Yeh Rishta Kya Kehlata Hai : गायु ने नायरा को कहा,  ‘ड्रामेबाज’

स्टार प्लस (Star Plus) का पौपुलर शो ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है'(Yeh Rishta Kya Kehlata Hai) में हाई वोल्टेज ड्रामा चल रहा है. जिससे इस शो के फैंस खूब एंटरटेन कर रहे हैं. तो आइए जानते हैं इस शो के लेटेस्ट एपिसोड के बारे में.

शो ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’  के बीते एपिसोड में आपने देखा कि वंश के एक्सीडेंट की वजह से गायु बदली बदली सी नजर आ रही है. वह नायरा (Shivangi Joshi) को खरी खोटी सुनाने में लगी हुई है. और कैरव भी गायु की नजरों में चढ़ा हुआ है.

 

कैरव भी अपनी सफाई देने में लगा हुआ है कि उसने वंश को धक्का नहीं मारा. इस शो के करेंट एपिसोड में यह दिखाया जा रहा है कि नायरा, गायु को समझाने की कोशिश करती है. तो वहीं गायु, नायरा की बातें सुनकर अपना आपा खो बैठी.

और ऐसे में गायु का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उसने घरवालों के सामने अपने मन की भड़ास निकाली. उसने गुस्से में नायरा-कार्तिक के साथ-साथ दादी और मनीष को भी जमकर लताड़ लगाई. गायु ने दादी को ये तक कह दिया कि रामलीला में उन्होंने जानबूझकर कैरव को एक्टिंग का अवार्ड दिया था. उसने यह भी कहा कि दादी ने सबकुछ कुछ नायरा और कार्तिक के नाम ही कर दिया है.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Mohsin Khan (@khan_mohsinkhan)

गायु का ये बर्ताव देखकर घर में हर कोई शौक्ड हो गया. तभी नायरा वहां आकर गायु को रोकने की कोशिश करती है तो उसने नायरा को ड्रामेबाज भी कह दिया. गायु ने आगे कहा कि जब तक कैरव नहीं था, तब वंश ही कार्तिक के लिए सब कुछ था.

तो ऐसे में गायु की बाते सुनकर कार्तिक बौखला गया. कार्तिक ने चिल्लाते हुए कहा कि गायु को अगर इतनी ही दिक्कत है तो वो इस घर में नहीं रहेगा.

इस शो के अपकमिंग एपिसोड में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या गायु की वजह से कार्तिक घर छोड़ देगा या नायरा, कार्तिक को शांत करवाने में कामयाब हो जाएगी.

Bigg Boss 14: अली गोनी के खिलाफ लीगल एक्शन लेंगे कविता कौशिक के पति!

बिग बौस 14 (Bigg Boss 14) में सभी कंटेस्टेंट कविता कौशिक (Kavita Kaushik) को टारगेट कर रहे हैं. घर में जब भी कविता कुछ भी कहते हुए नजर आती हैं तो घर के हर सदस्य कविता पर निशाना साधने लगते हैं.

हर छोटी सी बात पर बिग बौस हाउस (Bigg Boss House)  में कविता को टारगेट किया जाता है. और आए दिन हर सदस्य से उनकी लड़ाई होने लगती है.

बिग बौस 14 के बीते एपिसोड में दिखाया गया कि अली गोनी (Aly Goni)  और कविता कौशिक के बीच घमासान लड़ाई हुई. इस लड़ाई के दौरान कविता कौशिक ने अली गोनी से कह दिया था कि गुस्से के मामले में वह उनकी बाप है.

ये भी पढ़ें- अर्जेंटीना के लिजेंड फुटबौलर डिएगो मैराडोना का 60 साल की उम्र में हुआ निधन

जिसके बाद अली ने कविता पर गंभीर आरोप लगाए और कहा कि वह मेरे माता पिता की बेइज्जती कर रही है. इस दौरान अली गोनी घर का सामान तोड़ते हुए भी नजर आए.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Colors TV (@colorstv)

 

अली गोनी की वजह से कविता कौशिक को चोट भी लग गई थी. अली गोनी की बातों से वह बहुत परेशान हुई. बिग बौस हाउस में वह फूट-फूट कर रोती हुई दिखाई दी.

तो इसी बीच खबर ये आ रही है कि अली गोनी का गुस्सा देखकर कविता कौशिक के पति रोनित विश्वास (Ronit Biswas) बुरी तरह से  भड़क गए हैं. और उन्होंने अली की जमकर लताड़ लगाई है.

खबरों के अनुसार कविता कौशिक के पति रोनित बिश्वास ने कहा है कि  मैंने  ‘बिग बौस 14′ का प्रोमो देखा था.  उस प्रोमो को देखकर मुझे बहुत दुख हुआ. मेरी पत्नी कविता की हालत देखकर आंखों में आंसू आ गए. अली गोनी ने कविता के साथ बहुत बुरी तरह से लड़ाई की थी.

जब मैंने एपिसोड में कविता कौशिक को बराबरी करते देखा तब मुझे अच्छा लगा. मुझे अपनी पत्नी पर नाज है कि  मामले को उसने अपने तरीके से सुलझाया.

ये भी पढ़ें- Bigg Boss 14: कविता कौशिक से भिड़ी रुबीना

बताया जा रहा है कि रोनित बिश्वास ने कहा है कि उनके परिवार के लोग अली गोनी के खिलाफ लीगल एक्शन लेने की बात कर रहे हैं. उन्होंने कहा है कि अली लड़ाई करते हुए अपनी सीमा पार करने की कोशिश की है. उनको इस बात की सजा मिलनी चाहिए.

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार रोनित बिश्वास ने आगे कहा कि  टीवी पर साफ दिखाई दे रहा था कि अली कितनी बुरी तरह से कविता कौशिक से भिड़ गए थे. अगर एक आदमी महिलाओं के साथ इस तरह का बर्ताव करता है तो इससे एक बात साफ हो जाती है कि उनके दिमाग में कोई दिक्कत है. अली गोनी जैसे लोग महिलाओं के साथ अच्छा बर्ताव करते हैं लेकिन उनका गुस्सा इससे भी ज्यादा खतरनाक हो जाता है. घर में हंगामा करने के लिए बिग बौस ने ओली को केवल नौमिनेट किया है.

ये भी पढ़ें- अब पुलिस की वर्दी में नजर आएंगी ‘सास-बहू और बेटियां’

रोनित बिश्वास ने ये भी कहा कि  क्या बिग बौस इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि अली बाकी लोगों को भी नुकसान पहुंचाए. ये एक बड़ा सवाल है. मेरे हिसाब से अली गोनी के खिलाफ सख्त एक्शन लिया जाना चाहिए. कविता कौशिक के पति होने के नाते मुझे अली गोनी का बर्ताव जरा भी पसंद नहीं आया.

ट्रस्ट एक प्रयास :भाग 3

लेखिका- अर्चना वाधवानी   

‘‘बिलकुल, तभी तो तुम ने मुझ से कल की सारी बातें छिपाईं,’’ उन के दुखी स्वर से मैं और दुखी थी.

‘‘मैं आप को दुखी नहीं करना चाहती थी. बस, इसलिए मैं ने आप को कुछ नहीं बताया,’’ मैं रो पड़ी.

