

भ्रष्टाचार को खत्म करने तथा ईमानदार पिता के माथे पर लगे कलंक को मिटाने के लिए सभी भ्रष्ट पुलिस अफसरों को मौत के घाट उतारने की कहानी है फिल्मकार मिलाप मिलन झवेरी की एक्शन व रोमांचक फिल्म ‘‘सत्यमेव जयते.’’ अतिनाटकीय घटनाक्रमों, अति रक्त रंजित दृश्यों से युक्त फिल्म ‘‘सत्यमेव जयते’’ में नएपन का घोर अभाव है. फिल्म देशभक्ति के साथ ही भ्रष्टाचार के खिलाफ संदेश देने में भी पूरी तरह से विफल है. फिल्म देखते समय दर्शक को सत्तर व अस्सी के दशक में बनी इंतकाम व अच्छाई बनाम बुराई की कहानी वाली सैकड़ों ‘बी’ ग्रेड फिल्में याद आ जाती है.
फिल्म की कहानी शुरू होती है एक भ्रष्ट पुलिस अफसर को वीर (जौन अब्राहम) के द्वारा आग में जिंदा जलाने से. जब तीन पुलिस अफसर इस तरह जलाकर मौत के घाट उतार दिए जाते हैं, तब अपराधी को पकड़ने के लिए पुलिस कमिश्नर (मनीष चौधरी), डीसीपी शिवांष (मनोज बाजपेयी) को जिम्मेदारी दी जाती है. डीसीपी शिवांष का हर कदम उन्हे अपराधी से दूर ही ले जाता है और भ्रष्ट पुलिस अधिकारी मारे जाते रहते हैं. इंटरवल तक पता चल जाता है कि वीर व शिवांष भाई हैं. जब यह बच्चे थे, तब इनके पिता और ईमानदार पुलिस अफसर शिवा को उनके दोस्त व पुलिस अफसर (मनीष चौधरी) ने ही साजिष रचकर ड्रग्स की तस्करी करने व घूस लेने के आरोप में पुलिस की नौकरी से निकलवाया था, जिसके बाद शिवा ने खुद को आग लगा ली थी.
बाद में बड़े होकर शिवांष पुलिस की नौकरी करने लगे और वीर एक चित्रकार बन गए. पर वीर ने भ्रष्ट पुलिस अफसरों की पहचान कर उनकी हत्या करने का सिलसिला जारी रखा. अंत में अपने पिता के अपराधी को वीर सजा देता है, मगर ईमानदार पुलिस अफसर शिवांष के हाथों गोली चलती है और वीर मारा जाता है.
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी इस फिल्म के लेखक व निर्देशक मिलाप मिलन झवेरी ही हैं. फिल्म की पटकथा बहुत कमजोर व सतही है. इस कमजोर कड़ी के चलते जौन अब्राहम और मनोज बाजपेयी का बेहतरीन अभिनय भी फिल्म को अच्छा नहीं बना पाता. पूरी फिल्म में भारी भरकम संवाद दर्शक को देशभक्ति या ईमानदारी का सबक देने की बजाय उसके सिर के उपर से गुजरते हैं.
फिल्म के कुछ संवाद तो बहुत सतही हैं. मसलन-‘पता लगाओ उसकी कोई रखैल है या नहीं. फिल्म के शुरुआती दृश्य और क्लायमेक्स प्रभावहीन हैं, इन पर कैंची चलाकर छोटा किया जाना चाहिए था. फिल्म में पुलिस अफसर को पीटना, फिर उस पर किरोसीन /घासलेट छिड़कना, फिर माचिस की तीली से आग लगा देने के दृश्य कई बार हैं. जबकि इसे सांकेतिक या छोटा करके भी दिखाया जा सकता था. फिल्म में जौन अब्राहम और आएशा शर्मा की प्रेम कहानी भी जबरन ठूंसी हुई लगती है. भ्रष्टाचार जैसे अति गंभीर मुद्दे को फिल्म में मजाक बना दिया गया.
मिलाप मिलन झवेरी की फिल्म ‘‘सत्यमेव जयते’’ की फिल्म में दीवार, दबंग, सिंघम, अक्षय कुमार की फिल ‘गब्बर इज बैक’ सहित कई फिल्मों का मिश्रित मुरब्बा है.
एक गुस्सैल आम आदमी वीर के किरदार में जौन अब्राहम ने बेहतरीन अभिनय किया है. दृढ़ प्रतिज्ञ व ईमानदार पुलिस अफसर शिवांष के किरदार में मनोज बाजपेयी ने दमदार अभिनय किया है. मनीष चौधरी का अभिनय ठीक ठाक है. नवोदित अभिनेत्री आएशा शर्मा ने काफी निराश किया है. फिल्म का गीत संगीत प्रभावित नहीं करता.
दो घंटे 21 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘सत्यमेव जयते’’ का निर्माण टीसीरीज व निखिल अडवाणी ने किया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक मिलाप मिलन झवेरी, संगीतकार साजिद वाजिद, तनिस्क बागची, रोचक कोहली, कैमरामैन निगम बोमजान तथा कलाकार हैं – जौन अब्राहम, मनोज बाजपेयी, आएशा शर्मा, अमृता खानविलकर, तोतारौय चौधरी, देवदत्ता नागे, नोरा फतेही व अन्य.
हौकी के खेल के इर्दगिर्द बुने गए देश के जज्बे से लबालब इतिहास के किसी पन्ने को मनोरंजक तरीके से सेल्यूलाइड के परदे पर पेश करना आसान तो नहीं कहा जा सकता, मगर रीमा कागती ने इसे बड़ी खूबसूरती से अंजाम दिया है.
खेल के मैदान पर अपने देश के झंडे को लहराते हुए देखना हर नागरिक के लिए गर्व की बात होती है. पर खेल के मैदान पर जब खिलाड़ी देशभक्ति के जज्बे के साथ खेलते हुए जीत के बाद अपने वतन के झंडे को लहराते हुए अपने देश का राष्ट्रन विदेशी धरती पर गाता है, उस वक्त उसका सीना चौड़ा हो ही जाता है.
ऐसे ही खेल के मैदान की ऐसी कहानी, जिसके बारे में वर्तमान पीढ़ी बहुत कम जानती है, को फिल्मकार रीमा कागती फिल्म ‘‘गोल्ड’’ में लेकर आयी हैं. यह कहानी है 200 साल की अंग्रेजों की गुलामी के बाद आजाद हुए भारत की हौकी टीम द्वारा 1948 में लंदन में संपन्न पहले ओलंपिक में अंग्रेजों की ही धरती पर उन्हें परास्त कर अपने वतन के झंडे को लहराने व राष्ट्रगान का सपना देखने वाले एक युवक की. यह ऐसी कहानी है जिसे हर इंसान जरूर देखना चाहेगा.
फिल्म की कहानी 1936 से शुरू होती है, जब बर्लिन में आयोजित ओलंपिक खेलों में तत्कालीन ब्रिटिश इंडिया की हौकी टीम ने जर्मनी को हराकर गोल्ड मैडल जीता था. उस वक्त इस टीम के कैप्टन थे सम्राट (कुणाल कपूर). तथा जूनियर मैनेजर थे तपन दास (अक्षय कुमार). जब ब्रिटिश टीम हार रही होती है, तब तपनदास ने ग्रीन रूम में खिलाड़ियों को अपने बैग में छिपाए भारतीय झंडे को दिखाकर कहा था कि उन सबको इसके सम्मान के लिए खेलना है और अंततः टीम ने गोल्ड जीता था. उसी वक्त तपन दास ने सपना देखा था कि आजादी के बाद होने वाले ओलंपिक में भारत, अंग्रेजों को हौकी में हराएगा.
कहानी आगे बढ़ती है. 1947 में भारत देश आजाद होता है और 1948 में लंदन में ओलंपिक होते हैं. जिसके लिए तपनदास काफी जद्दोजेहाद करके भारतीय हौकी टीम तैयार करता है, जिसे सम्राट प्रशिक्षित करते हैं. इस टीम में बलरामपुर के राज कुमार रघुवीर प्रताप सिंह (अमित साध) और पंजाब के हिम्मत सिंह (सनी कौशल) भी जुड़ते हैं. भारतीय हौकी फेडरेशन के सेक्रेटरी मेहता, तपन दास के खिलाफ अपनी घटिया राजनीतिक चालें चलते रहते हैं. पर तपन को फेडरेशन के अध्यक्ष का साथ मिल जाता है. उधर रघुवीर प्रताप सिंह ओर हिम्मत सिंह के बीच भी तनातनी है. मगर तपन दास की सूझबूझ के चलते 1948 के ओलंपिक में इंग्लैंड की ही धरती पर हौकी में हराकर गोल्ड मैडल जीतकर भारतीय हौकी टीम अंग्रेजों से 200 साल का हिसाब चुकता करती है. वहां भारतीय तिरंगा फहराए जाने के साथ राष्ट्रगान भी होता है.
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी यह है कि यदि यह कहानी एक कालखंड की न हो, तो कहानी व घटनाक्रमों के स्तर पर काफी कुछ पुरानी फिल्म ‘‘चक दे इंडिया’’ से ली गयी है. यह बात ‘गोल्ड’ के खिलाफ जाती है. अन्यथा फिल्म के कई हिस्से बहुत बेहतरीन हैं.
लेखक व निर्देशक ने आजादी से पहले व आजादी के बाद देश व खिलाड़ियों के बीच आए बदलाव को भी बहुत अच्छे ढंग से चित्रित किया है. आजादी से पहले ब्रिटिश शासन के दबाव में किस तरह दबाव के साथ खिलाड़ी खेलते हैं और आजादी के बाद भारतीय तिरंगे के लिए जीतने के जज्बे के साथ जब खेलते हैं, तो कितना अंतर होता है. इसे भी निर्देशक ने कुशलता से चित्रित किया है. तो वहीं राज कुमार भले ही बेहतरीन हौकी खिलाड़ी हो, पर उसके अंदर राजशाही परिवार के होने के गरूर का भी अच्छा चित्रण है. यदि फिल्म को एडीटिंग टेबल पर कसकर छोटा किया जाता, तो फिल्म और अधिक बेहतर हो सकती थी. यदि फिल्मकार ने गिमिक से बचने का प्रयास किया होता, तो ज्यादा अच्छा होता. सनी कौशल व निकिता दत्ता की प्रेम कहानी जबरन ठूंसी हुई लगती है.
जहां तक अभिनय का सवाल है तो अक्षय कुमार ने धोती पहने हुए बंगाली तपन दास के किरदार को निभाते हुए एक बार फिर साबित कर दिखाया कि वह किसी भी किरदार में अपने अभिनय से जान डाल सकते हैं. वह कभी हंसाते हैं, तो कभी भावुक भी करते हैं. सम्राट के किरदार में कुणाल कपूर, रघुवीर प्रताप सिंह के किरदार में अमित साध, हिम्मत सिंह के किरदार में सनी कौशल ने भी अच्छा काम किया है. विनीत कुमार सिंह ने भी ठीकठाक अभिनय किया है. टीवी अदाकारा मौनी रौय की पहली फिल्म है, अभी उन्हे बहुत कुछ सीखने व मेहनत करने की जरुरत है.
कैमरामैन अल्वरो गुटीरेज भी बधाई के पात्र हैं.
दो घंटे 33 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘गोल्ड’’ का निर्माण रितेश सिद्धवानी व फरहान अख्तर ने किया है. फिल्म की निर्देशक रीमा कागती, संवाद लेखक जावेद अख्तर, पटकथा लेखक राजेश देवराज, कहानीकार रीमा कागती व राजेश देवराज, संगीतकार सचिन जिगर, कैमरामैन अल्वरो गुटीरेज तथा कलाकार हैं – अक्षय कुमार, मौनी रौय, कुणाल कपूर, अमित साध, विनीत कुमार सिंह, सनी कौशल, निकिता दत्ता, दिलीप ताहिल, जतिन सरना, भावशील साहनी, अब्दुल कादिर अमीन व अन्य.
चाहे फिल्मों की बात हो या फिर सोशल मीडिया भोजपुरी अदाकारा आम्रपाली दुबे को कहर बरपाना बेहद अच्छी तरह से आता है. हाल ही में आम्रपाली दुबे भोजपुरी सिनेमा के जुबली स्टार दिनेश लाल यादव निरहुआ की फिल्म ‘बौर्डर’ में नजर आ चुकी हैं. इस फिल्म को बौक्स औफिस पर अच्छी सफलता मिली थी. लेकिन इन दिनों आम्रपाली दुबे ने अपने फैन्स के दिलों पर बिजलियां गिराने की ठान ही ली है. आम्रपाली दुबे ने अपने इंस्टाग्राम एकाउंट पर कुछ हौट तस्वीरें और वीडियो डाले हैं जिन्हें बार-बार देखा जा रहा है, और उनका ये अंदाज काफी पसंद भी किया जा रहा है.
आम्रपाली दुबे ने इंस्टाग्राम पर एक फोटो शेयर की है जिसमें उन्होंने हौट पैंट पहन रखी है. आम्रपाली दुबे की ये तस्वीर जोधपुर की है, जहां वे इन दिनों पावर स्टार पवन सिंह के साथ अपनी अगली फिल्म ‘शेर सिंह’ की शूटिंग कर रही हैं. आम्रपाली दुबे और पवन सिंह की जोड़ी सुपरहिट है, और उनका गाना ‘राते दिया बुताके’ यूट्यूब पर धूम मचाए हुए है. आपको बता दें कि ‘शेर सिंह’ एक्शन फिल्म है और उसमें आम्रपाली दुबे और पवन सिंह का धमाल देखने को मिलेगा.
