योगासनों की वास्तविकता

योग वाले अपने संभावित ग्राहक को अभिभूत करने के लिए आमतौर पर 2 रास्तों का सहारा लेते हैं. एक तो वे इस की अति प्राचीनता की दुहाई देते हैं, दूसरे, इस के आसनों के परिमाण की बहुलता का भारी प्रचार करते हैं.

यद्यपि पतंजलि ने अपने योगसूत्रों में स्थिर हो कर सुखपूर्वक बैठने को ही ‘आसन’ कहा है और किसी भी आसन विशेष का न उल्लेख किया है न वर्णन फिर भी उस के प्राचीनतम भाष्य (व्यासभाष्य) में 11 आसनों का उल्लेख मिलता है.

तद्यथा पद्मासनं वीरासनं भद्रासनं स्वस्तिकं दण्डासनं सोपाश्रयं पर्यंकं, क्रौंचनिषदनं,

हस्तिनिषदनमुष्ट्रनिषदनं समसंस्थानं स्थिरसुखं यथासुखं चेत्येवमादीनि.

(योगसूत्र 2/46 पर व्यासभाष्य)

[पद्मासन, वीरासन, भद्रासन, स्वस्तिक, दंडासन, सोपाश्रय, पर्यंकासन, क्रौंचासन, हस्तिनिषदन (हाथी आसन) उष्ट्रनिषदन (ऊंट आसन) और समसंस्थान-ये आसन स्थिर करने वाले तथा सुख देने वाले हैं.]

वैसे यदि योगसूत्रों के अलावा विशाल योगसाहित्य पर एक नजर डालें तो पता चलेगा कि किसी ग्रंथ में एक आसन का वर्णन है तो किसी में 2 का. एक ग्रंथ में 32 आसनों का वर्णन है. जैसे, त्रिशिखब्राह्मणोपनिषद् में एक आसन का; योगचूडामणि उपनिषद में 2 आसनों का; योगकुंडल्युपनिषद् व अमृतनाद उपनिषद् में 3 आसनों का; ध्यानबिंदु उपनिषद्, योगतत्त्व उपनिषद् और शिवसंहिता में 4 आसनों का; शांडिल्य उपनिषद् में 8 आसनों का; दर्शन उपनिषद्  में 9 आसनों का; वाराह उपनिषद् में 11 आसनों का, हठयोगप्रदीपिका में 15 आसनों का; त्रिशिख ब्राह्मण उपनिषद् (मंत्रभाग) में 17 आसनों का और घेरंड संहिता में 32 आसनों का वर्णन है.

इस विवरण से स्पष्ट है कि व्यासभाष्य, वाराह उपनिषद् तक के 10 ग्रंथों के रचे जाने के बाद लिखा गया, तभी उस में 11 आसनों का उल्लेख  है.

ध्यान रहे, ये ‘उपनिषद्’ गं्रथ प्राचीन उपनिषदों की अपेक्षा अर्वाचीन ग्रंथ हैं. इन्हें प्राचीन दर्शाने के उद्देश्य से इन के पीछे ‘उपनिषद्’ शब्द जोड़ दिया गया है.

इन ग्रंथों के बाद जो योग विषयक ग्रंथ रचे गए, उन में से कइयों ने न केवल आसनों को सीधे शिव से प्राप्त करने की बात की है बल्कि उन की संख्या भी चौरासी लाख बताई है :

आसनानि समस्तानि यावत्यो जीवयोनय:,

चतुरशीतिलक्षाणि शिवेन कथितानि तु.

(श्रीधर्मकल्पद्रुम, खंड 4, पृ. 13)

(कुल आसन 84 लाख हैं, जितनी कि जीवों की योनियां हैं. उन सब आसनों का ज्ञान शिव द्वारा दिया गया है.)

यह अतिशयोक्तिपूर्ण संख्या निरा झूठ प्रतीत होती है, क्योंकि किसी प्राचीन ग्रंथ में जैसे जीवों की 84 लाख योनियों का विवरण नहीं मिलता, उसी तरह 84 लाख आसनों का भी कहीं विवरण उपलब्ध नहीं होता, न किसी प्राचीन ग्रंथ में, न किसी अर्वाचीन ग्रंथ में.

दूसरा यह प्रश्न भी पैदा होता है कि शिव ने 84 लाख आसन बताए थे तो बाकी कहां चले गए? स्पष्ट है कि 84 लाख की संख्या एक मिथ के तौैर पर लोगों को अभिभूत करने के लिए गढ़ी गई है, जबकि वास्तविकता यह है कि पहले आसन एक था. फिर 2,3,4,8,9, 11,15,17 और 32 बने. इस वास्त- विकता पर परदा डालने के लिए योग वालों ने फिर यह कहना शुरू कर दिया कि 84 लाख आसनों में 84 आसन विशेष हैं और मृत्युलोक में 33 आसन मंगलजनक हैं :

तेषां मध्ये विशिष्टानि षोडशोनं शतं कृतम्,

आसनानि त्रयस्त्रिंशन्मर्त्यलोके शुभानि वै.

(श्रीधर्मकल्पद्रुम, खंड 4, पृ. 13)

भावार्थ यह है कि 84 लाख की बात निरी गप है, तभी तो उन में से 84 को विशेष कहा गया है. यह 84 का आंकड़ा भी काल्पनिक प्रतीत होता है. तभी तो मृत्युलोक में 33 आसनों के मंगलजनक होने की बात कही गई है. घेरंड संहिता (2/2) में तो 33 के स्थान पर भी 32 आसनों के ही मंगलजनक होने की बात कही गई है : तेषां मध्ये मर्त्यलोके द्वात्रिंशदासनं शुभम् (इन में भी 32 आसन मृत्युलोक के निवासियों के लिए शुभ अर्थात कल्याणदायक हैं).

इन दोनों ग्रंथों में एक आसन का अंतर है. बद्धपद्मासन नामक आसन श्रीधर्मकल्पद्रुम में अतिरिक्त है.

यहां कई बातें विचारणीय हैं. यदि मृत्युलोक के लिए 32/33 आसन ही मंगलजनक अथवा कल्याणकारक हैं, तब 84 या 84 लाख किस के लिए हैं? तब 8300068 फालतू आसनों का क्या औचित्य है? वे क्या किसी ‘दूसरी’ दुनिया के लोगों के लिए हैं या निरर्थक हैं? उन निरर्थक आसनों को बनाने वाले की क्या महानता है?

यह एक विडंबना है कि 84 लाख आसनों की डींग हांकने वाले 32 आसनों के बाद के आसनों के नाम व विवरण देने में अपने को एकदम असमर्थ पाते हैं. इन 32 आसनों को भी शिव द्वारा सिखाए हुए नहीं माना जा सकता, क्योंकि इन में से 2 आसन तो 13वीं शताब्दी के 2 योगियों द्वारा गढ़े हुए हैं. इसीलिए उन के नाम भी उन्हीं के नाम पर हैं.

पहला है, मत्स्येन्द्र आसन. मत्स्येन्द्र नाथ कामरूप (असम) के एक मछुआरे मीनपा के पुत्र थे और 13वीं शताब्दी में हुए. इसी तरह दूसरा आसन है गोरक्षासन. गोरक्षनाथ तिब्बती जनश्रुति के अनुसार बौद्ध बाजीगर थे. विद्वान इन्हें 13वीं शताब्दी में मानते हैं. कुछ इन का समय संवत 1250 बताते हैं, तो कुछ 1257. गोरक्षनाथ मत्स्येन्द्रनाथ का शिष्य था.

अब यदि 13वीं शताब्दी के मत्स्येन्द्रनाथ और गोरक्षनाथ द्वारा गढ़े गए आसन मिला कर कुल 32 बनते हैं तो स्पष्ट है कि आसन अभी कल तक नए गढ़े जाते रहे हैं. इन का शिव से कुछ लेनादेना नहीं है. उस का नाम केवल तथाकथित अति प्राचीनता से लोगों को अभिभूत करने के लिए किया जाता है.

इन आसनों का प्रयोजन क्या है? क्यों ये विविध रोगों की चिकित्सा के उद्देश्य से गढ़े गए हैं? इन का उद्देश्य न तो कभी बीमारियों का इलाज करना रहा है और न किसी आयुर्वेदीय गं्रथ ने ही इलाज के तौर पर कहीं इन का उल्लेख किया है. योगशास्त्रीय गं्रथों ने भी इन्हें चिकित्साशास्त्रीय चीजें नहीं माना है. उन्होंने इन्हें मन की चंचलता को रोकने के लिए इस्तेमाल में लाने की ही बात की है.

कुर्यात्तदासनं स्थैर्यमारोग्यं चांगला- घवम््.

(हठयोगप्रदीपिका 1/17)

(आसन मन की स्थिरता व आरोग्य लाता है और शरीर के भारीपन को दूर करता है.)

अभ्यासाद्यस्य देहोऽयं योगौपयिकतां व्रजेत्,

मनश्च स्थिरतामेति प्रोच्यते तदिहासनम्.

(श्रीधर्मकल्पद्रुम, खंड 4, पृ. 12)

(जिस के अभ्यास से शरीर योग के उपयुक्त और मन स्थिर हो जाता है, उस का नाम आसन है.)

योगेन चित्तस्य मलं शरीरस्य तु वैद्यकेन.

(योगवार्तिक/योगसूत्रभोजवृत्ति)

(योग से चित्त (मन) के मल दूर होते हैं और वैद्यक (आयुर्वेद) से शरीर के.)

जायते येन येनेह विहितेन स्थिरं मन:,

तत्तदेव विधातव्यमासनं ध्यान- साधनम्.

(योगशास्त्र 4/134)

(जिस आसन के करने से मन स्थिर हो, वही आसन करना चाहिए, क्योंकि आसन ध्यान का साधन होता है.)

इन उद्धरणों से स्पष्ट है कि योगासनों का उद्देश्य केवल मन को स्थिर व काबू में करना है. यदि किसी आसन से कोई अन्य लाभ होता है तो वह गौण है, उस का मुख्य उद्देश्य नहीं. यही कारण है कि जिन 32 आसनों का घेरंडसंहिता में वर्णन है, उन में से 22 आसनों का शारीरिक दृष्टि से कोई भी लाभ नहीं बताया गया है. उन के केवल लक्षण दिए हैं कि इस आसन को इस प्रकार करें, बस, मन को संयम में करने में मिलने वाली कथित सहायता ही इन का लाभ है.

जिन 10 आसनों के लाभ बताए गए हैं वे भी इस ढंग के हैं कि उन का चिकित्साशास्त्रीय दृष्टि से कोई विशेष अर्थ नहीं बनता. 5 आसनों के लाभ इस तरह बताए गए हैं :

एतद् व्याधिविनाशकारणपरं पद्मासनं प्रोच्यते.

(घेरंड संहिता 2/8)

(यह सब व्याधियों का विनाशक कहा जाता है.)

भद्रासनं भवेदेतत् सर्वव्याधि- विनाशकम्.

(घेरंड संहिता 2/10)

(भद्रासन नामक आसन सब व्याधियों का विनाशक है.)

सिंहासनं भवेदेतत् सर्वव्याधि- विनाशकम्.

(घेरंड संहिता 2/15)

(सिंहासन नामक आसन सब व्याधियों का विनाशक है.)

मत्स्यासनं तु रोगहा.

(घेरंड संहिता 2/21)

(मत्स्यासन रोगों को दूर करने वाला है.)

सर्वरोगविनाशनम् भुजंगासनम्.

(घेरंड संहिता 2/42)

(भुजंगासन समस्त रोगों का नाश करता है.)

यदि कभी चिकित्साशास्त्रीय दृष्टि से इन आसनों की प्रामाणिकता सिद्ध भी हो जाए तो भी स्पष्ट है कि इन पांचों में से एक ही काफी होगा, शेष 4 एकदम व्यर्थ हैं; क्योंकि जब एक ही आसन ‘सब रोगों का निवारक’ है तो फिर अलगअलग बीमारियों के लिए अलगअलग आसन बताने वाले क्या केवल दुकानदारी नहीं कर रहे हैं?

अगले एक आसन के बारे में कहा गया है कि इस से थकावट दूर होती है:

शवासनं श्रमहरम्.

(घेरंड संहिता 2/19)

(शवासन थकावट को दूर करता है.)

क्या पूर्वोक्त ‘सर्वव्याधिहर आसन’ थकावट को दूर करने में असमर्थ है, जो इसे विशेषत: श्रमहर बताया गया है?

इसी तरह अगले मकरासन के बारे में कहा गया है कि यह शरीर की अग्नि को प्रज्वलित करता है :

देहाग्निकरं मकरासनं तत्.

(घेरंड संहिता 2/39)

क्या पहले कहे हुए ‘सर्वव्याधि नाशक’ आसन यह काम नहीं करते जो इस के लिए पृथक् से मकरासन की कल्पना की गई है? यदि वे नहीं करते तो फिर उन्हें ‘सर्वव्याधि नाशक’ कहने का क्या औचित्य है?

इसी तरह अगले 3 आसनों को सिद्धि देने वाले कहा गया है :

मुक्तासनं तु सिद्धिदम्.

(घेरंड संहिता 2/11)

(मुक्तासन सिद्धियों को देने वाला है.)

वज्रासनं भवेदेतत् योगिनां सिद्धिदायकम्.

(घेरंड संहिता 2/12)

(वज्रासन योगियों के लिए सिद्धियां प्रदान करने वाला है.)

गोरक्षासनमित्याहु : योगिनां सिद्धि- कारणम्.

(घेरंड संहिता 2/26)

(गोरक्षासन योगियों को सिद्धि प्रदान करने वाला है.)

क्या इन 3 आसनों को छोड़ कर शेष 29 आसन सिद्धि देने में असमर्थ हैं. यदि वे असमर्थ हों तो भी इन 3 विशेष आसनों के अस्तित्व का क्या औचित्य है? तीनों एक ही काम करते हैं. कथित सिद्धियां प्रदान करने का यह काम तो एक आसन ही कर सकता है. ऐसे में 2 आसनों को तो बेकार ही घोषित करना होगा. साथ ही शेष 29 आसन भी निरर्थक सिद्ध होंगे, क्योंकि वे तो सिद्धि देने में असमर्थ ही रहेंगे. इस दृष्टि से तो केवल 1 आसन काफी है. जब वह सिद्धि प्रदान करने में समर्थ है, तब स्पष्ट है कि वह सर्वव्याधियों को विनष्ट करने में भी समर्थ होगा. ऐसे में 32 आसनों का ही औचित्य सिद्ध करना कठिन हो जाएगा, 84 या 84 लाख की तो बात ही छोड़ो.

घेरंड संहिता ने मत्स्येन्द्र आसन, पश्चिमतान आसन और मयूर आसन का कोई लाभ विशेष नहीं बताया है. परंतु हठयोगप्रदीपिका ने इन के भी लाभ गिना दिए हैं :

मत्स्येन्द्रपीठं जठरप्रदीप्तिं प्रचंडरुग्मंडलखंडनास्त्रम्.

(हठयोग-प्रदीपिका 1/27)

[मत्स्येंद्र आसन जठराग्नि (पाचनशक्ति) को तेज करता है और प्रचंड रोगों के समूह को नष्ट करता है.]

इति पश्चिमतानमासनम्,

उदयं जठरानलस्य कुर्यादुदरे कार्श्यमरोगतां च पुंसाम्.

(हठयोगप्रदीपिका 1/29)

(पश्चिमतान आसन जठराग्नि को प्रदीप्त करता है, उदर को मध्य से कृश करता है और रोगों से मुक्त करता है.)

हरति सकलरोगानाशु गुल्मो- दरादीनभिभवति च दोषानासनं श्रीमयूरम्,

बहु कदशनभुक्तं भस्म कुर्यादशेषं जनयति जठराग्ंिन जारयेत्कालकूटम्.

(हठयोगप्रदीपिका 1/31)

[मयूरासन गुल्म, जलोदर आदि सब रोगों को नष्ट करता है, खाए हुए ज्यादा या कुत्सित अन्न को पचाता है, जठराग्नि को बढ़ाता है और कालकूट (विष) के प्रभाव को भी खत्म करता है.]

यहां यह विचारणीय है कि जो चीजें घेरंड संहिता को मालूम नहीं वे हठयोगप्रदीपिका को कैसे मालूम हो गईं? क्या ‘शिव’ इस के लेखक के कानों में फूंक मार गए थे या ऐसे ही मनमाने ढंग के इन 3 आसनों के गुण कल्पित कर लिए गए?

तीनों सब रोगों को दूर करते बताए गए हैं, तीनों जठराग्नि को प्रदीप करने वाले कहे गए हैं. यदि तीनों को एक सा काम ही करना है तो फिर इन तीनों का औचित्य ही क्या रह जाता है?

दूसरे, मयूरासन को विष को भी पचा जाने वाला किस आधार पर कहा गया है? यह एक आम धारणा है कि मयूर (मोर) सांप को खा जाता है, विष को पचा लेता है. उसी आधार पर यह कल्पना की गई है कि मयूरासन से विष को पचाया जा सकता है. यह बहुत स्थूलबुद्धि की बात है. स्पष्ट है, मयूर के शरीर की नकल करने वाला आसन, मयूरासन लगाने पर व्यक्ति के अंदर उस पक्षी के अंदरूनी सिस्टम सा कोई सिस्टम काम करना शुरू नहीं कर सकता.

स्पष्टत: इन आसनों के कथित लाभ कपोलकल्पित हैं : जो बात एक गं्रथ में थी, बाद के ग्रंथकार ने उसे और ज्यादा लुभावना व आकर्षक बनाने के लिए अपने ग्रंथ में अपनी ओर से और मिर्च मसाला लगा कर प्रस्तुत कर दिया. जिन आसनों के कथित लाभों की बाबत योगीराज घेरंड चुप थे, हठयोगप्रदीपिका के लेखक ने उन में से कइयों के लाभ अपनी ओर से जोड़ कर अपने ग्रंथ को ज्यादा लोकप्रिय बना लिया और अपना योगीराजत्व ज्यादा श्रेष्ठ घोषित करवा लिया.

यहां यह भी विचारणीय है कि क्या किसी योगी ने इन योगासनों से कभी पाचन शक्ति बढ़ाई है? क्या किसी ने विष खा कर इन की सहायता से कभी अपनी जान बचाई है? क्या इन के कारण कोई रोग से मुक्त हुआ है? क्या इन के कोई प्रामाणिक उदाहरण हैं?

मेरा खयाल है, हम आधुनिक योगियों के उदाहरण न ले कर प्राचीन व प्रामाणिक उदाहरण ही लें. 1883 ई. में आर्यसमाज के संस्थापक योगीराज स्वामी दयानंद सरस्वती को विष दे दिया गया था. वे योगाभ्यास व योगासन किया करते बताए जाते हैं. परंतु कोई भी आसन उन्हें विष के घातक प्रभाव से नहीं बचा सका.

गौतम बुद्ध को भी योगीराज बताया जाता है. इसीलिए कई लोग तो बुद्धधर्म का अर्थ ही योग/विपश्यना बताते हैं. पालि त्रिपिटक में आता है कि पावा नगरी में बुद्ध ने शूकरमार्दव खाया था और फलत: उन्हें खून गिरने की बीमारी लग गई थी. इस (शूकरमार्दव) के लोगों ने भिन्नभिन्न अर्थ किए हैं. पहला और प्रसिद्ध अर्थ तो ‘एक वर्ष के सूअर का मांस’ है.

दूसरे इस का अर्थ ‘नर्म चावल को 5 गोरस से पकाने पर बना खाद्य पदार्थ’ बताते हैं और तीसरे इसे ऐसा रसायन बताते हैं जिस से मृत्यु पर विजय प्राप्त होती है. पहला अर्थ कई लोगों को इसलिए नहीं पचता कि इस से बुद्ध के मांसाहारी होने की बात सिद्ध होती है. दूसरा अर्थ उन्हें मांसाहारी के स्थान पर शाकाहारी सिद्ध करने के लिए किया जाता है. यहां हमारा उद्देश्य इस विवाद में पड़ना नहीं है कि वे मांसाहारी थे या शाकाहारी, बल्कि यह बताना मात्र है कि उन की पाचनशक्ति गड़बड़ा गई, वह बीमार पड़ गए.

तीसरा अर्थ आत्मविरोधी है, क्योंकि जो रसायन मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से आयुर्वेद व रसायन शास्त्र के अनुसार तैयार किया व करवाया गया था, वही बुद्ध की मृत्यु का कारण बना. यह अर्थ तो आयुर्वेद व रसायनशास्त्र के ढोल की पोल ही खोलता दिखाई देता है.

बुद्ध की वह बीमारी किसी भी योगासन से ठीक नहीं हो पाई. यदि वह योगी थे तो उन्होंने इन का आश्रय अवश्य लिया होगा. फलत: इसी बीमारी के कारण उन की मृत्यु हो गई.

इसी प्रकार महावीर स्वामी के बारे में भगवतीसूत्र के 15वें शतक में आता है कि उन्हें गोशाल के शाप के कारण अत्यंत पीड़ाकारी पित्त ज्वर का दाह उत्पन्न हो गया था व खूनी दस्त आने लगे थे. इस पर उन्होंने योगासन नहीं किए, कोई योगाभ्यास नहीं किया, बल्कि उन्होंने ‘कुक्कुट मांस’ का प्रयोग किया. ‘जैन धर्मदर्शन’ (1999) नामक पुस्तक में, जो राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सरकारों द्वारा पुरस्कृत है, डा. मोहनलाल मेहता लिखते हैं, ‘‘सिंह अनगार के आने पर महावीर ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा, ‘मैं अभी नहीं मरूंगा, किंतु 16 वर्ष तक और ‘जिन’ के रूप में विचरण करूंगा. अत: तू मेंढिक ग्राम में रेवती गृहपत्नी के यहां जा.

उस ने मेरे लिए 2 कपोतशरीर (कबूतर) उपस्कृत कर, तैयार कर रखे हैं, किंतु उन का मुझे प्रयोजन नहीं है. उस के यहां बासी (कल का) मार्जारकृत कुक्कुट मांस (बिल्ली द्वारा मारे गए मुर्गे का मांस) है, वह ले आ. उस का मुझे प्रयोजन है.’ सिंह अनगार रेवती गृहपत्नी के यहां गए एवं महावीर की आज्ञानुसार कुक्कुट मांस लाए. महावीर ने उस का सेवन किया, जिस से उन का पीड़ाकारी रोग शांत हुआ.’’

(जैन धर्मदर्शन, पृष्ठ 39-40)

यहां भी ‘कुक्कुट मांस’ शब्द के अर्थ बदल कर शाकाहारी बनाने के यत्न किए गए हैं परंतु डा. मेहता लिखते हैं, ‘‘मांसाहारपरक शब्दों को शाकाहारपरक अर्थ कर के इस दोष को दूर करने का प्रयत्न किया जाता है किंतु इस से चिंतक को संतोषप्रद समाधान प्राप्त नहीं होता. जिन अमुक शब्दों का प्रयोग इस शतक में किया गया है, जिन का कि शाकाहारपरक अर्थ किया जाता है, उन शब्दों का प्रयोग आगमिक साहित्य में अन्यत्र जहां कहीं हुआ है, साधारण प्रचलित अर्थ में ही हुआ है, अर्थात उन का झुकाव मांसाहारपरक अर्थ की ओर ही है.

(पृष्ठ 31-32)

हम यहां इस विवाद में नहीं पड़ना चाहते कि कुक्कुट मांस का मांसाहारी अर्थ ठीक है या शाकाहारी, हमारा उद्देश्य केवल यह बताना है कि वह जब बीमार पड़े, तब उन्होंने योगासन नहीं किए, योगाभ्यास नहीं किया, बल्कि उस बीमारी को शांत करने में समर्थ वस्तुओं/औषधियों का प्रयोग किया और फलत: 16 वर्ष जीवित रहे.

ये तीनों उदाहरण प्रसिद्ध व मान्य योगियों के हैं. इन से योगासनों के दावों की पोल ही खुलती नजर आती है. स्वामी दयानंद योगी होने के बावजूद मृत्यु को प्राप्त हुए; कोई योगासन काम नहीं आया; कोई विष के प्रभाव को नष्ट नहीं कर सका. गौतम बुद्ध की भी योगासनों से न बीमारी ठीक हुई, न पाचनशक्ति बढ़ पाई और वह मृत्यु को प्राप्त हुए. महावीर की बीमारी भी ठीक हो जाती है और वह 16 वर्ष तक बाद में जीते भी हैं; क्योंकि वे रोगनाशक औषधि का प्रयोग करते हैं, न कि योगासनों का, योगाभ्यास का.

इन उदाहरणों में बहुत कुछ छिपा है. हमें इन से शिक्षा ग्रहण करनी होगी और आसनों के यौगिक मकड़जाल से निकल कर औषधि की शरण ग्रहण करनी होगी.

हठयोग प्रदीपिका ने 84 आसनों का सार केवल 4 आसन बताए हैं.

चतुरशीत्यासनानि शिवेन कथितानि च,

तेभ्यश्चतुष्कमादाय सारभूतं ब्रवीम्यहम्.

सिद्धं पद्मं तथा सिंहं भद्रं चेति चतुष्टयम्.

(हठयोगप्रदीपिका 1/33-34)

(शिव ने जो 84 आसन कहे हैं, उन के सारभूत 4 आसन हैं – सिद्धासन, पद्मासन, सिंहासन और भद्रासन.)

हठयोगप्रदीपिका में इन में से 2 पद्मासन और भद्रासन को ही सर्वव्याधि विनाशक कहा गया है. सिंहासन को उस ने सर्वव्याधि विनाशक के पद से च्युत कर दिया है, हालांकि घेरंड संहिता इसे भी सर्वव्याधि विनाशक घोषित करती है. (देखें, घेरंड संहिता 2/15). लेकिन हठयोग- प्रदीपिका इसे योगियों द्वारा पूज्य और सब आसनों में उत्तम बताती है :

सिंहासनं भवेदेतत्पूजितं योगिपुंगवै:,

बंधत्रितयसंधानं कुरुते चासनोत्तमम्.

(हठयोगप्रदीपिका 1/52)

(सिंहासन श्रेष्ठ योगियों द्वारा पूजित, मूलबंध आदि तीनों बंधों को संनिधान करने वाला और सब आसनों में उत्तम है.)

अब यदि यह सब में उत्तम है, तो यह सर्वव्याधि विनाशक क्यों नहीं हो सकता? जब दूसरे सर्वव्याधि विनाशक आसन विद्यमान हैं, तब यह उस गुण से रहित होते हुए भी सब में उत्तम कैसे हो सकता है? लगता है, अपना श्रेष्ठत्व प्रतिपादित करने के लिए घेरंड की कुछ बातों को तोड़नामरोड़ना या बदलना जरूरी समझा गया. यह ईर्ष्याजनित मनमानापन क्या वैज्ञानिकता है?

इस चक्कर में विभिन्न योगीराजों को यह भी दिखाई नहीं देता कि वे परस्पर विरोधी बातें कर रहे हैं और अपनी ही बातों को काटे जा रहे हैं.

हठयोगप्रदीपिका के लेखक स्वात्माराम योगींद्र सिद्धासन को भी सब से उत्तम आसन घोषित करते हुए कहते हैं :

नासनं सिद्धसदृशम्.

(हठयोगप्रदीपिका 1/43)

(सिद्धासन के समान अन्य कोई आसन नहीं है.)

अब यदि सिंहासन सब में उत्तम है, तो सिद्धासन लासानी (अनुपम) कैसे हो सकता है?

जो उत्तम है, वह अनुपम (लासानी, अद्वितीय) क्यों नहीं और जो लासानी (अनुपम) है, वह उत्तम क्यों नहीं? क्या योगीराज ने झोंक में लिखा है या होश में? होश में तो ऐसा लिखना संभव नहीं, फिर झोंक के लिखे को कोई होशवाला व्यक्ति कैसे प्रामाणिक व सत्य बात के रूप में स्वीकार कर सकता है?

योगीराज इसी सिद्धासन की प्रशंसा करते हुए लिखते हैं :

किमन्यैर्बहुभि: पीठै: सिद्धे सिद्धासने सति,

प्राणानिले सावधाने बद्धे केवलकुंभके.

(हठयोगप्रदीपिका 1/41)

(सिद्धासन के सिद्ध होने पर दूसरे बहुत से आसनों का क्या लाभ? इस सिद्धासन से केवलकुंभक प्राणायाम बंधने पर दूसरे सब आसन वृथा समझने चाहिए).

यहां स्वात्माराम योगींद्र ने केवल एक आसन पर आ कर शेष को व्यर्थ घोषित कर दिया है. यह वही निष्कर्ष है जिसे हम पहले ही प्रतिपादित कर चुके हैं, ‘इस दृष्टि से तो केवल एक आसन काफी है. ऐसे में 32 आसनों का ही औचित्य सिद्ध करना कठिन है, 84 या 84 लाख की तो बात ही छोड़ो.’

जब स्वयं योग के ग्रंथ ही एक आसन को छोड़ कर सब को वृथा घोषित करते हैं, जब विभिन्न ग्रंथों के माहात्म्यों पर तार्किक दृष्टि से विचार करने के बाद आम आदमी भी इसी निष्कर्ष पर पहुंचता है कि एक के सिवा शेष सब आसन व्यर्थ हैं, तब योग वालों का बीसियों योगासनों को भिन्नभिन्न रोगों, दर्दों, विकृतियों आदि के इलाज के लिए मनमाने रूप में, बिना किसी वैज्ञानिक व प्रामाणिक आधार के, परोसते फिरना क्या अर्थ रखता है? इन की बड़ीबड़ी सजी दुकानों, इन के बड़ेबड़े कारोबारों को देख कर मनुस्मृति में प्रयुक्त ‘योग’ शब्द का स्मरण हो आता है, जिस का अर्थ सभी भाष्यकारों के अनुसार ‘छल’ है.

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि यदि योगासनों का चिकित्सा शास्त्रीय दृष्टि से कोई महत्त्व है, यदि इन से वास्तव में रोग दूर होते हैं तो इस काम के लिए एक ही ‘सर्वव्याधि विनाशक’ आसन पर्याप्त है. शेष सारी उठापटक एकदम फालतू है. विडंबना यही है कि इस एक आसन का भी कोई संतोषजनक व प्रामाणिक चिकित्साशास्त्रीय आधार उपलब्ध नहीं है. अत: योगा वालों के जंजाल से बचने में ही भला है.

एक हत्या ऐसी भी

कत्ल का मुकदमा चल रहा हो तो उस का फैसला जानने के लिए काफी लोग उत्सुक रहते हैं. 12 मार्च, 2018 को चंडीगढ़ के सेशन जज बलबीर सिंह की अदालत के भीतरबाहर तमाम लोग एकत्र थे. वजह यह थी कि उन की अदालत में चल रहा कत्ल का एक मुकदमा अपने आखिरी पड़ाव पर आ पहुंचा था. लोग इस केस का फैसला सुनने को बेकरार थे.

इस केस की शुरुआत कुछ यूं हुई थी.

उस दिन किसी केस की छानबीन के सिलसिले में चंडीगढ़ के थाना सेक्टर-31 की महिला एसएचओ जसविंदर कौर अपने औफिस में मौजूद थीं. रात में ही करीब 45 वर्षीय शख्स ने आ कर उन से कहा, ‘‘मैडम, मेरा नाम दुर्गपाल है और मैं रामदरबार इलाके के फेज-2 के मकान नंबर 2133 में रहता हूं.’’

‘‘जी बताइए, थाने में कैसे आना हुआ, वह भी इस वक्त?’’ इंसपेक्टर जसविंदर कौर ने उस व्यक्ति को गौर से देखते हुए पूछा.

‘‘ऐसा है मैडमजी,’’ खुद को दुर्गपाल कहने वाले शख्स ने बताना शुरू किया, ‘‘हम 4 भाई हैं और मैं सब से बड़ा हूं. मेरी मां शारदा देवी मेरे से छोटे भाई राजबीर के साथ ग्राउंड फ्लोर पर रहती हैं. फर्स्ट फ्लोर पर मेरा सब से छोटा भाई विजय रहता है. मैं और तीसरे नंबर का भाई उदयवीर अपनीअपनी फैमिली के साथ टौप फ्लोर पर रहते हैं.’’

‘‘ठीक है, आप समस्या बताइए.’’

‘‘मैडम, हमारे घर के टौप फ्लोर पर 4 कमरे हैं. वहां सीढि़यों की तरफ वाले 2 कमरे मेरे पास हैं और उस के आगे वाले 2 कमरे मेरे भाई उदयवीर के पास.’’

‘‘आप के मकान और कमरों की बात तो हो गई, वह बताइए जिस के लिए आप को थाने आना पड़ा?’’ थानाप्रभारी जसविंदर कौर ने अपना लहजा थोड़ा बदला.

लेकिन उस शख्स ने जैसे कुछ सुना ही नहीं.

उस ने अपनी बात बेझिझक जारी रखी, ‘‘मेरा भाई उदयबीर अपनी पत्नी प्रतिभा के साथ रहता था. दोनों की शादी को अभी कुल डेढ़ साल हुआ है. 10 जून, 2017 को मेरे पिता जंडियाल सिंह की मौत हो गई थी. कल मैं और मेरे तीनों भाई कुछ रिश्तेदारों के साथ हरिद्वार में पिताजी की अस्थियों का विसर्जन कर के रात करीब साढ़े 8 बजे घर लौटे थे.’’

‘‘आगे बताइए,’’ अब इंसपेक्टर जसविंदर कौर ने दुर्गपाल की बात में रुचि लेते हुए कहा.

‘‘हम लोग थकेहारे थे. घर आ कर खाना खाने के बाद सो गए थे. मैं घर के टौप फ्लोर पर बने कमरों के आगे गैलरी में सो रहा था. रात के एक बजे जब मैं गहरी नींद में था, तभी शोरशराबा सुन कर अचानक मेरी आंखें खुल…’’

दुर्गपाल की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि इंसपेक्टर जसविंदर कौर ने हाथ के इशारे से उसे रोक दिया.

दरअसल, थानाप्रभारी के लिए कंट्रोलरूम से फोन आया था. इंसपेक्टर जसविंदर ने काल रिसीव की तो दूसरी तरफ से पीसीआर कांस्टेबल ओमप्रकाश था.

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उस ने कहना शुरू किया, ‘‘मैडम, रामदरबार इलाके से किसी के छत से गिराने की काल आई है. मौके पर पहुंच कर पता चला कि छत से गिरने वाले को अस्पताल ले जाया चुका था, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. उसे गिराने वाला फरार है. शुरुआती छानबीन में ही मामला कत्ल का लग रहा है, जिस के पीछे की वजह इश्क हो सकती है. केस आप के ही इलाके का है.’’

‘‘मरने वाले और मारने वाले के नाम वगैरह के बारे में पता चला?’’ इंसपेक्टर जसविंदर ने पूछा.

‘‘जी मैडम, सब पता कर लिया है. मरने वाले का नाम उदयवीर है और उसे छत से गिरा कर मारा है उस की पत्नी के कथित प्रेमी सतनाम ने.’’

‘‘ओके, तुम लोग अभी वहीं रुको, मैं पहुंचती हूं वहां.’’ कहते हुए इंसपेक्टर जसविंदर ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया.

उन्होंने सामने बैठे दुर्गपाल की ओर देख कर पूछा, ‘‘आप के भाई उदयवीर को सतनाम नामक शख्स ने छत से नीचे गिरा कर मार दिया और आप…’’

‘‘जी मैडम.’’ इंसपेक्टर जसविंदर की बात पूरी होने से पहले ही दुर्गपाल ने कहा.

‘‘तुम वहां रुकने के बजाय थाने चले आए?’’

‘‘मैडम, मैं ने तुरंत 100 नंबर पर फोन कर के घटना के बारे में बता दिया था. साथ ही आटोरिक्शा से भाई को सेक्टर-32 के सरकारी अस्पताल में पहुंचा भी दिया था. फिर यह सोच कर कि इस तरीके से पुलिस पता नहीं कब पहुंचेगी, मैं अपने दूसरे भाइयों को वहीं रुके रहने को बोल कर थाने चला आया.’’

‘‘कोई बात नहीं, पुलिस ने वहां पहुंच कर अपनी काररवाई शुरू कर दी है. तुम भी चलो हमारे साथ.’’

इस के बाद इंसपेक्टर जसविंदर कौर सबइंसपेक्टर राजवीर सिंह और सिपाही प्रमोद व नवीन के अलावा दुर्गपाल सिंह को साथ ले कर सरकारी गाड़ी से रामदरबार की ओर रवाना हो गईं.

घटनास्थल पर काफी भीड़ एकत्र थी. पीसीआर वाले भी वहीं थे. उन से जरूरी जानकारी लेने के बाद उन्हें वहां से रुखसत कर दिया गया. साथ ही सिपाही नवीन को वहां तैनात कर के इंसपेक्टर जसविंदर कौर अन्य लोगों के साथ सेक्टर-32 के सिविल अस्पताल चली गईं.

वहां उदयवीर को पहले ही मृत घोषित किया जा चुका था. थाना पुलिस ने अपनी आगे की काररवाई शुरू कर दी. एसआई राजबीर सिंह शव का पंचनामा बनाने लगे और जसविंदर कौर ने दुर्गपाल से उस की तहरीर ले कर एफआईआर दर्ज करवाने की प्रक्रिया शुरू कर दी.

दुर्गपाल ने अपनी तहरीर के शुरुआती हिस्से में वही सब दोहराया, जो वह पहले ही थाने में थानाप्रभारी जसविंदर कौर को बता चुका था. आगे उस ने जो कुछ बताया, वह कुछ इस तरह था—

शोरशराबा सुन कर जब मेरी आंखें खुलीं तो मैं ने देखा कि बहलाना में रहने वाला एक लड़का सतनाम सिंह अपने हाथ में बेसबाल बैट पकड़े मेरे भाई उदयवीर से लड़ता हुआ छत पर जा पहुंचा था.

वह उदयवीर से मारपीट करते हुए उसे घसीट कर छत पर ले गया था. बीचबीच में उदयवीर भी उस का मुकाबला करने का प्रयास करते हुए उस पर हाथपैर से वार कर रहा था.

यह सब देख मैं भी तेजी से उन के पीछे छत पर चला गया. तब तक वे दोनों लड़ते हुए कौर्नर के मकानों की छत पर जा पहुंचे थे. ऐसा इसलिए था कि हमारी लाइन के मकानों व बैकसाइड वाले मकानों की छतें आपस में मिली हुई हैं.

जिस वक्त वे दोनों लड़ते हुए मकान नंबर 2088 की छत पर पहुंचे तो मैं भी उन्हें छुड़ाने के लिए वहां जा पहुंचा. अभी मैं उन से थोड़े फासले पर था, जब मेरे कानों में सतनाम की आवाज पड़ी.

वह मेरे भाई से कह रहा था कि प्रतिभा हमेशा से उस की प्रेमिका रही है, उसे मजबूरी में उस से शादी करनी पड़ी थी. अब वह उसे आजाद कर दे, वरना वह उस की (मेरे भाई उदयवीर की) जान ले लेगा.

इस से पहले कि मैं भाई की मदद के लिए उस के पास पहुंच पाता, वह दीवार के एक कोने की तरफ हुआ और तभी सतनाम ने मौका देख कर उसे धक्का दे कर नीचे गिरा दिया. सतनाम सिंह ने मेरे भाई की पत्नी प्रतिभा के साथ लव अफेयर के चलते मेरे भाई को रास्ते से हटाने के लिए जान से मार दिया. उस के खिलाफ मामला दर्ज कर के सख्त काररवाई की जाए.

उसी रोज यह प्रकरण थाना सेक्टर-31 में भादंवि की धाराओं 302 एवं 456 के तहत दर्ज हो गया. यह 14 जून, 2017 की बात है.

मौके की अन्य काररवाइयां पूरी कर के थाने लौटने के बाद पुलिस ने सतनाम सिंह को काबू करने की योजनाएं बनानी शुरू कीं. वारदात को अंजाम देने के बाद वह मौके से फरार होने में सफल हो गया था. लेकिन अपराध कर के भागने के 8 घंटे के भीतर ही पुलिस ने एक गुप्त सूचना के आधार पर उसे गिरफ्तार कर लिया.

अगले दिन अदालत से उस का कस्टडी रिमांड हासिल कर के उस से विस्तार से पूछताछ की गई. इस पूछताछ में उस ने बताया कि वह चंडीगढ़ के गांव बहलाना के मकान नंबर 74 का रहने वाला था. यहीं की रहने वाली लड़की प्रतिभा से उसे प्यार हो गया था. मगर यह एकतरफा प्यार था, जिस में प्रतिभा ने कभी कोई रुचि नहीं दिखाई थी.

सतनाम सिंह ने उसे अपनी प्रेमिका घोषित करते हुए उस का पीछा नहीं छोड़ा था. इस से प्रतिभा खुद तो परेशान थी ही, उस के घर वाले भी फिक्रमंद होने लगे थे.

उन के मन में यह भय समा गया था कि कहीं सतनाम उन की बेटी को उठा न ले जाए. इस की वजह यह भी थी कि सतनाम अपराधी किस्म का लड़का था. आखिर प्रतिभा के घर वालों ने रामदरबार के रहने वाले उदयवीर से उस की शादी कर दी.

सतनाम के बताए अनुसार प्रतिभा के घर वालों का डर एकदम सही निकला. वह वाकई उन की लड़की को अपहृत करने के प्रयास में था. यह अलग बात है कि अभी तक उसे सफलता नहीं मिल पाई थी. प्रतिभा की शादी के बाद तो उस के लिए यह काम और भी मुश्किल हो गया था.

देखतेदेखते इस शादी को डेढ़ साल गुजर गया. लेकिन सतनाम इस बीच प्रतिभा को भूल नहीं पाया. इस बीच उस ने एक दुस्साहस भरा काम यह भी किया कि उदयवीर से मिल कर उस से सीधे ही कह दिया, ‘‘प्रतिभा मेरी प्रेमिका थी और हमेशा रहेगी. तुम ने उस की मजबूरी का फायदा उठा कर उस की इच्छा के विरुद्ध शादी की है. तुम्हारी भलाई इसी में है कि उस से तलाक ले कर उसे मेरे हवाले कर दो, वरना मुझे तुम्हारा खून करना पड़ेगा.’’

उदयवीर ने इस बारे में अपने भाइयों को भी बताया और प्रतिभा से भी बात की. प्रतिभा ने पति को समझाया कि उस का सतनाम से प्रेमप्यार जैसा कभी कोई रिश्ता नहीं था. वह उस के पीछे पड़ कर नाहक उसे परेशान करता था.

इस पर उदयवीर ने सतनाम को फोन कर के उसे लताड़ दिया.

बकौल सतनाम उस ने भी तय कर लिया कि आगे उसे कुछ भी करना पड़े, वह प्रतिभा को उठा ले जाएगा. बस, मौका मिलने भर की देर थी.

यह मौका भी उसे जल्दी ही मिल गया. उदयवीर के पिता का देहांत हो गया और उन की अस्थियों को गंगा में विसर्जित करने उसे अपने भाइयों व परिजनों के साथ हरिद्वार जाना पड़ा.

सतनाम ने पुलिस को बताया कि उसे 13 जून, 2017 की रात में प्रतिभा के घर पर अकेली होने की जानकारी मिली. आधी रात के बाद वह घर के पिछवाड़े से उस के पास जा पहुंचा. वहां जा कर देखा तो उस का पति भी उस की बगल में लेटा था.

लेकिन सतनाम ने परवाह नहीं की और प्रतिभा के मुंह पर हाथ रख कर उसे कंधे पर लाद लिया. जब वह प्रतिभा को ले जाने लगा तो उदयवीर की आंखें खुल गईं. वह सतनाम पर झपटा तो प्रतिभा उस की पकड़ से छूट गई.

इस के बाद सतनाम और उदयवीर गुत्थमगुत्था हो गए. संभव था कि उदयवीर सतनाम पर हावी हो जाता और इस बीच उस के परिजन भी उस की मदद को आ जाते. लेकिन पता नहीं कैसे वहां पड़ा बेसबाल बैट सतनाम के हाथ लग गया और वह उसी से उदयवीर को पीटते हुए छत पर ले गया. वहां से सतनाम ने उसे नीचे गिरा दिया. वह मुंह के बल आ कर गिरा था.

सेक्टर-32 के सिविल अस्पताल के डा. मंडर रामचंद सने व डा. गौरव कुमार ने उदयवीर के शव का पोस्टमार्टम किया. उन्होंने उस के जिस्म पर छोटीबड़ी 10 चोटों का उल्लेख करते हुए मौत का कारण मानसिक आघात और फेफड़ों का बायां हिस्सा नष्ट होना बताया.

खैर, कस्टडी रिमांड की अवधि समाप्त होने पर पुलिस ने सतनाम को फिर से अदालत में पेश कर के न्यायिक हिरासत में बुड़ैल जेल भेज दिया गया.

इस के बाद समयावधि के भीतर उस के विरुद्ध आरोपपत्र तैयार कर 8 गवाहों की सूची के साथ प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी गीतांजलि गोयल की अदालत में पेश कर दिया. इस के बाद यह केस सेशन कमिट हो कर चंडीगढ़ के जिला एवं सत्र न्यायाधीश बलवीर सिंह की अदालत में विधिवत रूप से चला.

विद्वान न्यायाधीश ने दोनों पक्षों को गौर से सुनने और उपलब्ध साक्ष्यों की गहराई से जांच करने के बाद बचावपक्ष के वकील व पब्लिक प्रौसीक्यूटर के बीच हुई बहस के मुद्दों पर भी पूरा ध्यान दिया.

बहस के दौरान पब्लिक प्रौसीक्यूटर राजेंद्र सिंह ने दूसरे की औरत को अपना बनाने की एवज में उस के पति का कत्ल करने को ले कर जहां इसे अमानवीय एवं घिनौना अपराध बताया, वहीं बचावपक्ष के वकील यादविंदर सिंह संधू ने अपनी दलील से अभियोजन पक्ष का रुख पलटने का प्रयास किया.

वकील संधू का कहना था कि मृतक के पिता की मौत के बाद संपत्ति विवाद को ले कर उस का अपने भाइयों से झगड़ा हो गया था. उन्होंने ही उसे छत से गिरा कर मौत के घाट उतारा है. सतनाम सिंह को इस केस में नाहक फंसा दिया है.

लेकिन एक अलग बात यह भी रही कि जहां अभियोजन पक्ष की ओर से 8 गवाह अदालत में पेश हुए, वहीं बचावपक्ष एक गवाह भी पेश नहीं कर पाया. बहरहाल, माननीय न्यायाधीश बलवीर सिंह ने 12 मार्च, 2018 को अभियुक्त सतनाम सिंह को भादंवि की धाराओं 302 एवं 456 का दोषी करार देते हुए अपना फैसला सुना दिया. इस केस में दी जाने वाली सजा की घोषणा 14 मार्च, 2018 को की गई.

14 मार्च को दोषी को सजा सुनाए जाने से पहले सजा के मुद्दे को सुना गया. दोषी ने बताया कि उस की मां की मौत हो चुकी है और अपने वृद्ध पिता हरबंस सिंह का वही अकेला सहारा है. वैसे भी वह अपनी बीए की पढ़ाई कर रहा था, जो पूरी कर के उसे नौकरी की तलाश करनी थी. इसलिए उसे कम से कम सजा सुनाई जाए.

जज साहब ने यह सब शांति से सुना, मगर उसी दिन दोपहर बाद अपना 27 पृष्ठ का फैसला सुनाते हुए दोषी सतनाम सिंह को धारा 302 के तहत उम्रकैद व 5 हजार रुपए जुरमाने और धारा 456 के अंतर्गत एक साल कैद की सजा सुनाई. दोषी ने जुरमाना भरने में अपने को असमर्थ बताया तो उस की कैद की सजा में 6 महीने की बढ़ोत्तरी कर दी गई.

जिस दिन सतनाम सिंह को न्यायिक हिरासत के तहत जेल भेजा गया था, तब से वह चंडीगढ़ की बुड़ैल जेल में ही बंद था. उस की जमानत नहीं हो पाई थी. अब उसे अदालत के फैसले के बाद फिर से उसी जेल में भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों एवं अदालत के फैसले पर आधारित

माधुरी ने किया ‘चोली के पीछे क्या है’ गाने पर धमाकेदार डांस

माधुरी दीक्षित एक बार फिर अपने शानदार डांस को लेकर सुर्खियों में हैं. वे अपनी एक्टिंग के साथ अपने डांस को लेकर भी जानी जाती हैं. फिलहाल माधुरी फिल्‍मों से दूर हैं लेकिन रियेलिटी शोज में नजर आ रही हैं. इनदिनों वे डांस रियेलिटी शो ‘डांस दीवाने’ में जज की भूमिका में हैं. हाल ही में सोनाक्षी सिन्‍हा और डायना पेंटी अपनी आनेवाली फिल्‍म ‘हैप्‍पी फिर भाग जायेगी’ के प्रमोशन के लिए ‘डांस दीवाने’ के सेट पर पहुंची थीं. तीनों ने स्‍टेज पर ऐसा तहलका मचाया कि लोग क्रेजी हो गये.

‘डांस दीवाने’ के सेट से एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें माधुरी दीक्षित अपने आइकौनिक गाने ‘चोली के पीछे क्‍या है’ पर सोनाक्षी और डायना के साथ ठुमके लगाती नजर आ रही हैं.

माधुरी का डांस देखकर वहां मौजूद ऑडियंस क्रेजी हो गई और सीटियां बजाने लगे. सोनाक्षी ने इस वीडियो को शेयर किया है जिसमें तीनों ‘चोली के पीछे क्या है..’ पर थिरकती नजर आ रही हैं. इस वीडियो को सोशल मीडिया पर बेहद पसंद किया जा रहा है.

