Social Story in Hindi: व्रत उपवास- भाग 3: नारायणी के व्रत से घर के सदस्य क्यों घबराते थे?

अभी करवाचौथ बीते 4 दिन भी नहीं हुए थे कि अष्टमी आ पहुंची. इसी- लिए नारायणी को छोड़ कर सब कांप रहे थे. और जैसे ही नारायणी ने चेतावनी दी कि कोई खटपट न करे तो शत्रु दल में भगदड़ मच गई. तनाव के कुछ तार बाकी थे, वे सब एकसाथ झनझना उठे. जैसे ही देवीलाल ने कहा कि खटपट वह शुरू कर रही है तो रोनापीटना शुरू हो गया.

एक दिन पहले ही नारायणी सब बच्चों से पूछ रही थी कि अष्टमी के दिन क्या बनाएं. बच्चों ने बड़े चाव से अपनी- अपनी पसंद बताई थी. काफी तैयारी भी हो चुकी थी. बच्चे बेसब्री से अष्टमी की प्रतीक्षा कर रहे थे. मन ही मन कह भी रहे थे कि चाहे कुछ भी हो वे मां को प्रसन्न रखेंगे.

पर ऐसा न पिछले कई वर्षों से हुआ था और न इस साल होने के आसार दिखाई दे रहे थे. नारायणी तो आंसू टपका कर बिस्तर पर जा गिरी और घर का भार आ पड़ा निर्मला के नन्हेनन्हे नाजुक कंधों पर. उस ने जैसेतैसे चाय बनाई, नाश्ता बनाया और सब को खिलाया. पर उस के गले से कुछ न उतरा.

देवीलाल ने गला खंखारते हुए पूछा, ‘‘बाजार से कुछ लाना है?’’

नारायणी चुप रही.

‘‘अरे, बाजार से कुछ लाना है?’’

नारायणी फिर भी चुप रही.

निर्मला ने मां के पास जा कर कंधा हिलाते हुए कहा, ‘‘अम्मां, बाबूजी बाजार जा रहे हैं, कुछ मंगाना है क्या?’’

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‘‘भाड़ में जाओ सब.’’

‘‘वह तो चले जाएंगे, पर अभी कुछ लाना हो तो बताओ,’’ देवीलाल ने कहा.

‘‘थोड़े मखाने ले आना. खरबूजे के बीज और एक नारियल. खोया मिले तो ले आना. जो सब्जी समझ में आए, ले लेना पर मटर लाना मत भूलना. आज आलूमटर की कचौडि़यां बनाऊंगी. सोनू का बड़ा मन था. मूंगदाल की पीठी ले आना, हलवा बनाना है. दहीबड़े खाने हों तो उड़द की दाल की पीठी और दही ले आना,’’ नारायणी एक सांस में बोल गई.

देवीलाल ने गहरी सांस भर कर कहा, ‘‘एकसाथ इतना सामान कैसे लाऊंगा?’’

‘‘सोनू को साथ ले जाओ.’’

‘‘चल बेटा, सोनू चल. बरतन और थैला उठा ले. पूछ ले अम्मां से घीतेल तो है न? कहीं ऐन मौके पर उस के लिए भी भागना पड़े.’’

‘‘अरे, अभी तो लाए थे करवाचौथ के दिन. सब का सब रखा है. खर्च ही कहां हुआ?’’

करवाचौथ के नाम से फिर एक बार दहशत छा गई. इस से पहले कि कुछ गड़बड़ हो, देवीलाल बाहर सड़क पर आ गए और सोनू की प्रतीक्षा करने लगे.

कुछ देर तक तो शांतिअशांति के उतारचढ़ाव में दिन निकला. पर जहां नारायणी जैसी धार्मिक तथा कट्टर व्रत वाली औरत हो, वहां तूफान न आए यह असंभव था. वह बारीबारी से देवीलाल और बच्चों को आड़े हाथों लेती रही. कभी इसे झिड़कती तो कभी उसे डांटती. देवीलाल को तो एक क्षण चैन नहीं लेने दिया.

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बोली, ‘‘मेरी मां तो सीधी थी, एकदम गऊ. आज उसी की शिक्षा है कि मैं भी इतनी सीधी हूं. मुंह से एक शब्द नहीं निकलता. दूसरी औरतों को देखो, कितनी तेजतर्रार हैं. सारे महल्ले का मुंह बंद कर देती हैं, बस, एक बार बोलना शुरू कर दें.’’

देवीलाल ने बच्चों की ओर देखा. वे मुसकराने का असफल प्रयत्न कर रहे थे. ठंडी सांस भर कर देवीलाल ने कहा, ‘‘सो तो है. तुम्हारे जैसी सीधी तो अंगरेजी कुत्ते की पूंछ भी नहीं होती.’’

नारायणी पहले तो समझी कि उस की प्रशंसा हो रही है, पर जब उस की समझ में आया तो चिढ़ कर बोली, ‘‘तुम मेरी मां की हंसी तो नहीं उड़ा रहे?’’

‘‘तुम्हारी मां तो गऊ थीं. कोई उन की हंसी उड़ाएगा. मैं तो बैल की सोच रहा था.’’

नारायणी ने आंखें तरेर कर कहा, ‘‘क्या कुछ मजाक कर रहे हो?’’

‘‘नहीं तो,’’ देवीलाल ने बात बदल कर कहा, ‘‘बेटी निर्मला, खाली हो तो एक प्याला चाय ही बना दे.’’

कुछ देर शांति रही, पर कब तक? फिर वही शाम और पूजा की तैयारी. फिर वही चांद की प्रतीक्षा. लो कल सप्तमी के दिन तो ऐसी फुरती से निकल आया कि पूछो मत और आज अष्टमी है तो ऐसा गायब जैसे गधे के सिर से सींग. सारा परिवार पागलों की तरह चांद की तलाश में ऊपरनीचे, अंदरबाहर घूम रहा था.

9 बज गए. पिछली बार की तरह फिर एक बार खतरे की घंटी बजी. पर वह चांद न था, केवल उस की परछाईं थी.

‘‘अरे, जा न,’’ नारायणी ने सोनू को डांटा, ‘‘जाता है कि नहीं.’’

‘‘अभी तो देख कर आ कर बैठा हूं,’’ सोनू ने झल्ला कर कहा, ‘‘अब नहीं जाता.’’

‘‘जा, गोलू, तू ही जा. यह तो मेरी जान ले कर छोड़ेगा. मरा, न जाने किस घड़ी में पैदा हुआ था,’’ नारायणी ने कोसा.

‘‘अम्मां, मैं नहीं जाता. मेरी टांगें तो टूट गई हैं ऊपरनीचे होते,’’ गोलू ने घुटने दबाते हुए कहा, ‘‘सोनू को कहो. यह बीच सीढ़ी से ही लौट आता है.’’

‘‘सत्यानास,’’ नारायणी एकदम आपा खो बैठी, ‘‘एक तो तुम्हारे लिए भूखप्यास से तड़प रही हूं और तुम लोगों से इतना सा भी नहीं होता.’’

‘‘छोड़ो, अम्मां,’’ सोनू ने हलके से कहा, ‘‘जा कर पिताजी की चांद देख लो. असली चांद से ज्यादा चमकती है.’’

नारायणी ने चिल्ला कर कहा, ‘‘मर जाओ एकएक कर के. मजाल है कि तुम्हारा मुंह भी देखूं.’’

देवीलाल ने कहा, ‘‘क्या कह रही हो, नारायणी? बच्चों के लिए व्रत रख रही हो और उन्हें ही कोस रही हो? ऐसा व्रत रखने का क्या लाभ है?’’

‘‘करम फूट गए जो ऐसी औलाद पैदा हुई. इस से तो बिना संतान ही भली थी,’’ नारायणी ने क्रोध में कहा. वह तनाव के अंतिम क्षणों में पहुंच गई थी.

इतने में ‘चांद निकल आया’ का शोर आने लगा. नारायणी ने फिर से अपनी गोटे वाली साड़ी को ठीक किया और सजीसजाई पूजा की थाली को ले कर छत की भीड़ में गुम हो गई. सोचती जा रही थी कि बाईं आंख फड़क रही है, कहीं फिर कुछ बदशगुनी न हो जाए.

जब खाना खाने बैठे तो किसी की इच्छा खाना खाने की न हुई. सब थोड़ा- बहुत खापी कर उठ गए. इस तरह मंगल कामना करते हुए बच्चों के लिए अष्टमी का व्रत पूरा हुआ.

दूसरे दिन पड़ोस वाली शीला ने पूछा, ‘‘अरे, नारायणी चाची, कल श्याम चाचा के यहां खाने पर क्यों नहीं आईं?’’

