दूसरे मुक्केबाजों से दस्ताने मांग कर भी खेला हूं : अमित पंघाल

हरियाणा के रोहतक से झज्जर की तरफ जाते हुए पहला गांव मायना आता है. सितंबर महीने के पहले हफ्ते में वहां उत्सव का माहौल था. गांव तो गांव आसपास के इलाकों के बहुत सारे लोग गरीब किसान विजेंदर सिंह पंघाल के छोटे से घर के सामने जमा थे. हों भी क्यों न, विजेंदर सिंह के छोटे बेटे महज 22 साल के अमित पंघाल ने कारनामा ही ऐसा किया था कि पूरा देश उस पर फख्र महसूस कर रहा था.

साल 2017 से मुक्केबाजी जगत की सुर्खियां बने अमित पंघाल ने इस बार जकार्ता, इंडोनेशिया में हुए 18वें एशियाई खेलों में लाइट फ्लाइवेट 49 किलोग्राम भार वर्ग में गोल्ड मैडल जीता था. अमित पंघाल से उन के अब तक के मुक्केबाजी के कैरियर, संघर्ष और निजी जिंदगी पर उन के पुश्तैनी घर पर बातचीत हुई. पेश हैं, उसी के खास अंश:

इस खेल की तरफ आप का रुझान कैसे हुआ?

मैं एक साधारण परिवार से हूं. मेरे पिता विजेंदर सिंह 10वीं जमात पास छोटे से किसान हैं. हमारी एक एकड़ जमीन है जिस पर गुजारे लायक अनाज हो जाता है. पिता की कोई और अतिरिक्त आमदनी नहीं है. अब तो वे थोड़े बीमार भी रहते हैं इसलिए इतना ज्यादा काम नहीं कर पाते हैं.

मेरी मां उषा रानी गृहिणी हैं. वे भी 10वीं जमात पास हैं. पर वे घर का कामकाज ही संभालती हैं.

जहां तक इस खेल की तरफ मेरे रुझान की बात है तो मेरे बड़े भाई अजय मुक्केबाजी सीखने कोच अनिल धनखड़ के पास जाते थे. मेरी उम्र उस समय 11-12 साल की रही होगी. मैं चूंकि बचपन में कमजोर शरीर का था तो भाई मुझे भी अपने साथ ले जाते थे कि थोड़ी मेहनत करूंगा तो भूख लगेगी, और जब भूख लगेगी तो खाना भी ढंग से खा लूंगा.

वहां पर भाई और कोच की निगरानी में मैं भी मुक्केबाजी सीखने लगा. बाद में उन दोनों को महसूस हुआ कि मैं इस खेल में आगे जा सकता हूं तो मेरे भाई ने फैसला लिया कि वे अब मुझ पर ज्यादा फोकस करेंगे.

वैसे भी उस समय हमारे घर के हालात ऐसे नहीं थे कि हम दोनों भाई एकसाथ मुक्केबाजी सीख पाते. मुक्केबाजी के दस्ताने खरीदने तक के तो पैसे नहीं होते थे. मैं ने कई बार दूसरे मुक्केबाजों से दस्ताने मांग कर भी प्रैक्टिस की थी.

लेकिन इस सब के बावजूद हमारे कोच अनिल धनखड़ ने हिम्मत नहीं हारी. उन्हीं की कोशिशों के चलते साल 2009 में मैं ने अपना पहला कंपीटिशन लड़ा था जो स्टेट लैवल का था और गुड़गांव में हुआ था. उस में मैं हार गया था. इस के बाद साल 2010 में हुए इसी कंपीटिशन को मैं ने जीता था.

इंटरनैशनल लैवल पर आप ने कितने मैडल जीते हैं?

जो खास हैं उन में साल 2017 में ताशकंद में हुई मुक्केबाजी की एशियाई चैंपियनशिप में मैं ने ब्रौंज मैडल जीता था. इस के बाद साल 2018 में गोल्ड कोस्ट में हुए कौमनवैल्थ खेलों में सिल्वर मैडल जीता था.

एशियाई खेलों के फाइनल मुकाबले में आप के सामने रियो ओलिंपिक में गोल्ड मैडल विजेता हसनबौय दस्मातोव थे. आप ने क्या रणनीति बनाई थी?

हसनबौय दस्मातोव ने मुझे ताशकंद में हुई मुक्केबाजी की एशियाई चैंपियनशिप में हराया था. साल 2017 में हुई वर्ल्ड बौक्सिंग चैंपियनशिप में भी उन्होंने ही मुझे मात दी थी. पर इस बार मैं पूरी तैयारी के साथ गया था.

हसनबौय दस्मातोव के साथ खेलते हुए दिक्कत यह होती है कि वे बाएं हाथ के मुक्केबाज हैं जो दुनिया में बहुत कम हैं. उन के खेलने के स्टाइल को भांपना आसान काम नहीं है. उन के बाएं हाथ के पंच बड़े तेज होते हैं. लिहाजा, मैं ने इस बार बाएं हाथ के मुक्केबाजों के साथ ही ज्यादा प्रैक्टिस की थी.

हमारी टीम एशियाई खेलों से पहले यूनाइटेड किंगडम गई थी जहां मैं ने बाएं हाथ के उसी मुक्केबाज के साथ प्रैक्टिस की थी जिस ने मुझे कौमनवैल्थ खेलों के फाइनल मुकाबले में हराया था.

मुझे पता था कि हसनबौय मेरे सामने जरूर आएगा. मैं ने इस बार ठान लिया था कि उस के अटैक को रोक कर काउंटर अटैक करना है और किसी भी तरह खुद पर उसे हावी नहीं होने देना है.

कोच ने बताया था कि उस के लैफ्ट हुक पंच को डिफैंस में ले कर वार करना है. उस ने कम से कम 20 बार मुझ पर उसी पंच से अटैक किया था जिस का मैं ने बचाव किया.

जब आप को गोल्ड मैडल मिला और भारतीय तिरंगा सम्मान में ऊंचा उठाया गया तो कैसा महसूस हुआ?

वह यादगार लमहा था. मेरे इमोशन काबू में नहीं रहे थे. रुका ही नहीं गया. आंसू बह निकले. बस यही खयाल मन में आ रहा था कि मेरी वजह से मेरे देश का झंडा इतना ऊपर जा रहा है.

मैडल जीतने के बाद आप ने ट्वीट किया था कि आप के पापा और कोच दोनों फिल्म कलाकार धर्मेंद्र के जबरदस्त फैन हैं और भारत लौट कर आप भी उन से मिलना चाहते हैं. इस के जवाब में धर्मेंद्र ने भी आप को बधाई दी थी और मिलने की इच्छा जताई थी. आप के पापा और कोच का धर्मेंद्र प्रेम वाला मामला क्या है?

मेरे पापा और कोच दोनों ही धर्मेंद्र के जबरदस्त फैन हैं. कोच के फोन में तो डीपी भी धर्मेंद्र की लगी हुई है. पापा तो उन की सारी फिल्में देखते हैं. टैलीविजन पर विज्ञापन भी आ रहा हो तो वे चैनल नहीं बदलने देते हैं. वे कहते हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए पर मूवी नहीं निकलनी चाहिए. मेरे कोच तो हमेशा धर्मेंद्र का उदाहरण दे कर कहते हैं कि धर्मा तो आगे ही खेलता है. उन के जैसा ही पावरफुल पंच लगाना है.

इस मुकाम तक पहुंचने में आप के परिवार का कितना सहयोग रहा है?  क्या कभी गांव में किसी ने ताना तो नहीं मारा कि खाने को है नहीं और चले मुक्केबाज बनने?

सारा उन्हीं का सहयोग है. मेरे बड़े भाई ने मेरे लिए ही बौक्सिंग छोड़ी थी. बाद में उन्होंने सेना में नौकरी कर ली थी ताकि मेरे खेल पर पैसे की वजह से कोई आंच न आए.

शुरूशुरू में तो लोग कहते ही थे कि इस के बस की बात नहीं है. मेरे पापा को भी लगता था कि शरीर तो ढंग का है नहीं, मुक्केबाजी कैसे करेगा. मेरा कद भी ज्यादा नहीं था. परिवार वाले चोट लगने से डरते थे. पर अब पूरे गांव ने मेरा सम्मान किया है.

आप भी तो अब सेना में हैं. सेना अपने खिलाडि़यों की कितनी मदद करती है?

मैं सेना में नायब सूबेदार के पद पर हूं. सेना अपने खिलाडि़यों की हर तरह से मदद करती है. सभी अच्छे मुक्केबाजों को एक सैंटर में रख कर उन की प्रैक्टिस कराई जाती है. सब के साथ खेल कर हम भी अच्छा सीखते हैं.

तो क्या सेना अब आप को तरक्की देगी?

उम्मीद तो है कि मुझे सूबेदार बना देगी. हरियाणा सरकार ने भी तो 3 करोड़ रुपए के इनाम की घोषणा के अलावा पुलिस में डीएसपी पद देने की बात कही है.

इनाम मिलने से कितना मनोबल बढ़ता है?

हरियाणा सरकार खिलाडि़यों के लिए बहुत अच्छा काम कर रही है. गांव में किसी को 3 करोड़ मिलना बहुत बड़ी बात है. पद के लिए अभी कुछ सोचा ही नहीं है. सभी से सलाह ले कर कोई कदम उठाया जाएगा, क्योंकि सेना भी खिलाडि़यों के लिए बहुत अच्छा काम कर रही है.

आप का नाम ‘अर्जुन अवार्ड’ के लिए भेजा गया था, लेकिन फाइनल लिस्ट में नहीं आ पाया. क्या इस बात का मलाल है?

मेरे सीनियर मुक्केबाज को इस बार का ‘अर्जुन अवार्ड’ मिला है, यह मेरे लिए खुशी की बात है. वैसे, सम्मान मिलने से खिलाड़ी का मनोबल बढ़ता है. लगता है कि खेल के लिए जो किया उस का फल मिल गया.

आप की रिंग में क्या ताकत है?

मैं अपने सामने वाले मुक्केबाज के अटैक को रोक कर उस पर काउंटर अटैक करता हूं. इस में स्पीड की बहुत जरूरत होती है. कम वजन के मुक्केबाजों के लिए ताकत से ज्यादा स्पीड जरूरी है.

अगला लक्ष्य क्या है?

2020 का ओलिंपिक. उस पर ही फोकस है.

पर आप की मां तो आप के लिए बहू ढूंढ़ना चाहती हैं?

अभी मेरा शादी करने का कोई इरादा नहीं है. ओलिंपिक से पहले तो बिलकुल भी नहीं. हर मां की तरह मेरी मां भी मेरा घर बसता देखना चाहती हैं पर अभी मेरी शादी में समय है.

कोई और शौक?

समय ही नहीं मिलता कुछ और करने का. घर आता हूं तो ज्यादा बाहर नहीं जाता. कभीकभी दोस्तों के साथ टाइमपास कर लेता हूं. वैसे, मुझे चंडीगढ़ में शौपिंग करना अच्छा लगता है.

खाने में क्या पसंद है?

मां के हाथ की खीर और चूरमा. जब घर आता हूं तो पापा कहते हैं कि खीर और चूरमा बनवा ले, तेरे बहाने मुझे भी मिल जाएगा. परिवार के साथ मिलबैठ कर खाने का अपना ही मजा है.

मुक्केबाजी में आप का आदर्श कौन है?

