शर्मनाक: कहार बने कांवड़ियों का कहर 

इसी साल जुलाई के महीने में दिल्ली के मोतीनगर इलाके में एक कार जरा सी छू जाने पर कांवडि़यों ने कार को बीच सड़क पर लोहे की छड़ों और डंडों से तहसनहस कर डाला.

वारदात के वक्त पुलिस तमाशबीन बनी रही. कार में सवार शख्स को किसी तरह अपनी जान बचानी पड़ी.

ऐसे ही शाहजहांपुर के मोहम्मदी मार्ग पर बना रेलवे गेट बंद होने पर कांवडि़यों ने जम कर उत्पात मचाया. गेट खुलवाने के लिए वे गेटमैन के केबिन में घुस गए और जबरन गेट खुलवाने की कोशिश करने लगे.

गेट न खोलने पर कांवडि़यों ने गेट को तोड़ दिया और पथराव किया. इस बवाल के चलते कई घंटे तक यातायात बंद करना पड़ा.

बुलंदशहर में भी कांवडि़यों ने जम कर कहर बरपाया. एक कार चालक के साथ झगड़े के बाद कांवडि़यों ने कार में तोड़फोड़ की, कार सवार को मारापीटा और जब पुलिस आई तो पुलिस वालों के साथ हाथापाई करने लगे और पुलिस की गाड़ी में भी तोड़फोड़ की.

मुजफ्फरनगर में कांवडि़यों ने कार के छू जाने पर कार को तोड़ दिया. कार सवार को घायल कर दिया. सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में दिखाया गया कि भगवा कच्छाबनियान पहने तकरीबन 15 कांवडि़यों ने कार को घेर रखा था और वे लाठीडंडों से तोड़फोड़ कर रहे थे.

दिल्ली से हरिद्वार मार्ग पर शराब पी रहे कांवडि़यों में से एक ने बोतल तोड़ कर दूसरे के पेट में घोंप दी. कांवडि़यों द्वारा रास्ते में शराब पीते हुए कई वीडियो वायरल हुए.

कांवडि़यों की गुंडागर्दी की ये घटनाएं एक ही हिस्से की हैं. देश के दूसरे हिस्सों में भी इसी तरह के हंगामों की खबरें भरी हुई हैं.

इस तरह की घटनाएं ऐसे वक्त

पर होती हैं जब सरकार, प्रशासन और सामाजिक व धार्मिक संगठन कांवडि़यों के लिए पलकपांवड़े बिछाए बैठा रहा और उन के लिए बेहतर से बेहतर इंतजाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

इस बार तो उत्तर प्रदेश की भगवा सरकार के डीजीपी प्रशांत कुमार द्वारा हैलीकौप्टर में सवार हो कर कांवडि़यों पर फूल बरसाए गए उसी तरह जैसे धर्मग्रंथों में देवताओं द्वारा ऋषियोंमुनियों पर बातबात में पुष्प वर्षा करने का जिक्र किया गया है.

वैसे, ज्यादातर पुष्प वर्षा दूसरों को सताने, पीड़ा देने की सलाह जैसी बातों पर की जाती थीं. कांवडि़यों के स्वागतसत्कार के लिए सड़कों पर जबरन कब्जा करने और चंदा वसूलना आम बात है. स्वागत वाले पंडालों में कांवडि़यों के मनोरंजन के लिए कानफोड़ू डीजे पर फूहड़ गीतसंगीत के रातभर बजने से आसपास के लोगों की नींद हराम होती है. मरीजों और बच्चों की पढ़ाई पर चाहे बुरा असर पड़े, धर्म के कारनामे जारी रहने चाहिए.

हर साल दिल्लीदेहरादून हाईवे कांवडि़यों की वजह से बंद करना पड़ता है. कांवड़ यात्रा के दौरान कांवडि़यों द्वारा इस रास्ते पर छेड़छाड़, बलात्कार, नशाखोरी, मारपीट, तोड़फोड़ करना आम बात है. आम लोगों को कांवडि़यों के चलते बड़ी परेशानी झेलनी पड़ती है.

पूरे रास्ते राहगीरों को धमकाते, कानून की धज्जियां उड़ाते, औरतों को देख कर बेहूदा फब्तियां कसते, लाठीडंडे से तोड़फोड़ करते इन की गुंडागर्दी जारी रहती है. बेकुसूर लोगों को जाम मेें फंसे रहना पड़ता है.

हर साल शिव की पूजा और शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाने के नाम पर भारत में यह संगठित सनातन धार्मिक उन्माद देखा जा सकता है. पिछले कुछ समय से कांवडि़यों का सैलाब ज्यादा बढ़ रहा है जिन की अंधभक्ति का शिकार आम जनता को होना पड़ रहा है.

कौन हैं ये लोग

सदियों से धर्म के सताए ये वे लोग हैं जिन के साथ हिंदू धर्म ज्यादती करता रहा है. धर्मगं्रथों ने जिन्हें अछूत करार दिया. दूसरों की सेवा करना, जूठन खाना, उतरे हुए कपड़े पहनना और बस्तियों के बाहरी हिस्से में रिहायश करने का इन लोगों को ईश्वरीय आदेश मिला था. पढ़नेलिखने की इन को इजाजत नहीं थी. फिर भी किसी ने पढ़ने की हिम्मत दिखाई तो उस के कानों में पिघलता हुआ सीसा उड़ेल देने की सजा मुकर्रर थी.

ज्यादातर कांवडि़ए शूद्र, दलित होते हैं जिन्हें अब भाजपा ने भगवा पहनने की इजाजत तो दे दी है, पर उन का काम वही कहार बन कर बोझा ढोने का है. गंगा का कीचड़ भर कांवड़ ढो कर मंदिरों तक पहुंचाने का काम सौंप दिया गया है. यानी अब भी शूद्रों को ऊंची जाति के देवीदेवताओं की पूजा करने की इजाजत नहीं है.

सदियों से धार्मिक कर्मकांडों से दूर रखे गए ये लोग अब अपनी दबी इच्छाओं को पूरा करने के लिए अराजकता का रास्ता अख्तियार कर रहे हैं. इन में से ज्यादातर गरीब, अनपढ़ या कम पढ़ेलिखे बेरोजगार हैं.

आधे से ज्यादा कांवडि़ए नशाखोरी और छोटेमोटे अपराधों में लिप्त रहते हैं. दिल्ली के मोतीनगर इलाके की घटना में पकड़ा गया राहुल उर्फ बिल्ला अनपढ़ बेरोजगार है और पुलिस के मुताबिक वह चोरी के मामले में जेल भी जा चुका है.

कौन भेजता है

गंगा जैसे पवित्र तीर्थ स्थल से सावन के महीने में कांवड़ से जल ला कर शिव पर चढ़ाने से पाप कटने, पुण्य मिलने और इच्छाओं का पूरा होने का झांसा दे कर मंदिरों में बैठे पंडेपुजारी, धर्म के नाम पर मोटा चंदा वसूलने वाले धार्मिक संगठन निचली, पिछड़ी जातियों को धर्म के ऐसे पाखंडों की ओर धकेल रहे हैं.

पंडों की सलाह मान कर बड़ी तादाद में नौजवान कांवड़ ढोने चल पड़ते हैं, पर इन लोगों को अपनी जातीय सीमा के अंदर ही रखने की कोशिश की गई है कि तुम कहार बन कर ही रहोगे यानी सेवक हो तो दास की तरह ही रहोगे. निचले व पिछड़े भगवा पहन कर धार्मिक कर्मकांड करने से ही खुश हो रहे हैं. भाजपा, संघ यही तो चाहता है.

देश का तकरीबन 50 फीसदी पिछड़ा शूद्र नौजवान अब धर्म के ठेकेदारों के इस्तेमाल का हथियार बन रहा है. वह सोच रहा है कि धर्म उस का कल्याण करेगा. धर्म और राजनीति बिना दिमाग लेकिन शारीरिक बल वाले नौजवानों को अपने सियासी और धार्मिक मकसद के लिए उपयोग करने में माहिर है. उसे इस में कामयाबी भी मिल रही है क्योंकि जब तक लोग बेवकूफ बने रहेंगे, तब तक धर्म के धंधेबाजों की दुकानें चमकती रहेंगी.

घिनौनी राजनीति की भेंट चढ़ते हिंदीभाषी

एक समय था जब पंजाब माली तौर पर मजबूत था. वहां के किसान उत्तर भारतीय मजदूरों की जीतोड़ मेहनत के बलबूते चमचमाती गाडि़यों और कोठियों के मालिक बन बैठे थे. यह वह दौर था जब उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों के चरमराते सिस्टम और बेरोजगारी से लोग अपना घरबार छोड़ने पर मजबूर हो गए थे और पंजाब, दिल्ली जैसे राज्यों में मेहनतमजदूरी कर के अपनी रोजीरोटी चला रहे थे. वक्त ने करवट बदली तो सरकारी योजनाओं खासकर मनरेगा ने उन्हें वापसी का रास्ता दिखाया.

पंजाब के किसानों की हालत अब बेहद खस्ता है, क्योंकि ज्यादातर उत्तर भारतीय मजदूर या तो दूसरे राज्यों की ओर रुख कर चुके हैं या फिर अपने राज्य लौट गए हैं. अब न तो सस्ते में काम करने वाले मजदूर रह गए हैं और न ही पंजाब में वैसी खुशहाली है. गेहूं और खरीफ फसलों की पैदावार कर भारतीय इकोनौमी को मजबूती देने वाला पंजाब अब नशे की गिरफ्त में है. ज्यादातर खेत बंजर पड़े हैं और किसानों के चेहरे पर पहले जैसी हंसी भी नहीं है. क्यों भागने पर मजबूर हाल ही में हुई एक हिंसक घटना से हीरों और कपड़ों के प्रोडक्शन में आगे रहने वाले गुजरात के कारोबारियों के चेहरे सूखे हुए हैं. मालूम हो कि सूरत, अहमदाबाद जैसे गुजरात के बड़े शहरों में कपड़ा मिलों में काम करने वाले और हीरों को तराश कर चमकाने वाले उत्तर भारतीय मजदूर अब गुजरात से बड़ी तादाद में भाग रहे हैं.

दरअसल, यह भागना राज्य में भड़की एक हिंसा के बाद हो रहा है जब 28 सितंबर, 2018 को साबरकांठा जिले में एक 14 महीने की मासूम बच्ची के साथ बलात्कार के आरोप के बाद राज्य के 6 जिलों में हिंदीभाषी लोगों के खिलाफ हिंसा भड़क उठी थी. हालांकि इस बलात्कार के आरोप में बिहार के एक मजदूर के पकड़े जाने के बाद भड़की हिंसा के खिलाफ तकरीबन 450 लोगों को गिरफ्तार किया गया है और 50 से ज्यादा प्राथमिकियां दर्ज की गई हैं. घटना से उपजा संकट इस घटना से उपजे संकट ने एक तरफ जहां वहां काम कर रहे मजदूरों को भागने के लिए मजबूर कर दिया तो वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक दलों की सियासी रोटियां भी सिंकनी शुरू हो गईं.

कांग्रेस ने भाजपा पर लोगों को क्षेत्र के नाम पर बांटने का आरोप लगाते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राज्य के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी को इस की जिम्मेदारी लेनी चाहिए. कांग्रेस प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी ने मीडिया से बातचीत में कहा, ‘‘नरेंद्र मोदी के गुजरात में प्रवासी लोगों को डरायाधमकाया और भगाया जा रहा है. ‘‘उत्तर प्रदेश और बिहार की जनता आप को चुन कर भेजती है. अब वहीं के लोगों को भगाया जा है. अब आप किस मुंह से उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जाएंगे?’’ कांग्रेस ने यहां तक कह दिया कि जहांजहां भाजपा की सरकारें हैं वहांवहां डर का माहौल है. उधर, राज्य के गृह मंत्री प्रदीप सिंह जडेजा ने किसी का नाम लिए बगैर कहा, ‘‘गुजरात की इस घटना के पीछे यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि क्या यह उन लोगों की साजिश है जो 22 साल से गुजरात की सत्ता से बाहर हैं?’’ प्रदीप सिंह जडेजा ने अपने बयान में बताया कि राज्य के हालात की केंद्र सरकार को जानकारी दे दी गई है और हालात काबू में हैं. सिक्के का दूसरा पहलू जिस अपराधी ने यह गंदा काम किया वह गिरफ्तार हो चुका है. कानूनन उसे कड़ी से कड़ी सजा भी मिलेगी और मिलनी भी चाहिए, पर सवाल यह है कि किसी एक के इस गलत काम से बाकियों को भी कठघरे में खड़ा करना कौन सी समझदारी है?

जाहिर है, घटना के बाद राजनीतिक दल अपनीअपनी रोटियां सेंकने में लग जाते हैं और भुगतते वे बेकुसूर हैं जिन का इस तरह के अपराधों से कोई वास्ता नहीं होता. कहीं साजिश तो नहीं भड़की हिंसा के पीछे एक वजह उत्तर भारतीयों का कम पैसे में बेहतर काम करना भी है, जो अपने काम से मालिकों का दिल जीत लेते हैं और फिर धीरेधीरे खुद को मजबूत कर लेते हैं. ऐसे में वहां के रहने वाले लोग खुद को ठगा सा महसूस करते हैं. बड़ीबड़ी कंपनियां भी बाहरी मजदूरों को काम यह सोच कर भी देती हैं कि कम पैसे में बेहतर काम हो तो फायदा हर हाल में कंपनी को होगा. साथ ही, अगर लोकल कामगार होंगे तो लोकल राजनीति कंपनी पर हावी होने लगती है.

दूसरा, गुजरात चूंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह का गृह प्रदेश भी है इसलिए देश के बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, पश्चिम बंगाल वगैरह जो भाजपा के गढ़ भी हैं, से आने वाले मजदूरों, बाहरियों पर किसी भी वजह से हमले कराए जाएं ताकि गुजरात विरोधी लहर पैदा हो. नरेंद्र मोदी और अमित शाह को सिर्फ गुजराती के रूप में पेश कर उन्हें राजनीतिक रूप से नीचा दिखाया जाए. उधर, गुजरात के करोबारियों की हालत पतली है कि नोटबंदी और जीएसटी की वजह से खस्ताहाल कारोबार पर अब कुशल और मेहनतकश मजदूरों की मार पड़ेगी जो कम मजदूरी में भी कारोबार की तरक्की के लिए जीजान से लगे थे.

हिंसा में शामिल कुछ अराजक तत्त्वों को इस से कुछ लेनादेना नहीं होगा क्योंकि कुछ लोगों का काम ही है अराजकता फैलाना और लोगों का इस्तेमाल करना ताकि उन की राजनीति चमकती रहे. गुजरात में जो हो रहा है, वह भाजपा के लिए खतरे की घंटी जरूर है जिस की पटकथा शायद जनता 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए लिख चुकी है.

मेरी देह मेरा अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने एक नए फैसले में 158 साल पुराने कानून, जिसमें किसी अन्य की पत्नी के साथ सहमति से यौन संबंध बनाने पर भी दंड दिया जा सकता है, असंवैधानिक करार दिया है. यह कानून अपनेआप में अनैतिक था और हमेशा इस पर आपत्तियां उठती रही हैं पर पहले हिंदू कानून और फिर अंगरेजी कानून बदला नहीं गया. रोचक बात यह है कि यदि पति किसी के साथ संबंध बनाए तो पत्नी को यह हक नहीं था कि वह शिकायत कर सके. एक और रोचक बात इस कानून में यह थी कि गुनहगार पत्नी नहीं परपुरुष ही होता था.

इस कानून का आधार यह था कि पत्नियां पतियों की जायदाद हैं और परपुरुष उन से संबंध बना कर संपत्ति का दुरुपयोग न करें. यदि पति इजाजत दे दे तो यह कार्य दंडनीय न था. यानी मामला नैतिकता या विवाह की शुद्धता का नहीं, मिल्कीयत का था.

