चुपड़ी और 2-2 : फातिका को मिल पाया सुख

रोशन अली जब 45 साल का था, तब उस की पहली बीवी की मौत हो गई थी. इस के बाद उस ने 23 साला फातिमा के साथ दूसरा निकाह कर लिया था. फातिमा का रंग गोरा था. उस का कमसिन बदन हर किसी की निगाह में चढ़ गया था, पर वह किसी को भी घास नहीं डालती थी.

रोशन अली की ढलती उम्र व कड़ी मेहनतमजदूरी करने के चलते उस का शरीर भी ठंडा पड़ गया था. वह फातिमा को खुश नहीं कर पा रहा था, जिस के चलते वह हमबिस्तर होने से कतराती थी. इसी तनाव के चलते वह टीबी के मरीज की तरह खांसती रहती थी.

उस का मन घर के कामों में भी नहीं लगता था. रोशन अली ने फातिमा का खूब इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ, क्योंकि फातिमा की बीमारी तो जिस्मानी तौर पर असंतुष्टि थी.

एक दिन रोशन अली ने गांव के तालाब के पास एक हकीम साहब का कैंप लगा देखा. उन की उम्र तकरीबन 30 साल थी. उन का दावा था कि वे हर तरह की बीमारी का शर्तिया इलाज करते थे. हिमालय की जड़ीबूटियों से तैयार की गई दवाएं लेने से 7 दिन में बीमारी से छुटकारा मिल जाता था, ऐसा हकीम साहब का कहना था. रोशन अली फातिमा को ले कर उन के कैंप में गया और बीमारी का हाल सुनाया.

हकीम असलम एकबारगी फातिमा को देख कर दंग रह गए. उस की जवानी, गोरे बलखाते बदन को देख कर उन की लार टपक गई. फातिमा भी हकीम साहब की जवानी देख कर मुसकरा उठी और वह ललचाई नजरों के साथ जमीन कुरेदने लगी.

हकीम ने उस की नब्ज देखने के बहाने हाथ से हाथ मिला कर कहा, ‘‘रोशन साहब, आप रात को 8 बजे इन्हें दोबारा यहां लाएं, ताकि फुरसत में पूरी तसल्ली से इन के शरीर की जांच की जा सके.’’

रोशन अली फातिमा को रात 8 बजे हकीम के कैंप में दोबारा ले गया. उसे बाहर इंतजार करने को कहा गया. हकीम साहब ने रोशन अली से दवाओं और सलाह के 5 सौ रुपए एडवांस में ले लिए.

रोशन अली ने देखा कि फातिमा के इलाज में ज्यादा समय लगेगा, इसलिए वह खाना खाने घर चला गया. इधर हकीम साहब ने फातिमा का हाथ पकड़ कर एक टेबल पर लिटा दिया और उसे नशे की गोलियां दे दीं, जिस से वह नशे की हालत में अंगड़ाइयां लेने लगी.

हकीम साहब ने अपना स्टैस्थोस्कोप निकाल कर कान में लगाया और फातिमा के ब्लाउज के बटन खोल कर उस के उभारों को सहलाना शुरू कर दिया. फातिमा नशे में चूर मुसकरा रही थी और मजा ले रही थी. इस तरह कुछ देर में दोनों में जोश जाग गया और टेबल पर ही वे एक हो गए. जब वे दोनों संतुष्ट हो गए, तो अलग हो गए.

हकीम साहब ने कहा, ‘‘7 दिन तक आती रहना. तुझे पूरी तरह संतुष्ट कर दूंगा और औलाद भी दे दूंगा.’’ फातिमा तो यही चाहती थी.

थोड़ी देर में रोशन अली भी आ गया. हकीम साहब ने दवा की पुडि़या पकड़ाते हुए कहा, ‘‘इन्हें 7 दिनों तक मेरे कैंप में ले कर आते रहना, जिस से इन की बीमारी का पूरा इलाज हो जाए.’’ इस तरह हकीम साहब ने 7 दिनों तक फातिमा को भोगा.

इस बीच हकीम साहब की करतूतों की कहानी कई गांवों में भी फैल चुकी थी, इसलिए कुछ गांव वाले एक सिपाही को ले कर उन के कैंप पर आ धमके. छानबीन में जाली दस्तावेज, लाइसैंस, फोटो, गर्भ निरोधक वगैरह मिले. पूछताछ में हकीम ने सब सच उगल दिया और उन्हें जेल भेज कर मुकदमा दायर कर दिया गया. उन की चुपड़ी और 2-2 की पोल खुल गई.

लेकिन रोशन अली अब खुश है, क्योंकि फातिमा उस का बिस्तर पर बढ़चढ़ कर साथ देती है. जब उस ने बताया कि वह पेट से है, तो रोशन अली ने पूरे महल्ले में मिठाई बांटी. सब ने मिठाई तो खाई, पर ज्यादातर लोग जानते थे कि असलियत क्या है, क्योंकि गांवों के कई घरों में बुजुर्ग होते मर्दों की बीवियों को अचानक उलटियां होने लगी थीं.

करिश्मा तन्ना ने मस्ती करते हुए शेयर किया वीडियो

एक्ट्रेस करिश्मा तन्ना का किस्मत आजकल बुलंदियों पर है. एक तरफ उनकी हालिया रिलीज फिल्म ‘संजू’ बौक्स-औफिस धमाल मचाते हुए 300 करोड़ से ज्यादा की कमाई कर चुकी है, वहीं दूसरी तरफ छोटे परदे पर करिश्मा का टीवी शो ‘नागिन’ टीआरपी की रेस में झंडे गाड़ रही है.

टीवी शो ‘नागिन’ के साथ-साथ करिश्मा आजकल एक और टीवी शो ‘कयामत की रात’ की शूटिंग में बिजी हैं. करिश्मा ने ‘कयामत की रात’ के सेट का एक वीडियो अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर पोस्ट किया है, जो खूब वायरल हो रहा है. इस वीडियो को 3 घंटे के भीतर 4 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं.

वीडियो में करिश्मा ‘कयामत की रात’ के सेट पर आईने में देखकर अपना मेकअप करवा रही होती हैं, तभी पीछे से एक तांत्रिक आता है और करिश्मा के बालों को सहलाने लगता है. करिश्मा जब मुड़ कर उस तांत्रिक को देखती है तो काफी जोर से चिल्लाती हैं. करिश्मा ने इस वीडियो को शेयर करते हुए कैप्शन दिया हैं, ‘शूटिंग से पहले अपने तांत्रिक के साथ पागलपंती.’

आपको बता दें कि टीवी जगत के सबसे फेमस शो ‘बिग बौस 8’ में हिस्सा लिया था. शो में उपेन पटेल के साथ करिश्मा की नजदीकियों ने उस समय काफी सुर्खियां बटोरी थी. इस शो के बाद करिश्मा की लोकप्रियता काफी बढ़ गई थी. इसके अलावा करिश्मा ‘नच बलिये 7’, ‘लव स्कूल 1’ और ‘झलक दिखला जा 9’ जैसे फेमस टीवी शो में नजर आ चुकी हैं.

बुराई : जब बहकने लगें इन के कदम

पुलिस की 25 साल से भी ज्यादा नौकरी कर चुके 59 साला सबइंस्पैक्टर मोहन सक्सेना को मध्य प्रदेश के मालवा इलाके के शहर शाजापुर में हर कोई जानता था. इस की एकलौती वजह यह नहीं थी कि वे पुलिस महकमे में थे और वरदी पहन कर शहर में निकलते थे, तो लोग इज्जत से सिर झुका कर उन्हें सलाम ठोंकते थे. दूसरी वजह थी उन का एक इज्जतदार कायस्थ घराने से होना. तीसरी अहम वजह जो बीते 2 साल में पैदा हुई थी, वह उन की बहू मालती (बदला नाम) थी, जिस के बारे में हर कोई जानता था कि वह ड्राइवर अंकित चौरसिया से अकसर चोरीछिपे मिला करती थी.

दुनियाभर के लोगों को सही रास्ते पर आने की नसीहत देने वाले दारोगाजी खुद अपनी बहू के बहकते कदम नहीं संभाल पा रहे थे. खून तो खूब खौलता था, लेकिन क्या करें यह उन की समझ में नहीं आ रहा था.

यों बहकी बहू

24 साला अंकित चौरसिया पेशे से ड्राइवर था, जो फिलहाल शाजापुर की ही एक मालदार व इज्जतदार औरत निर्मला गौर की कार चला रहा था. गोराचिट्टा खूबसूरत बांका अंकित खुशमिजाज और बातूनी था. जल्दी ही वह घर के सभी लोगों से घुलमिल गया था. इस के पहले वह मोहन सक्सेना की कार चलाता था.

लेकिन 25 साला बहू मालती ड्राइवर अंकित चौरसिया से जरूरत से ज्यादा घुलमिल गई थी. शुरू में तो किसी ने इस बात पर गौर नहीं किया, लेकिन जल्दी ही वे दोनों चोरीछिपे मिलनेजुलने लगे और उन के प्यार की सुगबुगाहट दारोगाजी के कानों में पड़ी, तो उन्होंने तुरंत अंकित को नौकरी से निकाल दिया और आइंदा मालती से दूर रहने की धमकी दे डाली.

यह नसीहत और धौंस बेकार साबित हुई. अंकित की नौकरी छूटी थी, महबूबा नहीं. लिहाजा, वह मोहन सक्सेना और नितिन की परवाह किए बिना मालती से मिलता रहा.

और एक दिन…

बदनामी का पानी तो काफी पहले ही सिर से गुजर चुका था, पर अब इतना लबालब भर गया था कि मोहन सक्सेना को सांस लेना भी मुहाल हो चला था. लिहाजा, उन्होंने नए साल की शुरुआत में कसम खा ली थी कि अगर अंकित सीधे बात नहीं मानता है, तो उसे सबक सिखाने के लिए जो भी रास्ता अख्तियार करना पड़े वे करेंगे.

जब किसी भी तरह मानमनोव्वल और धौंस के अलावा तंत्रमंत्र से भी बात नहीं बनी, तो मोहन सक्सेना का अक्ल और सब्र से नाता टूट गया. लेकिन इस बाबत उन्होंने जो रास्ता चुना, वह बेहद खतरनाक था.

झमेला तंत्रमंत्र का

संजय व्यास जैसे तांत्रिकों की छोटे शहरों में बड़ी धाक और पूछपरख रहती है, जिन के बारे में यह मशहूर रहा है कि उन के नीबू काटने की देर भर है,  अच्छेअच्छे रास्ते पर आ जाते हैं.

इस मामले में एक बात बड़ी दिलचस्प रही कि मोहन सक्सेना और नितिन तो इस तांत्रिक के चक्कर काट ही रहे थे, लेकिन इस बात से अनजान अंकित भी उस के फेर में आ गया था, जिस की परेशानी यह थी कि मालती उस के वश में पूरी तरह नहीं आ रही थी. वह उसे पसंद तो करती थी, पर शादी करने के लिए राजी नहीं हो रही थी.

कुछ दिन तो मजे ले कर संजय व्यास ने उन दोनों से पैसा झटका, पर अंकित गरीब था, इसलिए अनुष्ठानों के नाम पर ज्यादा चढ़ावा नहीं दे पा रहा था. इसी बीच काम हो जाने के लिए लगातार दबाव बना रहे मोहन सक्सेना को वह यह समझा पाने में कामयाब हो गया कि बहू के ऊपर कोई बड़ी बला है, इसलिए अंकित को रास्ते से हटाने का एकलौता उपाय उसे इस दुनिया से ही उठा देना है.

योजना के मुताबिक, संजय व्यास ने अंकित को यह झांसा दिया कि मालती हमेशा के लिए उस के वश में हो सकती है, लेकिन इस के लिए एक खास किस्म का अनुष्ठान करना पड़ेगा.

उम्मीद के मुताबिक, मालती के लिए पगलाया अंकित पूजा कराने को तुरंत तैयार हो गया. संजय ने उसे बताया था कि यह खास किस्म की तांत्रिक क्रिया दूर किसी सुनसान सिद्ध जगह पर करनी पड़ेगी. इस पर अंकित ने एतराज नहीं जताया, न ही कोई सवाल किया.

17 जनवरी, 2016 की सुबह अंकित अपनी मालकिन निर्मला गौर के पास गया और उज्जैन जाने के लिए उन की कार मांगी. उस ने बहाना यह बनाया कि वह कुछ दोस्तों के साथ महाकाल मंदिर के दर्शन करने जाना चाहता है. उस की बात पर निर्मला गौर को कोई शक नहीं हुआ, इसलिए उन्होंने अपनी कार उसे दे दी.

दोस्त तो नहीं, पर अपने कातिलों में से एक संजय व्यास को उस ने कार में बैठाया और बजाय उज्जैन जाने के तांत्रिक के बताए रास्ते पर गाड़ी दौड़ा दी.

बैरसिया तहसील के पास भोजपुरा के घने जंगलों में संजय व्यास ने कार रुकवाई और कहा कि यहीं पूजा होगी. उधर पहले से ही बनाई योजना के मुताबिक, मोहन सक्सेना और नितिन बैरसिया होते हुए भोजपुरा पहुंच गए थे.

एक सुनसान जगह को तांत्रिक क्रियाओं के लिए मशहूर बताते हुए संजय व्यास ने अंकित को पूजापाठ के लिए बैठाया. कुछ देर ऊलजलूल क्रियाएं करने के बाद तांत्रिक ने उसे आंखें बंद करने को कहा, तो अंकित ने तुरंत उस के हुक्म की तामील की.

अंकित ने जैसे ही अपनी आंखें बंद कीं, तभी पीछे से मोहन सक्सेना और नितिन आ गए. अंकित ने आहट पा कर जैसे ही आंखें खोलीं, तो उन दोनों ने उस की आंखों में पिसी लाल मिर्च झोंक दी.

तिलमिलाया अंकित समझ तो गया कि उस के साथ धोखा हुआ है, लेकिन कुछ कर पाता इस के पहले ही उन तीनों ने लोहे की छड़ उस के सिर पर दे मारी.

कहीं वह जिंदा न बच जाए, इसलिए वहशी हो गए मोहन सक्सेना, नितिन और संजय ने उस पर पत्थरों से भी हमले किए. जब उस के मरने की तसल्ली हो गई, तो वे तीनों वहां से फरार हो गए.

यों पकड़े गए

17 जनवरी, 2016 की ही दोपहर को बैरसिया पुलिस को एक नौजवान की लाश जंगल में पड़ी होने की खबर मिली, तो लाश बरामद कर कातिलों को ढूंढ़ने का काम शुरू हो गया.

हत्या की जगह से कुछ दूर ही खड़ी कार की पड़ताल से पता चला कि यह कार तो शाजापुर की निर्मला गौर नाम की औरत की है. जब उन से पुलिस ने पूछताछ की, तो उन्होंने तुरंत बता दिया कि उन का ड्राइवर अंकित उन से उज्जैन जाने की कह कर कार ले गया था. बैरसिया कैसे पहुंच गया, यह उन्हें नहीं मालूम.

इधर मोहन सक्सेना इंदौर होते हुए शाजापुर लौट आए और थाने में शिकायत दर्ज करा दी. उन तीनों ने होशियारी दिखाते हुए मोबाइल फोन साथ नहीं रखे थे, क्योंकि इस से तुरंत लोकेशन पता चल जाती. लेकिन बैरसिया के पैट्रोल पंप पर अंकित ने कार में पैट्रोल डलवाया था. वहां के मुलाजिमों ने कार में संजय व्यास के होने की शिनाख्त की, तो पुलिस वालों के पास अब कहने और करने को ज्यादा कुछ नहीं रह गया था.

हत्या के जुर्म में गिरफ्तार होते ही संजय व्यास तमाम तंत्रमंत्र भूल गया और सारी बात सच उगल दी. जल्दी ही मोहन सक्सेना और नितिन को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

पूछताछ में मोहन सक्सेना ने अपने ही महकमे के मुलाजिमों को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन कहानी में दम नहीं रह गया था, इसलिए उन्होंने भी अपना जुर्म कबूल कर लिया.

क्या करें घर वाले

जैसे ही बहू, बेटी या घर की दूसरी किसी औरत के बाहरी मर्द से संबंध पकड़े जाते हैं या बदनामी की वजह बनने लगते हैं, तो घर वालों को समझ नहीं आता कि ऐसा क्या करें कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

बहकी औरत अगर बहू है, तो ज्यादा रोकने या मारपीट करने पर दहेज का मुकदमा दर्ज कराने की धौंस देती है यानी ससुराल वालों की बेबसी का पूरा फायदा उठाती है और वहीं रह कर उन के सामने ही गलत रास्ते पर चलते रहना चाहती है, क्योंकि यह महफूज रहता है.

अगर वह औरत बेटी है, तो डर उस के भागने या पेट से होने का बना रहता है. तीसरा बड़ा डर खुदकुशी कर लेने का होता है, जिस की धौंस पराए मर्द की मुहब्बत में पड़ चुकी औरत अकसर देती भी रहती है.

जिस्मानी और जज्बाती तौर पर दूसरे की गिरफ्त में आ चुकी औरत किसी का कहना नहीं मानती और न ही उसे घर की इज्जत और समाज के कायदेकानूनों के अलावा नातेरिश्तों से कोई वास्ता रहता. बात उस समय और बिगड़ती है, जब उस का आशिक भी हौसले दिखाने लगता है. दोनों ही अपने मांबाप और दुनियाजहान के बारे में नहीं सोचते, तो साफ है कि उन्हें समझाने या रोकनेटोकने से कोई फायदा नहीं होता.

इसलिए बेहतर यही है कि जब औरत के कदम बहकने लगे और तमाम नसीहतों के बाद भी वह न माने तो बजाय जुर्म का रास्ता चुनने के उसे अपनी मरजी से जीने दिया जाना चाहिए. इज्जत और समाज की बात इसलिए माने नहीं रखती कि कोई इश्क कभी छिपता नहीं, बल्कि जितना छिपाया जाए उलटे ज्यादा ही विस्फोटक तरीके से दुनिया के सामने आता है.

समझाने पर न माने जैसा कि ऐसे मामलों में अकसर होता है, तो कानूनी लिखापढ़ी कर औरत को उस के आशिक के साथ जाने दे कर अपना पिंड छुड़ा लेना एक बेहतर रास्ता है.

हालांकि इस में जगहंसाई भी होगी, पर वैसी और उतनी खतरनाक नुकसानदेह नहीं होगी, जैसी मोहन सक्सेना के मामले में हुई.

औरतें भी समझें हकीकत

पराए मर्द के प्यार में जिन औरतों के पैर संभाले नहीं संभलते हों, उन्हें इस मामले से सबक लेना चाहिए कि जो मर्द उन्हें ब्याह कर लाया है, उस में कोई कमी या कमजोरी हो सकती है, पर उस का यह मतलब कतई नहीं कि उस से इस तरह बदला लिया जाए.

दूसरा, यह भी सोचसमझ लेना चाहिए कि ऐसे रिश्तों की उम्र ज्यादा नहीं होती और न ही अंजाम हमेशा अच्छा होता है. इस के अलावा दूसरा मर्द यानी आशिक वफादार ही होगा, इस की कोई गारंटी नहीं होती.

कई मामलों से साफ हो चुका है कि वह जिस्म से खेलता है, पैसे ऐंठता है और जोर डालने पर बीच भंवर में छोड़ कर भाग भी जाता है. ऐसी औरत कहीं की नहीं रह पाती.

ऐसे ताल्लुकों से किसी को कुछ हासिल नहीं होता, सिवाय तांत्रिकों के, जो दोनों पार्टियों से पैसा ऐंठते हैं और फिर बात न बनने पर कत्ल जैसे संगीन जुर्म के लिए उकसाते हैं और ज्यादा पैसों के लालच में उस में साथ भी देते हैं. अगर वे नहीं पकड़े जाते तो तय है कि तांत्रिक संजय व्यास जिंदगीभर सक्सेना परिवार को ब्लैकमेल कर उन से रकम ऐंठता रहता.

सब से बड़ा तनाव झेलने वाले घर वालों को चाहिए कि वे चार लोगों को बैठा कर सारा सच खुद उगलें और औरत को भी साथ बैठा लें, जिस से वह कोई झूठ न बोल सके और न ही गलत इलजाम लगा सके. इस से बदनामी जो आज नहीं तो कल होती जरूर होगी, लेकिन जिंदगी बची रहेगी और औरत की गलती भी सामने आ जाएगी.

क्यों बहकती हैं औरतें

* पति से जिस्मानी सुख न मिल पाना और शर्म के मारे इस की बात किसी से न कर पाना.

* ससुराल वालों खासतौर से पति से जज्बाती लगाव का पैदा न हो पाना.

* कम उम्र में ही पराए मर्दों से घुलनेमिलने या सैक्स की आदत पड़ जाना.

* घर या ससुराल में बंदिशों का ज्यादा होना और रोजरोज कलह होना.

* दिलफेंक, खूबसूरत जवां मर्दों पर दिल आ जाना, उन की लच्छेदार बातों में फंस जाना, फिर छुटकारा पाने की कोशिश में और उस के जाल में और फंसते जाना.

* पति से समय न मिलना.

* पति का उम्मीद के मुताबिक रोमांटिक न हो पाना.

* इस बात का फायदा उठाना कि ससुराल या घर वाले तो इज्जत के लिए खामोश रहेंगे.

* घर में मन न लगना और हमेशा रोमांटिक और सैक्सी खयालों में डूबे रहना.

देवरानी और जेठानी : बदल रहे हैं रिश्तों के माने

आज सुबह से ही मेरी पड़ोसन शोभा के यहां उठापटक हो रही थी. जब सुबह दूध लेते वक्त मेरी उन से मुलाकात हुई तो मैं ने इस उठापटक की वजह पूछी.

वे जोश से भर कर बोलीं, ‘‘आज दोपहर को मेरे जेठजेठानी अपने परिवार समेत आ रहे हैं. बस, हम उन्हीं के स्वागत की तैयारी में बिजी थे.’’

बातों ही बातों में उन्होंने बताया कि कैसे पिछले हफ्ते से ही वे जेठानी के परिवार के हर सदस्य का मनपसंद खाना बनाने और उपहार लाने में मसरूफ थीं.

पड़ोसन की बातें सुन कर मुझे अपनी मां की याद आ गई कि जब ताईजी और ताऊजी आने वाले होते थे तो कैसे मां थरथर कांपने लगती थीं और ताईजी के आने के बाद अपने ही घर में मम्मी की जगह जीरो हो जाती थी, पर आज शोभा की बातें सुन कर नए जमाने की देवरानीजेठानी के रिश्ते की यह नई बहार मेरे मन को बड़ा सुकून दे गई.

हकीकत में आज के इस नए जमाने की बहुएं देवरानीजेठानी के बजाय सहेली और बहनें बन कर रहना ज्यादा पसंद कर रही हैं. पुरानी दकियानूसी सोच को छोड़ कर वे आज एकदूसरे की साथी बन कर समाज में इस रिश्ते को नया रूप दे रही हैं.

आज तकनीक का जमाना है. इस में एकदूसरे से जुड़े रहने के अनेक साधन हैं. इन का इस्तेमाल भी आज की औरतें अपने रिश्तों को मजबूत करने में बखूबी कर रही हैं.

मुंबई की रहने वाली अणिमा की बेंगलुरु में रहने वाली जेठानी खाना बनाने में माहिर हैं. अणिमा अकसर वीडियो कौलिंग कर के अपनी जेठानी से नईनई रैसिपी पूछती रहती है. साथ ही, उस ने कोशिश कर के अपनी जेठानी का कुकिंग का यूट्यूब चैनल भी बनवा दिया है, जिस से जेठानी भी घर बैठे अच्छीखासी कमाई कर लेती हैं. दोनों दूर रह कर भी एकदूसरे की साथी बन गई हैं.

विविधा की ससुराल में 2 जेठानियां और सास थीं. दोनों जेठानियां कम पढ़ीलिखी थीं, जबकि विविधा शादी से पहले ही एक स्कूल में पढ़ाती थी और पीएचडी भी कर रही थी.

कुछ ही दिनों के बाद विविधा ने महसूस किया कि घर का काम खत्म करने के बाद उस की जेठानियां शाम को जेठजी के औफिस से आने तक फ्री रहती हैं इसीलिए सुबहसुबह उस का तैयार हो कर घर से स्कूल चले जाना भी उन्हें रास नहीं आ रहा था.

एक दिन मौका देख कर विविधा ने जेठानियों को बिजी रहने के लिए कुछ करने की सलाह दी. उन की रुचि देख कर उस ने एक को सिलाई और दूसरी को ब्यूटीशियन का कोर्स करवा दिया.

कुछ ही दिनों में विविधा ने खुद कोशिश कर के घर के ही 2 कमरों में दोनों जेठानियों को ब्यूटीपार्लर और बुटीक खुलवा दिया.

अब जेठानियां बिजी रहने के साथसाथ कमाई भी करने लगी हैं. वे इस के लिए विविधा का गुणगान करते नहीं थकतीं. अब वे तीनों मिल कर घरबाहर का सारा काम चुटकियों में कर लेती हैं.

अपनी तीनों बहुओं का तालमेल देख सास व परिवार के मर्द भी चैन की सांस लेते हैं.

मंजू और उस की देवरानी अंजू ने अपनी समझदारी का परिचय देते हुए भाइयों की आपसी दुश्मनी को दरकिनार कर अपने संबंधों को जब सामान्य कर लिया तो दोनों भाइयों का मनमुटाव भी खुद ही खत्म हो गया.

हुआ यों कि मंजू के देवर शादी से पहले बड़े भाई के साथ ही रहते थे. सो, शादी के बाद देवरानी भी उसी घर में आ गई. शुरुआत में तो सब ठीकठाक रहा, पर कुछ दिनों के बाद ही दोनों में छोटीछोटी बातों को ले कर तनातनी होने लगी.

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देवरानीजेठानी से शुरू हुई बात भाइयों तक पहुंचतेपहुंचते बतंगड़ बन गई और एक दिन गरम स्वभाव के दोनों भाइयों ने अलग होना ठीक समझा. नतीजतन, दोनों भाई एक ही महल्ले में अलगअलग रहने लगे.

कुछ समय बाद पढ़ीलिखी और समझदार मंजू को जब एक सामाजिक कार्यक्रम में देवरानी अंजू मिली तो वह बोली, ‘‘एक ही शहर में रह कर भी अगर हम जरूरत पड़ने पर एकदूसरे

के काम न आएं तो हमारी पढ़ाईलिखाई किस काम की. अपने ही सगे भाई से अहंकार पाल कर क्यों दूसरों को बातें बनाने का मौका दें.

‘‘अच्छा है कि हम पिछला सब भुला कर एक नई शुरुआत करें और मिलजुल कर रहें.’’

समझदार देवरानी को भी जेठानी की बात जंच गई और अगली दीवाली सब ने एकसाथ मनाने का तय किया. दोनों बहुओं की थोड़ी सी कोशिश से पिछले 3 सालों से बनी दिलों की दूरियों को मिटा कर आज अलग रहने के बाद भी दोनों भाई बड़े ही प्यार से रहते हैं और जरूरत पड़ने पर एकदूसरे का भरपूर साथ भी देते हैं.

आजकल इस हाथ दे उस हाथ ले का जमाना है. गरिमा और उस की देवरानी रीना का परिवार भी साल में एक बार जरूर साथ घूमने का प्रोग्राम बनाते हैं.

वह कहती है, ‘‘हम दोनों पैसों के मामले में पूरी साफगोई रखते हैं क्योंकि पैसा ही संबंध बिगड़ने की बहुत बड़ी वजह बन जाता है.

‘‘ऐसे प्रोग्राम में न कोई छोटा है और न कोई बड़ा. हम दोनों पूरे खर्च को

2 बराबर हिस्सों में बांट लेते हैं ताकि किसी भी तरह का मनमुटाव न हो और हमारे द्वारा चलाया गया यह सिलसिला हमारे बाद हमारे बच्चे भी चलाते रहें.

‘‘एकसाथ घूमने जाने से हम बच्चों और दूसरे मामलों में बेफिक्र तो रहते ही हैं, साथ ही हमारे बच्चों के संबंध भी मजबूत होते हैं जो उन के भविष्य के लिए बहुत जरूरी है.’’

आज की देवरानीजेठानी ज्यादा समझदार हैं और प्रैक्टिकल भी. वैसे तो तनाव, तकरार और मनमुटाव के मुद्दे आज भी वही हैं, पर पढ़ाईलिखाई का असर और सोच के बड़े नजरिए के चलते वर्तमान समय की देवरानीजेठानी इन सब से अपने पारस्परिक संबंधों को कम से कम प्रभावित होने देती हैं.

कुछ साल पहले जहां आपसी मनमुटाव के चलते सालोंसाल तक भाइयों के परिवार आपस में बातचीत तक नहीं करते थे, वहीं आज की बहुएं अच्छी तरह समझती हैं कि वर्तमान समय में परिवार छोटे हैं जिस में सदस्यों के नाम पर महज 3 या 4 लोग ही होते हैं. ऐसे में सभी को कभी न कभी एकदूसरे की जरूरत पड़ती ही है, तो क्यों न अपने ही भाई के परिवार से तालमेल बिठा कर रखा जाए. इस से अपनेपन के साथसाथ रिश्ते की मजबूती बढ़ती है.

वक्तबेवक्त जरूरत पड़ने पर दूसरों से मदद ले कर अहसानमंद होने के बजाय अपने ही भाई के परिवार से मदद ली जाए. पहले जहां मान और पद की गरिमा को बहुत ज्यादा अहमियत दी जाती थी वहीं आज की बहुएं मानती हैं कि न कोई छोटा है और न बड़ा.

एक मल्टीनैशनल कंपनी में मैनेजर गरिमा के देवर की जब शादी हुई तो सभी उसे जेठानी बनने की बधाई दे रहे थे.

इस पर वह बोली, ‘‘आंटी, न कोई देवरानी है, न जेठानी. बस, सब एक परिवार के सदस्य हैं और मैं खुश हूं कि हमारे परिवार में एक सदस्य आ रही है.’’

गरिमा की यह सोच आज की नई पीढ़ी की सोच को बखूबी बयान करती है.

न्यूड फोटो के बाद मंदाना करीमी के इस हौट विडियो ने मचाया हंगामा

कुछ दिनों पहले अपनी न्यूड फोटो पोस्ट कर हड़कंप मचाने वाली अदाकारा मंदाना करीमी का अब एक ऐसा विडियो सामने आया है, जिसने सोशल मीडिया पर आग लगा दी है. इस विडियो में मंदाना करीमी ब्‍लैक टौप और हौट-शौर्ट में नजर आ रही हैं. वह वीडियो में अपने दोस्तों के साथ डांस करते वक्त सिगरेट के कश लगाती नजर आ रही हैं.

इस विडियो को मंदाना ने अपने इंस्टाग्राम अंकाउंट पर शेयर किया है. मंदाना का यह अंदाज जहां कुछ लोगों को पसंद आया, वहीं कुछ लोगो ने उन्हें ‘बेशर्म’ कहा और हिदायतें देना शुरू कर दिया. कई यूजर्स ने मंदाना को स्‍मोकिंग करने के लिए खरी-खोटी सुनाई है. एक यूजर ने उन्‍हें ट्रोल करते हुए लिखा है, ‘…और तुम जैसे को कोई अपना आइडल मानता है..’.  कुछ लोगों ने लड़की होकर स्‍मोकिंग करने पर भी उन्‍हें ट्रोल किया है. कुछ ने कहा, ‘जब स्मोकिंग नहीं छोड़ सकतीं तो दुनिया को फिटनस के बारे में क्यों बताती हो?

लेकिन दूसरी तरफ कई लोगों ने मंदाना को इस तरह ट्रोल करने वालों को लताड़ा भी है. एक यूजर ने लिखा, ‘क्‍यों हमेशा एक महिला का ही आंकलन किया जाता है. अगर एक लड़का सिगरेट पी सकता है तो लड़की क्‍यों नहीं?’ तो वहीं एक दूसरे यूजर ने लिखा, ‘आप उन्‍हें क्‍यों समझा रहे हैं कि क्‍या करना है. वह एक व्‍यस्‍क हैं और वह जानती हैं कि क्‍या कर रही हैं.’

बता दें कि मंदाना करीमी सोशल मीडिया पर ऐक्टिव रहती हैं और अक्सर अपनी फोटोज शेयर करती रहती हैं. हाल ही में उन्होंने इंस्टाग्राम पर अपनी फोटो शेयर की, जिसमें वह बीच साइड पर रेत में न्यूड लेटी हुई हैं. इस फोटो पर उन्होंने कैप्शन दिया है, ‘जिंदगी एक बीच है और मैं बस रेत में खेल रही हूं. इस फोटो के अलावा मंदाना ने अपनी एक और फोटो शेयर की थी और उसमें भी वह टौपलेस हैं.

मालूम हो कि मंदाना करीमी उस वक्त चर्चा में आईं थीं, जब उन्होंने अपने पति गौरव गुप्ता के खिलाफ घरेलू हिंसा का केस दर्ज करवाया था. मंदाना ने आरोप लगाया था कि कई हफ्तों तक उन्हें अपने ससुराल में घुसने नहीं दिया गया. साथ ही उन्होंने कहा था कि उनकी सास के साथ कभी अच्छे संबंध नहीं रहे. गौरतलब है कि मंदाना करीमी ने गौरव से शादी करने के लिए हिंदू धर्म अपनाया था और हिंदू रीति-रिवाजों से शादी की थी.

प्रफेशनल फ्रंट की बात करें, तो मंदाना ‘बिग बौस’ में भी नजर आईं थीं. उन्होंने ‘राय’, ‘भाग जानी’, ‘मैं और चार्ल्स’ और ‘क्या कूल हैं हम 3’ जैसी फिल्मों में भी काम किया. फिलहाल मंदाना के पास कोई फिल्म नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया पर वह काफी ऐक्टिव रहती हैं.

कश्मीर की उलझन

जम्मूकश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगाने को मजबूर होना पड़ना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की असफलताओं की सूची में एक और क्रमांक है. जैसे नोटबंदी, जीएसटी, स्वच्छ भारत, कालाधन, अच्छे दिन, सब का साथ सब का विकास आदि कर्मों व नारों से कुछ नहीं हुआ वैसे ही पीपल्स डैमोक्रेटिक पार्टी यानी पीडीपी के साथ मिल कर जम्मूकश्मीर में बनाई गई सरकार से नरेंद्र मोदी कुछ हासिल न कर पाए.

साझा सरकार के दौरान राज्य में अशांति रही और विघटनवादी बढ़ते रहे. मोदी सरकार ने राष्ट्रपति से संस्तुति ले कर वहां राष्ट्रपति शासन लगवा दिया है. पर इस से कुछ होगा नहीं क्योंकि अब सेना ज्यादतियां करेगी तो अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियां बनेंगी.

जम्मूकश्मीर कमजोर नींव पर खड़ा है. 1947 से सरकारों ने इस को अपने राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया है. भाजपा जब सत्ता में न थी तब उस ने काफी होहल्ला मचाया था कि कांग्रेस सरकार कमजोर दिल की है. पर जब भाजपा ने महबूबा मुफ्ती के साथ मिल कर वहां सरकार बनाई तो भी कश्मीर की जनता को भरोसा नहीं दिलाया जा सका कि पूरा भारत उस को बराबर का महत्त्व देता है और वह इस में सब के साथ रह कर ही खुशहाल रह सकती है.