‘‘खाने पर,’’ नारायणी ने पूछा, ‘‘कैसा खाना था श्याम के यहां?’’

‘‘अरे, क्या तुम्हें निमंत्रण नहीं मिला? उन के बेटे की सगाई थी न.’’

‘‘पता नहीं,’’ नारायणी ने मुरझा कर कहा.

सहसा शीला को याद आया, ‘‘पर वैसे भी तुम कहां आतीं. कल तो तुम ने अहोई अष्टमी का व्रत रखा होगा. सच, बड़ा कठिन है. मैं तो एक बार भी व्रत नहीं रख पाई. मुझे तो चक्कर आने लगते हैं.’’

नारायणी ने कहा, ‘‘अगर निमंत्रण आया होता तो मैं अवश्य आती.’’

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‘‘क्यों, क्या व्रत नहीं रखतीं?’’

‘‘व्रत?’’ नारायणी ने क्रोध में कहा, ‘‘ऐसे नासपीटे बच्चों के लिए व्रत रखना तो महान अपराध है.’’

शीला अवाक् हो कर नारायणी का मुंह देख रही थी. उस ने कभी उसे इतना उत्तेजित नहीं देखा था.

सहज हो कर नारायणी ने पूछा, ‘‘क्याक्या बना था दावत में?’’

Satyakatha: शादी से 6 दिन पहले मंगेतर ने दिया खूनी तोहफा

जतिन अपनी मोटरसाइकिल को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के डिलारी- मुरादाबाद मार्ग पर सरपट दौड़ाए जा रहा था. उस पर बैठी टीना जतिन की कमर को कस कर पकड़े हुए थी. इसी बीच उसे एक झटका लगा और हल्की सी चीख निकल गई.

‘‘ठीक से चलाओ, मुझे गिरा दोगे क्या?’’ टीना बोली.

‘‘अरे, तुम्हें कैसे गिरा दूंगा, तुम तो मेरी जान हो.’’ कहते हुए जतिन ने मोटरसाइकिल रोक दी.

‘‘अब मोटरसाइकिल क्यों रोक दी. तुम्हें पता नहीं कितनी खरीदारी करनी है और अंधेरा होने से पहले घर भी लौटना है.’’ टीना ने कहा.

‘‘हांहां, सब पता है, लेकिन उधर देखो पुलिस ने अचानक बेरियर गिराकर रास्ता बंद कर दिया. मैं तो तेजी से निकलना चाहता था, लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या? तुम्हें तो बस बहाना चाहिए.’’ टीना अब थोड़ा नाराज हो गई थी. जतिन उस की मुंडी को रास्ता बंद बैरियर की ओर घुमाते हुए बोला, ‘‘ ठीक से देखो न उधर!’’

‘‘तो अब क्या करें?’’ टीना ने सवाल किया.

‘‘करना क्या है, वापस सुरजन नगर चलते हैं. वहीं कुछ देर समय गुजारेंगे.’’

‘‘ और शौपिंग?’’

‘‘अब मुझे क्या पता था कि मुरादाबाद में भी लौकडाउन लगा होगा.’’ जतिन ने सफाई दी.

‘‘तो फिर वहीं से कुछ सामान खरीद लेते हैं.’’

‘‘हांहां, यही ठीक रहेगा. मुझे ध्यान आया मुरादाबाद का लौकडाउन वीकेंड का है, सोमवार को खुल जाएगा.’’

‘‘तो फिर मुरादाबाद सोमवार को चलते हैं. अभी तो हमारी शादी में 6 दिन बचे हैं.’’ टीना बोली.

‘‘ठीक है,’’ कहते हुए जतिन ने सुरजन नगर के लिए मोटरसाइकल

घुमा ली.

‘‘अच्छी तरह बैठ जाओ, वहां का रास्ता ठीक नहीं है.’’ जतिन के कहने पर टीना ने पहले की तरह उस की कमर को कस कर पकड़ लिया. थोड़ी देर में दोनों सुरजन नगर मार्ग पर आ गए थे.

एक जगह पर रुकते हुए जतिन बोला, ‘‘चलो कुछ देर थोड़ी मौजमस्ती भी हो जाए. अभी तो साढ़े 11 ही बजे हैं. एक बजे तक पूरी दुकानें भी खुल जाएंगी’’

‘‘कहां चलेंगे, बैठने की यहां कोई एकांत जगह तुम्हें मालूम है?’’ टीना बोली.

‘‘है न, पास में ही मेरे एक दोस्त का मकान है. वह इन दिनों अपनी फैमिली के साथ दिल्ली में है. वहां उस का नौकर होगा. वही मकान का केयरटेकर है, मुझे अच्छी तरह जानतापहचानता है.’’ जतिन को बताया.

‘‘ठीक है,’’  कहते हुए टीना ने सर हिला दिया.

कुछ मिनटों में ही जतिन और टीना एक मकान के सजेसजाए ड्राइंगरूम में थे. टीना ने फ्रेश होने की इच्छा जताई. जतिन ने बाथरूम की ओर इशारा किया और नौकर से कुछ नाश्ते का इंतजाम करने के लिए पैसे दिए.

टीना बाथरूम से निकलते ही बोली ‘‘मेरे बैग में छोटा तौलिया होगा, निकालना. और पानी की बोतल भी देना…’’

‘‘यह लो तौलिया और पानी की बोतल.’’

‘‘यहां कौनकौन रहता है?’’

‘‘छोड़ो न, यहां जो भी रहता हो, हमें क्या? हमें तो केवल डेढ़दो घंटे बिताने हैं.’’ जतिन बोला.

‘‘फिर भी, तुम तो यहां पहले भी आए होगे?’’ टीना ने सवाल किया.

‘‘तुम्हारी यही आदत मुझे कभीकभी अच्छी नहीं लगती है.’’ जतिन ने शिकायत की.

‘‘मेरी कौन सी आदत खराब है और कौन सी अच्छी, यह तो तुम्हारी सोच पर निर्भर करता है.’’

‘‘अरे छोड़ो भी, क्यों नराज होती हो. मैं ने तुम्हारे लिए यहां का फेवरेट नाश्ता मंगवाया है. खाओगी तो सालोंसाल तक याद रखोगी.’’

‘‘इस का मतलब है तुम यहां हमेशा आते रहे हो!’’ टीना बोली.

‘‘हमेशा आते रहने से तुम्हारा क्या मतलब है, तुम मुझ पर शक कर

रही हो.’’

‘‘मैं ने तो शक की बात नहीं कही. सिर्फ पूछा कि यहां कौनकौन रहता है?’’

‘‘ यह मेरे दोस्त का मकान है. वह अपनी फैमिली के साथ रहता है, इस से अधिक मैं नहीं जानता.’’ जतिन ने बताया.

‘‘… लेकिन बाथरूम में केवल लेडीज अंडरगारमेंट पड़े हैं. वे भी गीले…’’ टीना बोली.

‘‘तो इस में क्या हो गया…किसी ने तुम से पहले बाथरूम यूज किया होगा. यहां की देखभाल नौकर के जिम्मे है. हो सकता है उस की बीवी आई हो, उस के परिवार का कोई सदस्य आया हो…’’

‘‘और…और कमोड में तैरते कंडोम के बारे में तुम क्या कहोगे?’’ टीना अब तीखेपन से बोली.

‘‘क…क…कंडोम! मैं कुछ नहीं जानता?’’ हकबकाता हुआ जतिन बोला.

‘‘…और यह भी सुनो, गीला अंडरगर्मेंट ठीक वैसा ही महंगा वाला ब्रांडेड है, जैसा तुम ने एक सप्ताह पहले मुझे गिफ्ट में दिया था.’’ टीना अब और तल्ख हो गई थी.

‘‘देखो, तुम मुझ पर बेवजह शक कर रही हो, मैं यहां थोड़ा खुशनुमा पल गुजारने के लिए तुम्हें ले कर आया हूं, और तुम हो कि बेकार की बातों में उलझती जा रही हो.’’

जतिन ने सफाई दी और टीना को समझाने की कोशिश की. लेकिन टीना का चेहरा तमतमाया हुआ देख उस ने अपनी आवाज में नरमी बनाए रखी.

‘‘मैं बेकार की बातें कर रही हूं? मैं तो दावे के साथ कह सकती हूं कि तुम यहां कल भी आए थे…और तुम्हारे साथ वह चुडैल भी थी… तुम्हारे चेहरे का उड़ा रंग ही सब बता रहा है.’’ टीना ने अब जतिन पर सीधे आरोप ही लगा दिया था.

