मुझे आसान काम करना पसंद नहीं है: यशपाल शर्मा

बौलीवुड में पिछले 18 वर्ष से कार्यरत अभिनेता यशपाल शर्मा ने सिनेमा को कभी भी भाषा की बंदिशों में बांधकर नहीं देखा. वह हिंदी के अलावा भारत की हर क्षेत्रीय भाषा की फिल्में करते रहे हैं. पिछले तीन वर्ष से वह हरियाणा में सिनेमा को विकसित करने के लिए जी जान से जुटे हए हैं. वह हर वर्ष हरियाणा में हरियाणा अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह का भी आयोजन करवा रहे हैं.

इन दिनों वह हरियाणा के संत माने जाने वाले लक्ष्मीचंद पर बतौर निर्माता, निर्देशक व अभिनेता ‘‘दादा लक्ष्मी” नामक बायोपिक फिल्म बनाने में लगे हुए हैं. जिसे वह दो भागों में बना रहे हैं.यह हरियाणवी के अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए अंग्रेजी भाषा में भी होगी. हरियाणा के पंडित लक्ष्मीचंद एक फोक कलाकार है, जिन्हे सूरदास,कबीर व सेक्सपिअर सहित कई नाम दिए गए थे. 1903 में जन्में लक्ष्मीचंद का महज 42 साल की उम्र में निधन हो गया था. वह कभी स्कूल नहीं गए थे. मगर वह फोक कलाकार, लेखक, गायक,निर्देषक सहित बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे.

प्रस्तुत है यशपाल शर्मा से हुई बातचीत के अंश

बतौर निर्देशक छोटी फिल्म की बजाय ‘‘दादा लक्ष्मी’’ जैसी बड़ी फिल्म से शुरूआत करने की कोई खास वजह?

मुझे आसान काम करना पसंद ही नही है. हमारा हरियाणा इस समय बहुत पिछड़ा हुआ है. आप भी जानते हैं कि तमिल,कन्नड़, तेलगू, पंजाबी, मराठी,गुजराती सिनेमा बहुत समृद्ध हो गया है. मराठी सिनेमा में तो क्रांति हो रही है.हरियाणवी सिनेमा को कोई जानता ही नहीं है.हरियाणवी सिनेमा के इतिहास में सिर्फ ‘लाड़ो’ व ‘पगड़ी’ सहित तीन फिल्में ऐसी रहीं,जिन्हें हम अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में भेज सके. ‘चंद्रावल’ अच्छी फिल्म है. इसमें गाने हैं, फिल्म को सफलता भी मिली. मगर अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में भेजने योग्य नहीं है. तो मुझे तकलीफ हो रही थी. मैने पाया कि हरियाणवी सिनेमा को आगे लाने का कोई प्रयास नहीं कर रहा है. सुभाष घई भी हरियाणा को भूल गए. सतीष कौशिक ने भी हरियाणा के बारे में नही सोचा. स्व.ओमपुरी, संजय दत्त,रणदीप हुड्डा सहित हरियाणा के कितने लोग बौलीवुड में सफल हैं,पर हरियाणा को भूल गए. इसलिए मैंने सोचा कि हरियाणा के ही बड़े संत लक्ष्मीचंद पर बायोपिक फिल्म बनायी जाए. कठिन विषय है. इसमें जात पांत का भी मुद्दा भी है. यह फिल्म दो भागों में बनेगी. पहले भाग में बचपन से टीएजर की उम्र तक की कहानी होगी.जबकि दूसरे भाग में उसके बाद की कहानी होगी.दूसरे भाग में लक्ष्मीचंद जी का किरदार मैं स्वयं निभाने वाला हूं.

आपने पंडित लक्ष्मीचंद के बारे में जानकारी कैसे हासिल की?

उन पर लिखी हुई 40 से अधिक किताबे हैं. विद्यार्थी कालेज में उन पर पीएचडी करते रहे हैं.आज भी कर रहे हैं.उनके साथ काम करने वाले लोगों ने उन पर कई किताबें लिखी हैं. अब तो उनका कोई शिष्य नही बचा. बचपन के बारे में लोगों को खास जानकारी नहीं दी है. बचपन के बारे में यही लिखा हुआ है कि उनके पिता गरीब किसान थे और लक्ष्मीचंद जी अक्सर घर से भाग जाया करते थे. बचपन को लेकर फिक्षन ही ज्यादा रखा है. उनके परिवार में अब उनके दो पोते व उनकी पत्नि व बच्चे हैं. उनका बेटा व बहू तो नहीं रहे. हरियाणा में उन्हें भगवान मानते हैं.

फिल्म में आजादी के लिए जो आंदोलन हो रहे थे,उसका भी जिक्र आएगा ही?

जी हां वह सब है. भगतसिंह की फांसी,महात्मा गांधी के भाषण और जवाहरलाल नेहरू भी इस फिल्म में नजर आएंगे. पर उनका आजादी के आंदोलन से कोई जुड़ाव नही था, पर उनकी लोकप्रियता जवाहरलाल नेहरु से भी ज्यादा थी.

क्षेत्रीय सिनेमा के विकसित होने और हिंदी सिनेमा के लगातार पतन होने का कारण क्या हैं?

हिंदी सिनेमा का पतन नही हो रहा है,बल्कि काफी उभर रहा है.अब बौलीवुड भी क्षेत्रीय सिनेमा हो गया है.‘सुल्तान’,‘दंगल’,‘तनु वेड्स मनु’,‘पैडमैन’ या जो नयी फिल्में बन रही हैं, उनमें लोग अवधी या बिहारी भाषा बोलते हुए नजर आ रहे हैं. फिल्म ‘मुल्क’ में बनारस की कहानी है. अब बौलीवुड के लोग भी गांव में घुस रहे हैं. अब सभी को देसी तड़का चाहिए. अब राकेश ओमप्रकाश मेहरा, करण जौहर सहित तमाम दिग्गज फिल्मकार राजस्थान से भाग रहे हैं. हमने करीम मोहम्मद को हिमाचल में फिल्माया है. जब लोकेशन अच्छी हो तो काम करने का मजा दोगुना हो जाता. दूसरी बात क्षेत्रीय सिनेमा में क्षेत्रीय मुद्दों को पिरोया जाता है.अब तो मैं हर षहर में जब किसी फिल्म फेस्टिवल में जाता हूं,तो वहां के लोगों से कहता हूं कि उन्हें अच्छा काम करने के लिए मुंबई आने की जरूरत नही है. अब वह जहां रह रहे हैं, वहां भी अच्छा काम कर सकते हैं. अब तो आप घर बैठे कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा को अपनी फोटो ईमेल कर दें, आपके योग्य किरदार होगा तो बुलाया जाएगा.

हरियाणा अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह की प्रगति कैसी है?

बहुत अच्छी है. 2016 और 2017 में इसे बहुत पसंद किया गया. अब तीसरा हरियाणा अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह 14 नवंबर से 18 नवंबर के बीच हिसार में संपन्न होगा. हम इस फिल्म समारोह में हरियाणा व भारतीय सभ्यता व संस्कृति को बढ़ावा देने के साथ-साथ यह प्रयास करते हैं कि हरियाणा के नागरिक भी सिनेमा से जुड़ने के लिए उत्साहित हों.

प्यार के खेल में उजड़ा अंशिका का सुहाग

मेवाराम यादव 8 जून, 2018 को अपनी बेटी ममता की ससुराल थाना सिरसागंज के गांव इंदरगढ़ गए थे. वहां के किसी वैद्य से उन्हें अपनी दवा लेनी थी. दवा ले कर उन्हें अगले दिन ही दोपहर तक घर लौटना था. लेकिन इस से पहले ही 9 जून की सुबह करीब 5 बजे उन के मोबाइल पर उन के बेटे सुनील की बहू अंशिका का फोन आया.

उस समय वह बहुत घबराई हुई थी. उस ने कहा, ‘‘पापा आप जल्दी से घर आ जाओ, सूर्यांश के पापा सुबह 3 बजे घर से दिशा मैदान के लिए गए थे, लेकिन 2 घंटे हो गए अब तक नहीं लौटे हैं. वह अपना मोबाइल भी घर पर छोड़ गए थे.’’

बहू की बात सुन कर मेवाराम घबरा गए. उन्होंने बहू से कहा कि वह चिंता न करे, वे अभी गांव आ रहे हैं.

बात बेटे के लापता होने की थी, इसलिए उन्होंने बेटी के ससुर यानी अपने समधी दिगंबर सिंह को यह बात बताई और अपनी बाइक उठा कर वापस अपने गांव नगला जलुआ के लिए चल दिए. इंद्रगढ़ से उन के गांव की दूरी बाइक से मात्र 30 मिनट की थी. रास्ते भर उन के दिमाग में यही बात घूम रही थी कि आखिर उन का बेटा सुनील चला कहां गया.

घर पहुंच कर उन्होंने अपनी बहू अंशिका से पूरी जानकारी ली. अंशिका ने बताया कि वह सुबह 3 बजे के करीब दिशा मैदान गए थे. उस समय वह केवल अंडरवियर और बनियान पहने हुए थे. जब वह काफी देर बाद भी वापस नहीं आए तब मुझे चिंता हुई और मैं ने घर से बाहर जा कर उन्हें खेतों की ओर तलाशा, लेकिन वह कहीं भी दिखाई नहीं दिए.

सुनील मेवाराम का 28 साल का बेटा था. उन्होंने करीब 5 साल पहले उस की शादी अंशिका से की थी. वह भी सुनील को खोजने के लिए जंगल की तरफ चल दिए. उन के साथ गांव के कुछ लोग भी थे. उन्होंने बेटे को संभावित जगहों पर ढूंढा लेकिन पता नहीं लगा.

जब वह वापस घर की तरफ आ रहे थे तभी रास्ते में मिले कुछ लोगों ने उन्हें बताया कि रेलवे लाइन के किनारे झाडि़यों में एक बोरी पड़ी है. देखने से लग रहा है कि उस में कोई लाश है. खून भी रिस रहा है.

इतना सुनते ही मेवाराम गांव वालों के साथ रेलवे लाइन की तरफ चल दिए. लाइन गांव से लगभग 200 मीटर दूर दक्षिण दिशा में थी.

सभी लोग वहां पहुंचे तो लाइन के पास की झाडि़यों में एक बोरा पड़ा था, बोरे से जो खून रिस रहा था उस पर मक्खियां भिनभिना रही थीं. लोगों ने जब गौर से देखा तो खून की बूंदें थीं. ऐसा लग रहा था कि बोरी को कुछ समय पहले ही ला कर फेंका गया है.

वैसे तो वह बोरी पुलिस की मौजूदगी में ही खोली जानी चाहिए थी. लेकिन बोरी देख कर मेवाराम की धड़कनें बढ़ गई थीं. बोरी के अंदर क्या है, यह देखने की उन की उत्सुकता बढ़ गई थी. इसलिए उन्होंने गांव वालों के सामने जब बोरी खुलवाई तो उस में उन के बेटे सुनील की ही लाश निकली.

बेटे की लाश देखते ही मेवाराम गश खा कर जमीन पर बैठ गए और रोने लगे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि उन के बेटे की हत्या किस ने और क्यों की. इस के बाद तो यह खबर जल्द ही आसपास के गांवों में भी फैल गई. जिस से वहां तमाम लोग इकट्ठा हो गए. सभी आपस में तरहतरह के कयास लगा रहे थे.

गांव के ही किसी व्यक्ति ने पुलिस को घटना की सूचना दे दी. सूचना मिलने के कुछ देर बाद ही थानाप्रभारी विजय कुमार गौतम पुलिस टीम के साथ वहां पहुंच गए.

पुलिस ने जब लाश का निरीक्षण किया तो उस के सिर और शरीर पर तेज धारदार हथियार के घाव थे. इस के अलावा उस की नाक भी कटी हुई थी. सारे घावों से जो खून निकला था, उसे देख कर लग रहा था कि उस की हत्या कुछ घंटों पहले ही की गई थी.

रास्ते में जो खून के निशान थे उन का पीछा किया गया तो वह भी गांव के पास तक मिले. उस के बाद उन का पता नहीं चला. इन सब बातों से पुलिस को इतना तो विश्वास हो गया कि सुनील की हत्या गांव में ही करने के बाद उस की लाश यहां डाली गई थी.

थानाप्रभारी ने मृतक के पिता मेवाराम से बात की तो उन्होंने किसी व्यक्ति पर कोई शक नहीं जताया. तब थानाप्रभारी ने जरूरी काररवाई कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

मेवाराम उत्तर प्रदेश के जिला फिरोजाबाद के गांव नगला जलुआ में रहते थे. वह गांव में ही टेलरिंग का काम करते थे. उन के 3 बेटे और 2 बेटियां थीं. उन के पास खेती की 3 बीघा जमीन थी जो बंटाई पर दे रखी थी. टेलरिंग की कमाई से ही वह अपने 4 बच्चों का विवाह कर चुके थे. केवल छोटा बेटा सनी ही शादी के लिए बचा था.

मेवाराम की पत्नी मुन्नी देवी की 3 साल पहले मौत हो चुकी थी. सब से बड़ा सुनील पिछले 4 साल से दक्षिणी दिल्ली के फतेहपुर बेरी स्थित एक फैक्ट्री में सिलाई का काम करता था. यह फैक्ट्री रेडीमेड कपड़े एक्सपोर्ट करती थी. सुनील के दोनों छोटे भाई संजय व सनी भी उसी के साथ रह कर ड्राइवरी करते थे. फतेहपुर बेरी में ही सुनील की बहन पिंकी की सुसराल थी. वहीं पास में ही उन्होंने किराए पर मकान ले लिया था.

मेवाराम ने सुनील की शादी 5 साल पहले फिरोजाबाद के गांव ढोलपुरा निवासी वीरेंद्र यादव की बेटी अंशिका उर्फ अनुष्का के साथ की थी. सुनील का डेढ़ साल का बेटा सूर्यांश था. जबकि संजय का अभी कोई बच्चा नहीं था. सुनील और संजय कुछ दिनों के लिए बारीबारी से अपनी पत्नी को गांव से दिल्ली लाते थे.

अंशिका जब दिल्ली से अपनी ससुराल नगला जलुआ लौटती थी तो वहां से जल्द ही अपने मायके ढोलपुरा चली जाती थी. मई 2018 के शुरू में सुनील अंशिका के साथ दिल्ली से अपने गांव आया, कुछ दिन गांव में रहने के बाद वह पत्नी व बेटे सूर्यांश को ढोलपुरा छोड़ कर वापस दिल्ली चला गया.

उस के बाद 28 मई को दिल्ली से सुनील पत्नी को लेने आया. वह अपनी ससुराल से पत्नी व बेटे को अपने गांव नगला जलुआ ले आया. उस ने अंशिका से कह दिया था कि 10 जून को दिल्ली चलेंगे. लेकिन दिल्ली लौटने से पहले ही सुनील की हत्या हो गई.

थानाप्रभारी विजय कुमार गौतम मेवाराम से बात करने के लिए उन के घर पहुंच गए. पूछताछ में मेवाराम ने बताया कि सुनील सुबह 3 बजे दिशा मैदान के लिए कभी नहीं गया, और न ही वह केवल अंडरवीयर में जाता था. उन्होंने बताया कि उन्हें शक है कि सुनील की पत्नी अंशिका उस से कुछ छिपा रही है. इस के बाद थानाप्रभारी ने सुनील के कमरे का निरीक्षण किया तो उन्हें सड़क की ओर के दरवाजे पर खून लगा दिखाई दिया.

खून देख कर थानाप्रभारी समझ गए कि सुनील की हत्या इसी घर में करने के बाद उस के शव को रेलवे लाइन के पास फेंका गया था. पुलिस ने अंशिका से सुनील की हत्या के बारे में पूछताछ की तो अंशिका ने रट्टू तोते की तरह ससुर को सुनाई कहानी दोहरा दी. थानाप्रभारी ने उस से पूछा कि सुनील नंगे पैर गया था या चप्पलें पहन कर. इस पर वह कोई जवाब नहीं दे सकी.

पुलिस ने घर में छानबीन की तो अंदर के कमरे के फर्श पर खून के निशान दिखाई दिए, जिसे साफ किया गया था. इस के साथ ही उस कमरे के दवाजे पर भी खून के छींटे साफ दिखाई दे रहे थे. जो सुनील की हत्या उसी कमरे में होने की गवाही दे रहे थे. पुलिस को घर में ही अंशिका की साड़ी व पेटीकोट सूखता मिला, जिसे धोने के बाद भी उस पर खून के धब्बे दिख रहे थे.

पुलिस ने फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट टीम को भी मौके पर बुला लिया. जिस ने जमीन तथा दरवाजे से खून के नमूने एकत्र किए. अधिकारियों को घटना की जानकारी देने पर एसपी (ग्रामीण) महेंद्र सिंह क्षेत्राधिकारी अभिषेक कुमार राहुल तथा महिला कांस्टेबल बीना यादव को साथ ले कर गांव पहुंच गए. सबूतों के आधार पर पुलिस ने अंशिका को हिरासत में ले लिया. इस के बाद पुलिस घटनास्थल की काररवाई निपटा कर अंशिका और उस के ससुर मेवाराम को थाने ले आई.

थाने ले जा कर महिला पुलिस ने जब अंशिका से उस के पति सुनील की हत्या के बारे में सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गई और फूटफूट कर रोने लगी. उस ने अपने पति की हत्या की जो कहानी पुलिस को सुनाई वह इस प्रकार थी—

अंशिका ने पुलिस को बताया कि उस ने अपने दिल्ली के प्रेमी राजा और उस के साथी रोहित के साथ मिल कर पति की हत्या की थी. उस ने आगे बताया कि करीब ढाई साल पहले वह दिल्ली के फतेहपुर बेरी में अपने पति व देवरों के साथ रहती थी.

वहीं सामने के कमरे में उत्तर प्रदेश के बरेली शहर निवासी राजा रहता था. राजा हलवाई का काम करता था. उसी समय राजा की दोस्ती सुनील व उस के देवरों से हो गई थी.

राजा का उन के घर भी आनाजाना था. उसी दौरान उस के व राजा के प्रेम संबंध हो गए. इस की किसी को कोई भनक तक नहीं लगी. अंशिका शादी के बाद से ही अपने पति सुनील को पसंद नहीं करती थी. उस ने दिल्ली से अपने प्रेमी राजा को 8 जून की रात को ही गांव बुला लिया था.

राजा अपने दोस्त रोहित के साथ गांव पहुंचा था. उस ने मकान के सड़क की ओर वाले दरवाजे से दोनों को अंदर बुला कर कमरे में छिपा दिया था. उस समय सुनील मकान के मुख्य दरवाजे पर बैठ कर गांव के लोगों से बात कर रहा था.

रात 12 बजे सुनील खाना खा कर जब बीच वाले कमरे में पलंग पर गहरी नींद में सो गया, तभी उस ने करीब 2 बजे प्रेमी व उस के दोस्त के साथ मिल कर सुनील को सोते समय दबोच लिया और उस का मुंह बंद कर के अंदर वाली कोठरी में ले गए, जहां कैंची व डंडों से उस की हत्या कर दी गई.

इस बीच अंशिका सुनील के हाथ पकडे़ रही. सुनील की हत्या के बाद उस की लाश को एक बोरे में भर कर राजा व उस का दोस्त रेलवे ट्रैक के पास झाडि़यों में फेंक कर दिल्ली वापस चले गए. अंशिका ने बताया कि इस के बाद उस ने बरामदे में पडे़ खून को पानी से धो दिया.

उस के कपड़ों पर भी खून लग गया था, इसलिए उस ने कपड़े धो कर डाल दिए. अंशिका से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस के और उस के दिल्ली निवासी प्रेमी राजा तथा उस के साथी रोहित के खिलाफ हत्या व साक्ष्य छिपाने का मुकदमा दर्ज कर लिया. पुलिस ने मुकदमा दर्ज होते ही अपनी काररवाई शुरू कर दी.

दिल्ली में रह रहे सुनील के भाई संजय और सनी व बहन को जब सुनील की हत्या की जानकारी मिली तो वह भी दिल्ली से अपने गांव आ गए. संजय और सनी को जब पता चला कि अंशिका सुनील के कत्ल में राजा और रोहित के शामिल होने की बात कह रही है तो वे चौंके, क्योंकि 8 जून, 2018 की रात 11 बजे राजा उन के साथ था.

9 जून की सुबह 6 बजे भी उन्होंने राजा को दिल्ली में देखा था. मेवाराम ने यह बात थाने जा कर थानाप्रभारी विजय कुमार गौतम को बता दी. इस पर पुलिस ने एक बार फिर अंशिका से सख्ती से पूछताछ की. इस के बाद उस ने पुलिस को वास्तविक कहानी बताई, जो इस प्रकार थी—

अंशिका की एक बुआ गांव कटौरा बुजुर्ग में रहती थी. शादी से पहले अंशिका का अपनी बुआ के यहां आनाजाना लगा रहता था. बुआ के मकान के पास ही शमी उर्फ शिम्मी नाम का युवक रहता था. इसी दौरान शमी और अंशिका के बीच प्यार का चक्कर चल पड़ा. दोनों एकदूसरे को बेहद पसंद करने लगे. बाद में दोनों ने शादी की इच्छा जताई. लेकिन अंशिका की नानी को यह रिश्ता पसंद नहीं आया, क्योंकि शमी कुछ कमाता नहीं था. इस के अलावा उस के पास खेती की जमीन भी नहीं थी.

करीब 5 साल पहले अंशिका की शादी सुनील से हो जरूर गई थी, लेकिन वह सुनील को पसंद नहीं करती थी. शादी के बाद भी उस के और शमी के संबंध जारी रहे, वह चाह कर भी उसे भुला नहीं सकी. सुनील शादी के बाद जब भी अंशिका को दिल्ली ले जाता तो कुछ दिन रहने के बाद वह गांव जाने की जिद करने लगती थी, गांव आने के बाद वह वहां से अपने मायके चली जाती थी.

मायके से वह अपनी बुआ के गांव जा कर प्रेमी शमी से मिलती थी. सुनील को अंशिका की गतिविधियों पर शक होने लगा था. दोनों में इसी बात को ले कर झगड़ा भी होता था. शमी और अंशिका ने अपने प्यार के बीच कांटा बने सुनील को रास्ते से हटाने की योजना बनाई. शमी ने अंशिका को एक मोबाइल दे रखा था, जिसे वह अपने संदूक में कपड़ों के बीच छिपा कर रखती थी. मौका मिलते ही वह शमी से बात कर लेती थी.

8 जून की शाम को जब अंशिका के ससुर इंदरगढ़ में रहने वाली अपनी बेटी के यहां चले गए तो घर पर अंशिका और सुनील ही रह गए थे. अच्छा मौका देख कर शमी द्वारा दिए गए मोबाइल, जिसे वह सायलेंट मोड पर रखती थी, से शमी को फोन कर के गांव बुला लिया. शमी अपने दोस्त के साथ आया था. अंशिका की मोबाइल पर उस से रात साढ़े 8 बजे, 9 बजे व रात 12 बजे बातचीत हुई.

शमी ने गांव पहुंच कर अंशिका को अपने आने की जानकारी दे दी. रात 12 बजे के बाद अंशिका सुनील से कह कर शौच के बहाने घर से निकली. उस ने खेत में छिपे अपने प्रेमी शमी से कहा कि वह सड़क की तरफ वाले दरवाजे की कुंडी नहीं लगाएगी. जब फोन करूं तभी चुपके से उसी दरवाजे से आ जाना.

रात को सुनील खाना खा कर गहरी नींद सो गया. अंशिका ने प्रेमी व उस के साथी को घर में बुला कर अंदर के कमरे में छिपा दिया. रात 12 बजे शमी व उस के साथी ने सोते समय सुनील को दबोच लिया और उस का मुंह बंद कर के अंदर के कमरे में ले गए, जहां कैंची व डंडों से उस की हत्या कर दी. हत्यारों ने कैंची से सुनील की नाक भी काट दी.

सुनील की हत्या होने की भनक गांव वालों को नहीं लगी. हत्या के बाद शव को बोरे में बंद कर रेलवे ट्रैक पर डालने की योजना थी ताकि सुबह 4 बजे फर्रुखाबाद की ओर से आने वाली कालिंदी एक्सप्रेस से शव के परखच्चे उड़ जाएं और मामला दुर्घटना जैसा लगे, लेकिन बोरा वहां लगे तारों में उलझने की वजह से रेलवे लाइन तक नहीं पहुंच सका. वे लोग बोरे को झाडि़यों में फेंक कर भाग गए.

इस के बाद मेवाराम ने थाने में नई तहरीर दे कर सुनील की हत्या के लिए अंशिका उस के प्रेमी शमी तथा उस के अज्ञात साथी को दोषी बताया. दूसरे दिन पुलिस ने अंशिका को पति की हत्या, साक्ष्य मिटाने के आरोप में जेल भेज दिया. पुलिस ने हत्या के बाद उस के प्रेमी शमी की गिरफ्तारी के लिए उस के गांव व अन्य ठिकानों पर दबिश दी, लेकिन उस का कोई सुराग नहीं मिला.

अंतत: 18 जून, 2018 को शमी ने न्यायालय में सरेंडर कर दिया. न्यायालय द्वारा उसे जेल भेज दिया गया. दूसरे दिन थानाप्रभारी ने जिला जेल पहुंच कर शमी से सुनील की हत्या के बारे में पूछताछ की. शमी पुलिस को गुमराह करता रहा, इस के बाद 24 जून को पुलिस ने शमी को न्यायालय से 4 घंटे के रिमांड पर ले लिया. शमी की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल कैंची गांव के बाहर झाडि़यों से बरामद कर ली.

पुलिस के अनुसार हत्या के पीछे शमी और अंशिका के अवैध संबंध थे. कथा लिखे जाने तक शमी के साथी की पुलिस तलाश कर रही थी.

बेटे की हत्या से व्यथित पिता मेवाराम ने कहा कि अगर बहू को मेरा बेटा पसंद नहीं था तो उसे छोड़ देती, उस की हत्या करने की क्या जरूरत थी. अंशिका के जेल जाने के बाद उस का अबोध बेटा दिल्ली में अपने चाचाओं के साथ रह रहा था.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

कालगर्ल से दोस्ती प्रोफेसर की भूल

महाराष्ट्र के जिला जलगांव के अमलनेर सिटी के रहने वाले दीपक पाटील जययोगेश्वर कालेज में प्रोफेसर थे. अपने सुखी वैवाहिक जीवन में मशगूल प्रो. दीपक पाटील का एक विद्यार्थी था सागर मराठे. सागर होनहार छात्र था. लेकिन एक दोस्त के माध्यम से उस की जानपहचान राबिया बानो नाम की एक कालगर्ल से हो गई थी. सागर राबिया से मिलनेजुलने लगा, जिस से उस के भी राबिया से शारीरिक संबंध बन गए थे.

वैसे तो राबिया के कई ग्राहक थे लेकिन उन सब में वह सागर को बहुत चाहती थी. राबिया का जब मन होता वह सागर को फोन कर के बातें कर लेती थी. एक बार की बात है. सागर और राबिया एक रेस्टोरेंट में बैठे थे. तभी इत्तफाक से प्रो. दीपक पाटील भी वहां आ गए.

सागर ने राबिया को अपनी दोस्त बताते हुए उस की मुलाकात प्रो. दीपक पाटील से कराई. पहली ही मुलाकात में राबिया की खूबसूरती और बातों से प्रो. दीपक बहुत प्रभावित हुए. हालांकि वह शादीशुदा थे, इस के बावजूद भी राबिया को उन्होंने अपने दिल में बसा लिया.

अगले दिन सागर जब कालेज आया तो उन्होंने किसी बहाने से सागर से राबिया का फोन नंबर ले लिया. प्रो. पाटील का मन राबिया से बात करने के लिए आतुर था.

ड्यूटी पूरी करने के बाद उन्होंने राबिया को फोन कर के उसे अपने बारे में बताया. राबिया भी समझ गई कि यह मोटी आसामी है, इसलिए वह भी उन से रसभरी बातें करने लगी.

इस के बाद आए दिन प्रोफेसर साहब की राबिया से फोन पर बातें होने लगीं. घर में खूबसूरत बीवी होने के बावजूद वह राबिया को चाहने लगे थे. इतना ही नहीं, उस से मुलाकातें भी करने लगे थे.

प्रो. दीपक पाटील का जब मन होता वह राबिया को होटल में बुला लेते और अपनी हसरतें पूरी करते. लेकिन इस के बदले में वह उसे पैसे कम देते थे. राबिया 2-4 बार तो उन से होटल में मिली लेकिन बाद में उस ने उन से मिलने के लिए मना कर दिया. इस पर प्रो. दीपक उसे बारबार फोन कर के तंग करने लगे.

उन के बारबार तंग करने से राबिया परेशान हो गई. उस ने इस की शिकायत सागर मराठे से की क्योंकि उसी ने उस की मुलाकात प्रो. दीपक से कराई थी. सागर ने भी प्रोफेसर को समझाया लेकिन वह नहीं माने.

जब राबिया ने उन की काल रिसीव करनी बंद कर दी तो वह दूसरे नंबरों से उसे काल करने लगे. उस ने कई बार प्रो. दीपक को झिड़क भी दिया था, पर वह अपनी हरकत से बाज नहीं आए.

अमलनेर की ही म्हाडा कालोनी में रहने वाली राबिया का एक प्रेमी था राज चव्हाण. वह हिस्ट्रीशीटर था. अलगअलग पुलिस थानों में उस पर दर्जनों केस दर्ज थे. बता दें राबिया शादीशुदा युवती थी. उस की शादी सूरत में हुई थी. शादी के कुछ ही दिनों में राबिया ने पति का घर छोड़ दिया था. बाद में वह अमलनेर में अपनी मां के यहां आ कर रहने लगी थी. पति को छोड़ने के बाद राबिया पूरी तरह आजाद हो गई थी.

राबिया का अमलनेर के रेलवे परिसर में आनाजाना लगा रहता था. इसी इलाके में राज चव्हाण भी रहता था. हर रोज दोनों की नजरें मिलने लगी थीं. कुछ ही दिनों में दोनों को एकदूसरे से प्यार हो गया था.

अपराध के सिलसिले में राज चव्हाण को लंबे समय के लिए दूसरी जगहों पर जाना पड़ता था. कभी पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए जाने पर उसे जेल जाना पड़ता तो राबिया के सामने आर्थिक समस्या खड़ी हो जाती थी. अपने प्रेमी राज चव्हाण की गैरमौजूदगी में वह जिस्मफरोशी का धंधा करती थी.

राबिया को प्रो. दीपक का बारबार फोन करना पसंद नहीं था. प्रोफेसर के अलावा उसे सागर मराठे पर भी गुस्सा आता था. एक दिन उस ने प्रोफेसर दीपक और सागर की शिकायत राज चव्हाण से कर दी. अपनी प्रेमिका की शिकायत सुन कर राज का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उस ने दोनों को सबक सिखाने की ठान ली.

राज चव्हाण का एक दोस्त था विजय डेढ़े. विजय बदलापुर मुंबई में रहता था. राज और विजय ने राबिया को परेशान करने वाले प्रोफेसर दीपक और उन के विद्यार्थी सागर को मारपीट कर सीधा करने का प्लान बनाया.

वे दोनों को एक साथ बुलाना चाहते थे. यह काम राबिया ही कर सकती थी इसलिए राज ने राबिया के माध्यम से प्रो. दीपक और सागर को साथसाथ बुलाने की योजना बनाई.

राज के इशारे पर राबिया ने दोनों को 3 मार्च, 2018 की रात के 10 बजे साथसाथ अमलनेर के प्रताप महाविद्यालय के पास स्थित स्टेडियम के पास पहुंचने को कह दिया. राबिया का फोन आने पर प्रोफेसर साहब फूले नहीं समा रहे थे.

चूंकि दोनों को राबिया ने बुलाया था, इसलिए प्रो. दीपक और सागर मराठे का आना निश्चित था. उन के आने से पहले ही राज चव्हाण और विजय रात के अंधेरे में स्टेडियम के पास छिप कर बैठ गए.

रात 10 बजे के करीब प्रो. दीपक और सागर मराठे स्टेडियम के पास पहुंचे तो उन्हें वहां राबिया मिल गई. तभी अचानक सागर मराठे का ध्यान अंधेरे में छिप कर बैठे राज चव्हाण की तरफ चला गया. सागर उसे पहचानता था, इसलिए वहां से भाग गया.

कहीं प्रोफेसर साहब भी न भाग निकलें, इसलिए छिपे बैठे राज चव्हाण और विजय ने दीपक पाटील को दबोच लिया. उन्होंने उस समय प्रोफेसर साहब से कुछ नहीं कहा, बल्कि उन्हें एक ढाबे पर ले गए, वहां पर दोनों ने मिल कर प्रो. दीपक को जबरन जरूरत से ज्यादा मात्रा में शराब पिलाई.

छात्रों को पढ़ाने वाला प्रोफेसर अय्याशी के चक्कर में 2 गुंडों के बीच बैठा जबरदस्ती शराब पी रहा था. कुछ ही देर में प्रोफेसर पर नशा छा गया, उन्हें कुछ नहीं सूझ रहा था. इस दौरान उन का बैंक एटीएम कार्ड दोनों गुंडों ने छीन लिया. उस का पासवर्ड भी विजय ने मारपीट कर पूछ लिया.

एटीएम कार्ड हासिल करने के बाद दोनों ने उन की डंडे से पिटाई करनी शुरू कर दी. इस मारपीट में प्रो. दीपक बुरी तरह से घायल हो गए. उन्हें पता था कि बदनामी से बचने के लिए प्रोफेसर मारपीट की बात किसी को नहीं बताएंगे.

बाद में दोनों हमलावरों ने जख्मी प्रोफेसर को उन्हीं की बाइक से शहर के डा. हजारे के क्लीनिक तक पहुंचाया. तब तक काफी रात हो चुकी थी. उन्होंने डा. हजारे को काफी आवाजें दीं, लेकिन किसी ने गेट नहीं खोला.

आखिर राज और विजय ने जख्मी प्रोफेसर को उसी हालत में क्लीनिक के पास छोड़ दिया और उन की मोटरसाइकिल से वहां से भाग निकले. प्रोफेसर का एटीएम कार्ड उन के पास ही था, जिस से उन्होंने करीब 40 हजार रुपए निकाल लिए.

अस्पताल के बाहर लहूलुहान पड़े प्रो. दीपक को इलाज नहीं मिला तो उन्होंने दम तोड़ दिया. रात लगभग 2 बजे उन की लाश पर किसी की नजर पड़ी तो उस ने इस की सूचना अमलनेर पुलिस थाने में दी. खबर मिलने पर थानाप्रभारी अनिल बड़गूजर पुलिस टीम के साथ डा. हजारे के क्लीनिक के पास पहुंची.

सुबह करीब साढ़े 3 बजे इस घटना की खबर मृतक प्रो. दीपक की पत्नी तथा रिश्तेदारों को मिली तो वे सब वहां पहुंच गए. सुबह होने पर पुलिस ने जब उन की लाश का निरीक्षण किया तो उन के शरीर पर चोटों के गहरे घाव थे.

लोग इसे एक सड़क दुर्घटना मान कर चल रहे थे लेकिन उन की बाइक वहां नहीं थी. इस से पुलिस उन की मौत को संदेहात्मक मान रही थी. प्रो. दीपक की पत्नी को यह हत्या का मामला लग रहा था, इसलिए उन्होंने अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करा दिया.

इस घटना को ले कर अमलनेर शहर में खलबली मच गई थी. पुलिस अधीक्षक दत्तात्रेय कराले ने पूरे मामले को ध्यान में रखते हुए इस केस की जांच पर क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर सुनील कुराड़े को भी लगा दिया था. मामले की जांच थाना पुलिस के अलावा क्राइम ब्रांच के इंचार्ज सुनील कुराडे और उन की टीम भी कर रही थी.

अपराध करने के बाद राज चव्हाण, विजय डेढे और राबिया फरार हो चुके थे. इधरउधर घूमतेघूमते वे सूरत पहुंचे. सूरत में राबिया की बहन का बेटा रहता था, जिस का नाम अजीज था. कुछ दिनों तक वे अजीज के पास रहे. वहीं पर राज को पैसों की जरूरत पड़ी तो उस ने अजीज को अपना मोबाइल बेच दिया.

जलगांव क्राइम ब्रांच की टीम को जांच के दौरान यह जानकारी मिल गई थी कि दीपक पाटील का राज चव्हाण की प्रेमिका राबिया के पास आनाजाना था, इसलिए यह आशंका जताई जाने लगी कि उन की हत्या में बदमाश राज चव्हाण का हाथ हो सकता है. ऐसे में पुलिस का राज चव्हाण से पूछताछ करना जरूरी था.

पुलिस को राज चव्हाण का मोबाइल नंबर मिल चुका था, जो सर्विलांस पर लगा दिया था. पुलिस को उस के मोबाइल की लोकेशन सूरत की मिली. क्राइम ब्रांच की टीम तुरंत सूरत के लिए रवाना हो गई. चूंकि राज अपना फोन अजीज को बेच चुका था, इसलिए पुलिस ने अजीज को हिरासत में ले लिया. उस ने बताया कि राज और राबिया सूरत से जा चुके हैं.

राज कोई दूसरा फोन प्रयोग करने लगा था. उस से उस ने 1-2 बार अजीज को भी फोन किया था. पुलिस ने उस के दूसरे नंबर की जांच की. वह नंबर उस समय बंद आ रहा था, जिस से उस की लोकेशन नहीं मिल रही थी.

जब अजीज पुलिस हिरासत में था, उसी दौरान उसे राज चव्हाण ने फोन किया. अजीज ने मोबाइल का स्पीकर औन कर के पुलिस के सामने ही उस से बात की. बातचीत के दौरान राज ने अजीज को बताया कि वह इस समय राबिया के साथ वाशीम जिले के कारंजा गांव में रह रहा है.

यह जानकारी मिलने पर क्राइम ब्रांच की टीम 16 मई, 2018 को कारंजा के लिए रवाना हो गई. पुलिस ने कारंजा से लगभग 10 किलोमीटर दूर एक झुग्गी बस्ती में रह रहे राज और राबिया को हिरासत में ले लिया.

दोनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने स्वीकार कर लिया कि प्रो. दीपक की हत्या विजय डेढे के साथ मिल कर की थी. क्राइम ब्रांच ने यह जानकारी अपने अधिकारियों को दी तो अमलनेर पुलिस ने विजय डेढे को भी गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने राबिया, उस के प्रेमी राज चव्हाण और विजय डेढे से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. कथा लिखने तक आरोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी. मामले की जांच थाना अमलनेर के प्रभारी अनिल बड़गूजर कर रहे हैं.

शशि थरूर ने दिया ‘कारवां’ की खबर का हवाला

कांग्रेस सांसद शशि थरूर की एक टिप्पणी पर भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर कांग्रेस पर टूट पड़ी है. थरूर अपनी टिप्पणी से विवादों में घिर गए हैं. बेंगलुरू लिटरेचर फेस्टिवल में संघ के एक नेता का हवाला दे कर उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना शिवलिंग पर बैठे बिच्छू से कर दी थी. उन्होंने कहा था आरएसएस के एक अनाम सूत्र ने एक पत्रकार से बातचीत में बेहद विचित्र तुलना की थी. कहा था कि मोदी शिवलिंग पर बैठे बिच्छू जैसे हैं, जिसे आप न हाथ से  हटा सकते हैं और न ही चप्पल से मार सकते हैं.

शशि थरूर ने अपने बयान में संघ के एक अनाम सूत्र द्वारा एक पत्रकार के समक्ष की गई टिप्पणी का जिक्र किया है. विवाद बढ़ने पर उन्होंने उस लेख का लिंक भी ट्वीटर पर शेयर किया. हालांकि विवाद बढ़ने पर उन्होंने कहा कि यह टिप्पणी 6 साल से पब्लिक डोमेन में है.

मालूम हो कि शशि थरूर ने जिस लेख का हवाला दिया है वह दिल्ली प्रेस की कारवां पत्रिका में मार्च, 2012 में ‘द एंपरर अनक्राउंड’ नाम से पत्रिका की वेबसाइट पर छपा था.

लंबे लेख के आखिरी पैराग्राफ में लिखा है, मेरे गुजरात छोड़ने से पहले आरएसएस के एक नेता ने कटुता के साथ कहा, शिवलिंग में बिच्छू बैठा है. ना उस को हाथ से उतार सकते हो, ना उस को जूता मार सकते हो.

थरूर की टिप्पणी पर आपत्ति जताते हुए भाजपा ने कांग्रस अध्यक्ष राहुल गांधी से माफी मांगने को कहा है. पार्टी के नेता और केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद सिंह ने कहा कि राहुल गांधी खुद को शिव भक्त कहते हैं और उन के नेता शिवलिंग पर चप्पल फेंकने की बात कहते हैं. क्या यह भगवान शिव का अपमान नहीं है?

रविशंकर प्रसाद ने चेतावनी भी दी कि हिंदू देवीदेवताओं का ऐसा अपमान यह देश सहन नहीं करेगा. उन्होंने सोनिया गांधी और राहुल गांधी से पूछा है कि क्या वह शिवलिंग पर चप्पल फेंकने वाले थरूर के बयान का समर्थन करते हैं.

एक और केंद्रीय मंत्री गिरीराज सिंह ने कहा कि अगर पाकिस्तान होता तो शशि थरूर की जुबान को चुप कर दिया गया होता. उन्होंने प्रधानमंत्री का अपमान नहीं किया, करोड़ों हिंदुओं और भगवान शिव को अपमानित किया है.

पिछले कुछ समय से भाजपा नेता बातबात पर देवीदेवताओं पर अपमान को ले कर आवाज उठाने लगते हैं. 4-5 सालों से नेताओं द्वारा आपस में की गई टीकाटिप्पणियों, मानहानि, भावनाओं को ठेस के आरोपों के मामले अदालतों में बड़ी तादाद में पहुंचे हैं.

नेताओं पर परस्पर टिप्पणियों से पार्टियां आमनेसामने आ जाती है. राजनीतिक पार्टियों में जरा भी सहनशक्ति दिखाई नहीं देती. वह हर बयान, टिप्पणी को राजनीतिक नफानुकसान से तोलती है. बातबात पर देवीदेवताओं के अपमान, धार्मिक भावनाओं को ठेस की बात को बीच में ले आती है. खासतौर से संघभाजपा के नेताओं की भावना बहुत जल्दी आहत होती है.

यह स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा ही है और लोकतंत्र का मूल आधार है. लोकतंत्र में जनता के मौलिक अधिकारों की बहुत अहमियत है लेकिन राजनीति में असहमति घटती जा रही है और आपसी टकराव बढ़ रहे हैं. यह देश, समाज के लिए अच्छे संकेत नहीं है.

कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं चाहती उस के नेता और उस के कामकाज पर सवाल खड़े हो. विपक्ष के विचारों और प्रतिकूल टिप्पणियों या किसी नेता के खिलाफ बयानों का स्वागत करना तथा बदलाव के लिए तत्पर रहना किसी भी देश की जनता के सुखशांति एवं प्रगति के लिए आवश्यक है.

सरकार और राजनीतिक पार्टिंयां कभीकभी सामाजिक अधिकारों की बात करने वाले लोगों या सत्ता के विरुद्घ आवाज उठाने वाले लोगों को इस का हवाला दे कर उन पर कठोर कारवाई पर उतारू दिखती है.

तानाशाही प्रवृत्तियां हमेशा विरोधी आवाज को दबाने के प्रयास करती आई हैं. राजशाही और तानाशाही शासनों में विरोधियों की आवाजों को हमेशा कुचला गया. लोकतंत्र ने अभिव्यक्ति की यह आजादी प्रदान की है.

पर स्वतंत्रता का अर्थ यह भी नहीं है कि कुछ भी बोल कर या लिख कर उस का दुरुपयोग किया जाए. उसे कानून द्वारा परिभाषित दायरे में रह कर बोलता पड़ता है. उल्लंघन किए जाने पर दंडित किए जाने का प्रावधान भी है.

समाज के समग्र विकास के लिए अभिव्यक्ति की आजादी उतनी ही जरूरी है जितना जीने का अधिकार है. तभी सही मायने में देश विकास की राह में आगे बढ़ेगा.

जहां से चले थे (अंतिम भाग)

पूर्व कथा मां की मौत के बाद संध्या अकेली रह जाती है. बेमन से आफिस जाती है. वहां उस का मन नहीं लगता तो घर वापस आ महरी को डांटने लगती है. महरी उसे चाय बना कर देती है और वह बचपन की यादों में खो जाती है.

संध्या अपने मातापिता की इकलौती संतान थी. बेटी होने के बावजूद बेटे की तरह पाला था उन्होंने उसे. उस के दबंग और अक्खड़ स्वभाव के कारण स्कूलकालिज में लड़के उस से बात तक नहीं करते थे. एम.बी.ए. करने के बाद संध्या के लिए अच्छे घर के रिश्ते आने लगे थे. वह मीनमेख निकाल कर इनकार कर देती लेकिन पिता की जिद के आगे झुक कर ‘हां’ करनी पड़ी. शादी के दिन उस ने अपने पापा के गिड़गिड़ाने की आवाज सुनी तो गुस्से में आ कर शादी से इनकार कर दिया. इस हादसे से दुखी उस के पापा की मौत हो गई लेकिन मरने से पहले संध्या को शादी के दिन का सच बता गए. मां भी उस के दबंग स्वभाव की वजह से चुप रह गई थीं. मातापिता की मौत के बाद संध्या का झूठा दंभ टूट जाता है और उसे अपना भविष्य अंधकारमय लगने लगता है.

