लोगों को खूब पसंद आ रही है निरहुआ और शुभी की जोड़ी, देखें ये वीडियो

भोजपुरी सिनेमा के प्रसिद्ध एक्टर दिनेशलाल यादव  की सुपरहिट फिल्‍म ‘निरहुआ हिंदुस्‍तानी’ का तीसरा भाग ‘निरहुआ हिंदुस्‍तानी 3’ जल्‍द ही आ रहा है. इस फिल्‍म में निरहुआ के साथ, आम्रपाली दुबे और शुभि शर्मा की जोड़ी नजर आने वाली है.


इस फिल्म का एक नया गाना ‘हमसे बियाह’ रिलीज किया गया है, जिसमें निरहुआ के साथ आम्रपाली दुबे और शुभि शर्मा दोनों नजर आ रही हैं. एस.आर.के  द्वारा यूट्यूब पर इसी महीने 26 अक्टूबर को अपलोड किए गए इस वीडियो को अब तक 1,819,607 बार देखा जा चुका है.

इससे पहले फिल्म ‘निरहुआ हिंदुस्तानी 3’ का ट्रेलर भी रिलीज होने के बाद इंटरनेट पर सुपरहिट हुआ. इस फिल्म की कहानी एक गांव के लड़के की है जो रोजगार की तलाश में मुंबई शहर में जाता है और वहां उसे एक लड़की से प्यार हो जाता है. इसके बाद शुरू होता है रोमांस, ड्रामा, कौमेडी और एक्शन.

लखनऊ का कालगर्ल डौटकौम

‘‘नेहा न तो ये देह व्यापार है और न ही तुम कोई कालगर्ल. यह तो जस्ट अ फन है, जिस में रात के कुछ घंटे किसी के साथ गुजारने हैं. ऐसे ही किसी के साथ भी नहीं, बल्कि जिसे तुम पसंद करो उस के साथ. पहले तुम उस की फोटो को पसंद कर लो, फिर वह तुम्हारी फोटो पसंद करेगा.’’ विपिन ने नेहा को समझाते हुए कहा.

‘‘फिर भी रिस्क तो है न, पकड़े गए तो क्या होगा?’’ नेहा को इस काम से इनकार नहीं था, वह तो बस बदनामी से डर रही थी. वह ऐसा लफड़ा नहीं चाहती थी, जिस से वह पकड़ी जाए.

‘‘नेहा, कोई रिस्क नहीं है, यह तो केवल गेम है. हम लोग तुम्हें होटल में छोड़ेंगे, वहां से तुम्हें हम ही पिक भी करेंगे. तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी. कई बार तो होटल की जगह किसी का घर भी हो सकता है.’’

‘‘यह सब केवल रात में ही करना होगा.’’ नेहा ने पूछा.

‘‘हां, केवल रात, वह भी पूरी नहीं. रात में 11 से सुबह 4-5 बजे तक. किसी को कानोंकान खबर नहीं होगी.’’

‘‘यार, कुछ गड़बड़ न हो बस.’’

‘‘कोई गड़बड़ नहीं होगी. तुम्हारे साथ रहने वाली प्रिया तो सब जानती है. एक रात का 10 हजार मिलेगा. आराम से 3-4 रात यह काम करो, इस के बाद महीना भर आराम से रहो. किसी तरह का कोई रिस्क नहीं, यह सारा काम इंटरनेट और वाट्सऐप पर चलता है.’’

ये सारी बातें नेहा और दलाल टाइप के युवक के बीच हो रही थीं. युवक उस गिरोह का हिस्सा था, जो सोशल मीडिया के माध्यम से देह व्यापार चला रहा था.

नेहा ने अपनी साथी प्रिया से पूछा तो उस ने बताया कि कई लड़कियां इस तरह ही अपना खर्च उठा रही हैं. इस के लिए ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है. नेहा ने बात मान ली.

पहली बार नेहा को डर लगा लेकिन धीरेधीरे यह डर खत्म हो गया. अब नेहा और प्रिया एक साथ ही जाने लगीं. होटल और ग्राहक के बीच घूमते हुए नेहा को मजा आने लगा. लखनऊ कालगर्ल डौटकौम के जरिए उन्हें जो ग्राहक मिलते थे, वे अलग थे. उन से मिले पैसों पर कमीशन नहीं देना पड़ता था.

कई बार प्रिया अपने लिए खुद भी ग्राहक खोज लेती थी. ऐसे में उसे किसी को पैसा भी नहीं देना होता था. प्रिया ने यह गुर नेहा को भी बताया, ‘‘कुछ दिन इन लोगों के साथ काम कर लो. उस के बाद हर हफ्ते 1-2 ग्राहक बना लो, अच्छा पैसा मिलने लगेगा. पता है, खुद को तैयार करने के लिए मेकअप से ले कर ड्रैस तक खुद ही खरीदनी पड़ती है.’’

प्रिया ने आगे बताया, ‘‘हर ग्राहक को हर बार नई लड़की की जरूरत होती है. ऐसे में हम दोनों अपने ग्राहकों में अदलाबदली कर लेंगे. इस में हमें किसी और को पैसे नहीं देने होंगे.’’

नेहा ने पूछा, ‘‘जब सब हम ही लोग कर लेंगे तो इन लड़कों को क्यों साथ रखें?’’

प्रिया ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘देखो, हर ग्राहक शरीफ नहीं होता. कई बार जब उसे लगता है कि अकेली लड़की है तो वह अपनी मनमरजी करने लगता है. ग्राहक के साथसाथ लड़की को अकेली जान कर पुलिस भी परेशान करती है. ऐसे में लड़कों का सहारा होता है तो ठीक रहता है. यह हमारी सुरक्षा के लिए जरूरी है.’’

नेहा और प्रिया की तरह दरजनों लड़कियां लखनऊ कालगर्ल डौटकौम के माध्यम से देह व्यापार कर रही थीं. ये लड़कियां लालच दे कर नई लड़कियों को देह व्यापार के लिए तैयार भी करती थीं. वैसे ही जैसे एक दलाल और प्रिया ने नेहा को तैयार किया था.

कोठे, कोठियों, रेडलाइट एरिया और मसाज पार्लरों से होता हुआ देहव्यापार अब इंटरनेट तक पहुंच चुका है. अब कई ग्राहक वाट्सऐप पर लड़कियों के फोटो और वीडियो देख कर उन्हें पसंद करने लगे हैं. इंटरनेट से देहधंधे में सुविधाएं बढ़ गई हैं. लड़की को अपने अड्डे से ले कर होटल तक ले जाया जा सकता है.

होटल की भी इंटरनेट से बुकिंग होने लगी है, जहां पहले जैसी छानबीन का खतरा नहीं होता. कालोनियों के घरों जैसे बने कुछ कमरों में ही होटल चलने लगे हैं. ऐसे होटलों में खानेपीने की सुविधाएं नहीं होतीं, वहां केवल ठहरने की सुविधा होती है. खानेपीने की सुविधा के लिए होटल के बाहर बनी दुकानों पर निर्भर होना पड़ता है.

इस तरह के रैकेट चलाने वाले पेशेवर लड़कियों के दलाल नहीं होते. यहां धंधा करने वाली लड़कियां भी जबरन नहीं लाई जातीं. वाट्सऐप और फेसबुक के जरिए ही इन को बुलाया जाता है.

कई तो हौलीडे पैकेज मान कर 4 से 6 दिन के लिए आती हैं और बाकी बचे महीने भर इस धंधे से दूर रहती हैं. इन में कुछ पढ़ने वाली लड़कियां हैं तो कुछ प्राइवेट जौब करने वाली. कुछ तो डांस, मौडलिंग और एक्टिंग के क्षेत्र में काम करने का दावा तक करती हैं. देह के इस धंधे में इस तरह की लड़कियों की डिमांड ज्यादा होती है.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोमतीनगर जैसे पौश एरिया में एक ऐसे ही सैक्स रैकेट को पकड़ा गया. यह सैक्स रैकेट लखनऊ कालगर्ल डौटकौम के नाम से चलता था. गिरोह को चलाने वाले लड़के लड़कियों को ग्राहकों के कमरों तक पहुंचाने और वहां से सुरक्षित लाने का काम भी करते थे.

कई बार ग्राहक पैसे देने में आनाकानी और लड़कियों से जोरजबरदस्ती करने की कोशिश करता है तो उस के लिए गिरोह चलाने वाले अपने पास रिवौल्वर रखते हैं ताकि ऐसे लोगों को धमकाया जा सके.

लखनऊ पुलिस को इस बात की सूचना लगी तो उस ने इस गिरोह का राजफाश करने का बीड़ा उठाया. पुलिस ने देर रात चलने वाले वाहनों पर नजर रखनी शुरू कर दी.

9 जून, 2018 को रात करीब ढाई बजे सीओ गोमतीनगर चक्रेश मिश्रा के निर्देश पर पुलिस कठौथा झील के पास आनेजाने वाले वाहनों की चैकिंग कर रही थी, तभी लाल रंग की कार में कुछ लोग आते दिखे. पुलिस ने जब उन्हें रुकने का इशारा किया तो वे तेजी से भागने लगे.

पुलिस द्वारा पीछा करने पर कार से उतर कर भाग रहे विपिन नाम के लड़के को पकड़ा गया तो पता चला कि वे लोग सैक्स रैकेट का संचालन कर रहे थे. कार सवार लड़के तो भाग गए लेकिन कार से उतरने वाले लड़के को पुलिस ने पकड़ लिया.

पुलिस ने उस के पास से आधार दरजन मोबाइल, 13 हजार रुपए, एक पिस्टल और एक कार बरामद की. पुलिस की छानबीन में उस ने अपना नाम विपिन शर्मा बताया. विपिन ने अपने फरार साथियों के नाम अंकित, अतुल और गोलू बताए. उस ने पुलिस को बताया कि वे लोग देह व्यापार का धंधा करते हैं.

बरामद पिस्टल के बारे में विपिन ने बताया कि कुछ ग्राहक बिगड़ैल किस्म के होते हैं. ऐसे लोग पेमेंट को ले कर लड़ाईझगड़ा तो करते ही हैं, लड़कियों को सैक्स के दौरान परेशान भी करते हैं. पिस्टल ऐसे ग्राहकों को डराने के काम आती है.

विपिन के पास से बरामद पिस्टल गैरलाइसेंसी थी. विपिन ने उस रात 3 लड़कियां ग्राहकों के पास भेजी थीं. वे लड़कियां वापस आने वाली थीं, ये लोग उन्हीं को लेने के लिए आए थे.

यह जानकारी मिलते ही एसएसआई अमरनाथ सरोज ने थाने से 2 महिला सिपाही चारू मलिक और रुचि मांगट को बुला लिया. विपिन के दिए बयान के अनुसार पुलिस वहां आने वाली लड़कियों का इंतजार करने लगी. सुबह करीब 6 बजे कार से 4 युवक विकास यादव, कर्मदेव यादव, सतवंत सिंह और आदित्य वर्मा वहां आए. पुलिस ने इन्हें पकड़ लिया.

इन लोगों ने पुलिस को बताया कि 3 लड़कियों को होटल के पास छोड़ा था. वे अभी आ रही होंगी. कुछ ही देर में 3 लड़कियां पैदल आती दिखीं. इन्हें महिला सिपाहियों ने पकड़ लिया. पुलिस की तलाशी में रीना, प्रिया और नेहा के पास पर्स से नकदी, मोबाइल और कुछ आपत्तिजनक चीजें मिलीं. इस में 2 लड़कियां प्रिया और नेहा हावड़ा की रहने वाली थीं. ये चिनहट के पास एक महिला हौस्टल में रह रही थीं.

