Family Story In Hindi: पानी पानी – आखिर समता क्यों गुमसुम रहने लगी?

Family Story In Hindi: अमित अपनी मां के साथ दिल्ली के पटेल नगर वाले मकान में था कि इतने में उस का फोन बजता है. सामने फोन पर प्राची है. अमित कुछ कह पाता, उस से पहले उस की भावभंगिमा बंद होने लगती  है. उस के हाथ कांपने लगते हैं. चेहरे का रंग पीला पड़ जाता है. वह घबरा कर अपनी मां की तरफ देख कर कहता है, ‘‘चिंकू कौन है मां? किस की बात कर रही हैं प्राची दी?’’

बेटे के चेहरे की उड़ी रंगत देख सुलक्षणा घबरा गई. बिस्तर से उठते हुए बेचैन हो कर वह बोली, ‘‘अरे, तेरा बेटा ही तो है चिंकू. और किसी चिंकू को तो मैं जानती नहीं. क्या हुआ, क्या कहा प्राची ने चिंकू के बारे में? कुछ तो बता.’’

‘‘मां, वह नहीं रहा. मेरा बच्चा चिंकू चला गया,’’ कह कर अमित बच्चों की तरह रोने लगा.

‘‘क्या हुआ उसे? ला मेरा फोन दे. शायद प्राची किसी और से बात करना चाह रही थी और तेरा नंबर मिल गया. मैं समता का नंबर लगा लेती हूं. बहू से ही पूछ लेती हूं इस फोन के बारे में. जरूर कुछ गड़बड़ हुई है. हो सकता है तुझ से सुनने में कुछ गलती हुई हो.’’ सुलक्षणा लगातार बोले जा रही थी. टेबल से अपना मोबाइल उठा कर उस ने अपनी बहू समता का नंबर मिला लिया. मोबाइल समता के जीजाजी ने उठाया. सुलक्षणा के कान जो नहीं सुनना चाह रहे थे वही सुनना पड़ा. सचमुच, अमित का 2 वर्षीय बेटा चिंकू इस दुनिया को छोड़ कर जा चुका था.

पिछले सप्ताह ही तो समता अपनी बहन प्राची के घर लखनऊ गई थी. शादी के बाद अमित की व्यस्तता के कारण वह प्राची के पास जा ही नहीं पाई थी. प्राची ही एक बार आ गई थी उस से मिलने. मातापिता तो थे नहीं, इसलिए दोनों बहनें ही एकदूसरे का सहारा थीं. कुछ दिनों पहले फोन पर प्राची ने समता से कहा था कि इस बार अपने बच्चों के स्कूल की छुट्टियों में वह कहीं नहीं जाएगी और समता को उस के पास आना ही पड़ेगा.

समता और चिंकू को लखनऊ छोड़ अमित कल ही दिल्ली वापस आया था. वह गुड़गांव में एक जरमन एमएनसी में मैनेजर के पद पर था. उसे कंपनी का मैनेजमैंट संभालना था, इसलिए वह लखनऊ रुक नहीं पाया और जल्द ही वापस दिल्ली आ गया. घर पहुंच कर उस ने जब समता को फोन किया था तो चिंकू ने समता के हाथ से मोबाइल छीन लिया था. उस की नन्हीं सी ‘एलो’ सुन कर रोमरोम खिल उठा था अमित का. प्यार से उसे ‘लव यू बेटा’ कह कर वह मुसकरा दिया था. चिंकू ने भी अपनी तोतली भाषा में ‘लब्बू पापा’ कह कर जवाब दे दिया था. आखिरी बार अमित ने तभी आवाज सुनी थी चिंकू की. और अब, वह कभी चिंकू की आवाज नहीं सुन पाएगा. कैसे हो गया यह सब.

दुख में डूबा अमित समता के पास जल्दी ही पहुंचना चाहता था. इसलिए उस ने बिना देरी किए फ्लाइट का टिकट बुक करवा लिया और लखनऊ के लिए रवाना हो गया.

अगले दिन ही वह समता को ले कर घर आ गया. उन के घर पहुंचते ही सुलक्षणा फूटफूट कर रोने लगी. अमित मां को कैसे सांत्वना देता, वह तो स्वयं ही टूट गया था. समता चुपचाप जा कर एक कोने में गुमसुम सी हो कर बैठ गई. उस की तो जैसे सोचनेसमझने की शक्ति ही चली गई थी. वह चंचल स्वभाव की थी. वह लोगों के साथ घुलनामिलना पसंद करती थी. लेकिन अब न जाने उस की दुनिया ही लुट गई हो.

धीरेधीरे पड़ोसी एकत्र होने लगे. चिंकू के इस तरह अचानक मौत के मुंह में जाने से सब बेहद दुखी थे.

‘‘कैसा लग रहा होगा समता को. खुद स्विमिंग की चैंपियन थी, अपने कालेज में… और बेटे की छोटी सी टंकी में डूब कर मौत,’’ समता की पुरानी सहेली वंदना दुखी स्वर में बोली.

‘‘बच्चे जब इकट्ठे होते हैं, मनमानी भी तो बहुत करने लगते हैं,’’ ठंडी आह भरते हुए सामने के मकान में रहने वाले मृदुल बोले.

‘‘हम लोग भी तो एकदूसरे में कभीकभी इतना खो जाते हैं कि बच्चों की सुध लेना ही भूल जाते हैं,’’ समता के पड़ोस में रहने वाली मनोविज्ञान की अध्यापिका, मृदुल को जवाब देने के अंदाज में बोल उठी.

‘‘असली बात तो यह है कि मौत के आगे आज तक किसी की नहीं चली. बाद में बस अफसोस ही तो कर सकते हैं. इस के सिवा कुछ नहीं,’’ एक बुजुर्ग महिला के कहने पर सभी कुछ देर के लिए मौन हो गए.

रिश्तेदारों को जब इस दुर्घटना के विषय में पता लगा तो वे प्राची से जानना चाह रहे थे कि आखिर यह सब हुआ कैसे? शोक में डूबी प्राची स्वयं को कुसूरवार समझ रही थी. न ही वह बच्चों को छत पर जाने देती और न ही यह दुर्घटना घटती. क्यों वह समता के साथ बातों में इतनी मशगूल हो गई कि छत पर खेल रहे बच्चों को झांक कर भी नहीं देखा. उस के बच्चे भी तो छोटे ही हैं. बेटी सौम्या 7 वर्ष की और बेटा सार्थक 5 वर्ष का. तभी तो वे समझ ही न पाए कि पानी की टंकी में गिरने के बाद चिंकू हाथपैर मार कर खेल नहीं रहा, बल्कि छटपटा रहा है. खेलखेल में ही क्या से क्या हो गया.

छत के फर्श पर रखी पानी की टंकी का ढक्कन खोल, प्राची के बच्चे उस में हाथ डाल कर मस्ती कर रहे थे. चिंकू ने भी उन की नकल करनी चाही, किंतु वह छोटा था और जब उचक कर उस ने पानी में दोनों हाथ डालने की कोशिश की तो उस का संतुलन बिगड़ गया और अपने को संभाल न पाने के कारण टंकी में ही गिर गया.

प्राची और समता के तब होश उड़ गए थे जब सौम्या ने नीचे आ कर कहा था, ‘‘चिंकू, बहुत देर से पानी में  है, आप निकालो बाहर’’, बेतहाशा दौड़ते हुए वे दोनों छत पर पहुंचीं. पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी. अपनी बहन समता के दुख में दुखी प्राची के पास आंसुओं के सिवा कुछ नहीं था.

पड़ोसी और रिश्तेदारों का अमित के घर आनाजाना लगातार जारी था. सब की नम आंखें हृदय का दुख व्यक्त कर पा रही थीं. मन को हलका करने के लिए एकदूसरे से बातें भी कर रहे थे वे. किंतु समता सब से दूर बैठी थी. जब कोई पास जा कर उस से बात करना शुरू करता तो वह अपना चेहरा दूसरी ओर मोड़ लेती. न आंखों में आंसू थे और न ही चेहरे पर कोई भाव. चिंकू का नाम सुनते ही वह कानों पर हाथ रख लेती और सब की बातों को अनसुना कर देती थी.

सब की यही राय थी कि समता को रोना चाहिए, ताकि उस का मन हलका हो पाए और वह भी सब के साथ अपना दुख साझा कर पाए, पर समता तो भावहीन चेहरा लिए एकटक शून्य में ताकती रहती थी.

समता की मानसिक स्थिति को देखते हुए अमित ने मनोचिकित्सक से सलाह ली. मनोचिकित्सक ने बताया कि ऐसे समय में कई बार व्यक्ति की चेतना दुख को स्वीकार नहीं करना चाहती, किंतु अवचेतन मन जानता है कि कुछ बुरा घट चुका है. सो, व्यक्ति का मस्तिष्क कुछ भी सोचना नहीं चाहता. समता के विषय में उस ने कहा कि यदि कुछ और दिनों तक उस की यही हालत रही तो उस के दिमाग के सोचनेसमझने की शक्ति हमेशा के लिए खत्म हो सकती है. चिकित्सक ने सलाह दी कि समता को चिंकू के कपड़े दिखा कर रुलाने का प्रयास करना चाहिए.

डाक्टर की सलाह अनुसार, अमित ने समता को चिंकू के कपड़े, खिलौने और फोटो दिखाए. चिंकू के विषय में जानबूझ कर बातें भी करने लगा वह. सुलक्षणा ने भी चिंकू की शैतानियों के किस्से समता को याद दिलाए और उन शैतानियों का नतीजा ही चिंकू की मौत का कारण बना, कह कर रुलाना भी चाहा पर समता पर किसी प्रकार का असर होता दिखाई नहीं दिया.

सुलक्षणा ने अमित को सलाह दी कि सब साथ में अपने गांव चलते हैं. वहां जा कर कुछ दिन इस वातावरण से दूर होने पर समता शायद सबकुछ नए सिरे से सोचने लगे और चिंकू की अनुपस्थिति खलने लगे उसे. संभव है फिर उस के मन का गुबार आंसुओं में निकल जाए. मां की बात मान अमित समता और सुलक्षणा के साथ कुछ दिनों के लिए गांव चला गया.

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के नजदीक ही गांव में उन का बड़ा सा पुश्तैनी मकान था. पास ही आम के बगीचे भी थे. उन सब की देखभाल रणजीत किया करता था. रणजीत बचपन से ही उन के परिवार के साथ जुड़ा हुआ था. यों तो उस की उम्र 40 वर्ष के ऊपर थी, पर परिवार के नाम पर पत्नी रज्जो और 4 वर्षीय इकलौटा बेटा सूरज ही थे. सूरज को उस ने पास के स्कूल में दाखिल करवा दिया था. विवाह के लगभग 20 वर्षों बाद सूरज का जन्म हुआ था. रज्जो और रणजीत चाहते थे कि उन की आंखों का तारा सूरज खूब पढ़ेलिखे और बड़ा हो कर कोई अच्छी नौकरी करे.

अमित का परिवार गांव आ रहा है, यह सुन कर रणजीत ने उन के आने की तैयारी शुरू कर दी. घर खूब साफसुथरा कर, बाजार जा कर जरूरी सामान ले आया. चिंकू के विषय में जान कर वह भी बेहद दुखी था.