‘‘देखो, बहुत हो गया. तुम्हारा कहना एकदम गलत है…और तुम किस की बात कर रही हो?’’

‘‘अरे वही, जिस के बारे में तुम पहले भी बता चुके हो कि वह तुम्हें फोन पर तंग करती रहती है.’’

‘‘टीना, तुम बेकार की बातें कर रही हो, उस से तो मेरा कब का छुटकारा मिल गया. मेरे दिल में तुम्हारे अलावा और कोई नहीं है,’’ जतिन बोला.टीना और जतिन के बीच नोकझोंक बढ़ती ही जा रही थी. दरअसल टीना जतिन को अपना सर्वस्व न्यौछावर कर चुकी थी. इसलिए वह कतई नहीं चाहती थी कि जतिन का किसी और के साथ कोई संबंध बना रहे. इस वजह से वह हमेशा जतिन को शक की निगाह से देखती थी.

‘‘तुम तो हमारे घरवालों के दबाव में आ कर मुझ से शादी कर रहे हो, सच तो यह है कि तुम मुझ से पीछा छुड़ाना चाहते हो.’’ टीना गुस्से में बोली.

‘‘ऐसा कुछ भी नहीं है, टीना.’’ जतिन ने समझाने की कोशिश की.

‘‘ कुछ भी कहो, तुम अपने अपमान का बदला लेना चाहते हो. जबकि मैं अपना सब कुछ लुटा चुकी हूं.’’

‘‘तुम्हारे कहने का मतलब है कि तुम से मेरा मन भर गया है.’’ जतिन बोला.

‘‘और क्या? सच कड़वा लग रहा है न?’’

‘‘तो तुम कौन सी दूध की धुली हो!’’ अब जतिन भी हमलावर अंदाज में बोला.

‘‘क्या कहा तुम ने? मुझ पर आरोप लगाया.’’ टीना गुस्साई.

‘‘सही तो कहा है मैं ने. तुम्हारा ठाकुरद्वारा में एक लड़के के साथ चक्कर नहीं चल रहा है? तुम ने भी तो पंचायत के दबाव में मुझ से शादी करना स्वीकारा है. मेरी लाइफ खराब करने पर तुली हो.’’ जतिन का इतना कहना था कि टीना और भी भड़क कर आगबबूला हो गई.

गुस्से में लाल टीना ने जतिन को एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया. वह बोली, ‘‘मेरे ऊपर इल्जाम लगाने से पहले तू अपने गिरेहबान में झांक कर देख. तूने मेरा सब कुछ तो ले लिया. एक समय में तेरी खातिर मैं ने अपना घरपरिवार तक छोड़ दिया था. अब मेरे ऊपर ही झूठा इल्जाम लगा रहा है.’’

टीना का थप्पड़ खा कर जतिन तिलमिला गया. उसे नहीं पता था कि छोटीछोटी बातों की उस की नोकझोंक यह रूप ले लेगी. बात यहीं तक खत्म नहीं हुई और बढ़ती चली गई.

उधर शाम को टीना के घरवाले उस के जतिन के साथ लौटने का इंतजार कर रहे थे. टीना की मां सोमवती ने जतिन के पसंद के कई पकवान बनाए थे. शाम के साढ़े 4 बज गए थे, दोनों नहीं लौटे.

तब टीना के घर वालों को उन की चिंता होने लगी. वे इस बात को ले कर चिंतित हो गए कि  शहर में अकसर 6 बजे के बाद लगने वाले कोरोना कर्फ्यू की वजह से वे कहीं फंस सकते हैं.

टीना के पिता मदनपाल सिंह यही सोच कर उन के बारे में मालूम करने के लिए मोटरसाइकिल से निकल पड़े. यह बात 14 जून, 2021 की है.

वह जब मुरादाबाद के थाना ठाकुरद्वारा के अंतर्गत डिलारी-सुरजन नगर मार्ग पर थोड़ी दूर ही बढ़े होंगे कि उन्होंने सड़क के किनारे कुछ लोगों की भीड़ देखी. जिज्ञासावश वह भी उस के पास पहुंच गए. सड़क किनारे गड्ढे में झाडि़यों के बीच एक लाश पड़ी थी, कुछ पुलिसकर्मी उस के इर्दगिर्द मुआयना कर रहे थे.

सड़क पर खड़े लोग तरहतरह की बातें कर रहे थे. उन्हीं में से किसी ने बताया कि लाश यहां दिन में 3 बजे से ही पड़ी है. पुलिस तो अब आई है. उन्हीं लोगों से मालूम हुआ कि लाश किसी युवती की है.

उस समय तक लाश को एक सफेद कपड़े से ढंक दिया गया था, पुलिस वाले उसे एंबुलेंस में ले जाने की तैयारी कर रहे थे. जहां पर लाश गिरी थी वह जगह भीड़भाड़ वाली जगह से करीब 400 मीटर दूर थी.

वहां दिन में ही सन्नाटा रहता था. सड़क थोड़ी मुड़ी होने के कारण वह जगह दूर से छिपी हुई नजर आती थी. वह इलाका पीपलसाना गांव में आता है.

सुरजन नगर पुलिस थाने में इस की सूचना स्थानीय लोगों से मिली थी. गड्ढे में लाश के होने की सूचना देने वाले ने ही बताया था कि युवती की लाश वहां किस स्थिति में पड़ी थी. उस ने क्या पहन रखे थे. दिखने में कैसी लग रही थी. आदिआदि.

इस तरह की कई बातें सुन कर मदनपाल सिंह आशंकित हो गए. वह तुरंत पुलिस वालों के पास जा पहुंचे. उन्होंने लाश का चेहरा दिखाने का अनुरोध किया. जांच कर रहे सुरजन नगर के थानाप्रभारी सत्येंद्र सिंह भी घटनास्थल पर मौजूद थे. मदनपाल सिंह ने उन से ही आग्रह किया था.

थानाप्रभारी ने उन का परिचय पूछा फिर कांस्टेबल को लाश का चेहरा दिखाने को कहा. हालांकि तबतक

लाश का बारीकी से निरीक्षण किया जा चुका था.

उस समय तक मौजूद लोगों में से किसी ने उस की पहचान नहीं की थी. लेकिन जैसे ही मदनपाल ने लाश का चेहरा देखा वह ‘टीना…’ कह कर तेज आवाज में चीख पड़े अगले पल धड़ाम से वहीं गिर गए. उन्हें पुलिसकर्मियों ने सहारा दे कर उठाया. वह बेहोश हो गए थे.

जांच टीम को लाश के बारे में उन के सवाल का जवाब मिल गया था. बेहोश मदनपाल के चेहरे पर पानी के छींटे मार कर होश में लाया गया, उन्हें पानी पिलाया गया. कुछ देर में वह सामान्य हुए. पुलिस को उन्होंने धीमी आवाज में बताया कि लाश उन की बेटी टीना की है. उस की 20 जून को शादी होने वाली थी.

पुलिस को उन्होंने बताया कि वह सुबह 11 बजे अपने मंगेतर के साथ शैपिंग करने के लिए निकली थी, लेकिन वह कहां है पता नहीं?

फफकफफक कर रोते हुए उन्होंने पुलिस को शादी के कार्ड भी दिखाए, जिस पर टीना सिंह और जतिन सिंह नाम के साथ दोनों के स्थायी निवास का पता भी लिखा था.

थानाप्रभारी सत्येंद्र सिंह ने सीओ अनूप सिंह को भी इस की सूचना दे दी थी, वह भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. उन्होंने भी शव का निरीक्षण कर बताया कि निश्चित तौर पर लड़की को मार कर यहां फेंका गया है, जिसे सड़क दुर्घटना बनाने की कोशिश की गई है. सूचना पा कर मदन पाल की पत्नी सोमवती भी वहां पहुंच गई.

सोमवती भी बेटी की मौत पर दहाड़े मारमार कर रोने लगी. थानाप्रभारी सत्येंद्र सिंह व सीओ अनूप सिंह ने मृतक टीना के पिता मदनपाल सिंह और मां  सोमवती को पूछताछ के लिए थाने बुलवा लिया.

मदन पाल तो पहले ही टीना के बारे में बहुत कुछ बता चुके थे. सोमवती ने पुलिस को टीना के घर से बाहर जाने के बारे में जानकारी दी.

सोमवती ने बताया कि 14 जून की सुबह टीना के मंगेतर जतिन का फोन आया था. उस ने कहा था कि मैं आ रहा हूं. टीना की शादी के लिए लहंगासूट और अपने लिए शेरवानी खरीदनी है.