रीना गोरखपुर की थी और एमबीए की पढ़ाई करने के लिए हौस्टल में रह रही थी. पुलिस जब लड़कियों को ले कर होटल गई तो वहां कोई ग्राहक नहीं मिला. ग्राहकों के नाम अहसान अली और दुर्गेश कुमार थे, जो पहले ही जा चुके थे.

पुलिस को पता चला कि इस रैकेट को विपिन कुमार अपने साथियों के साथ मिल कर चलाता था. ये लोग एक कमरा ले कर किराए पर रहते थे. विपिन बीकौम में पढ़ता है, जबकि विकास और आदित्य प्राइवेट जौब करते हुए यह काम करते थे.

विभूतिखंड थाने के प्रभारी बृजेश कुमार राय ने बताया कि पुलिस को पता चला है कि ये लोग बड़ेबड़े लोगों को भी लड़कियां सप्लाई करते थे. इस की जांच होगी. पुलिस के सहयोग के लिए साइबर क्राइम पुलिस को भी सहयोग देने के लिए कहा गया है.

पूरा मामला इंटरनेट से जुड़ा होने के कारण साइबर पुलिस की उपयोगिता बढ़ गई थी. उस के सहयोग से ही पुलिस इंटरनेट पर ठिकाना बना कर देह व्यापार कराने वाले रैकेट को पकड़ सकी. पुलिस भी मानती है कि ऐसे धंधों का खत्म होना संभव नहीं है. धरपकड़ कर के केवल इन्हें सीमित भर किया जा सकता है.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. पहचान छिपाने के लिए कुछ नाम बदल दिए गए हैं

मोहब्बत का लाल रंग

कानपुर से करीब 40 किलोमीटर दूर जीटी रोड पर एक कस्बा है बिल्हौर. इस कस्बे से सटा एक गांव है दासा निवादा, जहां छिद्दू का परिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी रमा के अलावा 2 बेटे सतीश, नेमचंद्र तथा 2 बेटियां विजयलक्ष्मी और पूनम थीं. विजयलक्ष्मी को ज्यादातर शबनम के नाम से जाना जाता था.

छिद्दू गरीब किसान था. उस के पास नाममात्र की जमीन थी. वह मेहनतमजदूरी कर के किसी तरह परिवार का भरणपोषण करता था. खेतीकिसानी में उस के दोनों बेटे भी सहयोग करते थे.

तीखे नैननक्श और गोरी रंगत वाली विजयलक्ष्मी उर्फ शबनम छिद्दू की संतानों में सब से सुंदर थी. समय के साथ जैसेजैसे उस की उम्र बढ़ रही थी, उस के सौंदर्य में भी निखार आता जा रहा था. उस का गोरा रंग, बड़ीबड़ी आंखें, तीखे नैननक्श, गुलाबी होंठ और कंधों तक लहराते बाल किसी को भी उस की ओर आकर्षित कर सकते थे. अपनी खूबसूरती पर शबनम को भी बहुत नाज था.

यही वजह थी कि जब कोई लड़का उसे चाहत भरी नजरों से देखता तो वह उसे इस तरह घूर कर देखती मानो खा जाएगी. उस की टेढ़ी नजरों से ही लड़के उस से डर जाते थे. लेकिन कुलदीप शबनम की टेढ़ी नजर से जरा भी नहीं डरा.

कुलदीप का घर शबनम के घर से कुछ ही दूरी पर था. उस के पिता देवी गुलाम खेतीबाड़ी करते थे. उन की 3 संतानों में कुलदीप सब से छोटा था. वह सिलाई का काम करता था. उस की कमाई ज्यादा अच्छी नहीं तो बुरी भी नहीं थी. अच्छे कपड़े पहनना और मोटरसाइकिल पर घूमना कुलदीप का शौक था.

शबनम तनमन से जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही वह पढ़नेलिखने में भी तेज थी. बिल्हौर के बाबा रघुनंदन दास इंटर कालेज से हाईस्कूल पास कर के उस ने 11वीं में दाखिला ले लिया था. अपने कामधाम और स्वभाव की वजह से वह अपने मांबाप की आंखों का तारा बनी हुई थी.

शबनम के कालेज आनेजाने में ही कुलदीप की निगाह शबनम पर पड़ी थी. पहली ही बार में वह उस की ओर आकर्षित हो गया था. वह उसे तब तक देखता रहता था, जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हो जाती थी. ऐसा नहीं था कि कुलदीप ने शबनम को पहली बार देखा था. इस के पहले भी उस ने शबनम को कई बार देखा था. लेकिन तब और अब में जमीनआसमान का अंतर था.

शबनम कुलदीप के मन को भायी तो वह उस का दीवाना हो गया. उस के कालेज आनेजाने के समय वह रास्ते में खड़ा हो कर उस का इंतजार करने लगा. शबनम उसे दिखाई दे जाती तो वह उसे चाहत भरी नजरों से देखता रहता, लेकिन शबनम थी कि उसे भाव ही नहीं दे रही थी.

धीरेधीरे उस की बेचैनी बढ़ने लगी थी. हर पल उस के मन में शबनम ही छाई रहती. यहां तक कि उस का मन सिलाई के काम में भी नहीं लगता था. उस के मन की बेचैनी तब और बढ़ जाती, जब शबनम उसे दिखाई दे जाती.

जब कुलदीप के लिए शबनम के करीब पहुंचने की तड़प बरदाश्त से बाहर हो गई तो उस ने शबनम के भाई सतीश से दोस्ती कर ली और मिलने के बहाने उस के घर आनेजाने लगा. सतीश के घर पर कुलदीप बातें भले ही दूसरों से करता था लेकिन उस की नजरें शबनम पर ही जमी रहती थीं. जल्दी ही इस बात को शबनम ने भी भांप लिया.

कुलदीप की आंखों में अपने प्रति चाहत देख कर शबनम का मन भी विचलित हो उठा. वह भी अब कुलदीप के आने का इंतजार करने लगी. जब कुलदीप आता तो वह उस के पास ही मंडराती रहती.

दोनों ही एकदूसरे का सामीप्य पाने के लिए बेचैन रहने लगे. कुलदीप की चाहत भरी नजरें शबनम की नजरों से मिलतीं तो वह मुसकरा कर मुंह फेर लेती. कई बार वह तिरछी नजरों से देखते हुए कुलदीप के आगेपीछे चक्कर लगाती रहती.

शबनम की कातिल निगाहों और मुसकान से कुलदीप समझ गया कि जो बात उस के मन में है, वही शबनम के मन में भी है. फिर भी वह अपनी बात शबनम से नहीं कह पा रहा था, जबकि शबनम पहल करने से कतरा रही थी.

सोचविचार कर कुलदीप ऐसे मौके की तलाश में रहने लगा, जब वह शबनम से अपने दिल की बात कह सके. यह सच है कि चाह को राह मिल ही जाती है. आखिर एक दिन कुलदीप को मौका मिल ही गया. शबनम को घर में अकेली पा कर कुलदीप ने कहा, ‘‘शबनम, मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं. अगर बुरा न मानो तो मैं अपने मन की बात कह दूं?’’

‘‘बात ही तो कहनी है. कह दो. इस में बुरा मानने की क्या बात है.’’ शबनम नजरें चुराते हुए बोली. शायद उसे अहसास था कि कुलदीप क्या कहने वाला है.

‘‘शबनम तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो, मुझे तुम्हारे अलावा कुछ सूझता ही नहीं है.’’ कुलदीप नजरें झुका कर बोला, ‘‘हर पल तुम्हारी सूरत मेरी नजरों के सामने घूमती रहती है.’’

कुलदीप की बात सुन कर शबनम के दिल में गुदगुदी सी होेने लगी. वह शरमाते हुए बोली, ‘‘कुलदीप, जो हाल तुम्हारा है, वही हाल मेरा भी है. तुम भी मुझे बहुत अच्छे लगते हो.’’

शबनम का जवाब सुन कर कुलदीप ने उसे बाहों में भर कर कहा, ‘‘तुम्हारे मुंह से यही बात सुनने के लिए मैं कब से इंतजार कर रहा था.’’

उस दिन के बाद दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. शबनम कालेज के लिए निकलती तो कुलदीप सड़क पर मोटरसाइकिल लिए उस का इंतजार करता मिलता. शबनम के आते ही वह उसे मोटरसाइकिल पर बिठा कर कालेज छोड़ आता. शबनम जब कुलदीप की मोटरसाइकिल पर बैठती तो उस के किशोर मन की कल्पना के घोड़े तेज रफ्तार से दौड़ने लगते.

उसे लगता जैसे कुलदीप ही उस के सपने का राजकुमार है और वह उस के साथ घोड़े पर सवार हो कर कहीं दूर सपनों की दुनिया में जा रही है. कुलदीप उसे बाइक से कालेज छोड़ने का कोई भी अवसर नहीं छोड़ता था. शबनम को भी उस का साथ भाने लगा था. शबनम बाइक से उतर कर जब उसे थैंक्स कहती तो कुलदीप का दिल खुश हो जाता.

इश्क की आग दोनों ओर बराबर भड़क रही थी. धीरेधीरे कुलदीप और शबनम के बीच की दूरियां सिमटने लगी थीं. अकसर तन्हाइयों में होने वाली दोनों की मुलाकातें उन्हें और ज्यादा नजदीक लाने लगी थीं. कुलदीप अब शबनम को तोहफे भी देने लगा था.

 

एक रोज कुलदीप शबनम के लिए एक कीमती सलवार सूट ले कर आया. सलवार सूट देख कर शबनम खुशी से झूम उठी. उस ने चहकते हुए पूछा, ‘‘इतना महंगा सलवार सूट क्यों लाए?’’

‘‘कीमती आभूषण पर महंगा नगीना ही सजता है, शबनम.’’ कुलदीप ने उस के कंधों पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे आगे इस सूट की कीमत कुछ भी नहीं है.’’ कुलदीप अपना चेहरा उस के एकदम करीब ले आया.

शबनम के होंठ कंपकंपाने लगे. निगाहें हया से झुक गईं. उस ने कांपते शब्दों में पूछा, ‘‘मैं तुम्हारे लिए इतना मायने रखती हूं.’’

‘‘हां, शबनम.’’ कुलदीप की सांसें उस के चेहरे से टकराने लगीं, ‘‘तुम मेरे लिए मेरी सांसों से ज्यादा मायने रखती हो. मैं दिल हूं तुम धड़कन. मैं दीया, तुम बाती. तुम फूल मैं खूशबू.’’ कहने के साथ ही उस ने शबनम का चेहरा ऊपर उठाया.

शबनम उस की बातों से मदहोशी के आलम में आ चुकी थी. खुशियों भरी लज्जा से उस की आंखें बंद हो गई थीं.

कुलदीप ने चेहरा झुका कर शबनम के होंठों को चूम लिया. सांसों से सांसें मिलीं तो शबनम की मदहोशी बढ़ गई. उस ने कुलदीप को रोका नहीं, बल्कि उस से लिपट गई. फिर तो तन से तन मिलने में ज्यादा समय नहीं लगा. दोनों सारी मर्यादाएं तोड़ कर एकदूसरे की बांहों में समा गए.

एक बार दोनों ने वासना की दलदल में कदम रखा तो उन की भावनाएं, उन की चाहत, सामाजिक मर्यादाएं सब उस दलदल में डूबते गए. घर के बाहर जहां भी मौका मिलता वे शरीर की आग शांत करने लगे.

कुलदीप शबनम के प्यार में ऐसा दीवाना हुआ कि उस की हर डिमांड पूरी करने लगा. बात करने के लिए उस ने शबनम को महंगा मोबाइल फोन खरीद कर दे दिया. रिचार्ज का पैसा भी शबनम उसी से लेती थी. इस के अलावा, कपड़े, फीस और उस के अन्य खर्चे भी कुलदीप ही उठाने लगा.

एक रोज शबनम ने कुलदीप से एक अजीब पेशकश की. उस ने प्यार के क्षणों में कहा, ‘‘कुलदीप मुझे बाइक चलाना सिखा दो. मैं भी तुम्हारी तरह फर्राटे भर कर बाइक चलाना चाहती हूं.’’

‘‘बाइक मर्द चलाते हैं, औरतें नहीं.’’ कुलदीप ने शबनम को समझाया, लेकिन वह जिद पर अड़ गई. अंतत: कुलदीप को शबनम की बात माननी पड़ी. वह उसे बाइक चलाना सिखाने लगा.

कुलदीप की मेहनत और शबनम की लगन काम आई, कुछ ही दिनों में वह सचमुच फर्राटे भरते हुए मोटरसाइकिल चलाने लगी. उस ने लाइसेंस भी बनवा लिया था. इस के बाद उस ने कुलदीप के सहयोग से एक पुरानी मोटरसाइकिल खरीद ली और उसी से कालेज आनेजाने लगी.

अब तक कुलदीप और शबनम के प्यार के चर्चे पूरे गांव में होने लगे थे. उड़तेउड़ते यह खबर शबनम के मांबाप के कानों में पड़ी तो सुन कर रमा और छिद्दू सन्न रह गए. उस दिन शबनम घर आई तो रमा उसे अलग कमरे में ले जा कर बोली, ‘‘शबनम, तुम पर मैं बहुत भरोसा करती थी, लेकिन तुम ने अभी से अपना खेल दिखाना शुरू कर दिया. बता कुलदीप के साथ तेरा क्या चक्कर है?’’

‘‘मां अगर जानना चाहती हो तो सुनो. कुलदीप और मैं एकदूसरे से प्यार करते हैं. हम दोनों शादी कर के अपना घर बसाना चाहते हैं.’’ शबनम ने विस्फोट किया तो छिद्दू और रमा समझ गए कि शबनम बेलगाम हो गई है. उसे समझाना आसान नहीं होगा.

चूंकि सवाल इज्जत का था, सो शबनम के दो टूक जवाब देने के बावजूद रमा ने उसे समझाया. छिद्दू भी कुलदीप के पिता देवी गुलाम के घर गया और इज्जत की दुहाई दे कर कुलदीप को समझाने के लिए कहा. देवी गुलाम ने आश्वासन दिया कि वह कुलदीप को समझाएगा. देवी गुलाम ने कुलदीप को समझाया भी, लेकिन उस ने पिता की बात एक कान से सुनी और दूसरे से निकाल दी.

परिवार वालों का विरोध बढ़ा तो शबनम अपने भविष्य को ले कर चिंतित हो उठी. उस ने अपनी चिंता से कुलदीप को भी अवगत करा दिया था. उस ने आश्वासन दिया कि वह किसी भी हाल में उस का साथ नहीं छोड़ेगा. समय आने पर उस की मांग में सिंदूर भरेगा. वह उसे भगा कर नहीं ले जाएगा, बल्कि गांव में ही उस के साथ सामाजिक रीतिरिवाज से विवाह कर के घर बसाएगा.

शबनम को विश्वास दिलाने के लिए वह उसे मंदिर में ले गया और भगवान को साक्षी मान कर उस के साथ विवाह कर लिया. इस बात की जानकारी न तो शबनम के घर वालों को हुई और न ही कुलदीप के घर वालों को.

कुलदीप को अब घर से पैसा मिलना बंद हो गया था. सिलाई की दुकान से उसे इतनी आमदनी नहीं थी कि वह अपना और शबनम का खर्च बरदाश्त कर पाता. इसलिए ज्यादा पैसा कमाने के लिए उस ने दिल्ली जाने का निश्चय कर लिया.

इस बाबत उस ने शबनम से बात की तो उस ने सहमति दे दी. दरअसल शबनम को कुलदीप से ज्यादा पैसे से प्यार था. बिना पैसे के उस का काम नहीं चल सकता था.

दिल्ली के लक्ष्मीनगर में कुलदीप का दोस्त अमर रेडीमेड कपड़ों के कारखाने में सिलाई का काम करता था. कुलदीप ने उस से बात की तो उस ने उसे दिल्ली बुला लिया.

दिल्ली आ कर कुलदीप कारखाने में ज्यादा से ज्यादा सिलाई का काम करने लगा ताकि प्रेमिका के लिए पैसा जुटा सके. कुलदीप और शबनम में ज्यादा बातें रात में होती थीं.

शबनम कुलदीप से प्यार भरी बातें तो करती थी, लेकिन अपनी डिमांड पूरी करने का दबाव भी बनाती थी. कुलदीप यथाशक्ति उस की डिमांड पूरी करने का प्रयास करता था. जो डिमांड अधूरी रह जाती उसे वह छुट्टी पर घर आ कर पूरी करता था.

कुलदीप को 2-4 दिन की ही छुट्टी मिलती थी. वह छुट्टी पर घर आता तो शबनम को हर तरह से खुश रखता. उस की डिमांड पूरी करता और शारीरिक सुख प्राप्त कर के वापस चला जाता.

समय बीतता रहा. शबनम अब तक इंटरमीडिएट पास कर चुकी थी और बीटेक की डिग्री के लिए उस ने कृष्णा इंजीनियरिंग कालेज, कानपुर में दाखिल ले लिया था. वह मोटरसाइकिल से ही कालेज आतीजाती थी.

20 वर्षीय शबनम तेजतर्रार युवती थी. वह न किसी से दबती थी और न किसी के सामने झुकती थी. कभी कोई युवक उस पर फब्तियां कसता तो वह बाइक रोक कर उसे सबक सिखा देती थी. उस के गांव के लोग तो उस की छाया तक से डरते थे.

बीटेक की पढ़ाई के दौरान शबनम के आंतरिक संबंध बीटेक के कुछ छात्रों से बन गए थे. वह उन के साथ घूमतीफिरती और मौजमस्ती करती. दोपहर को वह एक युवक के साथ होटल या रेस्टोरेंट जाती तो शाम को किसी दूसरे के साथ.

जल्दी ही उस के चाहने वालों की फौज तैयार हो गई. चाहत के ऐसे ही फौजियों से उस की आर्थिक व शारीरिक दोनों तरह की पूर्ति होने लगी.

दरअसल, कुलदीप के बाहर चले जाने के बाद वह पुरुष संसर्ग से वंचित रहने लगी थी. साथ ही उसे आर्थिक परेशानी से भी जूझना पड़ता था. इन्हीं आवश्यकताओं की वजह से उस के कदम बहक गए थे.

शबनम ने जम कर मौजमस्ती की तो उस की पढ़ाई में बाधा पड़ने लगी. इस का परिणाम यह निकला कि उस के 2 पेपर में बैक आ गई. खिन्न हो कर शबनम ने बीटेक की पढ़ाई अधूरी छोड़ दी. इस के बाद उस ने तांतियागंज स्थित विशंभरनाथ डिग्री कालेज से बीकौम करने के लिए दाखिल ले लिया.

शबनम पर घर वालों का कोई नियंत्रण नहीं था. वह अपनी मरजी से घर आती थी और मरजी से जाती थी. उस की भाभी दया अगर कभी उस से मजाक करती तो वह उसे करारा जवाब देती, ‘‘भाभी, पहले तुम बताओ मायके में कितने यार छोड़ कर आई हो, फिर मैं बताऊंगी.’’

शबनम भले ही गरीबी में पली थी, लेकिन उस के सपने आसमान छूने वाले थे. वह पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी, अपने सपने पूरे करना चाहती थी. वह तेजतर्रार ही नहीं शरीर से भी हृष्टपुष्ट थी.

इसी के मद्देनजर वह पुलिस विभाग में नौकरी करने की इच्छुक थी. इस के लिए उस ने प्रयास भी शुरू कर दिया था. सिपाही भरती में उस ने आवेदन भी किया था, लेकिन यह परीक्षा निरस्त हो गई थी.

इधर शबनम ने जब नए दोस्त बना लिए और वह उन के साथ मौजमस्ती करने लगी तो उस ने कुलदीप को दिल से ही निकाल दिया. अब उस का मन कुलदीप से ऊबने लगा था. प्रेमिका की यह फितरत कुलदीप समझ नहीं पाया. वह तो सपनों की दुनिया में जी रहा था. शबनम ने अब मोबाइल पर भी कुलदीप से बात करनी करीबकरीब बंद कर दी थी.

कुलदीप शबनम से बात करने की कोशिश करता तो वह उस का फोन रिसीव नहीं करती थी, कभी झुंझला कर रिसीव भी करती तो कोई न कोई बहाना बना देती.

कभी कालेज में होने का बहाना बनाती तो कभी रात अधिक होने या सिरदर्द का बहाना कर फोन बंद कर देती. कुलदीप की समझ में नहीं आ रहा था कि शबनम बेवफाई क्यों कर रही है.

कुलदीप, शबनम से बेइंतहा प्यार करता था. उस के बिना वह खुद को अधूरा महसूस करता था. जब शबनम ने उस से बातचीत करनी बंद कर दी तो वह परेशान रहने लगा. कारण जानने के लिए वह दिल्ली से अपने गांव आ गया.

गांव में उस ने गुप्त रूप से शबनम की बेरुखी के बारे में पता किया तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे पता चला कि शबनम ने कई नए दोस्त बना लिए हैं, जिन के साथ वह मौजमस्ती करती है.

कुलदीप ने इन नए दोस्तों के बारे में शबनम से पूछा तो वह तुनक कर बोली, ‘‘कुलदीप, अब मैं कालेज में पढ़ती हूं. कालेज में लड़केलड़कियां साथ में पढ़ते हैं. उन से मेलजोल स्वाभाविक है. तुम व्यर्थ में शक कर रहे हो. मैं तुम से उतना ही प्यार करती हूं जितना पहले किया करती थी.’’

‘‘तो फिर मोबाइल पर बातचीत करनी क्यों बंद कर दी?’’ कुलदीप ने शिकायत की, तो शबनम बोली, ‘‘तुम वक्त बेवक्त फोन करते हो. कभी मैं कालेज में क्लास में होती हूं तो कभी रात को घर वाले कान लगाए रहते हैं. लेकिन अब तुम्हें शिकायत नहीं होगी. मैं तुम से बात करती रहूंगी.’’

शबनम ने अपनी चपल चाल से कुलदीप को संतुष्ट कर दिया. उस ने 1-2 दिन कुलदीप के साथ मौजमस्ती की और अपनी जरूरत की चीजों की खरीदारी भी. इस के बाद कुलदीप वापस दिल्ली चला गया. लेकिन इस बार दिल्ली में उस का मन नहीं लग रहा था. वह रात दिन शबनम के फोन का इंतजार करता रहता. पर शबनम फोन नहीं करती. कुलदीप फोन मिलाता तो वह रिसीव नहीं करती थी.

शबनम से बात न हो पाने से कुलदीप परेशान हो गया. उस का दिन का चैन और रात की नींद हराम हो गई. कुलदीप समझ गया कि शबनम बेवफा हो गई है. उस ने नए यार बना लिए हैं, जिन की वजह से उस ने उसे भुला दिया है. उस ने सोच लिया कि अगर शबनम उस की नहीं हुई तो वह उसे दूसरों की बांहों में भी नहीं झूलने देगा.

24 जून, 2018 को कुलदीप दिल्ली से अपने गांव दासानिवादा आ गया. यहां उस ने शिवराजपुर कस्बे के एक अपराधी से संपर्क किया और उस से 315 बोर का तमंचा व 6 कारतूस खरीद लिए. उस ने तमंचा लोड कर के सुरक्षित रख लिया. कुलदीप ने शबनम से मिल कर बात करने का काफी प्रयास किया, लेकिन शबनम नहीं मिली.

27 जून को कुलदीप को शबनम के चचेरे भाई से पता चला कि वह कालेज गई है. यह जानने के बाद कुलदीप बाइक ले कर राधन लिंक रोड पर पहुंच गया और शबनम के वापस लौटने का इंतजार करने लगा.

इसी लिंक रोड से गांव आनेजाने का रास्ता जुड़ा था. कुलदीप को मालूम था कि गांव जाने के लिए शबनम इसी लिंक रोड से हो कर गुजरेगी.

इस बीच कुलदीप ने अपने मोबाइल से शबनम से बात करने की कोशिश की. लेकिन शबनम ने उस का फोन रिसीव नहीं किया. इस पर कुलदीप ने शबनम के फोन पर ‘काल मी’ मैसेज भेजा पर शबनम ने उसे फोन नहीं किया.

लगभग 12 बजे कुलदीप को शबनम बाइक से आती दिखी. नजदीक आते ही उस ने शबनम को रोेक लिया. दोनों में फोन पर बात न करने को ले कर तकरार होने लगी. कुलदीप ने शबनम से कहा, ‘‘मैं तुम्हारी हर जरूरत पूरी करता हूं. फिर भी तुम बेवफा बन गईं, मुझे भूल कर यारों के साथ गुलछर्रे उड़ाने लगीं.’’

कुलदीप के इस आरोप से शबनम तिलमिला गई. वह कुलदीप को मां की गाली देते हुए बोली, ‘‘तू अपना खर्चा पूरा कर नहीं पाता, मेरा कैसे करेगा. चल भाग, नामर्द कहीं का.’’

एक तो मां की गाली, ऊपर से नामर्द कहना, कुलदीप को नागवार लगा. उस का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. उस ने कमर में खोसा हुआ तमंचा निकाला और शबनम की कनपटी पर लगाते हुए बोला, ‘‘बेवफा, बदजुबान, आज मैं तुझे सबक सिखा कर रहूंगा.’’

शबनम कुछ सोच पाती इस से पहले ही कुलदीप ने ट्रिगर दबा दिया. धांय की आवाज के साथ शबनम का भेजा उड़ गया. खून से लथपथ हो कर वह सड़क पर गिर गई. थोड़ी देर में उस ने दम तोड़ दिया.

गोली चलने की आवाज सुन कर खेतों में काम कर रहे लोग उस ओर दौड़े तो कुलदीप बाइक से भाग निकला. कुछ ही देर में वहां भीड़ जुट गई. इसी बीच किसी ने एक युवती की हत्या किए जाने की खबर थाना बिल्हौर की पुलिस को दे दी. सूचना पाते ही बिल्हौर थानाप्रभारी ज्ञान सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल आ गए.

उन्होंने यह सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी दे दी. कुछ देर बाद ही एसपी (ग्रामीण) प्रद्युम्न सिंह, सीओ (बिल्हौर) आर.के. चतुर्वेदी, फोरेंसिक टीम के साथ आ गए.

इसी बीच दासानिवादा निवासी छिद्दू और उस के दोनों बेटे सतीश व नेमचंद आए और युवती के शव को देख कर बिलख पड़े. छिद्दू ने पुलिस अधिकारियों को बताया कि लाश उस की बेटी शबनम उर्फ विजयलक्ष्मी की है.

लाश की पहचान हो गई तो पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. शबनम की कनपटी में सटा कर गोली मारी गई थी. जो आरपार हो गई थी. उस का भेजा उड़ चुका था.

मौके पर पुलिस को मृतका का मोबाइल फोन मिला, जिसे जाब्ते की काररवाई में शामिल कर लिया गया. मृतका की बाइक भी पुलिस ने थाने भिजवा दी. फोरेंसिक टीम ने भी साक्ष्य जुटाए. इस के बाद पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय चिकित्सालय भेज दिया.

शबनम की हत्या के संबंध में एसपी (ग्रामीण) प्रद्युम्न सिंह ने छिद्दू और उस के बेटे से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि शबनम की हत्या गांव के ही कुलदीप ने की है. दोनों के बीच अवैध संबंध थे.

यह पता चलते ही थानाप्रभारी ज्ञान सिंह ने मृतका के भाई सतीश को वादी बना कर भादंवि की धारा 302 के तहत कुलदीप के खिलाफ रिपार्ट दर्ज कर ली और उस की तलाश में जुट गए. उस के घर पर छापा मारा गया पर वह फरार हो गया था.

कुलदीप को पकड़ने के लिए एसपी (गामीण) प्रद्युम्न सिंह ने एक पुलिस टीम गठित की. इस टीम में बिल्हौर थानाप्रभारी ज्ञान सिंह, एसआई बहादुर सिंह, शिवप्रताप तथा सिपाही उमेश रामवीर, जुनेंद्र व अफरोज को शामिल किया गया. पुलिस टीम ने कुलदीप के पिता देवी गुलाम से उस के ठिकानों के संबंध में जानकारी हासिल की.

इस के बाद कुलदीप के मोबाइल की लोकेशन के आधार पर उसे चरखी, दादरी, लक्ष्मी नगर (दिल्ली), बीकानेर (राजस्थान), गोहना (हरियाणा) तथा नोएडा की संभावित जगहों पर खोजा गया. लेकिन कुलदीप हाथ नहीं लगा. आखिर पुलिस ने उस की तलाश में मुखबिर लगा दिए.

पुलिस टीम ने घटनास्थल से मिला मृतका का फोन खंगाला तो उस में कई दरजन नंबर सेव थे. ये नंबर थे तो लड़कों के, लेकिन फोन में लड़कियों के नाम से सेव किए गए थे. मृतका के मोबाइल पर आखिरी काल 3 मिनट की थी. इसी नंबर से ‘काल मी’ का मैसेज भी था. जांच से पता चला कि वह नंबर कुलदीप का था.

13 जुलाई, 2018 की सुबह 10 बजे थानाप्रभारी ज्ञान सिंह को मुखबिर ने खबर दी कि हत्यारोपी कुलदीप इस वक्त उत्तरीपुरा रेलवे फाटक के पास मौजूद है, अगर तुरंत एक्शन लिया जाए तो उसे पकड़ा जा सकता है.

सूचना महत्त्वपूर्ण थी. ज्ञान सिंह ने पुलिस टीम के साथ छापा मार कर कुलदीप को रेलवे फाटक के पास स्थित होटल से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर उस से शबनम की हत्या के संबंध में पूछा गया तो उस ने बड़ी आसानी से अपना जुर्म कबूल कर लिया. उस ने कहा कि उसे शबनम की हत्या का कोई गम नहीं है. उस की बेवफाई ने उसे गुनाह करने को मजबूर कर दिया था.

कुलदीप के पास से 315 बोर का तमंचा तथा 3 जीवित कारतूस भी मिले. पुलिस ने इस के लिए उस के खिलाफ आर्म्स एक्ट का मुकदमा अलग से दर्ज किया. यह वही तमंचा था, जिस से उस ने शबनम की हत्या की थी.

दिनांक 14 जुलाई, 2018 को थाना बिल्हौर पुलिस ने अभियुक्त कुलदीप को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

मैं 12वीं जमात में पढ़ता हूं. मेरी चचेरी बहन मुझ से संबंध बनाना चाहती है और मौका पाने पर मुझे चूम लेती है. मैं क्या करूं.

सवाल
मैं 12वीं जमात में पढ़ता हूं. मेरी चचेरी बहन मुझ से संबंध बनाना चाहती है और मौका पाने पर मुझे चूम लेती है. मैं क्या करूं?

जवाब
आप उसे समझा दें कि भाई होने के नाते आप ऐसा नहीं कर सकते हैं. आप उसे अकेले में मिलने का बिलकुल मौका न दें. धीरेधीरे वह समझ जाएगी कि उस का इरादा गलत था.

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इतने समय तक सेक्स करना चाहती हैं महिलाएं

हम सोचते थे कि महिलाएं लंबे समय तक सेक्शुअल गतिविधि चाहती हैं, पर हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि पुरुषों को लगता है कि महिलाएं लंबा सेक्स नहीं चाहतीं.

पीनिस के आकार से लेकर सेक्स के दौरान अपने प्रदर्शन तक-पुरुष होना आसान काम नहीं है. अमेरिका में टार्जन कंडोम द्वारा हाल ही में कराए गए एक सर्वे के नतीजों में सामने आया कि 41 प्रतिशत पुरुषों ने कहा कि वे चाहते हैं कि सेक्स लंबे समय तक चले, जबकि ऐसा चाहनेवाली महिलाओं की संख्या 34 फीसदी ही थी.

अक्सर महिलाएं थोड़े समय के सेक्शुअल इंटरकोर्स से ही खुश रहती हैं, वे इसे लंबा नहीं रखना चाहती हैं, जबकि अधिकतर पुरुष इस प्रक्रिया को लंबा ही रखना चाहते हैं.

म्यूजिशियन गैविन फर्नांडिस स्वीकारते हैं कि वे सेक्स के दौरान अपने प्रदर्शन को लेकर दबाव महसूस करते हैं. ‘‘हमें पता है कि महिलाओं को मल्टीपल ऑर्गैज़्म (कई बार चरम) आ सकते हैं. फिर इस तरह की मान्यताएं भी हैं कि महिलाएं ऑर्गैज़्म का झूठा दिखावा भी करती हैं. ये बातें पुरुषों की मानसिकता को प्रभावित करने के लिए काफ़ी हैं,’’

वे कहते हैं. ‘‘कई बार सेक्शुअल संबंध बनाने के बाद मैं समझ ही नहीं पाता कि मैं अपनी गर्लफ्रेंड को संतुष्ट कर भी पाया हूं या नहीं. मैं चाहता हूं कि उसे संतुष्ट करने के लिए मैं और लंबे समय तक उसका साथ दे सकूं.’’

आनंद को लंबा रखने की चाहत

गैविन जैसे कई और पुरुष हैं. वर्ष 2009 में मेन्स हेल्थ मैग्ज़ीन द्वारा कराए गए सर्वे में पाया गया कि सेक्स के दौरान पुरुष 5 से 10 मिनट तक संयम बनाए रख सकते हैं, पर 71 प्रतिशत पुरुष चाहते हैं कि काश वे इससे कहीं अधिक समय तक ऐसा कर पाते.

जरनल औफ सेक्स मेडिसिन द्वारा कराए गए एक अलग अध्ययन के मुताबिक, वह इंटरकोर्स जो 7 से 13 मिनट के भीतर समाप्त हो जाता है, बेहतरीन माना जाता है. ‘‘कई पुरुष इस बात को लेकर शर्मिंदगी महसूस करते हैं कि वे लंबे समय तक संयम नहीं बनाए रख पाते,’’ कहना है चेन्नई की काउंसलर सुजाता रामकृष्णन का. ‘‘और मैं उन पुरुषों की बात नहीं कर रही हूं, जिन्हें प्रीमैच्योर इजेकुलेशन की समस्या है. सामान्य पुरुष, जिनका सेक्शुअल जीवन अच्छा है, वे भी सेक्स की प्रक्रिया को और लंबा बनाना चाहते हैं. इसकी वजह ये है कि ये पुरुष पौर्न देखते हुए बड़े हुए हैं और सेक्स के बारे में अपनी पिछले पीढ़ी से कहीं ज्यादा बातें करते हैं. ये बातें अब मीडिया में हैं, फिलम्स में हैं, किताबों में भी हैं. आज की महिलाएं भी यह बताने में संकोच महसूस नहीं करतीं कि उन्हें सेक्स के दौरान क्या पसंद है और क्या नापसंद. इस वजह से पुरुषों पर काफी दबाव होता है.’’

फोरप्ले का समय भी तो जोड़िए!

सेक्स एक्सपर्ट डॉ महिंदर वत्स कहते हैं कि यदि कुछ बदलाव किए जाएं तो सेक्स प्रक्रिया को लंबा बनाया जा सकता है. ‘‘हालांकि यूं देखा जाए तो ये बात सिर्फ़ आपकी दिमा़गी सोच पर निर्भर करती है, लेकिन आप सेक्शुअल इंटरकोर्स को थोड़ा लंबा बना सकते हैं,’’ वे कहते हैं. ‘‘क्विकी (झटपट सेक्शुअल संबंध बनाना) अच्छे तो होते हैं, पर हमेशा नहीं. सेक्स को लंबा बनाने के लिए सही समय और अपने शरीर के संकेतों को समझना बहुत जरूरी है. यही कारण है कि फोरप्ले का महत्व उससे कहीं ज्यादा बढ़ जाता है, जितना कि हम सोचते हैं. यदि सेक्शुल प्रक्रिया को लंबा बनाना चाहते हैं तो फोरप्ले का समय भी लंबा होना चाहिए. और लंबे समय तक चलने वाले फोरप्ले से कभी किसी महिला को शिकायत नहीं होती, बल्कि वे इसका आनंद लेती हैं.’’

ऑर्गैज़्म पर ध्यान देने के बजाए सेक्स के दौरान एक-दूसरे के साथ का आनंद उठाना ज़्यादा महत्वपूर्ण है. आप अलग-अलग सेक्शुअल पोज़ीशन्स अपना सकते हैं. अंतिम, लेकिन महत्वपूर्ण बात ये है कि इस दौरान पार्टनर्स एक-दूसरे से बातचीत करते रहें. तो अगली बार यदि वे कुछ ऐसा करें, जिससे आपको सुखद अनुभूति हो तो उनकी तारीफ करना बिल्कुल न भूलें.

हाशिए पर कार्यकर्ता मुखर हुए विरोध के स्वर

लोकतंत्र में सत्ताधारी पार्टी की अहमियत के सामने मजबूत विपक्ष की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. लेकिन देश के मौजूदा हालात में विपक्ष के मुखर न रहने से पार्टी कार्यकर्ता बैकफुट पर आ गए हैं.

किसी भी राजनीतिक दल का मुख्य आधार उस का कार्यकर्ता होता है. उस का ही जोश और जनून होता है जो बिना खाएपिए, भूखेपेट नेता का झंडा उठाए घूमता रहता है. इस की मेहनत से ही नेता की हवा बनती है. जिस पार्टी के कार्यकर्ता में हताशा और निराशा होती  है वह अपनी आधी लड़ाई तो पहले ही हार चुकी होती है. उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं को यह समझ ही नहीं आ रहा था कि वे मुलायम, अखिलेश या शिवपाल में से किस के साथ हैं. परिवार की लड़ाई में कार्यकर्ता हताश हुए और पार्टी सत्ता से बाहर हो गई.

केंद्र और प्रदेश में सरकार चला रही भारतीय जनता पार्टी का कार्यकर्ता आज हताशा के दौर में है. वह भी बैकफुट पर है. आपसी बातचीत में वह पहले की तरह मुखर हो कर आक्रामक बातें नहीं कर पा रहा. वह अपनी जगह किसी और दल में बना नहीं पा रहा, इस कारण वह मजबूरी में पार्टी को डिफैंड भर कर रहा है.

आज सोशल मीडिया के जमाने में कार्यकर्ता इसलिए भी महत्त्वपूर्ण होता है क्योंकि इस के बल पर काफी लड़ाई लड़ी जाती है. मैसेज ट्रोल और वायरल होते हैं. 2 साल पहले वाले हालात अब नहीं हैं. भाजपा से जुड़ी खबरों पर प्रतिक्रिया कम आ रही है. भाजपा के खिलाफ आने वाली खबरों को भी कार्यकर्ता स्वीकार करने लगे हैं. केवल धर्म और राष्ट्र के मुद्दे पर बात करते समय वे पार्टी का पक्ष लेते दिखते हैं. इन मुद्दों पर भी इन का पक्ष कमजोर होने लगा है.

उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के शेल्टर होम में सैक्स रैकेट को ले कर विरोधियों ने योगी सरकार पर जब हमला शुरू किया तो सोशल मीडिया पर भाजपा का पक्ष लेने वाले पीछे खिसक गए. पिछले साल जब गोरखपुर में अस्पताल में बच्चों की मौत हुई तो भी भाजपा के कार्यकर्ता सरकार की कमी मानने को तैयार नहीं थे.

खाली हाथ कार्यकर्ता

कुछ समय पहले ‘पद्मावत’ फिल्म पर इस वर्ग के लोग बेहद मुखर थे. भाजपा के पक्ष में प्रचार हो रहा था कि सरकार के दबाव में नाम बदल गया और कहानी में कई बदलाव हुए. इस साल दलित एक्ट को ले कर कार्यकर्ता निराशा में चला गया. दलित एक्ट को ले कर केंद्र सरकार की आलोचना शुरू हुई तो बचाव में कार्यकर्ता बाहर दिखा. कई कट्टर कार्यकर्ता खुद पार्टी का विरोध करते नजर आने लगे.

उत्तर प्रदेश में यह हालत विधानसभा चुनाव के बाद से ही होने लगी थी. यही कारण है कि भाजपा गोरखपुर, फूलपुर, कैराना और नूरपुर में हुए उपचुनाव हार गई.

कार्यकर्ताओं को लग रहा था कि उन की सरकार बनेगी तो कुछ नया होगा. चुनावी जीत के बाद पार्टी वर्करों को कुछ देना जरूरी होता है ताकि वे पार्टी के साथ बने रहें. कांग्रेस ने 1947 में अपने वर्करों को स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर सुविधाएं और पैंशन दी थीं. वामपंथी दलों ने हड़ताल कराने के अधिकार अपने लोगों को दे दिए. कांग्रेस ने अपने लोगों की सरकारी कंपनियों में खूब भरती भी कराई थी.

भाजपा के पास न नौकरियां हैं और न पैंशन, न सुविधाएं देने की योजना. इसीलिए निराश कार्यकर्ताओं को भीड़ बना कर लोगों को पीटने का अधिकार दे दिया है. यही वजह है कि बड़ी संख्या में भीड़तंत्र ने हिंसक घटनाओं को अंजाम देना शुरू कर दिया है.

युवकों को खुश करने के लिए योगी सरकार ने कांवड़ यात्रा में जाने वालों पर हैलिकौप्टर से फूल बरसाने का काम सरकारी मशीनरी को दे दिया. भाजपा सोच रही है कि  इस तरह की आजादी से युवक उस के साथ कार्यकर्ता बन कर रहेंगे. यहां समझने वाली बात यह भी है कि जो युवक इस तरह की घटनाओं के चक्कर में पुलिस और मुकदमों का शिकार हो जाते हैं उन को नुकसान उठाना पड़ता है. युवकों को लग रहा था कि उन की सरकार बनने के बाद वे कमाई कर सकेंगे. कुछ रोजगार मिलेगा. उन को केवल दलितों, पिछड़ों और मुसलिमों पर धौंस जमा कर सुख नहीं मिल रहा.

निराशा का दौर

भाजपा के पास वोटबैंक के रूप में जो लोग थे उन में से बड़ी संख्या सवर्णों की थी. बिजनैसमैन इन का वोटर था. अब केंद्र सरकार की नोटबंदी और जीएसटी कानून के कारण उन पर इंस्पैक्टर राज चलने लगा है. दूसरे सवर्णों को यह उम्मीद थी कि भाजपा की सरकार आरक्षण के मुद्दे पर कुछ अलग करेगी. प्रमोशन में आरक्षण के मुद्दे पर जिस तरह से भाजपा ने सवर्णों की आवाज को दरकिनार किया वह नाराजगी का कारण बना. इस से बनिया के बाद नौकरीपेशा पार्टी से नाराज हुआ.

भाजपा ने दलित एक्ट को ले कर जिस तरह से कोर्ट की मंशा के खिलाफ काम किया वह सब से बड़ा नाराजगी का मुद्दा बन गया. आज सवर्णों को यह लग रहा है कि भाजपा से बेहतर तो मायावती ही थीं जिन्होंने बिना जांच के मुकदमा होने और मुकदमा होते ही गिरफ्तार होने की बात को कानून से हटा दिया था.

भाजपा को लगता है कि वह अपने लोगों को धर्म और राष्ट्रवाद से जोड़ कर वापस पार्टी में ले आएगी. दलित एक्ट और प्रमोशन में आरक्षण के मुद्दों पर वह दलित को अपने साथ ले आएगी. यह सोच पुराने राजाओं जैसी है जो खुद की कही बात को ही सही मानते थे.

भावी लोकसभा चुनाव में भाजपा का सब से बड़ा सिरदर्द बसपा नेता मायावती हो गई हैं. इस कारण भाजपा अपने कुछ वर्करों को नाराज कर बसपा को कमजोर करना चाहती है. भाजपा यह नहीं समझ पा रही है कि केवल बातों से सवर्ण और अवर्ण एकसाथ नहीं आने वाले. उत्तर प्रदेश में सहारनपुर के बाद मेरठ में भड़की जातीय हिंसा ने सामाजिक समरसता की पोल खोल दी है. कार्यकर्ता केवल धर्म और राष्ट्रवाद के खोखले दावों पर पार्टी का साथ नहीं देने वाला.

भाजपा इस बात को समझ रही है. इस कारण उस ने तमाम नए लोगों को नाममात्र वाली कुरसी देनी शुरू कर दी है. इन कुरसियों पर नाममात्र के लोग बैठ सकते हैं. आम कार्यकर्ता निराशा के दौर में है. उस ने भाजपा के साथ रह कर जो त्याग किया, उस का कोई लाभ उसे नहीं मिल रहा. अब तक जनता की आलोचना का जवाब देने वाला कार्यकर्ता खुद अपने अंदर के सवालों का कोई जवाब नहीं दे पा रहा.

नौकरशाही का मनोबल बढ़ने से भ्रष्टाचार और इंस्पैक्टर राज बढ़ गया है. इस बात की शिकायत ले कर जब कोई कार्यकर्ता मंत्री के सामने अपनी बात रखता है तो मंत्री महोदय कहते हैं  कि रिश्वत लेने वाले कर्मचारीअधिकारी का नाम व रिश्वत लेने का प्रमाण दो. रिश्वत का प्रमाणपत्र लेना कितना सरल है, यह समझने वाली बात है. जनता भी समझ रही है कि केवल उस को गुमराह किया जा रहा है. कावंड़ यात्रा में गए लोग फूलवर्षा के लिए नहीं, अपने लिए भगवान से सुखद भविष्य की कामना ले कर जाते हैं. उन को भी निराशा हाथ लग रही है. कुल मिला कर भाजपा के कार्यकर्ता अपनी सरकार की नीतियों से संतुष्ट नहीं हैं. हालांकि, वे इस बाबत खुल कर बोल नहीं रहे.

मनमानी प्राइवेट स्कूलों की

कोलकाता के एक निजी स्कूल की एलकेजी कक्षा की सालाना फीस लगभग 2 लाख रुपए है. तकरीबन ऐसा ही हाल हाईफाई कहे जाने वाले अंगरेजी माध्यम स्कूलों का हर शहर में है. इतनी महंगी फीस ले कर भला ये स्कूल बच्चों को कौन सा ज्ञान का खजाना मुहैया करा रहे हैं, पता नहीं. हां, इतना जरूर है कि ऐसे स्कूलों में ज्ञान कम, ढोंग ज्यादा परोसा जाता है. फिर भी महंगी फीस वाले स्कूलों की तादाद बढ़ी है, लोगों में इन का क्रेज बढ़ा है. साथ ही, बढ़ा है बच्चों द्वारा मातापिता से किया जा रहा गैरजिम्मेदाराना व्यवहार और बच्चों में डिप्रैशन.

शिक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर यह लूट अब आम है. इस पर गौर करने वाला कोई नहीं है. सरकार इसे सरप्लस के रूप में देखती है और मातापिता नई उम्मीद के रूप में. पैसे वाले पेरैंट्स इस बात से खुश हैं कि उन का बच्चा हाईफाई स्कूल में पढ़ रहा है जबकि कम आमदनी वाले मातापिता इस बात को ले कर फिक्रमंद हैं कि उन का बच्चा हाईफाई स्कूल में नहीं पढ़ पा रहा है. सारे पेरैंट्स अपनी सोच में गुम हैं. कोई बच्चों के बारे में सोच ही नहीं रहा कि वे पढ़ क्या रहे हैं, किसलिए और क्यों पढ़ रहे हैं?

पैसा नहीं अच्छी शिक्षा की गारंटी

अच्छी शिक्षा का पैमाना मोटी रकम नहीं है. जब कोई बच्चा नर्सरी कक्षा में पढ़ रहा होता है तो उसे जितनी ज्ञान की जरूरत होती है, उतना ही दिया जाना चाहिए. चाहे वह कम सुविधा दे कर हो या ज्यादा. अगर नर्सरी के बच्चों पर गैरजरूरी दबाव बना रहे हैं तो वह विकास तो नहीं करेगा, डिप्रैशन में जरूर चला जाएगा. आजकल के ज्यादातर हाईफाई स्कूल यही काम कर रहे हैं. रही बात इंफ्रास्ट्रक्चर और सुविधा की, तब भी इस तरह से पैसा वसूली कहीं से भी जायज नहीं.

आज निजी विद्यालयों में पढ़ रहा तकरीबन हर छात्र होम ट्यूशन भी पढ़ता है. अगर पेरैंट्स के 2-3 बच्चे हैं और वे उन को इन स्कूलों में शिक्षा देना चाहते हैं तो वे या तो बच्चों को पढ़ा पाएंगे या फिर खानेपीने तथा दूसरी चीजों की व्यवस्था ही कर पाएंगे. आम परिवार के लिए ऐसे स्कूल बने ही नहीं हैं. यानी कि ये स्कूल साफतौर पर समाज को अमीर और गरीब की शिक्षा का फर्क समझा रहे हैं और शिक्षा के नाम पर समाज में ऊंचनीच का भाव पैदा कर रहे हैं. ऐसे स्कूल यह दर्शा रहे हैं कि अच्छी गुणवत्ता से लबरेज शिक्षा सिर्फ महंगे विद्यालयों में मुहैया है. वे इस बात को भी ठोकपीट कर बता रहे हैं कि हाईफाई अंगरेजी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा ही जीवन में सफल हो सकता है.

सोचें, क्या आज के प्राइवेट स्कूल इस लायक नहीं हैं कि वे छात्रों को बेहतर व समझदार इंसान बना सकें?

रोजगारपरक हो शिक्षा

शिक्षा कारगर तभी है जब वह अच्छी नौकरी दिलवाने में सफल हो. भविष्य में किसी अच्छे संस्थान में नौकरी मिल जाएगी, यही सोच कर सभी पेरैंट्स अपने बच्चों पर हैसियत से ज्यादा खर्च करते हैं. पैसों को प्राथमिकता देने के चक्कर में वे ये भूल जाते हैं कि बच्चों की अपनी जिंदगी भी होती है. सिर्फ पैसा कमाना ही सबकुछ नहीं होता. स्कूल और ट्यूशन के बीच पढ़ाई के बोझ तले दबे रहने वाले बच्चों का भविष्य में क्या और कैसा स्वरूप होगा, इस विषय पर आमतौर पर पेरैंट्स गौर नहीं करते.

हाईफाई स्कूलों में 12 घंटे की पढ़ाई के बाद भी घर में ट्यूशन की पढ़ाई और त्योहारों में प्रोजैक्ट्स बनाने में ही बीत जाता है बच्चों का पूरा वक्त और आधी जिंदगी. बच्चों के साथ उन के मातापिता का जीवन भी उन के प्रोजैक्ट्स और होम वर्क करवाते बीत जाता है और छूट जाते हैं कई महत्त्वपूर्ण त्योहार, परिवार और बेशकीमती पल.

ए, बी, सी, डी या 1, 2, 3, 4 जैसी चीजें ही प्राइमरी लैवल पर बच्चों को सिखाई जा सकती हैं, चाहे वह कोई सस्ता सरकारी स्कूल हो या निजी महंगा विद्यालय. आजकल जरूरत से ज्यादा सुविधाएं भी बच्चों को बिगाड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही हैं. तभी तो आजकल वैज्ञानिक बनने वाले विद्यार्थी भी मौलिक शोध में पीछे हैं. तभी तो भारत को सी वी रमन के बाद से कोई नोबेल पुरस्कार इस क्षेत्र में अब तक नहीं मिल सका है.

एकसमान हो फीस

एक तरह की शिक्षा के लिए फीस का स्तर भी एकसा होना चाहिए. जबकि हकीकत यह है कि हर तरह के प्राइवेट स्कूलों ने अपने हिसाब से फीस के नियम बना रखे हैं. प्राइवेट और सरकारी विद्यालयों की फीस में इतना भारी अंतर न सिर्फ भेदभाव व असमानता प्रदर्शित करता है बल्कि इस से यह जाहिर भी होता है कि शिक्षा कारोबार बन चुकी है. सुविधा के अनुसार शिक्षा बेची जा रही है. ऐसे स्कूलों का मकसद बच्चों के चहुंमुखी विकास के नाम पर पैसा कमाना है.

एक कर, एक चुनाव की बात तो की जा रही है लेकिन एक ही तरह की शिक्षा और एक ही तरह की फीस की बात नहीं की जाती. जब हर तरह का बच्चा एक कक्षा में पढ़ सकता है बिना भेदभाव के, तो फीस भी ऐसी होनी चाहिए जिसे हर मातापिता अदा करने में सक्षम हो. या फिर शिक्षा मुफ्त हो वरना समानता की बात करनी बेमानी होगी.

हर जगह के बोर्ड अलग हैं, गुणवत्ता अलग है और फीस भी अलग है. जब शिक्षा में ही इस तरह की असमानता है तो बाकी जगहों का हाल भी वही बन जाता है. शिक्षा पर काले बादल मंडरा रहे हैं. बच्चों को ज्ञान की जगह पैसे कमाने वाली मशीन बनने की ट्रेनिंग दी जा रही है.

शिक्षकों को मिले पर्याप्त वेतन

दिक्कत यह भी है कि हाईफाई स्कूलों में भी शिक्षकों को कम सैलरी मिलती है. जिस में वे मुश्किल से अपना जीवनयापन कर पाते हैं. ज्यादातर हाईफाई स्कूलों के शिक्षकों का भी यही हाल है. जब तक रोजीरोटी की सही व्यवस्था नहीं हो जाती तब तक कोई इंसान विकास या उत्थान की बात नहीं सोच पाता. ऐसे में जब तक शिक्षकों के हालात नहीं सुधरते तब तक छात्रों का भी हाल सही नहीं रहने वाला. इतनी ज्यादा फीस भर पाना हर पेरैंट्स के बस की बात नहीं है. सरकारी नौकरी वाले या कालाधन जमा करने वाले हाईफाई लोग ही ऐसी फीस का भार वहन कर सकते हैं. आम पेरैंट्स अगर एक बच्चे के प्राइमरी स्तर पर इतना खर्च करने लगे तो उन्हें दोवक्त की रोटी के बारे में सोचना पड़ सकता है.

ऐसे में ये स्कूल सिर्फ पैसे वाले लोगों के लिए हैं जो आम लोगों में असंतोष का भाव पैदा कर रहे हैं और उन पेरैंट्स पर ज्यादा पैसे कमाने के लिए गैरजरूरी दबाव भी बना रहे हैं. ज्ञान के नाम पर पैसों को आधार बना कर इस तरह का भेदभाव बंद होना चाहिए. साथ ही, फीस ऐसी हो जो एक साधारण तबका भी वहन कर सके. शिक्षा के बाजारीकरण को रोका जाना चाहिए.

सरकार को तथा सभी पेरैंट्स को इस पर गौर कर हल निकालना होगा. सभी राज्यों को फीस रैगुलेटिंग अथौरिटी पर विचार करना चाहिए, जिस से शिक्षा में फीस की मनमानी रुक सके और कम से कम शिक्षा में तो समानता लाई जा सके, यहां तो भेदभाव रुके और सभी विद्यार्थियों को समान अवसर मिले चाहे गरीब हो या अमीर.

धर्म, सर्जिकल स्ट्राइक के बहाने

धर्मयुद्ध का बहाना जनता को बहकाने में सदा सफल रहा है. बचपन से ही जब धर्म एक व्यक्ति की जिंदगी की धुरी बन चुका हो तो ‘धर्म खतरे में है’ कह कर उसे कुछ भी काम करने को राजी किया जा सकता है. देश की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी शासन स्तर पर और आर्थिक मामलों में कुछ अच्छा कर पाने में अपने को असफल महसूस कर रही है, इसलिए वह पाकिस्तान का नाम ले कर ‘धर्म खतरे में है’ का नारा लगाने में लग गई है. सर्जिकल स्ट्राइक डे मनाना उस की खिसियाहट का ही एक नमूना है.

पाकिस्तान क्या सर्जिकल स्ट्राइकों से डर चुका है और उस के हरे झंडे क्या सफेद हो गए हैं? क्या पाकिस्तानी प्रधानमंत्री घुटनों के बल चल कर आते दिख रहे हैं? क्या पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया है? क्या पाकिस्तानी सैनिक भारतीय सर्जिकल स्ट्राइकों से डर कर छुट्टी पर चले गए हैं? सर्जिकल स्ट्राइक का राजनीतिक लाभ लेना देश के लिए महंगा पड़ेगा.

पाकिस्तान, जो कभी भारत का अभिन्न अंग था, आज भारत का शत्रु है पर घुसपैठ कर उस के कुछ जवानों को मार देने से दोनों के बीच की कटुता कम नहीं होगी, बल्कि और बढ़ेगी. 70 वर्षों का इतिहास गवाह है कि लगातार पाकिस्तान को शत्रु कहने से कोई लाभ नहीं हुआ. 1965 और 1971 की विजयों के बाद भी भारत पड़ोसी पाकिस्तान की सेना को निरुत्साहित नहीं कर पाया है.

सर्जिकल स्ट्राइक छोटे उद्देश्य के लिए की जाती है और आमनेसामने बैठी सभी सेनाएं ऐसा करती रहती हैं ताकि वे एकदूसरे के प्रति सतर्क रहें और चौकन्नी भी. इस का जय या पराजय से कोई संबंध नहीं. सर्जिकल स्ट्राइक सफल होना ऐसी शान की बात है जैसी माओवादियों का बस्तर में सुरक्षाबलों की गाडि़यों को बम से उड़ा देना. यह किसी समस्या का अंत नहीं है.

अगर आज कुछ चाहिए तो तनाव कम चाहिए क्योंकि भारत और पाकिस्तान की बहुसंख्य जनता दुनिया की सब से गरीब और फटेहाल है. हमें सर्जिकल स्ट्राइक तो गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, अंधविश्वासी सोच, अशिक्षा पर करनी है. सेना अपना काम करे. देश सेना के साथ है. सेना की छोटी टैक्निकल कार्यवाहियों को व्यर्थ का प्रचार देना जनता को धोखा देना है. वोटों की खातिर सेना का इस्तेमाल करना ही नहीं चाहिए, क्योंकि इस से सेना को राजनीतिक सत्ता का चसका लगने लगता है.

मौब लिंचिंग बेमकसद नहीं

भाजपा के सत्ता में आते ही मौब लिंचिंग की घटनाओं में इजाफा संयोग नहीं हो सकता. दहशत के मकसद से अंजाम दी जा रही इन घटनाओं के पीछे सियासी स्वार्थों के निहित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है. लोग 4 साल पहले तक मौब लिंचिंग शब्द से अनजान थे, लेकिन अब सवा सौ करोड़ देशवासी जान गए हैं कि मौब लिंचिंग के माने होते हैं बेकाबू भीड़ द्वारा किसी को पीटना या पीटपीट कर उस की हत्या कर देना. यह महज इत्तफाक नहीं है कि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आते ही मौब लिंचिंग के हादसे बढें, बल्कि आंकड़े और हादसे दोनों यह गवाही भी देते हैं कि मौब लिंचिंग हमेशा बेमकसद नहीं होती, उस के अपने अलग माने, मंशा और मकसद होते हैं.

मौब लिंचिंग पर 22 जुलाई को एक बार फिर बहस और चर्चा गरमा गई जब राजस्थान के अलवर शहर के नजदीक रामगढ़ गांव में भीड़ ने रकबर उर्फ अकबर खान नाम के एक मुसलिम नौजवान की हत्या कर दी. रकबर का कुसूर इतनाभर नहीं था कि वह मुसलमान था बल्कि यह भी था कि हादसे की रात वह गाय ले कर आ रहा था. इस पर गौरक्षकों की भीड़ ने उसे गौ तस्कर मान लिया और सजा दे कर इंसाफ भी कर दिया. हादसा नहीं साजिश 21 जुलाई की देररात रकबर खान असलम खान के साथ गाय खरीद कर अलवर वापस लौट रहा था. 28 वर्षीय यह नौजवान मेहनतमजदूरी कर अपने घर के 11 लोगों का पेट पाल रहा था. अलवर के कोलगांव के इस मेहनती बाशिंदे के ख्वाब वैसे ही थे जैसे आम नौजवानों के होते हैं कि घर की सहूलियतों व सुख के लिए ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाए जाएं. कभीकभार रकबर दूध भी बेचता था.

यह धंधा उसे मुनाफेदार लगा तो उस ने गाय पालने की सोची. रकबर सालों से बचत कर पैसे इकट्ठा कर रहा था जिस से एक अच्छी सी गाय खरीद सके. जब उस के पास 50 हजार रुपए जमा हो गए तो वह गाय खरीदने चला गया और उस ने अच्छी नस्ल की 2 गाएं खरीद लीं. खानपुर से कोलपुर के लिए वह पैदल ही चल पड़ा, मकसद था, किराए के पैसे बचाना और गाय ले कर आना. अलवर के नजदीक जाने कहां से गौरक्षकों की भीड़ आ गई और उन्होंने उसे पीटना शुरू कर दिया. रकबर बेचारा मरते दम तक नहीं समझ पाया कि आखिर उसे किस जुर्म की सजा, इंडियन पीनल कोड की किस धारा के तहत मिली, जिस में न कोई चार्जशीट थी, न गवाह थे, न सुबूत थे. थी तो बस, मौत. रकबर खान की मौत पर हल्ला मचा, तो रोज नएनए चौंकाने वाले खुलासे सामने आने लगे जिन में से पहला था कि उस की मौत गौरक्षकों की पिटाई से नहीं, बल्कि पुलिस की लापरवाही से पुलिस हिरासत में हुई.

राजस्थान के तेजतर्रार गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने घटनास्थल का दौरा करने के बाद कहा कि रकबर की मौत मौब लिंचिंग से नहीं, बल्कि पुलिस कस्टडी में हुई. गुलाबचंद कटारिया ने खुलेतौर पर माना कि पुलिस वाले पहले गाय को गौशाला ले गए, लेकिन उन्होंने जख्मी रकबर को तवज्जुह नहीं दी, जो सरासर गलत है. रकबर की पोस्टमौर्टम रिपोर्ट से उजागर हुआ कि उस की मौत पिटाई से ही हुई है. उस के जिस्म पर चोटों के दर्जनभर निशान थे. रकबर की मौत कई शक और सस्पैंस पैदा कर रही है या उन्हें दूर कर रही है, यह समझना अब कोई मुश्किल काम नहीं है. मसलन, सारा ठीकरा पुलिस के सिर फोड़ा जा रहा है. हालांकि वह पूरी तरह गलत नहीं है. इस हादसे की खबर पुलिस को रात पौने एक बजे के करीब लगी थी, लेकिन सुबह 4 बजे उस ने रकबर को अस्पताल पहुंचाया. इस दौरान पुलिस वालों ने रास्ते में चाय की चुस्कियां भी ली थीं. अस्पताल पहुंचाने से पहले पुलिस ने रकबर को नहलाया था, क्योंकि वह पूरी तरह कीचड़ में सना हुआ था. ऐसी हालत में पुलिस उसे भला अपनी गाड़ी में कैसे ले जाती, उस के गंदा होने का अंदेशा था यानी तकरीबन 3 घंटे पुलिस रकबर को यहां से वहां घुमाती रही और पहले गायों को गौशाला पहुंचाया गया. अगर रकबर की मौत पर हल्ला नहीं मचता, तो गौरक्षकों और हिंदूवादियों की मंशा अधूरी रह जाती. मंशा यह थी कि कैसे गौतस्करी के नाम पर इस हत्या से दहशत फैलाई जाए. नवल किशोर शर्मा नाम के शख्स ने पुलिस को रकबर की पिटाई की खबर दी थी. नवल किशोर के बारे में दिलचस्प बात यह है कि वह विश्व हिंदू परिषद का कार्यकर्ता है. इसी नवल किशोर शर्मा ने रकबर की एक तसवीर सोशल मीडिया पर शेयर की थी. पुराने जमाने के जासूसी उपन्यासों में भी इतने पेच नहीं होते थे जितने इस हत्याकांड में दिखे. मसलन, नवल किशोर शर्मा जैसे हिंदूवादी क्या इतनी रात गए गौरक्षा के लिए गश्त लगाते हैं और गौ तस्करों से इतनी हमदर्दी रखते हैं कि उन की हिफाजत के लिए पुलिस को खबर दें और उस के फोटो खींच कर वायरल भी करें. बाद की लीपापोती सियासी खानापूर्ति भर थी जिस के तहत कुछ पुलिस वालों को सस्पैंड किया गया और 3 लोगों धर्मेंद्र यादव, परमजीत सिंह व नरेशचंद को आरोपी बनाया गया. इन तीनों की उम्र 26 साल के लगभग है.

अब तक देशभर में रकबर की मौत पर जम कर हल्ला मच चुका था. संसद के अंदरबाहर नेताओं ने इस पर बयानबाजी की. इसी बहस और बयानबाजी के बीच पहली दफा यह बात आम लोगों को समझ आई कि मौब लिंचिंग के लिए कोई अलग से धारा कानून में नहीं है. सरकार इस पर सोचविचार कर रही है कि क्या किया जाए. बढ़ावा देती बयानबाजी रकबर की मौत के बाद शुरू हुई नेताओं की बयानबाजी में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा तो कांग्रेस के ही एक सीनियर नेता शशि थरूर ने कहा कि इस देश में मुसलमान होने से बेहतर है गाय होना.

इस तंत्र पर भाजपाई नेता इतने तिलमिलाए कि उन्होंने ऐसे बयान दे डाले जिन की उम्मीद सभी को थी, लेकिन इंतजार रकबर की मौत के बाद जा कर खत्म हुआ. दो टूक कहें तो आज जबां पर दिल की बात आ गई जैसी थी. गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो मौब लिंचिंग के लिए सरकार कानून बनाएगी या फिर मौजूद कानून में बदलाव करेगी, लेकिन अगले ही लफ्जों में उन की मंशा उजागर हो गई जब उन्होंने यह भी कह डाला कि देश की सब से बड़ी मौब लिंचिंग तो 1984 में हुई थी. 1984 यानी हिंदूसिख हिंसा जो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुई थी.

बात रकबर की मौत के बाद कानून और सरकार की भूमिका की हो रही थी लेकिन सधे और पके नेता राजनाथ सिंह 34 साल पहले के दौर में पहुंच गए. यह सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती मौब लिंचिंग का हल तो कतई नहीं कहा जा सकता. मेरे घर में गंदगी तो मेरे घर की गंदगी पर एतराज क्यों, जैसी इन बातों से अगर देश चलना है तो मुसलमानों और दलितों को हर कभी हर कहीं गौरक्षा के नाम पर मरने (शहीद होने नहीं) के लिए तैयार रहना चाहिए.

राजनाथ सिंह का यह कहना भी मुद्दे की बात से ध्यान भटकाना जैसा था कि कश्मीर में सैनिकों पर हमला करने वालों के समर्थन में जश्न मनाया जाता है और संसद पर हमला करने वालों के लिए हमदर्दी जताई जाती है. राजनाथ सिंह से एक कदम आगे चलते हुए केंद्रीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर ने यह कहते हिंदूवादियों की तबीयत हरी कर दी कि हर घटना को मौब लिंचिंग से जोड़ने वाले राजनेताओं में अगर हिम्मत है तो वे कश्मीर में होने वाली पत्थरबाजी को भी मौब लिंचिंग कहें. फिर उन्होंने भी हिंसा की निंदा की और कानून बनाने की बात भी कही. कभी ओलिंपिक में निशानेबाजी में पदक जीतने वाले राज्यवर्धन सिंह ने सीधेसीधे उन पत्थरबाजों पर निशाना साधा जो आमतौर पर नहीं, बल्कि शर्तिया मुसलमान होते हैं. पर यह उन्होंने नहीं बताया कि उस के माने क्या, क्या कश्मीर के हिंदुओं यानी कश्मीरी पंडितों का बदला राजस्थान, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र सहित पूरे देश के मुसलमानों से लिया जाना जायज है उसी तरह जैसे 2002 में गुजरात में मुसलमानों की हत्याओं से लिया गया था.

भाजपा की ही एक और सांसद मीनाक्षी लेखी ने तो अपने हिंदूवादी तेवर दिखाते यह तक कह डाला कि मौब लिंचिंग पर बहस करने वाले बताएं कि अयोध्या में कारसेवकों को नरसंहार मौब लिंचिंग क्यों नहीं थी. गोधरा में साबरमती ऐक्सप्रैस में जिंदा जलाए गए रामभक्तों की घटना मौब लिंचिंग क्यों नहीं थी. एक तरह से मीनाक्षी ने और करोड़ों हिंदुओं के जज्बातों को भड़काने का ही काम किया है कि चूंकि मुगलकाल में हिंदुओं पर कहर ढाए गए थे, कांग्रेस के शासनकाल में रामभक्तों को मारा गया था इसलिए आज रकबर खान को गौभक्तों द्वारा पीटपीट कर मारा जाना गुनाह नहीं, बल्कि इंसाफ और फख्र की बात है. सरकार में मौजूद ये नेता लोकतंत्र की नहीं, जंगलराज की बातें करते नजर आए जहां खून का बदला खून होता है और जिस की लाठी उस की भैंस होती है.

इस वक्त देशभर में रकबर खान जैसे लोगों की मौतों पर बहस चल रही थी. यह बहस ठंडी न पड़े और लोग इसे सिर्फ हिंदुओं के नजरिए से देखें, इस बाबत एक दिलचस्प बयान तेलंगाना के गोशामहल से भाजपा के विधायक टी राजा ने दिया जो टाइगर के नाम से मशहूर है. टी राजा का कहना था कि गाय की रक्षा के लिए लड़ा जा रहा यह युद्ध तब तक नहीं रुकेगा जब तक देश में गाय को राष्ट्रमाता का दरजा नहीं मिल जाता. बकौल टी राजा, गाय हिंदुओं की माता होने के नाते पूजनीय भी है. सो, गौ तस्करी करना अपनेआप मौब लिंचिंग को बढ़ावा देना है. अगर यह खूनखराबा यानी लिंचिंग बंद करनी है तो गौ तस्करी रोकनी होगी और गाय को राष्ट्रमाता का दरजा देना होगा. अगर सांसद खूनखराबा नहीं चाहते हैं तो इस मांग को संसद में उठाएं. मुसलमान और दलित ही क्यों भड़काऊ बयान दर्जनभर भाजपाई नेताओं ने दिए, जिस से लगता है कि मौब लिंचिंग कोई गुनाह नहीं, बल्कि एक तरह का इंसाफ है.

मौब लिंचिंग पर पहली दफा आरएसएस की तरफ से उस के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार बोले कि अगर लोग गौ मांस खाना छोड़ दें तो मौब लिंचिंग खत्म हो जाएगी. बकौल इंद्रेश कुमार, गौ मांस खाने से कुछ लोगों का दिल दुखता है, इसलिए वे मौब लिंचिंग करते हैं. शायद ही कोई बता पाए कि दिलों में दर्द 4 सालों से ही उठना क्यों शुरू हुआ और राम के जमाने यानी त्रेतायुग में भी लोग गौ मांस खाते थे जब मौब लिंचिंग क्यों नहीं होती थी. क्या सिर्फ इसलिए कि तब गौ मांस खाने वाले हिंदू थे, मुसलमान नहीं. सरकार के पास भी मौब लिंचिंग के ठोस आंकड़े नहीं हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ऐसा क्या हो गया कि कट्टर हिंदूवादी भीड़ इंसाफ पर उतारू हो आई, वह भी सिर्फ गाय के मामले में.

इंडिया स्पेंड नाम के एक वैबपोर्टल के मुताबिक, साल 2010 से ले कर जून 2017 तक गाय से जुड़े मुद्दों पर मौब लिंचिंग की 60 वारदातें हुईं, जिन में 25 लोग मारे गए. मरने वालों में 20 मुसलमान और 5 दलित थे यानी ऊंची जाति वाला कभी मौब लिंचिंग का शिकार नहीं हुआ. इस पोर्टल के मुताबिक ही जो 60 वारदातें हुईं उन में से 58 भाजपा के कार्यकाल में हुईं. इसी दौरान गाय को ले कर मौब लिंचिंग के 21 बर्बर हादसों में सभी मुसलमान या दलित थे. पहला चर्चित मामला भी अलवर का ही है जिस में 5 अप्रैल, 2017 को पहलू खान नाम के शख्स की मौत हो गई थी.

1 अप्रैल, 2017 को अलवर के बहरोड़ में गौरक्षकों ने गौ तस्करी के शक में 6 वाहनों को रोका था और उन पर सवार लोगों की जम कर धुनाई की थी. पहलू खान हरियाणा के नूंह के जयसिंहपुर का बाशिंदा था. दूसरा चर्चित हादसा भी अलवर का ही है जिस में 9 नवंबर, 2017 की रात गौरक्षकों ने गोविंदगढ़ थाने के इलाके में गाय तस्करी के शक में उमर खान नाम के शख्स को खूब पीटा और बाद में उसे गोली मार दी थी. फिर उस की लाश रेल की पटरियों पर फेंक दी गई थी. इस से पहले 22 जून, 2017 को जुनैद खान नाम के नौजवान को दिल्ली के नजदीक हरियाणा के वल्लभगढ़ में भीड़ ने पीटपीट कर मार डाला था.

इस फसाद की जड़ में दिल्ली से मथुरा जा रही शटल ट्रेन में बैठने को ले कर विवाद था. बाद में हवा उड़ी कि जुनैद गौ तस्कर था. पुलिस ने जिन 5 नौजवानों को आरोपी बनवाया, वे सभी हिंदू थे. इस से पहले अखलाक की मौत भी सुर्खियों में रही थी. ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश) के बिसाहड़ा गांव के इस बाश्ंिदे को घर में गौ मांस रखने के शक में पीटपीट कर मारा गया था. इस से इतनी दशहत फैली थी कि बिसाहड़ा के दर्जनभर मुसलमान परिवार गांव छोड़ कर चले गए थे. देश के 12 राज्यों में हुई इस तरह की वारदातों में अधिकतर मरने वाले दलित या मुलसमान ही थे.

इस से लगता है महज 4 वर्षों में गाय को ले कर कट्टर हिंदूवादियों में इतनी जागरूकता आ गई है कि इन तबकों के लोगों को चुनचुन कर मारा जा रहा है जिस का असल मकसद इन्हें दबाना और इन में दहशत फैलाए रखना है. जवाब साफ है कि देश के बहुसंख्यक हिंदू बेकाबू हो चले हैं और उन्हें हिंदूवादी संगठनों व भाजपा की शह भी मिली हुई है जो नेताओं के बयानों से समझ भी आती है. दहशत है मकसद रकबर की मौत के बाद का ड्रामा अब सब के सामने है कि कट्टरवादियों का असल मकसद दशहत बनाए रखना है. इस बाबत खुद विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों के लोग किसी को मारने से पहले उस के फोटो खींचते हैं, उन्हें वायरल करते हैं ताकि बवाल मचे. इसी बवाल से हिंदूवादी संगठनों खासतौर से आरएसएस की बादशाहत और पूछपरख कायम रहती है, जिस ने देश को हिंदू राष्ट्र घोषित करवाने का ठेका ले रखा है.

आरएसएस की तरफ से मौब लिंचिंग पर कभी कोई बयान क्यों नहीं आता, यह बात भी काबिलेगौर है. सैंटर फौर स्टडी औफ सोसाइटी ऐंड सैक्युलरिज्म (सीएसएसएस) की इस बाबत एक रिपोर्ट काबिलेगौर है जिस में कहा गया है कि साल 2014 से यानी केंद्र में भाजपा की सत्ता आने के बाद से देश में कोई भी बड़ा सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ है, उलटे इस में कमी आई है. पर यह कोई ताली बजा कर खुश होने वाली बात नहीं है, क्योंकि इसी रिपोर्ट में इस हकीकत का खुलासा करते यह भी कहा गया है कि समाज में सांप्रदायिक सोच का बोलबाला बढ़ा है और इस की बड़ी वजह सत्ताधारी दल यानी भाजपा नेताओं के नफरत फैलाने वाले बयान हैं. इन में से जाहिर है अधिकांश नेताओं का सीधा नाता आरएसएस से है. अब दंगों की जगह मौब लिंचिंग लेती जा रही है. चिंता का विषय मौब लिंचिंग पर बहुत कम काम हुआ, लेकिन इस मसले पर मशहूर अमेरिकी लेखक पौल ब्रास के खयालात काबिलेगौर हैं और मौजूदा हालत में खरे भी उतरते हैं. अपनी एक किताब ‘द प्रोडक्शन औफ हिंदूमुसलिम वायलैंस इन कंटैंपररी इंडिया’ में पौल ब्रास ने लिखा है कि संस्थागत दंगा प्रणाली यानी साजिशपूर्वक दंगे माकूल राजनीतिक हालात में करवाए जाते हैं, इस के लिए रोजाना के मामूली झगड़ों को सांप्रदायिक रंग दे कर उन्हें बड़ा किया जाता है.

बकौल पौल ब्रास, सांप्रदायिक दंगों (विवादों) से हमेशा उस पार्टी को फायदा होता है जो समाज के बहुसंख्यक तबके की अगुआई या रहनुमाई करने का दावा करती है. जैसे, आजादी के बाद हिंदू महासभा, फिर जनसंघ और अब भाजपा कर रही है. भाजपा नेताओं को यह कहने में कभी कोई गुरेज नहीं हुआ कि वह हिंदुओं की पार्टी है. अब चूंकि हिंदुओं की पार्टी सत्ता में है, इसलिए उन्हें बड़े दंगे करवाने की जरूरत नहीं रह गई है. वे अपना मकसद नफरत फैलाने वाले भाषणों और दुष्प्रचार से हासिलकर रहे हैं. नफरत बढ़ाने, अफवाहों का सहारा लेने की जरूरत किसे है, इस सवाल का जवाब बेहद साफ है कि भाजपा और आरएसएस को, जिन के करताधरता देवीदेवताओं की तरह मंदमंद मुसकराते हुए तमाशा देखा करते हैं. एक कहावत है कि भीड़ बेवकूफों की होती है जो पलभर में हर उस शख्स के खून की प्यासी हो जाती है जिस से उस का कोई सीधा वास्ता नहीं होता.

अब साल 2019 के चुनाव यह तय करेंगे कि देश के लोग दरअसल क्या सोच रहे हैं. जिन वजहों के चलते उन्होंने कांग्रेस को 2014 में खारिज किया था वे नई शक्ल में सामने आ रही हैं. भ्रष्टाचार, महंगाई और बेरोजगारी ज्यों की ज्यों हैं. देश में अमनचैन का नामोनिशान नहीं है. महिलाओं का तो दूर, छोटी बच्चियों तक का बलात्कार इफरात से हो रहा है. मुसलमानों और दलितों को दबा दिया गया है फिर भले ही इस के लिए सैकड़ों पहलू खान, उमर और रकबर खानों को मौब लिंचिंग के जरिए मारना पड़े.

खुद को श्रेष्ठ समझने वाले ये हिंदू अभी यह नहीं सोच पा रहे हैं कि इस कट्टरवादी सोच से वे खुद ही दोफाड़ हो रहे हैं. पिछड़े व दलित अब खुद को हिंदू कहलवाने में हिचकिचाने लगे हैं क्योंकि उन पर अब पहले से ज्यादा अत्याचार हो रहे हैं. जब यह भीड़ इन्हीं हिंदुओं की तरफ मुड़ने लगेगी तब इन का भगवान कैसे इन्हें बचाएगा, यह सोचने वाला कोई नहीं. इस बात को मौब लिंचिंग से ही समझा जा सकता है कि अब इंसाफ पर उतारू हो आई हिंसक होती भीड़ मुसलमानों और दलितों के अलावा दूसरों को भी मारने लगी है. गाय के बाद अब बच्चाचोर गिरोह के लोग मारे जा रहे हैं जो सभी मुसलमान या दलित नहीं हैं. सरकार की चिंता यही बात है, इसलिए वह अब संजीदा हो कर कमेटियां बना कर कानून वजूद में ला रही है कि कहीं ऐसा न हो कि कल को जेबकतरों और कौलगर्ल्स को भी भीड़ पीटपीट कर मारने लगे. वे सभी तो मुसलमान या दलित नहीं होते, यानी इंसाफ सिर्फ बीफ और गौ तस्करी तक सिमटा रहता, तो ही काम का था.

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