‘‘नैना, मैं पराया नहीं हूं, तुम्हारा अपना…’’ वह आगे नहीं बोल पाए. मैं उन के कंधे पर सिर रख कर सिसक पड़ी थी.

कुछ ही दिन बाद…

‘‘नैना, तैयार रहना, आज कहीं खास जगह चलना है, ठीक 5 बजे,’’ कह कर आलोक ने फोन रख दिया. मैं ने घड़ी देखी तो 4 बज रहे थे.

मैं धीरेधीरे तैयार होने लगी. अपनी शक्ल शीशे में देखी तो चौंक गई. लग ही नहीं रहा था कि मेरा चेहरा है. गुलाबी रंगत गायब हो गई थी. आंखों के नीचे काले गड्ढे पड़ गए थे. कितने ही दिनों से खुद को शीशे में देखा ही नहीं था. सारा दिन भाइयों की बातें ध्यान में आती रहतीं. भाइयों का तो दुख था ही उस पर बाऊजी से मिल न पाने का गम भीतर ही भीतर दीमक की तरह मुझे खोखला करता जा रहा था.

ये भी पढ़ें- रिश्ते की बुआ

आलोक दुखी न हों इसलिए उन से कुछ न कह कर मैं अपना सारा दुख डायरी में लिखती जा रही थी. बचपन से ही मुझे डायरी लिखने का शौक था. पता नहीं अब शादी से पहले की डायरी किस कोने में पड़ी मेरी तरह जारजार आंसू बहाती होगी. शादी के बाद वह डायरी बाऊजी के पास ही रह गई थी.

‘‘आलोक, हम कहां जा रहे हैं?’’ मैं आलोक के साथ कार में बैठी हुई थी.

‘‘बस, नैना, कुछ देर और फिर सब पता चल जाएगा,’’ आलोक हंस कर बोले.

कार धीरेधीरे शहर से बाहर लेकिन एक खुली जगह पर जा रुकी. मैं हैरानपरेशान कार में बैठी रही. समझ नहीं पा रही थी कि आखिर आलोक चाहते क्या हैं. अभी इसी उधेड़बुन में थी कि सामने खड़ी कार से जिस व्यक्ति को उतरते देखा तो उन्हें देख कर मैं एकदम चौंक पड़ी. मुझ से रहा न गया और मैं भी कार से बाहर आ गई.

‘‘आओ, नैना बिटिया,’’ वर्मा चाचाजी बोले.

‘‘नमस्ते, चाचाजी, आप यहां?’’

‘‘हां, बेटी, अब तो यहां आना लगा ही रहेगा.’’

‘‘आलोक, प्लीज, क्या छिपा रहे हैं आप लोग मुझ से?’’

‘‘नैना, क्या छिपाने का हक सिर्फ तुम्हें ही है, मुझे नहीं.’’

‘‘आलोक, मैं ने आप से क्या छिपाया है?’’ मैं हैरान थी.

‘‘अपना दुख, अपने जज्बात, छिपाए या नहीं वह तो अलमारी में रखी तुम्हारी डायरी पढ़ ली वरना तुम्हारा चेहरा तो वैसे ही सारा हाल बता रहा है. तुम ने क्या सोचा, मुझे कुछ खबर नहीं है?’’

नजरें नीची किए मैं किसी अपराधी की तरह खड़ी रही लेकिन यह समझ अभी भी नहीं आया था कि यहां क्या यही सब कहने के लिए लाए हैं.

‘‘आलोक, बेटा, अब नैना को और परेशान मत करो और सचाई बता ही डालो.’’

‘‘नैना, यह जमीन का टुकड़ा, जहां हम खडे़ हैं, अब से तुम्हारा है.’’

‘‘लेकिन, आलोक, हमारे पास तो अच्छाखासा मकान है, फिर यह सब?’’

‘‘नैना, यह जमीन तुम्हारे बाऊजी ने दी है,’’ चाचाजी भावुक हो कर बोले और फिर बताते चले गए, ‘‘हरिश्चंद्र (बाऊजी) को तुम्हारे विवाह से बहुत पहले ही यह आभास होने लगा था कि बहुओं ने तुम्हें दिल से कभी स्वीकार नहीं किया. उन्होंने कई साल पहले यह प्लाट बुक किया था जिस की भनक उन्होंने किसी को भी नहीं लगने दी. उन्होंने अपने प्लाट और फिक्स्ड डिपोजिट की नामिनी तुम्हें बनाया था. जब वह बीमार रहने लगे तो उन्होंने मुझे सब कागजात दे दिए और तुम्हें देने के लिए कहा. क्या पता था कि वह अचानक हमें यों छोड़ जाएंगे. मैं ने आलोक को वे सब कागजात, एक डायरी और तसवीरें, जो तुम्हारे बाऊजी ने तुम्हें देने को बोला था, क्रिया के बाद भिजवा दीं. आगे आलोक तुम्हें बताएगा.’’

ये भी पढ़ें- अंधा मोड़ : सौरभ से कैसे बच पाई माधवी

मैं ने प्रश्नसूचक नजरों से आलोक को देखा, ‘‘नैना, याद है जब तुम रजिस्ट्रार आफिस से लौटी थीं तो मैं ने एक पैकेट की बात की थी. लेकिन तुम ने ध्यान नहीं दिया तो उत्सुकतावश मैं ने खोल लिया था, जानती हो उस में क्या था, प्लाट के कागजात के अलावा… तुम्हारी शादी से पहले की डायरी…

‘‘मैं नहीं जानता था कि तुम बचपन से ही इतनी भावुक थीं. उस मेें तुम ने एक सपने का जिक्र किया था. बस, वही सपना पूरा करने का मैं ने एक छोटा सा प्रयास किया है.’’

आलोक और भी पता नहीं क्याक्या बताते चले गए. मेरी आंखों से आंसू बह निकले. लेकिन आज आंसू खुशी के थे, इस एहसास से भरे हुए थे कि मेरा वह सपना जो मैं ने बाऊजी की लिखी हुई एक कहानी ‘ट्रस्ट : एक छोटा सा प्रयास’ से संजोया था, सच बन कर, एक हकीकत बन कर मेरे सामने खड़ा हुआ है.

उन की उस कहानी का नायक अपना सारा जीवन समाजसेवा में लगा देता है. वह एक ऐसे ट्रस्ट का निर्माण करता है जिस का उद्देश्य अपंग और अपनों से ठुकराए, बेबस, लाचार, बेसहारा लोगों की मदद करना होता है. लेकिन मदद के नाम पर केवल रोटी, कपड़ा या आश्रय देना ही उस का उद्देश्य नहीं होता, वह उन में स्वाभिमान भी जागृत करना चाहता है.

बाऊजी से मुझे क्या नहीं मिला. अच्छी परवरिश, अच्छी शिक्षा, संस्कार, प्यार, आत्मविश्वास और अब एक अच्छे जीवनसाथी का साथ.

चाचाजी ने बताया कि आलोक ने अपनी तरफ से भी बहुत बड़ी रकम ट्रस्ट के लिए दी है. वह चाहते तो प्लाट या बैंक के पैसे अपने इस्तेमाल में ले लेते लेकिन मेरा दुख देख उन्होंने इस कार्य को अंजाम दिया.