अगर धर्म के नाम पर कश्मीरियों को बहकाया जा रहा है तो इस का दोष भी भाजपा को दिया जाएगा क्योंकि वही पूरे देश में हिंदू पौराणिक धर्म लाने की बात करती रहती है. जब केंद्र की सरकार धर्म के इशारे पर चलेगी तो कश्मीर की जनता कैसे धर्म को त्याग कर आर्थिक विकास की खातिर विरोध करना छोड़ दे.

कश्मीर का इतिहास बहुत ही उलझा हुआ है. हो सकता है उसे सुलझाने में सदियां बीत जाएं और वहां की जनता न दिल्ली के और न ही किसी और के साथ चलना चाहे.

यूरोप के कितने ही देशों में आज तमाम तकनीक, आर्थिक विकास, बराबरी के सिद्धांतों के रातदिन के रागों के बावजूद इतिहास की कब्रें खोद कर अपनी अलग राष्ट्रीयता की मांग की जा रही है. भारत में तो धर्म के अनुसार ही देश का विभाजन हुआ और उसी आधार पर हम पाकिस्तान को शत्रु

मान रहे हैं. कश्मीरियों को समझाना कि धर्म से विकास संभव नहीं, बहुत मुश्किल है.

राष्ट्रपति शासन लगाने का लाभ भाजपा ने यदि देश के अन्य हिस्सों के चुनावों में उठाया तो बात और बिगड़ेगी. देश की रगों में वैसे भी विषैले कीटाणु भरे हैं और यदि ऐसे वायरस ज्यादा इंजैक्ट किए गए तो देश की रहीसही इज्जत भी धूल में मिल जाएगी.

बाप बड़ा न भैया सब से बड़ा रुपैया

पिछले अंकों में आप ने पढ़ा:
धन्ना ने शहर में पढ़ाई शुरू कर दी. वहां उस ने अपने मास्टरों को घीदूध बेचने के बहाने चूना लगाना शुरू कर दिया. जिन लोगों से वह दूध खरीदता था, उन्हें भी पैसे देने में बदमाशी करता था. बाद में उस ने दूध का कारोबार करने के लिए गांव की अपनी भैंसें हड़पने की योजना बनाई.
अब पढ़िए आगे:

धन्ना की बात सुन कर सभी चुप थे. रामभजन और गणेश ने कई सवाल खड़े किए, पर धन्ना ने बड़ी ही चालाकी से उन के दिमाग में यह बात बैठा दी कि कुछ ही दिनों में घर की हालत सुधर जाएगी.

थोड़े ही दिनों में धन्ना ने भागदौड़ कर के शहर में अपना काम शुरू कर दिया. वह दिनभर दुकान चलाता और सुबहशाम दूध का काम कर लेता. कुछ मेहनत और कुछ बेईमानी की बैसाखियों से उस का धंधा अच्छा चल पड़ा. वह घर वालों को भी जरूरी सामान और थोड़ेबहुत पैसे भी हर महीने दे आता, ताकि वे भैंसों के लिए ज्यादा शोरगुल न मचाएं.

धन्ना की दुकान पर सभी तरह के लोग आते थे. उन में कुछ बदमाश भी थे. धन्ना की उन से गाढ़ी दोस्ती हो गई. उन्हीं दिनों शहर में दंगे हो गए. धन्ना ने अपने दोस्तों के साथ मिल कर खूब लूटखसोट की. इस दंगे में उस के हाथ काफी जेवरात और कीमती सामान लग गए. उस की माली हालत काफी मजबूत हो गई.

एक दिन सुनने में आया कि जिस मकान में वह रह रहा था, उसे ही हड़प लिया. बेचारा मकान मालिक गुंडों से डर कर चुपचाप अपने घर बैठ गया. धन्ना की अच्छी माली हालत का नतीजा यह हुआ कि उस के कई जगह से रिश्ते आने लगे. आखिरकार रामशरण नाम के एक शख्स की लड़की धन्ना को पसंद आ गई.

‘‘तुम अपने मांबाप को बुला लो, तो रिश्ता पक्का कर दिया जाए.’’ ‘‘ऐसी कोई बात नहीं है. पिताजी ने सबकुछ मेरे ऊपर छोड़ रखा है.’’

‘‘तो बताओ, फिर तुम्हें कैसी शादी चाहिए. हमारे पास देने को ज्यादा कुछ नहीं है,’’ रामशरण ने कहा. ‘‘जी, कलपरसों भी कई जगह से रिश्ते आए थे, पर आप की वजह से मैं ने उन से मना कर दिया. रही बात लेनदेन की, तो मैं भी इस के खिलाफ हूं, मगर गांव में एक परिवार से हमारे मतभेद हैं. उन के लड़के की हाल ही में शादी हुई है. कम से कम उस से तो अच्छी शादी होनी ही चाहिए. यह हमारी इज्जत का सवाल है,’’ धन्ना ने कहा.

‘‘कैसी शादी हुई है उस की?’’ ‘‘जी, 15 तोला सोना और 2 किलो चांदी तो उन्होंने अपनी लड़की को दी है और एक लाख रुपए नकद व एक मोटरसाइकिल दहेज में दी है. कम से कम इतना तो होना ही चाहिए,’’ धन्ना ने एक शातिर सौदागर की तरह कहा.

रामशरण के एक ही लड़की थी, इसलिए उस ने सोचा कि खाताकमाता लड़का है, लड़की भी सुख पाएगी. रामशरण ने कहा, ‘‘मोटरसाइकिल तो हम नहीं दे सकते, लेकिन बाकी जो तुम ने बताया है, वह सबकुछ दे देंगे.’’

यह सुन कर धन्ना थोड़ी देर तक कुछ सोचता रहा, फिर राजी हो गया. उस ने कहा, ‘‘ठीक है, आप मुहूर्त दिखा कर मेरे पिताजी से मिल लीजिए.’’ सबकुछ ठीक रहा. रामशरण ने शादी में जीजान लगा दी, ताकि लड़की को कोई उलाहना न मिले. दहेज में मिले सारे रुपए धन्ना ने बड़ी ही चालाकी से अपने कब्जे में कर लिए.

धन्ना अपनी पत्नी लाली के साथ शहर में रहने लगा. उन्हीं दिनों उस के एक दोस्त ने कहा कि शहर के बाहर बाईपास रोड पर एक खेत बिक रहा है. अगर हम दोनों जुगाड़ कर के उसे ले लें, तो बाद में उस में प्लौट काट कर अच्छा पैसा कमाया जा सकता है. धन्ना को यह सलाह अच्छी लगी. इस के लिए बड़ी रकम की जरूरत थी. इतनी रकम का कहां से बंदोबस्त होगा.

धन्ना इन्हीं सवालों की उधेड़बुन में था कि तभी उस के दिमाग में कोई नया प्लान आ ही गया और उस के होंठों पर कुटिल मुसकान दौड़ने लगी. अगले ही दिन धन्ना अपने गांव पहुंच गया. शादी के बाद सारे घर वाले उस से नाराज थे. सभी गिलेशिकवे करने लगे कि एक तो हमारी भैंसें ले गया, ऊपर से शादी के सारे पैसे भी हजम कर गया. कोई भी उस से सीधे मुंह बात नहीं कर रहा था.

धन्ना ने अपनी सफाई में कहा, ‘‘तुम क्या सोचते हो कि मैं ने सारे पैसे उड़ा दिए या फुजूलखर्ची के लिए ले गया था?’’

‘‘तो फिर कहां हैं पैसे? उन्हें हमें वापस ला कर दो,’’ रामभजन ने तमतमाते हुए पूछा. ‘‘मैं बाईपास रोड पर एक खेत ले रहा हूं. उस की कीमत 5 लाख रुपए है. एक लाख रुपए तो शादी वाले हैं और एक लाख की मेरे पास बचत है. अभी मैं 3 लाख रुपए कर्ज लेने का बंदोबस्त कर रहा हूं.

‘‘जब मैं उस में प्लौट काट कर बेचूंगा, तो वह 25 लाख रुपए का बिकेगा. फिर हमें किसी के आगे हाथ फैलाने की क्या जरूरत है. 3 महीने में ही प्लौट काट कर बेच दूंगा, फिर तुम जितने चाहो रुपए ले लेना,’’ भोलेभाले संतू ने तो धन्ना की बात का यकीन कर लिया, लेकिन दोनों भाई उसे शक की नजरों से देख रहे थे.

थोड़ी ही देर में धन्ना ने अपनी चालाकी भरी बातों से भोलेभाले परिवार को हरा दिया. आखिर में धन्ना ने कहा, ‘‘मैं मांबापू को भी साथ ही रखूंगा. वे थोड़ीबहुत देर दुकान पर बैठ जाया करेंगे. लाली का भी मन लगा रहेगा.’’

इस बात पर किसी को कोई एतराज नहीं था. अगले दिन धन्ना अपने मांबाप को ले कर शहर पहुंच गया. 2-4 दिन धन्ना ने उन की खूब खातिरदारी की. वे भी अब खुश थे.

एक दिन धन्ना ने संतू के सामने एक कागज का पुलिंदा रखते हुए कहा, ‘‘बापू, यह दुकान मैं तुम्हारे नाम कर रहा हूं. लो, यहां अंगूठा लगा दो.’’ भोलेभाले संतू ने उन कागजात पर 4-5 जगह अंगूठा लगा दिया.

दरअसल, गांव की सारी जमीन संतू के नाम ही थी. धन्ना ने धोखे से अंगूठा लगवा कर उसे गिरवी रख कर 3 लाख रुपए उधार ले लिए. एक दिन धन्ना अपने मांबाप से कहने लगा कि शहर में खर्चा बहुत होता है, तुम अब गांव में ही रहो. इस के बाद उस ने दोनों को गांव भेज दिया, फिर कभी उन की सुध नहीं ली.

गांव जा कर जब उन लोगों को यह पता लगा कि धन्ना ने उन के साथ धोखा किया है, तो उस की मां यह सदमा सहन नहीं कर सकी और मर गई. धन्ना को मां की मौत की खबर दी गई, पर वह नहीं आया.

अंतिम संस्कार के बाद धन्ना का बड़ा भाई रामभजन दुखी हो कर घर छोड़ कर साधु बन गया और कहीं चला गया.

एक दिन धन्ना के साले हरिराम का अपहरण हो गया. वह मांबाप का एकलौता लड़का था. सभी लोग हैरानपरेशान इधर से उधर उस की खोज में भागेभागे फिर रहे थे. उसे सभी जगह ढूंढ़ा, मगर हरिराम का कहीं कोई सुराग नहीं लगा.

धन्ना को हरिराम के अपहरण होने की खुशी हो रही थी. उस ने सोचा कि शायद वे लोग फिरौती की रकम नहीं दे पाएंगे, इसलिए अपहरणकर्ता हरिराम को मार डालेंगे. फिर धन्ना उन की सारी जमीनजायदाद का अकेला ही वारिस

बन जाएगा. सारे रिश्तेदार हरिराम का पता लगाने की कोशिश में थाने, कचहरी वगैरह में मारेमारे फिर रहे थे. ऐसे में धन्ना इन सब से उलट शहर के सरकारी शवगृह के बाहर बैठा था. वह यही सोच रहा था

कि अब तक तो अपहरणकर्ताओं ने उस की हत्या कर दी होगी. लाश मिली होगी तो उसे पोस्टमार्टम के लिए यहीं लाया जाएगा.

सुबह से शाम हो गई, मगर धन्ना शवगृह में आते हुए मुरदों की पहचान में ही लगा रहा. उधर हरिराम को अपहरण करने वाले ने छोड़ दिया. वह घर आ गया. हरिराम को सकुशल देख कर धन्ना का चेहरा उतर गया. चेहरे पर आतेजाते भावों से लग रहा था, मानो उसे धंधे में बहुत बड़ा घाटा हो गया.

इधर, धन्ना के भाई गणेश ने मेहनतमजदूरी कर के और कुछ कर्ज ले कर अपनी दोनों लड़कियों की शादी कर दी. धन्ना ने शादी में फूटी कौड़ी भी मदद नहीं की. धन्ना की बेईमानी ने संतू को तोड़ कर रख दिया. उस की सेहत भी दिनोंदिन गिरने लगी थी.

समय अपनी रफ्तार से गुजरता जा रहा था. धन्ना के एक ही लड़का था, जो अब शादी के लायक हो चुका था. धन्ना ने एक दिन उस की शादी राजवंती नाम की एक लड़की से कर दी. उस का पिता रामा गरीब किसान था. धन्ना ने ऐन वक्त पर उस से ज्यादा दहेज की मांग कर दी. वह बेचारा हाथ जोड़ कर धन्ना के आगे गिड़गिड़ाता रहा. रामा के पास केवल 3 बीघा खेत था, उसी के सहारे वह अपने बच्चों को पालतापोसता था. धन्ना ने कहा, ‘‘तुम अपना 3 बीघा खेत मेरे लड़के के नाम कर दो. दहेज की भरपाई हो जाएगी.’’

मजबूरी में रामा ने उस के नाम 3 बीघा जमीन कर दी. शादी के 2-3 महीने तो सबकुछ ठीकठाक चलता रहा, मगर एक दिन धन्ना ने अपने लड़के रतिराम को बुला कर कहा, ‘‘देख रतिराम, तेरी शादी मेरे मनमुताबिक नहीं हुई है. हमें हमारी इज्जत के मुताबिक दहेज और रिश्तेदारी नहीं मिली है. मैं इस शादी से बिलकुल खुश नहीं हूं.’’ ‘‘लेकिन, पिताजी अब तो जो होना है, सो हो गया. अब इस बारे में बात करना बेकार है.’’

‘‘नहीं, अभी बहुतकुछ हो सकता है.’’ ‘‘क्या हो सकता है?’’

‘‘तुम्हारी दूसरी शादी.’’ यह सुन कर रतिराम चौंक गया. उस ने सकपका कर कहा, ‘‘पिताजी, मेरी शादी हो चुकी है. राजवंती एक अच्छी और समझदार पत्नी है. मुझे उस से कोई शिकायत नहीं है.’’

‘‘तू तो राजवंती के चक्कर में अंधा हो गया है. तू उस का गुलाम

बन गया है. मैं तेरे लिए इस से भी खूबसूरत पत्नी ला दूंगा. मैं ने कई जगह लड़की भी देख रखी हैं,’’ धन्ना तमतमाते हुए बोला. दोनों में काफी बहस होती रही, पर रतिराम ने दूसरी शादी के लिए हां नहीं की. अब धन्ना ने मन ही मन कुछ तय कर लिया. अगर राजवंती को रास्ते से हटा दिया जाए, तो रतिराम अपनेआप मान जाएगा.

एक दिन रतिराम अपनी मां के साथ किसी काम से ननिहाल गया हुआ था. धन्ना ने मौका देख कर पानी की मटकी में जहर मिला दिया. वह खुद बहाना बना कर कहीं चला गया. राजवंती ने दोपहर का खाना उसी पानी से बनाया और खा लिया. थोड़ी देर में उस की तबीयत बिगड़ने लगी. उस के जोरजोर से चीखने पर पड़ोसी उसे अस्पताल ले कर गए, मगर उस ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया.

पोस्टमार्टम के बाद पुलिस केस दर्ज हो गया. 2 महीने तक पुलिस छानबीन करती रही. आखिरकार धन्ना को हिरासत में ले लिया गया. धन्ना को बचाने के लिए रतिराम ने काफी जायदाद बेच कर केस लड़ा, परंतु उसे छुड़ा नहीं पाया. गांव वाली गिरवी जमीन का ब्याज इतना हो गया कि उसे छुड़ाना नामुमकिन था.

धन्ना को अपने किए का फल तो मिल गया, पर अभी भी उस के चेहरे पर पछतावा नहीं दिखाई दे रहा था. अगर उस के चेहरे पर कुछ दिखाई दे रहा था, तो केवल फर्जीवाड़े की किसी भावी योजना को आखिरी रूप देने का धुंधला तानाबाना.

बोल्ड तस्वीरों पर फिर ट्रोल हुईं हिना खान

छोटे परदे की फेमस बहु ‘अक्षरा’ यानि हिना खान आज अपना म्यूजिक वीडियो रिलीज करने वाली हैं. हिना के इस म्यूजिक वीडियो का नाम ‘भसूड़ी’ है. हाल ही में हिना ने अपने इस म्यूजिक वीडियो का टीजर अपने सोशल मीडिया से रिलीज किया था. इस टीजर को रिलीज करते हुए हिना ने बताया था कि यह म्यूजिक वीडियो 17 जुलाई को रिलीज होने वाली है.

हिना खान आजकल अपने इस म्यूजिक वीडियो का प्रमोशन करने दिल्ली पहुंची हुई हैं. प्रमोशन के दौरान हिना काफी दिलकश अंदाज में दिखी. प्रमोशन से जुड़ी फोटो-वीडियो हिना ने अपने सोशल मीडिया आकाउंट पर पोस्ट किया हैं. इस पोस्ट के बाद लोगों ने उन्हें फिर से ट्रोल करना शुरू कर दिया है.

एक सोशल मीडिया यूजर ने लिखा, ‘तुम मुस्लिम ही हो ना? अल्लाह से खौफ खाओ.’ हालांकि बहुत से लोग ऐसे भी है, जो हिना के इस म्यूजिक वीडियो के लिए बेस्ट विशेस देते हुए उनके इस खूबसूरत अवतार की तारीफ भी कर रहे हैं. एक फैन ने लिखा, ‘लुकिंग सो स्ट्यालिश, बेस्ट औफ लक.’

आपको बता दें कि हिना इस म्यूजिक वीडियो में अपनी आवाज देने जा रही हैं. इससे पहले भी हम ‘बिग बौस 11’ में हिना खान की आवाज को सुन ही चुके हैं, जब भी हिना ‘बिग बॉस’ के घर में बोर होती थीं तब गाना गा कर खुद का मन बहलाती थीं. शो के होस्ट सलमान खान भी हिना के सिंगिंग कायल थे और शो के दौरान कई बार हिना के सिंगिंग की तारीफ कर चुके थे.

इस म्यूजिक वीडियो में सोनू ठुकराल ने अपनी आवाज दी है और कंपोज प्रीत हुंडल ने किया है. म्यूजिक वीडियो के डायरेक्टर रौबी सिंह हैं. गाने की शूटिंग पंजाब के पटियाला में की गई है.

नाच और नैतिकता

रैस्टोरैंटों में लाइव बैंड पर लड़कियों का नाच नैतिक है या अनैतिक, इस पर लंबी बहस चल रही है. मुंबई पहले डांस बारों से भरा हुआ था पर कुछ नैतिकता के नाम पर, कुछ शोरशराबे की वजह से, कुछ अपराधी किस्म के लोगों के जमा होने की वजह से, तो कुछ आपसी मारपीट से पैदा हुई लौ ऐंड और्डर की समस्या के कारण एकएक कर के सभी राज्यों में इन पर रोक लग गई है. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने 2005 के कर्नाटक पुलिस नियमों को सही ठहराया जिन में इन पर इतनी रोकटोक के नियम बना दिए गए थे कि कोई रैस्टोरैंटों में लाइव बैंडों के साथ कैबरे डांस करा ही नहीं सकता था.

सुप्रीम कोर्ट ने नैतिकता की बात तो कम की है पर सारी जिम्मेदारी पुलिस पर छोड़ कर और पुलिस को खुली छूट दे कर इन कैबरे डांसों को बंद कराने का फैसला दे दिया.

बार के डांसों या रैस्टोरैंटों के कैबरे डांसों की वकालत करना मुश्किल है जबकि ये बंद हालों में होते हैं. इस के उलट आजकल गांवों और कसबों में खुले में पंडाल लगा कर भड़काऊ नाच कराए जा रहे हैं और कुछ तो हिंदू त्योहारों या भजनों, जागरणों के नाम पर भी भड़काऊ डांस कराए जा रहे हैं. यूट्यूब इस तरह के डांसों से भरा पड़ा है. 5-7 साल पहले तक हिंदी फिल्मों में जब तक एक ऐसा डांस न हो उसे पूरा नहीं माना जाता था.

नाचना या नाच देखना बहुत ही पुरानी परंपरा है और यह तकरीबन कुदरती है. आदिवासियों और अफ्रीका के कबीलों में हर छोटे मौके पर नाच जरूरी है. इनसान ने नाचना क्यों शुरू किया, इस बहस में न जा कर यह देखा जाना चाहिए कि मंदिरों में होने वाले नाचों या सड़क पर होने वाले नाचों का नैतिकता से या कानून व्यवस्था से क्या लेनादेना है? नैतिकता तो बहुत ही उलझी बात है. एक समय सिर पर बिना पल्ला डाले जवान लड़कियां अनैतिक मानी जाती थीं, आज बौबकट बाल नैतिकता की ही सीमा में हैं. एक समय भारत में टांगें दिखाना अनैतिक था, आज स्कर्ट पहनना नैतिक है. नैतिकता का असल में न पोशाक से लेनादेना है, न नाचनेगाने से.

धर्म के बिचौलिए असल में अवसर ढूंढ़ते रहते हैं कि आम आदमी कहीं सुखी तो नहीं हो रहा. वे चाहते हैं कि हर सुख की चीज या काम मंदिरों के तले हो या न हो. हिंदू धर्म हर समय आम आदमी को पापी ठहराने में लगा रहता है और उसी के पैरोकार व दुकानदार हर मजे वाले काम को अनैतिक करार कर देते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने इसी को समाज की जरूरत माना है.

नाचना या नाच दिखाना असल में मौलिक अधिकारों में है. यह अभिव्यक्ति का अधिकार भी है और इस से पैसे मिलते हैं, इसलिए यह जीवन का आधार भी है. कानून व्यवस्था के खराब होने का डर तो हर बात में हो सकता है. बाजारों में बम फटते हैं तो इस का यह मतलब तो नहीं है कि उन्हें बंद करा दिया जाए. कारखानों में हड़तालें होती हैं तो कारखानों को बंद तो नहीं किया जा सकता.

औरतें अपना शरीर दिखा कर, नाच कर पैसा कमाएं, इस पर कुछ को एतराज हो सकता है पर यह औरतों के अधिकार क्षेत्र में दखल भी है. उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट कुछ उदारता बरतता.

कौन है गीता की बदहाली का जिम्मेदार

अनाथ गीता शायद दुनिया की पहली ऐसी लड़की है जिस के मांबाप, पता, जातिधर्म का किसी को पता नहीं. यहां तक कि गीता नाम भी उसे पाकिस्तानियों ने दिया है.

गीता की दुखद कहानी तो उस के पैदा होने के साथ ही शुरू हो गई थी क्योंकि वह न तो बोल सकती थी और न ही सुन सकती थी. सरकारी जबान में कहें तो वह मूकबधिर यानी गूंगीबहरी है.

गीता कौन है और कहां की है, इस सवाल का जवाब हासिल करने की जीतोड़ कोशिशें सरकार के विदेश मंत्रालय ने कीं, लेकिन अब तक वह भी नाकाम ही रहा है.

साल 2003-04 में मासूम गीता भारत और पाकिस्तान के बीच चलने वाली ट्रेन में लावारिस हालत में पाकिस्तानी सैनिकों को मिली थी.

पाकिस्तानी सैनिकों ने तरस खा कर उसे कराची की मशहूर समाजसेवी संस्था ईधी फाउंडेशन के हवाले कर दिया तो गीता वहीं की हो कर रह गई. इस फाउंडेशन के कर्ताधर्ता पाकिस्तान के नामी समाजसेवी अब्दुल सत्तार और उन की बीवी बिल्किस बेगम ने उसे हिंदू मानते हुए गीता नाम दे दिया था.

इन दोनों मियांबीवी ने लाख कोशिशें कीं, पर गीता के घरबार और मांबाप का पता नहीं चला.

गीता चूंकि हिंदू और हिंदुस्तानी मान ली गई थी, इसलिए ईधी फाउंडेशन में ही उस के पूजापाठ के इंतजाम कर

दिए गए. लेकिन भगवान भी गीता के पूजापाठ के आगे नहीं पसीजा और गीता गुमनामी की जिंदगी जीने लगी.

और जब वतन आई  गीता की कहानी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की जानकारी में आई तो वे पसीज उठीं. उन्हें लगा कि अपने देश की इस लड़की को अगर उस के घर और मांबाप से मिला दिया जाए.

गीता 14 साल पाकिस्तान के ईधी फाउंडेशन में रही और वहीं जवान हुई. एक तरह से पाकिस्तान ही उस का घर और वतन हो गया था. यह कशिश मिट्टी की ही कही जाएगी कि उसे इतने साल बाद भी अपना घर और देश याद आते थे.

सुषमा स्वराज ने पहल करते हुए पाकिस्तान से गीता मांगी तो पाकिस्तान ने मना नहीं किया और गीता को सौंपने के लिए राजीखुशी रजामंदी जता दी.

लंबी सरकारी कवायद के बाद आखिरकार 26 अक्तूबर, 2015 को गीता के भारत आने की तारीख तय हुई.

इस के पहले गीता की वापसी को ले कर खूब होहल्ला मचा. मीडिया ने स्क्रीन और पन्ने गीता की वापसी से रंग डाले थे. सुषमा स्वराज की नेकदिली की तारीफ हुई. तब तय है कि तब उन्हें कतई अहसास नहीं रहा होगा कि वे हवन करते अपना हाथ जला रही हैं.

तयशुदा तारीख को गीता पाकिस्तान एयरलाइंस के हवाईजहाज से भारत आई तो उस का स्वागत राजकुमारियों सरीखा किया गया. हवाईअड्डे पर नेताओं और अफसरों की फौज खड़ी हुई थी. तब गीता के साथ उस की मुंहबोली मां बिल्किस बेगम और उन का बेटा फैजल ईधी भी था.

वाहवाही लूटने की गरज से गीता को तब के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से खासतौर से मिलवाया गया. हालांकि यह एक बेतुकी बात थी क्योंकि गीता तो जानतीसमझती ही नहीं थी कि इन हस्तियों के माने क्या होते हैं और इन तीनों को भी समझ नहीं आ रहा था कि गीता से क्या बात करें और कैसे करें.

इस के पहले गीता जब पाकिस्तान में थी तब उस का फोटो विदेश मंत्रालय ने सोशल मीडिया पर वायरल किया था. मंशा और मकसद यह था कि गीता के मांबाप मिल जाएं और उसे घर ले जाएं.

देशभर के राज्यों के कोई दर्जनभर मांबापों ने गीता पर दोवदारी जताई, तो विदेश मंत्रालय ने तय यह किया कि गीता का डीएनए मैच किया जाएगा जिस से उसे उस के असली मांबाप को ही सौंपा जाए. ईधी फाउंडेशन भी इसी शर्त पर तैयार हुआ था.

society

जब दावेदारों के फोटो गीता को दिखाए गए तो उस ने बिहार के सहरसा जिले के रहने वाले जनार्दन महतो नाम के शख्स को अपना पिता बताया. जनार्दन महतो ने भी कहा था कि गीता ही उन की खोई हुई बेटी है जो सालों पहले बिछुड़ गई थी.

एक वक्त में यह मान लिया गया था कि जनार्दन महतो ही गीता के असली पिता हैं. हालांकि ईधी फाउंडेशन के फैजल ईधी को शक था कि गीता महज भारत जाने की गरज से झूठ बोल रही है. इस बाबत उन्होंने कहा भी था कि मुमकिन है, गीता गुमराह कर रही हो लेकिन भारत में गीता की वापसी को ले कर इतना होहल्ला मचा दिया गया था कि फैजल की आवाज उस में दब कर रह गई.

गीता को कई हस्तियों से मिला कर मध्य प्रदेश के इंदौर के एक मूकबधिर केंद्र भेज दिया गया. इस की कर्ताधर्ता वहां की मशहूर समाजसेविका मोनिका पंजाबी हैं. गीता की देखरेख और खर्चे के लिए सरकार उन के केंद्र को 30,000 रुपए महीना देती है. लेकिन अब तक गीता के स्वागतसत्कार पर ही लाखों रुपए खर्च हो चुके हैं.

गीता का डीएनए जनार्दन महतो से नहीं मिला तो मानो गाज सी गिरी. उसी समय में यह बात उजागर हुई कि जर्नादन महतो की गुम लड़की की शादी तो लुधियाना के उमेश महतो नाम के शख्स से बचपन में ही हो चुकी थी और उमेश से उसे एक बेटा भी है. इधर गीता इशारों में बता रही थी कि उस की तो कभी शादी ही नहीं हुई थी.

लेकिन उम्मीद की किरण अभी बाकी थी. सोचा यह गया कि जनार्दन महतो न सही किसी और दावेदार से उस का डीएनए मैच हो सकता है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं तो सुषमा स्वराज की कवायदों और कोशिशों पर पानी फिरता नजर आया. 2 साल में कई बार वे गीता से मिलीं तो गीता ने हर बार उन्हें मांबाप से मिलाने का वादा इशारों में याद दिलाया.

खजूर पे अटकी

इंदौर के सैंटर में रहतेरहते एक दफा गीता भाग गई तो खासा हड़कंप मच गया. शहर के 3 थानों की पुलिस उसे ढूंढ़ने में जुट गई. दोपहर को गायब हुई गीता शाम को एक हनुमान मंदिर में मिली तो नेताओं और अफसरों ने चैन की सांस ली.

गीता क्यों और कैसे भागी थी, इस सवाल का जवाब देने से हर कोई खासतौर से मोनिका पंजाबी बचती ही रहीं. मीडिया वाले जब इस सवाल को ले कर मूकबधिर केंद्र पहुंचे तो उन्हें वहां की एक मुलाजिम ने फटकार कर भगा दिया. इस पर गुस्साए मीडिया ने यह कहना शुरू कर दिया कि गीता को मूकबधिर केंद्र में पूरी सहूलियतें नहीं मिल रही हैं और वह कैद से परेशान है.

बात आईगई हो गई, लेकिन गीता को ले कर इंदौर प्रशासन की नींद उड़ी हुई थी. गीता को ले कर तरहतरह की खबरें रोज आने लगी थीं. लिहाजा, प्रशासन भी गीता को ले कर एहतियात बरतने लगा.

मांबाप के मिलने की आस 2 साल में पूरी तरह टूट गई तो गीता की उदासी और गुस्सा दोनों बढ़ने लगे. हालत यह थी कि प्रशासन और मूकबधिर केंद्र वाले इस डर को ले कर हलकान रहने लगे कि कहीं गीता खुद को कोई नुकसान न पहुंचा ले, नहीं तो लेने के देने पड़ जाना तय बात थी.

बुरे और मुश्किल दौर से गुजरती गीता के एक मददगार हैं इंदौर के ही ज्ञानेंद्र पुरोहित और उन की पत्नी मोनिका पुरोहित, जो सालों से मूकबधिरों के लिए काम कर रहे हैं और कई मूकबधिर लड़कियों को उन के घर वालों से मिलवा चुके हैं.

ज्ञानेंद्र ने गीता को सांकेतिक भाषा यानी साइन लैंग्वेज सिखाई और हर तरह से उस के जज्बातों को समझा.

ज्ञानेंद्र गीता की दिमागी हालत देख खौफजदा थे क्योंकि वह गहरे तनाव में थी और इस की वजह भी थी कि जिस नाम और पहचान के लिए वह भारत आई थी, वे उसे लाख कोशिशों के बाद भी नहीं मिल रहे थे. उस की हालत आसमान से गिरे और खजूर पे अटके जैसी हो गई.

स्वयंवर का फ्लौप ड्रामा

जब यह तय हो गया कि अब गीता के मांबाप का मिलना मुश्किल काम है तो उस की शादी की बात उठी. कहा गया कि खुद गीता ने शादी की ख्वाहिश जताई थी, लेकिन यह चर्चा भी रही कि गले की हड्डी बनती जा रही गीता से अब सरकार पल्ला झाड़ना चाहती है इसलिए उस की शादी पर जोर दे रही है जिस से वह ससुराल चली जाए.

गीता की शादी को ले कर भी सरकार ने जल्दबाजी दिखाते हुए ऐलान कर दिया कि गीता का स्वयंवर होगा जिस में जिसे भी वह शौहर चुनेगी उसे सरकारी नौकरी और घर के अलावा तमाम दूसरी सहूलियतें दी जाएंगी. इस स्वयंवर का भी खूब ढिंढोरा पीटा गया. गीता के लिए पति चुनने में खासतौर से फेसबुक पर एक पेज बनाया गया.

उम्मीद थी कि सरकारी दहेज के लालच में सरकारी दामाद बनने के लिए लड़कों की लाइन लग जाएगी लेकिन हुआ उलटा. केवल 14 उम्मीदवारों ने ही गीता से शादी करने में दिलचस्पी दिखाई. बीती 7 और 8 जून को इंदौर में मूकबधिर गीता के स्वयंवर में कुल 6 लोग आए. इन में से किसी ने गीता को रिजैक्ट कर दिया तो किसी को गीता ने.

गीता की शर्तें थीं कि लड़का खाताकमाता और शहरी होना चाहिए, उसे सांकेतिक भाषा भी आनी चाहिए. उसे इंदौर में ही रहना होगा और वह उस के मांबाप को ढूंढ़ने में उस की मदद करने को बाध्य होगा.

इतनी कड़ी और बेतुकी शर्तें सुन कर सभी उम्मीदवार खिसक लिए तो बात फिर वहीं अटक गई, जहां से शुरू हुई थी. यह चर्चा होना कुदरती बात थी कि इंदौर आने के बाद ढाई साल में ही गीता इस हद तक सयानी हो गई है कि उसे अपनाने आए उम्मीदवारों पर ऐसी शर्तें थोप रही है, जिन्हें पूरा कर पाना किसी के बस की बात नहीं.

जाहिर है, गीता सरकारी ऐशोआराम छोड़ कर घरगृहस्थी के बंधन में नहीं बंधना चाहती जहां चूल्हाचौका करना पड़े. 19 जून, 2018 को गीता इस बात पर अड़ गई कि वह शादी तभी करेगी जब उस के मांबाप मिल जाएंगे.

उम्मीदवार भी उम्मीद से कम आए तो इस की और भी वजहें थीं. हर किसी को अहसास था कि अगर शादी के बाद गीता ने जरा सी भी शिकायत की तो घर और नौकरी तो छिनेंगी ही, साथ ही जेल की चक्की और पीसनी पड़ेगी क्योंकि गीता कोई ऐसीवैसी लड़की नहीं, बल्कि सरकारी राजकुमारी है जिस के नखरे उठाना मजबूरी हो जाएगी. इस के अलावा जातपांत और धर्म का बंधन भी आड़े आता दिखा.

अब क्या होगा

2 बार की तामझाम के बाद गीता अब फिर मूकबधिर केंद्र में गुमसुम बैठी है. उस के हमदर्द और मैंटर ज्ञानेंद्र पुरोहित को इस बात का डर है कि वह कहीं गुस्से और दुख में कहीं ऐसावैसा कदम न उठा ले. अगर ऐसा हुआ तो किरकिरी सरकार और सुषमा स्वराज की होगी जो गीता को देश लाई थीं.

गीता बदहाल और गुमनाम जिंदगी जी रही है. जी क्या रही है, बल्कि ढो रही है तो साफ है इस की जिम्मेदार सरकार है जिस ने शोहरत के लिए जल्दबाजी में फैसले लिए और अब गीता के भविष्य के लिए कुछ नहीं कर पा रही है.

गीता की बदकिस्मती बरकरार है और उसे ले कर प्रशासन फिर डरासहमा है तो किसी को कुछ नहीं सूझ रहा है कि अब क्या किया जाए.

यह परेशानी उस वक्त और बढ़ जाती है, जब वह कभी ऐक्टर सलमान खान तो कभी क्रिकेटर विराट कोहली से मिलने की जिद पकड़ लेती है.

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