

जुलाई 2018 के दूसरे पखवाड़े की शुरुआत में राजस्थान में वसुंधरा राजे सरकार ने 2 दिनों तक राज्य में इंटरनैट सेवाएं 20 घंटे तक बंद रखीं. चालू वर्ष के शुरुआती 7 महीने में ही राजस्थान में इंटरनैट पर यह पाबंदी 9वीं बार लगाई गई थी. राज्य में ऐसा पहली बार हुआ जब सिर्फ किसी परीक्षा के लिए पूरे प्रदेश में साइबर कर्फ्यू लगा दिया गया. राजस्थान में पुलिस कौंस्टेबल भरती की 4 घंटे की लिखित परीक्षा का आयोजन था, जिस में नकल की रोकथाम के लिए पूरे प्रदेश में इटरनैट इमरजैंसी लगा दी गई.
डिजिटल इंडिया के गूंजते नारे के बीच राजस्थान सरकार ने ऐसा कारनामा कर दिखाया जिस के कारण 20 घंटे इंटरनैट नहीं चलने से 15 हजार से ज्यादा रेल टिकटों की औनलाइन बुकिंग नहीं हुई, 4,500 से ज्यादा ई चालान नहीं हुए, बिजली कंपनियों में 10 लाख रुपए की औनलाइन बिलिंग नहीं हुई और 30 करोड़ रुपए के मोबाइल ट्रांजैक्शंस प्रभावित हुए. सब से गंभीर बात यह रही कि इंटरनैट के रूप में आम जनता को जो ताकत मिली है, वह ताकत एक आदेश से एक झटके में निलंबित हो गई. जीएसटी के ई वे बिल नहीं निकले. जिस फाइलिंग को देर से करने पर फाइन लगता है, वह इस दौरान चालू रहा.
राजस्थान में नैटबंदी जारी थी तो केंद्र सरकार दूसरे झमेलों को ले कर चिंतित थी. उस की चिंता के केंद्र में आम लोगों की सोशल मीडिया पर की जाने वाली और उसे चुभने वाली टीकाटिप्पणियां थीं. साथ में सीमापार से आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली हरकतों में इंटरनैट के इस्तेमाल ने उस की चिंता बढ़ा रखी है.
केंद्र सरकार में गृह सचिव राजीव गाबा की अध्यक्षता में जून 2018 में हुई एक बैठक में यह भी खुलासा हुआ कि कश्मीर घाटी में गिरफ्तार किए गए जैशे मुहम्मद के आतंकी ने नैटबंदी के दौरान भी ऐसी सेवाओं के जारी रहने की जानकारी दी थी. उस के मुताबिक, वर्ष 2016 में नगरौटा में मिलिट्री कैंप पर हुए हमले के दौरान आतंकियों को सीमापार पाकिस्तानी कब्जे वाले इलाके से लगातार सिग्नल मिल रहे थे, जबकि उस दौरान भारतीय इलाके में इंटरनैट सेवाएं बंद कर दी गई थीं. इस से सुरक्षाबलों को कार्यवाही करने में काफी कठिनाई हुई, क्योंकि वे अपने शीर्ष अधिकारियों से संपर्क नहीं साध पाए, जबकि आतंकी अपने आकाओं से मिलने वाले संदेशों के बल पर बच निकलने में कामयाब रहे.
साफ है कि जिस मकसद से सरकार देश के विभिन्न इलाकों में साइबर कर्फ्यू लगाती रही है, उस में उसे बुरी तरह असफलता मिली है. ऐसे में सवाल है कि वह आखिर क्यों, कब और कैसे साइबर कर्फ्यू लगाती है और क्यों इस का कोई और विकल्प नहीं मिल पा रहा है?
कभी कश्मीर, कभी मेघालय
इंटरनैट पर अफवाहों के प्रसार को देखते हुए अगस्त 2017 में केंद्र सरकार ने टैलीग्राम एक्ट में एक अध्यादेश में संशोधन कर राज्य और केंद्र सरकार को यह हक प्रदान किया था कि किसी भी आपातस्थिति में जनता की सुरक्षा के लिए अस्थायी तौर पर इंटरनैट शटडाउन किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सरकार ने व्हाट्सऐप आदि इंटरनैट सेवा प्रदाताओं को अफवाहों के प्रसार में इंटरनैट के इस्तेमाल की रोकथाम के उपाय करने को कहा है. इस के लिए नैट पर परोसी जाने वाली सामग्री की छानबीन और जरूरी लगे, तो इंटरनैट सेवाएं ही निलंबित करने का विकल्प खुला हुआ है.
इस से पहले सरकारें, धारा 144 के तहत ही इंटरनैट शटडाउन को जायज ठहराती रही हैं. इसी कायदे के तहत जम्मूकश्मीर तो इंटरनैट बैन के मामले में तीर्थ ही बन गया है. वहां नैटबंदी के लिए सरकारप्रशासन को ज्यादा बहाने खोजने की जरूरत नहीं पड़ती, लेकिन देश के दूसरे हिस्सों में ऐसा हो, तो हैरानी होती है. अब तो ऐसी स्थितियां बन गई हैं कि कहीं भी हालात जरा से बेकाबू होते दिखाई देते हैं, वहां प्रशासन पहला काम नैटबंदी करने का ही करता है.
जैसे इस साल जून की शुरुआत में मेघालय की राजधानी शिलौंग में सिखों और स्थानीय खासी जनजाति के लोगों के बीच मामूली बात पर एक विवाद पैदा हुआ. इस से पहले कि वहां हालात सुधारने के लिए कर्फ्यू लगाया जाता, लेकिन स्थानीय सरकार व प्रशासन ने साइबर कर्फ्यू लगा दिया और दावा किया गया कि इस से हालात सुधर जाएंगे, सांप्रदायिक झगड़ेझंझट की नौबत नहीं आएगी, लेकिन असल में वहां हालात तभी संभले, जब वास्तविक कर्फ्यू लगाया गया.
दावा किया जा रहा है कि असली कर्फ्यू की तरह साइबर कर्फ्यू का उद्देश्य भी यही है कि किसी भी अशांत जगह पर अमनचैन लौटे और कानूनव्यवस्था कायम हो. लेकिन बीते कुछ बरसों से साइबर कर्फ्यू ज्यादा जोर पकड़ रहा है, बल्कि स्थिति यह बनी है कि असली कर्फ्यू लगे या नहीं, साइबर कर्फ्यू जरूर लगा दिया जाता है.
जब पढ़ाई, खरीदारी, बैंकिंग, रिजर्वेशन, औनलाइन खबरें पढ़ने, वीडियो फिल्में देखने से ले कर तमाम तरह का ज्ञान इंटरनैट के जरिए बांटा और हासिल किया जा रहा हो, ऐसी स्थिति में अगर साइबर कर्फ्यू लगा दिया जाए तो क्या हालत होती होगी. इस से शायद ही कोई अनजान हो कि इंटरनैट बैन कर दिया जाए तो किस तरह नैटसंचालित सारी चीजों का आवागमन रुक जाता है. लेकिन सरकार कहती है कि उसे जीवन रोक देने वाली इन चीजों से ज्यादा चिंता इस की है कि अफवाहें न फैलें, आतंकी अपने मंसूबों में सफल न होने पाएं.
वैसे हाल की घटनाओं पर नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि जम्मूकश्मीर के बाहर मेघालय में सिखों और स्थानीय खासी जनजाति के बीच टकराहट के मौके पर, हरियाणा में जाट आरक्षण के दौरान, गुजरात में पटेल आंदोलन के दौरान, राजस्थान, मध्य प्रदेश, झारखंड और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में अलगअलग मौकों पर इंटरनैट बैन किया गया. उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर और सहारनपुर में सांप्रदायिक तनाव के दिनों में इंटरनैट सेवाएं बाधित की गईं, तो वर्ष 2017 में जम्मूकश्मीर में आतंकी बुरहान बानी के एनकाउंटर के बाद लगातार 17 दिनों तक इंटरनैट सेवाएं बंद रखी गई थीं. कुछ ऐसा ही हाल 2017 में मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसानों पर हुई फायरिंग के बाद 3 जिलों में साइबर कर्फ्यू के रूप में हुआ और चौबीस परगना जिले में भड़काऊ फेसबुक पोस्ट के बाद पश्चिम बंगाल में इंटरनैट बंद रखने के रूप में दिखा.
सब से आगे होंगे हिंदुस्तानी
जून 2018 में यूनेस्को और इंटरनैशनल फैडरेशन औफ जर्नलिस्ट्स की ओर से जारी ‘साउथ एशिया प्रैस फ्रीडम रिपोर्ट 2017-18’ पर नजर दौड़ाने से पता चलता है कि मई 2017 से अप्रैल 2018 के बीच की अवधि में पूरे दक्षिण एशिया में इंटरनैट शटडाउन की जो 97 घटनाएं रिकौर्ड हुईं, उन में से 82 घटनाएं अकेले भारत में हुईं.
यहां तक पड़ोसी पाकिस्तान और अफगानिस्तान इस मामले में हम से बेहतर स्थिति में हैं, क्योंकि समान अवधि में पाकिस्तान में सिर्फ 12 बार इंटरनैट शटडाउन किया गया, जबकि अफगानिस्तान और श्रीलंका में मात्र एकएक घटना दर्ज की गई. अफगानिस्तान में तो कहा जा सकता है कि ज्यादा लोगों तक इंटरनैट की पहुंच नहीं है, लेकिन पाकिस्तान में ऐसा नहीं है. इसलिए भारत में इंटरनैट बैन का मामला थोड़ा पेचीदा लगता है. इसीलिए यहां सवाल पैदा होता है कि हमारी सरकार को इंटरनैट रोकना इतना जरूरी क्यों लगता है?
क्या बोले सरकार
सरकार से पूछें तो इस का जवाब यह है कि अकसर कानून व्यवस्था को खतरे की आशंका होने पर इंटरनैट शटडाउन के आदेश दिए जाते हैं. जिस समाज में चोटीकटवा का आतंक सोशल मीडिया पर सवार हो कर पूरे उत्तर भारत को महीनों तक परेशान कर सकता है, जिस देश में क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद और इसी किस्म की समाज को विभाजित करने वाली अफवाह फेसबुकव्हाट्सऐप के माध्यम से जंगल की आग की तरह फैलाई जा सकती है, वहां इंटरनैट शटडाउन सरकार का एक जरूरी उपाय लगता है. यह कई बार साबित हुआ है कि जो सूचनाएं या खबरें सोशल मीडिया पर फैलाई गईं उन के पीछे कुछ उपद्रवी तत्त्व थे और इन सूचनाओं के कारण सामाजिक सद्भाव खतरे में पड़ गया.
यही नहीं, बाद में यह साबित भी हुआ कि ऐसी ज्यादातर सूचनाएं फर्जी निकलीं और उन के पीछे शरारती तत्त्वों की भूमिका थी, लेकिन इस का दूसरा पहलू भी है. जैसा कि यूनेस्को की रिपार्ट बताती है कि सूचनाओं को बाधित करने वाले साइबर कर्फ्यू से एक तरफ लोगों का स्वतंत्र रूप से सूचना हासिल करने का अधिकार बाधित होता है, वहीं दूसरी तरफ मीडिया के लिए अपना काम करना कठिन हो जाता है. घरदफ्तर के अनगिनत काम साइबर कर्फ्यू से प्रभावित होते हैं, इस का अंदाजा तो आज की इंटरनैट पर निर्भर दुनिया को देख कर आसानी से लगाया ही जा सकता है.
पाबंदी से अरबों का नुकसान
इंटरनैट शटडाउन अब काफी ज्यादा आर्थिक नुकसान का सबब भी बन रहा है. यह नुकसान कितना है, इस का एक अनुमान हाल में इंडियन काउंसिल फौर रिसर्च औन इंटरनैशनल इकोनौमिक रिलेशंस (आईसीआईईआर) ने लगाया है. मई 2018 में जारी अपनी रिपोर्ट में आईसीआईईआर ने कहा कि पिछले
5 वर्षों में भारत में अलगअलग जगहों पर करीब 16 हजार घंटों के लिए इंटरनैट शटडाउन रखा गया, जिस से भारतीय अर्थव्यवस्था को मोटेतौर पर 3 अरब डौलर की चपत लगी. यह नुकसान इंटरनैट कंपनियों और सरकारी कामकाज में पैदा हुए व्यवधान का है, अगर इस में आम लोगों को हुई क्षति को जोड़ा जाए, तो यह मामला शायद कई सौ अरब डौलर की हानि का बनेगा.
यही नहीं, एक सिविल सोसायटी संगठन एक्सेस नाऊ ने शटडाउन ट्रैकर औप्टिमाइजेशन प्रोजैक्ट चला कर हासिल किए गए आंकड़ों के आधार पर दावा किया कि साल 2017 में भारत में इंटरनैट शटडाउन की 54 घटनाएं हुईं जो 30 देशों की लिस्ट में सब से ज्यादा हैं. सरकार की ओर से लगाई ऐसी बंदिशों का क्या औचित्य है और क्या ऐसी बातों की जरूरत सरकारी दायरों से बाहर नहीं है. ये सारे सवाल इस कोशिश के साथ ही उठते हैं और इन के हल भी खोजने की जरूरत बनती है.
उल्लेखनीय है कि दुनिया के अन्य विकसित और विकासशील देशों की तरह ही भारत में भी साइबरस्पेस का दायरा तेजी से बढ़ रहा है. आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में ही हमारे देश में वायरलैस दूरसंचार सुविधाओं (जिन में इंटरनैट का हिस्सा सब से ज्यादा है) का घनत्व 5 प्रतिशत से बढ़ कर 85 प्रतिशत हो गया और इंटरनैट की पहुंच 10 लाख से भी कम यूजर्स से बढ़ कर 40-45 करोड़ यूजर्स तक पहुंच गई है.
इस से साबित होता है कि इंटरनैट के जरिए हमारे काम करने और एकदूसरे से संपर्क व संवाद करने के तौरतरीकों में पिछले 10 सालों में भारी तबदीली आई है. आज बैंकिंग और वित्त ही नहीं, परिवहन, संचार, रक्षा और इंडस्ट्री के विभिन्न क्षेत्रों का कामकाज काफी हद तक साइबर दुनिया पर निर्भर है. सैटेलाइटों के जरिए सूचना और मनोरंजन के कार्यक्रमों के प्रसारण से ले कर देश की सुरक्षा जैसे अति महत्त्वपूर्ण कार्य भी इसी साइबर स्पेस पर आश्रित हैं.
दुरुपयोग का खतरा
इस निर्भरता का एक बड़ा पहलू यह है कि जितना यह सुगम है, उतना ही इस के पलक झपकते ही छिन्नभिन्न होने और इस के दुरुपयोग किए जाने का खतरा है. दुनिया में कहीं भी बैठे हैकर हमारी महत्त्वपूर्ण सूचनाएं चुरा सकते हैं, उन का गलत इस्तेमाल कर सकते हैं और हमारी बैकिंग, परिवहन, सैटेलाइट्स सेवाओं को बाधित करने के अलावा सरकारी व सैन्य सेवाओं पर आभासी कब्जा जमा सकते हैं. चूंकि ये सारे संदेह सही लगते हैं, ऐसे में इंटरनैट पर बैन की जो पहलें सरकार की तरफ से हो रही हैं. उन के अपने अर्थ बताए जाते हैं.
लेकिन इस के बावजूद इंटरनैट शटडाउन की अधिकता हमारी सरकार की कट्टरता पर भी सवाल उठाती है. पर इस से यह पता चलता है कि एक समाज के रूप में हम जागरूक नहीं हैं. हम न तो खबरों और अफवाहों में फर्क कर पाते हैं, न ही अफवाहों के खुद पर असर को नियंत्रित कर पाते हैं.
जिस दिन समाज यह अंतर करने में सफल हो जाएगा, इंटरनैट पर प्रतिबंधों की संख्या उतनी ही सीमित होती चली जाएगी. स्पष्ट है कि सरकार और समाज दोनों को इस मोरचे पर मिल कर काम करना पड़ेगा.
कभी न कभी हम सभी ने प्राणप्रतिष्ठा शब्द सुना ही है. नवनिर्मित मंदिरों में मूर्तियों की प्राणप्रतिष्ठा की जाती है. जानेमाने और प्रकांड पंडित राहुल शर्मा के अनुसार, किसी भी मंदिर में मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा से मतलब है कि मूर्ति को मंदिर में विशेष स्थान पर स्थापित करना. स्थापित करने से पहले विशिष्ट स्थान और मूर्ति दोनों को ही विभिन्न मंत्रोच्चारों द्वारा पवित्र किया जाता है.
धर्मग्रंथों में मानवजीवन के 16 संस्कार माने गए हैं और उन सभी संस्कारों का अपना विशिष्ट महत्त्व है. धार्मिक मान्यतानुसार, जिस तरह मनुष्य के लिए 16 संस्कारों का किया जाना जरूरी होता है उसी तरह पाषाण मूर्ति स्वरूप भगवान के 15 संस्कारों को विभिन्न धार्मिक मंत्रों द्वारा संपादित किया जाता है. 16वां मरण संस्कार भगवान का किया जाना धार्मिक ग्रंथों में मना है क्योंकि ईश्वर सर्वव्यापी और अजरअमर है.
किन मूर्तियों की होती है प्राणप्रतिष्ठा
जब किसी मंदिर में मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा की जाती है तो मूर्ति को गाजेबाजे के साथ शिल्पकार की दुकान से लाया जाता है. एक मंदिर के पुजारी का कहना है कि हर मूर्ति को प्राणप्रतिष्ठा की जरूरत नहीं होती. केवल 12 अंगुल से बड़ी मूर्तियों की ही प्राणप्रतिष्ठा की जाती है. घरों के मंदिरों में रखी जाने वाली मूर्तियों को प्राणप्रतिष्ठा की जरूरत नहीं होती. केवल अचल और स्थायी मूर्तियों की ही स्थापना की जाती है यानी एक बार किसी स्थान पर प्राणप्रतिष्ठा की गई मूर्तियों को उन के स्थान से हिलायाडुलाया नहीं जा सकता. आमतौर पर इस तरह की प्राणप्रतिष्ठा मंदिरों में ही की जाती है.
कैसे की जाती है प्राणप्रतिष्ठा
पंडित राहुल शर्र्मा के अनुसार प्राणप्रतिष्ठा का काम करने में 3 से 5 दिन लगते हैं और कम से कम 5 पंडित इस काम को करते हैं. किसी भी मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा करवाए जाने से पहले 84 कुंभ या घड़े भरे जाते हैं जिन में पंचगव्य, सप्तधान, औषधियां, पंचामृत, अक्षत जैसी कई वस्तुएं होती हैं. मूर्ति को स्नान करवाने के लिए हजार छेद वाला कलश लिया जाता है. दूध, दही, घी, पंचामृत आदि से मूर्ति को स्नान करवाने के बाद नए वस्त्र पहनाए जाते हैं. उस के बाद खुले वाहन पर बैठा कर मूर्ति को नगरभ्रमण करवाया जाता है.