मेरे बड़े भाई अजय और कोच अनिल धनखड़. मैं ने बड़े भाई से यही सीखा है कि अपना त्याग कर के दूसरों के लिए बहुतकुछ किया जा सकता है. वे शायद मुझ से भी अच्छा कर सकते थे, पर मेरे लिए उन्होंने अपना मुक्केबाजी का कैरियर ही दांव पर लगा दिया. कोच अनिल धनखड़ तो हमेशा मेरा मनोबल बढ़ाते हैं. ओवर कौंफिडैंस से बचने की सलाह देते हैं.

मन्नत मांगने के नाम पर पेड़पौधों के साथ जुल्म

यह अंधविश्वास की हद ही है कि इनसान अपना भविष्य बेहतर बनाने के लिए तरहतरह के खटकरम, कर्मकांड, धार्मिकतांत्रिक अनुष्ठान करता रहता है. अपने फायदे के लिए लोग पशुपक्षियों की तो बलि चढ़ाते ही हैं, पेड़पौधों को भी बलि का बकरा बनाने से बाज नहीं आते हैं.

ऐसे अंधविश्वासी लोग मंदिरों में देवीदेवताओं से मन्नत मांगते हैं और इसी के बहाने पेड़पौधों पर जोरजुल्म करते हैं. उन्हें चारों ओर से धागों से लपेट कर उन के बढ़ने में बाधा डालते हैं, यह जानते हुए भी कि पेड़पौधे हमारी जिंदगी का एक अटूट हिस्सा हैं. अगर वे नहीं रहेंगे तो इनसान का जिंदा रहना भी काफी मुश्किल हो जाएगा.

पेड़पौधे वायुमंडल में ज्यादा मात्रा में कार्बन डाईऔक्साइड यानी गंदी हवा सोखते हैं और ताजा हवा औक्सिजन के रूप में छोड़ते हैं जिस से हम सांस ले कर जीवित रहते हैं. पेड़पौधों से हमें और भी तरह का फायदा मिलता है. जहां पेड़पौधे ज्यादा होते हैं वहां की आबोहवा ताजा होती है. जल्दी बादल बनते हैं और हमें पानी मिलता है.

आज हम अंधविश्वास में जकड़ कर उन का सर्वनाश करने पर तुले हुए हैं. जिधर भी नजरें घुमा कर देखा जाए तो आज सब से ज्यादा जुल्म पेड़पौधों पर ही हो रहा है.

बताते चलें कि पहले के लोग खासकर नीम, पीपल और बरगद इन 3 पेड़ों को जरूर लगाते थे. इन से सब से ज्यादा मात्रा में औक्सिजन मिलती है और आबोहवा भी ठीक रहती है लेकिन आज धार्मिक अनुष्ठान के नाम पर सब से ज्यादा जुल्म इन्हीं तीनों पेड़ों के साथ हुआ है. नतीजा यह है कि अब ये पेड़ मिटने के कगार पर हैं.

पूजापाठ और मन्नत मांगने के नाम पर सब से ज्यादा जोरजुल्म नीम, पीपल और बरगद के पेड़ों के साथ ही होता है. सिर्फ इन्हीं के साथ ऐसा नहीं है, और भी जो दूसरे पेड़पौधे हैं उन के साथ भी लोग पूजापाठ, मन्नत के नाम पर जुल्म करते हैं.

बिहार, झारखंड में लोग खासकर औरतें व्रतत्योहार के मौके पर बरगद के पेड़ के नीचे बैठ कर धार्मिक अनुष्ठान करते हुए उसे चारों ओर से रंगीन सुतलियों से इतना बांध देती हैं कि उस का मूल तना ही दिखना बंद हो जाता है.

कहीं कहीं तो पीपल के तने को भी रंगीन सुतलियों से बांधा जाता है. अगर किसी जवान आदमी को चारों तरफ से रस्सियों से बांध दिया जाए तो उस की क्या हालत होगी?

जेठबैसाख की तपती गरमी में जिस पेड़ के नीचे ठंडी छांव में बैठ कर औरतें अपने पति की लंबी उम्र होने का वर मांगती हैं और पूजापाठ करती हैं, उसी पेड़ के साथ यह जुल्म नहीं तो और क्या है?

यही नहीं, भक्तगण देवीदेवताओं की पूजा करते हुए उन से अपना मनचाहा फल पाने के लिए किसी मंदिर के अहाते या अगलबगल के पेड़पौधों पर कोई चीज जैसे नारियल, ईंट, पत्थर के टुकड़े वगैरह को बांध कर लटका जाते हैं.

अकसर नए शादीशुदा जोड़े जिन के बच्चा होने में देरी होती है, इलाज कराने डाक्टर के पास न जा कर मंदिरों में दौड़े आते हैं और औलाद का आशीर्वाद मांगते हुए ईंटपत्थर लाल कपड़ों में लपेट कर पेड़ों की शाखाओं से बांध जाते हैं कि बच्चा हो जाने पर इसे खोल जाएंगे. कहींकहीं तो लोग दुधमुंहे बच्चों के बाल उतरवा कर उन्हें लाल कपड़े में लपेट कर पेड़ की शाखाओं से बांध देते हैं.

मंदिरों के आसपास ऐसे नजारे आसानी से देखने को मिल जाएंगे. देश के अनेक हिस्सों में जहां देवीदेवताओं का निवास माना जाता है वहां एक खास मौके पर मेला लगता है और लोग पूजापाठ कर मंदिर के अहाते में लगे पेड़पौधे पर नारियल, ईंट, पत्थर वगैरह लाल कपड़ों में बांध कर चले जाते हैं.

झारखंड में साहिबगंज की रक्सी नामक जगह पर ऐसे अंधविश्वासी लोग हर मंगलवार और शनिवार को पूजापाठ करने आते हैं और मन्नत मांगने के नाम पर यहां के पेड़पौधों पर ईंट बांध कर चले जाते हैं. यही हाल पटमदा के नजदीक हाथी खेदा मंदिर का भी है. वहां भी लोग मन्नत के नाम पर पेड़पौधों में नारियल बांध कर चले जाते हैं.

जमशेदपुर के गोलपहाड़ी मंदिर के पास के पेड़पौधों में लोग पत्थर के टुकड़े बांध कर मन्नत मांगते हैं. अब पता नहीं कितनों की मन्नत पूरी होती भी है या नहीं लेकिन बेचारे बेजबान पेड़पौधे मारे जाते हैं. पेड़पौधे भी किस से शिकायत करें कि हम भी सजीव हैं? अपनी इच्छा हम पर क्यों लादी जा रही है?

बताया जाता है कि जब लोगों की मन्नत पूरी हो जाती है वे पूजाअर्चना के साथ इसे खोल कर वहीं रख देते हैं. लेकिन जिस तरह से इन पेड़पौधों पर हजारों की तादाद में नारियल, ईंट, पत्थर वगैरह लटके हुए हैं, इन को देख कर ऐसा लगता है कि ये कई सालों से लटके हुए हैं और कभी इन्हें लोग वापस आ कर खोलते भी हैं. पेड़ों की डालियां इन के भार से टूट कर गिर जाती हैं. बेचारे पेड़पौधे अपनी बदहाली पर आंसू बहाते रहते हैं.

मंदिर में विराजमान देवीदेवताओं से मन्नत मांगने आए ऐसे भक्तों से न जाने कब इन पेड़पौधों की हिफाजत हो सकेगी और वे सहज रूप से विकसित हो सकेंगे. इन अंधविश्वासियों के चलते मंदिर के आसपास के कारोबारियों की चांदी हो जाती है. वे पूजा के नाम पर बिकने वाले नारियल, ईंट, सुतली वगैरह के भाव कई गुना बढ़ा कर के भक्तों से वसूलते हैं. इसी बहाने वे पूजापाठ से संबंधित दूसरी चीजों के भी दाम बढ़ा कर ग्राहकों को लूटते हैं.

लोग मन्नत मांगने के लिए खाली पेट ही पूजापाठ करने जाते हैं. ऐसे में वहां के होटल वाले भी खानेपीने के सामान के भाव काफी बढ़ाए रखते हैं.

नथिंग टु रिपोर्ट माने एनटीआर

इलेक्ट्रोनिक मीडिया के दर्जन भर से अधिक फ्लैश एकसाथ चमकने लगे. मंत्रीजी के पीछे खड़े आधा दर्जन थोबड़े मुसकराहट से फैलते गए. वे अपने पोज लगातार बदलते रहे. तभी बराबर में बैठे शंभु कहने लगे, ‘‘एनटीआर को देख रहे हैं न?’’

बात मेरी समझ में नहीं आई. वह धीरे से बतिया रहे थे. कुछ देर सोचने में लगी और फिर बात समझ में आ गई. एनटीआर माने नथिंग टु रिपोर्ट. मतलब साफ कि लिखना कुछ नहीं. बस, टीवी चैनलों के आगे मौकेबेमौके अपने थोबड़े दिखाते रहो ताकि 24 घंटे के समाचारों में कईकई चैनलों में दीखते रहो. घर वालों को फोन कर दो, आज टीवी न्यूज चैनल देख लेना. मित्रों को भी खबर कर दो, ‘‘अरे, यार, आज जरा न्यूज चैनल देख लेना, फलाने मंत्री के साथ अपन भी मौजूद हैं.’’ इस से धाक भी जमती है और धंधे करने में सहूलियत भी होती है. अब देखिए न, हर पार्टी के नियमित पत्रकार सम्मेलन होते हैं, सो उन का समय पहले से ही करीबकरीब तय होता है. समय से काफी पहले फोकस वाली सारी कुरसियां घिर जाती हैं, जो पहले पहुंच जाते हैं अपने मित्रों के लिए कुरसियां घेर लेते हैं. फिर सवाल पूछने में सब से आगे और लिखने के मामले में कलम जेब से बाहर नहीं निकलती.

एक पत्रकार हैं, उम्र में भी वरिष्ठ हैं पर अब एनटीआर हो गए हैं. कहीं भी बैठे हों फोन घुमाने लगते हैं और बताते हैं, ‘संसद भवन में बैठा हूं.’ चाहे वह चाय की कोई दुकान ही क्यों न हो. काम क्या करते हैं, उन के अलावा शायद ही किसी को पता हो. अचानक विनोद मिल गए. छूटते ही कहने लगे, ‘‘एक प्रेस कान्फ्रेंस कराई थी पर अनुभव अच्छा नहीं रहा.’’

‘‘क्यों, क्या हुआ?’’ मैं ने पूछा तो बताने लगे, ‘‘तुम्हें तो पता ही है, अपना काम विज्ञापन का है. एक कंपनी ने नई गारमेंट लांच की. पब्लिसिटी का जिम्मा मुझे दे दिया. टाइम कम था, फिर भी निमंत्रणपत्र गिनेचुने अखबारों को भेज दिए. बुलाया 15 को था, वहां पहुंच गए 50. गिफ्ट के लिए खूब हंगामा किया. कौन कहां से आया, कुछ पता नहीं. एक साहब तो कहने लगे, ‘मेरा पर्स रास्ते में कहीं गायब हो गया, 500 रुपए दे दो, घर जाऊं.’ आयोजक ने मरता क्या न करता की हालत में चुपचाप उन्हें 500 रुपए का नोट पकड़ा दिया. फिर कहने लगे, ‘घर तो छुड़वा दीजिए या फिर टैक्सी के लिए 200 रुपए दीजिए.’ किसी तरह उन से पिंड छुड़वाया.’’ ‘‘और क्या हुआ?’’ मैं ने मुसकराते हुए पूछा.

