परनारी के प्यार में गणेश ने किया कत्ल

दोपहर का वक्त था. वंदना नहा कर बाथरूम से निकली तभी ‘भाभीभाभी’ कहता हुआ गणेश उस के घर आ पहुंचा. उस समय वंदना के शरीर पर मात्र पेटीकोटब्लाउज था. उस के जुल्फों से पानी की बूंदें टपक रही थीं. गणेश की निगाहें वंदना के मखमली बदन पर जैसे पानी की बूंदों की तरह चिपक कर रह गई थीं. गणेश की इस हरकत को वंदना समझ रही थी. वह न तो शरमाई और न ही वहां से भाग कर दूसरे कमरे में गई. बल्कि वह नजाकत से चलते हुए उस के और करीब आ गई. गणेश रिश्ते से उस का देवर लगता था. उन के बीच अकसर मजाक भी होता रहता था. वंदना उस के एकदम करीब आ कर बोली, ‘‘गणेश, खड़े क्यों हो, बैठ जाओ न.’’

वंदना के कहने के बावजूद गणेश चारपाई पर नहीं बैठा, बल्कि खड़ेखड़े उसे अपलक निहारता रहा. उस के मन में कोई तूफान मचल रहा था. वंदना मादक मुसकान बिखेरती हुई मुड़ी और अंदर वाले कमरे में चली गई. गणेश तब भी अपनी जगह जमा रहा. वंदना कुछ देर बाद बाहर आई तो गणेश की आंखें फिर उस के चेहरे पर टिक गईं. आखिर वंदना से रहा नहीं गया तो उस ने पूछ ही लिया, ‘‘क्या बात है गणेश, तुम आज मुझे इस तरह से क्यों देख रहे हो?’’

‘‘बता दूं?’’ गणेश ने वंदना की आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘भाभी, तुम मुझे बहुत खूबसूरत लगती हो. तुम्हारी अदाएं मेरे अंदर बेचैनी पैदा कर रही हैं.’’

गणेश की बात सुन कर वंदना के मन में भी हलचल सी मच गई. वह आगे बढ़ी और गणेश का हाथ थाम कर बोली, ‘‘सच कहूं गणेश, तुम भी मुझे बहुत अच्छे लगते हो. मैं तो तुम्हारे लिए ही सजतीसंवरती हूं. राजू को तो मेरी कद्र ही नहीं है.’’

वंदना के इतना कहते ही गणेश का खुद पर काबू नहीं रहा. उस ने वंदना को अपनी आगोश में भींच लिया. जब 2 जवान बदन मिले तो आग लगनी लाजिमी थी. दोनों हाथ एकदूसरे के बदन पर रेंगने लगे और उन्होंने अपनी हसरतें पूरी कर लीं. वंदना से अवैध संबंध कायम होने के बाद तो गणेश ने उस के पति राजू से दोस्ती और बढ़ा ली ताकि दोस्ती की आड़ में उस का खेल चलता रहे. रविवार को राजू की छुट्टी रहती थी. गणेश सुबह ही राजू के घर पहुंच जाता. वह खुद अपने साथ मीट और शराब की बोतल ले जाता. फिर दोपहर को दारू का दौर शुरू हो जाता. राजू को फ्री में पार्टी मिल जाती. वह गणेश के मकसद को काफी दिनों तक नहीं समझ पाया. गणेश और वंदना राजू की इस बेवकूफी पर खुश होते थे.

13 दिसंबर, 2016 की सुबह उत्तर प्रदेश के औरैया जिले से करीब 40 किलोमीटर दूर तिर्वा-बेला रोड पर स्थित रसूखपुर गांव के कुछ लोग फार्महाउस की तरफ जा रहे थे, तभी उन्हें एक लाश दिखाई दी. यह गांव थाना झींझक के अंतर्गत आता था. किसी ने लाश मिलने की सूचना फोन द्वारा थाना झींझक पुलिस को दे दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी श्रीप्रकाश यादव पुलिस बल के साथ गांव रसूखपुर पहुंचे. लाश युवक की थी, जिस की उम्र यही कोई 30-32 साल थी. उस के गले में एक अंगौछा बंधा था, इसलिए लग रहा था कि उस की हत्या गला घोंट कर की गई थी. मृतक काले रंग की पैंट, चैकदार कमीज और ग्रे कलर का स्वेटर पहने था. उस के एक पैर का जूता वहीं उतरा पड़ा था. श्रीप्रकाश यादव घटनास्थल का निरीक्षण कर रहे थे कि एक महिला एक बूढ़े व्यक्ति के साथ भीड़ को हटा कर लाश के पास आई. लाश देख कर दोनों फूटफूट कर रोने लगे. पुलिस समझ गई कि मृतक जरूर इन्हीं का संबंधी है. थानाप्रभारी ने महिला को धैर्य बंधा कर पूछताछ की तो पता चला कि लाश उस के पति राजू की थी.

महिला का नाम वंदना था और उस के साथ जो बूढ़ा था, उस का नाम हरीराम था. वह मृतक का बाप था. शव की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने पंचनामा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए औरैया के जिला अस्पताल भिजवा दिया.

पुलिस ने हरीराम की तहरीर पर भादंवि की धारा 302 के तहत अज्ञात हत्यारों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर विवेचना शुरू कर दी. पुलिस ने सब से पहले मृतक की पत्नी वंदना से पूछताछ की. उस ने बताया कि उस का पति सीधासादा आदमी था. उन का न किसी से झगड़ा था और न ही कोई लेनदेन.

वह सुबह काम पर जाते थे तो रात 8 बजे तक घर लौटते थे. लेकिन कल रात वह नहीं लौटे. रात भर वह उन का इंतजार करती रही. सुबह उसे पड़ोसियों से पता चला कि फार्महाउस के पास किसी की लाश पड़ी है तो वह ससुर के साथ वहां पहुंची तो लाश देख कर पता चला कि लाश उस के पति की है. पूछताछ में हरीराम ने बताया था कि राजू एकदम सीधासादा था, जबकि उस की बहू वंदना चंचल स्वभाव की थी. दोनों में ज्यादा पटती नहीं थी. अकसर दोनों में झगड़ा होता रहता था. इस की वजह थी पड़ोसी गणेश का उस के घर आनाजाना था. उसी को ले कर दोनों में झगड़ा होता रहता था. उस ने गणेश पर ही हत्या का शक जाहिर किया.

हरीराम के शक के आधार पर पुलिस ने गणेश के घर दबिश दी तो वह घर से फरार मिला. इस के बाद पुलिस ने वंदना से पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि गणेश से उस के नाजायज संबंध थे. लेकिन पति की हत्या किस ने की, यह उसे पता नहीं है. इस के बाद पुलिस ने उसे छोड़ दिया.

18 दिसंबर, 2016 को पुलिस ने मुखबिर से मिली सूचना पर गणेश को झींझक के रूरा रोड स्थित मधुबन होटल से हिरासत में ले लिया. थाने ला कर जब उस से राजू की हत्या के बारे में सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने गुनाह कबूल कर के राजू की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

वंदना रसूखपुर गांव के ही रहने वाले दीपचंद की बेटी थी. वंदना के अलावा उन के 2 बेटे और थे. वह खेतीकिसानी कर के अपने परिवार का पालनपोषण करता था. वंदना सयानी हुई तो दीपचंद ने औरैया के ही कस्बा झींझक के रहने वाले हरीराम के बेटे राजू से उस का विवाह कर दिया. राजू के अलावा हरीराम की 2 और बेटियां थीं. राजू कानपुर के दादानगर में स्थित एक प्लास्टिक की फैक्ट्री में नौकरी करता था.

राजू सीधासादा युवक था, जबकि वंदना आकर्षक रूपरंग की तेजतर्रार व चंचल स्वभाव की युवती थी. वह न तो ससुर से परदा करती थी और न ही बड़ीबुजुर्ग महिलाओं से. उस के इस व्यवहार से उस के सासससुर नाराज रहते थे. उन्हें उस की यह आदत पसंद नहीं थी. आखिर दोनों अलग कमरा ले कर रहने लगे.

सासससुर से निजात मिलने के बाद वंदना और भी स्वच्छंद हो गई. उस का जहां मन होता, घूमने लगी. राजू तो सीधासादा था, उसे उस ने एक तरह से मुट्ठी में कर रखा था. वह जो कमा कर लाता, पत्नी को दे देता था. वंदना 2 बच्चों की मां बन गई.

2 बच्चों की मां बनने के बाद भी वंदना खूब बनसंवर कर रहती थी. जबकि राजू की पत्नी के प्रति रुचि कम हो गई. वह सुबह 8 बजे नौकरी के लिए निकलता तो रात 8 बजे तक घर लौटता था. इस तरह पूरे दिन वंदना अकेली रहती थी.

वंदना के घर के पास ही गणेश रहता था. 24 साल का गणेश काफी स्मार्ट था. 3 भाईबहनों में वह सब से छोटा था. कस्बे की ही एक जनरल स्टोर की दुकान पर वह काम करता था. वह वंदना को भाभी कहता था. देवरभाभी के नाते दोनों में हंसीमजाक भी होती रहती थी. गणेश अकसर वंदना के घर आता रहता था. इसी आनेजाने में वंदना का झुकाव गणेश की तरफ हो गया. वंदना की हंसीमजाक व छेड़छाड़ से गणेश समझ गया कि वंदना उस से क्या चाहती है. इस के बाद उस के मन में भी वंदना को पाने  की ललक जाग उठी.

आखिर एक दोपहर वह वंदना के घर पहुंचा और अपने दिल की बात उस से कह दी. इस के बाद उन के बीच शारीरिक संबंध बन गए. फिर तो किसी न किसी बहाने गणेश राजू के घर पहुंच जाता और इच्छा पूरी कर निकल जाता. राजू की गैरमौजूदगी में गणेश का उस के घर आनाजाना लोगों के मन में शक पैदा करने लगा. फिर किसी ने यह बात राजू के कानों में भी डाल दी. पत्नी के बदले व्यवहार से राजू को वैसे ही शक था, पड़ोसी की बात सुन कर वह शक और ज्यादा मजबूत हो गया. वह वंदना और गणेश पर नजर रखने लगा. आखिर एक दिन राजू ने दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया. पत्नी को गणेश के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख कर उस का खून खौल उठा. पति को देख कर वंदना का चेहरा पीला पड़ गया. वहीं रंगेहाथ पकड़े जाने पर गणेश भाग गया.

राजू ने सारा गुस्सा पत्नी पर उतारा. पत्नी को जम कर पीटने के बाद उस ने उसे समझाया, ‘‘मुझे अच्छी तरह पता है कि गणेश मनचला है. दोस्ती का उस ने नाजायज फायदा उठाया. जरूर उस ने ही तुम्हारे साथ ज्यादती की होगी, वरना तुम बहकने वाली नहीं थी. मैं तुम्हें सुधरने का एक मौका देता हूं.’  पति की बातें सुन कर वंदना की जान में जान आई. उस ने पति की हां में हां मिलाई और अपने किए की माफी मांग ली. कुछ दिनों तो सब ठीक रहा. वंदना ने गणेश से दूरी बनाए रखी. पर मौका मिलते ही वह प्रेमी गणेश से फिर मिलने लगी. अब वे पूरी सावधानी बरतते थे. इस के बावजूद एक दिन दोनों को रंगरलियां मनाते राजू ने फिर पकड़ लिया.

