राजेश साहनी की खुदकुशी : एटीएस कैंपस में दफन है राज

एंटी टेरेरिस्ट स्क्वायड यानी एटीएस में बतौर एएसपी तैनात राजेश साहनी की खुदकुशी पर लखनऊ के लोग यकीन नहीं कर पा रहे. राजेश साहनी का नाम ईमानदार और सीधेसरल अफसरों में लिया जाता था. वह बहुत मृदुभाषी थे. लोग उन के पास अपनी परेशानी ले कर जाते थे तो शिकायत सुनने के बाद वह अपनी सलाह देते समय एक तरह से पूरी काउंसलिंग कर देते थे.

जब वह किसी सेमीनार में हिस्सा लेने जाते थे तो सब से एक ही अपील करते थे कि कभी अपने मन की बात को मन में न रखें, उसे व्यक्त करें, कठिनाई कोई भी हो रास्ता निकल ही आता है. पुलिस विभाग में उन को मोटिवेटर के रूप में देखा जाता था.

राजेश साहनी केवल मोटिवेटर ही नहीं थे, खुद भी बहुत कुछ करते थे. जहां बहादुरी दिखानी होती थी वहां वह पीछे नहीं हटते थे. उन के लिए इस बात का कोई मतलब नहीं था कि पुलिस के किस विभाग में तैनात हैं.

लखनऊवासियों को उस समय का एक वाकया आज भी याद है, जब राजेश साहनी सीओ चौक हुआ करते थे. उन्हीं दिनों एक दिन वह वाहनों की चेकिंग कर रहे थे. तब समाजवादी पार्टी की सरकार थी और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे. चैकिंग के समय सपा के कुछ नेता वहां से एक जीप से गुजरे. पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो उन्होंने जीप को पुलिस पर चढ़ाने का प्रयास किया. राजेश साहनी खुद आगे बढ़े और जीप के बोनट पर चढ़ गए.

दुस्साहसी नेताओं ने जीप की स्पीड बढ़ा दी और गाड़ी लहरा कर चलाने लगे ताकि राजेश साहनी गिर जाएं, उन को चोटें लगें. 3 किलोमीटर तक गाड़ी इसी तरह भागती रही. साहनी की हिम्मत देख नेताओं को लगा कि वे बचेंगे नहीं. ऐसे मे वे जीप को मुख्यमंत्री आवास की ओर ले जाने लगे.

पुलिस ने घेराबंदी की और हजरतगंज में एसएसपी कार्यालय के पास जीप रोक ली. गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने नेताओं को जेल भेज दिया. इस मामले के बाद पूरे लखनऊ में राजेश साहनी की चर्चा जांबाज अफसर के रूप में होने लगी.

वैसे पटना के रहने वाले राजेश साहनी ने अपना कैरियर एक पत्रकार के रूप में शुरू किया था. 1997 में राजेश साहनी का चयन उत्तर प्रदेश पुलिस सेवा में हो गया. मुरादाबाद में प्रोबेशन पीरियड खत्म होने के बाद उन की पोस्टिंग कानपुर में बतौर अंडर ट्रेनी डीएसपी हुई. 2006 में उन्हें लखनऊ में तैनाती मिली. इस के बाद उन्हें किसी जिले में तैनात नहीं किया गया.

2006 से 2012 के बीच वह लखनऊ में ही इंटलीजेंस, पुलिस हेडक्वार्टर, एसटीएफ, डीजीपी हेडक्वार्टर में रहे. 4 साल तक वह डीजी उत्तर प्रदेश के उप सहायक रहे. 2012 में राजेश साहनी प्रतिनियुक्ति पर केंद्र सरकार के अधीन एनआईए में दिल्ली चले गए थे.

2 साल बाद वह 2014 में वापस लखनऊ आए तो उन की नियुक्ति एटीएस लखनऊ में बतौर एएसपी हो गई. पुलिस सेवा में 21 साल गुजारने वाले राजेश साहनी को लिखापढ़ी में बहुत होशियार माना जाता था.

राजेश साहनी केवल समाज के लिए ही व्यवहारकुशल नहीं थे, घरपरिवार की अपनी जिम्मेदारी के प्रति भी पूरी तरह से सजग और जिम्मेदार थे. उन्हें पटना में रहने वाले अपने मातापिता प्रेम सागर साहनी और कांता साहनी की बहुत चिंता लगी रहती थी. वह करीबकरीब रोज ही अपने घर पर फोन कर के बात करते थे.

उन की मां को पैर में चोट लग गई थी, लेकिन मातापिता ने इस बात की जानकारी राजेश साहनी को नहीं दी, क्योंकि वह उन्हें परेशान नहीं करना चाहते थे. जब यह बात राजेश साहनी को पता चली तो उन्होंने पटना जाने के लिए एयर टिकट करा लिया था.

मातापिता के साथ ही साथ वह अपनी पत्नी और बेटी को भी बहुत प्यार करते थे. राजेश साहनी कोई प्रौपर्टी भले ही न बना पाए हो पर सब के दिल में जगह बनाने में सफल रहे थे. वह लखनऊ पुलिस लाइन में अपने सरकारी आवास में ही रहते थे. यही साथ में पत्नी सोनी और बेटी श्रेया रहती थीं.

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राजेश साहनी की बेटी श्रेया ने दिल्ली के लेडी श्रीराम कालेज से ग्रैजुएशन किया था. इस के बाद श्रेया ने मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट औफ सोशल साइंसेज से पोस्टग्रेजुएट करने के लिए एमए में दाखिला ले लिया था. राजेश बेटी को मुंबई छोड़ने जाने के पहले उस के साथ घूमने जाने का कार्यक्रम बना चुके थे.

राजेश पटना हो कर मुंबई जाना चाहते थे, जिस से मातापिता से भी मिल लें. इस के लिए उन्होंने 10 दिन की छुट्टी ली थी. साहनी खुशदिल इंसान थे, इस का पता उन के फोन की रिंग टोन से ही लग जाता था. ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया.’ यह रिंग टोन सालों से उन के फोन की पहचान थी.

औफिस में की खुदकुशी

29 मई की दोपहर अचानक लखनऊ के लोगों को यह खबर मिली कि राजेश साहनी ने गोमतीनगर स्थित एटीएस के औफिस में रिवाल्वर से गोली मार कर खुदकुशी कर ली. इस की सूचना राजेश साहनी के परिवार वालों को बहुत देर में दी गई. उन दिनों राजेश साहनी 10 दिन के अवकाश पर थे. इस के बावजूद वह औफिस गए थे.

जानकारी के अनुसार उन्हें किसी खास काम से बुलाया गया था. 49 साल के राजेश दोपहर के करीब 12 बजे अपने औफिस गए थे. 12:45 से 1 बजे के बीच उन्होंने खुद को गोली मार ली. इन दिनों वह पिथौरागढ़ में पकडे़ गए आईएसआई एजेंट रमेश सिंह के मामले में तफ्तीश कर रहे थे.

बताते हैं कि औफिस पहुंच कर राजेश साहनी ने अपने ड्राइवर मनोज से शस्त्रागार से पिस्टल मंगवाई थी. उन्हें पिस्टल दे कर मनोज गाड़ी में पैट्रोल डलवाने चला गया. उस के जाते ही राजेश साहनी ने अंदर से दरवाजा बंद कर के खुद को गोली मार ली.

औफिस में गोली चलने की आवाज सुनते ही एटीएस एसएसपी जोगेंद्र कुमार उन के रूम में पहुंचे. दरवाजा अंदर से लौक था. दूसरी ओर का दरवाजा खोला गया तो अंदर राजेश साहनी का शव पड़ा था. घटना की सूचना मिलते ही लखनऊ के एसएसपी दीपक कुमार  भी मौके पर पहुंच गए.

घटना के 2 घंटे के बाद एफएसएल के अधिकारी भी मौके पर आ  गए. फोरेंसिक जांच के बाद राजेश का शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. राजेश की दाईं कनपटी के पास गोली लगी थी, जो बाईं कनपटी को चीरते हुए निकल गई थी.

गोली लगने के बाद उन की मौके पर ही मौत हो गई. गोली कनपटी से पिस्टल सटा कर चलाई गई थी. जिस जगह पर गोली लगी उस के आसपास बारूद जलने के निशान पाए गए.

30 मई को राजेश साहनी का अंतिम संस्कार लखनऊ के भैंसाकुंड स्थल पर किया गया. राजेश को अंतिम विदाई देने के लिए केवल पुलिस विभाग के लोग ही नहीं बल्कि लखनऊ के तमाम लोग उमड़पड़े थे. राजेश को मुखाग्नि देने का काम उन की बेटी श्रेया ने किया.

सब की जुबान पर एक ही बात थी कि कभी हार न मानने वाले राजेश ने किस वजह से जिंदगी से हार मान ली. मंत्री सूर्यप्रताप शाही से ले कर पुलिस विभाग के सभी आला अधिकारी वहां मौजूद थे. हैरानी इस बात की थी कि राजेश ने ऐसा क्यों किया?

क्यों की खुदकुशी

पुलिस विभाग में इस बात की चर्चा है कि छुट्टी के बाद भी किस अफसर के कहने पर उन्हें जरूरी काम के लिए बुलाया गया? एटीएस में कामकाज को ले कर राजेश से किसी अफसर का झगड़ा भी हुआ था. कहा जा रहा है कि ऐसे ही किसी हालात से खिन्न हो कर राजेश जैसे जिंदादिल इंसान ने यह कदम उठा लिया होगा.

राजेश के पास जो भी केस आता था उसे वह पूरी तरह सुलझाते थे. एटीएस के करीब 90 फीसदी गुड वर्क में उन की भूमिका प्रमुख होती थी. वह बेहद ठंडे दिमाग से काम लेते थे. आईएसआई एजेंट रमेश सिंह कान्याल को पकड़ने में उन की प्रमुख भूमिका थी.

शुक्रवार 27 मई को रमेश कान्याल को अदालत में पेश किया गया था. पुलिस विभाग के अफसर चाहते थे कि रमेश को रिमांड पर लिया जाए. राजेश को छुट्टी पर जाना था. रमेश का बयान दर्ज कराने के लिए ही वह छुट्टी पर होने के बावजूद औफिस आए थे. सवाल यह उठता है कि औफिस आने के बाद ऐसा क्या हुआ जो राजेश ने खुद को गोली मार ली?

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने इस मामले को सीबीआई के हवाले कर दिया है. सीबीआई की जांच के बाद ही यह पता चल सकेगा कि राजेश ने खुद को गोली क्यों मारी? जिस एटीएस पर आतंकवादियों को पकड़ने की जिम्मेदारी है, वह अपने ही अफसर की मौत के राज का पता लगाने के लिए सीबीआई की शरण में है. यह साफ है कि एटीएस औफिस के कैंपस के अंदर ही राजेश की मौत का राज छिपा है.

प्रेमिका और पत्नी के बीच मौत का खेल

इसी साल मार्च और अप्रैल महीने में महाराष्ट्र में जिस प्रकार से 5 शिवसेना तालुका उप प्रमुखों और नगर सेवकों की हत्याएं हुई थीं, उस से राजधानी मुंबई और उस से सटे ठाणे जनपद के पुलिस अधिकारियों की नींद उड़ गई थी. शिवसेना महाराष्ट्र राज्य की एक बड़ी और जानीमानी पार्टी है.

इन दो महीनों में शिवसेना के 5 नेताओं की हत्या के मामले को राज्य सरकार के गृह विभाग ने भी गंभीरता से लिया था. इन मामलों में से कुछ को तो स्थानीय पुलिस और क्राइम ब्रांच ने सुलझा लिया था. पर कुछ शेष थे. इन में से एक मामला शिवसेना के शाहपुर तालुका उपप्रमुख और नगर सेवक शैलेश निमसे की हत्या का भी था.

पुलिस ने शिवसेना के अन्य नेताओं की हत्या के जो मामले खोले थे उन में वजह उन की स्वयं की दुश्मनी, बिजनैस, प्रौपर्टी और रंगदारी की बात सामने आई थी. लेकिन क्राइम ब्रांच ने जब नगर सेवक और ताल्लुका उपप्रमुख शैलेश निमसे की हत्या का मामला खोला तो लोग स्तब्ध रह गए.

घटना 20 अप्रैल, 2018 की थी. थाणे जनपद के भिवड़ी तालुका गणेशपुरी पुलिस थाने में उस समय अफरातफरी मच गई थी, जिस समय चिनचेली गांव के काशीनाथ पाटिल ने थाने आ कर ड्यूटी पर तैनात पीआई शेखर डोबे को यह खबर दी कि देवचोले परिसर की सीमा से लगे दाल्या माला शिखर की पहाडि़यों की झाडि़यों के बीच एक व्यक्ति का झुलसा हुआ शव पड़ा है.

उस समय दिन के यही कोई 10 बज रहे थे. पीआई शेखर डोबे ने पाटिल की इस सूचना को गंभीरता से लिया और मामले की जानकारी थानाप्रभारी के अलावा पुलिस कंट्रोल रूम को देने के बाद पुलिस टीम ले कर घटनास्थल की तरफ रवाना हो गए.

जिस समय पुलिस टीम घटनास्थल पर पहुंची थी उस समय तक घटना की खबर पूरे इलाके में भी फैल गई थी. देखते ही देखते घटनास्थल पर काफी लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी. पुलिस ने घटनास्थल का मुआयना किया.

युवक का शव अधजली अवस्था में पड़ा था. वह एक मजबूत कदकाठी वाला था. पुलिस ने अनुमान लगाया कि उस की हत्या कहीं और करने के बाद यहां ला कर लाश को जलाने की कोशिश की गई होगी ताकि लाश की शिनाख्त न हो सके.

पीआई शेखर डोबे अभी अपने सहायकों के साथ घटनास्थल और शव का निरीक्षण कर ही रहे थे कि मामले की सूचना पा कर थाणे के डीसीपी प्रशांत कदम, एसीपी कृष्णकांत काटकर भी मौके पर पहुंच गए. उन के साथ फोरेंसिक टीम के अधिकारी भी थे.

फोरेंसिक टीम के काम खत्म होने के बाद डीसीपी प्रशांत कदम और एसीपी कृष्णकांत काटकर ने शव और घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण कर आपस में विचार विमर्श किया. मामले की तफ्तीश के विषय में पीआई शेखर डोबे को आवश्यक निर्देश दे कर वह वहां से अपने औफिस लौट गए.

इस के बाद पीआई शेखर डोबे ने वहां मौजूद लोगों से लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की लेकिन कोई भी उस लाश को नहीं पहचान सका. यह साबित हो गया था कि मृतक उस इलाके का नहीं है. पुलिस को घटनास्थल से भी कोई ऐसा सबूत नहीं मिला जिस से शव की शिनाख्त और तफ्तीश में कोई मदद मिल सके.

शेखर डोबे ने घटनास्थल की सारी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए जे.जे. अस्पताल भेज दिया. थाने लौट कर उन्होंने काशीनाथ पाटिल के बयान पर अज्ञात हत्यारे के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के मामले की तफ्तीश अपने हाथों में ले ली.

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लेकिन उन के सामने समस्या यह थी कि मृतक की शिनाख्त के बिना तफ्तीश कैसे आगे बढ़ाई जाए, दूसरे घटनास्थल से भी कोई सूत्र नहीं मिला था मगर उन्हें केस की जांच तो करनी ही थी. इसलिए उन्होंने जिले के सभी थानों में अज्ञात युवक की लाश बरामद होने का मैसेज वायरलैस से प्रसारित कर दिया था.

साथ ही यह भी जानने की कोशिश की कि कहीं किसी थाने में उस हुलिए के युवक की कोई गुमशुदगी तो दर्ज नहीं है. इस कोशिश के बाद भी उन्हें कोई सफलता नहीं मिली.

तफ्तीश जटिल थी लेकिन पुलिस टीम निराश नहीं हुई. इस से पहले कि पुलिस तफ्तीश की कोई दूसरी रूप रेखा तैयार करती टीम को एक अहम जानकारी मिली. पुलिस को पता चला कि घटनास्थल से करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर उसी दिन से हुंडई की एक सोनाटा इंबेरा कार लावारिश स्थित में  खड़ी है, जिस दिन पुलिस ने वह अज्ञात व्यक्ति की लाश बरामद की थी.

क्या कार से मृतक का कोई संबंध हो सकता है, यह सोच कर पीआई शेखर डोबे उस कार का निरीक्षण करने पहुंच गए. उन्होंने जब उस कार के पेपर चेक किए तो वह कार शिवसेना के शाहपुर तालुका उपप्रमुख और नगरसेवक शैलेश निमसे की निकली जो अधई गांव के रहने वाले थे.

पुलिस टीम जब शैलेश के घर पहुंची तो उन की पत्नी साक्षी उर्फ वैशाली ने बताया कि उस रात करीब एक बजे पति के मोबाइल पर किसी का फोन आया था. फोन रिसीव करने के बाद वह कार ले कर निकल गए थे. जाते समय वह दरवाजे को बाहर से ही बंद कर गए थे.

वह कहां गए और क्यों गए थे इस विषय में उसे कोई जानकारी नहीं है. पुलिस ने साक्षी को अस्पताल ले जा कर वह अधजला शव दिखाया तो वह शव को देखते ही दहाड़े मार कर रोने लगी. इस से पुलिस समझ गई कि मृतक साक्षी का पति ही है.

साक्षी से पूछताछ के बाद पुलिस को पता चला कि मृतक शैलेश निमसे उस का पति था और वह शिवसेना का शाहपुर तालुका का उपप्रमुख और नगर सेवक था. जैसे ही शिवसेना के नेताओं और कार्यकर्ताओं को शैलेश निमसे की हत्या की जानकारी मिली, वह पुलिस मुख्यालय के सामने इकट्ठे होने लगे. उन्होंने हत्यारे की गिरफ्तारी और शिवसेना के नेताओं की सुरक्षा की मांग को ले कर नारेबाजी शुरू कर दी.

मामले को तूल पकड़ते देख कर पुलिस आयुक्त, पुलिस उपायुक्त और एसीपी तुरंत प्रदर्शनकारियों के बीच पहुंच गए. अधिकारियों ने जैसेतैसे कर के प्रदर्शन कर रहे शिवसैनिकों को समझाया. उन्होंने उन्हें भरोसा दिया कि इस केस की जांच क्राइम ब्रांच से करा कर जल्द ही हत्यारों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा. तब कहीं जा कर प्रदर्शनकारी शांत हुए.

इस के बाद पुलिस कमिश्नर ने इस केस को सुलझाने के लिए क्राइम ब्रांच के सीनियर पीआई व्यंकट आंधले के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में सहायक पीआई प्रमोद बड़ाख, एसआई अभिजीत टेलर, बजरंग राजपूत, विशाल वायकर, हेड कांस्टेबल अशोक पाटिल, विजय ढेगरे और मनोज चव्हाण को शामिल किया गया.