और अब आगे…  संध्या की मां को गुजरे 4-5 दिन हो चुके थे पर वह आज भी अतीत में विचरण कर रही थी. 15 अगस्त वाले दिन सुबहसुबह मेरी अंतरंग सहेली वंदना मिलने आ गई. मैं उसे देखते ही उछल पड़ी और बोली, ‘अब आई है तुझे मेरी याद.

मां की अंतिम यात्रा में शामिल हो कर तू ने समझा सारे फर्ज निभा दिए.’  नाराज होते हुए वह बोली, ‘मिलूं कैसे, आफिस में तेरा फोन हमेशा व्यस्त रहता है और घर तू देर से पहुंचती है.’ ‘अच्छा, अब बातें न बना,’ यह कह कर उस का हाथ पकड़ उसे बिठाते हुए मैं बोली, ‘बता, क्या लेगी?’ ‘कुछ भी बना ले,’ वंदना बोली, ‘तेरी बड़ी याद आ रही थी, सो सोचा कि तू आज के दिन तो घर पर ही मिलेगी,’ और इसी के साथ वंदना पांव पसार कर बैठ गई.

जब तक मैं चायनाश्ता तैयार कर के लाई वंदना ने मेज पर ढेर सारे पत्र और फोटो बिछा दिए. ‘यह सब क्या है,’ मैंने मेज के एक कोने पर टे्र रखते हुए पूछा. ‘बस, क्या बताऊं संध्या, आंटी ने मरने से कुछ ही दिन पहले मुझे बुलाया और तेरे लिए पुन: घर वर खोजने को कहा था, शायद उन से तेरी बात हुई होगी. यह उसी विज्ञापन के पत्र हैं.’ ‘बात तो हुई थी, मैं ने तो वैसे ही उन का मन रखने के लिए कह दिया था पर मुझे क्या पता था कि मां सचमुच मेरे विवाह के लिए इतनी सीरियस हैं. शायद उन्हें अपने जाने का एहसास हो गया था,’ कह कर मैं बिलखने लगी.

‘संध्या, जमाना अभी भी वहीं है और समाज आज भी पुरुषों का ही है, वश उन का ही चलता है. तुम नए सिरे से मनुस्मृति लिखने की कोशिश मत करो. रहना तुम्हें भी इसी समाज में है. तुम चाहे कितनी भी ऊंचाइयां छू लो, रहोगी तुम औरत ही. स्त्रियोचित मर्यादा, गुण, स्वभाव, शर्म तुम्हें भी अपनाने होंगे,’ कह कर वंदना चुप हो गई. मैं इस बहस को ज्यादा तूल नहीं देना चाहती थी और उत्सुकतावश एकएक कर के पत्र और फोटो देखने लगी.

‘बस, यही सब रह गए हैं अब मेरे लिए,’ मैं कुछ लोगों का विवरण पढ़ते हुए बोली, ‘कोई विधुर 2 बच्चों का बाप है तो कोई तलाकशुदा. किसी का बच्चा विदेश में है तो कोई विकलांग. एकदो को छोड़ कर बाकी मुझ से आधी तनख्वाह भी नहीं पाते.’ ‘मैडम, अब तुम्हारे लिए कोई 20-22 वर्ष का नौजवान तो मिलेगा नहीं. मिलेगा तो आदमी ही. तुम्हारी उम्र 45 के आसपास है, बालों में भी सफेद चांदी के तार चमकने लगे हैं. अब इस उम्र में कोई अपनी वंशवृद्धि के लिए तो विवाह करेगा नहीं और न ही तुम सक्षम हो, और कोई इस उम्र तक तुम्हारे लिए भी नहीं बैठा होगा.

अब तो वही मिलेगा जो उम्र के इस पड़ाव में साथ चाहता होगा.’ ‘तेरा मतलब है मैं उस की केयर टेकर बन कर उस का साथ दूं,’ यह कह कर मैं ने वंदना की ओर देखा और बोली, ‘इस से तो शादी न करना ही अच्छा है,’ मुझ से अपने व्यक्तित्व का अपमान बरदाश्त नहीं हुआ.  वंदना मेरी तरफ देख कर बोली, ‘तब भी तुम में यही गरूर था जो आज है. आज तो फिर भी तुम्हारे पास 10-12 रिश्ते हैं, और देर करोगी तो 60-62 साल का वृद्ध ही मिलेगा, वह भी पेंशन होल्डर. जवानी का सारा सुख तो तुम ने दांव पर लगा दिया. मातृत्व सुख क्या होता है तुम्हें एहसास ही नहीं.

जिम्मेदारियों से मुक्त होना चाहती थीं न…अब कोई जिम्मेदारी नहीं मिलेगी, सिवा इस के कि उस का हाथ पकड़ कर तुम सड़क पार कराओगी,’ चाय खत्म करते हुए वंदना ने कहना जारी रखा. ‘शायद इसीलिए पुराने लोग जल्द से जल्द बच्चों की शादी कर दिया करते थे. लड़की आसानी से उस परिवार में ढल जाती थी. एकदूसरे के साथ रहतेरहते, प्रेम, तकरार, संवेदनाओं और भावनाओं का एहसास होता रहता था. एक बार फिर से सोच लो तुम. यह जो कुछ तू ने कमा कर जोड़ा है न उस का सुख तब दूसरे ही भोगेंगे…पर इतना याद रखना, इस तपते रेगिस्तान में चलना तुम्हें अकेले ही पड़ेगा.’ बात कड़वी थी पर थी सच. मुझे वंदना की सरल भाषा में कही गई बातों ने सोचने पर मजबूर कर दिया. मैं अपने अंधेरे भविष्य को देख कर एकदम घबरा गई.

‘अच्छा, अब मैं चलती हूं. घर पर बच्चे इंतजार कर रहे होंगे. बस, इतना बता दो कि तुम शादी करना चाहती हो या नहीं, ताकि मैं इस बारे में आगे सोच सकूं. आंटी मुझे यह काम सौंप गई थीं, इसलिए मैं तुम्हें समझाने चली आई.’ मां की इच्छा और वंदना के तर्क के आगे मैं एकदम बौनी पड़ गई और मैं ने उस की बात मान ली. जातेजाते वंदना बोल गई, ‘देखो, तुम दिन भर बैठ कर फिर से सारे पत्र पढ़ लो. समझ में आता है तो ठीक, नहीं तो नया विज्ञापन दे देती हूं.

मैं शाम को आती हूं, फिर पता नहीं तुम्हें कब फुरसत मिले.’  शाम को वंदना के आने से पहले मैं ने सारे पत्र पढ़े. जैसा वर मुझे चाहिए था, उन में वैसा कोई न मिला. मैं विरोधाभास के समुद्र में तैरती रही. मांपापा की इच्छा का ध्यान रखते हुए मैं ने 2-3 बायोडाटा अलग रख लिए. ठीक 6 बजे वंदना आ गई. अपने साथ आए एक व्यक्ति का परिचय करवाते हुए बोली, ‘यह विजय शर्मा हैं, यह मेरे परिचित भी हैं और मैरिज काउंसलर भी. मैं ने सोचा इन्हें साथ लेती चलूं ताकि तुम्हारे मन में कोई शंका हो तो निवारण कर लोगी.’ उन के लिए झट से शरबत बना कर मैं वहीं पास ही में बैठ गई. ‘संध्या, मैं ने इन को तुम्हारे बारे में सबकुछ बता दिया है, अब तुम बिना झिझक इन से बात कर सकती हो,’ वंदना मुझे देखते हुए बोली, ‘उन में से कोई तुम्हें पसंद आया क्या?’ मैं ने अपने चुने हुए पेपर उन के सामने रख दिए. विजयजी ने पेपर्स देखते हुए पूछा, ‘मैम, क्या आप साफसाफ बता सकती हैं कि इस उम्र में शादी क्यों करना चाहती हैं?’ ‘यह कैसा बेहूदा सवाल है?’ मैं ने चिढ़ कर कहा.

मेरी आवाज में रोष स्पष्ट था. ‘यही तो अहम प्रश्न है, संध्या,’ उन की अनुभवी नजरों ने मुझे चीर कर रख दिया. ‘शायद इसलिए कि मां चाहती थीं या शायद समाज मुझे भेद भरी नजरों से न देखे इसलिए या शायद मुझे सहारे की जरूरत हो,’ मैं ने अपनेआप से प्रश्न किया. मैं मन ही मन उचित शब्दों को तलाशती रही फिर बोली, ‘मुझे लगता है मैं बहुत अकेली जी ली, अब कदम जिस उम्र की ओर बढ़ रहे हैं शायद मैं अकेली न चल सकूं,’ मैं ने 1-1 अक्षर पर जोर दे कर कहा. ‘तो वह व्यक्ति भी आप के स्टेटस का होना चाहिए?’ प्रश्न जितना सरल था समाधान उतना ही कठिन. मैं ने वंदना की तरफ देख कर कहा, ‘मुझे लगता है यह अब संभव नहीं हो पाएगा.

उम्र, जाति, बंधन, स्टेटस, धन, ऐश्वर्य की अब मुझे कोई चाहत नहीं है. व्यक्ति कैसा भी हो बस, मेरी भावनाओं को समझने वाला और सहारा देने वाला होना चाहिए. एक बार मैं ने शादी की उम्र में शादी क्या तोड़ दी, मुझे ग्रहण लग गया है. कभी पापा का सहारा तो कभी मां की गोद और एकएक कर के सभी संबंध टूटते चले गए. आज मैं बिलकुल अकेली खड़ी हूं,’ कह कर मैं सुबकने लगी. मेरा सारा दुख आंखों के रास्ते बाहर निकल गया. हमारे बीच एक गहरी चुप्पी छा गई. ‘संध्या,’ वंदना ने मेरे पास आ कर मेरे गाल थपथपाए और कहने लगी, ‘विजय वही व्यक्ति हैं जिस की शादी बरसों पहले तुम से हो रही थी. तुम्हारे झूठे लांछन की वजह से न इन की शादी हो पाई और न ही तुम ने की.

मैं ने तुम से झूठ बोला कि यह मेरे जानने वाले हैं. विज्ञापन के उत्तर में इन का भी एक पत्र आया था, जो मैं ने संभाल कर रख लिया था. तुम से सबकुछ सुनने के बाद ही मैं ने इन से तुम्हारे बारे में बात की है. इन के मन में अब भी तुम्हारे प्रति रोष था किंतु मैं ने इन्हें सबकुछ बता दिया है. बाकी तुम दोनों बात कर लो.’ यह सुनते ही मेरी सांसें ठहर गईं. जैसे मैं सब के सामने निर्वसन हो गई हूं. मेरी जबान ने अब मेरा साथ छोड़ दिया. मैं बेहद परेशान हो गई थी.

अपने पर काबू पाने में मुझे कुछ समय लगा, फिर मैं बोली, ‘मुझ में अब इतनी हिम्मत नहीं है कि इन से नजर भी मिला सकूं. पहले ही मैं ने इन का जीवन बरबाद कर दिया. मुझे जब तक इन के बारे में पता चला, बहुत देर ही चुकी थी. यदि यह मुझे स्वीकार कर लें तो इन का मुझ पर बड़ा एहसान होगा. मैं वादा करती हूं कि ताउम्र इन की दासी बन कर इन की सेवा करूंगी. बस, यह सिर्फ एक बार मुझे माफ कर दें.’ ‘क्या तुम मेरे लिए नौकरी छोड़ सकती हो?’ विजयजी ने पूछा.

‘हां, आप की खुशी के लिए मैं अभी इस्तीफा भेज सकती हूं. बस, मुझे एक बार प्रायश्चित का अवसर दीजिए,’ कह कर मैं रोने लगी. मेरा कंठ एकदम अवरुद्ध हो गया और मैं उन के पैरों पर गिर पड़ी.  विजय ने मुझे उठा कर अपने सीने से लगा लिया और बोले, ‘मैं तुम्हें न तो नौकरी छोड़ने के लिए कहूंगा और न ही कुछ ऐसा कहूंगा जो तुम्हारी इच्छाओं के विरुद्ध हो. बस, पिछली बातों को ले कर मन में कोई अवसाद न रखना,’ मैं उन की ओर न देखने का बहाना करते भी चोरीचोरी उन्हें देखने लगी. पता नहीं कैसे मुझ में से 18 साल की किशोरी संध्या निकल कर बाहर आ गई और पुन: उन के सीने से जा लगी. मुझे अपने चारों ओर बांहों के घेरे का एहसास हुआ तो मैं वापस वहीं पर पहुंच गई जहां से चली थी. कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी मुझे.

राफेल पर रार: बिखरी हुई है भारत की रक्षा तैयारी

राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के इर्दगिर्द हो रहे विवाद के पीछे एक कड़वा तथ्य यह है कि भारत की रक्षा तैयारी देश की दूसरी तैयारियों की तरह बुरी तरह लचर व बिखरी हुई है. हमारी सेना हो, प्रशासन हो, शिक्षा हो, स्वास्थ्य सेवाएं हों, सभी हमारे किसी भी शहर की तरह हैं जहां कुछ इलाके ढंग से बने हैं, साफ हैं, व्यवस्थित हैं जबकि शेष शहर में पैचवर्क है, कहीं का रोड़ा कहीं का ठीकरा जमा कर बनाए गए आढ़ेतिरछे, गंदे, बदबूदार मकान हैं.

जहां पिछली सरकार 130 राफेल विमानों की बातचीत कर रही थी, वहीं नरेंद्र मोदी सरकार केवल 36 पर ही अटक गई और वे भी कब आएंगे, पता नहीं. इतने बड़े देश के लिए 36 नए विमान नाकाफी हैं क्योंकि पिछले मिग विमानों का बेड़ा लगभग समाप्त सा है और अब हमारे पास न तो अमेरिकी रक्षाकवच है, न रूसी यानी अगर किसी से युद्ध हो तो यही कहेंगे कि हम तो पहले जैसे हैं, आना है तो आओ और लूटपाट कर के ले जाओ.

राफेल विमान दुनिया के अकेले लड़ाकू विमान नहीं हैं और कितने ही देशों के पास दूसरे विमानों की बड़ी तादाद है. हर देश अपनी रक्षा के लिए अपने पड़ोसी से अच्छा विमान रखता है. चीन ने तो चेंगडू जे-10 बनाने शुरू कर दिए हैं. जे-20 हवाई जहाज भी हैं उस के पास. केवल 20 हजार कर्मचारियों वाली चीनी कंपनी दशकों से हवाई जहाज बना रही है. भारत की फ्रांस व दूसरे देशों पर रक्षा के लिए निर्भरता हमारी आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी कमजोरी ही दर्शाती है. यह हमारे नेताओं की बेवकूफी का नतीजा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उम्मीद थी कि उन के फैसलों से किसी तरह का विवाद खड़ा न होगा पर उन का यह फैसला गले की हड्डी बन गया है. यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. हो सकता है कि रक्षा के रहस्यों को जगजाहिर न होने देने के लिए सुप्रीम कोर्ट इसे रफादफा कर दे पर विपक्षी दलों को अगले 6 महीने तक यानी भावी आम चुनावों तक बोलने से कोई रोक नहीं सकता. एक ऐसी खरीद जिस पर देश को गर्व होना चाहिए था, एक काला धब्बा बन कर रह जाएगी. होना तो यह चाहिए था कि इस खरीद पर देश को गर्व होता कि न केवल लड़ाकू विमान आ रहे हैं, बल्कि उन के भारत में बनने का रास्ता भी साफ हो रहा है, पर असल में हमारा हाल यह है कि न केवल लड़ाकू विमान बल्कि हम से कुछ भी नहीं बन पा रहा चाहे साइकिल जैसी चीज हो या बड़े यात्री जहाज, सब बाहर से आ रहे हैं.

हम तो, बस, योग का निर्यात कर के गोबर का गुणगान करते फिर रहे हैं. सरकार ने एक तरह से ऊंची तकनीक वाले महंगे अरबोंखरबों वाले लड़ाकू विमानों की खरीद को मजाक बनवा डाला है. यह अब कुंभ के मेले की तरह बन गया है जहां हर कोई मैली गंगा को छू कर अपने को धन्य मानता है. देश की रक्षा को विदेशियों के हवाले करना अपनेआप में दयनीय व चिंतनीय है, ऊपर से उस में आरोपप्रत्यारोप लग रहे हैं तो इस से देश की बदनामी भी हो रही है.

इंटरनेट पर धूम मचा रहा आम्रपाली दुबे का यह वीडियो

भोजपुरी एक्ट्रेस आम्रपाली दुबे इंडस्ट्री की मशहूर अभिनेत्रियों में से एक हैं. आम्रपाली को यूट्यूब क्वीन भी कहा जाता है, क्योंकि उनका वीडियो यूट्यूब पर खूब देखा जाता है. इधर कुछ दिनों में आम्रपाली में काफी बदलाव देखने को मिला है. उन्होंने अपनी आगामी फिल्मों को लेकर अपना वजन काफी घटा लिया है. बता दें, आम्रपाली सोशल नेटवर्किंग साइट इंस्टाग्राम पर काफी एक्टिव रहती हैं और आए दिन अपने फैन्स को अपना अपडेट देती रहती हैं.

इन दिनों आम्रपाली दुबे काफी सुर्खियों में हैं. उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. आम्रपाली का यह वीडियो दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’ के साथ उनकी आगामी फिल्म  ‘निरहुआ हिंदुस्‍तानी 3’ के एक गाने ‘चिकन बिरियानी’ का है. ‘निरहुआ हिंदुस्‍तानी 3′ निरहुआ’ की सुपरहिट फिल्‍म ‘निरहुआ हिंदुस्‍तानी’ की तीसरी कड़ी के रूप में तैयार की गई है. एस.आर.के म्युजिक द्वारा यूट्यूब पर इसी महीने 20 अक्टूबर को अपलोड किए गए इस वीडियो को अब तक 1,751,311 बार देखा जा चुका है.


‘चिकन बिरियानी चंपा की जवानी’ टाइटल से रिलीज किया गया यह गाना यूट्यूब पर आते ही सुपरहिट हो गया है. इस गाने को गायिका कल्‍पना ने आवाज दी हैं और गाने में हिंदी और मराठी दोनों ही भाषाएं सुनाई दे रही हैं. इससे पहले फिल्म ‘निरहुआ हिंदुस्तानी 3’ का ट्रेलर भी रिलीज होने के बाद इंटरनेट पर सुपरहिट हुआ. फिल्म की कहानी एक गांव के लड़के की है जो रोजगार की तलाश में मुंबई शहर में जाता है और वहां उसे एक लड़की से प्यार हो जाता है. इसके बाद शुरू होता है रोमांस, ड्रामा, कौमेडी और एक्शन. ट्रेलर में निरहुआ जबरदस्‍त एक्‍शन करते नजर आ रहे हैं. आप भी देखें फिल्‍म का यह ट्रेलर.

न खाना न सेहत न छत: हल्ला सूचियों का

विश्व बैंक का कहना है कि फ्रांस को पीछे छोड़ कर भारत अब विश्व की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है. आंकड़ों में दावा किया गया है कि 2017 के अंत में भारत का सकल घरेलू उत्पाद फ्रांस के 2.582 ट्रिलियन डौलर की तुलना में 2.597 ट्रिलियन डौलर पहुंच गया था. भारत से ऊपर अमेरिका, चीन, जापान, जरमनी और ब्रिटेन हैं. अमेरिका का सकल घरेलू उत्पाद 19.390, चीन का 12.237, जापान का 4.872, जर्मनी का 3.677 ट्रिलियन डौलर है. 8वें स्थान पर ब्राजील, 9वें पर इटली और फिर कनाडा है. इस से पहले ईज औफ डूइंग यानी कारोबार करने की सहूलियत के मामले में भारत की रैंकिंग में सुधार हुआ बताया गया. इस सूची में भारत 190 देशों में 100वें स्थान पर आ गया.

विश्व बैंक ने भारत को कारोबार करने के माहौल में सुधार करने वाले शीर्ष 10 देशों में रखा है. जनवरी में भारत को उभरती हुई अर्थव्यवस्था में 62वें स्थान पर बताया गया था. वर्ल्ड इकोनौमिक फोरम की रिपोर्ट के अनुसार, भारत तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था वाला देश है. समावेशी विकास सूचकांक पर उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में चीन, पाकिस्तान, नेपाल, बंगलादेश, श्रीलंका को भारत से आगे दिखाया गया है. नेपाल 22वें, चीन 26वें, बंगलादेश 34वें, श्रीलंका 40वें और पाकिस्तान 47वें स्थान पर हैं.

फोरम कुछ मानकों के आधार पर यह रिपोर्ट जारी करता है. मानकों में देश के लोगों के रहने का तरीका, पर्यावरण में ठहराव और भविष्य में पीढि़यों के आगे कर्ज से संरक्षण जैसी बातें शामिल होती हैं. ट्रांसपैरेंसी इंटरनैशनल की रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक भ्रष्टाचार सूचकांक में 180 देशों में भारत 81वें नंबर पर शोभायमान है. पहले स्थान पर न्यूजीलैंड, दूसरे पर डेनमार्क और तीसरे पर स्वीडन है. वैश्विक लिंग गैप रिपोर्ट 2017-18 में 108 देशों की सूची में भारत 144वें स्थान पर है. वर्ल्ड इकोनौमिक फोरम की इस रिपोर्ट में नार्वे पहले, फिनलैंड दूसरे और रवांडा तीसरे स्थान पर है. वैश्विक आतंकवाद सूचकांक में 163 देशों की सूची में भारत 8वें नंबर पर है. एक नंबर पर इराक, दूसरे पर अफगानिस्तान और तीसरे पर नाइजीरिया है. वैश्विक युवा विकास सूचकांक में 183 देशों में हम 133वें नंबर पर हैं. एक नंबर पर जरमनी, दूसरे पर डेनमार्क और तीसरे पर आस्टे्रलिया है.

ग्लोबल पीस इंडैक्स 2018 में 163 देशों की सूची में भारत 137वें स्थान पर है. सीरिया सब से आखिर में है. ग्लोबल डैमोक्रेसी इंडैक्स में भारत 42वें स्थान पर है. मानव विकास सूचकांक में भारत 140 देशों में 131वें स्थान पर है. प्रथम स्थान पर नार्वे, दूसरे पर आस्टे्रलिया, तीसरे पर स्विट्जरलैंड को दर्शाया गया है. स्वास्थ्य की देखभाल के मामले में 195 देशों की सूची में 145वें स्थान पर भारत, पाकिस्तान 154, बंगलादेश 132, अफगानिस्तान 191, श्रीलंका 71, नेपाल 149 और भूटान 134वें स्थान पर है. स्विट्जरलैंड पहले, स्वीडन दूसरे, नार्वे तीसरे स्थान पर शीर्ष पर हैं. प्रैस फ्रीडम इंडैक्स में 180 देशों की सूची में हमारा 138वां स्थान है. पाकिस्तान 139वें और बंगलादेश 146वें स्थान पर है. वर्ल्ड हैप्पीनैस सूचकांक 2018 की 156 देशों की सूची में भारत को 133वें नंबर पर दिखाया गया है. एक नंबर पर फिनलैंड, दूसरे पर नार्वे जबकि तीसरे पर डेनमार्क है. इन में कुछ तथाकथित उपलब्धियों वाली सूचियों पर सत्ताधारी दल द्वारा तालियां पीटी जा रही हैं पर भारत में अभी भी करोड़ों लोग भुखमरी के शिकार हैं. करोड़ों लोग छत से वंचित हैं. प्रतिवर्ष बदतर होती स्वास्थ्य व्यवस्था के चलते लाखों लोग मौत के मुंह में समा रहे हैं.

अर्थव्यवस्था में छठे स्थान पर आने से खुश होने वालों को यह नहीं दिखता कि भारत की आबादी 134 करोड़ के लगभग है जबकि फ्रांस की केवल 6.7 करोड़ ही है. चीन दूसरे नंबर पर क्यों है? आबादी ज्यादा है तो क्या सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि नहीं होनी चाहिए? अधिक आबादी क्या संसाधन का अधिक होना नहीं है? इसी आबादी यानी श्रमशक्ति के बूते चीन अपने उद्योगों व उत्पादन का विस्तार करते हुए उपभोक्ता वस्तुओं के मामले में वैश्विक बाजार में सब से बड़े उत्पादक और निर्यातक देशों में शुमार हो सका है. भारत फ्रांस जैसे देशों से प्रतिव्यक्ति आय (लगभग 7.060 हजार डौलर) के मामले में भी बहुत पीछे है. चीन की आबादी भारत से ज्यादा है, फिर भी उस की प्रतिव्यक्ति आय 16.760 डौलर है.

तुलनात्मक रूप से विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्था अमेरिका की प्रतिव्यक्ति आय 60.200 डौलर है. बदहाली की रिपोर्टें भी समयसमय पर आती रहती हैं. सितंबर 2017 में विश्व बैंक ने घटिया शिक्षा देने वाले देशों की सूची जारी की थी. बदतर शिक्षा देने वाले देशों में भारत दूसरे स्थान पर विराजमान है. पहले स्थान पर मलाया है. यह सूची इस आधार पर तैयार की गई कि जहां दूसरी कक्षा के बच्चे एक छोटे से अध्याय का एक शब्द तक नहीं पढ़ सकते. विश्व बैंक दुनिया के 12 देशों की सूची जारी करता है जहां की शिक्षा व्यवस्था सब से बदतर है.

विश्व बैंक की वर्ल्ड डैवलपमैंट रिपोर्ट 2018 ‘लर्निंग टू रियलाइज एजुकेशन प्रौमिस’ में कहा गया है कि ग्रामीण भारत में कक्षा 3 के छात्र मामूली सवाल भी हल नहीं कर सकते. रिपोर्ट में कहा गया है कि बिना ज्ञान की शिक्षा से गरीबी को मिटाने और समाज में समृद्धि लाने के सपने को पूरा नहीं किया जा सकता. ज्ञान का यह संकट सामाजिक खाईर् को और बढ़ा रहा है. अगर लोगों को अच्छी शिक्षा दी जाती है तो वे बेहतर नौकरी, आय और स्वास्थ्य लाभ हासिल करते हैं वरना गरीबी में जीवनयापन करते हैं. ईज औफ डूइंग में भारत की रैंक सुधरी है, ऐसा कहा जा रहा है. सवाल है कि कारोबार करने में सुगमता आईर् है तो विदेशी पूंजी निवेश घट क्यों रहा है? रिपोर्ट बताती है कि देश में पिछले कुछ समय से एफडीआई में कमी आई है.

इसी तरह एक सूची में भारत की फैली भुखमरी की पोल खुलती है. 2017 में जारी अंतर्राष्ट्रीय भुखमरी सूचकांक में भारत 119 देशों की सूची में 100वें नंबर पर था. उस से पिछले साल भारत 97वें स्थान पर रहा यानी 3 नंबर और ऊपर चला गया. अर्जेंटीना पहले, बेलारूस दूसरे, बोस्निया और हर्जेगोविना तीसरे स्थान पर हैं. सरकारें केवल आंकड़ों के सहारे विकास दिखाना चाहती हैं जबकि हकीकत में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, बिजली, पीने का पानी जैसे बुनियादी मामलों में देश की हालत बदतर है. आज भी देश में कितने ही देशवासी भूखे पेट सोने को मजबूर हैं, कितने ही इलाज की सुविधा मुहैया न होने के चलते मर जाते हैं और कितने ही छत न होने की वजह से खुले आसमान के नीचे जिंदगी गुजार रहे हैं.

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