इस बार राजू ने वंदना के साथसाथ गणेश की भी जम कर पिटाई की और उसे हिदायत दी, ‘‘तू मेरा दोस्त नहीं दुश्मन है. दोस्त बन कर तूने मेरी इज्जत पर डाका डाला. आस्तीन के सांप तू कान खोल कर सुन ले, आज के बाद अगर तू मेरे घर में दिखाई दे गया तो तेरा काम तमाम कर दूंगा.’’ उस समय तो गणेश और वंदना ने उस से माफी मांग ली थी, पर बाद में वे फिर अपने ढर्रे पर चलने लगे. राजू की धमकी से वंदना और गणेश डर तो गए थे, लेकिन मन ही मन दोनों राजू से खुन्नस रखने लगे थे. राजू पत्नी की इस बेवफाई से इतना टूट गया था कि वह शराब में डूबा रहने लगा. वह गुस्से में अकसर वंदना की पिटाई करता रहता था.

राजू से दोनों ही परेशान थे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वे क्या करें? गणेश का एक हमदर्द था. गणेश ने उसे अपनी समस्या बताई तो उस ने समस्या से निजात पाने के लिए राजू को ठिकाने लगाने का सुझाव दिया. गणेश को उस का यह सुझाव पसंद आ गया. योजना के तहत गणेश ने राजू से फिर से दोस्ती गांठ ली. गणेश ने बारबार माफी मांगी तो राजू का गुस्सा ठंडा पड़ गया और उस ने उसे माफ कर दिया. सारे गिलेशिकवे भूल कर दोनों फिर से साथसाथ खानेपीने लगे.

12 दिसंबर, 2016 की रात 8 बजे जब राजू घर लौट रहा था तो झींझक बसस्टैंड के पास उसे गणेश मिल गया. दोनों में बातचीत होने लगी. राजू को शराब की तलब लगी थी, लेकिन उस के पास पैसे नहीं थे. गणेश को ऐसे ही मौके की तलाश थी. बसस्टैंड के पास स्थित शराब की दुकान से गणेश ने शराब की एक बोतल खरीदी. दोनों ने वहीं बैठ कर शराब पी. गणेश ने जानबूझ कर राजू को अधिक शराब पिलाई. शराब पीने के बाद राजू घर की ओर चला तो गणेश उसे बातों में उलझा कर घर के बजाय फार्महाउस की ओर ले गया. फार्महाउस कस्बे के पूर्वी छोर पर स्थित है. कभी यहां अनाज मंडी लगती थी, लेकिन अब यह खंडहर में तब्दील हो चुकी है. शाम ढलते ही यहां सन्नाटा पसर जाता है.

कुछ देर बाद राजू और गणेश फार्महाउस पहुंच गए. उस समय वहां अंधेरा था. उचित मौका देख कर गणेश ने अचानक राजू को धक्का दे कर गिरा दिया. अधिक नशा होने की वजह से राजू उठ नहीं सका. उसी बीच गणेश ने अंगौछे से उस का गला घोंट दिया. राजू की हत्या कर के गणेश घर लौट आया. पुलिस से बचने के लिए वह इधरउधर घूमता रहा. आखिर 5 दिनों बाद मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने उसे पकड़ लिया. पूछताछ करने के बाद पुलिस ने गणेश को औरैया की जिला अदालत में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हो सकी थी. जिस वंदना के लिए उस ने अपने हाथ दोस्त के खून से रंगे, क्या अब वह उस की हो पाएगी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

धड़क: इंसानी संवेदनाआं व अहसासों का अभाव..

2016 की मराठी भाषा की सुपरहिट फिल्म ‘‘सैराट’’ का शशांक खेतान ने हिंदी रीमेक ‘‘धड़क’’ बनाया है, जिसे देखकर अहसास होता है कि फिल्मकार ने ‘सैराट’ की ही औनर कीलिंग कर डाली है.  ‘धड़क’ से ‘सैराट’ की रूह गायब है.

कहा जाता है कि ‘समरथ को नहीं दोष गोसांई’..इसीलिए ‘धड़क’ के फिल्मसर्जक ने अपने धन बल का भरपूर उपयोग करते हुए क्षेत्रीय भाषा की अति संवेदनशील व औनर कीलिंग के साथ राजनीतिक व सामाजिक परिवेश पर कुठाराघात करने वाली फिल्म ‘‘सैराट’’ को ‘धड़क’ में तहस नहस कर दिया. फिल्मकार नागराज मंजुले ने जिस कौशल व गहराई के साथ ‘सैराट’ में जातिगत व क्लास के चलते भेदभाव व औनर कीलिंग को पेशकर लोगों को सोचने पर मजबूर किया था,उसमें शशांक खेतान बुरी तरह से पस्त नजर आते हैं. ‘सैराट’ की तरह ‘धड़क’ में प्रेमी जोड़े में डर व निराशा का अहसास उभरता ही नही है.

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फिल्म की कहानी झीलों की नगरी उदयपुर में रहने वाले मधुकर बागला (इशान खट्टर) और राजशाही परिवार के तथा राजनेता रतन सिंह (आशुतोष राणा) की बेटी पार्थवी (जान्हवी कपूर) के इर्दगिर्द घूमती है. मधुकर के पिता का रेस्टोरेंट है.

मधुकर अच्छा कुक और टूर गाइड है. फिल्म की शुरुआत मधुकर के घर से होती है, वह सुबह सुबह सपना देख रहा है कि एक लड़की ने उसके पास आकर कहा कि इसबगोल पी लो, आज जीत उसी की होगी और उसे पुरस्कार वही देगी. खैर, प्रतियोगिता स्थल पर पहुंचने में देर होने के बावजूद जीत मधुकर बागला की होती है. पुरस्कार देने के लिए रतन सिंह अपने पूरे परिवार के साथ आए हैं. रतन सिंह अपनी बेटी पार्थवी से कहते हैं कि वह मधुकर को पुरस्कार दे. यहीं पर दोनों एक नजर में ही एक दूसरे को अपना दिल दे बैठते हैं. बाद में रतन सिंह अपने भाषण में अपनी प्रतिद्वंदी सुलेखा पर तीखे हमले करते हैं. इधर मधुकर और पार्थवी की मुलाकातें बढ़ती हैं. पता चलता है कालेज में दोनों को एक ही कक्षा में प्रवेश मिला है.

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जब मधुकर के पिता को इस प्रेम संबंध के बारे में पता चलता है, तो वह मधुकर से कहते हैं कि पार्थवी का परिवार उंची जाति का है, इसलिए उससे दूर रहो. यहां तक कि मधुकर के पिता मधुकर से अपने सिर की कसम ले लेते हैं कि वह अब पार्थवी से बात नहीं करेगा.

उधर पार्थवी को मधुकर का साथ चाहिए. उसे अपनी बात मनवानी आती है. अंततः मधुकर और पार्थवी की मुलाकातें, प्यार की तीखी नोकझोक चलती रहती है. इसकी भनक पार्थवी के भाई व रतन सिंह के बेटे रूप (आदित्य कुमार) को चलती है, तो वह मधुकर को सबक सिखाना चाहता है. पर चुनाव नजदीक होने के कारण मामला ठंडा हो जाता है. इधर रूप की जन्मदिन पर कोठी में आयोजित पार्टी में मधुकर के आने पर मधुकर को ‘किस’ देने की शर्त पार्थवी रखती है. अपने दोस्तों के साथ पहुंचकर मधुकर गाना भी गाता है. अब पार्थवी अपना वादा पूरा करने के लिए मधुकर को लेकर कोठी के एक कोने में जाती है. वह ‘किस’ दे इससे पहले ही रतन सिंह व रूप सिंह पहुंचकर पार्थवी को पकड़कर ले जाते हैं और कमरे में बंद कर देते हैं.

इधर मधुकर व उसके दोस्त भागकर अपने घर पहुंच जाते हैं. चुनाव जीतने के बाद रतन सिंह पुलिस पर दबाव डालकर मधुकर और उसके दोनों दोस्तों को पुलिस थाने मे खुब पिटवाते हैं. इसकी खबर जब पार्थवी को मिलती है, तो वह विद्रोही हो जाती है. पुलिस स्टेशन पहुंचकर अपनी कनपटी पर बंदूक रखकर अपने पिता रतन सिंह, भाई रूप सिंह व पुलिस वालों को दूर रहने के लिए कह कर मधुकर के साथ भागती है.

मधुकर व पार्थवी पहले मुंबई, फिर नागपुर होते हुए कोलकता पहुंचते है. वहां पर दोनों एक होस्टल में किराए पर कमरा लेकर रहना शुरू करते हैं. मधुकर को एक होटल में तथा पार्थवी को भी एक कंपनी में नौकरी मिल जाती है. उसके बाद दोनो शादी कर लेते हैं. उनका बेटा आदित्य दो साल का हो गया है. उधर पांच साल बाद हुए चुनाव में रतन सिंह चुनाव हार चुके हैं. बीच बीच में पार्थवी अपनी मां से बातें करती रहती है. इधर पार्थिव व मधुकर ने नया मकान खरीदा है और गृहप्रवेश की पूजा है. पार्थवी मां से फोन पर बात करती है, अचानक रतन सिंह फोन छीनकर पार्थवी की बातें सुनते हैं और फिर पार्थवी को जीती रहने का आशीर्वाद दे देते हैं. पर कुछ देर में पार्थवी का भाई रूप सिंह चार पांच लोगों के साथ पार्थवी के घर उपहार लेकर पहुंचते हैं. पार्थवी व मधुकर उनकी आवभगत करते हैं. फिर पूजा के लिए पार्थवी मिठाई लेने जाती है और जब वापस आती है, तो उसके सामने इमारत के नीचे उसके मकान से उसके पति मधुकर व बेटे आदित्य की लाश नीचे गिरती है.

फिल्म ‘‘धड़क’’ के प्रमोशन के दौरान निर्देशक शशांक खेतान सीना ठोककर दावा कर रहे थे कि यह फिल्म उनकी अपनी आवाज वाली फिल्म है. अपनी इसी बात को साबित करने तथा वर्तमान सरकार की ‘बेटी बचाओ’ मुहीम की वकालत करते हुए शशांक खेतान ने ‘धड़क’ में हीरो व उसके बेटे को मारकर हीरोईन को जिंदा रखा? पर क्या एक इमानदार फिल्मकार के तौर पर उन्हें यह जायज लगा? ज्ञातव्य है कि फिल्म ‘सैराट’ में हीरो व हीरोईन दोनों को हीरोइन का भाई मार देता है और उनका बेटा अनाथ हो जाता है.

फिल्म ‘‘धड़क’’ न तो संवेदनशील फिल्म बन सकी और न ही इसमें इंसानी भावनाएं ही उभर सकी. कम से कम ‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’ और ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ जैसी फिल्मों के निर्देशक से इस तरह की उम्मीद नहीं थी. ‘धड़क’ देखकर अहसास होता है कि शशांक खेतान के अंदर की रचनात्मकता खत्म हो चुकी है. परिणामतः दो किरदारों के बीच का प्रेम भी दर्शकों के दिलों तक नही पहुंचता. हां फिल्म के परदे पर सिर्फ जोधपुर की सुंदर व खूबसूरत लोकेशन की चमक जरुर है, जिसके लिए शशांक खेतान की बजाय फिल्म के कैमरामैन विष्णु राव बधाई के पात्र हैं. पटकथा के स्तर पर भी कुछ किरदारों को सही ढंग से तवज्जो नहीं दी गयी. फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी तो फिल्म का अंत ही है.

फिल्म ‘‘धड़क’’ की शुरुआत बहुत ही धीमी व बोझिल गति से होती है. शायद ‘सैराट’ से अलग ‘धड़क’ लगे इस प्रयास में शशांक खेतान फिल्म व विषयवस्तु के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाए. इंटरवल तक यह फिल्म ‘सैराट’ की तुलना में शून्य साबित होती है. दर्शकों पर किसी भी तरह का प्रभाव नहीं डालती. इंटरवल के बाद फिल्म काफी नाटकीय हो जाती है. फिर भी मानवीय संवेदनाएं व भावनाएं अपना आकार लेती नजर नहीं आती हैं. रोमांस व औनर कीलिंग के साथ क्लास का अंतर, जातिगत भेदभाव, राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के चलते लिए जाने वाले निर्णय जैसे मुद्दे भी ठीक से उभर नहीं पाए. फिल्मकार ने जाति के अंतर को महज एक संवाद में कह कर अपना दायित्व निभा लिया है. समसामायिक भारत के सामाजिक परिवेश में जाति का मुद्दा किस तरह गर्म है, इसे दृष्यों के माध्यम से चित्रित करना भी निर्देशक ने उचित नहीं समझा.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो बेहतर काम करते हुए जान्हवी कपूर काफी खूबसूरत लगी हैं. मगर कई दृश्यों में उन्हें काफी मेहनत करने की जरुरत थी.

मधुकर बागला के किरदार में ईशान खट्टर का अभिनय उनकी पिछली फिल्म ‘बियांड द क्लाउड्स’ के मुकाबले कमजोर ही नजर आता है. मधुकर के दोस्तों के किरदार में दोनों कलाकारों ने बेहतर काम किया है.

जहां तक फिल्म के संगीत का सवाल है, तो फिल्म का पार्श्व संगीत ठीक है. मगर फिल्म के गाने प्रभावित नहीं करते. यहां तक ‘सैराट’ के मूल गाने ‘झिंगाट’ का भी ‘धड़क’ में बंटाधार हो गया.

कुल मिलाकर ‘‘सैराट’’ संग तुलना किए जाने पर ‘धड़क’ कहीं नहीं ठहरती. ‘सैराट’ देख चुके दर्शकों की उम्मीदों पर ‘धड़क’ खरी नहीं उतरती है.

दो घंटे 17 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘धड़क’’ का निर्माण ‘धर्मा प्रोडक्शन’ और जी स्टूडियो ने किया है. फिल्म के निर्देशक शशांक खेतान, कहानीकार नागराज मंजुले, फिल्म ‘सैराट’ पर आधारित, पटकथा लेखक शशांक खेतान, संगीतकार अजय अतुल, कैमरामैन विष्णु राव तथा फिल्म को अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं- ईशान खट्टर, जान्हवी कपूर, आशुतोष राणा, अंकित बिस्ट, श्रीधर वाटसर, आदित्य कुमार, ऐश्वर्या नारकर, खरज मुखर्जी व अन्य.

मुकेश छाबड़ा की फिल्म का नाम होगा ‘‘किज्जी और मन्नी’’

मशहूर कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा बतौर निर्देशक 2014 की सफलतम हौलीवुड फिल्म ‘‘द फाल्ट इन अवर स्टार’’ को हिंदी में बना रहे हैं. इस फिल्म का निर्माण ‘फौक्स स्टार स्टूडियो’ कर रहा है. जबकि फिल्म में सुशांत सिंह राजपूत और और संजना संघी की मुख्य भूमिका है. अब तक इस फिल्म को ‘द फाल्ट इन अवर स्टार’ कहा जा रहा था, पर अब इसका हिंदी नामकरण ‘किज्जी और मन्नी’ किया गया. फिल्म में सुशांत सिंह राजपूत के किरदार का नाम मन्नी और संजना सांघी के किरदार का नाम किज्जी है.

रोमांटिक ड्रामा वाली यह फिल्म दो युवाओं की दिल को छू लेने वाली प्रेम कहानी है. जो कि अपनी खुशी, प्यार और उम्मीदों की यात्रा को तमाम रूकावटों के बावजूद आगे बढ़ाते रहते हैं. हौलीवुड फिल्म में संगीत की अहम भूमिका थी. इसी के चलते हिंदी वर्जन में संगीत देने के लिए अकादमी पुरस्कार विजेता संगीतकार ए आर रहमान की सेवाएं ली गयी हैं.

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मजेदार बात यह है कि इस फिल्म पर पिछले तीन वर्ष से काम हो रहा था. पर अब जाकर फिल्म के कलाकार आदि तय हो पाए हैं. ‘‘फौक्स स्टार स्टूडियो’’ की मुख्य रचनात्मक अधिकारी रूचा पाठक कहती हैं- ‘‘हम पिछले कुछ वर्षों से ‘फाल्ट इन अवर स्टार’ की हिंदी वर्जन की पटकथा पर काम कर रहे थे. अब हमें खुशी है कि हमारी फिल्म के साथ सुशांत सिंह राजपूत और संजना सांघी जुड़ चुके हैं.

अब भारतीय किरदारों के साथ ही इसे हिंदी नाम भी मिल गया. हम फिल्म की शूटिंग शुरू कर चुके हैं. फिल्म का नाम ‘किज्जी और मन्नी’ फिल्म के पटकथा लेखक सुप्रतिम सेनगुप्ता की पटकथा के चरित्रों के आधार पर रखा गया है. फिल्म के संवाद लेखक शशांक खेतान हैं.’’

जमशेदपुर में फिल्म की शूटिंग कर रहे निर्देशक मुकेश छाबड़ा कहते हैं- ‘‘हम इस फिल्म में दो लोगों के बीच की खूबसूरत प्रेम कहानी को पेश कर रहे हैं. हम इसे बहुत ही साधारण रख रहे हैं. हमने फिल्म को जमशेदपुर में फिल्माने का निर्णय लिया, क्योंकि यहां के लोग काफी दोस्ताना ढंग से पेश आते हैं. दूसरी बात जमशेदपुर में बंगाली का पड़ोसी दक्षिण भारतीय तथा बिहारी का पड़ोसी पारसी पाया जाता है. इसके अलावा मैने जमशेदपुर के बारे में काफी कुछ सुन रखा था.’’

रिश्तों को कलंकित करने वाला प्यार

कानपुर का एक कस्बा है सिकंदरा. उसी से सटा एक गांव है सहजपुर. जिस में श्याम सिंह का परिवार रहता था. उन के परिवार में पत्नी बेगवती के अलावा 2 बेटियां कमला, विमला और एक बेटा निर्मल था. श्याम सिंह खेती करते थे. उसी की आय से ही परिवार का भरणपोषण होता था. श्याम सिंह खुद पढ़ेलिखे इंसान थे, इसलिए बच्चों को भी पढ़ायालिखाया था. कमला की शादी उन्होंने औरेया जिले के फरीदपुर गांव में नाथू सिंह के साथ की थी तो विमला की शादी कानपुर (देहात) के थाना सिकंदरा के जाटियापुर गांव के शिवनाथ सिंह के साथ, बेटा पढ़लिख कर फौज में भरती हो गया था.

श्याम सिंह की मौत हो गई तो घरपरिवार की जिम्मेदारी बेगवती ने संभाल ली थी. विमला के 3 बच्चों में अनुपम सब से छोटी थी. दसवीं पास कर के उस ने पढ़ाई छोड़ दी थी. उस की मौसी का बेटा गौरव इंटरमीडिएट पास कर चुका था. वह अध्यापक बनना चाहता था. इसलिए सीमित आय के बावजूद पिता उसे किसी चीज की कमी नहीं होने दे रहे थे.

गौरव अकसर मौसी के घर आता रहता था. 17 साल की अनुपम से गौरव की खूब पटती थी. लेकिन गौरव को अनुपम की खूबसूरती कुछ अलग ही नजरिए से सुहाती थी. वह उसे चाहत भरी ललचाई नजरों से देखता था. लेकिन रिश्ते की याद आते ही वह अनुपम पर से नजरें हटा लेता था. जबकि उस का दिल ऐसा करने की इजाजत नहीं देता था. गौरव ने बहुत कोशिश की कि वह रिश्ते की मर्यादा बनाए रखे, लेकिन दिल के मामले में उस का वश नहीं चला.

गौरव को लगा कि वह अनुपम को चाहने लगा है. उस के दीदार से उस के दिल को सुकून मिलता था. अनुपम जब उस के पास नहीं होती तो उसे कुछ अच्छा नहीं लगता था. उस के बिना जीने की कल्पना करना भी बेईमानी लगती थी. लेकिन अनुपम का साथ पाने के लिए इच्छा तभी पूरी हो सकती थी, जब वह भी उसे प्यार करती.

उन्हीं दिनों ननिहाल में पारिवारिक शादी समारोह में दोनों का मिलना हुआ. शादी समारोह में सजीधजी अनुपम बेहद खूबसूरत लग रही थी. वह जीवन के 17 बसंत पार कर चुकी थी.

मजबूत कदकाठी का 18 साल का गौरव भी बहुत हैंडसम लग रहा था. अनुपम की गौरव के प्रति दिलचस्पी बढ़ती जा रही थी. चूंकि वे मौसेरे भाईबहन थे, इसलिए दोनों के साथसाथ रहने पर किसी को कोई शक नहीं होता था.

शादी के बाद दोनों अपनेअपने घर चले गए. घर जाने के बाद अनुपम के मन में उथलपुथल मची थी. शादी में गौरव के साथ की गई मस्ती के पल उस के दिमाग मे घूमते रहते थे. मोसेरा भाई होने के बावजूद अनुपम का झुकाव उस की तरफ हो गया था. दोनों के पास एकदूसरे के फोन नंबर थे. समय मिलने पर वे दोनों फोन पर बातें करते और एसएमएस भी करते.

गौरव और अनुपम एकदूसरे को मन ही मन चाहने लगे थे. लेकिन भाईबहन का रिश्ता होने की वजह से वे प्यार का इजहार नहीं कर पा रहे थे. काफी सोचविचार कर आखिर गौरव ने फैसला किया कि वह अनुपम से अपने दिल की बात जरूर कहेगा. इस के लिए भले ही अनुपम नाराज हो जाए या फिर उस का प्यार ठुकरा दे.

एक दिन अनुपम अपने कमरे में बैठी गौरव को बारबार फोन कर रही थी, लेकिन उस का फोन लग ही नहीं रहा था. झुंझला कर उस ने मोबाइल फोन स्विच औफ कर दिया तभी गौरव आ गया. वह मन ही मन ठान कर आया था कि आज अनुपम से अपने दिल की बात जरूर कहेगा. आते ही उस ने कहा, ‘‘अनु आज मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं.’’

‘‘क्या कहना चाहते हो बोलो?’’ अनुपम ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘मुझे डर लगता है कि तुम मेरी बात सुन कर नाराज तो नहीं हो जाओगी?’’

‘‘पता तो चले, ऐसी कौन सी बात है, जिसे कहने से तुम इतना डर रहे हो?’’

‘‘अनु, मैं तुम से प्यार करने लगा हूं. क्या तुम मेरे प्यार को स्वीकार करोगी?’’ गौरव ने अनुपम का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा.

‘‘क्या…?’’ अनुपम चौंकी. एकाएक अपने कानों पर उसे भरोसा नहीं हुआ.

‘‘हां अनु, मैं तुम से प्यार करने लगा हूं और तुम मेरे दिल में रचबस गई हो.’’ ‘‘यह कैसी बात कह रहे हो तुम? तुम अच्छी तरह जानते हो कि हम भाईबहन हैं.’’

‘‘अनु मैं ने कभी भी तुम्हें बहन की नजर से नहीं देखा. मुझे अपने प्यार की भीख दे दो. मैं तुम्हारे लिए सारे जहां से लड़ जाऊंगा.’’

‘‘हम दोनों रिश्ते में भाईबहन हैं. यह बेरहम समाज हमारे प्यार के रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं करेगा. जब लोगों को पता चलेगा तो वे हमें कभी एक नहीं होने देंगे. तुम किसकिस से लड़ोगे?’’

‘‘मुझे किसी की फिक्र नहीं है. बस तुम एक बार हां कर दो.’’

‘‘ठीक है, तुम इतना कह रहे हो तो मैं सोच कर जवाब दूंगी.’’ अनुपम ने कहा.

‘‘आज तो मैं घर जा रहा हूं. एक सप्ताह बाद लौट कर आऊंगा. तब तक तुम खूब सोच लेना.’’ कह कर गौरव चला गया.

रात का खाना खा कर अनुपम सोने के लिए बिस्तर पर लेटी तो नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. उस के कानों में गौरव के शब्द गूंज रहे थे. उस ने अपने दिल में झांकने की कोशिश की तो उसे लगा कि वह भी गौरव से प्यार करती थी, लेकिन रिश्ते की वजह से इजहार नहीं कर पा रही थी.

अब गौरव प्यार की बात कर रहा है तो उसे पीछे नहीं हटना चाहिए. जिंदगी में सच्चा प्यार हर किसी को नहीं मिलता. ऐसे में उसे गौरव के प्यार को टुकराना नहीं चाहिए. काफी सोचविचार कर उस ने फैसला कर लिया कि उसे क्या करना है.

अगले दिन की सुबह अनुपम के लिए कुछ अलग ही थी, गौरव के प्यार में डूबी हुई वह खोईखोई सी थी, लेकिन किसी को भनक तक नहीं लगी कि उस के मन में क्या चल रहा है. अनुपम को अब बेसब्री से गौरव का इंतजार था. लगभग एक सप्ताह बाद गौरव मौसी के घर आया. घर के लोगों से मिल कर वह अनुपम के कमरे में चला गया. उस ने अनुपम से पूछा, ‘‘अनु जल्दी बताओ, तुम ने क्या फैसला लिया?’’

‘‘गौरव, मैं ने सोचविचार कर तुम्हारे हक में फैसला लिया है.’’

गौरव ने खुशी से अनुपम को बांहों में भर लिया. खुद को छुड़ाते हुए अनुपम बोली, ‘‘अपने ऊपर काबू रखो. अगर किसी ने इस तरह देख लिया तो कयामत आ जाएगी. हमारा प्यार शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाएगा.’’

‘‘क्या करूं अनु, तुम्हारा फैसला सुन कर मैं जो पागल हो गया था.’’

‘‘ठीक है, लेकिन लोगों की नजरों में हमें भाईबहन ही रहना है. वैसे यह एक तरह से अच्छा है, इस से हम पर कोई जल्दी शक नहीं करेगा.’’

उस दिन से दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. दोनों के बीच फोन पर भी प्यार भरी बातें होने लगीं. जल्दी ही दोनों के बीच दूरियां भी मिट गईं.

कहते हैं, प्यार को चाहे कितना छिपा कर किया जाए, वह छिप नहीं पाता. लेकिन अनुपम और गौरव के संबंधों पर घर वालों को जल्दी इसलिए शक नहीं हुआ, क्योंकि वे भाईबहन थे. लेकिन एक दिन विमला ने अनुपम और गौरव को एकदूसरे से अश्लील हरकत करते देख लिया.

पहले तो वह सन्न रह गई, उस के बाद दोनों को लताड़ा भी और समझाया भी. उस ने यह बात बड़ी बहन कमला को बताई तो वह भी सन्न रह गई. उस ने भी गौरव को समझाया कि वे दोनों भाईबहन हैं. इसलिए उन का प्यार किसी भी तरह उचित नहीं है.

घर वालों ने भले ही दोनों को समझाया, रिश्ते की दुहाई दी, लेकिन उन पर कोई असर नहीं पड़ा. दोनों चोरीछिपे मिलते रहे. इस की जानकारी घर वालों को हुई तो उन्होंने दोनों पर सख्ती करनी शुरू कर दी. इस के बाद दोनों का मिलना बंद हो गया. अब दोनों की बातें फोन पर ही हो पाती थीं. विमला जब कभी अनुपम को फोन पर बातें करते देख लेती तो उसे डांटती और फोन छीन कर अपने पास रख लेती थी.

गौरव और अनुपम के मिलन में बाधा पड़ने लगी तो दोनों बेचैन रहने लगे. आखिर जब उन से नहीं रहा गया तो अनुपम ने मिलने का एक नया तरीका निकाल लिया. उस की नानी बेगवती का घर उस के घर से एक किलोमीटर दूर था. अनुपम किसी न किसी बहाने नानी के घर जाती और रात में वहां रुक जाती. घर से निकलते ही वह गौरव को फोन कर के नानी के घर जाने की जानकारी दे देती थी. गौरव भी नानी के घर पहुंच जाता. वहां आराम से दोनों का मिलन हो जाता.

एक दिन ऐसे ही गौरव ने अनुपम से पूछा, ‘‘अनु, कब तक हम इस तरह छिपछिप कर मिलते रहेंगे. अब तुम्हारी दूरी मुझ से बरदाश्त नहीं होती. मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूं.’’

‘‘यह संभव नहीं है, गौरव. हमारे रिश्ते को न तो घर वाले मंजूरी देंगे और न ही समाज.’’ अनु मायूस हो कर बोली.

‘‘कोई तो रास्ता होगा अनु.’’

‘‘हां एक रास्ता है.’’

‘‘क्या?’’ गौरव ने पूछा.

‘‘हम इस जनम में तो मिल नहीं पाएंगे, इसलिए जान दे कर दूसरे जनम में मिल सकते हैं.’’

‘‘शायद तुम ठीक कहती हो.’’ गौरव ने सहमति जताई.

22 जनवरी, 2016 की दोपहर अनुपम ने गौरव से फोन कर के कहा कि वह नानी के घर जा रही है. वह भी आ जाए. शायद यह उन की आखिरी मुलाकात होगी. गौरव शाम 5 बजे नानी के घर पहुंच गया. देर शाम अनुपम ने खाना बनाया और दोनों ने नानी के साथ खाना खाया.

खाना खाने के बाद अनुपम नानी के साथ चारपाई पर लेट गई तो गौरव दूसरे कमरे में पड़ी चारपाई पर लेट गया. नानी के सो जाने के बद अनुपम गौरव के कमरे में पहुंच गई. दोनों ने प्यार की अकल्पनीय बातें करते हुए साथसाथ मरने का निश्चय किया.

गौरव और अनुपम ने बरामदे में छत के कुंडे में रस्सी के 2 अलगअलग फंदे बना कर कंधे और एकएक हाथ आपस में कलावा से बांधा और अपने गले में फंदा डाल कर फांसी पर झूल गए.

सुबह बेगवती की आंखें खुलीं तो अनुपम चारपाई पर नहीं थी. उन्होंने आवाज लगाई. जब जवाब नहीं मिला तो कमरे से बरामदे में आई. बरामदे का दृश्य देख कर वह अवाक रह गई. बरामदे में नाती और नातिन फंदे से झूल रहे थे.

वह चीखतीचिल्लाती घर के बाहर आईं और पड़ोसियों को घटना की जानकारी दी. इस के बाद तो गांव में कोहराम मच गया. जिस ने सुना, वही बेगवती के घर की ओर दौड़ पड़ा. देखते ही देखते वहां भीड़ लग गई.

बेगवती ने पड़ोसियों की मदद से घटना की जानकारी अपनी बेटियों कमला और विमला तथा बेटे निर्मल को मोबाइल फोन से दी थी. सूचना पाते ही विमला पति शिवनाथ सिंह तथा गौरव की मां कमला व पिता नाथू सिंह आ गए. शव देख कर सभी फफक कर रो पड़े. इसी बीच शिवनाथ सिंह ने घटना की जानकारी थाना सिकंदरा पुलिस को दे दी थी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी विकास राय पुलिस फोर्स के साथ आ गए थे.

थानाप्रभारी विकास राय ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और दोनों शवों को उतरवा कर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को घटना की जानकारी दे दी. जानकारी पा कर एसपी प्रभाकर चौधरी, एएसपी मनोज सोनकर तथा सीओ आलोक कुमार जायसवल घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और मृतकों के घर वालों से पूछताछ की. पूछताछ में पता चला कि मृतक आपस में मौसेरे भाईबहन थे. दोनों के बीच अमर्यादित प्रेम था, जिस की वजह से दोनों ने आत्महत्या कर ली थी.

चूंकि मृतकों के परिजनों ने पुलिस को लिख कर दे दिया था कि वे कोई काररवाई नहीं चाहते हैं. इसलिए पुलिस ने दोनों शवों को पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए माती भिजवा दिया गया. फिर पोस्टमार्टम के बाद लाशें घर वालों को सौंप दी गईं. उस के बाद घर वालों ने एक ही चिता पर दोनों का अंतिम संस्कार कर दिया. पुलिस ने इस केस की फाइल बंद कर दी है.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

धर्म के नाम पर सिंकती हैं रोटियां

पाखंडी सब ऐश कर रहे जनता लुटे बेचारी,

भोले भक्तों की कमाई भरे दानपेटियां सारी.

इसी के बल पर दाढ़ीचोटी वाले मौज मनाते,

आंखें खोल कर रहने की अब आई बारी.

चढ़ावे के नाम पर मची लूट व अंधेरगर्दी पर ये लाइनें बड़ी सटीक लगती हैं. धार्मिक जगहों पर लगी दानपेटियों में भक्त सोना, चांदी, हीरे, जवाहरात, नकदी, जेवर वगैरह चढ़ाते रहते हैं इसलिए मंदिरों, गुरुद्वारों वगैरह में इतनी ज्यादा दौलत बरसती है कि नोट गिनने के लिए मशीनें लगानी पड़ती हैं.

ऐसी इमारतों की दीवारों, दरवाजों, गुंबदों वगैरह पर सोनेचांदी के पतरे चढ़ाए जाते हैं. मूर्तियां व सिंहासन सोनेचांदी के बन जाते हैं. उसी दौलत की बदौलत पंडेपुजारी, संतमहंत, मैनेजर वगैरह सब मौज करते हैं.

धर्म व मजहब के नाम पर दानपुण्य, चढ़ावे, खैरात वगैरह की महिमा का बखान सदियों से किया जाता रहा है. धर्म की किताबों में ऐसे किस्से भरे पड़े हैं. चढ़ावे के चलन को बढ़ाने के लिए धर्म प्रचारक खूब बढ़चढ़ कर झूठी कहानियां सुनाते हैं, अफवाहें फैलाते हैं, ऊलजुलूल बातों से लोगों को तरहतरह से भरमाते व बहकाते हैं.

पंडेपुजारी यह बात जानते हैं कि ज्यादातर लोग खुद पर यकीन रखने की जगह भाग्य व भगवान पर भरोसा करते हैं, इसलिए वे अपने मसलों से घबरा कर मठमंदिरों की शरण में चले जाते हैं और वहां लगी दानपेटियों में यह सोच कर पैसे डालते हैं कि इस से भगवान खुश होंगे और उन का काम जल्दी बन जाएगा, लेकिन अगर चढ़ावे से ही मन्नतें पूरी होतीं तो दुनिया में कभी किसी की कोई इच्छा अधूरी ही नहीं रहती.

गोरखधंधा है यह

सिर्फ अपना घर भरने की गरज से पंडेपुरोहित जीने से मरने तक में लोगों को दान करने व चढ़ावा चढ़ाने की घुट्टी पिलाते रहते हैं. मसलन चढ़ावा चढ़ाने से सारे पाप कट जाएंगे, दुखतकलीफें खत्म हो जाएंगी, खराब ग्रह ठीक हो जाएंगे, बीमारी व गरीबी चली जाएगी, कई गुना पैसा लौट कर आएगा, पुण्य व मोक्ष मिलेगा, इसलिए अपनी कमाई का कम से कम 10वां हिस्सा तो मंदिर या तीर्थ में ब्राह्मण को जरूर दान कर देना चाहिए. कभीकभार वे ज्यादा दान भी मांगते हैं. आजकल भगवा दुपट्टा डाले रंगदार गलीगली में पैदा हो गए हैं.

भोले भक्त, अंधविश्वासी लोग खासकर औरतें उन की उलझाऊ बातों में आ जाती हैं और जहांतहां लगी दानपेटियों में अरबोंखरबों रुपए की बरसात होती रहती है.

पंडेपुजारी, मठाधीश, ट्रस्ट व सरकार ऐसी धार्मिक जगहों के मालिक बन जाते हैं, वहीं सांईं बाबा, बालाजी, काशी विश्वनाथ, अक्षरधाम, वैष्णो देवी वगैरह बहुत से मंदिरों में रोज खूब चढ़ावा चढ़ता है, इसलिए गरीबों से भरे देश में भगवान की अमीरी खूब दिखाई देती है. वह भगवान जिस के बारे में दावा किया जाता है कि वह न तो कुछ खाता है, न पहनता है. जिसे किसी चीज की जरूरत ही नहीं है, तो आखिर उसे रुपएपैसे, जेवर, कपड़े, हलवापूरी व छप्पन भोग लगाने की जरूरत क्या है? लेकिन इस के एजेंट हैं कि हरदम भक्त और भगवान के बीच अपना घर भरने की जुगत में लगे रहते हैं.

धर्म के नाम पर कारोबार करने वाले कई तरह से लोगों को डराते हैं. वे धार्मिक अंधविश्वास फैला कर लोगों को उकसाते हैं, फिर रखरखाव की आड़ में अपनी कमाई के लिए धार्मिक जगहों पर बड़ीबड़ी दानपेटियां लगाते हैं, जबकि भगवान के घर में चोरीचकारी इतनी है कि किसी को किसी पर भरोसा नहीं है.

शुद्ध होने का स्वांग करने वाले कितने बेईमान हैं, यह पंडों की बेईमानियों से साफ है. मंदिरों में लगी दानपेटियों को जंजीरों से बांध कर उन में 5-5 ताले लगा दिए जाते हैं. हर पंडे के पास अलग चाबी होती है ताकि सब मिल कर ही तिजोरी खोलें.

सभी तीर्थों में ऐसे मंदिर हैं जहां दर्शन करने वालों को मोटा चढ़ावा चढ़ाने के लिए तकरीबन मजबूर किया जाता है. चढ़ावा न चढ़ाने पर उन के साथ बदसलूकी की जाती है. इस से तंग आ कर बहुत से लोग तोबा कर चुके हैं और उन मंदिरों में आगे से कभी न जाने की कसम खा चुके हैं. पर धर्म का नशा ऐसा है कि एक मंदिर से दुत्कारे जाने पर लोग दूसरे मंदिर की ओर चल देते हैं.

मची है छीनाझपटी

धर्म के कारोबारी चढ़ावे के नाम पर बेहिसाब धनदौलत इकट्ठा करते हैं. वे बेखौफ हो कर मजे से अपनी दुकानें चलाते हैं. दानपेटियों के गोरखधंधे से फायदा धर्म के ठेकेदारों व नुकसान भक्तों का होता है. जेब गरीबों की हलकी होती है.

ऐसा कहा जाता है कि सोमनाथ मंदिर की अकूत दौलत को लूटने के लिए उस पर 16 बार हमले हुए. आज भी मंदिरों में अकसर दानपेटियों के ताले तोड़ कर चोरियां होती रहती हैं, जबकि गजनी से कोई नहीं आता.

ज्यादातर मठमंदिर बहुत मोटी कमाई का जरीया हैं. इन पर कब्जा करने के लिए अकसर बेतहाशा खींचतान व छीनाझपटी मचती है. लड़ाईझगड़ा, मुकदमेबाजी, हत्याएं व खूनखराबा होता है. कई बार बिल्लियों की लड़ाई में

बंदर बाजी मार जाता है. पुरोहितों को हटा कर आला सरकारी अफसर बैठा दिए जाते हैं और धार्मिक कमाई पर सरकारें काबिज हो जाती हैं, लेकिन भक्त अपनी आंखें मूंदे रहते हैं. कुछ निजी मंदिर भी बनने लगे हैं. यह दूसरे कारोबारों से ज्यादा मुनाफे का धंधा जो है.

धर्म के नाम पर आंखें मूंद कर चढ़ावा चढ़ाने व अपनी जेबें हलकी करते रहने का ही नतीजा है कि इस देश में मंदिरों की भरमार है. हर गलीमहल्ले, सड़क व चौराहे पर बहुत से पुलिस थानों व ज्यादातर सरकारी इमारतों में न सिर्फ देवीदेवताओं की मूर्तियां लगी होती हैं, बल्कि बाकायदा पूजापाठ, आरती वगैरह करने का पक्का इंतजाम भी रहता है.

पिछड़ापन यों बरकरार

बहुत हैरत व अफसोस की बात तो यह है कि अपने देश में इतने स्कूल व अस्पताल नहीं हैं, जितने मठमंदिरों, मजारों वगैरह की भरमार है.

दूरदराज के बहुत से पिछड़े इलाकों में बसी आबादी रोटी, कपड़ा और मकान की बुनियादी सहूलियतों से दूर है. आज भी पीने के लिए साफ पानी, सड़क, संचार, सेहत वगैरह के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं.

आजादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी देश के बहुत से इलाकों में पिछड़ापन बरकरार है. बहुत सी सरकारी स्कीमों में पानी की तरह पैसा बहाने के बावजूद आज भी करोड़ों लोग बेघर हैं.

गंवई इलाकों व गंदी बस्तियों में करोड़ों लोग गरीबी की रेखा के नीचे रह कर कीड़ेमकोड़ों की तरह अपनी बदहाल जिंदगी बसर करते हैं. इस में सुधार व बदलाव होना बहुत जरूरी है.

उपाय भी हैं

दानपेटियों को तो मंदिरों की जगह स्कूलकालेजों व अस्पतालों में लगाया जाना चाहिए, लेकिन अपनीअपनी दुकानें चलाने वाले धर्म के धंधेबाज ऐसा कभी न होने देंगे.

यह कोई नई बात नहीं है. धर्म व राजनीति के नाम पर रोटियां सेंकने वाले हमेशा जनता को बेवकूफ बना कर अपना उल्लू सीधा करते रहे हैं.

अमीर वही हुए हैं, जिन्होंने पैसे की कीमत समझी, उसे बचाया, महफूज रखा व सही जगह लगा कर कई गुना बढ़ाया.

एकएक बूंद मिल कर सागर बन जाता है. इसी तरह अगर जीने से मरने तक धर्म के नाम पर किए गए खर्च को जोड़ा या बचाया जाए तो अच्छीखासी रकम जमा हो जाती है जो अपने जरूरी खर्चों में काम आ सकती है. तंगहाली में तो बचत की अहमियत और भी बढ़ जाती है, इसलिए उस की अनदेखी करना कतई वाजिब नहीं है.

जनता को खुद चालबाज मक्कारों के फैलाए हुए जंजाल से निकलना होगा. लोगों को यह बात अच्छी तरह से समझनी होगी कि दानचढ़ावे से कुछ हासिल नहीं होता. यह सिर्फ मन का वहम है, इसलिए दानपेटियों में अपनी मेहनत की कमाई बहाने से कुछ न मिलेगा.

याद रखें कि दानपेटियों में धन डालने से सिर्फ उन्हें मिलता है जो बिना कुछ करेधरे ही हलवापूरी खाना चाहते हैं, इसलिए अपने पैसों का इस्तेमाल सुखी जिंदगी जीने के लिए करें, दानपेटियों में डाल कर उसे बरबाद न करें.

पढ़ाई के लिए जब जाना हो विदेश

बढ़ते वैश्वीकरण ने बाजार के लगभग हर उत्पाद व सेवा को ग्लोबल कर दिया है. शिक्षाजगत भी इस से अछूता नहीं है. लिहाजा, आज स्टूडैंट्स अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए विदेशों का रुख कर रहे हैं. विदेश जा कर पढ़ाई करने का चलन पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ रहा है. एक अनुमान के मुताबिक, हर साल करीब 43 लाख स्टूडैंट्स अपना देश छोड़ कर किसी दूसरे देश पढ़ने जा रहे हैं. वैसे तो भारत में 400 से ज्यादा विश्वविद्यालय हैं जहां वे पढ़ सकते हैं, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के मामले में हमारे यहां आईआईटी और आईआईएम जैसे चंद शिक्षण संस्थान ही हैं जो विश्वस्तरीय सूची में शामिल हैं, बाकी शिक्षा के व्यावसायीकरण में मोटी कमाई करने में जुटे हैं.

यही वजह है कि आज भारतीय छात्र अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों के नामचीन शिक्षा संस्थानों में पढ़ने के लिए न सिर्फ अच्छाखासा रुपया खर्च करने को तैयार दिखते हैं, बल्कि घर से दूर रहने से भी नहीं हिचकते. अमेरिका के इंस्टिट्यूट औफ इंटरनैशनल एजुकेशन से जुड़े डैनियल ओब्स्ट के मुताबिक, वैश्वीकरण के इस दौर में कामयाबी के लिए हर छात्र को विदेश में पढ़ाई करनी चाहिए. इस से वह अलग भाषा और संस्कृति वाले लोगों से तालमेल बिठाना सीखेगा और मल्टीनैशनल कंपनियों में काम करना उस के लिए आसान होगा. हालांकि यह आसान काम नहीं है.

विदेश में रहना, वहां के विश्वविद्यालयों की फीस भरना, किताबों की कीमत, वीजापासपोर्ट और ट्रैवल का खर्च आदि कई बातें हैं जिन पर सोचे बिना विदेशों में पढ़ाई का सपना पूरा नहीं होता. इसलिए यदि आप भी विदेश में पढ़ाई करने की सोच रहे हैं तो कुछ बातों और तैयारियों से दोचार हो लें :

क्या पढ़ना चाहते हैं?

आप किस सब्जैक्ट या बीट या कोर्स के लिए विदेशी कालेज में दाखिला लेना चाहते हैं, यह सब से पहले तय कर लें. संबंधित कोर्स के बारे में पूरी रिसर्च करें. हो सके तो जो प्रोफैसर या जानकार विदेश से पढ़ कर या काम कर के आए हैं, उन से गाइडैंस ले लें. विदेश में पढ़ने के तमाम तरह के प्रोग्राम होते हैं. कई बार अलगअलग देशों में सेमेस्टर या कोर्स की अवधि भी अलग होती है और कुछ कोर्स अंगरेजी में होते हैं. कई संस्थान एकसाथ 2-2 डिगरियों की पढ़ाई की इजाजत भी देते हैं. आप जो भी कोर्स करना चाहते हैं, उन कोर्सेस की भविष्य में कहांकहां व किस स्तर की मान्यता है, शौर्टटर्म है या फुलटाइम आदि जरूरी बातों का पता कर के देश और संबंधित संस्थानों के बारे में सर्च करें. संबंधित संस्थान की प्लेसमैंट रिपोर्ट, उस की रैपुटेशन कैसी है आदि जानकारियां आजकल इंटरनैट के जरिए मालूम की जा सकती हैं.

बजट, स्कौलरशिप और लोन

अब बात आती है खर्च की. किसी भी कोर्स को चुनने से पहले अनुमान लगा लें कि आप विदेश में पढ़ाई पर कितना खर्च वहन कर सकते हैं. विदेशों में पढ़ाई के लिए सरकारी व निजी विश्वविद्यालयों के विकल्प होते हैं. हर कालेज या यूनिवर्सिटी की ट्यूशन फीस भी अलगअलग होती है. इस के अलावा हर देश में रहने और खानेपीने का खर्च अलगअलग होता है. इसलिए देश तथा संस्थान चुनते वक्त आप को अपने बजट का भी ध्यान रखना होगा. वैसे तो विदेश में पढ़ाई महंगी पड़ती है, लेकिन स्कौलरशिप इस के लिए सब से बेहतर विकल्प है. कई निजी और सरकारी और्गनाइजेशंस की ओर से भी आप को विदेश में पढ़ने का मौका मिल सकता है, लेकिन यह सिर्फ योग्य छात्रों को ही मिलता है. ऐसे बहुत से देश (जरमनी, फिनलैंड, नौर्वे, ब्राजील, स्लोवेनिया और स्वीडन) हैं, जिन के कुछ विश्वविद्यालय विदेशी छात्रों की डिगरी, उन की स्कौलरशिप व काबिलीयत को देख कर उन का खर्च उठाने के लिए तैयार रहते हैं.

कुछ स्कौलरशिप्स में ट्यूशन फीस का कुछ हिस्सा कवर होता है, जबकि कई में पूरी फीस शामिल होती है. जितना हिस्सा स्कौलरशिप से मिल जाए, उस के बाद बची रकम अभिभावक या बैंक लोन से पूरी की जा सकती है. अगर आप अपनी लोकल यूनिवर्सिटी के किसी प्रोग्राम के तहत जा रहे हैं, तो आप को लोकल यूनिवर्सिटी की फीस देनी होगी. साथ ही, विदेश में पढ़ने का खर्च भी उठाना होगा.

हर देश में पढ़ाई का खर्च अलगअलग होता है. आमतौर पर अमेरिका के मुकाबले यूरोप में पढ़ाई सस्ती है. अगर आप लंदन में रह कर पढ़ते हैं, तो आप का रहनेखाने का खर्च ज्यादा आएगा. इस के मुकाबले मैनचेस्टर में पढ़ाई सस्ती होगी. अमूमन अमेरिका में पढ़ाई का खर्च सालाना 25 से 50 लाख रुपए आ सकता है. हालांकि, दूसरे कई देशों में यह सस्ता है.

इंटरनैशनल स्टडीज के मामले में काउंसलिंग सैशन का खर्च प्रति सैशन 5,000 रुपए आ सकता है और औल इनक्लूसिव पैकेज की बात करें तो यह 75,000 से 10 लाख रुपए के बीच आता है. इस के अलावा एजुकेशन लोन भी एक विकल्प है. हालांकि शिक्षा के लिए लोन पर ब्याजदर अपेक्षाकृत कम होती है फिर भी इस से बचना चाहिए. यदि पेरैंट्स ने पहले से आप के लिए कोई एजुकेशन पौलिसी या बचत कर रखी है तो यह सब से अच्छा है.

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वीजा की तैयारी

विदेश जाने के लिए सब से जरूरी है वीजा. कई स्टूडैंट्स अधूरी तैयारी की वजह से विदेश नहीं  जा पाते हैं. गौरतलब है कि विदेश जाने के लिए छात्र को 1-20 वीजा की जरूरत होती है. इस के लिए आप के पास संबंधित संस्थान से प्राप्त एफ -1 फौर्म होना जरूरी है. इस के बाद वीजा फौर्म को बिना किसी गलती के सावधानी से भरें. हर बात स्पष्ट हो. नोट में पूरे विश्वास के साथ बताएं कि आप वहां पढ़ाई करने जा रहे हैं. इस के साथ जीआरई, जीमैट और टौफेल जैसे टैस्ट की मूल प्रतियां तैयार रखें.

क्या करें और क्या नहीं

विदेश पहुंच गए तो यह न सोचें कि अब सब काम अपनेआप हो जाएंगे. कुछ बातें हैं जिन को वहां पहुंचते ही समझ लेना चाहिए, मसलन आप के देश का दूतावास कहां है, वहां का फोन नंबर आदि. वहां की भाषा की बेसिक समझ के लिए डिक्शनरी रखें.

वहां पहुंचते ही घूमने के चक्कर में अपना पढ़ाई का समय न गंवाएं. जाते ही लोकल बैंक में अपना खाता खुलवा लें. वहीं इमरजैंसी नंबर्स जैसे पुलिस, फायर ब्रिगेड व अन्य सेवाओं के संपर्क नंबर पता कर लें. आत्मविश्वास से लबरेज रहें.

अलग देश और अलग भाषा वाले लोगों से तालमेल बिठाना, अपनी दिक्कतों का हल खोजना आदि सीखें. वहां की भाषा, संस्कृति, खानपान के बारे में जानें. इस से ग्लोबल सिटिजन बनने में आसानी होगी. बहुत से बच्चे तो विदेश पढ़ने ऐसे जाते हैं जैसे छुट्टियों में घूमने जा रहे हों. ऐसा सोचना पैसे और वक्त दोनों की बरबादी होगी. यह गलती न करें. विदेशों में किसी कोर्स से जुड़ने के बाद पर्सनल से ले कर प्रोफैशनल स्तर तक आप का पूरा मेकओवर हो जाता है. बाहर जा कर आप अपनी जिम्मेदारियों से पहले से ज्यादा वाकिफ होते हैं.

कुल मिला कर विदेश में पढ़ाई को हौआ न मानें. हर जगह अच्छे और बुरे संस्थान होते हैं. इसलिए किसी के कहने या देखादेखी विदेश जाना ठीक नहीं है. यदि आप को लगता है कि संबंधित कोर्स विदेश जा कर अच्छे से पढ़ा जा सकता है और उस से रोजगारपरक संभावना बढ़ती है तो ही जाएं. वरना विदेश से पढ़ कर आने से अच्छी नौकरी मिल जाएगी, इस की गारंटी नहीं है. अपना बजट, घरेलू स्थितियां और संबंधित देश के मौजूदा सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक हाल देख कर ही वहां पढ़ाई करने के लिए जाने की सोचें.

खिचड़ी सरकार की दरकार

खिचड़ी सरकार का भय दिखा कर भारतीय जनता पार्टी 2019 के आम चुनावों में जीत हासिल करना चाहती है. कर्नाटक विधानसभा और 10 राज्यों में हुए उपचुनावों के परिणामों से यह तो साफ है कि 1977 के बाद कांग्रेस के पर्याय के रूप में खिचड़ी सरकारों का जैसा दौर रहा वैसा ही 2019 के बाद भी संभव है जिस में दालचावल का शोरवा नहीं रहेगा, दाल अलग दिखेगी, चावल अलग. सवाल है कि इस में बुराई क्या है.

कांग्रेस के बाद देश कोई अराजकता में तो नहीं डूबा. कइयों की सहमति से फैसले होते थे. कुछ फैसले ढंग के होते थे, कुछ बेढंगे. इस के विपरीत कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की जबजब अकेली सरकारें बनी हैं तब दाल तो अकेली थी लेकिन चावलों का पता ही नहीं था. यही नहीं, दाल में कंकर ज्यादा थे, दाल कम. दोनों सरकारों ने जनता के हितों से जम कर खेला. अगर अदालतें न होतीं तो देश का लोकतंत्र इंदिरा गांधी के युग में भी और नरेंद्र मोदी के युग में भी हवा हो चुका होता.

अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की मिलीजुली सरकारों को मंत्रिमंडल की बैठकों में आम सहमति से फैसले लेने पड़े और वे सही थे. यह देश अपनेआप में एक खिचड़ी है. यह न जरमनी है, न चीन जहां लगभग पूरी जनता एक परंपरा, एक इतिहास, एक बोली और एकतरह के विचारों वाली हो. पर इसी एकतरह में हिटलर और माओ पैदा हुए हैं, जिन्होंने लाखों अपनों को  मरवाया और परायों को भी जम कर मारा.

भारत को विभिन्नता चाहिए. भारत को ऐसा एकाधिकार नहीं चाहिए.

खिचड़ी सरकारों में 10-15 सांसदों वाली पार्टी भी अपनी बात कह सकती है. आज नरेंद्र मोदी को उन की पार्टी के 50 सांसद भी कुछ कहना चाहें तो कह नहीं सकते. नरेंद्र मोदी ने तो अपने मंत्रिमंडल के मंत्रियों के भी पर कुतर रखे हैं और सारे असंवैधानिक, अनैतिक व अतार्किक फैसले पीएमओ यानी प्राइम मिनिस्टर औफिस कर रहा है.

मोदी के नेतृत्व की यह सरकार न संविधान को मानती है न मानव अधिकारों को. इस ने तो भरी अदालत में यहां तक कह दिया कि हर नागरिक के शरीर पर सरकार का हक है, उस का खुद का नहीं.

आज जनता अगर कुछ खुली सांस ले पा रही है तो इसलिए कि देश की राजनीति में कई दालें, सब्जियां, कई तरह के चावल और तरहतरह के मसाले हैं. बढि़या खिचड़ी बनती है. यह स्वादिष्ठ भी होती है और हाजमा भी ठीक रखती है.

बिहार : फिर निकला विशेष राज्य दर्जा का जिन्न

लोकसभा चुनाव की सुगबुगाहट शुरू होते ही नीतीश कुमार को फिर से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की याद आई है और इस के लिए उन्होंने केंद्र सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है. 29 मई, 2018 को उन्होंने 15वें वित्त आयोग को इस मसले को ले कर चिट्ठी भेजी थी.

जानकारों का मानना है कि विशेष राज्य के दर्जे की मांग करना कोरा राजनीतिक स्टंट है. बिहार विशेष राज्य का दर्जा पाने के नियमों पर खरा ही नहीं उतरता है तो किस मुंह से इस की मांग कर के जनता को बरगलाया जा रहा है?

केंद्र सरकार कई दफा इस मांग को खारिज करती रही है. नीतीश कुमार ही नहीं, कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति जैसी पार्टियां भी अपनी सहूलियत और सियासी मतलब के हिसाब से यह मांग उठाती रही हैं.

बिहार कांग्रेस के प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल कहते हैं कि उन की पार्टी बिहार को स्पैशल स्टेटस दिलाने का समर्थन करती रही है. इस के लिए पार्टी मुहिम चलाने की तैयारी भी कर चुकी है.

लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान कहते हैं कि बिहार पिछड़ा राज्य है और इसे विशेष राज्य का दर्जा मिलना ही चाहिए.

गौरतलब है कि बिहार के अलावा झारखंड, ओडिशा और राजस्थान में भी विशेष राज्य का दर्जा की मांग उठती रही है. केंद्र सरकार इस मसले को छेड़ने से परहेज करती रही है. बिहार को स्पैशल स्टेटस मिलने के बाद बाकी तीनों राज्य भी उस के पीछे हाथ धो कर पड़ सकते हैं.

गौरतलब है कि बिहार विधानसभा ने 4 अप्रैल, 2006 को ही राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग का प्रस्ताव पास कर दिया था और इस बारे में मुख्यमंत्री ने 3 जून, 2006 को प्रधानमंत्री को जानकारी दी थी.

31 मई, 2010 को बिहार विधानपरिषद ने भी इस प्रस्ताव पर मुहर लगा दी थी और 10 जून, 2010  को मुख्यमंत्री ने फिर प्रधानमंत्री को चिट्ठी के जरीए यह जानकारी दी थी.

23 मार्च, 2011 को राज्य के सभी सियासी दलों और सांसदों से इस मुहिम को समर्थन देने की अपील की गई थी और एक हस्ताक्षर मुहिम की शुरुआत की गई थी.

जब 13 साल पहले बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने को ले कर बिहार में नए सियासी ड्रामे ने जोर पकड़ा था तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उन की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) को इस के अलावा कुछ और नहीं सूझ रहा था. उस समय राज्य के बाकी दल इसे नीतीश कुमार की सियासी नौटंकी करार दे कर उन की मांग की हवा निकालने पर तुले हुए थे.

नीतीश कुमार ने साल 2005 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद ही बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग उठाई थी और इस मामले को ले कर यह हवा बनाई गई थी कि अगर केंद्र ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दे दिया तो उस के सारे दुखदर्द दूर हो जाएंगे.

बिहार की वाजिब तरक्की नहीं हो पाने का ठीकरा केंद्र के माथे फोड़ कर नीतीश कुमार खुद की जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने की कोशिश करते रहे हैं. 5-6 साल पहले इस मसले पर केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए जद (यू) ने राज्यभर में हस्ताक्षर मुहिम शुरू की थी और एक करोड़ बिहारियों के हस्ताक्षर जुटा कर केंद्र सरकार को सौंपे थे.

नीतीश कुमार बारबार यह रट लगा रहे हैं कि बिहार के सामाजिक और माली पिछड़ेपन को दूर करने के लिए राज्य को विशेष राज्य का दर्जा मिलना जरूरी है.

आजादी के बाद से ही केंद्र सरकारों ने बिहार की अनदेखी की है. पढ़ाईलिखाई और सेहत के लिए जरूरत से काफी कम पैसे मिले. रोजगार के लिए बड़ी तादाद में लोग राज्य से भाग रहे हैं. खनिज से भरा होने के बाद भी यहां उद्योग नहीं लग सके हैं.

जिन उद्योगों को बिहार आना चाहिए था वे छिटक कर दक्षिण और पश्चिम के राज्यों में चले गए. साल 2000 में बिहार के बंटवारे ने तो राज्य को पूरी तरह से चौपट कर के रख दिया. खदान वाला हिस्सा झारखंड में चला गया. विशेष राज्य का दर्जा मिलने के बाद राज्य में पूंजी निवेश बढ़ेगा, कारखाने लगेंगे, रोजगार के मौके बढ़ेंगे और लोगों का यहां से जाना भी रुकेगा.

राजद नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं कि नीतीश कुमार इस मामले पर केवल हवाबाजी करते रहे हैं. बिहार के साथ कभी इंसाफ हुआ ही नहीं है. सरकार के पास केंद्र सरकार से विशेष राज्य के दर्जे की भीख मांगने के अलावा और कोई काम नहीं रह गया है.

सरकार यह साबित करने की कोशिश कर रही है कि केंद्र की वजह से ही राज्य की तरक्की नहीं हो पा रही है, तो राजद सरकार पर वह किस मुंह से बिहार के पिछड़ेपन का आरोप मढ़ती रही है.

विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग करने वालों का कहना है कि बिहार को एक स्पैशल इकोनौमी पैकेज की जरूरत है और इस के लिए संविधान में दिए गए मापदंडों की समीक्षा की जानी चाहिए.

पिछड़े राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा दे कर माली मदद और टैक्सों में छूट दी जाती है. जम्मूकश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, नागालैंड, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, असम, त्रिपुरा, मिजोरम, सिक्किम और मेघालय को पिछड़े राज्यों का दर्जा दे कर केंद्र सरकार स्पैशल मदद दे रही है.

बिहार प्रदेश विशेष राज्य दर्जा संघर्ष समिति के मुख्य प्रवक्ता संजय वर्मा कहते हैं कि बिहार का एक बड़ा इलाका नक्सलवाद, बाढ़, सूखा, पलायन, भौगोलिक अलगाव, बेरोजगारी, बिजली की कमी, कारखानों की कमी और कमजोर माली हालात से जूझ रहा है, ऐसे में विशेष राज्य का दर्जा पाए राज्यों से बिहार की हालत बेहतर नहीं है.

आमतौर पर राज्य को केंद्र सरकार तरक्की की योजनाओं के लिए 30 फीसदी अनुदान और 70 फीसदी कर्ज के रूप में देती है. स्पैशल राज्य का दर्जा मिलने पर 90 फीसदी अनुदान और 10 फीसदी कर्ज मिलता है.

बिहार चैंबर औफ कौमर्स के अध्यक्ष ओपी साह कहते हैं कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलने के बाद इस का औद्योगिक और माली रंगरूप पूरी तरह से बदल जाएगा और बिहार तरक्की की दिशा में ऊंची छलांग लगा सकेगा.

औद्योगीकरण और रोजगार पैदा न होने से राज्य में ठहराव के हालात बन गए हैं.

वैसे, इस बात से भी नकारा नहीं जा सकता है कि देश के बाकी राज्यों की तुलना में बिहार की काफी अनदेखी हुई है, इसलिए यह समय की मांग है कि बिहार को स्पैशल राज्य का दर्जा मिले.

क्या मिलेगा विशेष राज्य का दर्जा

*   केंद्रीय अनुदान का फार्मूला 70:30 के बजाय 90:10 हो जाएगा.

*   कर्ज मुहैया होने की वजह से संसाधन जुटाना आसान होगा.

*   कर्ज के बोझ में कमी आएगी. इस से बाजार को लुभाना आसान होगा और निवेश बढ़ेगा.

*   सामाजिक और माली क्षेत्र के बीच की खाई को पाटा जा सकेगा.

*   टैक्सों और ऐक्साइज ड्यूटी में काफी छूट मिलेगी. इस से प्राइवेट निवेश में तेजी आएगी.

*   गरीबी उन्मूलन, स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा और रोजगार पैदा होने के कामों में तेजी आएगी, जिस से विकास दर बढ़ेगी.

देखिये भोजपुरी गाने पर ऋतिक का यह जबरदस्त डांस

बौलीवुड अभिनेता ऋतिक रोशन एक शानदार डांसर भी हैं. उनके जबरदस्त डांस के फैंस दुनिया भर में हैं. ऐसे में सोशल मीडिया पर उनका एक डांस वीडियो काफी वायरल हो रहा है. सोशल मीडिया पर काफी तेजी से वायरल हो रहा ऋतिक का ये वीडियो वाकई बेहद दिलचस्प है. इसे एक बार देखने के बाद हर किसी का बार-बार देखने को जी चाहेगा.

वीडियो की बात करें तो ये ऋतिक की फिल्म ‘बैंग बैंग’ के गाने ‘मैं तेरा होने लगा’ का है लेकिन ऋतिक के इस वीडियो को मनोज तिवारी के मशहूर गाने ‘चट देनी मार देले खींच के तमाचा’ के साथ सिंक किया गया है.

इस वीडियो को इतनी जबरदस्त तरीके से सिंक किया गया है कि ये मानना मुश्किल सा हो रहा है कि ऋतिक किसी और गाने पर डांस कर रहे हैं. बता दें कि सोशल मीडिया पर आए इस वीडियो को अब तक करोड़ों लोग देख चुके हैं.

यहां देखिए ऋतिक रोशन का ये मजेदार वीडियो:

ये पहली बार नहीं है जब ऋतिक रोशन का ऐसा कोई वीडियो वायरल हो रहा है. बल्कि इससे पहले ऋतिक का एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी पसंद किया गया था. जिसमें उनके गाने को पवन सिंह के मशहूर गाने ‘लौलीपौप लागेलू’ के साथ एडिट किया गया था.

जिंदगी बरबाद करते दगाबाज आशिक

कहने वाले गलत नहीं कहते हैं कि प्यार अंधा होता है और इस में ठगी अकसर वे लड़कियां जाती हैं, जो अपने आशिक पर आंखें मूंद कर जरूरत से ज्यादा भरोसा करती हैं. बदलते दौर में बहुत जल्द ही वे अपना सबकुछ उन को सौंप देती हैं.

आएदिन ऐसे मामले उजागर होने लगे हैं, जिन से यह साबित होता है कि इश्क में माशूका और आशिक ने कुछ दिन एकसाथ काटे, इस के बाद आशिक शादी के अपने वादे से मुकर गया या फिर कन्नी काटने लगा.

2-4 फीसदी मामलों में ही लड़कियां खुद ही सच उजागर करते हुए बवाल मचाती हैं, पर तब तक उन के पास रोने के अलावा कुछ और नहीं रह जाता, क्योंकि उन की जिंदगी बरबाद हो चुकी होती है.

प्यार में अंधी हो कर अपने आशिक की असलियत और मंशा को न समझ पाने का खमियाजा 28 साला पार्वती (बदला नाम) रोतेसुबकते भुगत रही है.

यों दी दगा

पार्वती को अपने ही शहर सीहोर, मध्य प्रदेश के एक नौजवान रवि सिसोदिया से प्यार हो गया था. दरअसल, रवि के पहले वह उस के भाई अजय को चाहती थी, जिस की बेवक्त मौत हुई, तो वह टूट सी गई थी. ऐसे वक्त में उसे रवि ने सहारा दिया और बड़ेबड़े वादे किए, जिन में से एक शादी कर लेने का वादा भी था.

अजय की मौत का गम रवि के प्यार ने भुला दिया, तो जल्द ही पार्वती ने उसे अपना जिस्म भी सौंप दिया. यही रवि चाहता था. आशिक की नीयत का खोट पार्वती वक्त रहते समझ नहीं पाई और कठपुतली की तरह उस के इशारों पर नाचने लगी.

सीहोर छोटा और घना शहर है. लिहाजा, वहां हमेशा मिलनेजुलने और हमबिस्तर होने का मौका सहूलियत से नहीं मिलता था, फिर भी दोनों के बीच कोई परदेदारी नहीं रही थी.

बात जब शादी की आई, तो रवि ने पार्वती को समझाया कि यहां शादी करेंगे, तो घर और समाज वाले हल्ला मचाएंगे, इसलिए इंदौर चल कर रहते हैं. कुछ दिनों बाद जब सबकुछ ठीक हो जाएगा, तो वापस आ जाएंगे और सभी थोड़ीबहुत नानुकर व नाराजगी के बाद हमें एक होने की मंजूरी देने पर मजबूर हो जाएंगे.

पार्वती उन दिनों पेट से हो गई थी. लिहाजा, वह समझ नहीं पाई कि रवि की असल मंशा यह है कि इंदौर जा कर बच्चा गिरवा दे और न गिरवा पाए तो भी कोई बात नहीं, कम से कम कोई शादी के बाबत दबाव तो नहीं बनाएगा.

अपने आशिक से यह सुन कर पार्वती का भरोसा और बढ़ा कि उस ने इंदौर में रहनेखाने का इंतजाम कर रखा है. फिर एक दिन वह चुपचाप रवि के साथ बस में बैठी और इंदौर जा पहुंची यानी घर से भाग गई.

इंदौर में सचमुच रहने के लिए रवि ने सिलिकौन सिटी अपार्टमेंट्स में फ्लैट ले रखा था. लिहाजा, किसी तरह का शक पार्वती को नहीं हुआ.

वक्त कटता गया. रवि चूंकि खातेपीते घर का था, इसलिए पैसों की उस के पास कमी नहीं थी. दिन पूरे हुए, तो पार्वती ने अस्पताल में एक बेटी को जन्म दिया. प्यार की यह निशानी अभी घुटनों के बल चलना सीख ही रही थी कि रवि एकाएक गायब हो गया.

2-3 दिन तो जैसेतैसे पार्वती ने उस के इंतजार में काटे, लेकिन जब रवि लौट कर नहीं आया तो उसे घबराहट होने लगी. जल्द ही उस ने पड़ोसियों और जानपहचान वालों को सच बता दिया, तो सभी ने उसे इस दगाबाज आशिक के खिलाफ थाने में जा कर रिपोर्ट लिखवाने का मशवरा दिया.

अब तक पार्वती को भी समझ आ गया था कि रवि ने उसे खूबसूरती से धोखा दिया है और गोद में नन्ही बच्ची थमा कर भाग गया है. लिहाजा, वह 10 अप्रैल, 2016 को इंदौर के राजेंद्र नगर थाने पहुंची और रवि के खिलाफ रिपोर्ट लिखा दी.

लेकिन बरबाद तो हुई

इस मामले में अहम बात यह है कि अब पार्वती का क्या होगा, जो एक बिनब्याही मां है? उसे कौन अपनाएगा? जाहिर है, कोई उसे सहारा नहीं देगा. अब पार्वती अकेली है और उसे अपने दम पर जिंदगी काटनी है और मासूम बेटी की परवरिश भी करनी है.

आशिक तरहतरह से अपनी माशूकाओं को ठगा करते हैं और धोखा दिया करते हैं या ऐसी दगाबाजियां करते हैं, जिन के बाद माशूका के पास सिवा पछताने के कुछ नहीं रह जाता. इस लिहाज से यह चिंता की बात जरूर है.

वजह, जिस्मानी ताल्लुकात बनाना बेहद आसान काम है, लेकिन बाद के अंजाम की चिंता या परवाह न करना बेवकूफी है, जिस में परेशानियां सिर्फ लड़की के हिस्से में आती हैं.

क्यों नहीं पार्वती जैसी लड़कियां अपना पेट गिरवा लेतीं? यह सवाल भी अहम है. आशिक के प्यार की निशानी को नाजायज तरीके से पेट में रखे रह कर पैदा करने की कोई तुक नहीं है. अपने दम पर बच्चे की परवरिश कर पाना कोई हंसीखेल नहीं है, वह भी उस सूरत में जब गांठ में पैसा या रोजगार न हो.

लड़कियां ज्यादा जज्बाती होती हैं और प्यार के दौरान ख्वाबोंखयालों में जीती रहती हैं, जिन्हें उन का आशिक चिकनीचुपड़ी बातें करते हुए और हवा देता रहता है, जिस से वे उस की बदनीयती न समझ पाएं.

क्या ऐसे आशिक वाकई प्यार करते हैं? इस सवाल का जवाब शायद ही कोई हां में दे. जिस की मंशा ही महज जिस्म हो, वह क्या खा कर साथ निभाएगा.

लड़कियों को प्यार करने से पहले अच्छी तरह सोच लेना चाहिए कि आज भी मर्दों का कुछ खास नहीं बिगड़ता, न ही उन के चालचलन या गलती पर कोई उन्हें कोसता या कुसूरवार ठहराता है. उलटे लड़की को ही कुलटा कहने वालों की फौज खड़ी हो जाती है.

पहचानें दगाबाजों को

फिर इस समस्या का हल क्या है, जिस से आशिक की नीयत का पता चल सके? हालांकि इस बात का कोई तयशुदा पैमाना नहीं है, फिर भी वक्त रहते कुछ एहतियात बरते जाएं, तो लड़कियां धोखा खाने से खुद को बचा सकती हैं:

* दगाबाज आशिक आमतौर पर बेरोजगार, निकम्मे और दिखावा करने वाले होते हैं. इन की एक खूबी चाशनी में डूबी प्यार भरी बातें करने की होती हैं. ये माशूका को सैक्स करने के लिए धीरेधीरे उकसाते रहते हैं.

* ये कभी किसी बात के लिए सीधे मना नहीं करते, इसलिए महबूबा इन से खुश रहती है और इस तरफ उस का ध्यान ही नहीं जा पाता कि जो हर बात में ‘हांहां’ कर रहा है, वह उन से ही अपनी बात बड़ी चालाकी से मनवा भी भी रहा है.

* दगाबाजी की पहली पहचान आशिक का यह कहना होता है कि सैक्स तो प्यार का हिस्सा है. इसे करने में कुछ गलत नहीं. आजकल तो सभी ऐसा करते हैं. फिर कुछ हुआ, तो मैं हूं न. क्या मुझ पर तुम्हें इतना भी भरोसा नहीं?

पर हकीकत में जब ऐसा कुछ हो जाता है, तो ये कहीं नहीं होते, बल्कि मुंह छिपा कर माशूका से भाग रहे होते हैं. थोड़ाबहुत डरें तो माशूका के पेट से हो जाने के बाद बच्चा गिराने का राग अलापने लगते हैं, पर यह आसान काम नहीं है.

डाक्टर और नर्सिंग होम वाले तमाम तरह के सवाल पूछते हैं और जरूरी खानापूरी करवाते हैं, इसलिए ये माशूका को उस के हाल पर छोड़ देते हैं. कई बार जब बात खुलती है, तो ये अपनी कारगुजारी से साफ मुकर भी जाते हैं.

जवानी में हमबिस्तरी की इच्छा आम है, पर इसे करने से पहले लड़कियों को आगेपीछे सोच लेना चाहिए कि अगर कंडोम या दूसरी सावधानियां नहीं बरतीं, तो लेने के देने पड़ सकते हैं. कई दफा जल्दबाजी में संबंध बन जाते हैं और नतीजा निकलता है पेट से होना, जिस का अंदाजा और तजरबा लड़कियों को नहीं रहता और जब पता चलता है, तो 2-3 महीने निकल चुके होते हैं. इस के बाद इतना ही वक्त क्या करें और कैसे करें, यह सोचने में कट जाता है. इस पर भी समाज का डर उन के मन में समाया रहता है.

अगर आशिक की मंशा दगा देने की नहीं है, तो वह घरपरिवार तो दूर की बात है, वाकई पहले अपने कहे मुताबिक जमाने से टकरा जाएगा. पर ऐसा अकसर होता नहीं है. होता यह है कि आशिक हाथ खड़े कर देता है कि अब तुम जानो और तुम्हारा काम जाने.

रवि जैसे आशिक तो महादगाबाज होते हैं, जो घर वालों के डर से चोरीछिपे माशूका को कहीं और ले जा कर पेट गिरवा देते हैं. चूंकि ऐसे आशिकों को माशूका और बच्चा बोझ लगने लगते हैं, इसलिए ये भाग जाते हैं. यह इन्हें समझ आ जाता है कि अब बच्चों से बंधी माशूका सिर्फ फड़फड़ा कर रह जाएगी और उस का कुछ खास नहीं बिगड़ेगा.

बात सच भी है, क्योंकि कानून ऐसी लड़कियों की ज्यादा मदद नहीं कर पाता और कोई उन्हें पनाह नहीं देता. लिहाजा, बच्चा गोद में लादे अपनी नामसमझी को कोसती और रोती माशूका सोचती रह जाती है कि कैसे एक नादानी के चलते अच्छीखासी जिंदगी बरबाद हो गई.

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