विनोद रोंआसे हो कर कहने लगे, ‘‘10 दिन हो गए पर खबर कहीं भी नहीं लगी. आयोजक मुझ से नाराज. अच्छे संबंध थे, बिजनेस भी मिल जाता था, सो भी हाथ से गया.’’

विनोद के साथ एक और सज्जन थे, मैं उन्हें नहीं जानता था. विनोद चुप हुए तो वह बोलने लगे, ‘‘कभी प्रगति मैदान के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले में गए हैं. कई सीजनल पत्रकार वहीं दिखाई देते हैं. हर जगह कैटलाग से ले कर जो भी मिलता है, बटोर कर ले जाते हैं. सुबह से शाम तक वहीं मंडराते रहते हैं. कहीं लंच तो कहीं ब्रेकफास्ट. एक साहब तो अपने साथ सहायक ले कर चलते हैं और दोपहर तक जुटाए माल के साथ उसे घर भेज देते हैं. मीडिया सेंटर में एक से एक चेहरे दिखाई दे जाएंगे, जो साल भर कहीं नहीं दिखाई देते.’’ फिर स्वयं ही कहने लगे, ‘‘पर अब आयोजक भी चतुर हो गए हैं. खिला तो देते हैं पर बरसाती मेंढकों को गिफ्ट नहीं देते. फिर भी कुछ का खानेपीने का गुजारा तो चल ही जाता है.’’

इसी बीच मुझे एक बुजुर्ग पत्रकार की याद आ गई. वह मीडिया सेंटर में दिन भर बैठे रहते. उन की आलीशान कोठी थी, 2-3 कारें, इतने ही फोन. ऐसा वह बताते थे. सच ही कहते होंगे. पर दिन भर मीडिया सेंटर के फोन पर चिपके रहते. उन्होंने अपने चाहने वालों को दिन में बात करने का फोन नंबर भी मीडिया सेंटर का ही दिया हुआ था. एक बार उन के साथ कहीं जाना हुआ. सब से पहले हम 2 ही पहुंचे थे. पत्रकारों के स्वागत में सिगरेट के पैकेट रखे हुए थे, शायद कोई विदेशी सिगरेट थी, सो उन्होंने फौरन एक पैकेट उठा कर जेब के हवाले कर दिया. मुझे गुस्सा तो बहुत आया. बाद में अकेले में मिले तो मुझ से रहा नहीं गया, उन के हाथ की सफाई का बखान करते हुए बोला, ‘‘उस मौके पर फोटोग्राफर नहीं था, आता तो फोटो खींच लेता.’’

‘‘किस की?’’ वह बोले. ‘‘सिगरेट जेब में रखते हुए आप की?’’ मैं ने धीरे से कहा तो वह कहने लगे, ‘‘सिगरेट तो मैं अपने ड्राइवर के लिए ले जा रहा हूं.’’

‘कितने महान हैं, ड्राइवर का बड़ा ध्यान रखते हैं,’ यह सोच कर मैं श्रद्धा से झुक गया. महीनों बाद वह ऐसे ही किसी कार्यक्रम में दोबारा मिल गए पर उस दिन सिगरेट के पैकेट को उन्होंने हाथ नहीं लगाया. मैं ने पूछ ही लिया, ‘‘सर, आप के ड्राइवर ने नौकरी छोड़ दी या सिगरेट?’’

‘‘अरे, तुम्हें कैसे पता? सचमुच वह ड्राइवर अब नहीं है,’’ बहुत भोलेपन से उन्होंने जवाब दिया.

एनटीआर हर जगह मिल जाते हैं. उन का अपना गिरोह है. एक को किसी आयोजन की खबर मिलती है तो पूरे गिरोह को ही वायरलैस हो जाता है और सारे हाजिर भी हो जाते हैं. वैसे कई बार भीड़ जुटाने में इन का बड़ा योगदान होता है. एनटीआर न हों तो पूरा कान्फ्रेंस हाल खालीखाली लगता है. एक स्थानीय निकाय के जनसंपर्क निदेशक के कमरे में बैठा था. तभी धड़धड़ाते हुए एक सज्जन घुसे और बिगड़ने लगे, ‘‘पत्रकारों की आप के यहां बेइज्जती हो रही है और आप कुछ नहीं करते. आप के सिक्योरिटी वाले स्कूटर तक नहीं लाने देते. कहते हैं कि पास नहीं है तो बाहर खड़ा करो.’’

‘‘आखिर हुआ क्या?’’ निदेशक ने बिना गरदन उठाए फाइल में आंखें गड़ाए पूछा तो वह गुस्से से तमतमाने लगे. फिर गुस्से में बोलने लगे, ‘‘पता नहीं कैसेकैसे ऐरेगैरों को पार्किंग पास दे देते हैं और जो पत्रकार हैं उन की बेइज्जती कराते हैं.’’ फिर मेरी तरफ देखते हुए बोले, ‘‘आप भी शायद पत्रकार बंधु हैं. क्या यह सब ठीक है?’’

मैं ने कहा, ‘‘कानून तो सब के लिए है.’’ वह विफरते हुए कहने लगे, ‘‘शर्म आनी चाहिए आप को. आप जैसे लोगों की वजह से ही ऐसा हो रहा है. आप भी गलत लोगों का साथ देते हैं.’’

मेरे पास कोई उत्तर नहीं था. वह जिस तेजी से आए थे उसी तेजी से चले गए. उन के जाने के बाद मैं ने निदेशक से पूछा, ‘‘ये पत्रकार महोदय कौन हैं?’’ निदेशक कहने लगे, ‘‘अरे, है एक टुटपुंजिया. 4 पेज का साप्ताहिक निकालता है जिस में हर हफ्ते किसी न किसी की बखिया उधेड़ता रहता है. अब अगले हफ्ते मेरी बारी है, ऐसा लगता है.’’

कमरे में कुछ और लोग भी बैठे थे. सब अपनेअपने अनुभव बांटने लगे. इलेक्ट्रोनिक मीडिया तब था ही नहीं और अखबार भी गिनती के ही थे. कुछ धाकड़ किस्म के लोग तब भी धंधा करने का रास्ता खोज निकालते थे. कई धंधों के चलते ही खूब मालामाल हो गए. कुछ तो आज के जानेमाने पत्रकारों में गिने जाते हैं. एक पत्रकार महोदय का किस्सा तो खासा चर्चित है. एक बार किसी थाने में घुस गए. सीधे एस.एच.ओ. से मिले. वह उन्हें जानता था. जाते ही कहने लगे, ‘‘यहां भीड़ में किसी ने मेरा पर्स उड़ा दिया, उस में हजार रुपए पड़े थे. आप के इलाके में उठाईगीरों का राज है.’’ एस.एच.ओ. ने कहा, ‘‘आप के साथ ऐसा हुआ, इस का मुझे अफसोस है. हम छानबीन करते हैं. कोशिश करेंगे कि आप का पर्स रुपए समेत मिल जाए.

शाम को एक सिपाही बंद लिफाफा ले कर उस धाकड़ पत्रकार के दफ्तर पहुंच गया और कहने लगा, ‘‘जनाब, यह लिफाफा एस.एच.ओ. साहब ने आप को भिजवाया है. पर्स तो मिला नहीं पर आप के हजार रुपए बरामद हो गए हैं.’’

तब उन का वेतन भी 250-300 से ज्यादा नहीं था. बाद में उन्होंने अपने किसी खास पत्रकार मित्र को यह घटना बताई और कहने लगे कि पर्स तो मेरे पास था नहीं. पुलिस वालों को आजमा रहा था. उन्होंने कौन से अपनी जेब से दिए, कहीं से वसूले ही होंगे. कई दशक पहले एक पत्रकार तो खासे चर्चित रहे. पदोन्नति और तबादला कराने में उन की खूब चलती थी. अगर उन की इच्छा से काम नहीं होता तो कई दिनों तक उस महकमे का कच्चा चिट्ठा छापते रहते. उन के एक ही फोन से काम हो जाता था, पर वह एनटीआर नहीं थे, रिपोर्ट धड़ल्ले से लिखते थे. जिस से नाराज हो जाते उस की शामत आ जाती और जो उन का काम कर देता उस की तारीफों की खबर छपती रहती.

एनटीआर के चक्कर में जानेमाने अखबारों के पत्रकारों की भी कई बार फजीहत हो जाती है, जो खबरें लिखते हैं वे कोई और काम नहीं करते. जो कुछ नहीं लिखते वे बहुत कुछ करते हैं. नियमित रूप से लोगों से मिलतेमिलते वे राजनीतिक गलियारों में घुस जाते हैं. फिर उन के वारेन्यारे हो जाते हैं. कुछ महिला पत्रकार भी कुछ कर गुजरने के चक्कर में एनटीआर के चक्कर में फंस जाती हैं. रिपोर्टिंग से ले कर देहदान तक का सफर करने के लिए विख्यात कुछ ऐसे पत्रकारों के बारे में कई किस्से खासे चर्चित भी हुए हैं, जिन में चुनाव में टिकट लेने तक की घटनाएं हैं. कुछ ही सफल राजनीतिज्ञ बन पाई हैं लेकिन कुछ राजनीतिबाजों की खास बन गईं.

एनटीआर की संख्या लगातार बढ़ रही है. हर कहीं एनटीआर दिखाई दे जाते हैं. हाथ में कागजों का पुलिंदा लिए खोजी पत्रकारिता की कपालक्रिया करतेकरते वे सिर्फ एनटीआर बन कर सुख भोगने में विश्वास करते हैं. कई तो इस चक्कर में राजनीति का सुख भोग रहे हैं, उन की आज खूब तूती बोल रही है.

मेरी बीवी का अंग बेहद कसा है. संबंध बनाते समय मेरे अंग की चमड़ी चारों तरफ से फट जाती है. क्या करूं.

सवाल
मैं 35 साल का हूं. 9 साल व 7 साल के 2 बच्चों का पिता हूं. बीवी 30 साल की है. बीवी का अंग बेहद कसा है. संबंध बनाते समय मेरे अंग की चमड़ी चारों तरफ से फट जाती है. क्या करूं?

जवाब
शादी के 10-11 सालों बाद आप को यह दिक्कत हो रही है यानी आप के अंग में कोई खराबी आ गई होगी. आप माहिर डाक्टर को अपनी तकलीफ बता कर इलाज कराएं.

ये भी पढ़ें…

सैक्स में और्गेज्म की है बड़ी भूमिका, आप भी जानिए

सैक्स की सफलता और्गेज्म पर टिकी होती है. अत: पतिपत्नी दोनों को ही और्गेज्म तक पहुंच सैक्स का आनंद लेना चाहिए. यदि सहवास के दौरान पतिपत्नी दोनों लगन के साथ सैक्स क्रिया का लुत्फ लेते हैं, तो और्गेज्म तक पहुंचना दोनों के लिए आसान हो जाता है. यदि और्गेज्म तक नहीं पहुंचते हैं तो दोनों में तनाव रहता है, झगड़े होने लगते हैं.

दिलीप जब पत्नी रूपा के साथ संबंध बनाते हैं तो फोरप्ले पर ज्यादा ध्यान नहीं देते हैं, जबकि उन की पत्नी फोरप्ले के साथ तन्मयता से सैक्स करना चाहती हैं. दिलीप के ऐसा न करने से रूपा और्गेज्म तक नहीं पहुंच पाती. अकसर दोनों में इस बात को ले कर झगड़ा होता है.

क्या है और्गेज्म

और्गेज्म सैक्स संबंध की मजबूत कड़ी है. मैडिकल साइंस के अनुसार सहवास के समय शरीर में होने वाले विभिन्न बदलावों और चरमसुख को ही और्गेज्म कहा जाता है. नईनई शादी होने पर सैक्स करने पर महिलाएं और्गेज्म का लुत्फ नहीं उठा पातीं. पर कुछ समय बाद लगातार सैक्स संबंध बनाने पर और्गेज्म पर पहुंच पाती हैं. सर्वे के अनुसार महिलाओं में फर्स्ट और्गेज्म के लिए सही उम्र 18 साल ही है.

गहरीगहरी सांसें लें: और्गेज्म के लिए पतिपत्नी के मन में दृढ़शक्ति और जिज्ञासा होनी जरूरी है. इस का आनंद पूरा शरीर उठाता है. इस की शुरुआत सांसों से होती है. सैक्स संबंध के समय सांसों पर ध्यान दें.

और्गेज्म के समीप पहुंचने पर गहरी सांसें लें और छोड़े. औक्सीजन शरीर में रक्त प्रवाह को तेज करती है. जितनी औक्सीजन लेते हैं सैक्स सुख उतना ही मजेदार बन जाता है.

सैक्स खिलौना: सैक्स टौयज की मदद से बिलकुल अलग तरह का आनंद अनुभव होता है. यह और्गेज्म तक पहुंचने का सब से आसान उपाय है. सैक्ससुख को अनुभव करने के लिए सैक्स टौयज की जरूरत नहीं होती है, लेकिन यह सहवास में उत्तेजना बढ़ाने में सहायक होता है.

कल्पनाओं का सहारा लें: सैक्सी सपने देख कर भी चरमसुख की प्राप्ति होती है. यह सहवास क्रिया को मजेदार और उत्तेजक बनाने में सहायक होता है. यदि पार्टनर के साथ उत्तेजना महसूस नहीं हो रही हो तो ऐसी स्थिति में कल्पना और्गेज्म तक पहुंचाती है.

कामोत्तेजक अंगों से खेलें: सहवास के दौरान अपने शरीर को ऐक्टिव रखें. ज्यादातर महिलाएं शरीर को कड़ा कर लेती हैं, जो गलत है. और्गेज्म के लिए शरीर का भरपूर इस्तेमाल करें.

अलगअलग आसन अपनाएं: सहवास करते वक्त केवल साधारण और आसान तरीके से सैक्स न करें पार्टनर के साथ अलगअलग सैक्स आसन अपना कर सहवास करें. ऐसा करने से और्गेज्म तक पहुंचना आसान हो जाता है.

सैक्स क्रिया में शरीर को लिप्त करें: रिलैक्स रहने की कोशिश करें. संबंध बनाते समय शरीर के 1-1 पार्ट को लिप्त करने की कोशिश करें. कामोत्तेजना के कारण मांसपेशियां सिकुड़ रही हैं तो रिलैक्स रहने की कोशिश करें. फ्रैश मूड से सहवास कर और्गेज्म तक पहुंचें.

फोरप्ले को स्थान दें: सैक्स से पहले चुंबन, स्पर्श, सहलाना, आलिंगन क्रिया करें, क्योंकि इस से कामवासना जाग्रत होती है.

डा. चंद्रकिशोर के मुताबिक पुरुषों की सैक्स इच्छा केवल शरीर तक ही सीमित होती है, जबकि महिलाएं सहवास को भावना से जोड़ती हैं. अत: फोरप्ले से और्गेज्म तक पहुंच कर इंटरकोर्स का सही आनंद लें.

हैल्थ चैकअप कराएं: यदि ये सब कर के भी सहवास में संतुष्टि नहीं मिल रही है, और्गेज्म तक नहीं पहुंच पा रही हैं, तो तुरंत डाक्टर से चैकअप करवाएं. कई बार ज्यादा दवा का सेवन भी और्गेज्म तक नहीं पहुंचने देता है. और्गेज्म तक न पहुंचने से आपसी रिश्ते खोखले होने लगते हैं. आपस में झगड़े होने लगते हैं, मानसिक तनाव होता है, यहां तक कि मैरिड लाइफ खतरे में पड़ जाती है. इसलिए पतिपत्नी दोनों ऐसे संबंध बनाएं कि दोनों ही चरमोत्कर्ष तक पहुंचें.

सैक्स दांपत्य जीवन का अहम हिस्सा है. इसे नजरअंदाज न करें. पतिपत्नी के संबंध को जिस तरह आपसी व्यवहार व सहयोग मधुरता देता है, ठीक उसी तरह सुखी सैक्स भी संबंध को और प्रगाढ़ बनाता है.

‘माया’ जाल में फंसा पति

चित्रकूट जिले के गांव लोहदा का रहने वाला फूलचंद विश्वकर्मा कानपुर की एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में ट्रक ड्राइवर की नौकरी करता था. उस की मां और बड़े भाई का परिवार गांव में रहते थे. ट्रक ड्राइवर का पेशा ऐसा है, जिस में कई बार आदमी को लौटने में महीनोंमहीनों लग जाते हैं. इसी वजह से फूलचंद पिछले एक साल से गांव में रह रही बूढ़ी मां और भाई के परिवार से नहीं मिल सका था. समय मिला तो उस ने 5 जुलाई, 2018 को गांव जाने का फैसला किया.

फूलचंद तहसील राजापुर स्थित अपने गांव लोहदा पहुंचा तो उस की वृद्धा मां तो पुश्तैनी घर में मिल गई, लेकिन अलग रह रहा बड़ा भाई शिवलोचन और उस का परिवार घर में नहीं था. वह मां से मिला तो उस की आंखें भर आईं और वह उस के गले लग कर रो पड़ी. फूलचंद को लगा कि मां से एक साल बाद मिला है, इसलिए वह भावुक हो गई है. उस ने जैसेतैसे सांत्वना दे कर मां को चुप कराया और बड़े भाई शिवलोचन और उस के परिवार के बारे में पूछा.

उस की मां चुनकी देवी ने रोते हुए बताया कि पिछले 8 महीने से शिवलोचन का कोई पता नहीं है. बहू माया भी 7-8 महीने पहले दोनों बच्चों को ले कर अपने मायके चली गई थी. तब से वापस नहीं लौटी.

मां की बात सुन कर फूलचंद परेशान हो गया. उस ने इस बारे में मां से विस्तार से पूछा तो उस ने बताया कि 8 महीने पहले जब कई दिनों तक शिवलोचनदिखाई नहीं दिया तो उस ने और गांव वालों ने बहू माया से उस के बारे में पूछा.

माया ने बताया कि शिवलोचन अपनी नौकरी पर कर्वी चला गया है. इस के कुछ दिन बाद माया भी यह कह कर दोनों बच्चों के साथ मायके चली गई कि घर में राशन खत्म हो गया है. जब शिवलोचन लौट आएं तो खबर भिजवा देना, मैं आ जाऊंगी.

फूलचंद को मालूम था कि उस का भाई शिवलोचन कर्वी के एक जमींदार तेजपाल सिंह के खेतों में टै्रक्टर चलाने का काम करता था. जमींदार की गाडि़यां भी वही ड्राइव करता था. मां ने बताया कि उस ने शिवलोचन को कई बार फोन भी कराया था, लेकिन उस का फोन बंद था. मां ने आशंका व्यक्त करते हुए यह भी कहा कि शिवलोचन इतने महीनों तक कभी भी कर्वी में नहीं रहा, बीचबीच में वह आता रहता था.

फूलचंद इस बात को समझता था कि आदमी भले ही कितना भी व्यस्त क्यों न रहे, ऐसा नहीं हो सकता कि अपने परिवार की सुध ही न ले. संदेह की एक वजह यह भी थी कि भाई का हालचाल जानने के लिए फूलचंद ने खुद भी भाई के मोबाइल पर फोन किए थे, लेकिन उस का फोन हर बार बंद मिला था. उस वक्त उस ने यही सोचा था कि संभव है, भाई किसी ऐसी जगह पर हो, जहां नेटवर्क न मिलता हो.

संदेह पैदा हुआ तो फूलचंद उसी दिन गांव के 2 आदमियों को साथ ले कर कर्वी के जमींदार तेजपाल सिंह के पास गया. वहां उसे जो जानकारी मिली, उस ने फूलचंद की चिंता और बढ़ा दी. तेजपाल सिंह ने बताया कि शिवलोचन नवंबर 2017 में दीपावली के बाद से काम पर नहीं आया है.

उस के कई दिनों तक काम पर न आने की वजह से उन्होंने उस के मोबाइल पर फोन किया तो उस की बीवी माया ने फोन उठाया. उस ने कहा कि शिवलोचन ने उन की नौकरी छोड़ दी है, उसे कहीं दूसरी जगह ज्यादा पगार की नौकरी मिल गई है.

तेजपाल सिंह ने आगे बताया कि उन्होंने इस के बाद यह सोच कर फोन नहीं किया कि जब वह अपना बकाया वेतन लेने के लिए आएगा तो पूछेंगे कि अचानक नौकरी क्यों छोड़ दी.

तेजपाल सिंह के यहां से मिली जानकारी के बाद चिंता में डूबा फूलचंद उदास चेहरा लिए अपने गांव लौट आया. फूलचंद ने घर लौट कर भाई के बारे में गहराई से सोचा तो यह बात उस की समझ में नहीं आई कि भाई ने जब दूसरी जगह नौकरी कर ली थी तो माया भाभी ने गांव वालों और मां से यह क्यों कहा था कि वह कर्वी में अपने काम पर गया है.

फूलचंद ने शिवलोचन के साथसाथ अपनी भाभी माया को भी कई बार फोन किया था, लेकिन शिवलोचन की तरह माया का भी फोन बंद मिला था. फूलचंद की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर शिवलोचन कहां चला गया और 8 महीने से घर क्यों नहीं लौटा. ऊपर से उस का फोन भी बंद था.

आश्चर्य की बात यह थी कि उस की भाभी माया जब से अपने मायके गई थी, वापस नहीं लौटी थी. न ही उस ने किसी को फोन कर के कभी कुशलक्षेम पूछी थी. ऊपर से उस का फोन नहीं लग रहा था.

फूलचंद को अपने भाई शिवलोचन की चिंता सताने लगी तो वह भाई की खोजबीनमें जुट गया. फूलचंद की एक बड़ी बहन थी, सावित्री. उस की शादी चित्रकूट की मऊ तहसील में हुई थी. उस के पास शिवलोचन की ससुराल वालों का नंबर था.

फूलचंद ने फोन कर के बहन को बताया कि शिवलोचन पिछले कई महीनों से लापता है और माया अपने मायके गई है. दोनों में से किसी का फोन भी नहीं लग रहा. शिवलोचन के बारे में पता लगाने की सोच कर फूलचंद ने सावित्री से माया के पिता का नंबर ले लिया.

उस ने वह नंबर लगा कर जब माया के पिता से बात की तो उस ने बताया कि माया अपने दोनों बच्चों को ले कर 8 महीने पहले दीपावली के बाद उन के पास आई थी. लेकिन वह 2 महीना पहले दोनों बच्चों को उन के घर छोड़ कर यह कह कर गई थी कि शिवलोचन के बारे में जानकारी लेने लोहदा जा रही है, 2-4 दिन में आ जाएगी. लेकिन उस के बाद ना तो वह घर लौटी, न ही उस ने फोन कर के बच्चों की कुशलक्षेम पूछी.

माया के पिता ने जो कुछ बताया, वह चौंकाने वाला था. क्योंकि अभी तक तो फूलचंद इस भ्रम में था कि उस की भाभी माया अपने मायके में है, लेकिन जब पता चला कि माया अपने मायके से 2 महीना पहले ही कहीं चली गई है तो फूलचंद के माथे पर परेशानी की लकीरें और गहरा गईं.

गांव में जहां शिवलोचन का मकान था, फूलचंद की मां उस से कुछ दूर अपने पैतृक मकान में रहती थी. वहीं पर वह अपनी गुजरबसर के लिए चाय का ढाबा चलाती थी. शिवलोचन की पत्नी माया जब 7-8 महीने पहले बच्चों को ले कर मायके गई थी तो जाते वक्त घर का ताला लगा कर चाभी अपनी सास चुनकी देवी को दे गई थी. तभी से शिवलोचन का मकान बंद पड़ा था.

इसी दौरान शिवलोचन के पड़ोसी हुकुम सिंह ने उस से कहा कि 8 महीने पहले शिवलोचन ने उस का सेकेंड हैंड टीवी यह कह कर लिया था कि कुछ दिन में पैसे दे देगा. लेकिन टीवी लेने के कुछ दिन बाद ही शिवलोचन और उस की पत्नी पता नहीं कहां चले गए. उन्होंने न तो पैसे दिए, न टीवी लौटाया.

हुकुम सिंह ने फूलचंद से कहा कि शिवलोचन तो पता नहीं कब आएगा, इसलिए वह उस का टीवी निकाल कर उसे दे दे. फूलचंद ने अपनी मां चुनकी देवी से शिवलोचन के घर की चाभी ले कर ताला खोला तो अंदर के दोनों कमरों से तेज बदबू का झोंका आया. बंद कमरों के खुलने के कुछ देर बाद जब बदबू कम हुई तो फूलचंद ने हुकुम सिंह का टीवी उठा कर उसे दे दिया.

फूलचंद को लगा कि लंबे समय से मकान बंद था, जिस से सीलन और गंदगी की वजह से बदबू आ रही होगी. उस ने सोचा कि क्यों न दोनों कमरों की सफाई कर दी जाए. लेकिन जब वह उस कमरे की सफाई करने लगा, जिस में शिवलोचन और माया रहते थे तो कमरे के फर्श की कच्ची जमीन थोड़ी धंसी हुई दिखाई दी.

यह देख कर फूलचंद का मन शंका से भर उठा. क्योंकि वहां की जमीन को देख कर ऐसा लग रहा था, मानो कच्चे फर्श का वह हिस्सा अलग हो. उस जगह को गौर से देखने पर लगा, जैसे वहां कोई चीज दबाई गई हो.

पांव से दबाने पर वहां की जमीन नीचे की तरफ दब रही थी. गांव के कुछ लोगों को बुला कर फूलचंद के जमीन का वह हिस्सा दिखाया तो सब ने राय दी कि क्यों न जमीन खोद कर देख लिया जाए. लेकिन जमीन में ऐसीवैसी किसी चीज के दबे होने की आशंका से फूलचंद खुदाई करने से हिचक रहा था. लिहाजा उस ने सब से राय ली कि क्यों न पहले पुलिस को खबर कर दी जाए.

‘‘अरे भैया, तुम तो ऐसे डर रहे हो जैसे जमीन में खजाना गड़ा हो. अरे तुम्हारा घर है, तुम्हारी जमीन है. खोद कर देखो, जो कुछ भी होगा सामने आ जाएगा और अगर ऐसावैसा कुछ हुआ भी तो पुलिस को खबर कर देना.’’ कई लोगों ने एक राय हो कर कहा.

बात फूलचंद की समझ में आ गई. लिहाजा उस ने कमरे के उस हिस्से की फावड़े से खुदाई शुरू कर दी. 3 फुट गहरा गड्ढा खुद चुका था मगर कुछ भी नहीं निकला. लेकिन एक बात ऐसी थी, जिस की वजह से केवल फूलचंद ही नहीं, बल्कि गांव वालों का मन भी आशंका से भर उठा.

बात यह थी कि उस जगह की मिट्टी काफी नरम थी. मिट्टी की सतह वैसे नहीं चिपकी थी, जैसे आमतौर पर चिपकी होती है. इतना ही नहीं जैसेजैसे जमीन खोदी जा रही थी, गड्ढे में से बदबू आनी शुरू हो गई थी. छह इंच जमीन और खोदते ही फूलचंद की आशंका सच साबित हुई. जमीन के उस गड्ढे से कुछ हड्डियां मिली. इस के बाद दहशत में आ कर फूलचंद ने खुदाई रोक दी.

गांव वालों से बातचीत के बाद फूलचंद अपनी मां चुनकी देवी, पड़ोसी हुकुम सिंह, गांव के प्रधान, चौकीदार और कुछ अन्य लोगों को साथ ले कर थाना पहाड़ी पहुंचा. यह 7 जुलाई, 2018 की दोपहर की बात है. पहाड़ी थाने के एसएचओ इंसपेक्टर अरुण पाठक थाने में ही मौजूद थे.

एक साथ इतने सारे लोगों को आया देख पाठक ने उन से आने की वजह पूछी तो फूलचंद ने अपने भाई और भाभी के घर से गायब होने के बारे में बता कर घर में हुई खुदाई के दौरान मानव हड्डियों के निकलने की बात उन्हें बता दी.

इंसपेक्टर अरुण पाठक बोले, ‘‘अरे भाई, जब तुम ने इतना गड्ढा खोद ही दिया था तो थोड़ा सा और खोद लेते. कम से कम यह पता तो चल जाता कि वहां किसी जानवर की हड्डियां दबी हैं या इंसान की.’’

‘‘दरअसल, मेरे भाईभाभी का कुछ पता नहीं है, इसलिए हमें बड़ा डर लग रहा है. आप चल कर देख लीजिए.’’ फूलचंद ने इंसपेक्टर पाठक के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा.

इंसपेक्टर अरुण पाठक पुलिस टीम ले कर फूलचंद और उस के साथ आए गांव वालों के साथ लोहदा गांव में शिवलोचन के घर पहुंच गए. घर के बाहर पहले से ही काफी भीड़ जमा थी. इंसपेक्टर अरुण पाठक ने पहले से 2-3 फीट खुदे गड्ढे की थोड़ी और खुदाई कराई.

पहले से करीब साढे़ 3 फीट खुदे गड्ढे की थोड़ी और खुदाई कराई. करीब साढ़े 3 फीट खुदे गड्ढे की एक फीट और खुदाई हुई तो पूरा नरकंकाल निकला. नरकंकाल की गर्दन में रस्सी बंधी हुई थी, जो गली नहीं थी. ऐसा लग रहा था जैसे रस्सी से उस का गला दबाया गया हो.

चूंकि शव पूरी तरह कंकाल में तब्दील हो चुका था, इसलिए लग रहा था कि शव को कई महीने पहले दफनाया गया था. मामले की गंभीरता को समझते हुए इंसपेक्टर अरुण पाठक ने इलाके के क्षेत्राधिकारी शिवबचन सिंह और नायब तहसीलदार को मौके पर बुलवा लिया.

दोनों अधिकारियों ने बात जानने के बाद नरकंकाल को सावधानीपूर्वक गड्ढे से बाहर निकलवा लिया. इस दौरान चित्रकूट जिले के पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार झा भी फोरेंसिक टीम को ले कर लोहदा पहुंच गए.

कंकाल किसी आदमी का था, यह ढांचे से साबित हो रहा था. कंकाल की पहचान के लिए गड्ढे से कोई ऐसी चीज नहीं निकली थी, जिसे पहचान कर कोई यह बता पाता कि कंकाल किस का है. अलबत्ता फूलचंद व उस की मां चुनकी देवी ने कंकाल को गौर से देखने के बाद आशंका जताई कि कंकाल शिवलोचन का हो सकता है.

इंसपेक्टर अरुण पाठक ने फूलचंद से पूछा, ‘‘तुम यह बात इतने विश्वास से कह रहे हो कि कंकाल शिवलोचन का ही है?’’

‘‘सर, मेरे भाई के बाए हाथ के पंजे में अंगूठा नहीं था. इस कंकाल के भी बाएं हाथ में सिर्फ चार अंगुलियों की हड्डियां हैं. अंगूठे की हड्डी गायब है. मेरे भाई के बाएं हाथ का अंगूठा एक दुर्घटना में पूरी तरह कट गया था.’’

फूलचंद ने विश्वास का कारण बताया तो इंसपेक्टर पाठक को भी लगा कि संभव है, कंकाल फूलचंद के भाई शिवलोचन का ही हो. वजह यह थी कि शिवलोचन काफी दिनों से गायब था. लेकिन कंकाल शिवलोचन का ही है, इस की वैज्ञानिक रूप से पुष्टि डीएनए टेस्ट होने पर ही हो सकती थी.

पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार झा के आदेश पर पुलिस ने नरकंकाल का पंचनामा भरवा कर उसे डीएनए टेस्ट के लिए भिजवाने की औपचारिकता पूरी की. डीएनए मिलान के लिए फोरेंसिक टीम के डाक्टरों ने शिवलोचन की मां चुनकी देवी का ब्लड सैंपल ले लिया.

पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार झा ने सीओ शिववचन सिंह को निर्देश दिया कि वह चुनकी देवी और उन के बेटे फूलचंद से शिवलोचन के गायब होने की शिकायत ले कर मुकदमा दर्ज करें. साथ ही शिवलोचन की लापता पत्नी माया और उस के दोनों बच्चों का भी पता लगाए.

पहाड़ी थाने के प्रभारी इंसपेक्टर अरुण पाठक ने शुरू में इस मामले को जितने सहज ढंग से लिया था, केस उतना ही पेचीदा निकला. यह जानकर उन्हें और भी ज्यादा आश्चर्य हुआ कि 2 महीने पहले माया अपने बच्चों को मां के पास छोड़ कर कहीं चली गई थी.

इंसपेक्टर अरुण पाठक ने शिवलोचन और माया के संबंधों के बारे में गहराई से पता लगाने के लिए गांव के लोगों और शिवलोचन के परिवार के सभी सदस्यों से एकएक कर के पूछताछ करनी शुरू कर दी. उन लोगों से मिली जानकारी के बाद यह साफ हो गया कि शिवलोचन के घर में जो नरकंकाल मिला वह शिवलोचन का ही है.

शिवलोचन के घर वालों और लोहदा गांव के लोगों से पूछताछ के बाद इंसपेक्टर अरुण पाठक की समझ मेंआ गया कि शिवलोचन के रहस्यमय ढंग से गायब होने और उस की पत्नी के लापता हो जाने के पीछे क्या राज है.

अरुण पाठक ने फूलचंद से तहरीर ले कर 7 जुलाई की रात को ही पहाड़ी थाने में भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत शिवलोचन की पत्नी माया और लोहदा गांव के टुल्लू लोध, जिसे रज्जन भी कहते थे, के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करवा दिया.

पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार झा के निर्देश पर एसएचओ अरुण पाठक ने मुकदमे की जांच का काम खुद ही शुरू कर दिया. सहयोग के लिए उन्होंने एक पुलिस टीम का गठन किया, जिस में सिपाही मुकद्दर सिंह, वीरेंद्र सिंह, रामअजोर सरोज और महिला सिपाही रुचि सिंह को शामिल किया गया.

पुलिस अधीक्षक के आदेश पर क्राइम व साइबर सेल की टीम भी थाना पहाड़ी पुलिस की मदद में लग गई. थानाप्रभारी अरुण पाठक ने सब से पहले टुल्लू लोध उर्फ रज्जन के पिता लिसुरवा और भाई लल्लन को हिरासत में ले कर उन से यह जानने का प्रयास किया कि टुल्लू इन दिनों कहां है.

पूछताछ में पता चला कि वह मुंबई में है. पुलिस ने जब कड़ी पूछताछ की तो उस के घर वालों ने टुल्लू का मोबाइल नंबर भी दे दिया. अरुण पाठक ने टुल्लू तक पहुंचने के लिए उस के पिता की उस से बात कराई.

बात से पहले ही मोबाइल फोन का स्पीकर औन करवा दिया गया था. उन्होंने लिसुरवा को हिदायत दे दी थी कि वह सामान्य ढंग से बात करे और टुल्लू को जरा भी अहसास न होने दे कि बात पुलिस की मौजूदगी में हो रही है.

इंसपेक्टर अरुण पाठक की टुल्लू के पिता की उस से बातचीत कराने की तरकीब काम कर गई. उन्हें पता चल गया कि टुल्लू मुंबई में है और माया भी उसी के साथ है. टुल्लू से हुई बातचीत में अरुण पाठक को यह भी पता चला कि टुल्लू अपने पिता से मिलने और उन की आर्थिक मदद के लिए आना चाहता है. उस ने अपने पिता से कहा था कि 15 जुलाई को वह कर्वी बस अड्डे पर पहुंच जाएं.

अरुण पाठक ने लिसुरवा तथा उस के परिवार के सदस्यों को 15 जुलाई तक पुलिस की निगरानी में रहने का निर्देश दिया. उन के मोबाइल फोन भी इंसपेक्टर पाठक ने अपने कब्जे में ले लिए, जिस से वे लोग टुल्लू को सतर्क न कर सकें. इस के बाद इंसपेक्टर पाठक और उन की पुलिस टीम बेसब्री से 15 जुलाई का इंतजार करने लगे.

15 जुलाई की सुबह टुल्लू ने अपने भाई लल्लन के मोबाइल पर फोन किया. पुलिस ने अपनी निगरानी में उस की बात कराई. टुल्लू ने लल्लन को फोन पर बताया कि वह माया के साथ चित्रकूट रेलवे स्टेशन पर है और दोपहर एक बजे तक कर्वी बसअड्डे पर पहुंचेगा. पाठक ने लल्लन व उस के पिता लिसुरवा को साथ लिया और पुलिस टीम के साथ कर्वी बस अड्डे के आसपास पुलिस का जाल बिछा दिया.

पुलिस ने लल्लन व उस के पिता को बस अड्डे के पास अकेले छोड़ दिया. सादे कपड़ों में 2 पुलिस वाले दोनों के आसपास मंडराते रहे. करीब एक बजे कर्वी बस अड्डे के टिकट काउंटर के पास बेसब्री से बेटे का इंतजार कर रहे लिसुरवा के पास एक युवक व महिला पहुंचे. आगंतुक युवक ने जब लिसुरवा के पैर छुए तो इंसपेक्टर पाठक समझ गए कि वही टुल्लू है.

नजरें गड़ाए बैठी पुलिस टीम ने उन लोगों को चारों ओर से घेर लिया. पूछताछ में पता चला कि युवक टुल्लू लोध उर्फ रज्जन राजपूत ही है और उस के साथ जो खूबसूरत सी महिला है, वह माया है. पुलिस टुल्लू और माया को उस के घर वालों के साथ थाना पहाड़ी ले आई. टुल्लू लोध और माया को हिरासत में लिए जाने की खबर उच्चाधिकारियों को भी मिल चुकी थी.

टुल्लू तथा मायादेवी से पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार झा और क्षेत्राधिकारी शिवबचन सिंह के समक्ष पूछताछ की गई. दोनों से पूछताछ में शिवलोचन हत्याकांड की हैरान करने और दिल दहलाने वाली कहानी सामने आई.

पूछताछ में यह बात साफ हो गई कि शिवलोचन के घर से जो नरकंकाल बरामद हुआ था, वह शिवलोचन का ही था. एक रात माया और टुल्लू ने उस की हत्या कर के लाश को घर में ही जमीन में गाड़ दिया था.

लोहदा गांव में रहने वाला 27 वर्षीय टुल्लू लोध उर्फ रज्जन राजपूत मकानों में टाइल्स लगाने का काम करता था. उस के परिवार में मातापिता के अलावा एक भाई व दो बहनें थीं. बहनों की शादी हो चुकी थी. जबकि छोटा भाई लल्लन अभी कुंवारा था. कई साल पहले टुल्लू की दोस्ती गांव के ही शिवलोचन से हो गई थी.

दोनों ही शराब पीने के शौकीन थे. सो दोस्ती की शुरुआत भी शराब के ठेके से हुई. टुल्लू और शिवलोचन ने एक बार साथ बैठ कर शराब पी तो जल्द ही उन की दोस्ती पारिवारिक संबंधों में तब्दील हो गई. दोनों एकदूसरे के घर आनेजाने लगे. कई बार दोनों का खानापीना भी साथसाथ होता था.

दरअसल, टुल्लू की शिवलोचन से गहरी दोस्ती की असली वजह उस की खूबसूरत और जवान पत्नी माया थी, जिसे वह भाभी कह कर बुलाता था. माया अल्हड़ और चंचल स्वभाव की औरत थी. टुल्लू को माया पहली ही नजर में भा गई थी. उस ने माया की नजरों में दिखाई देने वाली प्यास को पढ़ लिया था.

टुल्लू का शिवलोचन के घर आनाजाना शुरू हुआ तो जल्दी ही यह सिलसिला शिवलोचन की अनुपस्थिति में भीचलने लगा.एक तरफ माया की जवानी उफान मार रही थी, जबकि दूसरी ओर उस का पति शिवलोचन काफीकाफी दिनों तक घर से दूर रहता था. माया उम्र के उस दौर से गुजर रही थी जब औरत को हर रात मर्द के साथ की जरूरत होती है.

टुल्लू ने पति से दूर रह रही और पुरुष संसर्ग के लिए तरसती माया के आंचल में अपने प्यार और हमदर्दी की बूंदें उडे़ली तो माया निहाल हो गई. जल्दी ही दोनों के बीच नाजायज रिश्ते बन गए. माया, टुल्लू के प्यार में ऐसी दीवानी हुई कि दोनों के बीच रोज शारीरिक संबंध बनने लगे. शिवलोचन काफीकाफी दिनों तक घर के बाहर रहता था. रोकटोक करने वाला कोई नहीं था.

लेदे कर घर में एक सास थी जो अकसर माया के पास आ कर रहने लगती थी. लेकिन टुल्लू से संबंध बनने के बाद माया ने सास चुनकी देवी से भी लड़ाईझगड़ा शुरू कर दिया था, फलस्वरूप सास उस के मकान पर न आ कर ज्यादातर अपने पैतृक घर में रहती थी. माया ने ऐसा इसलिए किया था ताकि टुल्लू रात में उस के पास बेरोकटोक आ जा सके.

मूलरूप से ग्राम देवरी पंधी, जिला बिलासपुर छत्तीसगढ़ की रहने वाली माया की पहली शादी 13 साल पहले उस के मायके में ही एक युवक से हुई थी. लेकिन शादी के एक साल बाद ही पति ने गलत चालचलन का आरोप लगा कर उसे छोड़ दिया था. 2008 में शिवलोचन अपने एक परिचित के साथ किसी काम से माया के गांव देवरी पंधी गया था.

वहां बातोंबातों में किसी ने जब उस से पूछा कि उस ने शादी क्यों नहीं की तो शिवलोचन ने बता दिया कि अभी तक कोई अच्छी लड़की नहीं मिली. उस परिचित ने शिवलोचन से कहा कि अगर वह कुछ रुपए खर्च करे तो वह अपने गांव की एक तलाकशुदा लड़की से उस की शादी करा देगा.

शिवलोचन की उम्र बढ़ रही थी. उसे भी एक जीवनसाथी की जरूरत थी. वह पैसा खर्चने को तैयार हो गया तो उस परिचित ने शिवलोचन को माया के घर ले जा कर उस के परिवार व माया से मिलवा दिया. शिवलोचन को माया पसंद आ गई. माया के घर और परिवार की माली हालत ठीक नहीं थी.

लिहाजा बिचौलिया बने परिचित ने माया के पिता को कुछ रकम दे कर जब शिवलोचन का माया से विवाह करने की बात चलाई तोवह तुरंत राजी हो गया. इस के बाद चट मंगनी पट विवाह की रस्म अदा कर के शिवलोचन माया को पत्नी बना कर अपने घर ले आया. वक्त हंसीखुशी गुजरने लगा. माया से उसे 2 बेटे हुए प्रमांशु (6) और 8 वर्षीय हिमांशु.

शिवलोचन काफीकाफी दिनों तक परिवार से दूर रह कर इसलिए जी तोड़ मेहनत करता था ताकि पत्नी व बच्चों का भविष्य संवार सके. उसे क्या पता था कि उस की गैरहाजिरी में माया उसी के दोस्त के साथ रंगरेलियां मनाती है.

बात पिछले साल दीवाली के बाद तब बिगड़ी, जब नवंबर में शिवलोचन छुट्टी ले कर घर आया. घर में उस के हाथ एक ऐसा फोटो लगा, जिसे देख कर उस का माथा ठनक गया. दरअसल, फोटो माया और टुल्लू का था, जिस में दोनों एक साथ थे.

शिवलोचन ने उस फोटो को देखने के बाद पहली बार माया पर हाथ उठाया. उसी शाम जब टुल्लू उस के घर आया तो उस ने उस की भी पिटाई कर दी.बात इतनी बढ़ी कि मामला थाने तक जा पहुंचा. गांव के बड़े बुजुर्ग और समझदार लोग भी थाने पहुंचे.

दरअसल, काफी दिनों से लोग शिवलोचन से शिकायत कर रहे थे कि उस की गैरमौजूदगी में टुल्लू उस के घर आताजाता है और वह अकसर रात को भी उस के घर में ही रहता है. शिवलोचन ने जब यह बात माया से पूछी तो उस ने ऐसे आरोपों को गलत बताया.

लेकिन जब शिवलोचन ने दोनों की एक साथ फोटो देखी तो वह समझ गया कि गांव के लोग जो कहते हैं, वह गलत नहीं है. बहरहाल, उस समय पुलिस ने बड़े बुजुर्गों के बीच बचाव के बाद शिवलोचन और टुल्लू में समझौता करा दिया. साथ ही टुल्लू को माया से न मिलने और उस के घर न जाने की हिदायत भी दी. लेकिन इस के बावजूद टुल्लू और माया का मिलना बदस्तूर जारी रहा.

काम के सिलसिले में शिवलोचन को अकसर घर से बाहर रहना पड़ता था जबकि माया को टुल्लू के संग साथ की जो लत लग चुकी थी, उस ने दोनों को एकदूसरे से दूर नहीं होने दिया.

दूसरी ओर शिवलोचन ने माया और टुल्लू की निगरानी शुरू कर दी थी. उस ने गांव के अपने एक दो हम उम्र दोस्तों से कह दिया था कि वे माया और टुल्लू पर नजर रखें.

जब उसे पता चला कि दोनों के बीच मिलनाजुलना अब भी बदस्तूर जारी है तो उस ने माया से मिल कर इस समस्या को खत्म करने का फैसला किया. इस के लिए वह 4 नवंबर को अपने घर आया. उस ने माया और टुल्लू के मेलजोल की बात को ले कर पत्नी की पिटाई कर दी. शाम को वह घर में ही शराब पी कर सो गया.

माया उसी दिन से शिवलोचन ने नफरत करने लगी थी, जब उस ने पहली बार दोनों का फोटो देखने के बाद तमाशा किया था और उस की पिटाई भी कर दी थी. तभी से गांव भर की औरतें माया को बदचलन औरत की नजर से देखने लगी थी. उस दिन शिवलोचन की मार ने आग में घी का काम किया. उस ने शिवलोचन के शराब पी कर गहरी नींद में सोते ही टुल्लू को फोन कर के अपने घर बुला लिया.

उस ने टुल्लू से कहा कि अगर वह उसे सचमुच प्यार करता है तो आज रात ही शिवलोचन से उस के अपमान का बदला लेने के लिए उसे जान से मार दे. टुल्लू तो माया का दीवाना था. उस ने सोचा कि शिवलोचन मर जाएगा तो माया सदा के लिए उस की हो जाएगी. यही सोच कर उस ने घर में पड़ी लाठी से सोते हुए शिवलोचन के सिर पर एक के बाद एक कई प्रहार किए, जिस से वह चारपाई पर ही ढेर हो गया.

इस काम में माया ने भी उस का साथ दिया. इस के बावजूद माया इत्मीनान कर लेना चाहती थी कि शिवलोचन मरा है या नहीं. उस ने टुल्लू के साथ मिल कर कमरे में पड़ी जूट की रस्सी का फंदा बनाया और शिवलोचन के गले में डाल कर काफी देर तक खींचा. शिवलोचन के मरने के बाद समस्या थी लाश को ठिकाने लगाने की. क्योंकि लाश को घर से बाहर ले जाने से पकडे़ जाने का डर था.

माया ने सुझाव दिया कि शिवलोचन के शव को कमरे में ही जमीन खोद कर गाड़ दिया जाए. इस के बाद उन्होंने ऐसा ही किया. टुल्लू ने फावड़े से कमरे के एक हिस्से के कच्चे फर्श को 5 फुट गहरा खोदा और शिवलोचन के गले में बंधी रस्सी समेत लाश को गड्ढे में धकेल दिया. टुल्लू ने खून से सने कपड़े लाश के ऊपर ही डाल दिए. लाश को गड्ढे में डालने के बाद माया और टुल्लू ने उस पर मिट्टी डाल दी.

रात में ही माया ने उस जगह को अच्छी तरह से लीप दिया, ताकि किसी को गड्ढा खोदे जाने की बात का पता न चल सके. उस रात शिवलोचन की हत्या करने से पहले माया और टुल्लू ने कुछ खायापीया नहीं था. लिहाजा लाश को घर में ही दफनाने के बाद माया ने चूल्हा जला कर खाना बनाया. जिस लाठी से शिवलोचन की हत्या की गई थी, माया ने उसे चूल्हे में जला कर रोटियां सेंकी.

इस के बाद दोनों ने चारपाई उसी जगह बिछाई, जहां शिवलोचन के शव को दफनाया था. उस रात शिवलोचन ने जिस बोतल से शराब पी थी, उस में कुछ शराब बची थी. टुल्लू और माया ने बची हुई शराब बराबरबराबर पी, फिर दोनों ने साथसाथ खाना खाया.

खाना खाने के बाद दोनों लाश दफनाने वाली जगह पर बिछी चारपाई पर सो गए. सोने से पहले दोनों ने एकदूसरे के जिस्म की प्यास बुझा कर शिवलोचन के मरने का जश्न मनाया.

शिवलोचन की हत्या को अंजाम देने के बाद माया करीब 15 दिन तक उसी घर में रही. इस दौरान टुल्लू हर रात उस के पास आता. दोनों एक साथ खाना खाते और उसी चारपाई पर रंगरेलियां मनाते, जो उन्होंने शिवलोचन की लाश दफनाने के बाद फर्श की जमीन लीप कर उस के ऊपर डाली थी.

शिवलोचन की हत्या के बाद जब गांव के लोग या माया की सास चुनकी देवी माया से शिवलोचन के बारे में पूछते तो वह कहती कि कर्वी में काम चल रहा है, वहीं रहते हैं.

करीब 15 दिन बाद जब घर का सारा राशन खत्म हो गया तो माया के पास वहां रहने की कोई वजह नहीं बची. इस दौरान माया और टुल्लू ने आपस में तय कर लिया था कि उन्हें आगे की जिंदगी किस तरह बितानी है. इसलिए 15 दिन बाद माया अपने दोनों बच्चों को ले कर मायके चली गई.

जाने से पहले उस ने अपनी सास से खूब लड़ाई की और ताना दिया कि उस का बेटा परिवार का ख्याल नहीं रखता. घर में राशन तक नहीं है इसलिए अपनी मां के घर जा रही हूं. जब शिवलोचन घर आए तो मुझे लेने आ जाएं.

उसी दिन माया ने घर की चाभी भी अपनी सास को दे दी थी. दरअसल, वह अच्छी तरह से जानती थी कि सास चुनकी देवी ढाबे वाले अपने पैतृक घर को छोड़ कर उस के घर में रहने के लिए नहीं जाएगी. वजह यह थी कि एक तो वह गांव में काफी पीछे और सुनसान जगह पर था, दूसरे वहां उस की देखभाल करने वाला भी कोई नहीं था.

माया जानती थी कि शिवलोचन तो अब किसी को मिलेगा नहीं, उस का शव भी गल जाएगा. समय के साथ शिवलोचन की मौत भी रहस्यमय गुमशुदगी बन कर रह जाएगी. माया के गांव से जाने के एक 2 दिन बाद टुल्लू भी मुंबई चला गया था और वहां बिल्डिंगों में टाइल्स लगाने का काम करने लगा था.

अपनी ससुराल लोहदा से जाने के बाद माया मई के महीने तक अपने मातापिता के पास रही. उस ने परिवार वालों को बताया कि बिना बताए शिवलोचन कहीं चला गया है. अपने गांव पहुंच कर माया ने अपना मोबाइल नंबर भी बदल दिया था. शिवलोचन के मोबाइल को उस ने उस की हत्या के बाद ही तोड़ कर फेंक दिया था. उस का नया नंबर सिर्फ टुल्लू के पास था, जिस पर दोनों की रोज बातें होती थीं.

टुल्लू अकसर अपने गांव में फोन कर के शिवलोचन को ले कर हो रही गतिविधियों की जानकारी लेता रहता था. जब कई महीने बीत गए और माया को लगा कि अब मामला ठंडा हो गया है तो उस ने मई महीने में अपने पिता से कहा कि वह पति के बारे में जानकारी करने के लिए चित्रकूट जा रही है, जल्दी ही लौट आएगी.

अपने बच्चों को छोड़ कर माया कर्वी आ गई, जहां पहले से ही टुल्लू उसे लेने के लिए आया हुआ था. वहां से वे दोनों मुंबई चले गए और पतिपत्नी की तरह साथ रहने लगे. माया की योजना थी कि एक दो महीने का वक्त और गुजरने के बाद अपने दोनों बच्चों को भी ले आएगी. लेकिन उस से पहले ही माया व टुल्लू पुलिस के हत्थे चढ़ गए.

पुलिस ने माया व टुल्लू से पूछताछ के बाद वह फावड़ा भी बरामद कर लिया, जिस से शिवलोचन की हत्या के बाद उस का शव दफनाने के लिए गड्ढा खोदा था. चूंकि महीनों गुजर जाने के बाद भी किसी को कोई शक नहीं हुआ था, इसलिए माया और टुल्लू को उम्मीद थी कि अब शिवलोचन की हत्या का भेद नहीं खुल पाएगा.

दरअसल शिवलोचन के घर वालों और गांव के लोगों से पूछताछ के बाद जब इंसपेक्टर अरुण पाठक को पता चला था कि माया और गांव के टुल्लू के बीच लंबे अर्से से न केवल अवैध संबंध थे बल्कि इन्हीं संबंधों के चलते शिवलोचन और टुल्लू में मारपीट भी हुई थी, तभी पाठक को शक हो गया था कि हो न हो शिवलोचन की हत्या में माया व टुल्लू का ही हाथ हो.

क्योंकि माया तो गांव से चली ही गई थी, कुछ दिन बाद टुल्लू भी गांव से गायब हो गया था. इंसपेक्टर अरुण पाठक ने माया व टुल्लू से पूछताछ के बाद दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. इसी दौरान पुलिस को शिवलोचन की डीएनए रिपोर्ट भी मिल गई, जिस से स्पष्ट हो गया कि शिवलोचन के घर में मिला नरकंकाल उसी का था.

– कथा अभियुक्तों से पूछताछ, परिजनों द्वारा पुलिस को दी गई जानकारी पर आधारित

विवाहेतर संबंध

इंडियन पीनल कोड यानी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विवाहिता स्त्री के साथ सहमति से  बनाए संबंध को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है. 1860 के इस कानून में यह बड़ा बदलाव माना जा रहा है और समलैंगिक कानून के बाद इसे सामाजिक मील का पत्थर कहा जा रहा है.

कोर्ट के इस निर्णय के आलोचकों का कहना है कि इस से औरतों में व्यभिचार बढ़ जाएगा, भारतीय संस्कृति नष्ट हो जाएगी, नैतिकता समाप्त हो जाएगी, स्त्रीपुरुष सड़कों पर संभोग करते नजर आएंगे. प्रशंसक खुश हैं कि औरतों को पति की संपत्ति मानने वाला यह कानून समाज के चेहरे पर बड़ा काला धब्बा था जिस पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दी गई है.

समलैंगिकता और व्यभिचार यानी एडल्ट्री के कानूनों को दशकों पहले समाप्त कर देना चाहिए था और यह काम संसद का था. संसद और उस में बैठी पार्टियों की रीढ़ की हड्डी इतनी कमजोर है कि वे सामाजिक हितों को बराबरी देने वाले कानूनों को छूने से ही डरती हैं, वे उन पर विचार तक करने को तैयार नहीं होतीं.

भारत के कानून में एडल्ट्री के अपराध होते हुए भी इस से जुड़े मामले बहुत कम दर्ज होते थे. इस में इक्कादुक्का ही सजा हुई होगी. यह अधिकार भी केवल पति को था, पत्नी को नहीं. शिकायत पति ही कर सकता था. इस का इस्तेमाल तभी होता था जब पत्नी खुल्लमखुल्ला घर छोड़ कर चली जाए और किसी के साथ रहने लगे. उस के किसी से यौन संबंध हैं, यह साबित करना कठिन होता था पर मुकदमा चल सकता था.

वैसे हमारी संस्कृति में ऐसे मामलों पर परपुरुष नहीं, स्त्री दोषी होती थी. परशुराम ने इसी आरोप में पिता के कहने पर मां को भी मार डाला था और उन 4 बड़े भाइयों को भी जिन्होंने दोषी मां को मारने से इनकार कर दिया था. अहल्या का इंद्र से संबंध बना तो सजा इंद्र को नहीं, अहल्या को मिली थी. एक तरह से 1860 का कानून तो महान सुधारक ही था. वह भारतीय संस्कृति की रीढ़ पर हमला करने वाला था कि पत्नी इस मामले में अपराधी नहीं. 1860 से पहले तो शायद औरतों को मृत्युदंड दे दिया जाता होगा जो स्मृतियों का कानून था.

कोर्ट के ताजा कदम से अब कोई फर्क पड़ेगा, जरूरी नहीं. परपुरुष से प्रेम हो, तो भी शारीरिक संबंध बनाना हंसीखेल नहीं. न तो सही जगह मिलती है, न लोग पड़ोसियों की आंखों से बच पाते हैं. तलाक का हक तो पति के पास इस फैसले के पहले से ही है और बाद में भी.

शारीरिक संबंधों को सहज लेना आसान नहीं. हम वे हैं जो हर समय गालियों में यौन संबंधों की बात करते हैं और जहां कोई कमजोर मिली, उसे दबोच लेते हैं. पर कानूनों में और भाषणों में महानता की बात करते रहते हैं.

दो एक्ट्रेस ने शाहरुख को किया किस फिर साफ की लिपस्टिक

शाहरुख खान, रानी मुखर्जी और काजोल की फिल्म  “कुछ कुछ होता है” को रिलीज हुए 20 साल हो गए हैं. इस मौके पर फिल्म के न‍िर्देशक करण जौहर ने मुंबई में पार्टी रखी थी. इस पार्टी में नेहा धूप‍िया, जाह्नवी कपूर, जोया अखतर, ईशान खट्टर, श्वेता बच्चन, सिद्धार्थ कपूर और करीना कपूर समेत कई बड़े सितारों ने हिस्सा लिया.

इस पार्टी के कई फोटोज सोशल मीडिया पर धूम मचा रहे हैं. एक फोटो वायरल हो रहा है, इस फोटो में शाहरुख, काजोल और रानी मुखर्जी एक साथ पोज देते नजर आ रहे हैं. दोनों एक्ट्रेस शाहरुख खान को किस भी करती हैं और फिर लिपस्टिक के निशान को खुद अपने हाथों साफ कर देती हैं.

bollywood kuch kuch hota hai grand party

आपको बता दे, इस फिल्म में शाहरुख खान, काजोल और रानी मुखर्जी की बॉन्डिंग को दिखाया गया था, जिससे इस फिल्म को खूब सरहना मिली थी. वास्तविक जीवन में भी तीनों दोस्त हैं. इस फिल्म के बाद काजोल और शाहरुख की जोड़ी हिट हो गई थी. दोनों ने साथ में कई फिल्मों में एक साथ काम भी किया.

आपको बता दें यह फिल्म फिल्म 16 अक्टूबर 1998 में रिलीज हुई थी. उस वक्त बॉक्स ऑफिस पर ये फिल्म ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी. फिल्म के लिए शाहरुख खान को बेस्ट एक्टर और काजोल को बेस्ट एक्ट्रेस का अवॉर्ड मिला था. सलमान खान और रानी मुखर्जी को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का खिताब दिया गया था.

बधाई हो : हास्य व भावनाआें से ओतप्रोत बेहतरीन फिल्म

क्या युवा व टीनएजर बेटे के माता पिता को रोमांस करने, प्यार करने व तीसरी बार माता पिता बनने का हक नहीं होता, क्या उनका यह कृत्य उन्हें शर्मिंदा करने वाला कृत्य है? क्या अधेड़ उम्र के दंपति को यौन संबंध नहीं बनाने चाहिए? इन मूलभूत सवालों के साथ परिवारिक रिश्तों पर बनी एक खूबसूरत फिल्म है – ‘‘बधाई हो’’.

फिल्म ‘‘बधाई हो’’ की कहानी मेरठ से दिल्ली आकर बसे एक मध्यमवर्गीय कौशिक परिवार के इर्द गिर्द घूमती है. इस परिवार के मुखिया जीतेंद्र कौशिक (गजराज राव) अपनी वृद्ध मां (सुरेखा सीकरी), पत्नी प्रियंवदा उर्फ बबली (नीना गुप्ता), पच्चीस वर्ष के युवा बेटे नकुल (आयुष्मान खराना) व बारहवीं कक्षा में पढ़ रहे छोटे बेटे गूलर के साथ रह रहे हैं. जितेंद्र कौशिक रेलवे में टीसी हैं. जबकि नकुल एक कारपोरेट कंपनी में नौकरी करने के साथ ही अपनी सहकर्मी रेनी (सान्या मल्होत्रा) के साथ रोमांस कर रहा है.

film-review-and-story-badhaai-ho

नकुल व रेनी जल्द शादी करने की योजना बना रहे हैं. सब बहुत खुश हैं. अचानक एक दिन पता चलता है कि नकुल की मां प्रियंवदा तीसरी बार मां बनने वाली हैं. इस खबर से सबसे ज्यादा शर्मिंदगी नकुल को महसूस होती है. उसे लगता है कि जब उसे शादी कर पिता बनने के बारे में सोचना चाहिए, तब उसके माता पिता पुनः बच्चा पैदा कर रहे हैं. गूलर भी नाखुश है. नकुल की दादी (सुरखा सीकरी) तो अपने हिसाब से बहू को काफी ताने देती हैं कि अब परिवार व रिशतेदारों का किस तरह से सामना करेंगे? कल तक नकुल अपने जिन दोस्तों का मजाक बनाया करता था, उनसे दूर हो जाता है. वह रेनी से भी मिलना बंद कर देता है. आफिस भी नही जाता. घर का माहौल बहुत तनावपूर्ण हो जाता है. मगर रेनी, नकुल से मिलती है और वह कहती है कि इसमें कुछ भी बुरा नहीं है.

मेरठ में नकुल की बुआ की बेटी शानू की शादी है. पर शर्मिंदगी के चलते नकुल व गूलर मेरठ नहीं जाते हैं. मेरठ में शादी संपन्न होने के बाद जब जीतेंद्र कौशिक की पत्नी प्रियंवदा से कहती है कि वह संस्कारी नहीं है, तो यह सुनकर दादी फट पड़ती है. फिर दादी कहती है कि उनकी बहू प्रियंवदा संस्कारी व सुशील है. उसी ने उनकी बीमारी के वक्त सेवा की और वह उसके तीसरी बार मां बनने से खुश हैं.

film-review-and-story-badhaai-ho

इधर दिल्ली में जब रेनी अपनी मां को बताती है कि नकुल की मां इस उम्र में मां बनने वाली हैं, तो रेनी की मां नकुल को अच्छा लड़का बताते हुए नकुल के परिवार को जाहिल बताकर कई अपशब्द कह देती है. यह सुनकर नकुल बर्दाश्त नहीं कर पाता. नकुल, रेनी की मां को जवाब देते हुए अपने परिवार को एक प्यारा संस्कारी मध्यमवर्गीय परिवार बताता है. इसी बात पर रेनी व नकुल के बीच रिश्ता खत्म हो जाता है. अब नकुल घर आकर अपनी मां व पिता से माफी मांगता है. उसे अहसास होता है कि उसके माता पिता ने कुछ भी गलत नहीं किया है.

फिर कहानी आगे बढ़ती है. अंत में प्रियंवदा एक बेटी को जन्म देती है. रेनी व नकुल का भी रिश्ता जुड़ जाता है. जहां तक अभिनय का सवाल है तो इंटरवल से पहले पूरी फिल्म परिवार की दादी यानीकि सुरेखा सीकरी की है. तो इंटरवल के बाद पूरी फिल्म आयुष्मान खुराना की है. सुरेखा सीकरी ने हर भारतीय परिवार में पाई जाने वाली दबंग दादी को जिस तरह अपने अभिनय से जीवंत किया, उसके चलते बच्चे से बूढे सभी उनके अभिनय के दीवाने हो जाएंगे.

film-review-and-story-badhaai-ho

यदि इस फिल्म के लिए सुरेखा सीकरी को पुरस्कार मिल जाए, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. वह एक ऐसी दबंग सास व मां हैं जो कि बहू, बेटी व बेटे सहित पूरे परिवार को धमकाने का दम रखती हैं.
‘विकी डोनर’, ‘दम लगा के हाईसा’, ‘शुभ मंगल सावधान’ जैसी सामजिक टैबू के विषयों पर बनी फिल्मों में अभिनय कर चुके आयुष्मान खुराना इस फिल्म में नकुल के किरदार के लिए सर्वाधिक सही रहे.

उनहोंने साबित कर दिखाया कि वह अभिनय में इतना सक्षम हैं कि दर्शक पंद्रह दिन के अंतराल में उन्हें दो दो फिल्मों में देखना चाहेगा. बड़ी उम्र के युवा बेटे की मौजूदगी में तीसरी बार मां बनने की शर्मिंदगी के भाव चेहरे पर लाकर नीना गुप्ता ने खुद को पुनः बेहतरीन अदाकारा साबित कर दिखाया. गजराज राव भी अपने किरदार में बेहतर लगे हैं. सान्या मल्होत्रा ने भी जानदार अभिनय किया है. बाकी कलाकार भी ठीक हैं. फिल्म ‘‘बधाई हो’’ के पटकथा व संवाद लेखक बधाई के पात्र हैं.

इन्होंने एक अति संजीदा विषय पर बहुत ही खूबसूरत पटकथा लिखी है. फिल्म के संवाद हंसाते हैं. उन्होंने दिल्ली और मेरठ की बोली, रहन सहन व पारिवारिक माहौल को बेहतर तरीके से गढ़ा है. मगर इंटरवल से पहले फिल्म को कसा जाना चाहिए था. इंटरवल के बाद फिल्म ज्यादा बेहतर हो गयी.

बतौर निर्देशक अमित रवींद्रनाथ शर्मा की यह बेहतरीन फिल्म है. ‘‘बधाई हो’’ में मध्यमवर्गीय परिवार के जीवन मूल्यों, पारिवारिक रिश्तों व रोजमर्रा की जिंदगी की बारीकियों को बड़ी खूबी से पिरोया गया है. निर्देशक के तौर पर पूरी फिल्म पर उनकी पकड़ बनी रहती है. फिल्म में संयुक्त परिवार, परिवार का सम्मान व मूल्यों को लेकर मनोरंजन के साथ संदेश भी है.

दो घंटे पांच मिनट की अवधि वाली फिल्म का निर्माण ‘‘जंगली पिक्चर्स’’ और ‘‘क्रोम पिक्चर्स’’ ने मिलकर किया है. फिल्म के निर्देशक अमित रवींद्रनाथ शर्मा, लेखक शांतनु श्रीवास्तव, अक्षत घिलडियाल व ज्योति कपूर, पटकथा लेखक अक्षत घिलडियाल, संगीतकार तनिष्क बागची, रोचक कोहली, कैमरामैन सानू वर्गीस तथा फिल्म को अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं – सुरेखा सीकरी, नीना गुप्ता, गजराज राव, आयुष्मान खुराना, राहुल तिवारी, सान्या ईरानी, शीबा व अन्य.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें