‘‘ये  लो और क्या चाहिए…पूरे 32 गुण मिल गए हैं,’’

गंगा बूआ ने बड़े गर्व से डाइनिंग टेबल पर नाश्ता करते हुए त्रिवेदी परिवार के सामने रश्मि की जन्मपत्री रख दी.

‘‘आप हांफ क्यों रही हैं? बैठिए तो सही…’’ चंद्रकांत त्रिवेदी ने खाली कुरसी की ओर इशारा करते हुए कहा.

‘‘चंदर, तू तो बस बात ही मत कर. जाने कौन सा राजकुमार ढूंढ़ कर लाएगा बेटी के लिए. कितने रिश्ते ले कर आई हूं…एक भी पसंद नहीं आता. अरे, नाक पर मक्खी ही नहीं बैठने देते तुम लोग… बेटी को बुड्ढी करोगे क्या घर में बिठा कर…?’’ गोपू के हाथ से पानी का गिलास ले कर बूआ गटगट गटक गईं.

चंद्रकांत, रश्मि और उस का भाई विक्की यानी विकास मजे से कुरकुरे टोस्ट कुतरते रहे. मुसकराहट उन के चेहरों पर पसरी रही पर चंद्रकांत त्रिवेदी की पत्नी स्मिता की आंखें गीली हो आईं. आखिर 27 वर्ष की हो गई है उन की बेटी. पीएच.डी. कर चुकी है. डिगरी कालेज में लेक्चरर हो गई है. अब क्या…घर पर ही बैठी रहेगी?

चंद्रकांत ने तो जाने कितने लड़के बताए अपनी पत्नी को पर स्मिता जिद पर अड़ी ही रहीं कि जब तक लड़के के पूरे गुण नहीं मिलेंगे तब तक रश्मि के रिश्ते का सवाल ही नहीं उठता. जो कोई लड़का मिलता स्मिता को कोई न कोई कमी उस में दिखाई दे जाती. चंद्रकांत परेशान हो गए थे. वे शहर के जानेमाने उद्योगपति थे. स्टील की 4 फैक्टरियों के मालिक थे. उन की बेटी के लिए कितने ही रिश्ते लाइन में खड़े रहते पर पत्नी थीं कि हर रिश्ते में कोई न कोई अड़ंगा लगा देतीं और उन का साथ देतीं गंगा बूआ.

गंगा बूआ 80 साल से ऊपर की हो गई होंगी. चंद्रकांत ने तो अपने बचपन से उन्हें यहीं देखा था. उन के पिता शशिकांत त्रिवेदी की छोटी बहन हैं गंगा बूआ. बचपन में ही बूआ का ब्याह हो गया था. ब्याह हुआ और 15 वर्ष की उम्र में ही वह विधवा हो गई थीं. मातापिता तो पहले ही चल बसे थे, अत: अपने इकलौते भाई के पास ही वे अपना जीवन व्यतीत कर रही थीं.

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घर में कोई कमी तो थी नहीं. अंगरेजों के जमाने से 2-3 गाडि़यां, महल सी कोठी, नौकरचाकर सबकुछ उन के पिता के पास था. फिर शशिकांत इतने प्रबुद्ध निकले कि जयपुर शहर के पहले आई.ए.एस. अफसर बने. उन के ही पुत्र चंद्रकांत हैं. चंद्रकांत की पत्नी स्मिता वैसे तो शिक्षित है, एम.ए. पास हैं पर न जाने उन के और गंगा बूआ के बीच क्या खिचड़ी पकती रहती है कि स्मिता की हंसी ही गायब हो गई है. उन्हें हर पल अपनी बेटी की ही चिंता सताती रहती है. चंद्रकांत ने अपनी बूआ के साथ अपनी पत्नी को हमेशा खुसरपुसर करते ही पाया है.

गंगा बूआ के मन में यह विश्वास पत्थर की लकीर सा बन गया है कि उन का वैधव्य उन की जन्मपत्री न मिलाने के कारण ही हुआ है. उन के पिता व भाई आर्यसमाजी विचारों के थे और कुंडली आदि मिलाने में उन का कोई विश्वास नहीं था. शशिकांत के बहुत करीबी दोस्त सेठ रतनलाल शर्मा ने अपने बेटे संयोग के लिए गंगा बूआ को मांग लिया था और फिर बिना किसी सामाजिक दिखावे के उन का विवाह संयोग से कर दिया गया था. शर्माजी का विचार था कि वे अपनी पुत्रवधू को बिटिया से भी अधिक स्नेह व ममता से सींचेंगे और उस को अच्छी से अच्छी शिक्षा देंगे, लेकिन विवाह के 8 दिन भी नहीं हुए थे कि कोठी के बड़े से बगीचे में नवविवाहित संयोग सांप के काटने से मर गया. जुड़वां भाई सुयोग चीखें मारमार कर अपने मरे भाई को झंझोड़ रहा था. पल भर में ही पूरा वातावरण भय और दुख का पर्याय बन गया था.

गंगोत्तरी ठीक से विवाह का मतलब भी कहां समझ पाई थी तबतक कि वैधव्य की कालिमा ने उसे निगल लिया. कुछ दिन तक वह ससुराल में रही. सेठ रतनलाल के परिवार के लोगों ने गंगोत्तरी का ध्यान रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी परंतु वहां वह बहुत भयभीत हो गई थी. मस्तिष्क पर इस दुर्घटना का इतना भयानक प्रभाव पड़ा था कि रात को सोतेसोते भी वह बहकीबहकी बातें करने लगी. थक कर इस शर्त पर उसे उस के मातापिता के पास भेज दिया गया कि वह उन की अमानत के रूप में वहां रहेगी.

गंगोत्तरी की पढ़ाई फिर शुरू करवा दी गई. कुछ सालों बाद शर्माजी ने संयोग के जुड़वां भाई सुयोग से उस का विवाह करने का प्रस्ताव रखा. कुछ समय तक सोचनेसमझने के बाद त्रिवेदी परिवार ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया परंतु गंगोत्तरी ने जो ‘न’ की हठ पकड़ी तो छोड़ने का नाम ही नहीं लिया.

बहुत समझाया गया उसे पर तबतक वह काफी समझदार हो चुकी थी और उसे विवाह व वैधव्य का अर्थ समझ में आने लगा था. उस का कहना था कि एक बार उस के साथ जो हुआ वही उस की नियति है, बस…अब वह पढ़ेगी और शिक्षिका बन कर जीवनयापन करेगी. फिर किसी ने उस से अधिक जिद नहीं की. इस प्रकार मातापिता की मृत्यु के बाद भी गंगोत्तरी इसी घर में रह गई. चंद्रकांत से ले कर उन के बच्चे, घर के नौकरचाकर, यहां तक कि पड़ोसी भी उन्हें प्यार से गंगा बूआ कह कर पुकारने लगे थे.

यद्यपि गंगा बूआ अब काफी बूढ़ी होे गई हैं, फिर भी घर की हर समस्या के साथ वे जुड़ी रहती हैं. उन्होंने स्मिता को अपना उदाहरण दे कर बड़े विस्तार से समझा दिया था कि घर की इकलौती लाड़ली रश्मि का विवाह बिना जन्मपत्री मिलाए न करे. बस, स्मिता के दिलोदिमाग पर गंगा बूआ की बात इतनी गहरी समा गई कि जब भी उन के पति किसी रिश्ते की बात करते वे गंगा बूआ की ओट में हो जातीं. उन्होंने ही गंगा बूआ को हरी झंडी दिखा रखी थी कि वे स्वयं जा कर पीढि़यों से चले आ रहे पंडितों के उस परिवार के श्रेष्ठ पंडित से जन्मपत्रियों का मिलान करवाएं जिसे बूआ शहर का श्रेष्ठ पंडित समझती हैं. वैसे स्मिता का विवाह भी तो बिना जन्मपत्री मिलाए हुआ था और वह बहुत सुखी थीं पर रश्मि के मामले में गंगा बूआ ने न जाने उन्हें क्या घुट्टी पिला दी थी कि बस…

आज गंगा बूआ सुबह ही नहाधो कर ड्राइवर को साथ ले कर निकल गई थीं. बूआ बेशक विधवा थीं, पर सदा ठसक से रहती थीं. ड्राइवर के बिना घर से बाहर न निकलतीं. उन के पहनावे इतने लकदक होते जो उन के व्यक्तित्व में चार चांद लगा देते थे. कहीं भी बिना जन्मपत्री मिलाए विवाह की बात होती तो वे अपना मंतव्य प्रकट किए बिना न रहतीं.

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घर के सदस्य बेशक गंगा बूआ की इस बात से थोड़ा नाराज रहते पर कोई भी उन का अपमान नहीं कर सकता था. सब मन ही मन हंसते, बुदबुदाते रहते, ‘आज फिर गंगा बूआ रश्मि की जन्मपत्री किसी से मिलवा कर लाई होंगी…’ सब ने मन ही मन सोचा.

गोपू ने बूआ के सामने नाश्ते की प्लेट रख दी थी और टोस्टर में से टोस्ट निकाल कर मक्खन लगा रहा था, तभी बूआ बोलीं, ‘‘अरे, गोपू, मैं किस के दांतों से खाऊंगी ये कड़क टोस्ट, ला, मुझे बिना सिंकी ब्रेड और बटरबाउल उठा दे और हां, मेरा दलिया कहां है?’’

गोपू ने बूआ के सामने उन का नाश्ता ला कर रख दिया. आज बूआ कुछ अलग ही मूड में थीं.

‘‘क्यों स्मिता, तुम क्यों चुप हो और तुम्हारा चेहरा इतना फीका क्यों पड़ गया है?’’ बूआ ने एक चम्मच दलिया मुंह में रखते हुए स्मिता की ओर रुख किया.

स्मिता कुछ बोली तो नहीं…एक नजर बूआ पर डाल कर मानो उन से आंखों ही आंखों में कुछ कह डाला.

‘‘देखो चंदर, मैं ने इस लड़के के परिवार को शाम की चाय पर बुला लिया है…’’ उन्होंने अपने बैग से लड़के का फोटो निकाल कर चंद्रकांत की ओर बढ़ाया.

‘‘पर बूआ आप पहले रश्मि से तो पूछ लीजिए कि वह शाम को घर पर रहेगी भी या नहीं,’’ चंद्रकांत ने धीरे से बूआजी के सामने यह बात रख दी, ‘‘और हां, यह भी बूआजी कि उसे यह लड़का पसंद भी है या नहीं,’’

‘‘देखो चंदर, आज 3 साल से लड़के की तलाश हो रही है पर इस के लिए कोई अच्छे गुणों वाला लड़का ही नहीं मिलता. और ये बात तो तय है कि बिना कुंडली मिलाए न तो मैं राजी होऊंगी और न ही स्मिता, क्यों स्मिता?’’ एक बार फिर बूआ ने स्मिता की ओर नजर घुमाई.

स्मिता चुप थीं.

नाश्ता कर के सब उठ गए और अपनेअपने कमरों में जाने लगे.

‘‘मैं जरा आराम कर लूं…थक गई हूं,’’ इतना बोल कर बूआ ने भी अपना बैग समेटा, ‘‘स्मिता, बाद में मेरे कमरे में आना.’’ बूआजी का यह आदेश स्मिता को था.

तभी चंद्रकांत ने पत्नी की ओर देख कर कहा, ‘‘स्मिता, तुम जरा कमरे में चलो. तुम से कुछ जरूरी बात करनी है.’’

स्मिता आंखें नीची कर के बूआ की ओर देखती हुई पति के पीछे चल दीं. बूआ को लगा, कुछ तो गड़बड़ है. वातावरण की दबीदबी खामोशी और स्मिता की दबीदबी चुप्पी के पीछे मानो कोई गहरा राज झांक रहा था.

वे सुबह से उठ कर, नित्य कर्म से निवृत्त हो कर बाहर निकलने में ऐसी निढाल हो गई थीं कि कुछ अधिक सोचविचार किए बिना उन्होंने अपने कमरे में जा कर स्वयं को पलंग पर डाल दिया. आज वैसे भी रविवार था. सब घर पर ही रहने वाले थे. थोड़ा आराम कर के लंच पर बात करेंगी. शाम को आने का न्योता तो दे आई हैं पर ‘मीनूवीनू’ तो तय करना होगा न. बूआजी बड़ी चिंतित थीं.

गंगा बूआ पूरे जोशोखरोश में थीं. उत्साह उन के भीतर पंख फड़फड़ा रहा था पर थकान थी कि उम्र की हंसी उड़ाने लगी थी. पलंग पर पहुंचते ही न जाने कब उन की आंख लग गई. जब वे सो कर उठीं तो दोपहर के साढ़े 3 बजे थे.

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‘कितना समय हो गया. मुझे किसी ने उठाया भी नहीं,’ बूआ बड़बड़ाती हुई कपड़े संभालती कमरे से बाहर निकलीं.

‘‘अरे, गोपू, कमली…कहां गए सब के सब…और आज खाने पर भी नहीं उठाया मुझे,’’ बूआ नौकरों को पुकारती हुई रसोईघर की ओर चल दीं. उन्हें गोपू दिखाई दिया, ‘‘गोपू, मुझे खाने के लिए भी नहीं उठाया. और सब लोग कहां हैं?’’

‘‘जी बूआ, आज किसी ने भी खाना नहीं खाया और सब बाहर गए हैं,’’ गोपू का उत्तर था.

‘बाहर गए हैं? मुझे बताया भी नहीं,’ बूआ अपने में ही बड़बड़ाने लगी थीं.

‘‘बूआजी, मैं महाराज को बोलता हूं आप का खाना लगाने के लिए. आप बैठें,’’ यह कहते हुए गोपू रसोईघर की ओर चला गया.

कुछ अनमने मन से बूआ वाशबेसिन पर गईं, मुंह व आंखों पर पानी के छींटे मारते हुए उन्होंने बेसिन पर लगे शीशे में अपना चेहरा देखा. थकावट अब भी उन के चेहरे पर विराजमान थी. नैपकिन से हाथ पोंछ कर वे मेज पर आ बैठीं. गोपू गरमागरम खाना ले आया था.

खाना खातेखाते उन्हें याद आया कि वे पंडितजी से कह आई थीं कि घर पर चर्चा कर के वे लड़के वालों को निमंत्रण देने के लिए चंदर से फोन करवा देंगी. आखिर लड़की का बाप है, फर्ज बनता है उस का कि वह फोन कर के लड़के वालों को घर आने का निमंत्रण दे. खाना खातेखाते बूआ सोचने लगीं कि न जाने कहां चले गए सब लोग…अभी तो उन्हें सब के साथ बैठ कर मेहमानों की आवभगत के लिए तैयारी करवानी थी.

‘खाना खा कर चंदर को फोन करूंगी,’ बूआ ने सोचा और जल्दीजल्दी खाना खा कर जैसे ही कुरसी से खड़ी हुईं कि उन की नजर ने ‘ड्राइंगरूम’ के मुख्यद्वार से परिवार के सारे सदस्यों  को घर में प्रवेश करते हुए देखा.

और…यह क्या, रश्मि ने दुलहन का लिबास पहन रखा है? उन्हें आश्चर्य हुआ और वे उन की ओर बढ़ गईं. स्मिता के अलावा परिवार के सभी सदस्यों के चेहरे पर हंसी थी और आंखों में चमक.

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‘‘लो, बूआजी भी आ गईं,’’ चंद्रकांत ने एक लंबे, गोरेचिट्टे, सुदर्शन व्यक्तित्व के लड़के को बूआजी के सामने खड़ा कर दिया.

‘‘रश्मिज ग्रैंड मदर,’’ चंद्रकांत ने कहा तो युवक ने आगे बढ़ कर बूआ के चरणस्पर्श कर लिए.

गंगा बूआ हकबका सी गई थीं.

सरस सलिल विशेष

‘‘बूआजी, यह सैमसन जौन है. आज होटल ‘हैवन’ में इस की रश्मि से शादी है. चलिए, सब को वहां पहुंचना है.’’

‘‘पर…ये…वो जन्मपत्री…’’ बूआजी हकबका कर बोलीं, फिर स्मिता पर नजर डाली. उस का चेहरा उतरा हुआ था.

‘‘अरे, बूआजी, जन्मपत्री तो इन की ऊपर वाले ने मिला कर भेजी है. चिंता मत करिए. चलिए, जल्दी तैयार हो जाइए. सैमसन के मातापिता भी होटल में ठहरे हैं. उन से भी मिलना है. फिर वे लोग अमेरिका वापस लौट जाएंगे.’’

चंद्रकांत बड़े उत्साहित थे. फिर बोले, ‘‘देखिएगा, किस धूमधाम से भारतीय रिवाज के अनुसार शादी होगी.’’

बूआजी किंकर्तव्यविमूढ़ सी खड़ी रह गई थीं. उन की नजर में रश्मि की जन्मपत्री के टुकड़े हवा में तैर रहे थे.

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