दिसंबर में शादी कर सकती हैं प्रियंका

एक्टर प्रियंका चोपड़ा और हौलिवुड सिंगर निक जोनास  की शादी की खबरें जोरो शोरो से चल रही हैं. हाल ही में, प्रियंका को आलिया भट्ट के साथ न्यूयौर्क में चिल करते हुए देखा गया. दरअसल प्रियंका सलाना आयोजित होने वाले एक अवार्ड शो में शामिल होने के लिए न्यूयौर्क गई हैं. वहीं आलिया भट्ट भी इन दिनों न्यूयौर्क में हैं. आपको बता दें, ऋषि कपूर का न्यूयौर्क में मेडिकल ट्रीटमेंट चल रहा है.  जिसके कारण रणबीर कपूर, नीतू कपूर और वहीं आलिया भट्ट भी साथ में है.

आपको बता दें, प्रियंका चोपड़ा फिल्म ‘भारत’ के जरिए लंबे समय बाद बौलीवुड में एंट्री लेने जा रही थीं. हालांकि फिर कुछ निजी कारणों से उन्होंने इस फिल्म में काम करने से मना कर दिया था. 18 अगस्त को भारतीय परंपराओं के तहत प्रियंका और निक की सगाई हुई थी. इस मौके पर निक के माता पिता भी मौजूद थे. खबरों के अनुसार निक जोनास और प्रियंका चोपड़ा 2 दिसंबर को शादी करने जा रहे हैं. कहा यह भी जा रहा है कि सितारों की रौयल शादी, राजस्थान के जोधपुर में होगी.

वहीं  ऋषि कपूर ने एक ट्वीट कर बताया था कि वे इलाज के लिए न्यूयौर्क जा रहे हैं. उनकी बीमारी को लेकर कयास ना लगाए जाएं. आलिया भट्ट की फिल्म की बात करें तो, साल 2019 में उनकी फिल्म ब्रह्मास्त्र रिलीज होने जा रही है. इस फिल्म में पहली बार रणबीर और आलिया साथ नजर आएंगे.  इसके अलावा आलिया फिल्म ‘कलंक’ में नजर आने वाली हैं.

जेब कटाते, जान गंवाते श्रद्धालु

देश भर में अकसर जहांतहां तरहतरह के धार्मिक आयोजन होते रहते हैं और धर्म के ठेकेदार अपनी मोटी कमाई के लिए मंत्रों का भरपूर प्रचार करते हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा श्रद्धालु आ सकें और धर्म के नाम पर चढ़ावा चढ़ा कर अपनी जेबें ढीली कर सकें. इसी भीड़भाड़ में कई बार हादसे भी हो जाते हैं जिन में श्रद्धालु भक्तजन घायल ही नहीं, मौत के शिकार तक हो जाते हैं.

इस तरह से जान गंवाने वाले श्रद्धालुओं की रक्षा न तो भगवान करते हैं और नहीं उन के मुफ्तखोर एजेंट. इस में असल दोष तो उन का है जो खुद देखादेखी आंखें मूंद कर दबने, कुचलने और मरने के लिए भीड़ में शामिल होते हैं.

अंध भक्ति

दरअसल, भारी प्रचार के चलते ज्यादातर धार्मिक जगहों पर श्रद्धालुओं की खूब रेलपेल रहती है. जिन में ऐसे लोगों की भी भीड़ रहती है जो छेड़छाड़, ठगी, चोरी व गुंडागर्दी की नीयत से वहां आते हैं. वे जूतेचप्पलों, पर्स, जेवर और दूसरी चीजों पर धड़ल्ले से हाथ साफ करते हैं, लेकिन भगवान उन की इस बदनीयती का उन्हें कोई दंड नहीं देता.

हर तरह से नुकसान तो बस, श्रद्धालुओं का ही होता है. इस के बावजूद श्रद्धालुओं की आंखें व दिमाग की खिड़की बंद पड़ी रहती है और पुण्य लूटने के चक्कर में खुद ही लुटतेपिटते और मरतेखपते रहते हैं.

श्रद्धा का ज्वार

दाढ़ीचोटी वालों की मनगढं़त बातों पर आंख मूंद कर भरोसा करने वाले अपनी ग्रह चाल सुधारने, पुण्य कमाने और धर्म लाभ उठाने में लगे रहते हैं ताकि भगवान उन पर खुश हो जाए. इस चक्कर में धर्मभीरु भीड़ अपना कामधाम और मेहनत छोड़ कर बेमतलब के कर्मकांड करती है और जब कोई दुर्घटना घटती और उस में जो लोग मरते हैं तो उन पर रोया जाता है. सरकार भी मरने वालों के परिजनों को कुछ रकम दे कर उन के आंसू पोंछ देती है.

आजकल ज्यादातर मंदिरों में भगवान के दर्शन भी बड़ी मुश्किल से होते हैं, क्योंकि पंडेपुजारी जानबूझ कर ऐसे नियम बनाते हैं जिन से बेहिसाब भीड़ लगी रहे और उन की तिजोरी भरती रहे. यदि दिन भर मंदिरों के कपाट खुले रहें तो भीड़ नहीं बढ़ेगी और न ही कोई हादसा होगा.

दर्शन करने वालों की भीड़ काबू में रहे वे ऐसे इंतजाम भी नहीं करते. अत: धार्मिक जगहों पर भीड़ व अराजकता बढ़ रही है. इस बारे में कोई सोचता तक नहीं. सचाई यह है कि धर्म एक धंधा है और बिना भीड़ के हर धंधा मंदा रहता है.

दोषी आयोजक

बेहद लापरवाही, बदइंतजामी व गैरजिम्मेदारी के नमूने धार्मिक मेलों के आयोजनों में आमतौर पर देखने को मिलते हैं, वजह उन का असली मकसद तो महज श्रद्धालुओं की जेब ढीली करना भर होता है. लोग मरते हैं तो मरें. इस की परवा कौन करता है?

रेल और बसों में रोज जहरीला प्रसाद खिलाने की घटनाएं होती हैं. धर्म की आड़ में लोग बेवकूफ बनाए जाते हैं. कई भक्त तो बेहोश व जख्मी हो जाते हैं फिर भी आयोजकों का बाल बांका नहीं होता.

आस्था लोगों की जान व उन के माल से भी ऊपर निकल जाती है इसलिए जराजरा सी बात पर भक्तों की भीड़ में भगदड़ मच जाती है. इस तरह के हर मामले में खता आयोजकों की होती है किंतु भोगते श्रद्धालु हैं जबकि बेवजह होने वाले अनचाहे हादसों से बचना बहुत जरूरी है.

टूटती सड़कें मरती नदियां

मंदिरों के साथसाथ नदी किनारे होने वाले धार्मिक आयोजनों में जुड़ने वाली भीड़ से कई तरह की समस्याएं खड़ी हो जाती हैं. भगदड़ मचने पर हिंसा होने व जाम लगने की स्थिति आ जाती है, रास्ते बंद हो जाते हैं. आपस में तनाव बढ़ जाता है. इस की परवा किसे है?

जहांतहां नदियों में पूजा सामग्री, फूल, शव, राख और मूर्तियां आदि बहाने से गंदगी बढ़ रही है, मछलियां मर रही हैं. रोज टनों कूड़ाकचरा इन सूखती हुई नदियों में बहाया जा रहा है. नतीजा हमारे सामने है कि बड़ीबड़ी नदियां भी अब गंदे नालों में तब्दील हो रही हैं. उन्हें साफ रखना क्या भक्तों व श्रद्धालुओं की जिम्मेदारी नहीं है?

बेकाबू भीड़, अंजाम बुरा

1954 में लगे इलाहाबाद के कुंभ मेले में 800 लोग मरे थे. हरिद्वार में 1984 में 200, 1986 में 50 तथा 1989 के अर्धकुंभ में 350 तीर्थयात्री अपनी जान से हाथ धो बैठे थे.

केरल के सबरीमला मंदिर में मची भगदड़ से 51 भक्तों की मौत हुई थी. यही नहीं नासिक कुंभ में 39 भक्तों की जान गई थी.

धार्मिक उत्सवों में हिंसा, उपद्रव व आग लगने से हुए हादसे भी कोई नई बात नहीं हैं. बीते दशहरा मेले में अकेले उत्तर प्रदेश में ही बाराबंकी, हरदोई व कोशांबी आदि कई जिलों में हिंसक घटनाएं हुईं. कहीं मूर्ति विसर्जन पर तो कहीं जुलूस का रास्ता बदलने भर की जरा सी बात पर भक्त इतना भड़के कि तोड़फोड़ व पथराव करने पर उतारू हो गए थे.

खुद ही संभलना होगा

भक्ति के नाम पर लोग जान देने तक से भी नहीं हिचके, ऐसे किस्सेकहानी हिंदू धर्म की किताबों में भरी पड़ी हैं. कथा सत्संग में भी ऐसी बातें खूब बताई जाती हैं कि भगवान के रास्ते पर चलते हुए मरोगे तो सीधे स्वर्ग, मोक्ष और बैकुंठ मिलेगा.

मरने के बाद यह सब किस ने देखा है? इसलिए श्रद्धालुओं के हिस्से में तो सिर्फ दुख तकलीफ ही आती हैं. हां, भक्तों की भीड़ से मुफ्तखोर खूब माल बटोरने व मलाई खाने में लगे रहते हैं. ऐसे लोग कभी नहीं चाहते कि धार्मिक जगहों पर या धार्मिक जलसों में लोग कम जुटें, भीड़ न हो.

धार्मिक अहंकार और दरिद्रता को उजागर करते भंडारे

भूखे को खाना खिलाने से लाख गुना ज्यादा पुण्य मिलता है. यह सिद्धांत धर्म के ठेकेदारों ने काफी पहले झटक लिया था. नतीजतन, भूख का सामाजिक पहलू और दूसरी आर्थिक विसंगतियां समझने के लिए अपने देश में ज्यादा व्यावहारिक कोशिशें हुई ही नहीं और जो हुईं भी वे अर्थशास्त्र के पाठ्यक्रम का हिस्सा बन कर रह गईं. मुद्दे की बात आम लोग समझ नहीं पाए कि पंडितों ने भूख, गरीबी और दरिद्रता को भाग्य और पूर्वजन्मों का फल बता कर एक धार्मिक मान्यता की शक्ल में स्थापित कर अपनी साजिश को अंजाम दे दिया है.

आज भी ज्यादातर गरीब लोग छोटी जातियों के हैं और इन पर अपना दबदबा बनाए रखने को ऊंची जाति वालों ने बड़े पैमाने पर नया चलन भंडारों के आयोजन का शुरू कर दिया है.

आजकल पूरे देश में भंडारे इफरात से हो रहे हैं, जहां भूखेनंगे, गरीबों की फौज पंडालों में बैठी देखी जा सकती है. अब तो झुग्गीझोंपड़ी वाले मेहनतकश भी भंडारों में शिरकत करने लगे हैं, जो भिखारी कहीं से नहीं हैं पर खाने का पैसा बचना इन के लिए अहमियत रखता है.

भंडारों का खतरनाक सच

अमीरों को चूंकि धर्म के नाम पर कुछ करना होता है इसलिए वे भंडारों में दिल खोल कर सहयोग करते हैं. भंडारे के आयोजकों की इच्छा भी अपनी दुकानदारी चमकाए रखने की होती है. इसलिए उन की कोशिश यह रहती है कि भंडारों में मैलेकुचैले लोगों की भीड़ दिखे जिस से पैसे वालों को पुण्य की झलक दिखला कर यह बताया जा सके कि दिया गया चंदा बेकार नहीं गया.

भंडारा एक शुद्ध धार्मिक आयोजन है, जो झांकियों, देवीदेवताओं की जयंती या फिर नवरात्रि के दिनों में ही किया जाता है. एक पंडाल में सैकड़ों भूखे पूरी, सब्जी, रायते और खीर पर टूटे हों इस से ज्यादा फख्र की कोई बात धार्मिक दुकानदारों और दानदाता के लिए हो भी नहीं सकती.

इन का मकसद पकवानों की आड़ में गरीबों को यह जताना भर रहता है कि आज जायकेदार खाना तुम्हें भगवान की कृपा से मिला है, हम तो जरिया भर हैं. मगर चूंकि तुम किस्मत में सूखी रोटी लिखा कर लाए हो इसलिए कल से वही खाना. कुछ अच्छे कामों की वजह से आज तुम्हें पकवान मिल गए हैं.

छोटी जाति के गरीब, जो भूख के आगे बेबस होते हैं, अपने स्तर पर इस दर्शन को खाने के साथ हजम कर जाते हैं. उन्हें समझ आ जाता है कि जब दोष भाग्य का ही है तो फिर अपनी बदहाली का जिम्मेदार राजनीति, साहूकारी, भेदभाव, छुआछूत या सामंती व्यवस्था को ठहराने से फायदा क्या.

भंडारों के आयोजनों का एक खतरनाक सच लोगों पर थोड़े से खाने का एहसान रख भाग्यवादी सोच को बढ़ावा देना भी है. खिलाने और खाने वाले दोनों बराबरी से जानते हैं कि 2-4 दिन के भंडारों से भूख हमेशा के लिए नहीं मिट जाने वाली. यहां से उठ कर मांगना तो भीख ही है या फिर पहले की तरह हाड़ तोड़ना है.

कौन हैं ये लोग

आमतौर पर भंडारों का आयोजन झांकी या उत्सव समितियां करती हैं, जिन के कर्ताधर्ता छोटेमोटे व्यापारी, दुकानदार और समाजसेवीनुमा नौकरीपेशा लोग होते हैं, मगर हकीकत यह है कि परदे के पीछे का प्रपंच हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्ता रचते हैं. इन लोगों की भूमिका तो चंदा दे कर नाम और पुण्य कमाने में समेटने की कर दी जाती है.

भंडारों का आयोजन जिन लोगों के चंदे से किया जाता है वही किराना व्यापारी आटा, मसाले, दाल, तेल देते हैं तो नौकरीपेशा चंदा दे कर तंबू गाड़ते हैं, टैंट हाउस से धर्म के नाम पर लाया गया फोकट का सामान इस्तेमाल करते हैं. भंडारों का आयोजन करने वाले सरकारी जमीन इस्तेमाल करें, घटिया सामान लोगों को दें, मुनाफाखोरी करें, सब ठीक. उन्हें उकसाने वालों की नजर तो उन के पैसे पर होती है.

हिंदूवादी, जो धर्म के नाम पर भंडारों के आयोजनों के लिए इन्हें उकसाते हैं, पूरी तरह खुल कर सामने नहीं आते. आयोजन की रूपरेखा 2-4 भरोसेमंद लोगों को ही समझाई जाती है.

इस से दोहरा फायदा होता है. आम पैसे वाले लोग भी धर्म से जुड़े रहते हैं और खुद की महत्ता जताने, कई गरीबों को भी धर्म के बड़े बैनर तले खींच कर लाने का काम निशुल्क करते हैं.

यों होता है प्रचारप्रसार

वैसे तो देसी शराब की तरह पकवानों की गंध ही भंडारों का विज्ञापन होती है, मगर भीड़ जुटाने और एक धार्मिक कृत्य की प्रदर्शनी दिखाने के लिए प्रचारप्रसार के भी तौरतरीके आयोजक अपनाते हैं. मसलन, परचे छपवा कर बंटवाना, अखबारों में समाचार छपवाना और आयोजकों द्वारा भिखारियों को कहना कि अमुक दिन यहां भंडारा रखा गया है. लाउडस्पीकर से भी लगातार भंडारे का बखान किया जाता है कि यह खाना प्रसाद है, इस का महत्त्व ही अलग है.

भिखारी समुदाय में बगैर किसी वेबसाइट के इंटरनेट की तर्ज पर यह बात फैलती है कि फलां झांकी या मंदिर में कब भंडारा है. दुकानदार अपने गरीब ग्राहकों को भंडारे का समाचार दे देता है.

धर्म के नाम पर भूख का मजाक भंडारों में देख कर किसी भी संवेदनशील आदमी का दिल दहल सकता है. दूसरी भाषा में कहें तो द्रवित हो सकता है. सुबह से ही भूखे, अधनंगे बच्चे और औरतें चेहरे पर खाने की आस लिए सहमे से तंबू के इर्दगिर्द जमा होने लगते हैं.

भंडारे का खाना पूरे धार्मिक विधिविधान यानी पाखंडों के बाद ही खिलाया जाता है. पहले पुजारी द्वारा देवी या देवता की आरती होती है, भोग लगता है, जयकारे होते हैं फिर जमा हुए अतिथियों को खाना परोसा जाता है. दोटूक शब्दों में कहा जाए तो खिलाने की शर्त बलात धार्मिक कृत्य थोपना है.

इस से भंडारों की महत्ता प्रदर्शित होती है कि आज भी ऊंची जाति वाले अपना अहंकार तुष्ट करने के लिए गरीब और छोटी जाति वालों को नीचे बैठाते हैं. भंडारों के जरिए ऊंची जाति के आयोजक यह जताने से नहीं चूकते कि अभी भी हम दाता हैं और तुम भिखारी, जिस की वजहें धर्म को मानने की मात्रा, जाति और कर्म है.

भंडारों के आयोजक ऊंची जाति के ही क्यों होते हैं? खाना खिलाने की अनिवार्य शर्त पूजापाठ, भोग, प्रवचन देखना क्यों है? इन सवालों का जवाब उतना ही कड़वा है जितना बगैर तर्क किए यह मान लेना कि भूखेनंगे लोग ईश्वर ने कर्म और जाति के आधार पर रचे हैं.

भूखे को खाना खिलाना कभी सामाजिक जिम्मेदारी नहीं समझा गया, स्वर्ग की सीढ़ी चढ़ने का लाइसेंस माना गया है. इसलिए भंडारे फलफूल रहे हैं. इन में कुछ के राजनीतिक स्वार्थ हो सकते हैं मगर चिंता की बात गरीबी और दरिद्रता को धर्म के कैमरे से पेश करना है. सामूहिक अहंकार की अभिव्यक्ति करते ये भंडारे नए तरीके से ऊंचनीच और जातपांत को बढ़ावा दे रहे हैं. कोई ऊंची जाति वाला फिल्मी शैली में भी इन अछूतों के साथ बैठ कर नहीं खाता पर खिलाने में शान समझता है.

हाथ में बंदूक और सरकार का भगवा कवच

जिस के हाथ में बंदूक और ऊपर से सरकार का भगवा कवच हो, उस की शक्ति तो अपरंपार है. ऐसा हमारे ग्रंथों में लिखा है, बस, फर्क यह है कि वहां बंदूक की जगह तीरकमान या चक्र होता था. उत्तर प्रदेश पुलिस चूंकि राम और कृष्ण की भूमि की है, उस के पास ग्रीन सिगनल है कि वह इन अधिकारों का निश्चित हो कर उपयोग करे.

सितंबर के अंतिम दिनों में लखनऊ में जिस कौंस्टेबल ने कार न रोकने पर उस के चालक को रिवौल्वर की गोली से मार डाला, उस ने कोई गुनाह नहीं किया.

वह तो मृतक विवेक तिवारी को उस के पापों का फल मिला है और कौंस्टेबल प्रशांत अपने ऊपर वाले द्वारा दिए अधिकारों का पालन कर रहा था. स्वयं ईश्वर के अवतार ने आदेश दे रखा है कि प्रदेश के सारे दस्युओं को मारमार कर समाप्त कर दो चाहे उन के अपराध साबित हुए हों या न हों. दस्युओं का उन्मूलन करना हर ऋषिमुनि और उन के इशारों पर चल रहे दासों का प्रमुख कर्तव्य है. उत्तर प्रदेश व दूसरे कई राज्यों की सरकारें इसे भलीभांति निभा भी रही हैं.

पुलिस हर देश में निरंकुश ही होती है. उम्मीद थी कि हमारा लोकतंत्र और मीडिया उस पर नकेल कसने में सफल होंगे पर लगता है यह केवल खयाली पुलाव है. जिस विवेक तिवारी को बिना अपराध किए मार डाला गया है उस पर रोष प्रकट करने से कुछ नहीं होगा. ऐसा करना, असल में, राष्ट्रद्रोहियों के हाथों में खेलना होगा. यह स्पष्ट है कि आज हर पुलिस अफसर स्वयं शक्तिपुंज है और उसे अपने मुख्यमंत्री से अभयदान मिला हुआ है.

प्रायश्चित्त के रूप में यह कौंस्टेबल कुछ दिन जेल में बने सुविधाजनक घर में रहेगा, फिर छूट जाएगा और बाद में भगवा पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ कर विधायक बन जाएगा. ऋषिमुनियों की सेवा करने वालों को मेवा मिलता है, यह आज स्पष्ट है. और जो सेवा करता है वह मां की हत्या करते हुए, अवतार परशुराम की तरह पूछता भी नहीं कि गलत क्या है और सही क्या है.

झांसी की रानी से तुलना पर कंगना ने दिया ये जवाब

बॉलिवुड एक्टर कंगना रनौत ने कहा है कि उन्हें अपनी जिंदगी में बिना लड़े कुछ हासिल नहीं हुआ है. और वे नहीं चाहती कि जिस तरह उन्होंने अपनी जिंदगी जी है उस तरीके से उनके बच्चे भी जिए. ये बात उन्होंने  अपनी फिल्म “मणिकर्णिका” के पूरा होने पर एक पार्टी में मीडिया से मुखातिब होते हुए कहीं.

उन्होंने कहा,  मैं नहीं चाहती कि मेरे बच्चों को मेरी जैसी जिंदगी मिले. मुझे नहीं पता क्यों, लेकिन जब से मैं पैदा हुई तब से मुझे लड़ाई लड़नी पड़ी. मुझे मेरे जिंदगी में बिना लड़े कुछ नहीं मिला लेकिन मुझे न तो इस पर गर्व है और न ही शर्मिंदगी.

जब कंगना से पूछा गया कि क्या आप अपनी शख्सियत और रानी लक्ष्मीबाई में कुछ समानताएं पाती हैं?, इस पर उन्होंने कहा, मुझे लगता है उनकी जिंदगी बहुत दुखदायक थी और उन्होंने अपनी जिंदगी में बहुत संघर्ष किया था. मुझे मेरे जिंदगी में बिना लड़े कुछ नहीं मिला. यहीं एक समानता है.

फिल्म निर्माण के दौरान सामना की गईं सभी समस्याओं पर प्रतिक्रिया देते हुए कंगना ने कहा, हर फिल्म की अपना एक सफर होता है, इस फिल्म का भी अपना सफर है. यह सच है कि शूटिंग के दौरान हमें शुरुआत में कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ा लेकिन हमारी टीम बहुत मजबूत थी, इसलिए हमने इन दिक्कतों से निजात पा ली और तभी यहां हम खुशी मना रहे हैं.

नमस्ते इंग्लैंड : सिरदर्द है ये फिल्म

2007 की सफलतम फिल्म ‘नमस्ते लंदन’ की सिक्वअल फिल्म ‘नमस्ते इंग्लैंड’ देखकर अहसास होता है कि फिल्मकार ने बेमन से फिल्म बनायी है. शुरू से अंत तक फिल्म में ऐसा कुछ नही है, जिसके लिए दर्शक अपनी गाढ़ी कमाई के पैसे व अपना बहुमूल्य समय बर्बाद कर इस फिल्म को देखना चाहेगा.

फिल्म की कहानी के केंद्र में पजांब में रहने वाले परम (अर्जुन कपूर) और ज्वेलरी डिजायनर/आभूषण डिजायनर बनने का सपना देख रही जसमीत (परिणीति चोपड़ा) है.

दशहरे के दिन जसमीत को देखकर परम उस पर लट्टू हो जाता है. फिर वह दिवाली व होली के दिन उसका पीछा करता है. पर बात नहीं जमती. तब अपने दोस्तों की मदद से वो ऐसे हालात पैदा करवाता है कि उनकी मुलाकात हो जाती है और दोनों अपने प्यार को कबूल कर लेते हैं. पर जसमीत के रूढ़िवादी दादाजी (विनोद नागपाल) व भाई बहुत कड़क स्वभाव के हैं.

bollywood namaste england film review

इसलिए परम व जसमीत को छिपकर मिलने के लिए परम के दोस्त हर दिन नई कहानी गढ़ते रहते हैं. खैर, परम व जसमीत की शादी, जसमीत के दादा की इस शर्त पर होती है कि शादी के बाद भी उनकी बेटी घर से बाहर कदम रखकर नौकरी या व्यापार नहीं करेगी.

जबकि जसमीत की महत्वाकांक्षा बहुत बड़ी ज्वेलरी डिजायनर बनना है. मगर प्यार के लिए जसमीत शादी कर लेती है. शादी के बाद हनीमून के लिए स्विट्ज़रलैंड जाना है. पर शादी वाले दिन परम का अपने दोस्त से झगड़ा हो जाता है. दोस्त गुस्से में उनका वीजा ही नही होने देता.

तब गैर कानूनी तरीके से लोगों को विदेश भेजने का काम कर रहे ट्रैवेल एजेंट गुरनाम (सतीष कौशिक), परम के सामने प्रस्ताव रखता है कि वह किसी इंग्लैंड की लड़की से शादी कर मैरिज वीजा पर इंग्लैंड चला जाए.

कुछ दिन बाद उसे इंग्लैंड की नागरिकता मिल जाए, तो वह उस लड़की को तलाक देकर अपनी पत्नी जसमीत को भारत से ले जाए. परम इस प्रस्ताव को ठुकरा देता है. मगर जसमीत को तो हर हाल में इग्लैंड जाना है तो वह गुरनाम के प्रस्ताव के पंजाबी, मगर इंग्लैंडवासी समीर उर्फ सैम (आदित्य सील) के साथ शादी कर इंग्लैंड चली जाती है और परम से कहती है कि नागरिकता मिलते ही वह समीर को तलाक देकर उसे इंग्लैंड ले जाएगी. जसमीत का विछोह परम से बर्दाश्त नहीं होता.

परम को इस बात का गुस्सा है कि उसकी पत्नी जसमीत एक पुरूष यानी कि उसकी बजाय एक शहर लंदन से प्यार करती है. इसलिए क्रोध में परम गैरकानूनी रास्ते से इग्लैंड पहुंचता है. वहां पर आलिषा (अलंकृता सहाय) की मदद से जसमीत को सच्चे प्यार का अहसास करा जसमीत के साथ भारत वापस आ जाता है.

फिल्म ‘‘नमस्ते इंग्लैंड’’ बेसिर पैर की कहानी व अविश्वसनीय घटनाक्रमों से सजी फिल्म है. फिल्म का एक भी दृश्य या पल तार्किक नही लगता. लेखक ने पुरूषों की ही तरह औरत को भी घर से बाहर निकलकर काम करने की आजादी का मुद्दा उठाया, पर फिर वह खुद भटक गए. फिल्म के शुरू होने के पांच मिनट बाद ही दर्शक कहने लगता है- ‘‘कहां फंसायो नाथ.’’ बेवकूफी से भरे द्रश्यों वाली इस फिल्म के संवाद भी बहुत घटिया हैं. शादी वाले दिन परम का अपने जिगरी दोस्त से झगड़े वाला द्रश्य लेखक व निर्देशक के दिमागी दिवालिएपन को ही उजागर करता है. इसके बाद फिल्म को पूरी तरह से डुबाने में फिल्म के कलाकारों ने अपना योगदान देने में कोई कसर बाकी नहीं रखी.

जहां तक अभीनय का सवाल है तो किसी भी कलाकार का अभिनय प्रभावित नहीं करता. अति कमजोर व ठीक से न लिखे गए किरदारों की वजह से परम के किरदार के साथ अर्जुन कपूर व जसमीत के किरदार के साथ परिणीति चोपड़ा न्याय करने में पूरी तरह से विफल हैं. ‘‘नमस्ते इंग्लैंड’’ से अर्जुन कपूर व परिणीति चोपड़ा के अभिनय करियर पर कई गंभीर सवाल उठते हैं.

‘‘तेवर’’, ‘‘की एंड का’’, ‘‘हाफ गर्ल फ्रेंड’, ‘‘मुबारकां’’ जैसी असफल फिल्में दे चुके अर्जुन कपूर ने अब तक अपने अभिनय में कोई सुधार नहीं किया है. अर्जुन कपूर के चेहरे पर कहीं कोई भाव नहीं आते. अर्जुन कपूर भी अपनी तरफ से अपने अभिनय को संवारने के लिए मेहनत करते नजर नही आते. अर्जुन कपूर ने अपने अभिनय से हर द्रश्य को तबाह ही किया है.

परिणीत चोपड़ा ने एक बार फिर साबित कर दिखाया है कि उनसे उत्कृष्ट अभिनय की उम्मीद रखना बेकार है. ‘शुद्ध देशी रोमांस’, ‘दावत ए इश्क’, ‘हंसी तो फंसी’, ‘किल दिल’ व ‘मेरी प्यारी बिंदू’ जैसी असफल फिल्मों के बाद परिणीति चोपड़ा ने फिल्म ‘‘नमस्ते इंग्लैंड’’ से अपने करियर पर खुद ही कुल्हाड़ी मारने का काम किया है.

अति घटिया कहानी, अति घटिया पटकथा, अति घटिया संवादों और कलाकारों के अति घटिया अभिनय के साथ ही इस फिल्म का प्रचार भी बहुत घटिया किया गया. यदि फिल्म का प्रचार ठीक से किया गया होता, तो शायद पहले दिन फिल्म कुछ कमा लेती.

पूरी फिल्म देखने के बाद यह समझना मुश्किल हो जाता है कि निर्माता निर्देशक विपुल अमृतलाल शाह के सामने फिल्म ‘‘नमस्ते इंग्लैड’’ बनाने की क्या मजबूरी रही. निर्देशक ने पितृसत्तात्मक से प्रेरित साजिश के मुद्दे को उठाया, पर कुछ देर में ही वह इसे भूल गए. उनके निर्देशन में भी कोई चमक नही है. इस तरह की फिल्में ही भारतीय सिनेमा को बदनाम करने का काम करती हैं.

फिल्म का गीत संगीत भी भुला देने योग्य है.  दो घंटे आठ मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘नमस्ते इंग्लैंड’’ का निर्माण विपुल अमृतलाल शाह, समीर चोपड़ा, फिरोजी खान, जयंतीलाल गाड़ा आदि ने किया है. फिल्म के निर्देशक विपुल अमृत लाल शाह, पटकथा लेखक सुरेष नायर,संगीतकार हिमेष रेषमिया व पार्श्वसंगीतकार सलीम सुलेमान, कैमरामेन जोनाथन ब्लूम तथा फिल्म को अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं – अर्जुन कपूर, परिणीति चोपड़ा, सतीश कौशिक, आदित्य सील, अनिल मांगे, अलंकृता सहाय, विनोद नागपाल व अन्य.

स्टारडम के लिए इन हसीनाओं ने उतारे कपड़े

बौलीवुड ने भी हौटनेस और बोल्ड सीन के मामले में हौलीवुड को टक्कर देना शुरू कर दिया है. ऐसा इसलिए क्योंकि इस तरह के सीन फिल्मानें में बौलीवुड अब कतराता नहीं है. ऐसे में कई अभिनेत्रियां इसके लिए आसानी से राजी भी हो जाती हैं. आज हम बात कर रहे हैं ऐसी ही अदाकाराओं की जिन्होंने बड़े परदे पर अपने तन से सारे परदे हटाकर बोल्डनेस की सारी हदें पार कर दी थीं…तो आइए जानते हैं इनके बारे में..

सनी लियोनी

bollywood

इस लिस्च में सबसे पहला नाम आता है बौलीवुड की ‘बेबी डौल’ सनी लियोनी का. उनके द्वारा फिल्म ‘रागिनी एमएमएस 2’ में फिल्माएं गए न्यूड सीन ने सबको हिला कर ही रख दिया था.

शर्लिन चोपड़ा

इंटरनेट पर अपने बोल्ड फोटोज से आग लगाने वाली एक्ट्रेस शर्लिन चोपड़ा ने फिल्म ‘कामासूत्र’ में न्यूड होकर फिल्मी परदे पर आग लगा दी थी.

कल्कि कोचलिन

एक्ट्रेस कल्कि कोचलिन फिल्मों में अपने बिंदास अंदाज के लिए जानी जाती हैं. बता दें कि उन्हें फिल्म ‘Margarita With A Straw’ में एक न्यूड सीन देते हुए देखा गया था.

राधिका आप्टे

राधिका आप्टे ने अपनी एक्टिंग के दम पर ही बौलीवुड में खास जगह बनाई है. वह फिल्मों में छोटे-छोटे बोल्ड सीन देने के चलते फेमस हुई थीं. लेकिन फिल्म ‘पार्च्ड’ में उन्होंने अपने अंदाज से सबको हिला ही डाला.

जीनत अमान

जीनत अमान ने फिल्म ‘सत्यम शिवम सुन्दरम’ में बेहद चौंकाने वाले सीन्स दिए थे. जीनत को अपने जमाने की बोल्ड अभिनेत्रियों में से एक माना जाता रहा है.

पूनम पांडे

इंटरनेट सेंसेशन में शामिल होने वाली एक्ट्रेस पूनम पांडे की अदाओं के तो कई दीवाने हैं. पूनम के फैन्स को भी उनकी नई-नई बोल्ड तस्वीरों का इंतजार रहता है. बता दें कि फिल्म ‘नशा’ में पूनम ने न्यूड होकर अपने हुस्न का लोहा मनवाया था.

सीमा रहमानी

साल 2005 में आई फिल्म ‘सिंस’ में सीमा रहमानी ने न्यूड होकर फिल्म इंडस्ट्री में तहलका मचा दिया था.

दीपा साही

माया मैमसाहब में एक्ट्रेस दीपा साही ने बौलीवुड के बादशाह शाहरुख खान के साथ बेड सीन दिया था जिसमें वह फुली न्यूड थीं. बता दें कि शाहरुख खान का भी यह पहला बोल्ड सीन था.

नंदना सेन

साल 2014 में रिलीज हुई मोस्ट कंट्रोवर्शियल फिल्म ‘रंग रसिया’ से एक्ट्रेस नंदना सेन ने जबरदस्त सुर्खियां बटोरी थीं. फिल्म में उनके साथ एक्टर रणदीप हुड्डा थे जिनके साथ नंदना ने बहुत ही बोल्ड सीन दिये थे.

सिमी ग्रेवाल

आखिर में बात करेंगे एक्ट्रेस सिमी ग्रेवाल की जिन्होंने फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ और ‘सिद्धार्थ’ जैसी फिल्मों में गजब के बोल्ड सीन दिए थे जिनमें वह इस दौरान फुल न्यूड भी हुई थीं.

बुलेट ट्रेन कितनी जरूरी

बड़े बांधों जैसे टिहरी और सरदार सरोवर परियोजनाओं को छोड़ दिया जाए तो हिंदुस्तान के इतिहास में किसी और सरकारी परियोजना का अब तक इतना जबरदस्त विरोध कभी नहीं हुआ जितना अहमदाबाद से मुंबई के लिए प्रस्तावित बुलेट ट्रेन परियोजना का हो रहा है. इस विरोध के कईर् पहलू हैं, लेकिन जो इसे सब से ज्यादा मुखर बनाता है, वह यह सवाल है कि क्या सचमुच अहमदाबाद से मुंबई के बीच बुलेट ट्रेन को चलाया जाना बहुत जरूरी है? निश्चित ही इस सवाल का जवाब है, नहीं.

अगर हम प्रस्तावित बुलेट ट्रेन को जबरदस्ती देश की शान से न जोड़ें तो ऐसा कोई तर्क नहीं है जो इस परियोजना को एक जरूरी परियोजना बता सके. शायद यही वजह है कि सितंबर 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने मिल कर अहमदाबाद से मुंबई के बीच प्रस्तावित जिस महत्त्वाकांक्षी बुलेट ट्रेन परियोजना की नींव रखी थी, अब तक वह लगभग नींव रखे जाने की स्थिति में ही है.

योजना के मुताबिक, 350 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से चलने के लिए प्रस्तावित हिंदुस्तान की इस सब से तेज ट्रेन की निर्माण परियोजना का कार्य इस साल के मध्य तक खूब जोरशोर से शुरू हो जाना था. लेकिन इस प्रस्तावित परियोजना की न तो अभी शुरुआत हुई है और न ही जरूरी जमीन का अधिग्रहण हुआ है. मतलब साफ है कि परियोजना शुरू हो जाने के बाद ट्रेन भले कितनी ही रफ्तार से चले लेकिन फिलहाल तो उस की निर्माण परियोजना पैसेंजर टे्रन से भी ज्यादा सुस्त है.

सवाल है आखिर देश की अब तक कि सब से तेज प्रस्तावित ट्रेन की यह निर्माण परियोजना इतनी सुस्त क्यों है? जाहिर है इस की वजह इस का जबरदस्त विरोध है. जिद पर उतारु केंद्र सरकार मोदी सरकार भले ही इस परियोजना को देश के विकास का अगला चरण बता रही हो या इसे नैक्स्ट इंडिया का सिंबल बना रही हो, लेकिन व्यावहारिक हकीकत यही है कि इस परियोजना से ज्यादातर लोग नाखुश हैं. 4 राज्यों के जिन किसानों की उपजाऊ जमीन इस तेज रफ्तार बुलेट ट्रेन परियोजना के लिए अधिग्रहित की जानी है, वे तो इस का विरोध करते ही हैं, वे लोग भी इस का विरोध कर रहे हैं जिन्हें हम रेल परिवहन के संदर्भ में विशेषज्ञों का दर्जा दे सकते हैं.

बावजूद इस के मोदी सरकार किसी भी विरोध को बिना भाव दिए अपने निर्णय पर अडिग है कि बुलेट ट्रेन 2022 तक भारत की हकीकत होगी. सवाल है, क्या वास्तव में हिंदुस्तान के लिए बुलेट ट्रेन इतनी जरूरी है कि किसी भी किस्म के विरोध को कान न दिया जाए या फिर इस परियोजना का हर तरफ से हो रहा जबरदस्त विरोध देख कर सरकार जिद पर उतर आई है? आइए, इस सवाल को इस क्षेत्र के तमाम विशेषज्ञों के निष्कर्षों की कसौटियों पर कस कर देखते हैं.

रेल परिवहन के जितने भी जानकार हैं, उन में से ज्यादातर, फिर वे चाहे इंजीनियर हों, चाहे दूसरे तकनीकी विशेषज्ञ हों या आर्थिक प्रबंधक ही क्यों न हों, सब के सब बुलेट ट्रेन परियोजना का किसी न किसी स्तर पर विरोध कर रहे हैं. इन सब का एक आवाज में कहना है कि यह जबरदस्त घाटे वाली परियोजना है. तमाम विशेषज्ञ दबी जबान यह आशंका भी जाहिर कर रहे हैं कि इस परियोजना को जिस तरह तमाम विरोध के बावजूद पूरा करने की सरकार जिद कर रही है, उस के पीछे कहीं कोई बड़ा खेल तो नहीं हो रहा है?

यात्रियों को जरूरत नहीं बुलेट ट्रेन परियोजना का यह विरोध इसलिए भी विरोध के लिए विरोध नहीं लग रहा, क्योंकि हाल ही में पूरे देश में मैट्रोमैन के नाम से मशहूर ई श्रीधरन ने भी बुलेट ट्रेन परियोजना की जबरदस्त मुखालफत की है. श्रीधरन के मुताबिक, ‘‘बुलेट ट्रेन सिर्फ संभ्रांत वर्ग के सपनों को पूरा करेगी. आम लोगों के लिए यह इतनी महंगी है कि वे कभी भी इस की सेवाएं हासिल नहीं कर पाएंगे. भारत को बुलेट ट्रेन की जगह एक आधुनिक, साफसुथरी, सुरक्षित और तेज रेल प्रणाली की जरूरत है.’’

हैरानी की बात यह है कि बुलेट ट्रेन की जरूरत अभी तक यह कह कर बताई जाती रही है कि मुंबई से अहमदाबाद या अहमदाबाद से मुंबई आनेजाने वाले ऐसे यात्रियों, जो लग्जरी यात्रा के लिए पैसा खर्च कर सकते हैं, को ऐनवक्त पर जरूरत भर के टिकट नहीं मिल पाते हैं. इसलिए हर दिन कुछकुछ घंटों के अंतराल में बुलेट टे्रन की जरूरत है ताकि महंगी टिकट खरीदने वाले यात्रियों को टिकट मिलने की चिंता न करनी पड़े.

लेकिन मुंबई और अहमदाबाद के बीच लग्जरी सीटों की कमी की यह बात किस कदर झूठ है, इस का खुलासा गत दिनों एक आरटीआई से हो चुका है. मुंबई के आरटीआई ऐक्टिविस्ट अनिल गलगली ने पश्चिम रेलवे से आरटीआई के जरिए यह जानकारी हासिल की है कि अहमदाबाद और मुंबई के बीच चलने वाली तमाम लग्जरी रेलगाडि़यों की 40 फीसदी सीटें खाली रहती हैं, जिस से पश्चिम रेलवे को हर महीने 10 करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ रहा है.

हालांकि आरटीआई से हासिल जवाब में तो यह नहीं कहा गया, लेकिन व्यक्तिगत रूप से पूछने पर पश्चिम रेलवे के तमाम बड़े अधिकारी अपना नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि 2016 से 2017 के बीच पश्चिम रेलवे के कई प्रबंधक मुंबई और अहमदाबाद के बीच चलने वाली कम से कम 5 ट्रेनों को बंद करने की सिफारिश कर चुके हैं.

गौरतलब है कि मुंबई और अहमदाबाद के बीच हर दिन 11 और पूरे सप्ताह में 81 रेलगाडि़यां चलती हैं. साथ ही, मुंबई और अहमदाबाद के बीच के 491 किलोमीटर के फासले को पूरा करने के लिए देश का सब से अच्छा 6 लेन का ऐक्सप्रैसवे भी मौजूद है, जिस से महज 4 से साढे़ 4 घंटे में मुंबई से अहमदाबाद पहुंचा जा सकता है. यही नहीं, अहमदाबाद से मुंबई के लिए और मुंबई से अहमदाबाद के लिए हर दिन 10 उड़ानें भी हैं और हैरानी की बात यह है कि इन उड़ानों में भी औसतन 10 फीसदी सीटें खाली ही रहती हैं.

सवाल है कि मुंबई और अहमदाबाद के बीच इतने बेहतरीन यातायात नैटवर्क के बाद भी आखिरकार बुलेट टे्रन चलाने की इस कदर जिद क्यों की जा रही है? यह सवाल इसलिए भी मौजूं है क्योंकि मुंबई और अहमदाबाद के बीच जब आज की तारीख में सभी तरह के माध्यमों से सफर करने वाले लोगों की तादाद 40 हजार नहीं है तो फिर बुलेट ट्रेन के लिए हर दिन इतने यात्री कहां से मिल जाएंगे, वह भी तब जब बुलेट ट्रेन का किराया हवाई जहाज से अगर ज्यादा नहीं, तो कम भी नहीं होगा.

बुलेट ट्रेन परियोजना का विरोध सिर्फ वे किसान ही नहीं कर रहे जिन की इस परियोजना के तहत जमीन अधिग्रहीत की जा रही है बल्कि इस का दबाछिपा विरोध वे तमाम विशेषज्ञ भी कर हैं जो इस परियोजना के साथ किसी न किसी रूप में जुडे़ हैं.

गौरतलब है कि नैशनल हाईस्पीड रेल कौर्पोरेशन लिमिटेड के अब तक कई अधिकारियों ने जमीन अधिग्रहण सर्वे पर जाने से इनकार कर दिया है. हालांकि एनएचएसआरसीएल इस तरह की किसी भी बात से इनकार करता है और इसे किसानों का शिगूफा बताता है. लेकिन 2022 तक पूरी होने वाली एक लाख

10 हजार करोड़ रुपए की इस बुलेट ट्रेन परियोजना का विरोध महज महाराष्ट्र के कुछ किसान ही नहीं कर रहे हैं बल्कि केंद्रशासित दादर और नगर हवेली के साथसाथ गुजरात और महाराष्ट्र के 312 गांवों के 5,000 से ज्यादा किसान परिवार इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं. उन का कहना है कि इस परियोजना के चलते उन की 850 हेक्टेयर उपजाऊ जमीन अधिग्रहीत होनी है, जिस से वे हमेशाहमेशा के लिए आर्थिक रूप से मुहताज हो जाएंगे.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें