Smartphone Buying Tips: मोबाइल फोन खरीदते समय 6 बातों का रखें ध्यान

Smartphone Buying Tips: मोबाइल फोन आज के समय में हर इंसान की जरूरत बन चुका है. हम लोग मोबाइल फोम पर इस कदर डीपेंड हो चुके हैं कि बिना मोबाइल के ना तो हम अपने घर के बाहर तक नहीं निकल पाते. आजकल हर चीज हमारे फोन से बस एक क्लिक में हो जाती है फिर चाहे किसी को पैसे भेजने हों या फिर किसी अनजान जगह का रास्ता पता करना हो.

अगर आप नया फोन खरीदने जा रहे हैं तो इन बातों का ध्यान रखें –

1. बजट करें सेट

सबसे पहली बात आपको बिना आवश्यकता के महंगे मोबाइल फोन के चक्करों में नहीं पड़ना चाहिए. आज के समय में मार्केट में 5 हजार रुपए के फोन से लेकर 2 लाख तक के फोन मिल रहे हैं तो सबसे पहले हमें अपनी जरूरत के हिसाब से एक बजट सेट करना चाहिए. किसी को दिखाने के लिए या किसी के बहकावे में आकर महंगा फोन लेने से बचें. दूसरा किसी से उधार लेकर भी मोबाइल फोन खरीदना भी सही नहीं है. बेहतर होगा कि अपनी बजट को ध्यान में रख कर मोबाइल फोन की वैराइटीज देखें.

2. कंपनी की मार्केट वैल्यू हो अच्छी

एक अच्छी कंपनी का फोन लेना चाहिए जिसकी मार्केट वैल्यू अच्छी हो और आपको गारंटी या वौरंटी मिले. बिना गारंटी और वौरंटी वाला फोन लेना आज के समय में बेवकूफी है क्योंकि ऐसे फोन ज्यादा ड्यूरेबल नहीं होते हैं, उल्टा आपके पैसे भी बरबाद करते हैं.

3. रैम और स्टोरेज का रखें खयाल

आपको रैम और स्टोरेज का भी खास खयाल रखना होगा और यह आपकी जरूरत पर निर्भर करता है. कम रैम वाले स्मार्टफोन बहुत जल्दी हैंग होने लगते हैं और स्लो भी हो जाते हैं. आपको स्टोरेज को भी ध्यान में रखना है कि आपको कितनी स्टोरेज की जरूरत है. मार्केट में 64, 128, 256, 512 जीबी से लेकर 1 टीबी तक की स्टोरेज वाले स्मार्टफोन उपलब्ध हैं तो इसका खास खयाल रखें.

4. सौफ्टवेयर और प्रोसेसर को ना करें इग्नोर

जब भी आप स्मार्टफोन खरीदने जाएं तो शौपकीपर से एक बात जरूर पूछें कि यह कंपनी कितने साल के सौफ्टवेयर अपडेट्स प्रोवाइड कर रही है. ज्यादा सोफ्टवेयर अपडेट्स आपके फोन को ज्यादा समय तक चलने में मदद कर सकते हैं. साथ ही प्रोसेसर का भी ध्यान रखें कि अच्छे प्रोसेसर वाले फोन आपको स्मूद एक्सपीरियंस देंगे.

5. कैमरा क्वालिटी भी है जरूरी

अगर आप फोटो खींचने या वीडियो बनाने के शौकीन हैं तो कैमरा क्वालिटी को लेकर ज्यादा ध्यान दें कि फोन की कैमरा क्वालिटी कैसी है और कितने मेगापिक्सल्स का कैमरा लगा हुआ है. आजकल सैल्फी कैमरे को लोग ज्यादा यूज करते हैं तो फोन का सैल्फी कैमरा भी अच्छा होना चाहिए.

6. बैटरी बैकअप का रखें ध्यान

लास्ट बट नौट द लीस्ट, आपको फोन के बैटरी बैकअप के बारे में भी पता होना चाहिए कि फोन में कितने एमएएच की बैटरी है. ज्यादा एमएएच वाली बैट्री आपको ज्यादा बैकअप प्रोवाइड करेगी और वहीं अगर कम एमएएच वाली बैट्री है तो आपको अपना फोन बार बार चार्जिंग पर लगाना पड़ सकता है.

मोबाइल फोन खरीदना एक बड़ा इंवेंस्टमेंट हो सकता है, इसलिए जल्दबाजी में फैसला न लें. अपनी जरूरत और उपयोग के अनुसार फोन को चुनें. Smartphone Buying Tips

Story In Hindi: उपहार – कौन थी क्षमा जिस ने रविकांत के जीवन में बहार ला दी   

Story In Hindi: अपने पहले एकतरफा प्रेम का प्रतिकार रविकांत केवल ‘न’ मेें ही पा सका. उस की कांती तो मां-बाप के ढूंढ़े हुए लड़के आशुतोष के साथ विवाह कर जरमनी चली गई. वह बिखर गया. विवाह न करने की ठान ली. मांबाप अपने बेटे को कहते समझाते 4 साल के अंदर दिवंगत हो गए.

कांती के साथ कौलेज में बिताए हुए दिनों की यादें भुलाए नहीं भूलती थीं. यह जानते हुए भी कि वह निर्मोही किसी और की हो कर दूर चली गई है वह अपने मन को उस से दूर नहीं कर पा रहा था. कालिज की 4 सालों की दोस्ती मेें वह उसे अपना दिल दे बैठा था. कई बार कोशिश करने के बाद रविकांत ने बड़ी कठिनाई से सकुचाते झिझकते एक दिन कांती से कहा था, ‘मैं तुम से प्रेम करने लगा हूं और तुम्हें अपनी जीवनसंगिनी के रूप में पा कर अपने को धन्य समझूंगा.’

जवाब में कांती ने कहा था, ‘रवि, मैं तुम्हें एक अच्छा दोस्त मानती हूं और इसी नाते से मैं तुम से मिलती जुलती रही. मैं तुम से उस तरह का प्रेम नहीं करती हूं कि मैं तुम्हारी जीवनसंगिनी बनूं. रही विवाह की बात, तो मैं तुम्हें यह भी बता देती हूं कि मैं शादी तो अपने मां-बाप की मर्जी और उन के ढूंढ़े हुए लड़के से ही करूंगी. अब चूंकि तुम्हारे विचार मेरे प्रति दोस्ती से बढ़ कर दूसरा रुख ले रहे हैं, इसलिए मेरा अनुरोध है कि तुम भविष्य में मुझ से मिलना-जुलना छोड़ दो और हम दोनों की दोस्ती को यहीं खत्म समझो.’

उस के बाद कांती फिर कभी रविकांत से नहीं मिली. रविकांत भी यह साहस नहीं कर सका कि उस के मातापिता से मिल कर कांती का हाथ उन से मांगता क्योेंकि उस आखिरी मुलाकात  के दिन उसे कांती की आंखों में प्यार तो दूर सहानुभूति तक नजर नहीं आई थी.

रविकांत ने खुद को प्रेम में असफल समझ कर जिंदगी को बेमानी, बेकार और बेरौनक मान लिया. ऐसे में अधिकतर लोग कठिनाइयों और असफलताओं से घबरा कर खुद को कमजोर समझ अपना आत्मविश्वास और उत्साह खो बैठते हैं.

रविकांत अब 50 पार कर चुके हैं. उन के कनपटी के बाल सफेद हो चुके हैं. आंखों पर चश्मा लग गया  है. इतने सालों तक एक ही कंपनी की सेवा में पूरी निष्ठा से लगे रहे तो अब वह जनरल मैनेजर बन गए हैं.

कंपनी से मिले हुए उन के फ्लैट के सामने वाले फ्लैट में कुछ दिन पहले ही शोभना नाम की एक महिला अपनी 24 साल की बेटी क्षमा के साथ किराए पर रहने के लिए आई.

क्षमा अपनी मां की ही तरह अत्यंत सुंदर और हंसमुख लड़की थी. वह जब भी रविकांत के सामने पड़ती ‘अंकल नमस्ते’ कहना और उन्हें एक मुसकराहट देना कभी नहीं भूलती. रविकांत भी ‘हैलो, कैसी हो बेटी’ कहते और उस के उत्तर में वह ‘थैंक यू’ कहती. क्षमा एम.एससी. कर के 2 वर्ष का कंप्यूटर कोर्स कर रही थी. इधर कई दिनों से रविकांत को न देख कर उस ने उन के नौकर से पूछा तो पता चला कि वह तो कई दिनों से बीमार हैं और नर्सिंग होम में भरती हैं. नौकर से नर्सिंग होम का पता पूछ कर क्षमा उसी शाम उन से मिलने नर्सिंग होम पहुंची.

क्षमा को देख कर रविकांत बेहद खुश हुए पर क्षमा ने पहले तो इस बात का गुस्सा दिखाया कि इतने दिनों से बीमार होने पर भी उन्होंने उसे खबर क्यों नहीं दी. वह तो हमेशा की तरह यही सोचती रही कि आप कहीं ‘टूर’ पर गए होंगे. क्षमा की झिड़की वह चुपचाप सुनते रहे. मन में उन्हें अच्छा लगा. क्षमा काफी देर तक उन के पास बैठी उन का हालचाल पूछती रही.

रविकांत ने जब बताया कि अब वह ठीक हैं और कुछ ही दिनों में उन्हें नर्सिंग होम से छुट्टी मिल जाएगी तभी उस की प्रश्नावली रुकी. घर वापस लौटते समय वह उन्हें जल्दी से अच्छे होने की शुभकामना देना नहीं भूली.

क्षमा अब रोज शाम को रविकांत को देखने नर्सिंग होम जाती. रविकांत का भी मन बहल जाता था. वह बड़ी बेसब्री से उस के आने की प्रतीक्षा करते. उस के आने पर वे दोनों विभिन्न विषयों पर बहस करते और हंसते हुए बातचीत करते रहते. 2 घंटे कितनी जल्दी गुजर जाते पता ही नहीं लगता.

जिस दिन रविकांत को नर्सिंग होम से छुट्टी मिली, क्षमा उन्हें अपने साथ ले कर उन के फ्लैट पर आई. अगले दिन रविकांत अपनी ड्यूटी पर जाने लगे तो क्षमा ने यह कह कर जाने नहीं दिया कि आप आज आराम करें और फिर कल तरोताजा हो कर काम पर जाएं.

अगले दिन शाम को जब रविकांत देर से वापस लौटे तो उन के आने की आहट सुन उस ने दरवाजा खोला. नमस्ते की. साथ ही देर करने का उलाहना भी दिया.

सप्ताह में 1-2 बार क्षमा उन के बुलाने पर या खुद ही उन के फ्लैट में जा कर घंटे डेढ़ घंटे गप लड़ाती, नौकर थोड़ी देर में चाय दे जाता. चाय की चुस्कियां लेते हुए वह अपनी बातें चालू रखते जो अकसर अन्य विषयों से सिमट कर अब कालिज, आफिस, घरेलू और निजी बातों पर आ जाती थीं.

क्षमा ने एक दिन पूछ ही लिया, ‘‘अंकल, आप अकेले क्यों हैं? आप ने शादी क्यों नहीं की? आप को साथी की कमी महसूस नहीं होती क्या? आप को अकेले घर काटने को नहीं दौड़ता? नौकर के हाथ का खाना खातेखाते आप का जी नहीं ऊबता?’’

रविकांत ने अपने पिछले प्रेम का जिक्र करते हुए कहा, ‘‘क्षमा, हम सब नियति के हाथों की कठपुतली हैं जिसे वह जैसा चाहती है नचाती है. अकेलापन तो मुझे भी बहुत काटता है पर मैं अपने आप को आफिस के काम में व्यस्त रख उसे भगाए रहता हूं. मुझे खुशी है कि अब मेरा कुछ समय तुम्हारे साथ हंसते-बोलते कट जाता है. तुम्हारे साथ बिताए ये क्षण मुझे अब भाने लगे हैं.’’

रविकांत की बीमारी को धीरे-धीरे 1 वर्ष हो गया. इस बीच क्षमा ने अपनी मां से पूछ रविकांत को करीब-करीब हर माह 1-2 बार खाने पर बुलाया. रविकांत शोभनाजी से मिलने पर क्षमा की बड़ी प्रशंसा करते. उन की थोड़ीबहुत औपचारिक बातें भी होतीं. जिस दिन रविकांत खाने पर आने को होते उस दिन क्षमा बड़े उत्साह से घर ठीक करने और खाना बनाने में मां के साथ लग जाती. वह अकसर मां से रविकांत के गुणों और विशेषताओं पर चर्चा करती रहती. वे हांहूं कर उस की बातें सुनती रहतीं.

बेटी और पड़ोसी रविकांत की बढ़ती दोस्ती और मिलनाजुलना कुछ महीनों से शोभना के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा था. क्षमा से इस बारे में कुछ न कह उन्होंने उस के विवाह के लिए प्रयत्न जोरों से शुरू कर दिए. उन की सहेली रमा का बेटा रौनक इन दिनों आस्ट्रेलिया से कुछ दिनों के लिए भारत आया हुआ था. क्षमा भी उस से बपचन से परिचित थी. शोभना ने रमा को क्षमा और रौनक के विवाह का सुझाव दिया तो वह अगले दिन शाम को अपने पति देवनाथ और बेटे रौनक के साथ मिलने आ गईं. शोभना और रमा के बीच कोई औपचारिकता तो थी नहीं सो उस ने उन्हें खाने के लिए रोक लिया.

भोजन के समय रमा ने सब के सामने क्षमा से सीधा प्रश्न कर दिया, ‘‘क्षमा बेटी, मेरा बेटा रौनक तुम्हें बचपन से पसंद करता है. यदि तुम्हें भी रौनक पसंद है तो तुम दोनों के विवाह से तुम्हारी मां और हमें बहुत खुशी होगी.’’

क्षमा पहले तो चुप रही पर रमा के बारबार आग्रह पर उस ने कहा, ‘‘आंटी, आप लोग हमारे बड़े हैं. मां जैसा कहेंगी मुझे मान्य होगा.’’

शोभना ने कहा, ‘‘क्षमा, रौनक सब प्रकार से तुम्हारे लिए उपयुक्त वर है. हमारे परिवारों के बीच संबंध भी मधुर हैं, इसलिए मैं चाहूंगी कि तुम और रौनक दोनों खाना खत्म करने के बाद बाहर लान में एकसाथ बैठ कर आपस में सलाह कर लो.’’

आपस में बातें कर के जब वे लौटे तो दोनों को खुश देख कर शोभना ने क्षमा को अंदर कमरे में ले जा कर उस से कहा, ‘‘तो फिर मैं बात पक्की कर दूं?’’

क्षमा के सकुचाते हुए स्वीकृति में सिर हिलाते ही उन्होंने उस के माथे को चूम कर उसे आशीर्वाद दिया. वे दोनों मांबेटी तब डाइंगरूम में आ गईं. शगुन के रूप में शोभना ने 1 हजार रुपए रौनक के हाथ में रख दोनों को आशीर्वाद दिया और रमा से लिपट उसे और उस के पति को बधाई दी. रौनक के आस्ट्रेलिया लौटने से पहले ही विवाह संपन्न करने की बात भी अभिभावकों के बीच हो गई.

क्षमा, शोभना और उस के पति का पासपोर्ट जापान, हांगकांग और आस्ट्रेलिया घूमने जाने के लिए पहले से ही बना हुआ था पर 3 वर्ष पहले क्षमा के पिता की अचानक मृत्यु हो जाने से वह प्रोग्राम कैंसिल हो गया था. यदि इस बीच क्षमा का वीसा बन गया तो वह भी रौनक के साथ आस्ट्रेलिया चली जाएगी नहीं तो रौनक 6 महीने बाद आ कर उसे ले जाएगा.

अगली शाम रविकांत से मिलने पर क्षमा ने उन्हें अपनी शादी के बारे में जब बताया तो उन्हें चुप और गंभीर देख वह बोली, ‘‘ऐसा लगता है अंकल कि आप को मेरे विवाह की बात सुन कर खुशी नहीं हुई.’’

रविकांत बोले, ‘‘तुम चली जाओगी तो मैं फिर अकेला हो जाऊंगा. मैं तो इन कुछ महीनों में ही तुम्हें अपने बहुत नजदीक समझने लगा था. पर यह तो मेरा स्वार्थ ही होगा, यदि मैं तुम्हारे विवाह से खुश न होऊं. मैं तो वर्षों से अकेले रहने का आदी हो गया हूं. मेरी बधाई स्वीकार करो.’’

क्षमा इठलाते हुए बोली, ‘‘ऐसे नहीं, मैं तो आप से बहुत बड़ा उपहार भी लूंगी, तभी आप की बधाई स्वीकार करूंगी.’’ रविकांत ने कहा, ‘‘तुम जो भी चाहोगी, मैं तुम्हें दूंगा. तुम कहो तो, तुम क्या लेना चाहोगी. अपनी इतनी अच्छी प्रिय दोस्त के लिए क्या मैं इतना भी नहीं कर सकूंगा.’’

‘‘पहले वादा कीजिए कि आप मना नहीं करेंगे.’’

‘‘अरे, मना क्योें करूंगा. लो, वादा भी करता हूं.’’

क्षमा बोली, ‘‘अंकल, मेरे सामने एक बड़ी समस्या है मेरी मां, जिन्होंने मेरे लिए इतना कुछ किया है, मैं उन्हें अकेली छोड़ विदेश चली जाऊं, ऐसा मेरा मन नहीं मानता. मैं चाहती हूं कि आप और मेरी मां, जो खुद भी एकाकी जीवन जी रही हैं, विवाह कर लें. आप दोनों को साथी मिल जाएगा. मैं मां को मना लूंगी. बस, आप हां कर दें.’’

रविकांत चुप रहे. कुछ देर के बाद क्षमा ने फिर कहा, ‘‘ठीक है, यदि आप तैयार नहीं हैं तो मैं अपने विवाह के लिए मना कर देती हूं. देखिए, मेरा विवाह अभी तय हुआ है, हुआ तो नहीं. मैं ने गलत सोचा था कि आप मेरे बहुत निकट हैं और मेरी भलाई के लिए मेरी भावनाओं को समझते हुए आप अपना दिया हुआ वादा निभाएंगे,’’ कहतेकहते क्षमा का गला रुंध गया.

रविकांत अपनी जगह से उठे. उन्होंने क्षमा के सिर पर हाथ रखा और उस के आंसू पोंछते हुए बोले, ‘‘मैं अपनी बेटी की खुशी के लिए सबकुछ करूंगा. मैं तुम्हारे सुझाव से सहमत हूं.’’

क्षमा खुशी से उछल पड़ी और उन के गले से लिपट गई. क्षमा ने अपनी शादी से पहले उन दोनों के विवाह कर लेने की जिद पकड़ ली ताकि वे दोनों संयुक्त रूप से उस का कन्यादान कर सकें.

अगले सप्ताह ही रविकांत और शोभना का विवाह बड़े सादे ढंग से संपन्न हुआ और उस के 5 दिन बाद रौनक और क्षमा की शादी बड़ी धूमधाम से हुई. Story In Hindi

Hindi Story: सुलझे लोग – शिशिर आजीवन अविवाहित क्यों रहना चाहता था

Hindi Story: सड़क दुर्घटना में हुई मिहिर की आकस्मिक मृत्यु ने सपना के परिवार को बुरी तरह झकझोर दिया था. सब से ज्यादा फिक्र सब लोगों को सपना को ले कर थी. बी.ए. की परीक्षा के तुरंत बाद सपना की सास ने सपना को एक शादी में देख कर अपने बेटे के लिए पसंद कर लिया था और शादी के लिए जल्दी मचा दी थी. सपना के घर वालों ने कहा भी था कि सपना को कोई प्रोफैशनल कोर्स कर लेने दें लेकिन उस की सास ने बड़े दर्प से कहा था, ‘‘हमारे घर की बहू को कभी नौकरी नहीं करनी पड़ेगी. मिहिर सरकारी प्रतिष्ठान में इंजीनियर है, अच्छी तनख्वाह पाता है. घरपरिवार की उस पर कोई जिम्मेदारी नहीं है. वकील बाप ने बढि़या कोठी बनवा ही दी है, इतना कैश भी छोड़ ही जाएंगे कि दोनों बेटे अपने बच्चों को अच्छा भविष्य दे सकें.’’

उन की बात गलत भी नहीं थी. सपना मिहिर के साथ बहुत खुश थी, पैसे की तो खैर, कमी थी ही नहीं. लेकिन शादी के 7 साल ही के बाद मिहिर उसे 2 बच्चों के साथ यों छोड़ कर चला जाएगा, यह किसी ने नहीं सोचा था. वैसे सपना के सासससुर का व्यवहार उस के साथ बहुत स्नेहपूर्ण और संवेदनशील था. सपना के भाई और पिता आश्वस्त थे कि उस का देवर और सासससुर उस का और बच्चों का पूरा खयाल रखेंगे, मगर सपना की चाची का कहना था कि यह सब मुंह देखी बातें हैं. हम लोगों को अभी सब बातें साफ कर लेनी चाहिए और उठावनी होते ही उन्होंने सपना की मां से कहा कि वह उस की सास से पूछें कि सपना अब कहां रहेगी?

‘‘हमारे साथ दिल्ली में रहेगी, बच्चों की छुट्टियों में आप लोगों के पास मेरठ आ जाया करेगी. मिहिर की बरसी के बाद उस के लिए उपयुक्त घरवर देखना शुरू करेंगे,’’ सास का स्वर कोशिश करने के बावजूद भी भर्रा गया.

‘‘आजकल कुंआरी लड़कियों के लिए तो उपयुक्त घरवर मिलते नहीं, बहनजी, सपना बेचारी के तो 2 बच्चे हैं,’’ चाची बोलीं.

‘‘मनोयोग से चेष्टा करने पर सब मिल जाता है, बहनजी. कोई न कोई विकल्प तो तलाशना ही होगा, क्योंकि सपना को हम ने न तो कभी बेचारी कहलवाना है, न ही उसे एक बेवा की निरीह और बोसीदा जिंदगी जीने देना है,’’ उस की सास ने दृढ़ स्वर में कहा और सपना की मां की ओर मुड़ीं, ‘‘फिलहाल तो हमें यह सोचना है कि अभी सपना के पास कौन रहेगा, आप या मैं? खैर, कोई जल्दी नहीं है, रिश्तेदारों के जाने के बाद तय कर लेंगे.’’

सब ने यही मुनासिब समझा कि सपना की मां उस के साथ रहे. सपना का देवर शिशिर नागपुर के एक कालेज में व्याख्याता था. वह हर दूसरे सप्ताहांत में आ जाता था. उस के आने से बच्चे तो खुश होते ही थे, सपना भी उस की पसंद का खाना बनाने में रुचि लेती थी. देवरभाभी में थोड़ी नोकझोंक भी हो जाती थी. शिशिर उम्र में सपना से कुछ महीने बड़ा था. कहता तो भाभी ही था लेकिन व्यवहार दोस्ती का था.

‘‘तुम्हारे आने से सब का दिल बहल जाता है, शिशिर, लेकिन तुम्हारी छुट्टियां खराब हो जाती हैं,’’ सपना की मां ने कहा.‘‘यहां आ कर मेरी छुट्टियां भी मजे से गुजर जाती हैं, मांजी. वहां छुट्टी के दिन सोने या पढ़ने के सिवा कुछ नहीं करता.’’‘‘दोस्तों के साथ समय नहीं गुजारते?’’

‘‘दोस्त हैं ही नहीं. पीएच.डी. करने के दौरान खानेसोने का समय ही नहीं मिला. जो दोस्त थे उन से भी संपर्क नहीं रहा और लड़कियां तो मांजी मुझ जैसे पुस्तक प्रेमी की ओर देखतीं भी नहीं,’’ शिशिर हंसा.

‘‘अब तो पीएच.डी. कर ली है, इसलिए दोस्त बनाओ.’’‘‘बनाऊंगा मांजी, मगर दिल्ली जा कर. मैं बंटीबन्नी के साथ रहने के लिए दिल्ली में नौकरी की कोशिश कर रहा हूं, उम्मीद है जल्दी ही मिल जाएगी,’’ शिशिर ने बताया.बच्चों की परीक्षा होने तक सपना भी संभल चुकी थी और बड़ी शांति से अपनी गृहस्थी को समेट रही थी. शिशिर को भी दिल्ली में नौकरी मिल गई थी. जब सपना की मां मेरठ लौट कर आई तो वह सपना की ओर से पूर्णतया निश्चिंत थी. सब के पूछने पर उस ने बताया, ‘‘मिहिर को तो वे वापस नहीं ला सकते, मगर ससुराल वाले बहुत सुलझे हुए लोग हैं और इसी कोशिश में रहते हैं कि सपना को हर तरह सुखी रखें. देवर ने भी बच्चों के साथ रहने की खातिर दिल्ली में नौकरी ढूंढ़ ली है.’’

‘‘बच्चों के साथ रहने को या यह देखने को कि कहीं सारी कोठी पर सपना का कब्जा न हो जाए,’’ चाची ने मुंह बिचकाया.‘‘चलो, इसीलिए सही, पर उस के रहने से हमारी बेटी और बच्चों का मन तो बहला रहेगा,’’ मां ने कहा.

‘‘तब तक जब तक उस की शादी नहीं होती. अपना घरसंसार बसाने के बाद कौन भाई के उजड़े चमन को सींचने आता है. मेरी मानो, तुम उन लोगों की बातों में न आ कर सपना के सासससुर से कहो कि वे उसे कोई अच्छा सा बिजनेस करा दें. उस का दिल भी लगा रहेगा और निजी आमदनी भी हो जाएगी,’’ चाची ने सलाह दी.

‘‘मगर सपना को तो बिजनेस का क ख ग भी नहीं मालूम,’’ मां ने कहा.‘‘सपना को न सही, जतिन को तो मालूम है. एम.बी.ए. कर रहा है, बहन की मदद करने को नौकरी के बजाय उस के साथ काम कर लेगा,’’ चाची बोलीं.

एक बार मेरठ आने पर जब वह सब को बता रही थी कि उसे आशंका थी कि भोपाल में पलेबढ़े बच्चे दिल्ली के बच्चों के साथ शायद न चल सकें, मगर बंटी और बन्नी ने तो बड़ी आसानी से नए परिवेश को अपना लिया है तो चाची ने पूछा, ‘‘लेकिन इन्हें संवारने के चक्कर में तुम ने अपने लिए भी कुछ सोचा है या नहीं?’’‘‘मेरा सर्वस्व या जीवन तो अब ये बच्चे ही हैं, चाची. इन का भविष्य संवारने के अलावा मुझे और क्या सोचना है?’’

इस से पहले कि चाची कुछ और बोलती, बच्चों ने आ कर कहा कि वे वापस दिल्ली जाना चाहते हैं. चाची की वजह पूछने पर बोले, ‘‘यहां हमारा दिल नहीं लग रहा. दिल्ली में तो चाचा के साथ छुट्टी के रोज सुबह घुड़सवारी करने जाते हैं और टैनिस तो रोज ही शाम को खेलते हैं. हम ने चाचा को भी फोन किया था. उन का भी दिल नहीं लग रहा. कहते थे, मम्मी से पूछ लो, अगर वे कहती हैं, तो मैं अभी लेने आ जाता हूं, आप क्या कहती हैं, मम्मी?’’

‘‘तुम्हें और तुम्हारे चाचा को उदास तो कर नहीं सकती. इसलिए चलो, ड्राइवर से कहो, हमें छोड़ आएगा.’’लेकिन तब तक बन्नी ने शिशिर को आने के लिए फोन कर दिया. शिशिर के आने से बच्चे बहुत खुश हुए.‘‘बाप की कमी महसूस नहीं होने देता बच्चों को,’’ सब के जाने के बाद सपना के पिता ने कहा.

‘‘जब तक अपनी शादी नहीं हो जाती, भाई साहब. हमें शिशिर की शादी अपने परिवार की लड़की से करवानी चाहिए ताकि अगर वह सपना को कुछ तकलीफ दे तो हम उस की लगाम तो कस सकें,’’ चाची बोलीं.‘‘मगर अपने परिवार में लड़कियां हैं ही कहां?’’‘‘मेरे पीहर में हैं. मैं देखती हूं,’’ चाची ने बड़े इतमीनान से कहा.मिहिर की बरसी के कुछ दिन बाद ही चाची अपनी भांजी का रिश्ता शिशिर के लिए ले कर सपना की ससुराल पहुंच गईं.

‘‘अब घर में कुछ खुशी भी आनी चाहिए.’’‘‘जरूर आएगी, बहनजी, लेकिन पहले सपना की जिंदगी में,’’ सपना की सास ने कहा, ‘‘उसे व्यवस्थित करने के बाद ही हम शिशिर के बारे में सोचेंगे.’’‘‘व्यवस्थित करने वाली बात आप सही कह रही हैं. सपना को कोई बिजनेस करा दीजिए. मेरे बेटे ने अभी एम.बी.ए. किया है, वह सपना के अनुकूल अच्छा प्रोजैक्ट सुझा सकता है,’’ चाची उत्साह से बोलीं.

‘‘सपना को रोजीरोटी कमाने की कोई मुसीबत नहीं है. मिहिर ही उस के लिए बहुत कुछ छोड़ गया है और ससुर भी बहुत कमा रहे हैं. लेकिन जीने के लिए पैसा ही सब कुछ नहीं होता. मैं ने पहले भी कहा था कि हम लोग सपना को बेवा की बोसीदा जिंदगीज्यादा दिन तक नहीं जीने देंगे. आप लोगों को उस की फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं है,’’ न चाहते हुए भी सपना की सास का स्वर तल्ख हो गया था.

‘‘मगर सपना ने तो बच्चों को अपना सर्वस्व बना लिया है. वह उन की जिम्मेदारी किसी अनजान आदमी से बांटने या शादी करने को तैयार नहीं होगी.’’सपना की सास कुछ सोचने लगी, ‘‘कहती तो आप सही हैं. फिर भी सपना को अब मैं ज्यादा रोज तक उदास या सादे लिबास में नहीं देख सकती. कोई न कोई विकल्प तो खोजना ही होगा,’’ उस ने दृढ़ स्वर में कहा.

चाची ने उस की ओर देखा. हमेशा ठसके से सजीसंवरी रहने वाली सपना की सास सादी सी शिफौन की साड़ी पहने थी.‘अगर बहू बेवा की वेशभूषा में रही तो तुम्हार सिंगारपिटार कैसे होगा, महारानी,’ चाची ने विद्रूपता से सोचा.अगले सप्ताहांत सपना के ससुर ने सपना के पिता को फोन किया कि वे उन लोगों से कुछ विचारविमर्श करना चाहते हैं, इसलिए क्या वह सपरिवार दिल्ली आ सकते हैं?

‘‘मुझे पता है क्या विचारविमर्श करेंगे,’’ चाची ने हाथ नचा कर कहा, ‘‘सपना शादी के लिए तैयार नहीं हो रही होगी, इसलिए चाहते होंगे कि हम उसे अपने पास रख लें ताकि उस की सास फिर सजसंवर सके.’’‘‘सपना की ससुराल वाले बड़े सुलझे हुए लोग हैं, वे ऐसा सोच भी नहीं सकते. हमें उन की बात सुनने से पहले न अटकल लगानी है, न सलाह देनी है,’’ सपना के पिता ने कहा.

शिशिर और सपना के सासससुर तो सामान्य लग रहे थे, मगर सपना कुछ अनमनी सी थी.‘‘जैसा कि मैं ने आप को पहले बताया था, हम लोग सपना का पूर्ण विवाह करना चाहते हैं,’’ सपना की सास ने कहते हुए चाची की ओर देखा.‘‘और इन्होंने ठीक सोचा था कि सपना अपने बच्चों की जिम्मेदारी किसी और के साथ बांटने को तैयार नहीं होगी. सपना ही नहीं, शिशिर भी बन्नीबंटी की जिम्मेदारी किसी गैर को सौंपने को तैयार नहीं है.’’

‘‘शिशिर का कहना है कि वह आजीवन उन्हें संभालेगा और अविवाहित रहेगा, क्योंकि बीवी को उस का दिवंगत भाई के बच्चों पर जान छिड़कना पसंद नहीं आएगा,’’ सपना के ससुर बोले, ‘‘मैं भी उस के विचारों से सहमत हूं, क्योंकि एक अतिरिक्त परिवार की जिम्मेदारी संभालने वाले व्यक्ति का अपना विवाहित जीवन तो कदापि सुखद नहीं हो सकता, वैसे भी शिशिर को लड़कियों या शादी में कोई दिलचस्पी नहीं है.’’

‘‘मगर शादी से एतराज भी नहीं है, अगर सपना से हो तो,’’ सपना की सास ने कहा. ‘‘दोनों ही बच्चों को किसी तीसरे से बांटना नहीं चाहते और उन की परवरिश में जिंदगी गुजारने को कटिबद्ध हैं. जब तक बच्चे छोटे हैं तब तक तो ठीक है, मगर जब ये समझने लायक होंगे कि लोग उन की मां और चाचा को ले कर क्या कहते हैं, तब सोचिए, उन पर क्या बीतेगी? वैसे लोग तो कहेंगे ही, उन का मुंह बंद करने का तो एक ही तरीका है, शिशिर और सपना की शादी. मगर उस के लिए सपना नहीं मान रही.’’

‘‘मगर क्यों? शिशिर में कोई कमी तो है नहीं,’’ सपना की मां ने कहा.‘‘इसीलिए तो मैं उस से शादी नहींकरना चाहती, मां. उसे एक से बढि़या एक कुंआरी लड़की मिल सकती है, तो फिर वह 2 बच्चों की मां से शादी क्यों करे?’’ सपना ने पूछा.‘‘इसलिए सपना कि वे दोनों बच्चे मेरी जिंदगी का अभिन्न अंग हैं, जिन्हें सिर्फ तुम स्वीकार कर सकती हो, कोई कुंआरी लड़की नहीं,’’ शिशिर ने किसी के बोलने से पहले कहा.

‘‘एक बात और सपना, मैं किसी मजबूरी या दयावश तुम से शादी नहीं कर रहा बल्कि इसलिए कि जब शादी करनी ही है तो किसी अनजान लड़की के बजाय जानीपहचानी तुम बेहतर रहोगी. तुम्हें ले कर मेरे मन में कोई पूर्वाग्रह नहीं है, मैं ने तुम्हें भाभी जरूर कहा है लेकिन देखा एक दोस्त की नजर से ही है.’’

‘‘और दोस्त तो अकसर शादी कर लेते हैं,’’ सपना का भाई सुनील बोला.‘‘खुद हिम्मत न करें तो दोस्त बढ़ कर करवा देते हैं, यार,’’ शिशिर हंसा.‘‘तो तुम्हारी शादी हम करवा देते हैं,’’ सुनील भी हंसा.‘‘मगर सपना माने तब न. उसे बेकार का वहम यह भी है कि उसे सुहाग का सुख है ही नहीं, तभी मिहिर की असमय मृत्यु हो गई.’’

‘‘जब उस के घर वाले मान गए हैं तो सपना भी मान जाएगी,’’ सपना के ससुर बोले. ‘‘उस की यह शंका कि दूसरी शादी कर के वह मिहिर की यादों के साथ बेवफाई कर रही है, मैं दूर कर देता हूं. मिहिर तुम्हें बच्चों की जिम्मेदारी सौंप कर गया है, जो तुम अकेले तो निभा नहीं सकतीं. हम तुम्हारा पूर्ण विवाह करना तो चाहते थे लेकिन साथ ही यह सोच कर भी विह्वल हो जाते थे कि किसी अनजान आदमी को अपने मिहिर की निशानियां कैसे सौंपेंगे? लेकिन शिशिर के साथ ऐसी कोई परेशानी नहीं है. दूसरे, मिहिर की जितनी आयु थी वह उतनी जी कर मरा है. शिशिर की जितनी आयु है, वह तुम से शादी करे या न करे, उतनी ही जिएगा और कोई शंका या एतराज?’’

‘‘नहीं, पापाजी,’’ सपना ने सिर झुका कर कहा लेकिन उस के रक्तिम होते गाल बहुत कुछ कह गए.‘‘आप ठीक कहते थे, भाई साहब, सपना के ससुराल वाले बहुत सुलझे हुए लोग हैं,’’ चाची के स्वर में अपनी हार के बावजूद भी उल्लास था. Hindi Story

Story In Hindi: परफैक्ट बैलेंस – नेहा किस बात से कमजोर महसूस कर रही थी

Story In Hindi: ‘‘नेहा बहुत थक गया हूं, एक गरमगरम चाय का कप और प्याज के पकौड़े हो जाएं. जरा जल्दी डार्लिंग,’’ राज ने औफिस से आते ही सोफे पर फैलते हुए कहा.

फीकी सी मुसकान बिखेरते नेहा ने पति को पानी का गिलास दिया और फिर उस के पास ही बैठ गई. फिर थकी सी आवाज में बोली, ‘‘चाय और पकौड़े थोड़ी देर में तैयार करती हूं. आज जल्दीजल्दी नहीं हो सकेगा.’’

‘‘क्यों, सब ठीक तो है?’’ राज की आवाज में खिन्नता साफ थी.

‘‘पिछले कुछ दिनों से थोड़ी कमजोरी महसूस कर रही हूं. थकीथकी सी रहती हूं,’’ पति की खिन्नता को भांप कर नेहा ने अपनी बढ़ती कमजोरी को थोड़ी बातों में समेट दिया था. यही तो वह करती आ रही है कई सालों से. कोई भी समस्या हो वह यथासंभव स्वयं ही सुलझा लेती या फिर हलके से उसे राज के सामने रखती ताकि उसे किसी प्रकार का तनाव न हो. ऐसा करने में नेहा को बहुत खुशी मिलती.

‘‘ठीक है पकौड़े न सही चाय के साथ बिस्कुट तो दे सकती हो मेरी नाजुक रानी,’’ राज ताना मारने से नहीं चूका. फिर नेहा की कमजोरी वाली बात को अनसुना कर फ्रैश होने के लिए बाथरूम की ओर बढ़ गया.

नाजुक नेहा के मन रूपी दर्पण पर जैसे किसी ने पत्थर दे मारा हो. कब थी वह नाजुक. 15 सालों की गृहस्थी में उस ने हर छोटेबड़े काम को कुशलता से निभाया था. कब टपटप करता बिगड़ा नल ठीक हो गया, कब पंखा दोबारा चलने लगा, कब बाथरूम की दीवार से रिसता पानी बंद हो गया उस ने राज को पता ही नहीं लगने दिया. बच्चों की देखरेख, पढ़ाईलिखाई, बैंक का काम, कितने ही और घरबाहर से जुड़े काम वह चुपचाप सुचारु रूप से संपन्न करती आ रही थी.

इतना ही नहीं नेहा छोटी कक्षा के 8-10 बच्चों को घर पर ही ट्यूशन भी पढ़ा देती थी. ताकि घर की आमदनी में थोड़ीबहुत वृद्धि हो सके.

पति और अपने बच्चों को प्रसन्न रखने में ही उस ने खुद को भुला दिया था. राज जबजब उसे गुलाबो या झांसी की रानी कह कर छेड़ता तो वह फूली न समाती थी. यही तो उस का प्यारा सा संसार था. यही उस की मनचाही साधना. अपने शौक, अपनी चाहतें सब कुछ उस ने सहर्ष भुला दिए थे. इस बात का नेहा को कभी कोई मलाल नहीं था, कोई गिला नहीं था. पर आज उसे मलाल हुआ कि मेरी कमजोरी, मेरी तकलीफ राज की नजर में कुछ अर्थ नहीं रखती. खुद को ताक पर रख दिया, यही मुझ से गलती हुई.

विचारों की उठतीउफनती लहरों में नेहा ने जैसेतैसे चाय बनाई.

राज फ्रैश हो कर आ गया था. खोईखोई सी नेहा ने उस के सामने चाय और बिस्कुट रख दिए. बस एक रोबोट की तरह यंत्रवत. कहते हैं कि सूखी आंखों से भी आंसू गिरते हैं, पर उन्हें समझने या देखने वाले बिरले ही होते हैं.

‘‘क्या कमाल की चाय बनाई है मेरी गुलाबो ने,’’ चाय की चुसकियां लेते हुए राज ने घाव पर मरहम लगाने की असफल चेष्टा की.

‘गुलाबो, हूं… अब लगे हैं मेरी खुशामद करने. चाय, बिस्कुट मिल गए… मेरी कमजोरी गई भाड़ में. दिल रखने के लिए ही सही कुछ तो पूछते मेरी कमजोरी के बारे में. इन्हें क्या? गलती मेरी ही है जो कभी इन के सामने अपनी तकलीफ नहीं रखी… यही तो सजा मिली है,’ मन ही मन बुदबुदा कर नेहा ने अपनी खीज निकाली.

‘‘नीरू और उमेश कहां हैं?’’ राज के प्रश्न पर नेहा का ध्यान भंग हुआ.

‘‘ट्यूशन वाले बच्चों का कैसा चल रहा है?’’

‘‘अच्छा चल रहा है. उन्हें भी आजकल अधिक समय देना पड़ रहा है. परीक्षा जो नजदीक है,’’ अनमनी सी नेहा बोली.

हर पौधे की तरह मानव हृदय के कोमल पौधे को भी समयसमय पर प्रेमजल से सींचना  पड़ता है, सहृदयता एवं सहानुभूति की खाद को जड़ों में यदाकदा डालना पड़ता है अन्यथा पौधा मुरझा जाता है. विशेषकर नारी का संवेदनशील हृदय जो प्रेम की हलकी सी थाप से छलकछलक जाता है, किंतु अवहेलना की तनिक सी चोट पर मरुस्थल सा शुष्क बन जाता है.

‘‘वह तो है. परीक्षा आ रही है तो समय देना ही पड़ेगा. इतना तो शुक्र है कि घर बैठे ही कमा लेती हो. बाहर नौकरी करती तो आए दिन थक जाती… आनाजाना पड़ता तो पता चलता,’’ घायल मन पर राज ने फिर चोट की.

यह चोट नेहा के लिए असहनीय थी. बोली, ‘‘घर पर ही अंदरबाहर के हजारों काम होते हैं. ये काम आप को दिखते ही नहीं. सब कियाकराया जो मिल जाता है… इतने सालों की गृहस्थी में मैं ने आप पर किसी भी काम का कम से कम बोझ डाला है. इसीलिए मेरी थकान, मेरी कमजोरी आप को पच नहीं रही. आखिर बढ़ती उम्र है… शरीर हमेशा एकजैसा तो नहीं रहता… पर नहीं, मैं तो सदैव गुलाब की तरह खिली रहूं, तरोताजा रहूं… है न?’’ क्रोध और क्षोभ से नेहा की आंखें छलछला आईं.

‘‘अब यह भी क्या बात हुई नाराज होने की? तुम तो मेरी झांसी की रानी हो. कुछ भी कहो आज भी तुम मुझे पहले जैसी गुलाबो ही दिखती हो,’’ राज ने बढ़ती कड़वाहट में मिठास घोलनी चाही.

‘‘रहने दो अपने चोंचले. आप का चैक बैंक में जमा करा दिया था और इंश्योरैंस वाले को फोन कर दिया था,’’ नेहा ने मात्र सूचना दी.

‘‘यह हुई न बात. पढ़ीलिखी, मौडर्न बीवी का कितना सुख होता है. मौडर्न औरत वाकई चुस्त और दुरुस्त होती है.’’

‘‘मौडर्न औरत बेमतलब पिसतीघुटती नहीं है और न ही इतनी मूर्ख कि अपने वजूद को भुला दे चाहे कोई कद्र करे या न करे,’’ नेहा के स्वर तीखे हो चले थे.

‘‘तिल का ताड़ मत बनाओ नेहा. तुम ही एकमात्र स्त्री नहीं हो जो घर और बाहर संभाल रही है. इस बढ़ती महंगाई के युग में हर सजग स्त्री कुछ न कुछ कर के पैसा कमा रही है. घर और परिवार में बैलेंस आजकल की स्त्री को बखूबी आता है. तनिक सूझबूझ से सब हो जाता है,’’ राज ने आग में घी डाल ही दिया.

‘‘आप कहना क्या चाहते हैं? क्या मुझ में सूझबूझ नहीं? इतने सालों से क्या मैं झकझोर रही हूं? क्या कमी रखी है किसी भी बात में? बैलेंस ही तो करती आ रही हूं अब तक… पर सच ही कहा है कि घर की मुरगी दाल बराबर,’’ नेहा आपे से बाहर हो चुकी थी.

सच सब से गहरे घाव भी उन्हीं से मिलते हैं जिन्हें हम बहुत चाहते हैं. उसी समय नीरू और उमेश आ गए. तूफान थम सा गया. नेहा ने उन्हें नाश्ता कराया. फिर उन्हें पढ़ाने बैठ गई.

वातावरण बोझिल हो चुका था.

‘‘मैं जरा बाहर घूमने जा रहा हूं,’’ कह कर राज बाहर निकल गया.

राज और नेहा की गृहस्थी सुखी और सामान्य थी. थोड़ी बहुत नोकझोंक होती रहती थी. यह सब तो गृहस्थ जीवन का अभिन्न अंग है. बहुत मिठास भी बनावटी लगती है.

नेहा राज को बहुत परिश्रम करता देखती. महीने में 2-3 टूअर भी हो जाते. देर रात तक राज नएनए प्रोजैक्ट पर काम करता. अपने पति पर नेहा को गर्व था. वह राज को प्रसन्न रखने की भरसक कोशिश करती.

सच तो यह था कि दोनों एकदूसरे से बहुत प्यार करते थे. लेकिन प्यार करने और दूसरे के मन की गहराई को समझने में काफी अंतर है. दिल महंगी भेंट नहीं मांगता. 2 शब्द प्रेम, प्रशंसा या सहानुभूति के ही पर्याप्त होते हैं. भावनाओं का स्थान भौतिक पदार्थ कमी नहीं ले सकते.

चूंकि नेहा हमेशा खिलीखिली रहती, इसलिए राज को उसे इसी प्रकार देखने की आदत हो चुकी थी. उस ने कभी इस बात को न जाना न समझा कि नेहा हर कार्य को कैसे कुशलतापूर्वक निबटा लेती. बहुत कम ऐसे अवसर आए जब नेहा ने अपनी परेशानी राज को बताई. प्रेमविभोर नेहा से शायद जानेअनजाने यही गलती हो गई थी. आज झगड़े का मूल कारण भी यही था. रात को डिनर के समय पतिपत्नी चुपचाप से थे. अंदर की पीड़ा जो थी सो थी.

बच्चे स्वभावानुसार चहक रहे थे, ‘‘पापा, मम्मी ने आज दमआलू कितने स्वादिष्ठ बनाए हैं,’’ नीरू ने चटकारे लेते हुए कहा.

‘‘हां बेटा, बहुत स्वादिष्ठ बने हैं,’’ राज ने स्वीकार किया.

उमेश भी नेहा को अपनी विज्ञान शिक्षिका और स्कूल की विज्ञान प्रदर्शिनी के बारे में बता रहा था. नेहा भी जैसेतैसे बेटे के उत्साह में भाग ले रही थी.

बच्चों का भोलापन वास्तव में कलकल करते निर्मल शीतल जलप्रपात सा है, जो पतिपत्नी के गिलेशिकवों के जलतेबुझते अंगारों को शांत कर देता है.

डिनर समाप्त हुआ तो बच्चे अपने बैडरूम में चले गए. नेहा ने जल्दी से बचे काम निबटाए और कपड़े बदल कर राज की तरफ पीठ कर के लेट गई. राज लेटेलेटे कुछ पढ़ रहा था. 11 बज रहे थे. नेहा के लेटते ही राज ने बत्ती बुझा दी.

‘‘नाराज हो क्या?’’ राज की आवाज में मलाई जैसी चिकनाहट थी.

नेहा चुप. कांटा बहुत गहरा चुभा था. पीड़ा हो रही थी.

‘‘डार्लिंग कल शाम मैं टूअर पर निकल जाऊंगा. 2-3 दिन के बाद ही आऊंगा. तुम बात नहीं करोगी तो कैसे चलेगा.’’

‘‘मेरा सिर दुख रहा है. आप सो जाएं,’’ नेहा ने टालना चाहा.

‘‘लाओ मैं तुम्हारा सिर दबा दूं,’’ राज नेहा को मना रहा था.

नेहा अब तक मन ही मन कोई फैसला ले चुकी थी. इसलिए प्रतिकार किए बिना उस ने करवट बदली और राज की ओर देखा. राज ने समझा बिगड़ी बात बनने लगी है. वह नेहा का सिर दबाने लगा.

‘अच्छा है… होने दो सेवा,’ नेहा मन ही मन मुसकराई. मन हलका हुआ तो आंख लग गई. राज भी हलके मन से सो गया.

अगला दिन सामान्य ही रहा. राज औफिस निकल गया. बच्चे स्कूल. नेहा

रोज के कार्यों में व्यस्त हो गई. पर कल रात उस ने जो फैसला लिया था. उसे भूली नहीं थी.

शाम हुई. बच्चे स्कूल से लौटे और राज औफिस से. कुछ खापी कर राज टूअर पर निकल गया. निकलने से पहले नेहा को आलिंगन में लिया. बच्चों को प्यार किया. सब ठीकठाक था. हमेशा की तरह.

3 दिन बाद राज सुबह 9 बजे घर लौटा. बच्चे स्कूल जा चुके थे. नेहा ने हंसते हुए स्वागत किया, ‘‘आप नहाधो लें. तब तक मैं नाश्ता तैयार करती हूं,’’

राज को लगा सब पहले जैसा नौर्मल है. दिल को सुकून मिला.

राज जैसे ही तरोताजा हुआ नेहा ने उस के सामने गरमगरम चाय और प्याज के पकौड़े रख दिए. साथ में पुदीने की चटनी.

‘‘मैं जानता था मेरी गुलाबो कभी बदल नहीं सकती,’’ राज बहुत खुश था.

‘‘कैसा रहा आप का टूअर?’’

‘‘अच्छा रहा. बहुत काम करना पड़ा पर मैं संतुष्ट हूं.’’

‘‘औफिस कितने बजे जाना है?’’

‘‘दोपहर 3 बजे निकलना है. थोड़ा आराम करूंगा. तुम अपनी कहो. क्याक्या किया इन 3 दिनों में?’’ राज ने पकौड़ों का आनंद लेते हुए उत्सुकता से नेहा की ओर देखा.

‘‘बहुत कुछ किया,’’ नेहा के चेहरे पर रहस्यमयी मुसकान थी.

‘‘बताओ तो सही.’’

‘‘एक स्कूल में इंटरव्यू दे कर आई हूं. पार्टटाइम जौब है. छठी और 7वीं कक्षा के बच्चों को अंगरेजी और समाजशास्त्र पढ़ाना है. मेरी ही पसंद के विषय हैं.’’

‘‘इंटरव्यू… यह सब क्या है,’’ राज सकपका गया.

‘‘हां डार्लिंग इंटरव्यू. नौकरी लगभग तय है. अगले महीने से जाना होगा. मेरी 1-2 सहेलियां भी वहां पढ़ा रही हैं. वेतन भी अच्छा है. मेरी सहेली ने ही मेरी सिफारिश की थी. अत: बात बन गई,’’ नेहा ने डट कर अपनी बात कह डाली. वह जानती थी कि राज को यह बात अच्छी नहीं लगेगी. लगे न लगे पर अब पता चलेगा कि परफैक्ट बैलेंस रखना क्या होता है.

‘‘अचानक यह नौकरी की क्या सूझी?’’ राज हैरान और खिन्न था.

‘‘अब इस में सूझने की क्या बात है?

जब हर आधुनिक स्त्री नौकरी कर रही है तो फिर मैं क्यों नहीं,’’ नेहा ने चटनी के चटखारे लेते हुए कहा.

‘‘तुम्हें मेरी उस दिन की बात बुरी लग गई?’’

‘‘बिलकुल नहीं. आप ठीक कहते थे. बैलेंस करने की ही तो बात है,’’ नेहा को मजा आ रहा था.

‘‘तुम्हारी कमजोरी… थकावट का क्या… सेहत भी देखनी पड़ती है.’’

‘‘भई कमाल है. आज आप को मेरी सेहत की बहुत चिंता होने लगी. पर सुन कर अच्छा लगा. चिंता न करें यह सब तो चलता ही है.’’

‘‘नेहा, बात उड़ाओ मत. मैं सीरियस हूं,’’ राज परेशान हो उठा.

‘‘धीरज रखें. मैं डाक्टर से मिल कर आई हूं. ब्लड टैस्ट की रिपोर्ट भी आ गई है.

सब ठीक है हीमोग्लोबिन कम है. डाक्टर की बताई दवा लेनी शुरू कर दी है और खानपान भी डाक्टर के निर्देशानुसार ले रही हूं.’’

‘‘और तुम्हारी ट्यूशनें?’’

‘‘पार्टटाइम नौकरी है. दोपहर 12:30 बजे तक लौट आऊंगी. ट्यूशन तो 3 बजे शुरू होती है. वह भी सप्ताह में 4 बार. महरी फुलटाइम सुबह से शाम तक आ जाया करेगी. बच्चे तो शाम 5 बजे तक ही लौटते हैं. स्कूल मुझे सप्ताह में 5 दिन ही जाना है. शनिर विवार छुट्टी. सब बैलेंस हो जाएगा,’’ नेहा मोरचे पर डटी थी.

‘‘तुम जानती हो अगले महीने बड़े भाईसाहब और भाभी आ रहे हैं,’’ राज ने हारे सिपाही के स्वर में कहा.

‘‘यह तो और भी अच्छी बात है. भाभीजी तो बहुत सुघड़ हैं. मेरी बहुत मदद हो जाएगी. वे भी थोड़ीबहुत घर की देखभाल कर लेंगी और भाईसाहब बच्चों को गणित और विज्ञान पढ़ा दिया करेंगे. इन विषयों में तो वे माहिर हैं,’’ नेहा आज घुटने टेकने वाली नहीं थी.

‘‘तो तुम ने नौकरी करने का निश्चय कर ही लिया है,’’ राज ने हथियार डाल दिए.

‘‘बिलकुल. आप देखना आप की झांसी की रानी घरबाहर को कैसा बैलेंस करती है. आप से ही तो मुझे प्रेरणा मिली है. खैर, छोडि़ए इन बातों को. आप थके हुए हैं. आओ सिर में तेल की मालिश कर देती हूं. आराम मिलेगा,’’ नेहा चाश्नी से सने तीर छोड़ रही थी.

‘‘लंच में क्या है?’’

‘‘सब आप की मनपसंद की चीजें.

लौकी के कोफ्ते, बैगन का भरता और मीठे में बासमती चावल की खीर. आया न मुंह में पानी?’’

‘‘हांहां, ठीक है,’’ राज निरुत्तर हो चुका था.

कहना न होगा कि नेहा परफैक्ट बैलेंस का अंदाज सीख चुकी थी. Story In Hindi

Love Story In Hindi: प्यार भरा मैसेज – दीपा किसके इंतजार में खिड़की पर खड़ी थी

Love Story In Hindi: दीपा तीसरी बार खिड़की के पास आई, लेकिन राजू ने उस की तरफ देखा तक नहीं. राजू दीपा के घर के सामने चाय की दुकान पर बैठा था और अपने ही खयालों में खोया था. मोहन ने कहा, ‘‘राजू देखो तो, दीपा कई बार खिड़की के पास आई और इंतजार कर के चली गई. एक तुम हो कि नजर ही नहीं घूम रही है.’’ राजू ने बेरुखी से मोहन को देखा, फिर सिर उठा कर दीपा पर एक नजर डाली तो दीपा की आंखों की चमक दोगुनी हो गई. उस के होंठों पर एक हलकी सी मोहक मुसकान तैर गई. फिर दोनों की आंखों ही आंखों में बातें हुईं और दीपा के गालों पर लाली तैर गई.

फिर वह नजरें झुका कर खिड़की से हट गई. कुछ देर बाद दीपा की छोटी बहन मंजू चाय की दुकान पर आई और उस ने राजू के हाथों में अपना मोबाइल फोन थमा दिया. उस ने यह भी कहा कि दीदी ने यह मैसेज भेजा है. उन का मोबाइल खराब है. इसी पर जवाब लिख दो. अब राजू के हाथों में वही मैसेज जैसे फड़फड़ा रहा था. उसे पुरानी मुलाकातें याद आ रही थीं. जब वह पहली बार दीपा से मिला था तो दीपा सिलाई सीखने जा रही थी. राजू गली में सामने से आ रहा था. वहीं दीपा से उस की नजरें चार हुईं. तब उस ने कई दिनों से लिख कर रखा अपना मोबाइल नंबर हिम्मत कर के वहीं गिरा दिया और दीपा के पास से निकलता हुआ खंभे की ओट ले कर खड़ा हो गया.

दीपा धीरेधीरे चलती हुई कागज के पास पहुंच कर रुक गई और दबी नजरों से इधरउधर देख कर अपने हाथ में पकड़ा रूमाल गिरा दिया. फिर उस ने रूमाल उठाने के बहाने कागज, जिस पर मोबाइल नंबर लिखा था, उठा लिया और तेज कदमों से चल कर अपने सिलाई स्कूल की तरफ चली गई. राजू ने चैन की सांस ली. सोचा कि यह तो अच्छा हुआ कि उस समय गली में कोई था नहीं. कुछ देर तक राजू वहीं खड़ा रहा और अपनी घबराहट पर काबू पाने की कोशिश करता रहा. फिर चल पड़ा दीपा के सिलाई स्कूल की तरफ. दीपा के सिलाई स्कूल के सामने बैठ कर समय गुजारने के लिए उस ने पास के मूंगफली वाले से कई बार मूंगफली खरीदी.

वह मूंगफली खाता रहा और सुनहरे सपनों में खोया रहा. कुछ देर बाद एक लड़की मूंगफली वाले के पास आई. मूंगफली ले कर जाते समय राजू के पास रुकी, फिर बोली, ‘‘यह चिट दीपा ने दी है,’’ और चिट देने के बाद वह तेज कदमों से सिलाई स्कूल में घुस गई. तब राजू की खुशी का ठिकाना न रहा. वह तुरंत वहां से उठा और तेज कदमों से चल कर पास के आजाद पार्क में पहुंचा. वहीं एक पेड़ के नीचे बैठ कर उस ने नंबर सेव किया और ‘हैलो’ का मैसेज दिया. दीपा ने जवाब में मैसेज किया, ‘मैं जबजब तुम को देखती हूं, मेरे मन के तार झनझना उठते हैं. आज तुम्हारा नंबर पा कर मैं खुशी से पागल हो गई. कल रविवार को मैं घर से सहेली के यहां जाने का बहाना बना कर निकलूंगी और आजाद पार्क में तुम से झूले के पास मिलूंगी…’ राजू को लगा जैसे वक्त थम गया हो.

उस के लिए दिन और रात भारी लग रहे थे. किसी तरह दिनरात बीते. दूसरे दिन वह दीपा से मिला. उस के बाद तो सिलसिला चल पड़ा. कभी सिनेमाघर में, तो कभी कौफीहाउस में उन की शामें कटने लगीं. एक रोज दीपा ने उसे अपनी एक सहेली के कमरे में बुलाया, जो एक घर की बरसाती में रहती थी. वह उन्हें कोल्ड ड्रिंक दे कर चली गई. उसे अपने बौयफ्रैंड से मिलने जाना था. दीपा ने उसे बांहों में जकड़ते हुए कहा, ‘‘राजू, मैं तुम से बेहद प्यार करती हूं.’’ राजू बोला, ‘‘मैं भी, पर हमारी जातियां…’’ ‘‘मैं जातियों को नहीं मानती,’’ कह कर दीपा ने राजू के होंठों पर अपने होंठ रख कर मुंह बंद कर दिया. धीरेधीरे दोनों ने सारी सीमाएं पार कर लीं. अब दोनों के बीच कोई दीवार नहीं रही. चाय की दुकान पर बैठे राजू का ध्यान तब टूटा, जब मोहन ने उस से कहा,

‘‘देख तो मैसेज में क्या लिखा है?’’ मैसेज में लिखा था : ‘मेरा मन बहुत घबरा रहा है. मैं तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली हूं. तुम आज ही मेरे पिताजी से मिलना और हमारी शादी के बारे में जरूर बातचीत करना. पिताजी शाम को 5 बजे दफ्तर से घर चले आते हैं. जरूर आना. मैं इंतजार करूंगी.’ राजू ने मोबाइल फोन छोटी बहन मंजू को वापस करते हुए कहा, ‘‘कह देना कि मेरी भी तबीयत ठीक नहीं है. मैं गांव जा रहा हूं. मैं आ कर बताता हूं. गांव का पता भी किसी को नहीं बताना.’’

फिर राजू तेज कदमों से बसअड्डे की ओर चल पड़ा. राजू जानता था कि वह दीपा के घर जाएगा तो उस की और दीपा दोनों की हत्या हो जाएगी. दीपा के पिता लोकल पार्टी के नेता थे और आएदिन मंदिरों के आगे कीर्तन गाते नजर आते थे. उन्होंने कुछ लठैत भी पाले हुए थे. अब दीपा का बच्चा गिरवा दिया जाएगा, लेकिन दोनों की जान तो बच जाएगी. वह समझ गया था कि उन का प्यार तो उस रेल की पटरी की तरह है, जिस पर कोई ट्रेन नहीं चलती. उस की पटरियों पर चल कर इश्क कर सकते हैं, पर कहीं पहुंच नहीं सकते. Love Story In Hindi

Hindi Funny Story: पति ‘नेता’ की पूजा

Hindi Funny Story: नेता आजकल तैंतीस कोटि होते हैं. कोटि का मतलब ‘करोड़’ भी होता है और ‘वर्ग’ भी. गिनतियों के जाल से बचने के लिए ‘कोटि’ का मतलब ‘वर्ग’ ही ले लें और मान लें कि नेता तैंतीस प्रकार के होते हैं. इसी प्रकार पति ‘नेता’ भी कुछ इस तरह के हो सकते हैं

: संविधान के मुताबिक, इस पति ‘नेता’ को कई तरह से अधिकार और मौके दिए जाते हैं, जैसे शक्ति भाव, रिश्वत, काम निकलवाना, फूल मालाएं पहनाना, उलाहने, ताने, गालियों की भेंट आदि. अच्छे गुणों वाली पत्नियां इन सभी का इस्तेमाल करती हैं. पति ‘नेताओं’ के तरहतरह के रूप कई प्रकार के हैं. नेता पार्ट टाइम भी होते हैं, फुल टाइम भी. पार्ट टाइम वे, जिन्हें पार्टी न पद देती है, जो न चुनाव लड़ते हैं. फुल टाइम वे, जो पार्टी में कोई पद रखते हैं और चुनाव लड़ते हैं.

पति ‘नेता’ अपना काम भी करते हैं, क्योंकि हर नेता की ऊपरी कमाई हो, यह जरूर नहीं. ड्राइवर : ड्राइवर रूपी पति ‘नेता’ रेल, मोटर वगैरह के ड्राइवर यूनियन का अध्यक्ष होता है. लेकिन वे घर की गाड़ी को सही ढंग से चला सकते हैं या नहीं, यह बात साफ नहीं है. गाड़ी चलाने में हादसा हो सकता है और घर में भी. फिर भी आप अपने पति से 2 तरह से बरताव कर सकती?हैं.

हरी साड़ी, उसी रंग की बिंदी का इस्तेमाल आप के पति को घर में घुसने के लिए हरी झंडी का काम करेगा. लेकिन अगर आप ने लाल रंग का इस्तेमाल किया, तो पति ‘नेता’ घर के बाहर ही खड़े रहेंगे. अगर नारंगी पहनी है, तो वे वहीं खड़े रह जाएंगे, पर चालू रहेंगे. पुलिस : आप के पति पुलिस में हैं और नेता के साथ लगे हैं तो, बधाई. सैयां भए कोतवाल तो आप को डर काहे का. फिर भी आप यह न भूलें कि पुलिस कानून को बचाने वाली नहीं होती तोड़ने वाली होती है.

ज्यादातर पत्नियों की तरह आप को भी ऐसी आदत डालनी पड़ सकती है कि आप पति के आते ही जेबों की सफाई करें. कहीं ऐसा न हो कि पति रंगे हाथों पकड़े जाएं. अगर पति पकड़े गए तो ईडी, एंटी करप्शन, सीबीआई वाले घर को तहसनहस कर के पति को लाइनहाजिर करने की धमकी दे सकते हैं. चोरी के माल को ऐसे में आए मेहमानों को चायनाश्ते में सौंप दीजिए और प्रार्थना कीजिए कि बात बढ़ाने से क्या फायदा, मामला खत्म किया जाए.

उम्मीद है कि ‘घूस देवी’ आप के पति ‘नेता’ को गुस्से से बचा लेगी. नेताओं की आदत होती है कि वे पुलिस वालों को नेता भी बना डालते हैं, क्योंकि चोरचोर मौसरे भाई ही होते हैं. कपड़ा दुकानदार पति ‘नेता’ : आप इतना तय मानिए कि आप को कपड़ों की कमी नहीं होगी. वे हरेक की कमीज भी उतरवा लेने में माहिर होंगे. एक सज्जन कपड़ा बेचने का काम करते थे, लेकिन ऐसे ही एक को कुछ दोस्त पकड़ कर एक क्लब में ले गए और उन्हें मेज के पास बैठा दिया.

थोड़ी देर बाद उन्हें नींद आ गई और मेज का कपड़ा 1 और 2 कहते हुए उन्होंने नींद में ही टुकड़ेटुकड़े कर दिए. पूछने पर बताया कि सपने में ग्राहक को एकएक मीटर कपड़ा बेच रहे थे. ऐसे नेता जब रात को कपड़े उतारते हैं तो भी तह कर के रखते हैं, अपनी धोती भी, आप की साड़ी भी चाहे, तब तक आप सो ही जाएं. अगर आप के पति ऐसी हालत में हों तो उन से दूर से ही बातचीत कीजिए. कपड़े उतारने तक तो कोई गड़बड़ी नहीं होगी, लेकिन कपड़े के टुकड़े हो जाने पर अपना ही नुकसान होगा. Hindi Funny Story

Sexual Tips: पौर्न देखने की आदत: सही या गलत?

Sexual Tips: पौर्न वीडियोज देखना आज के समय में काफी आम हो चुका है. आजकल बच्चों से लेकर बड़ों तक के हाथों में स्मार्टफोन हैं और ऐसे में पौर्न वीडियोज देखना काफी आसान हो चुका है. खासतौर पर यंग लड़के और लड़कियां पौर्न देखने के उत्सुक रहते हैं लेकिन यह सवाल अक्सर उठता है कि क्या पौर्न देखना सही है या गलत? देखा जाए तो इसका जवाब ना तो पूरी तरह से ‘हां’ है और ना ही पूरी तरह से ‘ना’ है.

पौर्न वीडियोज देखने से लोगों को सैक्स की समझ होने लगती है और जिसने सैक्स नहीं किया है वे भी पौर्न वीडियोज देख सैक्स करना जान जाते हैं. पौर्न वीडियोज की मदद से जो व्यक्ति सिंगल है या यूं कहें कि जिसके पास सैक्स करने के लिए पार्टनर नहीं है, वे भी पौर्न देख कर मास्टरबेट कर सकता है जो कि उनकी सैटिस्फैक्शन के लिए सही है.

पौर्न वीडियोज देखना गलत नहीं है लेकिन पौर्न वीडियोज देखने की आदत या लत लगा लेना गलत है. पौर्न वीडियोज की लत लग जाना ना सिर्फ हमारे शरीर को नुकसान पहुंचाती है बल्कि दिमाग पर भी इसका गलत असर पड़ता है. कभी कभी पौर्न देखना सही है लेकिन अगर इसे रोज देखा जाए तो इससे दिमाग में गलत भावनाएं घर करने लगती हैं, जो क्राइम के रूप में सामने आती है.

कई बार ऐसा भी देखा गया है कि पौर्न वीडियोज की आदत लग जाने पर रिश्तों में दूरी आने लगती है और इससे एडिक्टेड व्यक्ति केवल पौर्न में ही घुसा रहता है. आसान शब्दों में समझा जाए तो पौर्न देखने की आदत से रिश्ते और दिमाग में तनाव पैदा होने लगता है. यह मेंटल हेल्थ पर बुरा असर डालता है.

आपको बता दें, पौर्न वीडियोज में दिखाई जाने वाली चीज़ें कई बार बहुत अलग होती हैं जो हमारे नौर्मल सैक्स के प्रोसेस से कोसों दूर होती है लेकिन फिर भी लोग इसे देख कर अपने दिमाग में गलत धारणाएं बना लेते हैं जिससे कि उन्हें आगे चलकर काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. उदाहरण के तौर पर बताया जाए तो पौर्न वीडियो में सैक्स की ड्यूरेशन काफी ज्यादा दिखाई जाती है जिससे कि लोगों की अपेक्षाएं काफी बढ़ जाती है लेकिन असल जिंदगी में जब उन्हें वह सब नहीं मिल पाता तो उन्हें निराशा हाथ लगती है.

अगर लिमिट में पौर्न देखी जाए और सिर्फ एंजौय करने के पर्पस से देखी जाए तो इसके काफी फायदे भी हैं जैसे कि पौर्न वीडियोज देखने से स्ट्रैस कम होता है और इंसान पौर्न देख खुद को सैटिस्फाई भी कर सकता है. Sexual Tips

Bollywood Careers: पहली फिल्म से सुपरस्टार, फिर इंडस्ट्री से ही गायब हुए ये सितारे

Bollywood Careers: बौलीवुड में एक नया चेहरा छाया हुआ है, अनन्या पांडे के कजिन अहान पांडे का जिसने अपनी डेब्यू फिल्म ‘सैयारा’ से जोरदार एंट्री की है. इस फिल्म के जरिए उन्होंने न सिर्फ दर्शकों का दिल जीता, बल्कि क्रिटिक्स से भी तारीफें बटोरीं. सोशल मीडिया से लेकर हर जगह उनके लुक्स, स्टाइल और परफौर्मेंस की चर्चा हो रही है. अहान पांडे को फैंस भरपूर प्यार दे रहे हैं और माना जा रहा है कि वो जल्द ही बौलीवुड के उभरते सुपरस्टार्स की लिस्ट में शुमार हो जाएंगे.

हालांकि, ये पहली बार नहीं है जब किसी न्यूकमर ने अपने डेब्यू से तहलका मचाया हो. इससे पहले भी कई नए चेहरों ने पहली ही फिल्म से दर्शकों को दीवाना बना दिया था. लेकिन कुछ सितारे ऐसे भी रहे, जिनका सितारा पहली फिल्म के बाद फीका पड़ गया और उनका करियर उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सका. अब देखना दिलचस्प होगा कि अहान इस शुरुआती सफलता को लंबे समय तक कायम रख पाते हैं या नहीं.

चलिए जानते हैं उन एक्टर्स और एक्ट्रैसेस के बारे में जिनकी पहली फिल्म तो सुपरहिट रही लेकिन बाद में वे कुछ खास कमाल नहीं कर पाए.

राहुल रौय

1990 में राहुल रौय ने फिल्म ‘आशिकी’ से बौलीवुड में एंट्री की और रातोंरात स्टार बन गए. उनके लुक्स और रोमांटिक अंदाज युवाओं को खूब पसंद आया. लेकिन अफसोस, इस धमाकेदार शुरुआत के बाद वो अपनी पहचान को बरकरार नहीं रख पाए. उनकी ज्यादातर फिल्में बौक्स औफिस पर फ्लौप रहीं और धीरे-धीरे उनका करियर रफ्तार खो बैठा. राहुल रौय की बाकी फिल्मों की बात करें तो वे फिल्म ‘धर्मा कर्मा’, ‘गुमराह’, ‘नौटी बौय’ और ‘तूने मेरा दिल ले लिया’ जैसी फिल्में में नजर आए हैं.

तुषार कपूर

तुषार कपूर ने ‘मुझे कुछ कहना है’ के जरिए फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा. डेब्यू फिल्म ने अच्छा रिस्पौन्स बटोरते हुए उन्हें एक प्रौमिसिंग एक्टर के तौर पर स्थापित किया. हालांकि, शुरुआती सफलता के बावजूद तुषार कपूर अपने पिता जितेंद्र जैसी स्टारडम हासिल नहीं कर सके. उनकी पौपुलैरिटी कुछ फिल्मों तक ही सीमित रह गई. तुषार की फ्लौप फिल्मों की बात करें तो लिस्ट में कई सारी फिल्में हैं जैसे कि, ‘गुड बौय बैड बौय’, ‘वन टू थ्री’, ‘कुछ तो है’ और ‘लव यू मिस्टर कलाकार’.

तनुश्री दत्ता

तनुश्री दत्ता ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत इमरान हाशमी के साथ फिल्म ‘आशिक बनाया आपने’ से की थी. इस फिल्म के हिट गानों और बोल्ड अंदाज ने उन्हें रातोंरात चर्चा में ला दिया था. तनुश्री को उस वक्त काफी पहचान मिली, लेकिन कुछ सालों बाद वो सिल्वर स्क्रीन से दूर हो गईं और इंडस्ट्री से धीरे-धीरे गायब हो गईं. तनुश्री फिल्म ‘आशिक बनाया आपने’ के बाद ‘अपार्टमेंट’, ‘ढ़ोल’, ‘स्पीड’ जैसी जैसी फिलमों में नजर आई जो कुछ खास कमाल नहीं कर पाईं.

अनु अग्रवाल

इसी तरह ‘आशिकी’ से राहुल रौय के साथ डेब्यू करने वाली अनु अग्रवाल ने भी शुरुआत में दर्शकों का ध्यान खींचा था. उनके लुक्स और मासूमियत ने लोगों को अपना दीवाना बनाया, और लगा था कि वो लंबे समय तक इंडस्ट्री में छाई रहेंगी. लेकिन शुरुआती सफलता के बाद उनका करियर खास उड़ान नहीं भर सका और वो भी फिल्मी दुनिया से दूर होती चली गईं. अनु अग्रवाल ने फिल्म ‘आशिकी’ के बाद ‘गजब तमाशा’, ‘किग अंकल’, ‘खलनायिका’ जैसी फिल्में की हैं. Bollywood Careers

Top 5 South Indian Films: एक्शन और ड्रामा से भरपूर हैं साउथ की यह 5 फिल्में

Top 5 South Indian Films: आज के समय में जहां बौलीवुड फिल्में बौक्स औफिस पर कुछ खास कमाल नहीं कर पा रही हैं वहीं साउथ की फिल्में बड़े पर्दे पर तहलका मचा रही हैं. चाहे कहानी हो या एक्शन, रोमांस हो या थ्रिल, साउथ की फिल्में हर मामले में दर्शकों की उम्मीदों पर खरी उतर रही हैं. पिछले कुछ सालों में इन फिल्मों ने वो कर दिखाया है जो पहले सिर्फ उम्मीद की जाती थी. न सिर्फ बौक्स औफिस रिकौर्ड तोड़े बल्कि दर्शकों के दिलों पर भी राज किया. आज के समय में साउथ की फिल्मों का एक अलग ही फैनबेस बन चुका है. दर्शक अब सिर्फ भाषा नहीं, बल्कि कंटेंट को अहमियत देने लगे हैं और यही वजह है कि साउथ की फिल्मों को पूरे देश में सराहा जा रहा है.

अगर आपको भी दमदार एक्शन, गहरी कहानी और शानदार अभिनय वाली फिल्में पसंद हैं, तो ये 5 साउथ इंडियन फिल्में आपकी वौचलिस्ट में जरूर होनी चाहिए. अगर अभी तक आपने इन्हें नहीं देखा है, तो यकीन मानिए, आप बहुत कुछ मिस कर रहे हैं.

बाहुबली: द बिगनिंग (2015)

साल 2015 में आई इस फिल्म ने बौक्स औफिस के सारे रिकौर्ड तोड़ डाले थे. जबरदस्त एक्शन के साथ इतना तगड़ा सस्पेंस की लोग फिल्म देखते साथ ही इसके अगले पार्ट का बेसब्री से इंतजार करने लगे थे. इस फिल्म में एक्टर ‘प्रभास’ ने मुख्य भूमिका निभाई थी और उनका साथ दिया था ‘अनुष्का शेट्टी’ और ‘राणा दग्गुबाती’ ने.

विक्रम (2022)

साल 2022 में आई फिल्म ‘विक्रम’ को लोगों द्वारा काफी पसंद किया था. इस फिल्म में ‘कमल हासन’ और ‘विजय सेथुपथी’ ने कमाल की एक्टिंग से लोगों का दिल जीता था. अगर आपने अभी तक यह फिल्म नहीं देखी है तो आपको जरूर देखनी चाहिए.

पुष्पा – द राइज (2021)

‘अल्लू अर्जुन’ और ‘रश्मिका मंदाना’ की सबसे ज्यादा पसंद की गई फिल्म ‘पुष्पा’ साल 2021 में रिलीज की गई थी. इस फिल्म को देश भर में खूब पसंद किया गया था. इस फिल्म में भरपूर एक्शन देखने को मिला था जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया था. साल 2024 में मेकर्स ने इस फिल्म का सैकेंड पार्ट भी रिलीज किया जिसका नाम रखा गया ‘पुष्पा – द रूल’.

जेलर (2023)

साल 2023 में आई साउथ फिल्मों के सपरस्टार ‘रजनीकान्त’ और ‘मोहनलाल’ की फिल्म ‘जेलर’ में भरपूर एक्शन देखने को मिला. इस फिल्म में सपरस्टार ‘रजनीकान्त’ ने एक रिटायर्ड जेलर की भूमिका निभाई थी जिसे लोगों ने काफी पसंद किया था.

मास्टर (2021)

‘मास्टर’ फिल्म को साल 2021 में रिलीज किया गया था जिसमें साउथ स्टार ‘विजय’ और ‘विजय सेथुपथी’ ने मुख्य भुमिका निभाई थी. इस फिल्म में आपको एक्शन और ड्रामा का भरपूर डोज देखने को मिलेगा. अगर आप एक्शन फिल्मों के शौकीन हैं तो आपको यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए. Top 5 South Indian Films

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