ्यूचर था, यह भी सोचो?’’ ‘‘इतना आसान नहीं है सर, किसी को भुला देना. प्यार किया है मैं ने…’’

‘‘मान लिया लेकिन तुम में समझ ही होती तो क्या ऐसे प्यार को अपनाती?’’ ‘‘सर, यह सही है कि हम में थोड़ा उम्र का फर्क था लेकिन उस के बीवीबच्चे थे, यह मुझे अब पता चला… धोखा किया उस ने मेरे साथ…’’

‘‘तो फिर तुम उसे अब क्यों याद कर रही हो? बुरा सपना बीत गया. अब तो वर्तमान में लौट आओ?’’ गरिमा ने कोई जवाब नहीं दिया. वह परेश के बहुत करीब लेटी थी. सच तो यह था कि परेश अब बहुत दुविधा में था.

गरिमा का हाथ परेश की छाती पर था. उस का इस तरह लिपटना उसे असहज कर रहा था. उस के अंदर शांत पड़ा मर्द जागने लगा. गरिमा के मासूम चेहरे पर कोई भाव नहीं थे. ‘‘क्या तुम्हें मुझ से डर नहीं लगता?’’ परेश ने पूछा.

‘‘नहीं, मुझे आप पर भरोसा है,’’ गरिमा ने शांत आवाज में जवाब दिया. ‘‘क्यों… मैं भी मर्द हूं… फिर?’’ परेश ने पूछा.

‘‘कोई नहीं सर… अब मैं इनसान और जानवर में फर्क करना सीख गई हूं.’’ गरिमा के जवाब से परेश को ग्लानि महसूस हुई. वह फौरन संभल गया. गरिमा क्या सोचेगी… हद है मर्द कितना नीचे गिर सकता है? परेश का मन उसे कचोटने लगा.

लेकिन गरिमा का अलसाया बदन परेश में भूचाल ला रहा था. गरिमा का खुलापन अजीब राज बन रहा था. वह समझ नहीं पा रहा था कि इस इम्तिहान में कैसे पास हो… गरिमा अब भी उस से लिपटी हुई थी. उस की आंखों में नींद की खुमारी झलक रही थी.

परेश सोच रहा था कि गरिमा का ऐसा बरताव उस के लिए न्योता था या अपनेपन में खोजता विश्वास… परेश की दुविधा ज्यादा देर नहीं चली. उस की हालत को समझ कर गरिमा बोली, ‘‘अगर आप इस समय मुझ से कुछ चाहते हैं तो मैं इनकार नहीं करूंगी… आप की मैं इज्जत करती हूं… आप ने मुझे आज नई जिंदगी दी है.’’

‘‘अरे नहीं, प्लीज… ऐसा कुछ भी नहीं… तुम दोस्त बन गई हो… बस यही बड़ा गिफ्ट है मेरे लिए,’’ सकपकाए परेश ने जवाब दिया. ‘‘उम्र में छोटी हूं सर लेकिन एक बात कहूंगी… शरीर का मिलन इनसान को दूर करता है और मन का मिलन हमेशा नजदीक, इसलिए फैसला आप पर है…’’

परेश को महसूस हुआ, सच में समझ उम्र की मुहताज नहीं होती. छोटे भी बड़ी बात कह और समझ सकते हैं. 2 दिन सैरसपाटे में बीत गए. परेश की किताब का काम शुरू ही न हो पाया, लेकिन गरिमा अब बिलकुल ठीक थी. वह वापस अपने घर लौटने को राजी हो गई थी. परेश ने फोन नंबर ले कर उस के पापा से बात की. घर से गुम हुई जवान लड़की की खबर पा कर गरिमा के मम्मीपापा ने सुकून की सांस ली.

परेश और गरिमा अब दोस्त बन गए थे. पक्के दोस्त, जिन में उम्र का फर्क तो था लेकिन आपसी समझ कहीं ज्यादा थी. परेश की मेहनत रंग लाई और गरिमा अपने घर वापस लौट गई. कुछ दिन बाद उस की शादी भी हो गई. अब वह अपनी गृहस्थी में खुश थी. परेश के लिए यह सुकून की बात थी. अकसर उस का फोन आ जाता, वही बिंदास, अल्हड़पन लेकिन अब सच में उस ने जिंदगी जीनी सीख ली थी. दिखावा नहीं बल्कि औरत की सच्ची गरिमा का अहसास और जिम्मेदारी उस में आ गई थी.

परेश सोचता था कि गरिमा को उस ने जीना सिखाया या गरिमा ने उसे? लेकिन यह सच था कि गरिमा जैसी अनोखी दोस्त परेश को औरत के मन की गहराइयों का अहसास करा गई.

Hindi Story : ठेले वाला

Hindi Story : रमेश अपने परिवार के साथ तीर्थयात्रा पर गए थे. यात्रा के दूसरे दिन उन्हें परेशान देख कर बेटे तन्मय ने हैरान हो कर पूछा, ‘‘पापा, आप इतना परेशान क्यों नजर आ रहे हैं? आप को पहली बार इतनी चिंता में देख कर मु झे घबराहट हो रही है.

‘‘चेहरे पर हमेशा मुसकान बिखेरने वाले मेरे पापा का यह तनाव भरा चेहरा कुछ अलग ही कहानी कह रहा है. कुछ तो बोलो पापा…’’

बेटे तन्मय के बारबार कहने पर रमेश बोले, ‘‘बेटा, जिंदगी में आज पहली बार मेरा पर्स गायब हुआ है. मु झे याद नहीं कि इस के पहले कभी इस 60 साल की जिंदगी में मेरा पर्स गायब हुआ हो. चिंता तो बनती है न…’’

रमेश के पर्स में तकरीबन 15,000 रुपए थे. यह जान कर परिवार के सभी सदस्य परेशान हो गए. पर्स कहां गायब हुआ होगा? जब इस पर बातचीत हुई, तो यह नतीजा निकला कि रास्ते में रमेश ने जहां अमरूद खरीदे थे, वहीं पर्स गायब हुआ होगा, पर अब तो 100 किलोमीटर आगे आ चुके थे.

बेटे तन्मय ने उस जगह पर जाने की जिद की, तो रमेश ने कहा, ‘‘बेटा, मेरे पर्स में रुपयों के अलावा आधारकार्ड, ड्राइविंग लाइसैंस और विजिटिंग कार्ड भी थे. अगर पाने वाले की नीयत अच्छी होती, तो विजिटिंग कार्ड से मोबाइल नंबर देख कर अब तक फोन आ गया होता.

‘‘फोन न आने का यह मतलब है कि पाने वाले की मंशा ठीक नहीं है, इसलिए वहां जाने से कोई फायदा नहीं होगा.’’

इस बारे में सब एकमत हो कर आगे की यात्रा के लिए निकल पड़े. सोमनाथ, पोरबंदर, द्वारका, बेट द्वारका, नागेश्वर जैसी जगहों पर घूम कर लौटते समय वे उसी रास्ते पर आगे बढ़े, जिस रास्ते से आए थे.

रास्ते में रमेश के मन में अनेक तरह के विचार आजा रहे थे. कभी उन के मन में आ रहा था कि इस जन्म में किसी का कुछ भी बिगाड़ा नहीं है, तो उन के पैसे रख कर कोई उन्हें कष्ट क्यों देगा? पर इस बात से वे शांत भी थे कि हो सकता है कि पिछले जन्म में किसी का कुछ कर्ज बाकी रहा हो और अब उस से मुक्ति मिली हो.

कभी वे यह सोचते कि अमरूद वाले की दिनभर की कमाई तकरीबन 1,000 रुपए होती होगी. पर्स मिलने के बाद हो सकता है कि उस ने अमरूद बेचने ही छोड़ दिए हों.

यह सब सोचने में रमेश इतने लीन थे कि उन्हें यह पता नहीं चला कि कब वे उस जगह पर पहुंच गए, जिस जगह उन्हें लग रहा था कि शायद पर्स खोया होगा.

तभी बेटा तन्मय चिल्लाया, ‘‘पापा देखो, वह अमरूद वाला कितनी शान से अमरूद बेच रहा है. पर्स चुराने की उस के चेहरे पर कोई शिकन तक दिखाई नहीं पड़ रही है.’’

कार से उतर कर रमेश जैसे ही अमरूद वाले के सामने पहुंचे, अमरूद वाला उन्हें एकटक देख रहा था.

रमेश ने उस अमरूद वाले से पूछा, ‘‘4 दिन पहले मैं ने आप से अमरूद खरीदे थे. आप के ध्यान में होगा ही…’’

अमरूद वाले ने जवाब दिया, ‘‘बिलकुल मेरे ध्यान में है.’’

‘‘तब तो यह भी ध्यान होगा कि मेरा पर्स आप के ठेले पर छूट गया था.’’

‘‘मेरे ठेले पर आप का पर्स… यहां तो कोई पर्स नहीं छूटा था. हां, जब आप अपनी कार में बैठ रहे थे, तब आप का पर्स नीचे गिरा था और मैं ने आवाज भी लगाई थी, पर आप लोग बिना सुने यहां से चले गए.

‘‘आप का पर्स मेरे पास रखा है. यह लीजिए आप अपना पर्स,’’ कहते हुए ठेले वाले ने रमेश को पर्स सौंप दिया.

खुशी के मारे रमेश यह नहीं सम झ पा रहे थे कि वे ठेले वाले का शुक्रिया कैसे अदा करें. उन्होंने ठेले वाले से पूछा, ‘‘भाई, इस पर्स में मेरा विजिटिंग कार्ड था, जिस में मेरा मोबाइल नंबर था. मु झे अगर फोन कर दिया होता, तो तुम्हारे बारे में मेरे मन में जो तरहतरह के बुरे विचार आ रहे थे, वे तो न आते.’’

रमेश की बात सुन कर वह ठेले वाला बोला, ‘‘साहब, पर्स मेरा नहीं था, तो किस हक से मैं इसे खोलता…’’

ठेले वाले की यह बात सुन कर रमेश और उस के परिवार के सभी सदस्य इतने हैरान हुए, जिस की कल्पना नहीं की जा सकती है. सभी को यही लग रहा था कि ईमानदारी अभी भी जिंदा है.

रमेश ने उस ठेले वाले को 500 रुपए देने चाहे, तो उस ने कहा, ‘‘मैं ने तो सिर्फ अपना फर्ज निभाया है.’’

जब उस ठेले वाले ने पैसे नहीं लिए, तो रमेश ने उस के ठेले पर रख दिए.

वह ठेले वाला बोला, ‘‘ठीक है साहब, ये पैसे मैं पास के सरकारी स्कूल में दे दूंगा और अगर आप एक महीने तक अपना पर्स लेने नहीं आते, तो यह पर्स भी मैं वहीं दे देता.’’

उस ठेले वाले की ईमानदारी से खुश हो कर रमेश ने वहां से कुछ ज्यादा ही अमरूद खरीदे और वहां से चल पड़े. रास्तेभर वे सोचते रहे, ‘काश, दुनिया के लोग इस ठेले वाले की तरह होते तो यह दुनिया कितनी अच्छी होती.’

लेखक – प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी ‘रत्नेश’

Hindi Story : बदला – मनीष क्यों ठगा-सा महसूस कर रहा था

Hindi Story : मनीष सुबह टहलने के लिए निकला था. उस के गांव के पिछवाड़े से रास्ता दूसरे गांव की ओर जाता था. उस रास्ते से अगले गांव की काफी दूरी थी. वह रास्ता गांव के विपरीत दिशा में था, इसलिए उधर सुनसान रहता था. मनीष को भीड़भाड़ से दूर वहां टहलना अच्छा लगता था. वह इस रास्ते पर दौड़ लगाता और कसरत करता था.

मनीष जैसे ही अपने घर से निकल कर गांव के आखिरी मोड़ पर पहुंचा, तो उस ने देखा कि सामने एक लड़की एक लड़के से गले लगी हुई. मनीष रुक गया था. दोनों को देख कर उस के जिस्म में सनसनाहट पैदा होने लगी थी. वह जैसे ही नजदीक पहुंचने वाला था, वह लड़की जल्दी से निकल कर पीछे की गली में गुम हो गई.

‘‘अरे, यह तो अंजलि थी,’’ वह मन ही मन बुदबुदाया. वही अंजलि, जिसे देख कर उस के मन में कभी तमन्ना मचलने लगती थी. उस के उभारों को देख कर मनीष का मन मचलने लगता था. आज उसे इस तरह देख कर वह अपनेआप को ठगा सा महसूस करने लगा था.

आज मनीष पूरे रास्ते इसी घटना के बारे में सोचता रहा. आज उस का टहलने में मन नहीं लग रहा था. वह कुछ दूर चल कर लौटने लगा था. वह जैसे ही घर पहुंचा कि गांव में शोर हुआ कि किसी की हत्या हुई है. लोग उधर ही जा रहे थे.

मनीष भी उसी रास्ते चल दिया था. वह हैरान हुआ, क्योंकि भीड़ तो वहीं जमा थी, जहां से अंजलि निकल कर भागी थी. एक पल को तो उसे लगा कि भीड़ को सब बता दे, पर वह चुप रहा.

सामने अंजलि अपने दरवाजे पर खड़ी मिल गई. शायद वह भी बाहर हो रही घटनाओं के संबंध में नजरें जमाई थी.

मनीष ने उसे धमकाते हुए कहा, ‘‘मैं ने सबकुछ देख लिया है. मैं चाहूं तो तुम सलाखों के पीछे चली जाओगी.’’

अंजलि ने हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘अपना मुंह बंद रखना. मैं तुम्हारी अहसानमंद रहूंगी.’’

‘‘ठीक है. आज शाम 7 बजे झाड़ी के पीछे वाली जगह पर मिलना. मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा.’’

‘‘अच्छा, लेकिन अभी जाओ और घटना पर नजर रखना.’’

मनीष वहां से चल दिया. घटनास्थल पर भीड़ इकट्ठा हो गई थी. कुछ देर बाद पुलिस भी आ गई थी. पुलिस ने हत्या के बारे में थोड़ीबहुत जानकारी ले कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया था. मनीष अपने घर लौट आया था.

मनीष अंदर से बहुत खुश था कि आज उस की मनोकामना पूरी होगी. फिर हत्या कैसे और क्यों की गई है,  इस का राज भी वह जान पाएगा. उस के मन में बेचैनी बढ़ती जा रही थी. आज काम में बिलकुल भी मन नहीं लग रहा था, इसलिए समय बिताने के लिए वह अपने कमरे में चला गया था.

मनीष तय समय पर घर से निकल गया था. जाड़े का मौसम होने के चलते अंधेरा पहले ही हो गया था.

मनीष तय जगह पर पहुंच चुका था, तभी उस की ओर एक परछाईं आती हुई नजर आई. मनीष थोड़ा सा डर गया था. परछाईं जैसेजैसे उस की ओर बढ़ रही थी, उस के मन से डर भी खत्म हो रहा था, क्योंकि वह कोई और नहीं बल्कि अंजलि थी.

अंजलि के आते ही मनीष ने उस के दोनों हाथों को अपने हाथों में थाम लिया था. कुछ पल के बाद उसे अपने आगोश में भरते हुए उस ने पूछा, ‘‘अंजलि, तुम ने जितेंद्र की हत्या क्यों की?’’

‘‘उस की हत्या मैं ने नहीं की है, उस ने मेरे साथ सिर्फ शारीरिक संबंध बनाए थे, जो तुम देख चुके हो.’’

‘‘हां, लेकिन हत्या किस ने की?’’

‘‘शायद मेरे जाने के बाद किसी ने हत्या कर दी हो. यही तो मुझे भी समझ में नहीं आ रहा है… और इसीलिए मैं डर रही थी और तुम्हारी बात मानने के लिए राजी हो गई,’’ अंजलि अपनी सफाई देते हुए बोली थी.

‘‘क्या उस की किसी से दुश्मनी रही होगी?’’ मनीष ने सवाल किया.

‘‘मुझे नहीं पता… अब तुम पता करो.’’

‘‘ठीक है, मैं पता करता हूं.’’

‘‘मुझे तो डर लग रहा है, कहीं मैं इस हत्या में फंस न जाऊं.’’

‘‘मेरी रानी, डरने की कोई बात नहीं है, मैं तुम्हारे साथ हूं. मैं तुम्हारी मदद करूंगा. बस, तुम मेरी जरूरतें पूरी करती रहो,’’ मनीष के हाथ उस की पीठ से फिसल कर उस के कोमल अंगों को छूने लगे थे.

थोड़ी सी नानुकुर के बाद जब मनीष का जोश ठंडा हुआ, तो उस ने अंजलि को अपनी पकड़ से आजाद कर दिया.

मनीष अगले सप्ताह रविवार को मिलने के लिए अंजलि से वादा किया था. अंजलि राजी हो गई थी. इधर अंजलि के मन का बोझ थोड़ा शांत हुआ कि वह मनीष को समझाने में कामयाब रही. मनीष को मुझ पर शक नहीं हुआ है. वह हत्यारे के बारे में पता करने में मदद करेगा.

अब अंजलि और मनीष के मिलने का सिलसिला जारी हो चुका था. मनीष एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाता था. अभी उस की शादी नहीं हुई थी. अंजलि महसूस कर रही थी कि मनीष दिल का बुरा नहीं है. उस की सिर्फ एक ही कमजोरी है. वह हुस्न का दीवाना है. कई बार अंजलि महसूस कर चुकी है कि आतेजाते मनीष उसे देखने की कोशिश करता था, लेकिन वह जानबूझकर शरीफ होने का नाटक करता था. इसीलिए औरों की तरह वह मेरा पीछा नहीं कर पाया था.

जितेंद्र की हत्या की जांच कई बार की गई, लेकिन यह पता नहीं चल पाया कि उस की हत्या किस ने की. पुलिस द्वारा जहरीली शराब पीने से मौत की पुष्टि कर तकरीबन उस की फाइल बंद कर दी गई थी. अब अंजलि भी समझ चुकी थी कि पुलिस की ओर से कोई डर नहीं है.

जितेंद्र की हत्या के बारे में गांव के लोगों की ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी. इस के पीछे वजह यह थी कि वह लोगों की नजरों में अच्छा इनसान नहीं था. वह शराब तो पीता ही था, औरतों व लड़कियों को भी छेड़ता रहता था. बहुत से लोग उस के मरने पर खुश भी थे.

अंजलि तकरीबन एक साल से मनीष से मिल रही थी. कई बार मनीष उसे उपहार भी देता था. अब तो अंजलि का भी मनीष के बगैर मन नहीं लगता था.

एक दिन मनीष अंजलि को अपने गोद में ले कर उस के बालों से खेल रहा था. उस ने अपनी इच्छा जाहिर की, ‘‘क्यों न हम दोनों शादी कर लें? कब तक यों ही हम छिपछिप कर मिलते रहेंगे?’’

इस पर अंजलि बोली, ‘‘मुझे कोई एतराज नहीं है, पर मुझे अपनी मां से पूछना होगा.’’

‘‘तुम अपनी मां को जल्दी से राजी करो.’’

‘‘मां तो राजी हो जाएंगी, लेकिन यह बात मैं राज नहीं रखना चाहती हूं.’’

‘‘कौन सी बात?’’

‘‘यही कि जितेंद्र की हत्या किस ने की थी.’’

‘‘किस ने की थी?’’

‘‘मैं ने…’’

‘‘कैसे और क्यों?’’

‘‘3 साल पहले की बात है. मेरी एक बहन रिया भी थी. घर में मां और मेरी बहन समेत हम सभी काफी खुश थे. पिताजी के नहीं होने के चलते मेरी छोटी बहन रिया मौल में काम कर के अच्छा पैसा कमा लेती थी. उसी के पैसों से हमारा घर चल रहा था.

‘‘जब भी मेरी बहन घर से निकलती थी, जितेंद्र अपनी मोटरसाइकिल से उस का पीछा करता था. मना करने के बाद भी वह नहीं मानता था.

‘‘मेरी बहन रिया उस से प्यार करने लगी थी. जितेंद्र ने मेरी बहन से कई बार शारीरिक संबंध बनाए. बहन को विश्वास था कि जितेंद्र उस से शादी जरूर करेगा.

‘‘लेकिन, जितेंद्र धोखेबाज निकला. मेरी बहन रिया को जितेंद्र के बारे में पता चला कि वह कई लड़कियों की जिंदगी बरबाद कर चुका है. मेरी बहन पेट से हो गई थी. 5 महीने तक मेरी बहन शादी के लिए इंतजार करती रही. जितेंद्र केवल झांसा देता रहा.

‘‘आखिरकार जितेंद्र ने शादी करने से इनकार कर दिया था. उस का मेरी बहन से झगड़ा भी हुआ था.

‘‘मेरी बहन परेशान रहने लगी थी. उस ने मुझे सबकुछ बता दिया था. मैं बहन को ले कर अस्पताल गई थी. वहां मैं ने उस का बच्चा गिरवाया, पर वह कोमा में चली गई थी. उस का बच्चा तो मरा ही, मेरी बहन भी दुनिया छोड़ कर चली गई. उसी दिन मैं ने कसम खाई थी कि जितेंद्र का अंत मैं ही करूंगी.

‘‘इस बार मैं ने गोरा को फंसाया था. मैं भी उस से प्यार का खेल खेलती रही. उस ने कई बार मुझे हवस का शिकार बनाना चाहा, लेकिन मैं उस से अपनेआप को बचाती रही.

‘‘उस दिन जितेंद्र ने मुझे अपने गुसलखाने में बुलाया था. मैं सोच कर गई थी कि आज रात काम तमाम कर के आना है. मैं ने उस की शराब में जहर मिला दिया.

‘‘मैं उस की मौत को नजदीक से महसूस करना चाहती थी, इसलिए उस की हत्या करने के बाद मैं भी उस के साथ रातभर रही. वह तड़पतड़प कर मेरे सामने ही मरा था.

‘‘सुबह मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं. जानबूझ कर उस के शरीर से मैं लिपटी हुई थी, ताकि कोई देखे तो गोरा को जिंदा समझे. पकड़े जाने पर पुलिस को गुमराह किया जा सके. हत्या के बारे में शक किसी और पर हो. यही हुआ भी. तुम ने मुझे बेकुसूर समझा.

‘‘मैं शादी करने से पहले सबकुछ तुम्हें बता देना चाहती हूं, ताकि भविष्य में पता चलने पर तुम मुझे गलत न समझ सको. मैं ने अपनी बहन रिया की मौत का बदला ले लिया, इसलिए मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं है.’’

मनीष यह सुन कर हक्काबक्का था. उस के मन में थोड़ा डर भी हुआ, लेकिन जल्द ही अपनेआप को संभालते हुए बोला, ‘‘तुम ने ठीक ही किया. तुम ने उस को उचित सजा दी है. तुम्हारे ऊपर किसी तरह का इलजाम लगता भी तो मैं अपने ऊपर ले लेता, क्योंकि मैं अब तुम से प्यार करने लगा हूं.’’

अंजलि ने मनीष को अपनी बांहों में ले कर चूम लिया था. वह अपनेआप पर गर्व कर रही थी कि उस ने गलत इनसान को नहीं चुना है. फिर वह सुखद भविष्य के सपने देखने लगी थी. उन दोनों ने जल्दी ही शादी कर ली. अंजलि अब मनीष को अपना राजदार समझती थी.

Hindi Story : गणपति का जन्म – विकृत बच्चे को देख क्या हुआ

Hindi Story : फूलचंद ने फटा हुआ कंबल खींचखींच कर एकदूसरे के साथ सट कर सो रहे तीनों बच्चों को ठीक से ओढ़ाया और खुद राख के ढेर में तब्दील हो चुके अलाव को कुरेद कर गरमी पाने की नाकाम कोशिश करने लगा.

जाड़े की रात थी. ऊपर से 3 तरफ से खुला हुआ बरामदा. सांयसांय करती हवा हड्डियों को काटती चली जाती थी. गनीमत यही थी कि सिर पर छत थी.

अंदर कमरे में फूलचंद की बीवी सुरना प्रसव वेदना से तड़प रही थी. रहरह कर उस की चीखें रात के सन्नाटे को चीरती चली जाती थीं. पड़ोसी रामचरन की घरवाली और सुखिया दाई उसे ढाढ़स बंधा रही थीं.

मगर फूलचंद का ध्यान न तो सुरना की पीड़ा की ओर था, न ही उस के मन में आने वाले मेहमान के प्रति कोई उल्लास था. सच तो यह था कि अनचाहे बोझ को ले कर वह चिंतित ही था.

परिवार की माली हालत पहले से ही खस्ता थी. जब तक मिल चलती रही तब तक तो गनीमत थी. मगर पिछले 8 महीने से मिल में तालाबंदी चल रही थी और अब वह मजदूरी कर के किसी तरह परिवार का पेट पाल रहा था.

लेकिन रोज काम मिलने की कोई गारंटी न थी. कई बार फाकों की नौबत आ चुकी थी. कर्ज था कि बढ़ता ही जा रहा था. ऐसे में वह चौथा बच्चा फूलचंद को किसी नई मुसीबत से कम नजर नहीं आ रहा था. लेकिन समय के चक्र के आगे बड़ेबड़ों की नहीं चलती, फिर फूलचंद की तो क्या बिसात थी.

तभी सुरना की हृदय विदारक चीख उभरी और धीरेधीरे एक पस्त कराह में ढलती चली गई. फूलचंद ने भीतर की आवाजों पर कान लगाए. अंदर कुछ हलचल तो हो रही थी. मगर नवजात शिशु का रुदन सुनाई नहीं पड़ रहा था. अब फूलचंद को खटका हुआ, ‘क्या बात हो सकती है?’ कहीं कुछ अनहोनी तो नहीं हो गई? मगर पूछूं भी तो किस से? अंदर जा नहीं सकता.

फूलचंद मन मार कर बैठा रहा. अब तो दोनों औरतों में से ही कोई बाहर आती, तभी कुछ पता चल पाता. हां, सुरना की कराहें उसे कहीं न कहीं आश्वस्त जरूर कर रही थीं.

प्रतीक्षा की वे घडि़यां जैसे युगों लंबी होती चली गईं. काफी देर बाद सुखिया दाई बाहर निकली. फूलचंद ने डरतेडरते पूछा, ‘‘सब ठीक तो है न?’’

‘‘हां, लड़का हुआ है,’’ सुखिया ने निराश स्वर में बताया, ‘‘मगर…’’

‘‘क्यों, क्या हुआ?’’ फूलचंद व्यग्र हो उठा.

‘‘अब मैं क्या कहूं. तुम खुद ही जा कर देख लो.’’

इस के बाद सुखिया तो चली गई, लेकिन फूलचंद की उलझन और बढ़ गई, ‘ऐसी क्या बात है, जो सुखिया से नहीं बताई गई? कहीं बच्चा मरा हुआ तो नहीं? मगर यह बात तो सुखिया बता सकती थी.’

कुछ देर बाद रामचरन की घरवाली भी यह कह कर चली गई, ‘‘कोई दिक्कत आए तो बुला लेना.’’

अब फूलचंद के अंदर जाने में कोई रुकावट नहीं थी. वह धड़कते दिल से अंदर घुसा. सुरना अधमरी सी चारपाई पर पड़ी थी. बगल में शिशु भी लेटा था.

सुरना ने आंखें खोल कर देखा. मगर फूलचंद की कुछ पूछने की हिम्मत न हुई. हां, उस की आंखों में कौंधती जिज्ञासा सुरना से छिपी न रह सकी. उस ने शिशु के मुंह पर से कपड़ा हटा दिया और खुद आंखें मूंद लीं.

आंखें तो फूलचंद की भी एकबारगी खुद ब खुद मुंद गईं. सामने दृश्य ही ऐसा था. नवजात शिशु का चेहरा सामान्य शिशुओं जैसा न था. माथा अत्यंत संकरा और लगभग तिकोना था. आंखें छोटीछोटी और कनपटियों तक फटी हुई थीं. कान भी असामान्य रूप से लंबे थे. सब से विचित्र बात यह थी कि शिशु का ऊपरी होंठ था ही नहीं. हां, नाक अत्यधिक लंबी हो कर ऊपरी तालू से जा लगी थी.

फूलचंद जड़ सा खड़ा था, ‘यह कैसी माया है? हुआ ही था तो अच्छाभला होता. नहीं तो जन्म लेने की क्या जरूरत थी. मुझ पर हालात की मार पहले ही क्या कम थी, जो यह नई मुसीबत मेरे सिर आ पड़ी. क्या होगा इस बच्चे का? अपना यह कुरूप ले कर इस दुनिया में यह कैसे जिएगा? क्या होगा इस का भविष्य?’

फूलचंद ने डरतेडरते पूछा, ‘‘इस की आवाज?’’

‘‘पता नहीं,’’ सुरना ने कमजोर आवाज में बताया, ‘‘रोया तक नहीं.’’

‘हैं,’ फूलचंद ने सोचा, ‘क्या यह गूंगा भी होगा?’

सुरना पहले ही काफी दुखी प्रतीत हो रही थी. इसलिए फूलचंद ने और कोई सवाल न किया. बस, अपनेआप को कोसता रहा और बाहर सोए तीनों बच्चों को ला ला कर अंदर लिटाता रहा. फिर खुद भी उन्हीं के साथ सिकुड़ कर लेटा रहा.

मगर उस की आंखों में नींद का नामोनिशान नहीं था. रहरह कर नवजात शिशु का चेहरा आंखों के आगे नाचने लगता था. तरहतरह की आशंकाएं मन में उठ रही थीं. फूलचंद ने सुना था कि उस तरह के बच्चे कुछ दिनों के ही मेहमान होते हैं. मगर वह बच्चा अगर जी गया तो…?

इसी तरह की उलझनों में पड़े हुए फूलचंद ने बाकी रात आंखों में ही काट दी.

सुबह होतेहोते रामचरन की घरवाली के माध्यम से यह बात महल्ले भर में जंगल की आग की तरह फैल गई कि फूलचंद के यहां विचित्र बालक का जन्म हुआ है.

बस, फिर क्या था. तमाशबीन औरतों के झुंड के झुंड आने शुरू हो गए. उन का तांता टूटने का नाम ही नहीं लेता था. वह एक ऐसी मुसीबत थी जिस की फूलचंद ने कल्पना तक नहीं की थी. मगर चुप्पी साधे रहने के सिवा कोई दूसरा चारा भी नहीं था.

तभी तमाशबीन औरतों के एक झुंड के साथ भगवानदीन की मां राधा आई. उस ने सारा वातावरण ही बदल कर रख दिया. राधा ने बच्चे को देखते ही हाथ जोड़ कर प्रणाम किया. फिर जमीन पर बैठ कर माथा झुकाया और साथ आई औरतों को फटकार लगाई, ‘‘अरी, ऐसे दीदे फाड़फाड़ कर क्या देख रही हो? प्रणाम करो. यह तो साक्षात गणेशजी ने कृपा की है सुरना पर. इस की तो कोख धन्य हो गई.’’

साथ आई औरतें अभी तक तो राधा के क्रियाकलाप अचरज से देख रही थीं. किंतु उस की बात सुनते ही जैसे उन की भी आंखें खुलीं. सब ने शिशु को प्रणाम किया. सुरना की कोख को सराहा और हाथ में जो भी सिक्का था, वही चारपाई के सामने अर्पित करने के बाद जमीन पर माथा टेक दिया.

अब राधा बाहर फूलचंद के पास दौड़ी आई. वह थकान और चिंता के कारण बाहर चबूतरे पर घुटनों में सिर डाले बैठा था. राधा ने उसे झिंझोड़ कर उठाया, ‘‘अरे, क्या रोनी सूरत बनाए बैठा है यहां. तुझे तो खुश होना चाहिए, भैया. सुरना की कोख पर साक्षात ‘गणेशजी’ ने कृपा की है. तेरे तो दिन फिर गए. और देख, वह तो माया दिखाने आए हैं अपनी. वह रुकेंगे थोड़ा ही. जब तक हैं, खुशीखुशी उन की सेवा कर. हजारों वर्षों में किसीकिसी को ही ऐसा अवसर मिलता है.’’

फूलचंद चमत्कृत हो उठा, ‘‘यह बात तो मेरे दिमाग में आई ही नहीं थी, काकी.’’

‘‘अरे, तुम लोग ठहरे उम्र व अक्ल के कच्चे,’’ राधा ने बड़प्पन झाड़ा, ‘‘तुम्हें ये सब बातें कहां से सूझें. और हां, लोग दर्शन को आएंगे तो किसी को मना न करना, बेटा. उन पर कोई अकेले तेरा ही हक थोड़ा है. वह तो साक्षात ‘परमात्मा’ हैं, वह सब के हैं, समझा?’’

फूलचंद ने नादान बालक की तरह हामी भरी और लपक कर अंदर पहुंचा. दरअसल, अब वह शिशु को एक नई नजर से देखना चाहता था. मगर चारपाई के पास पड़े पैसों को देख कर वह एक बार फिर चक्कर खा गया. सुरना से पूछा, ‘‘यह क्या है?’’

‘‘वही लोग चढ़ा गए हैं,’’ सुरना ने बताया, ‘‘काकी कहती थीं, गणेशजी…’’

‘‘और नहीं तो क्या,’’ फूलचंद में जैसे नई जान पड़ने लगी थी, ‘‘न तो तेरी मति में यह बात आई, न ही मेरी. मगर हैं ये साक्षात गणेशजी ही.’’

‘‘हम लोग उन की माया क्या जान सकें. अपनी माया वही जानें.’’

फूलचंद को एकाएक शिशु की चिंता सताने लगी, ‘‘यह तो हिलताडुलता भी नहीं. देख सांस तो चलती है न?’’

सुरना ने कपड़ा हटा कर देखा. सांसें चल रही थीं.

फूलचंद को अब दूसरी चिंता हुई, ‘‘भला एकआध बार दूधवूध चटाया या नहीं?’’

सुरना ने तनिक दुखी स्वर में कहा, ‘‘दूध तो मुंह में दाब ही नहीं पाता.’’

‘‘ओह,’’ फूलचंद झल्लाया, ‘‘क्या इसे भूखा मारोगी? देखो, मैं रुई का फाहा बना कर देता हूं. तुम उसी से दूध इस के मुंह में टपका देना. गला सूखता होगा.’’

शिशु का गला सींचने का यह उपक्रम चल ही रहा था कि कुछ और लोग कथित गणेशजी के दर्शनार्थ आ पहुंचे. इस बार औरतों के अलावा मर्द भी आए थे. दूसरी खास बात यह थी कि कुछ लोगों के हाथों में फूल और फल भी थे. फूलचंद ने लपक कर प्रसन्न मन से सब का स्वागत किया, ‘‘आइए आइए, आप लोग भी दर्शन कीजिए.’’

दोपहर ढलतेढलते कथित गणेशजी के जन्म की खबर पासपड़ोस के महल्लों तक फैल गई. श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी. मिठाई, फल, मेवा, फूल आदि जो बन पाता, लिए चले आ रहे थे. उस के अलावा नकदी का चढ़ावा भी कम न था.

शाम को किसी पड़ोसी ने सलाह दी, ‘‘कुछ परचे छपवा कर बांट दिए जाएं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को खबर हो जाए और वे दर्शन का लाभ प्राप्त कर सकें.’’

फूलचंद को वह सलाह जंची. पता नहीं, कब उस की भी यह दिली इच्छा हो आई थी कि जितने ज्यादा लोग दर्शन का लाभ उठा लें, उतना ही अच्छा.

आननफानन मजमून बनाया गया और एक पड़ोसी ने खुद आगे बढ़ कर परचे छपवा कर अगले ही दिन मुहैया कराने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली.

रात करीब 10 बजे दर्शनार्थियों का तांता टूटा. तब फूलचंद ने दर्शन बंद होने की घोषणा की. उस रात फूलचंद के परिवार ने बहुत दिनों बाद तृप्ति भर सुस्वाद भोजन का आनंद उठाया था. दूसरे दिन परचे बंटे और एक स्थानीय अखबार के प्रतिनिधि आ कर बच्चे की तसवीर खींच ले गए. अखबार में बच्चे की तसवीर और विचित्र बालक के जन्म की खबर छपते ही, शहर में जैसे आग सी लग गई. दूरदराज के महल्लों से भी लोग दर्शन के लिए टूट पड़े.

फूलचंद के घर के सामने मेला सा लग गया. पता नहीं, कहां से फूल आदि ले कर एक माली बैठ गया. उस के अलावा महल्ले के हलवाई को दम मारने की फुरसत न थी. उस भीड़ को व्यवस्थित ढंग से दर्शन कराने के लिए फूलचंद को अपने कमरे का दूसरा दरवाजा (जो अभी तक बंद रखा जा रहा था) खोलना पड़ा. अब लोग कतार बांधे एक दरवाजे से अंदर आते थे और दर्शन कर के दूसरे दरवाजे से बाहर निकल जाते थे.

फूलचंद और उस के बच्चे सुबहसुबह ही नहाधो कर साफसुथरे कपड़े पहन लेते और दर्शन की व्यवस्था में जुट जाते. घर में अब न तो पहले जैसा तनाव था, न ही कुढ़न. सभी जैसे उल्लास की लहरों में तैरते रहते थे.

फूलचंद थोड़ीथोड़ी देर बाद सुरना के पास आ कर उस के कान में शिशु को रुई के फाहे से दूध चटाते रहने की हिदायत देता रहता था. इस बहाने वह अपनेआप को आश्वस्त भी कर लेता था कि शिशु अभी जीवित है.

रात को भी वह कई बार शिशु को देखता और उस की सांसें चलती देख कर चैन से सो जाता. सब कुछ सामान्य ढंग से चल रहा था. कहीं कोई समस्या न थी. हां, एक समस्या यह जरूर पैदा हो गई थी कि चढ़ावे में चढ़ी मिठाई का क्या किया जाए. उसे उपभोग के लिए ज्यादा दिन बचाए रखना संभव न था. यों फूलचंद ने महल्ले में अत्यंत उदारतापूर्वक प्रसाद बांटा था. फिर भी मिठाई चुकने में न आती थी.

लेकिन उस समस्या का हल भी निकल आया. रात में मिठाई फूलचंद के यहां से उठा कर हलवाई के हाथों बेच दी जाती, फिर सुबह श्रद्धालुओं के हाथों में होती हुई दोबारा फूलचंद के यहां चढ़ा दी जाती.

छठे दिन भोर में ही सुरना ने फूलचंद को जगाया और घबराई हुई आवाज में कहा, ‘‘देखो, इस को क्या हो गया?’’

फूलचंद ने हड़बड़ा कर शिशु को उघाड़ दिया. झुक कर गौर से देखा. उस की सांसें बंद हो चुकी थीं. हताश हो कर सुरना की ओर देखा, ‘‘खेल खत्म हो गया.’’ सुरना की रुलाई खुद व खुद फूट पड़ी. मगर फूलचंद ने उसे रोका, ‘‘नहीं, रोनाधोना बंद करो. इस को ऐसे ही लेटा रहने दो. देखो, किसी से जिक्र न करना. थोड़ी देर में लोग दर्शन के लिए आने लगेंगे.’’

सुरना ने रोतेरोते ही कहा, ‘‘मगर यह तो…’’

‘‘तो क्या हुआ?’’ फूलचंद ने कहा, ‘‘यह तो वैसे भी न तो रोता था, न ही हिलताडुलता था. लोगों को क्या पता चलेगा? हां, शाम को कह देंगे कि भगवान ने माया समेट ली.’’ और फिर जैसे सुरना को समझाने के बहाने फूलचंद अपनेआप को भी समझाने लगा, ‘कोई हम ने तो भगवान से यह स्वरूप मांगा न था. यह तो उन्हीं की कृपा थी. शायद हमारी गरीबी ही दूर करने आए थे. आज दिन भर लोग और दर्शन कर लेंगे तो कुछ बुरा तो नहीं हो जाएगा.’

सुरना घुटनों पर माथा टेके सिसकती रही. फूलचंद ने फिर समझाया, ‘‘देखो, अब ज्यादा दुख न करो. ज्यादा दिन तो इसे वैसे भी नहीं जीना था. और जी जाता तो क्या होता इस का. उठो, तैयार हो कर रोज की तरह बैठ जाओ. लोग आने ही वाले हैं.’’ सुरना बिना कुछ बोले तैयार होने के लिए उठ गई. थोड़ी देर बाद ही वहां दर्शनार्थियों का तांता लगना शुरू हो गया और भेंट व प्रसाद के रूप में फूलों, मिठाइयों एवं सिक्कों के ढेर लगने लगे.

Hindi Story : रिजैक्शन

Hindi Story : कितना खुश और जोश में था वीर अपनी सगाई में. उम्र के इस दौर में, जब जोबन उछाह भर रहा हो, यह होना भी था. कभी उस ने लड़कियों के लिए खास उत्सुकता नहीं दिखाई थी.

दरअसल, उसे जैसे इस के लिए समय ही नहीं मिला था या समय ने उसे इस लायक रख छोड़ा था कि उस की इस में कोई दिलचस्पी ही नहीं रही थी.

मां की मौत तो बचपन में ही हो गई थी. तब वीर चौथी क्लास में था. पापा ने दूसरी शादी की और उसे होस्टल में भेज दिया गया. शायद पापा के मन में यह भाव या डर रहा हो कि उन की दूसरी पत्नी पता नहीं अपने इस सौतेले बेटे के साथ कैसा बरताव करेगी. इस तरह वह अचानक ही प्यार जैसे भावों से दूर अपनी एकाकी जिंदगी काटते रह गया था.

ऐसी बात नहीं थी कि वीर बिलकुल ही अकेला था. एक तो वह शुरू से ही शांत स्वभाव का रहा था, मां की मौत के बाद वह और भी चुप रहने लगा था. रहीसही कसर उस के होस्टल के सख्त अनुशासन और कायदेकानूनों ने पूरी कर दी थी.

होस्टल में लड़कों के कई ग्रुप थे. उन से भी वीर का कोई खास लगाव नहीं था. वह बस पढ़ाई और खेल तक ही सिमटा रहा. वैसे भी पढ़ाई में वह बहुत तेज था और सभी उसे किताबी कीड़ा ही मान कर चलते रहे.

दरअसल, जब भी वीर छुट्टियों में घर आता, तो यहां भी उसे कुछ खास लगाव हो नहीं पाया. आगे चल कर उस की दूसरी मां से भाईबहन हुए, तब तो ये दूरियां कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थीं. यह अलग बात है कि अब वे उस के प्रति अपनेपन का भाव रखने लगे थे. सौतेली मां खासतौर पर उस के खानपान का खास खयाल रखती थीं, ताकि गांव में कोई कुछ आरोप न लगा दे.

यह इत्तिफाक की बात थी कि 12वीं जमात पास करने के बाद वीर इंजीनियरिंग डिप्लोमा में चुन लिया गया था. यहां भी उस ने इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की बढि़या से पढ़ाई की और एक सरकारी नौकरी में लग गया. उस के पापा ही नहीं, बल्कि पूरा परिवार उस से खुश था.

लेकिन वीर में एक यही कमी रह गई थी कि वह अपने डिप्रैशन से बाहर निकल नहीं पाया था. वह हमेशा खोयाखोया सा रहता था या खुद को उदास पाता. पापा ने इस के लिए उसे डाक्टर को दिखाया भी था.

डाक्टर ने कहा था कि चिंता की कोई बात नहीं है. यह समय के साथ ठीक हो जाएगा. शादी के बाद तो वीर बिलकुल ठीक हो जाएगा, इसलिए पापा ने उस की शादी की बात चलानी शुरू कर दी थी. कई जगह देखने के बाद बक्सर में एक जगह उस का रिश्ता तय हो गया था.

जैसा कि आमतौर पर नया चलन है, वीर की सगाई भी धूमधाम से कर दी गई. एक रिसौर्ट में दोनों परिवार अपने रिश्तेदारों के साथ जमा हुए और धूमधाम से सगाई की रस्म पूरी की गई थी. बिलकुल शादी जैसी धूमधाम. पहली बार वह किसी लड़की के करीब और साथसाथ बैठा था, उस से खुल कर बातें की थीं.

आज के इस जमाने में शादी का मतलब जब छोटेछोटे लड़के जानते हैं, तो वीर की तो बात ही अलग थी. फिर रूपा का तो कहना ही क्या. पहले उस ने उस के कंधे से सिर टिकाया, हाथों में हाथ लिया और बातें करने लगी. उसे भी यह सबकुछ अच्छा लग रहा था.

रूपा के सुखदुख की कहानियों में वीर दिलचस्पी लेते हुए पहली बार उसे महसूस हुआ कि सिर्फ वही दुखी नहीं है, बल्कि दूसरे लोग भी दुखी हैं और उन्हें भी किसी सहारे की जरूरत होती है. जब वह रूपा जैसी कोई लड़की हो, तो उसे सहारा देना उस का फर्ज बनता है. उस की तर्जनी में पड़ी सगाई की वह सोने की भारी अंगूठी जैसे उसे इस का अहसास भी दिलाती थी.

अकसर रूपा ही उसे फोन करती थी खासकर रात में तो यह उस का नियमित शगल था और फिर वे दोनों दुनियाजहान की बात करते थे. अपने मन को वीर ने पहली बार किसी अनजान के सामने खोला था.

रूपा को ले कर वीर के मन में अनेक भाव उपजते और एक अनकहे जोश और उछाह से वह भर उठता था. जिंदगी के रंगीन सपने उस के सामने पूरे से होने लगते थे.

आरा से बक्सर की दूरी कुछ खास नहीं है और जैसे ही वीर का डुमरांव ब्लौक में ट्रांसफर हुआ, तो यह दूरी और घट गई थी. अपने घर तो वह कभी रहा ही नहीं. जहां उस की नौकरी होती, वहीं उसे क्वार्टर भी मिल जाता था. यहां डुमरांव में रहते हुए वह एकाध बार बक्सर गया, तो उस ने रूपा को वहीं बुला कर बातें भी कर आता था.

दरअसल, यह रूपा की ही जिद थी कि वीर उस से मिले, तो उसे भी इस मेलजोल में कुछ गलत नहीं लगा था और इस के बाद तो जब भी उसे समय मिलता, अपनी मोटरसाइकिल उठा कर बक्सर चला आता था.

यहां वे किसी रैस्टोरैंट या पार्क में घंटों बैठ कर बातें करते, खातेपीते और घूमते थे और यह बात दोनों के ही परिवार में पता चल गई थी.

छोटे शहरों में ऐसी बातें छिपती भी कहां हैं. वीर के पापा और दूसरी मां ने उसे आगाह भी किया था कि शादी से पहले इस तरह मिलनाजुलना ठीक नहीं है, जिसे उस ने हंसी में उड़ा दिया था.

वीर ने इस बात की चर्चा रूपा से करते हुए पूछा था, ‘‘क्या तुम्हारे पापा भी हमारे मिलनेजुलने को गलत मानते हैं?’’

रूपा हंस कर बोली थी, ‘‘गलत, अरे वे तो इसे बहुत अच्छा मानते हैं कि इसी बहाने हम एकदूसरे को जानसम झ रहे हैं. जब भविष्य में शादी होनी ही है, तो अभी मिलनेजुलने पर रोकटोक क्यों करें.

‘‘हां, मां जरूर इसे ठीक नहीं मानती हैं, मगर पापा का कहना है कि वे दोनों एक हद में रहें, तो मिलनेजुलने में क्या बुराई है.’’

इस बीच वीर ने रूपा को कितने ही सस्तेमहंगे उपहार खरीद कर दे डाले थे. होटलरैस्टोरैंट में हजारों रुपए का बिल वह हंसतेहंसते भर जाता था कि अपनी मंगेतर के लिए इतना भी न कर सका, तो उस का नौकरी करना बेकार है.

मगर इस बीच वीर के साथ एक घटना हो गई. वीर के औफिस में कोई बड़े लैवल का खरीद घोटाला हुआ था, जिस में उस का नाम भी घसीट लिया गया था.

डिपार्टमैंटल इंक्वायरी में पटना के बड़े अफसर आए और उस से कड़ी पूछताछ की. चूंकि उस के कई जगह पर दस्तखत थे, सुबूत उसे ही कुसूरवार ठहराते थे.

साथी मुलाजिमों ने बड़े अफसरों से अलग चुगली कर रखी थी कि अपनी मंगेतर के यहां कोई अकसर जाएगा और पार्टियां करतेफिरते, महंगेमहंगे गिफ्ट भेंट में देगा, तो क्या यह तनख्वाह से मुमकिन है? उस के लिए तो कोई भी गलत रास्ता ही अख्तियार करेगा न. तनख्वाह के पैसे पर कौन फालतू के खर्च करता है?

एक साथी मुलाजिम ने तो हद कर दी, जब उस ने वीर को ‘मैंटल’ बता दिया. और इसी के साथ वह सस्पैंड कर दिया गया था.

ज्यों ही यह खबर फैली तो वाकई वीर की दिमागी हालत गड़बड़ा गई थी. उस के पापा आए और फिर उन्होंने ही उसे संभाला था. उसे साथ घर ला कर अपनी देखरेख में रखा. उस के भाईबहन भी उस का खयाल रखते और उसे खुश रखने की पूरी कोशिश करते और हंसाते थे.

पापा ने वीर को पटना में एक साइकियाट्रिस्ट को भी दिखाया और कुछ इलाज कराया. फिर वे उस के सस्पैंशन के मामले में पड़े कि क्या हो सकता है. इस के लिए वे वकीलों और बड़े अफसरों से भी मिले.

अगले 3 महीने वीर के लिए भारी पड़े थे. आखिरकार घोटाले का भेद खुला, तो उस में 2 मुलाजिमों की भागीदारी देखने को मिली.

दरअसल, वे दोनों जैसे ही जानते कि वीर बक्सर जाने की हड़बड़ी में है. उस से जाते समय कुछ दस्तावेजों पर दस्तखत ले लेते थे. अपने जाने की हड़बड़ी में वह ज्यादा ध्यान नहीं दे पाता था. इस तरह उन लोगों ने लाखों रुपए की हेराफेरी कर ली थी.

मगर यह भी सच है कि विभागीय खर्चे किसी एक के दस्तखत करने से नहीं होते. उस में 3 और मुलाजिम फंसे थे और उन लोगों ने भागदौड़ कर सही बात पता कर ली थी. उन लोगों की वजह से असली कुसूरवार पकड़े गए.

मगर वीर की जिंदगी में जैसे एक और तूफान इंतजार कर रहा था. रूपा के घर में उस के सस्पैंशन वाली बात का पता चल चुका था. उस से भी बड़ी बात यह कि उस के पापा ने इस रिश्ते के लिए इनकार कर दिया था, क्योंकि उन्हें एक बड़ा घराना मिल चुका था.

वीर ने रूपा को कई बार फोन किया. वह बक्सर आया और एक रैस्टोरैंट में रूपा को मिलने भी बुलाया. वह चुपचाप आई और एक कोने में बैठ गई.

‘‘कैसे हो तुम?’’ वीर ने पूछा.

रूपा ने ही चुप्पी तोड़ी, ‘‘बहुत बुरा हुआ तुम्हारे साथ.’’

‘‘वह तो जो हुआ, सो हुआ,’’ वीर ने अपनी उंगली में पहनी सगाई की अंगूठी को घुमाते और देखते हुए नाराजगी दिखाई, ‘‘मगर, तुम ने भी नाता तोड़ लिया.’’

‘‘ऐसा न कहो. दरअसल, मेरे पापा को कुछ लोगों ने बहका दिया था कि लड़के में कुछ दिमागी परेशानी है, इसलिए वहां रिश्ता करना सही नहीं है. मगर, मैं तो एकदम से अड़ गई कि मु झे तुम्हारे साथ ही शादी करनी है.’’

थोड़ी देर तक मानमनुहार की बात चलती रही. चाय और नाश्ते का दौर चला. इस बीच रूपा अचानक बोली, ‘‘अरे हां, मैं तुम्हें एक बात बताना भूल गई. हम ने तुम्हें जो सगाई की अंगूठी पहनाई थी, उस के बारे में शक है कि उस में ज्यादा मिलावट तो नहीं है, इसलिए मां ने कहा है कि तुम से वह अंगूठी एक दिन के लिए ले लूं. उस की किसी दूसरे सुनार से जांच करवाने पर तसल्ली मिल जाएगी, इसलिए तुम वह अंगूठी मुझे दे दो.’’

‘‘यह क्या बात हुई. अब जैसी भी है, यह सगाई की अंगूठी है और मैं इसे अपनी उंगली से नहीं निकाल सकता. एक यही तो अंगूठी है, जिस की वजह से मु झे अपने तनाव को कम करने में मदद मिली थी. जब भी इसे देखता, तो तुम्हारी याद आती और मेरी हिम्मत बढ़ जाती थी.’’

‘‘सचमुच इस अंगूठी से मु झे भी बहुत ताकत मिलती है. मगर, एकाध दिन की ही तो बात है…’’ रूपा अपनी उंगली में फंसी सगाई की अंगूठी से खेलते हुए बोली, ‘‘यह हमारे पहले प्यार की निशानी है, तो ही ऐसा लगेगा.

मगर हमें थोड़ा प्रैक्टिकल हो कर भी सोचना चाहिए.

‘‘कोई हमें जानबू झ कर ठगे, यह भी तो कोई अच्छी बात नहीं है न, इसलिए अभी इसे दे दो. अगली बार आना, तो इसे ले लेना. आखिर मैं इसे ले कर क्या करूंगी?’’

वीर ने सगाई वाली अंगूठी रूपा को दे दी.

अगली बार जब वीर आया, तो तय जगह पर आने के लिए उस ने रूपा को फोन किया था. वह तो नहीं आई, मगर उस के पापा वहां आ गए. वह उन के सम्मान में उठ खड़ा हुआ.

‘‘ऐसा है बाबू कि रूपा की तबीयत थोड़ी खराब है, इसलिए वह नहीं आई…’’ थोड़ी देर ठहर कर वे उसे गौर से देखते हुए बोले, ‘‘और हां, अब हमें तुम्हारे साथ रूपा की शादी करने में कुछ दिक्कत महसूस हो रही है. यह लो सगाई की वह अंगूठी, जो तुम ने रूपा को पहनाई थी.’’

यह सुनते ही वीर को धरती घूमती नजर आई. वह बोला, ‘‘यह आप क्या कह रहे हैं. 4 महीने पहले हमारी सगाई हुई थी. 2 महीने बाद शादी होना तय था. और आप कुछ दूसरी ही बात कर रहे हैं,’’ वह अपनी उखड़ती हुई सांसों को काबू में करते हुए बोला, ‘‘इतने दिनों में हम एकदूसरे को बहुत जाननेसम झने और प्यार करने लगे हैं. और आप कहते हैं कि यह रिश्ता टूटेगा. ऐसा कैसे हो सकता है. रूपा इसे बरदाश्त नहीं कर पाएगी.’’

‘‘वह ऐसा है बाबू कि हमें काफीकुछ प्रैक्टिकल हो कर सोचना पड़ता है. तुम्हारे पापा औसत दर्जे के किसान ठहरे. घर में सौतेली मां और भाईबहन हैं. तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं रहती.

‘‘ऐसे में तुम्हारे छोटे से घर में रूपा का निबाह नहीं होगा. यह सब जानते हुए हम रूपा की शादी तुम्हारे साथ नहीं कर सकते. उसे भी यह रिश्ता मंजूर नहीं है.’’

रूपा के पापा अपनी रौ में बोले जा रहे थे. बिना यह जानेसम झे कि वीर के दिल पर क्या बीत रही होगी, ‘‘और रही बात रूपा की, तो उसे एक और अच्छा लड़का मिल गया है. बैंगलुरु में सौफ्टवेयर इंजीनियर है. तो रूपा को भी सब से अलग बैंगलुरु में अकेले रहने का चाव पूरा होगा.

‘‘लड़के के पिता की 30 बीघा की खेती है. उस के पिता अमीर किसान हैं और वह एकलौता लड़का है. एक बड़ी बहन है, जिस की शादी हो चुकी है. ऐसे में उसे और क्या चाहिए? इसलिए उस की तो बात ही मत करो.’’

‘‘यह आप से किस ने कह दिया कि मेरी तबीयत ठीक नहीं रहती. ठीक है कि असमय मां के गुजर जाने के बाद मैं डिप्रैशन में आ गया था. पापा ने मु झे होस्टल में डाल दिया था. लेकिन होस्टल में रह कर पढ़ाई करना कोई गुनाह तो नहीं…’’ वीर अपनेआप को काबू में करता हुआ सा बोला, ‘‘और रही बात मेरी सौतेली मां और भाईबहनों की, तो यह आप की गलतफहमी है. वे मु झे सगी मां जैसा प्यार करती हैं. उन्होंने कभी भेदभाव नहीं किया.

‘‘और आप को भी थोड़ा सोचसम झ कर किसी के बारे में बोलना चाहिए. आखिर में वे सौतेली ही सही, पर मेरी मां हैं. उन्होंने मुझ में और अपने बेटों में कभी कोई फर्क नहीं किया.’’

‘‘वह सब तो ठीक है बाबू. मगर हम जानबू झ कर मक्खी नहीं निगल सकते न. मैं ने अपने शहर में ऐसे अनेक केस देखे हैं, जिस से घरपरिवार बिखर गया है, इसलिए तुम अपने पापा को बता देना.’’

‘‘मैं बताऊंगा कि आप बताएंगे…’’ वीर गुस्से में आ गया था, ‘‘आप को किसी की भावनाओं से खेलने का कोई हक नहीं है. मेरे परिवार को जब यह पता चलेगा, तो उस पर क्या बीतेगी?’’

‘‘अब तुम से बात क्या करना…’’ रूपा के पापा जाते हुए बोले, ‘‘ठीक है, मैं ही तुम्हारे पापा को बता दूंगा.’’

वीर पर जैसे बिजली सी गिरी थी. क्या ऐसे भी रिश्ता तोड़ा जाता है? मगर सबकुछ अपनी आंखों से देखने और कानों से सुनने के बाद अब बाकी क्या रहा था.

वीर के पापा ने सारी जानकारी लेने के बाद थोड़ी भागदौड़ की, उस के ठीक होने के कागजात तक उन्हें दिखाए, मगर रूपा का परिवार टस से मस नहीं हुआ. तब उन्होंने कहा कि जब उन की बेटी के लिए दूसरे लड़के मिल सकते हैं, तो उन्हें भी अपने बेटे के लिए दूसरी लड़कियां मिल जाएंगी.

मगर वीर के दिल में तो रूपा घर कर गई थी. उस ने उस से मिलने की कोशिश की, मगर वह नाकाम रहा था. यह तो तय था कि रूपा की भी इस सगाई को तोड़ने में रजामंदी थी, तभी तो उस ने बहाने से वीर की सगाई की अंगूठी वापस ले ली थी. फिर भी उस का दिल इस सच को मानने को तैयार नहीं होता था.

जब वीर पहली बार रूपा से एकांत में मिला था, तब वह उसे निहारती रह गई थी.

‘‘तुम्हारे इस सांवलेसलोने रूप पर तो लड़कियां मरमिट जाएंगी. मैं कितनी खुशकिस्मत हूं कि तुम मु झे मिले हो,’’ रूपा वीर के सीने पर अपना सिर रख कर उस की बांहों की मछलियों से खेलती हुई कह रही थी, ‘‘तुम्हारे जैसा बांका जवान तो मु झे पूरी दुनिया में नहीं मिलने वाला. अच्छीभली सरकारी नौकरी है तुम्हारी. छुट्टियों में हम आराम से एकाध साल में एकाध महीने के लिए बाहर घूमने जा सकते हैं.’’

रूपा का दूधिया रंग और मासूम चेहरा वीर के आगे घूम जाता था. लेकिन आज उसी रूपा ने वीर को अपने मन से दूध में गिरी मक्खी के समान निकाल फेंका था. मन के किसी कोने में यह बात भी उठती कि आज जब उस का रिजैक्शन हुआ, तब उसे अहसास हो रहा है कि इस रिजैक्शन से लड़कियों के दिल पर भी क्या गुजरती होगी.

वीर को अब भी यकीन नहीं होता था कि उस की सगाई टूट गई है. उस के साथी सामने तो कुछ कहते नहीं थे, पर पीठ पीछे हंसते थे. सचमुच अविश्वास की एक फांस तो लग ही गई थी कि कहीं कुछ तो गलत है ही उस में, जिस से उस की सगाई टूट गई है.

समय का चक्र नहीं रुकता और वीर के पापा भागदौड़ में लगे थे. सौतेली मां ने अपने भाइयों से कह कर उस के लिए अनेक जगह से रिश्ते की बात चला रखी थी. कुछ रिश्तों के प्रस्ताव उस के पास आ चुके थे और चुनाव अब उसे करना था, मगर रहरह कर उसे रूपा की याद आती, तो वह बेचैन हो जाता था.

फिर भी समय ने तो वीर को यह सिखा ही दिया था कि अब पिछला सब भूल कर आगे की ओर बढ़ जाना है. यही सब के फायदे में है.

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