पूजापाठ से पूरी नहीं होतीं उम्मीदें

शहर की एक पौश कालोनी की 2 युवतियां चुस्त जींस व टीशर्ट पहने अंगरेजी में बातचीत करते हुए मंदिर की ओर जा रही थीं. मंदिर के बाहर दुकान से प्रसाद, नारियल, अगरबत्ती आदि लीं. मंदिर में दोनों बड़ी श्रद्धा से लेट कर नाक रगड़ कर भगवान की मूर्ति के आगे नतमस्तक हुईं, पूजा की, बुदबुदा कर कुछ कहा और बाहर आ गईं.

एक युवती दूसरी से बोली, ‘‘मैं ने भगवान से कहा है कि यदि मेरा मेडिकल में चयन हो जाएगा तो मैं 5 मंगलवार, 5 शुक्रवार और 5 सोमवार तक व्रत रखूंगी, बराबर मंदिर आऊंगी और प्रसाद चढ़ाऊंगी.’’

यह सुन कर दूसरी युवती बोली, ‘‘तेरे साथ मैं भी मंदिर आया करूंगी, जब भगवान तेरी सुनेंगे तो मेरी मनोकामना भी जरूर पूरी होगी और ऐसा होने पर मैं भगवान की एक मार्बल की मूर्ति खरीद कर लाऊंगी.’’

इस तरह के दृश्य हर जगह मंदिरों में देखने को मिलते हैं. पहनावे, रहनसहन में भले ही हम कितने ही आधुनिक हो गए हों, बातें मोबाइल फोन, सुपरकंप्यूटर व इंटरनेट की करते हों, लेकिन विचारों से आज भी हम सब मध्ययुग में जी रहे हैं. धार्मिक अंधविश्वासों, कर्मकांडों, कुरीतियों, ऊंचनीच, ढोंगियों, साधुओं की जमात को ले कर हमारी सोच आज भी पुरातन ही है. शिक्षित होने के बाद भी लोगों में वैज्ञानिक सोच का विकास नहीं हुआ, यही कारण है कि बिना सोचेसमझे ही उच्च शिक्षित डाक्टर, इंजीनियर तथा कान्वेंट शिक्षित युवतियां भी गणेश की मूर्ति को दूध पिलाने चली जाती हैं. इन धार्मिक अंधविश्वासों ने जनसामान्य के विवेक, चिंतन व अध्ययन को तो लगभग क्षीण ही कर दिया है.

महिलाएं परिवार की मुख्य धुरी होती हैं और यदि यही अंधविश्वासों के जाल में फंसी रहीं तो उस परिवार का क्या होगा? धार्मिक रूढि़यों व निरर्थक कर्मकांडों के कारण ही हमें दुनिया के विकसित लोग अछूत, असभ्य व पिछड़ा मानते हैं. बेशक लड़कियां मेडिकल, इंजीनियरिंग, कंप्यूटर आदि में उच्च शिक्षा ले रही हों, लेकिन तंत्रमंत्र, जादूटोना, भूतप्रेत, पूजापाठ व कर्मकांड के मायाजाल में वे उलझी हुई हैं. इन में से ज्यादातर लड़कियों का मानना है कि आज वह जो कुछ हैं सिर्फ भगवान की कृपा की बदौलत हैं. उस मेहनत को वे नजरअंदाज कर देती हैं, जो उन्होंने की थी. वे यह भी मानती हैं कि भगवान की कुदृष्टि से सर्वनाश हो सकता है.

कहा जाता है कि हिंदू धर्म में देवीदेवता की संख्या हजारोंलाखों में नहीं करोड़ों में है और अब भी प्रतिदिन कोई न कोई चमत्कारिक देवीदेवता पैदा हो ही रहा है. अपनी मनोकामनाएं पूरी करवाने के लिए महिलाएं देवीदेवताओं के मंदिरों में जाती हैं. हर दिन सुबहशाम और कई खास दिनों में तो पूरा दिन पूजापाठ में गंवा देती हैं. कई मंदिरों में तो पूरे वर्ष ही वृद्ध महिलाओं की भीड़ जमी रहती है. समाज में गरीबों व असहायों के लिए कोई काम करने के बजाय वृद्ध महिलाएं दिनभर मंदिरों में ढोलमंजीरे कूटती नजर आती हैं. कई बार तो महिलाएं अपने पति व बच्चों की जरूरतों को भी नजरअंदाज कर सुबहशाम पूजा में व्यस्त रहती हैं. इस से परिवार, समाज व देश का काफी कीमती समय बरबाद होता है.

पूजापाठ करने वाली महिलाएं यह तर्क देती हैं कि ऐसा करने से उन्हें आत्मिक शांति मिलती है. इस बात को प्रमाणित करना है तो किसी भी मंदिर में चले जाइए. देशभर के मंदिरों की हालत देख कर ऐसा नहीं लगता कि वहां जाने से किसी को मानसिक शांति मिलती होगी.

घंटे, घडि़याल, शंख, आरती और जयकारे की ऊंची आवाज का शोर शायद ही किसी को कर्णप्रिय लगता हो. यह सब केवल देखादेखी किया जाता है वरना मंदिरों की व्यवस्था किस से छिपी है. अकसर मंदिर में जाने वाले को यह चिंता रहती है कि बाहर खोले गए उस के जूते को कोई दूसरा न चुरा ले जाए क्योंकि एक भक्त द्वारा दूसरे भक्त के अच्छे जूते देख कर चुराना एक आम बात है. मंदिर के अंदर भी भीड़ के कारण धक्कामुक्की होती है, मनचले औरतों के साथ छेड़छाड़ करते हैं, फूल मालाएं पैरों तले रौंदी जाती हैं. पुजारियों द्वारा अंधभक्तों को लूटा जाता है. भला ऐसे माहौल में पूजापाठ कर कैसी शांति मिलती होगी यह तो वहां जाने वाले बेहतर जानते हैं.

आजकल एक नया फैशन चल पड़ा है. जब से टेलीविजन पर नएनए बेतुके धार्मिक धारावाहिक चलने लगे हैं मंदिरों के पुजारियों की तो चांदी हो गई है.

लोग वैष्णोदेवी, बद्रीनाथ, केदारनाथ, मानसरोवर , तिरुपति, सोमनाथ, हरिद्वार आदि जगहों की तीर्थयात्रा कर पूजापाठ कर पुण्य कमाने की अधिक सोचते हैं. अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा इन तीर्थयात्राओं में गंवा देते हैं. इस से उन्हें मिलता तो कुछ नहीं, हां, इन में से जरूर कई लोग धार्मिक स्थानों पर होने वाली दुर्घटनाओं में बेमौत मारे जाते हैं. यदि दुनिया में तेजी से बदलते हुए परिवेश के अनुरूप हम अपने रीतिरिवाजों, तौरतरीकों में बदलाव नहीं लाएंगे तो पगपग पर दुनिया में हंसी के पात्र बनेंगे.

भगवाई राह पर कांग्रेस

कांग्रेस में इस समय हिंदू धर्म और सवर्णों का जो महिमामंडन चल रहा है वह उस के अब तक के किसी भी दौर को मात देने वाला है. कांग्रेस और उस के नेताओं में इस बात की होड़ लगी हुई है कि उन्हें आरएसएस और उस के संगठनों से इस मामले में आगे निकल जाना है.

राहुल गांधी मानसरोवर यात्रा पर गए. भला इस से किसी को क्या एतराज हो सकता है. यह उन की व्यक्तिगत आस्था का भी एक विषय हो सकता है. हालांकि ऐसा कुछ है नहीं, फिर भी उसे मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए. लेकिन उस के साथ ही देश के हर कोने में पार्टी की हर इकाई अगर इसी तरह से धर्म और आस्था से जुडे़ मुद्दों का अलगअलग तरीके से राग अलापती नजर आ रही हो तो मामला जरूर गंभीर हो जाता है.

मध्य प्रदेश में चुनाव जीतने का दावा कर रही कांग्रेस के चुनाव अभियान के प्रभारी कमलनाथ चुनाव जीतने पर हर पंचायत में गौशाला खुलवाने का वादा करते नजर आ रहे हैं. अब वहां आरएसएस को  भाजपा की जगह कांग्रेस की पीठ पर हाथ रखने में भला क्या एतराज हो सकता है, जो उस का हर एजेंडा पूरा करने के लिए तैयार है.

पार्टी के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला हरियाणा में कांग्रेस के डीएनए में ब्राह्मण खोजते पाए गए और उन्होंने एक ब्राह्मण सम्मेलन में ऐलानिया तौर पर इस बात की घोषणा की. इस सम्मेलन में बताया जा रहा है कि जनेऊ और चोटी से ले कर हर ब्राह्मणवादी कर्मकांड की चर्चा हुई. जिस ब्राह्मणवादी वर्चस्व के चलते देश में दलितों और वंचितों को एक इंसानी जिंदगी तक मयस्सर नहीं हो सकी, उस का महिमामंडन कर के आखिर पार्टी क्या हासिल करना चाहती है?

पंजाब में कांग्रेसी मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने तो सारी सीमाएं ही लांघ दीं. उन्होंने धर्म का अपमान करने पर ईशनिंदा कानून तक लाने की घोषणा कर डाली है. जो चीज अभी तक सिर्फ इसलामिक राष्ट्रों या धर्म आधारित देशों तक सीमित थी, उसे भारत में लाने की कवायद शुरू हो गई है और यह काम संघ या उस का कोई संगठन नहीं, बल्कि विपक्षी पार्टी कांग्रेस कर रही है.

इस के जरिए कांग्रेस ने एक बार फिर इस बात को साबित कर दिया है कि हर मामले, वह चाहे लिबरलाइजेशन के रास्ते कौर्पोरेट गुलामी का हो या फिर मंदिर में मूर्ति रखने व ताला खुलवाने के जरिए राम मंदिर अभियान शुरू करने का या कौर्पोरेट के इशारे पर नक्सलियों के सफाए का अभियान हो, देश को ये सभी रास्ते कांग्रेस ने ही दिखाए और सुझाए हैं. अब कांग्रेस ईशनिंदा जैसा एक खतरनाक हथियार संघ को दे रही है जो आने वाले दिनों में अगर उस का इस्तेमाल शुरू कर दे तो किसी को ताज्जुब नहीं होना चाहिए.

दरअसल, भारतीय राजनीति एक ऐसे उग्र दक्षिणपंथी दौर में पहुंच गई है जिस में संघ का पूरा अभियान एक फासीवादी रूप ग्रहण कर चुका है. उस में कांग्रेस की ये सब कवायदें अपनी तरह की तुष्टीकरण हैं. लेकिन इस से संघ का पक्ष कमजोर होने के बजाय और मजबूत होगा.

यह कुछ उसी तरह का दृश्य है जब हिटलर की मांगों के सामने यूरोप के सारे देश बारीबारी से झुकते जा रहे थे, क्योंकि उन को लग रहा था कि उस से हिटलर को शांत कर लिया जाएगा और मानवता के ऊपर से विश्वयुद्ध का खतरा टल जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. और पहले बढ़ाने, फिर आखिर में संतुष्ट करने के क्रम में पूरा विश्व युद्ध की आग में ढकेल दिया गया.

असली मुद्दे की बात नहीं

लिहाजा, इस समय कांग्रेस को संघ की बी टीम बन कर तमाम धार्मिक व सांस्कृतिक मुद्दों पर जयकारा लगाने की जगह उसे जनता से जुड़े बुनियादी मुद्दों को उठाना चाहिए था, जिस मोरचे पर भाजपा निहत्थी हो चुकी है. और उसे एक आखिरी धक्के की जरूरत है. पैट्रोल से ले कर डौलर के  मुकाबले रुपए की कीमत और महंगाई से ले कर बेरोजगारी देश के चरम मुद्दे बने हुए हैं, लेकिन इन सवालों पर न तो किसी राजनीतिक पार्टी की तरफ से कोई जुंबिश दिख रही है और न ही कोई दूसरा दूरदूर तक उस को आगे बढ़ाने वाला दिख रहा है.

लेकिन एक बात दावे के साथ कही जा सकती है कि इस पूरे प्रकरण में संघ विजयी साबित हो रहा है. उस का एजेंडा पूरे देश का एजेंडा बन गया है. आज भाजपा उस को आगे बढ़ा रही है और सत्ता में आने के बाद कल कांग्रेस उस को आगे ले जाने के लिए वादा कर रही है. इसलिए संघ के दोनों हाथों में लड्डू हैं.

एक बात राहुल गांधी को जरूर समझनी होगी कि संघ के खिलाफ लड़ाई संघियों को साथ ले कर नहीं लड़ी जा सकती है. उस के लिए आप को अपने विचारों से ले कर आधार तक सब को बदलना होगा. लेकिन जिस कांग्रेस के दिए खादपानी पर संघ खड़ा हुआ है, उस से उस के खिलाफ लड़ाई की उम्मीद करना ही बेमानी है.

मौसम यज्ञ का : यज्ञ के बाजारीकरण का लेखाजोखा

संकट मोचन हनुमान महायज्ञ, विश्वशांति गायत्री महायज्ञ, विश्व शांति वैदिक महायज्ञ. इस तरह के और भी न जाने कितने यज्ञ और महायज्ञ गांवों और शहरों में आयोजित होने लगे हैं जिन का नाम याद रखना भी संभव नहीं है.

मई का महीना शुरू होते ही ऐसे यज्ञों और महायज्ञों के आयोजन की कवायद शुरू हो जाती है और यह कार्यक्रम जुलाई तक चलता रहता है. बिलकुल कदमकदम की दूरी पर विभिन्न संतमहंतों द्वारा अलगअलग तरह के यज्ञ आयोजित किए जाते हैं.

खैर, आइए, अब आप को गांवों में ले चलते हैं जहां आप को इन यज्ञों का दूसरा पक्ष देखने को मिलेगा. सभी यज्ञ अगलबगल के गांवों में चंदा इकट््ठा कर आयोजित किए जाते हैं. चंदे के रूप में रुपएपैसे या अन्न के रूप में कुछ भी लिया जा सकता है. जिस के पास जो भी हो यज्ञ में अवश्य दान करना होगा.

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हरेक गांव से कई बोरे अनाज और कितने सारे रुपए यज्ञ के नाम पर वसूले जाते हैं. वसूली का दूसरा आलम यह है कि अभी एक यज्ञ की समाप्ति (पूर्णाहुति) भी नहीं हुई कि दूसरे यज्ञ वाले चंदा मांगने आ जाते हैं. एकत्रित कर के चंदे की इस रकम का आखिर क्या होता है? इस तरह के आयोजनों के लिए चंदा लगा कर लाखों रुपए जमा किए जाते हैं. फिर उन पैसों को तरहतरह से खर्च किया जाता है. भीड़ के रुकने के लिए जगह आदि की व्यवस्था, इस के साथ जगहजगह पर माइक, पोस्टर आदि के माध्यम से यज्ञ के लाभ और यज्ञ कराने वाले बाबा का यशोगान होता है. साथ ही यज्ञ के दौरान जुटने वाले साधुसंतों का आतिथ्य सत्कार भी उचित चढ़ावे के साथ किया जाता है.

इस दौरान तरहतरह के संतमहात्मा भी जुटते हैं, कोई सालों से मौन है तो किसी ने अन्न  न खाने (सिर्फ दूधफल पर जीवित रहने) की शपथ खाई है, तो कोई जीवन भर न बैठने की प्रतिज्ञा किए हुए है. और गांवों तथा देहातों में ऐसे बाबाओं के नाम पर बहुत लोग आकर्षित होते हैं. वास्तव में ऐसे बाबा ही आकर्षण का मुख्य केंद्र होते हैं.

ऐसे ही एक मौनी बाबा से यज्ञ के लाभ के बारे में पूछने पर उन का उत्तर था कि यज्ञ एक धार्मिक कार्य है और यह बात भी उन्होंने लिख कर बताई. बस, इस के आगे वह कुछ नहीं जानते. फिर आगे उन्होंने बताया कि आजकल धर्म का हृस हो रहा है और इस तरह के धार्मिक कार्य कर के वह लोगों को धर्म के रास्ते पर ले जाना चाहते हैं.

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अंत में मौनी बाबा ने धर्म का एक और महत्त्वपूर्ण तत्त्व बताया ‘दान’ और वह दान संतों को ही करना चाहिए, किसी दूसरे पुरुष को दिया गया दान व्यर्थ जाता है.

इस दान की रकम का तथाकथित संतमहंत किस प्रकार उपयोग करते हैं यह पिछले दिनों एक न्यूज चैनल द्वारा कराए गए ‘स्टिंग आपरेशन’ में खुल कर दिखाया गया, जिस में ये माया को त्यागने की शिक्षा देने वाले बाबा एक दलाल की तरह सौदेबाजी कर रहे थे.

मौनी बाबा हों या खड़ेश्वरी बाबा, इन के धर्म के प्रचार करने का तरीका कुछ समझ में नहीं आता. वैसे भी इस तरह के साधुसंत समाज और धर्म पर खुद एक बोझ हैं. किसी भी संत को कोई भी काम करते हुए आज तक नहीं देखा गया. सिर्फ भक्तों के पैसे पर ऐश करना उन का पेशा होता है.

इन यज्ञों के दौरान होने वाले धन की लूट का एक नजारा भी देखने को मिला जब एक यज्ञ के बाद यज्ञ करवाने वाले विहंगम योग के आचार्य को चढ़ावे में मिले सामान व रुपए ले जाने के लिए अलग से किराए पर गाड़ी करनी पड़ी.

चंदा जुटाने के बाद यज्ञ का आयोजन शुरू होता है. पहले दिन कलश यात्रा या जलभरी का कार्यक्रम होता है. शहर के आसपास के गांवों से आई महिलाओं और बच्चों की भीड़ के साथ यज्ञ कराने वाले संत बाबा और उन के शिष्य पूरे तामझाम और शानोशौकत के साथ नजदीक की नदी अथवा तालाब तक जुलूस की शक्ल में जल लाने के लिए निकलते हैं. इस दौरान बाजार और सड़क पर घंटों जाम लगा रहता है. मजे की बात तो यह कि इस जुलूस को शहर के भीड़भाड़ वाले इलाके से ही लाया और ले जाया जाता है, ताकि यज्ञ का प्रचार अधिक से अधिक लोगों तक हो सके.

इस कलश यात्रा को देख कर मन में इस प्रश्न का उठना स्वाभाविक है कि आखिर सैकड़ों महिलाओं व बच्चों के साथ चिलचिलाती धूप में सिर पर घड़ा रख कर नंगे पांव चलने वाले को लाभ क्या होता है? उन के द्वारा लाए गए पानी का आखिर क्या उपयोग होता है? यह जल कलश तो यज्ञ मंडप में केवल सजावट की चीज के तौर पर रखा जाता है, जिसे यज्ञ समाप्त होने पर स्वामीजी के चेले आपस में बांट लेते हैं और इतने कष्ट से लाए गए जल को अंत में फेंक दिया जाता है.

अगले दिन से यज्ञ का आयोजन शुरू होता है. इस दौरान लाउडस्पीकर लगा कर कभी रामचरितमानस तो कभी अन्य ग्रंथ बांचे जाते हैं. इतना ही नहीं यज्ञ मंडप की परिक्रमा करना भी बड़े पुण्य का काम माना जाता है. भक्तगण अधिक से अधिक परिक्रमा करते हैं. साथ ही यज्ञ में आने वाले भक्तों के लिए प्रवचन और रामलीला आदि की भी व्यवस्था की जाती है और अंत में होता है यज्ञ का समापन पूरे तामझाम और शानोशौकत के साथ.

हमारे देश में धर्म की दुकानें तो सदियों से चलती आ रही हैं और आज भी खूब चल रही हैं. अब तो आधुनिक संतमहंतों ने इसे वैश्विक बना दिया है. मई का महीना शुरू होते ही जगहजगह मठों और मंदिरों में साधुसंतों का आना शुरू हो जाता है. कई मठ तो ऐसे हैं जहां हर साल किसी न किसी प्रकार का यज्ञ आयोजित किया जाता है. चूंकि इस महीने खेती का काम नहीं रहता, स्कूलकालिज भी बंद रहते हैं अत: लोगों की अच्छीखासी भीड़ जुटती है. गांवदेहात से लोग यज्ञ देखने और स्वामीजी का आशीर्वाद लेने इस उम्मीद के साथ पहुंचते हैं कि इस पुण्य के बदले उन्हें सुखसमृद्धि मिलेगी. उन की वर्तमान दुर्दशा का कारण उन के पूर्वजन्म के पाप हैं और यज्ञ में भाग ले कर, दान दे कर जो पुण्य मिलेगा वह अगले जन्म में काम आएगा.

यज्ञ के बाजारीकरण का एक और नमूना देखिए. एक संस्था ‘विहंगम योग’ द्वारा आयोजित किए जाने वाले यज्ञ में सैकड़ों या कभीकभी तो हजार की संख्या में हवनकुंड बनाए जाते हैं, फिर इन हवनकुंडों की नीलामी होती है. मंच के नजदीक का हवनकुंड 10 से 20 हजार रुपए में यज्ञ करने के लिए नीलाम किया जाता है और दूर वाले कुंड की कीमत कुछ कम होती है. अगर हवनकुंड लेने वाले अधिक हो गए और उन की संख्या कम पड़ गई तो उस की भी वैकल्पिक व्यवस्था की जाती है.

इन में हवन करने के लिए घर से लाई गई हवन सामग्री से काम नहीं चलेगा. हवन सामग्री आप को संस्था से ही खरीदनी पड़ेगी, जिस की कीमत संस्था द्वारा मनमाने तरीके से तय की जाती है.

इस प्रकार की दुकान के चलने का एक बड़ा कारण यह है कि सदियों से हमारे देश में पिछड़ी जातियों के लोगों को पूजापाठ और यज्ञहवन करने से मना किया जाता रहा है और इस संस्था द्वारा पैसे ले कर ऐसे ही लोगों से यज्ञ और हवन कराया जाता है. ऐसा करने वाले अपने को धन्य समझते हैं.

इस तरह के आयोजनों में कितने समय और श्रम की बरबादी होती है इस का अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं.

यज्ञ का आयोजन करने वालों में कोई तो विश्व शांति के लिए यज्ञ करवाता है तो कोई सामाजिक सुखसमृद्धि के लिए. अगर यज्ञ के द्वारा ही विश्व शांति हो जाती तो फिर संयुक्त राष्ट्र जैसी बड़ी संस्था की क्या आवश्यकता थी? यज्ञ करवाने के पक्ष में एक और तर्क दिया जाता है कि यज्ञ कुंड के धुएं से पर्यावरण की शुद्धि होती है और आसपास का वातावरण स्वच्छ होता है, लेकिन यज्ञ में जुटने वाली भीड़ और यज्ञ के दौरान होने वाले शोरगुल का लाभ आप को यज्ञ स्थल के आसपास रहने वाले लोग ही बता सकते हैं.

इन यज्ञों से किसी को पुण्य लाभ मिलता है या नहीं, लेकिन यज्ञ कराने वाले बाबा की जेब जरूर भरती है.

कास्टिंग काउच का सियाह सच

कास्टिंग काउच के लिए दोषी भले ही पुरुष समाज हो लेकिन इस कृत्य में कहीं न कहीं महिलाओं की मूक सहमति भी छिपी होती है. ऐसे में समाज में एक सियाह सच बन चुके कासटिंग काउच पर रोक लगाना कैसे संभव है भला.

कास्टिंग काउच आज की दुनिया का एक सियाह सच है. फिर चाहे वह फिल्मी दुनिया, टीवी इंडस्ट्री या मौडलिंग क्षेत्र हो या फिर नौकरी या शिक्षा का क्षेत्र,  सभी क्षेत्रों में कास्टिंग काउच होता है.यह सभी जानते हैं. लेकिन कोई इस के बारे में बात नहीं करना चाहता. बहुत कम लोग ऐसे हैं जो इस मामले को सब के सामने उजागर करने की हिम्मत जुटाते हैं. यही नहीं, आजकल हर तरफ एक जाल बिछा है, युवक हों या युवती, दोनों को ही कभी न कभी किसी रूप में सामना करना पड़ता है. हो सकता है युवकों को इसका कम सामना करना पड़े. युवती से तो पहली शर्त यही होती है कि अकेले में आ कर मिलो.

मेरी एक सहेली, सीमा (परिवर्तित नाम) लेखिका है. उसके अनुसार लेखन की दुनिया भी इससे अछूती नहीं. सीमा ने जो भी बताया, बहुत चौंकाने वाला था.

सीमा और उसी के शहर के एक दैनिक अखबार के संपादक के बीच की वार्ता से आपको रूबरू करवाते हैं :

संपादक : सुप्रभात.

सीमा : नमस्ते सर.

संपादक : आपकी मेल मिली.

सीमा : धन्यवाद.

संपादक : क्या करती हो?

सीमा : लेखिका हूं.

संपादक : लेखन से गुजारा हो जाता है और क्या करती हो?

सीमा : नहीं, हाउसवाइफ हूं.

संपादक : अपनी रचना और 2 फोटो भेजो, यहीं इनबौक्स में.

सीमा : मेल से नहीं?

संपादक : तुम्हारी खुली नहीं. मैं ने तो बहुत कोशिश की. इसीलिए इनबौक्स में ही आओ. वैसे तुम बहुत अच्छी हो. संपर्क बनाए रखो. बताओ, अच्छी हो या नहीं?

सीमा : पता नहीं.

सीमा को यह वार्तालाप अजीब लगा. उसने कुछ दिनों तक कोई कविता नहीं भेजी. फिर एक दिन उसी संपादक महोदय का मैसेज आया.

संपादक : मन सागर तन गागर, मिले कैसे प्रेम बागर. हमने कहा था फोन करना, क्यों नहीं किया? समय निकाल कर फोन करो. अकेलापन रहने नहीं देता. पर सीमा ने फोन नहीं किया. फिर एक मैसेज आया.

संपादक : जीवन बेनूर हो गया है, हर सपना चूर हो गया है. उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद खाक, ईमानदार पत्रकारिता का जो गुरूर हो गया है.

सीमा ने गुस्से में कौल किया तो उस की आवाज सुनते ही महाशय बोले,’’ अरे जान, तुम कहां थीं? तुम्हारी आवाज सुनते ही तनमन झूम गया.

सीमा ने कहा,  आपकी हिम्मत कैसे हुई इस तरह बात करने की?

‘‘क्या हुआ तुम्हें प्रिये? कविता नहीं छपवानी क्या?’’

नहीं, सीमा ने साफ मना कर दिया. लालच दिया संपादक ने.

संपादक ने फिर भी पीछा नहीं छोड़ा, ‘‘पैसा नहीं कमाना चाहती क्या?’’

‘‘इस तरह से बिलकुल नहीं, आपने शायद मुझे गलत समझा,’’ सीमा ने हिम्मत दिखाई.

अब संपादक गिड़गिड़ाया, अरे नहीं, मैंने गलत नहीं समझा. मैं तो बस इतना कह रहा हूं.एक दिन अकेले में आ कर मिलो. एक कप साथ में बैठ कर कौफी पी लें. थोड़ी सी बातें कर लें. एकदूसरे को जान लें.

सीमा ने उस संपादक के नंबर को ब्लौक कर दिया. पर मन में डर बना रहा कि कहीं कोई अनहोनी न हो, क्योंकि मेल में उस ने घर का पता भी भेजा था. यही नहीं, इसके अलावा भी कुछ लोगों ने सीमा को लालच दिया कि मंथली बेसिस पर लेख लेंगे लेकिन शर्त वही, ‘एक मुलाकात अकेले में.’

अकेले का मतलब क्या है, आप समझ ही गए होंगे. शुरू-शुरू में उसे बहुत बुरा लगा क्योंकि वह पत्रकारिता की दुनिया को साफसुथरा समझती थी. सीमा के अनुसार, धीरे-धीरे औफर्स इतने कौमन होते जाते हैं कि फिर इन से फर्क पड़ना बंद हो जाता है.

महिला का शोषण हर जगह और हर रूप में हो रहा है. कहीं दहेज तो कहीं शादी और कहीं नौकरी के नाम पर उस का यौनशोषण किया जाता है. कहीं गरीबी तो कहीं स्टेटस के नाम पर वह बिकने को मजबूर है.

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झारखंड में तो औरत की इज्जत बिकना जैसे उस की नियति बनती जा रही है. कुछ ही दिनों पहले एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसमें छात्रा दिल्ली के दौलतराम कालेज में पढ़ती है. कालेज के राजनीति शास्त्र के प्रोफैसर कक्षा के दौरान छात्रा के संपर्क में आए और फिर नजदीक आने का बहाना ढूंढ़ने लगे. 17 वर्षीया छात्रा का आरोप है कि प्रोफैसर शुरू से ही उस पर गलत निगाह रखते थे और नजदीक जाने पर किसी न किसी बहाने से उसे गलत तरीके से छूते थे. लिहाजा, वह प्रोफैसर से दूरियां बनाने लगी.एक दिन प्रोफैसर ने छात्रा को कैंटीन के पास रोक लिया और गंदे शब्दों से संबोधित कर उससे छेड़छाड़ की. छात्रा के मुताबिक, प्रोफैसर उसे अकेले मिलने को बुलाते थे और अश्लील व्हाट्सऐप मैसेज भेजते थे. छात्रा का कहना है कि जब उसने छेड़छाड़ की शिकायत करने को कहा तो प्रोफैसर ने उस को फेल करने की धमकी दी. इन बातों से छात्रा मानसिक तौर से काफी परेशान रहने लगी. बाद में दोस्तों की सलाह पर छात्रा ने प्रोफैसर के खिलाफ थाने में शिकायत दर्ज करा दी.

महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी, रोहतक के खेल निदेशक देवेंद्र ढुल के खिलाफ यूजीसी-नैट क्लीयर करवाने का झांसा दे कर यौन शोषण करने के आरोप में केस दर्ज कराया गया था. ढुल पर आरोप लगाने वाली छात्रा ने अपनी शिकायत में लिखा था कि अधिकारी ने उसे नैट परीक्षा में पास कराने व पीएचडी की डिग्री दे कर लैक्चरर की नौकरी दिलवाने के एवज में औफिस के बजाय कहीं बाहर अकेले मिलने को कहा था.

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उत्तर प्रदेश, ग्रेटर नोएडा की गलगोटिया यूनिवर्सिटी की एक छात्रा ने अपने प्रोफैसर पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था. छात्रा के अनुसार, उपस्थिति कम होने की वजह से उसे एग्जाम में बैठने से रोक दिया गया. इसके बाद उस ने ब्रांच के प्रोफैसर से मुलाकात कर एग्जाम में बैठाने की अपील की. प्रोफैसर ने उसे ज्यादा नंबर दिलाने और प्रतिदिन अधिक क्लासेस पढ़ने के लिए कहा. प्रोफैसर ने 3 दिनों तक तो उसे यूनिवर्सिटी में ही पढ़ाया. इसके बाद उससे घर पर आ कर पढ़ने के लिए कहा. घर पर बुलाने के बाद प्रोफैसर उस छात्रा का रोज यौन उत्पीड़न करता रहा.

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साहित्य विभाग के एक युवा असिस्टैंट प्रोफैसर ने एक छात्रा को पढ़ाने के बहाने अपने घर बुला कर उसके साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाए और चुप रहने की धमकी भी दी. यही नहीं, इस प्रोफैसर ने अपने रसूख का इस्तेमाल कर उस लड़की को एमए कोर्स में फेल भी करा दिया.

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दरअसल, आप किसी भी पद पर हों, उस से फर्क नहीं पड़ता, पर आप एक महिला हैं तो सिर्फ इस कारण आपको कई दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे कई पुरुष मिल जाएंगे जो मिलने पर हाय-हैलो करना नहीं भूलते. पर पीठ-पीछे उनकी निगाहें लड़की होने का अर्थ समझा देती हैं.

यह सच है कि हमारे देश में महिलाएं प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री भी रह चुकी हैं, फिर भी वे शोषण का शिकार हैं. यह एक कड़वी सचाई है. बजाय इसके कि हम उन की मानसिक पीड़ा को कम करें, हम महिला शोषण पर लिख कर उन के प्रति सिर्फ सहानुभूति दर्शाति हैं और इतने ही कर के अपने कर्तव्यों का पूरा होना मान लेते हैं.

समाज में महिलाओं की स्थिति

अत्याचार सिर्फ वही नहीं होता जो कानून की दफाओं में दर्ज हो. हमारे देश में महिलाओं की हालत सिर्फ नारों के आसपास ही घूमती रहती है. सशक्तीकरण, आजादी, इज्जत और बराबरी का हक सिर्फ किताबों में धूल फांक रहा है. इनका जमीनी हकीकत से कोई लेनादेना नहीं है.आज की महिला को जो विशेष सम्मान या दर्जा मिला है, वह सिर्फ कैलेंडर और तस्वीरों की शोभा बढ़ाता है. जमीनी हकीकत में तो वह अब भी सिर्फ मांस का लोथड़ा भर है, जो पुरुषों के नोचने-खसोटने भर के लिए है. उसकी अपनी कोई इच्छा नहीं है, अपना कोई वजूद नहीं है. वह तब तक आजाद है जब तक पुरुष चाहे. वह तब तक खुश रह सकती है जब तक कि पुरुष उसमें बाधा न डाले. समाज और समुदायों में इसी ‘मर्दानगी’ को मजबूत किया जाता है. इस से महिलाओं को पुरुषत्व का बोध कराया जाता है और इस चल रही रीति को आगे बढ़ाया जाता है. लिहाजा, मर्द महिला का बलात्कार कर अपनी कुंठा को निकालता है.

दोनों तरफ से सहमति

लखनऊ स्थित एजुकेशनल टीवी सैंटर एसआईई के हेमंत का इस बारे में कहना है, ‘‘यौन उत्पीड़न की घटनाएं हर क्षेत्र में होती हैं.’’ आज से 8-10 साल पहले का वाकया बताते हुए वे कहते हैं, ‘‘उस समय दूरदर्शन पर औडिशन हुआ तो अनाउंसर की पोस्ट के लिए एक युवती का सिलैक्शन हुआ. डायरैक्टर साहब आशिकमिजाज थे, वे उस युवती के पीछे पड़ गए. उसे जब-तब गंदे मैसेज कर देते थे. एक दिन तो हद ही हो गई जब वे शराब पी कर सीधे उसके घर पहुंच गए. युवती के परिवार वालों ने पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी. तब वे अपनी इस आदत से बाज आए. उस युवती की गलती यह थी कि आगाह करने के बाद भी उसने उसे अपने घर का नंबर दे दिया.’’

हेमंत का यह भी कहना है, ‘‘कास्टिंग काउच में सिर्फ एक पक्ष की गलती होती है, ऐसा नहीं है. यह दोनों पक्षों से जुड़ा मामला है. यह दोनों तरफ से सहमति के बाद ही संभव होता है. कास्टिंग काउच तभी संभव है, जब दूसरा इंसान भी तैयार होता है.’’

सवाल उठता है कि क्या कास्टिंग काउच आज के समय में बिलकुल नौर्मल बात है? क्या टैलेंट की कोई कद्र नहीं? क्या आगे बढ़ने के लिए घिनौनी शर्तों को मानना पड़ता है? बहरहाल, ऐसी भी बहुत युवतियां हैं जो कास्टिंग काउच के सामने घुटने टेकने के बजाय उसकी असलियत सब के सामने लाने में यकीन रखती हैं जबकि कुछ कामयाबी के लिए इसे एक आसान राह मान कर समझौता कर लेती हैं.

हर फिल्म अश्लील नहीं होती: आकांक्षा अवस्थी

लखनऊ की आकांक्षा अवस्थी को जीवन में चैलेंज लेना बहुत पसंद है. आकांक्षा ने लखनऊ के भातखंडे संगीत विद्यालय से म्यूजिक की शिक्षा ली, लेकिन म्यूजिक से अधिक लोगों को उनका अभिनय पसंद आने लगा. आकांक्षा को भी लगा कि वे ऐक्टिंग में कैरियर बना सकती हैं.आकांक्षा ने मुंबई जा कर प्रयास करना शुरू किया. कुछ ही सालों में आकांक्षा ने अलग-अलग चैनलों के लिए 12 से अधिक टीवी सीरियलों में काम किया. इनमें ‘घर की लक्ष्मी,’ ‘इश्क में मर जांवा’, ‘डोली सजा के रखना’, ‘राजा की आएगी बरात’ और ‘उतरन’ जैसे नाम प्रमुख हैं. ‘उतरन’ से उनको घर-घर में पहचान मिली. टीवी सीरियलों की दुनिया से निकल कर अचानक आकांक्षा ने भोजपुरी फिल्म ‘दबंग सरकार’ में हीरोइन की भूमिका स्वीकार कर ली.

सीरियलों से भोजपुरी फिल्म की ओर क्यों? ऐसे कई सवालों को ले कर आकांक्षा के साथ खास बातचीत हुई. पेश हैं प्रमुख अंश :

टीवी सीरियलों से अचानक भोजपुरी फिल्मों का रुख कैसे किया?

काफी सोच-विचार के बाद भोजपुरी फिल्म ‘दबंग सरकार’ में काम करने का फैसला लिया. इस फिल्म को स्वीकार करने के पीछे प्रमुख वजह यह है कि मुझे चैलेंज लेने की बहुत आदत है. मैं म्यूजिक सीखने के बाद एक्टिंग करने लगी, यह भी उसी का हिस्सा था.‘दबंग सरकार’ को बनाने वाले निर्देशक योगेश राज मिश्रा, प्रोड्यूसर राहुल वोहरा और दीपक कुमार ने मुझे बताया कि वे भोजपुरी फिल्मों में चल रहे ट्रैंड से कुछ अलग हट कर एक फिल्म बना रहे हैं. इस फिल्म में गाने, डांस और कहानी के बीच संतुलन देखने को मिलेगा. फिल्म को लखनऊ में शूट किया जाएगा. ऐसे में मुझे अपने शहर में काम करने का मौका मिल रहा था. मैंने भोजपुरी फिल्मों के बारे में बहुत सुना था. मुझे लगा कि जिंदगी में यह चैलेंज भी ले कर देखना चाहिए. काफी सोच-विचार कर मैंने इस फिल्म के लिए हामी भर दी.

क्या कुछ तैयारी की इसके लिए?

सब से पहले तो यह परेशानी थी कि मैंने कभी भोजपुरी फिल्म नहीं देखी थी. मैंने भोजपुरी फिल्में देखीं. उनके गाने सुने. ‘दबंग सरकार’ में मेरे हीरो खेसारीलाल हैं. उनके बारे में पता था कि वे भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार हैं. एक डर सा मन में बैठ गया कि पता नहीं कैसा व्यवहार होगा उनका. भोजपुरी फिल्मों के गाने, उनका फिल्मांकन देख मुझे थोड़ा डर लगा कि मेरी इमेज खराब न हो. चैलेंज लेने के अपने स्वभाव के कारण ही मैंने ‘दबंग सरकार’ में काम करने की हामी भरी. इस फिल्म में अपने रोल के लिए मुझे अपना वजन 8 से 10 किलो बढ़ाना पड़ा.

भोजपुरी फिल्मों को ले कर आप के मन में जो झिझक या डर था वह खत्म हो गया?

शूटिंग शुरू हुई तो फिल्म के हीरो खेसारीलाल ने मेरी काफी सहायता की. मुझे लगा ही नहीं कि वे इतने बड़े कलाकार हैं. फिल्म के लिए मेरे जो सीन या गाने शूट हुए वे काफी अच्छे लगे. फिल्म में खुलेपन और फूहड़पन को ले कर जिन बातों का डर था वह नहीं दिखा. सीरियलों में हम स्टूडियो में ही शूटिंग करते हैं, लेकिन फिल्म के लिए आउटडोर शूटिंग करनी पड़ी. यह अलग अनुभव था.

आप सीरियल या फिल्मों में कैसे रोल पसंद करती हैं?

एक ऐक्ट्रैस के तौर पर जिस किरदार में मुझे कुछ कर दिखाने का मौका मिलेगा वह मुझे पसंद है. निजी तौर पर मैं कौमिक रोल करना पसंद करती हूं. मुझे लगता है कि किसी को हंसाना सब से अच्छा मनोरंजन होता है. अपने किरदार में कई बार कौमेडी के रंग भरती हूं, पर कौमेडी में यादगार रोल करने का बहुत मन है.

भोजपुरी फिल्मों पर अश्लीलता का ठप्पा लगा है. ऐसे में आपकी इमेज को कोई खतरा तो नहीं?

भोजपुरी में अच्छी फिल्में भी बनती हैं लेकिन इनकी चर्चा कम होती है. अश्लीलता की चर्चा से कुछ फिल्मों को प्रचार मिलता है. इस कारण यह बात होती है. कलाकार अपना रोल पसंद आने के बाद ही फिल्म करता है. ‘दबंग सरकार’ को करने के बाद मैं दावे से कह सकती हूं कि हर फिल्म अश्लील नहीं होती. इस फिल्म से भोजपुरी फिल्मों को ले कर जो सोच बनी है वह बदल जाएगी. इस फिल्म को करने के बाद मैं वापस सीरियलों में शूटिंग करने जा रही हूं. इमेज पर खतरे वाला कोई रोल हमने नहीं किया है.

फिल्म और टीवी दोनों में अभिनय अलग-अलग हैं?

फिल्म और टीवी दोनों अलग-अलग माध्यम हैं. खासकर भोजपुरी फिल्मों को ले कर कहें तो यहां पर परिवार एकसाथ जा कर फिल्में नहीं देख रहे हैं. टीवी सब से ज्यादा परिवार के बीच देखा जाता है. ऐेसे में दोनों माध्यम केवल दर्शक के हिसाब से ही अलग नहीं हैं, इन को बनाने से ले कर प्रोडक्शन हाउस तक अलग होते हैं. फिल्म 2 घंटे में सिमट जाती है जबकि टीवी सीरियल सालों साल चलते हैं. दोनों के दर्शक और महत्त्व अलग हैं. इन को आपस में जोड़ कर नहीं देखा जा सकता.

आप की हौबीज क्या हैं?

म्यूजिक के साथसाथ मुझे कुकिंग का भी बहुत शौक है. जब भी मुझे समय मिलता है कुछ स्वादिष्ठ खाना बनाने का प्रयास करती हूं. वैसे तो कई बार मजबूरी में बेस्वाद खाना ही खाना पड़ता है जिस से वजन न बढ़े. इस फिल्म में वजन बढ़ाया, अब मुझे घटाना होगा. नारियल पानी से काफी मदद मिलती है.

किस स्तन के आकार की महिलाएं होती हैं ज्यादा आकर्षक? जानिए पुरुषों की राय

महिलाओं के वक्ष को ले कर पुरूषों में बेहद कामुकता देखी जाती है. वक्ष को ले कर उनकी धारणाएं, सोच, ख्याल सब बहुत अनोखे और अति होते हैं. यही कारण रहा कि पुरूषों को किस तरह के स्तन पसंद है इस बात को ले कर कई शोध किए जा चुके हैं पर अब तक किसी खास नतीजे पर पहुंचना संभव ना हो सका.

महिलाओं के वक्ष हर तरह के होते हैं. कुछ डील-डौल, कुछ बड़े, छोटे, चुस्त और ढीले भी हो सकते हैं और कई बार तो ये भी होता है कि दोनों स्तन समान आकार के ना हों. ज्यादातर पुरूषों में बड़े स्तन वाली महिलाओं के प्रति आकर्षण होता है, इसका मनोवैज्ञानिक कारण ये सामने आया कि पुरुषों को लगता है कि बड़े स्तन वाली महिलाएं दुसरों से तुलनात्मक रूप से ज्यादा उर्वर होती हैं.

इस मामले पर विश्व भर के कई शोधकर्ताओं ने शोध किया है. इसमें ब्राज़ील, कैमरून, चेक गणराज्य और नामीबिया के 250 ऐसे पुरुषों को ढूंढा गया जो महिलाओं के स्तनों की तसवीरें देखकर उनका आकलन करने को तैयार थे. उन्हें विभिन्न प्रकार के स्तनों की तसवीरें दिखाई गयी और उन्हें उनकी सुंदरता के आधार पर अंक देने को कहा गया. जिसमें ये बात सामने आई कि अधिकतर पुरुषों में मध्यम आकार के स्तन को ले कर ज्यादा आकर्षण दिखा. इसके अलावा पुरुषों के पसंद के पीछे उनके भागौलिक संबंध का भी असर दिखा. चेक गणराज्य को छोड़ दें तो बाकी देशो में हर पांच में से एक पुरुष को छोटे स्तन अच्छे लगते थे. विश्व के अलग हिस्सों में हुए कई और अध्ययनों से भी यही बात सामने आई है कि पुरुषों को सभी तरह के स्तन पसंद आते हैं.

हम अपने दोगलेपन में माहिर हैं

दूसरे देशों के नागरिक दोगले हैं या नहीं, पर हम अपने दोगलेपन में माहिर हैं. हमारे नेताओं से ले कर घर के सामने सफाई करने वाले तक कहते कुछ हैं, करते कुछ हैं और उन की नैतिकता, व्यावहारिकता, रिश्तेदारी, राष्ट्रीयता, भक्ति के पैमाने हर मौके पर बदल जाते हैं. सुबह 4 घंटे पूजा करने वाले घर में मांबहन की गालियां दी जाती हैं और बाहर निकलते ही हम लूट में लग जाते हैं. मंच पर सदाचार का भाषण देने वाले मंत्री कमरे में लौट कर लाखों की रिश्वत लेते हैं.

सब से बड़े दोगले तो वे प्रवचनकर्ता हैं जो सोने के सिंहासन पर बैठ कमसिन लड़कियों से पैर दबवाते सेवा व त्याग का गुणगान करते हैं और धन को माटी समान कहते हैं.

इसी गिनती में विदेशों में बसे भारतीय हैं. वे दोगलेपन के स्पष्ट नमूने हैं. उन्हें अपने देश से हजार शिकायतें हैं, पर कोई उन के देश की जरा सी आलोचना कर दे तो सिर फोड़ने की बात करने लगते हैं (फोड़ते नहीं क्योंकि इतना दम नहीं). अमेरिका में हर 7 में से 1 शख्स अमेरिका से बाहर पैदा हुआ है पर उन में भारतीय ही खास हैं जिन का पाकिस्तानी मूल के उसी देश में रहने वाले उसी देश के नागरिक को देख कर खून खौलता है.

वे अपने देश की गंदगी की भरपूर आलोचना करते हैं पर अगर उन के देश के दौरे पर हों तो भारत के उन्हीं राजनीतिबाजों की जीहुजूरी करते हैं जो उन की निगाहों में निकम्मे और भ्रष्ट हैं. हिंदू धर्म के ये ही सब से बड़े धर्मरक्षक हैं जबकि जानते हैं कि धार्मिक रीतिरिवाजों के कारण ही भारत पिछड़ा हुआ है. वर्ष 2007 से 2017 तक लगभग 8 लाख देशभक्त अपना देश भारत छोड़ कर अमेरिका जा चुके हैं और भारत की गंदगी से मुक्ति पा कर अमेरिका में सैकंड रेट रैजीडैंट बन कर खुश हैं.

भारतीय मूल के लोग इस साल बड़ी संख्या में अमेरिकी चुनावों में भी लगे हैं. वे भारतीय चुनावों में भी दखल देते रहते हैं. दोगलेपन में माहिर ये 2 देशों के नागरिक बने रहते हैं, भारत पर पैदाइशी हक और अमेरिका पर कानूनी.

ये वे ही हैं जो भारत में बंगलादेश से आए लोगों को कोसते नहीं थकते. ये ही भारत के हर मुसलमान को विदेशी मानते हैं. अमेरिका में आधुनिक शिक्षा पाते हैं, तार्किक ज्ञान पाते हैं लेकिन भारत लौट कर पंचांग देख कर शुभ समय देख व पूजापाठ करते हैं.

कुछ समय पहले इन की इज्जत बढ़ी थी जब भारतीय कंपनियों ने सौफ्टवेयर व छोटी मशीनें सस्ते में तैयार करनी शुरू की थीं पर अब ये फिर से ग्रहण में आ गए हैं. ये समाजसेवा के नाम पर मंदिर बनवाते हैं और लगता है अब ये अमेरिकियों की आंखों में चुभने लगे हैं.

25 फीसदी सीटों की मांग से टूटा मायावती-कांग्रेस गठबंधन

मायावती की सोच में राजनीतिक लचीलापन नहीं है. वह बहुजन समाज पार्टी को अपनी निजी जायदाद समझ कर काम कर रही हैं. यही वजह है कि 4 बार उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री रहने के बाद भी उनको राष्ट्रीय स्तर का नेता नहीं माना जाता. राष्ट्रीय राजनीति में उनकी तुलना पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से कमतर की जाती है. दलित वर्ग जैसे बड़े वर्ग की नेता होने के बाद भी करीब 30 साल की राजनीति में वह उत्तर प्रदेश से बाहर अपना प्रभाव नहीं बना पाई.

उत्तर प्रदेश में 2007 के बाद से उनका जनाधार कमजोर होता जा रहा है. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छतीसगढ़ के विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में मायावती से जिस समझदारी भरी राजनीति की उम्मीद की जा रही थी वह खत्म हो रही है.

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छतीसगढ़ तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में गठबंधन न होने के पीछे मायावती का अक्खड़पन था. वह उत्तर प्रदेश में सीटों के बंटवारे में कांग्रेस को सबसे कम सीटें देना चाहती थी जबकि कांग्रेस से मध्य प्रदेश, राजस्थान और छतीसगढ़ मांग रही थी.

उत्तर प्रदेश में पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को बसपा से अधिक सीटे मिली थी. बसपा को उस समय 5 और कांग्रेस को 2 सीटें मिली थी. बसपा को एक भी सीट नहीं मिल सकी थी. लोकसभा में बसपा का कोई सदस्य नहीं है. इसके बाद भी वह उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस से ज्यादा सीटें मांग रही थी.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को सबसे कम सीटें देने की बात कहने वाली मायावती मध्य प्रदेश, राजस्थान और छतीसगढ़ दलित आबादी को आधार मानकर 25 प्रतिशत सीटें मांग रही थी. मायावती तालमेल का जो फार्मूला उत्तर प्रदेश में लागू कर रही थी वह उसे मध्य प्रदेश, राजस्थान और छतीसगढ़ में लागू नहीं करना चाहती थी. इस वजह से कांग्रेस के साथ उनका तालमेल नहीं हो सका.

राष्ट्रीय राजनीति में मायावती खुद को तीसरे मोर्चे का नेता मानकर चल रही हैं. उन्हे लगता है कि अजित जोगी जैसे नेताओं के साथ मिलकर वह अपना जनाधार साबित कर लेंगी. मायावती की मजबूरी दलित वोटर का बिखर जाना है. उत्तर प्रदेश में इस बिखराव को रोकने की जिम्मेदारी मायावती की थी. तालमेल तोड़ कर मायावती ने बड़ी चूक की है.

अखिलेश यादव और राहुल गांधी के पास अभी समय है. मायावती इस बार चूकी तो जो जनाधार उनके पास बचा है वह भी खत्म हो जायेगा. ऐसे में वापस बसपा का उभर कर आना नामुमकिन हो जायेगा. जिस तरह से बसपा-कांग्रेस का तालमेल मध्य प्रदेश, राजस्थान और छतीसगढ़ के चुनाव में टूटा है उसी तरह उत्तर प्रदेश में भी टूटेगा.

मायावती को अगर तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में सफलता मिली तो वह बढ़ी हुई कीमत वसूल कर तालमेल करेंगी. हमेश खुद को अपर हैंड रखने की चाहत मायावती, बसपा और दलित वर्ग के लिये किसी अभिशाप से कम नहीं है. बसपा इससे बाहर आकर कोई फैसला करने की हालत में नहीं है. ऐसे में दलित  वोटर बिखर रहा और मायावती का वजन घटता जा रहा है.

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