उस ने यह भी बताया था कि इस के लिए वह मुरादाबाद के टाउन हाल से कपड़े खरीदेगा और टीना को साथ ले जाएगा. अपने बताए समय पर वह टीना को पूर्वाह्न 11 बजे घर से ले कर गया था. उस के बाद अब मुझे अपनी बेटी को इस हाल में देखना पड़ रहा है.

पुलिस ने सोमवती और मदन पाल सिंह के बयानों के आधार प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार कर ली. उस के बाद सोमवती से जतिन का फोन नंबर ले कर उस पर बात करने के लिए काल की. लेकिन फोन बंद मिला.

टीना का फोन भी गायब था. पुलिस ने टीना का शव मुरादाबाद पोस्टमार्टम हाउस भिजवा दिया. घटना की सूचना पा कर मुरादाबाद के एसपी (देहात) विद्यासागर मिश्रा भी थाना ठाकुरद्वारा पहुंच गए थे.

पूरा मामला समझने के बाद इस घटना से मुरादाबाद के एसएसपी प्रभाकर चौधरी को अवगत करा दिया. उन्होंने भी ठाकुरद्वारा पुलिस को निर्देश दिए कि टीना का हत्यारा चाहे कितना बड़ा क्यों न हो, उस को तुरंत हिरासत में लिया जाए.

इस निर्देश के बाद सीओ अनूप सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस जांच टीम का गठन किया गया. उस में थानाप्रभारी सत्येंद्र सिंह, एसआई पंकज कुमार, कांस्टेबल संजीव धामा, मनोज कुमार, कृष्णपाल, शुभम तोमर, विनीत कुमार आदि थे.

सब से पहले 15 जून को टीम ने जतिन के कालागढ़ स्थित घर सी-293 नई कालोनी नूनगढ़ चौराहा पर छापा मारा. वह घर पर नहीं मिला. घर पर उस के पिता राजेंद्र सिंह मिले. थानाप्रभारी ने उन्हें हिदायत दी कि जैसे ही जतिन के बारे में उन्हें पता चले तो वह थाने में सूचना दे दें.

पुलिस वहां से निराश लौट रही थी, तभी मुरादाबाद के सर्विलांस सेल ने थानाप्रभारी सत्येंद्र सिंह को अभियुक्त जतिन के फोन की लोकेशन मिलने की सूचना दी. उस के फोन की लोकेशन सुरजन नगर और स्यौहारा के बीच की मिल रही थी.

इस सूचना पर पुलिस टीम ने तुरंत उसी तरफ अपनी गाड़ी बढ़ा दी. रास्ते में पुल के पास जतिन मोटरसाइकिल सहित गिरफ्तार कर लिया गया उस के पास से एक मोबाइल भी बरामद किया गया. पुलिस अभियुक्त जतिन को ठाकुरद्वारा थाना ले आई.

वहां एसपी (देहात) विद्या सागर मिश्रा व सीओ अनूप सिंह ने पूछताछ की. पूछताछ में जतिन ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही अपनी मंगेतर टीना की हत्या की है.

हत्या की वजह पूछने पर जतिन ने उस से हुई 3 साल पहले की मुलाकात, प्यार और तकरार की सारी बातें सिलसिलेवार ढंग से बताईं.

उस ने बताया कि उस की टीना से मुलाकात 3 साल पहले चाची के घर पर हुई थी. उस की चाची गांव लालपुर पीपलसाना में रहती है, जहां उस का अकसर आनाजाना होता था. वहीं टीना से दोस्ती हुई.

फिर दोस्ती प्यार में बदल गई. दोनों ने जीनेमरने की कसमें खाईं. उस ने बताया कि वह टीना से बेइंतहा मोहब्बत करने लगा था. टीना भी उसे बहुत चाहती थी.

अपने अफेयर के बारे में बताते हुए जतिन ने बताया कि उस का टीना के घर वालों से 6 महीने पहले विवाद हो गया था. दरअसल वह नहीं चाहते थे कि टीना उस से मिले.

जतिन ने इस बारे में 6 महीने पहले की घटना बताई. उस ने बताया कि करीब 6 माह पहले जनवरी 2021 में वह टीना को ले कर कालागढ़ स्थित अपने घर ले आया था. 4 दिनों तक टीना वहां ठहरी थी. इस का उस के घर वालों ने विरोध जताते हुए उस के खिलाफ थाना ठाकुरद्वारा में लड़की भगाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी थी.

उस के बाद टीना को अपने साथ गांव लालपुर पीपलसाना ले आए थे. टीना के पिता मदन पाल सिंह ने थाना ठाकुरद्वारा में जो रिपोर्ट लिखाई थी, उस में कहा था कि मैं टीना से शादी नहीं करना चाहता. जबकि ऐसी कोई बात नहीं थी.

उसी शिकायत के आधार पर टीना भी मुझे बारबार फोन पर धमकी दे रही थी कि अगर मैं ने  उस से शादी नहीं की तो वह मुझे जेल भिजवा देगी. उस के बाद से पुलिस मुझे आए दिन परेशान करने लगी.

उस घटना के 3 माह बाद पंचायत बैठी. टीना ने अपने परिवार वालों से साफसाफ कह दिया था कि उस की शादी होगी तो सिर्फ जतिन से क्योंकि वह जनित को अपना सब कुछ सौंप चुकी है.

पंचायत में दोनों पक्षों के बीच बात चली, सभी पंचों ने एकमत हो कर फैसला सुनाया कि जब इतना सब कुछ हो चुका है तो क्यों न टीना व जतिन की शादी कर दी जाए.  इस फैसले को दोनों पक्षों ने मान लिया.

इस फैसले के बाद टीना के मातापिता ने शादी की तैयारी शुरू कर दी थी. कार्ड छप गए थे. सीमित संख्या में लोग अमंत्रित किए जा रहे थे. सवा महीने पहले टीना के पिता कालागढ़ में जतिन के घर जा कर लगुन का सामान दे आए थे.

गरम सूट, सोने की चेन, अंगूठी कपड़े, शादी के कार्ड, मिठाई, फल वगैरह ले कर गए थे. वहां पर उन की बहुत आवभगत हुई थी. लगुन देने के बाद वह अपने गांव लौट कर शादी की बाकी तैयारी में जुट गए थे.

घर में शादी का सारा सामान आ चुका था. दहेज का सारा सामान टीना के पिता ने खरीद लिया था. अब, बस शादी के 6 दिन रह गए थे.

14 जून, 2021 की सुबह टीना के मोबाइल नंबर पर जतिन का फोन आया था. टीना बहुत खुश थी. जतिन फोन पर बोला, ‘‘तुम्हारे पापा ने लगन में मुझे जो सूट दिया है, वह गरम है और गरमी का मौसम है. आजकल शेरवानी का रिवाज है. मैं तुम्हें भी कपड़े दिलवाना चाहता हूं. बस, 2 ही जगह हैं काशीपुर या मुरादाबाद. मुरादाबाद के टाउनहाल बाजार में शादी का सारा समान कपड़े शेरवानी, जूते, चप्पल सभी मिल जाते हैं. वहीं से सब खरीद लाते हैं. इस के साथ कुछ मौजमस्ती भी करेंगे. कुछ खाएंगे, एंजौय करेंगे. फिर शाम को घर आ जाएंगे.’’

जतिन ने पुलिस को बताया कि टीना से फोन पर बात करने के बाद 14 जून को वह समय पर टीना के घर ठीक 11 बजे पहुंच गया था. वहां होने वाली सास ने खूब खातिरदारी की थी.

सोमवती ने बहुत प्यार से खाना खिलाया था. होने वाले दामाद के व्यवहार से खुश थी. टीना भी अपना मनपसंद जीवनसाथी पा कर बेहद संतुष्ट और खुश थी. टीना और जतिन के मोटरसाइकिल से मुरादाबाद के लिए निकलते समय सोमवती ने बायबाय कर विदाई की थी.

यहां तक सब कुछ सामान्य प्लान के मुताबिक चल रहा था. टीना और जतिन के बीच मामला तब बिगड़ गया जब वे मुरादाबाद जाने के बजाय एक मकान में कुछ समय गुजारने के लिए ठहरे.

उन के बीच बातोंबातों में बहस छिड़ गई जिस ने हिंसा का रूप ले लिया. टीना के हाथों थप्पड़ खा कर जतिन काफी असहज हो गया था. गुस्से में उस ने भी टीना के मुंह पर 2 थप्पड़ जड़ दिए. उन के बीच हाथापाई बढ़ गई.

जतिन उस पर किसी दूसरी लड़की के साथ संबंध बनाने के आरोप में गुस्से में पागल हो गया था. उस ने टीना की गरदन उस के स्टौल से ही घोंट दी. फिर मोटरसाइकिल पर ही अपने पीछे उसे स्टोल से बांध लिया. थोड़ी दूर जा कर सुनसान जगह पर उसे गड्ढे में धकेल कर फरार हो गया.