बता दें कि आनंद एल राय के निर्देशन में बनी इस फिल्‍म में सोनाक्षी और डायना ‘हैप्‍पी’ का किरदार निभाती नजर आयेंगी. सोनाक्षी सिन्‍हा जहां नवप्रीत कौर (हैप्‍पी) तो डायना पेंटी फिल्‍म में हरप्रीत कौर (हैप्‍पी) के किरदार में हैं. फिल्‍म में सोनाक्षी और डायना के अलावा अजी फजल, जिम्‍मी शेरगिल, पीयूष मिश्रा और मोमल शेख जैसे कई कलाकार हैं. यह फिल्‍म ‘हैप्‍पी भाग जायेगी’ की सीक्‍वल है. इसे मुदस्‍सर अजीज ने डायरेक्‍ट किया है.

दो प्रेमियों की बेरहम जुदाई

हसनप्रीत सिंह लाइब्रेरी में अपने सामने अखबार फैलाए बैठा था. फिर भी उस का सारा ध्यान सीढि़यों की तरफ ही लगा हुआ था. सीढि़यों पर जैसे ही किसी के आने की आहट होती, वह चौकन्ना हो कर उधर देखने लगता. उसे पूरी उम्मीद थी कि रमनदीप कौर जरूर आएगी. दरअसल वह खुद ही तयशुदा वक्त से 15-20 मिनट पहले आ गया था.

कस्बे में उन दोनों की मुलाकातें न के बराबर ही हो पाती थीं. सारा दिन एकदूसरे के लिए तड़पते रहने के बावजूद वे 10-15 दिनों में एकाध बार, बस 3-4 मिनट के लिए ही मिल पाते थे. इस छोटी सी मुलाकात के दौरान भी आमतौर पर उन में आपस में कोई बात नहीं हो पाती थी.

उन की बातचीत का माध्यम वे पर्चियां ही रह गई थीं, जो एकदूसरे को लिखा करते थे. इन्हीं पर्चियों में वे अपनी सब भावनाएं, अपने सब दर्द उड़ेल दिया करते थे. इन्हीं पर्चियों में उन की अगली मुलाकात की जगह और उस का वक्त तय होता था.

दरअसल, खेमकरण जैसे छोटे से उस कस्बे में लड़केलड़की का आपस में बात करना इतना आसान नहीं था. फिर बात जब एक ही गांव और एक ही बिरादरी की हो तो और भी मुश्किलें पैदा हो जाती हैं.

बात तो कहीं न कहीं की जा सकती थी, पर बात करने की खबर पूरे कस्बे में फैलते देर नहीं लगती थी. कम उम्र होने के बावजूद लड़केलड़की में इतनी समझ थी कि वे न तो अपनी और न अपने घर वालों की बदनामी होने देना चाहते थे.

इसलिए जब भी वे मिलते तो यही कोशिश करते कि बात न की जाए. हां, कभीकभार मौका मिल जाने पर एकाध वाक्य का आदानप्रदान हो जाया करता था. बावजूद इतनी सावधानी के आखिर एक दिन उन की चोरी पकड़ी गई और उस दिन दोनों के घर में जो तूफान उठा, वह बड़ा भयानक था. दरअसल, उन के मोहल्ले के किसी आदमी ने दोनों को एक साथ देख कर उन के घर शिकायत कर दी थी.

हसनप्रीत सिंह के पिता परविंदर सिंह भारतपाक सीमा पर बसे कस्बा खेमकरण सेक्टर के वार्ड-2 में रहते थे. परविंदर सिंह के 2 बेटे थे. बड़ा बेटा अर्शदीप सिंह जो शादीशुदा था और छोटा बेटा 21 वर्षीय हसनप्रीत, जो अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने पिता के साथ खेतीबाड़ी करता था.

जाट परिवार से संबंधित परविंदर सिंह के पास कई एकड़ उपजाऊ भूमि है और उन की गिनती बड़े किसानों में होती थी. उन के पास धनदौलत, ऐश्वर्य किसी चीज की कमी नहीं थी.

वहीं रमनदीप कौर के पिता जस्सा सिंह की गिनती भी बड़े किसानों में होती थी. उन के पास भी कई एकड़ उपजाऊ भूमि और सुखसुविधाओं का सभी सामान था. जस्सा सिंह का परिवार परविंदर के घर से कुछ दूरी पर वार्ड नंबर-2 में ही रहता था. दोनों परिवारों में अच्छा मेलमिलाप था पर वर्चस्व को ले कर कभीकभार कहासुनी हो जाती थी.

बहरहाल, हसनप्रीत अखबार सामने रखे अपने आसपास बैठे लोगों पर भी नजर रखे हुए था. यह ध्यान रखना बेहद जरूरी था कि उन लोगों में से कोई उस की जानपहचान का न हो. साथ ही इस बात का भी खयाल रखना जरूरी था कि वहां बैठे किसी आदमी को उस पर यह शक न हो जाए कि वह वहां अखबार पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि किसी और इरादे से आया है.

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एक समस्या और भी थी. सामने के किताबों से भरी अलमारियों वाले कमरे में लाइब्रेरियन के अलावा कई लोग मौजूद थे. उस कमरे में लोगों का आनाजाना भी लगा रहता था.

हसन और रमनदीप की मुलाकात करीब 2 साल पहले एक शादी में हुई थी. 12वीं तक की पढ़ाई करने के बाद हसन एग्रीकल्चर का डिप्लोमा कर के पिता के साथ अपने खेतों में आधुनिक तरीके से खेती का काम करने लगा था.

रमनदीप कौर सामान्य कद की गोरी लेकिन साधारण सी लड़की थी. उस की यही साधारणता उस के आकर्षण का कारण थी, जिस पर हसनप्रीत पूरी तरह कुरबान था.

शहर में 2 लाइब्रेरियां थीं. एक तो बहुत छोटी थी, जिस में मात्र 4-6 लोग बड़ी मुश्किल से बैठ पाते थे. वहां मिलने का तो सवाल ही नहीं उठता था. हां, यह दूसरी लाइब्रेरी काफी बड़ी थी.

वे लोग इसी लाइब्रेरी में मिला करते थे. अब दोनों कोडवर्ड के जरिए मिलने की जगह, तारीख और समय तय कर लेते और इस तरह 10-15 दिनों में एक बार मिला करते.

इन्हीं मुलाकातों में वे भावनाओं से लबालब अपनीअपनी पर्चियां किसी न किसी तरीके से एकदूसरे को पकड़ा दिया करते थे. उस दिन उन का मिलना भी इसी तरह एक चिट्ठी के जरिए तय हुआ था.

हसनप्रीत की नजरें बारबार अपनी कलाई घड़ी से टकरातीं. तय वक्त से पूरे 7 मिनट ऊपर हो चुके थे. वह मायूस हो चुका था. उसे लगने लगा था कि अब रमन नहीं आएगी.

तभी हाथ में एक छोटा सा लिफाफा पकड़े रमन सीढि़यों पर नजर आई. बेंच पर संयोगवश हसनप्रीत के पास वाली जगह खाली थी, जहां आ कर रमन बैठ गई. आसपास इतने लोग बैठे थे कि बात करना बिलकुल असंभव लग रहा था. हसनप्रीत के दिल में तूफान सा मचल रहा था.

लाइब्रेरी में जमे तल्लीनता से अखबार पढ़ रहे लोगों के बीच पसरी चुप्पी के बावजूद बात करना कतई संभव नहीं लग रहा था. हसन ने कनखियों से रमन की ओर देखा. वह भी अखबार सामने रखे हुए उसे पढ़ने का नाटक करने लगी. इसी उधेड़बुन में कई मिनट बीत गए.

हसनप्रीत बड़ी बेचैनी सी महसूस कर रहा था. इस से पहले ऐसे कई मौके आए थे, जब वे इस तरह लाइब्रेरी में मिले थे और आपस में उन की कोई बात नहीं हो पाई थी. पर उन के लिए आज का दिन तो विशेष था.

रमन ने कोई खास बात करने के लिए हसन को बुलाया था. आखिर अपने चारों ओर देखने के बाद रमन ने चौकन्ने हो कर धीमे स्वर में कहा, ‘‘हसन, मेरे पिताजी किसी भी सूरत में हमारी शादी के लिए तैयार नहीं होंगे, इसलिए तुम मुझे भूल जाओ.’’

‘‘अपने प्यार को भूलना क्या इतना आसान होता है? तुम भी पागलों जैसी बातें करती हो.’’ हसन ने रोआंसे हो कर कहा, ‘‘देखो मेरे पिता को देखो, वह मेरी खुशी की खातिर तुम्हें अपनी बहू बनाने को तैयार हो गए हैं. क्या तुम्हारे पिताजी मुझे अपना दामाद स्वीकार नहीं कर सकते?’’

‘‘यही तो विडंबना है मेरे भाग्य की. तुम्हारी जुदाई शायद मेरा नसीब है.’’

‘‘तुम भी बेकार की बातें करती हो. इंसान को अपनी कोशिश तब तक जारी रखनी चाहिए जब तक उस की समस्या का समाधान नहीं हो जाता.’’ हसनप्रीत ने रमन को हौसला बंधाते हुए कहा.

‘‘तुम पुरुष हो और तुम्हारे लिए ऐसी बातें करना सहज है, लेकिन मैं लड़की हूं. मैं इस समाज का और अपने परिवार का सामना नहीं कर सकती.’’

रमन के ये वाक्य उस के टूटे हृदय की वेदना और उस की हार की निशानी थे, जिसे हसनप्रीत ने स्पष्ट महसूस किया. इसलिए उस ने ढांढस बंधाते हुए कहा, ‘‘एक काम करो, तुम सारी बातें उस वाहेगुरु पर छोड़ दो. अगर हमारा प्यार सच्चा है और इरादा पक्का है तो मुझे पूरा विश्वास है कि सच्चे पातशाह हमारी मदद जरूर करेंगे. वही कोई न कोई रास्ता निकालेंगे. बस तुम विश्वास रखना.’’

बातचीत के बाद दोनों अपनेअपने घर चले गए.

जस्सा सिंह और उस के भाइयों को जिस दिन से यह खबर लगी थी कि परविंदर का छोटा बेटा हसनप्रीत उन की बेटी रमनदीप में दिलचस्पी ले रहा है, उन्होंने उसी दिन से रमन पर नजर रखनी शुरू कर दी थी. यहां तक कि उसे किसी काम से अपने घर के सामने रहने वाले अपने चाचा के घर भी अकेले जाने की इजाजत नहीं थी.

ऐसे में हसन से मिलना तो बिलकुल संभव ही नहीं था, इसीलिए अपनी आखिरी मुलाकात में वह हसन को स्पष्ट कह आई थी कि शायद अब दोबारा मिलना कभी संभव न हो.

हसनप्रीत के कहने पर रमनदीप ने अपने जीवन की बागडोर वाहेगुरु के हाथों में सौंप दी थी और आने वाले समय का बड़ी बेसब्री से इंतजार करने लगी थी. हसन ने भी अपने आप को वाहेगुरु की मरजी के हवाले कर दिया था. अब उन की मुलाकातें लगभग समाप्त हो गई थीं.

दूसरी ओर जस्सा सिंह और उन के परिवार के दिमाग में यह फितूर अभी तक बना हुआ था. उन्हें हर समय यह संदेह घेरे रहता था कि हसन अब भी उन की लड़की से मिलताजुलता है. वह किसी न किसी बहाने से हसन और उस के परिवार को सबक सिखाने के लिए उतावले रहते थे.

13 मई, 2018 की बात है. शाम के लगभग 4 बजे का समय होगा. परविंदर ने अपने बेटे हसन से कहा कि वह बाड़े में जा कर पशुओं को चारा डाल आए. परविंदर के पास कई दुधारू पशु थे. उस ने पशुओं के लिए अपने घर के बाहर एक बाड़ा बना रखा था.

वह बाड़ा जस्सा सिंह के घर की तरफ था और पशुओं को प्रतिदिन चारा डालने की जिम्मेदारी हसन की थी. 13 तारीख रविवार की शाम 4 बजे भी वह रोज की तरह पशुओं को चारा डालने बाड़े में गया.

पशुओं को चारा डाल कर हसन लगभग 2 घंटे में लौट आता था, लेकिन उस दिन देर रात गए जब वह वापस नहीं लौटा तो परविंदर को उस की चिंता हुई. उन्होंने अपने बड़े बेटे अर्शदीप के साथ जा कर बाड़े में देखा तो हैरान रह गए. पशु चारे के बिना भूख से बिलबिला रहे थे.

इस का मतलब हसन बाड़े में आया ही नहीं था. परविंदर ने मन ही मन कुढ़ते हुए अर्शदीप से कहा, ‘‘बहुत लापरवाह लड़का है, भूखे पशुओं को छोड़ कर न जाने कहां आवारागर्दी कर रहा है. आज इस की खबर लेनी पड़ेगी.’’

इस के बाद दोनों बापबेटे ने मिल कर पशुओं को चारा खिलाया और हसन की तलाश शुरू कर दी. परविंदर के भाइयों को इस बात का पता चला तो वे भी हसन की तलाश में जुट गए.

सब को इस बात का आश्चर्य था कि आज से पहले हसन ने इस तरह की हरकत कभी नहीं की थी, फिर ऐसा क्या हुआ कि जो वह बिना कुछ बताए घर से लापता हो गया था. बहरहाल, रात भर हसन की तलाश की जाती रही पर उस की कहीं कोई खोजखबर नहीं मिली.

 

अगले दिन सुबह परविंदर सिंह को उन की रिश्तेदारी में लगते भाई दया सिंह ने आ कर बताया कि उस के लड़के हसन को जस्सा सिंह का परिवार पकड़ कर अपने घर ले गया है. उसे यह खबर किसी ने बताई थी. बताने वाले ने कहा था कि जिस समय हसन पशुओं को चारा डालने बाड़े की ओर जा रहा था तो उस ने देखा, जस्सा सिंह और उस के भाई हसन को अपने साथ अपने घर की ओर ले जा रहे थे.

यह पता चलते ही परविंदर, उस का बेटा अर्शदीप और उन के रिश्तेदार जस्सा सिंह के घर पहुंचे पर जस्सा सिंह ने हसन के वहां होने से साफ इनकार कर दिया. इतना ही नहीं, उस ने परविंदर और उन के साथ आए लोगों की बेइज्जती कर के अपने घर से भगा दिया.

जस्सा सिंह के ऐसे व्यवहार से परविंदर सिंह का शक विश्वास में बदल गया. किसी अनहोनी के डर से उन का तनमन बुरी तरह कांप उठा. वह वहीं से सभी लोगों के साथ थाना खेमकरण पहुंचे और थानाप्रभारी बलविंदर सिंह को हसनप्रीत के लापता होने की पूरी घटना बता कर जस्सा सिंह और उस के परिवार पर संदेह जताया.

थानाप्रभारी बलविंदर सिंह ने परविंदर की पूरी शिकायत सुनने के बाद उन के लिखित बयान दर्ज किए और एएसआई चरण सिंह, दर्शन सिंह, हैडकांस्टेबल दिलबाग सिंह, बलविंदर सिंह, इंदरजीत सिंह, मेजर सिंह, तरलोक सिंह और दलविंदर सिंह को साथ ले कर जस्सा सिंह के घर जा पहुंचे.

थानाप्रभारी बलविंदर सिंह द्वारा हसन के बारे में पूछने पर जस्सा सिंह ने बताया कि उन्होंने तो कई दिनों से हसन को नहीं देखा. इस के बाद थानाप्रभारी बलविंदर सिंह ने रमनदीप कौर के बारे में पूछा तो जस्सा सिंह ने बताया कि वह रिश्तेदारी में गई हुई है.

कहां गई है, यह पूछने पर वह बगलें झांकने लगा. इस से थानाप्रभारी बलविंदर सिंह का संदेह गहरा गया. उन्होंने परिवार के हर सदस्य से जब अलगअलग पूछताछ की तो सब के बयान एकदूसरे से भिन्न थे.

थानाप्रभारी बलविंदर सिंह ने अब वहां ठहरना उचित नहीं समझा और पूछताछ के लिए सब को हिरासत में ले कर थाने आ गए. थाने पहुंच कर जब सब से सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि उन लोगों ने मिल कर हसनप्रीत और रमनदीप कौर की हत्या कर के उन दोनों की लाशों को छिपा दिया है.

अपराध स्वीकृति के बाद थानाप्रभारी बलविंदर सिंह ने एसएसपी (तरनतारन) दर्शन सिंह मान को इस हत्याकांड की सूचना दे दी. उन के निर्देश पर जस्सा सिंह, उस की पत्नी मंजीत कौर और बेटा आकाश, उस के भाई हरपाल सिंह, शेर सिंह, मनप्रीत कौर, शेर सिंह के बेटे राणा और एक रिश्तेदार धुला सिंह को गिरफ्तार कर लिया.

इन सभी के खिलाफ भादंसं की धारा 302, 364, 201, 148, 149 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया. हसनप्रीत सिंह और रमनदीप कौर की हत्या के अपराध में पुलिस ने इन सभी को सक्षम अदालत में पेश कर 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया.

पूछताछ के दौरान अभियुक्तों ने बताया कि दोनों की हत्या करने के बाद रमनदीप कौर का शव जस्सा सिंह के घर के सामने रहने वाले उस के भाई हरपाल सिंह के घर में बने शौचालय के मेनहोल में छिपा दिया है, जबकि हसन की लाश को उन्होंने जस्सा सिंह के घर में बने शौचालय के मेनहोल में छिपा दी ाि.

थानाप्रभारी बलविंदर सिंह ने अभियुक्तों की निशानदेही पर एसएसपी दर्शन सिंह मान और पट्टी के एसडीएम सुरिंदर सिंह की मौजूदगी में दोनों घरों से हसन और रमनदीप की लाशें बरामद कर के उन्हें पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया.

सभी अभियुक्तों से पूछताछ के बाद इस दिल दहला देने वाले हत्याकांड की जो कहानी प्रकाश में आई, वह 2 प्रेमियों को जुदा करने की क्रूरता भरी दास्तां थी.

हसनप्रीत सिंह और रमनदीप कौर दोनों एकदूसरे से बेहद प्रेम करते थे और शादी करना चाहते थे. लेकिन जस्सा सिंह को यह बात किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं थी. उस ने अपनी बेटी पर पहरा बैठा दिया था. उस का घर से बाहर तक निकलना बंद करवा दिया गया था.

पर इस के बावजूद जस्सा के मन में यह बात कहीं घर कर गई थी कि एक न एक दिन हसन उस की बेटी को भगा ले जाएगा या उस की बेटी घर वालों को धोखा दे कर हसन के साथ भाग कर शादी कर लेगी.

जस्सा को अपनी मूंछों पर बड़ा गर्व था, वह नहीं चाहता था कि बेटी को ले कर कभी उसे अपनी मूंछें नीची करनी पड़ें. इसलिए वह इस किस्से को ही जड़ से खत्म करना चाहता था.

उस का सोचना था कि न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी, इसलिए वह मौके की तलाश में रहने लगा. अपने भाइयों के साथ मिल कर हसन की हत्या की योजना वह बहुत पहले ही बना चुका था.

सो 13 मई की शाम जब हसन अपने पशुओं को चारा डालने बाड़े की ओर जा रहा था तो जस्सा सिंह और उस के भाई हरपाल ने उसे रास्ते में रोक लिया और कोई बात करने का बहाना बना कर अपने घर ले गए.

उन के घर पहुंचने पर घर की औरतों मंजीत कौर और मनप्रीत कौर ने घर का मुख्यद्वार बंद कर दिया और हसन से बिना कोई बात किए, बिना कोई मौका दिए ट्रैक्टर की लोहे की रौड उठा कर उस के सिर पर दे मारी.

अचानक हुए इस हमले से हसन चक्कर खा कर जमीन पर गिर गया. रमनदीप कौर अपने कमरे से यह सब देख रही थी. अपने प्रेमी की यह हालत देख वह उस का बचाव करने के लिए भागती हुई आई तो जस्सा सिंह ने उसी रौड का एक जोरदार वार उस के सिर पर भी कर दिया और चीखते हुए बोला, ‘‘अपने यार को बचाने आई है, अब तू भी मर.’’

इस के बाद सब ने मिल कर हसन और रमन पर रौड से तब तक प्रहार किए, जब तक उन के प्राण नहीं निकल गए.

2 हत्याओं को अंजाम देने के बाद रमनदीप कौर का शव जस्सा सिंह के घर के सामने रहने वाले उस के भाई हरपाल सिंह के घर में बने शौचालय के मेनहोल में छिपाया गया और हसन की लाश को जस्सा सिंह के घर में बने शौचालय के मेनहोल में.

पुलिस रिमांड के दौरान अभियुक्तों की निशानदेही पर वह लोहे की रौड भी बरामद कर ली गई, जिस से दोनों प्रेमियों की हत्या की गई थी. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद पुलिस ने इस हत्याकांड से जुड़े सभी आठों अभियुक्तों को अदालत में पेश कर के जिला जेल भेज दिया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

घोंसले का तिनका (भाग-1)

7 बज चुके थे. मिशैल के आने में अभी 1 घंटा बचा था. मैं ने अपनी मनपसंद कौफी बनाई और जूते उतार कर आराम से सोफे पर लेट गया. मैं ने टेलीविजन चलाया और एक के बाद एक कई चैनल बदले पर मेरी पसंद का कोई भी प्रोग्राम नहीं आ रहा था. परेशान हो टीवी बंद कर अखबार पढ़ने लगा. यह मेरा रोज का कार्यक्रम था. मिशैल के आने के बाद ही हम खाने का प्रोग्राम बनाते थे. जब कभी उसे अस्पताल से देर हो जाती, मैं चिप्स और जूस पी कर सो जाता. मैं यहां एक मल्टीस्टोर में सेल्समैन था और मिशैल सिटी अस्पताल में नर्स.

दरवाजा खुलने के साथ ही मेरी तंद्रा टूटी. मिशैल ने अपना पर्स दरवाजे के पास बने काउंटर पर रखा और मेरे पास पीछे से गले में बांहें डाल कर बोली, ‘‘बहुत थके हुए लग रहे हो.’’

‘‘हां,’’ मैं ने अंगड़ाई लेते हुए कहा, ‘‘वीकएंड के कारण सारा दिन व्यस्त रहा,’’ फिर उस की तरफ प्यार से देखते हुए पूछा, ‘‘तुम कैसी हो?’’

‘‘ठीक हूं. मैं भी अपने लिए कौफी बना कर लाती हूं,’’ कह कर वह किचन में जातेजाते पूछने लगी, ‘‘मेरे कौफी बींस लाए हो या आज भी भूल गए.’’

‘‘ओह मिशैल, आई एम रियली सौरी. मैं आज भी भूल गया. स्टोर बंद होने के समय मुझे बहुत काम होता है. फूड डिपार्टमेंट में जा नहीं सका.’’

3 दिन से लगातार मिशैल के कहने के बावजूद मैं उस की कौफी नहीं ला सका था. मैं ने उसी समय उठ कर जूते पहने और कहा, ‘‘मैं अभी सामने की दुकान से ला देता हूं, वह तो खुली होगी.’’

‘‘ओह नो, टोनी. मैं आज भी तुम्हारी कौफी से गुजारा कर लूंगी. मुझे तो तुम इसीलिए अच्छे लगते हो कि फौरन अपनी गलती मान लेते हो. थके होने के बावजूद तुम अभी भी वहां जाने को तैयार हो. आई लव यू, टोनी. तुम्हारी जगह कोई यहां का लड़का होता तो बस, इसी बात पर युद्ध छिड़ जाता.’’

मैं ऐसे हजारों प्रशंसा के वाक्य पहले भी मिशैल से अपने लिए सुन चुका था. 5 साल पहले मैं अपने एक दोस्त के साथ जरमनी आया था और बस, यहीं का हो कर रह गया. भारत में वह जब भी मेरे घर आता, उस का व्यवहार और रहनसहन देख कर मैं बहुत प्रभावित होता था. उस का बातचीत का तरीका, उस का अंदाज, उस के कपड़े, उस के मुंह से निकले वाक्य और शब्द एकएक कर मुझ पर अमिट छाप छोड़ते गए. मुझ से कम पढ़ालिखा होने के बावजूद वह इतने अच्छे ढंग से जीवन जी रहा है और मैं पढ़ाई खत्म होने के 3 साल बाद भी जीवन की शुरुआत के लिए जूझ रहा था. मैं अपने परिवार की भावनाओं की कोई परवा न करते हुए उसी के साथ यहां आ गया था.

पहले तो मैं यहां की चकाचौंध और नियमित सी जिंदगी से बेहद प्रभावित हुआ. यहां की साफसुथरी सड़कें, मैट्रो, मल्टीस्टोर, शौपिंग मौल, ऊंचीऊंची इमारतों के साथसाथ समय की प्रतिबद्धता से मैं भारत की तुलना करता तो यहीं का पलड़ा भारी पाता. जैसेजैसे मैं यहां के जीवन की गहराई में उतरता गया, लगा जिंदगी वैसी नहीं है जैसी मैं समझता था.

एक भारतीय औपचारिक समारोह में मेरी मुलाकत मिशैल से हो गई और उस दिन को अब मैं अपने जीवन का सब से बेहतरीन दिन मानता हूं. चूंकि मिशैल के साथ काम करने वाली कई नर्सें एशियाई मूल की थीं इसलिए उसे इन समारोहों में जाने की उत्सुकता होती थी. उसे पेइंग गेस्ट की जरूरत थी और मुझे घर की. हम दोनों की जरूरतें पूरी होती थीं इसलिए दोनों के बीच एक अलिखित समझौता हो गया.

मिशैल बहुत सुंदर तो नहीं थी पर उसे बदसूरत भी नहीं कहा जा सकता था. धीरेधीरे हम एकदूसरे के इतने करीब आ गए कि अब एकदूसरे के पर्याय बन गए हैं. मेरी नीरस जिंदगी में बहार आने लगी है.

मिशैल जब भी मुझ से भारत की संस्कृति, सभ्यता और भारतीयों की वफादारी की बात करती है तो मैं चुप हो जाता हूं. मैं कैसे बताता कि जो कुछ उस ने सुना है, भारत वैसा नहीं है. वहां की तंग और गंदी गलियां, गरीबी, पिछड़ापन और बेरोजगारी से भाग कर ही तो मैं यहां आया हूं. उसे कैसे बताता कि भ्रष्टाचार, घूसखोरी और बिजलीपानी का अभाव कैसे वहां के आमजन को तिलतिल कर जीने को मजबूर करता है. इन बातों को बताने का मतलब था कि उस के मन में भारत के प्रति जो सम्मान था वह शायद न रहता और शायद वह मुझ से भी नफरत करने  लग जाती. चूंकि मैं इतना सक्षम नहीं था कि अलग रह सकूं इसलिए कई बार उस की गलत बातों का भी समर्थन करना पड़ता था.

‘‘जानते हो, टोनी,’’ मिशैल कौफी का घूंट भरते हुए बोली, ‘‘इस बार हैनोवर इंटरनेशनल फेयर में तुम्हारे भारत को जरमन सरकार ने अतिथि देश चुना है और यहां के अखबार, न्यूज चैनलों में इस समाचार को बहुत बढ़ाचढ़ा कर बताया जा रहा है. जगहजगह भारत के झंडे लगे हुए हैं.’’

‘‘भारत यहां का अतिथि देश होगा?’’ मैं ने जानबूझ कर अनजान बनने की कोशिश की.

‘‘और क्या? देखा नहीं तुम ने…मैं एक बार तो जरूर जाऊंगी, शायद कोई सामान पसंद आ जाए.’’

‘‘मिशैल, भारतीय तो यहां से सामान खरीद कर भारत ले जाते हैं और तुम वहां का सामान…न कोई क्वालिटी होगी न वैराइटी,’’ मैं ने मुंह बनाया.

‘‘कोई बात नहीं,’’ कह कर उस ने कौफी का आखिरी घूंट भरा और मेरे गले में अपनी बांहें डाल कर बोली, ‘‘टोनी, तुम भी चलो न, वस्तुओं को समझने में आसानी होगी.’’

फेयर के पहले दिन सुबहसुबह ही मिशैल तैयार हो गई. मैं ने सोचा था कि उस को वहां छोड़ कर कोई बहाना कर के वहां से चला जाऊंगा. पर मैं ने जैसे ही मेन गेट पर गाड़ी रोकी, गेट पर ही भारत के विशालकाय झंडे, कई विशिष्ट व्यक्तियों की टीम, भारतीय टेलीविजन चैनलों की कतार और नेवी का पूरा बैंड देख कर मैं दंग रह गया. कुल मिला कर ऐसा लगा जैसे सारा भारत सिमट कर वहीं आ गया हो.

मैं ने उत्सुकतावश गाड़ी पार्किंग में खड़ी की तो मिशैल भाग कर वहां पहुंच गई. मेरे वहां पहुंचते ही बोली, ‘‘देखो, कैसा सजा रखा है गेट को.’’

मैं ने उत्सुकता से वहां खड़े एक भारतीय से पूछा, ‘‘यहां क्या हो रहा है?’’

‘‘यहां तो हम केवल प्रधानमंत्रीजी के स्वागत के लिए खड़े हैं. बाकी का सारा कार्यक्रम तो भीतर हमारे हाल नं. 6 में होगा.’’

‘‘भारत के प्रधानमंत्री यहां आ रहे हैं?’’ मैं ने उत्सुकतावश मिशैल से पूछा.

‘‘मैं ने कहा था न कि भारत अतिथि देश है पर लगता है यहां हम लोग ही अतिथि हो गए हैं. जानते हो टोनी, उन के स्वागत के लिए यहां के चांसलर स्वयं आ रहे हैं.’’

थोड़ी देर में वंदेमातरम की धुन चारों तरफ गूंजने लगी. प्रधानमंत्रीजी के पीछेपीछे हम लोग भी हाल नं. 6 में आ गए, जहां भारतीय मंडप को दुलहन की तरह सजाया हुआ था.

प्रधानमंत्रीजी के वहां पहुंचते ही भारतीय तिरंगा फहराने लगा और राष्ट्रीय गीत के साथसाथ सभी लोग सीधे खड़े हो गए, जैसा कि कभी मैं ने अपने स्कूल में देखा था. टोनी आज भारतीय होने पर गर्व महसूस कर रहा था. उसे भीतर तक एक झुरझुरी सी महसूस हुई कि क्या यही वह भारत था जिसे मैं कई बरस पहले छोड़ आया था. आज यदि जरमनी के लोगों ने इसे अतिथि देश स्वीकार किया है तो जरूर अपने देश में कोई बात होगी. मुझे पहली बार महसूस हुआ कि अपना देश और उस के लोग किस कदर अपने लगते हैं.

समारोह के समाप्त होते ही एक विशेष कक्ष में प्रधानमंत्री चले गए और बाकी लोग भारतीय सामान को देखने में व्यस्त हो गए. थोड़ी देर में प्रधानमंत्रीजी अपने मंत्रिमंडल एवं विदेश विभाग के लोगों के साथ भारतीय निर्यातकों से मिलने चले गए. उधर हाल में अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम होेते रहे. एक कोने में भारतीय टी एवं कौफी बोर्ड के स्टालों पर भी काफी भीड़ थी.

मैं ने मिशैल से कहा, ‘‘चलो, तुम्हें भारतीय कौफी पिलवाता हूं.’’

‘‘नहीं, पहले यहां कठपुतलियों का यह नाच देख लें. मुझे बहुत अच्छा लग रहा है.’’

अगले दिन मेरा मन पुन: विचलित हो उठा. मैं ने मिशैल से कहा तो वह भी वहां जाने को तैयार हो गई.

मैं एकएक कर के भारतीय सामान के स्टालों को देख रहा था. भारत की क्राकरी, हस्तनिर्मित सामान, गृहसज्जा का सामान, दरियां और कारपेट तथा हैंडीक्राफ्ट की गुणवत्ता और नक्काशी देख कर दंग रह गया. मैं जिस स्टोर में काम करता था वहां ऐसा कुछ भी सामान नहीं था. मैं एक भारतीय स्टैंड के पास बने बैंच पर कौफी ले कर सुस्ताने को बैठ गया. पास ही बैठे किसी कंपनी के कुछ लोग आपस में जरमन भाषा में बात कर रहे थे कि भारत का सामान कितना अच्छा और आधुनिक तरीकों से बना हुआ है. वे कल्पना भी नहीं कर पा रहे थे कि यह सब भारत में ही बना हुआ है और एशिया के बाकी देशों की तुलना में भारत कहीं अधिक तरक्की कर चुका है. मुझे यह सब सुन कर अच्छा लग रहा था.

उन्होंने मेरी तरफ देख कर पूछा, ‘‘आप को क्या लगता है कि क्या सचमुच माल भी ऐसा ही होगा जैसा सैंपल दिखा रहे हैं?’’

‘‘मैं क्या जानूं, मैं तो कई वर्षों से यहीं रहता हूं,’’ मैं ने अपना सा मुंह बनाया.

मिशैल ने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मैं ने कोई गलत बात कह दी हो. वह धीरे से मुझ से कहने लगी, ‘‘तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए था. क्या तुम्हें अपने देश से कोई प्रेम नहीं रहा?’’

मैं उस की बातों का अर्थ ढूंढ़ने का प्रयास करता रहा. शायद वह ठीक ही कह रही थी. हाल में दूर हो रहे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में राजस्थानी लोकगीत की धुन के साथसाथ मिशैल के पांव भी थिरकने लगे. वह वहां से उठ कर चली गई.

मैं थोड़ी देर आराम करने के बाद भारतीय सामान से सजे स्टैंड की तरफ चला गया. मेरे हैंडीक्राफ्ट के स्टैंड पर पहुंचते ही एक व्यक्ति उठ कर खड़ा हो गया और बोला,  ‘‘मे आई हैल्प यू?’’

‘‘नो थैंक्स, मैं तो बस, यों ही,’’ मैं हिंदी में बोलने लगा.

‘‘कोई बात नहीं, भीतर आ जाइए और आराम से देखिए,’’ वह मुसकरा कर हिंदी में बोला.

तब तक पास के दूसरे स्टैंड से एक सरदारजी आ कर उस व्यक्ति से पूछने लगे, ‘‘यार, खाने का यहां क्या इंतजाम है?’’

‘‘पता नहीं सिंह साहब, लगता है यहां कोई इंडियन रेस्तरां नहीं है. शायद यहीं की सख्त बै्रड और हाट डाग खाने पड़ेंगे और पीने के लिए काली कौफी.’’

जिस के स्टैंड पर मैं खड़ा था वह मेरी तरफ देख कर बोले, ‘‘सर, आप तो यहीं रहते हैं. कोई भारतीय रेस्तरां है यहां? ’’

‘‘भारतीय रेस्तरां तो कई हैं, पर यहां कुछ दे पाएंगे…यह पूछना पड़ेगा,’’ मैं ने अपनत्व की भावना से कहा.

मैं ने एक रेस्तरां में फोन कर के उस से पूछा. पहले तो वह यहां तक पहुंचाने में आनाकानी करता रहा. फिर जब मैं ने उसे जरमन भाषा में थोड़ा सख्ती से डांट कर और इन की मजबूरी तथा कई लोगों के बारे में बताया तो वह तैयार हो गया. देखते ही देखते कई लोगों ने उसे आर्डर दे दिया. सब लोग मुझे बेहद आत्मीयता से धन्यवाद देने लगे कि मेरे कारण उन्हें यहां खाना तो नसीब होगा.

अगले 3 दिन मैं लगातार यहां आता रहा. मैं अब उन में अपनापन महसूस कर रहा था. मैं जरमन भाषा अच्छी तरह जानता हूं यह जान कर अकसर मुझे कई लोगों के लिए द्विभाषिए का काम करना पड़ता. कई तो मुझ से यहां के दर्शनीय स्थलों के बारे में पूछते तो कई यहां की मैट्रो के बारे में. मैं ने उन को कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां दीं, जिस से पहले दिन ही उन के लिए सफर आसान हो गया.

आखिरी दिन मैं उन सब से विदा लेने गया. हाल में विदाई पार्टी चल रही थी. सभी ने मुझे उस में शामिल होने की प्रार्थना की. हम ने आपस में अपने फोन नंबर दिए, कइयों ने मुझे अपने हिसाब से गिफ्ट दिए. भारतीय मेला प्राधिकरण के अधिकारियों ने मुझे मेरे सहयोग के लिए सराहा और भविष्य में इस प्रकार के आयोजनों में समर्थन देने को कहा. मिशैल मेरे साथ थी जो इन सब बातों को बड़े ध्यान से देख रही थी.

अगले कई दिन तक मैं निरंतर अपनों की याद में खोया रहा. मन का एक कोना लगातार मुझे कोसता रहा, न चाहते हुए भी रहरह कर यह विचार आता रहा कि किस तरह अपने मातापिता से झूठ बोल कर विदेश चला आया. उस समय यह भी नहीं सोचा कि मेरे पीछे उन्होंने कैसे यह सब सहा होगा.

एक दिन मिशैल और मैं टेलीविजन पर कोई भारतीय प्रोग्राम देख रहे थे. कौफी की चुस्कियों के साथसाथ वह बोली, ‘‘तुम्हें याद है टोनी, उस दिन इंडियन कौफी बोर्ड की कौफी पी थी. सचमुच बहुत ही अच्छी थी. सबकुछ मुझे बहुत अच्छा लगा और वह कठपुतलियों का नाच भी…कभीकभी मेरा मन करता है कुछ दिन के लिए भारत चली जाऊं. सुना है कला और संस्कृति में भारत ही विश्व की राजधानी है.’’

‘‘क्या करोगी वहां जा कर. जैसा भारत तुम्हें यहां लगा असल में ऐसा है नहीं. यहां की सुविधाओं और समय की पाबंदियों के सामने तुम वहां एक दिन भी नहीं रह सकतीं,’’ मैं ने कहा.

‘‘पर मैं जाना जरूर चाहूंगी. तुम वहां नहीं जाना चाहते क्या? क्या तुम्हारा मन नहीं करता कि तुम अपने देश जाओ?’’

‘‘मन तो करता है पर तुम मेरी मजबूरी नहीं समझ सकोगी,’’ मैं ने बड़े बेमन से कहा.

‘‘चलो, अपने लोगों से तुम न मिलना चाहो तो न सही पर हम कहीं और तो घूम ही सकते हैं.’’

मैं चुप रहा. मैं नहीं जानता कि मेरे भीतर क्या चल रहा है. दरअसल, जिन हालात में मैं यहां आया था उन का सामना करने का मुझ में साहस नहीं था.

सबकुछ जानते हुए भी मैं ने अपनेआप को आने वाले समय पर छोड़ दिया और मिशैल के साथ भारत रवाना हो गया.

– क्रमश:

फ्राड तांत्रिक : कैसे हो गए मेरे होश फाख्ता

मेरे एक लेक्चरर दोस्त ने कहा, ‘‘चार अक्षर पढ़ लिए, दोचार लेख अखबारों, पत्रिकाओं में छप गए तो किसी को कुछ समझते ही नहीं. अरे, स्वामी सदाचारी, सत्यनिकेतन मोतीबाग, दिल्ली से मिलते ही तुम्हारी आंखें खुल जाएंगी, अंतर की सोई कुंडलियां जाग जाएंगी और सब चौकड़ी भूल जाओगे. मैं 2 बार मिला हूं. बिना पूछे नाम व समस्या न बता दें तो तुम मेरा नाम बदल देना.’’ मैं अपने खयालों में खोया उन की बातें भी सुन रहा था. मुझे लगा जैसे मेरे दोस्त कह रहे हों कि तुम मेरे नाम का कुत्ता पाल लेना, सो मैं ने चौंक कर उन की ओर देखा तो वह कह रहे थे, ‘‘मैं ने एक परचे पर अपना नाम व समस्या लिखी और घड़े में डाल दी. स्वामी सदाचार 6 मीटर दूर बैठे थे. फिर भी मेरी समस्या बता दी और उपाय के लिए इलायची, लौंग मंगाई है. कल सुबह चलना.’’

अगले दिन हम दोनों मोतीबाग पहुंचे. एक महिला, जो मनोहर मेकअप में थी और जिस के शरीर से सेंट की भीनीभीनी खुशबू आ रही थी, ने ड्राइंगरूम में बिठाया. पानी पिलाया और बोली, ‘‘मैं देखती हूं कि स्वामीजी हवन कर चुके या नहीं. आप का नाम व काम?’’ मैं बोला, ‘‘अपना नाम व काम दोनों मैं स्वामीजी को ही बताऊंगा.’’

वह इतरा कर बोली, ‘‘स्वामीजी तो बिना बताए ही बता देंगे, सर्वज्ञ हैं.’’ उस के बारबार आग्रह पर मैं ने कहा, ‘‘लेंटिकुलर ओपेसिटी है (मोतिया बिंद).’’

‘‘वह क्या होता है?’’ ‘‘यह क्या होता है मैं नहीं जानता पर डाक्टर यही बताता है.’’

स्वामीजी के कमरे पर नोटिस लगा था : ‘केवल एक व्यक्ति कक्ष में प्रवेश करे. स्वामीजी से हुई बातचीत गोपनीय रखें. किसी से चर्चा करने पर हानि हो सकती है.’ नमस्कार के बाद मैं ने कहा, ‘‘सुना है, आप व्यक्ति का विवरण बिना पूछे बता देते हैं.’’

‘‘ठीक सुना है. पर इस काम को करने में समय लगेगा और आज मैं एक राष्ट्रीय महत्त्व के काम में व्यस्त हूं. यह सरकार गिरानी है.’’ ‘‘असंभव,’’ मेरे मुंह से निकला कि उन का सदन में स्पष्ट बहुमत है.

तब मोरारजी देसाई की सरकार थी. सदन में उन का स्पष्ट बहुमत था. स्टीफन विपक्ष के नेता थे. उन की ओर से अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया जा चुका था. बाद में पता चला कि चौधरी चरणसिंह व राजनारायण फोड़े जा चुके थे. ‘‘असंभव को संभव करना या कहें हथेली पर सरसों जमाना ही तो तंत्र का काम है. खैर, अपनी समस्या बताइए.’’

मैं ने कहा, ‘‘लेंटिकुलर ओपेसिटी है.’’ वह बोले, ‘‘डाक्टर क्या कहते हैं?’’

‘‘वह तो इतना ही बताते हैं जितना मैं ने आप को बताया है.’’ स्वामीजी ने अपनी हथेली सामने की और बोले, ‘‘मेरे हाथ में क्या दिखता है?’’

मैं ने कहा, ‘‘गुरु पर्वत उन्नत है, सूर्य रेखा स्पष्ट व गहरी है.’’ ‘‘नहीं, हाथ में कुछ है, कोई वस्तु?’’

‘‘जी नहीं,’’ मैं ने कहा. मेरा हाथ पकड़ कर उन्होंने अपनी हथेली से टकराया और बोले, ‘‘सिद्ध रुद्राक्ष है, जेब में रखो, पूजाघर में रख देना. सामान्य जन से कुछ नहीं लेते. आप को सरल मंत्र बताएंगे. 11 माला हर रोज आधी रात को श्मशान में 11 दिन जपना. पहले एक मंत्र जपना तो भय नहीं लगेगा. शरीर कवचबद्ध हो जाएगा फिर हमें बताना. आप के सामने ही उल्लू की बलि देंगे. उल्लू व पूजासामग्री ला देना. जो काम डाक्टर नहीं कर पाए उसे तंत्र कर देगा. भय लगे तो हमारा शिष्य श्मशान मंत्र सिद्ध कर देगा पर 1,100 रुपए दे देना. कल 250 ग्राम लौंग व इलायची ला देना.’’

मैं फिर नहीं गया. हां, कुछ दिन बाद एक समाचारपत्र में छपा स्वामीजी से संबंधित शिकायत पत्र जरूर पढ़ा : मुझे बलात्कार के झूठे मामले में फंसाया गया है. पुलिस ने कठोर यातनाएं दीं. मेरे हाथों में डंडा बांध कर पंखे से लटका कर घुमाया गया. पानी मांगने पर मेरे सामने पेशाब कर के गिलास पकड़ाया गया. पैर फैला कर डंडा बांध दिया. हाथ पीछे खिड़की से बांधे. 2 दिन खड़े रखा, यहां तक कि मलमूत्र भी उसी दशा में. मैं ने जीवित नरक भोगा.

मैं सच कहता हूं कि मैं निर्दोष हूं. (स्वामी) सदाचारी. दलील, अपील कोई नहीं. वकील- जज आप हैं. उसे निर्दोष भी मानें तो तंत्र क्यों फेल हो गया? झूठी शिकायत करने वाले पर मोहिनी, उच्चारण, मारक मंत्र चलता तो उसे नानी याद आ जाती. किसी दिव्य दृष्टिसंपन्न ऋषि ने अशोक वाटिका में सीता नहीं देखी, रावण पर मोहन मारण मंत्र नहीं चलाया.

एक गुरुजी लाख नहीं करोड़ टके की बात कहते थे. ‘‘पढ़ाई में सिर मत खपाओ. बिना ऊंची पढ़ाई, व्यवसाय में पूंजी लगाए तंत्र, गुरुडम शुरू करो. धन, सम्मान कीर्ति की वर्षा, हलदी न फिटकरी रंग चोखा. मंत्री, उद्योगपति ही नहीं सुंदरसलोनी कोमलांगियां भी तनमन और धन से समर्पित. मनचाहा हल, नौकरी, छोकरी, व्यवसाय में पौबारह, चुनाव विजय, मंत्रीपद गृहक्लेश मुक्ति पलक झपकते मनचाहा.

कम दाम में ज्यादा मजा

भोजपुरी सिनेमा ने 55 साल से भी ज्यादा का सफर पूरा कर लिया है लेकिन भद्दे गाने, फूहड़ डायलौग, गंदी हरकतें और इशारेबाजी ही भोजपुरी फिल्मों की पहचान बन कर रह गए हैं. हिंदी फिल्मों की अंधी नकल के बाद भी भोजपुरी सिनेमा का काफी बड़ा बाजार है और इस से जुड़े ज्यादातर लोग मुनाफा कमा रहे हैं.

मजदूर, ड्राइवर, खलासी जैसा कम कमाई वाला तबका भोजपुरी फिल्मों का सब से बड़ा दर्शक है. इन फिल्मों के टिकट की कीमत काफी कम होती है. सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों में भोजपुरी फिल्मों की टिकट 40 से 60 रुपए में आसानी से मिल जाती है. यही वजह है कि दर्शक कम पैसे में भोजपुरी फिल्मों में सैक्स के तड़के का मजा उठा रहे हैं.

गौरतलब है कि भारत समेत मौरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद जैसे देशों में तकरीबन 25 करोड़ लोग भोजपुरी बोलनेसमझने वाले हैं. हमारे देश में बिहार और उत्तर प्रदेश में भोजपुरी बोलने वाले सब से ज्यादा लोग हैं. महाराष्ट्र, पंजाब, गुजरात वगैरह राज्य भी भोजपुरी सिनेमा के बड़े बाजार हैं क्योंकि बिहार व उत्तर प्रदेश के हजारोंलाखों लोग वहां के कलकारखानों में काम करते हैं. दर्जनों भोजपुरी फिल्मों में काम कर चुके कलाकार धामा वर्मा कहते हैं कि परदेश में अपनी बोली की फिल्म देख कर लोग अपने गांव की मिट्टी की खुशबू जैसा मजा लेते हैं. इसी वजह से बिहार और उत्तर प्रदेश समेत दूसरे कई राज्यों में भी भोजपुरी फिल्में काफी चलती हैं.

कलाकार धामा वर्मा ने जिस मिट्टी की खुशबू की बात की वह भले ही आज की भोजपुरी फिल्मों से पूरी तरह से गायब हो चुकी है, लेकिन भोजपुरी का बाजार बढ़ता ही जा रहा है. भोजपुरी के सुपरस्टार पवन सिंह की फिल्म ‘गदर’ ने करोड़ों रुपए की कमाई की है. एक औसत दर्जे की भोजपुरी फिल्म बनाने में 1-2 करोड़ रुपए लगते हैं और वह 10 से 20 करोड़ रुपए तक की कमाई कर लेती है. इस से चोखा धंधा और क्या हो सकता है.

भोजपुरी फिल्मों के नाम भी दर्शकों को लुभाने के खयाल से ही रखे जाते हैं. ‘पैप्सी पी के लागेलू सैक्सी’, ‘अजब देवरा के गजब भौजाई’, ‘लैला माल छैला धमाल’, ‘दारोगा बाबू आई लव यू’ जैसे नाम दर्शकों को गुदगुदाते हैं और उन्हें सिनेमाघरों की ओर खींच लाते हैं. भोजपुरी फिल्मों के सैक्सी नामों के साथ उन के गाने और उन गानों का फिल्मांकन भी बड़े ही सैक्सी अंदाज में किया जाता है. ‘हमर जवानी खोजेला डबल मरद…’, ‘नथुनी पागल करेली हो रानी…’, ‘लगावे लू जब लिपिस्टिक…’, ‘लौलीपौप लागे लू…’ जैसी गानों में हीरोहीरोइन के सैक्सी लटकेझटके दर्शकों को सिनेमाघरों में सिसकारी भरने के लिए मजबूर कर देते हैं.

भोजपुरी फिल्में अपने शुरुआती दिनों में गंगा, मैया, भौजी, सैंया जैसे नामों के आसपास घूमती रही थीं. 5 लाख रुपए में बनी ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ ने 75 लाख रुपए की कमाई की थी. विश्वनाथ शाहाबादी की बनाई इस फिल्म को मिली भारी कामयाबी के बाद तो भोजपुरी सिनेमा का रास्ता ही खुल गया था और एक के बाद एक धड़ाधड़ भोजपुरी फिल्में बनने लगी थीं. ‘सैंया

से भइल मिलनवा’, ‘तुलसी सोहे तोहार अंगना’, ‘सोलहो सिंगार करे दुलहनिया’, ‘बिदेसिया’, ‘पान खाए सैंया हमार’, ‘लागी नाही छूटे राम’ जैसी कई फिल्में आईं और भोजपुरी सिनेमा को नई ताकत मिली.

साल 1977 में हिंदी सिनेमा के खलनायक रहे सुजीत कुमार और छोटेमोटे रोल करने वाली प्रेमा नारायण भोजपुरी फिल्म ‘दंगल’ में हीरोहीरोइन बन कर आए थे. ‘दंगल’ भोजपुरी की पहली रंगीन फिल्म थी जिस ने आखिरी सांस ले रहे भोजपुरी सिनेमा में नई जान फूंक दी थी. इस फिल्म के सुपरहिट गीत ‘गोरकी पतरकी रे मारे गुलेलवा जियरा हिलहिल जाए…’ को मोहम्मद रफी और आशा भोंसले ने अपनी आवाज दी थी.

उस के बाद राकेश पांडे और पद्मा खन्ना की जोड़ी फिल्म ‘बलम परदेसिया’ ले कर आई थी, जिस ने कामयाबी के झंडे गाड़े थे. साल 2003 में रिलीज हुई फिल्म ‘ससुरा बड़ा पइसावाला’ ने भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को काफी दमदार बना दिया. बिहार के भोजपुरी गायक मनोज तिवारी और रानी चटर्जी की इस फिल्म को मिली कामयाबी ने भोजपुरी सिनेमा के परदे को फिर से चमकदार बना डाला. उस के बाद तो एक बार फिर भोजपुरी फिल्मों की झड़ी लग गई.

फिल्म वितरक विनोद पांडे कहते हैं कि भोजपुरी सिनेमा की बढ़ती लोकप्रियता का ही नतीजा था कि अमिताभ बच्चन, अजय देवगन, जैकी श्रौफ, शत्रुघ्न सिन्हा, जितेंद्र, रति अग्निहोत्री, नगमा, भाग्यश्री, भूमिका चावला जैसे बौलीवुड के कलाकारों ने इस में काम किया. भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री ने कुणाल सिंह, राकेश पांडे के बाद मनोज तिवारी, रविकिशन, दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’, सुदीप पांडे को सुपरस्टार बना दिया.

पिछले 4-5 सालों में भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार की नई खेप पैदा हो चुकी है. भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री ने पवन सिंह, खेसारी लाल, राकेश मिश्रा, धीरज मिश्रा, पाखी हेगड़े, रानी चटर्जी, मोनालिसा, श्वेता तिवारी, दिव्या देसाई, रिंकू घोष, जैसे तमाम कलाकारों को पैसा और पहचान दिला दी है. भोजपुरी सिनेमा की बहती गंगा में हाथ धोने के लिए कई बाहरी लोग भोजपुरी सिनेमा बनाने लगे हैं. साउथ फिल्म इंडस्ट्री के कई लोग भोजपुरी फिल्म बना रहे हैं.

हिंदी फिल्मों और हौलीवुड की नामचीन हीरोइन प्रियंका चोपड़ा द्वारा बनाई गई फिल्म ‘बम बम बोल रहा है काशी’ ने खासी कमाई थी.

दलित अत्याचार कानून

भारतीय जनता पार्टी सरकार को हार कर दलित अत्याचार कानून को फिर से ठीक करने पर मजबूर होना पड़ा है. इस कानून के अनुसार दलितों को गालियां देने या उन को सताने पर पुलिस को शिकायत मिलने पर तुरंत जेल भेज कर मुकदमा चलाने का हक था. सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में फैसला दिया था कि यह कानून गलत है और जब तक पुलिस अधीक्षक इजाजत न दें गिरफ्तारी नहीं हो सकती. अगर जिस के खिलाफ शिकायत है वह सरकारी कर्मचारी है तो उस के डिपार्टमैंट के हैड की इजाजत भी होनी चाहिए थी.

इन इजाजतों को लेने में महीनों लग जाने लाजिमी होने हैं और अगर इजाजत देनी भी हो तो अदालत जैसी सुनवाई पुलिस अधीक्षक या डिपार्टमैंट हैड को भी करनी होगी. एक तरह से सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को खटाई में डाल दिया था. दलितों को इस पर गुस्सा आया हुआ है.

इसे असल में ऊंची जातियों की पार्टी भारतीय जनता पार्टी का एजेंडा समझा जाता है जो दलितों को अछूत बने रहना देना चाहती है और पिछड़ों को शूद्र. जो पार्टी हर 4 वाक्यों में

2 वाक्य पुराने कल की महिमा के गाए उस से उम्मीद भी क्या की जा सकती है? 2014 में दलितों और पिछड़ों ने अपने वोट बंटने दिए थे और काफी वोट भाजपा को भी दे दिए थे.

भाजपा के आका संघ के लोग बरसों से इन लोगों को मंदिरों की सेवाओं में आने का मौका तो दे रहे थे और अपने देवताओं के दासों या गंवई देवीदेवताओं को पूजने के लिए उकसा भी रहे थे. उन्होंने भगवा दलितों और पिछड़ों की कई फौजें बना रखी हैं. इन के बल पर 2014 और बाद के चुनाव जीते गए थे.

अब दलितों को ही नहीं पिछड़ों को भी अहसास होने लगा है कि उन्हें इस्तेमाल करा जा रहा है. इसलिए मराठे, जाट, राजपूत, पाटीदार एक तरफ उठ खड़े हुए हैं तो दूसरी तरफ दलित. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पिछड़ी जातियों के वोट तो ले पाया पर अंबेडकर के नाम पर एक हो चुकी दलित जातियों में खाइयां नहीं खोद सका. दोनों को अब लगा है कि भाजपाई तो असल में आरक्षण को हटाना चाहते हैं और दलित ऐक्ट में अदालती फैसला तो बस एक नमूना है.

इस कदम पर भाजपा के साथ पुछल्ले बने दलित व पिछड़े दल भी बिदकने लगे. भाजपा की शैड्यूल कास्ट व शैड्यूल ट्राइब सीटों पर जीते सांसद भी खुलेआम तैश में आ गए. हार कर भाजपा को दलित ऐक्ट फिर से बहाल करना पड़ रहा है और पिछड़ा आयोग को भी साथ ही संवैधानिक दर्जा देना पड़ा है.

अब भारत की जनता के 80-85 फीसदी को साफ दिख रहा है कि भाजपा चाहे चुनावों में डर कर समझौते के मूड में है उस का मन क्या है. दूसरी तरफ भजनपूजन के ठेकेदारों को लग रहा है कि जब भाजपा इस सवर्ण एजेंडे को लागू ही नहीं कर सकती तो इसे पालने का क्या लाभ? वह गाय जो दूध न दे उसे तो कभी कोई हिंदू सदियों से नहीं पाल रहा. गौदान में मिली सारी गाएं सूखने के बाद कटती ही रही हैं. इस तरह की गाय का फायदा क्या है?

चुरा लिया है तुम ने जो डाटा…

यह हमारा साइकोलौजिकल डाटा था. सारे का सारा उन्होंने चुरा लिया. सिर्फ चुराया ही नहीं, उस का राजनीतिक इस्तेमाल भी किया. वो भारत आएं, तो हम उन से पूछेंगे कि क्या मिला उन्हें हमारा डाटा उड़ा कर?

इस डाटा में यों समझिए कि हमारी जिंदगी की पूरी कहानी दर्ज थी. आप को भी इस डाटाचोरी के दर्द का एहसास हो सके, इस के लिए शब्द दर शब्द यहां पेश हैं (इसे छिपाने का अब कोई फायदा नहीं, पहले से ही उड़ाया जा चुका है) :

लड़की ने पूछा, ‘‘डू यू लव मी?’’

हम ने कहा, ‘‘औफ्कोर्स नौट…’’

उधर से जवाब आया, ‘‘चल झूठ…ठे.’’

यह डाटा उड़ा लिया गया, इस का पता हमें चुनावों में चला.

अगले दिन उस ने नया अकाउंट बना कर फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजी. हम ने रिक्वैस्ट को मनाने से इनकार कर दिया. उस के पहले वाले अकाउंट पर लिखा, ‘‘आलिया का चेहरा लगाने से कोई फायदा नहीं. हम ने पहचान लिया है. कहीं और मुंह मारो.’’

जवाब आया, ‘‘चोट…टे…कमीने.’’

अहा, हम प्रफुल्लित हुए कि हम ने चोरी पकड़ ली. हम ने पहचान लिया था कि उधर कौन था. बाद में पता चला कि चोरी तो हमारे डाटा की हुई थी. महल्ले के चुनावों के वक्त हमारे पास सीधा संदेश पहुंचाया गया कि वोट गज्जू भैया को ही देना है वरना अपना डाटा कहीं दिखाने लायक नहीं रहोगे. हम ने डरना कहां सीखा था, लेकिन मुंह पर जवाब नहीं दिया.

वोट जिसे देना था, उसे ही दिया और उस के अकाउंट पर आ कर लिख दिया, ‘‘देखना, इस दफा टुल्लूजी जीतेंगे.’’

उस ने पूछा, ‘‘काहे?’’

हम ने लिखा, ‘‘हम ने उन्हें वोट जो दिया है.’’

शाम होतेहोते हम पीट दिए गए. पीटते समय तमाम गालियों में सब से ज्यादा जोर कमीने पर था.

‘‘अपनी चलाएगा…कमीने.’’

‘‘जिसे चाहेगा, उसे वोट देना… कमीने.’’

‘‘महल्ले का दादा है तू… कमीने.’’

‘‘और हां, घर की बहूबेटियों से सोशल मीडिया पर चैट करता है…क्यों बे, कमीने.’’

साफ था कि हमारा डाटा किसी ने चोरी कर लिया था. उन्हें पता चल गया था कि गज्जू भैया अगर हारे हैं, तो इस में हमारा भी कम योगदान न था.

इत्ता होने के बाद भी हम ने नया डाटा रिलीज किया, ‘‘ये डैमोक्रेसी है. मारमार कर मुंह सुजा दो, एक आंख फोड़ दो, लेकिन वोट उन्हें हरगिज न देंगे, जिन का तुम ने इशारा किया है.’’ इस डाटा पर भी हाथ साफ कर के हमारी दोनों मंशाएं अगले रोज पूरी कर दी गईं. सूजा मुंह और फूटी आंख देख कर डाक्टर ने पूछा, ‘‘तुम्हारा डाटा भी चोरी हुआ है क्या?’’

हम चौंके, ‘‘आप को कैसे पता चला?’’

‘‘इस हालत में तुम 15वें हो,’’ डाक्टर ने बताया.

यह तो हद है. एक तो डाटा चोरी, ऊपर से सीनाजोरी. हम ने शपथ ली कि इस जोरजुल्म की टक्कर में सारा डाटा हमारा है. आखिरी बात हम जोर से बोल गए. डाक्टर ने आंखें तरेर कर हमारी बेशर्मी पर लानत फेंकी, ‘‘अपना डाटा संभाला नहीं जाता. दूसरों का डाटा लेने चले हैं.’’

हम ने उस दिन को कोसा जिस दिन हमारी जैसी पीढ़ी को चैट की चाट लगी थी. तब लगा न था कि एक दिन ऐसा भी आएगा कि हमें परम और दूसरों को तुच्छ लगने वाली बातें दूसरों को परम और हमें तुच्छ लगने लगेंगी. हालत यह हो जाएगी कि हमारे तुच्छ को परम मान कर वे उस से प्रेम करने लगेंगे, उस से अपना रैम भरने लगेंगे और हम अगर उन के प्रेम को समझ कर भी न समझने का नाटक करेंगे, तो हमारा रैमनेम सत्य कर दिया जाएगा.

इतना सब हो चुकने के बाद बोलचाल फिर शुरू हुई.

नया मैसेज आया, ‘‘एक चुनाव और है. जल्दी ही होगा. तब तक अपनी टांग जुड़वा लो…’’

हम ने हैरानी प्रकट की, ‘‘टांग को क्या हुआ, फूटी तो आंख थी?’’

‘‘नहीं जैसा एटिट्यूड है, उस में अगला नंबर टांग का है,’’ साफ धमकी दी गई.

हम ने अकाउंट ही बंद करने की सोची. इस बारे में सिर्फ सोचा ही था, जनाब. लेकिन दूसरी धमकी आई, ‘‘खबरदार, जो अपना अकाउंट बंद किया. तुम्हारी सारी फ्रैंडलिस्ट देख रखी है हम ने. उन के डाटा में तुम्हारी सारी कारस्तानियां दर्ज हैं. सब ओपन हो जाएंगी. कहीं मुंह, आंख, टांग इत्यादि दिखाने लायक न रहोगे.’’

मरता क्या न करता. अकाउंट चालू रख कर कुछ दिनों के लिए चैट ही बंद कर दी.

हफ्तेभर में नया संदेश प्रकट हुआ, ‘‘मर गए क्या? क्योंकि मरने के बाद भी इधर लोगों का अकाउंट चालू रहता है.’’

हम ने जवाब न देना बेहतर समझा. रात में ढाबे से लौटते वक्त 2 साए अगलबगल हो कर चलने लगे.

एक कह रहा था, ‘पड़ोसी मुल्क में तो लोग इंसान का गोश्त भी खा जाते हैं.’

दूसरे ने कहा, ‘अपने यहां भी कहां पता चल रहा आजकल कि गोश्त किस का है? मीट है कि बीफ है?’

मैंकांप उठा. सोचने लगा कि डाटा चुराने वाले यह सब भी करने लगे हैं. धमकीवमकी तक ठीक था. एकाध बार पीट लेने में भी हर्ज न था, लेकिन अब तो बात जान पर बन आई है.

यह आत्मज्ञान का दौर था. हमारी डाटेंद्रियां जाग उठीं और रैम कुलबुलाने लगा. मोबाइल औन किया तो ऐसा प्रकाश फूटा मानो साक्षात प्रकृति के दर्शन कर लिए हों. स्क्रीन पर हमारी उंगलियां सरपट दौड़ने लगीं.

पहला शब्द हम ने लिखा, ‘‘सरैंडर.’’

जवाब फौरन आया, ‘‘अक्ल आ गई.’’

हम ने लिखा, ‘‘नहीं, बात आत्मज्ञान की है. हमें संसार की, संसार के सारे डाटा की तुच्छता का एहसास हो गया है.’’

वहां से रिप्लाई आया, ‘‘हम ने पहले ही कहा था, क्या करोगे अपना डाटा छिपा कर. यों, हम से तुम्हारा कुछ छिपा थोड़े ही है.’’

‘‘सत्य वचन,’’ हम ने लिखा, फिर पूछा, ‘‘क्या आज कहीं मिलने का प्रोग्राम बन सकता है?’’

उधर से जवाब आया, ‘‘मिल तो लेंगे पर गज्जू भैय्या से मिल कर करोगे क्या. तुम्हारा वोट ही काफी है हमारे लिए.’’

हम सदमे में हैं तब से. भरोसा उठ गया है डाटागीरी से. भला कोई फेक अकाउंट बना कर उस का डाटा भी चोरी करता है क्या…

आईना (भाग-1) : अपनों के दर्द का एहसास

‘‘अच्छा चलते हैं, डैड. आशीर्वाद दीजिए.’’

विदा लेने के लिए खड़े बेटे अनुज व उस की पत्नी सूजन की आवाज सुन कर तरुण को लगा मानो सबकुछ उन के हाथों से सरकता जा रहा है. वक्त मुट्ठी से फिसलती रेत की तरह बीता जा रहा था. अमेरिका के लिए बेटे की फ्लाइट जाने में कुछ ही घंटे बचे थे. 2-3 घंटे तो उड़ान से पहले की औपचारिकताएं पूरी करने में ही बीत जाते हैं.

तरुण चाह कर भी अपने बेटे व बहू को एअरपोर्ट तक पहुंचाने का साहस अपने में नहीं जुटा पा रहे थे. इकलौते बेटे को अमेरिका भेज कर फिर जिंदगी के सन्नाटे को अकेले झेलने की कल्पना भर ही तरुण को सिहरा देती थी.

ड्राइवर ने गाड़ी निकाल कर सामान उस में रख दिया था और अनुज व सूजन जाने से पहले उन के पांव छू कर आशीर्वाद लेने आए हुए थे. बेटे के बिछोह ने उन की आवाज अवरुद्ध कर दी थी. चश्मा साफ करने के बहाने अपनी डबडबाई आंखें पोंछ उन्होंने केवल बच्चों के सिर पर हाथ रख दिया. आशीर्वाद व विदा देता हाथ खुद ही नीचे झुक गया.

बाहर खड़ी गाड़ी की तरफ बेटेबहू को जाते देख कुछ कदम वह साथ चले पर फिर ठिठक कर वहीं से देखते रहे. ड्राइवर के गाड़ी स्टार्ट करते ही वह कब आ कर लौन में बैठ गए उन्हें पता ही न चला. सबकुछ यंत्रवत सा होता चला जा रहा था. कार जितनी तेजी से उन से दूर होती जा रही थी, मन उस से दोगुनी रफ्तार से उन्हें अतीत की गहरी वादियों में खींच रहा था.

वक्त कितनी जल्दी बीत जाता है. कभीकभी लगता है मानो सालों पहले घटी कोई घटना अभी कल की ही तो बात थी. प्रीनर्सरी में नन्हे अनुज का दाखिला करा कर तरुण वापस लौट रहे थे, तब उन का हाथ अनुज ने रोते हुए कस कर पकड़ लिया था.

‘पापा, मुझे अकेला छोड़ कर मत जाइए.’

बड़ी मुश्किल से समझाबुझा कर प्यार से टीचर ने उसे क्लास में बैठने के लिए बहलाया था. आज वही अनुज डाक्टर बनते ही इतना बड़ा हो गया कि उन के सारे जीवन की तपस्या को चंद शब्दों की मार से पलक झपकते धराशायी कर अमेरिका चला गया. शायद सदा के लिए.

‘आप ने मेरे लिए किया ही क्या है?’ बेटे के तल्ख स्वर में कहे गए ये शब्द बारबार उन के कानों में बज रहे रिकार्ड की तरह टकरा रहे थे. कभीकभी उन्हें भ्रम होता कि यह आवाज अनुज की नहीं बल्कि उन की खुद की ही है, जो कई साल पहले उन्होंने अपने पिताजी से कही थी. इतिहास शायद स्वयं को दोहरा रहा था. पर क्या मैं ने अनुज की परवरिश में कोई कसर छोड़ी थी? कभी उस की कोई इच्छा अधूरी रहने दी? तभी उन के अंदर का पिता जैसे पुत्र बन कर उन से ही पूछ बैठा, ‘तो तुम्हारे पिता ने भी तो तुम्हारी हर इच्छा तुम्हारे कहने से पहले ही पूरी की थी. तुम कैसे कह सके थे वे शब्द?’

तरुण के पास इस का कोई जवाब नहीं था. कई बार परिस्थितिजन्य लमहों के वशीभूत हो इनसान कुछ ऐसा बोल जाता है, जिस के लिए ताउम्र शर्मिंदा होने के अलावा वह कुछ नहीं कर पाता. कुछ लमहों की खता जीवन का रुख ही मोड़ देती है…

उस वक्त तरुण अपने पिता शशिधर मुखर्जी की पीड़ा को कहां समझ सके थे. अपनी मेडिकल की प्राइवेट प्रैक्टिस अच्छी तरह जमाने की धुन में तरुण का पूरा दिन एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल की भागदौड़ में ही निकल जाता था. वृद्ध होते मांबाप, पत्नी व बच्चे के प्रति भी उन की कुछ जिम्मेदारियां हैं, यह जानते हुए भी उन से अनजान बन कर अपनी व्यस्तता की आड़ में उन्हें कितनी आसानी से नकार देते थे.

सुमी से विवाह, अनुज का जन्म जीवन में खुशियां तो लाया पर साथ ही 2 पीढि़यों की सोच का अंतर और आपसी सामंजस्य का अभाव मातापिता के साथ संबंधों को मधुर नहीं रख पाया. परिवार में शांति केवल चाहने भर से ही तो नहीं रह सकती. रिश्तों में मधुरता व निरंतरता बनाए रखने के लिए आपसी संवाद व पारदर्शिता के साथसाथ परस्पर प्यार व सम्मान होना बेहद जरूरी है ताकि कोई आपसी गलतफहमी न पनपने पाए.

बड़े चाव से बेटे तरुण का विवाह कर रमादेवी, सुमी जैसी बहू पा कर निहाल हो उठी थीं. दूध जैसे गोरे रंगरूप के समक्ष दूसरे गुणअवगुण गौण पड़ गए थे. सलोनी सूरत का आकर्षण कुछ समय तो मन को बांध सकता है पर सीरत का प्रभाव वक्त के साथ धीरेधीरे ही पता चलता है. अब उस ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था. पुराने रूढि़वादी संस्कारों में बंधी रमादेवी नए परिवेश की मुखर बहू को परिपाटियों से इतर आचरण करते देख अपना संयम खो बैठती थीं. वक्त के साथ खुद को बदलने की उन्होंने कुछ कोशिशें भी कीं पर स्वयं बहू के रूप में झेली गई बंदिशें अकसर उन्हें परंपरागत रूढि़वादी सास के रूप में अनजाने ही ढाल देतीं और वही सोच का अंतर तकरार का कारण बन जाता.

दबंग व्यक्तित्व के धनी शशिधर आयुर्वेद के चिकित्सक होने के साथ ही पाक कला में भी निपुण थे. उन्होंने शुरू में अपनी बहू सुमी को कई चीजें बनानी सिखानी चाहीं पर सुमी ने कभी ध्यान- पूर्वक सीखने की कोशिश नहीं की, उलटे ‘उन्हें तो खाना बनाने का शौक है’ यह कह कर अन्य कामों से भी अपना हाथ खींच लिया.

जिंदगी की तेज रफ्तार में आगे बढ़ने की ललक में तरुण कितना कुछ पीछे छोड़ते जा रहे थे, अपनी ही व्यस्तता के जाल में उलझे वह तब कहां समझ पाए थे कि अन्य महत्त्वपूर्ण जरूरतों को पूरा करने के अलावा मांबाप की कुछ मानसिक जरूरतें भी हो सकती हैं.

दिल की गहराइयों से तो तरुण ने ऐसा कभी नहीं चाहा, कम से कम मातापिता के लिए तो नहीं ही…सुबह के गए शाम को लौटते…पूरे घटनाक्रम से अनजान होते, सो पत्नी की कही बातों पर ही सहज विश्वास कर लेते. उस वक्त तो हमउम्र, वाक्पटु, कालिज में लेक्चरार पत्नी सुमी की कही हर बात तरुण को तर्कसंगत लगती थी. मातापिता…जिन्होंने इतने वर्षों तक उन्हें पालपोस कर इस मुकाम तक पहुंचाया कि वह उस पर गर्व कर सकें, एकाएक ही उन्हें दकियानूसी व तंगदिल लगने लगे थे. किसी विवाद का कोई तर्कपूर्ण हल निकालने के बजाय वह अकसर पत्नी का पक्ष ले कर मांबाप से ही उलझ बैठते थे. छोटों का असंयमित आचरण व बड़ों की क्रोधाग्नि से स्थिति और भी विस्फोटक हो जाती थी.

जिस परिवार की बहुओं का घूंघट भी माथे से ऊंचा न हुआ हो उसी परिवार की बहू जब स्वेच्छा से सिर खोले घूमने लगी तो इसे वक्त के साथ होने वाला परिवर्तन सोच कर उन लोगों ने नजरअंदाज कर दिया, क्योंकि सिर के परदे से कहीं बड़ा और जरूरी आंखों की शरम का परदा होता है.

बढ़ती वय का अनुज भी इस वातावरण से अछूता न रह सका था. यदाकदा वह भी सुमी के कहने की उपेक्षा कर अपने मन की करता रहता था या पलट कर जवाब देने लगता तो उसे समझाने के बजाय सुमी को केवल उस की पिटाई करना ही सुधारने का एकमात्र समाधान लगता था. छोटीछोटी बातों पर भी मार खाने का अभ्यस्त हो चुका अनुज कुछ ढीठ भी हो चला था.

ऐसे ही एक अवसर पर जब रमादेवी ने बहू को बच्चे से मारपीट करने की अपेक्षा प्यार से समझा कर अपनी बात कहने के लिए कहा तो विवाद ने तूल पकड़ लिया. रोजरोज के तनावपूर्ण माहौल से पीडि़त शशिधर मुखर्जी ने गुस्से में बहू को दूसरी जगह घर ले कर रहने के लिए कह दिया. उस समय तो सुमी चुपचाप अपने कमरे में चली गई. पर यह शांति बाद में आए तूफान की पूर्वसूचक थी. रात को तरुण लौट कर आने के थोड़ी देर बाद ही पिता के पास पहुंचे :

‘आप लोग क्या कह रहे थे…हमें घर से निकालेंगे?’

शशिधर ने एक नजर गुस्से में भरे बेटे पर डाली और बोले, ‘थकेमांदे आए हो. पहले थोड़ी देर बैठो, भोजन करो, बाद में शांत चित्त से बात करना.’

‘मैं जो पूछ रहा हूं वह बताइए… आप ने कहा कैसे?’

‘हां… कहा तो था पर क्यों कहा यह पता नहीं किया? पता करते तो मेरी बजाय तुम बहू को समझा रहे होते.’

‘मुझे किसी को कुछ नहीं समझाना है…आप हम लोगों के बीच में न बोला कीजिए.’

‘बेटे, हम तो वैसे ही कुछ नहीं कहते पर छोटे से बच्चे को इतनी बुरी तरह पिटते भी तो नहीं देखा जाता. वही समझाया था बहू को कि जरा बच्चों के साथ प्यार व नरमी से पेश आया करे. इस में हम ने क्या गलत कह दिया था.’

‘उसे पता है कि बच्चे कैसे पाले जाते हैं. आप ने और तो कुछ किया नहीं हमारे लिए…अब हमें चैन से तो रहने दें.’

‘क्या नहीं किया तुम्हारे लिए? पढ़ालिखा दिया…डाक्टर बना दिया… शादी कर दी…अपनी सीमित आय में इज्जत के साथ जितना तुम्हारे लिए जो कर सकता था, वह किया. और क्या चाहते हो मुझ से?’

‘वह तो आप का फर्ज था. मेरे लिए आप ने किया ही क्या है. मेरी शादी में वह लोग इतना कुछ देने को तैयार थे. पर आप तो ठहरे आदर्शवादी. मेरे दोस्तों को तो कार तक दहेज में मिली है.’

मन की कुंठाएं आज कुपित वाणी बन गई थीं.

शशिधर एक मिनट तो हतप्रभ से बेटे का मुंह देखते रह गए फिर बोले, ‘दहेज…क्या तुम्हें अपने हाथपैरों और अपने पर भरोसा नहीं है. मेरा लड़का बिकाऊ  तो था नहीं, जो उस की बोली लगाता. न तुम्हारी बहन श्रेया के विवाह में मुझ से कुछ मांगा गया न मुझे तुम्हारे विवाह में कुछ लेना था. हां, केवल बहू जरूर सुशील, समझदार व सुसंस्कृत चाहता था…पर खैर…उसे कुछ समझाओ तो उलटा ही मतलब निकालती है. साथ रहने से यदि प्यार के बजाय कटुता ही बढ़ रही है, तो बेहतर है अलग रहो.’

‘तो ठीक है…आप अलग ही रहिए…’ कह कर तरुण अपने कमरे में चले गए थे.

शशिधर व उन की पत्नी रमादेवी पूरी रात सो नहीं सके. बेटे की उद्दंडता से अंतर्मन तक आहत हो उठा था. सहमासहमा सा अनुज दादी के पास ही दुबक कर सो गया था. जीवन की इस सांध्यवेला में जब वृद्ध होता इनसान अपनी लगाई बगिया में दो घड़ी चैन से बैठ कर विश्राम करना चाहता है, अपने जीवन के अनमोल अनुभव नई पीढ़ी के साथ बांट कर उन्हें फलताफूलता देख सुखी हो उठता है, तब यदि जीवन फिर नए सिरे से शुरू करना पडे़, तो लगता है पूरे जीवन की तपस्या ही व्यर्थ हो गई. यदि अपना बेटा ही परायों का सा व्यवहार करने लगे तो परायों से क्या शिकायत. इस एहसास का दंश कि अब शायद उन के बच्चों को उन की कोई जरूरत ही नहीं रह गई है, रहरह कर बुजुर्ग दंपती को कचोटता रहा.

आखिर बेटे, पोते के साथ रहने का मोह छोड़ उन दोनों ने शहर  से  कुछ ही दूर पर गांव की अपनी पैतृक हवेली में जा कर रहने का निश्चय किया. मन की दुविधा हटते ही उन्हें कुछ संतोष मिला. वास्तव में मातापिता के जाने की भनक पा कर तरुण को झटका सा लगा था. वह पिता से तो कुछ बातें करने का साहस नहीं जुटा सके थे…हां, मां को रोकने का प्रयास करते हुए बोले थे, ‘मां…यहां क्या दिक्कत है…कभीकभी गुस्से में मैं गलत बोल जाता हूं, उस के लिए मैं माफी मांगता हूं, जितना हो सकता है, आप लोगों की देखभाल करता ही हूं.’

रमादेवी उसे क्या समझातीं कि मांबाप को इस उम्र में प्यार, अपनत्व और सम्मान की चाह होती है, जो उन्हें उस से मिल नहीं पाई. वह एक नजर बेटे को ऊपर से नीचे तक देखती हुई बोलीं, ‘बेटा, एक बार पहले भी तुम्हारे कहने से मैं रुक गई थी पर अब हमारा जाना ही उचित है. हम तो नींव के पत्थर की तरह हैं. भव्य इमारत बन जाने पर लोग  उस की ऊंची अट्टालिकाएं ही तो देख पाते हैं, और उन्हीं की प्रशंसा भी करते हैं…जिस नींव पर एकएक ईंट चुन कर इमारत तैयार होती है उस की किसे याद आती है? अब तुम भी बडे़ हो गए हो, गृहस्थी वाले हो, सो अपनी इच्छानुसार ही रहो.’

‘नहीं मां…पता नहीं क्यों कभीकभी मैं बहुत अपसेट हो जाता हूं. क्या आप लोग मुझे व सुमी को क्षमा नहीं कर सकते…वहां कैसे रहेंगे?’ मां के सामने तरुण भावुक हो उठे थे.

‘थकेमांदे लौटे पति को यदि घर पर आते ही पत्नी की शिकायतों का रोना सुनना पडे़ तो झुंझलाहट तो होगी ही. मैं दिल में किसी के लिए बुरा नहीं सोचती…बहुएं सब अच्छी ही होती हैं…सुमी थोड़ी नासमझ है पर यदि हमारा कुछ कहना समझाना भी तुम लोगों को अखरता है तो कुछ न कहना ही बेहतर होगा. तुम लोगों का जब दिल करे वहां आ कर मिल जाया करना. हां…यह जरूर कहूंगी कि विवाह के बाद बेटों को सारी बातें निष्पक्षता से सोचनी चाहिए और पत्नी व परिवार के बीच एक सेतु बन कर जिंदगी जीनी चाहिए. रिश्तों का निर्माण तो छोटीछोटी बातों से ही होता है. हमें कौन से चांदतारे चाहिए…बस, बच्चों के मुंह से प्यार के दो मीठे बोल ही सुनने को मिलते रहें, हमारे लिए वही बहुत है. पर अब क्या कहूं…’

शशिधर मुखर्जी पत्नी रमादेवी को साथ ले कर गांव चले गए. दिल ही दिल में कहीं स्वयं को इस परिस्थिति का जिम्मेदार मान कर अपराधबोधग्रस्त तरुण ने उन्हें कुछ माह तक मनीआर्डर भेजे थे पर हर बार वापस लौट आने पर तो उन्होंने भेजना ही बंद कर दिया. नीयत बदल जाने से ही नियति तो नहीं बदल जाती.

जब तक मातापिता साथ थे, उन दोनों को घर की तरफ से पूर्ण बेफिक्री  रही. वृद्ध शशिधर, बेटे की व्यस्तता का खयाल कर किसी न किसी तरह बाहर के जरूरी काम निबटा ही देते थे. घर में मां थीं ही सुमी के साथ. उन दोनों को अस्पताल व कालिज जाने के बाद न घर की तरफसे फिक्र होती थी न नन्हे अनुज की चिंता, बल्कि यही सुकून रहता था कि दादादादी के स्नेही आंचल तले वह प्यार व संस्कार दोनों पा रहा है. पर अब उन दोनों के चले जाने से बैंक से ले कर बिजली के बिल जमा कराने तक सब काम तरुण के ही जिम्मे आ गए थे. और अब उन सब कामों के लिए उन के पास वक्त भी निकलने लगा था.

सुमी के लिए सुबह का वक्त तो जैसे पंख लगा कर उड़ता था. उधर तरुण को अस्पताल पहुंचने की जल्दी, इधर अनुज को कभी मोजा नहीं मिल रहा कभी स्कूल का बैग नहीं तैयार, यदि कभी काम वाली बाई समय से नहीं आई तब तो गरीबी में आटा गीला वाली हालत हो जाती थी. इन सब के बीच भागतीदौड़ती सुमी को स्वयं भी तैयार हो कर समय से कालिज पहुंचने की हड़बड़ाहट. ऐसे में अकसर ही उसे अपनी सास की याद आती, जो ऐसे मौके पर उस का हाथ बंटा कर सब काम फुर्ती  व सुघड़ता से निबटा देती थीं.

– क्रमश :

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