‘‘आलोक, आप एक अच्छे जीवनसाथी हैं यह तो मैं जानती थी लेकिन इतने अच्छे इनसान भी हैं, यह आज पता चला.’’

ये भी पढ़ें- साठ पार का प्यार : सुहानी ने कैसा पैतरा अपनाया

‘‘अब यह तुम्हारा नहीं हमारा सपना है,’’ आलोक ने कहा, ‘‘हम अपने चेरिटेबल ट्रस्ट का नाम ‘प्रयास’ रखेंगे. कैसा लगा?’’

‘‘बहुत अच्छा और सटीक लगा यह नाम,’’ नैना बोली, ‘‘सच ही तो है, जरूरतमंदों की मदद के लिए जितना भी प्रयास किया जाए कम होता है.’’

ट्रस्ट का एक मतलब जहां विश्वास होता है तो दूसरा मतलब अब हमारी जिंदगी का उद्देश्य बन चुका था. यानी कि मानव सेवा. जैसेजैसे हम इस उद्देश्य के निकट पहुंचते गए वैसेवैसे ही मेरे भीतर के दुख दूर होते गए.

आज भी मां और बाऊजी की तसवीरें ‘प्रयास’ के आफिस में हमें आशीर्वाद देती प्रतीत होती हैं. उन दोनों ने मुझे अपनाया और एक पहचान दी. वे दोनों ही मेरे परिवार और मेरी नजरों में अमर हैं. वे हमारे दिलोें में सदा जीवित रहेंगे. मैं, आलोक और मेरी दोनों बेटियां, आन्या और पाखी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं हर दिन, हर पल लेकिन फूलों से नहीं बल्कि ट्रस्ट  ‘प्रयास’ के रूप में.

ट्रस्ट एक प्रयास : भाग 1

लेखिका- अर्चना वाधवानी   

हम सब अपनीअपनी जिंदगी में कितने ही सपने देखते हैं. कुछ टूटते हैं तो कुछ पूरे भी हो जाते हैं. बस, जरूरत है तो मात्र ‘प्रयास’ की. कई बार सिर्फ एक शब्द जिंदगी के माने बदल देता है. मेरी जिंदगी में भी एक शब्द ‘ट्रस्ट’ ने जहां मेरा दिल तोड़ा वहीं उसी शब्द ने मेरे सब से खूबसूरत सपने को भी साकार किया.

अंगरेजी के शब्द ट्रस्ट का हिंदी में अर्थ है ‘विश्वास’ और इस छोटे से शब्द में कितना कुछ छिपा हुआ है. उफ, कितनी आहत हुई थी, जब अपनों से ही धोखा खाया था.

आलोक मेरे सामने खडे़ थे. मैं अभीअभी रजिस्ट्रार आफिस से सब बंधनों से मुक्त हो कर आई थी.

‘‘नैना, क्या तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं?’’

‘‘आलोक, मुझे आप पर पूरा विश्वास है लेकिन हालात ही कुछ ऐसे हो गए थे.’’

मेरी आंखों के सामने बाऊजी का चेहरा आ रहा था और उन्हें याद करतेकरते वे फिर भर आईं.

मेरी आंखें गंगायमुना की तरह निरंतर बह रही थीं तो मन अतीत की गलियों में भटक रहा था जो भटकतेभटकते एक ऐसे दोराहे पर आ कर खड़ा हो गया जहां से मायके के लिए कोई रास्ता जाता ही नहीं था.

मेरा विवाह कुछ महीने पहले ही हुआ था. शादी के कुछ समय बाद आलोक और मैं सिंगापुर गए हुए थे. आलोक का यह बिजनेस ट्रिप था. हम दोनों काफी समय से सिंगापुर में थे. बाऊजी से फोन पर मेरी बात होती रहती थी. अचानक एक दिन बड़े भैया का होटल में फोन आया, ‘नैना, बाऊजी, नहीं रहे.’

ये भी पढ़ें- अंतत -भाग 3: जीत किस की हुई

मुझे नहीं पता कब आलोक ने वापसी की टिकटें बुक कराईं और कब हम लोग सिंगापुर से वापस भारत आए.

बरामदे में दरी बिछी हुई थी. बाऊजी की तसवीर पर माला चढ़ी हुई थी. उन के बिना घर कितना सूनासूना लग रहा था. पता लगा कि भाई हरिद्वार उन की अस्थियां प्रवाहित करने गए हुए थे.

‘नैना, तू आ गई बेटी,’ पीछे पलट कर देखा तो वर्मा चाचा खडे़ थे. उन्हें देख मैं फूटफूट कर रो पड़ी.

‘चाचाजी, अचानक बाऊजी कैसे चले गए.’

‘बेटी, वह काफी बीमार थे.’

‘लेकिन मुझे तो किसी ने नहीं बताया. यहां तक कि बाऊजी ने भी नहीं.’

‘शायद वह नहीं चाहते थे कि तुम बीमारी की खबर सुन कर परेशान हो, इसलिए नहीं बताया.’

लेकिन भाइयों ने भी मुझे उन के बीमार होने की खबर देने की जरूरत नहीं समझी थी. मैं पूछना चाहती थी कि मेरे साथ ऐसा क्यों किया गया? लेकिन शब्द थे कि जबान तक आ ही नहीं रहे थे. वर्मा चाचाजी ने बताया कि आखिरी समय तक बाऊजी की आंखें मुझे ही ढूंढ़ रही थीं.

घर वापस आ कर मैं चुपचाप लेटी रही. विश्वास नहीं हो रहा था कि बाऊजी अब इस दुनिया में नहीं रहे.

बाऊजी मेरे लिए सबकुछ थे क्योंकि होश संभालने के बाद से मैं ने उन्हें ही देखा था. बडे़ भाई विजय और अजय दोनों मुझ से उम्र में काफी बडे़ थे. बेहद सरल स्वभाव के बाऊजी डी.ए.वी. स्कूल की एक शाखा में प्रिंसिपल थे और स्कूल से लौटने के बाद का सारा समय वह मेरे साथ बिताते थे.

मां को तो मैं बचपन में ही खो चुकी थी लेकिन बाऊजी ने मां की कमी कभी महसूस नहीं होने दी. वह कहानियां भी लिखा करते थे. उन की उपदेशात्मक कहानियां मुझे आज भी याद हैं. एक बार उन्होंने मुझे कृष्ण की जन्मकथा सुनाई और पूछा कि नैना, बताओ, कृष्ण पर किस का ज्यादा हक है? यशोदा का या देवकी का? मेरे द्वारा यशोदा का नाम लेते ही उन का चेहरा खुशी से खिल उठा था.

उस समय तो नहीं लेकिन कुछ वर्षों के बाद बाऊजी ने एक रहस्य से परदा उठाया था. वह नहीं चाहते थे कि मुझे किसी और से पता चले कि मैं उन की गोद ली हुई बेटी हूं. हां, मैं उन की सगी संतान नहीं थी लेकिन शायद उन्हें अपने प्यार व मुझे दिए हुए संस्कारों पर पूरापूरा विश्वास था. इसीलिए मेरे थोड़ा समझदार होते ही उन्होंने खुद ही मुझे सच से अवगत करा दिया था.