क्राइम ब्रांच की टीम ने कई पहलुओं को ध्यान में रखते हुए जांच की लेकिन शैलेश निमसे के मामले में राजनैतिक, प्रौपर्टी, आपसी रंजिश आदि का मामला नजर नहीं आया. तब क्राइम ब्रांच ने शैलेश के घर से ही जांच की शुरुआत की.

घर की कुंडली खंगालने पर पता चला कि शैलेश निमसे के किसी महिला के साथ अवैध संबंध थे. जिस की वजह से शैलेश की अपनी पत्नी साक्षी उर्फ वैशाली से अकसर लड़ाई होती रहती थी. वह उस के साथ मारपीट करता था.

इस बात की जब गहराई से जांच की गई तो शैलेश की पत्नी साक्षी उर्फ वैशाली पर पुलिस को शक होने लगा. लेकिन मामला एक सभ्य और सम्मानित परिवार से संबंधित था इसलिए पुलिस ने बिना किसी पुख्ता सबूत के उस पर हाथ डालना ठीक नहीं समझा.

दूसरी ओर एपीआई प्रमोद बड़ाख ने शैलेश निमसे के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स व सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को जांचा तो प्रमोद बबन लुटे नाम के एक शख्स की स्थिति संदिग्ध नजर आई. यह जानकारी उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दी.

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर एपीआई ने प्रमोद बबन लुटे को थाने बुलवा लिया. उस से शैलेश की हत्या के बारे में मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की और उस के सामने फोन की काल डिटेल्स व सीसीटीवी फुटेज रखी तो उस के होश उड़ गए.

ऐसे में उस के सामने अपना अपराध स्वीकार करने के अलावा और कोई दूसरा चारा नहीं था. लिहाजा वह टूट गया और अपना अपराध स्वीकार करते हुए शैलेश की हत्या की उस ने जो कहानी बताई, वह हैरान कर देने वाली निकली.

प्रमोद लुटे के बयान के आधार पर पुलिस ने उसी समय शैलेश निमसे की पत्नी साक्षी उर्फ वैशाली को भी पति की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. मजे की बात यह थी कि साक्षी के चेहरे पर अपने पति की हत्या का जरा भी अफसोस नहीं था. उसने बिना किसी दबाव के पति की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया.

43 वर्षीय शैलेश निमसे एक संभ्रांत परिवार का युवक था. वह अपने परिवार के साथ ठाणे जनपद के तालुका शाहपुर के अधई गांव में रहता था. मांबाप की अकेली संतान होने के कारण उस का परिवार में कुछ ज्यादा ही प्यारदुलार था. ज्यादा प्यार के कारण वह पढ़लिख भी नहीं सका.

उस की दिलचस्पी नेतागिरी में अधिक थी. स्कूल छोड़ने के बाद वह पूरी तरह से शिवसेना पार्टी का सक्रिय कार्यकर्ता बन गया था. इस के बाद उस की इलाके में धाक बन गई थी, जिस के चलते वह अपना अवैध काम भी करने लगा था.

नेतागिरी से उसे कमाई होने लगी तो वह पार्टी को भी चंदे के रूप में मोटी रकम देने लगा. यही कारण था कि वह पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के काफी करीब आ गया था. तब पार्टी ने उसे शाहपुर का तालुका का उपप्रमुख और नगर सेवक बना दिया था.

करीब 15 साल पहले शैलेश की शादी साक्षी उर्फ वैशाली से हुई थी. उस का अच्छा स्वभाव था. वह शैलेश निमसे को बहुत प्यार करती थी. वक्त के साथ वह 3 बच्चों की मां भी बन गई थी. शादी के 10 सालों तक तो शैलेश ने अपने परिवार का काफी ध्यान रखा. लेकिन 2013 में उस के जीवन में एक ऐसी लड़की ने प्रवेश किया कि उस के परिवार की नींव हिल गई.

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जो शैलेश अपने परिवार के बिना एक क्षण नहीं रह सकता था वह धीरेधीरे अपने परिवार से दूरियां बनाने लगा. वह न तो पत्नी से ठीक तरह से बात करता और न ही बच्चों को प्यारदुलार करता था. धीरेध्ीरे जब उस ने घर में भी आना कम कर दिया तो साक्षी परेशान हो उठी.

पहले तो साक्षी को लगा कि पति को कोई पार्टी का तनाव या परेशानी होगी जिस से वह बच्चों और उसे समय नहीं दे पा रहे हैं. लेकिन जब सच्चाई सामने आई तो साक्षी के होश उड़ गए. साक्षी ने पहले शैलेश को समझाने और मनाने की कोशिश की, उस ने अपने और बच्चों के भविष्य का वास्ता दिया.  लेकिन शैलेश पर उस की बातों का कोई असर नहीं हुआ.

दलदल में डूबे शैलेश ने अपनी पत्नी और बच्चों की बातों को नजरअंदाज करते हुए अपनी प्रेमिका को रहने के लिए फ्लैट दे दिया. यह सब जान कर साक्षी के धैर्य का बांध टूट गया. अब आए दिनों उस की प्रेमिका को ले कर घर का माहौल खराब होने लगा. घर में लड़ाईझगड़े होने शुरू हो गए थे.

इस का नतीजा यह हुआ कि शैलेश ने अपनी पत्नी साक्षी को तलाक दे कर अपनी सारी प्रौपर्टी से बेदखल कर देने का मन बना लिया. इस के लिए उस ने साक्षी को धोखे में रख कर उस से तलाक के पेपरों पर हस्ताक्षर भी करा लिए. ताकि अपनी सारी प्रौपर्टी अपनी प्रेमिका को दे सके.

पति के इस चक्रव्यूह की जानकारी जब साक्षी को हुई तो उस के पैरों के नीचे की जैसे जमीन सरक गई. उस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे. अगर पति ने ऐसा किया तो वह फिर क्या करेगी. वह अपने छोटेछोटे बच्चों को ले कर कहां जाएगी. उस के और बच्चों के भविष्य का क्या होगा.

इस के लिए उस ने पति को फिर समझाया. उस के सामने रोई, गिड़गिड़ाई, लेकिन शैलेश को बच्चों और पत्नी पर कोई दया नहीं आई. वह अपने फैसले पर अटल रहा. बल्कि उस ने पत्नी को घर छोड़ कर जाने की तारीख भी बता दी थी.

पति का यह निर्णय जान कर साक्षी उर्फ वैशाली ने अपना आपा खो दिया और उस ने अपने पति शैलेश निमसे के प्रति एक खतरनाक फैसला कर लिया. उस ने बेवफा पति को सजा देने की योजना बना डाली.

जिस दिन शैलेश पत्नी और बच्चों को अपनी प्रौपर्टी से बेदखल कर अपनी प्रेमिका के साथ रहने को जाने वाला था. उस से एक दिन पहले ही साक्षी ने अपने फैसले के अनुसार पति को सदासदा के लिए नींद के आगोश में भेज दिया. इस में उस का साथ शैलेश के एक किराएदार प्रमोद बबन लुटे ने दिया था.

दरअसल पति के निर्णय से आहत साक्षी को पति से सख्त नफरत हो गई थी. अपनी दर्दभरी कथा जब उस ने अपने यहां रहने वाले किराएदार प्रमोद लुटे को सुनाई तो वह उस की मदद करने के लिए तैयार हो गया. पर इस के लिए उस ने साक्षी के सामने पैसों की मांग रखी. जो साक्षी उसे देने के लिए तैयार हो गई.

डेढ़ लाख रुपए की सुपारी लेने के बाद प्रमोद बबन लुटे अपने 2 साथियों को साथ ले कर शैलेश की हत्या की रूप रेखा तैयार करने में जुट गया. अपनी तैयारी पूरी करने के बाद प्रमोद ने इस की जानकारी साक्षी को भी दे दी थी.

19 अप्रैल, 2018 को अपनी मौत से अनभिज्ञ शैलेश जब अपने घर पर आया तो बहुत खुश था. उस ने साक्षी से कहा कि वह आज की रात और इस घर में रह ले. कल सुबह ही वह उसे और उस के बच्चों के साथ इस घर और अपनी पूरी प्रौपर्टी से बेदखल कर के वह अपनी प्रेमिका के साथ रहने के लिए चला जाएगा.

लेकिन उसे क्या पता था कि कौन घर छोड़ कर जाएगा. प्रेमिका के साथ रहने का सपना उस का सपना ही रह जाएगा. साक्षी ने रोजाना की तरह पति को शाम का खाना परोस कर दिया. खाना खाने के बाद उस ने साक्षी की तरफ नफरत से देखा और सो गया.

उस के सो जाने के बाद साक्षी उस का कमरा खुला छोड़ कर दूसरे कमरे में सोने के लिए चली गई. लेकिन नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. उसे प्रमोद लुटे के आने का इंतजार था.

रात करीब एक बजे जब प्रमोद लुटे के आने की आहट हुई तो साक्षी ने उठ कर घर का मेन दरवाजा खोल दिया. प्रमोद लुटे अपने 2 साथियों के साथ एक मोटरसाइकिल से आया था. नींद में सोए शैलेश की उन लोगों ने गला दबा कर हत्या कर दी.

शैलेश की हत्या करने के बाद तीनों ने शव को उठा कर के उस की हुंडई सोनाटा इंबेरा कार की डिक्की में डाला और उसे ठिकाने लगाने के लिए प्रमोद लुटे अपने एक साथी के साथ गणेशपुरी पुलिस थाने की सीमा में ले गया.

शव को झाडि़यों में डाल कर उन्होंने उस के ऊपर पेट्रौल डाला और आग लगा दी. इस के बाद उस की कार को घटनास्थल से लगभग डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर ले जा कर लावारिश हालत में छोड़ कर वे फरार हो गए. लाश ठिकाने लगाने की जानकारी प्रमोद ने साक्षी को भी दे दी थी.

अभियुक्तों ने पुलिस से बचने की लाख कोशिश की लेकिन क्राइम ब्रांच अधिकारियों की नजर से अधिक दिनों तक फरार नहीं रह सके. 24 अप्रैल, 2018 को क्राइम ब्रांच ने प्रमोद बबन लुटे और शैलेश की पत्नी साक्षी निमसे को अपनी गिरफ्त में ले लिया. दोनों से विस्तृत पूछताछ के बाद क्राइम ब्रांच ने उन्हें आगे की तफ्तीश के लिए गणेशपुरी पुलिस थाने के अधिकारियों को सौंप दिया.

गणेशपुरी पुलिस ने उन के विरुद्ध भादंवि की धारा 302, 201, 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्हें तलोजा जेल भेज दिया. कथा लिखने तक इस हत्याकांड में शामिल 2 अन्य अभियुक्तों का पुलिस पता नहीं लगा सकी थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

मैं अपनी चाची के साथ 2 सालों से हमबिस्तरी कर रहा हूं. वह पेट से हैं, फिर भी मेरे साथ हमबिस्तरी करना चाहती हैं. मैं क्या करूं.

सवाल
मैं 20 साल का हूं. मैं अपनी चाची के साथ 2 सालों से हमबिस्तरी कर रहा हूं. वह 4 महीने से पेट से है, फिर भी मेरे साथ हमबिस्तरी करना चाहती है. मना करने पर सब को बताने को कहती है. मैं क्या करूं?

जवाब
चाची के साथ संबंध बना कर आप ने अच्छा नहीं किया. आप फौरन यह सिलसिला बंद कर दें. चाची की धमकी से न डरें, औरतें ऐसी बातें बता कर खुद मुसीबत में फंस जाती हैं.

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चाची की यारी में कर दिया कत्ल

17 अक्तूबर, 2016 की सुबह जिला गोरखपुर के चिलुआताल के महेसरा पुल के नजदीक जंगल में एक पेड़ के सहारे एक साइकिल खड़ी देखी गई, जिस के कैरियर पर एक बोरा बंधा था. बोरा खून से लथपथ था, इसलिए देखने वालों को अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि बोरे में लाश हो सकती है.

लाश  होने की संभावना पर ही इस बात की सूचना थाना चिलुआताल पुलिस को दे दी गई थी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर रामबेलास यादव पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर आ पहुंचे थे. बोरे से उस समय भी खून टपक रहा था.

इस का मतलब था कि बोरा कुछ देर पहले ही साइकिल से वहां लाया गया था. उन्होंने बोरा खुलवाया तो उस में से एक आदमी की लाश निकली. मृतक की उम्र 35-36 साल रही होगी. उस के सिर पर किसी वजनदार चीज से वार किया गया था. वह रंगीन सैंडो बनियान और लुंगी पहने था. शायद रात को सोते समय उस की हत्या की गई थी.

पुलिस को लाश की शिनाख्त कराने में जरा भी दिक्कत नहीं हुई. वहां जमा भीड़ ने मृतक की शिनाख्त प्रौपर्टी डीलर सुरेश सिंह के रूप में कर दी थी. वह चिलुआताल गांव का ही रहने वाला था.

शिनाख्त होने के बाद रामबेलास यादव ने मृतक के घर वालों को सूचना देने के लिए 2 सिपाहियों को भेजा. दोनों सिपाही मृतक के घर पहुंचे तो घर पर कोई नहीं मिला. पड़ोसियों से पता चला कि सुरेश सिंह के बिस्तर पर भारी मात्रा में खून मिलने और उस के बिस्तर से गायब होने से घर के सभी लोग उसी की खोज में निकले हुए थे.

घर पर पुलिस के आने की सूचना मिलने पर मृतक सुरेश सिंह के बड़े भाई दिनेश सिंह घर आए तो जंगल में एक लाश मिलने की बात बता कर दोनों सिपाही उन्हें अपने साथ ले आए. लाश देखते ही दिनेश सिंह फफक कर रो पड़े. इस से साफ हो गया कि मृतक उन का भाई सुरेश सिंह ही था.

इस के बाद पुलिस ने घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भिजवा दिया और उस साइकिल को जब्त कर लिया, जिस पर लाश बोरे में भर कर वहां लाई गई थी.

थाने लौट कर रामबेलास यादव ने मृतक के बडे़ भाई दिनेश सिंह की तहरीर पर सुरेश सिंह की हत्या का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर लिया. मृतक सुरेश सिंह प्रौपटी डीलिंग का काम करता था. विवादित जमीनों को खरीदनाबेचना उस का मुख्य धंधा था. पुलिस ने इसी बात को ध्यान में रख कर जांच आगे बढ़ाई, लेकिन उस का ऐसा कोई दुश्मन नजर नहीं आया, जिस से लगे कि हत्या उस ने कराई है.

यह हत्याकांड अखबारों की सुर्खियां बना तो एसएसपी रामलाल वर्मा ने एसपी (सिटी) हेमराज मीणा को आदेश दिया कि वह जल्द से जल्द इस मामले का खुलासा कराएं. उन्होंने सीओ देवेंद्रनाथ शुक्ला और थानाप्रभारी रामबेलास यादव को सुरेश सिंह तथा उस के घरपरिवार के आसपास जांच का घेरा बढ़ाने को कहा.

क्योंकि उन्हें लग रहा था कि यह हत्या दुश्मनी की वजह से नहीं, बल्कि अवैधसंबंधों की वजह से हुई है. क्योंकि मृतक को जिस तरह बेरहमी से मारा गया था, इस तरह लोग अवैध संबंधों में ही नफरत में मारे जाते हैं. इसी बात को ध्यान में रख कर जांच आगे बढ़ाई गई तो जल्दी ही नतीजा निकलता नजर आया.

किसी मुखबिर ने बताया कि पिछले कई सालों से सुरेश सिंह की अपनी पत्नी से पटती नहीं थी. दोनों में अकसर लड़ाईझगड़ा होता रहता था और इस की वजह सुरेश सिंह का सगा भतीजा राहुल चौधरी था. क्योंकि उस के अपनी चाची राधिका से अवैध संबंध थे.

घटना से सप्ताह भर पहले भी इसी बात को ले कर सुरेश और राधिका के बीच काफी झगड़ा हुआ था. तब सुरेश ने पत्नी की पिटाई कर दी थी, जिस से नाराज हो कर वह बच्चे को ले कर मायके चली गई थी. रामबेलास यादव को हत्या की वजह का पता चल गया था. राहुल से पूछताछ करने के लिए वह उस के घर पहुंचा तो उस के पिता दिनेश सिंह ने बताया कि वह तो लखनऊ में है.

लखनऊ में राहुल गोमतीनगर में किराए का कमरा ले कर रहता है और सरकारी नौकरी के लिए तैयारी कर रहा है. पिता का कहना था कि हत्या वाले दिन के एक दिन पहले वह लखनऊ चला गया था. जबकि मुखबिर ने उन्हें बताया था कि घटना वाले दिन सुबह वह चिलुआताल में दिखाई दिया था.

पिता का कहना था कि घटना से एक दिन पहले यानी 16 अक्तूबर, 2016 को राहुल लखनऊ चला गया था, जबकि मुखबिर का कहना था कि घटना वाले दिन वह चिलुआताल में दिखाई दिया था. मुखबिर की बात पर विश्वास कर के रामबेलास यादव ने राहुल को लखनऊ से लाने के लिए 2 सिपाहियों को भेज दिया.

लखनऊ पुलिस की मदद से गोरखपुर पुलिस 22 अक्तूबर, 2016 को लखनऊ के गोमतीनगर से राहुल चौधरी को गिरफ्तार कर गोरखपुर ले आई. थाने ला कर उस से सुरेश सिंह की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने बिना किसी हीलाहवाली के चाची से अवैध संबंधों की वजह से चाचा सुरेश सिंह की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. राहुल ने चाची के प्रेम में पड़ कर चाचा की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर के थाना चिलुआताल में सुरेश सिंह पत्नी राधिका सिंह और 6 साल के बेटे के साथ रहता था. उस का बड़ा भाई था दिनेश सिंह. राहुल उसी का बेटा था. दोनों भाइयों के परिवार भले ही अलगअलग रहते थे, लेकिन रहते एक ही मकान में थे. सुखदुख में भी एकदूसरे की मदद भी करते थे.

गांव वाले भाइयों के इस प्रेम को देख मन ही मन जलते थे. सुरेश सिंह चेन्नई में किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था. लेकिन पत्नी राधिका बेटे के साथ गांव में रहती थी. वह साल में एक या 2 बार ही घर आता था. उस के न रहने पर जरूरत पड़ने पर घर के छोटेमोटे काम उस के बड़े भाई का बेटा राहुल कर दिया करता था.

राहुल और राधिका थे तो चाचीभतीजा, लेकिन हमउम्र होने की वजह से दोनों दोस्तों की तरह रहते थे, बातचीत भी वे दोस्तों की ही तरह करते थे. इस का नतीजा यह निकला कि धीरेधीरे उन के बीच मधुर संबंध बन गए. उन के मन में एकदूसरे के लिए चाहत के फूल खिले तो एकदूसरे के स्पर्श मात्र से उन का रोमरोम खिल उठने लगा.

राहुल चाची राधिका से जुनून के हद तक प्यार करने लगा तो राधिका ने भी उस के प्यार पर अपने समर्पण की मोहर लगा दी. एक बार मर्यादा टूटी तो उन्हें जब भी मौका मिलता, जिस्म की भूख मिटाने लगे. दोनों ने अपने इस अनैतिक रिश्ते पर परदा डालने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन पाप के इस रिश्ते को वे छिपा नहीं सके.

लोग राधिका और राहुल को ले कर तरहतरह की चर्चाएं भी करने लगे, पर उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया. जब सुरेश सिंह के किसी शुभचिंतक ने उसे फोन कर के चाचीभतीजे के बीच पक रही खिचड़ी की जानकारी दी तो वह नौकरी छोड़ कर गांव आ गया. यह सन 2014 की बात है.

सुरेश ने खूब पैसे कमाए थे. उन्हीं पैसों से उस ने गांव में रह कर प्रौपर्टी का काम शुरू कर दिया, जो थोड़ी मेहनत के बाद अच्छा चल निकला. कामधंधे की वजह से अकसर उसे दिन भर घर से बाहर रहना पड़ता था, इसलिए राहुल और राधिका को मिलने में कोई परेशानी नहीं होती थी. लेकिन एक दिन अचानक वह दोपहर में घर आ गया तो उस ने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ लिया.

फिर क्या था, सुरेश ने न पत्नी को छोड़ा और न भतीजे को. उस ने इस बात को ले कर भाई से बात की तो बेटे की हरकत से वह काफी शर्मिंदा हुए. समाज और रिश्तों की दुहाई दे कर उन्होंने बेटे को घर से निकाल दिया तो वह लखनऊ आ गया और गोमतीनगर में किराए पर कमरा ले कर रहने लगा.

यहां वह सरकारी नौकरी की परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था. सुरेश की वजह से गांव में राहुल और उस की चाची की काफी बदनामी हुई थी. यही नहीं, उसे घर से भी निकाल दिया गया था. राधिका की खूब थूथू हुई थी. गांव से ले कर नातेरिश्तेदारों तक ने उस की खूब फजीहत की थी.

धीरेधीरे बात थमती गई. मांबाप से मांफी मांग कर राहुल फिर घर लौट आया. मांबाप ने उसे माफ जरूर कर दिया था, लेकिन उस पर कड़ी नजर रखी जा रही थी. राधिका से उसे मिलने की सख्त मनाही थी. जबकि वह चाची से मिलने के लिए तड़प रहा था. लेकिन सख्त पहरेदारी की वजह से दोनों का मिलन संभव नहीं हो पा रहा था.

चाचा सुरेश की वजह से राहुल प्रेमिका चाची से मिल नहीं पा रहा था. उसे लग रहा था कि जब तक चाचा रहेगा, वह चाची से कभी मिल नहीं पाएगा. चाचा प्यार की राह का कांटा लगा तो वह उसे हटाने के बारे में सोचने लगा. आखिर उस ने उसे हटाने का निश्चय कर लिया.

अब वह ऐसी राह खोजने लगा, जिस पर चल कर उस का काम भी हो जाए और वह फंसे भी न. काफी सोचविचार कर उस ने तय किया कि वह अपना मोबाइल फोन औन कर के बाइब्रेशन पर लखनऊ वाले कमरे पर ही छोड़ देगा और रात में गोरखपुर पहुंच कर चाचा की हत्या कर के लखनऊ अपने कमरे पर आ जाएगा.

पुलिस उस पर शक करेगी तो मोबाइल लोकेशन के सहारे वह बच जाएगा. तब वह शायद यह भूल गया था कि कातिल कितना भी चालाक क्यों न हो, कानून के लंबे हाथों से उस का बचना आसान नहीं है.

राहुल जब से घर आ कर रहने लगा था, सुरेश और उस की पत्नी राधिका के बीच उसे ले कर अकसर झगड़ा होता रहता था. जबकि इस बीच राहुल एक बार भी चाची से नहीं मिला था.

रोजरोज के झगड़े से परेशान हो कर राधिका नाराज हो कर बेटे को ले कर मायके चली गई थी. राधिका के चली जाने से राहुल काफी दुखी था. उस का मन घर में नहीं लगा तो 16 अक्तूबर को मांबाप से कह कर वह लखनऊ चला गया.

चाची से न मिल पाने की वजह से राहुल तड़प रहा था. तड़प की वेदना से आहत हो कर उस ने योजना को अमलीजामा पहना दिया. योजना के अनुसार 17 अक्तूबर की शाम 4 बजे इंटरसिटी ट्रेन से वह गोरखपुर के लिए चल पड़ा. रात 11 बजे के करीब वह गोरखुपर पहुंचा. स्टेशन से टैंपो ले कर वह चिलुआताल के बरगदवां चौराहे पर पहुंचा और वहां से पैदल ही घर पहुंच गया.

उसे घर तो जाना नहीं था, इसलिए सब से पहले उस ने पिता के कमरे के दरवाजे की सिटकनी बाहर से बंद कर दी, ताकि शोर होने पर वह बाहर न निकल सकें.

इस के बाद पीछे की दीवार के सहारे वह सुरेश सिंह के कमरे में पहुंचा, जहां वह गहरी नींद सो रहा था. उसे देखते ही नफरत से राहुल का खून खौल उठा. उसे पता था कि चाचा के घर में लोहे की रौड कहां रखी है. उस ने लोहे की रौड उठाई और पूरी ताकत से सुरेश के सिर पर 3 वार कर के उसे मौत के घाट उतर दिया.

राहुल को विश्वास हो गया कि सुरेश की मौत हो चुकी है तो उस ने घर में रखा बोरा उठाया और उसी में उस की लाश भर कर रात के 4 बजे के करीब बाहर झांक कर देखा कि कोई देख तो नहीं रहा. जब उसे लगा कि कोई नहीं देख रहा है तो उस ने सुरेश की ही साइकिल घर उस की लाश वाले बोरे को कैरियर पर रख कर जंगल की ओर चल पड़ा.

लेकिन जब वह झील की ओर जा रहा था, तभी एक ट्रैक्टर आता दिखाई दिया. उसे देख कर वह घबरा गया और साइकिल को एक पेड़ से टिका कर भागा. ट्रैक्टर पर बैठे एक मजदूर ने उसे भागते देख लिया तो उस ने उस का नाम ले कर पुकारा भी, लेकिन रुकने के बजाए राहुल बरगदवां चौराहे की ओर भाग गया.

वहां से उस ने टैंपो पकड़ी और गोरखपुर रेलवे स्टेशन पहुंचा, जहां से ट्रेन पकड़ कर लखनऊ स्थित अपने कमरे पर चला गया. उस ने चालाकी तो बहुत दिखाई, लेकिन वह काम न आई और पकड़ा गया. राहुल चौधरी की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त लोहे की रौड बरामद कर ली थी.

पूछताछ के बाद राहुल को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. राधिका के पति की हत्या की खबर पा कर ससुराल आ गई थी. राहुल ने जो किया था, उस से उसे काफी दुख पहुंचा. क्योंकि उस ने राहुल से कभी नहीं कहा था कि वह उस के पति की हत्या कर उसे विधवा बना दे.

राहुल के मांबाप भी काफी दुखी हैं. उन्होंने राहुल से अपना नाता तोड़ कर उसे उस के हाल पर छोड़ दिया है.

– कथा में राधिका सिंह बदला नाम है. कथा पुलिस सूत्रों एवं राहुल के बयानों पर आधारित

 

 

केन्या की अनोखी दहेज प्रथा : ब्राइड प्राइज

केन्या में अपने 30 वर्षों के प्रवास के दौरान मैं ने वहां की अनेक सामाजिक कुरीतियों तथा रीतियों का गहन अध्ययन किया. वहां की दहेज प्रथा मुझे बहुत आश्चर्यजनक लगी.

भारत में लड़की वाले लड़के वालों को दहेज देते हैं हालांकि यह गैरकानूनी है. इस के विपरीत केन्या में लड़के वाले लड़की के मातापिता को भारी रकम देते हैं. दहेज देने के बाद ही विवाह कानूनी तौर पर स्वीकृत होता है. इस प्रथा को केन्या में ‘ब्राइड प्राइज’ के नाम से जाना जाता है.

अचंभे वाली बात यह लगी कि केन्या सरकार ने इस प्रथा को पूर्ण मान्यता दे रखी है. ऐसा केवल केन्या में ही नहीं बल्कि केन्या के समीप के देशों, तंजानिया तथा युगांडा में भी इस प्रकार की दहेज प्रथा का प्रचलन है.

विभिन्न अफ्रीकी व्यक्तियों से संपर्क करने पर पता चला कि वे इस प्रकार की दहेज प्रथा का शिकार हुए. मेरे साथ एक अध्यापिका मिस रोज कार्यरत थीं. उन का एक ही बेटा था. उस के जन्मदिवस पर मु?ो आमंत्रित किया गया. वहां उन्होंने अपने पतिदेव मिस्टर पीटर से मेरा परिचय करवाया. मैं ने पीटर से पूछा कि क्या कारण है तुम्हारी पत्नी अपने नाम के साथ मिस लिखती हैं? पीटर ने बताया कि जो ब्राइड प्राइज रोज के मातापिता के साथ तय हुई है जब वह चुक जाएगी तब हमारा विवाह चर्च में होगा.

ब्राइड प्राइज यहां के अलगअलग कबीलों में अलगअलग ढंग से अदा की जाती है. कई कबीले जैसे कि किकूयू, लुओ, कलेंजिन आर्थिक तौर पर संपन्न हैं उन्हें कोई दिक्कत नहीं आती. जो कबीले, जैसे कि मसाई, तुरकाना, मिजीकेंडा आर्थिक तौर पर संपन्न नहीं हैं, वे अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार ‘ब्राइड प्राइज’ तय करते हैं.

मेरे एक अफ्रीकी मित्र मिस्टर साइमन, जोकि लगभग 55 वर्ष के थे, मु?ो एक निमंत्रण पत्र दे गए. पूछने पर बोले कि आप को मेरे विवाह समारोह में अवश्य आना है. साइमन के बच्चे विश्वविद्यालय में पढ़ रहे थे. ब्राइड प्राइज पूर्ण होने के बाद उन का चर्च में विधिवत विवाह हो रहा था.

पर पिछले कुछ वर्षों से केन्या की युवा पीढ़ी में जागृति आई है. बहुत से युवकयुवतियां अब इकट्ठे रहने लगे हैं पतिपत्नी के तौर पर. जो युवतियां ये कदम उठाती हैं उन्हें संपत्ति से वंचित कर दिया जाता है तथा किसी भी प्रकार की सहायता उन को अपने मांबाप से नहीं मिलती.

ब्राइड प्राइज तय कैसे होती है यह भी बहुत रोचक है. ब्राइड प्राइज की रकम गायों की संख्या से तय की जाती है. गरीब लड़के अपनी वधू के लिए 10 से 50 गायों तक का सौदा कर सकते हैं पर मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग के लड़के वाले 200 से 400 गायों तक भी देना स्वीकार कर लेते हैं. यह मोलभाव सामूहिक और सांस्कृतिक गीतों और नृत्यों के साथसाथ तय होता है. इस के साथ बजने वाले वाद्ययंत्र चमड़े के ड्रम, मंजीरे और गायों के सींगों से बने वाद्य यंत्र होते हैं. नर्तक पारंपरिक वेषभूषाएं पहनते हैं जिन में पत्तों, चमड़ों की पोशाकें तथा कौडि़यों और हड्डियों के आभूषण होते हैं. सिर पर पंखों के मुकुट भी पहने जाते हैं और चेहरे पर सफेद और लाल मिट्टी घोल कर चित्रकारी की जाती है.

यह परंपरा बहुत सालों से चली आ रही है. पर आजकल गायों की संख्या के बराबर रकम ही दी जाती है. जो लोग सारी रकम नहीं दे सकते वे किस्तों में भी चुका सकते हैं. कुछ कबीलों में वर अपनी वधू के भाईबहनों की पढ़ाई का खर्चा उठा कर भी ब्राइड प्राइज की रकम पूरी कर सकता है.

जिस प्रकार भारत में विवाह के बाद अनेक लड़कियां दहेज की हिंसा का शिकार हो जाती हैं उसी प्रकार केन्या में जो लोग ब्राइड प्राइज की पूरी रकम चुका देते हैं उन में से कुछ अपनी पत्नियों के साथ खरीदे हुए गुलामों जैसा व्यवहार करते हैं.

दुख की बात तो यह है कि तलाक लेने की स्थिति में ब्राइड प्राइज लड़की वालों को लौटाना पड़ता है. यही कारण है कि बहुत से जोड़े बगैर विवाह के पतिपत्नी के तौर पर रहते हैं, संतान पैदा करते हैं और कोई भी मतभेद होने पर अलगअलग रहने लगते हैं. ऐसी औरतें ‘सिंगलमदर’ कहलाती हैं. स्कूलों के रजिस्टरों में ऐसे बच्चों के अभिभावकों की जगह मां का ही नाम लिखा जाता है. हालांकि ऐसी माताएं स्कूल फीस की मांग इन बच्चों के पिताओं से कर सकती हैं.

ऐसे बच्चे अवैध नहीं माने जाते पर कहीं न कहीं इन के मन का कोना सूना ही रहता है जो एक पिता ही दूर कर सकता है. दहेज की कुप्रथा के शिकार ये बच्चे भी हो सकते हैं पर मां की ओर का पूरा परिवार बच्चों को पूरा सहयोग देता है और आगे बढ़ने को प्रेरित करता है.

बहरहाल, केन्या में यह कुप्रथा न होती तो शायद हर बच्चा अपने मांबाप के साथ संतुलित जीवन निर्वाह कर सकता.

दीवारों पर बेशर्मी के निशान, क्या यही है भारत महान

आप ने आतेजाते अकसर लोगों को रास्ते में, आम सड़क के किनारे खड़ी दीवारों या आसपास की झाडि़यों को गीला करते देखा होगा. रात में चलते वक्त ये नजारे देख आप की नजरें शर्मसार हो कर अपनेआप झुक जाती हैं. हैरानी की बात तो यह है कि जिन्हें शर्म आनी चाहिए वे बेशर्म बन कर दीवारों और पेड़पौधों को बिना हिचक के खुलेआम गीला करते हैं जबकि पब्लिक सिर और नजरें झुकाए शर्म के मारे झुक कर चलती है.

बात अगर पूरे भारत की की जाए तो खुलेआम ऐसी हरकत करने वाले पुरुष ही हैं जो इस तरह बेशर्म हो कर आसपास गंदगी फैला रहे हैं और वातावरण को भी गंदा कर रहे हैं. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की ही बात करें तो यह नजारा आप को लगभग शहर के हर मैट्रो पिलर या फ्लाईओवर के नीचे गंदगी और बदबू के साथ देखने को मिल जाएगा.

हद हो गई

राह में चलते वक्त तेजी से मस्ती में आप अपने कदम आगे बढ़ाते हैं. सिर घुमाते ही दाहिनी तरफ देखते हैं एक व्यक्ति को जो लगा है झाडि़यों को हराभरा करने में, यह देख आप की नजर अचानक से ठिठक जाती है और आप नाक की सीध में तेज कदमों के साथ चलने लगते हैं. यह क्षणभर की शर्मिंदगी उस व्यक्ति को नहीं होती जो अपनी हरकत से दूसरों को असहज महसूस करा रहा है, उलटे राहगीर शर्मसार हो कर गरदन झुकाए रास्ता पार करता है. साथसाथ गंदगी, मक्खियां और बदबू का सम्मिश्रण भी राहगीरों को परेशान करता है. यह हालत दिल्ली की ही नहीं बल्कि देश के लगभग हर छोटेबड़े शहर की है.

सुलभ शौचालयों का अभाव

राह में या वाहनों में चलते वक्त कूड़ाकरकट रास्ते में फैलाना, थूकखंखार फेंकना, कहीं भी खड़े हो कर पेशाब करना, दीवारों को गंदा कर आपत्तिजनक शब्दों को लिखना, पेड़पौधों के आसपास और नुक्कड़ों में अपने घरों का कूड़ा लालपीली पन्नियों में बांध कर छोड़ जाना आदि. क्या यही सब हमारे देश की सफाई और स्वच्छता है? क्या यही है हमारा सहयोग और योगदान हमारे अपने देश के प्रति?

देश में ऐसी कई जगहें हैं जहां सुलभ शौचालय नहीं हैं पर जहां हैं वहां तो उन का उपयोग होना चाहिए. आसपास के लोगों व राहगीरों के अनुसार सुलभ शौचालय तो हैं पर सफाई नहीं. लोग शौचालयों का इस्तेमाल तो करते हैं पर बराबर सफाई न होने की वजह से दोबारा इस्तेमाल नहीं कर पाते. कई सुलभ शौचालयों में जबरन 2 से 5 रुपए ले कर शौचालय इस्तेमाल करने दिया जाता है. लोग पैसा देने से कतराते हैं और आसपास झाड़ या पेड़ के नीचे ही शुरू हो जाते हैं. कई शौचालयों के बोर्ड पर निशुल्क लिखे होने के बावजूद पैसा वसूला जाता है.

समझें अपनी जिम्मेदारी

हर व्यक्ति साफसफाई चाहता है. जरा सी बदबू में नाक और भौंहों को सिकोड़ लेता है. दरअसल, हम सफाई तो चाहते हैं पर सफाई करना नहीं चाहते. रोज आसपास की जगहों को साफ देखना चाहते हैं पर खुद गंदगी फैलाते हैं. हम ऐसी गंदगी अपने घरों में क्यों नहीं फैलाते? हम हमेशा अपने ही घर को साफ रखने की जद्दोजहद क्यों करते हैं? जो जिम्मेदारी हमारी अपने घर की तरफ है, क्या नहीं लगता कि ऐसी ही एक जिम्मेदारी हमारी अपने देश के प्रति भी होनी चाहिए. ज्यादा नहीं तो केवल अपने आसपास की सफाई करने की ही सही. क्या हम इतना भी नहीं कर सकते, अपने देश के लिए, अपने शहर के लिए ताकि हमें खुद शर्मिंदगी न उठानी पड़े.

मैला उठाने की प्रथा बरकरार

यह दुखद बात है कि आज के दौर में भी हमारे देश में सिर पर मैला ढोने की प्रथा बदस्तूर जारी है. देश के कई शहरों में नगरनिगमों को अंगूठा दिखा कर नालियों में मैला बहाया जाता है. क्या यह अच्छी बात है? कतई नहीं. यह जुर्म है. ऐसा करने वाले पर कानूनी कार्यवाही हो सकती है. पिछले दिनों टैलीविजन कार्यक्रम ‘सत्यमेव जयते’ के जरिए आमिर खान ने देश का ध्यान इस समस्या की ओर खींचा था. यह प्रयास सराहनीय रहा. पर दुखद यह है कि देश में अभी भी 3 लाख से अधिक लोग सिर पर मैला उठा रहे हैं.

बिगड़ रही है भारत की छवि

पर्यटन विभाग द्वारा प्रसारित ‘अतिथि देवो भव:’ के विज्ञापन शृंखला के एक विज्ञापन में एक अभिजात्य वर्ग की महिला, पुल के किनारे पर अपनी महंगी गाड़ी से उतरती है. अपने छोटे बच्चे को पुल के किनारे पेशाब करवाते हुए दिखाई देती है. दूर से यह दृश्य एक विदेशी पर्यटक बड़े ही आश्चर्य से देख रहा होता है,

इस के बाद आमिर खान अपना संदेश देशवासियों को देते हैं और कहते हैं कि हमारी इन्हीं हरकतों से देश की छवि बिगड़ रही है…जानेअनजाने में हम देश की यह कैसी तसवीर पेश कर रहे हैं? दिल्ली मैट्रो सिटी नाम से जानी जाती है. भारत के 4 महानगरों में से एक महानगर दिल्ली है, जिस की खूबसूरती को निहारने दूरदराज के देशों से भी पर्यटक आते हैं. हर रोज हजारों की संख्या में पर्यटक दिल्लीमुंबई जैसे शहरों में घूमने के लिए पहुंचते हैं. ऐसे में वहां की खूबसूरती के साथसाथ उक्त शहर की बदसूरती भी उन से नहीं छिपती. कभी सोचा है कि हम इन लोगों के सामने अपनी और देश की, अपने शहर की, अपने जनजीवन की क्या छवि बना रहे हैं?

बहरहाल, इन बातों पर गौर करना बेहद जरूरी है. देश के नागरिकों को जागरूक होना पड़ेगा. वे जागरूक होंगे तभी एक स्वच्छ और सुंदर परिवेश का निर्माण हो सकेगा.

– रचना रावत

सोशल मीडिया पर छाया पवन सिंह का ये गाना

बौलीवुड और हौलीवुड के अलावा इन दिनों रीजनल सिनेमा की काफी धूम है. जिसमें भोजपुरी सिनेमा की फैन फौलोईंग काफी ज्यादा है. ऐसे में भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार पवन सिंह की आगामी फिल्म ‘मां तुझे सलाम’ के हाल में रिलीज हुए नए गाने ने हमेशा की तरह एक बार फिर धूम मचा दी है. यह गाना सोशल मीडिया पर काफी तहलका मचा रहा है.

दरअसल पवन सिंह की फिल्म ‘मां तुझे सलाम’ का औडियो-विजुअल गाना ‘समुन्दर सोके’ हाल ही में रिलीज किया गया है और पवन सिंह के बाकी गानों की तरह ही ये गाना भी सोशल मीडिया पर छाया हुआ है. मनोज मतलबी का लिखा गया ये गाना इंदु सोनाली ने गाया है.

यहां देखें फिल्म ‘मां तुझे सलाम’ का ये नया गाना…

वहीं अगर बात करें पवन सिंह और अक्षरा सिंह की तो इन दोनों स्टार्स की फैन फॉलोईंग इतनी तादाद में है कि इनका कोई भी गाना सोशल मीडिया पर वायरल हुए नहीं बचता. इस्ससे पहले इसी फिल्म का गाना ‘लॉकर में जवानी’ सोशल मीडिया पर छाया रहा था.

फिल्म ‘मां तुझे सलाम’ में पवन सिंह के साथ साथ मधु शर्मा, अक्षरा सिंह और सुरेन्द्र पाल सिंह जैसे सुपरस्टार मौजूद हैं.

उद्योगपतियों की परिक्रमा

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर नरेंद्र मोदी को कुछ उद्योगपतियों से ज्यादा मिलने और उन्हें फायदा पहुंचाने की बात खासे जोर से कही. अपने 90 मिनट के उत्तर में नरेंद्र मोदी ने इस बात का स्पष्टीकरण न दे कर कांग्रेस के इतिहास और उस के नेताओं के व्यक्तित्व की चर्चा कर के मामले को टाल दिया.

लखनऊ में उन्होंने सफाई दी कि अगर नीयत साफ हो तो उद्योगपतियों से मिलने में क्या हर्ज है, क्योंकि वे देश के प्रमुख लोग हैं.

यह सही बात है. उद्योगपति ही देश की रगों में वह खून देते हैं जिस से अर्थव्यवस्था चलती है और अगर उन की समस्याएं सुनी व समझी न जाएं तो कोई देश ढंग से नहीं चल सकता.

नरेंद्र मोदी की सरकार से शिकायत यह है कि वे उद्योगपतियों से मिलते हैं तो केवल उन्हें भाषण पिलाने के लिए. वे प्रवाचक की तरह उपदेश देते हैं. वे उन से समस्याएं सुनने को तैयार नहीं हैं क्योंकि धर्म प्रचारकों की तरह उन्हें विश्वास है कि उन के पास ज्ञान और बुद्धि का अपार खजाना है.

नरेंद्र मोदी ने अपनी सफाई देने की जगह धर्म प्रचारकों की तरह कांग्रेसियों पर पलटवार किया कि वे भी तो ऐसा ही करते हैं, उद्योगपतियों के बरामदों में चहलकदमी करते हैं. यह धर्म प्रचारकों का मुख्य तरीका है अपने विरोधियों को चुप कराने का. आप महिलाओं पर हिंदू धर्म में होने वाले भेदभाव की बात

जैसे ही करेंगे, तो जवाब मिलेगा कि मुसलमानों में तुरंत 3 तलाक, 4 पत्नियां रखने, बुरका के विषय भी तो हैं.

अपने दोषों से मुकरने के लिए दूसरों के दोषों को दिखाना ठीक नहीं है. लोग अपने नेताओं से ऐसा व्यवहार चाहते हैं जो शांति, व्यवस्थाबराबरी, आर्थिक उन्नति दे.

गौरक्षकों द्वारा मौब लिंचिंग का जवाब यह नहीं कि 1984 में भी तो लिंचिंग हुई थी.

अमिताभ की नातिन का हौट अंदाज वायरल

बौलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन की बेटी श्वेता बच्चन ने ग्लैमर इंडस्ट्री में 44 साल की उम्र में कदम रखा. वह पिता अमिताभ बच्चन के साथ एक जूलर ब्रांड के ऐड में नजर आईं. हालांकि, विवादों के बाद उनके पहले विज्ञापन को हटा दिया गया. श्वेता एक बार फिर सुर्खियों में हैं. उन्होंने अपना नया क्लोदिंग ब्रांड लौन्च किया है. इसे वह अपनी बेटी नव्या नवेली नंदा के साथ प्रमोट कर रही हैं. श्वेता ने इंस्टाग्राम पर नव्या के साथ एक वीडियो जारी किया है, जिसमें दोनों मस्ती भरे अंदाज में नजर आ रही हैं. वीडियो में नव्या नवेली पर ग्लैमरस लुक जच रहा हैं. सिल्वर टी-शर्ट और हॉट पैंट्स में नव्या का लुक देखते ही बन रहा है.

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श्वेता बच्चन Mxsworld नाम का क्लोदिंग ब्रांड फैशन डिजाइनर मोनिशा जयसिंह के साथ लौन्च करने जा रही हैं. अमिताभ बच्चन ने अपनी बेटी और नातिन की तस्वीर साझा कर दोनों को शुभकामनाएं दी है.

इसके अलावा करण जौहर ने भी श्वेता और नव्या की तस्वीर साझा कर उन्हें बधाई दी. हालांकि, इस पोस्ट पर उन्हें जमकर ट्रोल किया गया. लोगों ने इस पोस्ट पर ‘नेपोटिज्म जिंदाबाद’ जैसे कमेंट किए.

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बता दें, 44 वर्षीय श्वेता बच्चन महानायक अमिताभ बच्चन और जया बच्चन की बड़ी बेटी हैं. उन्होंने 1997 में निखिल नंदा से शादी की थी. जोड़ी के दो बच्चे हैं बेटी नव्या नवेली नंदा और बेटा अगस्त्या नंदा. क्लोदिंग ब्रांड के अलावा श्वेता जल्द ही अपनी किताब लौन्च करेंगी.

श्वेता बच्चन नंदा की पहली किताब ‘पैराडाइज टावर्स’ अक्टूबर में लौन्च होगी. श्वेता ने बयान में कहा, “मेरे मन में ‘पैराडाइज टावर्स’ लिखने का विचार एक सुबह जागने के बाद आया. यह मेरे लिए अस्वाभाविक नहीं है. मैं कथाकारों के परिवार से ताल्लुक रखती हूं. बचपन में हमें पढ़ने-लिखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था और हमें कल्पनाएं करने की पूरी छूट थी.”

अथ श्रीरिमोट यंत्रं माहात्म्यम् : एक अनार और सौ बीमार

संस्कृत के एक जानकार ने लिखा है :

यथा मोबाइलयंत्रं युवकानां वृद्धानां कृत्रिमदंता: यथा.

गृहस्थमनोरंजन वस्तुनां रिमोटयंत्रं मूर्धनिस्थितम्.

अर्थात जिस प्रकार युवाओं के लिए मोबाइल व वृद्धों के लिए उन के नकली दांत का महत्त्व होता है उसी प्रकार घर में उपलब्ध मनोरंजक वस्तुओं में रिमोट ही प्रधान होता है.

दूरदर्शकयंत्र यानी टेलीविजन घरों की एक अभिन्न वस्तु है. हमारे लिए रोटी की तरह टीवी दर्शन भी जरूरी है. पहले तो इकलौता चैनल दूरदर्शन ही हुआ करता था इसलिए उस समय तो बस, टीवी चालू कर लीजिए और आराम से बैठ कर दूर के दर्शन कीजिए. एक ही चैनल होने से टीवी के रिमोट की भी जरूरत नहीं होती थी.

आज कम से कम 80-100 प्रकार के चैनल हैं. विविध रुचि वाले लोगों के लिए विविध प्रकार के चैनल हैं. पता नहीं लोगों की विविध प्रकार की रुचियों को देख कर इतने सारे चैनल बने या इतने सारे चैनलों को देख कर लोगों में विविध प्रकार की रुचियों ने जन्म लिया. कारण कुछ भी हो लेकिन घर का हर सदस्य अपनी रुचि के अनुसार ही चैनल देखना चाहता है.

इस के लिए एक ही रास्ता है कि टीवी का रिमोट उस के हाथ में हो. जिस के हाथ में रिमोट होता है उस की स्थिति किसी राजा के समान होती है. वह अपनी रुचि के अनुसार कार्यक्रम देख सकता है. घर के दूसरे सदस्य देखना चाहें या न चाहें लेकिन रिमोटधारक के मनपसंद कार्य- क्रम उन को झेलने ही पड़ते हैं.

आज के दौर में टीवी के रिमोट का महत्त्व तिजोरी की चाबी के समान हो गया है. जिस प्रकार हर घर में तिजोरी की चाबी घर के सब से प्रमुख व्यक्ति के पास होती है, उसी प्रकार रिमोट भी घर के सब से प्रमुख व्यक्ति के हाथ में होता है. वह व्यक्ति जब घर में नहीं होता या टीवी दर्शन से गले तक संतुष्ट हो जाता है तभी अन्य सदस्यों को रिमोट प्राप्त होता है.

आमतौर पर छापामार पद्धति से व्यक्ति को रिमोट हस्तगत करना पड़ता है. यह पद्धति सभ्य तो नहीं है लेकिन कारगर है. वैसे वाक्युद्ध में प्रवीण व बलप्रयोग में सक्षम सदस्य जब चाहें तब रिमोट का प्रयोग कर सकते हैं. सभ्य परिवारों में तो रिमोट के प्रयोग के लिए निश्चित शिफ्ट में समय का विभाजन कर दिया जाता है. इस के बाद भी सदस्यों की गिद्ध दृष्टि हमेशा रिमोट पर ही टिकी होती है.

यहां रिमोट मिल जाने से ही समस्या का समाधान नहीं होता बल्कि रिमोट मिलने के बाद ही सभी समस्याओं की शुरुआत होती है. जिस प्रकार राजनेताओं को अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए परिश्रम करना पड़ता है उसी प्रकार रिमोट मिल जाने के बाद उसे अपने अधिकार में रखने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है. यही नहीं अपना प्रिय कार्यक्रम देखते समय भी रिमोट के ऊपर ध्यान देना पड़ता है कि कहीं दूसरा कोई रिमोट अपने अधिकार में न ले ले. आप जब अपने हाथ में रिमोट ले कर कार्यक्रम देख रहे होते हैं तो घर के दूसरे सदस्यों की नजरें कार्यक्रम के बजाय आप के रिमोट पर होती हैं. वे केवल ऐसे अवसर की प्रतीक्षा में होते हैं कि कब आप अपना रिमोट छोड़ें और वे उसे लपक लें, ठीक उसी तरह जैसे वे तिजोरी की चाबी प्राप्त करने की प्रतीक्षा में रहते हैं.

इसीलिए तो पुराने जमाने में (शायद अब भी) लोग अपनी तिजोरी की चाबी अपने यज्ञोपवीत (जनेऊ) से बांध कर रखते थे. इस से चाबी हमेशा उन के अधिकार में रहती थी.

अब चूंकि यज्ञोपवीत पहनने की परंपरा लगभग समाप्त सी हो गई है इसलिए आज के समय में कोई भी व्यक्ति रिमोट को जनेऊ से नहीं बांधता है. शायद रिमोट का वजनी होना भी एक कारण हो पर एक बात तो साफ है कि आज के दौर में रिमोट का महत्त्व तिजोरी की चाबी जैसा ही है.

इसलिए टीवी देखते समय रिमोट- धारक रिमोट को अपने हाथ में या इतना निकट रखते हैं कि जैसे ही कोई झपटे वे तुरंत उसे अपने हाथ में ले सकें. जो लोग पलंग पर लेटे हुए टीवी दर्शन करते हैं वे आमतौर पर रिमोट को अपने पेट पर रख लेते हैं जिस प्रकार बंदरिया अपने बच्चे को सदैव छाती से चिपटाए रहती है.

कार्यक्रम के बीच में जब भी विज्ञापन आता है तो रिमोट छीने जाने की संभावना होती है. यह तो छोटी विपदा है. हां, रिमोट छिन जाने की सब से ज्यादा संभावना तब होती है जब कार्यक्रम के दौरान आप को तीव्र लघुशंका लगी हो. अगर आप रिमोट को वहीं छोड़ कर जाते हैं तो इस बात की शतप्रतिशत संभावना है कि जब आप लघुशंका से वापस आएंगे तो रिमोट को किसी अन्य के हाथ में ही पाएंगे. इसलिए चतुर रिमोटधारक लघुशंका के समय भी रिमोट अपने साथ ही ले जाते हैं.

उस समय तो आप पर वज्रपात ही होता है जब आप टीवी देख रहे हों और घर के बाहर से आप का कोई परिचित आप को आवाज लगा रहा हो. ऐसे समय घर के दूसरे सदस्यों के चेहरे गेंदे के फूल की तरह खिल जाते हैं कि अब तो रिमोट उन के हाथ से लगना ही लगना है.

तब आप को अपने उस दोस्त पर इतना क्रोध आता है जैसे कि उस ने कोई जघन्य अपराध कर दिया हो. इसी प्रकार का भाव आप के मन में तब भी उत्पन्न होता है जब घर का कोई सदस्य रिमोट को कहीं रख कर भूल जाता है. उस समय उस अभागे व्यक्ति पर तीर के समान शब्दों की आप वर्षा करते हैं.

टीवी देखते समय कई प्रकार की विचित्र स्थितियां उत्पन्न होती हैं. जैसे आप का प्रिय कार्यक्रम साढ़े 9 बजे प्रसारित होता है, लेकिन आप को 9 बजे ही रिमोट मिल गया. अब आप को अगले आधे घंटे तक रिमोट अपने पास बनाए रखना है. यह कोई आसान काम नहीं है, आप आधे घंटे के लिए रिमोट किसी और को दे भी नहीं सकते हैं क्योंकि अगर उस व्यक्ति ने ऐसा कोई कार्यक्रम या फिल्म चला दी जोकि सब को पसंद आ गई है तो फिर आप अपना रिमोट वापस नहीं पा सकते हैं. इसलिए समय व्यतीत करने के लिए एक चैनल से दूसरे चैनल पर कूदतेफांदते किसी तरह वह आधा घंटा व्यतीत करते हैं.

उस समय दूसरे सदस्यों को यह पता चल जाता है कि आप को यह पता नहीं चल रहा है कि अब कौन सा चैनल देखना चाहिए. लेकिन वह संकोच के कारण आप से कुछ कहते नहीं और मन ही मन खुश होते हैं कि शायद अब आप बोर हो कर रिमोट छोड़ देंगे.

आप दृढ़निश्चयी बन कर किसी तरह वह आधा घंटा व्यतीत कर देते हैं और यह आधा घंटा आप को आधी शताब्दी के समान लगता है. जब आप के प्रिय कार्यक्रम का समय हो जाता है तब आप की जान में जान आती है और आप कार्यक्रम का आनंद लेते हैं.

बिजली जाने पर भी आप रिमोट अपने हाथ से नहीं छोड़ते और किसी कारण से रिमोट छोड़ना भी पड़ जाए तो उसे ऐसे किसी स्थान पर रखते हैं कि जब बिजली वापस आए तो आप तुरंत उसे हथिया सकें. उस समय अंधेरे में भी आप यथासंभव रिमोट के आसपास ही मंडराते रहते हैं, जैसे कि कीटपतंग जलते हुए दीपक के चारों ओर चक्कर काटते हैं.

सभी का प्यारा रिमोट कभीकभी अपना कोप दिखा ही देता है. जब यह खराब होता है तो दर्शकों की स्थिति तो विकलांगों के समान हो जाती है. उन्हें ऐसा लगता है जैसे कि उन के दोनों हाथ ही नहीं हैं. मजबूरन कोई एक चैनल ही देखना पड़ता है. जब उस चैनल पर विज्ञापन आते हैं या चैनल बदलना होता है तो हाथ अपने आप ही रिमोट को ढूंढ़ने लगते हैं, लेकिन जब वस्तुस्थिति का एहसास होता है तो अपनी जगह से उठ कर टीवी तक जाने का महान कष्ट सहना पड़ता है. सर्दी के दिनों में तो यह आपदा और भी ज्यादा तकलीफदेह बन जाती है. इसलिए जब रिमोट खराब होता है तो ‘परिश्रमी’ लोग तुरंत उसे सुधरवाते हैं या नया ले कर आते हैं.

इस तरह यह रिमोट नाना प्रकार से धारक की धारण क्षमता की परीक्षा लेता है, जो लोग परीक्षा में पास होते हैं वे तो इस का उपभोग कर के आनंद प्राप्त करते हैं लेकिन जो फेल होते हैं वे रिमोट को पाने के लिए फिर से तपस्या करते हैं. इसलिए हम प्रार्थना करते हैं :

न भवतु विकृतम्, न भवतु लुप्तम्

सदा विराजतु मम हस्ते, हे रिमोट

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