सुरजन नगर से स्योहारा की तरफ भागने के दौरान वह 15 जून को पकड़ा गया. पुलिस को उस की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल स्टोल व उस में बंधा टीना का मोबाइल पास के तालाब से बरामद कर लिया था.

बाद में विवेचनाधिकारी सत्येंद्र सिंह ने भादंवि की धारा 302 के तहत जतिन को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश कर दिया. वहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

   (कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित)

Crime Story in Hindi: वह नीला परदा- भाग 7: आखिर ऐसा क्या देख लिया था जौन ने?

Writer- Kadambari Mehra

मौयरा अगले दिन किनारों पर से फटी काली हाटपैंट, कसा हुआ ब्लाउज और 10 इंच लंबा आगे बांधने वाला कार्डिगन पहन कर और छोटेछोटे बौबकट केशों में बिलकुल स्कूल गर्ल बन कर नासेर की दुकान में अकेली चली गई.

नासेर को चिडि़या अच्छी लगी. उस ने दाना फेंकने में देर नहीं लगाई. बताया कि वह दुकान के ऊपर अकेला रहता है. मौयरा ने कहा, ‘‘हो सकता है तुम अकेले हो पर अकसर तुम्हारी जात के लड़के 30 से पहले ही ब्याह जाते हैं.’’

‘‘ब्याह तो हुआ था. मगर मेरी बीवी मुझ से बहुत बड़ी है. मेरे भाई की बेवा थी वह.

3 बच्चे थे पर लड़का नहीं था. लड़के के बिना उस के आदमी की सारी जायदाद उस के भतीजे ले जाते, इसलिए उस ने मुझ से शादी कर ली.’’

‘‘लड़का हो गया तुम से उसे?’’

‘‘हां हुआ, मगर मैं कमाई करने इधर आ गया. 7-8 साल से मुल्क नहीं गया. तुम क्या इधर ही रहती हो?’’

‘‘हां, यहीं पास में. 4-5 मील दूर. तरहतरह की चीजें खानेपीने का शौक है, इसलिए इधर चली आई. तुम क्या पाकिस्तान से हो?’’

‘‘अरे नहीं, हम तो तुम्हारे पड़ोसी हैं. टर्की से आया हूं. वह तो यूरोप का ही हिस्सा है. देखो न, मेरा रंग भी कितना गोरा है.’’

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मौयरा ने कबाब बनवाया.

फिर मौयरा से बोला, ‘‘यहीं बैठ कर खाओ न. मैं ने भी सुबह से दाना पेट में नहीं डाला. तुम्हारी कंपनी में मुझे भी भूख लग गई है.’’

नासेर बड़ा स्मार्ट और हंसमुख आदमी लगा मौयरा को, मगर एकएक कर के जो तथ्य सामने आ रहे थे, उसे कटघरे में धकेलते जा रहे थे.

‘‘नहीं, अभी पैक करा दो. फिर किसी दिन फुरसत में आ जाऊंगी. आज तो मेरा टैनिस कोर्ट में सेशन बुक किया हुआ है. बेकार में नुकसान हो जाएगा किराए का.’’

‘‘टैनिस तो मैं भी खेलता हूं. चलो अगली बार संगसंग बुक करवाएंगे. कल आओगी?’’

‘‘कह नहीं सकती पर मिलूंगी, तुम मुझे अच्छे लगे.’’

डेविड क्रिस्टी ने दुकान के बाहर एक सिपाही एंडी को ट्रैफिक वार्डन बना कर तैनात कर दिया. लोगों की गाडि़यों की अवैध पार्किंग पर नजर रखता. वह वहीं घूमता और नासेर की दुकान पर भी नजर रखता.

उस दिन तो नहीं मगर 2-4 दिन बाद नासेर बाहर निकला. वार्डन ने अपनी कार से उस का पीछा किया. नासेर एक मसजिद में गया, जहां लंबी स्कर्ट और पूरी बांह का ब्लाउज पहने एक प्रौढ़ सी खूबसूरत औरत 3 बच्चों को ले कर खड़ी थी. 2 बड़ी बेटियां और 1 बेटा, जो करीब 5 साल का था. बेटा नासेर को देख कर डैडडैड कहता हुआ आया और उंगली पकड़ कर मसजिद में दाखिल हो गया. स्कर्ट वाली औरत ने सिर पर रेशमी रूमाल बांधा हुआ था. वह बेटियों के साथ दूसरे दरवाजे से अंदर गई. नासेर उस बच्चे को देख कर एकदम खिल उठा.

यानी नासेर ने मौयरा को जो कहानी सुनाई थी वह झूठी थी. नासेर की बीवी वहीं पर थी.

क्रिस्टी ने इस औरत पर भी जाल बिछा दिया. टै्रफिक वार्डन बने हुए अपने सहायक से कहा कि वह नासेर को छोड़ कर इस स्त्री का पीछा करे.

2 घंटे बाद नासेर अपनी दुकान में चला गया. मसजिद के बाहर कई औरतें उस की बीवी से बातें करती रहीं. जब वह वहां से चली, सिपाही ने लगातार उस पर निगरानी रखी. अंत में उस ने उसे घर की चाबी निकाल कर ताला खोलते हुए और अंदर जाते हुए देखा. उस ने पता अपनी डायरी में लिख लिया और घर का एक फोटो भी कैमरे में कैद कर लिया.

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उस दिन शुक्रवार था. शनिवार और इतवार को दफ्तर की छुट्टी थी. सोमवार को सुबह 7 बजे से एंडी की ड्यूटी नासेर के तथाकथित घर के बाहर लगा दी गई. वह एक वीडियो कैमरा ले कर अपनी कार में बैठा सारी गतिविधियां रिकार्ड करता रहा. 8 बजे नासेर की पत्नी अपने तीनों बच्चों को ले कर स्कूल की ओर रवाना हुई. स्कूल ज्यादा दूर नहीं था. यही कोई 15 मिनट की चहलकदमी पर. एंडी अपना फासला रखते हुए धीमी रफ्तार से पीछेपीछे रेंगता हुआ स्कूल का नामपता भी दर्ज कर लाया.

बच्चों को भेज कर नासेर की बस से कहीं जाने लगी. एंडी ने पीछा किया. 2-3 मील दूर पर एक दुकान थी, जिस में मिठाइयां, स्वीट, अखबार आदि के साथसाथ ब्रैड, दूध, सब्जी, फल भी रखे थे. दुकान पहले से खुली हुई थी. मतलब उस का मालिक कोई और था. नासेर की पत्नी ने अंदर जा कर कार्यभार संभाल लिया और वहां से एक और औरत, जो काफी कम उम्र की और स्मार्ट थी बाहर आई और एक छोटी कार से कहीं चली गई.

शाम को 3 बजे वह लड़की दुकान में वापस आ गई और नासेर की पत्नी वापस अपने बच्चों को स्कूल से ले कर अपने घर चली गई.

एंडी ने यह सारी रिपोर्ट मौयरा और डेविड को दे दी. मौयरा की बातों से जाहिर था कि नासेर इस शादी की कतई इज्जत नहीं करता था. फिर भी वह उसी घर में रहता था और वहीं रात को सोता था. हो सकता है कि उस की बीवी को उस की तफरीहों का पता ही न हो. बेईमान पुरुष जरा ज्यादा ही शरीफ बने रहते हैं अपनी बीवियों के साथ. क्रिस्टी को संभलसंभल कर अगला कदम रखना होगा. मौयरा को वह इस खेल में झोंक नहीं सकता था. वह एक इज्जतदार स्त्री थी. कई सालों से एक ही बौयफैंरड से निभा रही थी. वह भी इसे पूरे मन से चाहता था, मगर उस की कमर्शियल पायलट की जिंदगी शादी, गृहस्थी के हिसाब से ठीक नहीं बैठती थी, इसलिए वे दोनों शादी नहीं कर रहे थे.

एक दिन मौयरा फिर उड़ती चिडि़या की तरह कबाब की दुकान में जा बैठी. नासेर खिल उठा. मौयरा ने जरा ज्यादा भाव दिया, तो नासेर सीधा मतलब पर आ गया.

‘‘तू आ न आज शाम को. हम इकट्ठे घूमेंगेफिरेंगे.’’

‘‘नहीं, शाम को बड़ा मुश्किल होता है. मेरी मां रहती है साथ में.’’

‘‘तो फिर अभी चल ऊपर मेरे फ्लैट में. वहां आराम से बैठते हैं. आई विल गिव यू ए गुड टाइम.’’