गांव पहुंच कर अमित और सुलक्षणा का मन तो कुछ हलका हुआ, पर समता की भावशून्यता वहां भी कम न हुई. अमित उसे इधरउधर ले कर जाता. सुलक्षणा भी गांव की पुरानी बातें बता कर उस का ध्यान दूसरी ओर लगाने का प्रयास करती, पर समता तो जैसे जड़ हो गई थी. न वह ठीक से खातीपीती और न ही ज्यादा कुछ बोलती थी.

उस दिन अमित सुलक्षणा के साथ घर के नजदीक बने तालाब के किनारे टहल रहा था. समता घास पर चुपचाप बैठी थी. कुछ देर बाद पास के खाली मैदान पर बच्चे आ कर क्रिकेट खेलने लगे. उन के पास जो गेंद थी, वह प्लास्टिक की थी, इसलिए अमित ने समता को वहां से हटाना आवश्यक नहीं समझा.

बच्चे गेंद पर तेजी से बल्ला मार, उसे दूर फेंकने का प्रयास कर रहे थे, ताकि गेंद दूर तक जाए और उन्हें अधिक से अधिक रन बनाने का अवसर मिले. उन बच्चों की टोली में एक छोटा सा बच्चा हर बार फुरती से जा कर गेंद ले कर आ रहा था. छोटा होने के कारण बच्चों ने उसे बैंटिंग या बौलिंग न दे कर, फेंकी हुई गेंद वापस ला कर देने का काम सौंपा हुआ था.

इस बार एक बच्चे ने कुछ ज्यादा ही तेजी से बल्ला चला दिया और गेंद तीव्र गति से लुढ़कने लगी. छोटा बच्चा भागता हुआ गेंद को पकड़ने की कोशिश करता रहा, पर गेंद तो खूब तेजी से लुढ़कते हुए तालाब में गिर कर ही रुकी. प्लास्टिक की होने के कारण वह गेंद पानी पर तैरने लगी. गेंद तालाब से निकालने के लिए उस बच्चे ने जमीन पर पड़ी पेड़ की पतली सी टहनी उठाई और गेंद को टहनी से खिसका कर करीब लाने की कोशिश करने लगा. पेड़ की डंडी गेंद तक तो पहुंच रही थी, पर इतनी बड़ी नहीं थी कि गेंद को आगे की ओर धकेल पाए. इधर बच्चा कोशिश कर रहा था, उधर साथी ‘जल्दीजल्दी’ का शोर मचाए हुए थे. गेंद को तेजी से आगे की ओर धकेलने के लिए उस पर डंडी मारते हुए अचानक ही वह बच्चा तालाब में गिर गया.

इस से पहले कि वहां खेल रहे बच्चे कुछ समझ पाते, समता तेजी से दौड़ती हुई वहां पहुंची और तालाब में कूद पड़ी. बच्चे को झटके से पकड़ कर उस ने गोदी में उठा लिया. अमित और सुलक्षणा दूर से यह दृश्य देख रहे थे. अमित भी भागता हुआ वहां पहुंच गया और तालाब के किनारे बैठ कर बच्चे को अपनी गोद में ले लिया. बच्चे को शीघ्र ही उस ने अपने घुटने पर पेट के बल लिटा दिया, ताकि थोड़ा सा पानी भी अंदर गया हो तो बाहर निकल सके. तब तक सभी बच्चे चिल्लाते हुए वहां पहुंच गए. शोर सुन कर आसपास के घरों से भी लोग वहां इकट्ठे होने लगे.

तालाब से बाहर निकलते ही समता अमित के पास आई और उस बच्चे को सकुशल देख अपने गले लगा कर फूटफूट कर रोने लगी. तभी भीड़ को चीरता हुआ रणजीत वहां पहुंच गया. अपने बेटे सूरज को मौत के मुंह से निकला हुआ देख उस की जान में जान आई. गदगद हो कर वह समता से बोला, ‘‘आज आप ने नया जीवन दिया है मेरे बच्चे को. कितने सालों बाद संतान का मुंह देखा था. अगर आज इसे कुछ हो जाता तो… आप का एहसान तो मैं इस जीवन में कभी नहीं चुका पाऊंगा.’’

भावविभोर समता बाली, ‘‘एहसान कैसा, भैया? मुझे तो लग रहा है जैसे मैं ने अपने चिंकू को बचा लिया हो.’’ और सूरज को गले लगा कर समता फिर से रोने लगी.

घर वापस आते हुए सूरज का हाथ थामे वह उस से बातें कर रही थी. समता में आए इस परिवर्तन से अमित और सुलक्षणा बेहद खुश थे. कुछ दिन गांव में गुजारने के बाद वे तीनों वापस दिल्ली लौट आए.

घर वापस आ कर समता नया जीवन जीने को तैयार थी. अनजाने में ही उसे यह एहसास हो गया था कि जिंदगी में गम और खुशी दोनों को ही गले लगाना पड़ता है.

उस के अवचेतन मन ने उसे समझा ही दिया था कि सुख और दुख के तानेबाने को गूंथ कर ही जिंदगी की बुनाई होती है. Family Story In Hindi

Family Story In Hindi: याददाश्त – भूलने की आदत से क्यों छूटकारा नहीं मिलता

Family Story In Hindi: याददाश्त इतनी कमजोर नहीं थी कि घर भूल जाऊं. पत्नीबच्चों को भूल जाऊं. जैसा कि लोग कहते थे कि यदि भूलने की आदत है तो खानापीना, सोना, घनिष्ठ संबंध क्यों नहीं भूल जाते. अब मैं क्या करूं यदि रोजमर्रा की चीजें भी दिमाग से निकल जाती थीं. तो वहीं ऐसी बहुत सारी छोटीछोटी बातें हैं जो मैं नहीं भूलता था और ऐसी भी बहुत सी चीजें, बातें थीं जो मैं भूल जाता था और बहुत कोशिश करने के बाद भी याद नहीं आती थीं और याद करने की कोशिश में दिमाग लड़खड़ा जाता.

खुद पर गुस्सा भी आता. तलाश में घर का कोनाकोना छान मारता. समय नष्ट होता. खूब हलकान, परेशान होता और जब चीज मिलती तो ऐसी जगह मिलती कि लगता, अरे, यहां रखी थी. हां, यहीं तो रखी थी. पहले भी इस जगह तलाश लिया था, तब क्यों नजर नहीं आई? उफ, यह कैसी आदत है भूलने की. इसे जल्दबाजी कहें, लापरवाही कहें या क्या कहें? अभी इतनी भी उम्र नहीं हुई थी कि याद न रहे.

कल बाजार में एक व्यक्ति मिला, जिस ने गर्मजोशी से मुझ से मुलाकात की और वह पिछली बहुत सी बातें करता रहा और मैं यही सोचता रहा कि कौन है यह? मैं उस की हां में हां मिला कर खिसकने का बहाना ढूंढ़ रहा था. मैं यह भी नहीं कह पा रहा था, उस का अपनापन देख कर कि भई माफ करना मैं ने आप को पहचाना नहीं. हालांकि, इतना मैं समझ रहा था कि इधर पांचसात सालों में मेरी इस व्यक्ति से मुलाकात नहीं हुई थी. उस के जाने के बाद मुझे अपनी याददाश्त पर बहुत गुस्सा आया. मैं सोचता रहा, दिमाग पर जोर देता रहा कि आखिर कौन था यह? लेकिन दिमाग कुछ भी नहीं पकड़ पा रहा था.

घर से जब बाहर निकलता तो कुछ न कुछ लाना भूल जाता था. यह भी समझ में आता था कि कुछ भूल रहा हूं लेकिन  क्या? यह पकड़ में नहीं आता था. अब मैं कागज पर लिख कर ले जाने लगा था कि क्याक्या खरीदना है बाजार से. इस बार मैं तैयार हो कर घर से बाहर निकला और बाहर निकलते ही ध्यान आया कि चश्मा तो पहना ही नहीं है. घर के अंदर गया तो जहां चश्मा रखता था, वहां चश्मा नहीं था. तो कहां गया चश्मा?

इस चक्कर में पूरा घर छान मारा. पत्नी को परेशान कर दिया. उसे उलाहना देते हुए कहा, ‘‘मेरी चीजें जगह पर क्यों नहीं मिलतीं? यहीं तो रखता था चश्मा. कहां गया?’’

पत्नी भी मेरे साथ चश्मा तलाश करने लगी और कहने भी लगी गुस्से में, ‘‘खुद ही कहीं रख कर भूल गए होगे. याद करो, कहां रखा था?’’

‘‘वहीं रखा था जहां रखता हूं हमेशा.’’

‘‘तो कहां गया?’’

‘‘मुझे पता होता, तो तुम से क्यों पूछता?’’

फिर हमारी गरमागरम बहस के साथ   हम दोनों ही पूरा घर छानने लगे चश्मे की तलाश में. काफी देर तलाशते रहे. लेकिन चश्मा कहीं नहीं मिल रहा था. मैं याद करने की कोशिश भी कर रहा था कि मैं ने यदि चश्मे को उस के नियत स्थान से उठाया था तो फिर कहांकहां रख सकता था? जैसे कि मैं ने चश्मा उठाया. उस के कांच साफ किए. फिर गाड़ी की चाबी उठाई. इस बीच, मैं ने आईने के सामने जा कर कंघी की. फिर पानी पिया, फिर…

तो मैं सभी संभावित स्थानों पर गया. जैसे ड्रैसिंग टेबल के पास, फ्रिज के पास वगैरह. लेकिन चश्मा नहीं मिला. मैं समझ नहीं पा रहा था कि आखिर चश्मा गया कहां? उसे जमीन खा गई या आसमान निगल गया. याद क्यों नहीं आ रहा है?

चश्मे की आदत सी पड़ गई थी. न भी पहनूं तो जेब में रख लेता था बाजार जाते समय. जैसे घड़ी का पहनना होता था. मोबाइल रखना होता था. बहुत जरूरी न होते भी जरूरी होना. न रखने पर लगता था कि जैसे कुछ जरूरी सामान छूट गया हो. खालीखाली सा लगता. आदत की बात है.

चश्मा तलाश रहा हूं. पत्नी अपने काम में लगी हुई है. उस ने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि नहीं मिल रहा तो परेशान मत हो. घर में होगा, मिल जाएगा. बिना चश्मे के बाजार जा सकते हो. मुझे उस की बात ठीक लगी. लेकिन दिमाग में यही चल रहा था कि आखिर चश्मा कहां रख कर भूल गया. तभी कोचिंग से बेटा घर आया. मेरा चेहरा देख कर समझ गया. उस ने पूछा, ‘‘क्या नहीं मिल रहा, अब?’’

उस की बात पर मुझे गुस्सा आ गया. ‘अब’ लगाने का क्या मतलब हुआ? यही कि मैं हमेशा कुछ न कुछ भूल जाता हूं. अकसर तो भूल जाता हूं, लेकिन हमेशा… यह तो हद हो गई. खुद तो कोचिंग के नाम पर व्यर्थ रुपया खर्च कर रहा है. कोचिंग ही जाना था तो स्कूल की क्या जरूरत थी? फैशन सा हो गया है आजकल कोचिंग जाना. कोचिंग जा कर छात्र साबित करते हैं कि वे बहुत पढ़ाकू हैं. दिनभर स्कूल, फिर कोचिंग. मैं इसे कमजोर दिमाग मानता हूं. जैसे पहले कमजोर को ट्यूशन दी जाती थी. लेकिन अब जमाना बदल गया है. कोचिंग जाने वालों को पढ़ाकू माना जाता है. मैं ने गुस्से से बेटे की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘जा कर अपना काम करो.’’ बेटे तो फिर बेटे ही होते हैं. तुरंत मुंह घुमा कर अंदर चला गया और मैं बिना चश्मे के बाहर निकल गया.

किराना दुकानदार को सामान की लिस्ट दी. वह सामान निकालता रहा. मैं इधरउधर सड़कों पर नजर घुमाता रहा.

दुकानदार आधा सामान दुकान के बाहर रखे हुए हैं.

तंबाकू खाते हुए मुझे भी थूकने की इच्छा हुई. मैं ने काफी देर पीक को मुंह में रखा और नाली, सड़क का किनारा तलाशता रहा. अंत में मुझे भी सड़क पर ही थूकना पड़ा. दुकानदार ने बिल देते हुए कहा, ‘‘चैक कर लीजिए.’’

मैं ने कहा, ‘‘भाई, आज मैं अपना चश्मा लाना भूल गया.’’ उस ने मेरे चेहरे पर इस तरह दृष्टि डाली जैसे मैं ने शराब पी रखी हो. फिर कहा, ‘‘लगा तो है.’’ मेरा हाथ आंखों पर गया और… अरे, यह तो पहले से ही लगा हुआ था और मैं पूरे घर में तलाश रहा था. लेकिन मुझे समझ क्यों नहीं आया. शायद आदत पड़ जाने पर उस चीज का भार महसूस नहीं होता.

पत्नी तो खैर मेरे कहने पर ढूंढ़ने लगी थी. उसे विश्वास था कि नहीं मिल रहा होगा. लेकिन बेटे को तो पता होगा कि चश्मा लगाया हुआ है मैं ने. लेकिन मैं ने कहां बताया था गुस्से में कि चश्मा नहीं मिल रहा है. बताता तो शायद वह बता देता और इतनी मानसिक यंत्रणा न झेलनी पड़ती. न ही दुकानदार के सामने शर्मिंदा होना पड़ता. बच्चों से प्रेम से ही बात करनी चाहिए. वह पूछता. मैं बताता कि चश्मा नहीं मिल रहा है तो वह बता देता.

मांबाप की डांट या गुस्से में बात करने से बच्चे और चिढ़ जाते हैं. नए खून नए मस्तिष्क पर भरोसा करना सीखना चाहिए. उन के बाप ही न बने रहना चाहिए. मित्र भी बन जाना चाहिए जवान होते बच्चों के पिता को.

बेटे को पता तो चल ही गया होगा कि चश्मा तलाश रहा था मैं और अब तक उस ने अपनी मां को बता भी दिया होगा कि चश्मा पिताजी पहने हुए थे. दोनों मांबेटे हंस रहे होंगे मुझ पर. अब भविष्य में कोई चीज गुम होने पर शायद उतनी संजीदगी से तलाशने में मदद भी न करें.

मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था कि मुझे समझ में क्यों नहीं आया कि मैं चश्मा लगाए हुए था.

अब दिमाग इसी उधेड़बुन में लगा हुआ था कि नियत स्थान से चश्मा उठा कर मैं ने लगाया कब था? तैयार होने के बाद. गाड़ी की चाबी उठाने के बाद या पानी पीने के बाद या इस सब के पहले या उस से भी बहुत पहले. कहीं ऐसा तो नहीं कि सुबह समाचारपत्र पढ़ते समय.

यह भी संभव है कि रात में पहन कर ही सो गया था. दिमाग पर काफी जोर डालने के बाद भी पक्का नहीं कर पाया कि चश्मा लगाया कब था और मैं अभी भी उसी सोच में डूबा हुआ था. और यह सोच तब तक नहीं निकलने वाली थी जब तक कोई दूसरी चीज न मिलने पर उस की खोज में दिमाग न उलझे. Family Story In Hindi

Hindi Family Story: ख्वाहिशें

 Hindi Family Story, लेखक – मनोज शर्मा

जो मुझे ठीक लगता है वही ठीक है, वही सच है. जिंदगी मेरी है, मैं जैसे चाहे जियूं, किसी का क्या जाता है. फिर यह सब मुझे पिछली जिंदगी से बेहतर लगता है. यों घिसटघिसट कर जीने से तो अच्छा है कि सोसाइटी में कुछ बन कर जिया जाए.

कल तक कोई साथ नहीं था, आज चार लोग साथ हैं. हर आदमी को पैसे की भूख है और शायद यही सच है, क्योंकि पैसे के बिना कुछ नहीं, कुछ भी नहीं. एक दिन भी नहीं जिया जा सकता. हां सच में, एक दिन भी नहीं.

जसपाल ने सिगरेट के धुएं को हवा में फेंकते हुए गाड़ी का दरवाजा खोला और मुसकराते हुए कहा, ‘‘ओह, कम औन गौरी…’’

गौरी ने शरारतभरी नजरों से जसपाल को देखा और उस के बगल में बैठ गई. कार धुआं छोड़ते हुए आगे बढ़ने लगी. साइड मिरर में गौरी ने खुद को निहारा. वह लाल फूलों वाली साड़ी में आज काफी खूबसूरत दिख रही थी.

‘‘अच्छा गौरी, कल तो आ रही हो न?’’ जसपाल ने गौरी की आंखों में ?ांकते हुए पूछा.

‘‘वैसे, कल तुम कर क्या रही हो?’’ जसपाल ने हौर्न देते हुए उस से दोबारा पूछा.

‘‘कुछ खास नहीं. पर कल रितु के स्कूल जाना है… वह पैरेंट मीटिंग हैं न कल स्कूल में,’’ गौरी ने बालों के जूड़े को ठीक करते हुए जवाब दिया.

गौरी का पूरा जिस्म मीठी खुशबू से महक रहा था. जसपाल उसे मुसकराते हुए देखता रहा. गाड़ी स्पीड ब्रेकर पर थोड़ा उछली. जसपाल ने गियर बदलते हुए गाड़ी को दाईं ओर मोड़ दिया. गौरी का बदन हलका सा ठिठका.

सड़क पर अलसाई शाम की उदासी के बीच लोग दफ्तरों से घर लौट रहे थे. कुछ छोटी गाडि़यां, मोटरें और सड़क के किनारे पैदल चलते लोग.

इन पैदल चलने वाले लोगों की भी क्या जिंदगी है, जसपाल ने उन की तरफ देख कर तेज हौर्न दिया और भोंड़ी सी हंसी हंस कर उस ने गाड़ी को सड़क के किनारे पार्क किया.

जसपाल सिगरेट का पैकेट खरीदने के लिए बाहर निकला. दरवाजा बंद होते ही गाड़ी में अकेली गौरी मिरर में खुद को बड़े प्यार से देखती रही. उस ने महसूस किया कि आज वह सच में ही खूबसूरत दिख रही है. उस ने बाईं कलाई में बंधी घड़ी में समय देखा, साढ़े 8 हो चुके थे.

गौरी ने बंद गाड़ी के काले शीशों में से बाहर देखा. जसपाल सिगरेट की टपरी पर बतिया रहा था. गौरी उसे पीली रोशनी में बाहर देखती रही. उसे लगा कि असलियत में यही जिंदगी है. गाड़ी, बंगला और सभी सुखसुविधाएं. अब कोई दुखदर्द नहीं. न घर की चिंता, न खानेपीने की, बस मौज ही मौज. शायद यही जिंदगी है और यही सचाई है.

4 साल पहले तक जैसे नरक में जी रही थी गौरी. वह मुफलिसी भरी जिंदगी जहां दो रोटियां भी वक्त पर नसीब नहीं होती थीं. घर वालों ने नीरज में क्या देखा था मेरे लिए, जो उस के साथ मुझे ब्याह दिया था. जसपाल की काली आकृति शीशों में हिलडुल रही थी.

नीरज अपने साथ एक गरीब परिवार लिए था, जिस में उस की बूढ़ी मां और विधवा बहन थी, जो पुराने सिद्धांतों पर जीते थे. घर के नाम पर वह टूटाफूटा कोठरा था, जहां पेटभर खाना भी नसीब नहीं होता था. पहले मां मर गई और फिर खुद नीरज भी और बहन भी गौरी को ऐसे हालात में तनहा छोड़ कर भाग गई.

उस घर में गौरी के सारे सपने चकनाचूर होते गए. काश, नीरज से शादी न हुई होती तो…

गौरी ने फ्रंट मिरर की लाइट जला कर खुद को देखा और वह अपने कानों में पहनी बड़ीबड़ी बालियों को देखने लगी. हलकी पीली लाइट में बालियां चमक रही थीं.

रितु का जन्म न हुआ होता तो बात दूसरी ही होती. गौरी ने अपने नरम गालों पर उंगली फिराते हुए बाहर देखा. जसपाल वापस लौट रहा था. वह उसे ऐसे देख रही थी, जैसे जसपाल ही उस के लिए सबकुछ हो.

जसपाल ने दरवाजा खोला. उस की आंखों में मीठी चमक थी. गौरी हलका सा खिसक कर बाहर की ओर देखने लगी. स्ट्रीट लाइट की सड़क पर तेज चमक थी.

एक पियक्कड़ गाड़ी के पास से गुजरा. वह शीशे को बजाते हुए कुछ बोलता रहा.

जसपाल ने उसे गुस्से से देखा और गाड़ी दौड़ा दी. पियक्कड़ कुछ देर गाड़ी के पीछे भागता रह गया. गाड़ी चली गई. आसपास की सब चीजें और वह पियक्कड़, जो बाहर सड़क पर दिखाई दे रहा थे, पलभर में ही सब ओ?ाल होते गए.

जसपाल ने गौरी को गंभीरता से देखते हुए पूछा, ‘‘क्या हुआ गौरी, तुम इतनी चुप क्यों हो? कम औन डियर. यही जिंदगी है. बदलाव का नाम ही जिंदगी है. जिंदगी में तुम्हारी अगर कोई भी ख्वाहिश, हो तो मुझे बताओ.

‘‘मैं ने तुम्हें नीरज के चले जाने के बाद कहा था न कि तुम अगर अच्छी जिंदगी और ऐश चाहती हो, तो रहनसहन और खानपान में थोड़ा बदलाव करो और मेरा साथ दो. फिर देखो, असली जिंदगी जीने का मजा.’’

गौरी गंभीर थी. वह चुप ही रही.

‘‘अरे, तुम कहां फिर पुराने दिनों में चली जाती हो. अच्छा, सचसच बताओ कि यह जिंदगी बेहतर है या वह, जिसे तुम ने 4 साल पहले जिया है? आज तुम समाज में चाहे एक विधवा हो, पर क्या यह जिंदगी उस जिंदगी से ज्यादा मजेदार नहीं है? सफेद साड़ी में जिंदगी इतनी बड़ी और नीरस दिखाई देती. तुम तो जानती ही हो कि मेरा तो जिंदगी में एक ही उसूल है, ख्वाहिशों को पूरा करना सीखो, चाहे जिस भी रास्ते से, वरना जीना छोड़ दो.

‘‘आज तुम्हारे पास नौकरचाकर और रितु के लिए आया है. अपना बंगला है. न किराया देने की टैंशन.

‘‘तुम्हारी सारी परेशानियां अब मेरी हैं. फिर जवानी जीने की चीज है, यों ही रो कर गंवा देने की नहीं. जितनी ऐश अब है तुम्हारी, शायद ही इस की कल्पना भी तुम कर पाती. और सच बताऊं तो तुम्हारा साथ मुझे और हम सब को खूब भाता है. फिर कुदरत ने एक ही तो जिंदगी दी है, वह भी रोधो कर जीनी पड़े, तो उस का क्या फायदा. ऐसे जीने से तो मरना ही अच्छा. सच बताऊं तो अच्छा ही हुआ, जो नीरज…’’ जसपाल बोलतेबोलते चुप हो गया और गौरी के चेहरे को देखता रहा.

गौरी भी जसपाल की नशीली नीली आंखों को देखती रही. जसपाल पैसे वाला रईस है, जिस के लिए जिंदगी केवल और केवल ऐश करने के लिए है. यों तिलतिल कर खत्म करने के लिए नहीं. लंबा और गठीला बदन, आंखों पर काला चश्मा, सिगरेट का शौकीन.

नीरज एक वक्त जसपाल के कारखाने में काम करता था. 15-20 हजार रुपए की सैलरी थी उस की. इतने रुपए में क्या ऐश की जा सकती है, बस जी ही लिया जाए, वही काफी है.

गौरी ने नीरज के जीतेजी जसपाल को 2-3 बार ही देखा था. जसपाल तेजतर्रार और आकर्षक मर्द है, जिसे जीना आता है. उस की ही बदौलत आज गौरी के पास उसी की कंपनी में अच्छी नौकरी है, घर है और सच कहें तो ऐश ही ऐश है.

‘‘कहां जा रहे हो, घर नहीं चलना क्या? जानते हो, पौने 9 बज चुके हैं,’’ गौरी ने जसपाल को देखते हुए पूछा, ‘‘और फिर रितु को भी तो देखना है.’’

‘‘अरे, चली जाना. घर पर ही तो जाना है. बस आधा घंटा और… तुम्हें अपना नया बंगला दिखाना है,’’ जसपाल की आंखों में नशीली शरारत थी.

‘‘अरे, चलो भी तो. मैं हूं न तुम्हारे साथ. तुम तो ऐसे कर रही हो जैसे पहली बार जा रही हो,’’ और वह एक आंख बंद कर मुसकराने लगा.

जसपाल की गाड़ी भीनीभीनी महक से भरी थी. गौरी ने गाड़ी के भीतर के कमजोर अंधेरे में उस की नीली आंखों को देखा, जो बारबार उसे ही देख रही थीं. वह पलभर में उस के इशारे को सम?ा गई.

‘‘ओके, रितु की आया सावित्री को फोन लगाओ,’’ गौरी बोली.

जसपाल ने जेब से अपना मोबाइल निकाला और गौरी के घर पर नंबर मिलाया.

दूसरी ओर से आया सावित्री की आवाज आई, ‘हैलो..’

‘‘हां सावित्री, रितु ने खाना खाया या नहीं?’’ गौरी इस ओर से फोन पर

बोलने लगी.

‘हां मेमसाब, रितु बिटिया ने खाना खा लिया है. बस अभीअभी सोई है. क्या जगाऊं?’ सावित्री पूछने लगी.

‘‘नहींनहीं, कोई जरूरत नहीं… ऐसा करो, तुम भी कुछ खा कर अभी वहीं रुको. मैं अभी जसपाल साहब के साथ हूं, थोड़ा टाइम और लगेगा. और हां, अगर इस बीच रितु उठ जाए, तो बोलना कि मैं 10 बजे तक पहुंच जाऊंगी. तुम संभाल लेना प्लीज उसे.

‘‘अच्छा, मैं अभी बहुत बिजी हूं. फोन रखती हूं,’’ कह कर उस ने फोन कट कर दिया.

जसपाल कंधे उचका कर मुसकराने लगा. यह जसपाल के लिए कोई नई बात नहीं थी और अब शायद गौरी के लिए भी. अब उन्हें इस जिंदगी में ज्यादा मजा आता है.

‘‘कहो, खुश तो हो न गौरी?’’ जसपाल ने गौरी की कलाई को छूते हुए पूछा.

गौरी चुप रही, पर उस के होंठों पर नरम हंसी थी, जिस का मतलब जसपाल खूब समझता था. गाड़ी सड़क पर दौड़ती रही. जसपाल ने गाड़ी की स्पीड बढ़ाते हुए गौरी की ओर देखा और कहा, ‘‘चलो, तुम्हें आज एक और सरप्राइज देता हूं…’’

गौरी सरप्राइज की बात सुन कर मंदमंद मुसकराने लगी मानो उस की एक और ख्वाहिश आज पूरी होने वाली हो, क्योंकि जब भी जसपाल ने कोई सरप्राइज दिया, उसे जिंदगी में कोई न कोई नई सौगात ही मिली है.

फिर इस शरीर का क्या है, अगर इस के सहारे कुछ मिलता भी है, तो गलत ही क्या है. जिंदगी में ऐसे दिन फिर कहां… आज जवानी है तो सब मिल रहा है, कल जब शरीर ही काम का नहीं रहेगा, फिर कौन साथ होगा. न जसपाल और न दूसरे सब. ओ जसपाल कितने अच्छे हैं, सच में,आज गौरी नई कार पा कर बहुत खुश थी. यह शौर्टकट सच में उसे खूब भाने लगा था.

10 बजे गौरी अपनी नई गाड़ी में घर पहुंची. तेज ठंडी हवा में उस के उलझे बिखरे बाल कंधे की ओर ढुलक रहे थे. आज उस ने फिर से वाइन भी पी थी. वह दरवाजे पर पहुंची. उस ने अंगड़ाई लेते हुए सावित्री की तरफ देखा. सावित्री का पीला और उदास चेहरा गौरी को देखता रहा.

‘‘कहो सावित्री, कुछ कहना चाहती हो?’’

‘‘मेमसाब, कुछ पैसे चाहिए,’’ कहते हुए वह खामोश हो गई और घर के बाहर फैले सन्नाटे को देखने लगी.

सावित्री क्योंकि इस महीने की सैलरी ले चुकी थी, इसलिए उस की पैसे मांगने की हिम्मत नहीं हो रही थी.

‘‘सैलरी तो तुम ले चुकी हो न,’’ गौरी ने सावित्री की आंखों में ?ांकते

हुए कहा.

‘‘जी मेमसाब, मेरा मरद बहुत बीमार है. अब उस की नौकरी भी छूट गई है. केवल मैं ही थोड़ा गुजरबसर कर रही हूं,’’ उस की आवाज में गहरा दुख था.

‘‘अच्छा, कितने पैसे चाहिए?’’ गौरी ने सावित्री के कंधे पर हाथ रख कर पूछा.

‘‘बस, 1,000 रुपए दे दीजिए, मैं बहुत जल्दी आप को लौटा दूंगी. आप यकीन कीजिए, उन के इलाज के लिए चाहिए… और हां, मैं कल केवल शाम को ही आ सकूंगी. मुझे कल उन के ऐक्सरे करवाने हैं,’’ वह असहाय सी हो कर बोली.

‘‘ठीक है. अब तुम जाओ और ये लो 5,000 रुपए,’’ गौरी ने नोटों की एक गड्डी से कुछ नोट निकाल कर सावित्री की ओर बढ़ा दिए.

‘‘नहीं मेमसाब, 1,000 रुपए ही काफी हैं.’’

‘‘कोई बात नहीं, अभी तुम रख लो, तुम्हें जरूरत होगी,’’ गौरी सावित्री की रोती आंखों को देखती रही.

सावित्री कुछ देर रुकी, फिर वह नोट गिनते हुए वहां से लौट गई.

फोन की घंटी बजी. जसपाल था, ‘कहो डियर, पहुंच गई. ओ सौरी, मैं तो आज बिलकुल ही टूट गया था, पर यकीन करो मजा आ गया.

‘और हां, मेरा सरप्राइज कैसा लगा? गाड़ी को सही से पार्किंग में लगा दिया न? और हां, मैं ने उस का टैंक फुल करवा दिया है. तेल की कोई टैंशन न लेना तुम. कहो तो एक ड्राइवर रखवा दूं तुम्हारे लिए?

‘डियर, तुम यकीन करो, मैं तुम्हें खुश देखना चाहता हूं. अच्छा अभी कामिनी का फोन आ रहा है… रखता हूं,’ फोन कट हो गया था.

गौरी अकेले में सोचते हुए, ‘मैं कितनी खुशनसीब हूं. सबकुछ तो है मेरे पास. बस, एक पति ही तो नहीं. फिर ऐसे पति का मुझे करना ही क्या, जो न ढंग का खिला सके. बिना घर, बिना गाड़ी के भी क्या जिंदगी. आज नीरज नहीं भी है तो क्या हुआ, बाकी सबकुछ तो है मेरे पास…’ और वह अकेले में पागलों की तरह हंसने लगी.

‘मुझे लगता है कि हमें जिंदगी की प्राथमिकताओं को समझना चाहिए. जो हमारे लिए जरूरी है और जिस काम से हमें मजा मिलता है, संतुष्टि मिलती है, हकीकत में वही सच्ची जिंदगी है, बाकी सब बेकार है.

‘आज मैं बड़ी सोसाइटी में जी रही हूं. यह मेरी जिंदगी है, केवल मेरी. मैं जैसे चाहे जीयूं,’ उस ने सिगरेट जलाई और बालकनी में जा कर दूर अंधेरे में देखती रही, मानो अंधेरे में सब छिप जाता है. इच्छाएं, सपने और ख्वाहिशें भी.

‘आज जिंदगी में जो उजाला है, वह मेरी ही बदौलत है…’ उस ने लंबा कश खींचते हुए आसमान में झिलमिलाते तारों को देखा और सोचने लगी, ‘कितनी चमक है इन तारों में. जो दिखाई दे रहा है, वही चमक रहा है. वैसे तो आसमान में अनगिनत सितारे हैं, पर चमक उन्हीं की नजर आती है, जो चमकना चाहते हैं.

‘जिंदगी में शायद कुछ भी गलत नहीं, केवल सोच या नजरिया ही किसी भी चीज को गलत या सही ठहराता है. आज जो मेरी नजर में सही है, वह मेरे लिए सही है और अगर मैं दूसरों के नजरिए से जीने लगूं, तो सावित्री की तरह जीना होगा.

‘ये गरीब लोग गरीब नहीं, बल्कि पागल हैं, कमजोर हैं, जो जिंदगी की सचाई से कोसों दूर हैं. अगर मैं अपनी जिंदगी में इस तरह का बदलाव न करती, तो शायद मुझे भी सावित्री की तरह दरदर की ठोकरें ही खानी पड़तीं…’

‘‘1,000 रुपए के लिए, केवल 1,000 के लिए…’’ गौरी हंस रही थी और उस की जबान लड़खड़ा रही थी, ‘‘ये लोग अपनी सोच नहीं बदल सकते तो जिएं ऐसे ही नरक में…’’

धीरेधीरे आसपास के बंगलों की लाइट कम होने लगी थी. गौरी पार्किंग में खड़ी सफेद चमचमाती कार को देख कर मंदमंद मुसकरा रही थी, मानो उस की जिंदगी का कोई बड़ा सपना आज पूरा हो गया हो.

नींद गौरी की आंखों से कोसों दूर थी. वह कुछ देर आसमान के तारों को ताकती रही. अंदर कमरे में मखमली गद्दे पर रितु गहरी नींद में सोई हुई थी. गौरी उस के नरम गालों को चूमते हुए उस के पास लेट गई. Hindi Family Story

Comedy Story: वोटर केयर सैंटर में आपका स्वागत है

Comedy Story: एक दिन मेरे मोबाइल फोन पर किसी अनजान नंबर से काल आई. जैसे ही मैं ने काल रिसीव की, दूसरी ओर से आवाज आई, ‘नमस्कार, वोटर केयर सैंटर में आप का स्वागत है.’

वह कंप्यूटराइज्ड आवाज सुन कर मेरे दिमाग के सैरेब्रल हैमिस्फीयर में दबाव बढ़ने लगा. कालर ट्यून, बैंकिंग लोन काल, क्रेडिट कार्ड देने वाले कस्टमर केयर या आधारकार्ड नंबर और ओटीपी मांगने वाले फ्राड काल के बारे में तो सुना था, पर अब यह वोटर केयर सैंटर कौन सी नई बला है.

इसी ऊहापोह में मैं फोन काटने ही वाला था कि तभी दूसरी ओर से आवाज आई, ‘चूंकि यह काल जनहित में जारी है, इसलिए पूरी जानकारी लिए बिना कृपया फोन काटने की हिमाकत न करें.’

वह चेतावनी सुन कर मैं थोड़ा हड़क गया और बगैर किसी बाधा के फोन की लाइन को जारी रखा.

‘नमस्कार, हम वोटर केयर हैल्पलाइन से बोल रहे हैं. आप के क्षेत्र में चुनाव की घोषणा हो चुकी है. क्षेत्रीय उम्मीदवार के चयन को सुविधाजनक बनाने के लिए अगर आप उन के चालचलन के बारे में जानना चाहते हैं, तो कृपया 1 दबाएं, वरना 2 दबाएं.’

मैं मन ही मन सोचने लगा, ‘यह कैसा वोटर केयर सैंटर है… पहले तो कस्टमर केयर काल में हिंदी, इंगलिश, बंगला, भोजपुरी वगैरह भाषा के चयन का औप्शन पूछा जाता था…’

तभी दूसरी ओर से आवाज आई, ‘आप भाषा चयन को ले कर कतई परेशान न हों. हमें पता है कि आप हिंदी के जानकार हैं. वैसे भी इंगलिश में आप कच्चे हैं और दूसरी क्षेत्रीय भाषा को समझना आप की औकात और ज्ञान से बाहर है. तो एकदूसरे का समय बरबाद किए बिना वोटर केयर प्रक्रिया को जारी रखते हुए अपने क्षेत्रीय उम्मीदवार का चालचलन जानने के लिए कृपया 1 दबाएं, वरना 2 दबाएं.’

वोटर केयर सैंटर वालों की बात सुन कर मैं हैरान रह गया. बहरहाल, मैं ने सवाल पर फोकस किया. चूंकि नेताओं के चालचलन के बारे में बिहार से ब्रह्मांड तक सब को पता है, इसलिए समय की बरबादी से बचने के लिए मैं ने बटन नंबर 2 दबा दिया.

‘माफ करें, यह जनहित में जारी काल है और मजबूत वोटर होने के नाते आप लोकतंत्र के निर्माता हैं, इसलिए आप को नेता चयन संबंधित प्रक्रिया हर हाल में पूरी करनी है.

‘लोकलुभावन भाषण और आश्वासन देने वालों के लिए 1 दबाएं, शिलान्यास के बाद योजना पैंडिंग रख दुर्लभ दर्शन वालों के लिए 2 दबाएं, दबंग, आपराधिक चरित्र वालों के लिए 3 दबाएं, घोटालेबाज भ्रष्ट माननीय के लिए 4 दबाएं, वादा भूलने वाले दलबदलू के लिए 5 दबाएं, सर्वसुलभ कमीशनखोर खादीमानव के लिए 6 दबाएं और सच्चे जनसेवक के लिए 7 दबाएं या दोबारा सुनने के लिए स्टार दबाएं.’

पलभर विचार कर के मैं ने 7 का बटन दबा दिया.

‘आप ने चुना है 7 यानी सच्चा जनसेवक. इस की तसदीक के लिए हैश दबाएं वरना दोबारा सुनने के लिए स्टार दबाएं.’

मैं ने हैश बटन दबा दिया.

‘माफ कीजिए, अखिल भारतीय स्तर पर इस प्रजाति का लोप हो जाने के चलते फिलहाल आप के क्षेत्र में यह सेवक उपलब्ध नहीं है. दोबारा सुनने के लिए स्टार दबाएं, मेन मैन्यू में जाने के लिए 8 दबाएं.’

मैं ने स्टार दबा कर दोबारा सुना और इस बार 6 का बटन दबाया.

‘आप ने चुना है 6 यानी सर्वसुलभ कमीशनखोर खादीमानव. तसदीक के लिए हैश दबाएं.’

मैं ने हैश दबा दिया.

‘राहत योजना में लूटखसोट की भागीदारी हेतु बाढ़, महामारी, आपदा के दौरान जनता के बीच आसानी से उपलब्ध जनसेवक के लिए 1 दबाएं, मुआवजा दे कर मीडिया में छाए रहने वालों के लिए 2 दबाएं, सिर्फ चुनाव के समय दर्शन देने वालों के लिए 3 दबाएं और ज्यादा समय उपलब्ध रहने वाले मार्गदर्शक नेता के लिए 4 दबाएं.’

मैं ने बिना समय गंवाए 4 दबा कर हैश बटन से तसदीक भी कर दी. मंदिर निर्माता, गौरक्षक, सर्वसुलभ मार्गदर्शक नेता के लिए 1 दबाएं, सर्वव्यापी हिजाब और जिहाद समर्थक के लिए 2 दबाएं, गांवगांव उपलब्ध जातपांत खेलने वालों के लिए 3 दबाएं और खालिस धर्मनिरपेक्ष नेता के लिए 4 दबाएं.’

मैं ने 4 दबाया, साथ ही हैश बटन भी दबा दिया. ‘एक बार फिर से माफ करें, मार्केट में फिलहाल यह टाइप भी मुहैया नहीं है… फिर से सुनने के लिए स्टार दबाएं, मेन मैन्यू में जाने के लिए 8 दबाएं या अपने क्षेत्र के पढ़ेलिखे, कर्मठ, लगनशील, काबिल उम्मीदवार से संबंधित सभी तरह की छोटीबड़ी जानकारी हेतु हमारे वोटर केयर ऐक्जिक्यूटिव से बात करने के लिए 9 दबाएं.’

मैं ने कंप्यूटराइज्ड आवाज से उलझने के बजाय 9 दबा कर सीधेसीधे वोटर केयर ऐक्जिक्यूटिव से बात कर क्षेत्र के काबिल उम्मीदवार के बारे में जान लेना उचित समझ .

‘आप की काल हमारे लिए खास है. जल्दी ही आप की बात हमारे वोटर केयर ऐक्जिक्यूटिव से होने वाली है, कृपया लाइन पर बने रहें,’ की आवाज के साथ शास्त्रीय संगीत की रिंगटोन पर पूरे 15 मिनट तक लटकाए रखने के बाद दूसरी ओर से आवाज आई, ‘माफ कीजिए, आप ने गलत औप्शन चुना है…’ और आखिरकार दूसरी ओर से फोन डिस्कनैक्ट कर दिया गया. Comedy Story

Love Crime: मोहब्बत का खौफनाक अंत – प्रेमी ने गले लगाकर कर दी हत्या

Love Crime: शादीशुदा होने के बावजूद साथ काम करने वाली प्रभावती पर तेजभान का दिल आया तो कोशिश कर के उस ने उस से संबंध बना लिए. फिर इस संबंध का भी वैसा ही अंत हुआ, जैसा अकसर होता आया हैप्रभावती को गौर से देखते हुए प्लाईवुड फैक्ट्री के मैनेजर ने कहा, ‘‘इस उम्र में तुम नौकरी करोगी, अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है? मुझे लगता है तुम 15-16 साल की होओगी? यह उम्र तो खेलनेखाने की होती है.’’

‘‘साहब, आप मेरी उम्र पर मत जाइए. मुझे काम दे दीजिए. आप मुझे जो भी काम देंगे, मैं मेहनत से करूंगी. मेरे परिवार की हालत ठीक नहीं है. भाईबहनों की शादी हो गई है. बहनें ससुराल चली गई हैं तो भाई अपनीअपनी पत्नियों को ले कर अलग हो गए हैं. मांबाप की देखभाल करने वाला कोई नहीं है. पिता बीमार रहते हैं. इसलिए मैं नौकरी कर के उन की देखभाल करना चाहती हूं.’’ प्रभावती ने कहा. रायबरेली की मिल एरिया में आसपास के गांवों से तमाम लोग काम करने आते थे. प्लाईवुड फैक्ट्री में भी आसपास के गांवों के तमाम लोग नौकरी करते थे. लेकिन उतनी छोटी लड़की कभी उस फैक्ट्री में नौकरी मांगने नहीं आई थी.

प्रभावती ने मैनेजर से जिस तरह अपनी बात कही थी, उस ने सोच लिया कि इस लड़की को वह अपने यहां नौकरी जरूर देगा. उस ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम कल समय पर जाना. और हां, मेहनत से काम करना. मैं तुम्हें दूसरों से ज्यादा वेतन दूंगा.’’ ‘‘ठीक है साहब, आप की बहुतबहुत मेहरबानी, जो आप ने मेरी मजबूरी समझ कर अपने यहां नौकरी दे दी. मैं कभी कोई ऐसा काम नहीं करूंगी, जिस से आप को कुछ कहने का मौका मिले.’’ कह कर प्रभावती चली गई. अगले दिन से प्रभावती काम पर जाने लगी. उस के काम को देख कर मैनेजर ने उस का वेतन 3 हजार रुपए तय किया. 15 साल की उम्र में ही मातापिता की जिम्मेदारी उठाने के लिए प्रभावती ने यह नौकरी कर ली थी.

उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली के शहर से कस्बातहसील लालगंज को जाने वाली मुख्य सड़क पर शहर से 10 किलोमीटर की दूरी पर बसा है कस्बा दरीबा. कभी यह गांव हुआ करता था. लेकिन रायबरेली से कानपुर जाने के लिए सड़क बनी तो इस गांव ने खूब तरक्की की. लोगों को तरहतरह के रोजगार मिल गए. सड़क के किनारे तमाम दुकानें खुल गईं. लेकिन जो परिवार सड़क के किनारे नहीं पाए, उन की हालत में खास सुधार नहीं हुआ. ऐसा ही एक परिवार महादेव का भी था. उस के परिवार में पत्नी रामदेई के अलावा 2 बेटे फूलचंद, रामसेवक तथा 4 बेटियां, कुसुम, लक्ष्मी, सविता और प्रभावती थीं. प्रभावती सब से छोटी थी. छोटी होने की वजह से परिवार में वह सब की लाडली थी. महादेव की 3 बेटियों की शादी हो गई तो वे ससुराल चली गईं. बेटे भी शादी के बाद अलग हो गए

अंत में महादेव और रामदेई के साथ रह गई उन की छोटी बेटी प्रभावती. भाइयों ने मांबाप के साथ जो किया था, उस से वह काफी दुखी और परेशान रहती थी. यही वजह थी कि उस ने उतनी कम उम्र में ही नौकरी कर ली थी. प्रभावती को जब काम के बदले फैक्ट्री से पहला वेतन मिला तो उस ने पूरा का पूरा ला कर पिता के हाथों पर रख दिया. बेटी के इस कार्य से महादेव इतना खुश हुआ कि उस की आंखों में आंसू भर आए. उस ने कहा, ‘‘मेरी सभी औलादों में तुम्हीं सब से समझदार हो. जहां बुढ़ापे में मेरे बेटे मुझे छोड़ कर चले गए, वहीं बेटी हो कर तुम मेरा सहारा बन गईं. तुम जुगजुग जियो, सभी को तुम्हारी जैसी औलाद मिले.’’

‘‘बापू, आप केवल अपनी तबीयत की चिंता कीजिए, बाकी मैं सब संभाल लूंगी. मुझे बढि़या नौकरी मिल गई है, इसलिए अब आप को चिंता करने की जरूरत नहीं है.’’ प्रभावती ने कहा. बदलते समय में आज लड़कियां लड़कों से ज्यादा समझदार हो गई हैं. यही वजह है, वे बेटों से ज्यादा मांबाप की फिक्र करती हैं. प्रभावती के इस काम से महादेव और उन की पत्नी रामदेई ही खुश नहीं थे, बल्कि गांव के अन्य लोग भी उस की तारीफ करते नहीं थकते थे. उस की मिसालें दी जाने लगी थींसमय बीतता रहा और प्रभावती अपनी जिम्मेदारी निभाती रही. प्रभावती जिस फैक्ट्री में नौकरी करती थी, उसी में बंगाल का रहने वाला एक कारीगर था मनोज बंगाली. वह प्रभावती की हर तरह से मदद करता था, इसलिए प्रभावती उस से काफी प्रभावित थी.

मनोज उस से उम्र में थोड़ा बड़ा जरूर था, लेकिन धरीरेधीरे प्रभावती उस के नजदीक आने लगी थी. जब यह बात फैक्ट्री में फैली तो एक दिन प्रभावती ने कहा, ‘‘मनोज, हमारे संबंधों को ले कर लोग तरहतरह की बातें करने लगे हैं. यह मुझे अच्छा नहीं लगता.’’

 ‘‘लोग क्या कहते हैं, इस की परवाह करने की जरूरत नहीं है. तुम मुझे प्यार करती हो और मैं तुम्हें प्यार करता हूं. बस यही जानने की जरूरत है.’’ इतना कह कर मनोज ने प्रभावती को सीने से लगा लिया.

 ‘‘मनोज, तुम मेरी बातों को गंभीरता से नहीं लेते. जब भी कुछ कहती हूं, इधरउधर की बातें कर के मेरी बातों को हवा में उड़ा देते हो. अगर तुम ने जल्दी कोई फैसला नहीं लिया तो मैं तुम से मिलनाजुलना बंद कर दूंगी.’’ प्रभावती ने धमकी दी तो मनोज ने कहा, ‘‘अच्छा, तुम चाहती क्या हो?’’

 ‘‘हम दोनों को ले कर फैक्ट्री में चर्चा हो रही है तो एक दिन बात हमारे गांव और फिर घर तक पहुंच जाएगी. जब इस बात की जानकारी मेरे मातापिता को होगी तो वे किसी को क्या जवाब देंगे. मैं उन की बहुत इज्जत करती हूं, इसलिए मैं ऐसा कोई काम नहीं करना चाहती, जिस से उन के मानसम्मान को ठेस लगे. उन्हें पता चलने से पहले हमें शादी कर लेनी चाहिए. उस के बाद हम चल कर उन्हें सारी बात बता देंगे.’’ प्रभावती ने कहा.

‘‘शादी करना आसान तो नहीं है, फिर भी मैं वह सब करने को तैयार हूं, जो तुम चाहती हो. बताओ मुझे क्या करना है?’’ मनोज ने पूछा.

 ‘‘मैं तुम से शादी करना चाहती हूं. मेरे मातापिता मुझे बहुत प्यार करते हैं. वह मेरी किसी भी बात का बुरा नहीं मानेंगे. मैं चाहती हूं कि हम किसी दिन शहर के मंशा देवी मंदिर में चल कर शादी कर लें. इस के बाद मैं अपने घर वालों को बता दूंगी. फिर मैं तुम्हारी हो जाऊंगी, केवल तुम्हारी.’’ प्रभावती ने कहा. प्रभावती की ये बातें सुन कर मनोज की खुशियां दोगुनी हो गईं. उस ने जब से प्रभावती को देखा था, तभी से उसे पाने के सपने देखने लगा था. लेकिन प्रभावती उस के लिए शराब के उस प्याले की तरह थी, जो केवल दिखाई तो देता था, लेकिन उस पर वह होंठ नहीं लगा पा रहा था. प्रभावती जो अभी कली थी, वह उसे फूल बनाने को बेचैन था.

रायबरेली का मंशा देवी मंदिर रेलवे स्टेशन के पास ही है. करीब 5 साल पहले सितंबर महीने के पहले रविवार को प्रभावती मनोज के साथ वहां गई. दोनों ने मंदिर में मंशा देवी के सामने एकदूसरे को पतिपत्नी मानते हुए जिंदगी भर साथ निभाने का वादा किया. इस के बाद एकदूसरे के गले में फूलों की जयमाल डाल कर दांपत्य बंधन में बंध गए

मंदिर में शादी कर के मनोज प्रभावती को अपने कमरे पर ले गया. मनोज को इसी दिन का बेताबी से इंतजार था. वह प्रभावती के यौवन का सुख पाना चाहता था. अब इस में कोई रुकावट नहीं रह गई थी, क्योंकि प्रभावती ने उसे अपना जीवनसाथी मान लिया था. इसलिए अब उस की हर चीज पर उस का पूरा अधिकार हो गया था. मनोज को प्रभावती किसी परी की तरह लग रही थी. छरहरी काया में उस की बोलती आंखें, मासूम चेहरा किसी को भी बहकने पर मजबूर कर सकता था. प्रभावती में वह सब कुछ था, जो मनोज को दीवाना बना रहा था. मनोज के लिए अब इंतजार करना मुश्किल हो रहा था.

वह प्रभावती को ले कर सुहागरात मनाने के लिए कमरे में पहुंचा. प्रभावती को भी अब उस से कोई शिकायत नहीं थी. मन तो वह पहले ही सौंप चुकी थी, उस दिन तन भी सौंप दिया. इस तरह प्रभावती की विवाहित जीवन की कल्पना साकार हो गई थी. यह बात प्रभावती ने अपने मातापिता को बताई तो उन्होंने बुरा नहीं माना. कुछ दिनों तक रायबरेली में साथ रहने के बाद वह मनोज के साथ उस के घर बंगाल चली गई. मनोज बंगाल के हुगली शहर के रेल बाजार का रहने वाला था. लेकिन मनोज अपने घर जा कर कोलकाता की एक फैक्ट्री में नौकरी करने लगा और वहीं मकान ले कर प्रभावती के साथ रहने लगा. साल भर बाद प्रभावती ने वहीं एक बेटे को जन्म दिया. मनोज नौकरी करता था तो प्रभावती घर और बेटे को संभाल रही थी. दोनों मिलजुल कर आराम से रह रहे थे.

मनोज बेटे और प्रभावती के साथ खुश था. लेकिन वह प्रभावती को अपने घर नहीं ले जा रहा था. प्रभावती कभी ले चलने को कहती तो वह कोई कोई बहाना कर के टाल जाता. कोलकाता में रहते हुए काफी समय हो गया तो प्रभावती को मांबाप की याद आने लगी. एक दिन उस ने मनोज से रायबरेली चलने को कहा तो मनोज ने कहा, ‘‘यहां हमें रायबरेली से ज्यादा वेतन मिल रहा है, इसलिए अब मैं वहां नहीं जाना चाहता. अगर तुम चाहो तो जा कर अपने घर वालों से मिल आओ. वहां से आने के बाद मैं तुम्हें अपने घर ले चलूंगा.’’

मातापिता से मिलने के लिए प्रभावती रायबरेली गई. कुछ दिनों बाद वह मनोज के पास कोलकाता पहुंची तो पता चला कि मनोज तो पहले से ही शादीशुदा है. क्योंकि प्रभावती के रायबरेली जाते ही मनोज अपनी पत्नी सीमा को ले आया था. उस की पत्नी ने उसे घर में घुसने नहीं दिया. उसे धमकाते हुए सीमा ने कहा, ‘‘तुम जैसी औरतें मर्दों को फंसाने में माहिर होती हैं. जवानी के लटकेझटके दिखा कर पैसों के लिए किसी भी मर्द को फांस लेती हैं. अब यहां कभी दिखाई मत देना. अगर यहां फिर आई तो ठीक नहीं होगा.’’ सीमा की बातें सुन कर प्रभावती के पास वापस आने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं बचा था. उसे जलालत पसंद नहीं थी.

वह एक बार मनोज से मिल कर रिश्ते की सच्चाई के बारे में जानना चाहती थी. लेकिन लाख कोशिश के बाद भी तो मनोज उस के सामने आया और उस ने फोन पर बात की. उस से मिलने के चक्कर में प्रभावती कुछ दिन वहां रुकी रही. लेकिन जब वह उस से मिलने को तैयार नहीं हुआ तो वह परेशान हो कर रायबरेली वापस चली आई. जिस मनोज को उस ने पति मान कर अपना सब कुछ सौंप दिया था, वह बेवफा निकल गया था. प्रभावती का दिल टूट चुका था. वापस आने पर उस की परेशानियां और भी बढ़ गईं. अब मातापिता की जिम्मेदारी के साथसाथ बेटे की भी जिम्मेदारी थी. गुजरबसर के लिए प्रभावती फिर से काम करने लगी. बदनामी के डर से वह प्लाईवुड फैक्ट्री में नहीं गई. थोड़ी दौड़धूप करने पर उसे रायबरेली शहर में दूसरा काम मिल गया था.

जीवन फिर से पटरी पर आने लगा था. शादी के बाद प्रभावती की सुंदरता में पहले से ज्यादा निखार गया था. दूसरी जगह काम करते हुए उस की मुलाकात तेजभान से हुई. तेजभान उसी की जाति का था. प्रभावती रोजाना अपने काम पर साइकिल से रायबरेली आतीजाती थी. कभी कोई परेशानी होती या देर हो जाती तो तेजभान उसे अपनी मोटरसाइकिल से उस के घर पहुंचा देता था. लगातार मिलनेजुलने से दोनों के बीच नजदीकी बढ़ने लगी. तेजभान के साथ प्रभावती को खुश देख कर उस के मांबाप भी खुश थे. तेजभान रायबरेली के ही डीह गांव का रहने वाला था.

एक दिन प्रभावती को कुछ ज्यादा देर हो गई तो तेजभान ने उस से अपने कमरे पर ही रुक जाने को कहा. थोड़ी नानुकुर के बाद प्रभावती तेजभान के कमरे पर रुक गई. मनोज से संबंध टूटने के बाद शारीरिक सुख से वंचित प्रभावती एकांत में तेजभान का साथ पाते ही पिघलने लगी. उस की शारीरिक सुख की कामना जाग उठी थी. तेजभान तो उस से भी ज्यादा बेचैन था. उम्र में बड़ा होने के बावजूद तेजभान का जिस्म मजबूत और गठा हुआ था. उस की कदकाठी मनोज से काफी मिलतीजुलती थी. वह मनोज जैसा सुंदर तो नहीं दिखता था, लेकिन बातें उसी की तरह प्यारभरी करता था. प्रभावती की सोई कामना को उस ने अंगुलियों से जगाना शुरू किया तो वह उस के करीब गई. इस के बाद दोनों के बीच वह सब हो गया जो पतिपत्नी के बीच होता है.

तेजभान और प्रभावती के बीच रिश्ते काफी प्रगाढ़ हो गए थे. वह प्रभावती के घर तो पहले से ही आताजाता था, लेकिन अब उस के घर रात में रुकने भी लगा था. प्रभावती के मातापिता से भी वह बहुत ही प्यार और सलीके से पेश आता था. इस के चलते वे भी उस पर भरोसा करने लगे थे. तेजभान के पास जो मोटरसाइकिल थी, वह पुरानी हो चुकी थी. वह उसे बेच कर नई मोटरसाइकिल खरीदना चाहता था. लेकिन इस के लिए उस के पास पैसे नहीं थे. अपने मन की बात उस ने प्रभावती से कही तो उस ने उसे 10 हजार रुपए दे कर नई मोटरसाइकिल खरीदवा दी. तेजभान का प्यार और साथ पा कर वह मनोज को भूलने लगी थी. तेजभान में सब तो ठीक था, लेकिन वह थोड़ा शंकालु स्वभाव का था.

वह प्रभावती को कभी किसी हमउम्र से बातें करते देख लेता तो उसे बहुत बुरा लगता. वह नहीं चाहता था कि प्रभावती किसी दूसरे से बात करे. इसलिए वह हमेशा उसे टोकता रहता था. प्रभावती को ही नहीं, उस के घर वालों को भी पता चल गया था कि तेजभान शादीशुदा है. एक शादीशुदा आदमी के साथ जिंदगी नहीं पार हो सकती थी, इसलिए प्रभावती की बड़ी बहन सविता ने अपनी ससुराल लोहारपुर में उस के लिए एक लड़का देखा. वह उस के साथ प्रभावती की शादी कराना चाहती थी. लड़के को देखने और बातचीत करने के लिए उस ने प्रभावती को अपनी ससुराल बुला लिया

जब इस बात की जानकारी तेजभान को हुई तो वह भी लोहारपुर पहुंच गया. जब उस ने देखा कि वहां एक लड़के के साथ प्रभावती बात कर रही है तो उसे गुस्सा गया. उस ने प्रभावती का हाथ पकड़ कर उस लड़के को 2-4 थप्पड़ लगाते हुए कहा, ‘‘तूने अपनी शकल देखी है जो इस से शादी करेगा.’’ प्रभावती के घर वाले उस की शादी जल्द से जल्द करना चाहते थे. लेकिन तेजभान टांग अड़ा रहा था. वह उस से खुद तो शादी कर नहीं सकता था लेकिन वह उस की शादी किसी ऐसे आदमी से कराना चाहता था, जो शादी के बाद भी उसे प्रभावती से मिलने से रोके. क्योंकि वह प्रभावती को खुद से दूर नहीं जाने देना चाहता था. इसीलिए तेजभान ने अपने एक रिश्तेदार प्रदीप को तैयार किया.

वह रिश्ते में उस का मामा लगता था. तेजभान को पूरा विश्वास था कि प्रदीप से शादी होने के बाद भी उसे प्रभावती से मिलनेजुलने में कोई परेशानी नहीं होगी. प्रदीप उम्र में तेजभान से काफी बड़ा था. प्रभावती का भरोसा जीतने के लिए उस ने उस की एक जीवनबीमा पौलिसी भी करा दी थी. प्रदीप से बात कर के तेजभान ने प्रभावती से कहा, ‘‘अगर तुम कहो तो मैं तुम्हारी शादी प्रदीप से करा दूं. वह अच्छा आदमी है. खातेपीते घर का भी है.’’ प्रभावती ने तेजभान की इस बात का कोई जवाब नहीं दिया. 2 दिनों बाद तेजभान प्रदीप को साथ ले कर प्रभावती से मिला. तीनों ने साथ खायापिया. प्रदीप चला गया तो तेजभान ने कहा, ‘‘प्रभावती, प्रदीप तुम्हें कैसा लगा? मैं इसी से तुम्हारी कराना चाहता हूं.’’

एक तो प्रदीप शक्लसूरत से ठीक नहीं था, दूसरे उस की उम्र उस से दोगुनी थी. वह शराब भी पीता था, इसलिए प्रभावती ने कहा, ‘‘इस बूढ़े के साथ तुम मेरी शादी कराना चाहते हो?’’

‘‘यह बहुत अच्छा आदमी है. उस से शादी के बाद भी हमें मिलने में कोई परेशानी नहीं होगी. दूसरी जगह शादी करोगी तो हमारा मिलनाजुलना नहीं हो पाएगा.’’

‘‘उस दिन मारपीट कर के तुम ने मेरी शादी तुड़वा दी थी. मैं उस बूढ़े से हरगिज शादी नहीं कर सकती. अब मैं तुम्हीं से शादी करूंगी. तुम्हें ही मुझे अपने घर में रखना पड़ेगा.’’ प्रभावती ने गुस्से में कहा.

प्रभावती अब तेजभान के लिए मुसीबत बन गई. वह उस से पीछा छुड़ाने की कोशिश करने लगा. तब प्रभावती उस से अपने वे पैसे मांगने लगी, जो उस ने उसे मोटरसाइकिल खरीदने के लिए दिए थे. दोनों के बीच टकराव होने लगा. तेजभान के साथ शादी कर के घर बसाने का प्रभावती का सपना तेजभान के लिए गले की हड्डी बन गयाप्रभावती ने कह भी दिया कि जब तक वह शादी नहीं कर लेता, तब तक वह उसे अपने पास फटकने नहीं देगी. वह प्रभावती से शादी तो करना चाहता था, लेकिन उस की मजबूरी यह थी कि वह पहले से ही शादीशुदा था. उस की पत्नी को प्रभावती और उस के संबंधों के बारे में पता भी चल चुका था.

तेजभान को प्रभावती से पीछा छुड़ाने की कोई राह नहीं सूझी तो उस ने उसे रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया. इस के बाद 7 दिसंबर, 2013 की शाम प्रभावती को समझाबुझा कर वह पूरे मौकी मजरा जगदीशपुर चलने के लिए राजी कर लिया. प्रभावती तैयार हो गई तो वह उसे मोटरसाइकिल पर बैठा कर चल पड़ा. परशदेपुर गांव के पास वह नइया नाला पर रुक गया. मोटरसाइकिल सड़क पर खड़ी कर के वह बहाने से प्रभावती को सड़क के नीचे पतावर के जंगल में ले गया. सुनसान जगह पर प्यार करने के बहाने उस ने प्रभावती को बांहों में समेटा और फिर उस का गला घोंट कर मार दिया.

प्रभावती को मार कर उस की लाश उस ने नाले के किनारे पतावर में इस तरह छिपा दिया कि वह सड़गल जाए. इस के बाद उस का मोबाइल फोन और अन्य सामान ले कर वह अपने गांव डीह चला गया. प्रभावती अपने घर नहीं पहुंची तो घर वालों को चिंता हुई. उन्होंने तेजभान को फोन किया तो उस ने कहा कि वह प्रभावती से कई दिनों से नहीं मिला है. उसी दिन प्रभावती के घर जा कर उस ने उस के घर वालों को प्रभावती के बारे में पता करने का आश्वासन दिया. प्रभावती के घर वालों ने पुलिस को सूचना देने की बात कही तो ऐसा करने से उस ने उन्हें रोक दिया. उस का सोचना था कि कुछ दिन बीत जाने पर प्रभावती की लाश सड़गल जाएगी तो वैसे ही उस का पता नहीं चलेगा.

प्रभावती की तलाश करने के बहाने वह रोज उस के घर जाता रहा. 4-5 दिनों बाद जब उसे लगा कि अब प्रभावती की लाश नहीं मिलेगी तो वह अपने काम पर जाने लगा. उस ने अपने साथियों से भी कह दिया था कि अगर उन से कोई प्रभावती के बारे में पूछे तो वे कह देंगे कि उन्होंने 10-15 दिनों से उसे नहीं देखा है. 11 दिसंबर, 2013 की सुबह चौकीदार छिटई को गांव वालों से पता चला कि नइया नाला के पास पतावर के बीच एक लड़की की लाश पड़ी है, जिस की उम्र 23-24 साल होगी. चौकीदार ने यह सूचना थाना डीह पुलिस को दी. उस दिन थानाप्रभारी बी.के. यादव छुट्टी पर थे. इसलिए सबइंसपेक्टर आर.के. कटियार सिपाहियों के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचे. शव की पहचान नहीं हो पाई

घटना की सूचना पा कर पुलिस अधीक्षक राजेश कुमार पांडेय और क्षेत्राधिकारी महमूद आलम सिद्दीकी भी पहुंच गए थे. उस समय जोरदार ठंड पड़ रही थी. चारों ओर घना कोहरा छाया था. निरीक्षण के दौरान देखा गया कि लड़की के हाथ परआई लव यूलिखा है. पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. पुलिस अधीक्षक राजेश कुमार पांडेय ने थाना डीह पुलिस को हत्यारे को जल्द से जल्द पकड़ने का आदेश दिया था. वह इस की रोज रिपोर्ट भी लेने लगे थे. पुलिस ने लड़की के कपड़े और उस के पास से मिले सामान को थाने में रख लिया था. 13 दिसंबर को जब इस घटना के बारे में अखबारों में छपा तो खबर पढ़ कर प्रभावती के घर वाले थाना डीह पहुंचे. उन्हें पूरा विश्वास था कि वह 6 दिनों पहले गायब हुई प्रभावती की ही लाश होगी.

थाने कर प्रभावती के भाई फूलचंद और पिता महादेव ने लाश से मिला सामान देखा तो उन्होंने बताया कि वह सारा सामान प्रभावती का है. अब तक थानाप्रभारी बी.के. यादव वापस चुके थे. शव की शिनाख्त होते ही उन्होंने जांच आगे बढ़ा दी. प्रभावती के घर वालों से पूछताछ के बाद पुलिस की नजरें तेजभान पर टिक गईं. प्रभावती के गायब होने के कुछ दिनों बाद तक तो वह प्रभावती के घर जाता रहा था, लेकिन 2 दिनों से वह नहीं गया था. 15 दिसंबर को 2 बजे के आसपास तेजभान डीह के रेलवे मोड़ पर मिल गया तो थानाप्रभारी बी.के. यादव ने उसे पकड़ लिया.

शुरूशुरू में तो तेजभान प्रभावती के संबंध में कोई भी जानकारी देने से मना करता रहा, लेकिन जब पुलिस ने उस के और प्रभावती के संबंधों के बारे में बताना शुरू किया तो मजबूर हो कर उसे सारी सच्चाई उगलनी पड़ी. प्रभावती की हत्या का अपना अपराध स्वीकार करते हुए उस ने कहा, ‘‘साहब, वह बहुत मतलबी और चालू औरत थी. मेरे अलावा भी उस के कई लोगों से संबंध थे. मैं ने उसे मना किया तो वह मुझ से शादी के लिए कहने लगी. उस ने मुझे जो पैसे दिए थे, उस से मैं ने उस का बीमा करा दिया था. फिर भी वह मुझ से अपने पैसे मांग रही थी. परेशान हो कर मैं ने उसे मार दिया.’’

पुलिस ने तेजभान के पास रखा प्रभावती का सामान भी बरामद कर लिया था. इस के तेजभान के खिलाफ प्रभावती की हत्या का मुकदमा दर्ज कर उसे अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में ही था.

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, Love Crime

Bhojpuri Update: भोजपुरी पावर स्टार पवन सिंह के घर हुई 15 लाख की चोरी

Bhojpuri Update: भोजपुरी सिनेमा जगत के जाने माने एक्टर, गायक और पावर स्टार कहे जाने वाले एक्टर पवन सिंह के घर लाखों की चोरी होने का मामला सामने आया है. यह चोरी बीते सोमवार देर रात पवन सिंह के मारुति नगर स्थित मकान में हुई जहां उसकी पहली पत्नी के मांबाप रहते हैं. हालांकि पवन सिंह के बड़े भाई राणू सिंह ने इस घटना के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी है.

आपको बता दें, पावर स्टार पवन सिंह के आरा शहर में पकड़ी और मारूति नगर दो मोहल्लों में मकान है और यह चोरी मारुति नगर स्थित मकान में हुई. चोर सोमवार देर रात खिड़की काटकर घर में दाखिल हुए और अलमारी तोड़कर 15 लाख के सोने चांदी के जेवरात, 15 हजार रुपए नकद और एक लाइसेंसी राइफल की 30 गोलियां चुरा ले गए.

पवन सिंह की पहली पत्नी के माता पिता उनके बड़े भाई राणू सिंह के भी सास ससुर है और इस घटना की जानकारी देते हुए राणू सिंह ने बताया कि वे अपने परिवार के साथ हरिद्वार गए थे और अपनी राइफल और कुछ गोलियां सास ससुर के पास रखे थे. उनका कहना है कि अच्छा हुआ चोर ने राइफल ना चुरा कर 30 कारतूस चुराए हैं.

राणू सिंह ने बताया कि इस घटना की सूचना पवन सिंह को दे दी गई है और उन्होंने इस मामले में एसपी से भी बातचीत की है. जिस मकान में चोरी हुई, उसमें पवन सिंह की पहली पत्नी स्वर्गीय नीलम सिंह की मां कलावती देवी और उनके पति सुनील कुमार सिंह रहते हैं. घटना के वक्त दोनों दूसरे कमरे में सो रहे थे, तभी चोरों ने वारदात को अंजाम दिया. Bhojpuri Update

Hindi Kahani: पाई को सलाम – एक सच्चे दोस्त की कहानी

Hindi Kahani: सऊदी अरब के एक अस्पताल में काम करते हुए मुझे अलगअलग देशों के लोगों के साथ काम करने का मौका मिला. मेरे महकमे में कुल 27 मुलाजिम थे, जिन में 13 सऊदी, 5 भारतीय, 6 फिलीपीनी और 3 पाकिस्तानी थे.

यों तो सभी आपस में अंगरेजी में ही बातें किया करते थे, लेकिन हम भारतीयों की इन तीनों पाकिस्तानियों से खूब जमती थी. एक तो भाषा भी तकरीबन एकजैसी थी और हम लोगों का खानापीना भी एकजैसा ही था.

हमारे महकमे का सब से नापसंद मुलाजिम एक पाकिस्तानी कामरान था, जिसे सभी ‘पाई’ के नाम से बुलाते थे.

क्या सऊदी, क्या फिलीपीनी, यहां तक कि बाकी दोनों पाकिस्तानी भी उस को पसंद नहीं करते थे.

वैसे तो ‘पाई’ हमारे साथ ही रहता और खातापीता था, लेकिन कोई भी उस की हरकतें पसंद नहीं करता था. काम में तो वह अच्छा था, लेकिन जानबूझ कर सब से आसान काम चुनता और मुश्किल काम को कम ही हाथ लगता.

अब मैडिकल ट्रांसक्रिप्शन है ही ऐसा काम, जिस में मुश्किल फाइल करना कोई भी पसंद नहीं करता, लेकिन चूंकि काम तो खत्म करना ही होता है, तो सभी लोग मिलबांट कर मुश्किल काम कर लेते. लेकिन मजाल है, जो ‘पाई’ किसी मुश्किल फाइल को हाथ में ले ले.

‘पाई’ कुरसी पर बैठ कर आसान फाइल का इंतजार करता रहता और जैसे ही कोई आसान फाइल आती, झट से उस को अपने नाम कर लेता. उस की इसी हरकत की वजह से सभी उस से चिढ़ने लगे थे.

भारतीय पवन हो या फिलीपीनी गुलिवर या फिर सऊदी लड़की सैनब, सभी उस की इस बात पर उस से नाराज रहते.

इस के अलावा ‘पाई’ एक नंबर का कंजूस था. कभीकभार सभी लोग मिल कर किसी साथी मुलाजिम को कोई पार्टी देते, तो ‘पाई’ एक पैसा भी न देता.

वह बोलता, ‘‘मैं यहां क्या इन लोगों के लिए कमाने आया हूं?’’

पार्टी के लिए एक पैसा भले ही न देता हो, पार्टी में खानेपीने में सब से आगे रहता. ‘पाई’ खुद भी जानता था कि कोई उस को पसंद नहीं करता, लेकिन इस से उस को कोई फर्क नहीं पड़ता था.

शुक्रवार को सऊदी अरब में छुट्टी रहती है. मैं भी उस दिन अपने घर में ही था कि पवन का फोन आया.

फोन पर उस के रोने की आवाज सुन कर मैं परेशान हो गया. उस की सिसकियां कुछ कम हुईं, तो उस ने बताया कि उस का 10 साल का बेटा घर से गायब है. पता नहीं, किसी ने उस को किडनैप कर लिया है या वह खुद ही कहीं चला गया है, किसी को भी नहीं पता था.

मैं तुरंत पवन के कमरे में पहुंचा. जल्दी ही सरफराज, गुलिवर और नावेद भी वहां पहुंच गए. सभी पवन को तसल्ली दे रहे थे.

तभी पवन के घर से फोन आया. किसी ने उस के घर खबर दी कि उस का बेटा कोचीन जाने वाली बस में देखा गया है. सभी की राय थी कि पवन को तुरंत भारत जाना चाहिए.

मैनेजर सुसान से बात की गई. उन्होंने तुरंत पवन के जाने के लिए वीजा का इंतजाम किया. सरफराज अपनी गाड़ी में पवन और मुझे ले कर हैड औफिस गए और वीजा ले आए.

अब बड़ा सवाल था भारत जाने के लिए टिकट का इंतजाम करना. महीने का आखिरी हफ्ता चल रहा था और हम सभी अपनीअपनी तनख्वाह अपनेअपने देश को भेज चुके थे. सभी के पास थोड़ेबहुत पैसे बचे हुए थे, जो कि टिकट की आधी रकम भी नहीं होती.

मैं और सरफराज अपनेअपने जानने वालों को फोन कर रहे थे कि तभी वहां ‘पाई’ आ गया. हम में से किसी ने भी उस को पवन के बारे में नहीं बताया था. एक तो शायद इसलिए कि ‘पाई’ और पवन की कुछ खास बनती नहीं थी, दूसरे, इसलिए भी कि उस से हमें किसी मदद की उम्मीद भी नहीं थी.

‘पाई’ पवन से उस के बेटे के बारे में पूछताछ कर रहा था. बातोंबातों में उस को पता चला कि भारत जाने के लिए टिकट के पैसे कम पड़ रहे हैं. हम लोग अपनेअपने फोन पर मसरूफ थे और पता ही नहीं चला कि कब ‘पाई’ उठ कर वहां से चला गया.

‘‘उस को लगा होगा कि उस से कोई पैसे न मांग ले,’’ फिलीपीनी गुलिवर ने अपने विचार रखे.

तकरीबन 10 मिनट बाद ‘पाई’ आया और पवन के हाथ में 5 हजार रियाल रख दिए और कहने लगा, ‘‘जाओ, जल्दी से टिकट ले लो, ताकि आज की ही फ्लाइट मिल जाए. अगर और पैसों की जरूरत हो, तो बेझिझक बता देना. मैं अपने पैसे इकट्ठा 2-3 महीने में ही भेजता हूं, इसलिए अभी मेरे पास और भी पैसे हैं.’’

यह सुन कर पवन भावुक हो गया और ‘पाई’ को गले लगा लिया, ‘‘शुक्रिया ‘पाई’, मुसीबत के समय में मेरी मदद कर के तुम ने मुझे जिंदगीभर का कर्जदार बना लिया है.’’

‘‘कर्ज कैसा, हम सब एक परिवार ही तो हैं. मुसीबत के समय अगर हम एकदूसरे की मदद नहीं करेंगे, तो कौन करेगा?’’

‘पाई’ का यह रूप देख कर मेरे मन में उस के प्रति जितनी भी बुरी भावनाएं थीं, तुरंत दूर हो गईं.

किसी ने सच ही कहा है कि दोस्त की पहचान मुसीबत के समय में ही होती है. और मुसीबत की इस घड़ी में पवन की मदद कर के ‘पाई’ ने अपने सच्चे दोस्त होने का सुबूत दे दिया.

‘पाई’ के इस अच्छे काम से मेरा मन उस के लिए श्रद्धा से भर गया. Hindi Kahani

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