अतिशयोक्ति नहीं होगी, मैं कुछ देर के लिए सकते में अवश्य आ गई थी लेकिन बाऊजी के प्यार व उन की शिक्षा का ऐसा असर था कि मैं बहुत जल्द सामान्य हो गई थी.

ये भी पढ़ें- ऐसा तो होना ही था

खुद से ही यह सवाल किया था कि क्या कभी उन के प्यार में बनावट या पराएपन का आभास हुआ था? नहीं, कभी नहीं. कितने स्नेह से उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था, ‘मेरी बेटी, तुम तो मेरे लिए इस दुनिया का सब से नायाब तोहफा हो. तुम मेरी बेटी हो इसलिए नहीं कि तुम्हें हमारी जरूरत थी बल्कि इसलिए क्योंकि हमें तुम्हारी जरूरत थी. तुम्हारे आने के बाद ही हमारा परिवार पूर्ण हुआ था.’

बाऊजी को सब लोग बाबूजी या लालाजी कह कर पुकारते थे लेकिन मैं अपनी तोतली बोली में उन्हें बचपन में ‘बाऊजी’ कहा करती थी और जब बड़ी हुई तो उन्होंने बाबूजी की जगह बाऊजी ही कह कर पुकारने को कहा. उन्हें मेरा बाऊजी कहना बहुत अच्छा लगता था.

ये भी पढ़ें- अधूरे प्यार की टीस

बाऊजी ने बताया था कि मां हर त्योहार या किसी भी खुशी के मौके पर अनाथाश्रम जाया करती थीं. एक बार उन्होंने आश्रम में एक छोटी सी बच्ची को रोते देखा. इतना छोटा बच्चा, आज तक आश्रम में नहीं आया था. रोती हुई वह बच्ची मात्र कुछ हफ्तों की थी और उसे अपनी मां की गोद भी नसीब नहीं हुई थी. पता नहीं किस निर्मोही मां ने अपनी बच्ची का त्याग कर दिया था.

‘पता नहीं क्या सम्मोहन था उस बच्ची की आंखों में कि प्रकाशवती यानी तुम्हारी मां अब हर रोज उस बच्ची को देखने जाने लगीं और किसी दिन न जा पातीं तो बेचैन हो जाती थीं. एक दिन मैं और तुम्हारी मां आश्रम पहुंचे. जैसे ही बच्ची आई उन्होंने उसे उठा लिया. बच्ची उन की गोद से वापस आया के पास जाते ही रोने लगी. यह देख कर मैं चकित था कि इतनी छोटी सी बच्ची को ममता की इतनी सही पहचान.

‘प्रकाशवती अब मुझ पर उस बच्ची को गोद लेने के लिए जोर डालने लगीं. दरअसल, उन्हें बेटी की बहुत चाह थी, जबकि मैं  ‘हम दो हमारे दो’ का प्रण ले चुका था. बच्ची को देखने के बाद उन की बेटी की इच्छा फिर से जागने लगी थी. मैं ने प्रकाशवती को समझाया कि बच्ची बहुत छोटी है. बहुत बड़ी जिम्मेदारी का काम होगा. लेकिन वह टस से मस न हुईं. आखिर मुझे उन की जिद के आगे झुकना ही पड़ा. वैसे एक बात कहूं, बेटी, मन ही मन मैं भी उस बच्ची को चाहने लगा था. बस, वह बच्ची कुछ ही दिनोें में नैना के रूप में हमारी जिंदगी में बहार बन कर मेरे घर आ गई.’

मैं डबडबाई नजरों से बाऊजी को निहारती रही थी.

‘लेकिन ज्यादा खुशी भी कभीकभी रास नहीं आती. तुम अभी 2 साल की भी नहीं हुई थीं कि तुम्हारी मां का निधन हो गया. दोनों बेटे बडे़ थे, खुद को संभाल सकते थे लेकिन जब तुम्हें देखता था तो मन भर आता था.

‘एक बार किसी जानकार ने तुम्हें ‘बेचारी बिन मां की बच्ची’ कह दिया. मुझे बहुत खला था वह शब्द. बस, मैं ने उस दिन से ही फैसला कर लिया था कि प्रकाशवती की बेटी को किसी भी तरह की कमी नहीं होने दूंगा. कोई उसे बेचारी कहे, ऐसी नौबत ही नहीं आने दूंगा. उस के बाद से ही तुम्हारे भविष्य को ले कर बहुत कुछ सोच डाला.’

ट्रस्ट एक प्रयास : भाग 2

लेखिका- अर्चना वाधवानी   

उफ, बाऊजी ने मुझे इतनी अच्छी परवरिश दी थी लेकिन लानत है मुझ पर जो आखिरी समय उन की सेवा न कर सकी. वह लाड़ करते  हुए मुझ से कहते थे कि किसी ने सच ही कहा है कि बेटी सारी जिंदगी बेटी ही रहती है. लेकिन मैं ने क्या फर्ज पूरे किए बेटी होने के?

आलोक ने मुझे बहुत समझाया कि इस सब में मेरी कोई गलती नहीं थी. हमें यदि समय पर खबर की जाती और तब भी न पहुंचते तब गलत था. उन की बातें ठीक थीं लेकिन दिल को कैसे समझाती.

बहुत गुस्सा था मन में भाइयों के लिए. बाऊजी की क्रिया थी. पगड़ी की रस्म के बाद आलोक किसी जरूरी काम से चले गए पर मैं वहीं रुकी थी. जब सब लोग चले गए तो मैं जा कर भाइयों के पास बैठ गई.

‘भैया, आप लोगों ने मुझे खबर क्यों नहीं की? बाऊजी आखिरी समय तक मेरी राह देखते रहे.’

‘नैना, जो बात करनी है, हम से करो,’ तीखा स्वर गूंजा तो मैं चौंक पड़ी. सामने दोनों भाभियां लाललाल आंखों से मुझे घूर रही थीं.

मैं थोड़ी सी अचकचा कर बोली, ‘भाभी, क्या बात हो गई. आप सब मुझ से नाराज क्यों हैं?’

‘पूछ रही हो नाराज क्यों हैं? पता नहीं तुम ने बाबूजी को क्या पट्टी पढ़ा दी कि उन्होंने हमारा हक ही छीन लिया,’ जवाब में छोटी भाभी बोलीं तो मैं तिलमिला गई.

बस, फिर क्या था, दोनों भाभियों ने मुझे खूब खरीखोटी सुनाईं और उस का सार था कि बाऊजी ने मेरे बहकावे में आ कर मकान में मेरा भी हिस्सा रखा था. बाऊजी के इलाज पर खर्चा उन लोगों ने किया, सेवा उन लोगों ने की इसीलिए केवल उन लोगों का ही मकान पर हक बनता था.

ये भी पढ़ें- बैकुंठ : धर्मकर्म की चादर में थे श्यामाचरण

मैं ने भाइयों की ओर देखा तो बडे़ भाई विजय मुझ से नजरें चुरा रहे थे. इस का मतलब था कि मकान के गुस्से में आ कर इन लोगों ने मुझे बाऊजी के बीमार होने की खबर नहीं की थी.

मैं ने बाऊजी की तसवीर की ओर देखा, वह मुसकरा रहे थे. इस से पहले कि मैं कुछ बोल पाती, छोटी भाभी ने ऐसी बात कह दी कि मेरे पांव तले की जमीन खिसक गई. उन्होंने कड़वाहट से कहा, ‘पता नहीं बाबूजी को बाहर वालों पर इतना तरस क्यों आता था. न जात का पता न मांबाप का, बस, ले आए उठा कर.’

मुझ से और नहीं सुना गया. मैं उठ खड़ी हुई. मेरे दोनों बडे़ भाई एकदम से मेरे पास आ कर बोले, ‘नैना, दरअसल हम पर बहुत उधार है और मकान बेच कर हम यह उधार चुकाएंगे, इसलिए ये दोनों परेशान हैं. हम ने तो इन से कहा था कि नैना को हम अपनी परेशानी बताएंगे तो वह हमारे साथ रजिस्ट्रार आफिस जा कर ‘रिलीज डीड’ पर साइन कर देगी. ठीक कहा न?’

सच क्या था, मैं अच्छी तरह समझती थी. मैं मरी सी आवाज में केवल यही पूछ पाई कि कब चलना है, और अगले ही दिन हम रजिस्ट्रार आफिस में बैठे हुए थे.

मेरे आगे कई कागज रखे गए. मैं एकएक कर के सब कागजों पर अंगूठा लगाती गई और अपने हस्ताक्षर भी करती गईर्र्र्र्. हर हस्ताक्षर पर भाई का प्यारदुलार, मेरा रूठना उन का मनाना मेरी आंखों के आगे आता चला गया. वहीं बैठे एक आदमी ने जब मुझ से उन कागजों को पढ़ने के लिए कहा, तो मेरा मन भर आया था. क्या कहती उस से कि मेरा तो मायका ही सदा के लिए छिन गया. बाऊजी क्या गए सब ने मुंह ही फेर लिया. भाभियां तो फिर पराई थीं लेकिन भाइयों की क्या कहूं. वे भी पराए हो गए.

भाइयों को जो चाहिए था वह उन्हें मिल गया लेकिन मेरा सबकुछ छिन गया. मेरे बाऊजी, मेरा मायका, मेरा बचपन. लगा, जैसे अनाथ तो मैं आज हुई हूं.

शायद मैं यानी नैना, जिस पर बाऊजी कितना गर्व करते थे, उस रोज टूट गई थी. घर पहुंची तो आलोक कहीं फोन मिला रहे थे.

‘कहां चली गई थीं तुम? पता है कहांकहां फोन नहीं किए?’ वह चिल्ला पडे़ लेकिन मेरी हालत देख कर कुछ नरम पड़ते हुए पूछा, ‘नैना, कहां थीं तुम?’

क्या कहती उन्हें. वह मेरे पास आए और बोले, ‘तुम्हारे वर्मा चाचाजी ने यह पैकेट तुम्हारे लिए भिजवाया था.’

मैं चुपचाप बैठी रही.

वह आगे बोले, ‘लाओ, मैं खोल देता हूं.’

वह जब पैकिट खोल रहे थे तो मैं अंदर कमरे में चली गई.

कुछ देर बाद वह भी मेरे पीछेपीछे कमरे में आ गए और बोले, ‘नैना, आखिर बात क्या हुई. कल से देख रहा हूं तुम हद से ज्यादा परेशान हो.’

ये भी पढ़ें- ऊंच नीच की दीवार : क्या हो पाई उन दोनों की शादी

कब तक छिपाती उन से. वैसे छिपाने का फायदा क्या और बताने में नुकसान क्या. रिश्ता तो उन लोगों ने लगभग तोड़ ही दिया था. मैं ने आलोक को एकएक बात बता दी.

वह कुछ देर के लिए सन्न रह गए. कुछ देर बाद बोले, ‘नैना, कितना सहा तुम ने. तुम्हें क्या जरूरत थी उन लोगों के साथ अकेले रजिस्ट्रार आफिस जाने की. मुझे इस लायक भी नहीं समझा. कल रात से मैं तुम से पूछ रहा था लेकिन तुम ने कुछ नहीं बताया. वहां से इतना कुछ सुनना पड़ा फिर भी उन लोगों की हर बात मानती चली गईं. द फैक्ट इज, यू डोंट ट्रस्ट मीं. सचाई तो यह है कि तुम्हें मुझ पर भरोसा ही नहीं है,’ कह कर वह दूसरे कमरे में चले गए.

जेहन में जैसे ही भरोसे की बात आई मुझे लगा जैसे किसी ने झकझोर कर मुझे जगा दिया हो. मैं अतीत से निकल वर्तमान में आ गई.

‘‘आलोक, क्या कह रहे हैं आप. मैं आप पर भरोसा नहीं करती.’’

ट्रस्ट एक प्रयास

बेटी की सनक : भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

बेटी के प्यार के बारे में जानते ही वह उस के प्रति सख्त हो गईं और उसे साफतौर पर देवदीप से मिलने पर मना कर दिया. यही नहीं, देवदीप के घर आने पर भी पाबंदी लगा दी.

उम्र के जिस मोड़ से रिया गुजर रही थी, उस उम्र में अकसर बच्चों के पांव फिसल जाते हैं. ऐसे में कहीं कोई ऊंचनीच हो जाए तो समाज में वह कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी. चंदना को इसी बात का डर सता रहा था, इसीलिए उन्होंने बेटी को देवदीप से मिलने और बात करने से मना कर दिया था.

मां की यह बात रिया को काफी नागवार लगी थी. रिया ने यह बात प्रेमी देवदीप को बता दी. यही नहीं वह अपने दिल की हर बात अपनी मौसेरी बहन आयशा जायसवाल से भी शेयर करती थी. दोनों हमउम्र भी थीं और हमराज भी. एकदूसरे के दिल की बातें सीने में दफन कर लेती थीं.

उस दिन के बाद से चंदना की बेटी पर सख्ती कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थी. बेटी से कहीं भी जानेआने पर उस से हिसाब लेने लगी थीं. मसलन कहां जा रही है? वहां काम क्या है? घर कब लौटोगी? वगैरह…वगैरह.

अचानक मां के बदले तेवर से रिया परेशान हो गई. मां की टोकाटाकी उसे कतई पसंद नहीं थी. मां के इस रवैए से उस के मन में नकारात्मक सोच पैदा हो गई. वह यह भी सोच रही थी कि मां उस के प्रेमी देवदीप को पसंद नहीं करती, मां के जीते जी वह देवदीप को अपना जीवनसाथी नहीं बना सकती तो क्यों न मां को ही हमेशा के लिए अपने रास्ते हटा दे. न रहेगा चंदना नाम का कांटा, न चुभेगा पांव में. उस के बाद तो जीवन भर मजे ही मजे रहेंगे.

रिया के कच्चे दिमाग में खतरनाक योजना अंतिम रूप ले चुकी थी. जल्द से जल्द वह इस काम को अंजाम देना चाहती थी. वह यह भी जानती थी कि इस काम को अकेली पूरा नहीं कर सकती. इसलिए उस ने अपनी इस खतरनाक योजना में मौसेरी बहन आयशा और प्रेमी देवदीप को भी शामिल कर लिया. आयशा ने रिया का विरोध करने के बजाए उस का साथ देने के लिए हामी भर दी थी.

सब कुछ उस की योजना के मुताबिक चल रहा था. 23 अगस्त, 2020 को रिया आयशा को घर बुला लाई. उस के आने से रिया की हिम्मत दोगुनी हो गई थी. दोनों ने मिल कर रात भर चंदना को मौत के घाट उतारने की योजना बनाई.

रिया बेसब्री से अगली सुबह होने का इंतजार कर रही थी कि कब सुबह हो और मां को मौत के घाट उतारा जाए. मां के लिए उस के दिल में जरा भी रहम नहीं था.

ये भी पढ़ें- प्रेम के लिए कुर्बानी

अगली सुबह 10 बजे रिया और आयशा बाजार गईं. उस दिन चंदना ड्यूटी नहीं गई थीं, घर पर ही थीं. मैडिकल की दुकान से दोनों ने नींद की 10 गोलियां खरीदीं और घर ला कर अलमारी में छिपा दीं.

दोपहर करीब साढ़े 12 बजे रिया ने 3 कप चाय बनाई. एक प्याली खुद ली, दूसरी प्याली आयशा को दी और तीसरी प्याली मां को दी. उस ने मां की चाय में चुपके से नींद की सारी गोलियां डाल दी थीं. चाय पीने के थोड़ी देर बाद ही दवा ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया.

चंदना अचेत हो कर बिस्तर पर गिर गईं. दोनों को बड़ी बेसब्री इसी पल का इंतजार था. रिया ने मां को हिला कर देखा, उन के जिस्म में कोई हरकत नहीं थी. फिर क्या था, दोनों ने मिल कर चुन्नी से चंदना का गला घोंट दिया.

कुछ ही पलों में चंदना की मौत हो गई. लेकिन रिया को अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि उस की मां मर चुकी है. फिर खुद कलयुगी बेटी ने मां के पैरों में बिजली का तार फंसा कर 10 मिनट तक करंट दौड़ाया ताकि मां की मौत पक्की हो जाए.

इस के बाद रिया को यकीन हुआ कि उस के रास्ते का कांटा हमेशा के लिए निकल चुका है. उस के बाद लाश ठिकाने लगाने के लिए उस ने मदद के लिए प्रेमी देवदीप को फोन किया. देवदीप रिया के घर पहुंचा.

तीनों ने चंदना की लाश एक चादर में बांध कर बैड के नीचे डाल दी. फिर रिया ने अलमारी में रखे लाखों के सोनेचांदी के गहने निकाले और एक पोटली में बांध कर तीनों घर से निकल गए, ताकि यह लगे कि लूट के चलते घटना घटी है. जाने से पहले रिया ने मां का फोन स्विच्ड औफ कर दिया था.

यह सब करतेकरते दोपहर के 2 बज गए थे. उस के बाद रिया प्रेमी देवदीप और मौसेरी बहन आयशा के साथ दिन भर इधरउधर घूमती रही. गहने उस ने देवदीप के हवाले कर दिए थे. फिर घूमतेटहलते रात में रिया और आयशा नानी के घर पहुंच गईं.

रिया ने नानी से झूठ बोला कि वह पिकनिक पर आयशा के साथ कोटा गई थी. लौटते वक्त मां को फोन लगाया तो मां के फोन की घंटी बजती रही लेकिन उन्होंने काल रिसीव नहीं किया, इसलिए यहां चली आई.

ये भी पढ़ें- औनलाइन फ्रैंडशिप : चली गई इज्जत

फिर नानी के घर से रिया ने अपने पड़ोसी इंजीनियर अंकल रामेश्वर सूर्यवंशी को फोन कर के मां के फोन न उठाने वाली बात बता कर उन्हें घर जा कर पता लगाने को कहा. ताकि मौका मिलते ही उन्हें फंसा कर खुद को बेदाग साबित कर दे.

लेकिन कानून के लंबे हाथों से वह बच नहीं पाई और सलाखों के पीछे पहुंच गई. वह खुद तो जेल गई ही, साथ में अपनी बहन और दोस्त को भी जेल ले गई.

कथा लिखे जाने तक पुलिस ने देवदीप से सारे गहने बरामद कर लिए थे. कलयुगी बेटी की करतूतों पर पूरा शहर थूथू कर रहा था. लोग यही कह रहे थे कि ऐसी औलाद से तो बेऔलाद होना ही अच्छा है.

बेटी की सनक : भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

उसी शाम मुखबिर के जरिए पुलिस को एक ऐसी चौंका देने वाली सूचना मिली, जिसे सुन कर पुलिस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. रिया ने पूछताछ में पुलिस को बताया था कि जिस दिन उस की मां की हत्या हुई, उस दिन वह घर पर नहीं थी, बल्कि अपनी मौसेरी बहन आयशा जायसवाल और दोस्त देवदीप गुप्ता के साथ घटना से 2 दिन पहले कोटा घूमने गई थी.

वह झूठ बोल रही थी. दरअसल, रिया घर छोड़ कर कहीं गई ही नहीं थी. यह सुन कर पुलिस हैरान रह गई कि रिया ने झूठ क्यों बोला कि वह घटना से 2 दिन पहले घूमने गई थी. इस का मतलब वह घटना के बारे में बहुत कुछ जानती थी या घटना में उस का कहीं न कहीं हाथ था.

रिया की काल डिटेल्स से भी बात स्पष्ट हो गई थी कि वह उस दिन कहीं नहीं गई थी, बल्कि घर पर ही थी. इस बात की पुष्टि हो जाने के बाद पुलिस की नजर पूरी तरह रिया पर जा टिकी.

रिया से दोबारा पूछताछ करनी जरूरी थी, लिहाजा 29 अगस्त, 2020 को पुलिस रिया को पूछताछ के लिए घर से थाने ले आई और उस से कड़ाई से पूछताछ शुरू की तो वह जल्द ही टूट गई और अपना जुर्म कबूल कर लिया. उस ने बताया कि उसी ने मौसेरी बहन आयशा और प्रेमी देवदीप गुप्ता के साथ मिल कर अपनी मां की हत्या की थी. पुलिस को भटकाने के लिए उस ने घटना को लूट की ओर मोड़ने की कोशिश की थी.

अलमारी में रखे मां के सोनेचांदी के जेवरात वह अपने साथ ले गई थी. रिया के बयान के आधार पर पुलिस ने उसी दिन उस की मौसेरी बहन आयशा जायसवाल और प्रेमी देवदीप गुप्ता को गिरफ्तार कर उन की निशानदेही पर जेवरात बरामद कर लिए.

तीनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने सचिव चंदना की हत्या की कहानी कुछ इस तरह बताई—

45 वर्षीय चंदना डडसेना मूलरूप से बिलासपुर के पथरिया की रहने वाली थी. एकलौती बेटी रिया और सास यही उस का घरसंसार था. वह सास और बेटी का चेहरा देख कर जी रही थी, यही उस के जीने का सहारा भी थे.

दोनों की जिम्मेदारी चंदना के कंधों पर थी. अपना दायित्व समझ कर चंदना उसे ईमानदारी से निभा रही थी. चंदना के कंधों पर जिम्मेदारी का यह बोझ उस समय आया, जब रिया 5-6 साल की रही होगी. उन्हीं दिनों मासूम रिया के सिर से पिता और चंदना के सिर से पति का साया उठ गया था. जेल के अंदर कैदियों ने पीटपीट कर उन की हत्या कर दी थी.

ये भी पढ़ें- ओयो होटल का रंगीन अखाड़ा

चंदना डडसेना के पति का नाम विजय डडसेना था. वह पथरिया चुनचुनिया पंचायत क्षेत्र के एक इंटर कालेज में सरकारी अध्यापक थे. खुद्दार और स्वाभिमानी विजय डडसेना अपने कुशल व्यवहार के लिए इलाके में मशहूर थे. अपने कर्तव्य के प्रति हमेशा सजग और कानून का पालन करने वाले थे. इन से जब कोई गलत और अनुचित बात करता था, तो वह उस का विरोध करते थे.

उस दिन 4 अप्रैल, 2009 की तारीख थी जब विजय डडसेना के जीवन में काल कुंडली मार कर बैठा. उन दिनों बिलासपुर में पंचायती चुनाव होने वाला था. उसी संबंध में चुनाव से पहले एक मीटिंग आयोजित की गई थी. उस मीटिंग में एसडीएम और तमाम अधिकारियों के साथ अध्यापक विजय डडसेना भी मौजूद थे. चुनाव में उन की भी ड्यूटी लगी थी. मीटिंग चुनावी प्रशिक्षण के लिए आयोजित की गई थी.

विजय डडसेना का किसी बात को ले कर एसडीएम से विवाद हो गया था. दोनों के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि नाराज एसडीएम ने उन्हें जेल भिजवा दिया. कुछ दिनों बाद जेल में उन की कैदियों के साथ लड़ाई हो गई. गुट बना कर कैदियों ने जेल में ही अध्यापक विजय डडसेना की पीटपीट कर हत्या कर दी.

अध्यापक विजय डडसेना की हत्या से बिलासपुर में तूफान खड़ा हो गया था. उन की हत्या के विरोध में कई दिनों तक सामाजिक संगठनों ने आंदोलन दिया. आंदोलन पर विराम लगाने के लिए अनुकंपा के आधार पर सरकार ने मृतक की पत्नी चंदना डडसेना को सरकारी नौकरी और 15 लाख रुपए मुआवजा देने की घोषणा की थी.

बाद के दिनों में पथरिया चुनचुनिया पंचायत में चंदना डडसेना की सचिव पद पर नियुक्ति हो गई थी. मुआवजे के 15 लाख रुपए में से 7 लाख बेटी रिया को और 8 लाख रुपए में से आधीआधी रकम सास और बहू को मिल गई थी.

इस के बाद से चंदना की जिम्मेदारी और बढ़ गई थी, चूंकि रिया चंदना की एकलौती औलाद थी, इसलिए वह जिद्दी भी थी. जिस काम के लिए वह जिद पर अड़ जाती थी, उसे पूरा कर के ही मानती थी. बेटी की जिद के सामने मां को झुकना पड़ता था.

वह जानती थीं ऐसा नहीं करती, तो बेटी से सदा के लिए हाथ धो बैठती, इसलिए बेटी के सामने झुकना उन की मजबूरी थी. वह वही करती थीं, जो बेटी कहती थी.

17 वर्षीया रिया जिस स्कूल में पढ़ती थी, उसी स्कूल में देवदीप गुप्ता भी पढ़ता था. फर्क सिर्फ इतना था वह दसवीं में थी तो देवदीप 12वीं में था.

देवदीप रिया के मोहल्ले में रहता था. 4 भाई बहनों में वह दूसरे नंबर का था. पिता की सरकारी नौकरी थी. घर में पिता की कमाई से अच्छे पैसे आते थे. मां पर दबाव बना कर देवदीप पैसे ऐंठता और अपने आवारा दोस्तों के साथ दिन भर गलीमोहल्लों में घूमता था. यही उस की दिनचर्या थी.

ये भी पढ़ें- गोल्डन ईगल का जाल

बहरहाल, स्कूल के दिनों में घर जातेआते रास्ते में दोनों के बीच परियच बढ़ा. यह परिचय बाद में दोस्ती में बदल गया और फिर दोस्ती प्यार में. चूंकि देवदीप गुप्ता रिया के ही मोहल्ले का ही रहने वाला था और एक ही स्कूल में पढ़ता था, यह बात रिया की मां चंदना जानती थी. पढ़ाई के बहाने से रिया देवदीप को घर बुलाती थी और दोनों घंटों साथ समय बिताते थे.

शुरू के दिनों में चंदना ने बेटी को देवदीप से मिलने के लिए मना नहीं किया, लेकिन उन्होंने अपनी आंखें भी बंद नहीं की थीं. उस के घर आने के बाद वह दोनों पर नजर रखती थीं. आखिरकार चंदना को बेटी के प्यार के बारे में पता चल ही गया.

बेटी की सनक : भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के थाना सकरी इलाके में स्थित है उसलापुर गुप्ता कालोनी. इसी कालोनी में पथरिया चुनचुनिया की पंचायत सचिव चंदना डडसेना अपनी 17 वर्षीया एकलौती बेटी रिया डडसेना के साथ रहती थी.

इस कालोनी में उन्होंने 2 माह पहले ही किराए पर कमरा लिया था. इस से पहले वह परिवार सहित पथरिया में स्थित अपनी ससुराल में रह रही थीं. उन की ससुराल में सास के अलावा कोई नहीं था. ससुर की मृत्यु हो चुकी थी. पति विजय डडसेना की बदमाशों ने जेल में हत्या कर दी थी.

पति और ससुर की मौत के बाद चंदना ने अपनी सास को अपने साथ रखा, बिलकुल मां की तरह क्योंकि उन के अलावा सास की देखभाल करने वाला कोई नहीं था.

बहरहाल, उस दिन तारीख थी 22 अगस्त, 2020. रिया मां चंदना से कह कर अपनी मौसेरी बहन आसना जायसवाल और दोस्त देवदीप गुप्ता के साथ कोटा (राजस्थान) टूर पर गई. घर पर चंदना डडसेना अकेली थीं. इन की सास बीते कई दिनों से पथरिया में रह रही थीं.

रिया ने 24 अगस्त, 2020 की रात 10 बजे के करीब मां को फोन कर हालचाल पूछना चाहा, लेकिन उन का फोन बंद आ रहा था. उस ने जितनी बार फोन मिलाया, हर बार फोन स्विच्ड औफ आया. इस से रिया थोड़ी परेशान हो गई कि मां का फोन बंद क्यों आ रहा है? वह कभी अपना फोन बंद नहीं रखती थीं.

दरअसल, रिया मां को फोन कर के यह बताना चाहती थी कि वह कोटा से वापस लौट आई है और इस समय नानी के यहां रुकी हुई है, सुबह घर लौट आएगी. पर मां से बात न होने पर वह बुरी तरह परेशान हो गई.

ये भी पढ़ें- प्यार का मोहरा

रात काफी हो गई थी. रिया समझ नहीं पा रही थी कि इस समय किस के पास फोन कर के मां के बारे में पता लगाए. जब कुछ समझ में नहीं आया तो वह सो गई. उस ने नानी से भी कुछ नहीं बताया.

अगली सुबह रिया ने अपने पड़ोसी अंकल इंजीनियर रामेश्वर सूर्यवंशी को फोन कर के कहा, ‘‘अंकल, रात से मां का फोन बंद आ रहा है. मुझे बहुत डर लग रहा है कहीं उन के साथ कोई अनहोनी तो हो नहीं हुई है. अंकल प्लीज, घर जा कर मां को देख लो. हो सके तो मां से मेरी बात करा दीजिए प्लीज.’’

रिया के आग्रह पर पड़ोसी रामेश्वर सूर्यवंशी ने हां कर दी. उन्होंने यह भी कहा कि घर पहुंच कर तुम्हारी मां से मैं बात करा दूंगा. उन के आश्वासन के बाद रिया ने फोन काट दिया.

एक घंटे बाद रामेश्वर अपनी पत्नी के साथ चंदना डडसेना के घर पहुंचे. उन के घर का मुख्यद्वार अंदर की ओर खुला हुआ था. वहीं से उन्होंने ‘भाभीजी… भाभीजी’ कह कर चंदना को पुकारा और खड़े हो गए.

आवाज लगाने के बाद जब अंदर से कोई हलचल नहीं हुई तो ‘भाभीजी… भाभीजी’ आवाज देते हुए पतिपत्नी अंदर घुस गए. अंदर गहरा सन्नाटा पसरा था. इधरउधर देखते हुए वह चंदना के बैडरूम में पहुंचे.

दरवाजे के ऊपर बाहर से सिटकनी चढ़ी हुई थी. रामेश्वर सूर्यवंशी ने सिटकनी खोली और दरवाजे से ही अंदर की ओर झांक कर कमरे का निरीक्षण किया. जैसे ही उन की नजर बैड के पास नीचे फर्श पर गई, पतिपत्नी दोनों के होश फाख्ता हो गए. वहां से दोनों उलटे पांव बाहर की ओर भागे.

दरअसल फर्श पर चंदना डडसेना की लाश पड़ी थी. उन के गले में दुपट्टा लिपटा था. दोनों पैर एक रंगीन चादर से बंधे हुए थे. लाश के पास ही उन का फोन पड़ा था.

बाहर आ कर पतिपत्नी दोनों ने थोड़ी राहत की सांस ली. जब रामेश्वर सूर्यवंशी सामान्य हुए तो उन्होंने रिया को फोन कर के घटना की सूचना दी और जल्द से जल्द घर पहुंचने के लिए कहा. फिर उन्होंने 100 नंबर पर डायल कर घटना की सूचना पुलिस कंट्रोलरूम को दे दी.

ये भी पढ़ें- “प्रेमिका” को प्रताड़ना, “प्रेमी” की क्रूरता!

घटनास्थल (उसलापुर गुप्ता कालोनी) सकरी थाना क्षेत्र में पड़ता था. सकरी थाना प्रभारी रविंद्र यादव सूचना मिलते ही पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए.

थोड़ी देर बाद सीएसपी आर.एन. यादव भी आ गए. इधर मां की मौत की जानकारी मिलते ही रिया भी मौसेरी बहन आयशा जायसवाल के साथ घर पहुंच गई. उस का रोरो कर बुरा हाल था. रिया को रोते हुए देख कर आयशा भी खुद को नहीं संभाल पाई. उस ने भी रोरो कर अपनी आंखें सुजा लीं.

चंदना कोई साधारण महिला नहीं थीं. वह चुनचुनिया की पंचायत सचिव थीं. अपने अच्छे व्यवहार से उन्होंने लोगों के बीच अच्छी पकड़ बना रखी थी. थोड़ी ही देर में चंदना की हत्या की खबर पूरी कालोनी में फैल गई थी. जिस ने भी उन की हत्या की खबर सुनी, दौड़ेभागे उन के आवास पहुंच गए.

मौके से पुलिस को मृतका के मोबाइल के अलावा कुछ नहीं मिला. वह भी स्विच्ड औफ था. घर की अलमारी खुली हुई थी. अलमारी के अंदर सामान तितरबितर था. देखने से ऐसा नहीं लग रहा था कि हत्या लूट की वजह से हुई हो.

अगर लूट की वजह से घटना घटी होती तो मृतका और लुटेरों के बीच संघर्ष के निशान जरूर मिलते, लेकिन मौके से संघर्ष के कोई निशान नहीं मिले थे. इस में पुलिस को कहानी कुछ और ही नजर आई.

पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई पूरी कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दी. थाने पहुंच कर थानाप्रभारी रविंद्र यादव ने रामेश्वर सूर्यवंशी की तहरीर पर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर आगे की काररवाई शुरू कर दी.

मृतका की बेटी रिया से पुलिस ने किसी पर शक होने की बात पूछी तो उस ने अपने पापा के पुराने दोस्त और पड़ोसी रामेश्वर सूर्यवंशी पर ही मां की हत्या का आरोप लगा दिया.

जबकि रिया के फोन करने पर रामेश्वर ही सब से पहले उस के घर पहुंचे थे और उन्होंने ही चंदना की हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराई थी. लेकिन जब मृतका की बेटी ने उन पर ही शक जताया तो रिया के बयान के आधार पर पुलिस रामेश्वर सूर्यवंशी को हिरासत में ले कर पूछताछ के लिए थाने ले आई.

पुलिस पूरी रात सूर्यवंशी से पूछताछ करती रही लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. जब हत्या में उन की कोई भूमिका सामने नहीं आई तो पुलिस ने उन्हें कुछ हिदायत दे कर इस शर्त पर छोड़ दिया कि दोबारा बुलाए जाने पर थाने आना होगा.

अगले दिन चंदना की पोस्टमार्टम रिपोर्ट थानाप्रभारी रविंद्र यादव के पास आ गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला दबाने और नशीली दवा खिलाने की बात लिखी थी. इसलिए मृतका का विसरा सुरक्षित रख लिया गया.

मतलब साफ था कि सचिव की हत्या लूट के लिए नहीं, बल्कि किसी और वजह से की गई थी. हत्या की वजह क्या हो सकती है, यह जांच का विषय था.

पुलिस को भटकाने के लिए हत्यारों ने हत्या जैसे जघन्य अपराध को लूट की ओर ले जाने की कोशिश की थी. पुलिस का शक मृतका के करीबियों पर बढ़ गया था. पुलिस ने रिया से दोबारा पूछताछ की तो इस बार उस का बयान बदल गया. रिया के बदले बयान ने उसे शक के घेरे में खड़ा किया.

शक के आधार पर पुलिस ने रिया को निशाने पर ले लिया और उस के फोन नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया. यही नहीं, पुलिस ने गोपनीय तरीके से उस की छानबीन भी शुरू कर दी थी.

कथा में रिया परिवर्तित नाम है. कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बेटी की सनक

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें