प्यार ने किया शिकार

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जनपद का एक कस्बा है धाता. यह कस्बा दूध, घी, खोया तथा दूध से बने उत्पादों के लिए मशहूर है. इसी कस्बे में दयाराम यादव अपने परिवार के साथ रहता था. उस का दूध, घी का अच्छा कारोबार था. उस के परिवार में पत्नी मालती के अलावा 2 बेटियां थीं.

दयाराम अपने नजदीक के गांवों से दूध खरीदता, उस से घी और खोया तैयार कर के उसे खागा, धाता, फतेहपुर आदि के थोक बाजारों में बेच देता था. इस काम में दयाराम की बेटियां और  पत्नी भी उस की मदद करती थीं.

वक्त की बयार चलती रही. रेखा और सुलेखा का बचपन किशोरावस्था के सांचे में ढला और निखरता हुआ जवानी में तब्दील हो गया. बेटियां जवान हुईं तो पिता को उन की शादी की चिंता सताने लगी. दयाराम को अपनी बड़ी बेटी रेखा के लिए लड़के की तलाश में अधिक भागदौड़ नहीं करनी पड़ी.

दयाराम ने अपने ही जिले के बिंदकी कस्बे के एक संपन्न खोया व्यापारी घनश्याम के बेटे रामबाबू से रेखा का विवाह कर के मुक्ति पा ली. लेकिन दूसरी बेटी सुलेखा बहुत खूबसूरत थी. इसलिए उस के योग्य लड़का तलाशने में काफी भागदौड़ करनी पड़ी.

ऐसे लड़के की तलाश में उन्हें समय तो जरूर ज्यादा लगा, लेकिन उन के मन मुताबिक एक लड़का फतेहपुर जिले के बेरुई गांव में मिल गया. लड़का था रामसिंह यादव का बेटा दिनेश यादव.

दिनेश अपने 3 भाइयों में सब से बड़ा था. उम्र में वह सुलेखा से बड़ा जरूर था, लेकिन संपन्न था. दिनेश कम उम्र से ही पिता के साथ खेतीबाड़ी करने लगा था. इसी वजह से वह अधिक पढ़लिख नहीं पाया था.

लड़का पसंद आया तो बातचीत आगे बढ़ी. आखिर सुलेखा की शादी दिनेश से हो गई. ससुराल में जिसने भी सुलेखा को देखा सभी ने उस के रूप सौंदर्य की प्रशंसा की. दिनेश भी  सुलेखा को पा कर बहुत खुश था.

समय अपनी गति से गुजरता रहा. धीरेधीरे दोनों की शादी को 8 साल बीत गए. शादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी सुलेखा की गोद नहीं भरी थी.

दिनेश ने सुलेखा का कई डाक्टरों से इलाज कराया. झाड़फूंक के लिए तांत्रिकों, ओझाओं के पास गया, लेकिन उस की कोख में कोई फूल नहीं खिला. इस के बाद घर और बाहर वाले उसे हेय दृष्टि से देखने लगे. जिस सुलेखा को ससुराल वालों ने विवाह के बाद सिरआंखों पर बिठा लिया था, वही अब उसे देख कर नजरें फेरने लगे थे.

घरपरिवार के लोगों का तो उस के प्रति व्यवहार बदला ही, पड़ोसी और मोहल्ले वाले भी उस के नाम पर तरहतरह की बातें करने लगे थे. कोई उसे बांझ तो कोई उसे निपूती कहता था. जहां 2-4 औरतें इकट्ठी होतीं, वहां इस तरह की बातें कुछ ज्यादा ही होती थीं.

एक रोज सुलेखा की उम्रदराज पड़ोसन उस के पास आई और उस ने गर्भवती होने के तमाम उपाय सुझा दिए. इस पर सुलेखा बोली, ‘‘काकी, सारे जतन कर लिए हैं हम ने, अब तो लगता है कि भगवान के घर हमारी सुनवाई नहीं होगी.’’ कहते हुए सुलेखा ने लंबी सांस भर कर छोड़ी.

सुलेखा के चेहरे पर निराशा की परत चढ़ी देख कर उस की पड़ोसन उस की कलाई पकड़ कर एक ओर ले गई. उस ने शरारत से सुलेखा के कान में फुसफुसा कर कहा, ‘‘बहू ऐसा तो नहीं कि दिनेश में ही कोई कमी हो? कमी उस में होगी पर भुगतना तुझे पड़ेगा. इस से अच्छा तो यह है कि किसी दूसरे आदमी से बीज दान करा ले.’’

‘‘कैसी बात कर रही हो काकी?’’ सुलेखा ने शर्म से अपना सिर झुका लिया, ‘‘मैं ऐसा कैसे कर सकती हूं.’’

सुलेखा की पड़ोसन ने यह बात भले ही मजाक में कही थी, मगर इस से सुलेखा के दिलोदिमाग में हलचल मचानी शुरू कर दी. जब भी वह अकेली होती, उस के मन में यही कशमकश रहती कि लोगों के तानों से बचने के लिए क्या उसे किसी परपुरुष की मदद लेनी चाहिए.

इसी बीच अचानक दिनेश के पिता रामसिंह की तबीयत खराब हो गई और उन्होंने चारपाई पकड़ ली. उन की बीमारी की खबर पा कर दिनेश की बुआ का लड़का अनिल उन्हें देखने आया. 30 वर्षीय अनिल कानपुर के मछरिया मोहल्ले में रहता था. वह हृष्टपुष्ट और स्मार्ट था. कपड़े का व्यवसाय करने वाला अनिल सजसंवर कर रहता था.

अनिल हालचाल जानने तो रामसिंह का आया था, लेकिन उस की नजर पड़ गई भाभी सुलेखा पर, जो उस वक्त किसी गहरी सोच में डूबी थी. अनिल ने पहले भी कई बार सुलेखा को देखा था, लेकिन उस रोज उसे सादे लिबास में देखा तो वह उस के दिल को भा गई.

उस ने सुलेखा का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की गरज से कहा, ‘‘भाभी, मुझे नहीं मालूम था कि मामा की तबीयत इतनी ज्यादा खराब है. इन का बदन तो सूख कर कांटा हो गया है.’’

‘‘तुम्हारे भैया ने दवादारू में तो कोई कसर नहीं छोड़ी है. फिर भी पता नहीं क्यों दिनबदिन कमजोर होते जा रहे हैं.’’ नजरें उठा कर सुलेखा ने निराश भाव से कहा.

‘‘नाना जी का ध्यान रखिएगा भाभी, अगर मेरे लायक कोई काम हो तो जरूर बताना.’’ अनिल ने चाहतभरी आंखें सुलेखा की आंखों में डाल दीं.

सुलेखा सिहर सी गई. अनिल काफी देर वहां बैठा रहा. इस दौरान सुलेखा की चोर निगाहें अनिल के मजबूत बदन पर पड़ीं तो उसे पड़ोसन वाली सलाह याद आ गई. सुलेखा ने अपने पति से सुन रखा था कि अनिल की पत्नी मानसिक रोगी थी, जिसे उस ने छोड़ रखा था. अनिल में सुलेखा की दिलचस्पी जागी तो पूछ बैठी, ‘‘तुम्हारी घर वाली के अब क्या हाल हैं?’’

पत्नी का नाम सुनते ही अनिल का चेहरा उतर गया. उस ने नाकभौंह सिकोड़ते हुए कहा, ‘‘भाभी, वह मेरी जिंदगी की नासूर थी. अब जैसी भी होगी, अपने मायके में होगी. और वैसे भी हर किसी के भाग्य में आप जैसी सुंदर और सुशील बीवी तो होती नहीं.’’ कह कर उस ने एक बार फिर सुलेखा को भरपूर नजरों से देखा.

सुलेखा को उस की नजरों में चाहत दिखी.

उस रोज के बाद अनिल मामा का हाल जानने के बहाने अकसर दिनेश के घर आने लगा. जब भी वह आता काफी देर तक सुलेखा के पास बैठ कर इधरउधर की बातें करता. उस की रसीली बातें सुलेखा के दिलोदिमाग पर हलचल मचा देतीं. इस बीच सुलेखा के पति दिनेश के स्वभाव में एक विचित्र सा परिवर्तन आ गया था.

संतान सुख से वंचित होने की मानसिकता ने उस के मन में निराशा भर दी थी, जिस के चलते उस ने शराब पीनी शुरू कर दी थी. सुलेखा में भी उस की रुचि कम हो गई थी. इस से सुलेखा के स्वभाव पर भी फर्क पड़ा. बिस्तर की तन्हाई उसे जलाने लगी थी, जिस से वह चिड़चिड़ी सी हो गई थी.

हालात धीरेधीरे सुलेखा को पतित करने की भूमिका बनाने लगे थे. एक तरफ संतान की चाहत से वंचित और पति की उपेक्षा तो दूसरी तरफ परपुरुष का आकर्षण.

एक रोज सुलेखा घर का कामकाज निपटा कर आराम करने जा रही थी कि दरवाजे पर दस्तक हुई. सुलेखा ने दरवाजा खोला तो सामने अनिल खड़ा था. उसे देख कर वह खुश होते हुए बोली, ‘‘अरे, अनिल तुम. अंदर आओ.’’

सुलेखा ने दरवाजा अंदर से बंद किया फिर मन ही मन खुश हो कर कमरे में आ गई. तभी अनिल ने उस की कलाई थाम ली और आंखों में अथाह चाहत तथा उन्माद भर कर बोला, ‘‘भाभी, तुम भी अधूरी, मैं भी अधूरा. आज इस अधूरेपन को पूरा करने का मौका है.’’

सुलेखा ने न अपना हाथ छुड़ाया और न कोई विरोध किया, बल्कि अनिल के स्पर्श से उस के बदन पर चीटियां सी रेंगने लगी थीं. अनिल को अब सब्र कहां था. बेसब्री के आलम में उस ने सुलेखा का चेहरा अपनी दोनों हथेलियों में भरा और उस का निचला होंठ अपने होंठों में भर कर चूसने लगा.

‘‘बहुत दिनों से प्यासे लगते हो.’’ सुलेखा ने उस की गरदन में अपनी बांहें फंसाते हुए कहा.

‘‘हां भाभी.’’ कह कर अनिल उस के नाजुक अंगों को सहलाने लगा, ‘‘आज मेरी प्यास बुझा दो.’’

इस के बाद दोनों ने अपनी हसरत पूरी कर ली.

एक बार अवैध संबंधों का यह सिलसिला शुरू हुआ तो फिर अकसर चलने लगा. हालांकि दोनों ने अपने इस अवैध रिश्ते को छिपाने की भरपूर कोशिश की. लेकिन कहावत है कि पाप चाहे कितना भी छिप कर किया जाए, उजागर हो ही जाता है.

ऐसा ही अनिल और सुलेखा के साथ भी हुआ. एक दिन दिनेश इंजन के लिए डीजल खरीदने फतेहपुर के लिए निकला. उस के निकलते ही अनिल आ गया. आते ही अनिल ने सुलेखा को बाहों में भर लिया.

सुलेखा ने किसी तरह अनिल की बांहों से मुक्ति पाई फिर बोली, ‘‘सब्र किया करो अनिल. आते ही भूखे भेड़िए की तरह टूट पड़ते हो. आज हमारे पास पूरा दिन है. तुम्हारे भैया डीजल खरीदने गए हैं. वहां से देर शाम तक ही लौटेंगे.’’

सुलेखा की बात सुन कर अनिल खुश हो कर बोला, ‘‘ठीक है, फिर तो पूरा दिन मस्ती करेंगे.’’ कह कर अनिल, कमरे में बैठ कर कोई किताब पढ़ने लगा और सुलेखा सजनेसंवरने लगी.

कुछ देर बाद सुलेखा सजधज कर कमरे में आई तो अनिल उसे देखता ही रह गया. वह बेहद खूबसूरत लग रही थी. अनिल ने उस की सुंदरता की जम कर तारीफ की तो वह मन ही मन खुश हुई और अनिल के साथ मस्ती में डूब गई.

दोनों का खेल चल ही रहा था कि दरवाजे पर दस्तक हुई. दस्तक से अनिल और सुलेखा घबरा गए. उन्होंने सोचा कहीं दिनेश तो वापस नहीं आ गया. सुलेखा सोच ही रही थी कि बाहर से आवाज आई, ‘‘दरवाजा खोल सुलेखा. क्या घोड़े बेच कर सो रही है?’’

दरअसल दिनेश पैसे घर में ही भूल गया था. इसलिए उसे बीच रास्ते लौटना पड़ा था.

सुलेखा ने पति की आवाज सुनी तो वह घबरा गई. वह घुटी सी आवाज में बोली, ‘‘आ रही हूं.’’ उस ने जैसेतैसे कपड़े लपेटे और दरवाजा खोला. देर से दरवाजा खोलने और सुलेखा की घबराहट व छितरे बालों से दिनेश समझ गया कि दाल में कुछ काला जरूर है. दिनेश अंदर आया तो कमरे में अनिल बैठा था. बैड की अस्तव्यस्त चादर और टूटी चूडि़यां काफी कुछ बयां कर रही थीं.

इस के बाद तो दिनेश का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. उस ने अनिल व सुलेखा की पिटाई कर दी. अपराधबोध के कारण दोनों ने पिटाई का विरोध नहीं किया.

कुछ देर बाद जब दिनेश का गुस्सा शांत हुआ तो उस ने अनिल व सुलेखा को ऊंचनीच का वास्ता दे कर समझाया भी. समझाने पर दोनों ने दिनेश से माफी मांग ली और आइंदा गलती न दोहराने का वादा किया.

उन्होंने वादा तो कर लिया था लेकिन वह ज्यादा समय तक अपने वादे पर कायम नहीं रह सके. रंगेहाथ पकड़े जाने के बाद कुछ दिन तक तो दोनों एकदूसरे से दूरी बनाए रहे किंतु बाद में उन्होंने फिर से पहले की तरह मिलना शुरू कर दिया. लेकिन अब वह बेहद सतर्कता बरतने लगे थे. सुलेखा को जब भी मौका मिलता वह अनिल को फोन कर के घर बुला लेती थी.

इसी दौरान एक घटना और घट गई. दिनेश को बैंक से नोटिस मिला कि वह कर्ज की किस्तें चुकाए अन्यथा उस की आरसी कट जाएगी. इस के लिए उसे जेल भी जाना पड़ सकता है. बैंक नोटिस मिलने से दिनेश घबरा गया. फसल खराब हो जाने से वह कर्ज नहीं चुका पा रहा था. फलस्वरूप दिनबदिन उस पर कर्ज बढ़ता जा रहा था.

सुलेखा भी परेशान हो उठी. उस ने इस बाबत अपने प्रेमी अनिल से बात की तो वह उस की मदद के लिए तैयार हो गया. पर वह चाहती थी कि पैसे लेने की बात दिनेश ही अनिल से करे.

एक दिन दिनेश कर्ज को ले कर ज्यादा परेशान दिखा तो सुलेखा ने पति को सुझाव दिया कि वह अनिल से पैसे उधार ले कर बैंक की किस्तें चुका दे. फसल कटने पर अनिल का पैसा चुका देंगे. पत्नी का यह सुझाव दिनेश को पसंद आया.

उस ने सुलेखा की मार्फत अनिल को घर बुलाया. दिनेश ने बैंक के कर्ज वाली परेशानी बता कर अनिल से पैसे उधार मांगे. अनिल ने पहले तो कुछ नखरे दिखाए फिर पैसा देने को राजी हो गया.

दिनेश ने अनिल से पैसे ले कर बैंक कर्ज चुका दिया और राहत की सांस ली. इस के बाद अनिल का सुलेखा के घर बेरोकटोक आनाजाना होने लगा. अब वह वहां रात को भी ठहरने लगा. अनिल ने दिनेश को पीने की लत भी डाल दी थी. दिनेश अब अनिल के अहसानों तले इतना दब गया था कि वह उस के रात में ठहराने के लिए भी मना नहीं कर सकता था.

अनिल की महफिल सप्ताह में 2-3 दिन दिनेश के यहां जमने लगी थी. दिनेश को मुफ्त में शराब व गोस्त की दावत मिलने लगी तो वह भी खुश रहने लगा. अनिल, शराब पीने के दौरान दिनेश को ज्यादा नशे में कर देता, जिस की वजह से कभीकभी तो वह खाना खाए बिना ही चारपाई पर लुढ़क जाता और खर्राटे भरने लगता. इस के बाद अनिल व सुलेखा रात भर मस्ती करते.

अनिल का दिनेश के घर आना और रात में रुकना पासपड़ोस के लोगों को खलने लगा तो वे कानाफूसी करने लगे. एक रोज पड़ोस में रहने वाले बुजुर्ग रामदत्त ने उसे टोका, ‘‘दिनेश, तुम रातदिन नशे में डूबे रहते हो. घर में तुम्हारी लुगाई क्या गुल खिलाती है, तुम्हें पता भी है. बेटा जानबूझ कर अनजान मत बनो. अनिल का तुम्हारे घर आनाजाना और रात में रुकना ठीक नहीं है. उन दोनों पर नजर रखो. तुम्हें खुद ही सब पता चल जाएगा.’’

दिनेश शराबी जरूर था, लेकिन मूर्ख नहीं था. रामदत्त चाचा की बात उस के कलेजे को चीरते हुए निकल गई. अब वह दोनों पर नजर रखने लगा. एक रोज अनिल दिनेश के घर आया तो उस ने शराब पीने से इनकार कर दिया.

वह अपने साथ पीनेपिलाने का सामान लाया था. उस ने पीने के लिए दिनेश को बुलाया तो उस ने बताया कि वह पहले से नशे में है. एक दोस्त के साथ खापी कर आ रहा है.

इस के बाद दिनेश सोने का बहाना कर चारपाई पर लेट गया. कुछ देर बाद दिनेश खर्राटे भरने का नाटक करने लगा तो अनिल व सुलेखा हर बार की तरह निश्ंिचत हो गए. फिर दोनों वासना का खेल खेलने लगे. आधी रात को दिनेश की आंखें खुलीं तो देखा कि सुलेखा कमरे में नहीं है.

वह दबे पांव कमरे के बाहर आंगन में पहुंच गया. आंगन में आते ही दिनेश के कदम ठिठक गए. आंगन से सटे कमरे से फुसफुसाहट और चूडि़यों की खनक की अवाज आ रही थी. दिनेश सधे कदमों से कमरे के पास पहुंच गया. दरवाजा उढ़का हुआ था. उस ने धकेला तो खुल गया. कमरे में अनिल और सुलेखा निर्वस्त्र थे.

सुलेखा को अनिल के साथ रंगरलियां मनाते देख दिनेश की मर्दानगी जाग उठी. उस ने दोनों को जलील किया. फिर सुलेखा की जम कर पिटाई की. दिनेश कुल्हाड़ी ले कर अनिल की तरफ बढ़ा तो वह जान बचा कर भाग गया. अब दिनेश की समझ में आ गया था कि अनिल उस पर क्यों मेहरबान था. क्यों उसे कर्ज दिया और क्यों उसे शराब और गोस्त की दावत देता था.

इधर रंगेहाथों पकडे़ जाने के बाद भी अनिल ने सुलेखा के घर आनाजाना बंद नहीं किया था. अब वह कर्ज मांगने के बहाने आता था. यद्यपि दिनेश अनिल के आने का विरोध करता था और उसे जलीकटी भी सुनाता था लेकिन अनिल, सुलेखा के शरीर को पाने की चाहत में सब सहन कर लेता था.

अब अनिल जब भी सुलेखा के घर आता, घर में जम कर कलह होती थी. सुलेखा को वह जलील करता अैर उस पर कड़ी नजर रखता, जिस से सुलेखा और अनिल का मिलन नहीं होता था. अनिल झुंझला कर वापस चला जाता था. अनिल के जाते ही दिनेश सुलेखा पर टूट पड़ता और उसे बेरहमी से पीटता था. वह चीखतीचिल्लाती तो लोग इकटठा हो जाते थे.

पति की प्रताड़ना से सुलेखा परेशान हो चुकी थी. अत: एक रोज जब अनिल उस के घर आया तो वह झुंझला कर बोली, ‘‘तुम कैसे मर्द हो. तुम्हारे आने से वह मुझे जानवरों की तरह पीटता है और गालियां देता है. तुम उस का कुछ नहीं कर पा रहे हो. धिक्कार है तुम्हारी ऐसी मर्दानगी पर.’’

सुलेखा ने प्रेमी की मर्दानगी को ललकारा तो अनिल बोला, ‘‘भाभी, मेरी मर्दानगी को मत ललकारो. मैं अब भी तुम्हारे लिए बहुत कुछ कर सकता हूं. तुम्हारे इशारे पर किसी की जान ले भी सकता हूं और अपनी जान दे भी सकता हूं.’’

‘‘तो फिर प्यार में रोड़ा बने दिनेश को हटा क्यों नहीं देते. कब तक मैं तुम्हारे लिए मार खाती रहूं. कब तक उस की प्रताड़ना सहूं.’’ कहते हुए उस की आंखों में आंसू भर आए.

‘‘ठीक है भाभी, तुम्हारे लिए मैं यह काम भी करने को तैयार हूं. अब तुम्हें न तो मार खानी पड़ेगी और न ही प्रताड़ना सहनी होगी.’’ इस के बाद अनिल व सुलेखा ने दिनेश की हत्या की योजना बना ली.

8 जुलाई, 2018 को अनिल, सुलेखा को अपने साथ मछरिया (नौबस्ता) ले आया. दिनेश को जब पता चला तो वह भी मछरिया पहुंच गया. मछरिया में दिनेश ने हंगामा खड़ा कर दिया.

उस ने अनिल के घर वालों को बताया कि अनिल और सुलेखा के बीच नाजायज संबंध हैं. दोनों ने उस का जीना हराम कर दिया है. अनिल के घर वालों ने किसी तरह दिनेश को समझाया और दूसरे रोज सुलेखा को उस के साथ भेजने का वादा कर दिया.

9 जुलाई की शाम को अनिल अपने दोस्त की कार ले आया. इसी कार में सवार हो कर अनिल, सुलेखा व दिनेश गांव बेरुई के लिए निकले. सरसौल कस्बा पार करने के बाद अनिल ने कार महौली गांव की ओर मोड़ दी. दिनेश के टोकने पर अनिल बोला कि महौली गांव के पास कोल्ड स्टोरेज है. वहां उस का दोस्त काम करता है, उस से मिलना है. यह सुन कर दिनेश चुप हो गया.

अनिल ने महौली गांव से पहले एक सुनसान जगह पर गाड़ी रोक दी. फिर वह पिछली सीट पर आ गया, जहां दिनेश और सुलेखा बैठे थे. सुलेखा को ले कर दिनेश व अनिल के बीच फिर से कहासुनी होने लगी.

इसी बीच दिनेश ने सुलेखा का हाथ पकड़ लिया और कार से उतर कर साथ चलने की जिद करने लगा. सुलेखा कार से नहीं उतरी तो दिनेश ने उसे 2 थप्पड़ जड़ दिए. तिलमिला कर सुलेखा बोली, ‘‘देखते क्या हो अनिल. आज इस राक्षस को सबक सिखा ही दो.’’

तब तक अंधेरा छा गया था. अनिल व सुलेखा ने कार में ही दिनेश को दबोच लिया और अंगौछे से दिनेश का गला घोंट दिया. उस की हत्या करने के बाद उन्होंने शव को कोल्ड स्टोरेज के पास झाडि़यों में फेंक दिया. इस के बाद दोनों फतेहपुर आ गए. रास्ते में उन्होंने एक ढाबे पर खाना खाया. खाना खाने के बाद अनिल, सुलेखा को उस की ससुराल बेरुई छोड़ कर कानपुर आ गया.

अगले दिन सुबह 10 बजे महौली गांव के कुछ बच्चे बकरियां चरा रहे थे, तभी उन्होंने झाडि़यों में एक युवक की लाश पड़ी देखी. बच्चों ने भाग कर गांव वालों को बताया तो वहां गांव वालों की भीड़ जुट गई. इसी बीच गांव के सरपंच धनीराम ने लाश पड़ी होने की सूचना थाना महाराजपुर पुलिस को दे दी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी रामविलास वर्मा पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने ग्रामीणों से लाश के बाबत पूछा. लेकिन कोई भी लाश को नहीं पहचान सका. शव की तलाशी ली गई तो जेब में आधार कार्ड मिला जिस में उस का नाम दिनेश, पिता का नाम रामसिंह, पता गांव बेरुई फतेहपुर लिखा था.

थानाप्रभारी ने तत्काल दिनेश की हत्या की जानकारी उस के घर वालों को दे दी और मौके की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया.

हत्या की खबर पा कर सुलेखा व अन्य लोग पोस्टमार्टम हाउस पहुंच गए. सुलेखा पति की लाश देख कर घडि़याली आंसू बहाने लगी. लेकिन साथ आए लोगों ने थानाप्रभारी को बताया कि पति की हत्या का राज सुलेखा के पेट में ही छिपा है.

यह जानकारी मिलते ही थानाप्रभारी सुलेखा को हिरासत में ले कर थाना महाराजपुर आ गए. महिला एसआई ममता सिंह ने सुलेखा से सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गई. उस ने बताया कि उस ने अपने प्रेमी अनिल की मदद से पति दिनेश की हत्या कर के लाश झाडि़यों में फेंक दी थी.

पुलिस ने सुलेखा के प्रेमी अनिल को पकड़ने के लिए उस के मछरिया स्थित घर पर छापा मारा. पुलिस को देख कर अनिल भागा भी, लेकिन पुलिस ने उसे दबोच लिया. थाना महाराजपुर में जब उस का सामना सुलेखा से हुआ तो वह समझ गया कि अब चुप रहने से कुछ नहीं होगा.

उस ने बड़ी आसानी से अपना जुर्म कबूल कर लिया. अनिल ने बताया कि सुलेखा से उस के नाजायज संबंध थे. उस का पति संबंधों में बाधक था, इसलिए उसे रास्ते से हटाना पड़ा. अनिल की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त कार व अंगौछा भी बरामद कर लिया.

चूंकि दिनेश की हत्या का जुर्म दोनों ने कबूल कर लिया था, अत: पुलिस ने सरपंच धनीराम को वादी बना कर भादंवि की धारा 302 के तहत अनिल व सुलेखा के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया और दोनों को कानूनी रूप से गिरफ्तार कर लिया.

इस के बाद 12 जुलाई, 2018 को पुलिस ने अभियुक्त अनिल व सुलेखा को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया, जहां से दोनों को जिला कारागार भेज दिया गया. कथा संकलन तक उन की जमानत स्वीकृत नहीं हुई थी. मामले की जांच थानाप्रभारी रामविलास वर्मा कर रहे हैं.

मन भाया ग्लोरी का ग्लो

23 मार्च, 2018 की बात है. इंदौर साइबर सेल के एसपी जितेंद्र सिंह अपने औफिस में बैठे थे.

तभी उन के औफिस में एक युवक आया. चारों तरफ शकभरी निगाहों से देख रहे उस युवक को देख वहां मौजूद पुलिस वालों को इस बात का एहसास हो गया कि वह युवक किसी बड़ी मुसीबत में है. युवक ने एसपी जितेंद्र सिंह से तत्काल मिलने की इच्छा जाहिर की. वहां मौजूद एएसआई ने एसपी से पूछ कर उस युवक को अंदर भेज दिया.

जितेंद्र सिंह ने युवक को बैठने का इशारा कर के उस के आने का कारण पूछा. उस युवक का नाम संजय था, उस ने बताया कि कुछ दिन पहले उस की मुलाकात दिल्ली में रह रही तंजानिया निवासी युवती ग्लोरी से हुई थी. दोनों में दोस्ती हो गई. मुलाकात के समय ग्लोरी ने मदद के नाम पर उस से 2-3 हजार रुपए मांगे, जो उसे दे दिए.

यहां तक तो ठीक था. लेकिन जल्दी ही उस की मांग लगातार बढ़ गई. यहां तक कि वह धमकी और ब्लैकमेलिंग पर उतर आई. बाद में उस की मांग लाखों तक पहुंच गई. संजय ने इस बात का खुलासा भी किया कि अब तक वह उसे करीब 15 लाख रुपए दे चुका है.

संजय ने आगे बताया कि ग्लोरी ने उस से कहा कि वह गर्भवती हो गई. उस ने गर्भ गिराने की कोशिश की, जिस से उस की तबीयत खराब हो गई और कुछ दिन पहले उस की मौत हो गई.

ग्लोरी की मौत के बाद उस की बहन और उस का एक साथी पैसा मांगने लगे. ग्लोरी के एक फ्रैंड का आज ही फोन आया था. उस ने उसे धमकी दी कि कल दोपहर तक उस के बैंक एकाउंट में 5 लाख रुपए जमा नहीं किए तो वह मेरा वीडियो वायरल कर देगा.

संजय ने एसपी जितेंद्र सिंह को बताया कि वह बुरी तरह परेशान हो चुका है. अब उस के पास 2 ही रास्ते थे, या तो वह आत्महत्या कर ले या पुलिस की मदद ले. यही सोच कर वह यहां आया है. एसपी जितेंद्र सिंह ने उसे रिपोर्ट लिखाने को कहा ताकि आगे की काररवाई की जा सके.

संजय जाने लगा तो जितेंद्र सिंह ने उस से पूछा, ‘‘आप एक ही बार ग्लोरी से मिले थे?’’

‘‘जी सर.’’

‘‘आप ने उसे गर्भावस्था में देखा.’’

‘‘जी नहीं, सर.’’ संजय ने जवाब दिया तो एसपी साहब ने अगला सवाल पूछा, ‘‘उस की शवयात्रा में शामिल हुए?’’

‘‘नहीं, मैं एक बार के बाद कभी नहीं मिला, शवयात्रा में शामिल होने का तो कोई सवाल ही नहीं था.’’

‘‘उस की बहन और भाई से कभी मिले?’’

‘‘नहीं, बस फोन पर ही बातें होती हैं.’’

‘‘ठीक है, रिपोर्ट लिखा दीजिए. हम देखेंगे सच क्या है.’’ कह कर जितेंद्र सिंह ने बात खत्म कर दी.

संजय ने एसपी साहब की बात मान कर 23 मार्च, 2018 को तंजानिया निवासी ग्लोरी के खिलाफ धोखाधड़ी और ब्लैकमेलिंग की रिपोर्ट लिखवा दी. उस ने यह भी बता दिया कि ग्लोरी छतरपुर, दिल्ली में रहती है.

साथ ही उस का और उस के तथाकथित रिश्तेदारों के फोन नंबर भी पुलिस को दे दिए. संजय ने उस बैंक एकाउंट के नंबर भी दे दिए, जिन में उस ने पैसा डाला था.

रिपोर्ट दर्ज होने के दूसरे ही दिन एसपी जितेंद्र सिंह ने इंसपेक्टर राशिद अहमद के साथ इस मामले को ले कर लंबी मीटिंग की. इस मीटिंग में जांच की रूपरेखा तय की गई.

इस के साथ ही उन्होंने राशिद अहमद के नेतृत्व में काम करने के लिए एक पुलिस टीम बना दी. इस टीम में एसआई पूजा मुवैल, आमोद, विनोद, एएसआई धीरज, हेडकांस्टेबल रामप्रकाश, रामपाल, प्रभाकर, गजेंद्र, राकेश, रमेश, करिश्मा और रजनी को शामिल किया गया.

पुलिस की इस टीम के सदस्यों को अलगअलग जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं. उसी दिन से यह टीम अपने काम पर लग गई. एसपी जितेंद्र सिंह टीम की हर गतिविधि पर नजर रखे हुए थे और सब को गाइड कर रहे थे.

छानबीन में जल्दी ही यह बात साफ हो गई कि संजय ने पुलिस को जो फोन नंबर दिए थे, वे सभी छतरपुर एक्सटेंशन, दिल्ली में चल रहे थे. साथ ही पुलिस ने उन खातों का भी पता लगा लिया जिन में संजय पैसा डालता रहा था.

ये खाते संदीप और सुमित प्रजापति निवासी दिल्ली और रीता काटजू के नाम पर थे. ग्लोरी ने जिस नंबर से फेसबुक मैसेंजर पर मैसेज और बाद में वाट्सऐप पर चैटिंग कर के संजय से दोस्ती की थी, उसी के आधार पर साइबर टीम ने कुछ ही दिनों में ग्लोरी के दिल्ली के ठिकाने और उस की गतिविधियों की जानकारी जुटा ली.

चूंकि यह मामला एक विदेशी युवती से जुड़ा था, इसलिए साइबर सेल की टीम फूंकफूंक कर कदम रख रही थी. क्योंकि जरा सी गलती भी इंदौर पुलिस को भारी पड़ सकती थी. लेकिन एसपी यह बात अच्छी तरह जानते थे कि गलती के डर से कुछ न करने से अच्छा है कि कुछ किया जाए.

पूरी तैयारी के साथ इंदौर से दिल्ली गई टीम ने 4 रातें और 5 दिन की मेहनत के बाद महरौली पुलिस की मदद से सुमित प्रजापति और साउमी एलियास ग्लोरी, निवासी तंजानिया जो दिल्ली के छतरपुर एक्सटेंशन में रह रही थी, को गिरफ्तार कर लिया.

जैसी कि पुलिस को पहले आशंका थी, गिरफ्तारी के बाद थाना महरौली जा कर ग्लोरी ने आसमान सिर पर उठा लिया. विदेशी नागरिक होने के नाम पर वह पुलिस को सबक सिखाने की धमकी देने लगी. लेकिन पुलिस टीम उस की धमकियों में नहीं आई और सुमित और ग्लोरी को इंदौर ले गई.

यह बात पहले ही स्पष्ट थी कि विदेश में बैठी जो लड़की लोगों के साथ धोखाधड़ी और ब्लैकमेलिंग कर रही हो, वह सीधीसादी नहीं बल्कि शातिर होगी. इंदौर में ग्लोरी को महिला थाने में रखा गया, लेकिन वहां के हवालात की दीवारें 2 दिन तक ग्लोरी के आतंक से कांपती रहीं.

स्टेट साइबर सेल ने ग्लोरी को अदालत से रिमांड पर ले कर पूछताछ की. शुरू में ग्लोरी ने पुलिस को बिलकुल सहयोग नहीं किया, लेकिन जब उस ने देखा कि एसपी जितेंद्र सिंह ने उस के गिरोह को कानून के जाल में फंसाने के लिए काफी मेहनत से मोहरे चले हैं तो उस ने अपने साथी तंजानिया निवासी एडवर्ड किंग्सले का नाम भी बता दिया था.

एडवर्ड को पुलिस की इसी टीम ने 4 दिन बाद दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया. दोनों से पूछताछ के बाद ब्लैकमेलर ब्लैक ब्यूटी की पूरी कहानी सामने आ गई, जो इस प्रकार निकली—

करीब 7-8 महीने पहले की बात है. इंदौर के तुकोगंज निवासी 27 वर्षीय फरनीचर व्यवसाई संजय को अपने फेसबुक मैसेंजर पर ग्लोरी नाम की ब्लैक ब्यूटी और हौट लगने वाली लड़की का मैसेज मिला था. सोशल मीडिया पर डीपी में खूबसूरत लड़कियों की फोटो लगा कर मजे लेने वाले लड़कों की कमी नहीं है. यह बात संजय भी जानता था, इसलिए उस ने उस मैसेज पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.

डेढ़ 2 महीने बाद एक दिन फुरसत में फेसबुक देखते वक्त संजय की नजर फिर से गलोरी के पुराने मैसेज पर पड़ी तो उस ने भी जवाब में उसे हाय लिख दिया. 2-4 दिन बाद ग्लोरी की तरफ से जवाब आ गया. ग्लोरी ने इस बार डीपी पर पहले से भी ज्यादा सैक्सी फोटो लगा रखी थी.

चूंकि पुरानी और नई डीपी में एक ही लड़की की फोटो थी, इसलिए संजय को भरोसा हो गया कि मैसेज भेजने वाली लड़की ही है. सोचविचार कर संजय ने भी बातचीत शुरू कर दी. बात बढ़ी तो दोनों ने एकदूसरे को अपना परिचय दे दिया. फिर दोनों फेसबुक मैसेंजर से निकल कर वाट्सऐप पर मैसेज भेजने लगे.

इसी दौरान ग्लोरी ने संजय को अपने ऐसे फोटो भी शेयर किए, जिन्हें देख कर संजय फैंटेसी की दुनिया में डूबने लगा. उस ने ग्लोरी से मिलने का निश्चय किया. बिजनैस के सिलसिले में संजय दिल्ली जाता रहता था.

ग्लोरी से बात होने के बाद संजय दिल्ली के एक होटल में ग्लोरी से मिला. दोनों के बीच बातें हुईं तो उस ने कुछ परेशानी बता कर संजय से मदद मांगी. नतीजतन संजय ने उस के बताए एकाउंट में 2 हजार रुपए ट्रांसफर कर दिए.

तंजानिया अफ्रीकी महाद्वीप के प्रमुख देशों में से एक है. संजय को अफ्रीकन ब्लैक ब्यूटी ग्लोरी काफी पसंद आई. डार्क कलर के बावजूद वह काफी सैक्सी और सुंदर लग रही थी.

2 हजार रुपए मिलने के अगले 10 दिनों में ग्लोरी ने संजय से एक बार 6 हजार और एक बार 12 सौ रुपए मांगे. चूंकि संजय के लिए यह कोई बड़ी रकम नहीं थी. इसलिए उस ने बिना सोचेसमझे 6 हजार और 12 सौ रुपए ग्लोरी के एकाउंट में ट्रांसफर कर दिए.

लेकिन हकीकत यह थी कि ग्लोरी छोटीछोटी रकम लेने के बहाने हांडी में चावल टटोलने का काम कर रही थी. जब उस ने देखा कि संजय जाल में फंस चुका है तो 10 दिनों बाद ग्लोरी ने उस से सीधे सवा लाख रुपए की मांग की. उस ने संजय को बताया कि वह एक मुसीबत में फंस गई है, इसलिए अपनी मां के पास तंजानिया जाना चाहती है.

‘‘ऐसी क्या मुसीबत आ गई?’’ संजय ने सवा लाख देने से बचने की कोशिश करते हुए पूछा.

‘‘तुम नहीं समझोगे संजय, मुझे बस पैसा दे दो.’’ ग्लोरी ने बिना कुछ बताए पैसे मांगे तो संजय ने असमर्थता जाहिर करते हुए कहा, ‘‘सौरी, इतना पैसा मेरे पास नहीं है.’’ संजय का इनकार सुनते ही ग्लोरी के तेवर बदल गए. उस ने संजय से कहा, ‘‘सुनो संजय उस दिन तुम ने मेरे साथ जो रेप किया था, उस से मुझे गर्भ ठहर गया है. यह गर्भ साफ कराने के लिए मैं तंजानिया जाना चाहती हूं. मेरे पास तुम्हारे द्वारा किए गए रेप का वीडियो है. अगर तुम ने मेरी मदद नहीं की तो मैं इसे सोशल मीडिया पर वायरल कर दूंगी.’’

ग्लोरी के मुंह से रेप की बात सुन कर संजय पागल हो गया. उस का गर्भवती हो जाना सचमुच बड़ा संकट था, इसलिए उस ने चुपचाप ग्लोरी द्वारा बताए गए खाते में एक लाख 20 हजार रुपए डाल दिए. इस के बाद कुछ दिनों तक ग्लोरी की कोई खबर नहीं मिली तो संजय ने राहत की सांस ली. उसे लगा कि ग्लोरी तंजानिया चली गई होगी और उस ने वहां जा कर गर्भपात करवा लिया होगा. लेकिन कहानी अभी बाकी थी.

कुछ दिनों बाद एक युवती ने संजय को फोन किया. उस ने बताया कि वह तंजानिया से ग्लोरी की बड़ी बहन बोल रही है. ग्लोरी के गर्भपात के दौरान गड़बड़ हो जाने से ग्लोरी की हालत काफी खराब है. हम ने उसे अस्पताल में भरती करवा दिया है, इसलिए तुम इलाज के लिए तुरंत एक लाख रुपए एकाउंट में डाल दो.

संजय की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. उसे नहीं मालूम था कि ब्लैक ब्यूटी का शौक उसे इतना भारी पड़ेगा. वह बुरी तरह फंस चुका था. मजबूरी में उसे ग्लोरी की बहन की बात माननी पड़ी. इस के बाद तो तंजानिया से उस के पास कभी ग्लोरी की बहन का तो कभी अस्पताल के डाक्टर के फोन आने लगे. मजबूरी में चुपचाप उन के बताए खाते में पैसे डालता रहा.

मार्च के दूसरे सप्ताह में संजय को खबर मिली कि ग्लोरी की मृत्यु हो गई है. जिस ग्लोरी को संजय अब तक दुनिया की सब से अधिक हौट और कौपरेटिव पार्टनर मान कर याद करता था, उस की मौत की खबर सुन कर दुखी होने के बजाए उस ने राहत की सांस ली. उसे लगा कि चलो पीछा छूटा. इसलिए मौत के बाद मांगी गई रकम भी उस की बहन के बतए गए खाते में ट्रांसफर कर दी.

लेकिन इस के हफ्ते भर बाद ही ग्लोरी के साथ उस के नग्न वीडियो वायरल कर देने की धमकी दे कर एक युवक ने उस से 2 लाख रुपए की मांग की तो संजय समझ गया कि ग्लोरी का भूत जिंदगी भर उस का पीछा नहीं छोड़ेगा. इसलिए सोचविचार के बाद उस ने कानून की मदद लेने का फैसला किया.

उस ने इंदौर की साइबर सेल के एसपी जितेंद्र सिंह से मिल कर उन्हें पूरा किस्सा सुना दिया. इस के बाद अजय की रिपोर्ट के आधार पर जितेंद्र सिंह की टीम ने महीने भर में ग्लोरी और उस के पूरे गिरोह को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया.

ग्लोरी के बारे में पुलिस की जांच में जो जानकारी सामने आई, उस के अनुसार ग्लोरी 3 साल पहले अपनी मां का इलाज करवाने मैडिकल वीजा पर भारत आई थी. इलाज के बाद मां तो वापस चली गई, लेकिन ग्लोरी दिल्ली में ही रह गई. यहां वह छतरपुर एक्सटेंशन के पौश इलाके में एक अन्य लड़की के साथ किराए के फ्लैट में रहती थी.

दिल्ली में रहते हुए ग्लोरी जल्द ही देह व्यापार से जुड़ गई. किसी भी ग्राहक से वह फोन पर बात नहीं करती थी. संजय ने जितना अपने दोस्तों के बारे में सुना था, उस के अनुसार वह जानता था कि अफ्रीकी मूल की लड़की काफी कौपरेटिव होती हैं. आमतौर पर अफ्रीकन लड़की किसी दूसरे महाद्वीप के व्यक्ति को वक्त नहीं देती और अगर वक्त देती है तो खुद भी ऐसे मौके को पूरा एंजौय करती है.

ग्लोरी जिस खुले लहजे में संजय से दोस्ती बढ़ा रही थी, उस से संजय को लगने लगा था कि ब्लैक ब्यूटी के साथ वक्त बिताने की उन की फैंटेसी सच होने वाली है. हुआ भी ऐसा ही. व्यापार के सिलसिले में एक रोज संजय दिल्ली गया तो काम से फ्री हो कर उस ने ग्लोरी से बात कर के खुद के दिल्ली में होने की बात कही. इस पर ग्लोरी ने उसे अपने फ्लैट का पता दे कर छतरपुर एक्सटेंशन में आने को कहा.

संजय के लिए यह सुनहरा मौका था. वह पंख लगा कर ग्लोरी के फ्लैट पर जा पहुंचा. ग्लोरी से मुलाकात के पहले संजय ने जैसा सोचा था, ग्लोरी उस से भी अधिक हौट थी.

भरापूरा जिस्म 5 फुट 7 इंच लंबी ग्लोरी ने संजय के स्वागत में जाली जैसे कपड़े की स्लीवलेस कुरती और जींस का काफी तंग और छोटा सा शौर्ट पहन रखा था. कुछ देर बाद कातिल अदा से मुसकराते हुए ग्लोरी ने संजय को ड्रिंक्स औफर किया. 2 ढाई घंटे चली पहली मुलाकात के बाद जब संजय उस के फ्लैट से बाहर निकला मारे खुशी के उस के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे.

वह नहीं जानता था कि ग्लोरी के साथ उस की इस ग्लोरियस मीटिंग का सुखद अध्याय इस मुलाकात के साथ ही खत्म हो जाएगा. दिल्ली से वापस लौट कर संजय जल्द ही एक बार फिर दिल्ली जाने की योजना बनाने लगा था. लेकिन 2-4 दिन बाद ही ग्लोरी ने उस से वाट्सऐप पर चैटिंग करते हुए कहा कि उसे 2 हजार रुपए की जरूरत है. संजय ने पेटीएम के जरिए भेज दिए.

ग्लोरी वाट्सऐप पर अपनी फोटो भेजती, रेट तय करती और फिर सौदा पट जाने पर या तो ग्राहक को अपने फ्लैट पर बुला लेती थी या उस के साथ चली जाती थी. अकेले दिल्ली शहर में अफ्रीकी मूल के लगभग 20 हजार युवकयुवती रहते हैं. इन में से कई विभिन्न तरह की आपराधिक गतिविधियों में शामिल होते हैं, ग्लोरी भी दूसरे शहरों के रईस युवकों को फंसा कर उन्हें ब्लैकमेल करने लगी थी.

इस दौरान तंजानिया का एडवर्ड किंग्सले 3 महीने के वीजा पर भारत आने के बाद लंबे समय से गैर कानूनी रूप से यहां रह रहा था. ग्लोरी उस की गर्लफैंड थी.

वह ब्लैकमेलिंग के काम में अपनी प्रेमिका की मदद करने लगा था. ग्लोरी के साथ पकड़ा गया सुमित प्रजापति ग्लोरी को बैंक खाते उपलब्ध कराता था.

सुमित अपने 3 भाइयों के साथ छतरपुर एक्सटेंशन इलाके में डिपार्टमेंटल स्टोर चलाता था. उस के स्टोर में एक काउंटर बायवा नाम की लड़की का भी था. ग्लोरी अकसर बायवा के काउंटर पर खरीदारी करने आती थी.

सुमित ने ग्लोरी को पहली बार वहीं देखा था और उस का दीवाना हो गया था. बाद में बायवा ने सुमित की ग्लोरी से दोस्ती करवा दी थी. जिस से सुमित भी ब्लैक ब्यूटी के शौक में ग्लोरी के फ्लैट पर आनेजाने लगा था.

लेकिन ग्लोरी ने सुमित को ब्लैकमेल नहीं किया. हां, वह उस से बैंक खाते का उपयोग लोगों से ठगी का पैसा जमा करवाने में करने लगी थी. ग्लोरी के कहने पर सुमित ने अपने एक भाई के खाते का नंबर भी उसे दे दिया था.

ग्लोरी ने काफी पैसा रीटा काटजू नाम की महिला के खाते में भी जमा करवाया था. 65 वर्षीय रीटा काटजू की बेटी हांगकांग में नौकरी करती है. जबकि इंडियन एयरलाइंस की नौकरी से रिटायर होने के बाद रीटा दिल्ली में अपने प्रेमी के साथ लिवइन रिलेशन में रहती हैं.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में संजय नाम बदला हुआ है.

भोजपुरी फिल्म ‘दबंग सरकार’ को मिला यू /ए प्रमाणपत्र

सेंसरबोर्ड ने भोजपुरी फिल्म ‘दबंग सरकार’ को  यू /ए प्रमाणपत्र दे दिया है. इस फिल्म के निर्देशक योगेश राज मिश्रा बहुत बधाई के पात्र है. जिनकी फिल्म को सेंसर बोर्ड ने यू /ए प्रमाणपत्र दे कर यह साबित कर दिया है कि यह पूरी तरह पारिवारिक फिल्म है, इस फिल्म के लिए योगेश ने बहुत कड़ी मेहनत की है. अगले माह यह फिल्म बिहार और झारखण्ड में रिलिज होगी.

इस फिल्म के निर्माता दीपक कुमार ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए बताया, कि वे इस फिल्म  के रिलीज होने के बाद जल्द ही सुपरस्टार खेसारीलाल यादव और पवन सिंह को अपनी अगली फिल्म के लिए साइन करेंगे. दीपक कुमार ने कहा कि खेसारी और पवन दोनों ही इस इंडस्ट्री के बेहद लोकप्रिय स्टार हैं. इस फिल्म में खेसारीलाल यादव का भव्य रूप देखने को मिलेगा. उन्होंने ये भी कहा कि खेसारी के साथ इस फिल्म का एक्सपीरियंस बेहद शानदार रहा. हम आगे भी उनके साथ फिल्म बनाएंगे.

दीपक कुमार बताते हैं कि वे इस फिल्म के परफेक्शन और क्लास के लिए काफी पैसे लगाएं हैं, ताकि भोजपुरी सिनेमा के प्रति लोगों की सोच बदले और ज्यादा से ज्यादा लोग सिनेमाहौल में जा कर इस फिल्म को देखें. इसलिए हम इस फिल्म को मल्टीप्लेक्स में भी रिलीज करने के लिए सोच रहे हैं. अगर अच्छी फिल्में बनेगी तो दर्शक हर हाल में फिल्म देखेंगे. दीपक कुमार ने कहा कि आप हमारी फिल्म को देखें. उसकी स्वस्थ आलोचना करें, यहीं तो जरिया है, जिससे इस इंडस्ट्री में सुधार आ सकता है. इसके साथ ही उन्होंने कहा, किसी दुर्भावना से फिल्म को बिना देखे, बुरा नहीं कहें. आज भोजपुरी सिनेमा भी दर्शकों की ध्यान अपनी ओर खीच रही है.

कुमार ने इस फिल्म की अभिनेत्री आकांक्षा अवस्थी और दीपिका त्रिपाठी की भी जमकर तारीफ की और कहा कि इन लोगों ने फिल्म को नायाब बना दिया है. खेसारीलाल यादव का तो जवाब नहीं, वे काफी सपोर्टिव हैं. उनके एक्शन और रोमांस से दर्शकों को बहुत मज़ा आएगा , वहीं आकांक्षा और दीपिका ने भी फिल्म के लिए दिन रात जीतोड़ मेहनत की हैं, इसके लिए उन्होंने काफी पसीने बहाये हैं. उन्होंने खुद को सेट पर प्रूव कर दिया है कि वें काफी अच्छी अदाकारा हैं.

फिल्‍म के निर्माता दीपक कुमार और राहुल वोहरा है. निर्देशक योगेश राज मिश्र और सह निर्माता दिनेश तिवारी है. इस फिल्म के लेखक मनोज पांडेय है. इस फिल्म के एक गाने को खेसारीलाल यादव और नीतू सिंह ने स्वर दिया है.

किस फिल्म में अमिताभ की एक्टिंग खराब मानते हैं रोहन?

फिल्म ‘‘बाजार’’ में रिजवान अहमद का किरदार निभा रहे अभिनेता रोहन मेहरा का भी बौलीवुड से बहुत पुराना संबंध रहा है. उनके पिता विनोद मेहरा बौलीवुड के मशहूर कलाकार थे. विनोद मेहरा ने रेखा व अमिताभ बच्चन के साथ भी फिल्में की थी. लेकिन विनोद मेहरा के अचानक इंतकाल के बाद रोहन मेहरा अपनी मां के साथ केन्या चले गए थे. अब वे बौलीवुड में अभिनेता के तौर पर सक्रिय हैं. रोहन मेहरा का मानना है कि उनके पिता अभिनय के महारथी थे.

हमारी एक्सक्लूसिव बातचीत में  मेहरा ने कहा- मेरे पिता विनोद मेहरा ने फिल्म ‘दो फूल’ में कौमेडी की थी. इस फिल्म में उनकी कमाल की कौमेडी थी. इसके अलावा हृषिकेष मुखर्जी द्वारा निर्देषित फिल्म ‘‘बेमिसाल’’ में भी उन्होने अद्भुत अभिनय किया था. इस फिल्म में अमिताभ बच्चन का सर्वाधिक अंडर रेटेड परफार्मेंस है. पर लोगों ने कभी इस फिल्म को लेकर बात नहीं की. इसके अलावा फिल्म ‘‘अनुरोध’’ में भी मुझे अपने पिता का किरदार बहुत पसंद आया. इसका विषय भी कमाल का था. इनकी ‘घर’ भी अच्छी फिल्म थी.

हमने उनसे सवाल किया कि वे अपने पिता की किस फिल्म का करना चाहेंगे? इस पर मेहरा का जवाब था- सच कहूं तो मेरी इच्छा है कि उनकी किसी भी फिल्म का रीमेक न हो. मूल फिल्में क्लासिक हैं. रीमेक में मामला गड़बड़ हो जाता है.

ज्योतिष विद्या झूठ का पुलिंदा

सदियों से भारतीयों के दिमाग पर हावी ज्योतिष विद्या सच है या नहीं, इस विषय पर अभी तक किसी तरह का शोध या परीक्षण नहीं हुआ है. पश्चिमी देशों में जरूर वैज्ञानिकों, अनुसंधानकर्ताओं व विद्वानों ने कई रिसर्च व परीक्षण किए, जिन में ज्योतिष विद्या सचाई की कसौटी पर खरी साबित नहीं हो पाई. इसे झूठा अंधविश्वास पाया गया.

भारत में आज भी हर कोई भविष्य- वाणियों पर आंखें मूंद कर विश्वास करता है. भले ही ज्योतिषियों की कही बातें गलत सिद्ध हुई हों. लोगों का विश्वास है कि ज्योतिष विद्या हमारे वेदों व दूसरे धार्मिक ग्रंथों में बताई गई है इसलिए यह झूठ कैसे हो सकती है. लिहाजा, प्रिंट और अत्याधुनिक इलेक्ट्रोनिक मीडिया से ले कर हर गलीनुक्कड़ पर भविष्य बांचने वालों का जाल बिछा हुआ है. लोग अपने दिन की शुरुआत इन के बताए अनुसार ही करते हैं, फिर चाहे वह गलत ही क्यों न हो.

ऐसे में जम्मू के राकेश आनंद ने एस्ट्रोलोजी (ज्योतिष विद्या) पर अपनी रिसर्च आधारित एक पुस्तक में दावा किया है कि एस्ट्रोलोजी झूठ है. उन्होंने अपने शोध व परीक्षण में पाया है कि ज्योतिष गणनाएं सत्य की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं. ज्योतिष संभावनाओं और विरोधाभासों से भरी हुई है.

एस्ट्रोलोजी को अंधविश्वास करार देते हुए राकेश कुमार अब इस के प्रति लोगों को जागरूक करने का बीड़ा उठा चुके हैं.

अपनी रिसर्च में राकेश ने कुछ मशहूर विदेशी विद्वानों के शोध व परीक्षणों का जिक्र किया है. इन में प्रमुख तौर पर रुडोल्फ एच. स्मिथ, ज्योफ्रे डीन आदि हैं. रुडोल्फ एच. स्मिथ के कई परीक्षणों के उदाहरण इन की शोध पुस्तक में दिए गए हैं.

दरअसल, ज्योतिष विद्या में सितारों, ग्रहों व नक्षत्रों की स्थिति देख कर लोगों का भूत, भविष्य बताया जाता है. ज्योतिषी सब से पहले व्यक्ति की जन्मतिथि, जन्म समय व स्थान के वक्त सितारों की स्थिति देख कर फलित गणना के आधार पर उस के जीवन के बारे में बताते हैं. ज्योतिषी प्रमुख तौर पर विवाह, नौकरी, व्यवसाय, संतान, धनसंपत्ति, मातापिता, पत्नी से संबंध, मानसम्मान आदि के बारे में जानकारी देते हैं. यह सब ग्रहों के अच्छेबुरे असर के आधार पर बताया जाता है.

लेकिन राकेश आनंद ने अपनी पुस्तक में ग्रहों, नक्षत्रों को वैज्ञानिक खोजों के आधार पर जानकारी देते हुए इन्हें महज गैस और तरल पदार्थों से युक्त बताया है और सवाल उठाए हैं कि ये ‘स्टार देवता’ ऐसे में कैसे किसी व्यक्ति के भाग्य को प्रभावित कर सकते हैं.

रिसर्च से पहले भारतीय परंपरागत धर्मभीरु परिवार के युवक की तरह राकेश कुमार भी शुरू में ज्योतिष में विश्वास रखते थे. जन्मपत्री दिखा कर भविष्यवक्ताओं के यहां खूब घूमे. इस विद्या को सीखा, पढ़ा भी और व्यवसाय के तौर पर अपनाने का भी विचार किया पर वह खुद ही इस की सत्यता पर उठे संदेह को दूर नहीं कर पाए.

हर भविष्यवक्ता अलगअलग बात कहता दिखाई पड़ा. शुरू में उन्होंने जम्मू, दिल्ली, जोधपुर, जालंधर, मथुरा आदि शहरों के ज्योतिषियों को अपनी जन्मपत्री दिखाई तो किसी ने उन्हें डाक्टर बनने का सपना दिखाया, किसी ने पारिवारिक बिजनेस का योग बताया, किसी ने फिल्म लाइन का, किसी ने देश में छोटीमोटी नौकरी का तो किसी ने विदेश में जाने का योग बताया. जन्मपत्री एक, फिर भी ज्योतिषियों के सुर अलगअलग क्यों? इस सवाल का जवाब उन्हें नहीं मिल पाया.

इसी दौरान उन्हें बताया गया कि कुछ ‘अलौकिक सिद्धि’ प्राप्त ज्योतिषी सटीक भविष्यवाणी करते हैं जबकि दूसरे वैसी नहीं कर पाते. ऐसे तथाकथित ज्योतिषी भी उन्हें संतुष्ट नहीं कर पाए.

इस शोधकर्ता ने लिखा है कि इस ने युवावस्था में परमहंस योगानंद लिखित ‘योगी कथामृत’ व अंगरेजी में ‘आटोबायोग्राफी आफ ए योगी’ पढ़ी थी. इस पुस्तक के एक अध्याय में योगानंद के गुरु श्री युक्तेश्वर ने एस्ट्रोलोजी की पैरवी की थी और योगानंद ने भी अंतत: ज्योतिष को स्वीकार किया था. योगानंद से वह प्रभावित थे इसलिए ज्योतिष पर उन का भी विश्वास पक्का हो गया.

उन्हें यकीन था कि ज्योतिषियों के निर्देशों का पालन करने से जन्मपत्री में जो अनिष्टकारी दोष हैं उन का शमन हो जाएगा और सफलता मिल जाएगी.

अमेरिका में स्क्रीनराइटिंग की पढ़ाई करने के अपने 3 वर्ष प्रवास के दौरान उन्होंने वहां भी कई ज्योतिषियों, हस्त विद्या, अंक विद्या, टैरो कार्ड आदि के विशेषज्ञों से अपने भूत, वर्तमान एवं भविष्य के बारे में जानना चाहा. लेकिन वहां भी सब की अलगअलग भविष्यवाणी थी.

पर ज्यादातर भविष्यवाणियां हकीकत में झूठी ही रहीं. भारत वापस आने पर उन्होंने अपनी रुचि के लिए इस विद्या को सीखना तय किया. एक प्रोफेशनल एस्ट्रोलोजर से जन्मपत्री बनाना सीखा. ज्योतिष पर कई पुस्तकें भी पढ़ीं और खुद की जन्मपत्री का विश्लेषण शुरू किया. अनेक पुस्तकों में दिए हुए गुणसूत्रों के अनुसार मिलान किया जो उन की जन्मपत्री में फिट बैठते हों, अंकों की गणनाओं को मिलाने की कोशिश की पर गणना समझने में असफल रहे कि प्लानेट और स्टार देवता वास्तव में मनुष्य के भाग्य को कैसे प्रभावित करते हैं.

अपनी ही जन्मपत्री को पढ़ने में ज्योतिष के एक फार्मूले के अनुसार जीवन बहुत अच्छा दिखता तो दूसरे के मुताबिक बहुत खराब. इस के अलावा अनगिनत संभावनाएं विभिन्न फार्मूलों में दिखाई देती थीं. इस से वह असमंजस में पड़ जाते. अपने एस्ट्रोलोजर टीचर से पूछने पर वह इन विरोधाभासी परिणामों के अनेक कारक बताते थे लेकिन टीचर के स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हो पाते थे.

इस से राकेश कुमार के दिमाग में आया कि ज्योतिष में इतनी संभावनाएं क्यों हैं और चीजों का मिलान क्यों नहीं होता. क्या यहां एस्ट्रोलोजरों के साथ कुछ गलत है या एस्ट्रोलोजी खुद में ही गलत है.

वह लिखते हैं कि इन संदेहों के साथ उन्होंने अपने व्यापार एवं निर्माता, अभिनेता के तौर पर तमाम अनुबंध निरस्त, स्थगित कर एस्ट्रोलोजी की मान्यता पर रिसर्च करने का निर्णय किया.

रिसर्च के लिए जब राकेश कुमार ने इस से संबंधित पुस्तकों की तलाश शुरू की तो ताज्जुब हुआ कि एक भी पुस्तक उन्हें एंटी एस्ट्रोलोजी की नहीं मिल पाई. इस के विपरीत ज्योतिष सीखने वाली सैकड़ों पुस्तकें जरूर दिखाई दीं.

कई सप्ताह तक इंटरनेट खंगालने के बाद पता चला कि एस्ट्रोलोजी झूठ है. कई पश्चिमी वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों ने अपने विस्तृत शोधों और परीक्षणों से इसे झूठा पाया. लिहाजा, उन्हें भी रिसर्च और परीक्षण का सूत्र हाथ लग गया.

परीक्षण के तहत कई भारतीय व विदेशी विख्यात और कुख्यात हस्तियों की जन्म संबंधी सूचनाएं इंटरनेट व ज्योतिष पत्रिकाओं से जमा की गईं. इन में से 24 हस्तियों को चुना गया. उन की जन्मपत्रियां बनाई गईं. इन के अलावा अपने जानने वालों की 9 जन्मपत्री भी ली गईं. कुल 33 जन्मपत्रियों को ले कर ज्योतिष की परख शुरू हुई. शुरुआत जम्मू के ज्योतिषी से हुई और जालंधर, लुधियाना, कुरुक्षेत्र, दिल्ली, मथुरा, गोकुल और ऋषिकेश के ज्योतिषियों को ये जन्मपत्रियां नाम बदल कर दिखाई गईं. इन में सभी तरह के ज्योतिषी शामिल थे. कुछ वंशानुगत तौर पर इस पेशे में थे, जो पिछले 50 सालों से यही जन्मपत्री देखने का काम कर रहे थे. कुछ अलौकिक शक्तियां प्राप्त होने का दावा करने वाले थे, तो कुछ इस विद्या में डिगरी, डिप्लोमा धारक थे. इन में कुछ की फीस 1 हजार रुपए से कम न थी तो कुछ जो भी मरजी से दे देंगे, उसी को स्वीकार कर लेने वाले भी थे.

इन 33 जन्मपत्रियों को 101 जगहों पर पढ़वाया गया पर कोई भी एस्ट्रोलोजर भूत, भविष्य, वर्तमान के बारे में सहीसही नहीं बता पाया.

अमिताभ बच्चन

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11 अक्तूबर, 1942 को जन्मे अमिताभ बच्चन की जन्मपत्री नाम बदल कर रजत मल्होत्रा के नाम से दिखाई गई तो जम्मू के ज्योतिषी ने बताया, 3 से 4 बच्चे होंगे, पत्नी से विवाद रहेगा, मातापिता का असहयोग, ड्रिंक और औरतों की बुरी लत रहेगी, बच्चों से असंतुष्ट, सर्विस क्लास, 50 साल की उम्र तक सामान्य जीवन व्यतीत होगा.

जम्मू के ही एक दूसरे ज्योतिषी ने बताया, जातक अभिनय क्षेत्र में सफल नहीं होगा, केवल समय और धन बरबाद होगा, फिल्म वितरण क्षेत्र में जरूर कामयाबी मिल सकती है, 2 शादियां संभव हैं. कुल मिला कर जीवन में सफलता नहीं मिल पाएगी.

मथुरा के ज्योतिषी बताते हैं कि संतान गृह के स्वामी 8वें स्थान पर होने से संतान पक्ष से चिंताएं रहेंगी. 2006-07 में केतु के कारण आर्थिक समस्याएं, पत्नी के स्वास्थ्य की चिंताएं और कई उतारचढ़ाव आएंगे.

कुरुक्षेत्र के एस्ट्रोलोजर कहते हैं, पत्नी और बच्चों से संबंध अच्छे नहीं रहेंगे. केतु मानसिक परेशानियां देता रहेगा. ग्रोसरी स्टोर, कन्फेक्शनरी स्टोर या एजेंसी से संबंधित व्यापार में सफलता मिलेगी.

सभी जानते हैं कि भारतीय सिनेमा में अमिताभ बच्चन की उपलब्धियां बेमिसाल हैं. देशविदेश में उन की ख्याति है और खूब पैसा है पर ज्योतिषी उन की जन्मपत्री देख कर कुछ और ही कह रहे हैं.

ब्रिटनी स्पीयर्स

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मशहूर अमेरिकी पौप सिंगर, डांसर, अभिनेत्री और लेखिका ब्रिटनी स्पीयर्स ने अपने क्षेत्र में सफलता के झंडे गाड़ रखे हैं. अमेरिकन म्यूजिक इतिहास में वह 8वीं सब से अधिक बिकने वाली कलाकार है. जनवरी 2004 में उस ने अपने बचपन के दोस्त जैसन ऐलन एलेक्जेंडर से शादी कर ली, पर यह शादी ज्यादा नहीं चली. इसी साल उस ने एक दूसरे कलाकार केविन फेडरलिन से ब्याह रचाया. फेडरलिन से उसे 2 बेटे सीन प्रेस्टन और जेडन जैम्स हुए. नवंबर 2006 में फेडरलिन से उस का तलाक हो गया.

लेकिन ज्योतिषी इस कलाकार के बारे में कुछ और ही बता रहे हैं. 2 दिसंबर, 1981 को जन्मी स्पीयर्स की जन्मपत्री सियारा लोहान के नाम से दिखाई गई     तो सब से   पहले जम्मू का ज्योतिषी बताता है, प्रोफेशन सर्विस होगा, 2 शादियां होंगी, दूसरी शादी सफल रहेगी. पहली शादी 2008 से 2013 के बीच होगी. दूसरी शादी 2013 के बाद होगी.

दिल्ली का ज्योतिषी कहता है, उच्चमध्यम श्रेणी की लाइफ स्टाइल होगी, एक बच्चा होगा, फैशन डिजायनिंग, आर्टिफिशियल ज्वेलरी, आर्ट, पेंटिंग, विज्ञापन, मीडिया का व्यवसाय होगा.

लुधियाना के ज्योतिषी बताते हैं, वीनस ठीक नहीं है इसलिए म्यूजिक में सफलता नहीं मिलेगी, दिसंबर 2006 से 18 दिन के भीतर एक बहुत धनवान व्यक्ति से शादी होगी.

बेनजीर भुट्टो

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इसी तरह 21 जून, 1953 को कराची में जन्मी बेनजीर भुट्टो की जन्मपत्री जरीना बानो के नाम से दिखाई तो जम्मू के ज्योतिषी ने बताया, बृहस्पति के अच्छे प्रभाव से व्यवसाय में

खूब कामयाबी मिलेगी. खराब मंगल के कारण 2 शादियों में तलाक होगा. तीसरी शादी सफल होगी. वीनस और मंगल के प्रभाव से नए तकनीकी व्यापार में सफलता मिलेगी. कोई भी सितारा राजनीति में सफलता की ओर इशारा नहीं कर रहा है.

दिल्ली का ज्योतिषी कहता है, वैवाहिक जीवन अस्तव्यस्त रहेगा, 31 अक्तूबर, 2006 से 10 सितंबर, 2009 तक आर्थिक दिक्कतें रहेंगी. रेडीमेड गारमेंट, फैशन डिजायनिंग, ट्रेडिंग या मैन्युफैक्चरिंग जैसा व्यवसाय होगा. एक से ज्यादा शादियां होंगी.

ताज्जुब है कि किसी भी भविष्य- वक्ता ने बेनजीर की मृत्यु के बारे में नहीं बताया.

प्रिंस चार्ल्स

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महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के बड़े पुत्र प्रिंस चार्ल्स राजघराने के उत्तराधिकारी हैं. वह 1981 में डायना से शादी के बाद भी बड़े चर्चित रहे हैं. उन के 2 पुत्र हैं. डायना की बाद में मृत्यु हो गई थी. 2005 में प्रिंस ने अपनी पुरानी मित्र कैमिला से शादी कर ली थी.

देखते हैं ज्योतिषी प्रिंस के बारे में क्या कहते हैं. 14 नवंबर, 1948 को लंदन में पैदा हुए चार्ल्स की जन्मपत्री ब्रैड डेलसन के नाम से दिखाई गई.

दिल्ली का ज्योतिषी बताता है, महिलाओं से प्रेम संबंधों के बावजूद वैवाहिक जीवन ठीक रहेगा. व्यापार सामान्यतया अच्छा चलेगा.

जम्मू का एक भविष्यवक्ता बताता है, व्यापार और नौकरी साथसाथ चलेगी. इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रोनिक सामान का व्यापार होगा, आर्मी, परिवार पक्ष से आय होगी, 3 बच्चे होंगे.

जम्मू का ही दूसरा ज्योतिषी कहता है, राहुचंद्रमा का योग बीमार रखेगा, सरकारी मामलों में खराब सूर्य समस्याएं बनाए रखेगा. प्राइवेट जौब होगी, राजनीतिक या उच्च पद का योग नहीं है. 2013 के बाद राजयोग, पत्नी और बच्चों से सामान्य संबंध.

डा. फारूक अब्दुल्ला

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यह एक जानेमाने राजनीतिबाज हैं. 21 अक्तूबर, 1937 में जन्मे अब्दुल्ला की जन्मपत्री लोकेश कौल के नाम से दिखाई गई.

जम्मू के ज्योतिषी ने कहा, राजनीति में कोई स्कोप नहीं, राजनीति अकसर गंदा खेल माना जाता है इसलिए जातक की जन्मपत्री में  जूपिटर की स्थिति इस की इजाजत नहीं देती.

दिल्ली का ज्योतिषी बताता है, सूर्य के कुप्रभाव के कारण खराब रेपुटेशन, उच्च प्रशासनिक जौब पर राजनीति में सफलता नहीं.

गोकुल का ज्योतिषी बताता है कि उच्च पद विशेष तौर से वकील, जज, संतान में लड़कियां ज्यादा होंगी, लड़कों से. खराब वीनस और मंगल के कारण खराब चरित्र.

जार्ज डब्लू बुश

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6 जुलाई, 1946 को जन्मे अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश टेक्सास के गवर्नर भी रह चुके हैं. जनवरी 2001 में वह राष्ट्रपति चुने गए थे. 2004 में वह दोबारा चुन लिए गए. पत्नी लौरा बुश और 2 पुत्रियों के पिता बुश का वैवाहिक जीवन खुशहाल माना जाता है.

उन की जन्मपत्री ब्रायन एडवर्ड के नाम से दिखाई गई तो जम्मू के ज्योतिषी ने बताया, व्यापार में कुछ परेशानियां रहेंगी पर व्यापार ही बेहतर रहेगा, राजनीति में कामयाब नहीं, 2 शादियां होंगी, दूसरी शादी अक्तूबर 2007 से मार्च 2008 में होगी.

दिल्ली के ज्योतिषी का कहना है, श्वास संबंधी बीमारी होगी, पत्नी नहीं रहेगी, सितंबर 2006 से अगस्त 2009 तक अच्छा समय, राजनीति में सफलता नहीं, मैंटली कन्फ्यूज्ड. जालंधर के ज्योतिषी ने कहा, मशीनरी और पार्ट्स संबंधी मैकेनिकल जौब, वैवाहिक जीवन दुखद, पहले तलाक के बाद शीघ्र ही दूसरा तलाक.

शंकराचार्य श्री जयेंद्र सरस्वती

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18 जुलाई, 1935 को इरुलनिकी, तमिलनाडु में जन्मे हिंदू धर्म के दक्षिण भारत में स्थित काची कामकोटि पीठ के 69वें शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती आज हिंदुओं के लिए बड़े सम्मानित शख्स माने जाते हैं. नवंबर 2004 में उन्हें पीठ के मैनेजर की हत्या के षड्यंत्र के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सुबूतों के अभाव में जमानत दे दी थी.

जयेंद्र सरस्वती की जन्मपत्री गजेंद्र अय्यर के नाम से दिखाई गई. दिल्ली के ज्योतिषी ने बताया, किसी भी क्षेत्र में सफलता नहीं, दुखी वैवाहिक जीवन पर तलाक नहीं, संतान से थोड़ा लगाव रहेगा. दिल्ली का ज्योतिषी बताता है, जातक बदजबान, भावुक व अहंकारी, राजनीति में सफलता संभव, पुत्र से लगाव. गोकुल का ज्योतिषी कहता है, समाज से सम्मान नहीं, पत्नी का स्वास्थ्य खराब.

इन के अलावा रिसर्च बुक में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, राहुल द्रविड़, सत्य सांई बाबा, सचिन तेंदुलकर, सलमान रुश्दी, शिल्पा शेट्टी आदि की जन्मपत्री बना कर दूसरे नामों से ज्योतिषियों को दिखाई गई. इन में किसी भी ज्योतिषी की कोई भी बात सच दिखाई नहीं दी. दरअसल, सब जानते हैं कि ज्योतिष की भविष्यवाणी हमेशा गलत ही साबित होती है फिर भी लोग इसलिए इस झूठ के पिछलग्गू बने हुए हैं क्योंकि इस पर हमारा परिवार और पूरा देश विश्वास करता है.

फैजाबाद का नाम नरेंद्र मोदी पुर रखा जाये

यह सुझाव देने की हिम्मत देश में अगर कोई शख्स कर कर सकता है तो ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं कि उसका नाम मार्कन्डेय काटजू है, जो सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस और प्रेस काउंसिल के मुखिया रहे हैं. उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने अपने हिंदूवादी एजेंडे को बढ़ाते हुए इलाहाबाद का नाम प्रयागराज किया तो उनकी आलोचना का धर्म भी सपा और कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों ने निभाते हुए तरह तरह की दलीलें दीं. लेकिन बड़बोले कहे जाने बाले काटजू ने तो उनका मजाक बनाते हुए उन्हें उत्तरप्रदेश के 20 शहरों की लिस्ट ही थमा दी कि अब किस शहर का नाम क्या होना चाहिए.

इसमें कोई शक नहीं कि मार्कन्डेय काटजू कभी कभी अतिरेक उत्साह में बोलने की हदें पार कर जाते हैं, लेकिन उनकी साफगोई में एक पीड़ा भी होती है कि देश में धर्म और जाति के नाम पर यह क्या हो क्या रहा है. कट्टरवाद के खिलाफ काटजू खुद को बोलने से रोक नहीं पाते तो यह  खास एतराज की बात नहीं क्योकि गलत कुछ होता दिखे तो उसके खिलाफ बोलना  जरूर चाहिए. जिससे बेलगाम होते कट्टरवादियों को यह इल्म रहे कि देश में ऐसे बुद्धिजीवी और जानकार मौजूद हैं जो उनके गलत फैसलों का विरोध करेंगे ही और वे जस्टिस काटजू जैसे लोग हों तो हर कोई जानता है कि उन पर खुद उनका भी जोर नहीं चलता.

इलाहाबाद का भी नाम बदलना बिलाशक एक बेतुकी और गैर जरूरी बात थी. जिसका मकसद हिंदूवादियों को खुश करना था क्योंकि मोदी योगी सरकारें कुछ और हिंदुओं तो क्या किसी और के लिए भी नहीं कर पा रहीं.  ऐसे में हिन्दुत्व का एहसास कराने से उनकी नाकामियों पर कुछ दिनों के लिए पर्दा डल जाता है. योगी सरकार के इस ताजे फैसले की चर्चा विदेशी मीडिया भी चिंताजनक तरीके से कर रही है. जिससे देश की बिगड़ती छवि देख काटजू इतने खिन्न हो उठे कि उन्होने आने वाले कल की तस्वीर ही खींच कर रख दी कि अब किस शहर का नाम क्या होगा.

बकौल मार्कन्डेय काटजू अब अलीगढ़ का नाम अश्वत्थामा नगर, आगरा का अगस्त्य नगर, गाजीपुर का गणेशपुर, शाहजहांपुर का सुग्रीवनगर, मुजफ्फरनगर का मुरलीमनोहर नगर, आजमगढ़ का अलकनंदापुर, हमीरपुर का हस्तिनापुर, लखनऊ का लक्ष्मणपुर, बुलंदशहर का बजरंगबलीपुर, फैजाबाद का नरेंद्र मोदी नगर, फ़तेहपुर का अमितशाह नगर, गाजियाबाद का गजेंद्र नगर, फिरोजाबाद का द्रोणाचार्य नगर, फर्रुखाबाद का अंगदपुर, गाजियाबाद का घटोत्कच नगर, सुल्तानपुर का सरस्वती नगर, मिर्जापुर का मीराबाई नगर और मुरादाबाद का नाम मन की बात नगर रख देना चाहिए.

इससे होगा यह कि मुगलकाल के नाम खत्म हो जाएंगे और त्रेता और द्वापर सतयुग की गंध महकने लगेगी. कलयुग के मौजूदा प्रमुख देवी देवताओं के नाम भी उन्होने सुझाए हैं. आगे दूसरे राज्यों के शहरों के नाम भी इसी तर्ज पर बदले जा सकते हैं.

दरअसल में मार्कन्डेय काटजू हमेशा से ही धार्मिक कट्टरवाद के विरोधी रहे हैं, उनकी नजर में इससे किसी को कुछ हासिल नहीं होता. अब से कोई छह साल पहले दिल्ली के एक कार्यक्रम में उन्होने 90 फीसदी भारतीयों को बेवकूफ करार देते हुए कहा था कि इन्हें धर्म के नाम पर लड़ाना बड़ा आसान काम है. धार्मिक मसलों पर भारतीय विवेक और तर्क का इस्तेमाल नहीं करते.

ऐसे कोई दर्जन भर से भी ज्यादा मसले हैं जिन पर काटजू खुल कर बिना किसी डर या हिचक के इतना बोले हैं कि उसे अगर संग्रहीत किया जाये तो एक गैर धार्मिक मार्कन्डेय पुराण पार्ट – 2 तैयार हो सकता है. कुछ मे वे गलत भी रहे तो कहा जा सकता है कि परफेक्टनेस की उम्मीद उनसे ही क्यों योगी मोदी से क्यों नहीं जो सत्ता का इस्तेमाल धर्म के लिए कर रहे हैं.

अपने नए सुझाव में उन्होने बड़े सलीके से आदित्यनाथ का मखौल उड़ाया है जिस पर किसी के मुंह से बोल नहीं फूट रहे और फूटेंगे भी नहीं क्योंकि उनकी मंशा काटजू जैसे बुद्धिजीवियों को अलगथलग कर देने की है. लेकिन इससे भगवा खेमा कामयाब हो पाएगा ऐसा लग नहीं रहा क्योंकि अब खुद हिन्दू दबी आवाज में कहने लगे हैं कि शहरों के नामों के हिंदुकरण के एवज में हम सौ रु प्रति लीटर का पेट्रोल नहीं खरीद सकते, फिर मंहगाई भ्रष्टाचार और बेरोजगारी तो और भी विस्फोटक कगार पर हैं सरकार को इन पर ध्यान देना चाहिए.

जिद ने बनाया हत्यारा

योगमाया साहू छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के किशनपुर में स्थित उपस्वास्थ्य केंद्र में एएनएम थी. वहीं पर उसे सरकारी क्वार्टर मिला हुआ था, जिस में वह अपने पति चैतन्य साहू और 2 बेटों तन्मय और कुणाल के साथ रहती थी. चैतन्य साहू भी रायपुर के एक प्राइवेट अस्पताल में नौकरी करता था. चूंकि दोनों पतिपत्नी कमा रहे थे, इसलिए घर में आर्थिक समस्या नहीं थी. परिवार खुशहाली से रह रहा था.

घर की साफसफाई और बरतन मांजने के लिए योगमाया ने त्यागी राणा नाम की एक बाई रख रखी थी. वह घर में झाड़ूपोंछा आदि काम निबटा कर चली जाती थी. घर के मुख्य दरवाजे की 2 चाबियां थीं. उन में से एक चाबी योगमाया ने बाई को दे रखी थी और एक को वह खुद अपने पास रखती थी.

बात पहली जून, 2018 की है. काम वाली बाई त्यागी राणा रोज की तरह उस दिन भी सुबह 6 बजे सफाई करने एएनएम योगमाया साहू के क्वार्टर पर पहुंची. घर के मुख्य दरवाजे पर ताला बाहर से लगा देख बाई त्यागी राणा को अजीब लगा. क्योंकि अमूमन गेट पर ताला अंदर की ओर से बंद रहता था.

अपने पास मौजूद चाबी से गेट का ताला खोल कर वह अंदर आई तो उस ने कमरे के दरवाजे को हलका सा धक्का दिया तो दरवाजा खुल गया. कमरे में कोई नहीं था. उस के बाद आवाज लगाती हुई वह आंगन में पहुंची तो आंगन में खून देख कर वह घबरा गई और उलटे पांव चीखती हुई बाहर भागी.

वह सीधी स्वास्थ्य केंद्र में मौजूद मितानिन हिरौंदी बाई साहू के पास पहुंची. वह उसी स्वास्थ्य केंद्र में नौकरी करती थी. उस ने उन्हें अपनी आंखों देखी बात बताई. स्वास्थ्य केंद्र में मौजूद स्टाफ के लोग एएनएम योगमाया के क्वार्टर पर पहुंचे तो वहां का नजारा देख कर सभी चौंक गए.

योगमाया साहू, पति चैतन्य साहू और उस के बड़े बेटे तन्मय की रक्तरंजित लाशें आंगन में पड़ी हुई थीं. दूसरे कमरे में छोटे बेटे कुणाल का खून से लथपथ शव खाट के एक कोने में पड़ा था.

स्वास्थ्य केंद्र में खबर देने के बाद बाई सरपंच सुरेश खुंटे के घर पहुंच गई. सरपंच ने जब सुना कि चैतन्य के घर में 4 हत्याएं हो चुकी हैं तो वह भी हैरान रह गए. पलभर में ही यह खबर पूरे किशनपुर में फैल गई. देखते ही देखते सैकड़ों तमाशबीन मौके पर पहुंच गए.

सूचना सरपंच सुरेश खुंटे ने पिथौरा थाने के थानाप्रभारी को फोन द्वारा दे दी. थानाप्रभारी रात की गश्त से लौट कर गहरी नींद में सो रहे थे. जैसे ही सरपंच का फोन आया तो उन की नींद काफूर हो गई. वह तुरंत सहयोगियों के साथ घटनास्थल की तरफ रवाना हो गए.

थानाप्रभारी ने घटनास्थल पर पहुंच कर मौकामुआयना किया. उन्होंने सूचना आला अधिकारियों को दे दी. चौहरे हत्याकांड की सूचना पाने के कुछ देर बाद ही एसपी संतोष सिंह, एएसपी संजय धु्रव और एएसपी (प्रशिक्षु आईपीएस) उदय किरण घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस अधिकारियों ने मौकामुआयना किया. आंगन में फैला खून देख कर ऐसा लग रहा था जैसे घटना को 3-4 घंटे पहले अंजाम दिया गया हो. एएनएम योगमाया, उन के पति चैतन्य साहू और बड़े बेटे तन्मय की लाश एक साथ पड़ी थी. लाश से थोड़ी दूर खून से सना एक फावड़ा पड़ा था. लग रहा था कि हत्यारों ने इसी फावड़े से हत्या की थी.

कमरे में लोहे की अलमारी खुली पड़ी थी. उस का सामान फर्श और बिस्तर पर बिखरा पड़ा था. यह सब देख कर यही अनुमान लगाया जा रहा था कि हत्यारे शायद चोरी की नीयत से घर में घुसे होंगे. जैसे ही उन्होंने अलमारी का लौक खोलने की कोशिश की होगी तो खटपट की आवाज सुन कर घर के किसी सदस्य की आंख खुली होगी. इसी बीच घटना को अंजाम दिया गया होगा.

पुलिस ने घटना की सूचना मृतक चैतन्य के पिता बाबूलाल साहू को दे कर मौके पर बुला लिया. वह सांकरा में अकेले रहते थे.

घटना से 2 दिन पहले ही यानी 30 मई, 2018 की शाम करीब 5 बजे बाबूलाल साहू कुछ रिश्तेदारों के साथ बेटा, बहू और पोतों से मिलने किशनपुर आए थे. 3-4 घंटे बच्चों के बीच बिताने के बाद रात वह करीब 9 बजे सांकरा वापस लौट गए थे.

एसपी संतोष सिंह ने बाबूलाल साहू से बेटे या बहू की किसी से कोई रंजिश या दुश्मनी की बात पूछी तो उन्होंने किसी से रंजिश या दुश्मनी होने से साफ इनकार कर दिया. पुलिस को पता चला कि मोहल्ले में चैतन्य या योगमाया साहू का व्यवहार बहुत अच्छा था. किसी के मुसीबत में होने पर दोनों पतिपत्नी उस की तीमारदारी करने उस के घर पहुंच जाते थे. इसलिए किशनपुर का एकएक बच्चा उन के व्यवहार से वाकिफ था.

जब ये इतने भले इंसान थे तो पुलिस यह नहीं समझ पा रही थी कि इस वारदात को किस ने अंजाम दिया, गुत्थी काफी उलझी और पेचीदगी से भरी थी. ध्यान देने वाली बात यह थी कि हत्यारों ने पुलिस को गुमराह करने के लिए घटना को लूटपाट में तब्दील करने की कोशिश की थी. घर की सारी वस्तुएं मौजूद मिलीं.

रायपुर से फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड टीम भी वहां पहुंची, लेकिन उस के हाथ कोई खास सफलता नहीं लगी. स्थानीय लोगों से पूछताछ में पता चला कि रात में चीखने की आवाज तो आ रही थी. उन्होंने यह सोच कर इस ओर ध्यान नहीं दिया कि अस्पताल है, प्रसव पीड़ा के समय यहां महिलाएं चीखती हैं. हो सकता है कोई महिला प्रसव पीड़ा से तड़प रही हो इसीलिए वह आवाज सुन कर भी अपने घरों से बाहर नहीं निकले और हत्यारे अपने काम पूरे कर गए.

पुलिस ने घटना की रिपोर्ट दर्ज कर जांच शुरू कर दी. ब्लाइंड मर्डर की गुत्थी को सुलझाने के लिए एसपी संतोष सिंह ने एएसपी संजय धु्रव के नेतृत्व में एक एसआईटी का गठन किया गया.

एसआईटी में प्रशिक्षु आईपीएस उदय किरण, पिथौरा एसडीपीओ के अलावा क्राइम ब्रांच के 10 पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया. इस के अलावा पुलिस की 3 टीमों को पिथौरा से बाहर भेजा गया.

सनसनीखेज चौहरे हत्याकांड के खुलासे के लिए पुलिस हत्यारों की खोजबीन में भटक रही थी. घटना के 3 दिनों बाद यानी 3 जून की शाम को पुलिस ने शक के आधार पर किशनपुर के ही रहने वाले 3 व्यक्तियों को हिरासत में ले कर पूछताछ की. संदिग्धों से पूछताछ में जब कोई नतीजा नहीं निकला तो उन्हें सख्त हिदायत दे कर छोड़ दिया.

पुलिस ने जहां से जांच की काररवाई शुरू की थी, घूमफिर कर वहीं आ खड़ी हुई. पुलिस ने मृतक पतिपत्नी की काल डिटेल्स की जांच कर ली थी लेकिन उस में कोई काल संदिग्ध नहीं मिली.

घटना की परिस्थितियों से साफ पता चल रहा था कि इस में कोई अपना शामिल है. लेकिन वह कौन है? पुलिस इसी बात का पता लगाने में जुटी हुई थी. जब पुलिस को कहीं से कोई सुराग हाथ नहीं लगा तो उस ने 4 जून को उसी एरिया के मोबाइल टावर के संपर्क में आने वाले फोन नंबरों की लिस्ट निकलवाई.

हजारों मोबाइल नंबरों की लोकेशन ट्रेस हुई. काफी मेहनत और मशक्कत के बाद उन नंबरों में से एक संदिग्ध नंबर सामने आया जो 30/31 मई की रात 2 से 3 बजे के बीच घटनास्थल पर मौजूद मिला था. उस के बाद बड़ी तेजी से उस की लोकेशन बदलती गई.

पते की बात तो यह थी कि वही संदिग्ध नंबर चैतन्य साहू की काल डिटेल्स में भी पाया गया था. एक ही नंबर दोनों जगह पाए जाने से वह नंबर संदेह के घेरे में आ गया.

पुलिस ने उस संदिग्ध नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि वह नंबर किशनपुर के रहने वाले धर्मेंद्र बहिरा के नाम पर लिया गया था. धर्मेंद्र बहिरा के बारे में पुलिस को पता चला कि वह प्लंबर का काम करता है.

5 जून, 2018 को एसआईटी ने धर्मेंद्र बहिरा को उस के घर से दबोच लिया. एएसपी संजय धु्रव ने उस से सख्ती से पूछताछ शुरू की, ‘‘अच्छा, यह बताओ कि तुम साहू परिवार को कितने दिनों से जानते हो?’’

‘‘साहब, वे मेरे पड़ोसी थे, इसलिए मैं उन्हें लंबे समय से जानता हूं.’’ धर्मेंद्र ने हाथ जोड़ कर जवाब दिया.

‘‘तब तो उन के घर में तुम्हारी अंदर तक पैठ बनी होगी?’’ एएसपी ने फिर सवाल किया.

‘‘नहीं साहब, उन के यहां कभी- कभार जाना होता था. चैतन्य साहू एक बार मेरे पास प्लंबिंग का काम कराने के लिए आए थे.’’ उस ने बताया.

‘‘30/31 मई की रात में तुम कहां थे?’’ एएसपी ने अगला सवाल किया.

‘‘सर, मैं उस रात अपने घर पर था.’’ धर्मेंद्र बोला.

‘‘तुम अपने घर पर थे तो तुम्हारा मोबाइल साहू के घर क्या कर रहा था?’’ एएसपी संजय ने अंधेरे में तीर चलाया.

इतना सुन कर धर्मेंद्र सन्न रह गया. उन्होंने उस के चेहरे के उड़े रंग को भांप लिया था.

‘‘चलो, सीधे मुद्दे पर आते हैं. अच्छा यह बता दो कि तुम ने साहू परिवार का कत्ल क्यों किया? सहीसही बताना.’’ इस बार थानाप्रभारी दीपक चंद ने सवाल किया था.

‘‘साहब, यह झूठ है, मैं ने किसी को नहीं मारा है.’’ धर्मेंद्र ने जवाब दिया.

एएसपी संजय धु्रव और थानाप्रभारी दीपक चंद समझ गए कि यह आसानी से मानने वाला नहीं है. इस के बाद उन्होंने उस के साथ सख्ती से पूछताछ की तो वह पूरी तरह टूट गया और कबूल कर लिया कि उसी ने साहू परिवार के चारों सदस्यों को मौत के घाट उतारा है.

इस के बाद वह पूरी कहानी तोते की तरह बकता चला गया. पुलिसिया पूछताछ से पता चला कि वह बड़ा ही नराधम निकला, महज चंद रुपयों की खातिर उस ने हंसतेखेलते पूरे परिवार की जिंदगी छीन ली. पूछताछ में कहानी कुछ ऐसी सामने आई—

40 वर्षीय चैतन्य साहू मूलरूप से छत्तीसगढ़ के रायपुर का रहने वाला था. इसी जिले की आरंग की रहने वाली योगमाया से उस की शादी सन 2008 में हुई थी. शादी के बाद चैतन्य के 2 बच्चे हुए. उस की जिंदगी खुशियों से भरी हुई थी. वे दोनों बच्चों की ठीक से परवरिश करने में लगे थे.

शादी के 7 साल बाद चैतन्य की भी रायपुर के ओम अस्पताल में वार्डबौय की नौकरी लग गई थी. 3 साल तक उस ने वहां नौकरी की. शादी के 8 साल बाद जुलाई 2016 में उस की पत्नी योगमाया की भी नौकरी स्वास्थ्य विभाग में एएनएम पद पर लग गई. उस की पहली पोस्टिंग महासमुंद जिले के किशनपुर के उप स्वास्थ्य केंद्र में हुई थी, जिस के बाद से पतिपत्नी बच्चों सहित रायपुर छोड़ कर पिथौरा में रहने लगे.

योगमाया साहू को किशनपुर के उप स्वास्थ्य केंद्र में ही रहने के लिए क्वार्टर मिल गया था. थोड़े ही समय में पतिपत्नी ने अपने मृदुल व्यवहार से किशनपुर के नागरिकों को अपना मुरीद बना लिया था. योगमाया पीडि़त महिलाओं का खास खयाल रखती थी. प्रसव वेदना के समय वह तीमारदारों की हिम्मत बंधाती थी. यही नहीं, तीमारदारों के बुलाने पर दोनों पतिपत्नी उन के घर तक पहुंच जाते थे.

उप स्वास्थ्य केंद्र के पास में 28 वर्षीय धर्मेंद्र बहिरा अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में मांबाप और भाईबहन थे. वह अविवाहित था. धर्मेंद्र मेहनतकश इंसान था. वह एक अच्छा प्लंबर था. लोग उसे बुला कर अपने घरों में काम करवाते थे. योगमाया के यहां उस का आनाजाना था.

एक दिन की बात है. एएनएम योगमाया के क्वार्टर का नल खराब हो गया. चैतन्य ने धर्मेंद्र के घर जा कर क्वार्टर का नल ठीक करने को कह दिया. अगले दिन धर्मेंद्र ने योगमाया के क्वार्टर का नल ठीक कर दिया. इस काम की उस की मजदूरी डेढ़ सौ रुपए हुई थी. चैतन्य ने उसे अगले दिन आ कर पैसे ले जाने को कह दिया तो धर्मेंद्र बिना कुछ बोले मुसकरा कर वहां से चला गया.

अगले दिन धर्मेंद्र अपनी मजदूरी के पैसे लेने चैतन्य के क्वार्टर पर गया. चैतन्य घर पर ही था. उस ने कह दिया कि पैसे शाम में आ कर ले जाना, अभी मेमसाहब घर पर नहीं हैं. पैसे उन्हीं के पास रहते हैं. यह सुन कर धर्मेंद्र को बुरा लगा लेकिन पड़ोस की बात होने के नाते बिना कुछ कहे वापस लौट गया.

उस के बाद ऐसे करतेकरते कई दिन बीत गए. चैतन्य कोई न कोई बहाना बना कर उसे घर से वापस लौटा देता था लेकिन उसे पैसे नहीं दिए. चैतन्य अब इस बात पर आ कर अड़ गया कि 50 रुपए के काम के डेढ़ सौ रुपए क्यों दूं. मैं डेढ़ सौ नहीं केवल 50 रुपए ही दूंगा.

उस के बाद पैसों को ले कर चैतन्य और धर्मेंद्र के बीच विवाद छिड़ गया. धर्मेंद्र ने चैतन्य से कह दिया कि वह अपनी मजदूरी के डेढ़ सौ रुपए उस से वसूल कर के ही रहेगा. चैतन्य ने भी कह दिया कि वह जो चाहे कर ले, 50 रुपए से एक फूटी कौड़ी ज्यादा नहीं देगा. योगमाया भी पति के ही पक्ष में बोलने लगी. मजदूरी को ले कर दोनों के बीच बात बढ़ गई.

धर्मेंद्र ने सोच लिया कि वह अपनी मेहनत के पैसे ले कर रहेगा, चाहे कुछ भी हो जाए. धर्मेंद्र ने मन ही मन सोच लिया कि उसे अब क्या करना है. उस ने सोच लिया कि चैतन्य साहू मजदूरी के पैसे नहीं दे रहा है तो कोई बात नहीं, वह उस से इस के कई गुना वसूल कर लेगा.

दरअसल चैतन्य के क्वार्टर पर आतेजाते धर्मेंद्र उस के क्वार्टर के कोनेकोने से परिचित हो चुका था. उसे मालूम हो चुका था कि घर में कहांकहां कीमती चीजें रखी जाती हैं.

उसे यह तक पता चल चुका था कि चैतन्य की पत्नी एएनएम योगमाया साहू के पास सोने और चांदी के कितने गहने हैं और वह कहां रखे हैं. उस ने अपनी मजदूरी के एवज में गहनों को चुराने की योजना बना ली.

योजना के मुताबिक 30-31 मई, 2018 की रात धर्मेंद्र बहिरा चैतन्य साहू के सरकारी क्वार्टर में चुपके से पीछे के रास्ते से घुस गया. उस ने अपने साथ फावड़ा ले रखा था ताकि मुसीबत के वक्त वह अपना बचाव कर सके. दबे पांव क्वार्टर में घुस कर उस ने कमरे का निरीक्षण किया.

देखा कि सभी गहरी नींद में सो रहे थे. फिर वह बीच कमरे में रखी अलमारी के पास गया और अपनी मास्टर की से अलमारी खोलने लगा. चाबी की आवाज सुन कर चैतन्य की नींद टूट गई.

उठ कर वह उस ओर बढ़ा जिस ओर से खड़खड़ाहट की आवाज आ रही थी. चैतन्य कमरे में पहुंचा तो धर्मेंद्र को देख कर चौंक गया. धर्मेंद्र की नजर जब चैतन्य पर पड़ी, उसे सामने देखा तो उसे सांप सूंघ गया. वह बुरी तरह डर गया और घबरा गया कि अब उस की चोरी पकड़ी जाएगी.

इस घबराहट में उसे कुछ सूझा नहीं तो फावड़े से चैतन्य की गरदन पर ताबड़तोड़ कई वार कर दिए. वह चीखता हुआ फर्श पर जा गिरा. धड़ाम की आवाज सुन कर योगमाया की नींद टूट गई और कमरे में आ गई. फर्श पर पति को लहूलुहान देख कर उस के मुंह से चीख निकल पड़ी.

धर्मेंद्र योगमाया को सामने देख कर घबरा गया. घबराहट में उस ने योगमाया की भी गरदन पर फावड़े से ताबड़तोड़ वार कर उसे भी मौत के घाट उतार दिया. इसी बीच मां की आवाज सुन कर तन्मय भी उठ कर कमरे में आ गया और धर्मेंद्र को पहचान गया तो धर्मेंद्र ने उसे भी मौत के उतार दिया. उस के बाद तीनों की लाशें घसीट कर आंगन में ले गया.

चैतन्य का एक और बेटा कुणाल जिंदा था और वह कमरे में अभी भी सो रहा था. धर्मेंद्र को डर था कि कुणाल उसे पहचानता है. कहीं वह जिंदा बच गया और उस ने भांडा फोड़ दिया तो उसे जेल जाना पड़ सकता है. उस समय धर्मेंद्र की मति ऐसी मारी जा चुकी थी कि वह इतना तक नहीं समझ सका कि जब गहरी नींद में सो रहे कुणाल ने उसे वारदात करते देखा ही नहीं है तो वह उस का नाम क्यों लेगा.

फिर क्या था विवेकहीन हो चुका धर्मेंद्र उस कमरे में जा पहुंचा, जहां कुणाल सोया था. उस ने सोते हुए कुणाल पर फावड़े से वार कर उसे भी मौत के घाट उतार दिया और लाश उसी बिस्तर पर छोड़ दी.

चारों को मौत के घाट उतारने के बाद दरिंदा बन चुके धर्मेंद्र को होश आया तो उस के होश फाख्ता हो गए. चारों ओर खून ही खून देख कर वह घबरा गया और फावड़ा आंगन में ही छोड़ कर मौके से फरार हो गया. अब उसे पश्चाताप हो रहा था कि आवेश में आ कर वह कितना बड़ा गुनाह कर बैठा.

चंद रुपयों के लिए उस ने हंसतेखेलते परिवार की दुनिया ही उजाड़ दी. लेकिन उस के पश्चाताप करने से अब क्या फायदा होने वाला था. जो होना था सो तो हो चुका था. साहू परिवार की दुनिया ही उजड़ चुकी थी.

5 जून, 2018 को पुलिस ने धर्मेंद्र बहिरा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. जेल में बंद धर्मेंद्र अपने किए पर पश्चाताप के आंसू बहा रहा था. काश, धर्मेंद्र पहले ही सोचसमझ कर कदम उठाता तो आज साहू परिवार दुनिया में सांस ले रहा होता.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सिरफिरे आशिक का हाईवोल्टेज ड्रामा

जिस ने भी सुना, उस ने मिसरोद का रास्ता पकड़ लिया. कोई सिटी बस से गया तो कोई औटो से. किसी ने टैक्सी ली तो कुछ लोग अपने वाहन से मिसरोज जा पहुंचे. बीती 13 जुलाई की अलसुबह मिसरोद में कोई ऐसी डिस्काउंट सेल नहीं लगी थी, जिस में किसी जहाज के डूब जाने से कपड़ा व्यवसायी या निर्माता को घाटे में आ कर मुफ्त के भाव कपड़े बेचने पड़ रहे हों, बल्कि जो हो रहा था, वह निहायत ही दिलचस्प और अनूठा ड्रामा था, जिसे भोपाल के लोग रूबरू देखने का मौका नहीं चूकना चाहते थे.

भोपाल होशंगाबाद रोड पर पड़ने वाला मिसरोद कस्बा अब भोपाल का ही हिस्सा बन गया है. इस इलाके में तेजी से जो रिहायशी कालोनियां विकसित हुई हैं, उन में से एक है फौर्च्यून डिवाइन सिटी.

इस कालोनी में खासे खातेपीते लोग रहते हैं. इन्हीं में से एक हैं बीएसएनएल (भारत संचार निगम लिमिटेड) से रिटायर हुए एम.पी. श्रीवास्तव. एजीएम जैसे अहम पद से रिटायर्ड एम.पी. श्रीवास्तव ने वक्त रहते फौर्च्यून डिवाइन सिटी में फ्लैट ले लिया था.

एम.पी. श्रीवास्तव नौकरी से तो रिटायर हो गए थे, लेकिन जवान हो गई दोनों बेटियां विभा और आभा की शादी की चिंता से मुक्त नहीं हो पाए थे. रिटायरमेंट के बाद उन का अधिकांश समय बेटियों के लिए योग्य वर ढूंढने में गुजर रहा था. साधनसंपन्न घर में सब कुछ था. साथ ही खुशहाल परिवार में 2 होनहार बेटियां और कुशल गृहिणी साबित हुई उन की पत्नी चंद्रा, जिन्हें पति से ज्यादा बेटियों के हाथ पीले होने की चिंता सताती थी.

13 जुलाई को श्रीवास्तवजी के फ्लैट नंबर 503 में जो चहलपहल हुई, उस की उम्मीद श्रीवास्तव दंपति ने सपने में भी नहीं की थी. ऐसी शोहरत जिस से हर शरीफ शहरी बचना चाहता है, कैसी और क्यों थी, पहले उस की वजह जान लेना जरूरी है.

इस संभ्रांत संस्कारी कायस्थ परिवार की बड़ी बेटी का नाम विभा है, जिस की उम्र 31 साल है. विभा पढ़ाईलिखाई में तो होशियार है ही, साथ ही उस की पहचान उस के सांवले सौंदर्य की वजह से भी है. एमटेक करने के बाद महत्त्वाकांक्षी विभा ने बजाय नौकरी करने के मुंबई का रास्ता पकड़ लिया था. चाहत थी मौडल बनने की.

विभा महत्त्वाकांक्षी ही नहीं, बल्कि प्रतिभावान भी थी. इसी के चलते करीब 3 साल पहले एक समारोह में कायस्थ समाज ने उसे सम्मानित भी किया था. उसी साल विभा ने एक ब्यूटी कौंटेस्ट में भी हिस्सा लिया था, जिस में वह विजेता रही थी.

इस सब से उत्साहित विभा को भी लगने लगा था कि अगर कोशिश की जाए तो उस के लिए सेलिब्रिटी बनना कोई मुश्किल काम नहीं है. उस ने अपनी यह इच्छा मांबाप को बताई तो उन्होंने उसे निराश नहीं किया. उन लोगों ने उसे मुंबई जाने की इजाजत दे दी.

मौडलिंग और फिल्मों में काम करने की सोच लेना तो आसान काम है, लेकिन ग्लैमर की इस दुनिया में अपना मुकाम बनाना हंसीखेल नहीं है. यह बात विभा को मुंबई जा कर समझ आई. लेकिन विभा हिम्मत हारने वालों में से नहीं थी. वह  काम हासिल करने के लिए लगातार संघर्ष करती रही. बोलचाल की भाषा में कहें तो वह स्ट्रगलर थी.

मुंबई में रोजाना हजारों स्ट्रगलर हाथ में एलबम लिए निर्माता निर्देशकों और नामी कलाकारों के यहां धक्के खाते हैं. सचमुच दाद देनी होगी ऐसे नवोदित कलाकारों को, जो सुबह उठ कर देर रात तक चलते दौड़ते नहीं थकते. उस वक्त उन के जेहन में उन नामी कलाकारों के संघर्ष की छवि बसी होती है जो कभी उन्हीं की तरह स्ट्रगलर थे.

मीडिया भी ऐसे किस्से खूब बढ़ाचढ़ा कर पेश करता है. मसलन देखो कल का चाय या फल बेचने वाला या फिर पेशे से कंडक्टर कैसे शोहरत के शिखर पर पहुंच गया और अब अरबों की दौलत का मालिक है.

कामयाब होना है तो धक्के तो खाने ही पड़ेंगे, यह बात मुंबई पहुंचने वाला हर स्ट्रगलर जानता है. विभा भी जानती थी. स्ट्रगल के दौरान विभा की मुलाकात रोहित नाम के युवक से हुई जो खुद भी स्ट्रगलर था.

मूलत: उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ का रहने वाला रोहित भी छोटामोटा कलाकार था और किसी बड़े मौके की तलाश में था.

विभा और रोहित की जानपहचान पहले दोस्ती में और फिर दोस्ती प्यार में बदल गई, इस का अहसास दोनों को उस वक्त हुआ, जब रोहित ने विभा पर बेजा हक जमाना शुरू कर दिया.

छोटे शहरों की बनिस्बत मुंबई की दोस्ती और प्यार में फर्क कर पाना बेहद मुश्किल काम है. वजह यह कि फिल्म इंडस्ट्री में कोई वर्जना नहीं होती. वहां कलाकार की पहचान उस की कामयाबी के पैमाने से होती है, जबकि विभा और रोहित अभी कामयाबी के सब से निचले पायदान पर खड़े थे. कामयाबी की सोचना तो दूर की बात है, अभी उन के कदम जरा भी आगे नहीं बढ़ पाए थे.

जमीन पर खड़ेखड़े ही विभा को अहसास हो गया था कि जितना उसे मिलना था, उतना मिल चुका. लिहाजा अब वापस भोपाल लौट जाए और मम्मीपापा जहां कहें, वहां शादी कर ले. वजह यह कि रोहित उस पर शादी के बाबत दबाव बनाने लगा था जो उस से बरदाश्त नहीं हो पा रहा था.

पर वापसी के पहले विभा ने एक आखिरी कोशिश इस सोच के साथ शौर्ट मूवी बना कर की थी कि अगर मूवी चल निकली तो आगे के रास्ते और किस्मत के दरवाजे खुदबखुद खुलते चले जाएंगे. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. उलटे जो हुआ वह उस की बनाई रील का रीयल लाइफ में उतर आना था.

अपनी बनाई मूवी में विभा ने अपनी पूरी कल्पनाशीलता, रचनात्मकता और प्रतिभा झोंक दी थी. इस मूवी की प्रोड्यूसर उस की छोटी बहन आभा थी. मूवी के कथानक के आधार पर उस ने उस का नाम फ्रायडे नाइट रखा था.

फ्रायडे नाइट की कहानी मसालों से भरपूर थी, जिस की शूटिंग विभा ने अपने ही फ्लैट पर की थी. इस कहानी की मुख्य पात्र भी वही थी, जो एक लड़के से प्यार करने लगती है. लड़का विभा को धोखा दे देता है तो वह तिलमिला उठती है.

इस के पहले वह अपने प्रेमी के सामने रोतीगिड़गिड़ाती है, लेकिन उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता. एक वक्त ऐसा भी आता है, जब विभा की हालत पागलों जैसी हो जाती है और इसी गुस्से में वह एक सख्त फैसला ले लेती है.

यह सख्त फैसला होता है अपने बेवफा प्रेमी का कत्ल कर देने का, जिसे वह एक शुक्रवार की रात को अंजाम देती है. विभा को लगा था कि उस की फिल्म बाजार में आते ही हाहाकार मचा देगी और बौलीवुड उसे हाथोंहाथ ले लेगा.

अपनी फिल्म को ले कर विभा ने कई चैनलों के चक्कर लगाए, लेकिन उसे किसी ने भाव नहीं दिया. अंतत: उस ने 2 साल पहले इस फिल्म को यूट्यूब पर अपलोड कर दिया. यूट्यूब पर भी नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं मिले. फ्रायडे नाइट को देखने वालों की संख्या मुश्किल से 5 अंकों में पहुंच पाई.

13 जुलाई को हजारों लोग विभा के पांचवीं मंजिल स्थित उस फ्लैट की तरफ उत्सुकता से देख रहे थे, जहां कभी फ्रायडे नाइट की शूटिंग हुई थी. इन में कितने ही लोग उस वीडियो को भी देख रहे थे जिसे रोहित ने वायरल किया था.

इस वीडियो में रोहित लाल बनियान में नजर आ रहा था और विभा पलंग पर बेहोश पड़ी थी. वीडियो में रोहित गुहार लगाता नजर आ रहा था कि देखो पुलिस और विभा के घर वाले हम बच्चों पर कितना जुल्म ढा रहे हैं.

रोहित के मुताबिक वह और विभा दोनों एकदूसरे से प्यार करते थे और शादी करना चाहते थे. लेकिन विभा के घर वाले इस के लिए तैयार नहीं थे. आज जब वह विभा से मिलने आया तो उन्होंने पुलिस बुला ली. पुलिस वालों ने दोनों की इतनी पिटाई की कि शरीर के कई हिस्सों से खून बह रहा है. उस ने बहता हुआ खून भी दिखाया.

वीडियो वायरल होने की देर थी कि लोग मुफ्त का तमाशा देखने मिसरोद की तरफ दौड़ पड़े. रोहित का यह कहना गलत नहीं था कि विभा के घर वालों ने पुलिस बुला ली है.

पुलिस घटनास्थल पर मौजूद तो थी लेकिन यह सोच कर सकपकाई हुई थी कि इस सिचुएशन से कैसे निपटा जाए. मतलब यह कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. यानी विभा की जान भी बच जाए और रोहित को गिरफ्तार भी कर लिया जाए.

दरअसल उस दिन सुबह करीब 7 बजे मिसरोद थाना इंचार्ज एस.के. चौकसे को एम.पी. श्रीवास्तव के फोन पर इत्तला दी थी कि रोहित नाम के एक युवक ने उन के फ्लैट में जबरन घुस कर उन की बड़ी बेटी विभा को फ्लैट के आखिरी कमरे में बंधक बना रखा है. उन्हें यह बात तब पता चली जब वह दूध लेने फ्लैट से बाहर निकले थे.

मामला गंभीर था और संभ्रांत कालोनी से ताल्लुक रखता था, इसलिए 3 सदस्यीय पुलिस टीम जल्द ही फार्च्यून डिवाइन सिटी पहुंच गई. पुलिस दल का नेतृत्व एसआई एस.एस. राजपूत कर रहे थे. उन्होंने सारा मामला समझ कर रोहित को बहलाफुसला कर काबू में करने की कोशिश की लेकिन वह कामयाब नहीं हुए.

सुबहसुबह पुलिस को आया देख कालोनी के लोग विभा के घर के नीचे इकट्ठा हो कर माजरा समझने की कोशिश करने लगे थे. उन्हें इतना ही पता चल पाया कि श्रीवास्तवजी के घर कोई सिरफिरा घुस आया है, जिस ने उन की बड़ी बेटी को बंधक बना लिया है और तरहतरह की धमकियां दे रहा है.

रोहित को इस बात की आशंका थी कि विभा के मातापिता पुलिस को बुलाएंगे इसलिए वह सतर्क था. एम.पी. श्रीवास्तव उन की पत्नी चंद्रा और छोटी बेटी आभा हलकान थीं कि अंदर कमरे में विभा पर रोहित जाने क्याक्या जुल्म ढा रहा होगा. इस डर की वजह रोहित के हाथ में देसी कट्टे का होना था.

एसआई राजपूत ने रोहित से बात करने की कोशिश की तो उस ने मोबाइल चार्जर की मांग की. राजपूत से चार्जर लेने के लिए रोहित ने दरवाजा थोड़ा खोला तो उन्होंने हाथ अड़ा कर पूरा दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन रोहित इस स्थिति के लिए तैयार था. उस ने कैंची से राजपूत के हाथ पर हमला कर दिया और उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी. चोट से तिलमिलाए एसआई राजपूत ने हाथ वापस खींच लिया तो रोहित ने चार्जर ले कर कमरा फिर से बंद कर लिया.

पुलिस को आया देख विभा की हिम्मत बढ़ी और उस ने रोहित का विरोध किया. इस पर झल्लाए रोहित ने विभा के हाथ और गले पर कैंची से वार कर के उसे घायल कर दिया. खून बहने से विभा बेहोश हो गई तो उस ने उसे बिस्तर पर पटक दिया और इसी हालत में वीडियो शूट कर वाट्सऐप पर डाल दिया.

इस वीडियो के वायरल होते ही भोपाल में हड़कंप मच गया. थोड़ी देर में पुलिस के आला अफसर भी मौके पर पहुंच गए. एसपी (साउथ) राहुल लोढा ने भी रोहित से बातचीत कर के उस की मंशा जाननी चाही. शुरू में तो वह बात करने से कतराता रहा लेकिन खामोश रहने से बात नहीं बन रही थी, इसलिए उस ने जल्द ही अपने दिल की बात जाहिर कर दी कि वह विभा से प्यार करता है और उस से शादी करना चाहता है.

इस दौरान पुलिस ने रोहित के पिता को भी खबर कर दी थी, इसलिए वह अलीगढ़ से भोपाल के लिए निकल गए थे. दरअसल, रोहित की एक शर्त यह भी थी कि वह अपने पिता के आने के बाद ही दरवाजा खोलेगा.

यह पुलिस और प्रशासन का इम्तिहान था. वजह अपनी पर उतारू हो आया रोहित विभा को जान से भी मार सकता था. ऐसे में पुलिस वालों ने उस की हर बात मानने में ही भलाई समझी और लगातार उस से बात कर के उसे उलझाए रखा.

रोहित ने दूध मांगा तो वह भी उसे दिया गया, लेकिन वह दरवाजा खोलने को तैयार नहीं था, इसलिए दूध की बोतल छत से रस्सी से लटका कर दी गई. रोहित ने बोतल का दूध लेने से मना कर दिया क्योंकि उसे डर था कि कहीं उस में कोई नशीला या बेहोश कर देने वाला पदार्थ न हो. इस के बाद उस ने हर चीज पैक्ड मांगी जो उसे मुहैया कराई गई.

उधर रोहित द्वारा जारी वीडियो में विभा लहूलुहान और बेहोश दिखाई दे रही थी, जिसे देख कर उस के मांबाप और बहन की चिंता बढ़ती जा रही थी. वीडियो में रोहित एसआई एस.एस. राजपूत को भी कोसता नजर आया. दोपहर होतेहोते स्थिति और विकट हो चली थी. रोहित कुछ समझने को तैयार नहीं था और बारबार विभा से शादी करने की रट लगाए जा रहा था. खाना और पानी भी उसे बालकनी से दिया गया था, जो उस की मांग के मुताबिक पैक्ड था.

जब खूब हल्ला मच गया तो शाम के करीब 5 बजे आला पुलिस अधिकारी हाइड्रोलिक मशीन के जरिए 5वीं मंजिल तक पहुंचे और रोहित से बातचीत की. हाइड्रोलिक मशीन पर राहुल लोढ़ा के साथ एसडीएम दिशा नागवंशी और एएसपी रामवीर यादव थे.

इन लोगों ने खिड़की से रोहित से बात की और उसे भरोसा दिलाया कि उस की शादी विभा से करवा दी जाएगी, इस में कोई अड़चन इसलिए नहीं है क्योंकि दोनों बालिग हैं और शादी के लिए राजी हैं.

राहुल लोढ़ा ने समझदारी से काम लेते हुए रोहित को आश्वस्त किया कि शादी रजिस्टर्ड होगी, क्योंकि एसडीएम भी उन के साथ हैं. चूंकि बंद कमरे में शादी नहीं करवाई जा सकती थी, इसलिए उन्होंने रोहित से बाहर आने के लिए कहा.

रोहित समझ तो रहा था कि यह पुलिस की चाल भी हो सकती है, लेकिन अब तक 12 घंटे गुजर चुके थे और वह थकने लगा था. वह बारबार विभा को धमका रहा था. होश में आ चुकी विभा की समझ में भी आ गया था कि इस सिरफिरे से छुटकारा पाने का एक ही तरीका है कि उस की बात मान ली जाए.

मेरी नहीं हुई तो मैं तुम्हें किसी और की भी नहीं होने दूंगा. अगर किसी और से शादी की तो मार डालूंगा, जैसे फिल्मी डायलौग बोलने वाले राहुल को थोड़ी तसल्ली तब हुई, जब विभा ने स्टांप पेपर पर शादी की सहमति दे दी.

इधर पुलिस वाले भी कुछ इस तरह से पेश आ रहे थे, मानो बाहर आते ही दोनों की शादी करा देंगे. रोहित को लग रहा था कि वह प्यार की जंग जीत गया है, जमाना उस के सामने झुक गया है.

वह पूरी ठसक से बाहर निकल आया. इस के पहले उस ने कुछ मीडियाकर्मियों से वीडियो कालिंग के जरिए बात की और जीत का निशान अंगरेजी का ‘वी’ अक्षर बनाते हुए खुशी जाहिर की थी.

बाहर आते ही पुलिस ने सिरफिरे आशिक रोहित को गिरफ्तार कर लिया और विभा सहित उसे इलाज के लिए अस्पताल भेज दिया, क्योंकि दोनों के शरीर से काफी खून बह चुका था. वहां गुस्से में मौजूद महिलाओं ने रोहित की जूतेचप्पलों और लातघूसों से खूब धुनाई की.

इलाज के बाद रोहित को हिरासत में ले लिया गया और विभा को घर जाने दिया गया. अस्पताल में विभा ने बताया कि वह रोहित से प्यार नहीं करती, उस ने तो खुद के बचाव के लिए शादी के हलफनामे पर दस्तखत कर दिए थे.

विभा की मां चंद्रा ने खुलासा किया कि एक साल से रोहित विभा के पीछे पड़ा था और उसे तरहतरह से तंग कर रहा था. इसी साल होली के मौके पर 28 मार्च को भी वह उन के घर में घुस आया था, तब भी उस के हाथ में कट्टा था. इस की शिकायत थाने में लिखाई गई थी और पुलिस ने रोहित को गिरफ्तार भी किया था, लेकिन बाद में उसे कोर्ट से जमानत मिल गई थी.

इधर मथुरा तक आ गए रोहित के पिता रेशमपाल को जैसे ही ड्रामे के खात्मे की जानकारी मिली, वह वहीं से वापस लौट गए. उन्होंने यह जरूर बताया कि वह रोहित की बेजा हरकतों से आजिज आ चुके हैं. इसीलिए कुछ दिन पहले उन्होंने उसे अपनी जायदाद से बेदखल कर दिया था. गांव में प्रधानी के चुनाव के दौरान रोहित द्वारा शराब चुराए जाने की बात भी उन्होंने बताई.

रेशमपाल ने ईमानदारी से यह भी बताया कि रोहित ने कई दफा इस लड़की (विभा) से फोन पर उन की बात कराई थी. यानी लोगों का यह अनुमान गलत नहीं था कि मामला उतना एकतरफा नहीं था, जितना विभा बता रही थी. उस ने भले ही रोहित से प्यार की बात नहीं स्वीकारी, पर यह जरूर कह रही थी कि रोहित का असली चेहरा सामने आने के बाद उस ने उस से दूरियां बनानी शुरू कर दी थीं.

जाहिर है माशूका की इसी बेरुखी से रोहित झल्लाया हुआ था. उसे विभा बेवफा नजर आने लगी थी, लेकिन वह उसे दिलोदिमाग से निकाल नहीं पा रहा था. गिरफ्तारी के दूसरे दिन रोहित पुलिस वालों से यह कहता रहा कि उन एसपी साहब को लाओ, जिन्होंने शादी करवाने का वादा किया था.

उस के मुंह से यह सुन कर सभी को उस पर हंसी भी आई और तरस भी. पुलिस वाले इस ड्रामे को थर्सडे नाइट कहते नजर आए, क्योंकि इस की शुरुआत गुरुवार 12 जुलाई से हुई थी.

श्रीवास्तव परिवार अभी सदमे से उबरा नहीं है और न ही लंबे समय तक उबर पाएगा. रोहित ने 12 घंटे जो ड्रामा किया, उस की दहशत उन के सिर चढ़ कर बोल रही है. खुद विभा आशंका जता रही है कि अगर रोहित को जमानत मिली तो वह फिर उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेगा.

रोहित के पिता रेशमपाल का भी यही कहना है कि रोहित को जमानत नहीं मिलनी चाहिए. कथा लिखने तक रोहित को जमानत नहीं मिली थी, पर भोपाल के सीनियर वकीलों का कहना है कि कुछ देर से ही सही, उसे जमानत मिल ही जाएगी. इसलिए बदनामी झेल चुके श्रीवास्तव परिवार को संभल कर रहना चाहिए.

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