सहारे की जरूरत करवाती है बुढ़ापे में शादी

उस समय सलोनी जायसवाल की उम्र करीब 45 साल थी. उन के पति की मृत्यु हो गई. उन्नाव की रहने वाली सलोनी के कोई संतान नहीं थी. पति के न रहने पर घरपरिवार का उपेक्षाभाव और भी ज्यादा बढ़ गया था. सलोनी को लग रहा था जैसे पति के साथ उन की खुशियां भी खत्म हो गईं. बच्चे होते तो शायद उन का सहारा मिलता.  परिवार और समाज की नजरों में विधवा किसी अभिशाप से कम नहीं होती है. उम्र के इस दौर में जीवनसाथी का साथ छूट जाना मौत से बदतर महसूस होने लगा था.

उपेक्षा के इसी भाव से दुखी सलोनी एकाकीपन का शिकार हो गईं. परिवार के लोग उन को बीमार मान कर उन से दूर रहने लगे. ऐसे में करीब 4 साल पहले सलोनी को सहारा दिया वीनस विकास संस्थान की डा. निर्मला सक्सेना ने.

वीनस विकास संस्थान लखनऊ के जानकीपुरम इलाके में एक वृद्धाश्रम चलाता है. डा. निर्मला सक्सेना को जब सलोनी की हालत का पता चला तो वे उन को अपने साथ लखनऊ ले आईं.  वृद्धाश्रम में कुछ दिनों तक अपनी ही उम्र की महिलाओं के साथ रह कर सलोनी को कुछ अच्छा महसूस होने लगा. उन की तबीयत भी मानसिक रूप से बेहतर होने लगी और वे खुश भी रहने का प्रयास करने लगीं. धीरेधीरे समय बीतने लगा. सलोनी को एक बार फिर मजबूत सहारे की तलाश होने लगी.

अपने मन की बात सलोनी ने डा. निर्मला सक्सेना से कही. शुरुआत में उन की बात को सुन कर सभी को थोड़ी हंसी आई. वृद्धाश्रम में काम करने वाले दूसरे लोगों ने तो मान लिया कि सलोनी की मानसिक हालत फिर से खराब होने लगी है. इस उम्र में कहीं कोई ऐसी बात करता है. लेकिन  डा. निर्मला सक्सेना को लगा कि सलोनी की इच्छा उचित है. वे इस प्रयास में लग गईं कि सलोनी को सदासदा के लिए अपनाने वाला कोई आगे आए.

उन की समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे 60 साल की सलोनी के लिए दूल्हा खोजा जाए. उन्होंने अपने जानने वालों और वृद्धाश्रम में काम करने वालों को दूल्हा तलाश करने में जुटा दिया. 60 साल की दुलहन के लिए दूल्हा तलाश करना सरल काम नहीं था.  वृद्धाश्रम में काम करने वाले एक व्यक्ति कोे पता चला कि हरदोई जिले में कृष्ण नारायण गुप्ता रहते हैं. उन की उम्र 62 साल की है. उन की पत्नी की मौत  3 साल पहले हो चुकी है. उन के 3 बेटे और बहू हैं. वे अपनी मिठाई की दुकान चलाते हैं. वे शादी करना चाहते हैं. हरदोई में लोग उन को कान्हा सेठ के नाम से जानते हैं. इस बात का पता चलते ही डा. निर्मला सक्सेना ने हरदोई जा कर उन से बात की. वे उन के घरपरिवार के लोगों से मिलीं. बेटेबहू से बात की. किसी को भी इस शादी से कोई परेशानी नहीं होने वाली थी.

कान्हा सेठ भी सलोनी को अपनी पत्नी बनाने के लिए उत्साहित हो गए. वे समय तय कर के एक दिन सलोनी को देखने के लिए लखनऊ आ गए. सलोनी और कान्हा सेठ ने एकदूसरे को देखा और फिर तय हो गया कि अब बची जिंदगी वे एकसाथ काटेंगे. शादी की तारीख 24 फरवरी तय हो गई. अब शादी की तैयारी करने का जिम्मा डा. निर्मला सक्सेना पर आ पड़ा था. वे अपनी टीम और कुछ सामाजिक लोगों के साथ शादी की तैयारी करने में जुट गईं. अपनी शादी की बात सुनते ही सलोनी ने कहा कि वे अपना मेकअप किसी ब्यूटीपार्लर में ही कराएंगी.

फैशन डिजाइनर और ब्यूटीशियन रीमा श्रीवास्तव ने सलोनी का मेकअप किया और लहंगाचुनरी उपलब्ध कराई. मेकअप देख कर कोई कह नहीं सकता था कि सलोनी की उम्र 60 साल है.  24 फरवरी को सलोनी और कान्हा सेठ ने एकदूसरे को जयमाला पहना कर पतिपत्नी के रूप में कुबूल कर लिया. इस खुशी में दोनों ने सब से पहले एकदूसरे को रसगुल्ला खिलाया. शादी की खुशी में शामिल होने के लिए हेल्पेज इंडिया के डायरैक्टर ए के सिंह और उत्तर प्रदेश समाज कल्याण विभाग के लोग भी शामिल हुए. शादी के बाद कान्हा सेठ अपनी पत्नी सलोनी को ले कर अपने घर गए. वहां दोनों हंसीखुशी से अपना जीवन बिता रहे हैं.

शादी के बाद डा. निर्मला इस शादीशुदा जोडे़ से मिलने के लिए हरदोई उन के घर गईं जहां सलोनी अपने मायके जैसे वृद्धाश्रम को याद कर रही थी.  दरअसल, सभी को अपने जीवन में एक सहारे की जरूरत होती है और यह सहारा जीवनसाथी के रूप में ही हो सकता है.

गलत नहीं सही बातों का करें अनुकरण

विकासशील देशों के लिए विकसित पश्चिमी देश सपना हैं और पश्चिमी सभ्यता अत्यानुकरणीय. चमकदमक स्वाभाविक रूप से आकृष्ट करती है. जो देखने में सुंदर है, मस्तीभरा है उस की ओर मन अपनेआप खिंचता है. एक कहावत है कि ‘हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती.’ पर जो चमकता है उस में चुंबकीय शक्ति जरूर होती है.

तनावपूर्ण जीवन में मौज के कुछक्षण राहत ही देते हैं. हां, केवल मौज ही जीवन का ध्येय हो जाए तो मुश्किल है. कालेज के जीवन से ही शराब के अलावा और भी तरह के नशे, डेटिंग वगैरह हमारी तरह की प्रगतिशीलता की स्वाभाविक उपलब्धियां हैं. आज का मध्यवर्ग दालरोटी की चिंता में कम घुलता है, पार्टियों में शराब का इंतजाम कैसे हो, इस की चिंता उसे अधिक सताती है.

पश्चिम में मात्र शराब, शोर मचाने वाला संगीत, कूल्हे मटकाने वाला नृत्य और स्त्रीपुरुष के बीच स्वतंत्र संबंध ही नहीं हैं, वहां और भी बहुतकुछ है. हम अपनी पुरातन सभ्यता का राग अलापते पश्चिम के पीछे दौड़ लगा रहे हैं, हमारी समस्त ज्ञानेंद्रियां पश्चिम वालों के वैभव और उन के उन्मुक्त जीवन के प्रति लालायित रही हैं. सतही लहरों से जलाशय की गहराई का पता विरले ही लगा पाते हैं. इसलिए उन की सभ्यता में कहां, क्या अनुकरणीय है, यह जानने के लिए उन के बीच कुछ समय बिताना या उन के बारे में अध्ययन करना जरूरी है और अनुकरण के लिए विवेक की जरूरत है.

‘अतिथि देवो भव:’ हमारी पुरातन सभ्यता का गौरवशाली अंग है जिसे हम आज भी किसी तरह निभा रहे हैं. महंगाई आसमान छू रही है, ऐसे में मेहमान बोझ लगने लगे हैं. फिर भी, मन ही मन कुढ़ते व ऊपर से मुसकराते, आने वाले की आवभगत में कोई कसर नहीं छोड़ते. आज की गृहस्थी, न नौकर, न कोई मदद, ऊपर से रुपए का अवमूल्यन, गृहिणी की चिंताएं शैतान की आंत की तरह अनंत, फिर भी घर आए मेहमान को चाय, नाश्ता, शरबत न पेश किया जाए तो हमारी सभ्यता को ठेस पहुंचती है. खुशी का मौका हो तो कहना ही क्या, हारीबीमारी हो, किसी का हाथपांव टूट गया हो या कोई और मुसीबत आन पड़ी हो, बेटी भाग गई हो या घर में चोरी हो गई हो, संवेदना जताने आए मेहमान को चाय न मिले, ऐसा भी कभी हो सकता है.

इस के ठीक विपरीत पश्चिम में यदि बिना बुलाए आप किसी से मिलने जाते हैं तो आमतौर पर वह पानी तक को नहीं पूछता. पर मुसीबत पड़ने पर एकदूसरे के प्रति पश्चिमवासियों का और हमारा व्यवहार बिलकुल अलग होता है. उदाहरण आप के सामने है.

सीखें मदद का जज्बा

अमेरिका में हमारी भयंकर कार दुर्घटना हुई जिस में चोटें तो सब ही को आईं पर हमारी बेटी, जिस से मिलने हम वहां गए थे, बहुत बुरी तरह घायल हो गई. मेरे पति और मेरी बेटी 6 सप्ताह अस्पताल में पड़े रहे. जब हम अस्पताल से छुट्टी पा कर अपनी बेटी के घर पहुंचे तो सच मानिए गृहस्थी का भार संभालने लायक स्थिति हमसब में से किसी की भी नहीं थी क्योंकि इस भयानक हादसे में मेरी बेटी की आंखों का तारा 3 वर्षीय हंसताखेलता बेटा हम से छिन गया था.

जो भी हो, भारी मन से ही सही, घर के काम तो संभालने ही होते हैं. पर वाह, पश्चिमी समाज, हमारे घर पहुंचते ही सारे पड़ोसी एकएक कर, ठंड और गिरती बर्फ की परवा किए बगैर आ पहुंचे. शायद वे अपनी खिड़कियों से हमारे आने की प्रतीक्षा में आंख लगाए ही बैठे थे. सहानुभूति और संवेदना के शब्दों के स्थान पर मुसकराते हुए छोटा सा ‘वैलकम होम’ और इसी के साथ सारे पड़ोसी 6 सप्ताह से बंद पड़े घर को साफ करने में जुट गए. किसी ने वैक्यूम क्लीनर चालू कर दिया, कोई मैले कपड़े वौश्ंिग मशीन में धोने चल दिया, कुछ ने बिस्तर झाड़े, चादरतकिए के गिलाफ बदले. तभी एक लड़की अपने घर से थर्मस में चाय भर कर ले आई.

हम चाय पी ही रहे थे कि एक अन्य पड़ोसी हमारे लिए खाना ले कर पहुंच गए. हमारे लिए मेज पर प्लेट और कांटाछुरी सजा कर ही वे लोग गए और जातेजाते कह गए कि जब तक आप की बेटी घर का काम संभालने लायक नहीं हो जाती, सप्ताह में हर रोज एक पड़ोसी आ कर वैक्यूम क्लीनिंग कर जाएगा, दूसरा आ कर वौश्ंिग मशीन से कपड़े धो जाएगा. रोज के दोनों वक्त के खाने का बंटवारा भी पड़ोसियों ने आपस में कर लिया. वे तो चायकौफी तक पहुंचाने को तैयार थे पर हमारे बहुत आग्रह से मना करने पर मान गए. इस बीच सहानुभूति का न तो एक शब्द कहा, न ही हमें उदास होने दिया. हां, सप्ताहांत पर जो ‘नेबरहुड न्यूज’ अखबार में हमें छप कर मिला उस में पूरा एक पैराग्राफ इस दुर्घटना के प्रति संवेदना से भरा था.

संवेदना या वेदना

अब देखिए एक और अनुभव. हमारे एक संबंधी की कार दुर्घटनाग्रस्त हुई. कोई घातक चोट किसी को भी नहीं लगी, माना कि एकाध हड्डी टूटी, दोएक जगह कटफट गया, प्लास्टर और टांके लगा कर अस्पताल से छुट्टी मिल गई. दुर्घटना में पति के पैर की हड्डी टूटी थी, पत्नी के दाहिने हाथ में प्लास्टर था और मां की नाक की हड्डी चटख गई थी जिस पर प्लास्टर भी नहीं चढ़ सकता था. जिस मित्र या रिश्तेदार को खबर मिली, खबर अच्छी हो या बुरी, बड़ी तेजी से फैलती है, यदि संकटग्रस्त परिवार से मिलने न आए तो दोस्ती, दुश्मनी में बदल सकती है. इसलिए औपचारिक सहानुभूति का सिलसिला शुरू होता है. ‘उस की माया अपरंपार’, ‘सुखदुख भरा यह संसार’, ‘फिर भी बड़ा भारी संकट टल गया’, ‘बुरे ग्रहों से मुक्ति मिली’ आदि व ऐसे अवसरों पर कहने योग्य जो और भी कुछ कहा जाता है वही सब कहने हर कोई पहुंचा, संवेदना के साथ.

हम भी पहुंचे. ड्राइंगरूम में दीवान पर माताजी अधलेटी अपने दर्द के बीच आसपास बैठी महिलाओं की ‘हाय बेचारी’ और ‘हाय बेचारा’ वाली सहानुभूति ग्रहण करती साहसपूर्वक मुसकराने का प्रयत्न कर रही थीं. पास की कुरसी पर प्लास्टर चढ़ा पांव स्टूल पर धरे पति महोदय शायद 50वीं बार दुर्घटना का ब्योरा दे रहे थे. उन की पत्नी को अनुपस्थित पा मैं ने इधरउधर दृष्टि दौड़ाई. रसोई की ओर से कुछ हलचल सुन मैं वहीं चली गई तो देखती क्या हूं कि बेचारी गृहस्वामिनी बड़े यत्न से बाएं

हाथ से चाय बनाने के प्रयास में जुटी हैं क्योंकि उन के दाहिने हाथ में प्लास्टर है. अधिकतर चाय प्याले के बाहर गिरती देख मैं ने लपक कर केतली संभाल ली और चाय बना कर बाहर बैठे मेहमानों को पकड़ा आई.

ये लोग चाय पी कर गए ही थे कि अन्य मेहमान आ गए और एक हाथ से भाभी कैसे चाय बनाएंगी, इसी चक्कर में 10 मिनट को मिलने आए हम किसी तरह निकल ही नहीं पाए. चाय तो कुछ भी नहीं, गाजियाबाद व फरीदाबाद से मिलने आए रिश्तेदारों को खाना भी चाहिए. सबकुछ निबटा कर ही मेरा लौटना हो सका. मेरे मन में एक प्रश्न कचोटता रहा. आखिर ये रिश्तेदार मन में क्या सोच कर आए थे? मैं न होती तो क्या टूटे हाथ वाली भाभी से खाना बनवाते? और न बनवाने का प्लान था तो क्या इरादा था यह मेरी समझ में कतई नहीं आया क्योंकि इस बीच रसोई में झांकने और भाभी से सहानुभूति जताने तो सब आए पर काम में हाथ बंटाने को कोई आगे नहीं बढ़ा. एकाध ने यह अवश्य कहा, ‘मैं कुछ करवा दूं क्या?’ पर करने को इतना कुछ होते हुए किसी ने कुछ किया नहीं.

दिन का खाना खापी कर वे सब दिल्ली घूमने निकल गए. संवेदना जताने की खानापूरी भी हो गई, ‘अरे तुम क्यों परेशान होती हो’ के साथ मजे से खानापीना भी हो गया, ऊपर से उन्हें दिल्ली दर्शन और खरीदारी का मौका भी मिल गया.

ये दोनों आपबीती, आंखोंदेखी व शतप्रतिशत सत्य घटनाएं हैं. इन दोनों अनुभवों को देख कर क्या आप को भारतीयों और पश्चिमी देशों के लोगों की मानसिकता में फर्क नजर नहीं आता? क्या आप को नहीं लगता कि आवश्यकता भारतीयों की मानसिकता को बदलने की है? क्या इस पाश्चात्य अनुभव में कुछ भी अनुकरणीय नहीं है?

हम पाश्चात्य सभ्यता के पीछे लगे हुए ‘डेटिंग’ से ले कर स्त्रीपुरुष के बिना विवाह साथ रहने के इकरारनामे तक प्रगति कर चुके हैं, हम जो कांटेछुरी से दक्षतापूर्वक खाने को ही सभ्य समाज की पहचान मानने लगे हैं, हम जो अंगरेजी बोलने की क्षमता को ही ऊंचे समाज का प्रवेशपत्र मानते हैं, हम जो देशी ठर्रा पीने वाले को शराबी और व्हिस्की पीने को फैशन मानते हैं, क्या हम एक बहुत ही खोखली सभ्यता की संरचना नहीं कर रहे जिस में न तो भारतीय संस्कृति की उत्कृष्टता है और न ही पश्चिम की अच्छी बातों का अनुकरण.

एटीएम के की-पैड के नीचे माचिस की तीली डालकर महिला से फ्रौड

एटीएम के की-पैड के नीचे माचिस की तीली या पिन डालकर फ्रौड कर 10 हजार रुपये निकालने वाले व्यक्ति को पकड़ लिया गया. दिल्ली के राजौरी गार्डन थाना एरिया में महिला से ठगी की गई. आरोपी ने कहा कि यह कला उसने अपने जीजा से सीखी थी.

डीसीपी मोनिका भारद्वाज ने बताया कि गिरफ्तार किए गए आरोपी का नाम हेमाराम (35) है. उसे राजौरी गार्डन थाने के एसएचओ सुनील शर्मा की टीम ने पकड़ा. पुलिस का कहना है कि पश्चिम विहार का रहने वाला हेमाराम ने पूछताछ में बताया है कि उसे यह कला उसके जीजा ने सिखाई है.

पुलिस उसके जीजा की भी तलाश में है. हेमाराम से पूछताछ करके पता लगाया जा रहा है कि अभी तक इस तरह से उसने कितने लोगों के अकाउंट से पैसे निकाले हैं.

सोमवार शाम करीब 7:15 बजे एक महिला ने एक बैंक के एटीएम से 10 हजार रुपये निकालने की कोशिश की थी. उन्होंने कार्ड को स्वाइप करके अपना पासवर्ड डाला. मगर, रुपये नहीं निकले. महिला के पीछे यह हेमाराम खड़ा था. उसने महिला से कहा कि लगता है एटीएम खराब है. महिला एटीएम में दी गई अपनी कमांड को कैंसल करके नहीं गईं. उनके जाते ही हेमाराम ने पासवर्ड डालकर एटीएम से 10 हजार रुपये निकाल लिए.

महिला एटीएम से निकलकर कुछ दूर गई थीं कि उनके मोबाइल फोन पर 10 हजार रुपये निकलने का मेसेज आया. वह वापस दौड़कर एटीएम पहुंचीं तो देखा कि आरोपी वहां से भाग रहा था. उन्होंने पुलिस कॉल कर दी. वहीं से एक हवलदार और एक सिपाही गुजर रहे थे. उन्हें देखकर आारोपी ने 10 हजार रुपये रोड पर फेंक दिए. दोनों पुलिसकर्मियों ने उसे पकड़ लिया. महिला ने उसकी पहचान कर ली. आरोपी से और पूछताछ की जा रही है.

आरोपी ने पुलिस को बताया कि वह एटीएम का की-पैड थोड़ा उठा देता था. अगर कोई रुपये निकालने के लिए पासवर्ड डालता तो पैसे नहीं निकलते. पीछे खड़ा होकर पासवर्ड देख लेता था. जैसे ही पैसे निकालने वाला बाहर जाता था वह पासवर्ड डालकर रुपये निकाल लेता था.

रणवीर-आलिया के रिश्ते पर महेश भट्ट का हैरान करने वाला बयान

महेश भट्ट हमेशा अपने बच्चों के रिलेशनशिप को ले कर चर्चा में रहे हैं. इसी मामले में एक बार फिर उन्हें मीडिया के सवालों का सामना करना पड़ा. रणवीर और आलिया का रिश्ता किसी से छिपा नहीं है, बौलीवुड के गलीयारों में अक्सर इनका चर्चा होती रहती है. पर शायद इस बारे में बात करने में महेश भट्ट सहज नहीं हैं.

आजकल रणवीर और आलिया फिल्म ब्रह्मास्त्र की शूटिंग पूरी करने में बिजी हैं. इस फिल्म की शूटिंग शुरू होने से ही इन दोनों के बारे में चर्चा और गर्मा गई हैं. रणबीर-आलिया की लवलाइफ अब बौलीवुड फैंस के लिए यह उत्सुकता पैदा कर रही है कि दोनों एक दूसरे के हमसफर बनेंगे या नहीं.

क्या कहा महेश भट्ट ने

अक्सर इन मामलों पर खुल कर बोलने वाले महेश भट्ट से जब ये इन दोनों के बारे में पूछा गया तो वो असहज हो गए. इसके जवाब में उन्होंने कहा कि ‘मैं कौन होता हूं.’

इस मामले पर और ज्यादा सफाई देते हुए महेश ने कहा कि, ‘जाहिर तौर पर दोनों एक दूसरे से प्यार करते हैं. आपको यह बात समझने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए. रणबीर बेहतर इंसान हैं. मुझे पसंद भी हैं. अब उन्हें इस रिश्ते को कैसे आगे बढ़ाना है ये उन्हें सोचने और डिसीजन लेने की जरूरत है. इंटरव्यू में महेश ने आगे कहा कि, ‘मैं इस बारे में बात करने लगाने वाला कोई नहीं होता हूं कि ये सब कब होगा या वे किस तरह से अपने रिश्ते को आगे बढ़ाएंगे.’

आपको बात दें कि हाल ही में शूटिंग के दौरान आलिया घायल हो गई थी. जिसके बाद रणवीर उन्हें डाक्टर के पास ले गए थे. तब से दोनों तकरीबन हर जगह एक साथ ही नजर आते हैं.

शिक्षा या अशिक्षा

देश के शिक्षा संस्थानों में बड़ेबड़े लैक्चर दिए जाते हैं कि युवाओं को शराफत से रहना चाहिए, सच बोलना चाहिए, कानून मानना चाहिए. पर हालत यह है कि खुद ये शिक्षा संस्थान बेईमानी, चोरी, झूठ, धोखेबाजी, अनाचार, अत्याचार, बलात्कार का पाठ पढ़ाने वाले बन कर रह गए हैं. इस के जिम्मेदार भटके युवा नहीं, उन के मातापिता नहीं, दिशाहीन समाज नहीं, बल्कि शिक्षक और अधिकारी हैं.

अभी हाल ही में बिहार के मोतिहारी के विश्वविद्यालय के एक वाइस चांसलर अरविंद कुमार अग्रवाल ने अपने पद से इस्तीफा दिया क्योंकि उन की डिगरियों पर शक था और वे सुबूत पेश नहीं कर पाए. राष्ट्रपति के पास इसे ऐक्सैप्ट करने के अलावा चारा न था. वर्षों पहले ली गई डिगरियां झूठी पाई गईं यानी इतने साल तक एक झूठा व्यक्ति युवाओं को सदाचार का पाठ पढ़ाता रहा.

शिक्षा का विश्वदूत मानने वाली सरकार को 2014 के बाद 9वें वाइस चांसलर को निकालना पड़ा क्योंकि उन पर आरोप लगे थे. विश्व भारती, हेमवती नंदन बहुगुणा, इलाहाबाद, दिल्ली, जामिया मिलिया जैसे नामी विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलर झूठे पाए गए हैं.

हमारे यहां पढ़ाई के नाम पर जगहजगह धंधे चल रहे हैं. कुछ को छोड़ कर सारे छात्र सिर्फ जुगाड़बाजी में लगे रहते हैं. पढ़ने से ज्यादा गुंडई का राज है क्योंकि शिक्षक अपनी सहूलियतों को ले कर धरनेप्रदर्शन करते रहते हैं. कक्षाओं में कोचिंग की बात होती है तो कोचिंग क्लासों में पेपर लीक करने की. यूनिवर्सिटी सरकारी हो या प्राइवेट, वहां आधे से ज्यादा शिक्षक झूठी, आधीअधूरी डिगरियों के बल पर नौकरियां पाते हैं और ड्यूटी के दौरान उन का समय ज्ञान देनेलेने में नहीं, बेईमानी करने में व्यतीत होता है.

जिस देश में शिक्षा को विरासत मान लिया गया हो, उस का यही हाल होगा. यहां तो 10-20 पीढ़ी पहले किसी ने 4 वेद पढ़ लिए तो आने वाली सारी पीढि़यां चतुर्वेदी हो जाती हैं, कभी किसी ने कुछ पढ़ लिया तो उस की संतानें त्रिपाठी बन जाती हैं. यहां शिक्षा का व्यक्ति के चरित्र से कुछ लेनादेना नहीं.

अगर यहां कुछ तेज हैं तो सिर्फ इसलिए कि इस देश की जमीन इतनी उपजाऊ है कि यहां असली फसल जैसे अपनेआप हो जाती है, वैसे ही योग्य व्यक्ति भी खुदबखुद तैयार हो जाते हैं. यह देश का सुनहरा पक्ष है कि हम बड़े देश होने के कारण सिर को कुछ तो उठा कर चल लेते हैं.

पहले मारी टक्कर, फिर निकाली पिस्टल और दाग दी गोलियां

दिल्ली में गीता कॉलोनी फ्लाइओवर के नीचे ठीक से स्कूटर चलाने को लेकर हुई कार वाले से बहस में स्कूटर वाले ने कार वाले को गोली मारकर हत्या कर दी. हत्या की वारदात को अंजाम देने के बाद स्कूटर सवार मौके से फरार हो गया. वारदात सोमवार रात 11:30 बजे से 11:45 बजे के बीच हुई. पुलिस ने बताया कि आरोपी की पहचान कर ली गई है, ज ल्द आरोपियों को गिरफ्तार किया जाएगा.

डीसीपी (शाहदरा) मेघना यादव ने बताया कि मृतक का नाम सुशील चौहान (34) है. वह अपने परिवार के साथ न्यू उस्मानपुर इलाके में रहते थे और यमुना विहार में शर्ट कटिंग करने का काम करते थे. रात में वह अपने दोस्तों के साथ निकले थे. दोस्तों में तीन लड़कियां और तीन लड़के थे. सभी आसपास ही रहते हैं.

जानकारी के मुताबिक सोमवार रात को सब यार-दोस्त एक दोस्त की सगाई से होकर आए थे. रास्ते में इनका कृष्णा नगर में एक चाप वाले के यहां चाप खाने का प्रोग्राम बना. यहां से यह चाप खाने के बाद वापस अपने घर जा रहे थे. जब यह गीता कॉलोनी फ्लाइओवर के नीचे थे. तभी सामने से आ रही एक स्कूटर ने इनकी कार में सामने से टक्कर मार दी.

टक्कर लगने के बाद सुशील कार से नीचे उतरे और स्कूटर वाले को समझाने लगे कि भाई इतनी तेजी से स्कूटर क्यों चला रहे हो, संभलकर स्कूटर चलाओ किसी को भी चोट लग सकती है. बताया जाता है कि सुशील के यह बात कहने से स्कूटर चलाने वाला लड़का गुस्से में आ गया और उसने सुशील का कॉलर पकड़ लिया. बचाव किया लेकिन दोनों के बीच हाथापाई हो गई.

इस दौरान सुशील की कार में बैठा कोई भी दोस्त उनके बचाव के लिए बाहर नहीं आया. तभी स्कूटर सवार को लगा कि सुशील उसके उपर हावी हो रहा है. उसने पिस्टल निकाली और सुशील पर गोली चला दी. गोली सुशील की लेफ्ट थाई में जा लगी. स्कूटर चलाने वाले ने एक और गोली सुशील को मारी लेकिन वह सुशील को ना लगकर कार के टायर में लगी. इसके बाद वह फरार हो गया.

मामले में सुशील के दोस्तों ने ही पुलिस को रात 11:39 बजे पीसीआर कॉल की. उन्हें इरविन अस्पताल ले जाया गया. वहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. बताया जाता है कि स्कूटर सवार ने हेलमेट पहना था. लेकिन कार में सवार सुशील के एक दोस्त ने यह भी कहा है कि वह बिना हेलमेट के था और उसकी पहचान कर ली गई है.

पुलिस का कहना है कि जिस जगह वारदात हुई है उस जगह कोई सीसीटीवी कैमरा नहीं लगा था. लेकिन आसपास कुछ जगह सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं. वहां से उसकी फुटेज निकाली जा रही है. पुलिस का कहना है कि अधिक खून बहने की वजह से सुशील की मौत हो गई. मामले में मृतक सुशील के सभी दोस्तों से भी पुलिस पूछताछ कर रही है.

रोडरेज नहीं साजिश रची है किसी ने : परिवारवाले

रोड रेज में गोली लगने के बाद भी सुशील ने खुद ही कार ड्राइव की थी. लेकिन वह बहुत दूर तक ड्राइव नहीं कर पाए थे. फिर उनके दोस्त ऑटो में बैठाकर उन्हें एक प्राइवेट अस्पताल में ले गए. जहां उन्हें भर्ती करने से मना कर दिया गया, बाद में सरकारी अस्पताल ले गए. मामले में परिजनों ने कार में बैठे एक लड़के और एक लड़की पर ही उनकी हत्या करने या कराने का आरोप लगाया है.

इस तरह के आरोपों से फिलहाल डीसीपी ने इंकार किया है. डीसीपी का कहना है कि शुरुआती जांच में इस तरह की कोई बात सामने नहीं आई है. लेकिन हम हर एंगल से जांच कर रहे हें. बताया गया है कि सुशील अपने साडू के बेटे अश्वनी और एक अन्य दोस्त कार्तिक के साथ पहले लोनी एक दोस्त की सगाई में गए थे. वहां से जब यह लोग वापस घर आ रहे थे. तब रास्ते में सुशील के पास इनके पड़ोस में ही रहने वाली एक लड़की का फोन आया. लड़की ने सुशील से कहा कि वह कमला मार्केट में है, उनके साथ दो और महिला दोस्त हैं. हो सके तो उन्हें भी पिक करके घर छोड़ देना.

इसके बाद सुशील अपने दोनों दोस्तों के साथ कमला मार्केट गए. जहां से उन तीनों लड़कियों को कार में बैठाकर निकले थे. परिजनों का आरोप है कि सुशील का दो दिन पहले एक दोस्त से झगड़ा हुआ था. परिजनों का आरोप है कि कार में बैठीं तीन लड़कियों में भी एक आरोपी है. और सुशील की हत्या में दोनों का हाथ लग रहा है.

देखिए खेसारीलाल यादव और शुभी शर्मा का जबरदस्त डांस

भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार खेसारीलाल यादव और मशहूर आदाकारा शुभी शर्मा की जोड़ी दर्शकों के बीच काफी मशहूर है. इन दोनों के गाने के वीडियो आए दिन इंटरनेट पर वायरल होते रहते हैं. इसी क्रम में इनका एक और वीडियो इंटरनेट पर काफी तेजी से देखा जा रहा है. यह वीडियो खेसारीलाल और शुभी के स्टेज शो का है, जहां दोनों के जमकर डांस करते नजर आ रहे हैं.

बता दें, खेसारीलाल इन दिनों भोजपुरी एक्ट्रेस काजल राघवानी के साथ रांची में फिल्म ‘कुली नंबर वन’ की शूटिंग में व्यस्त हैं. कभी वे बाइक पर काजल को लेकर राइडिंग करते नजर आ रहे हैं, तो कभी वे उनके साथ इश्क फरमाते. मामला लालबाबू पंडित की भोजपुरी फिल्‍म ‘कुली नंबर वन’ का है, जिसकी शूटिंग इन दिनों रांची में जोर-शोर से चल रही है. लालबाबू पंडित की फिल्‍म में इस बार खेसारीलाल यादव और काजल राघवानी पहली बार साथ नजर आ रहे हैं. इससे पहले लालबाबू पंडित ने अपनी फिल्‍म में नई हिरोईनों को मौका दिया था. मगर इस बार खेसारीलाल यादव के साथ काजल राघवानी की जोड़ी उनकी फिल्‍म में देखने को मिलेगी.

इन नतीजों से लेने होंगे ये 5 सबक

  1. गलतफहमी छोड़नी होगी BJP को

बीजेपी को इस गलतफहमी से निकलना ही होगा कि सिर्फ मोदी के चेहरे को आगे कर सभी चुनाव जीते जा सकते हैं. 2014 में मोदी का जो आभामंडल दिखा था, 2019 आते-आते उसके बरकरार रहने की सम्भावनाओं पर विराम लगता दिख रहा है. वोटर सिर्फ भाषण के जरिए तसल्ली पाने के मूड में नहीं हैं. वह अपने हित के मुद्दों पर ठोस काम देखना चाहता है. पार्टी के अजेंडे और सरकार की परफार्मेंस पर बात बढ़ी है.

  1. जवाबदेही से बच नहीं सकतीं सरकारें

एंटी-इनकम्बेन्सी (सरकार से नाराजगी) फैक्टर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. पार्टी 15 साल से सत्ता में हो या महज 5 साल से, वोटर जानना चाहता है कि चुनाव में जो वादे किए गए थे, उनका क्या हुआ/ मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 15-15 साल से सत्ता में रहने वाले मुख्यमंत्रियों को जिन सवालों से रूबरू होना पड़ा, वैसे ही सवाल से 5-5 साल से सत्ता में रहे राजस्थान और तेलंगाना के मुख्यमंत्रियों के सामने भी थे.

  1. काम न आई रंग बदलने की कोशिश

बीजेपी को विकास के अजेंडे पर लौटना ही पड़ेगा. बीजेपी कह सकती है कि वह इससे इतर गई ही कब थी, लेकिन जिस तरह से मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में, जहां पार्टी पिछले 15 बरसों से सत्ता में थी, वहां योगी आदित्यनाथ को आगे कर चुनाव का रंग बदलने की कोशिश हुई, उसने नुकसान ही किया. दोनों सरकारों के काम पर बात कम हुई, जबकि योगी के बयानों पर बहस ज्यादा.

  1. कांग्रेस भी खुशफहमी न पाले

कांग्रेस को भी बहुत खुश होने की जरूरत नहीं है. ऐसा नहीं कि कांग्रेस के पक्ष में कोई लहर चल रही है, जहां भी चुनाव हुए एंटी-इनकम्बेन्सी फैक्टर काम कर रहा था. बीजेपी शासित तीनों राज्यों में उसके मुखालिफ कांग्रेस के अलावा कोई और मजबूत विकल्प नहीं था. अगर कांग्रेस के पक्ष में कोई लहर होती तो मध्य प्रदेश और राजस्थान में इतना करीबी मुकाबला नहीं छूटता और तेलंगाना में भी पार्टी को टीआरएस से नहीं पिटना पड़ता.

  1. छोटे दलों की भी बड़ी भूमिका

बीजेपी से जीतना है तो कांग्रेस को बड़ा गठबंधन करना ही होगा. राज्यों में स्थानीय दलों को कमतर आंकना उसकी बड़ी चूक हो सकती है. कर्नाटक में जेडीएस और बीएसपी के साथ तालमेल के लिए लचीला रुख न अपनाने की कीमत उसे चुकानी पड़ी थी लेकिन उससे उसने कोई सबक नहीं लिया. इन चुनावों में उसे बीएसपी और एसपी की अनदेखी का नुकसान उठाना पड़ा. छोटे दल जीतने में कम, हराने में ज्यादा बड़ी भूमिका निभाते हैं.

इन नतीजों से 2019 के लोकसभा चुनावों पर क्या असर पड़ेगा

माहौल बनाने और बिगाड़ने पर असर पड़ना स्वाभाविक है. नतीजों के बीजेपी के पक्ष में जाने पर मोदी लहर के जारी होने की तस्दीक होती, विपक्ष का मनोबल टूटता. लेकिन अब यह संदेश जाता दिख रहा है कि टक्कर कड़ी है. बीजेपी हार भी सकती है. 2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद बीजेपी को सिर्फ दिल्ली और बिहार विधानसभा के चुनाव में ही हार का सामना करना पड़ा था, वर्ना बीजेपी लगातार चुनाव जीतती रही है. यहां तक यूपी में भी उसने दो दशक बाद सत्ता में वापसी कर ली थी.

भोजपुरी फिल्मों में परिवार होता है

परिवार समाज की बुनियाद माना जाता है और भारत में इस की अहमियत दूसरे देशों के बजाय ज्यादा है. इसलिए यह और भी अहम हो जाता है कि फिल्में इस पर रोशनी डालें और भोजपुरी फिल्मों का इस मामले में कोई सानी नहीं है.

कुछ फिल्में जैसे ‘नदिया के पार’, ‘गंगा’, ‘गंगा किनारे मोरा गांव’, ‘हमार बेटवा’, ‘आंगन की लक्ष्मी’, ‘ससुरा बड़ा पईसा वाला’, ‘तुलसी’, ‘गंगापुत्र’, ‘गंगा देवी’, ‘बीवी नंबर 1’, ‘जीजाजी की जय हो’, ‘जींस वाली भौजी’, ‘भैयादूज’, जैसी फिल्में पारिवारिक मसाले को ध्यान में रख कर ही बनाई गई हैं.

इस तरह की फिल्में बना कर भोजपुरी सिनेमा ने भारतीय समाज में अलग छाप छोड़ी है, क्योंकि फिल्में न केवल परिवार को एकजुट रखने का आईना दिखाती हैं, बल्कि परिवार के हर सदस्य को अपनी जिम्मेदारी का अहसास भी कराती हैं. इसलिए भोजपुरी फिल्मों की पारिवारिक तानेबाने में बहुत बड़ी जगह है.

फिल्म ‘नदिया के पार’ देख कर आप को लगेगा कि हम अपने घरपरिवार या फिर समाज की कोई कहानी सुन रहे हैं. इस फिल्म में एक किसान अपने

2 भतीजों के साथ उत्तर प्रदेश के एक गांव में रहता है. किसान के बीमार होने के बाद उस का इलाज वैद्य द्वारा किया जाता है और जब ठीक होने पर किसान इलाज की कीमत चुकाने के संबंध में वैद्य से बात करता है तो वह वैद्य अपनी बड़ी बेटी रूपा के लिए किसान के बड़े भतीजे ओमकार का हाथ मांगता है, जिस के लिए वह राजी भी हो जाता है क्योंकि दोनों का घरपरिवार अच्छा है.

राजीखुशी दोनों की शादी हो जाती है. जब रूपा पेट से होती है तो उस की छोटी बहन गुंजा कुछ दिनों के लिए उस के घर आती है जहां वह ओमकार के छोटे भाई चंदन के प्यार में पड़ जाती है.

इस बारे में जब रूपा की बहन को पता चलता है तो वह दोनों की शादी करवाने का वादा करती है लेकिन एक हादसे में रूपा की मौत होने के चलते उन दोनों के प्यार के बारे में किसी को पता नहीं चल पाता है.

इस बीच पारिवारिक हालात के चलते दोनों को अपने प्यार को कुरबान करने की नौबत आ जाती है और वे इस के लिए राजी भी हो जाते हैं लेकिन जब घर वालों को इस बारे में पता चलता है तो वे उन दोनों की शादी करवाते हैं.

यानी इस फिल्म में परिवार और रिश्तों की अहमियत को दिखाते हुए परिवार की एकजुटता पर फोकस किया गया है.

वहीं फिल्म ‘ससुरा बड़ा पईसा वाला’ में हम कह सकते हैं कि बहुत कम फिल्में ऐसी होती हैं जिन में ससुर और दामाद के रिश्तों पर कहानी की बुनियाद टिकी होती है लेकिन हीरो मनोज तिवारी की इस फिल्म में भले ही कौमेडी का तड़का लगाया गया है लेकिन ससुरदामाद के रिश्तों के बीच की तल्खी और भावनात्मक लड़ाई को भी बखूबी दिखाया गया है. इस तरह से इस में 2 परिवारों की कहानी को सिलसिलेवार तरीके से जोड़ा गया है.

ऐसी ही एक फिल्म ‘गंगा’ आई थी जिस में पारिवारिक रिश्तों के साथ ही सामाजिक बंधनों के बीच के टकराव को बखूबी दिखाया गया. वहीं फिल्म ‘गंगापुत्र’ में मांबेटे के रिश्ते को केंद्र में रखा गया.

आप को बता दें कि फिल्म ‘जीजाजी की जय हो’ में भी साली और जीजा के मजाक को बहुत ही चुटीले और मजेदार ढंग से दिखाया गया. इस से इस रिश्ते की अहमियत पता चलती है. फिल्म ‘जींस वाली भौजी’ में घर में भाभी के किरदार को अहमियत दी गई.

फिल्म ‘भैयादूज’ में भी भाईबहन के रिश्तों की मिठास को रुपहले परदे पर घोला गया.

कुलमिला कर हम कह सकते हैं कि जिस तरह से बौलीवुड फिल्में हीरोहीरोइन के इर्दगिर्द ही घूमती हैं वहीं भोजपुरी फिल्मों में जितनी अहमियत हीरोहीरोइन को दी जाती है उतनी ही दूसरे रिश्तों को भी मिलती है, जो हमें भोजपुरी फिल्में देखने पर मजबूर करता है.

स्टालिन का संदेश, केजरीवाल बढ़ाएं दोस्ती का ‘हाथ’

विपक्षी एकता की कोशिश में कई विपक्षी दलों की मीटिंग से पहले डीएमके नेताओं ने आप संयोजक अरविंद केजरीवाल से मुलाकात की. मुलाकात केजरीवाल के घर पर ही हुई. सूत्रों के मुताबिक करीब 20 मिनट की मुलाकात में बातचीत का मुख्य फोकस पीएम नरेंद्र मोदी रहे.

सूत्रों ने बताया कि इस दौरान इन नेताओं ने मोदी सरकार की कई नीतियों पर बात की और चर्चा की कि किस तरह वह जनहित में नहीं हैं. मोदी को किस तरह हराया जा सकता है इस पर भी बातचीत हुई. डीएमके नेता एमके स्टालिन के साथ सांसद कनिमोझी, पूर्व केंद्रीय मंत्री ए राजा और टीआर बालू भी इस मुलाकात के दौरान थे.

विपक्षी गठबंधन की कवायद के बीच इस मीटिंग में डीएमके नेता स्टालिन ने केजरीवाल के साथ विपक्ष के नेताओं की बैठक के बारे में चर्चा की. सूत्रों के मुताबिक स्टालिन ने क्षेत्रीय दलों की कांग्रेस के साथ तल्खी को मिटाने की जरूरत पर जोर दिया और कहा कि देश के हित में विपक्ष की एकता जरूरी है.

इसके जवाब में केजरीवाल की तरफ से कहा गया कि उनकी तरफ से कोई तल्खी नहीं है. सूत्रों के मुताबिक बातचीत में सभी नेता इस पर एकमत दिखे कि राज्यवार गठबंधन की जरूरत है. जहां जो पार्टी मजबूत है वह मिलकर बीजेपी को हरा सकते हैं. हर राज्य में एक तरीके का गठबंधन हो यह जरूरी नहीं.

सूत्रों के मुताबिक आम आदमी पार्टी पहले भी कई क्षेत्रीय दलों के नेताओं को यह साफ कर चुकी है कि राज्यवार गठबंधन ज्यादा अहम है और ज्यादा मजबूत होगा और यह महागठबंधन जैसे किसी गठबंधन से बेहतर विकल्प हैं. सूत्रों के मुताबिक इस मीटिंग में इस पर भी बात हुई कि किस तरह मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियों को लगातार लोगों को बताना है.

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