पहले भी 2-3 बार यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका या और एकतरफा होने के कारण इसे असंवैधानिक करने की मांग की जा चुकी थी पर अदालतों ने हस्तक्षेप नहीं किया और न ही संसद ने यह कानून बदला. अंगरेजों को दोष देने की जगह असल में भारतीय संसद इस कानून के लिए जिम्मेदार है जिस ने 70-75 साल इसे थोपे रखा.

वैसे यह कानून निष्क्रिय सा ही था और बहुत कम मामले ही दर्ज होते थे, पर फिर भी विवाहित औरत और उस के प्रेमी पर तलवार तो लटकी ही रहती थी कि न जाने कब पति शिकायत कर दे और प्रेमी जेल में बंद हो जाए और पत्नी की जगहंसाई हो जाए.

बहुत सी विवाहिताएं अपने पति का घर छोड़ कर प्रेमी के साथ रहने से कतराती थीं कि कहीं पुलिस मामला न बन जाए पर पत्नी के पास यह अधिकार न था कि वह किसी और विवाहिता या अविवाहिता के साथ रहने वाले पति पर मुकदमा दायर कर सके.

हां, वैवाहिक कानून में इस मामले में दोनों को तलाक लेने का हक पहले से ही बराबर का है पर प्रक्रिया लंबी है और थाने के चक्कर वकीलों के चक्करों से ज्यादा दुखदाई होते हैं.

पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह अनैतिक कार्य व्यभिचार है और परपुरुष को ही अपराधी बनाना गलत नहीं, क्योंकि इस से गैरपुरुष के साथ यौन संबंध बनाने वाली औरत को सुरक्षा व संरक्षण मिलता है. सुप्रीम कोर्ट बराबर का मतलब यह मान रहा था कि पत्नी पर भी मुकदमा चले.

अब के फैसले में यह कहा गया है कि पत्नी पर भी आपराधिक मामला नहीं बनेगा और उस के प्रेमी पर भी नहीं. इस फैसले का मतलब अब यह भी है कि लोकसभा भी कानून नहीं बना सकती क्योंकि यह गैरसंवैधानिक घोषित कर दिया गया है. यदि संसद पहले से कानून बना कर कुछ करती तो गुंजाइश थी कि सांसद मनचाहा बीच का रास्ता अपना लेते.

यह सैक्स संबंधों में उदारता का लाइसैंस नहीं है, यह स्त्रीपुरुष के संबंधों को थानेदारों से बचाने का कवच है. पतिपत्नी संबंध आपसी सहमति का संबंध है, इस में कानून की सहायता से जोरजबरदस्ती नहीं चलनी चाहिए. नैतिकता का पाठ पढ़ाने और हिंदू संस्कृति की दुहाई देने वाले अगर अपने धर्म ग्रंथों के पृष्ठ खंगालेंगे तो पाएंगे कि जिन देवीदेवताओं को वे पूजते हैं उन में से लगभग हर देवीदेवताओं के विवाहेतर संबंध रहे हैं.

भारतीय समाज में घरों में भी और बाजारों में भी सैक्स का खुलापन आज भी है और हम जो शराफत का ढोल पीटते हैं वह केवल इसलिए कि हम सब अपनी खामियों को छिपा कर रखने में सफल रहे हैं. हम हर उस व्यक्ति का मुंह तोड़ सकते हैं जो सच कहने की हिम्मत करता है और महान भारतीय हिंदू संस्कृति का राज केवल यहीं तक सीमित है. आज जो बलात्कार के मामले सामने आ रहे हैं, इसलिए कि औरतों को संपत्ति मानने की तो सामाजिक, सांस्कारिक सहमति पहले से ही है. अगर औरत सड़क पर दिखे तो उसे उठा कर वैसे ही इस्तेमाल करा जा सकता है जैसे सड़क पर पड़े 2 हजार रुपए के नोट को.

पतिपत्नी संबंध बराबर के हों, मधुर हों, सुखी हों, यह जिम्मेदारी पतिपत्नी दोनों की है, बराबर की है. कानून की धौंस दे कर अब पति अपनी पत्नी को किसी और से बात करने पर धमका नहीं सकता. यह नैतिक, प्राकृतिक और मौलिक अधिकार है.

लीरा द सोलमेट: जनम जनम का साथ

प्यार किसी भी तरह की सीमाओं को नहीं मानता. वह अपनी जिंदगी के प्यार की तलाश में एक अंतरिक्ष से दूसरे अंतरिक्ष तक की यात्रा करता है. इसी बात को चित्रित करने वाली अंतरिक्ष की प्रेम कहानी वाली फिल्म है – ‘‘लीरा द सोलमेट’’. यह भारत की पहली सौ प्रतिशत वीएफएक्स फिल्म है. इसे आईटीएम यूनिवर्सिटी द्वारा ‘‘सर्वश्रेष्ठ वीएफएक्स’’ के लिए पुरस्कृत किया जा चुका है.

 movie review of lira the soulmate

यह कहानी है आकाशगंगा में विचरते तमाम ग्रहों, उपग्रहों की पृष्ठभूमि में कहानी चलती है. यह कहानी है अंतरिक्ष शोधकर्ता लीरा (लीरा कालजय) की. भारतीय संस्कृति में पली बढ़ी और भारतीय संस्कृति में आकंठ डूबी लीरा को पता चलता है कि उसका सोलमेट लीरा नामक अंतरिक्ष में रहता है. तब लीरा अंतरिक्ष शोधकर्ता के रूप में अंतरिक्ष यात्री बनकर लीरा नामक ग्रह पर पहुंचती है. और वह अपने सोलमेट (मेहुल आडवाणी) को ढूढ़ने में कामयाब होती है. क्योकि सोलमेट में कई समानताएं होतीहैं.

इसी तरह लीरा और उसके सोलमेट में समानता है कि दोनों की जीभ उनकी नाक तक पहुंचती है. मजेदार बात यह है कि अंतरिक्ष यात्री लीरा और लीरा ग्रह पर मौजूद पुरुष की जीभ उनकी नाक तक पहुंचती है. दोनों भारतीय संस्कृति में यकीन करते हैं. दोनों का स्वभाव भी एक जैसा है. यानी कि दो प्लानेट के लोगों की प्रेम गाथा है. पूरी कहानी अंतरिक्ष मे प्रेम को दर्शाती है. यह अंतर्मन के प्यार की बात करती है.

दो प्लानेट यानी कि अंतरिक्ष के प्रेमियों का मिलन, आपस में  संवाद करना, प्रेम गीत गाना आदि को शानदार ढंग से परदे पर उभारने में वीएफएक्स का बहुत सही ढंग से उपयोग किया गया है.

फिल्म में प्रेम कहानी के साथ रोमांचक पल भी हैं. भावनात्मक दृश्य आकर्षित करते हैं. फिल्म में सोलमेट को परिभाषित करने वाले संवाद भी हैं. मसलन-यूनिवर्स में जिस किसी की भी जीभ उसकी नाक तक पहुंचेगी, वो मेरा सोलमेट तो नहीं हो सकता न?

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जहां तक अभिनय का सवाल है तो लीरा कालजय और मेहुल अडवाणी दोनों ने अपने किरदारों के साथ पूर्णरूपेण न्याय किया है.फिल्म का हर दृश्य लाजवाब व शानदार है. फिल्म में अद्भुत रोमांस भी है. फिल्म की कहानी कभी गुदगुदाती है तो कभी अचंभित करती है.

फिल्म का गीत संगीत आकर्षित करता है. फिल्म का शीर्ष गीत ‘‘तुम्ही तो मेरी सोलमेट हो, गौड की भेंट हो मेरे लिए..’’ काफी पसंद किया जा रहा है.

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बौलीवुड की पहली वीएफएक्स फिल्म ‘‘लीरा द सोलमेट’’ के निर्माता व निर्देशक डां. सुमनेश श्री कालजय, कौंसेप्ट ऊषा कालजय, गीत व संवाद लेखक ऊषा कालजय हैं. तथा कलाकार हैं-  लीरा कालजय, मेहुल आडवाणी व दो सौ कलाकार.

 

नमस्ते बिहार : बिहार की अस्मिता को बचाने की लड़ाई

अपराध और राजनेताओं के गठजोड़ को एक मनोरंजक कहानी के साथ बिहार की पृष्ठभूमि में पेश करने वाली फिल्म का नाम है -‘‘नमस्ते बिहार’’. जिसमें अपराध जगत के साथ साथ मिड डे मील में हो रहे भ्रष्टाचार को लेकर काफी बातें की गयी हैं. फिल्म में बिहार को उर्वरक प्रदेश बताते हुए बिहार के योगदान की गौरव गाथा का भी चित्रण है.

फिल्म की शुरुआत एक गाने के साथ होती है, जिसमें फिल्म के नायक बिहार की गौरव गाथा गाते हुए बिहार की शिक्षा, संस्कृति व बिहार में पैदा हुए महानुभावों व शहीदों की बात करता है. उसके बाद कहानी शुरू होती है पटना से दूर नदी किनारे बसे एक कस्बे में रह रहे निडर व बेबाक नवयुवक डब्लू (राजन कुमार) से. डब्लू अपनी मौसी के साथ रहता है और उसकी मौसी एक स्कूल में मिड डे मील बनाने व बच्चों को खिलाने का काम करती है.

डब्लू के माता पिता भी इसी कस्बे में रहते हैं. मगर वह डब्लू से नाराज चल रहे हैं. उसी कस्बे की लड़की शांति, डब्लू से प्यार करती है. डब्लू तेज दिमाग का प्रतिभाशाली युवक है. मगर कुछ सफेदपोश व दबंग किस्म के लोग उसे अपराध की दुनिया से जोड़ लेते हैं.

डब्लू एक आपराधिक गतिविधियों से जुड़ संगठन ‘‘जय त्रिशूल जय नाग’’ से जुड़ा हुआ है. जिसका मुखिया गेंदा है और गेंदा एक राजनेता प्रभू यादव के लिए काम कर रहा है. एक दिन प्रभू यादव, गेंदा को सभासद बनवा देता है, तो गेंदा डब्लू को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर देते हैं.

डब्लू एक गुमराह युवक जरुर है, लेकिन उसके भी अपने कुछ उसूल व आदर्श हैं. गुंडागर्दी के क्षेत्र में रहते हुए भी उसके अंदर अपने कुछ अच्छे गुण हैं, जिसके चलते समाज में लोग उसकी इज्जत भी करते हैं. इतना ही नहीं खुद डब्लू, रेशमी सिन्हा (भूमिका कलिता) की इज्जत करता है. रेशमी सिन्हा बिहार से प्यार करने वाली बिहार के बेबाक अखबार ‘‘नमस्ते बिहार’’ में कार्यरत इमानदार पत्रकार है. जो कि बिहार को अपराधमुक्त बनाने के मकसद के साथ दिल्ली से बिहार आयी है. डब्लू उनकी लेखनी का दीवाना है.

एक दिन नए सभासद बने गेंदा की हरकतों के चलते स्कूलों में पहुंचने वाला मिड डे मील का अनाज प्रभू यादव के गोदाम में पहुंचने लगता है और सड़ा गला अनाज स्कूल में पहुंचाया जाने लगता है. एक दिन सडे़ गले अनाज की वजह से डब्लू की मौसी के स्कूल कुछ बच्चे मौत के मुंह में समा जाते हैं. इससे डब्लू और रेशमी सिन्हा काफी दुःखी होते हैं. पर गेंदा व प्रभू यादव खुद को,अपने अन्य साथियों व सरकारी अफसरों को बचाने के लिए लिए ऐसा चक्रव्यूह रचते हैं कि डब्लू की मौसी की गिरफ्तारी हो जाती है. उन पर आरोप है कि भोजन में मरी छिपकली की अनदेखी की.

इस पर डब्लू को यकीन नहीं होता. क्योंकि वह स्वयं हर रोज उन्ही स्कूली बच्चों के साथ बैठकर मिड डे मील खाया करता था. पर उस दिन वह देर से पहुंचा था. इसी बीच शांति, रेशमी सिन्हा को असलियत बताती है.      डब्लू सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है, लेकिन जब बात बिहार की अस्मिता की हो, तो वह किसी भी खतरे को मोल लेने के लिए तैयार रहता है. इसीलिए वह बिहार के दुश्मनों के खिलाफ मोर्चा खोल देता है.

अब रेशमी सिन्हा और डब्लू स्कूलों के मिड डे मील के मामले में हो रहे भ्रष्टाचार को उजागर करना शुरू करते है. पहले प्रभू व गेंदा, रेशमी सिन्हा को धमकाते हैं. फिर उसे मारने का ऐलान कर देते हैं. तब डब्लू, रेशमी का साथ देते हुए गेंदा व प्रभू के खिलाफ खड़ा हो जाता है. अब यह दोनों मिड डे मील के भ्रष्टाचार के सबूत पटना जाकर मुख्यमंत्री को देने के लिए निकलते हैं.गुंडे उनके पीछे हैं. पटना में मुख्यमंत्री आवास के पास डब्लू मारा जाता है, पर रेशमी सिन्हा मुख्यमंत्री को सबूत का पेन ड्राइव देती है. सारे अपराधी पकड़े जाते हैं.

पटकथा लेखक की अपनी कुछ कमियों के चलते बेहतरीन विषय वस्तु वाली फिल्म ‘‘नमस्ते बिहार’’ बेहतरीन फिल्म बनते बनते रह गयी. फिल्म के संवाद भी बहुत सतही स्तर के हैं. फिल्म के निर्देशक भी अपने कलाकारों की प्रतिभा का सदुपयोग करने में विफल रहे हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल हैं,तो चार्ली चैप्लीन के किरदार को नाटकों में अभिनय कर सैकड़ों पुरस्कार जीतने के साथ ही‘चार्ली चैप्लीन द्वितीय’ कहलाने वाले अभिनेता राजन कुमार ने फिल्म में डब्लू का किरदार निभाया है. यूं तो राजन कुमार ने अपनी तरफ से पूरी मेहनत की है. पर कमजोर पटकथा व निर्देशक की कमजोरियों के चलते उनका किरदार पूरी तरह से उभर नहीं पाया.

फिल्म की नायिका भूमिका कलिता को अभी बहुत ज्यादा मेहनत करने की जरूरत है. बिहार की कुछ लोकेशनों को खूबसूरती से फिल्माने के लिए कैमरामैन अनिल वाघेला बधाई के पात्र हैं.

दो घंटे आठ मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘नमस्ते बिहार’’ का निर्माण राजन कुमार ने ‘‘ओमकार फिल्म एंड टेलीविजन’’ के बैनर तले किया हैं. फिल्म कौंसेप्ट राजन कुमार का है. जबकि इसके सहनिर्माता एडवोकेट कल्पना एल वासकर व लक्ष्मण कुमार सिंह हैं. निर्देशक लक्ष्मण एन सिन्हा, कैमरामैन अनिल वाघेला, कला निर्देशक गोविंद साहनी, संगीतकार अमन श्लोक, नृत्य निर्देशक गौरव कौशिक, पटकथा लेखक निहाल अहमद तथा फिल्म के कलाकार हैं – राजन कुमार, भूमिका कलिता, मनोज सिन्हा, सोहेल राना, मोनिका कांति, प्रमोद निराला, राजेश कुशवाहा, शशांक देवनायक दास, जितेन्द्र सिंह, हर्ष कुमार, राजीव राय, नवीन वर्मा, परमानंद कुमार, प्रीतम अधिकारी, मिथलेष साहनी, त्रिशा खान, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री सतीश प्रसाद सिंह व अन्य.

इस तरह लिया एक माशूका ने खौफनाक बदला

मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले सीधी का एक गांव है नौगवां दर्शन सिंह, जिस में ज्यादातर आदिवासी या फिर पिछड़ी और दलित जातियों के लोग रहते हैं. शहरों की चकाचौंध से दूर बसे इस शांत गांव में एक वारदात ऐसी भी हुई, जिस ने सुनने वालों को हिला कर रख दिया और यह सोचने पर भी मजबूर कर दिया कि राजो (बदला नाम) ने जो किया, वैसा न पहले कभी सुना था और न ही किसी ने सोचा था.

इस गांव का एक 20 साला नौजवान संजय केवट अपनी ही दुनिया में मस्त रहता था. भरेपूरे घर में पैदा हुए संजय को किसी बात की चिंता नहीं थी. पिता की भी अच्छीखासी कमाई थी और खेतीबारी से इतनी आमदनी हो जाती थी कि घर में किसी चीज की कमी नहीं रहती थी.

बचपन की मासूमियत

संजय और राजो दोनों बचपन के दोस्त थे. अगलबगल में होने के चलते दोनों पर एकदूसरे के घर आनेजाने की कोई रोकटोक नहीं थी. 8-10  साल की उम्र तक दोनों साथसाफ बेफिक्र हो कर बचपन के खेल खेलते थे. चूंकि चौबीसों घंटे का साथ था, इसलिए दोनों में नजदीकियां बढ़ने लगीं और उम्र बढ़ने लगी, तो दोनों में जवान होने के लक्षण भी दिखने लगे.

संजय और राजो एकदूसरे में आ रहे इन बदलावों को हैरानी से देख रहे थे. अब उन्हें बजाय सारे दोस्तों के साथ खेलने के अकेले में खेलने में मजा आने लगा था.

जवानी केवल मन में ही नहीं, बल्कि उन के तन में भी पसर रही थी. संजय राजो को छूता था, तो वह सिहर उठती थी. वह कोई एतराज नहीं जताती थी और न ही घर में किसी से इस की बात करती थी.

धीरेधीरे दोनों को इस नए खेल में एक अलग किस्म का मजा आने लगा था, जिसे खेलने के लिए वे तनहाई ढूंढ़ ही लेते थे. किसी का भी ध्यान इस तरफ नहीं जाता था कि बड़े होते ये बच्चे कौन सा खेल खेल रहे हैं.

जवानी की आग

यों ही बड़े होतेहोते संजय और राजो एकदूसरे से इतना खुल गए कि इस अनूठे मजेदार खेल को खेलतेखेलते सारी हदें पार कर गए. यह खेल अब सैक्स का हो गया था, जिसे सीखने के लिए किसी लड़के या लड़की को किसी स्कूल या कोचिंग में नहीं जाना पड़ता.

बात अकेले सैक्स की भी नहीं थी. दोनों एकदूसरे को बहुत चाहने भी लगे थे और हर रोज एकदूसरे पर इश्क का इजहार भी करते रहते थे. चूंकि अब घर वालों की तरफ से थोड़ी टोकाटाकी शुरू हो गई थी, इसलिए ये दोनों सावधानी बरतने लगे थे.

18-20 साल की उम्र में गलत नहीं कहा जाता कि जिस्म की प्यास बुझती नहीं है, बल्कि जितना बुझाने की कोशिश करो उतनी ही ज्यादा भड़कती है. संजय और राजो को तो तमाम सहूलियतें मिली हुई थीं, इसलिए दोनों अब बेफिक्र हो कर सैक्स के नएनए प्रयोग करने लगे थे.

इसी दौरान दोनों शादी करने का भी वादा कर चुके थे. एकदूसरे के प्यार में डूबे कब दोनों 20 साल की उम्र के आसपास आ गए, इस का उन्हें पता ही नहीं चला. अब तक जिस्म और सैक्स इन के लिए कोई नई बात नहीं रह गई थी.

दोनों एकदूसरे के दिल के साथसाथ जिस्मों के भी जर्रेजर्रे से वाकिफ हो चुके थे. अब देर बस शादी की थी, जिस के बाबत संजय ने राजो को भरोसा दिलाया था कि वह जल्द ही मौका देख कर घर वालों से बात करेगा.

उन्होंने सैक्स का एक नया ही गेम ईजाद किया था, जिस में दोनों बिना कपड़ों के आंखों पर पट्टी बांध लेते थे और एकदूसरे के जिस्म को सहलातेटटोलते हमबिस्तरी की मंजिल तक पहुंचते थे. खासतौर से संजय को तो यह खेल काफी भाता था, जिस में उसे राजो के नाजुक अंगों को मनमाने ढंग से छूने का मौका मिलता था. राजो भी इस खेल को पसंद करती थी, क्योंकि वह जो करती थी, उस दौरान संजय की आंखें पट्टी से बंधी रहती थीं.

शुरू हुई बेवफाई

जैसा कि गांवदेहातों में होता है, 16-18 साल का होते ही शादीब्याह की बात शुरू हो जाती है. राजो अभी छोटी थी, इसलिए उस की शादी की बात नहीं चली थी, पर संजय के लिए अच्छेअच्छे रिश्ते आने लगे थे.

यह भनक जब राजो को लगी, तो वह चौकन्नी हो गई, क्योंकि वह तो मन ही मन संजय को अपना पति मान चुकी थी और उस के साथ आने वाली जिंदगी के ख्वाब यहां तक बुन चुकी थी कि उन के कितने बच्चे होंगे और वे बड़े हो कर क्याक्या बनेंगे.

शादी की बाबत उस ने संजय से सवाल किया, तो वह यह कहते हुए टाल गया, ‘तुम बेवजह चिंता करते हुए अपना खून जला रही हो. मैं तो तुम्हारा हूं और हमेशा तुम्हारा ही रहूंगा.’

संजय के मुंह से यह बात सुन कर राजो को तसल्ली तो मिली, पर वह बेफिक्र न हुई. एक दिन राजो ने संजय की मां से पड़ोसनों से बतियाते समय यह सुना कि संजय की शादी के लिए बात तय कर दी है और जल्दी ही शादी हो जाएगी.

इतना सुनना था कि राजो आगबबूला हो गई और उस ने अपने लैवल पर छानबीन की तो पता चला कि वाकई संजय की शादी कहीं दूसरी जगह तय हो गई थी. होली के बाद उस की शादी कभी भी हो सकती थी.

संजय उस से मिला, तो उस ने फिर पूछा. इस पर हमेशा की तरह संजय उसे टाल गया कि ऐसा कुछ नहीं है. संजय के घर में रोजरोज हो रही शादी की तैयारियां देख कर राजो का कलेजा मुंह को आ रहा था. उसे अपनी दुनिया उजड़ती सी लग रही थी. उस की आंखों के सामने उस के बचपन का दोस्त और आशिक किसी और का होने जा रहा था. इस पर भी आग में घी डालने वाली बात उस के लिए यह थी कि संजय अपने मुंह से इस हकीकत को नहीं मान रहा था.

इस से राजो को लगा कि जल्द ही एक दिन इसी तरह संजय अपनी दुलहन ले आएगा और वह घर के दरवाजे या खिड़की से देखते हुए उस की बेवफाई पर आंसू बहाती रहेगी और बाद में संजय नाकाम या चालाक आशिकों की तरह घडि़याली आंसू बहाता घर वालों के दबाव में मजबूरी का रोना रोता रहेगा.

बेवफाई की दी सजा

राजो का अंदाजा गलत नहीं था. एक दिन इशारों में ही संजय ने मान लिया कि उस की शादी तय हो चुकी है. दूसरे दिन राजो ने तय कर लिया कि बचपन से ही उस के जिस्म और जज्बातों से खिलवाड़ कर रहे इस बेवफा आशिक को क्या सजा देनी है.

वह कड़कड़ाती जाड़े की रात थी. 23 जनवरी को उस ने हमेशा की तरह आंख पर पट्टी बांध कर सैक्स का गेम खेलने के लिए संजय को बुलाया. इन दिनों तो संजय के मन में लड्डू फूट रहे थे और उसे लग रहा था कि शादी के बाद भी उस के दोनों हाथों में लड्डू होंगे.

रात को हमेशा की तरह चोरीछिपे वह दीवार फांद कर राजो के कमरे में पहुंचा, तो वह उस से बेल की तरह लिपट गई. जल्द ही दोनों ने एकदूसरे की आंखों पर पट्टी बांध दी. संजय को बिस्तर पर लिटा कर राजो उस के अंगों से छेड़छाड़ करने लगी, तो वह आपा खोने लगा.

मौका ताड़ कर राजो ने इस गेम में पहली और आखिरी बार बेईमानी करते हुए अपनी आंखों पर बंधी पट्टी उतारी और बिस्तर के नीचे छिपाया चाकू निकाल कर उसे संजय के अंग पर बेरहमी से दे मारा. एक चीख और खून के छींटों के साथ उस का अंग कट कर दूर जा गिरा.

दर्द से कराहता, तड़पता संजय भाग कर अपने घर पहुंचा और घर वालों को सारी बात बताई, तो वे तुरंत उसे सीधी के जिला अस्पताल ले गए.

संजय का इलाज हुआ, तो वह बच गया, पर पुलिस और डाक्टरों के सामने झूठ यह बोलता रहा कि अंग उस ने ही काटा है.

पर पुलिस को शक था, इसलिए वह सख्ती से पूछताछ करने लगी. इस पर संजय के पिता ने बयान दे दिया कि संजय को पड़ोस में रहने वाली लड़की राजो ने हमबिस्तरी के लिए बुलाया था और उसी दौरान उस का अंग काट डाला, जबकि कुछ दिनों बाद उस की शादी होने वाली है.

पुलिस वाले राजो के घर पहुंचे, तो उस के कमरे की दीवारों पर खून के निशान थे, जबकि फर्श पर बिखरे खून पर उस ने पोंछा लगा दिया था. तलाशी लेने पर कमरे में कटा हुआ अंग नहीं मिला, तो पुलिस वालों ने राजो से भी सख्ती की.

पुलिस द्वारा बारबार पूछने पर जल्द ही राजो ने अपना जुर्म स्वीकारते हुए बता दिया कि हां, उस ने बेवफा संजय का अंग काट कर उसे सजा दी है और वह अंग बाहर झाडि़यों में फेंक दिया है, ताकि उसे कुत्ते खा जाएं.

दरअसल, राजो बचपन के दोस्त और आशिक संजय पर खार खाए बैठी थी और बदले की आग ने उसे यह जुर्म करने के लिए मजबूर कर दिया था. राजो चाहती थी कि संजय किसी और लड़की से जिस्मानी ताल्लुकात बना ही न पाए. यह मुहब्बत की इंतिहा थी या नफरत थी, यह तय कर पाना मुश्किल है, क्योंकि बेवफाई तो संजय ने की थी, जिस की सजा भी वह भुगत रहा है.

राजो की हिम्मत धोखेबाज और बेवफा आशिकों के लिए यह सबक है कि वह दौर गया, जब माशूका के जिस्म और जज्बातों से खेल कर उसे खिलौने की तरह फेंक दिया जाता था. अगर अपनी पर आ जाए, तो अब माशूका भी इतने खौफनाक तरीके से बदला ले सकती है.

प्यार के अंधेरे में डूबता चला गया प्रकाश

छत्तीसगढ़ के जिला रायपुर की कोतवाली के अंतर्गत आने वाले मोहल्ला रिसाईपारा की रहने वाली 20 साल की खूबसूरत नगमा परवीन 18 जनवरी, 2017 की रात ब्यूटीपार्लर से लौट कर नहीं आई तो घर वालों को चिंता हुई. उस के अब्बू मोहम्मद असलम ने उस के मोबाइल पर फोन किया तो पता चला कि मोबाइल घर पर ही रखा है. उस से संपर्क का एकमात्र साधन फोन था, जो घर पर ही रखा था. ब्यूटीपार्लर ज्यादा दूर नहीं था. वहां जा कर पता किया तो पता चला कि उस दिन वह ब्यूटीपार्लर पर गई ही नहीं थी. यह जान कर घर वाले परेशान हो उठे. उन की समझ में यह नहीं आ रहा था कि नगमा ब्यूटीपार्लर पर नहीं गई तो बिना बताए कहां चली गई. जबकि उसे कहीं बाहर जाना होता था तो वह घर वालों को बता कर जाती थी.

ऐसा पहली बार हुआ था, जब नगमा घर वालों को बिना बताए न जाने कहां चली गई थी. अपने हिसाब से मोहम्मद असलम ने बेटी को हर तरह से खोजा, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. वह कोई छोटी बच्ची नहीं थी कि कोई उसे बहलाफुसला कर उठा ले जाता. वह जहां भी गई थी, अपनी मरजी से गई थी. अगर उस के साथ जबरदस्ती की गई होती तो पता चल जाता.

मोहम्मद असलम और उन के घर वालों ने किसी तरह रात बिताई. सवेरा होते ही वह कुछ लोगों के साथ कोतवाली पहुंच गए और बेटी की गुमशुदगी दर्ज करा दी. गुमशुदगी दर्ज होने के बाद इंसपेक्टर श्रीप्रकाश सिंह ने इस मामले में जांच शुरू की तो पता चला कि नगमा सुबह तेजप्रकाश सेन की मोटरसाइकिल पर बैठ कर कहीं गई थी.

उसे तेजप्रकाश की मोटरसाइकिल पर बैठ कर जाते किसी और ने नहीं, नगमा की 8 साल की छोटी बहन ने देखा था. लेकिन यह बात उस ने घर वालों को नहीं बताई थी. जब पुलिस ने उस से पूछा, तभी उस ने बताया था.

श्रीप्रकाश सिंह को जब पता चला कि नगमा तेजप्रकाश के साथ गई है तो उन्होंने उस के बारे में मोहम्मद असलम से पूछा. पता चला कि तेजप्रकाश मोहल्ला आमातालाब में अपने परिवार के साथ रहता था. वह शादीशुदा था और 2 बच्चों का बाप था, इस के बावजूद उस ने खुद को कुंवारा बता  कर नगमा से कोर्टमैरिज कर ली थी.

नगमा को जब उस के शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप होने का पता चला था तो वह अदालत चली गई, जहां से उसे ढाई लाख रुपए गुजाराभत्ता देने का आदेश हुआ था. ये रुपए तेजप्रकाश को 27 हजार रुपए हर महीने की किस्त के रूप में देने थे. लेकिन तेजप्रकाश ने 27 हजार रुपए की मात्र एक किस्म ही दी थी. उस के बाद उस ने एक पैसा नहीं दिया था.

नगमा और तेजप्रकाश की इस कहानी को जान कर श्रीप्रकाश सिंह को समझते देर नहीं लगी कि मामला क्या हो सकता है.  उन्होंने तुरंत तेजप्रकाश सेन के घर छापा मारा तो वह घर पर ही मिल गया. पूछताछ के लिए उसे कोतवाली लाया गया, लेकिन पुलिस हिरासत में होने के बावजूद उस के चेहरे पर जरा भी भय नहीं था.

एसएसपी राजीव टंडन और सीओ ए.सी. द्विवेदी की उपस्थिति में उस से पूछताछ शुरू हुई. श्रीप्रकाश सिंह ने पूछा, ‘‘तुम नगमा परवीन को जानते हो?’’

‘‘जी जानता हूं. लेकिन आप उस के बारे में मुझ से क्यों पूछ रहे हैं?’’ तेजप्रकाश ने कहा.

‘‘इसलिए कि वह 4 दिनों से गायब है.’’

‘‘क्या?’’ उस ने चौंक कर कहा, ‘‘वह 4 दिनों से गायब है?’’

‘‘हां, वह 4 दिनों से गायब है. काफी प्रयास के बाद भी उस का कुछ पता नहीं चल रहा है. घर से ब्यूटीपार्लर जाने के लिए वह निकली थी, लेकिन वह ब्यूटीपार्लर पहुंच नहीं पाई. बीच से ही वह गायब हो गई.’’

‘‘ब्यूटीपार्लर नहीं गई तो फिर वह कहां गई?’’

‘‘यही पता करने के लिए तो तुम्हें यहां लाया गया है.’’ श्रीप्रकाश सिंह ने कहा.

‘‘लेकिन मुझे क्या पता कि वह ब्यूटीपार्लर नहीं गई तो कहां गई? वह जहां भी गई है, मुझे बता कर थोड़े ही गई है. वह कहां जाती है, किस से मिलती है, क्या करती है, मुझे बता कर थोड़े ही करती है?’’ सफाई देते हुए तेजप्रकाश ने कहा, ‘‘अगर उस के बारे में कुछ पूछना है तो उस के घर वालों से जा कर पूछें. वही बता सकते हैं कि वह कहां है?’’

‘‘ठीक है, घर वालों से पूछ लेंगे. लेकिन तुम एक बात यह बताओ, क्या तुम नगमा की छोटी बहन को जानते हो?’’

‘‘जी, बिलकुल जानता हूं.’’

‘‘वह कह रही थी कि जिस दिन नगमा गायब हुई है, उस दिन उस ने तुम्हें नगमा को मोटरसाइकिल पर बैठा कर ले जाते हुए देखा था.’’

‘‘वह झूठ बोल रही है.’’ तेजप्रकाश ने एकदम से कहा. लेकिन इस बात से वह घबरा गया, जो उस के चेहरे पर स्पष्ट नजर आ रहा था. पुलिस अधिकारियों ने उसे भांप भी लिया था. इस के बाद तो पुलिस अधिकारियों ने उसे अपने सवालों से इस तरह घेरा कि बिना सख्ती किए ही उस ने एसएसपी के पैर पकड़ लिए.

वह गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘सर, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. नगमा को मैं ने मार दिया है. उसे मारता न तो क्या करता. मैं ने उस से प्यार किया, पत्नीबच्चों को छोड़ कर शादी की, इस के बावजूद उस ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा. उस की वजह से मेरे परिवार ने मुझे छोड़ दिया. इस के बावजूद वह मुझे छोड़ कर चली ही नहीं गई, मेरे ऊपर मुकदमा भी कर दिया था.’’

पुलिस ने तेजप्रकाश को अदालत में पेश कर के 5 दिनों के रिमांड पर ले लिया. रिमांड अवधि के दौरान उस ने नगमा परवीन की हत्या का अपना अपराध तो स्वीकार कर ही लिया, मोटरसाइकिल और उस की डिक्की में रखा चाकू, बोरी, रस्सी आदि भी बरामद करवा दी. पूछताछ में उस ने नगमा की हत्या की जो कहानी पुलिस अधिकारियों को सुनाई, वह इस प्रकर थी—

नगमा परवीन मोहम्मद असलम की बड़ी बेटी थी. प्राइवेट नौकरी करने वाले मोहम्मद असलम की जिंदगी मजे से कट रही थी. वह जमाने से कदम मिला कर चलने वालों में थे, इसलिए उन्होंने अपने सभी बच्चों को पढ़ायालिखाया. नगमा ने भी बीए किया. पढ़ाई पूरी करने के बाद उस ने नौकरी करने के बजाए ब्यूटीपार्लर का काम सीखा और घर से थोड़ी दूरी पर अपना ब्यूटीपार्लर खोल लिया. उस का ब्यूटीपार्लर चल भी निकला.

खूबसूरत नगमा परवीन पर मर मिटने वालों की कमी नहीं थी. उन्हीं में आमातालाब का रहने वाला तेजप्रकाश सेन भी था. वह किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था. उस के पिता सरकारी नौकरी में थे. बापबेटे को ठीकठाक तनख्वाह मिलती थी, इसलिए परिवार सुखी और संपन्न था.

तेजप्रकाश मांबाप की एकलौती संतान था. उस की शादी ही नहीं हो चुकी थी, बल्कि वह एक बेटे और एक बेटी का बाप भी था. इस के बावजूद वह पहली ही नजर में नगमा पर मर मिटा था. नगमा पर दिल आते ही वह उस की एक झलक पाने के लिए उस के घर और ब्यूटीपार्लर के चक्कर ही नहीं लगाने लगा था, बल्कि घंटों उस के ब्यूटीपार्लर के सामने खड़ा हसरतभरी नजरों से ताका करता था.

उस की इस हरकत को देख कर नगमा को समझते देर नहीं लगी कि वह क्या चाहता है. फिर तो वह उसे देख कर अनायास ही मुसकराने लगी. इसी मुसकान ने दोनों को एकदूसरे के करीब ला दिया. उस समय नगमा 18 साल की थी तो तेजप्रकाश 29 साल का. देनों के बीच उम्र में 10 साल का लंबा फासला था. लेकिन तेजप्रकाश की कदकाठी ऐसी थी कि वह इतनी उम्र का लगता नहीं था.

जल्दी ही नगमा के घर वालों को उस के और तेजप्रकाश के प्रेमसंबंधों का पता चल गया था. लेकिन उन्होंने किसी तरह का ऐतराज नहीं किया. नगमा ने तेजप्रकाश को दिल का राजकुमार बनाया तो उसी से शादी करने का फैसला कर लिया. इस की वजह यह थी कि दोहरी जिंदगी जी रहे शातिर तेजप्रकाश सेन ने अपनी शादी के बारे में न तो नगमा को पता चलने दिया और न ही उस के घर वालों को.

जल्दी ही दोनों ने कोर्टमैरिज कर ली. चूंकि नगमा बालिग हो चुकी थी, इसलिए घर वाले चाह कर भी विरोध नहीं कर सकते थे. अदालत से पतिपत्नी की तरह रहने की इजाजत ले कर तेजप्रकाश ने किराए का कमरा लिया और उसी में नगमा परवीन के साथ रहने लगा.

तेजप्रकाश ने जो कुछ छिपा कर नगमा से शादी की थी, जल्दी ही उस सब की जानकारी नगमा को हो गई. जब तेजप्रकाश की सच्चाई नगमा के सामने आई तो वह सन्न रह गई. उस के सपने चूरचूर हो गए थे. उस ने तेजप्रकाश से ऐसी उम्मीद कतई नहीं की थी कि वह उस के साथ इतना बड़ा धोखा कर सकता है. इसलिए उस की सच्चाई जान कर उसे उस से नफरत हो गई.

नगमा परवीन की समझ में नहीं आ रहा था कि उस ने जो गलती की है, उसे मांबाप को कैसे बताए, क्योंकि एक तरह से उस ने मांबाप के भरोसे को तोड़ा था. उस ने मांबाप को बताए बिना तेजप्रकाश से शादी की थी. आखिर में मजबूर हो कर उस ने सारी बातें अपने अब्बू को बताई तो बेटी की परेशानी को देखते हुए वह उस की मदद के लिए तैयार हो गए. क्योंकि बेटी की जिंदगी का सवाल था.

तेजप्रकाश को सबक सिखाने के लिए मोहम्मद असलम ने अदालत में उस के खिलाफ धोखा दे कर शादी करने का मुकदमा दायर कर दिया. मुकदमा दायर होने के बाद तेजप्रकाश के घर वालों को जब उस की इस करतूत का पता चला तो मांबाप ने उस की मदद करने के बजाए उसे उस के हाल पर छोड़ दिया.

पत्नी भी बच्चों को ले कर मायके चली गई. तेजप्रकाश की स्थिति धोबी के कुत्ते की जैसी हो गई. वह न घर का रहा न घाट का. अदालत ने नगमा परवीन के हक में फैसला सुनाया. उस ने तेजप्रकाश को ढाई लाख रुपए देने का आदेश दिया, जिसे उसे 27 हजार रुपए महीने की किस्त के रूप में देना था. उस ने 27 हजार रुपए की पहली किस्त तो नगमा परवीन को दे दी, लेकिन उस के बाद उस ने उसे एक भी रुपया नहीं दिया. धीरेधीरे 3 साल बीत गए. मजबूर हो कर नगमा ने एक बार फिर अदालत का दरवाजा खटखटाया.

नगमा द्वारा दोबारा मुकदमा करने पर तेजप्रकाश परेशान हो उठा. अब उसे अपने किए का पश्चाताप हो रहा था. क्योंकि अब वह कहीं का नहीं रह गया था. पत्नी पहले ही उसे छोड़ कर चली गई थी. मांबाप ने भी मुंह मोड़ लिया था. पत्नी और मांबाप को मनाने की उस ने बहुत कोशिश की, लेकिन उन्होंने उसे साथ रखने से साफ मना कर दिया. जिस की वजह से यह सब हुआ था, वह भी साथ रहने को तैयार नहीं थी. बल्कि वह उसे परेशान कर रही थी.

तेजप्रकाश की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? नगमा द्वारा दोबारा मुकदमा करने से वह काफी परेशान था. इस परेशानी में उस ने नगमा नाम की इस बला से निजात पाने के लिए सोचाविचारा तो उसे लगा कि वह इस बला से हमेशा के लिए तभी छुटकारा पा सकता है, जब उसे खत्म कर दे.

लेकिन इस में खतरा बहुत था. पकड़े जाने पर उस की पूरी जिंदगी जेल में बीतती. इसलिए वह हत्या इस तरह करना चाहता था कि पकड़ा न जाए. उसे पता था कि वह पकड़ा तभी नहीं जाएगा, जब पुलिस की हत्या का कोई सबूत न मिले. इस के लिए तेजप्रकाश टीवी पर आने वाले आपराधिक धारावाहिक देखने लगा. इन्हीं धारावाहिकों को देख कर उस ने नगमा की हत्या की योजना बना डाली. योजना के अनुसार उस ने पहले नगमा पर विश्वास जमाया. तेजप्रकाश नगमा का पहला प्यार था, इसलिए उस ने भले ही उसे धोखा दिया था, लेकिन वह उसे अपने दिल से निकाल नहीं पाई थी.

इसलिए जब भी तेजप्रकाश उसे फोन करता था, वह फोन उठा लेती थी. यही वजह थी कि वह नगमा को यकीन दिलाने में सफल रहा कि वह उसे फिर से अपना लेगा, दोनों पतिपत्नी की तरह रहेंगे. विश्वास दिलाने के लिए उस ने कहा था कि पत्नी से उस ने संबंध तोड़ लिए हैं. उस की इसी बात पर नगमा झांसे में आ गई.

नगमा को पूरी तरह विश्वास में ले कर 17 जनवरी, 2017 की रात 9 बजे के करीब तेजप्रकाश ने उसे फोन कर के कहा कि अगले दिन वह उसे ले कर घूमने जाना चाहता है. नगमा उस के साथ चलने को तैयार हो गई. उस ने यह बात मांबाप को भी नहीं बताई. इस की वजह यह थी कि शायद वे उसे उस के साथ जाने न देते.

18 जनवरी की सुबह 9 बजे तेजप्रकाश ने फोन कर के नगमा से कहा कि वह उस के घर से थोड़ी दूरी पर सड़क पर मोटरसाइकिल लिए खड़ा है. इस के बाद उस ने कहा था कि वह अपना फोन घर में ही छोड़ कर आए, क्योंकि वह उसे नया फोन गिफ्ट में दिलाना चाहता है.

बात नए फोन की थी, इसलिए नगमा ने वैसा ही किया, जैसा तेजप्रकाश ने कहा था. उस ने अपना फोन घर में ही छोड़ दिया. इस के बाद घर वालों से ब्यूटीपार्लर जाने की बात कह कर वह तेजप्रकाश के साथ उस की मोटरसाइकिल से चली गई. नगमा ने भले ही घर वालों को नहीं बताया था कि वह कहां जा रही है, लेकिन उस की छोटी बहन ने उसे तेजप्रकाश के साथ मोटरसाइकिल से जाते देख लिया था.

तेजप्रकाश उसे ले कर पड़ोसी जिले बालोद के सियादेई मंदिर पर पहुंचा. दर्शन करने के बाद उस ने सुनसान जगह पर मोटरसाइकिल रोक कर नगमा को धक्का दे कर जमीन पर गिरा दिया और फुरती से गले में पड़े दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया. जब वह बेहोश हो गई तो उस ने डिक्की में रखे चाकू और पेंचकस से उस के गले पर कई वार किए.

जब उसे लगा कि नगमा मर गई है तो उस ने साथ लाए बोरे में उस की लाश भरी और उसे पीछे बांध कर वहां से 40 किलोमीटर दूर रुद्री घाट पर ले गया. वहां से उस ने धमतरी के एक लकड़ी व्यवसाई से फोन पर बात कर के अंतिम संस्कार के बहाने घाट पर लकडि़यां मंगवा लीं. उस समय तक शाम हो चुकी थी. उस ने मोटरसाइकिल से पैट्रोल निकाल कर लकडि़यों पर लाश रखी और पैट्रोल डाल कर आग लगा दी. उस समय घाट सूना पड़ा था. इसलिए उसे लाश जलाते हुए किसी ने नहीं देखा.

लाश जल गई तो उस ने राख ठंडी कर के नदी में फेंक दी, जिस से पुलिस को कोई साक्ष्य न मिले. इस के बाद नहाधो कर साफ कपड़े पहने और रात 11 बजे के करीब दुर्ग जिला के उतई गांव स्थित अपनी ससुराल पहुंच गया. रात उस ने वहीं बिताई और अगले दिन अपने घर आ गया.

रिमांड अवधि खत्म होने पर कोतवाली पुलिस ने उसे दोबारा अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक वह जेल में बंद था. पुलिस उस के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल करने की तैयारी कर रही थी. तेजप्रकाश ने चालाकी तो बहुत दिखाई, पर कानून के लंबे हाथों से बच नहीं सका. सोचने वाली बात यह है कि आखिर तेजप्रकाश को मिला क्या? अगर वह अपनी पत्नी में ही संतोष किए रहता तो न उस का घर बरबाद होता और न जिंदगी?

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

हिना खान को इस वजह से मिला कोमोलिका का किरदार

स्टार प्लस पर प्रसारित होने वाला शो ‘कसौटी जिंदगी के’ आते ही टीआरपी की रेस में छा गया है. इस शो में कोमोलिका का किरदार चर्चित अभिनेत्री हिना खान निभा रही है. सोशल मीडिया पर उनके इस किरदार की खूब चर्चा हो रही है.

इस सीरियल के पहले सीजन में कोमोलिका का किरदार उर्वशी ढोलकिया ने निभाया था. शो में सबसे ज्यादा जो किरदार मशहूर हुआ वो कोमोलिका का ही था. वैसे इस बार भी हिना खान की एंट्री से ये किरदार जबरदस्त छाया हुआ है.

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार हिना खान ने कोमोलिका का रोल मिलने के पीछे की कहानी बताई. उन्होंने बताया कि एकता कपूर के इस चर्चित शो में उन्हें रिएलिटी शो बिग बौस की वजह से एंट्री मिली. दरअसल हिना बिग बौस सीजन 11 में कंटेस्टेंट रह चुकी है.

हिना ने कहा, ‘इंसान का हर कदम उसे उसके करियर के अगले पड़ाव पर लेकर जाता है और ये मौका उन्हें बिग बौस में बेहतर परफार्म करने की वजह से मिला है.’

हिना के मुताबिक जब भी कभी कोमोलिका के किरदार की बात होती है तो सबसे पहले यह याद आता है कि कोमोलिका अपने वक्त की सबसे ज्यादा फैशनेबल कैरेक्टर थी. जिसकी वजह से वो सुर्ख़ियों में भी रही. उन्होंने कहा कि जब मैं बिग बौस के घर में थी तो मुझे भी सबसे स्टाइलिश कंटेस्टेंट का टैग मिला था. ऐसे में हिना का मानना है कि उनके ड्रेसिंग स्टाइल ने उन्हें कोमोलिका का फेमस किरदार दिलाने में साथ दिया है.

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