जिस स्थान पर मूर्ति को स्थापित किया जाता है वहां पर जमीन में सोना, मुद्रा, अन्न आदि को रख कर मूर्ति के लिए पाट बनाया जाता है. जिस भगवान की प्राणप्रतिष्ठा की जाती है, विभिन्न मंत्रों के उच्चारण द्वारा उन का आह्वान किया जाता है ताकि वे उस मूर्ति में जीवंतस्वरूप में प्रविष्ट हो जाएं, पाषाण मूर्ति में जान डालने की न्याय प्रक्रिया कहा जाता है. मूर्ति के स्थापित हो जाने के बाद भगवान की आरती और पूजा की जाती है. प्राणप्रतिष्ठा के आयोजन को समारोहपूर्वक संपन्न कराने में शहर या गांव के नामीगिरामी लोगों के साथसाथ आम जनता को भी इकट्ठा किया जाता है.
प्राणप्रतिष्ठा का मतलब
सवाल है कि प्राणप्रतिष्ठा का आखिर मतलब क्या है? क्या किसी भी बेजान पाषाण प्रतिमा में किसी मंत्र या उपक्रम द्वारा जान फूंकी जा सकती है? और इस से लाभ किसे है? हर जगह मौजूद और अदृश्य ईश्वर को एक मूर्ति के अंदर कैसे समाहित किया जा सकता है? एक आम इंसान, फिर चाहे वह पंडित ही क्यों न हो, मूर्ति के अंदर प्राण कैसे फूंक सकता है या किसी मूर्ति को जीवंतस्वरूप किस तरह दिया जा सकता है.
मूर्ति में प्राण आने के बाद तो वह बोलने लगती होगी, चलने लगती होगी, भक्तों से बातें तो जरूर करती होगी. फिर तो भक्तों को कोई दुख, समस्या रहनी ही नहीं चाहिए. वास्तव में यदि गहराई और तर्क के साथ विचार किया जाए तो प्राणप्रतिष्ठा महज एक ढोंग और अंधविश्वास के अलावा कुछ नहीं है. जिस का इस्तेमाल आम जनता को मूर्ख बनाने में किया जाता है. प्राणप्रतिष्ठा के समय ही आम जनता द्वारा नवस्थापित मूर्ति पर जम कर चढ़ावा चढ़ाया जाता है. जिस पर पूरा अधिकार प्राणप्रतिष्ठा करवाने वाले पंडितों का होता है. इस के अलावा समाज के जिस वर्ग द्वारा मंदिर में मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा करवाई जाती है उस के द्वारा भी पंडितों को जम कर दानदक्षिणा दी जाती है.
दरअसल, यह देश के पंडेपुजारियों द्वारा देश की धर्मभीरू जनता की भावनाओं का फायदा उठा कर किया जाने वाला एक थोथा उपक्रम है, जिस से चढ़ावे के जरिए वे अपनी आजीविका चलाते हैं. भारतीय पूजापाठ में चढ़ावा एक मजबूत जरिया है जिस में सोनाचांदी से ले कर हजारोंलाखों रुपए चढ़ाए जाते हैं. भारत के बड़ेबड़े मंदिरों में करोड़ों का चढ़ावा चढ़ाया जाता है. इस प्रकार की प्राणप्रतिष्ठा केवल चढ़ावे का पाखंड है जिस के जरिए आम जनता को बेवकूफ बनाया जाता है.
धर्मग्रंथों में है इस का विधान
मूर्तियों की प्राणप्रतिष्ठा का विधान वेदों से ले कर बाद में रचे कर्मकांड की किताबों तक में लिखा गया है. बाजार में प्रतिमाओं की प्राणप्रतिष्ठा को ले कर कई पुस्तकें खूब बिक रही हैं. कर्मकांड भास्कर, कर्मकांड प्रदीप, प्रतिष्ठा मयूख, बृहत कर्मकांडसमुच्चय प्रमुख किताबें हैं.
अथर्ववेद में प्राणप्रतिष्ठा को महिमामंडित करते हुए लिखा गया है,
प्राणाय नमो यस्य सर्वमिंद वशे.
यो भूत: सर्वस्येश्वरी यस्मिन्त्सर्वं
प्रतिष्ठितम्
-अथर्ववेद-11-6/1
अर्थात, इस प्राण के लिए नमस्कार है, जिस के वश में यह समस्त चराचर जगत है. यह प्राण सब का ईश्वर है और इसी में सारा जगत स्थित है.
प्राणमाहुर्मातरिश्वानं,
वातो ह प्राण उच्चते.
प्राणे ह भूतं भव्यं च,
प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्.
-अथर्ववेद-11-6/15
अर्थात प्राण को मातरिखा अंतरिक्ष का स्वामी वायु कहा गया है. इसी वायु को प्राण कहा जाता है. उन दोनों में केवल नाम का भेद है. जगत के आधार पर बने हुए उस प्राण में भूतकाल से संबंधित और भविष्यकाल में उत्पन्न होने वाला जगत आश्रित रहता है. इस प्रकार प्राणों में ही सब प्रतिष्ठित है.
आगे लिखा है,
अस्यै प्राणा: प्रतिष्ठंतु,
अस्यै प्राणा: क्षरंतु च.
अस्यै देवत्वमचर्यायैमामहेति
च कश्चन.
अर्थात इस देव प्रतिमा के प्राण यहां प्रतिष्ठित हों, इस में निरंतर दिव्य प्राणों का संचार होता रहे. अर्चना के लिए इस के देवत्व की महानता को कोई सामान्य न समझे.
प्रतिमा के प्राण के लिए आह्वान
ऊं ही क्रो यं लं वं शं,
षं सं हं क्षं हं सं.
अस्या प्रतिमाया जीव इह स्थित:
ऊं आं हृं क्रो यं रं लं वं शं,
षं सं हं लं क्षं हं सं.
अस्या: प्रतिमाया: सर्वेंद्रियाणि
वांग्ड मनस्त्वक चक्षु:
क्षोत्रजिव्हा घ्राणपाणिपादपायूपस्थानि
इहैवोगत्य सुखं चिरं तिष्ठंतु स्वाहा.
अर्थात हम उपरोक्त मंत्रों द्वारा इस प्रतिमा में आप के प्राणों की, जीव की तथा समस्त इंद्रियों की प्रतिष्ठा करते हैं. आप यहां उपस्थित हो कर चिरकाल तक सुखपूर्वक निवास करें. हम आप का यजन करते हैं.
कर्मकांड भास्कर के अनुसार, प्राणप्रतिष्ठा करने से पहले षट्कर्म कराया जाता है. जिस प्रतिमा की प्राणप्रतिष्ठा करनी है, उसे परदे के बाहर आसन पर बैठा कर पहले षट्कर्म करा दिया जाए, शुद्धि सिंचन यज्ञ के कलशों का जल अनेक पात्रों में निकाल कर रखा जाए. यह मंत्र, ‘ऊं आपोहिष्ठा मयोभुव:, ता न अ ऊर्जे दधानत महेरणाय चक्षसे,’ पढ़ते हुए साथसाथ उस जल का सिंचन, उपस्थित व्यक्तियों, पूजन सामग्री, मंदिर और मूर्तियों पर किया जाए.
शुरू में मूर्ति को 10 स्नान कराए जाते हैं. मूर्ति जिस पत्थर या धातु की बनी है उस में सन्निहित कुसंस्कारों के निवारण तथा वांछित संस्कारों की स्थापना के लिए यह कराया जाता है. इस के बाद ही प्रतिमा सत्ता की प्रतीक बनने योग्य होती है.
प्रथम 4 स्नान भस्म, गोबर, मिट्टी और गोमूत्र से होते हैं. ये अवांछनीय संस्कारों के निवारण के लिए होते हैं. शेष 6 पदार्थों में दही, दूध, घी, सर्वोषधि, कुशोधक और शहद का प्रयोग इसी प्रकार किया जाए. अंत में शुद्ध जल से स्नान करा दिया जाना चाहिए. प्राणप्रतिष्ठा के बाद प्रतिमा को वस्त्र, आभूषण पहनाए जाएं.
कर्मकांड भास्कर, युग निर्माण योजना, प्रैस मथुरा के प्राणप्रतिष्ठा विधान में लिखा है,
अस्य श्रीप्राण प्रतिष्ठा मंत्रस्य
ब्रह्मा, विष्णु महेश्वरा ऋ षय,
ऋ ग्यजु सामानि छंदांसि.
क्रियामय वपु: प्राण शक्ति देवता.
ऐं बीजम्, हृं शक्ति : क्रीं कीलम.
प्राण प्रतिष्ठाने विनियोग :
इस प्रकार, पत्थर की मूर्तियों में प्राण डालने का ढोंग धर्म की पुस्तकों में इसलिए लिखा गया है ताकि प्रतिमाओं में शक्ति के नाम पर भोलेभाले धर्मांध लोगों को बेवकूफ बना कर अपना स्वार्थ साधा जाए.
सुपरस्टार पवन सिंह की आने वाली फिल्म ‘राजा’ का ट्रेलर रिलीज हो चुका है. पवन सिंह अपने एक्शन और दमदार स्टाइल के लिए जाने जाते हैं. ऐसा ही दमदार स्टाइल इस फिल्म के ट्रेलर में भी नजर आ रहा है. गुंडो को मारते और सबक सिखाते पवन सिंह धमाकेदार एक्शन करते दिख रहे हैं. ट्रेलर में आपको इस एक्शन की भरपूर झलक देखने को मिलेगी.
इस फिल्म में सत्यप्रकाश, दिव्या सिंह, प्रीति बिस्वास, संजय वर्मा जैसे कलाकार नजर आ रहे हैं. इसके साथ ही फिल्म में बिग बौस में नजर आ चुकी संभावना सेठ भी एक डांस करती दिखेंगी. ट्रेलर में पवन कई दमदार डायलौग बोल रहे हैं- जैसे ‘खौफ तो कुत्ता भी मचा देता है, दहशत तो शेर की आहट से होती है’, ‘बाप से मस्ती नहीं, तेरी हस्ती मिटा देगा.’ फिल्म में पवन दमदार पुलिसवाले के किरदार में दिख रहे हैं.

इस फिल्म का निर्देशन संजय श्रीवास्तव और राज टीम ने किया है, जिसे मुकेश गुप्ता ने प्रोड्यूस किया है. ट्रेलर में राजा बने पवन सिंह हवा में उछल-उछलकर गुंडों को मारते और एक्शन करते दिख रहे हैं.
ढोलक की आवाज सुन कर मैं समझ जाता हूं कि किसी के यहां खुशी हुई है. मेरा अंदाजा सही निकलता है क्योंकि कुछ ही देर बाद बेसुरी बधाइयां बरसने लगती हैं. बृहन्नलाएं लड़का होने की खबर सुनते ही ढोलक ले कर बधाइयां देने पहुंच जाती हैं. इन का सूचना तंत्र बड़ा तगड़ा होता है. किस की शादी हुई, किस के यहां बेटा हुआ, किस का नया मकान बना जैसी खबरें मिनटों में इन के पास पहुंच जाती हैं और कुछ ही देर में बधाई के गीत सुनाई देने लगते हैं.
ये बृहन्नलाएं बधाई की बाकायदा कीमत वसूल करती हैं. वसूली की राशि खुशी पाने वाले की आर्थिक हैसियत पर निर्भर रहती है. किसी ने देने में आनाकानी की तो इन की बधाइयां जल्दी ही श्राप बन कर निकलने लगती हैं.
इन के नाम अकसर स्त्रीलिंगी होते हैं. पर एक नाम ऐसा भी है जो कामन होता है. वह है गुलाब. यह नाम किसी भी महिला का और दूसरे किसी भी पुरुष का हो सकता है पर तीसरे जो न तो महिला होते हैं और न ही पुरुष उन में भी यह नाम लोकप्रिय है.
तीसरे गुलाब अकसर साड़ी या सलवार पहने होते हैं. पर इन की एक प्रजाति ऐसी भी होती है, जो कमीजपतलून पहनती है. मतदाता सूची में इस का नाम पुरुषों में आता है. इस के सदस्य होते तो पुरुष शरीर के हैं पर इन की नीयत बृहन्नलाओं की होती है.
ये बधाई देने खुद नहीं आते बल्कि इन से बधाई लेने इन की शरण में जाना पड़ता है. नेग तो चुकाना ही पड़ता है और वह भी हाथोंहाथ. कभीकभी तो एडवांस में चुकाना पड़ता है. ये नेग को सेवा शुल्क कहते हैं. न दो तो इन के कांटे झेलने पड़ते हैं. अपने साथसाथ ये सामने वाले के कपड़े उतारने में भी नहीं डरते. इन के श्राप बड़े ही भयानक होते हैं. कई बार तो इन का श्रापित व्यक्ति पागल तक हो जाता है. आप शायद समझ नहीं पाए होंगे कि हम यहां किस की बात कर रहे हैं. तो चलिए सिलसिलेवार आप को समझाते चलें.
आप की शादी हुई. नवविवाहिता पत्नी का नाम राशन कार्ड में जुड़वाना है. संबंधित दफ्तर में आप का पाला किसी कमीजपतलून पहने जीव से पड़ता है. अपनी सुविधा के लिए इस का नाम आप गुलाब शर्मा रख लें. आप अपने आने का उद्देश्य बताते हैं. वार्तालाप कुछ यों शुरू होता है :
‘‘10 दिन बाद आइए,’’ गुलाब कहता है.
‘‘पर कल तो हम हनीमून के लिए जा रहे हैं,’’ आप कहते हैं.
‘‘लौटने का इरादा रखते हो या नहीं. लौटने के बाद आना.’’
‘‘छुट्टी खत्म होते ही टूर पर जाना है.’’
‘‘तो जब आप को समय मिले तब आइए,’’ गुलाब कहता है.
‘‘जल्दी नहीं हो सकता?’’
‘‘अब सरकारी दफ्तर में इतनी जल्दी काम तो नहीं होता.’’
आप गुलाब का ध्यान उस के पीछे लगे बोर्ड की ओर खींचते हैं जिस पर राशन कार्ड बनवाने के लिए लगने वाली अवधि लिखी होती है.
‘‘उस के लिए सेवा शुल्क लगेगा,’’ और वह आंकड़ा बतलाता है. आप कहते हैं कि यह तो बहुत है. वह ताना मारता है. ‘‘अरे, जनाब, दहेज में कुछ तो मिला होगा और फिर रिसेप्शन में खाली लिफाफे तो आए नहीं होंगे.’’
आप भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं देना चाहते और आप को हनीमून पुकार रहा होता है. इसलिए 10 दिन बाद आने की बात कर हनीमून पर चल देते हैं. लौटने पर राशन कार्ड की याद आती है. आप फिर राशन कार्ड के दफ्तर में जा कर गुलाब शर्मा से रूबरू होते हैं. पहले तो वह आप को प्रश्नवाचक निगाह से देखेगा फिर पहचानने का नाटक करेगा और बताएगा कि राशन कार्ड पर दस्तखत करने वाले साहब छुट्टी पर हैं. अगले सप्ताह लौटेंगे. आप अपने दफ्तर से कुछ देर की छुट्टी ले कर आए हैं. उस की बात पर विश्वास कर जाहिर है आप दफ्तर जाना पसंद करेंगे.
अगले सप्ताह पता चलता है कि राशन कार्ड तो तैयार है पर जिस गुलाब शर्मा के पास है उस के पिता बीमार हैं और अस्पताल में भरती हैं. अब आप में इतनी तो इंसानियत है कि उसे अस्पताल में नहीं ढूंढें़गे. लेकिन आप ईमानदारी की जीतीजागती मिसाल भी बनना चाहते हैं इसलिए उस के लौटने का इंतजार करते हैं.
अगली बार पता चलता है कि गुलाब शर्मा के पिताजी तो ऊपर चले गए. उस के दुख की घड़ी में आप का इनसान जाग उठता है और आप 13 दिन तक उस के दफ्तर नहीं जाते. फिर छुट्टियां आती हैं और आप अपने काम में व्यस्त हो जाते हैं.
याद आने पर आप पूरी तरह से तैयार हो कर जाते हैं. गुलाब शर्मा अपनी कुरसी पर बैठा नजर आता है. उस का सिर मुंड़ा हुआ नहीं है. आप को देखते ही कह देता है कि साहब टूर पर हैं और राशन कार्ड पर दस्तखत नहीं हो पाए हैं. आप समझदार की तरह उसे सेवा शुल्क का लिफाफा थमा देते हैं. वह उसे खोल कर देखता है और उसे जिस दराज में डालता है उसी दराज से आप का नया राशन कार्ड निकाल कर आप को थमा देता है.
आप की शादी हुई है तो यथा समय आप के यहां संतान भी होगी ही. अगर बेटा हुआ तो तुरतफुरत साड़ी- सलवार वाली बृहन्नलाएं ढोलक की थाप पर बधाइयां देने पहुंच जाएंगी. आप को जो भी नेग देना हो दे कर छुट्टी पा लेें. लेकिन नगर निगम के जन्ममृत्यु विभाग से जन्म प्रमाणपत्र इतनी आसानी से नहीं मिलेगा. आप वहां जब यह कहेंगे कि लड़का हुआ है तो वहां के गुलाबों में खुशी दौड़ जाएगी. आप को बधाइयां देने के लिए कतार लग जाएगी. ‘लाटरी खुल गई. लाटरी खुल गई’ के नारे गूंज उठेंगे. नेग की रकम जो आमतौर पर 100-200 रुपए होती है बढ़कर दोगुनी हो जाती है. आप में ईमानदारी का जज्बा है इसलिए आप नेग देने से मना कर देते हैं.
कर्मचारी एकता की भावना से ओतप्रोत दफ्तर के सभी गुलाब आप को धिक्कारते हैं और उलाहना देते हैं कि बेटा होने की खुशी में आप ने मिठाई तो बांटी ही होगी. कुछ मिठाई नेग के रूप में हमें भी मिलनी चाहिए. आप के ईमानदार बने रहने पर वे आप को 1 महीने बाद आने को कहते हैं. आप 1 महीने बाद जाते हैं तो किसी गुलाब दूबे से पता चलता है कि नगर निगम के पास अभी अस्पताल से आप के बेटे के जन्म की सूचना नहीं मिली है. आप अस्पताल दौड़ते हैं. वहां पता चलता है कि चूंकि वह अस्पताल सरकारी नहीं है इसलिए उन्होंने आप के बेटे के जन्म के 3 दिन बाद ही नगर निगम को उस की सूचना दे दी है.
आप दौड़ कर नगर निगम जाते हैं और हकीकत बयान करते हैं. गुलाब दूबे अपनी ईमानदारी पर संदेह उठने पर नाराज हो जाता है और 1 माह बाद आने को कहता है. आप 1 माह बाद जाते हैं तो बताया जाता है कि बेमौसम बरसात से रेकार्ड रूम में रखे सभी जन्ममृत्यु प्रमाण- पत्र नष्ट हो गए हैं. वैसे आप को यह भी सलाह दी जाती है कि बीचबीच में आते रहें. उन का कहना मान कर आप बीच- बीच में नगर निगम झांक आते हैं. कभी गुलाब नहीं मिलता तो कभी साहब छुट्टी पर रहते हैं तो कभी दोनों ही मीटिंग में लगे होते हैं.
आखिर एक शुभ दिन संयोग से छोटा गुलाब. बड़ा गुलाब, (बड़े बाबू) और साहब दफ्तर में एक समय पर नजर आते हैं. बड़े बेमन से गुलाब दूबे आप को बेशर्म की उपाधि दे कर आप के बेटे का जन्म प्रमाणपत्र देता है. आप देखते हैं कि उस पर उसी दिन की तारीख पड़ी हुई है जिस दिन आप अस्पताल से सूचना भेजने की खबर ले कर आए थे. तभी आप की नजर अपने बच्चे की जन्म तारीख पर पड़ती है. आप को याद आता है कि आज तो आप के बेटे की पहली वर्षगांठ है.
आप खुद के लिए एक घर बनवाना चाहते हैं. पत्नी का आग्रह होता है कि भूखंड खुद का हो ताकि रिटायर होने के बाद ऊपर का हिस्सा किराए पर उठा देंगे. कमाई हो जाएगी. चूंकि नगर निगम ने पूरा शहर बिल्डरों को बेच दिया होता है इसलिए आप समझदार की तरह ‘आन’ में भूखंड खरीदते हैं. भूखंड की रजिस्ट्री के लिए आप रजिस्ट्रार कार्यालय जाते हैं और अपने सिद्धांत पर कुर्बान हो जाते हैं. वहां के गुलाब जैन या गुलाब हुसैन को नेग दे कर अपने नाम रजिस्ट्री करवाते हैं.
कर्ज लेने के लिए आप कर्मचारी भविष्य निधि कार्यालय में आवेदन करते हैं. 6 माह तक तो नियमानुसार कोई जवाब नहीं आता. फिर एक अशुभ दिन आप का आवेदनपत्र लौट आता है. उस में कुछ खामियां बताई जाती हैं. आप वे कमियां दूर कर आवेदनपत्र भेज देते हैं. 6 माह फिर खामोशी.
जानकार लोग आप को बताते हैं कि वहां के गुलाबों को नेग दे कर हाथोंहाथ कर्ज मिल सकता है. आप अपने ही पैसे पाने के लिए पैसे खर्च करने में विश्वास नहीं करते और रोज डाकिए का इंतजार करते रहते हैं. उधर बिल्डर अपनी बाकी रकम के लिए बारबार आप के घर आ कर आप को अपमानित करता है. हार कर आप ज्यादा ब्याज पर गैरसरकारी संस्था के हाथ जोड़ते हैं. चूंकि वहां गुलाब की खेती नहीं होती इसलिए आप को 2 दिन में कर्ज मिल जाता है.
आप मकान का नक्शा पास करवाने के लिए नगर निगम के चक्कर लगाते हैं. वहां कभी छत की ऊंचाई कम बताई जाती है तो कभी ज्यादा. वहां बैठा गुलाब परमार आप को दोस्ताना सलाह देता है कि नक्शे में गैरेज जरूर बताएं. भले ही बनवाएं नहीं. जब नक्शे में गैरेज बताते हैं तो गुलाब जोशी आप को अमीर जान कर ज्यादा नेग मांगता है. हकीकत यह है कि आप की हैसियत स्कूटर खरीदने की भी नहीं रह जाती. चूंकि कर्ज की किस्त शुरू हो जाती है इसलिए आप नेग की रकम दे देते हैं और आप का नक्शा खामियों सहित 5 मिनट में पास हो जाता है. छुट्टी पर बताए जाने वाले दस्तखत करने वाले साहब न जाने कब मौका सूंघ कर अपनी कुरसी पर आ बैठते हैं.
नल कनेक्शन के लिए आप फिर नगर निगम में जाते हैं. अब तक आप को सरकारी दफ्तरों के गुलाबों का अच्छाखासा अनुभव हो चुका होता है अगर सीधे किसी गुलाब चौधरी से आप बात करते हैं, वह जगह बताता है. आप गुलाब चौधरी का लिफाफा कैंटीन वाले को सौंप देते हैं.
दूसरे दिन जब आप अपने प्लाट पर जाते हैं तो पाते हैं कि नल का कनेक्शन हो चुका है और मजदूर बख्शीश के लिए आप का इंतजार कर रहे हैं.
बिजली वाले गुलाबचंद भी आप को इसी तरह का झटका देते रहते हैं. कभी मीटर नहीं है तो कभी तार नहीं है. आप समझदार हो चुके हैं अत: नेग हमेशा अपने साथ रखते हैं. इधर नेग पहुंचा नहीं कि दूसरे ही दिन आप के प्लाट पर बिजली कौंधने लगती है. आप को सलाह दी जाती है कि मीटर की चिंता न करें.
अपने बनाए हुए मकान में किसी छुट्टी के दिन आप भोजन कर आराम कर रहे होते हैं तो अचानक फोन की घंटी आप को जगा देती है. फोन आयकर विभाग से है. आवाज आती है कि आप का रिफंड तैयार है और आप कार्यालय में आ कर कुलकर्णी बाबू से ले लें.
आप खुश हो जाते हैं. हमेशा आप की जेब काटने वाले आय कर विभाग से आप को कमाई हो रही है. आप इस रिफंड की सफेद कमाई लेने आयकर दफ्तर जाते हैं. वहां जा कर पता चलता है कि कुलकर्णी बाबू तो असल में गुलाब कुलकर्णी हैं.
नेग पर खींचतान होती है. चूंकि रिफंड का चेक आप के नाम से बना है इसलिए आप अकड़ कर नेग देने से मना कर देते हैं और चेक डाक से भेजने को कह कर चले आते हैं.
रोजरोज डाक देखने पर भी जब निराशा हाथ लगती है तो आप फिर आय- कर दफ्तर जाते हैं. वहां गुलाब कुलकर्णी बताता है कि चेक तो डाक से भेज दिया गया है. आप खाली हाथ लौट आते हैं. 2 दिन बाद आप को डाक से चेक मिलता है. आप खुशी से नाच उठते हैं. बिना कुछ दिए सरकारी विभाग से अपने हक की चीज मिली है.
आप की खुशी सरकारी इमारत की तरह तब भरभरा कर गिर जाती है. जब आप को यह पता चलता है कि चेक 6 महीने पहले का बना है और अब बैंक में जमा नहीं किया जा सकता है. आप फिर आयकर दफ्तर जा कर गुलाब कुलकर्णी से मिलते हैं. वह खलनायकी अंदाज में आप से फिर नेग की मांग करता है और न देने पर पतलून उतारने की धमकी देता है. अब यहां भी मोलभाव होता है. काफी हुज्जत के बाद वह आप के घर रिफंड का चेक ले कर आता है. आप उसे खास मेहमान की तरह बढि़या चायनाश्ता करवाते हैं. वह आप से नेग का लिफाफा ले कर चला जाता है और जातेजाते हिदायत दे जाता है कि आप आगे किसी भी सरकारी कर्मचारी से पंगा न लें.
अब एक दुखद घटना. पिताजी की मृत्यु की खानापूर्ति करने के बाद जब आप उन की संपत्ति बीमे की रकम पाने के लिए नगर निगम से उन का मृत्यु प्रमाणपत्र लेने जाते हैं तो उसी गुलाब दूबे से आप का सामना होता है. वह भले ही जन्म विभाग में हो पर आप को पहचान कर मृत्यु विभाग के अपने सहयोगियों को ‘एफसी’ कह कर सावधान कर देता है.
विभाग के गुलाब आप को टालना शुरू करते हैं. बहाने पुराने ही होते हैं. आखिर मृत्यु विभाग का गुलाब चौबे साफसाफ बात करता है तो आप मौके की दुहाई देते हैं. वह उलटे आप से सवाल करता है कि आप ने अपने पिताजी की अंतिम क्रिया में पंडित को तो दक्षिणा दी ही होगी. जब उसे दी है तो यहां देने में क्या हर्ज है.
सरकारी दफ्तरों के बदबू भरे कमरों में अब आप बारबार जाना नहीं चाहते इसलिए नगर निगम के इस कर्मकांडी ब्राह्मण को दक्षिणा दे कर आप अपने पिताजी का मृत्यु प्रमाणपत्र ले आते हैं.
अगर आप के पिताजी ने कोई मकान या जमीन का टुकड़ा खरीद रखा है तो रजिस्ट्रार के दफ्तर में आप का फिर उन्हीं गुलाबों से पाला पड़ेगा. वे सहानुभूति जताने के बजाय आप की किस्मत पर रश्क करेंगे. कहेंगे कि काश, उन के पिता भी ऐसा ही कुछ छोड़ जाते या छोड़ जाएं. बिना मेहनत के बाप की कमाई हुई संपत्ति आप को मिली है, इस संपत्ति पर यहां तो टैक्स देना ही होता है. यहां के गुलाब आप के शरीर का कुछ हिस्सा तो घायल कर ही देंगे वरना वह संपत्ति आप को तो खैर छोडि़ए आप के पोते को भी नहीं मिलेगी, क्योंकि तब तक वहां एक और गुलाब उग आया होगा.
आप के अनुभवों ने यह तो बतला दिया होगा कि किसी भी पार्टी की सरकार हो और उस ने भले ही किसी भी तरह के गुलाब के लिए आरक्षण न रखा हो पर उस के दफ्तरों में तीसरे गुलाबों की भरमार है. यहां आ कर पहले क्या और दूसरे क्या दोनों ही तीसरे गुलाब बन जाते हैं. वह बात और है कि वे कमीजपतलून पहनते हैं और उन का लिंग ‘पुरुष’ लिखा होता है.
अमेरिका की दरियादिली को 3 साल तक अमेरिकियों के खिलाफ कहने वाले खब्ती राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब एशिया, अफ्रीका और यूरोप के देशों को 60 अरब डौलर की सहायता देने को तैयार हो गए हैं. यह उन का हृदय परिवर्तन नहीं, बल्कि चीन के साथ, प्रभाव के क्षेत्र की जंग का हिस्सा है. राष्ट्रपति चुने जाने से पहले और बाद में ट्रंप यह कहते रहे थे कि अमेरिकी जनता का पैसा दूसरों पर खर्च किया जाए, यह गलत है.
इस के पहले चीन के नेताओं ने वन बैल्ट, वन रोड कार्यक्रम लगभग 60 देशों में चालू कर के चीन के लिए एक बड़े बाजार का रास्ता बनाना शुरू कर ही दिया. इन 60 देशों में सड़कों, रेलों, हवाई अड्डों, बंदरगाहों को दुरुस्त करने का काम हो रहा है और वह इस पर 100 अरब डौलर से ज्यादा खर्च करने वाला है, जिस में से काफी खर्च हो भी चुका है.
चीन पैसा दान दे रहा हो, ऐसा नहीं. हर दान देने वाले के छिपे स्वार्थ होते हैं पर कई बार दान दोनों के लिए हितकारी होता है. वन बैल्ट, वन रोड कार्यक्रम से चीन का सामान तो दूर देशों में पहुंचेगा ही, वहीं उन देशों का कच्चा माल, मजदूर भी चीन पहुंच सकेंगे. चीन अपना काम जिन देशों में बांट सकेगा, वहां वहीं का कच्चा माल व वहीं के कर्मचारी इस्तेमाल हो सकते हैं.
अमेरिका की समृद्धि के पीछे उस की दूसरों की सहायता करने की नीति रही है. अमेरिका ने फौजें वहां भेजीं जहां आंतरिक विवाद खड़े हुए थे और जहां लोकतंत्र को खतरा था. वहीं, अमेरिका ने जिस देश की सहायता की, वहां से उसे कच्चा माल मिला और बाजार भी. सहायता देना एकतरफा काम नहीं है. भारत के जो सेठ दानी कहे जाते हैं वे असल में अपने स्थायी ग्राहक भी पा लेते हैं और निष्ठावान कर्मचारी भी.
दुनिया जोरजबरदस्ती से न आज चल सकती है, न कभी चली है. हर अन्यायी तानाशाह केवल तभी तक राज कर पाया जब तक पिछले राजाओं की जमा पूंजी थी. हिटलर हो या स्टालिन, उन्होंने तानाशाही से एकतरफा काम कर के अपने देशों को नष्ट ही किया.
भारत ने तो खुद की भिखारी की शक्ल बना रखी है जो कभी एक से मांगता है तो कभी दूसरे से. अच्छीभली उपजाऊ जमीन, बड़ी जनसंख्या, खेती के लिए अनुकूल मौसम के बावजूद हमारे यहां दूसरे की सहायता करने का अर्थशास्त्र बहुत कमों को समझ आया.
आज भारत जो अलगथलग पड़ गया है और जो नाम है इस का, वह खुशहाली के कारण नहीं बल्कि यहां गरीबों, फटेहालों की बड़ी संख्या होने के कारण है. इतनी बड़ी जनसंख्या, अगर हर रोज हर देशवासी 10 रुपए भी दे तो सरकार का खजाना भर जाए लेकिन, दरअसल, हम न बाहर वालों की सहायता करना जानते हैं, न अपनों की ही.
उत्तर कोरिया ने एक बार फिर हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया. भूकंप संबंधी जानकारी देने वाली निगरानी संस्थाओं ने उत्तर कोरिया के मुख्य एटमी स्थल के पास 6.3 तीव्रता का विस्फोट दर्ज किया. यह बम उत्तर कोरिया की लंबी दूरी की मिसाइलों से भी दागा जा सकता है. इस धमाके की ताकत पिछले परीक्षण से 9.8 गुना ज्यादा थी. इस से कुछ ही घंटों पहले उत्तर कोरिया ने दावा किया था कि उस ने एक ऐसा हाइड्रोजन बम विकसित किया है जिसे देश की नई अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल में लोड किया जा सकता है.
एटमी हथियारों से लैस उत्तर कोरिया 1950 के दशक से अपने कट्टर दुश्मन अमेरिका तक एटमी मिसाइल दागने में समक्ष होने के तरीकों को लंबे समय से तलाश रहा है.
इस वक्त दुनिया के सामने सब से बड़ा सवाल यह है कि उत्तर कोरिया के हाइड्रोजन बम परीक्षण का जवाब क्या है? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने धमकी दी है कि उत्तर कोरिया को मिटा कर रख देंगे. इस के जवाब में उत्तर कोरिया ने धमकी दी है कि जापान को डुबो देंगे, अमेरिका को राख कर देंगे. लेकिन उत्तर कोरिया को मिटाना ट्रंप के लिए इतना भी आसान नहीं है.
अगर कोरियाई प्रायद्वीप पर जंग छिड़ी तो युद्ध का हश्र किसी को भी मालूम नहीं होगा कि यह कितनी जानें ले कर थमेगा. इस की सब से बड़ी वजह यह है कि उत्तरी कोरिया खुद में ही ‘महाबम’ बन चुका है. लगातार एटमी परीक्षण कर उत्तर कोरिया ने न सिर्फ अपनी तकनीक को उन्नत किया है बल्कि वह दुनिया के शक्तिशाली एटमी देशों में भी शामिल हो गया है. अमेरिका, आज के दौर में, उत्तर कोरिया को इराक या सीरिया समझने की गलती नहीं कर सकता.
एटमी हमले का डर
उत्तर कोरिया ने जिस हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया है वह नागासाकी पर गिरे बम से 5 गुना अधिक ताकतवर था. यह उत्तर कोरिया का छठा सब से शक्तिशाली एटमी परीक्षण था. सैकड़ों किलोटन के इस बम के सभी उपकरण उत्तर कोरिया ने देश में ही तैयार किए. उत्तर कोरिया जब खुद को बुरी तरह घिरता या हारता देखेगा तब यह सोचना बेमानी होगा कि वह एटमी हमला नहीं करेगा. तानाशाह किम जोंग जब आज दुनिया की परवा न करते हुए परमाणु परीक्षण कर रहा है तो युद्ध के वक्त एटमी हमला करने में वह देर नहीं लगाएगा.
अमेरिका के लिए उत्तर कोरिया पर हमला करना एक और कारण से भी आसान नहीं है. उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच चीन मौजूद है. उत्तर कोरिया के साथ चीन एक संधि से बंधा हुआ है. संधि के तहत चीन या उत्तर कोरिया पर किसी दूसरे देश के हमला करने पर दोनों को ही एकदूसरे की मदद करनी होगी. साल 2021 तक इस संधि की मियाद है. आज के जो हालात हैं उन्हें देखते हुए अमेरिका 4 साल इंतजार करने की स्थिति में नहीं है. ऐसे में अमेरिका अगर हमला करता है तो चीन का युद्ध में कूदना मजबूरी होगी.

दरअसल, दोनों देशों के बीच तनाव तब चरम पर पहुंच गया था जब किम जोंग ने अमेरिकी द्वीप गुआम पर मिसाइल से हमला करने की धमकी दी थी. जिस के बाद गुस्साए ट्रंप ने कहा था कि अगर उत्तर कोरिया ने ऐसी गलती की तो अमेरिका आसमान से इतनी आग बरसाएगा जिसे पूरी दुनिया देखेगी. लेकिन किम जोंग पर अमेरिकी चेतावनियों का कोई असर नहीं पड़ रहा है. रक्षा विशेषज्ञ पिछले 3 दशकों में अब तक का सब से गंभीर और भड़काऊ बैलिस्टिक मिसाइल प्रक्षेपण बता रहे हैं. उत्तर कोरिया अपने मिसाइल कार्यक्रमों में जिस तेजी से काम कर रहा है उस से यह शक गहरा रहा है कि उस की मिसाइलें 3 वर्षों में अमेरिकी शहरों को अपने दायरे में ले सकेंगी. उत्तर कोरिया ने इस बार अपनी सब से विकसित ह्वासौग-12 मिसाइल का दुनिया के सामने नजारा पेश किया है जो एटमी हथियार ले जाने में कारगर है.
अमेरिका की लामबंदी
तकरीबन 60 साल के बाद अब उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच तनाव किसी भी वक्त महायुद्ध में बदल सकता है. अमेरिका बारबार विश्व समुदाय को उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षण से दुनिया के लिए बढ़ते खतरे को आगाह कर लामबंद करने की कोशिश कर रहा है. हालांकि चीन और रूस भी उत्तर कोरिया पर लगे संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों का समर्थन कर रहे हैं लेकिन दुनिया यह जानती है कि बिना चीन की मदद के उत्तर कोरिया एटमी परीक्षण नहीं कर सकता था.
कोरियाई प्रायद्वीप पर 1950 में छिड़े युद्ध का इतिहास आज भी दक्षिण कोरिया के जख्मों को हरा कर देता है. उत्तर कोरिया ने सियोल पर कब्जा कर लिया था जिसे दक्षिण कोरिया ने अमेरिकी मदद से छुड़ाया था. अब अगर दोनों देशों के बीच जंग छिड़ती है तो पिछले युद्ध की तरह करोड़ों लोग प्रभावित होंगे. उत्तर कोरिया के पास दुनिया की चौथी सब से बड़ी सेना है. उस के पास 60 लाख सैनिक हैं.
अगर युद्ध होता है तो उत्तर कोरिया शुरुआती एक घंटे में हजारों मिसाइल दाग कर सियोल को खाक कर सकता है. वहीं, उस के पास इंटरकौंटिनैंटल बैलिस्टिक मिसाइलें भी हैं जो अमेरिकी शहरों को भी निशाना बना सकती हैं. दुनिया के लिए तीसरे विश्वयुद्ध का खतरा तब पैदा हो जाएगा जब चीन और रूस भी इस युद्ध में उतर जाएंगे.
क्रूर और सनकी तानाशाह – किम जोंग उन
इतिहास में कुछ शासक अपने सशक्त शासन के लिए जाने जाते हैं जिन्हें जनता ने भी बेहद प्यार दिया. इस के विपरीत कुछ ऐसे शासक भी रहे हैं जिन्होंने हैवानियत की सारी हदें पार कर दीं और इसी कारण इन्हें सब से बड़े तानाशाह का दरजा मिला. इन तानाशाहों ने जनता के अधिकारों का शोषण ही नहीं किया बल्कि अपना खौफ और जनता पर राज बनाए रखने के लिए कत्लेआम तक किया.
अपने पिता किम इल सुंग की मौत के बाद उत्तर कोरिया की सत्ता पाने वाला किम जोंग इल वहां का एक बड़ा तानाशाह बन गया. किम जोंग इल ने 1994 से 2011 तक अपनी सत्ता में कई मानव अधिकारों का उल्लंघन करते हुए बड़ी संख्या में लोगों की हत्या करवा दी थी. इस ने अपने शासनकाल में लगभग 3 लाख से भी अधिक लोगों को गिरफ्तार करवा लिया था. इस के अलावा लाखों कोरियाई नागरिक किम जोंग इल की क्रूर नीतियों के कारण मौत के घाट उतारे गए.
किम जोंग ऐसा तानाशाह है जो किसी पर रहम नहीं करता, किसी को मौत की सजा देना उस के लिए मजाक है. उत्तर कोरिया के किम जोंग के बारे में आप ने बहुत सारे किस्से पढ़े होंगे जैसे कि उस ने अपने फूफा को भूखे कुत्तों को खिला कर मार दिया था या कुछ और भी, लेकिन वहां के मीडिया और यहां तक कि इंटरनैट पर भी इतनी पाबंदियां हैं कि वहां की खबरें बाहर आना बहुत ही मुश्किल होता है.
सनकी तानाशाह किम जोंग को नाफरमानी पसंद नहीं है. ऐसा करने वाले को वह सिर्फ मौत की सजा देता है. एक बार किम जोंग ने उत्तर कोरिया के रक्षा प्रमुख ह्योंग योंग को ही मरवा दिया. उन की गलती सिर्फ इतनी थी कि उन्होंने किम जोंग के सामने झपकी लेने की हिमाकत कर दी थी. एक मीटिंग के दौरान रक्षा प्रमुख को झपकी आ गई. उस मीटिंग को खुद तानाशाह किम जोंग ले रहा था. लिहाजा, वह आगबबूला हो उठा. उस का तमाशा देखने के लिए उत्तर कोरिया के हर बड़े अधिकारी को मौजूद रहने का फरमान सुनाया गया ताकि उन के दिल में खौफ पैदा किया जा सके.
किम जोंग ने अपनी सरकार के ही शिक्षा विभाग प्रमुख रि योंग जिन और कृषि मंत्री हांग मिन को एंटी एयरक्राफ्ट गन से मरवा दिया. दोनों पर आरोप था कि वे किम जोंग की बैठक में सोते हुए पकड़े गए थे.
किम ने अपनी गर्लफ्रैंड को भी नहीं बख्शा. किम की गर्लफ्रैंड गायिका थी और उस पर आरोप था कि उस का म्यूजिक ग्रुप पौर्न फिल्म बना रहा है. इस के बाद किम ने अपनी गर्लफ्रैंड सहित पूरे म्यूजिकल ग्रुप को ही गोली से उड़वा दिया. किम जोंग ने रि सोल जू से शादी की है जो चीयरलीडर और सिंगर रह चुकी है. कहा जाता है कि दोनों बचपन के दोस्त हैं.
4 साल पहले जब किम जोंग के पिता किम जोंग इल की मौत हुई थी, तब भी कई लोगों को मौत की सजा दी गई थी. दरअसल, किम जोंग ने फरमान सुनाया था कि जब उस के पिता का जनाजा निकलेगा तो सभी को रोना पड़ेगा. उस रोज प्योंगयांग की सड़कों पर हजारों लोग रो रहे थे. लेकिन जो नहीं रोया उस की मौत आ गई. किम जोंग ने ऐसे लोगों को फौरन गिरफ्तार करने का फरमान सुना दिया. दर्जनों लोगों को शोक नहीं मनाने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया और फिर उन्हें गोली मार दी गई.
किम की रंगीन मिजाजी के साथ उस की शानोशौकत भी मशहूर है. किम की हेयरस्टाइल, उस के कपड़े यहां तक कि उस के जूते भी उत्तर कोरिया में सुर्खियां बटोरते हैं. कहा जाता कि कि साल 2000 में किम जोंग ने प्लास्टिक सर्जरी करवा कर अपनी अपनी शक्ल भी बदलवाई थी, क्योंकि वह अपने दादा किम ईल सुंग की तरह दिखना चाहता था.

उत्तर कोरिया में बाइबिल रखने पर किम ने रोक लगा रखी है. पौर्न सामग्री रखना या देखना सख्त मना है. साउथ कोरियाई फिल्म देखने पर पाबंदी है. गरीबों की तसवीरें खींचना भी मना है. टूरिस्ट्स मोबाइल फोन, कैमरा, लैपटौप नहीं रख सकते. गाड़ी खरीदना और जींस पहनना भी मना है.
इन नियमों को तोड़ने की वहां बड़ी सजा मिलती है. जिस ने नाफरमानी की, उसे सजाएमौत तक दी जाती है. सजा का कानून भी 3 पीढि़यों तक चलता है. मसलन, अगर उत्तर कोरिया में कोई जुर्म करता है तो उस की अगली 2 पीढि़यां भी इस सजा को भुगतेंगी. इस का असर यह है कि कई परिवारों की 3 पीढि़यां बिना कुसूर के जेल काट रही हैं.
60साल के अमर सिंह की जिंदगी देख कर घरगृहस्थी की गाड़ी ढोते दूसरे लोगों को उस से कोफ्त होती थी. वजह, अमर सिंह अकेला था. उस पर ‘आगे नाथ न पीछे पगहा’ वाली कहावत लागू होती थी. उस के सिर पर कोई जिम्मेदारी नहीं, घर में कोई सवालजवाब करने वाला नहीं और न ही कोई झंझट.
पेशे से मिस्त्री अमर सिंह निहायत ही मस्तमौला भी था. दिनभर मजदूरी कर के वह 5-6 सौ रुपए कमाता था. उन में से 2 सौ रुपए मुरगेदारू पर खर्च करता था और रात को टैलीविजन देखतेदेखते बेफिक्री से चादर तान कर सो जाता था.
अब से तकरीबन ढाई साल पहले अमर सिंह की बीवी की मौत हुई थी. तब से वह तनहा रह गया था. उस के 3 औलादें थीं. शादी कर के बेटी अपनी ससुराल में सुकून से रह रही थी, लेकिन एक बेटे ने 3 साल पहले खुदकुशी कर ली थी और दूसरा बेटा लव मैरिज कर के इंदौर जा बसा था, जिसे बाप से कोई खास मतलब नहीं था.
भोपाल के करोंद इलाके के पीपल चौराहा इलाके के मकान नंबर 2 में बीते 8 महीनों से अमर सिंह किराए पर रह रहा था. वजह यह नहीं थी कि उस का अपना कोई मकान नहीं था, बल्कि वह अपना खुद का मकान इसलाम नगर इलाके में बनवा रहा था.
दरअसल, कुछ महीने पहले ही उस ने अपनी जिंदगीभर की कमाई और बचत से शिव नगर इलाके में बनाया अपना मकान साढे़ 12 लाख रुपए में बेचा था और उसी पैसे से अकेले खुद के रहने लायक छोटा मकान बड़े चाव से बनवा रहा था.

मस्ती पर लगा ग्रहण
पीपल चौराहा इलाके के लोगों और अमर सिंह के पड़ोसियों को यह देखने की आदत सी पड़ गई थी कि अनजान औरतें कभी भी अमर सिंह के घर आतीजाती रहती थीं. अंदर क्या होता होगा, इस का अंदाजा लगाने के लिए किसी को अपने दिमाग पर ज्यादा जोर नहीं डालना पड़ता था.
चूंकि अमर सिंह किसी से खास वास्ता नहीं रखता था और न ही किसी के लिए परेशानी का सबब बनता था, इसलिए कोई इस बात को उस का निजी मामला मानते हुए एतराज नहीं जताता था.
अमर सिंह का नया मकान तकरीबन तैयार हो गया था और उस ने गृह प्रवेश की तारीख 20 जनवरी तय भी कर ली थी. मकान बनवाई का काम आखिरी दौर में था, इसलिए अमर सिंह ने 3 मजदूर लगा लिए, जिस से कि वक्त पर गृह प्रवेश हो जाए.
ये 3 मजदूर थे विदिशा का रहने वाला जीतू उर्फ भरतलाल अहिरवार और बाकी 2 जवान लड़कियां थीं. इन में से 35 साला मंजू नट उडि़या बस्ती में रहती थी और उस की 25 साला सहेली टीना नट उस की पड़ोसन थी.
जीतू व अमर सिंह की जानपहचान पुरानी थी. जीतू की सिफारिश पर कुछ दिन पहले ही अमर सिंह ने उन दोनों लड़कियों को अपने मकान के काम में लगा लिया था.
जल्द ही मंजू और टीना की जवानी देख रंगीनमिजाज अमर सिंह का दिल डोलने लगा. शौकीन तो वह था ही और किस्मकिस्म की औरतों को भोग चुका था, लिहाजा उसे लगा कि थोड़ी कोशिश की जाए, तो इन में से कोई एक पट ही जाएगी. टीना ने तो घास नहीं डाली, लेकिन मंजू से हंसीमजाक शुरू हो गया.
मिस्त्री होने के चलते अमर सिंह का पाला कई मजदूर औरतों से पड़ा था. वह उन की पैसे की जरूरतों को खूब समझता था. धीरेधीरे उस ने मंजू से नजदीकियां बढ़ाईं और उसे लालच देना शुरू कर दिया.
मंजू ने थोड़ी घास डाली, तो अमर सिंह को लगा कि शिकार जाल में आ फंसा है. लिहाजा देर नहीं करनी चाहिए. मंजू को फंसाने के चक्कर में कुछ दिनों से उस ने किसी कालगर्ल को भी नहीं बुलाया था. इसलिए उस की जिस्मानी भूख और भड़कती जा रही थी.
जल्द ही अमर सिंह ने मंजू से छेड़छाड़ शुरू कर दी, जिस पर मंजू ने एतराज तो जताया, पर वह इतना सख्त नहीं था कि अमर सिंह उसे उस की न समझ लेता.
वैसे, अमर सिंह को यह नहीं मालूम था कि शादीशुदा मंजू जीतू की माशूका थी. जब मंजू ने अमर सिंह की हरकतों के बारे में जीतू को बताया, तो उस का खून खौल उठा और उस ने मंजू और टीना के साथ मिल कर अमर सिंह को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली.
नए साल की शुरुआत में उस ने अमर सिंह को बताया, ‘‘मंजू और टीना चिकन बहुत जायकेदार बनाती हैं. क्यों न एक दिन की पार्टी तुम्हारे यहां रख ली जाए?’’
अमर सिंह ने तुरंत हामी भर दी और 14 जनवरी को पार्टी की रात तय हुई. इस दिन अमर सिंह के रसोईघर से चिकन की ऐसी खुशबू आ रही थी कि पूरा महल्ला उसे सूंघता रहा.
अंदर खाना तैयार होता रहा और कमरे में जीतू और अमर सिंह शराब पीते अपनी भूख बढ़ाते रहे. लेकिन अमर सिंह को एहसास भी न था कि थोड़ी देर बाद क्या होने वाला है.
ज्यादा शराब पीने से अमर सिंह लुढ़कने लगा, तो जीतू के बुलावे पर वे दोनों बाहर आईं. मंजू ने अमर सिंह के हाथ जकड़े और टीना ने पांव पकड़े. फिर जीतू ने गरदन पर कुल्हाड़ी से हमला कर के उस का काम तमाम कर दिया.
इस के बाद वे तीनों अमर सिंह का पर्स, मोबाइल फोन, घर की चाबी और स्कूटर ले कर फरार हो गए.
3 दिन बाद मकान से बदबू आने लगी, तो लोगों ने पुलिस को खबर दी. अमर सिंह की लाश सड़ चुकी थी. पूछताछ में जल्द ही उजागर हो गया कि हादसे की रात जीतू, मंजू और टीना उस के घर आए थे. निशातपुरा थाने की पुलिस ने शक की बिना पर उन्हें हिरासत में लिया, तो तीनों ने कत्ल की वारदात कबूल कर ली.
क्या करें अकेले बूढ़े
बुढ़ापे में रंगीनमिजाजी आम बात है, खासतौर से उन बूढ़ों की, जिन के आगेपीछे कोई नहीं होता है.
बूढ़े सैक्स की अपनी जरूरत पूरी करें, तो यह उन का हक है, लेकिन अमर सिंह जैसे बूढ़े अकसर गच्चा खा जाते हैं. देखा जाए, तो अमर सिंह बदले का नहीं, बल्कि साजिश का शिकार हुआ, नहीं तो इस से पहले वह कालगर्ल लाता था, तयशुदा रकम देता था और सुबह उन्हें चलता कर देता था.
अकेले रह रहे बूढ़ों का कालगर्ल के पास जाना या फिर घर ला कर सुख भोगना उतनी ही आम बात है, जितनी नौजवानों का ऐसा ही करना. फर्क इतना है कि बूढ़ों से कालगर्ल को ज्यादा पैसा मिल जाता है.
भोपाल के एमपी नगर इलाके की 26 साला एक कालगर्ल कामिनी (बदला नाम) की मानें, तो आजकल उन के ग्राहकों में बूढ़ों की तादाद तकरीबन 25 फीसदी होती है.
बकौल कामिनी, ‘‘जरूरतमंद बूढ़े दलालों के जरीए उन तक पहुंचते हैं, कभी सीधे भी सौदा हो जाता है. ये लोग जल्दबाजी में ज्यादा भावताव नहीं करते और थोड़ा डरते भी हैं.’’
कामिनी इस बाबत बूढ़ों को ज्यादा कुसूरवार नहीं मानती. वह कहती है कि ये बेचारे क्या करें और कहां जाएं. अगर मालदार हों तो हर किसी की नजर इन के माल पर रहती है, इसलिए खुद औरतें इन पर डोरे डालती हैं. लेकिन समझदार बूढ़े कालगर्ल्स को ज्यादा महफूज मानते हैं.
कुछ बूढ़े जोश के लिए इश्तिहार पढ़ कर ताकत और मर्दानगी वाली दवाएं भी खरीदते हैं.
भोपाल के शाहपुरा इलाके के मनीषा मार्केट के एक कैमिस्ट अनिल ललवानी की मानें, तो बड़ी तादाद में बूढ़े इश्तिहारों वाली पलंगतोड़ दवाएं खरीद कर ले जाते हैं और कंडोम भी खरीदते हैं.
जाहिर है, बूढ़ों को भी हक है कि वे सैक्स का सुख उठाएं, लेकिन जरूरी यह है कि इस में एहतियात रखें, नहीं तो अंजाम अमर सिंह सरीखा भी हो सकता है, जो जल्दबाजी के चलते मारा गया.
ऐसे महफूज रह सकते हैं आशिकमिजाज बूढ़े
* सैक्स के लिए कालगर्ल्स जानपहचान वालियों से बेहतर साबित होती हैं.
* अगर औरतों या कालगर्ल्स के साथ कोई मर्द दिखे, तो उस से जल्द पल्ला झाड़ लेना चाहिए. ये लोग किसी गिरोह वाले भी हो सकते हैं.
* जब कालगर्ल लाएं, तो उस पर रोब डालने के लिए अपनी दौलत का जिक्र न करें, न ही घर में ज्यादा नकदी और कीमती सामान रखें.
* कालगर्ल का मोबाइल फोन बंद करवा दें, जिस से वह बातचीत टेप न कर सके और न ही वीडियो फिल्म बना कर बाद में ब्लैकमेल कर सके.
* सैक्स की लत इस उम्र में इतनी न लगाएं कि रोजरोज इस की जरूरत पड़ने लगे.
* कालगर्ल या कोई दूसरी औरत लाएं, तो नशा खासतौर से शराब का सेवन बिलकुल न करें. अमर सिंह की यही गलती उस की आसान मौत की वजह बनी.
* सैक्स में कमजोरी आजकल नौजवानों में भी आम बात है. वैसे भी सैक्स पर उम्र का कोई खास असर नहीं पड़ता. अगर इश्तिहार वाली दवाओं से खुद पर भरोसा बढ़ता है, तो उन्हें लेने में हर्ज नहीं है.
* सैक्स के दौरान कंडोम का इस्तेमाल जरूर करें. इस से सैक्स संबंधी बीमारियां होने का खतरा नहीं रहता.

एक्टर करिश्मा शर्मा हमेशा से ही अपनी हौट अदाओं की वजह से मशहूर हैं लेकिन इस बार तो उन्होंने अपने सेक्सी अंदाज से लोगों के होश उड़ा दिए हैं. जाने माने फोटोग्राफर अमित खन्ना ने करिश्मा शर्मा की ये तस्वीरें क्लिक की हैं. सोशल मीडिया पर खन्ना ने उनकी कुछ तस्वीरें भी शेयर की हैं.
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इन तस्वीरों में दिख रहा है कि करिश्मा शर्मा फर से बनी हुए कपड़े से खुद को ढ़के हुए दिख रही हैं. इस तस्वीर को शेयर करते हुए अमित खन्ना ने लिखा- The fur story with the sensational करिश्मा शर्मा.
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ये फोटोशूट करिश्मा शर्मा ने पिछले साल दिसंबर में न्यू ईयर कैलेंडर के लिए कराया था. उसके बाद से ही फोटोग्राफर अमित खन्ना समय-समय पर करिश्मा के इस फोटोशूट की तस्वीरें शेयर करते रहते हैं.
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इससे पहले करिश्मा शर्मा ‘रागिनी एम.एम.एस 3 और ‘प्यार का पंचनामा’ जैसी फिल्मों में भी नज़र चुकी हैं. ये अभिनेत्री ‘पवित्र रिश्ता’ जैसे कई सीरियल में भी अपनी अदाकारी से लोगों को इंप्रेस कर चुकी हैं.