लीक से हट कर चुनें कैरियर

कभी सोचा है कि चाय का स्वाद ले कर खासा पैसा कमाया जा सकता है या परफ्यूम की खुशबू सूंघ कर कैरियर बनाया जा सकता है. पालतू जानवरों की ग्रूमिंग और पपेट्री में भी डिगरीडिप्लोमा हासिल किए जा सकते हैं. एक साइबर हैकर बनने के लिए भी डिप्लोमा कोर्स है. आजकल फ्यूनरल मैनेजमैंट से ले कर साइन लैंग्वेज तक के कोर्स कराए जा रहे हैं. सुनने में ये कोर्स भले ही अजीब लगते हों, लेकिन आज इन्हीं में कैरियर की बढ़ती मांग और पैसा है. यंग जैनरेशन के लिए लीक से हट कर ये कोर्स उन के कैरियर व समय को देखते हुए बैस्ट साबित हो रहे हैं.

एथिकल हैकिंग

हैकिंग ऐक्सपर्ट बन कर आप डिगरी और नौकरी दोनों पा सकते हैं. कई बड़ी कंपनियां एथिकल हैकर्स को सिक्योरिटी के लिए हायर करती हैं. एथिकल हैकर्स कंपनियों की आईटी इन्फौर्मेशन व डाटाबेस को सुरक्षित रखते हैं. सुरक्षा एजेंसियां हैकर्स द्वारा किसी अकाउंट को हैक करा कर गोपनीय जानकारियां इकट्ठा करती हैं. इस से उन्हें अपनी जांच को आगे बढ़ाने या सुबूत जुटाने में मदद मिलती है. इस सब को देखते हुए एथिकल हैंकिंग का कोर्स कैरियर के लिहाज से काफी अहम है.

हैकिंग द्वारा हैकर आप के कंप्यूटर या आप के संबंधित अकाउंट पर पूरी तरह से हावी हो जाता है. इस के बाद उसे आप के डाटा को चुराने या खत्म करने की आजादी मिल जाती है. वाईफाई इंटरनैट कनैक्शन से चलने वाले सिस्टम को हैक करना ज्यादा आसान होता है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कंप्यूटर में घुसपैठ की बढ़ती समस्या से निबटने के लिए एथिकल हैकिंग का नया कोर्स कैरियर के लिए विकल्प के तौर पर बेहतरीन मौका बन कर सामने आया है.

साइबर क्राइम का बढ़ना : आज इस कोर्स की जरूरत इसलिए भी है क्योंकि आएदिन साइबर क्राइम  होते रहते हैं. यह कोर्स नया है, इस के बारे में लोगों को कम जानकारी है. लेकिन इस के विशेषज्ञों की मांग लगातार बढ़ रही है. जैसेजैसे लोगों की निर्भरता इंटरनैट पर बढ़ती जा रही है, नैटवर्क सिक्योरिटी एक चुनौती बनती जा रही है. इस लिहाज से आने वाले दिनों में एथिकल हैकर्स की मांग उम्मीद से कहीं ज्यादा होगी. हर कंपनी अपने डाटा को सुरक्षित रखने या प्रतिद्वंद्वी कंपनी की रणनीति को समझने के लिए एथिकल हैकर्स रखने लगी है.

क्या है नया : एथिकल हैकिंग

कोर्स में इंटरनैट से संबंधित तमाम चीजों के बारे में सिखाया जाता है. इस से संबंधित कोर्स में सिक्योरिटी टैस्टिंग की कार्यप्रणाली, स्निफिंग, प्रीविलेज एस्कलेशन, हैकिंग, अटैकिंग नैटवर्क वर्क सिस्टम, हैकिंग वैब ऐप्लिकेशन, क्रौस साइट स्क्रिप्टिंग, ब्रेकिंग आईपी, सिस्टम हैकिंग, पासवर्ड क्रैकिंग आदि से संबंधित जानकारी दी जाती है.

स्पा मैनेजमैंट

जब से लोगों ने अपनी हैल्थ और फिटनैस पर ध्यान देना शुरू किया है, स्पा बिजनैस में काफी बूम आया है. अब थ्रीस्टार और फाइवस्टार हौस्पिटैलिटी के कई स्पा खुल गए हैं. लिहाजा, ऐक्सपर्ट स्पा मैनेजरों की मांग बढ़ गई है. इन का काम पूरे स्पा को बेहतर तरीके से संभालना होता है. एक स्पा मैनेजर को स्टाफ पर नजर रखने के अलावा और्डर की सप्लाई, क्लाइंट्स को अच्छी सर्विस देने व स्पा में अधिक से अधिक लोगों को सर्विस लेने के लिए आने को प्रोत्साहित करना होता है. इस के अलावा, वह स्पा के लिए कुछ मार्केटिंग ऐक्टिविटीज व मार्केटिंग प्लानिंग्स में भी हिस्सा लेता है.

स्किल्स : आप का कंप्यूटरसेवी होने के साथ स्ट्रौंग कम्युनिकेशन स्किल व इंटरपर्सनल स्किल भी बेहतर होनी चाहिए. इतना ही नहीं, आप को पूरे स्पा को मैनेज करना होता है, इसलिए आप के भीतर और्गनाइजेशन स्किल भी अच्छी होनी चाहिए. आप को न सिर्फ अपने यहां कार्यरत लोगों की क्षमताओं को पहचानना आना चाहिए, बल्कि उन की क्षमताओं के हिसाब से उन से बेहतर काम करवाना भी आना चाहिए.

संभावनाएं : एक स्पा मैनेजर पार्टटाइम, फुलटाइम या कौन्ट्रैक्ट के आधार पर भी काम कर सकता है. स्पा मैनेजर की आवश्यकता होटल, रिसौर्ट, हैल्थ क्लब, क्रूज शिप या चिकित्सकीय सैलून आदि में होती है. एक स्पा मैनेजर विदेशों में जौब के लिए भी अप्लाई कर सकता है.

फोटोनिक्स

फोटोनिक्स का कोर्स आम साइंस के कोर्सों से हट कर है. जब से टैली कम्युनिकेशन का क्षेत्र बढ़ा है तब से कंप्यूटिंग, सिक्योरिटी समेत और भी कई कार्यप्रणालियों में फोटोनिक्स मुख्य तकनीक बन गई है. इस तकनीक का इस्तेमाल इमेजिंग, चिकित्सा व स्वास्थ्य सेवा, प्रतिरक्षा, औप्टिक्स व इलैक्ट्रौनिक्स, बायोटैक्नोलौजी,  चिकित्सा विज्ञान, सर्जरी, माइक्रोबायोलौजी और लाइफसाइंस में भी होता है.

कैसे मिलेगी ऐंट्री : देश के कई प्रमुख शिक्षण संस्थान फोटोनिक्स कोर्स की शिक्षा देते हैं. भौतिकी, रसायन और गणित विषय के साथ 12वीं की परीक्षा न्यूनतम 50 फीसदी अंकों के साथ उत्तीर्ण कैंडिडेट्स फोटोनिक्स ऐंड औप्टोमेट्रिक्स के ग्रेजुएशन कोर्स में प्रवेश ले सकते हैं.

इस के अलावा, आप डिप्लोमा कोर्स में भी एंट्री ले सकते हैं. डिप्लोमा कोर्स करने के बाद आप फोटोनिक्स टैक्नीशियन बन सकते हैं. वैसे द्विवर्षीय टैक्नीशियन प्रोग्राम के जरिए भी फोटोनिक्स टैक्नीशियन बना जा सकता है.

पर्सनल स्किल : यदि आप इस में कैरियर बनाना चाहते हैं तो जरूरी है कि इस क्षेत्र में होने वाली नईनई गतिविधियों पर सतत निगाह रखें और ज्यादा से ज्यादा सीखने की कोशिश करें. आप की फिजिक्स व मैथमेटिक्स अच्छी होनी चाहिए. इस में इंस्ट्रूमैंट डिजाइन करने पड़ते हैं, लिहाजा क्रिएटिव होना भी जरूरी है.

कहां है नौकरी : इस क्षेत्र के विशेषज्ञ साइंटिस्ट के तौर पर भी काम कर सकते हैं. उन्हें फोटोनिक्स पर शोध का काम करना होता है. फोटोनिक्स इंजीनियर चाहें तो किसी अनुभवी इंजीनियर के सहायक बतौर अपना कैरियर शुरू कर सकते हैं. योग्यता और अनुभव के आधार पर आप आगे चल कर रिसर्च डायरैक्टर या प्रिंसिपल इंजीनियर भी बन सकते हैं.

कहां से करें : इंडियन इंस्टिट्यूट औफ टैक्नोलौजी, मुंबई, नई दिल्ली, मणिपाल एकेडमी औफ हायर एजुकेशन, इंटरनैशनल स्कूल औफ फोटोनिक्स, कोचीन, सैंटर फौर एडवांस टैक्नोलौजी (केट), इंदौर, भाभा एटौमिक रिसर्च सैंटर, मुंबई, इंडियन इंस्टिट्यूट औफ साइंस, बेंगलुरु आदि संस्थानों से यह कोर्स किया जा सकता है.

पपेट्री

राजस्थान की लोककथाओं से निकल कर अब पपेट शो मौडर्न रंगढंग में रंग गए हैं. लगातार सरकारी उपेक्षा व उचित स्थान न मिलने के कारण यह कला धीरेधीरे लुप्त होने के कगार पर थी. लेकिन कई युवा थिएटर कलाकारों और कलाप्रेमियों ने इस कला को मौडर्न व एक कोर्स के रूप में शुरू करने का प्रयास किया है ताकि यह कला जिंदा रहे. इसे सीखने में सिर्फ उसी का मन रम सकता है जिस में क्रिएटिविटी हो और हर चीज को अलग नजरिए से देखता हो. किड्स इंटरटेनमैंट चैनलों और विज्ञापन एजेंसियों में इन की मांग हमेशा रहती है. लिज्जत पापड़ का वह खरगोश आज भी लोगों को याद है, वह पपेट का पहला विज्ञापन प्रयोग था.

कहां से करें : मुंबई यूनिवर्सिटी और कोलकाता पपेट थिएटर पपेट्री में सर्टिफिकेट कोर्स कराते हैं.

टी टेस्टिंग

अगर चाय पीने के शौकीन हैं तो टी टैस्टर बनना आप के लिए अच्छा कैरियर औप्शन हो सकता है. टी टैस्टर का काम अलगअलग चाय के स्वादों में अंतर समझना और टीलीफ, ग्रेड्स, कलर के बारे में जानकारी हासिल करना होता है. बेंगलुरू का इंडियन इंस्टिट्यूट औफ प्लांट मैनेजमैंट अपने सर्टिफिकेट कोर्स के जरिए टी मार्केटिंग, टी बिजनैस, टी टैस्टिंग तकनीक के बारे में विद्यार्थियों को जानकारी देता है और डिप्लोमा व डिगरी दोनों कोर्स कराता है. यह कोर्स टी बोर्ड और वाणिज्य मंत्रालय के सहयोग से कराया जाता है. असम का डिप्रास इंस्टिट्यूट औफ प्रोफैशनल्स भी डिगरीडिप्लोमा कोर्स कराता है.

इमेज कंसल्टिंग

आप को ग्लैमर इंडस्ट्री के प्रति लगाव है तो इमेज कंसल्टैंट के तौर पर अपना कैरियर बना सकते हैं. फैशन और कम्युनिकेशन डिगरी से मिलतेजुलते इस सर्टिफिकेट कोर्स के जरिए आप को कौर्पोरेट और फिल्म इंडस्ट्री में बड़ी आसानी से हाईप्रोफाइल जौब मिल सकता है. इस कोर्स में आप को इमेज, स्टाइल, एटिकेट, कंडक्ट, लैंग्वेज और बिहेवियर जैसे जरूरी टौपिक्स के बारे में ट्रेनिंग दी जाती है और फिर आप टौप पर्सनैलिटीज की इमेज बनाने में उन की मदद करते हैं.

पैट ग्रूमिंग

आप पैसा कमाने के साथ यदि जानवरों के साथ भी कुछ वक्त बिताना चाहते हैं तो पैट ग्रूमिंग में कैरियर बना सकते हैं. आजकल लोग अपने पालतू जानवरों की देखभाल के पीछे काफी पैसा खर्च करने को तैयार हैं. लोग ऐसे प्रोफैशनल्स की तलाश में रहते हैं जो उन के पैट्स को अच्छी तरह से शेप में रखें. साथ ही, पैट शोज और कंपीटिशंस भी काफी बढ़ गए हैं, इस को देखते हुए भी पैट ग्रूमर्स की डिमांड बढ़ गई है. यही वजह है कि कई वेटेरिनरी कालेज और टौप ग्रूमिंग इंस्टिट्यूट में इस के डिगरी कोर्सेज उपलब्ध हैं.

म्यूजिओलौजी

जिन की रुचि हिस्ट्री में है या जिन का दिमाग हमेशा एंटीक चीजों की तलाश व जानकारी जुटाने में लगा रहता है, म्यूजिओलौजी स्टडी उन के कैरियर के लिए बहुत अच्छा कदम साबित होगी. इस में आर्कियोलौजी, म्यूजियम मैनेजमैंट ऐंड कल्चर की जानकारी दी जाती है. नैशनल म्यूजियम इंस्टिट्यूट औफ हिस्ट्री ऐंड आर्ट, कन्वर्सेशन ऐंड म्यूजिओलौजी, नई दिल्ली कई कोर्स चलाते हैं. कोलकाता यूनिवर्सिटी भी एमए और एमएससी की डिगरी देती है.

बैचलर औफ रूरल स्टडी

भारत की आधी से ज्यादा आबादी जहां रहती है और आप उस से प्यार करते हैं तो बैचलर औफ रूरल स्टडी का कोर्स आप के लिए सब से अच्छा साबित होगा. इस कोर्स में एग्रीकल्चर, चाइल्ड डैवलपमैंट, रूरल मैनेजमैंट, कम्युनिटी डैवलपमैंट आदि विषय शामिल रहते हैं. गुजरात, उत्तर प्रदेश के कालेज डिप्लोमा कोर्स कराते हैं. भावनगर, यूनिवर्सिटी रूरल स्टडी में बैचलर और मास्टर डिगरी भी देती है.

जेरैंटोलौजी

उम्र बढ़ने पर साइकोलौजिकल और बायोलौजिकल क्या प्रभाव होते हैं, जेरैंटोलौजी में इस का अध्ययन किया जाता है. कई ओल्डएज होम और प्राइवेट व सरकारी हैल्थ सैक्टर्स में ऐसे पेशेवरों की मांग रहती है. आज कई ऐसे नर्गिंसहोम और हौस्पिटल हैं जो बुजुर्ग के इलाज और केयर के लिए जेरैंटोलौजी में डिगरी लेने वाले की तलाश में रहते हैं. इंस्टिट्यूट औफ होम इकोनौमिक्स नई दिल्ली, राम नारायण रुइया कालेज मुंबई, कोलकाता मैट्रोपोलिटन इंस्टिट्यूट औफ जेरैंटोलौजी में डिगरी और सर्टिफिकेट कोर्स करवाते हैं.

चुनाव और फेसबुक व्हाट्सऐप

फेसबुक ने भारतीय चुनाव आयोग को भरोसा दिलाया है कि अगले चुनावों से पहले वह फेक यानी झूठी खबरों को रोकने की पूरी कोशिश करेगा. इस तरह के छद्म समाचार को फेसबुक एक खास एल्ग्रोथिम के जरिए अपनेआप रोक देगा, उन्हें फौरवर्ड नहीं होने देगा. सोशल मीडिया के दूसरे अहम माध्यम व्हाट्सऐप ने भी इसी तरह का भरोसा दिलाया है.

फेक न्यूज यानी झूठी खबरें या कहें अफवाहें दुनियाभर की चिंता का विषय बन गई हैं. विचारों की स्वतंत्रता पर हमेशा ही झूठी खबरें या झूठे तथ्य देने पर अंकुश रहा है. जो स्वतंत्रता के हामी हैं उन्होंने भी कभी दुर्भावनाभरी बातों को प्रसारित करने का समर्थन नहीं किया.

पहले छपाई की सुविधा आसानी से उपलब्ध नहीं थी. फेक न्यूज केवल अफवाहों के जरिए कानों से कानों तक पहुंचाई जा सकती थी. उस समय छपी सामग्री जिम्मेदार लोगों के हाथों में रहती थी. हर कोई प्रैस या छापाखाना स्थापित कर फेक न्यूज वाला अपना अखबार नहीं निकाल सकता था.

अब तो घर में बैठ कर ही पटियाला या प्लानीपट्टम में हुई मारपीट का वीडियो बनाया जा सकता है. लेटिन अमेरिकी फिल्मों के दृश्यों को कई बार आसानी से मार्फिंग और फोटोशौप के जरिए उन्हें भारतीय पृष्ठभूमि में बदल कर मुसलिमों द्वारा हिंदुओं पर किए जा रहे अत्याचार के रूप में दर्शाया जा सकता है.

जो लोग सदियों से पौराणिक झूठी खबरों पर विश्वास कर रहे हैं, जिन में प्रधानमंत्री से ले कर अधिकांश मंत्री शामिल हैं, वे इस तरह की फेक न्यूज पर विश्वास कर लेते हैं. तर्क शब्द तो उन की भाषा में है ही नहीं. वे तो विश्वास करते हैं कि मेढकमेढकी की शादी करा कर बारिश कराई जा सकती है या सर्जरी से हाथी का सिर आदमी पर लगाया जा सकता है और फिर उसे चूहे पर सवारी कराई जा सकती है.

उन्हीं लोगों ने फेक न्यूज का जम कर प्रचार किया है क्योंकि वे उस का लाभ उठाना जानते हैं और उठा भी रहे हैं. फेसबुक और व्हाट्सऐप ने अगर इन्हें बंद कर दिया तो जान लीजिए कि ये दोनों सोशल मीडिया के स्तंभ समाप्तप्राय हो जाएंगे.

तर्क की बात सुनने की व सत्य सहने की ताकत और बुद्धि भारतीयों में है ही नहीं. जो थोड़ी बहुत 1950 और 1960 के दशकों में दिखी थी वह अब तक गंगा के पानी की तरह जहरीली हो गई है. ऐसे में यह कहना गलत न होगा कि फेसबुक और व्हाट्सऐप का अंत अब निकट ही है.

केजरीवाल बनाम मोदी : कोर्टों में लड़ाई

जब से ‘आप’ के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने हैं, तब से उन्होंने दिल्ली वालों के हकों की लड़ाई लड़ने में कसर नहीं छोड़ी है. आज आलम यह है कि वे दिल्ली में मुख्यमंत्री की ताकत को बढ़वाने के लिए उपराज्यपाल के साथसाथ केंद्र सरकार से भी लोहा ले रहे हैं.

दरअसल, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिला हुआ है. ऐसे में इस आधेअधूरे राज्य को ले कर कुछ फैसले लेने का हक केंद्र सरकार के पास है तो कुछ राज्य सरकार के पास.

जब तक अरविंद केजरीवाल की पार्टी के चुनाव चिह्न ‘झाड़ू’ ने दिल्ली से कांग्रेस के ‘हाथ’ और भारतीय जनता पार्टी के ‘कमल’ को पिछले विधानसभा चुनाव में बुहारा नहीं था, तब तक यहां इस तरह की नौबत नहीं आई थी कि बागडोर उपराज्यपाल के हाथ में है या मुख्यमंत्री के हाथ में, क्योंकि दोनों एक ही पार्टी के होते थे.

असली घमासान तभी शुरू हो गया था जब साल 2014 में दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से 67 सीटें जीत कर अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने सीना तान कर विधानसभा में ऐंट्री मारी थी.

लोकसभा चुनावों के कुछ महीनों बाद ही अरविंद केजरीवाल ने नरेंद्र मोदी के माथे पर काला टीका जड़ दिया था. तभी से केंद्र सरकार की शह पर उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री में ‘दिल्ली का बौस कौन ’की लड़ाई का बिगुल बज गया था.

खेल मानहानि का

इस अदालती खेल की शुरुआत कांग्रेस ने की थी. साल 2013 में दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकी शीला दीक्षित के राजनीतिक सचिव पवन खेड़ा ने अरविंद केजरीवाल पर केस किया था.

इस मामले पर तब अरविंद केजरीवाल ने खुद को बेकुसूर बताते हुए दलील दी थी कि पवन खेड़ा पीडि़त शख्स नहीं हैं और उन के खिलाफ शिकायत गलत है. पवन खेड़ा के पास यह मामला दर्ज करने का कोई हक नहीं है. शिकायत करने वाले पवन खेड़ा न तो कांग्रेस पार्टी के सदस्य हैं, न ही उन्होंने शीला दीक्षित के साथ अपने संबंधों का साफतौर पर खुलासा किया है.

साल 2013 में ही अमित सिब्बल ने भी अरविंद केजरीवाल पर मानहानि का केस कर दिया था. केजरीवाल ने उन पर आरोप लगाया था कि उन्होंने एक दूरसंचार कंपनी की पैरवी करने के लिए अपने पिता कपिल सिब्बल के पद का फायदा उठाया था.

साल 2014 में अरविंद केजरीवाल ने भाजपा के दिग्गज नेता नितिन गडकरी को भारत के सब से भ्रष्ट नेताओं की लिस्ट में शुमार किया था. साथ ही, उन्होंने अरुण जेटली पर भी दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन में हो रही धांधली में चुप्पी साधे रहने पर सवाल उठाए थे. उन का कहना था कि उन की नाक के नीचे भ्रष्टाचार हुआ था और उन्होंने कुछ नहीं किया.

अरविंद केजरीवाल ने ऐसे जो भी आरोप लगाए थे उन में उन के खिलाफ मानहानि के केस दर्ज करा दिए गए थे. बाद में उन्हें एहसास हुआ कि इस तरह के मसलों में उलझे रहने से वे बतौर मुख्यमंत्री दिल्ली की जनता की भलाई के काम नहीं कर पाएंगे और साथ ही उन की इमेज पर भी बुरा असर पड़ रहा था. लिहाजा, इन केसों से नजात पाने के लिए उन्होंने संबंधित नेताओं से बात करना शुरू किया.

आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज ने इस मसले पर बताया कि ये मानहानि के मामले हमारे राजनीतिक विरोधियों द्वारा हमें कमजोर करने और हमारे नेतृत्व को इन कानूनी मामलों में उलझाए रखने के लिए दर्ज कराए गए हैं. सभी मामलों को आपसी सहमति से सुलझाने का फैसला पार्टी की लीगल टीम की सलाह पर लिया गया.

दूसरों को भी तंग किया

जब अरविंद केजरीवाल या उन की पार्टी के दूसरे नेताओं ने मानहानि के मुकदमों में माफी मांगी तो पहली नजर में लगा कि वे हार गए हैं. उन्होंने केवल चर्चा में बने रहने के लिए ये मामले उछाले थे ताकि भ्रष्टाचार की परतें उघाड़ने के नाम पर दिल्ली की जनता की वाहवाही लूट सकें.

लेकिन माफी मांग कर अरविंद केजरीवाल ने सियासत में लंबे समय तक टिके रहने का टिकट पा लिया था क्योंकि मानहानि के किसी भी केस में अगर कोई कोर्ट उन्हें सजा सुना देती तो शायद उन का राजनीतिक कैरियर ही खत्म हो जाता.

लेकिन भारतीय जनता पार्टी को कहां चैन था. साल 2016 में ‘आप’ के विधायक सोमनाथ भारती के खिलाफ पुलिस ने मामला दर्ज किया था. इस से पहले विधायक संदीप कुमार और अमानतुल्ला खान पर भी मामला दर्ज किया था.

विधायक सोमनाथ भारती पर एम्स के चीफ सैक्रेटरी ने मामला दर्ज कराया था. उन्होंने सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और एम्स के चीफ सिक्योरिटी अफसर को धमकाने का आरोप लगाया था.

साथ ही, उन्होंने यह भी कहा था कि विधायक ने बिना किसी सरकारी आदेश के जेसीबी मशीन से जबरन एम्स का गेट तुड़वाने की कोशिश की.

दरअसल, दिल्ली पुलिस की बागडोर दिल्ली सरकार के हाथ में नहीं है. यह केंद्र सरकार के अधीन है और अरविंद केजरीवाल की सरकार ने बारबार जनता को यह बताने की कोशिश की थी कि चूंकि भाजपा सरकार का उन पर बस नहीं चलता है, लिहाजा वह उन के विधायकों को तंग करने के मकसद से पुलिस में मामले दर्ज करा कर उन के हौसलों को तोड़ना चाहती है.

इसी तरह दिल्ली के प्रमुख सचिव अंशु प्रकाश के साथ तथाकथित मारपीट के आरोप में आम आदमी पार्टी के ओखला के विधायक अमानतुल्ला खान और देवली से विधायक प्रकाश जारवाल को गिरफ्तार कर 14 दिनों की हिरासत में भेज दिया था.

इस मसले पर दिल्ली पुलिस के वकील की दलील थी कि जांच जारी रहने तक उन विधायकों को जमानत न दी जाए. बाद में कोर्ट ने विधायकों की याचिका रद्द कर उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया था.

आम आदमी पार्टी ने इस केस के सिलसिले में आरोप लगाया था कि दिल्ली पुलिस ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सलाहकार बीके जैन पर बयान बदलने का दबाव बनाया था. बीके जैन को हिरासत में ले कर पूछताछ के बाद छोड़ दिया गया था.

आम आदमी पार्टी के लिए सब से बड़ा मामला लाभ के पद पर बैठे विधायकों की लड़ाई से जुड़ा था कि लाभ के पद के मामलों में चुनाव आयोग ने विधायकों की मान्यता रद्द कर दी थी. इस पर विपक्ष खासकर भारतीय जनता पार्टी ने जम कर चुटकी ली थी और इसे मीडिया की सुर्खियां बना दिया था.

पर आप वालों ने हिम्मत नहीं हारी और हाईकोर्ट में याचिका दे दी. दिल्ली हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग की सिफारिश को खारिज करते हुए निर्देश दिया कि विधायकों की अयोग्यता पर फिर से विचार किया जाए.

हाईकोर्ट के इस फैसले पर खुशी जाहिर करते हुए तब अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर मैसेज किया था, ‘सत्य की जीत हुई. दिल्ली के लोगों द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों को गलत तरीके से बरखास्त किया गया था. दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली के लोगों को न्याय दिया. दिल्ली के लोगों की बड़ी जीत.’

दरअसल, मार्च 2015 में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाया था, जिस के बाद विपक्ष ने विधायक रहते हुए इन्हें लाभ का पद देने का आरोप लगाया था. हाईकोर्ट ने उन के 20 विधायकों को राहत दी थी.

उलझे उपराज्यपाल

भारतीय जनता पार्टी पिछले 3 साल से उपराज्यपाल के मारफत दिल्ली पर राज करना चाहती है ताकि अरविंद केजरीवाल को निकम्मा साबित कर सके.

अरविंद केजरीवाल सुप्रीम कोर्ट से 3 चीजें चाहते हैं जो अगर मिल जाएं तो केजरीवाल के मुताबिक दिल्ली में गवर्नेंस नए लैवल पर दिखाई देगी. वे 3 चीजें इस तरह हैं:

सलाह : इस शब्द पर दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार में लंबी लड़ाई चली है. दरअसल, संविधान का एक आर्टिकल 239ए है. इस के तहत दिल्ली में विधानसभा, मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल की व्यवस्था की गई है.

इस में ही एक हिस्सा है आर्टिकल 239एए (4). इस में लिखा गया है कि दिल्ली में उपराज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर काम करेंगे, पर पूरे कानून में यह कहीं पर नहीं लिखा है कि चुने हुए मुख्यमंत्री की सलाह मानना उपराज्यपाल के लिए जरूरी है या नहीं.

दूसरे राज्यों में वहां के राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह मानने को बाध्य होते हैं, पर दिल्ली में ऐसा नहीं है.

दिल्ली हाईकोर्ट ने भी कहा है कि उपराज्यपाल जरूरत पड़ने पर मुख्यमंत्री या मंत्रिमंडल की सलाह ले सकते हैं, पर सलाह मानने को बाध्य नहीं हैं.

अरविंद केजरीवाल चाहते हैं कि कुछ विषयों को छोड़ कर उपराज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह मानने को बाध्य हों, ताकि दिल्ली में चुनी हुई सरकार अपने हिसाब से काम कर सके.

सर्विसेज : दिल्ली की केजरीवाल सरकार के पास किसी भी कार्मचारी या अधिकारी की ट्रांसफरपोस्टिंग का अधिकार नहीं है क्योंकि केंद्र सरकार ने नोटिफिकेशन जारी कर के इस को केंद्र सरकार का विषय बताया था. बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस पर अपनी मुहर लगा दी थी.

केजरीवाल सरकार कहती है कि शीला दीक्षित के समय में सर्विसेज विभाग चुनी हुई सरकार के पास था लेकिन केंद्र ने केजरीवाल सरकार से यह अधिकार छीन लिया, जिस से एक अधिकारी या कर्मचारी पर चुनी हुई सरकार का कंट्रोल खत्म हो गया है.

एंटी करप्शन ब्रांच : अरविंद केजरीवाल और उन की आम आदमी पार्टी का उदय ही भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के मुद्दे पर हुआ था, तभी तो सरकार में आने के बाद अरविंद केजरीवाल ने अपनी एंटी करप्शन ब्रांच के लिए भ्रष्टाचार पर कार्यवाही शुरू की और बड़ी तेजी से केस दर्ज किए लेकिन जून, 2015 में उपराज्यपाल ने अपनी पसंद के अधिकारी को एंटी करप्शन ब्रांच में नियुक्त कर दिया जिस से केजरीवाल का यह बड़ा हथियार उन के हाथ से निकल गया.

जहां तक सर्विसेज की बात है तो अरविंद केजरीवाल ने यहां तक कहा कि आईएएस अफसर तो एक तरह से हड़ताल पर चले गए हैं और इसी सिलसिले पर वे 11 जून, 2018 को उपराज्यपाल से मिलने उन के दफ्तर गए थे. तब दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने सोशल मीडिया पर अपनी 3 मांगों को गिनाया था.

मनीष सिसोदिया ने कहा था कि वे हड़ताल के बारे में उपराज्यपाल से 5 बार मिले लेकिन उन्होंने इसे खत्म कराने के लिए कुछ नहीं किया.

गौरतलब है कि मुख्य सचिव अंशु प्रकाश पर अरविंद केजरीवाल के आवास पर फरवरी, 2018 में हुए तथाकथित हमले के बाद से दिल्ली सरकार और नौकरशाही के बीच तीखी तकरार चल रही थी.

जब यह मामला सुलझने के बजाय उलझता चला गया तो 11 जून, 2018 को अरविंद केजरीवाल और उन की कैबिनेट के कुछ सदस्यों ने उपराज्यपाल अनिल बैजल से राजनिवास पर मुलाकात की और मनीष सिसोदिया द्वारा बताई गई अपनी तीनों मांगों के स्वीकार होने तक उन के दफ्तर में बैठे रहने का फैसला किया.

उसी दिन शाम के 6 बजे अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया के जरीए अपनी बात जनता के सामने रखते हुए कहा कि उन्होंने उपराज्यपाल अनिल बैजल को एक चिट्ठी सौंपी. उपराज्यपाल ने कार्यवाही करने से इनकार कर दिया.

अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन और गोपाल राय के इस धरने पर उपराज्यपाल अनिल बैजल ने कहा कि अधिकारी किसी हड़ताल पर नहीं हैं और उन्होंने मुख्यमंत्री को विश्वास का माहौल बनाने और नौकरशाही की वास्तविक समस्याओं को हल करने की सलाह दी.

लेकिन अरविंद केजरीवाल राजभवन से टस से मस न हुए. धरने के चौथे दिन उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री को भी इस आरपार की लड़ाई में शामिल कर लिया.

इस मुद्दे पर उन्होंने नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी कि उपराज्यपाल हमारी बातें नहीं सुन रहे हैं. मैं आप से अपील करता हूं कि आप इस मामले में दखल दें और पिछले 3 महीने से जो आईएएस अधिकारियों की हड़ताल जारी है उसे खत्म कराएं.

उपराज्यपाल के निवास पर मुख्यमंत्री का धरना हो और सियासत न गरमाए, ऐसा हो नहीं सकता. आम आदमी पार्टी के नेता और राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने कहा कि आईएएस अधिकारी और उपराज्यपाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कठपुतली हैं.

दिल्ली में विपक्ष के नेता भाजपाई बिजेंद्र गुप्ता ने अरविंद केजरीवाल के इस धरने पर निशाना साधते हुए कहा, ‘‘वे लोग एयरकंडीशंड कार्यालय में धरने पर बैठे हुए हैं और बाहर उन्हें स्वादिष्ठ भोजन दिया जा रहा है, जबकि दिल्ली के लोग पानी की समस्या से जूझ रहे हैं. यह काम से भागने का एक नया तरीका है.’’

धरने का यह हाई वोल्टेज ड्रामा

9 दिनों तक चला. 4 जुलाई, 2018 को अपने ऐतिहासिक फैसले में जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपराज्यपाल दिल्ली में फैसला लेने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं. उपराज्यपाल को कैबिनेट की सलाह के अनुसार ही काम करना होगा.

इस के अलावा सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना मुमकिन नहीं है.

इस फैसले के बाद अरविंद केजरीवाल ने कहा कि यह दिल्ली के लोगों और लोकतंत्र की जीत है.

इस के उलट केंद्र सरकार में केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने इस मुद्दे पर ब्लौग लिख कर केजरीवाल सरकार को जवाब दिया. उन्होंने लिखा कि इस फैसले को किसी एक की जीत और दूसरे की हार के तौर पर नहीं देखना चाहिए. दिल्ली सरकार के अधिकार क्षेत्र में पुलिस नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में न तो किसी की शक्तियों को बढ़ाया है और न ही किसी की शक्तियां पहले की तुलना में कम की हैं.

अब देखना यह होगा कि आने वाले समय में कौन कहलाएगा दिल्ली का असली सर्वेसर्वा.

फिल्म ‘मुल्क’ की रिलीज पर कोर्ट ने लगाई रोक

मुंबई की एक सेशन कोर्ट ने फिल्म ‘मुल्क’ की रिलीज पर फिलहाल रोक लगा दी है. ऋषि कपूर और तापसी पन्नू स्टारर ये फिल्म 3 अगस्त को रिलीज होनी है. कोर्ट ने याचिकाकर्ता वंदना पुनवानी की याचिका पर सुनवाई के दौरान ये रोक लगाई. वंदना ने आरोप लगाए है कि फिल्म बनाने में सहयोगी इंटरटेंटमेंट एजेंसी बनारस मीडिया वर्क्स लिमिटेड ने उनकी प्रापर्टी का फिल्म बनाने में प्रयोग किया था. इस कंपनी ने अब बत उनकी प्रापर्टी का किराया नहीं चुकाया है.

याचिकाकर्ता ने कहा नहीं दिया किराया

याचिका कर्ता ने मांग की है कि जब तक बनारस मीडिया वर्क्स लिमिटेड से प्रापर्टी के किराए से संबंधित विवाद सुलझ नहीं जाता तब तक फिल्म की रिलीज पर रोक लगायी जानी चाहिए. याचिका कर्ता के अनुसार एजेंसी ने वर्ष 2011 में उनका बंगला किराए पर लिया था. इस बंगले को वो औफिस के तौर पर प्रयोग करना चाहते थे. लेकिन स्थानीय निकाय की ओर से उन्हें रेजिडेंशियल प्रापर्टी को कौमर्शियल प्रापर्टी के तौर पर प्रयोग करने की अनुमति नहीं दी. ऐसे में इस एजेंसी ने कराया देने से इनकार कर दिया.

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याचिकाकर्ता ने मांगे 50 लाख रुपये

याचिकाकर्ता ने वर्ष 2016 में डिंडोशी सत्र अदालत में अपील कर किराया दिलाए जाने की मांग की थी. उन्होंने इस बंगले का किराया लगभग 50 लाख रुपये के करीब मांगा है. पुनवानी ने महीने की शुरुआत में ही याचिका दाखिल कर विवाद सुलझने के पहले फिल्म की रिलीज को रोकने की मांग की है. एडिशनल सेशन जज एमएच शेख ने सोमवार को याचिका की सुनवाई के दौरान फिल्म की रिलीज पर आंतिरिक रोक लगाने का निर्देश दिया है. इस मामले में अगली सुनवाई 2 अगस्त को होनी है.

निदेशक ने कहा अभी नहीं मिले आदेश

फिल्म के निदेशक अनुभव सिन्हा के वकील विभव कृष्णा के अनुसार पुनवानी ने गलत आरोप लगाए हैं कि ‘बनारस मीडिया वर्क्स लिमिटेड’ के मुल्क के निदेशक अनुभव सिन्हा से संबंध हैं. हमें फिल्म पर रोक लगाए जाने के न्यायालय के आदेश की कौपी मिलते ही हम इसे मुम्बई हाई कोर्ट में चुनौती देंगे. न्यायालय के इस आदेश पर फिल्म के निदेशक अनुभव सिन्हा ने कहा कि हमें फिलहाल फिल्म पर रोक लीगाने के आदेश की कौपी नहीं मिली है.

फातिमा और सान्या ने किया ‘दिलबर’ पर जोरदार डांस

सुपरस्टार आमिर खान की फिल्‍म ‘दंगल’ से अपने फिल्मी सफर की शुरुआत करने वाली अदाकारा फातिमा सना शेख और सान्या मल्होत्रा इन दिनों अपने डांस वीडियो को लेकर सुर्खियों में हैं. फिल्म में दोनों ने गीता और बबीता का रोल अदा किया था. फिल्म को काफी समय हो गया लेकिन इन दोनों की दोस्ती अभी भी कायम है.

इन्हें अक्सर आमिर खान के साथ या फिर एक-दूसरे के साथ क्वालिटी टाइम स्पेंड करते हुए देखा जाता है. अखाड़े में दंगल करने वाली ये अभिनेत्रियां असल जिंदगी में बेहतरीन डांसर हैं, इसका अंदाजा आप सान्या और फातिमा के इन ताजा वीडियो से लगा सकते हैं.

सोशल मीडिया प्लैटफौर्म इंस्टाग्राम पर इन्होंने अपने इन डांस वीडियो को शेयर किया है. वीडियो में दोनों ही ऐक्ट्रेस ‘सत्यमेव जयते’ के सुपरहिट ट्रैक ‘दिलबर’ पर डांस करती नजर आ रही हैं. सान्या के अलावा फातिमा ने भी अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर वीडियो शेयर किया है जिसमें दोनों एक साथ डांस करती नजर आ रही हैं.

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सान्या और फतिमा ने इसी गाने के चार और वीडियो भी जारी किए हैं. वीडियो में दोनों कोरियोग्राफर शाजेब शेख के साथ थिरक रही हैं.

बता दें, ‘दंगल’ से मिली पौपुलैरिटी के बाद सान्या और फातिमा बौलीवुड में अपने पैर जमा रही हैं. फातिमा जल्द ही आमिर खान स्टारर फिल्म ‘ठग्स औफ हिंदोस्तान’ में नजर आएंगी. जबकि सान्या मल्होत्रा अभिनेता आयुष्मान खुराना के साथ फिल्म ‘बधाई हो’ में दिखाई देंगी.

मौत की गुफा से बच्चों को जिंदा निकाला

23 जून, 2018 का दिन थाईलैंड वाले कभी भूल नहीं पाएंगे. इसी दिन 11 से 16 साल के थाईलैंड की अंडर-16 फुटबाल टीम के 12 लड़के अपने कोच समेत उत्तरी थाईलैंड की थामलुआंग गुफा में क्या घुसे कि वहीं फंस कर रह गए.

दरअसल, 23 जून, 2018 की शाम को फुटबाल की प्रैक्टिस करने के बाद वे सब घर लौट रहे थे कि उन का गुफा देखने का मन बन गया.

जब वे सब अपनेअपने घर नहीं पहुंचे तो एक लड़के की मां ने अपने बेटे के लापता होने की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज कराई.

24 जून, 2018 को वहां के लोकल अफसरों को बच्चों की साइकिलें और जूते गुफा में जाने के रास्ते के बाहर मिले.

इधर गुफा में फंसे बच्चे और उन का कोच बाढ़ के पानी से बचने के लिए 4 किलोमीटर तक अंदर पहुंच गए थे. जल्दी ही यह खबर जंगल की आग की तरह पहले पूरे थाईलैंड और उस के बाद दुनियाभर में फैल गई.

बचाने की जद्दोजेहद

बच्चों को गुफा से बाहर निकालने में सब से बड़ा रोड़ा बाढ़ का पानी साबित हुआ. 25 जून को बच्चों की तलाश में नेवी सील के गोताखोर गुफा में घुसे.

26 जून को वे गोताखोर कई किलोमीटर तक अंदर एक टीजंक्शन तक पहुंचे, पर वहां चूंकि पानी का तेज बहाव था इसलिए वे लौट आए.

27 जून तक थाईलैंड में अमेरिका के 30 नौसेना वाले और ब्रिटेन के 3 माहिर गोताखोर भी आ चुके थे. उन्होंने भी बच्चों तक पहुंचने की जीतोड़ कोशिश की पर पानी के तेज बहाव ने उन्हें भी आगे बढ़ने से रोक दिया.

इसी बीच दोबारा बारिश हो गई जिस से 28 जून को मजबूरन यह मुहिम रोक देनी पड़ी. गुफा से पानी निकालने के लिए पंप लगाए गए, पर कोई बड़ी कामयाबी नहीं मिली.

तब तक यह भी नहीं पता था कि गुफा में गए सब बच्चे और उन के कोच की हालत कैसी है. वे जिंदा हैं भी या नहीं. इसी बीच बचाव दल ने 1 जुलाई को गुफा के भीतर एक औपरेटिंग बेस बनाया और सैकड़ों एयर टैंक व दूसरी जरूरी चीजें अंदर पहुंचाई गईं.

2 जुलाई का दिन दुनिया के चेहरे पर खुशी और राहत की बात ले कर आया. ब्रिटेन के गोताखोरों ने गुफा के अंदर पट्टापा बीच से 4 किलोमीटर अंदर बच्चों और उन के कोच को जिंदा पाया. इस के बाद उन तक खाने का सामान, दवाएं वगैरह पहुंचाई गईं.

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हुआ एक हादसा

जब यह लगने लगा कि अब फंसे हुए सभी लोगों को बचा लिया जाएगा, तब अचानक ऐसी बात हो गई कि इस हादसे पर पलपल की नजर रखने वाले लोग दुख में डूब गए.

हुआ यों कि 6 जुलाई को 38 साला पूर्व थाई नेवी सील कमांडर समन गुनान की गुफा के अंदर मौत हो गई. वे बच्चों तक एयर टैंक पहुंचा कर लौट रहे थे कि गुफा के अंदर औक्सिजन की कमी होने से उन की जान चली गई.

यह था असली मिशन

बच्चों को बचाने के शुरुआती दिनों में यह माना गया कि उस इलाके में मानसून खत्म होने तक बच्चों को गुफा के भीतर ही रहना पड़ेगा. लेकिन जब बीच में भारी बरसात हुई तो यह डर लगा कि गुफा में तो पानी भरता ही जाएगा. साथ ही, गुफा में औक्सिजन का लैवल कम और कार्बन डाईऔक्साइड की मात्रा बढ़ रही थी. इस से तो बच्चों की मौत तक हो सकती थी.

इन्हीं सब बातों के मद्देनजर 8 जुलाई को यह फैसला लिया गया कि चाहे कुछ भी हो जाए बच्चों को जल्दी से जल्दी बचाना होगा.

इस बचाव दल में भारत, ब्रिटेन, चीन, म्यांमार, लाओस, आस्ट्रेलिया, अमेरिका, जापान, थाईलैंड समेत दूसरे कई देशों के लोग शामिल थे. गुफा में 90 गोताखोर भी मौजूद थे.

बच्चों व कोच के जीने के जज्बे ने अपना रंग दिखाया. बचाव दल ने 8 जुलाई को 4 बच्चों को, उस के बाद 9 जुलाई को फिर 4 बच्चों को और 10 जुलाई को 4 बच्चों के साथ उन के कोच को भी गुफा से बाहर निकालने में कामयाबी पाई.

कोच ने बढ़ाई हिम्मत

गुफा में फंसे 12 बच्चे अपने कोच के साथ पूरी दुनिया से कट चुके थे. उन्हें तो यह भी नहीं मालूम था कि वे उस अंधेरे से निकल कर सूरज को दोबारा देख पाएंगे या नहीं.

पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. इस काम में बच्चों के कोच एकापोल ने उन का बखूबी साथ दिया. हालांकि एकापोल बच्चों को मौत के मुंह में ले जाने के लिए खुद को जिम्मेदार मान रहे थे और इस के लिए गलती भी मानी थी पर उन्होंने थाईलैंड के लोगों से वादा भी किया था कि वे बच्चों का खयाल रखने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे. उन्होंने बच्चों का हौसला बनाए रखा जिस से वे सभी तकरीबन 18 दिनों तक गुफा में जिंदा रहे.

बच्चों को लील रहे पोंगापंथ के सिक्के

चंद सिक्कों के लालच में ही सही, गरीबों के बच्चे जान जोखिम में डाल कर नदियों में छलांग लगा रहे हैं. नदियों की तली में जा कर सिक्कों को बटोरने के चक्कर में पिछले कुछ महीनों में 3 बच्चों की जानें जा चुकी हैं.

पटना में गंगा नदी के किनारे बने गायघाट के पास 3 बच्चे सिक्कों के लालच में गंगा में कूदे, पर बाहर नहीं आ सके. छोटी पहाड़ी इलाके का रहने वाला 14 साल का पुन्नू राम और गायघाट के पास की एक झोंपड़पट्टी का रहने वाला 7 साल का साहिल सिक्कों को बटोरने के लिए गंगा में कूदे और डूब गए. तीसरे बच्चे की पहचान नहीं हो सकी.

गंगा के घाटों पर अकसर देखा जाता है कि बच्चे गंगा के गहरे और उफनते पानी में छलांग लगाते रहते हैं. उन बच्चों की उम्र अमूमन 8 से 12 साल के बीच होती है. उन्हें गंगा की तेज धारा में डूबने का जरा भी खौफ नहीं होता है.

10 साल का जुम्मन यह कह कर अच्छेअच्छों की बोलती बंद कर देता है, ‘‘जीने के लिए तो रोज मौत से खेलना ही पड़ता है साहब. गंगा के पेट से सिक्के निकालना ही हम सब का धंधा है. इसी से मेरी मां और बहन का गुजारा चलता है.’’

सिक्कों के लिए गंगा में छलांग लगाने के बाद कुछ पल के लिए वे पानी के भीतर गुम हो जाते हैं. इस से किनारे पर खड़े लोगों की सांसें अटक जाती हैं. थोड़ी ही देर के बाद बच्चे एकएक कर पानी की सतह पर आते हैं.

वे जल्दीजल्दी तैर कर किनारे आते हैं और अपना मुंह खोलते हैं. उस में से भरभरा कर कई सिक्के जमीन पर आ गिरते हैं. उस के बाद अपनी हथेलियों को खोल कर दिखाते हैं. उन में भी 1, 2, 5 और 10 के कई सिक्के होते हैं.

पटना में गंगा नदी के किनारे राजाघाट, गायघाट, गोसाईंघाट, कंगली गली, कालीघाट, अगमकुआं जैसी जगहों पर दर्जनों झोंपड़पट्टियां हैं. उन्हीं झोंपड़पट्टियों के बच्चे गंगा से सिक्कों को बटोरने में लगे रहते हैं. प्रशासन और पुलिस ने अपनी फाइलों में उन्हें ‘कौइन पिकर’ का नाम दे रखा है.

रेलगाडि़यों, बसों, कारों वगैरह से पुल पार करते समय लोग नदियों में अंधाधुंध सिक्के फेंकने लगते हैं. वे गंगा नदी समेत कई दूसरी नदियों में सिक्के फेंक कर यह समझते हैं कि उन्होंने एक झटके और सस्ते में काफी पुण्य कमा लिया है या ऊपर वाले को खुश कर दिया है. सिक्कों को नदी में फेंकने के बाद उन की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी, मन की हर मुराद पूरी हो जाएगी.

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पोंगापंथियों की इस अंधी सोच की वजह से जहां एक ओर हजारोंलाखों सिक्के बरबाद हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नदियों से सिक्के बटोरने के चक्कर में कई बच्चे नदी की गहराइयों में समा कर अपनी जान गंवा रहे हैं.

पटना के पुराने इलाके पटना सिटी

के गायघाट समेत कई घाटों पर सुबह से ले कर शाम तक नंगधड़ंग बच्चों का हुजूम गंगा नदी में छलांग लगाता दिख जाता है. हर बच्चे के हाथ में एक चुंबक होती है.

नदी में कूदने के बाद वे उस की तली तक पहुंच जाते हैं और चुंबक को इधरउधर घुमाते हैं. इस से कई सिक्के चुंबक से चिपक जाते हैं.

चुंबक से सिक्कों को छुड़ा कर बच्चे अपने मुंह में डाल लेते हैं और फिर से चुंबक को नदी की तली में इधरउधर घुमाने लगते हैं. इस बीच कुछ और सिक्के उस से चिपक गए तो ठीक वरना सांस लेने के लिए वे पानी की सतह पर आ जाते हैं.

सभी बच्चे अपनेअपने मुंह से सिक्के उगल कर उन्हें जमीन पर गिरा कर गिनते हैं. बाद में नदी किनारे खड़े अपने साथी को थमाते हैं. उस के बाद 5-7 मिनट तक लंबी सांसें ले कर फेफड़ों में ताजा हवा भरते हैं और सिक्कों की तलाश में दोबारा नदी की गहराइयों में डुबकी लगा देते हैं.

11 साल का मनोज बताता है कि वह स्कूल जाने के लिए घर से निकला है. स्कूल जाने के पहले कुछ देर तक वह गंगा में डुबकी लगा कर कुछ सिक्के निकाल लेता है और उस से चाट, गोलगप्पे, पकौड़े वगैरह खाता है. जिस दिन ज्यादा सिक्के हाथ लग जाते हैं तो वह घर के लिए चावल, आटा, दाल, चीनी वगैरह खरीद लेता है.

मनोज कहता है कि 6 साल पहले उस के पिता की मौत हो गई थी. अम्मां दाई का काम कर परिवार का पेट पालती हैं. वे अकसर बीमार रहती हैं जिस से रोज काम पर नहीं जा पाती हैं. इस से मालिक लोग उन के पैसे काट लेते हैं.

कम पैसों में 6 लोगों के परिवार का गुजारा चलाना मुश्किल होता है, इसलिए नदी में गोता लगा कर सिक्के निकाल कर वह परिवार के लिए खाने का सामान खरीद लेता है. वह रोज 8 से 10 बार नदी में गोता लगाता है और तकरीबन 30 से 50 रुपए निकाल लेता है.

कुछ सिक्कों के लिए स्कूल से भाग कर नदी में बच्चों की छलांग सरकारी योजनाओं को मुंह चिढ़ा रही हैं. सरकार इस खुशफहमी में आंकड़े तैयार करती रहती है कि मिड डे मील के लालच में लाखों बच्चे स्कूल आ रहे हैं, साइकिल योजना की वजह से लड़कियां काफी दूरदूर से पढ़ने के लिए स्कूल आ रही हैं, नए कपड़ों को लेने के बहाने हजारों गरीब परिवारों के बच्चे स्कूल आने लगे हैं, पर चंद सिक्कों के लालच में जान जोखिम में डाल कर गंगा नदी में छलांग लगाते बच्चे तमाम सरकारी योजनाओं का सच बयान कर देते हैं.

10 साल का दिलीप राम बताता है, ‘‘स्कूल में तो हमें भरपेट खाना मिल जाता है पर लाचार मांबाप क्या खाएंगे? मेरे कुछ दोस्त गंगा में डुबकी लगा कर सिक्के जमा करने का काम करते हैं, इसलिए हम भी इसी काम में लग गए. रोजाना तकरीबन 60 से 100 रुपए तक जमा हो जाते हैं. पुल को पार करते समय हर बस, ट्रक, कार और रेलगाड़ी से कई सिक्के नदी में लोग फेंकते हैं.’’

नदी में सिक्के फेंकने वालों को पुण्य मिले या न मिले, पर उन सिक्कों से कई गरीब बच्चों का पेट तो भर रहा है. लेकिन इस के लिए उन्हें अपनी नन्ही जान को खतरे में डालना पड़ रहा है.

इस मसले पर समाजसेवी आलोक कुमार कहते हैं कि अंधविश्वास की वजह से हजारोंलाखों सिक्के रोज ही नदियों में फेंके जाते हैं. किसी भी पुल से गुजरते हर छोटीबड़ी गाड़ी से दनादन सिक्के नदियों में फेंके जाते हैं.

पोंगापंथ के जाल में फंसे लोग समझते हैं कि नदियों में सिक्के डालने से उन्हें पुण्य मिलेगा या उन का सफर महफूज होगा, जबकि वे यह नहीं समझते हैं कि इस तरह से पुण्य कमाने के चक्कर में रोजाना हजारों सिक्के नदियों में फेंक दिए जाते हैं.

टूट गई मर्यादाओं की डोर

उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के थाना रेहड़ के अंतर्गत एक गांव है लालबाग. गुरदास इसी गांव में अपने परिवार के साथ रहते थे. पतिपत्नी और 2 बच्चे, यही उन का छोटा सा घरसंसार था. खेतीबाड़ी काफी थी, जिस से उन के परिवार की गाड़ी बड़े आराम से चल रही थी.

उन के यहां ऐशोआराम की हर चीज मौजूद थी. परिवार को खुश रखने के लिए वह कड़ी मेहनत करते थे. गुरदास के दोनों बच्चों में अमिता सब से बड़ी थी. वह पिता की आंखों का तारा थी तो बेटा बुढ़ापे की लाठी. अपने बच्चों पर वह बहुत गर्व करते थे.

बेटी के प्रति अटूट ममता को देख कर कभीकभी पत्नी सुखविंदर कौर पति से दिल्लगी कर बैठती थी कि बेटी तो पराई अमानत होती है. बेटी जब अपनी ससुराल चली जाएगी, तब उस के बिना कैसे रहोगे?

इस पर गुरदास पत्नी को टका सा जवाब दे देते, ‘‘तब की तब देखी जाएगी. नहीं होगा तो दामाद को घरजंवाई बना कर अपने पास रख लेंगे. तब तो मेरी बेटी मेरी आंखों के सामने रहेगी. आखिरकार दामाद भी तो बेटे जैसा होता है. जैसे मेरा एक बेटा वैसे दामाद दूसरा बेटा.’’

पति का टका सा जवाब सुन कर सुखविंदर कौर खामोश हो जाती.

21 दिसंबर, 2017 की बात है. गुरदास किसी काम से सुबहसुबह ही निकल गए थे. सुबह के 9-10 बजे के करीब अमिता मां से कुछ देर में वापस लौट कर आने की बात कह कर कहीं चली गई. घर से निकलते वक्त उस ने मां को ये नहीं बताया कि वह कहां और किस काम से जा रही है. बस इतना ही कहा कि थोड़ी देर में वापस लौट आऊंगी.

थोड़ी देर में लौट आने की बात कह कर घर से निकली अमिता को करीब 3 घंटे बीत गए थे. इतनी देर बाद भी वह घर नहीं लौटी थी. मां सुखविंदर कौर को चिंता सताने लगी कि थोड़ी देर में लौट कर आने को कह कर गई अमिता 3 घंटे बाद भी लौटी क्यों नहीं.

सुखविंदर ने अमिता का मोबाइल नंबर मिलाया पर वह स्विच्ड औफ मिला. सुखविंदर ने कई बार फोन लगाने की कोशिश की लेकिन फोन हर बार बंद ही मिला. उस का फोन बारबार स्विच्ड औफ बता रहा था.

इस से सुखविंदर अमिता को ले कर जहां चिंतित हो रही थी, वहीं दूसरी ओर उसे उस पर गुस्सा भी आ रहा था कि कम से कम घर पर फोन तो कर सकती थी. उस दिन अमिता स्कूल भी नहीं गई थी. स्कूल का बैग उस के कमरे की मेज पर वैसे ही पड़ा था, जैसे उसे रख कर गई थी.

अमिता का कुछ पता नहीं चला तो परेशान हो कर सुखविंदर ने पति को फोन कर के बेटी के वापस न लौटने की सूचना दे दी. अमिता 17 साल की थी. उस के गायब होने से घर वालों की चिंता बढ़नी स्वाभाविक थी. पत्नी के मुंह से बेटी के गायब होने की खबर सुन कर गुरदास के हाथपांव फूल गए. वह बुरी तरह घबरा गए और कुछ ही देर में घर लौट आए.

इधर सुखविंदर ने अपने बड़े बेटे गुलजार के बेटे यानी पोते कमलजीत को अमिता का पता लगाने के लिए गांव में भेजा. करीब एक घंटे में वह सारा गांव छान कर लौट आया लेकिन अमिता का कहीं पता नहीं लगा.

धीरेधीरे दिन ढल रहा था. शाम हो गई लेकिन अमिता अब तक घर नहीं लौटी थी. बेटी के रहस्यमय तरीके से गायब होने से घर ही नहीं, गांव में भी कोहराम मच गया था. गुरदास और सुखविंदर का रोरो कर बुरा हाल था. वे समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें.

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काफी सोचविचार करने के बाद गुरदास बेटी की गुमशुदगी दर्ज कराने के लिए अपने पोते कमलजीत और गांव वालों के साथ रात 8 बजे थाना रेहड़ पहुंच गए. थानाप्रभारी सुभाष सिंह थाने में मौजूद थे.

गुरदास ने थानाप्रभारी को अपनी 17 वर्षीय बेटी अमिता के गायब होने की बात बताई. उन्होंने अमिता की गुमशुदगी दर्ज करने के बाद उन्हें घर भेज दिया.

अगले दिन यानी 22 दिसंबर, 2017 की सुबह थानाप्रभारी को मुखबिर ने सूचना दी कि जिम कार्बेट नैशनल पार्क बौर्डर के पास एक युवती की लाश पड़ी है. लाश पाए जाने की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ जिम कार्बेट नैशनल पार्क की तरफ रवाना हो गए.

वहां पहुंच कर उन्होंने लाश का मुआयना किया तो ऐसा लगा जैसे युवती ने कोई जहरीला पदार्थ खा कर अपनी जान दी हो क्योंकि उस का पूरा शरीर नीला पड़ा हुआ था. ऐसा तभी होता है जब कोई जहरीले पदार्थ का सेवन करता है.

इस के अलावा सरसरी तौर पर उस के शरीर पर चोट का भी कोई निशान नजर नहीं आ रहा था. देखने से युवती किसी भले घर की लग रही थी. तभी थानाप्रभारी को याद आया कि बीती रात लालबाग के रहने वाले गुरदास अपनी बेटी की गुमशुदगी लिखाने आए थे. उन्होंने अपनी बेटी का जो हुलिया बताया था, वह मृतका से काफी मेल खा रहा था.

लाश की शिनाख्त के लिए उन्होंने एक सिपाही को भेज कर गुरदास को साथ लाने को कहा. सिपाही के साथ गुरदास घर और गांव के कुछ लोगों के साथ मौके पर पहुंच गए. युवती की लाश देखते ही वे फफकफफक कर रोने लगे. उन्हें रोता देख पुलिस को यह समझते देर नहीं लगी कि मृतका उन की ही बेटी है.

थोड़ी देर बाद जब गुरदास शांत हुए तो पुलिस ने उन से अमिता द्वारा खुदकुशी किए जाने के बारे में सवाल पूछे कि आखिर अमिता के साथ ऐसा क्या हुआ था कि उस ने इतना बड़ा कदम उठाया.

यह सुन कर गुरदास सकते में आ गए. वह खुद ही नहीं समझ पा रहे थे कि अमिता ने आत्महत्या क्यों की? इसलिए वह थानाप्रभारी के सवाल पर सुबकने लगे.

पुलिस ने उस समय गुरदास से ज्यादा पूछताछ कर के मौके की काररवाई निपटाई और लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. अब पुलिस की निगाह पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर आ कर टिक गई थी कि रिपोर्ट आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी कि अमिता की मृत्यु कैसे हुई?

2 दिनों बाद अमिता की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई. रिपोर्ट पढ़ कर थानाप्रभारी सुभाष सिंह चौंक गए. क्योंकि पोस्टमार्टम में बताया गया था कि अमिता 4 माह की गर्भवती थी और जहर खाने के साथसाथ किसी चौड़े दुपट्टे या शौल से उस का गला घोंटा गया था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पूरी कहानी ही उलटपलट कर रख दी थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद घटना शीशे की तरह साफ हो गई थी. पूरा मामला प्रेमप्रसंग का नजर आने लगा.

अब पुलिस को इस में 2 ही वजह दिखाई देने लगीं. पहली तो यह कि या तो उस के प्रेमी ने छुटकारा पाने के लिए उस की हत्या कर दी थी या फिर उस के घर वालों ने सामाजिक लोकलाज के चलते हत्या कर के लाश ठिकाने लगा दी थी.

यह मामला काफी पेचीदा हो गया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद थानाप्रभारी ने गुरदास को थाने बुलवाया और उन से अमिता के प्रैगनेंट होने की बात बताई तो यह बात सुनते ही उन के पैरों तले से जमीन ही खिसक गई.

गुरदास को अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था कि थानाप्रभारी ने जो उन से कहा है, वह सच है? वह तो यह सोचसोच कर हैरानपरेशान हो रहे थे कि जब लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे. फिर समाज में वह अपना मुंह कैसे दिखाएंगे? पुलिस ने उन से यह बात भी पूछी कि क्या अमिता का किसी से चक्कर चल रहा था? पर वह कुछ भी बताने में असमर्थ रहे.

अमिता हत्याकांड की गुत्थी उलझ कर रह गई थी. धीरेधीरे 4 दिन बीत गए. कोई ऐसी कड़ी पुलिस के हाथ नहीं लग रही थी जिस से वह हत्यारों तक पहुंच पाती. पुलिस ने अमिता के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस में भी कोई ऐसा संदिग्ध नंबर नहीं मिला, जिसे संदेह के घेरे में लिया जा सके.

गुत्थी सुलझाने के लिए पुलिस ने मुखबिर लगा दिए. इधर घर वाले भी इस बात से काफी परेशान रहने लगे कि आखिर अमिता के पेट में किस का बच्चा पल रहा था. उस का प्रेमी कौन था? पुलिस विवेचना कर रही थी तो उधर घर वाले भी अमिता के प्रेमी की जानकारी के लिए जुट गए. पता नहीं क्यों गुरदास का पोता कमलजीत कुछ परेशान सा रहने लगा था. उस के बातव्यवहार में भी अचानक से परिवर्तत आ गया था.

बेटे की परेशानी देख उस के पिता गुलजार ने कमलजीत से बात की और पूछा कि आखिर वह इतना परेशान क्यों है? इस से पहले तो उसे इतना परेशान कभी नहीं देखा था. आखिर क्या बात हो सकती है, जो वह इतना परेशान है.

उधर मुखबिर ने पुलिस को कमलजीत के संदिग्ध चरित्र के बारे में बता दिया था. मुखबिर ने पुलिस को यह भी बताया था कि घटना वाले दिन सुबह के समय कमलजीत को अमिता के साथ जिम कार्बेट नैशनल पार्क की तरफ जाते देखा गया था.

मुखबिर की दी गई खबर पक्की थी. पुलिस ने इस की पड़ताल की तो बात सच निकली. सचमुच कमलजीत अमिता के साथ जिम कार्बेट नैशनल पार्क की तरफ जाते देखा गया था. इस के बाद पुलिस बिना समय गंवाए लालबाग पहुंच गई. कमलजीत घर पर ही मिल गया. वह घर छोड़ कर कहीं भागने की फिराक में था. पुलिस को देखते ही उस के मंसूबे पर पानी फिर गया.

पुलिस ने कमलजीत को हिरासत में ले लिया और थाने लौट आई. थाने में जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने सारी बातें बता दीं. उस ने कहा, ‘‘हां सर, मैं ने ही अपनी बुआ को मारा है. मैं करता भी क्या? मेरे पास अपने बचाव का कोई दूसरा रास्ता भी नहीं बचा था. वह मुझ पर शादी करने के लिए दबाव बना रही थी. उस से छुटकारा पाने के लिए मजबूरन मुझे ये कदम उठाना पड़ा.’’

कमलजीत से पूछताछ के बाद अमिता की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह रिश्तों को तारतार करने वाली निकली.

अमिता और कमलजीत एकदूसरे से रिश्तों के जिन पवित्र धागों से बंधे थे, वहां कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था कि बुआ और भतीजा यानी मांबेटे जैसे पवित्र रिश्ते की आड़ में समाज की मानमर्यादा को ताख पर रख कर इश्क के दरिया में डूबा जा सकता है.

22 वर्षीय कमलजीत गुरदास का एकलौता पौत्र था. गुरदास उसे बहुत प्यार करते थे. एक तरह से कमलजीत उन के दिल का टुकड़ा था. उन का संयुक्त परिवार था. एक ही छत के नीचे सारा परिवार हंसीखुशी से रहता था. उन की एकता की मिशाल की सारे गांव में चर्चा थी.

कमलजीत था तो दुबलापतला, लेकिन था बेहद फुरतीला और स्मार्ट. यही नहीं वह मजाकिया किस्म का भी था. बच्चों से ले कर बड़ेबूढ़ों के बीच बैठ अकसर वह गप्पें लड़ाया करता था. उस की गप्पें सुन कर सभी हंसतेहंसते लोटपोट हो जाया करते थे.

अमिता, कमलजीत की सगी बुआ थी. उन के बीच 4-5 साल का अंतर था. अमिता 17 साल की थी तो वहीं कमलजीत 22 साल का था. अमिता बेहद खूबसूरत थी. कमलजीत मन ही मन अमिता को चाहने लगा. एक दिन की बात है. अमिता, आंगन में बैठी अधखुले तन से नहा रही थी.

उस ने बरामदे के दरवाजे को ऐसे ही भिड़ा दिया था. अकसर वो ऐसे ही बेपरवाह हो कर नहाया करती थी. यह सोच कर उस पर सिटकनी नहीं चढ़ाई थी कि झट से नहा कर उठ जाएगी. वैसे भी उस वक्त घर के सारे पुरुष बाहर दरवाजे पर बैठे थे.

उसी समय कमलजीत अचानक किसी काम से आया और बरामदे का दरवाजा खोल कर धड़धड़ाता हुआ आंगन में दाखिल हो गया. अमिता उसे देख कर हड़बड़ा गई और गीले कपड़ों से जल्दीजल्दी अपने तन को ढकने की कोशिश करने लगी.

तब तक कमलजीत की नजरें अमिता के बदन से टकरा चुकी थीं. उसे उस हालत में देख कर कमलजीत का मन बेचैन और बेकाबू हो गया. उस समय उस ने खुद पर जैसेतैसे काबू पाया, लेकिन इस के बाद से वह अमिता बुआ के जिस्म को पाने के लिए मचल उठा.

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अमिता को पाने के लिए उस ने धीरेधीरे उस के चारों तरफ इश्क का जाल बिछा कर प्यार का दाना डालना शुरू कर दिया. कमलजीत का प्यार तो एक छलावा था. उस का एकमात्र उद्देश्य जिस्म की भूख थी. इस के लिए वह किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार था. अमिता अपने भतीजे कमलजीत के नापाक और घिनौने इरादों से एकदम अंजान थीं.

योजना के मुताबिक, अमिता के दिल में जगह बनाने के लिए कमलजीत उस के पास ज्यादा से ज्यादा समय बिताने लगा. उस की छोटी से छोटी बातों का खयाल रखने लगा.

ये देख कर अमित कमलजीत से काफी प्रभावित रहने लगी. कमलजीत जिस आशिकाना नजरों से उसे देखता था, अमिता को समझते देर नहीं लगी कि वह दीवानों वाला प्यार करने लगा है.

अमिता उम्र के जिस दौर से गुजर रही थी, उस उम्र में अकसर लड़केलड़कियों के पांव फिसल जाया करते हैं. अमिता के भी पांव भतीजे के इश्क में फिसल गए. वह भी उसे उसी आशिकाना अंदाज से देखने लगी थी, जैसा कमलजीत उसे अपलक निहारता रहता था. धीरेधीरे दोनों में प्यार हो गया और मौका देख कर उन्होंने अपने प्यार का इजहार भी कर दिया.

चूंकि, अमिता और कमलजीत एक ही छत के नीचे रहते थे इसलिए घर के किसी भी सदस्य को उन के नापाक रिश्तों की भनक नहीं लगी और न ही उन पर किसी ने कोई शक किया. उन्हें जो भी बातें करनी होती थीं घर वालों से नजरें बचा कर कर लेते थे.

कमलजीत अमिता का पहलापहला प्यार था. वह उसे समुद्र की गहराइयों से भी ज्यादा चाहने लगी थी. प्यार में बंधे दोनों यह तक भूल गए कि उन के बीच रिश्ता क्या है? जब उन के प्यार का राजफाश होगा तो समाज के लोग उन के बारे में क्या सोचेंगे? उन की कितनी जगहंसाई होगी. इस का दोनों को तनिक भी खयाल नहीं हुआ. यह बात सन 2016 की है.

कमलजीत के प्यार का जादू अमिता के सिर चढ़ कर बोल रहा था. उसे कमलजीत के सिवाय कुछ नजर नहीं आ रहा था. कमलजीत भी इसी दिन के इंतजार में कब से बेताब बैठा था. अमिता भतीजे के बिछाए इश्क के जाल में अच्छी तरह से फंस चुकी थी.

बेहद भोलीभाली और सीधीसादी अमिता लोमड़ी से भी अधिक चालाक और शातिर भतीजे कमलजीत के रचे चक्रव्यूह को समझ नहीं पाई और अपनी आबरू लुटा बैठी.

प्यार के अंधे कुआं में डूबी अमिता कमलजीत के बांहों में आ गिरी. उन के बीच के सारे फासले, सारे रिश्ते पल भर में सिमट कर रह गए. दोनों एक जिस्मानी रिश्ते में समा गए. एक बार जो मिलन का खेल शुरू हुआ तो सिलसिला बन गया.

जिस का परिणाम यह हुआ कि अमिता के पांव भारी हो गए. जब उस के गर्भ में कमलजीत का 4 माह का पाप पांव पसारने लगा तो अमिता को अहसास हुआ कि वह कितनी बड़ी गलती कर बैठी थी. जब मांबाप इस हालात के लिए उस से पूछेंगे तो वह क्या जवाब देगी. ये सोचसोच कर उस की रातों की नींद और दिन का चैन लुट चुका था. हर घड़ी वह परेशानी की मौत मरती रही.

उस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि क्या करे? किसे अपने मन का हाल सुना कर जी हलका करे. जब कुछ समझ में नहीं आया तो उस ने कमलजीत से बात की कि वह उस के बच्चे की मां बनने वाली है. जल्द से जल्द कोई उपाय करे नहीं तो समाज में जीना मुश्किल हो जाएगा.

अमिता के मुंह से ये सुनते ही कमलजीत के होश उड़ गए. घबराहट के मारे पसीना छूटने लगा. उसे ऐसा लगा जैसे उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई हो. उस के सिर से अमिता के इश्क का सारा भूत उतर गया. उस ने अमिता को समझाया कि उसे सोचने के लिए थोड़ा मौका दे. जल्द से जल्द कोई न कोई उपाय निकाल लेगा.

उधर अमिता उस पर शादी के लिए दबाव बनाने लगी. शादी का नाम सुन कर कमलजीत बुरी तरह घबरा गया. वह सोचने लगा कि लोग उस के बारे में क्या सोचेंगे की बुआभतीजे के रिश्ते को तारतार कर दिया. वह कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा.

कमलजीत ने शादी के लिए इनकार करते हुए कहा कि ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि रिश्ते में हम बुआभतीजे लगते हैं. दुनिया क्या कहेगी? समाज हम पर थूकेगा.

इस पर अमिता ने कहा, ‘‘तुम ने उस समय यह बात क्यों नहीं सोची थी. अब मामला बिगड़ गया तो दुनियादारी याद आ रही है. मैं कुछ नहीं जानती. तुम्हें मुझ से शादी करनी ही होगी.’’

काफी सोचनेविचारने के बाद कमलजीत ने कहा, ‘‘मेरे दिमाग में एक आइडिया आया है. इस मुसीबत से छुटकारा पाने के लिए हम दोनों खुदकुशी कर लेते हैं. तब तो हम पर कोई अंगुली नहीं उठाएगा.’’

कमलजीत का यह आइडिया अमिता को पसंद आ गया. इस के बाद दोनों ने सुसाइड करने का प्लान बना लिया. प्लान के मुताबिक कमलजीत 20 दिसंबर, 2017 को बाजार से एक घातक कीटनाशक दवा खरीद लाया.

अगले दिन वह बहलाफुसला कर अमिता को घर से बाहर जिम कार्बेट नैशनल पार्क ले गया. दोनों को पार्क की ओर जाते हुए मोहल्ले के कई लोगों ने देखा था. पार्क पहुंच कर सामने मौत देख कर कमलजीत की रूह कांप उठी. उस ने मरने का अपना फैसला बदल दिया. बडे़ शातिराना अंदाज में उस ने अमिता से कहा, ‘‘तुम पहले जहर खा लो, फिर मैं खा लूंगा.’’

भतीजे की बातों पर यकीन कर के अमिता ने पहले जहर खा लिया. उस के बाद उस ने अपने प्रेमी कमलजीत से भी जहर खाने को कहा तो उस ने फिल्मी खलनायकों के अंदाज में हंसते हुए अमिता की तरफ घूर कर देखा और कहा, ‘‘मेरी प्यारी बुआ, तुम अभी भी मेरी फितरत को नहीं समझ पाई. तुम्हें पता नहीं कि तुम से पीछा छुड़ाने के लिए मैं ने यह कदम उठाया था. तुम तो मर जाओगी, लेकिन मैं… मैं अभी मरना नहीं चाहता.’’

जहर ने अमिता पर अपना असर दिखाना शुरू कर दिया. अमिता का शरीर ढीला पड़ने लगा. तभी कमलजीत ने उस के गले में लिपटे दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया. अमिता कटे वृक्ष की तरह जमीन पर धड़ाम से जा गिरी. कमलजीत ने उसे हिलाडुला कर देखा. वह मर चुकी थी. उस के बाद कमलजीत लाश को वहीं ठिकाने लगा कर इत्मीनान से घर लौट आया.

जिस चालाकी और सफाई से कमलजीत ने अपना काम किया था. उसे ऐसा लगा था कि पुलिस उस तक नहीं पहुंच पाएगी. लेकिन अपराध कभी छिपता नहीं है. आखिरकार अपराधी को उन्हें जेल की सलाखों के पीछे पहुंचना ही होता है. कमलजीत के साथ भी यही हुआ. उस से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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