प्यार में ब्लू व्हेल

‘हां मैं अत्तू को 7 साल से जानती थी और उस के साथ रिलेशनशिप में थी. लेकिन 7 साल में वह कुछ नहीं कर पाया. वह अपने कैरियर के प्रति लापरवाह था. मैं ने उसे कई बार समझाया, लेकिन वह स्टेबल नहीं हो पाया. इस वजह से एक साल से मैं ने उस से दूरियां बनानी शुरू कर दी थीं. मैं एक ऐसे आदमी से शादी नहीं करना चाहती थी, जो मेरी या परिवार की जिम्मेदारी न निभा पाए.’

बीती 4 जुलाई को प्रीति जब मीडिया से रूबरू हुई, तब उस का चेहरा हालांकि उतरा और निचुड़ा हुआ था, लेकिन इस के बावजूद वह यह जताने की कोशिश करती नजर आई कि अतुल लोखंडे उर्फ अत्तू की आत्महत्या में उस का या उस के पिता का कोई हाथ नहीं है.

मतलब उसे खुदकुशी के लिए उकसाया नहीं गया था. यह खुद अतुल का फैसला था, लेकिन जबरन उस के पिता का नाम बीच में घसीटा जा रहा है कि उन के कहने पर उस ने प्यार का सबूत देने के लिए आत्महत्या करने की कोशिश की. प्यार की यह दुखद कहानी भोपाल के शिवाजी नगर इलाके की है, जिसे शहर की सब से शांत और खूबसूरत जगहों में शुमार किया जाता है.

हबीबगंज रेलवे स्टेशन और व्यवसायिक इलाके एम.पी. नगर से महज डेढ़ किलोमीटर की दूर स्थित शिवाजी नगर में सरकारी आवासों की भरमार है. यह जगह शहर के वीआईपी इलाके चार इमली से भी सटी हुई है, जहां प्रदेश भर की दिग्गज हस्तियां रहती हैं.

शिवाजी नगर में रहने वाले नाम से कम अपने क्वार्टरों के टाइप और नंबरों से ज्यादा जाने जाते हैं. अगर आप अतुल लोखंडे के घर जाना चाहते हैं तो आप को 121 की लाइन ढूंढनी पड़ेगी. लेकिन अतुल लोखंडे को लोग नाम से भी जानते थे, क्योंकि वह भाजपा अरेरा मंडल के युवा मोर्चे का उपाध्यक्ष था.

नेतागिरी में सक्रिय युवाओं को बरबस ही लोग जानने लगते हैं. ऐसे आवासों में अकसर पार्टी कार्यकर्ताओं की आवाजाही लगी रहती है. कभीकभार कोई बड़ा नेता या मंत्री भी उन के घर आ जाता है. ऐसे में बैठेबिठाए मुफ्त का प्रचार मिल जाता है. 30 वर्षीय अतुल हंसमुख और जिंदादिल नवयुवक था, लेकिन बीती 3 जुलाई को उस ने निहायत ही नाटकीय अंदाज में खुदकुशी कर ली. ऐसे में भोपाल में सनाका खिंचना स्वाभाविक सी बात थी.

प्रेम में जिंदगी हारा आशिक

जब अतुल अपने घर से महज 2 सौ मीटर दूर रहने वाली प्रीति के घर पहुंचा, तब रात के लगभग साढ़े 9 बजे का वक्त था. प्रीति की इसी साल बैंक में नौकरी लगी थी और वह विदिशा से रोजाना हबीबगंज स्टेशन से अपडाउन करती थी. रोजाना की ही तरह उस के पिता उस दिन भी अपनी आई10 कार से उसे लेने स्टेशन पहुंचे थे.

दोनों अभी घर लौटे ही थे कि अतुल भी वहां पहुंच गया. प्रीति के पिता जल संसाधन विभाग में अधिकारी हैं. पहुंचते ही बगैर किसी भूमिका के, जिस की जरूरत भी नहीं थी, अतुल ने कहा कि वह प्रीति से शादी करना चाहता है.

जवाब उम्मीद के मुताबिक नहीं मिला तो अतुल ने बिना किसी हिचकिचाहट या घबराहट के अपनी कमर में खोंसा हुआ देसी कट्टा निकाला और माथे पर लगा कर उस का ट्रिगर दबा दिया. गोली उस के भेजे में जा कर धंस गई.

धांय की आवाज के साथ ही अतुल कटे पेड़ की तरह धड़ाम से जमीन पर गिर गया तो प्रीति और उस के पिता को माजरा समझ में आया. स्थिति देख कर वे घबरा गए. शोरशराबा शुरू हुआ तो आसपास के लोग दौड़े चले आए. भीड़ ने अतुल को उठा कर नजदीक के पारूल अस्पताल में भरती करा दिया. थोड़ी देर में उस के घर वाले भी अस्पताल पहुंच गए.

खबर तेजी से फैली कि भाजपा युवा मोर्चे के एक पदाधिकारी अतुल लोखंडे ने प्रेम प्रसंग के चलते खुद को गोली मार ली. अस्पताल के सामने भाजपा युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं की भीड़ लगनी शुरू हो गई. वारदात की खबर मिलते ही पुलिस टीम भी अस्पताल पहुंच गई. सुरक्षा के लिहाज से अस्पताल के सामने पुलिस बल तैनात कर दिया गया.

एकत्र भीड़ में मौजूद अधिकांश लोगों को नहीं मालूम था कि आखिर माजरा क्या है, लेकिन एक घंटे की बातचीत और चर्चा के बाद अतुल और प्रीति की लव स्टोरी सामने आई तो कोहरा छंटता नजर आया. अब हर कोई यह दुआ मांगने लगा था कि अतुल बच जाए.

पुलिस अपनी काररवाई में लग गई थी और डाक्टर अतुल के इलाज में जुट गए थे. अतुल के कुछ नजदीकी दोस्त गुट सा बना कर चर्चा कर रहे थे कि अतुल तो यह कहा करता था कि कुछ भी हो जाए, कभी खुदकुशी जैसा बुजदिली भरा कदम नहीं उठाएगा और आज वही…

ब्लू व्हेल सा चैलेंज

इसी चर्चा से सामने आई अतुल और प्रीति की प्रेमकथा, जिसे कई लोग पहले से ही जानते थे. अतुल और प्रीति करीब 13 साल से एकदूसरे को जानते थे और जल्द ही शादी करने वाले थे. कुछ लोग तो यह तक मानते थे कि दोनों शादी कर चुके थे, बस उन्हें पारिवारिक स्वीकृति और सामाजिक मान्यता का इंतजार था. फिर ऐसा क्या हो गया कि अतुल को यह आत्मघाती कदम उठाना पड़ा. इस सवाल का जवाब मिला अतुल की फेसबुक वाल से, जिसे उस ने प्रीति के घर आने के पहले ही अपडेट करते हुए किसी ज्योतिषी की तरह अपनी मौत की सटीक भविष्यवाणी कर दी थी.

अतुल ने प्रीति के घर रवाना होने से चंद मिनटों पहले फेसबुक पर लिखा था—

‘उस के पापा ने कहा कि आज शाम घर आओ, अपनी प्रेमिका के लिए मर के दिखाओ… अगर उस से प्यार करते हो तो. बच गए तो तुम दोनों की शादी पक्की, मर गए तो सात जन्म हैं ही… फिर पैदा हो कर कर लेना शादी.

‘मैं प्रीति के घर पर ही हूं, मुझे यहां से ले जाना. जिंदा रहा तो खुद आ जाऊंगा, उस से भी वादा किया था. एक वादा तो पूरा नहीं कर पाया दूसरा वादा, मैं तेरे बिना नहीं जी सकता, इसलिए मर रहा हूं…

‘सब यही कहेंगे कि लड़की के चक्कर में चला गया, घर वालों के बारे में नहीं सोचा. सब के बारे में सोचसमझ कर ही यह कदम उठाया है. इस के अलावा कहीं कुछ नहीं दिख रहा, बहुत कोशिश कर ली पर भूल ही नहीं पा रहा. वैसे भी भुलाया तो पराए को जाता है अपने को नहीं.’

सहजता से समझा जा सकता है कि यह सब लिखते वक्त प्यार में असफल होने वाले एक आशिक की मनोदशा क्या रही होगी. एक आशिक दुनिया से लड़ सकता है लेकिन अपनी माशूका से नहीं लड़ पाता. उसे घर वालों की चिंता भी थी पर प्रीति के पिता की यह चुनौती उसे मजबूर कर रही थी कि वह अपने प्यार की सच्चाई साबित करे, भले ही इस के लिए उसे जान ही क्यों न देनी पड़े.

अस्पताल में भरती अतुल 4 जुलाई को जब जिंदगी से भी हार रहा था, तब प्रीति मीडियाकर्मियों के सामने यह साबित करने की कोशिश कर रही थी कि उस के पिता ने ऐसा कोई चैलेंज उसे नहीं दिया था, बल्कि यह एक नाकाम आशिक के खुराफाती दिमाग की उपज है.

अपनी बात में दम लाने के लिए प्रीति ने बताया कि हादसे के दिन वह अपनी ड्यूटी पूरी कर के रात लगभग 9.25 बजे घर पहुंची थी. उस के पिता भी साथ थे. घर के बाहर आल्टो कार में अत्तू बैठा था. हमें देखते ही वह भी घर के गेट तक आ गया. उस ने कहा कि एक मिनट पापा से बात करनी है.

इस पर प्रीति ने कहा कि कोई बात नहीं होगी, तुम जाओ. उस ने जिद की तो पापा मान गए. तब तक गेट पर प्रीति की मां और बड़ी बहन भी आ गई थीं. गेट पर ही अतुल ने प्रीति से पूछा, ‘‘क्या मैं तुम्हें परेशान करता हूं?’’

जवाब में प्रीति ने कहा, ‘‘अब इन बातों का कोई मतलब नहीं, मैं शादी नहीं करूंगी.’’

उस का जवाब सुनते ही अतुल ने जेब से देशी कट्टा निकाला और कनपटी पर लगा कर गोली चला दी.

बकौल प्रीति, फेसबुक पर अतुल ने जो लिखा है वह गलत है. हमारी कोई शादी नहीं हुई है और न ही मेरे पिता ने उसे घर पर बात करने के लिए बुलाया था.

प्रीति ने यह भी बताया कि अतुल ने कुछ दिन पहले उस के साथ सरेराह मारपीट भी की थी. उस की स्कूटी का मिरर, मोबाइल और हेलमेट तोड़ दिए थे.

प्रीति उस से दूर रहना चाहती थी पर एक महीने से अतुल के सिर पर पागलपन सवार था. उस के बडे़ भाई मुकुल ने भी उस के पिता को भलाबुरा कहा था. इसी दौरान अतुल ने उस के औफिस जा कर भी बात करने की कोशिश की थी. इस पर प्रीति ने उसे समझाया था कि अब हमारा कुछ नहीं हो सकता, तुम अपना कैरियर बनाओ.

मीडिया से रूबरू होते समय प्रीति के पिता का कहना था कि उन्होंने कुछ दिनों पहले ही अतुल के घर वालों से उस की शिकायत की थी, लेकिन उन्होंने कहा कि उन का बेटा मरता है तो मर जाए, आप यहां से चले जाएं. चूंकि अतुल उन के घर के चक्कर लगाता रहता था, इसलिए वे प्रीति को लेने स्टेशन जाने लगे थे, जिस से किसी तरह का फसाद खड़ा न हो.

अतुल ने खुदकुशी कर के जो फसाद खड़ा किया, वह शायद ही लोग आसानी से भूल पाएं. इस मामले में फसाद की जड़ माशूका की बेरुखी थी, जो साफ दिखती है. जबकि यह बात अतुल की समझ में नहीं आ रही थी कि ऐसा क्या हो गया जो नौकरी लगते ही प्रीति का दिमाग फिर गया और वह उस से रूठीरूठी रहने लगी. मुमकिन है इस दौरान उसे अपने निकम्मे होने का खयाल भी आया हो, जिस का अहसास खुद प्रीति भी उसे करा चुकी थी.

4 जुलाई को जब अतुल जिंदगी की जंग में हार रहा था, तब न केवल प्रीति और उस के घर वाले अतुल पर आरोप लगा रहे थे, बल्कि अतुल के घर वाले भी खामोश नहीं बैठे थे.

सच के इर्दगिर्द

अतुल की मां सुनंदा का कहना था कि प्रीति का 12-13 सालों से उन के घर आनाजाना था. वह उन के घर के हर कार्यक्रम में हिस्सा लेती थी और हर मामले में घर के सदस्य जैसा ही अधिकार जमाती थी.

उन्होंने स्वीकारा कि अतुल और प्रीति दोनों एकदूसरे से प्यार करते थे. लेकिन बैंक में नौकरी लगने के बाद प्रीति के तेवर बदल गए थे. उस की ख्वाहिशें बढ़ गई थीं. उसे रहने के लिए बंगला और घूमने के लिए गाडि़यां चाहिए थीं. 15 दिन में मेरा बेटा यह सब कहां से अरेंज करता, प्रीति शर्तों पर जीना चाहती थी, लेकिन प्यार में शर्तें कहां होती हैं?

अतुल की मां भी सरकारी कर्मचारी हैं और उस के पिता मधुकर लोखंडे जेल विभाग में कार्यरत हैं जो कुछ नामालूम वजहों के चलते घर से अलग रहते हैं.

इन बातों का प्रीति और अतुल के प्यार की गहराई से कोई संबंध नहीं लगता, जो किशोरावस्था में ही पनप चुका था और इतना परिपक्व हो चुका था कि पूरा शिवाजी नगर इस प्रेम प्रसंग को जानता था. दूसरे प्रेमियों की तरह उन्हें चोरीछिपे नहीं मिलना पड़ता था.

लाख टके और मुद्दे की बात अतुल का खुदकुशी का फैसला है, जिस की वजह यही समझ आती है कि वाकई नौकरी लगने के बाद प्रीति बदल गई थी. यह बात दूसरे शब्दों में वह खुद भी स्वीकार कर रही है और अतुल की मां का भी यही कहना है.

हंसमुख अतुल मौत के 15 मिनट पहले तक दोस्तों को हंसा रहा था, पर तब कोई नहीं समझ पाया था कि इस नाकाम आशिक के दिलोदिमाग में कौन सा तूफान उमड़ रहा है.

प्रीति की यह नसीहत अपनी जगह ठीक थी कि अतुल को कैरियर पर ध्यान देना चाहिए, लेकिन उस की बेरुखी अतुल बरदाश्त नहीं कर पाया तो खुद की चलाई गोली उस के भेजे में उतरी और 5 जुलाई को उस ने अपने घर के ठीक सामने बने पारूल अस्पताल में दम तोड़ दिया.

लगता है कि अतुल नफरत और प्यार के द्वंद में फंस गया था. फेसबुक पर उस ने यह लिखा भी था कि प्रीति को कोई कुछ न कहे, सारी गलती खुद उसी की है. सब कुछ मेरी वजह से ही बिगड़ा.

प्रीति के लिए उस ने लिखा कि मैं 13 साल उस के साथ रहा, लेकिन उस के सपने पूरे नहीं कर पाया. तू भी हमारे 13 साल के रिश्ते को कैसे भूल गई. अपने पापा के सामने डर क्यों गई? एक बार हिम्मत दिखाती तो आज जिंदगी कुछ और होती.

अपनी मां को संबोधित करते हुए उस ने बड़े भावुक अंदाज में इच्छा जताई थी कि अगर यह सच है कि 7 जन्म होते हैं तो हर जन्म में वह अपनी मां का बेटा बनना चाहेगा, उस की मां जैसी कोई मां दुनिया में नहीं है.

पहचानें ऐसे दगाबाजों को

इंतजार करते करते कई दिन बीत चुके थे, पर लवकुश अभी तक घर लौट कर नहीं आया था. ज्यों ज्यों समय बीतता जा रहा था त्यों त्यों नाहर सिंह की चिंता बढ़ती जा रही थी. उन की पत्नी सीमा सिंह भी चिंतित थी. बेटे की याद में उन्होंने खानापीना तक छोड़ दिया था. दरअसल, नाहर सिंह का 20 वर्षीय बेटा लवकुश ड्राइवर था. वह दूध कलेक्शन करने वाली एक कंपनी की गाड़ी चलाता था. कई दिनों से वह घर नहीं आया था.

वैसे तो लवकुश रोजाना ही देर रात तक घर वापस आ जाता था. कभीकभी उसे जब देर हो जाती तो वह घर फोन कर के इस की सूचना दे देता था. लेकिन इस बार तो कई दिन बीत चुके थे. न तो वह घर आया और न ही उस ने कोई सूचना दी थी.

कहीं लवकुश के साथ कोई अप्रिय घटना तो नहीं हो गई, इस तरह के अनेक विचार नाहर सिंह के मस्तिष्क में घूमने लगे थे. उन्होंने बेटे की खोज में रातदिन एक कर दिया था. रिश्तेनाते में जहां भी वह जा सकता था, फोन कर के उन सभी से पूछा.

साथी दोस्तों में भी उस की तलाश की. पर उस के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. नाहर सिंह बेटे के बारे में जानकारी लेने के लिए उस की दूध कंपनी भी गए. वहां पता चला कि लवकुश कई रोज से काम पर नहीं आ रहा है. यह मई, 2018 के अंतिम सप्ताह की बात है.

वह कई दिन से ड्यूटी पर नहीं जा रहा है तो आखिर वह गया कहां, यह बात नाहर सिंह की समझ में नहीं आ रही थी, जब कहीं भी उस का पता नहीं चला तो नाहर सिंह थाना अकबरपुर पहुंच गए. थानाप्रभारी ऋषिकांत शुक्ला को उन्होंने अपने 20 वर्षीय बेटे के कई दिनों से लापता होने की जानकारी दे दी.

नाहर सिंह की बात सुनने के बाद थानाप्रभारी ऋषिकांत शुक्ला ने उन्हें धैर्य बंधाया और कहा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि आप का बेटा अपने यारदोस्तों के साथ कहीं घूमनेफिरने निकल गया हो. यदि ऐसा है तो वह 2-4 दिन में घूमफिर कर वापस आ जाएगा. फिर भी आप उस का हुलिया आदि लिख कर दे दीजिए हम भी उसे तलाशेंगे और यदि आप को भी उस के बारे में कोई सूचना मिले तो थाने आ कर बताना.

आश्वासन पा कर बुझे मन से नाहर सिंह घर वापस आ गए. दरवाजे पर टकटकी लगाए उन की पत्नी सीमा सिंह खड़ी थी. देखते ही बोली, ‘‘लवकुश का कुछ पता चला. कहां है वह.’’

‘‘नहीं, अभी तो पता नहीं चला, पुलिस को सूचना दे दी गई है, वह भी अपने स्तर से उसे ढूंढेगी.’’ नाहर सिंह ने बताया.

10 जून, 2018 की शाम नाहर सिंह चौपाल पर बैठे थे. वहां मौजूद सभी लोग लवकुश के बारे में ही बातें कर रहे थे. तभी नाहर सिंह के मोबाइल फोन पर काल आई. जैसे ही उन्होंने काल रिसीव की तो दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘तुम्हारा बेटा लवकुश हमारे पास है. उस की जान की सलामती चाहते हो तो जल्द से जल्द 25 लाख रुपए का इंतजाम कर लो.’’ इतना कहने के बाद फोनकर्ता ने फोन काट दिया. नाहर सिंह हैलोहैलो कहते रह गए.

फिरौती के मांगे 25 लाख रुपए

नाहर सिंह ने जब फोन चेक किया तो पता चला कि वह काल लवकुश के फोन से ही की गई थी. इस से उन्हें विश्वास हो गया कि उन का बेटा अपहर्त्ताओं के ही चंगुल में है. उस के बाद तो नाहर सिंह के घर में कोहराम मच गया. अब यह स्पष्ट हो गया था कि फिरौती के लिए लवकुश का अपहरण किया गया है. परिवार के सभी लोग बहुत चिंतित हो गए. सभी को इस बात की चिंता हो रही थी कि पता नहीं लवकुश किस हाल में होगा.

इस के ठीक 10 मिनट बाद अपहर्त्ता ने नाहर सिंह को पुन: फोन कर के कहा, ‘‘पुलिस को इस बारे में कुछ भी बताया तो तुम्हारे बेटे की सेहत के लिए यह अच्छा नहीं होगा. ध्यान रहे कि ज्यादा चालाक बनने की गलती न करना.’’

‘‘भाई आप कौन बोल रहे हैं? क्या बिगाड़ा है मैं ने आप का. मैं आप के हाथ जोड़ता हूं, पैर पड़ता हूं. मेरे बेटे को कुछ मत करना.’’ घबराहट भरे स्वर में उन्होंने उस से विनती की.

‘‘तो अपना समय घर में बैठ कर बरबाद मत करो. फटाफट रुपयों का बंदोबस्त करने में जुट जाओ. इस के लिए चाहे गहने बेचो या फिर जमीन. क्योंकि मेरे पास अधिक समय नहीं है.’’ अपहर्त्ता ने कहा.

25 लाख कोई मामूली रकम नहीं होती, इतनी बड़ी रकम जल्द जुटा पाना नाहर सिंह के लिए संभव नहीं था. लिहाजा अपने घर वालों से सलाहमशविरा कर ने के बाद उन्होंने पुलिस को सारी बातें बताना जरूरी समझा.

वह अपने बड़े बेटे धीरेंद्र सिंह के साथ थाना अकबरपुर पहुंच गए. उन्होंने थानाप्रभारी ऋषिकांत शुक्ला को अपहर्त्ता का फोन आने तथा 25 लाख रुपए की फिरौती मांगने की बात बताई. साथ ही यह भी बताया कि अपहर्त्ता उन के बेटे के ही मोबाइल से फोन कर रहे हैं.

अपहरण और फिरौती की बात सुन कर थानाप्रभारी ऋषिकांत शुक्ला चौंक पडे़े उन्होंने तत्काल नाहर सिंह की तहरीर पर अज्ञात अपहर्त्ताओं के खिलाफ लवकुश के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कर ली और घटना की जानकारी वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दे दी. अब वह गंभीरता से मामले की जांच में जुट गए.

उन्होंने नाहर सिंह से पूछा, ‘‘आप की किसी से रंजिश या जमीनी विवाद तो नहीं है, जिस के चलते उन लोगों ने बेटे को अगवा कर लिया हो और वो फिरौती मांग रहे हों.’’

नाहर सिंह कुछ देर दिमाग पर जोर डालते रहे फिर बोले, ‘‘मेरी रंजिश भी है और जमीनी विवाद भी, लेकिन रंजिश और जमीनी विवाद घरेलू हैं. यकीनन तो कुछ नहीं कह सकता पर शक जरूर है.’’

‘‘खुल कर सारी बात बताओ.’’ श्री शुक्ला ने कहा.

नाहर सिंह ने जताया शक

‘‘सर, मुझे ससुराल में 4 बीघा जमीन मिली थी. जिस की कीमत लाखों में है. जाहिर है कि मेरे सालों को जमीन खटकती होगी. रही बात रंजिश की तो वह बड़े बेटे की ससुराल से है. एक साल पहले बेटे की पत्नी प्रीति लड़झगड़ कर मायके चली गई थी. उस ने उत्पीड़न का आरोप लगा कर हम लोगों को परेशान किया. प्रीति का साथ उस की मां रेखा तथा पिता रामसिंह ने भी दिया, शक है कि इन्हीं लोगों का अपहरण में हाथ हो सकता है.’’ नाहर सिंह ने बताया.

नाहर सिंह के साले शक के दायरे में आए तो थानाप्रभारी ने उन्हें थाने बुला लिया और उन से हर दृष्टिकोण से पूछताछ की लेकिन ऐसा कोई क्लू नहीं मिला, जिस से लगे कि लवकुश का अपहरण उन्होंने किया है. उन्हें यह कह कर पुलिस ने घर भेज दिया कि जरूरत पड़ने पर उन से आगे भी पूछताछ की ज सकती है.

नाहर सिंह के बड़े बेटे धीरेंद्र सिंह की ससुराल वाले भी संदेह के घेरे में थे. अत: थानाप्रभारी ने धीरेंद्र सिंह की पत्नी प्रीति, सास रेखा व ससुर रामसिंह को थाने बुलवा लिया. प्रीति, रेखा और रामसिंह से अलगअलग की गई पूछताछ के बाद थानाप्रभारी ऋषिकांत शुक्ला को लगा कि वह तीनों निर्दोष हैं. अत: उन्होंने तीनों को थाने से जाने दिया.

रिपोर्ट दर्ज हुए अब तक एक सप्ताह बीत चुका था. थानाप्रभारी करीब एक दरजन लोगों से पूछताछ कर चुके थे. लवकुश अपहरण व फिरौती का मामला एसपी राधेश्याम के संज्ञान में भी था और क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ था. मीडिया में भी यह मामला सुर्खियां बटोर रहा था.

एसपी राधेश्याम ने अपहरण व फिरौती के इस मामले के खुलासे के लिए एक स्पैशल पुलिस टीम का गठन किया. इस टीम में थानाप्रभारी ऋषिकांत शुक्ला, स्वाट टीम प्रभारी रोहित कुमार, सर्विलांस प्रभारी राजीव कुमार के साथ आधा दरजन विश्वसनीय सिपाहियों को शामिल किया गया. टीम का निर्देशन सीओ अर्पित कपूर को सौंप दिया गया.

पुलिस टीम ने जांच शुरू की तो चौंकाने वाली बातें सामने आने लगीं. पता चला कि गांव का एक युवक विपिन यादव लवकुश का गहरा दोस्त है. लवकुश के घर वाले उस पर अटूट विश्वास करते हैं और उसे अपना हितैषी मानते हैं. लवकुश को ढूंढने में वह नाहर सिंह के साथ साए की तरह लगा रहा. नाहर सिंह जहां भी बेटे की खोज में गए विपिन उन के साथ लगा रहा. नाहर सिंह व उन के परिवार को धैर्य बंधाने में भी उस की अहम भूमिका रही.

शक के दायरे में आया विपिन यादव

एक चौंकाने वाली बात यह भी पता चली कि विपिन ने दबाव के साथ नाहर सिंह को यह सलाह भी दी थी कि वह ससुराल वाली जमीन बेच कर लवकुश को अपहर्त्ताओं के चंगुल से छुड़ा लें. इस के लिए वह जमीन का रेट मालूम करने घाटमपुर भी गया था. वह नाहर सिंह को उकसाता था कि बेटे से बढ़ कर जमीन नहीं है. जब लवकुश ही नहीं आएगा तो जमीन क्या चाटोगे.

इधर सर्विलांस प्रभारी राजीव कुमार ने अपहृत लवकुश के मोबाइल को सर्विलांस पर लगा दिया था. उस की लोकेशन मुक्तापुर गांव तथा आसपास की मिली. इस से जाहिर हो रहा था कि अपहर्त्ता मुक्तापुर गांव या फिर पासपड़ोस का है.

राजीव कुमार ने एक बात और चौंकाने वाली बताई कि अपहर्त्ता लवकुश के मोबाइल में दूसरा सिम डाल कर अपने अन्य साथियों से बात करता है. शायद वह पुलिस की गतिविधियों की जानकारी उन्हें देता है.

इन सब बातों से मुक्तापुर गांव का विपिन यादव भी शक के घेरे में आ गया. फिर सीओ अर्पित कपूर के निर्देश पर पुलिस टीम ने मुक्तापुर गांव में छापा मार कर विपिन यादव को गिरफ्तार कर लिया.

थाना अकबरपुर ला कर जब उस से लवकुश के अपहरण के संबंध में पूछा गया तो वह साफ मुकर गया और बोला, ‘‘साहब, लवकुश मेरा जिगरी दोस्त है. भला मैं उस का अपहरण क्यों करूंगा. मैं तो उस की खोज में रातदिन लगा हूं. उस के पिता की हर संभव मदद करता हूं.’’

विपिन ने स्वीकारा अपराध

साधारण पूछताछ में विपिन यादव ने कुछ नहीं बताया तो थानाप्रभारी ऋषिकांत शुक्ला ने पुलिसिया अंदाज में उस से पूछताछ शुरू की. वह ज्यादा देर टिक न सका और बोला, ‘‘साहब, मुझे मत मारो मैं सब कुछ आप को बता दूंगा.’’

‘‘तो बताओ लवकुश कहां है? उसे तुम ने कहां बंधक बना कर रखा है?’’ श्री शुक्ला ने पूछा.

‘‘साहब, लवकुश अब इस दुनिया में नहीं है. मैं ने अपने साथी शिवम, पंकज व दुर्गेश की मदद से लवकुश की हत्या कर दी और उस का मोबाइल फोन अपने पास रख लिया था. फिर उसी मोबाइल से फिरौती मांगी थी.’’

पुलिस ने विपिन यादव की निशानदेही पर उस के घर से लवकुश का मोबाइल फोन तथा एक अन्य मोबाइल फोन बरामद कर लिया. दूसरा फोन लूट का था. इस के बाद पुलिस टीम ने रात में ही छापा मार कर विपिन यादव के दोस्त शिवम यादव, पंकज यादव व दुर्गेश को हिरासत में ले लिया. पूछताछ में सभी ने बिना हीलाहवाली के अपना जुर्म स्वीकार कर लिया.

जब विपिन यादव की गिरफ्तारी की सूचना नाहर सिंह को मिली तो वह थाने पहुंच गए. उन्होंने पुलिस से गुहार लगाई कि विपिन बेकसूर है. वह तो उन के परिवार का हितैषी है उसे इस मामले में न फंसाया जाए. लेकिन पुलिस ने जब सारी हकीकत बताई तो नाहर सिंह भौचक्के रह गए. वह माथा पकड़ कर बैठ गए. सोचने लगे कि यह तो बड़ा ही खतरनाक आस्तीन का सांप निकला. इस के बाद तो उन के घर में कोहराम मच गया.

अब पुलिस को आरोपियों की निशानदेही पर लवकुश की लाश बरामद करनी थी. लिहाजा वह चारों आरोपियों व नाहर सिंह को ले कर अमृतसर के लिए रवाना हो गई. क्योंकि उन्होंने वहीं पर लवकुश की हत्या कर लाश ठिकाने लगाई थी. थानाप्रभारी आरोपियों को फतेहपुर गांव के बाहर नहर किनारे खेत पर ले गए जहां उन्होंने लवकुश की हत्या की थी.

लेकिन पुलिस को वहां कुछ भी नहीं मिला. पूछताछ से पता चला कि यह स्थान अमृतसर (रूरल) जिले के जंडियाला थाना क्षेत्र में आता है. इस के बाद पुलिस टीम थाना जंडियाला पहुंची टीम ने वहां मौजूद थानाप्रभारी हरसन दीप सिंह को लवकुश की हत्या वाली बात बताई.

थानाप्रभारी हरसनदीप सिंह ने अकबर पुर पुलिस को एक युवक की लाश के फोटो दिखाते हुए कहा कि इस युवक की लाश 30 मई, 2018 को फतेहपुर गांव के बाहर नहर किनारे खेत में मिली थी. युवक की गला घोंट कर हत्या की गई थी.

थाने पर सूचना फतेहपुर गांव के सरपंच तरसेम सिंह ने दी थी. उसी की तहरीर पर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज है.

फोटो देख कर फफक पड़े नाहर सिंह

नाहर सिंह ने जब वह फोटो देखा तो वह फफक कर रो पड़े और बताया कि यह फोटो उन के बेटे लवकुश की है. अकबरपुर पुलिस थाने से मृतक की फोटो एफआईआर की प्रति आदि ले कर वापस लौट आई. इस के बाद थानाप्रभारी ने सारी जानकारी एसपी राधेश्याम को दी. पुलिस अधिकारियों ने आननफानन में प्रैस कौन्फै्रंस कर के मामले का खुलासा कर दिया.

चूंकि लवकुश के हत्यारोपी अपहर्त्ताओं ने अपना जुर्म कबूल कर लिया था. अत: थानाप्रभारी ऋषिकांत शुक्ला ने मृतक के पिता नाहर सिंह को वादी बना कर भादंवि की धारा 364ए/302 आईपीसी के तहत विपिन यादव, पंकज यादव, शुभम यादव व दुर्गेश के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और उन्हें विधि सम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस पूछताछ में दोस्त की गहरी साजिश का जो परदाफाश हुआ, वह चौंकाने वाला था.

उत्तर प्रदेश के कानपुर (देहात) जनपद के अकबरपुर थाना अंतर्गत एक गांव मुक्तापुर पड़ता है. रूरा और अकबरपुर जैसे 2 बडे़  कस्बों के बीच पड़ने वाले इस गांव के लोग काफी संपन्न हैं. वह या तो व्यापार करते हैं या फिर अपनी खेती. इसी मुक्तापुर गांव में संपन्न किसान नाहर सिंह रहते थे. उन के परिवार में पत्नी सीमा सिंह के अलावा 2 बेटे धीरेंद्र सिंह व लवकुश थे. नाहर सिंह के पास अच्छीखासी खेती की जमीन थी. जिस में अच्छी उपज होती थी. इस के अलावा उन्हें ससुराल में भी 4 बीघा जमीन मिली थी. कुल मिला कर उन की आर्थिक स्थिति अच्छी थी.

बड़ा होने पर धीरेंद्र सिंह पिता के साथ खेती कार्य में हाथ बंटाने लगा. बाद में नाहर सिंह ने उस की शादी मूसानगर निवासी राम सिंह की बेटी प्रीति से कर दी. प्रीति खूबसूरत व चंचल थी जबकि धीरेंद्र सिंह सीधासादा था. प्रीति दिखावे में तो उस की पत्नी थी, लेकिन उस ने मन से धीरेंद्र को अपना पति स्वीकार नहीं किया था. इस की वजह यह थी कि धीरेंद्र अपने काम में व्यस्त रहने की वजह से उस की भावनाओं को नहीं समझता था.

इस के बाद छोटीछोटी बातों को ले कर पतिपत्नी में कलह होने लगी. कलह ने जब विकराल रूप धारण किया तो प्रीति ससुराल से नाता तोड़ कर मायके में रहने लगी.

गांव में लवकुश का एक दोस्त था विपिन यादव. दोनों में गहरी दोस्ती थी. लवकुश व विपिन दोनों शराब के लती थे. अकसर दोनों की महफिल जमती रहती थी. एक रोज शराब पीने के दौरान लवकुश ने विपिन को बताया कि उस के पिता को ससुराल में जो 4 बीघा जमीन मिली है उस की कीमत बढ़ रही है. वह अब 25-30 लाख से कम नहीं है.

विपिन के मन में आ गया था लालच

विपिन यादव साधारण किसान लल्ला यादव का बेटा था. घर से उसे खर्च के लिए फूटी कौड़ी नहीं मिलती थी. छुटपुट काम से वह जो कमाता था वह शराब तथा अय्याशी में खर्च कर देता था. पैसा न रहने पर वह परेशान रहता था. विपिन ने जब 25-30 लाख की बात लवकुश के मुंह से सुनी तो उस के मन में लालच समा गया, फिर वह लालच की चाह में अमीर होने के तानेबाने बुनने लगा.

विपिन का एक दोस्त शिवम था. शिवम, रूरा निवासी बबलू यादव का बेटा था. शिवम अमृतसर की एक फैक्ट्री में काम करता था. शिवम महत्त्वाकांक्षी था. वह जल्द रईस बनना चाहता था. लेकिन फैक्ट्री की नौकरी से उस का खर्चा भी पूरा नहीं होता था. एक रोज रूरा में विपिन की मुलाकात शिवम से हुई. वह छुट्टी ले कर अमृतसर से आया था.

दोस्त का अपहरण कर के कर दी हत्या

बातचीत के दौरान शिवम ने रईस बनने की इच्छा जाहिर की तो विपिन ने भी उस की हां में हां मिलाई. पर रईस कैसे बना जाए, इस पर विचार करने के लिए जब दोनों सिर जोड़ कर बैठे तो वे इस नतीजे पर पहुंचे कि सीधे तरीके से तो बड़ी रकम हाथ आने से रही.

इस के लिए कोई गलत रास्ता अपनाना पड़ेगा. वह गलत रास्ता क्या हो इस के लिए दोनों ने काफी सोचविचार के बाद किसी अमीरजादे के बच्चे का अपहरण कर के लाखों रुपए फिरौती वसूलने का मंसूबा बनाया.

विपिन ने शुभम को बताया कि उस का दोस्त लवकुश संपन्न किसान नाहर सिंह का बेटा है. यदि उस का अपहरण कर फिरौती मांगी जाए तो 20-25 लाख रुपया आसानी से मिल सकता है. नाहर सिंह को ससुराल में 4 बीघा जमीन मिली है, जिसे बेच कर वह फिरौती दे सकता है.

यह सुन कर शुभम की आंखों में चमक आ गई. फिर दोनों ने मिल कर लवकुश के अपहरण व हत्या कर फिरौती वसूलने की योजना बनाई. इस योजना में शुभम ने अपने दोस्त सवायज पुरवा (नरवल) निवासी पंकज यादव तथा अहिरन पुरवा (रनियां) निवासी दुर्गेश को भी शामिल कर लिया. दोनों पैसों के लालच में साथ देने को तैयार हो गए.

योजना के तहत 28 मई, 2018 को विपिन यादव व उस के दोस्त शुभम, दुर्गेश तथा पंकज लवकुश को घुमाने के बहाने अमृतसर ले गए. 29 मई की शाम को सभी ने अमृतसर के जंडियाला में शराब पी फिर अंधेरा होने पर वह सब लवकुश को नहर किनारे खेत में ले गए और अंगौंछे से गला घोंट कर हत्या कर दी.

उस का मोबाइल फोन विपिन ने अपने पास रख लिया. इस के बाद सभी वापस आ गए और अपनेअपने घरों में रहने लगे. कुछ दिनों बाद उस के घर वालों को विपिन ने लवकुश के मोबाइल से ही 25 लाख रुपए फिरौती की मांग की.

तब नाहर सिंह ने थाना अकबरपुर जा कर रिपोर्ट दर्ज करा दी. इस के बाद पुलिस सक्रिय हुई और लवकुश के अपहरण व हत्या का परदाफाश कर उस के दगाबाज दोस्त व उस के साथियों को बंदी बनाया.

25 जून, 2018 को थाना अकबरपुर पुलिस ने अभियुक्त विपिन यादव, शुभम यादव, पंकज यादव तथा दुर्गेश को माती कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया. जहां से माती जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक सभी अभियुक्तों की जमानत लोअर कोर्ट से खारिज हो गई थी. वे सब जेल में हैं.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

फरहान अख्तर ने अपने रिलेनशिप का किया खुलासा

कुछ दिन पहले एक तस्वीर ने इन कयासों को जन्म देना शुरू कर दिया था, जब शिबानी ने एक तस्वीर लगाई, जिसमें वो एक आदमी का हाथ पकड़ी थीं. उस समय कई लोगों ने कहा था कि वह आदमी फरहान हैं. लेकिन जब मीडिया ने इस जोड़े से उनके रिश्ते को लेकर सवाल किए तो दोनों ही ने इस बात को गलत बताया था. लेकिन अब फरहान ने इस तस्वीर को एक दिल के आइकौन के साथ लगाकर सारी बात साफ कर दी है.

हालांकि फरहान अपने सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहते हैं और अपने लाइफ के बारे में हमेशा से एक छिपी झलक भी देते रहे हैं, फिर भी उन्होंने शिबानी के साथ अपने संबंध के बारे में कभी कुछ न तो शेयर किया और न ही लिखा. भले ही शिबानी के साथ उन्होंने पिछले समय में कुछ तस्वीरें शेयर की थी, लेकिन ऐसा कुछ जाहिर नहीं किया कि दोनों बीच क्या रिश्ता है.

आपको बता दें कि 16 वर्षों तक  साथ रहने के बावजूद भी फरहान अख्तर और उनकी पत्नी अधूना अलग हो गए थे. इनके दो बेटियां हैं- शाक्य और अकीरा. इनकी फिल्म की बात करें तो फरहान को जल्द ही ‘द स्काई इज पिंक’ में देखा जाएगा, जो मोटिवेशनल स्पीकर आयशा चौधरी की जिंदगी पर आधारित है. इस फिल्म में फरहान के साथ प्रियंका चोपड़ा भी नजर आने वाली हैं.

कानून से बड़ा कोई नहीं

निर्मम हत्या के मामले में भी अपराधी किस तरह अदालतों के चक्कर काटते रहते हैं कि किसी तरह छूट जाएं. 1984 में एक घर में भरे दिन में बंदूक से की गई हत्या के 2 अपराधी भाई 2018 तक अदालतों में छूटने की गुहार लगाते रहे पर न तो हाई कोर्ट ने और न ही सुप्रीम कोर्ट ने 35 साल बाद भी उन की बात मानी.

मामला केवल एक मोटरसाइकिल का था. 1981 में हुई शादी में पहले ही दिन लगता है खटपट हो गई और 8 दिन बाद पत्नी मायके चली गई. 3 साल बाद पति पत्नी को घर ले तो आया पर 3 दिन बाद ही उस की डबल बैरल गन से दोपहर 4 बजे हत्या कर दी शायद यह सोच कर कि ठाकुर परिवार को कौन हाथ लगाएगा.

चाहे हम कोसते रहें कि देश में न्याय नहीं है और इसे खरीदा जा सकता है पर इस मामले में तो पति, उस के भाई और मां को गिरफ्तार कर लिया गया. सैशन कोर्ट ने उन्हें आजीवन कैद का दंड दिया. 1984 के अपराध की सैशन कोर्ट के फैसले की अपील पर 2014 में उच्च न्यायालय ने 2 भाइयों की सजा तो बरकरार रखी पर मां को छोड़ दिया- 30 साल बाद. पता नहीं इन 30 सालों में वह कितने साल जेल में रही.

2 भाई सुप्रीम कोर्ट में आए पर सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें राहत नहीं दी और उन का अपराध बरकरार रखा.

चाहे जमाना 1980 का हो या 2020 का, मारपीट, हत्या कर के झगड़े सुलझाना अपनेआप में गलत है और खासतौर पर बेकुसूर औरतों पर गुस्सा निकालना जो अपने फैसले खुद नहीं कर सकतीं.

देश के एक वर्ग को अपने ऊपर जरूरत से ज्यादा गरूर है कि वह लाठीबंदूक के बल पर कुछ भी कर सकता है और फिर कानून को मनचाहे तरीके से खरीद सकता है. देश में लिंचिंग मौब कभी गौरक्षा के नाम पर, कभी मुसलमानों की नमाज पर, कभी भारत माता की जय बुलवाने के लिए तो कभी कांवडि़यों को विशेष स्थान देने पर कानून बेरहमी से अपने हाथ में लेने लगी हैं. ये उसी तरह के लोग हैं जिन्होंने 1984 में ब्याही पत्नी को दिन के उजाले में डबल बैरल बंदूक से मार डाला मानो वे मदर इंडिया बन गए हैं और गुनहगार तो निहत्थे, निर्दोष ही हैं क्योंकि वे उन की बात को नहीं मान रहे.

सुप्रीम कोर्ट के इस तरह के फैसले एक तरह से राहत देते हैं. देर से न्याय देने में वास्तव में जिन्होंने अपराध किया उन्हें लंबी सजाएं भुगतनी पड़ती हैं या फिर दंडित होने का बिल्ला लगाए घूमना पड़ता है. जेसिका कांड के मनु शर्मा के साथ भी यही हुआ है जब हर तरह की कानूनबाजी के बावजूद जेल में रहना ही पड़ रहा है.

जब पुलिस के हत्थे चढ़ जाएं प्रेमी जोड़े

रश्मि रिटेल मार्केटिंग का कोर्स कर रही थी. इसी दौरान उसे कालेज के ही रवि नाम के एक लड़के से प्यार हो गया. उन दोनों को जब भी फुरसत मिलती तो वे कालेज के पास ही एक पार्क में घंटों बैठ कर बातें किया करते और एकदूसरे में खो जाते.

चूंकि वह पार्क पे्रेमी जोड़ों के लिए जाना जाता था. ऐसे में कुछ लोग ऐसे भी वहां आते थे जो प्रेमी जोड़े कम रंगरलियां मनाने वाले ज्यादा होते थे. इस वजह से वहां आएदिन पुलिस की दबिश भी पड़ती रहती थी.

एक दिन रश्मि और रवि हर बार की तरह पार्क में बैठ कर एकदूसरे से दिल की बातें कर ही रहे थे कि अचानक पड़ी पुलिस दबिश से पार्क में भगदड़ सी मच गई.  रश्मि और रवि जब तक कुछ समझ पाते तब तक 2 पुलिस वालों ने उन को दबोच लिया.

जब रश्मि ने पुलिस द्वारा अपनी गिरफ्तारी की खिलाफत की तो पुलिस ने कहा कि पार्क में अपने आशिक के साथ बैठ कर गुलछर्रे उड़ा रही हो और हम लोगों के छू देने से इतना गुस्सा. इस के बाद पुलिस वाले रश्मि के साथ बदतमीजी पर उतर आए जिस की रवि ने खिलाफत करनी चाही तो पुलिस वालों ने उसे भी मारापीटा.

छापे में पकड़े गए लोगों के साथ पुलिस रश्मि और रवि को भी थाने ले गई. वहां पुलिस वालों ने तमाम तरह की भद्दी फब्तियां कसनी शुरू कर दीं.

जब इस बात की जानकारी रश्मि ने अपने कालेज प्रशासन व घर वालों को दी तो कालेज की दखलअंदाजी के चलते उन्हें पुलिस की गिरफ्त से छुड़ाया जा सका.

थाने से छूटने के बाद रश्मि ने पुलिस वालों द्वारा गिरफ्तारी और उस के साथ की गई बदतमीजी की शिकायत बड़े अफसरों से की जिस का नतीजा यह हुआ कि बिना महिला पुलिस के रश्मि को गिरफ्तार करने और झूठे केस में फंसाने व बेहूदा हरकतें करने की वजह से थाने के कई पुलिस वालों को निलंबित कर दिया गया और कई को सजा भी दी गई.

पुलिस द्वारा प्रेमी जोड़ों को परेशान किए जाने का यह अकेला मामला नहीं है बल्कि ऐसे मामले पूरे देश में हर रोज होते रहते हैं.

प्यार गलत नहीं

समाजशास्त्री गोविंद मिश्र के मुताबिक, प्यार करना हर किसी का हक है और इस के लिए न ही कोई रोक सकता है और न ही प्यार में जाति, धर्म, ऊंचनीच का खयाल रखा जाता है. जवान होते लड़केलड़कियों का एकदूसरे की तरफ खिंचना और छिपछिपा कर मिलना आम बात है. कालेज लाइफ में आने के बाद अकसर ही लड़केलड़कियों में दोस्ती हो जाती है और यही दोस्ती जब प्यार में बदलती है तो उन्हें ऐसी जगह की तलाश होती है जो सुनसान होने के साथसाथ शांत हो जिस से उन के प्यार के बीच में कोई खलल न पड़ने पाए लेकिन पुलिस वाले इन प्रेमी जोड़ों को बेहूदगी फैलाने के नाम पर परेशान करते रहते हैं.

गोविंद मिश्र का आगे कहना है कि अब लोग घरों से निकल कर महंगे होटलों, पार्कों और मौल में अपने प्यार का इजहार करते नजर आ जाते हैं. प्यार करने वालों पर तब शामत आ जाती है जब पुलिस नाहक ही छापे मार कर उन्हें परेशान करती है.

सामाजिक कार्यकर्ता कुलदीप सिंह का कहना है कि पार्कों की झाडि़यों, मौल के कोनों, रैस्टोरैंटों व होटलों में प्यार का इजहार करने वाले जोड़ों को पुलिस द्वारा बेइज्जत करना व शारीरिक सजा देना गैरकानूनी अपराध है.

कभीकभी तो पुलिस वाले इन प्रेमी जोड़ों को बेहूदगी फैलाने के नाम पर फर्जी तरीके से गिरफ्तार कर लेते हैं और सार्वजनिक जगहों पर ही सजा देना शुरू कर देते हैं.

इसी तरह का एक वाकिआ गाजियाबाद में हुआ था जब वहां की महिला थानाध्यक्ष ने प्रेमी जोड़ों को झाडि़यों के पीछे से पकड़ कर टैलीविजन कैमरों के सामने उठकबैठक कराई थी. बाद में उस थानाध्यक्ष अलका पांडेय को निलंबित किया गया था.

अकसर पुलिस वालों का आरोप होता है कि प्रेमी जोड़े पार्कों व स्मारकों जैसी सुनसान जगह की तलाश करते हैं ताकि सैक्स संबंध बना सकें.

पुलिस का यह आधार बिलकुल गलत है क्योंकि अगर संबंध आपसी रजामंदी से बन रहा है तो इस में क्या गलत हो रहा है. जहां तक ऐसे सैक्स संबंधों से बेहूदगी फैलने का सवाल है तो कोई भी जोड़ा खुले में सैक्स संबंध बनाना पसंद नहीं करेगा.

करें खिलाफत

प्यार और सैक्स जिंदगी के सब से अहम पहलू हैं. ऐसे में अगर औरत और मर्द आपसी रजामंदी से प्यार या सैक्स करते हैं तो उन्हें किसी तरह से भी परेशान किया जाना गलत होता है. सुनसान जगहों की कमी के चलते अकसर हम सड़कों के किनारे शाम ढलने के बाद तमाम ऐसे जोड़ों को एकसाथ चिपके हुए देख सकते हैं क्योंकि उन्हें परिवार व घर में वह माहौल नहीं मिल पाता जो ऐसी जगहों पर मिलता है.

पुलिस द्वारा कई बार मुहिम चला कर उन्हें पकड़ा जाता है और ब्लैकमेल भी किया जाता है. इस की वजह यह है कि अकसर ऐसे जोड़े प्यार के शुरुआती दौर में परिवार वालों से अपने प्यार की बात छिपाते हैं जिसे पुलिस वाले बखूबी जानते हैं.

ऐसे जोड़ों की इसी कमजोरी का फायदा उठा कर पुलिस वाले उन्हें पकड़ने के बाद या तो उन से परिवार वालों को बताने की धमकी दे कर पैसे वसूलने की कोशिश करते हैं या फिर थाने ला कर लड़की के साथ छेड़खानी व बेहूदा हरकतें करते हैं. अगर ऐसे हालात आते हैं तो ऐसे जोड़ों को चाहिए कि वे पुलिस वालों की जम कर खिलाफत करें और तेज आवाज में हल्ला मचा कर लोगों को अपनी तरफ बुलाएं.

इस तरह पुलिस की ज्यादती से न केवल बचा जा सकता है बल्कि कुसूरवारों के खिलाफ कार्यवाही के लिए सुबूत और गवाह भी इकट्ठा किए जा सकते हैं.

कभीकभी पुलिस वसूली के मकसद से प्रेमी जोड़ों पर देह धंधे का आरोप भी लगा देती है जिस से उन्हें भारी बदनामी झेलनी पड़ती है और इस का बुरा असर उन के दिमाग पर भी पड़ता है जिस के चलते प्रेमी जोड़े गलत कदम भी उठा बैठते हैं.

इस मसले पर समाजशास्त्री माधुरी का कहना है कि पार्कों या दूसरी सुनसान जगहों पर चोरीछिपे मिलने वाले जोड़े ज्यादातर अपनी दिल की बातें ही कर रहे होते हैं लेकिन पुलिस अपना कोरम पूरा करने के चलते इन लोगों पर कहर ढाती है और उन्हें अपनी ज्यादती का शिकार बनाती है.

अपने साथ ज्यादती करने वाले पुलिस वाले की नेमप्लेट को पढ़ना नहीं भूलना चाहिए. इस से कुसूरवार पुलिस वाले के खिलाफ कार्यवाही कराने में आसानी होती है.

मांबाप की लें मदद

कभी भी पुलिस के हत्थे चढ़ने पर मांबाप की मदद लेना न भूलें. जैसे ही पुलिस वालों द्वारा आप को परेशान किया जाए या थाने ले जाया जाए तो आप अपने मोबाइल से फोन करना या मैसेज डालना न भूलें.

इस का फायदा यह होगा कि आप के साथ होने वाली ज्यादती के पहले ही आप के मांबाप मदद के लिए मौके पर पहुंच सकते हैं.

पुलिस के बारे में रखें ये जानकारियां अगर कभी आप पार्क, मौल या दूसरी जगहों पर पुलिस के हत्थे चढ़ते हैं तो पुलिस आप से सामान्य पूछताछ कर सकती है लेकिन आप को मारनेपीटने या सजा देने का हक उस के पास नहीं होता है, बल्कि सजा देने का हक कोर्ट का है.

– अगर पुलिस आप से पूछताछ करे तो बगैर घबराए सही जानकारी दें और जरूरत पड़ने पर तलाशी लेने के दौरान अपने जानने वालों के सामने ही तलाशी देने पर राजी हों क्योंकि कभीकभी पुलिस वालों द्वारा झूठे केस में फंसाने के मकसद से ही गैरकानूनी चीजें दिखा कर आप को फंसाया जा सकता है.

– अगर कभी गिरफ्तारी की नौबत आती है तो औरत या लड़की को गिरफ्तार करने का हक सिर्फ महिला पुलिस को ही होता है. किसी भी हालात में मर्द पुलिस वाला उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकता.

– गिरफ्तारी के दौरान आप अपनी गिरफ्तारी की वजह जरूर पूछें और गिरफ्तारी की जायज वजह न बताने पर आप अपनी गिरफ्तारी की खिलाफत भी कर सकते हैं. आप अपने वकील को बुला कर सलाह भी ले सकते हैं.

– गिरफ्तारी के दौरान पुलिस द्वारा जोरजबरदस्ती करना कानूनन अपराध है. सामान्य नागरिक को हथकड़ी लगाना भी गैरकानूनी है. अगर आप को शक की बिना पर गिरफ्तार किया गया है तो जरूरी है कि पुलिस गिरफ्तारी की सूचना मजिस्ट्रेट को दे और 24 घंटे के अंदर कोर्ट में पेश करे वरना आप को पुलिस को छोड़ना ही होगा.

– ज्यादातर पुलिस द्वारा रात के अंधेरे में ही प्रेमी जोड़ों की गिरफ्तारी की जाती है क्योंकि रात के समय किसी सामान्य नागरिक को गिरफ्तार करना कानूनन गलत है. अगर ऐसा आप के साथ होता है तो आप पुलिस के साथ जाने से इनकार कर सकते हैं. इस के लिए पुलिस को जोरजबरदस्ती करने का हक नहीं है.

दलित शब्द पर प्रतिबंध, शब्द नहीं सोच बदलें

केंद्र सरकार ने दलित शब्द का इस्तेमाल न करने को कहा है. सरकार ने कहा है कि अनुसूचित जाति एक संवैधानिक शब्द है इसलिए यही शब्द इस्तेमाल में लाया जाना चाहिए.

सरकार के इस फैसले पर देशभर के कई दलित संगठन और बुद्धिजीवी पुरजोर तरीके से खिलाफत कर रहे हैं और इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस शुरू हो गई है.

इस निर्देश पर राजग सरकार के भीतर भी मतभेद है. केंद्र में मंत्री और रिपब्लिकन पार्टी औफ इंडिया के नेता रामदास अठावले इस से खुश नहीं हैं. केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान और भाजपा के दलित सांसद उदितराज ने भी दलित शब्द की पैरवी की है लेकिन केंद्रीय मंत्री राज्यवर्द्घन सिंह, प्रकाश जावड़ेकर जैसे नेता इस प्रतिबंध के पक्ष में हैं.

सरकार ने यह फैसला बांबे हाईकोर्ट के निर्देश पर दिया है. बांबे हाईकोर्ट की नागपुर बैंच ने सरकार को इस पर विचार करने के लिए कहा था. अदालत में पंकज मेश्राम नामक एक शख्स ने याचिका दायर की थी, जिस में कहा गया था कि दलित शब्द अपमानजनक है. इस का मतलब अछूत, असहाय और नीचा होता है. यह उस समुदाय के लिए अपमानजनक है. इस शब्द का संविधान में भी कहीं इस्तेमाल नहीं किया गया है.

इस से पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में भी मोहनलाल माहौर नाम के एक आदमी ने दलित शब्द को ले कर याचिका दायर की थी. याचिका में कहा गया था कि दलित शब्द अपमानजनक है और इसे अनुसूचित जातियों को अपमानित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

भाजपा सरकार अदालत की सलाह की आड़ में दलित शब्द को प्रतिबंधित करना चाहती है क्योंकि यह शब्द सरकार को ही नहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे हिंदू संगठनों को गहरा चुभ रहा है. इन्हें जबतब टीस दे रहा है.

‘दलित’ शब्द का अर्थ उत्पीडि़त यानी दबा कर रखा गया, जिस पर जुल्म ढाया गया होता है. आमतौर पर दलित की पहचान गरीब, भुखमरी से पीडि़त, अछूत, भेदभाव सहने वाला बेचारा और समाज का सब से निचला शख्स से होती है.

इस की एक सामाजिक पृष्ठभूमि है. दलित हिंदू वर्ण व्यवस्था के बाहर 5वां वर्ग है. चौथा शूद्र है पर दलित इस व्यवस्था से बाहर है जिस के साथ सदियों से गैरइनसानी बरताव होता रहा है. इसे गांव, शहर से बाहर रहने का शास्त्रीय आदेश है. इसे संपत्ति रखने का अधिकार नहीं है.

यह शब्द सामाजिक व्यवस्था की पोल खोलता है. वह व्यवस्था जिस में भेदभाव, छुआछूत, असमानता, अत्याचार, शोषण को ईश्वरीय आदेश बताया गया है. ‘दलित’ जाहिर करता है कि प्राचीन ईश्वर प्रदत्त व्यवस्था किस कदर अमानवीय थी.

यह महज शब्द नहीं है बल्कि पूरी हिंदू व्यवस्था के खिलाफ बगावत, गुस्सा, आंदोलन है. इस से हिंदुत्व की बदनामी होती है. यह उस महान संस्कृति की पोल खोलता है, जिस का देशदुनिया में दंभ भरा जाता है.

दलितों में सभी अछूत जातियां आती हैं. दलित शब्द ने इन अछूत, दबीकुचली जातियों को एक होने का काम किया. जिस तरह मंडल आयोग में आई पिछड़ों के नाम पर पिछड़ी जातियां एक हुईं.

दलित किसी एक जाति का नाम नहीं है. दलित में दर्जनों जातियां शामिल हैं जो दलित के नाम पर एकजुट दिखती हैं. यही एकजुटता हिंदुत्व के लिए खतरा है.

दलित अब अपनी जाति छिपाता नहीं, गर्व होने की बात करता है. ‘मैं चमार हूं’, ‘चमार बौय’, ‘वाल्मीकि गर्व’ की बात की जाने लगी है. अपनी बदहाली के लिए दलित समाज और सरकार से सवाल पूछने लगे हैं. यह बात न समाज को पच रही है, न सरकार को.

भाजपा सरकार को दिक्कत यह है कि वह जिस हिंदू व्यवस्था को उज्ज्वल, विश्व में सर्वोच्च आदर्श बताना चाहती है उस में दागधब्बे और सड़ांध भरी हुई है.

भाजपा और संघ दलितों को हिंदू नहीं मानते पर हिंदू के नाम पर उसे दलितों के वोट चाहिए. भाजपा से दलित सवाल भी पूछते हैं कि अगर वे हिंदू हैं तो उन्हें मंदिरों, पूजापाठ, कर्मकांडों से दूर क्यों रखा जाता है? व्यवहार में भाजपा दलितों को वर्ण व्यवस्था के अनुसार ही रखना चाहती है. वैसे, कांग्रेस कोई दूध की धुली नहीं है. 1947 से ही उस के नेता किसी तरह वह पौराणिक राज लाना चाहते थे जो अब संघ करना चाह रहा है. इस में अछूतों को जबरन जगह मिली है.

दलितों को भगवा रंग में रंगने के लिए समरसता कार्यक्रम जैसे तमाम प्रयास नाकाम होते दिखाई दे रहे हैं. रोहित वेमुला आत्महत्या, भीमा कोरेगांव जैसी घटनाओं ने भाजपा की चिंता को और बढ़ाया है.

दलित को घोड़ी पर चढ़ने नहीं दिया गया, दलित को मूंछ रखने पर पीटा गया, मरी गाय की खाल उतारने पर दलितों पर हिंसा, दलित के साथ मौब लिंचिंग, इस तरह की घटनाओं से हिंदूवादी सरकारों की बदनामी होती है. इस से दुनिया में भारत को जातीय, नस्लीय भेदभाव वाला देश माना जाता है.

जो दिक्कत भाजपा को दलित शब्द से है, वही कांग्रेस को भी रही है. शब्द बदलने के कई बार प्रयास किए गए. वर्ण व्यवस्था के पक्षधर महात्मा गांधी ने भारतीय समाज में फैले छुआछूत को देखते हुए ‘हरिजन’ शब्द दिया था. इसे ले कर भी काफी विवाद हुआ था. लोग भी ‘हरिजन शब्द’ का इस्तेमाल करने से बचने लगे थे.

जवाहरलाल नेहरू के समय में छुआछूत जब हद पर थी तब दलित नेता जगजीवन राम ने उन के सामने यह समस्या रखी थी. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि दलितों से कहें कि वे अपने नाम के आगे जातिसूचक शब्द लगाना बंद कर दें. तब जगजीवन राम ने इस पर आपत्ति की थी कि दलित तो जातिसूचक शब्द लगाना बंद कर दें और मालवीय जातिसूचक शब्द लगाएं, ऐसा नहीं हो सकता. इस का जवाहरलाल नेहरू के पास कोई जवाब नहीं था.

उसी दौर में बहुत सारे लोगोें ने अपने नाम के आगेपीछे राम लगाना शुरू किया. मसलन सुरेशराम, जगजीवनराम. और भी तरहतरह के प्रयास हुए, पर समाज की सोच और व्यवस्था नहीं बदल पाई. भेदभाव, छुआछूत, अत्याचार कम नहीं हुआ.

दलित शब्द 60 के दशक में उस समय चलन में आया था जब महाराष्ट्र में दलित पैंथर्स आंदोलन चला था. तब से अकेले महाराष्ट्र में ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों में भी निचली जातियों में एकता पैदा हुई.

जब तक जाति रहेगी, वैर रहेगा,  इसलिए दलित शब्द पर ही क्यों, हर जातीय पहचान पर रोक लगाई जानी चाहिए. आजादी के 70 साल बाद भी जाति को ले कर सोच नहीं बदली है, बस शब्द ही बदले जाने की बातें की जा रही हैं.

सलमान की एक्स गर्लफ्रेंड का खुलासा, कम उम्र में हुआ था रेप

अभिनेता सलमान खान की एक्स गर्लफ्रेंड और अभिनेत्री सोमी अली ने कहा है कि जब वह 14 साल की थीं, तब वो यौन उत्पीड़न और दुष्कर्म का शिकार हुई थीं. सोमी अली ने ऐसी दर्द से गुजरने वाली अन्य महिलाओं से भी आगे आकर यौन शोषण के खिलाफ #metoo से जुड़ने की अपील की है.

सोमी अली ने सोमवार को  इंस्टाग्राम  पर पोस्ट में लिखा, “पांच साल की उम्र में मेरा यौन उत्पीड़न हुआ था और 14 साल की उम्र में मेरे साथ दुष्कर्म हुआ. मैं उन सभी को सैलूट करना चाहूंगी जिन्होंने अपने साथ हुई ऐसी घटनाओं के बारे में बोला और जिन्होंने बोलने का फैसला किया है. मैं समझती हूं कि यह करना बहुत कठिन है क्योंकि मेरे साथ भी ऐसा हो चुका है और मुझे इससे जुड़ी बात शेयर करने में बहुत लंबा समय लगा.

सोमी ने ये भी कहा, कि  यह तब और भी कठिन हो जाता है जब आपके आसपास मौजूद लोग भी आपकी मदद न करें जिन पर आपकी सुरक्षा की जिम्मेदारी है. मेरे साथ भी ऐसा हुआ है और इसकी तकलीफ को बयान करना मुश्किल है. लेकिन मैं चाहती हूं कि ऐसी घटनाओं से गुजरने वाले लोग इस बात को जानें कि इसके बारे में खुलकर बोलने से आजादी मिलती है और ऐसा करना सही है.

आपको बता दे, सोमी ने ये भी कहा कि  “यह आपका सच है और सच बोलने से कभी मत डरिए. इस अवसर को व्यर्थ में मत जाने दीजिए. इस अवसर का हम सब को लंबे समय से इंतजार था. अभी आपके पास यह मौका है, आपकी बात सुनी जाए और आपको न्याय मिले. मुझे आप पर पूरा भरोसा है.”

आपको बता दें, भारत में इन दिनों #metoo हर तरफ चर्चा का विषय बना हुआ है, राजनीति, फिल्म इंडस्ट्री से लेकर  मीडिया जगत तक के लोगों के चेहरा बेनकाब हो रहे हैं. अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाने के बाद देश में #metoo कैम्पेन को एक नई पहचान मिली है. कई बड़े सितारे इस कैम्पेन की चपेट में आ चुके हैं. आलोक नाथ,सुभाष घई, विकास बहल, कैलाश खेर, चेतन भगत, साजिद खान जैसे सितारों पर महिलाओं ने सैक्शुअल हैरेसमेंट के आरोप लगाए हैं.

खतरनाक औरत

27 जून, 2018 की सुबह काशीपुर स्टेशन के अधीक्षक ने थाना आईटीआई को फोन कर के
बताया कि बाजपुर ट्रैक पर किसी की लाश पड़ी है. यह सूचना मिलते ही आईटीआई थानाप्रभारी कुलदीप सिंह अधिकारी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. जब पुलिस वहां पहुंची, तब वहां कोई भी मौजूद नहीं था. वजह यह थी कि न तो वहां कोई आम रास्ता था और न ही कोई वहां से गुजरा था.
घटनास्थल पर पहुंच कर पुलिस ने लाश और घटनास्थल का मुआयना किया. साथ ही जरूरी काररवाई भी की. मृतक के गले और छाती पर चोट के निशान थे. उस की एक पैर की एड़ी भी कटी हुई थी, जो शायद ट्रेन की चपेट में आने से कट गई थी.

लेकिन लाश देख कर ही पता चल रहा था कि उस की मौत ट्रेन से कट कर नहीं हुई थी. इस का मतलब यह था कि उस की हत्या कर के डैडबौडी वहां फेंकी गई थी, जिस से यह मामला दुर्घटना का लगे.
रेलवे ट्रैक पर लाश मिलने की सूचना मिलते ही आसपास के गांवों के लोग एकत्र होने लगे. घटनास्थल पर काफी लोग जुट गए थे, उन में राजपुरम निवासी छत्तर ने मृतक की पहचान करते हुए पुलिस की बड़ी सिरदर्दी खत्म कर दी.

छत्तर ने मृतक की पहचान अपने जीजा राकेश उर्फ हरकेश के रूप में की. राकेश की हत्या की बात सुन कर उस के घर वाले तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गए. वहां पहुंचे उस के घर वालों से पुलिस ने राकेश के बारे में पूछताछ की और लाश पोस्टमार्टम के लिए राजकीय चिकित्सालय भिजवा दी.

राकेश की लाश के पोस्टमार्टम के समय एक बात चौंकाने वाली पता चली. मृतक के पैरों पर जला हुआ इंजन औयल लगा मिला था. वैसा ही तेल वहां मौजूद मृतक राकेश के मौसेरे भाई इंद्रपाल के कपड़ों पर भी लगा हुआ था. यह पता चलते ही राकेश के घर वालों ने इंद्रपाल को अपने कब्जे में ले कर उसे मारनापीटना शुरू कर दिया.

वैसे भी राकेश के घर वालों को शक था कि उस की हत्या इंद्रपाल ने ही की है. पोस्टमार्टम के दौरान यह बात सामने आते ही उन्हें पूरा विश्वास हो गया कि राकेश का हत्यारा वही है.

राकेश के घर वालों ने इंद्रपाल को ठोकपीट कर पुलिस के हवाले कर दिया. इंद्रपाल को हिरासत में लेने के बाद पुलिस ने उस से कड़ी पूछताछ की तो पहले तो उस ने साफ इनकार कर दिया कि राकेश की हत्या से उस का कोई लेनादेना नहीं है. लेकिन जब पुलिस ने उस के कपड़ों पर लगे काले औयल का राज पूछा तो वह पुलिस को कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाया.

आखिरकार उस ने सब कुछ साफसाफ बता दिया. पूछताछ में इंद्रपाल ने बताया कि राकेश की हत्या उस की बीवी माया ने कराई है. यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस इंद्रपाल को थाना ले आई. थाने में उस से कड़ी पूछताछ की गई.

पुलिस पूछताछ के दौरान पता चला कि राकेश की हत्या में मृतक की बीवी माया, इंद्रपाल निवासी मोहनतखतपुर, थाना कुंदरकी जिला मुरादाबाद, गुड्डू निवासी नगला थाना भगतपुर, जिला मुरादाबाद, रेखा निवासी खड़कपुर काशीपुर, जमुना निवासी खड़कपुर शामिल थे.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने आरोपियों की धरपकड़ शुरू की तो सभी आरोपी पकड़ में आ गए. गिरफ्तारी के बाद उन से पूछताछ की गई तो राकेश की हत्या की पूरी सच्चाई सामने आ गई.

मेहनतकश राकेश पहुंच गया शहर की ड्योढ़ी पर

बाजपुर, उत्तराखंड के गांव कनौरा निवासी हरकेश उर्फ राकेश की शादी करीब 17 साल पहले गांव परमानंदपुर (गौशाला) निवासी खानचंद्र की बेटी माया से हुई थी. माया देखने में खूबसूरत ही नहीं, तेजतर्रार भी थी.

राकेश के पास जुतासे की थोड़ी सी जमीन थी, जिस में इतनी पैदावार नहीं होती थी कि परिवार की गुजरबसर हो सके. राकेश फैक्ट्रियों में काम कर के परिवार का भरणपोषण करता था. बाद में एक फैक्ट्री में उसे लेबर का ठेका मिल गया तो उस की मेहनत कम हो गई और आमदनी ज्यादा.

शादी के कुछ समय बाद तक राकेश की घरगृहस्थी ठीक से चलती रही. इस बीच पतिपत्नी का तालमेल भी ठीक बैठ गया था. राकेश शुरू से ही अपनी बीवी माया को बहुत प्यार करता था. वह सुबह काम पर चला जाता और देर शाम घर लौटता था. घर आने के बाद वह दिन भर की थकान की वजह से खाना खापी कर जल्दी सो जाता था. उस की बीवी माया को यह पसंद नहीं था. वह चाहती थी कि जब तक वह जागे, पति उस का साथ दे. लेकिन राकेश की अपनी मजबूरी थी, जो माया के अरमानों पर भारी पड़ती थी.

माया ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी. लेकिन उस की हसरतों की उड़ान ऊंची थी. वह शुरू से ही शरारती थी, बनठन कर रहने वाली. राकेश के साथ शादी के बंधन में बंध कर वह ससुराल तो आ गई थी, लेकिन वह अपनी शादी से खुश नहीं थी.

शादी के बाद अनचाहे ही सही, राकेश के साथ रहना उस की मजबूरी थी. जबकि राकेश उसे पा कर खुश था. शादी के बाद वह उसे जी जान से चाहने भी लगा था.

गुजरते समय के साथ माया 3 बच्चों की मां बन गई. उस की बड़ी बेटी का नाम मधु था, उस से छोटा बेटा था आकाश और सब से छोटी थी बेटी प्रीति. राकेश काम के लिए गांव से शहर आता था. जब बच्चे थोड़े बड़े हो गए तो माया का मन शहर में रहने का होने लगा. यह बात मन में आते ही उस ने राकेश से कहा, ‘‘जब तुम्हें शहर में ही काम करना है तो क्यों न हम शहर में थोड़ी सी जमीन खरीद कर छोटा सा मकान बना लें.’’

राकेश अपने घर की स्थिति अच्छी तरह जानता था. उस के सामने पैसे की मजबूरी थी. उस ने इनकार कर दिया तो माया को मन मार कर गांव में ही रहने को मजबूर होना पड़ा.

शादी के कुछ सालों के बाद तक तो माया पत्नी का धर्म निभाती रही, लेकिन जब उस के दिमाग से राकेश की छवि धूमिल होने लगी तो उस का मन और निगाहें इधरउधर भटकने लगीं. जल्द ही उस ने अपने रंगढंग दिखाने शुरू कर दिए. उस ने चोरीछिपे ससुराल में कई लोगों से अवैध संबंध बना लिए. राकेश को इस बात की जानकारी कानोंकान नहीं हुई. हालांकि माया 3 बच्चों की मां बन चुकी थी, फिर भी उस के शरीर की कशिश बरकरार थी.

बदनाम है खड़कपुर

माया की एक बहन की शादी काशीपुर के गांव खड़कपुर निवासी सत्यभान से हुई थी. माया जब भी बहन से मिलने आती तो उस के बच्चे साथ आते थे और मौसी के घर रहने की जिद करते थे. राकेश ने कई बार अपने बच्चों को समझाने की कोशिश की, लेकिन बच्चे जिद करते कि उन्हें भी मौसी की तरह शहर में ही रहना है.

आखिर बच्चों की जिद के आगे राकेश को झुकना पड़ा. करीब 6 साल पहले राकेश ने अपनी जुतासे की जमीन बेच दी. उस पैसे से उस ने खड़कपुर में 25 गज का प्लौट ले कर मकान बनवा लिया. इस के बाद राकेश अपने बीवीबच्चों के साथ खड़कपुर आ कर रहने लगा.

काशीपुर से लगे गांव खड़कपुर में शुरू से ही मजदूर और छोटामोटा काम करने वाले लोग रहते हैं. इसी वजह से यह इलाका हर मामले में चर्चित है. चाहे कच्ची शराब की बिक्री हो, जुआ हो या फिर देह व्यापार, खड़कपुर में सब मिलता है.

खड़कपुर आने के बाद माया की संगत कुछ ऐसी औरतों के साथ हो गई, जो देह व्यापार से जुड़ी थीं. नतीजतन उस के रहनसहन में काफी बदलाव आ गया. वह बनठन कर घर से निकलती थी. गलत औरतों के साथ माया की संगत देख कर राकेश का दिमाग घूमने लगा. उस ने माया को कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन उस ने पति की एक नहीं मानी. फलस्वरूप घर में कलह और विवाद रहने लगा, जिस के चलते पतिपत्नी के बीच दूरियां बढ़ने लगीं.

उधर माया ने खड़कपुर निवासी रेखा, जानकी और कई ऐसी ही औरतों की टोली बना ली, जो देह व्यापार से जुड़ी हुई थीं. उन का सहयोग मिलते ही माया पूरी तरह देह व्यापार में उतर गई.
यह बात राकेश की बरदाश्त के बाहर थी. उस ने इस की शिकायत माया के मायके वालों से की, लेकिन उन लोगों ने माया का साथ देते हुए कहा कि वह बिना वजह उन की बेटी को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है. माया ऐसी कतई नहीं है.

मायके वालों का साथ मिलने से माया के हौसले और बुलंद हो गए. राकेश के काम पर निकलते ही वह बच्चों को स्कूल भेज देती और फिर वह अपने धंधे में लग जाती. इस मामले में रेखा और जानकी उस का साथ दे रही थीं.

उन के सहयोग से उस का धंधा जोरों से चल निकला था. आसपास के लोग खड़कपुर में कच्ची शराब पीने आते तो वह अपने दलालों के माध्यम से उन्हें फंसाती और पैसा ले कर उन के साथ मौजमस्ती करती.
करीब 6 महीने पहले गांव तख्तपुर, कुंदरकी, जिला मुरादाबाद का रहने वाला राकेश का मौसेरा भाई इंद्रपाल भी काम की तलाश में खड़कपुर आया और राकेश के घर में रह कर एक फैक्ट्री में काम करने लगा.

राकेश के घर पर रह कर इंद्रपाल कुछ ही दिनों में अपनी भाभी के कर्मों से पूरी तरह से वाकिफ हो गया. जब इंद्रपाल को पता चला कि माया राकेश की गैरमौजूदगी में देह व्यापार करती है तो उस ने माया की दुखती रग पकड़ कर उस के साथ अवैध संबंध बना लिए.

हकीकत जान कर राकेश हुआ खफा

माया के साथ शारीरिक संबंध बनते ही इंद्रपाल ने नौकरी छोड़ दी और माया के लिए ग्राहक लाने लगा. इस के बदले माया उसे कमीशन देती थी, जो उस की मेहनत की कमाई से ज्यादा होता था.
देवरभाभी के बीच यह सिलसिला काफी दिनों तक चलता रहा, लेकिन जब राकेश को इस की जानकारी मिली तो उस ने इंद्रपाल को खरीखोटी सुना कर घर से भगाने की कोशिश की.

लेकिन इस मामले में माया इंद्रपाल का पक्ष ले कर उस के सामने खड़ी हो गई. जब राकेश को लगा कि देवरभाभी के सामने उस की नहीं चलने वाली तो उस ने बीवी से किनारा कर लिया. साथ ही माया से साफसाफ कह दिया कि आज के बाद वह अपना घर का खर्च भी खुद ही चलाए.

उस दिन के बाद माया राकेश से नफरत करने लगी. वह देह व्यापार की आदी हो चुकी थी, जिसे वह किसी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं थी. जिस दिन माया और राकेश के बीच तकरार हुई थी, उसी दिन माया ने सोच लिया था कि वह उसे अपने रास्ते से हटा कर रहेगी.

माया ने इंद्रपाल को भी राकेश के विरुद्ध भड़काना शुरू कर दिया था. उस ने इंद्रपाल से साफ कहा कि हमारे घर में जो भी फसाद हो रहा है, वह सब तुम्हारी वजह से है. राकेश को हम दोनों पर शक हो गया है. इसीलिए वह आए दिन मुझे मारतापीटता है. अगर तुम ने समय रहते उस का कोई इलाज नहीं किया तो तुम्हें यह घर छोड़ कर जाना पड़ेगा. माया की बात सुनते ही इंद्रपाल का पौरुष जाग उठा.

माया ने अपने धंधे में आड़े आ रहे पति को मौत की नींद सुलाने के लिए षडयंत्र रचना शुरू कर दिया था. वह राकेश की गैरमौजूदगी में अपनी पूरी मंडली को अपने घर बुला कर शराब पिलाती थी. जब सब शराब के नशे में हो जाते तो माया उन्हें अय्याशी की राह पर ले जाती. इस का नतीजा यह निकला कि माया का घर उस इलाके में चर्चित हो गया, जहां पर लोग शराब और शवाब दोनों का आनंद लेने के लिए आने लगे.
धीरेधीरे माया की करतूत राकेश के सामने आई तो उस ने फिर से माया को मारापीटा. इस के बाद माया ने राकेश से साफ कह दिया कि अगर उसे घर में मुंह बंद कर के रहना है तो रहे वरना रहने के लिए कहीं दूसरी जगह कमरा ले ले. माया ने यह भी कहा कि वह चाहे तो उसे तलाक दे सकता है.
माया ने बदल दिया पति

जब राकेश को लगने लगा कि माया किसी भी तरह सुधरने वाली नहीं है तो उस ने अपने बच्चों की खातिर अपने घर की तरफ से पूरी तरह से आंखें बंद कर लीं. इस के बाद भी माया के दिल को तसल्ली नहीं हुई.
उस के बाद वह इंद्रपाल के साथ उस की बीवी बन कर रहने लगी. इंद्रपाल उस का घर खर्च चलाने के साथसाथ उस की दिली तमन्ना भी पूरी करने लगा था.

इंद्रपाल की पहले से ही गुड्डू से अच्छी दोस्ती थी. उस ने अपने इस धंधे में गुड्डू को भी शामिल कर लिया. उस के बाद इंद्रपाल और गुड्डू दोनों माया, रेखा और जमुना के लिए ग्राहक ढूंढ कर लाते और अपना कमीशन ले कर मौजमस्ती करते. जब इन लोगों की हरकतें हद पार करने लगीं तो राकेश एक दिन जमुना के पति धर्म सिंह से मिला.

उस ने अपनी बीवी और उस की बीवी जमुना की पोल खोलते हुए बताया कि दोनों ने कई औरतों के साथ मिल कर उस के घर को अय्याशी का अड्डा बना रखा है. यह पता चलने पर धर्म सिंह अपनी बीवी जमुना पर चढ़ बैठा.

उस ने जमुना से मारपिटाई भी की. जब ग्रुप की सभी मेंबरों को पता चला कि फसाद की असली जड़ राकेश है तो सब ने मिल कर उसे मौत के घाट उतारने में माया का साथ देने के लिए रास्ता खोजना शुरू कर दिया.

शराब के सुरूर में एक दिन जब इस मुद्दे पर बात हुई तो सब ने तय किया कि राकेश को ठिकाने लगाने से पहले किसी आरोप में धर्म सिंह को जेल भिजवाया जाए. इस गिरोह से जुड़ी सभी औरतों का एकदूसरे के घर आनाजाना लगा रहता था. सभी के एकदूसरे के परिवार से घर जैसे संबंध बन गए थे.

इसी का लाभ उठाते हुए पहले से तैयार योजना के तहत रेखा ने किसी काम के बहाने धर्म सिंह को अपने घर बुलाया. रेखा को पता था कि धर्म सिंह शराब पीने का आदी है. इसी का लाभ उठा कर उस ने धर्म सिंह को पहले से घर में रखी कच्ची शराब पिलाई. जब धर्म सिंह नशे में डूब गया तो उस ने घर से बाहर आ कर शोर मचा दिया. रेखा के रोनेचीखने की आवाज सुन कर आसपास के लोग एकत्र हुए तो उस ने बताया कि धर्म सिंह उसे अकेला देख कर घर में घुस आया और उस की इज्जत लूटने की कोशिश करने लगा.

योजना रह गई धरी की धरी

रेखा की बात मान कर उस के पड़ोसी उस के घर के अंदर गए तो धर्म सिंह नशे की हालत में बेसुध सा पड़ा था. उस के कपड़े भी शरीर से उतरे हुए थे. यह देख कर पड़ोसियों ने समझा कि रेखा जो भी कह रही है, वह सच है.

बाद में रेखा अपनी मंडली की सभी सदस्यों और पड़ोसियों को साथ ले कर थाना आईटीआई पहुंची और धर्म सिंह के खिलाफ दुष्कर्म के प्रयास का आरोप लगा कर मुकदमा दर्ज कराने की कोशिश की. लेकिन जब पुलिस ने जांच की तो मामला फरजी पाया गया.

फलस्वरूप धर्म सिंह बच गया. जब यह गिरोह धर्म सिंह को फंसाने में फेल हो गया तो गिरोह के सदस्यों ने राकेश को मौत की नींद सुलाने की योजना पर ध्यान केंद्रित कर दिया. आखिरकार माया और उस के मौसेरे देवर इंद्रपाल ने अपने साथियों के साथ मिल कर राकेश की हत्या की साजिश रच डाली.

माया ने अपने पति राकेश से छुटकारा पाने के लिए सभी साथियों को 50 हजार रुपए देने की बात कही, जबकि इंद्रपाल को राकेश की बाइक देने का वादा किया. योजना बनने के बाद 26 जून को देर रात गुड्डू राकेश को शराब पिलाने के बहाने साथ ले कर रामनगर रोड स्थित गांव रमपुरा पहुंचा. वहां पहुंच कर गुड्डू ने उसे जम कर शराब पिलाई.

राकेश जब नशे में डूब गया तो गुड्डू ने मोबाइल से रेखा को फोन कर दिया. रेखा पहले से ही उस के फोन का इंतजार कर रही थी. रात के लगभग 10 बजे गुड्डू रेखा की मदद से राकेश को बाइक पर बिठा कर कचनाल गाजी गुसाईं स्थित अपने कमरे पर पहुंचा.

माया का देवर इंद्रपाल और जमुना वहां पहले ही पहुंच गए थे और इन लोगों का इंतजार कर रहे थे. ज्यादा नशा होने की वजह से राकेश गुड्डू के कमरे पर पहुंचते ही अर्द्धबेहोशी की हालत में फैल गया.

षडयंत्र हो गया कामयाब

जब सब लोगों को लगा कि राकेश को हमेशा के लिए मौत की नींद सुलाने का इस से बढि़या मौका नहीं मिलेगा तो इंद्रपाल और रेखा ने राकेश के हाथ पकड़े और गुड्डू ने उस का गला दबा दिया. जमुना ने इस काम में गुड्डू की मदद की. कुछ देर छटपटाने के बाद राकेश की मौत हो गई.

राकेश को मौत की नींद तो सुला दिया गया, अब बारी थी उस की लाश को ठिकाने लगाने की. पहले से बनी आगे की योजना के अनुसार राकेश की लाश को रेलवे ट्रैक पर डालना था ताकि मामला रेल से कटने का लगे.

परेशानी यह थी कि जिस जगह गुड्डू का कमरा था, वहां से रेलवे लाइन तक जाने के लिए न तो कोई पगडंडी थी और न कोई रास्ता.

कोई और रास्ता न देख गुड्डू और इंद्रपाल ने राकेश की लाश कंधे पर रखी और रेलवे ट्रैक तक ले गए. वहां जा कर दोनों ने उस की लाश रेलवे ट्रैक के किनारे डाल दी.

रात के अंधेरे में राकेश की लाश को रेलवे लाइन पर डालने के लिए ले जाते वक्त इंद्रपाल का पैर रास्ते में पड़े जले हुए इंजन औयल पर पड़ गया था. बाद में राकेश की लाश को संभालते वक्त वह औयल मृतक राकेश के पैर पर लग गया था.

इंद्रपाल ने अपने कपड़ों पर लगे औयल को गंभीरता से नहीं लिया था. बाद में वही औयल इस केस को खोलने में सहायक बना. राकेश की लाश का एक पैर रेलवे लाइन से लगा हुआ था, इसीलिए ट्रेन आने पर उस के एक पैर की एड़ी कट गई थी.

राकेश की लाश को रेलवे ट्रैक पर डालने के बाद सभी अपनेअपने कमरे पर चले गए. उन्हें पता था कि कल को दिन निकलते ही रेल हादसे में राकेश की मौत की खबर फैल जाएगी.

अगले दिन सुबह इंद्रपाल ने मृतक के भाई कमल के मोबाइल पर फोन कर के बताया कि राकेश कल 2 बजे ड्यूटी पर गया था, लेकिन घर वापस नहीं आया. यह सूचना मिलते ही कमल अपने घर वालों के साथ खड़कपुर पहुंचा. इसी दौरान उसे सूचना मिली कि रेलवे लाइन पर एक व्यक्ति की लाश पड़ी है. कमल ने रेलवे लाइन पर जा कर देखा तो वह लाश उस के भाई राकेश की थी.

केस के खुल जाने के बाद आईटीआई पुलिस ने राकेश के भाई कमल की तहरीर के आधार पर इंद्रपाल, रामकिशोर, रेखा और जमुना के खिलाफ भादंवि की धारा 147, 302, 201, 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. सभी आरोपी पकड़े जा चुके थे. इन सब को कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया गया. राकेश की मौत और माया के जेल चले जाने के बाद उस के तीनों बच्चे बेसहारा हो गए. पुलिस ने बच्च राकेश के साढ़ू सत्यभान को सौंप दिए. इस मामले की तफ्तीश थानाप्रभारी कुलदीप सिंह स्वयं ही कर रहे हैं.

इन आरोपियों को पकड़ने वाली टीम में थानाप्रभारी कुलदीप सिंह, एसआई कैलाश चंद, कांस्टेबल विनय कुमार, कांस्टेबल प्रकाश सिंह, कांस्टेबल कुंदन सिंह तथा गंगा सिंह शामिल थे.

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