यही नहीं, आम्रपाली दुबे ने इससे पहले एक वीडियो पोस्ट किया था. इस वीडियो में आम्रपाली दुबे झूमकर नाच रही हैं. इस वीडियो में आम्रपाली दुबे मौडर्न अंदाज में नजर आ रही हैं और ‘नी मैं वोदका लगाके’ गाने पर इस मस्त अंदाज में नाच रही हैं कि इस वीडियो को बार-बार देखा जा रहा है. इस वीडियो में आम्रपाली का डांस और लटके-झटके वाकई कमाल हैं. वैसे भी आम्रपाली दुबे की अगली फिल्म ‘निरहुआ चलल लंदन’ है, जिसमें वे निरहुआ के साथ जलवे बिखेरेंगी.
भोजपुरी फिल्म जगत के सुपरस्टार खेसारीलाल यादव दर्शकों के दिलों पर राज करते हैं. लोग उन्हें उनकी शानदार अभिनय और उनकी संगीत के लिए पसंद करते हैं. ऐसे में खेसारी लाल का नया गाना रिलीज होते ही यूट्यूब पर धूम मचा रहा है.
भोजपुरी अभिनेता खेसारी लाल और रितु सिंह की फिल्म ‘संघर्ष’ का नया गाना ‘ चटर चटर’ यूट्यूब पर 11 अगस्त को रिलीज किया गया और अभी तक ये गाना 6 लाख से भी ज्यादा बार देखा जा चुका है. आजाद सिंह का लिखा ये गाना खुद खेसारी लाल नी गाया है जिसमें गायिका प्रियंका सिंह ने भी अपनी आवाज दी है.
वहीं अगर हम बात करें खेसारी लाल की फैन फौलोईंग की तो खेसारीलाल ने अपनी पहचान को बनाने के लिए कड़ी मेहनत की है. उन्होंने गरीबी देखी है और ऐसी गरीबी कि उन्हें दिल्ली की सड़कों पर ‘लिट्टी-चोखा’ तक बेचना पड़ा. ऐसे में इतने संघर्ष के बाद क्यों न वो अब अपने फैन्स के बीच इतने चाहे जाएं.
भोजपुरी सिनेमा की अलबम क्वीन के नाम से मशहूर और खेसारी लाल यादव के साथ हिट सांग देने वाली अदाकारा चांदनी सिंह एक बार फिर सुर्खियों में हैं. उनका एक लाइव डांस वीडियो वायरल हो गया है, जिसे करीब 30 लाख लोग देख चुके हैं. चांदनी ने पिछले कुछ समय में इंडस्ट्री में ऐसा तहलका मचाया है कि उनके वीडियो दर्शकों के दिल-ओ-दिमाग पर छा जाते हैं. उन्हें आहें भरने पर मजबूर कर देते हैं. चांदनी सिंह ने के हर अलबम ने नये रिकौर्ड बनाये हैं.
सावन के महीने में उनकी पवन सिंह के साथ एक अलबम आया था : ‘गौरा तनि हंसि द न’. इसने रिलीज होते ही 30 लाख व्यू का आंकड़ा पार कर लिया. चांदनी सिंह ने पवन सिंह के अलावा खेसारी लाल यादव के साथ भी एक हिट सांग दिया है. चांदनी सिंह ने खेसारी लाल के साथ ‘मिलते मरद हमके भूल गइलू’ पर डांस किया था और यह वीडियो काफी वायरल हुआ था.
चांदनी सिंह का यह वीडियो एक बार फिर सुर्खियों में है. इस वीडियो में चांदनी सिंह अपने ही सांग ‘मिलते मरद हमके भूल गइलू’ पर ठुमके लगा रही हैं. दिलचस्प यह है कि इस गीत पर चांदनी सिंह अपने ही घर के बेडरूम में मस्त होकर नाच रही हैं. इस वीडियो में टीवी पर उनका और खेसारी लाल यादव का गीत चल रहा है.
चांदनी एक बार फिर सुपर स्टार खेसारीलाल यादव के साथ ‘डोली में गोली मार देव’ के सीक्वल ‘डोली में गोली मार देव-2’ में नजर आने वाली हैं. इसी गाने से दो साल पहले चांदनी सिंह भोजपुरी म्युजिक वर्ल्ड में सनसनी बन गयी थीं.
इससे पहले चांदनी सिंह और खेसारीलाल यादव ने ‘पलंग करे चोएं चोएं’ और ‘मिलते मरद हमको भूल गइले’ से तहलका मचाया था. चांदनी सिंह यू-ट्यूब की सनसनी हैं. सभी सितारों के साथ काम कर रहीं हैं. जल्द ही उनकी फिल्म ‘बद्रीनाथ’ भी रिलीज होने वाला है.
हर साल बैसाखी के पर्व पर भारत से सिख व हिंदू श्रद्धालुओं का एक जत्था पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारा पंजा साहिब ननकाना साहिब जाता है. वैसे समय समय पर गुरुओं के प्रकाशपर्व या गुरुपर्व पर श्रद्धालु पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारों के दर्शन, सेवा आदि करने जाते रहते हैं. पर 13 अप्रैल, 2018 की बैसाखी के पर्व का अपना एक विशेष महत्त्व होता है.
वहां जाने वाले श्रद्धालुओं में उस समय एक अजीब सा उत्साह होता है. जो जत्था पाकिस्तान जाता है, उस की तैयारियां और श्रद्धालुओं की बुकिंग का काम कई महीने पहले से ही शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की देखरेख में किया जाता है और जत्थे को सहीसलामत पाकिस्तान ले कर जाने और दर्शन करवा कर वहां से वापस भारत आने तक की जिम्मेदारी एसजीपीसी की ही होती है.
इस साल 12 अप्रैल को एसजीपीसी के कार्यकारी सदस्य गुरमीत सिंह की अगुवाई में 717 सदस्यों का जत्था गुरुद्वारा पंजा साहिब में बैसाखी का जश्न मनाने के लिए भारत से पाकिस्तान के लिए रवाना हुआ.
पाकिस्तान के पवित्र मंदिरों, गुरुद्वारों की यात्रा करने के बाद यात्री जत्था जब 21 अप्रैल को वापस भारतपाक बौर्डर पर पहुंचा तो पता चला कि जत्थे में एक यात्री कम है. इस मामले में जब छानबीन की गई तो पंजाब के होशियारपुर जिले के गढ़शंकर की एक सिख महिला किरनबाला जत्थे में नहीं थी. वह तीर्थयात्रा के दौरान गायब हो गई थी. उस समय ऐसा संभव नहीं था कि किरनबाला की तलाश की जाए, अत: जत्था किरनबाला के बिना ही अमृतसर लौट आया.
किरनबाला हुई लापता
बाद में पता चला कि जत्थे से अलग हो कर किरनबाला ने 16 अप्रैल, 2018 को लाहौर में एक मुसलमान युवक से विवाह कर लिया था. यात्रियों से पूछताछ के बाद पता चला कि पंजा साहिब से लाहौर लौटते समय रावी नदी के निकट से ही किरनबाला अचानक बस से गायब हा गई थी.
वह अपना सामान भी बस में ही छोड़ गई थी. उस समय इस बात की तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया था कि उस के मन में क्या खिचड़ी पक रही है.
किरनबाला एसजीपीसी के प्रतिनिधिमंडल की ओर से बतौर तीर्थयात्री 12 अपैल को पाकिस्तान रवाना हुई थी. वह भारतीय पासपोर्ट पर पाकिस्तानी वीजा के साथ गई थी, जो 21 अप्रैल तक वैध था.
बाद में उस ने इस्लामाबाद में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय को चिट्ठी लिख कर अनुरोध किया कि मैं ने लाहौर के दारुल उलूम जामिया नईमिया में अपनी मरजी से इसलाम धर्म अपनाया है और लाहौर के हंजरवाल मुलतान रोड निवासी मोहम्मद आजम से निकाह कर लिया है. इसलिए मेरे वीजा की अवधि बढ़ाई जाए ताकि मैं अपने शौहर के साथ पाकिस्तान में रह सकूं.
आवेदन में उस का नाम आमना बीबी लिखा था. मंत्रालय ने उस की अरजी स्वीकार कर वीजा की अवधि 30 दिन के लिए बढ़ा दी. यह मामला पाकिस्तानी मीडिया में भी चर्चित हो गया.

यह जानकारी मिलने के बाद एसजीपीसी और भारतीय सुरक्षा एजेंसियों में हड़कंप मच गया. सुरक्षा एजेंसियों को जांच के बाद पता चला कि किरनबाला को सिख जत्थे के साथ श्री हरमंदिर साहिब गुरुद्वारे के मैनेजर की सिफारिश पर जत्थे के साथ पाकिस्तान भेजा गया था. जब मैनेजर के बारे में पता किया गया तो जानकारी मिली कि वह छुट्टी ले कर कनाडा जा चुका है.
खुफिया एजेंसियों ने मैनेजर का भी रिकौर्ड खंगालना शुरू कर दिया कि उस की ओर से अब तक पाकिस्तान गए सिख श्रद्धालुओं के जत्थे में किनकिन लोगों की सिफारिश की गई है. कुछ केंद्रीय एजेंसियों और राज्य की खुफिया एजेंसियों के अधिकारियों ने भी एसजीपीसी के कर्मचारियों से बात कर के तथ्य जुटाने की कोशिश की.
खुफिया एजेंसियों का अलर्ट
खुफिया एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही थीं कि किरनबाला ने जत्थे के साथ जाने के लिए अपने क्षेत्र के एसजीपीसी के सदस्यों से सिफारिश न करवा कर अमृतसर जिले के रहने वाले उस मैनेजर से ही क्यों सिफारिश करवाई. यह मैनेजर एक पूर्वमंत्री के पीए का अतिकरीबी था.
किरनबाला पंजाब में अपने 3 बच्चे छोड़ गई थी, जिन में 2 बेटे और एक बेटी है. लेकिन पाकिस्तान में मोहम्मद आजम से शादी करने के बाद वह अपने 3 बच्चों के होने से भी मुकर गई. उस ने पाकिस्तानी मीडिया से कहा कि उस के कोई बच्चा नहीं है.
अपने तीनों बच्चों को उस ने अपनी मौसी के बच्चे बताया. जबकि उस की सास और ससुर ने बताया कि किरनबाला वैसे तो 5 बच्चों की मां है. उस के एक बच्चे की मौत उस के जन्म के 4 दिन बाद ही हो गई थी, जबकि दूसरा बच्चा मृत पैदा हुआ था.
अपनी बात को साबित करने के लिए उस के ससुर तरसेम सिंह ने किरनबाला का आधार कार्ड, राशन कार्ड और किरनबाला के तीनों बच्चों के जन्म प्रमाणपत्र, बीपीएल कार्ड और बेटी के साथ खोले गए बैंक खाते की प्रतियां भी दिखाईं.
पाकिस्तान जाते समय किरनबाला 12 साल की अपनी बड़ी बेटी को यह समझा कर गई थी कि वह 21 तारीख को लौट आएगी. तब तक वह अपने छोटे भाइयों का ध्यान रखे. उस ने बच्चों को यह भी समझाया था कि वह दादादादी की बात मानें और घर में किसी को तंग न करें.
किरनबाला की पृष्ठभूमि
किरनबाला का परिवार मूलरूप से पठानकोट के गांव शेरपुर का निवासी था. लेकिन उस के पिता मनोहरलाल लंबे समय से उत्तरी दिल्ली के मुखर्जीनगर इलाके में रहने लगे थे. किरन का जन्म पंजाब के होशियारपुर के गढ़शंकर गांव में हुआ था. मातापिता के अलावा मायके में उस की एक छोटी बहन और छोटा भाई है. बहन की शादी हो चुकी है, जबकि भाई दिल्ली में पुरानी गाडि़यों की खरीदफरोख्त का काम करता है.
किरनबाला के ससुर तरसेम सिंह के मुताबिक, वह सन 1971 की जंग में भारतीय सेना में सेवा के दौरान जख्मी हो गए थे. इस के बाद वह वीआरएस ले कर घर लौट आए थे. सन 2005 में वह अपने बेटे को फौज में भरती कराने के लिए दिल्ली गए थे. दिल्ली प्रवास के दौरान उन के बेटे नरिंदर की किरनबाला से मुलाकात हो गई.
किरन का घर भरती केंद्र के पास ही था. उस वक्त किरनबाला 10वीं कक्षा में पढ़ती थी. इस दौरान कब उन के बेटे और किरन के बीच प्यार परवान चढ़ा, इस का पता परिजनों को भी नहीं लगा और फिर एक दिन उन का बेटा नरिंदर किरनबाला को साथ ले कर घर आ गया.
उस ने बताया कि किरन अपना घर छोड़ कर उस के साथ घर बसाने के लिए आई है और अब वह इस घर की बहू बन कर यहां रहेगी. उस समय किरन की उम्र 18 साल थी. शादी के बाद किरन ने 5 बच्चों को जन्म दिया, जिन में से 2 बच्चों की मौत हो गई थी और 3 बच्चे मौजूद हैं.
नरिंदर की सेना में भरती तो नहीं हो सकी पर उस ने एक गैस एजेंसी में डिलीवरीमैन का काम करना शुरू कर दिया था. वह थोड़ेथोड़े समय बाद दिल्ली जाया करता था. इसी बीच नवंबर, 2013 को एक दुर्घटना में नरिंदर की मौत हो गई.
बेटे की मौत के बाद नवंबर, 2013 में ही किरन घर छोड़ कर अपने मायके दिल्ली चली गई थी. अपने पोतीपोतों के बिना तरसेम का मन नहीं लग रहा था तो वह बहू और बच्चों को लेने के लिए दिल्ली चले गए और बाकायदा एग्रीमेंट कर के किरनबाला को अपने यहां ले आए.
उन्होंने कई बार किरनबाला से दूसरी शादी करने की भी बात कही और कहा कि वह खुद अपनी बेटी की तरह उस का कन्यादान करेंगे, लेकिन वह दूसरी शादी के लिए राजी नहीं हुई. लिहाजा अब उस का इस तरह घर छोड़ कर पाकिस्तान जाना और निकाह करना तरसेम सिंह की समझ में नहीं आ रहा था.
वहीं किरनबाला की सास कृष्णा कौर के मुताबिक, बेटे की मौत के बाद किरनबाला का चालचलन कुछ अच्छा नहीं रहा था. कई बार उन्होंने उसे रंगेहाथ पकड़ भी लिया था. इस बीच साल डेढ़ साल के लिए उस ने नंगल के करीब टाहलीवाल में एक फैक्ट्री में भी काम किया, लेकिन जब लोग उस के बारे में तरहतरह की बातें बनाने लगे तो उन्होंने उसे काम करने से मना कर दिया था.
किरन की बदल गई पहचान
तरसेम सिंह का कहना है कि अगर उन्हें जरा भी पता होता कि किरन के मन में ऐसा कुछ चल रहा है तो वह उसे किसी भी कीमत पर पाकिस्तान नहीं जाने देते. पाकिस्तान जाने के बाद 15 तारीख तक तो वह लगातार उन्हें फोन कर के बच्चों और परिवार का हाल जानती रही थी लेकिन एकाएक उस ने बच्चों व परिवार से मुंह मोड़ लिया.
इस के बाद 16 तारीख को उस ने तरसेम सिंह को फोन कर के कहा, ‘‘पिताजी, अब मैं लौट कर नहीं आऊंगी. मैं ने यहां इसलाम धर्म कबूल कर के मोहम्मद आजम नाम के शख्स से निकाह कर लिया है. और अब मेरा नाम आमना बीबी हो गया है.’’
तरसेम सिंह को लगा कि किरन मजाक कर रही है. इस पर उन्होंने उस से कहा, ‘‘क्यों मजाक करती हो बेटा. छोड़ो कोई बात नहीं, तुम यात्रा पूरी कर के जल्दी घर आ जाओ. बच्चे और हम सब तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं.’’
इस के बाद किरन का कोई फोन नहीं आया और न ही उस से कोई संपर्क हो सका था.
18 अप्रैल, 2018 को जब तरसेम सिंह को एक अंतरराष्ट्रीय संवाद एजेंसी के पत्रकार का फोन आया और उस ने भी वही बात दोहराई तो वह चकित रह गए.
तरसेम का मानना है कि किरन शायद पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई या आतंकी संगठनों की साजिश का शिकार हो सकती है. जिस तरह वह बात कर रही है और जो बोल रही है, उस से जाहिर है कि उस का ब्रेनवाश किया गया है. अब वह वही बोल रही है जो आईएसआई या आईएसआईएस के लोगों ने उसे सिखाया होगा.
लेकिन इतना सब होने के बावजूद अब भी वह बच्चों की खातिर किरनबाला को वापस लाना चाहते हैं ताकि वह किसी साजिश का शिकार हो कर नारकीय जीवन जीने को मजबूर न हो सके और बच्चे भी मां की देखभाल से महरूम न रहें.
तरसेम सिंह ने अंदेशा जताया कि शायद सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिए वह पाकिस्तान के लोगों के संपर्क में आई होगी. इस के बाद वह शायद आईएसआई के हाथों में पड़ गई हो. यह भी हो सकता है कि उसे धर्म परिवर्तन या फिर से शादी करने के लिए मजबूर किया गया हो.

किरनबाला ने फैक्ट्री में काम कर के बचाए अपने पैसों को अपने पास ही रखा था. पति की मौत के बाद मुआवजे के तौर पर मिले 25 हजार रुपए भी उसी के पास थे. इन्हीं पैसों से साल भर पहले उस ने एक स्मार्टफोन खरीदा था, जिस के बाद वह सोशल नेटवर्किंग साइटों से जुड़ी और सोशल नेटवर्क पर चैटिंग और वाइस काल में ऐसी डूबी कि ये कारनामा कर डाला.
वह घंटों तक फोन पर बातें करती रहती थी. जब उस के ससुर उस पूछते तो वह अपनी मां, भाई या किसी अन्य रिश्तेदार से बात करने की बात कह कर टाल देती थी.
तरसेम सिंह उसे फोन पर ज्यादा बात करने को ले कर टोकते थे, लेकिन उस ने कभी उन की एक नहीं सुनी और फोन पर उस की यह बातचीत लगातार बढ़ती ही चली गई.
सोशल नेटवर्किंग से जुड़ी मोहम्मद आजम से
किरनबाला की पड़ोसन और सहेली रही गिस्टी ने बताया था, ‘‘पति की मौत के बाद अपने मायके दिल्ली रहने के दौरान ही वह मोहम्मद आजम के संपर्क में आई थी.’’
किरन ने मुझे बताया था कि आजम दुबई में रहता है. पाकिस्तान जाने से पहले किरन ने अपने बैंक खाते से साढ़े 14 हजार रुपए निकलवाए थे. किरन फेसबुक पर ज्यादा सक्रिय थी. वह बिग लाइव, एक वीडियो आधारित सोशल नेटवर्क साइट पर भी बहुत सक्रिय थी.
किरन ने नरिंदर के साथ प्रेम विवाह करने के लिए हिंदू धर्म से सिख धर्म अपनाया था और अब मोहम्मद आजम से निकाह करने के लिए इसलाम धर्म को कबूल कर लिया. पाकिस्तान जाने से पहले वह दिल्ली के अस्पताल में अपने बीमार पिता को भी देखने गई थी.
किरन द्वारा यह कदम उठाने के बाद उस के बच्चे भी डरने लगे हैं. किरन की बेटी अपनी मां के धर्म परिवर्तन कर पुनर्विवाह करने पर काफी शर्मिंदा है. वह स्कूल जाना नहीं चाहती. वह कहती है कि बच्चे उसे तंग करते हैं और उस का मजाक उड़ाते हैं.
किरन की भूमिका संदेह के घेरे में
इस बीच होशियारपुर, महिलपुर और गढ़शंकर के सभी निर्वाचित और चुने गए एसजीपीसी सदस्यों ने किरन के लिए वीजा की सिफारिश करने से इनकार कर दिया. सुरिंदर सिंह भुलेवाल राथन, जंगबहादुर सिंह, रणजीत कौर और चरनजीत सिंह ने कहा कि उन्हें बैसाखी तीर्थयात्रा के लिए उस का कोई आवेदन नहीं मिला था.
तरसेम सिंह ने अब इस मामले में एसजीपीसी की भूमिका पर सवाल उठाए हैं. उन का कहना है कि इस मामले में एसजीपीसी उन की लगातार अनदेखी कर रही है. लिहाजा, इस की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए. उन्होंने मांग की है कि किरन को वीजा दिलाने के लिए मदद करने वालों, उस के नाम की सिफारिश करने वाले एसजीपीसी के अधिकारियों और अन्य लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया जाना चाहिए.
तरसेम सिंह ने होशियारपुर के एसएसपी को दी गई शिकायत में देश को बदनाम करने और धोखा देने के आरोप में किरनबाला के खिलाफ भी मामला दर्ज किए जाने की मांग की. उन्होंने आरोप लगाया है कि इस पूरे प्रकरण में पाकिस्तानी पुलिस भी शामिल रही है. किरन पाकिस्तानी पुलिस के संपर्क में थी.
तरसेम सिंह ने बताया कि नंगल के रहने वाले और पाकिस्तान जत्थे में गए नछत्तर सिंह से उन की फोन पर बात हुई थी. तरसेम के मुताबिक, नछत्तर ने उन्हें बताया था कि पाकिस्तान में प्रवेश करने के बाद से ही पाकिस्तानी पुलिस किरन के आसपास मंडरा रही थी. पाकिस्तानी पुलिस के अधिकारी और कर्मचारी थोड़ीथोड़ी देर में उस से बातचीत कर रहे थे.
नछत्तर का कहना था कि लाहौर पहुंचने के बाद जब जत्थे में शामिल महिलाओं व पुरुषों को अलगअलग कमरों में भेजा गया तो भी पाकिस्तानी पुलिस के कर्मचारी किरन से मिलते रहे थे. इस के बाद 15 अप्रैल तक लगातार किरन जत्थे के साथ रही और पाकिस्तान पुलिस ने उस से संपर्क बनाए रखा था. इस के बाद 16 अप्रैल को वह रुमाला लाने के बहाने से जत्थे से अलग हो कर गायब हो गई थी.
इस मामले की होनी चाहिए उच्चस्तरीय जांच
तरसेम सिंह ने एसएसपी को शिकायती पत्र दे कर किरन के वहां जाने, जत्थे में शामिल होने और वहां से गायब होने के मामले में एसजीपीसी के अधिकारियों और पदाधिकारियों पर संदेह जताते हुए मामले की जांच कराए जाने और संबंधित लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर कड़ी काररवाई किए जाने की मांग की है.
तरसेम सिंह ने किरनबाला को पाकिस्तान सरकार से तालमेल कर वापस लाए जाने की मांग को ले कर भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अविनाश राय खन्ना से भी मुलाकात की. खन्ना को दिए पत्र में तरसेम सिंह ने कहा है कि किरनबाला को पाकिस्तान से वापस ला कर परिवार को सौंपा जाए, ताकि उस के बच्चों की परवरिश सही ढंग से हो सके.
दूसरी ओर, किरनबाला उर्फ आमना बीबी ने पति मोहम्मद आजम के साथ लाहौर हाईकोर्ट में अब याचिका दायर की है. इस में बताया गया है कि उस ने दिल्ली में रहते हुए पहले फेसबुक के माध्यम से लाहौर निवासी मोहम्मद आजम से दोस्ती की थी और अब पाकिस्तान आ कर रजामंदी से इसलाम धर्म कबूल कर के उस ने निकाह भी कर लिया है. इसलिए पाकिस्तान सरकार उसे यहां की नागरिकता दे, यह उस का अधिकार है.
इस सब के बीच आमना बीबी बनने के बाद उस के पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने के वायरल वीडियो ने खुफिया एजेंसियों को सकते में डाल दिया है. इस से उस के ससुर तरसेम सिंह की इस बात को बल मिल रहा है कि कहीं वह आईएसआई की एजेंट तो नहीं बन गई. वीडियो फुटेज में किरनबाला अपने नए पाकिस्तानी पति मोहम्मद आजम के साथ कोर्ट के बाहर खड़ी दिखाई दी.
बहरहाल, यह दिल का मामला है या कोई बड़ी साजिश, कहा नहीं जा सकता. परंतु किरनबाला से आमना बीबी बनी पाकिस्तान की नई दुलहन के बारे में अब ताजा बात यह सामने आई है कि अपने फेसबुक के प्रेम और इसलाम धर्म के साथ वफादारी निभाते हुए उस ने लाहौर स्थित अपने घर में रोजे रखे. किरन वहां पर बच्चों से उर्दू भी सीख रही है और कुरआन शरीफ की आयतें भी याद कर रही है.
इन दिनों उस का पति काम के सिलसिले में सऊदी अरब चला गया है. पंजाब पुलिस और अन्य खुफिया एजेंसियां अब किरन के फेसबुक एकाउंट को स्कैन कर के गहनता से इस मामले की जांच कर रही हैं.
28 अप्रैल, 2018 को दिल्ली के कंट्रोल रूम को सूचना मिली कि जाकिर नगर की गली नंबर 7 में रहने वाले शमीम अहमद का दरवाजा अंदर से बंद है. काफी आवाजें देने के बावजूद भी उन के कमरे से कोई प्रतिक्रिया नहीं हो रही.
चूंकि यह मामला दक्षिणपूर्वी दिल्ली के थाना जामिया नगर के अंतर्गत आता है, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम से वायरलेस द्वारा यह सूचना थाना जामिया नगर को दे दी गई. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी संजीव कुमार पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. वहां पर शमीम अहमद के बेटे अब्दुल रहमान के अलावा आसपास के लोग भी जमा थे.
अब्दुल रहमान ने पुलिस को बताया कि कल रात खाना खाने के बाद उस के अम्मीअब्बू अपने कमरे में सोने के लिए चले गए थे, जबकि वह दूसरे कमरे में सो गया था. रोजाना उस के अम्मीअब्बू ही सुबह पहले उठते थे. वही उसे जगाते भी थे, लेकिन आज वह अभी तक नहीं उठे. मैं ने काफी देर दरवाजा खटखटाया इस के बावजूद भी अंदर से कोई आवाज नहीं आ रही. वहां मौजूद पड़ोसियों ने भी अब्दुल रहमान की हां में हां मिलाई.
अब्दुल रहमान की बात सुनने के बाद थानाप्रभारी संजीव कुमार ने भी दरवाजा खटखटाया लेकिन वास्तव में अंदर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो उन्हें भी शक होने लगा. तब उन्होंने लोगों की मौजूदगी में दरवाजा तोड़ दिया. दरवाजा तोड़ने के बाद जैसे ही पुलिस अंदर घुसी तो पहले कमरे में ही फर्श पर शमीम अहमद और उन की पत्नी तसलीम बानो की लाशें पड़ी थीं.
रहस्यमय मौतें
अम्मी और अब्बू की लाशें देख कर रहमान दहाडें़े मार कर रोने लगा. पड़ोसी भी हतप्रभ थे कि दोनों की मौत कैसे हो गई. उन के शरीर पर किसी चोट आदि का निशान भी नहीं था. दोनों की मौत कैसे हुई उस समय इस का पता लगाना संभव नहीं था. थानाप्रभारी संजीव कुमार ने इस मामले की जानकारी डीसीपी चिन्यम बिश्वाल को दे दी. साथ ही क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीम को भी मौके पर बुलवा लिया.
थानाप्रभारी ने मौकामुआयना किया तो पता चला कि उस दरवाजे पर औटोमैटिक लौक लगा हुआ था, जो अंदर और बाहर दोनों तरफ से बंद हो जाता था. उन के कमरे में सवा 5 लाख रुपए की नकदी के अलावा ज्वैलरी भी मिली. इस से वहां पर लूट की संभवना नजर नहीं आई. कमरे में 2 लोग सो रहे थे, दोनों की ही संदिग्ध मौत हो गई थी.
ऐसा भी नहीं था कि उन की मौत कमरे में मौजूद किसी जहरीली गैस की वजह से हुई हो क्योंकि जब कमरे का दरवाजा तोड़ा गया था तो उस समय कमरे में किसी जहरीली गैस आदि की स्मैल भी नहीं आ रही थी. यानी उस समय कमरे में पर्याप्त मात्रा में औक्सीजन थी. लग रहा था कि उन दोनों के खाने में कोई जहरीली पदार्थ मिला दिया गया होगा.
बहरहाल इन दोनों की मौत कैसे हुई यह पोस्टमार्टम के बाद ही पता लग सकता था. लिहाजा थानाप्रभारी ने जरूरी काररवाई कर के दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. डीसीपी चिन्मय बिश्बाल ने भी घटनास्थल का दौरा किया. अब्दुल रहमान शमीम अहमद का इकलौता बेटा था. वही उन के साथ रहता था, इसलिए पुलिस ने अब्दुल रहमान से कहा कि जब तक इस केस की जांच पूरी न हो जाए वह दिल्ली छोड़ कर कहीं न जाए.

2-3 दिन बाद पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया था कि उन की मौत दम घुटने की वजह से हुई थी. यानी किसी ने उन का दम घोट कर हत्या की थी. पुलिस इस बात का पता लगाने में जुट गई कि उन का कातिल कौन है.
उधर मृतकों का बेटा अब्दुल रहमान थाने और डीसीपी औफिस के चक्कर काट कर अपने मातापिता के हत्यारे का पता लगा कर उसे गिरफ्तार करने की मांग कर रहा था. जबकि पुलिस अलगअलग तरीके से जांच कर केस को खोलने की कोशिश में लगी थी.
इस दौरान थानाप्रभारी संजीव कुमार ने अब्दुल रहमान से भी 2 बार पूछताछ की थी. लेकिन उस से कोई क्लू नहीं मिल सका था. उन के यहां जिनजिन रिश्तेदारों या परिचितों का आनाजाना था, पुलिस ने उन्हें भी थाने बुला कर पूछताछ की.
इतना ही नहीं पुलिस ने उन पेशेवर हत्यारों को भी उठा लिया जो उस समय जेल से बाहर थे. लेकिन उन से भी कोई जानकारी नहीं मिली. इधर मामले को ले कर पुलिस भी परेशान थी. घटना के 3 सप्ताह बाद पुलिस ने अब्दुल रहमान को एक बार फिर थाने बुलाया. थाना प्रभारी और इंसपेक्टर भारत कुमार की टीम ने उस से फिर पूछताछ की. सख्ती से की गई पूछताछ में अब्दुल रहमान ने अपना मुंह खोलते हुए कहा कि अपने मांबाप का हत्यारा मैं ही हूं. मैं ने ही अपने दोस्तों के साथ उन की हत्या की थी.
उस की बात सुन कर एक बार तो पुलिस भी आश्चर्यचकित रह गई कि वह अपने मांबाप का एकलौता बेटा था तो ऐसी क्या बात हो गई कि घर के इसी चिराग ने अपने मांबाप का ही खून कर दिया. पुलिस ने अब्दुल रहमान से मांबाप की हत्या करने की वजह जानने के लिए पूछताछ की तो उस ने उन की हत्या की जो कहानी बताई वह हैरान करने वाली थी.
फेसबुक की दोस्त बनी महबूबा
अब्दुल रहमान अपने मांबाप की इकलौती संतान था. पिता शमीम अहमद और मां तसलीम बानो ने उसे हमेशा अपनी पलकों पर बिठा कर रखा था. वह उस की हर फरमाइश पूरी करते थे. मांबाप का लाडला अब्दुल रहमान पढ़ाई में भी होशियार था. उस का माइंड क्रिएटिव था इसलिए उस ने एनिमेशन में डिप्लोमा किया. मांबाप चाहते थे कि उन के बेटे की कहीं अच्छी जगह नौकरी लग जाए. शमीम अहमद ने करीब डेढ़ साल पहले उस की शादी कर दी थी, लेकिन किसी वजह से उस की पत्नी से नहीं बनी. दोनों के विचारों में विरोधाभास था, इसलिए उस ने पत्नी को तलाक दे दिया.
इस के बाद फेसबुक के माध्यम से अब्दुल रहमान की दोस्ती कानपुर की रहने वाली एक लड़की से हो गई. यह दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि दोनों ही एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे. यहां तक कि दोनों शादी के लिए भी तैयार हो गए.
लड़की ने कह दिया कि वह उस के लिए अपने घर वालों तक को छोड़ने के लिए तैयार है. अब बात अब्दुल रहमान को फाइनल करनी थी. वह तो तैयार था लेकिन उसे उम्मीद थी कि शायद उस के घर वाले कानपुर वाली उस की दोस्त से शादी करने के लिए तैयार नहीं होंगे.
फिर भी अब्दुल रहमान ने अपने मातापिता से कानपुर वाली अपनी दोस्त के बारे में बताया और कहा कि वह उस से शादी करना चाहता है. शमीम अहमद ने साफ कह दिया कि वह अपनी बिरादरी की लड़की के साथ ही उस की शादी करना पसंद करेंगे. इसलिए कानपुर वाली उस लड़की को वह भूल जाए. उस के साथ उस की शादी नहीं हो सकती.
मांबाप पर भारी पड़ी प्रेमिका
पिता ने जितनी आसानी से भुला देने वाली बात कही थी, वह अब्दुल रहमान के लिए उतनी आसान नहीं थी. बहरहाल घर वालों की बातों को दरकिनार करते हुए वह अपनी उस फेसबुक फ्रेंड के संपर्क में बना रहा. इतना ही नहीं वह उस से मिलने भी जाता था.
इसी दौरान घर वालों ने अब्दुल रहमान की दूसरी शादी कर दी. घर वालों के दबाव में उस ने शादी कर जरूर ली थी लेकिन उस के दिल में तो उस की कानपुर वाली प्रेमिका बसी हुई थी.
दूसरी शादी हो जाने के बाद भी वह अपनी प्रेमिका को नहीं भूला था. वह एक काल सेंटर में नौकरी करता था, इसलिए प्रेमिका को महंगे गिफ्ट आदि देने और उस से मिलने के लिए कानपुर जाता रहता था. वह अब्दुल रहमान पर शादी के लिए दबाव डाल रही थी. वह भी सोचता था कि यदि प्रेमिका ही उस की पत्नी बन जाए तो उस का जीवन हंसीखुशी से बीतेगा. लेकिन इस काम में सब से बड़ी रुकावट उस के मांबाप ही थे.
अब्दुल रहमान ने एक बार फिर से अपने मांबाप को मनाने की कोशिश की कि वह उस की कानपुर वाली दोस्त के साथ उस की शादी कर दें. लेकिन शमीम अहमद ने बेटे को न सिर्फ जम कर फटकार लगाई बल्कि हिदायत भी दी कि वह उस लड़की को भूल कर अपनी घरगृहस्थी में ध्यान लगाए.
अब्दुल रहमान की कोशिश नाकाम हो चुकी थी पर वह हारना नहीं चाहता था. आखिर उस ने भी एक सख्त फैसला ले लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए वह अपनी प्रेमिका को दुलहन बना कर घर लाएगा. इस के लिए उस ने अपने मांबाप को रास्ते से हटाने का फैसला ले लिया. यानी प्रेमिका की खातिर उस ने मांबाप तक की हत्या करने की ठान ली.
इतना बड़ा काम वह खुद नहीं कर सकता था. इस बारे में उस ने दिल्ली के नांगलोई इलाके के रहने वाले अपने दोस्त नदीम खान (32) और गुड्डू से बात की. दोनों ढाई लाख रुपए में यह काम करने के लिए तैयार हो गए. तीनों ने शमीम अहमद और तसलीम बानो की हत्या करने की पूरी योजना बना ली.
योजना के अनुसार 27-28 अप्रैल की रात नदीम खान और गुड््डू जाकिर नगर इलाके में आ गए. अब्दुल रहमान के मातापिता जब खाना खा कर अपने कमरे में सोने के लिए चले गए तो रात 11 बजे के करीब अब्दुल रहमान ने फोन कर के अपने दोनों दोस्तों को घर बुला लिया. उन के घर आने के बाद अब्दुल रहमान उन्हें अपने मातापिता के कमरे में ले गया. उन के दरवाजे पर आटोमैटिक लौक लगा था जो दोनों तरफ से बंद हो जाता था.
इन लोगों ने मुंह पर तकिया रख कर एकएक कर दोनों का दम घोंट दिया और उन की लाशें बेड से उतार कर फर्श पर डाल दीं. इस के बाद अब्दुल रहमान ने दरवाजे को बंद कर दिया. अपना काम कर के नदीम खान और गुड्डू रात में ही वहां से चले गए.
अब्दुल रहमान अपने कमरे में आ गया. इस के बाद उसे रात भर नींद नहीं आई. सुबह होने पर उस ने मोहल्ले के लोगों को यह कह कर इकटठा कर लिया कि पता नहीं क्यों आज अम्मी और अब्बू दरवाजा नहीं खोल रहे.
अब्दुल रहमान से पूछताछ के बाद पुलिस ने नदीम खान को भी गिरफ्तार कर लिया जबकि गुड्डू फरार हो गया था. दोनों से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश किया जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. पुलिस मामले की तफ्तीश कर रही है.
बौलीवुड अभिनेता अंगद बेदी और नेहा धूपिया इन दिनों मालदीव में छुट्टियां मना रहे हैं. इस जोड़े ने सोशल मीडिया पर अपने वैकेशन की तस्वीरें शेयर की हैं जिन्हें खूब लाइक और शेयर किया जा रहा है. बता दें कि नेहा और अंगद ने 10 मई को दिल्ली में गुपचुप तरीके से शादी कर ली थी. दोनों की शादी का खुलासा अचानक से सोशल मीडिया पर किया गया था. दोनों के शादी करने के बाद ऐसा कहा जा रहा था कि नेहा प्रेग्नेंट हैं लेकिन अंगद लगातार इन खबरों को नकारते आए.
नेहा और अंगद इन दिनों मालदीव में हैं और वहां से उनकी कई तस्वीरें सामने आई हैं. मालदीव की हर तस्वीर में नेहा अंगद के पीछे छिपी नजर आ रही हैं. खार इसकी वजह क्या है ये तो नेहा ही बताएंगी. वैसे हर तस्वीर में नेहा और अंगद साथ में बेहद खुश नजर आ रहे हैं. नेहा ने हाल ही में एक तस्वीर शेयर की थी जिसमें वह पूल में पति अंगद के साथ मस्ती करती नजर आ रही हैं. नेहा ने ये तस्वीर अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर शेयर की हैं.
शादी के बाद नेहा और अंगद ने अपनी लव स्टोरी को लेकर कहा था, ‘जब सालों पहले मैं अंडर 19 क्रिकेट खेलता था तब मैंने नेहा को नोटिस किया था. उस दौरान नेहा मिस इंडिया कौनटेस्ट की तैयारी कर रहीं थी. इसके बाद हम मुंबई में मिले और दोस्त बन गए.’
वहीं नेहा ने कहा था, ‘अंगद ने 4 साल पहले उन्हें शादी के लिए प्रपोज किया था लेकिन तब नेहा ने मना कर दिया था. नेहा उस समय किसी और के साथ रिलेशन में थीं. दोनों के दोस्त जानते थे कि अंगद, नेहा से प्यार करते हैं लेकिन ये सिर्फ एकतरफा था.’
सरकार ने प्रौविडैंट फंड का जो कानून बना रखा है वह देश में रोजगारों की अच्छी जानकारी देता है. हाल में जारी हुए आंकड़ों से स्पष्ट हुआ है कि सितंबर 2017 से मार्च 2018 के बीच प्रौविडैंट फंड का लाभ उठाने वालों की संख्या 39.35 लाख से घट कर 34.40 लाख रही यानी 5 लाख लोगों की नौकरी चली गई.
यह जीएसटी और नोटबंदी का बुरा असर है. छोटे और मझोले व्यापारों पर इन दोनों सरकारी प्रहारों की भारी मार पड़ी है और सरकार है कि बजाय खुद को सुधारने के, लगातार जीएसटी और नोटबंदी के गुणगान कर रही है.
व्यापारियों ने जबरन वसूले जा रहे टैक्स देने तो शुरू कर दिए हैं पर इस का मतलब यह नहीं कि उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया है. अगर व्यापारी खुश होते तो इसे हाथोंहाथ लेते. इस ने तो व्यापारियों और उद्योगपतियों को चार्टर्ड अकाउंटैंटों का गुलाम बना दिया है. यह औनलाइन फाइलिंग, कहने को चाहे सरल लगे कि दफ्तर नहीं छोड़ना पड़ता, लेकिन आप इस तरह के सौफ्टवेयर के इतने गुलाम हो जाते हैं कि आप की अपनी सूझबूझ और सोच कुंठित होने लगती है.
नई नौकरियां न मिलने की बात तो एकतरफ है, सवाल यह उठता है कि 125 करोड़ जनता में से सिर्फ 39 लाख लोग ही प्रौविडैंट फंड के दायरे में क्यों आते हैं? क्या बाकी के लिए रोजगार सिर्फ खेती करने या पकौड़े बेचने में ही हैं? सवाल यह भी उठता है कि सरकार ने आखिर क्यों ऐसा कानून बना रखा है जो सिर्फ 39 लाख रोजी पाए लोगों पर लागू होता है?
सरकारों ने असल में ऐसा तंत्र बना रखा है कि सुधार और सुरक्षा के नाम पर एक खास वर्ग को ही काम मिल सके. देश के अधिकांश कामगार खेतों, दुकानों, सड़कों पर काम करते हैं. वे इतना कम वेतन पाते हैं कि उन्हें एंप्लौयड कहना ही गलत होगा. उन की आर्थिक हालत बेरोजगारों सी रहती है.
सरकार के ये आंकड़े सरकार की ही पोल खोलते हैं कि करोड़ों नौकरियां निकलेंगी. यहां तो नौकरियों का ही टोटा हो रहा है.