‘‘थैंक यू, मगर मैं तो तुम्हें ज्यादा जानती नहीं, फिर कभी मिलेंगे. हो सका तो वीकएंड में आऊंगी.’’

‘‘वीकएंड में ठीक नहीं रहेगा. काम बहुत बढ़ जाता है. मुझे फुरसत नहीं मिलती.’’

‘‘कोई बात नहीं अगले हफ्ते देखूंगी, बाय.’’

नासेर की दाल नहीं गल रही थी.

क्रिस्टी ने स्कूल के हेडमास्टर को अपने विश्वास में लपेटा. बिना उसे कुछ बताए उस ने नासेर के बच्चों का हवाला लिया. बड़ी लड़की 10 साल की होने जा रही थी. उस से छोटी 7 साल की थी और सब से छोटा लड़का 5 साल पूरे कर चुका था, अभी कुछ ही दिन पहले मां का नाम साफिया था मगर लड़के का नाम अब्दुल नहीं था. उसे सब शकूर अली नासेर बुलाते थे.

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डेविड क्रिस्टी ने बच्चे का बर्थ सर्टिफिकेट निकलवाया. वह मोरक्को का पैदा हुआ बच्चा था और उस की जन्म की तारीख में भी फर्क था.

फिर से चक्का जाम हो गया यानी इस पहेली के कई दरवाजे अभी भी बंद थे. डेविड और मौयरा दोनों बौखला गए. अब किस आधार पर जा कर नासेर को पकड़ें? कहीं भी नासेर की तसवीर में फैमी फिट नहीं हो रही थी.

कहां थी जैनेट के घर में रहने वाली फैमी और उस का बच्चा? हो सकता है वे दोनों कहीं और रहते हों. बेकार ही वह इस परिवार को दोषी समझ बैठा है.

अगले दिन सुबह वह अपने औफिस में मौयरा के आने का इंतजार कर रहा था. नीचे से उस को खबर आई कि एक औरत मिलने आई है. डेविड ने उसे वहीं अपने औफिस में बुला लिया. आगंतुक एक ईरानी औरत थी. उस ने सिर में रूमाल बांधा हुआ था और टखनों तक लंबा कोट पहना था. डेविड देर तक उस से बातें करता रहा.

उस के जाने के बाद मौयरा आई तो डेविड खिड़की से बाहर खोयाखोया सा आसमान को ताक रहा था.

‘‘तुम्हारा चेहरा तो बेहद उतरा हुआ है डेविड, क्या हुआ?’’

‘‘कुछ भी नहीं हुआ मगर मौयरा जब भी मैं यह केस बंद करना चाहता हूं, कुछ ऐसा हो जाता है कि मुझे अपना फैसला रद्द कर देना पड़ता है.’’

मौयरा ने पूछा, ‘‘यह औरत कौन थी?’’

‘‘यह एक ईरानी औरत है बर्ग हीथ से आई थी.’’

‘‘क्या चाहती थी?’’

‘‘फिर बताऊंगा, वह इत्तफाक से यहां आ पहुंची. हां, यह पता लगा है कि नासेर का बेटा मोरक्को में पैदा हुआ.’’

‘‘तो फिर अब्दुल कहां गया?’’

‘‘यही तो गड़बड़ है. अब किस बिना पर नासेर को दोषी मान लें?’’

‘‘छोड़ो मत उसे, वह बेहद गंदा आदमी है. एकदम घटिया. मैं अब अकेली उस के यहां नहीं जाऊंगी. वह तो सीधा गुड टाइम की बात करने लगता है.’’

‘‘हां, वह खतरनाक हो सकता है पर अब क्या करें कि उसे पकड़ कर इलजाम लगाया जा सके?’’

‘‘मेरी मानो तो लारेन को ले आना चाहिए. देखें कैसा रिएक्शन रहता है उस का.’’

‘‘चलो यह भी कर के देख लें.’’

अगले दिन डेविड फिर नासेर की दुकान में गया. नासेर हंसहंस कर उस से बातें करने लगा.

‘‘क्या बताया तुम ने कि टर्की से आए हो?’’

‘‘नहीं टर्की से तो मेरी बीवी है. मैं तो सच पूछो तो मोरक्को का रहने वाला हूं, वहां मेरे खानदान का बड़ा बिजनेस है.’’

‘‘मोरक्को के तो कई लोगों को मैं जानता हूं. एक बीवी की फ्रैंड थी फैमी फहमीदा सादी. वह भी मोरक्को से आई थी. तुम जानते हो उसे?’’

यह सुन कर नासेर का रंग उड़ गया. वह अटक कर बोला, ‘‘नहीं, मैं इस नाम की किसी और को नहीं जानता.’’

इस के बाद उस का बातचीत का रुख बदल गया. वह धंधे की परेशानियों का रोना रोने लगा.

क्रिस्टी का शक और पक्का हो गया मगर ऊपर से उस ने कुछ जाहिर नहीं किया.

इस के बाद क्रिस्टी लारेन से मिला. लारेन को पुलिस के काम के लिए छुट्टी दिला दी और वह उसे ले कर नासेर की दुकान में गया. खुद कुछ देर के लिए बाहर ही खड़ा रहा और अकेली लारेन अंदर गई. लारेन को देख कर नासेर के चेहरे पर की हवाइयां उड़ने लगीं. उस ने झूठा स्वांग रचा कि उसे दमा का रोग है और अटैक आ गया है, इसलिए वह दुकान बंद कर के बाहर खुली हवा में जाना चाहता है.

वह जोरजोर से खांसने लगा. काउंटर के नीचे झुक कर उस ने कबाब के ग्रिल का बटन बंद कर दिया और रुकरुक कर घुटती सी आवाज में गालियां बकने लगा.

‘‘ये कम्बख्त चूल्हा और यह गोश्त का धुआं मेरी जान ले लेगा. जाओ, प्लीज बाहर निकलो, मुझे जाना है.’’

लारेन बाहर चली गई तो उस ने झटपट दुकान का शटर गिरा दिया और ऊपर फ्लैट में चला गया.

इधर मौयरा बाल मनोविज्ञान का परीक्षण करने वाली टीचर बन कर शकूर अली नासेर के हेडमास्टर से मिली और उसे इस बात के लिए राजी कर लिया कि शकूर से अकेले में बात करेगी. एक अन्य डिनर लेडी शकूर को लाने की जिम्मेदारी बनी. शायद इतना छोटा बच्चा अजनबी स्त्री से ठीक तरह बात न करता.

मौयरा ने ढेर सारे कंस्ट्रक्शन गेम टेबल पर रख दिए और शकूर से उन्हें बनाने को कहा. बच्चा ही तो था झट बहल गया.

फिर उस की बनाई चीजें की खूब तारीफ की और अनेक मिलेजुले छोटेमोटे सामान मेज पर बिखेर दिए.

‘‘शकूर, तुम्हें जोड़े मिलाने पड़ेंगे यानी क्या चीज किस के साथ जोड़ी जाती है. जैसे, ताले के साथ चाबी, जूते के साथ मोजा वगैरह.’’

शकूर जब खूब मगन हो गया तब उस ने धीमे से फैमी का फोटो मेज पर रख दिया.

जैसे ही उस ने उसे देखा वह सकपका गया और फिर रोआंसा हो गया. उस ने फोटो उठा लिया और उसे निहारता रहा.

‘‘तुम जानते हो यह कौन है?’’

‘‘आंटी.’’

‘‘तुम्हें प्यार करती है?’’

‘‘बहुत, हम घूमने जाते थे. वह मुझे बाहर ले जाती थी.’’

‘‘कहां?’’

‘‘कभी चिडि़याघर तो कभी पार्क में.’’

‘‘अब भी जाते हो?’’

‘‘अब नहीं आती.’’

यह बात कह कर शकूर रोने लगा.

अगले दिन हेडमास्टर ने साफिया को स्कूल के बाद आधा घंटा रुकने को कहा. बताया कि तुम्हारा बेटा बहुत मेधावी है.

भोजपुरी Singer अक्षरा सिंह का हिंदी गाना ‘मेरी वफा’ ओटीटी प्लेटफार्म पर हुआ रिलीज

दिग्गज फिल्म निर्माता हैदर काजमी के ओटीटी प्लेटफॉर्म मस्तानी पर सुपर हॉट गर्ल अक्षरा सिंह का गाना ‘मेरी वफा’ रिलीज होते ही वायरल भी हो गया. यूं तो अक्षरा के गानों की धूम यूट्यब पर खूब है, लेकिन अब उनके गाने ओटीटी प्लेटफॉर्म ‘मस्तानी’पर भी धमाल मचाने लगी है.‘मेरी वफा’ अक्षरा का हिंदी गाना है, जिसे अक्षरा ने अपनी बेहद सुरीली आवाज दी है.

यह मूलतः सैड सौंग है, लेकिन बहुत शानदार है.यह कहा जा सकता है कि अक्षरा सिंह के गाए हिंदी गानों में यह सबसे अलग और मजेदार है.

 

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ओटीटी प्लेटफार्म ‘‘मस्तानी’’ पर पहली बार अपने हिंदी गाने के आने पर अक्षरा सिंह अपनी खुशी जाहिर करते हुए कहा-‘‘मुझे अच्छा लगा रहा है कि हैदर काजमी जैसे दिग्गज व संजीदा फिल्ममेकर के ओटीटी प्लेटफॉर्म ‘मस्तानी’पर मेरे गाने को जगह मिली है.यह ओटीटी प्लेटफॉर्म सार्थक सिनेमा और गानों को बेहतर मंच देता है.इसलिए यह मेरे लिए सम्घ्मान की बात है कि यहां मेरी कला को एकअलग पहचान मिलेगी.यह गाना बेहद अच्घ्छा है.आप जरूर सुनिए.इस गीत को फंणींद्र राव ने लिखा है,संगीत आशीष वर्मा ने दिया है.’’

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ओटीटी प्लेटफॉर्म ‘‘मस्तानी’’ पर इस गाने से पहले वेब सीरीज ‘‘द रेड लैंड’’रिलीज हो चुकी है, जिसमें पूर्वांचल में जातिवाद की लड़ाई के खूनी अंजाम को दिखाया गया था,जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया और अब यह मिस्ट्री थ्रिलर.खुद हैदर काजमी भी अपने ओटीटी प्लेटफार्म ‘मस्तानी’को लेकर कह चुके हैं यह सार्थक और प्रगतिशील सिनेमा के लिए एक बेहतर मंच बनेगी.यहां लोग पूरे परिवार के साथ बैठकर फिल्में वेब सीरीज व अन्य मनोरंजक चीजें देख पाएंगे. इस प्लेटफार्म पर हैदर काजमी के निर्देशन में बनी फिल्में रिलीज होंगी ही,साथ-साथ दुनिया भर में बनी अच्छी और सार्थक फिल्में इस ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दर्शकों को देखने को मिलेगा,जिसका मनोरंजन के साथ सामाजिक सरोकार होगा.

Aly Goni ने गुस्से में आकर Twitter से लिया ब्रेक, जानें वजह

बिग बॉस 14 फेम अली गोनी सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहते हैं.  वह अक्सर अपनी फेैमिली और फ्रेंड्स के साथ  फोटोज और वीडियोज शेयर करते रहते हैं. वह इन दिनों काफी गुस्से में नजर आ रहे हैं. उन्होंने ट्विटर छोड़ने का फैसला लिया है. दरअसल एक्टर की बहन इल्हाम गोनी को लेकर यूजर्स गंदे-गंदे कमेंट्स कर रहे थे. ऐसे में अली गोनी ने ट्विटर छोड़ने का ऐलान किया है.

हाल ही में अली गोनी ने ट्वीट कर लिखा कि ‘कुछ एकाउंट्स ने मेरी बहन को गाली देते हुए और नेगेटिव बातें कहते हुए देखा. मैं चीजों को नजरअंदाज करता था लेकिन यह एक ऐसी चीज है जिसे मैं नजरअंदाज नहीं कर सकता.

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उन्होंने आगे ये भी लिखा कि मेरे परिवार को यहां घसीटने की हिम्मत मत करो. मैं अभी बहुत गुस्से में हूं और अपना अकाउंट डिलीट कर रहा हूं. अली ने  कहा कि ‘  मैं कुछ समय के लिए ट्विटर से ब्रेक ले रहा हूं.अपने लोगों को ढेर सारा प्यार.

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अली गोनी की गर्लफ्रेंड जैस्मिन भसीन ने एक्टर का सपोर्ट करते हुए ट्विटर पर लिखा कि मैं न तो किसी को दोष दे रही हूं और न ही किसी को गलत समझ रही हूं. बस आप सभी से रिक्वेस्ट है कि पॉजिटिव और शांत रहें. जब हम भद्दी बातों का जवाब नहीं देते हैं, तो खुद खत्म हो जाती हैं. अगर तुम मुझसे प्यार करते हो तो तुम प्यार फैलाओगे, सिर्फ प्यार…

GHKKPM: पाखी देगी सई को धक्का, चोट लगते ही बौखलाएगा विराट

स्‍टार प्‍लस का सीरियल ‘गुम है किसी के प्‍यार में’ में नए-नए ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. शो के बिते एपिसोड में आपने देखा कि सई और पाखी की लड़ाई बढ़ती ही जा रही है. तो वहीं विराट सई (Ayesha Singh) का बर्थडे धूमधाम से मनाने की प्‍लानिंग कर रहा है. उसने सभी घरवालों के साथ मिलकर प्लानिंग की है लेकिन पाखी काफी गुस्से में है. शो के अपकमिंग एपिसोड में दर्शकों को एंटरटेनमेंट का डबल डोज मिलने वाला है. तो आइए बताते है, शो के नए एपिसोड में क्या होने वाला है.

शो में दिखाया जा रहा है कि विराट ने सभी घरवालों से कहा है कि वह सई का बर्थडे वैसे ही धूमधाम से मनाना चाहता है जैसे उसके पापा मनाया करते थे. तो विराट की ये सारी बाते सुनकर पाखी का गुस्सा सातवें आसमान पर है. पाखी हर तरह से कोशिश कर रही है कि वह सई का बर्थडे बर्बाद करे.

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शो के अपकमिंग एपिसोड में दिखाया जाएगा कि सई ये सोचकर कॉलेज चली जाएगी कि परिवार में किसी को उसका बर्थडे याद है लेकिन जब वह शाम को घर लौटेगी तो पूरा घर सजा हुआ होगा. सई को पता चलेगा कि विराट ने उसके लिए सरप्राइज बर्थडे पार्टी प्‍लान की है.

 

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इस पार्टी में  देवयानी-पुलकित भी शामिल होंगे. केवल पाखी इस पार्टी में नजर नहीं आएगी. लेकिन केक काटने के वक्‍त सई पाखी को बुलाने जाएगी.

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सई पाखी का हाथ पकड़कर चलने के लिए कहेगी तो पाखी गुस्‍से में सई को धक्‍का दे देगी जिससे उसके सिर पर चोट लग जाएगी. तो वहीं विराट भी कमरे में आ जाएगा और वह देख लेगा कि पाखी ने सई को धक्‍का दिया है.

सई के माथे पर खून देखकर विराट बौखला जाएगा. अब शो के अपकमिंग एपिसोड में ये देखना दिलचस्प होगा कि विराट का ये रिएक्शन देखकर पाखी का अगला कदम क्या होगा?

फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह: संघर्षों की बुनियाद पर सफलता की दास्तान

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो संसार में आते हैं तो किसी को भनक तक नहीं होती, लेकिन उन की मौत पर दुनिया को बेतहाशा दुख होता है. ऐसे ही महान इंसानों में मिल्खा सिंह को शामिल किया जा सकता है. जिन्होंने अपनी मेहनत और जज्बे की बदौलत सफलता की ऐसी दास्तान लिखी कि…

भारत के महान फर्राटा धावक मिल्खा सिंह पिछले महीने कोरोना संक्रमण से जूझने के बाद ठीक हो गए थे.

लेकिन कुछ रोज पहले उन की तबीयत फिर से बिगड़ गई, जिस के बाद उन्हें चंडीगढ़ के पीजीआईएमईआर के आईसीयू में भरती कराया गया था. लेकिन दुनिया के बड़े से बडे़ धावकों को पछाड़ने वाले इस धावक को आखिर 18 जून, 2021 की रात साढे़ 11 बजे उन की बीमारी ने हरा दिया.

मिल्खा सिंह की हालत 18 जून की शाम से ही खराब थी. बुखार के साथ उन की औक्सीजन भी कम हो गई थी. उन्हें पिछले महीने कोरोना हुआ था, लेकिन 2 दिन पहले उन की रिपोर्ट नेगेटिव आने के बावजूद तबियत में सुधार नहीं हो रहा था. जिस कारण 2 दिन पहले उन्हें जनरल आईसीयू में शिफ्ट कर दिया गया था, वहां उन की हालत स्थिर बनी हुई थी.

दुखद बात यह थी कि उन की पत्नी 85 वर्षीय निर्मल कौर का भी 5 दिन पहले एक निजी अस्पताल में कोरोना बीमारी के कारण निधन हो गया था. बीमारी से जूझ रहे मिल्खा सिंह को प्राण छोड़ते समय तक इस बात का मलाल था कि वह जीवन के कठिन संघर्षों में उन का साथ निभाने वाली जीवनसंगिनी के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सके थे. उन की पत्नी भारतीय वालीबाल टीम की पूर्व कप्तान रही थीं.

मिल्खा सिंह के निधन की खबर से देश के खेल जगत से एक ऐसा सितारा टूट कर लुप्त हो गया है, जिस की भरपाई होना बेहद मुश्किल है. मिल्खा सिंह के जन्म से ले कर उन के अवसान तक की कहानी किसी ऐतिहासिक फिल्म की कहानी की तरह है, जो युवाओं को प्रेरित करने वाली है.

मिल्खा सिंह का जन्म 20 नवंबर, 1929 को गोविंदपुरा (जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है) के एक सिख राठौर (राजपूत) परिवार में हुआ था. अपने मांबाप की कुल 15 संतानों में वह एक थे. उन्होंने अपनी पढ़ाई की शुरुआत वहां के एक स्कूल से की और करीब 5वीं कक्षा तक अपनी पढ़ाई की. उन का बचपन 2 कमरों के घर में रहने वाले परिवार के साथ गरीबी में बीता. इस में एक कमरा पशुओं के लिए था.

1947 में भारत पाकिस्तान विभाजन के बाद हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान उन्होंने अपने मातापिता को खो दिया. उस दौरान विभाजन के लिए हुए मजहबी दंगों में उन के कई भाईबहन समेत परिवार के कई रिश्तेदारों की उन की आंखों के सामने ही हत्या कर दी गई.

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मिल्खा के मनमस्तिष्क पर दंगों की वे स्मृतियां मरते दम तक जिंदा रहीं. मिल्खा अपने  जीवन में कई बार अपनी बचपन की यादों का जिक्र करते भावुक हुए थे, जब उस दौरान हुए दंगों और चारों तरफ फैले खूनखराबा तथा रक्तरंजित मंजर का जिक्र करते थे. मिल्खा शायद अपने जीवन में पहली बार उस दौरान ही रोए थे.

जब पाकिस्तान में उन के परिवार का नरसंहार हुआ, उस से 3 दिन पहले मिल्खा को मुलतान में अपने सब से बड़े भाई माखन सिंह की मदद के लिए भेजा गया था. माखन सिंह मुलतान में हवलदार तैनात थे. मुलतान जाने के लिए उन्होंने कोट अड्डू से ट्रेन पकड़ी. ट्रेन पहले की यात्रा से खून से सनी पड़ी थी. मिल्खा सिंह डर की वजह से महिलाओं के डिब्बे में एक सीट के नीचे छिप गए थे, क्योंकि उन्हें आक्रोशित भीड़ द्वारा खुद को मार दिए जाने की आशंका थी.

जब मिल्खा अपने भाई माखन के साथ लौट कर कोट अड्डू पहुंचे, तब तक दंगाइयों ने उन के गांव को श्मशान घाट में बदल दिया था. मिल्खा के मातापिता, 2 भाइयों और उन की पत्नियों को इतनी बेरहमी के साथ मारा गया था कि उन के शवों को भी नहीं पहचाना जा सका.

जूतों पर करते थे पौलिश

घटना के लगभग 4 या 5 दिनों के बाद माखन के कहने पर मिल्खा सिंह अपनी भाभी जीत कौर के साथ भारत के लिए सेना के एक ट्रक में सवार हो कर फिरोजपुर-हुसनीवाला क्षेत्र में आ गए. माखन वहां सेना में ही रहे.

यहां आ कर मिल्खा ने काम ढूंढना शुरू किया. काम की तलाश में वह अकसर स्थानीय सेना के शिविरों का दौरा किया करते थे और कई बार भोजन पाने के लिए सेना के जवानों के जूते पौलिश करते थे.

लेकिन यहां भी समस्या ने उन का साथ नहीं छोड़ा. फिरोजपुर से हो कर जो सतलुज नदी गुजरती है, अगस्त महीने में उस में बाढ़ आ गई जिस से छत पर चढ़ कर उन्हें जान बचानी पड़ी. घर का सारा सामान बह चुका था.

फिरोजपुर में तकलीफें झेल चुके मिल्खा ने दिल्ली का रुख करने का मन बनाया. सुना था कि वहां काम ढूंढना आसान होता है. उन की प्राथमिकता दिल्ली पहुंचने की थी लेकिन ट्रेन में इतनी भीड़ थी कि उस में घुसना भी मुश्किल था. किसी तरह उन्होंने भाभी को महिला डिब्बे में घुसा दिया और खुद ट्रेन की छत पर चढ़ गए.

जिस ट्रेन से वह दिल्ली  गए थे, उस में भी कत्लेआम हुआ और दिल्ली पहुंचने पर उन्होंने उस ट्रेन में कई लाशें देखीं.

पुरानी दिल्ली स्टेशन पर वह उन हजारों शरणार्थियों की तरह ही थे, जो प्लेटफार्म पर खड़े थे, जिन्हें यह नहीं पता था कि जाना कहां है.

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चूंकि दिल्ली में रहने के लिए कोई जगह नहीं थी, उन्होंने कुछ दिन पुरानी दिल्ली रेलवे प्लेटफार्म पर ही अराजकता से भरे दिन बिताए. उन्होंने स्टेशन के बाहर जूते भी पौलिश किए. बाद में उन्हें पता चला कि उन की भाभी के मातापिता दिल्ली के शाहदरा इलाके में बस गए हैं. वह भाभी के मायके में चले तो गए, लेकिन उन्हें भाभी के घर पर रहने में घुटन महसूस हो रही थी, क्योंकि काफी समय यहां रहने पर वह खुद को एक बोझ सा समझने लगे थे.

हालांकि उन के लिए एक राहत की बात यह थी कि जब उन्हें पता चला कि उन की एक बहन ईश्वर कौर पास के ही एक स्थानीय इलाके में रह रही हैं तो वह रहने के लिए उन के पास चले गए. जब वह उन के घर पहुंचे तो परिवार का पुनर्मिलन आंसुओं भरा और मर्मस्पर्शी था. लेकिन वहां भी मिल्खा को यह अहसास हो गया कि बहन के अलावा अन्य लोगों को उन का वहां रहना जरा भी नहीं भाता था.

चूंकि मिल्खा के पास काम करने के लिए कुछ नहीं था, उन्होंने अपना समय सड़कों पर बिताना शुरू कर दिया और इस प्रक्रिया में वह बुरी संगत में पड़ गए. उन्होंने फिल्में देखना और उन के टिकट खरीद कर बेचना शुरू कर दिया.

साथ ही साथ अन्य लड़कों के साथ जुआ खेलना और चोरी करना भी शुरू कर दिया. उसी समय मिल्खा ने सुना कि उन के भाई माखन सिंह सेना की टुकड़ी के साथ भारत आ गए हैं. तब उन्हें उम्मीद जगी कि अब सारी चिंताएं दूर हो जाएंगी.

पढ़ाई में नहीं लगा मन

कुछ समय बाद उन के सब से बड़े भाई माखन सिंह को भारत के लाल किले में पोस्टिंग मिल गई. माखन सिंह मिल्खा को पास के एक स्कूल में ले गए और उन्हें 7वीं कक्षा में दाखिला करा दिया. परंतु अब उन्हें पढ़ाई करने में बिलकुल भी मन नहीं लग रहा था, जिस के कारण वह फिर से बुरी संगत में पड़ गए.

1949 में मिल्खा सिंह और उन के दोस्तों ने भारतीय सेना में शामिल होने के बारे में सोचा और लाल किले में हो रहे भरती कैंप में चले गए. हालांकि मिल्खा सिंह को रिजेक्ट कर दिया गया. उन्होंने 1950 में फिर से एक कोशिश की और फिर से उन्हें खारिज कर दिया गया.

2 बार अस्वीकार किए जाने के बाद उन्होंने एक मैकेनिक के रूप में काम करना शुरू कर दिया. बाद में उन्हें एक रबर फैक्ट्री में नौकरी मिल गई, जहां उन का वेतन 15 रुपए महीना था. लेकिन वह लंबे समय तक काम नहीं कर पाए, क्योंकि इस बीच उन्हें हीट स्ट्रोक आया और 2 महीने तक वह बिस्तर पर ही पड़े रहे.

1952 के नवंबर में उन्हें अपने भाई की मदद से आखिर सेना में नौकरी मिल ही गई और उन की पहली पोस्टिंग श्रीनगर में हुई. श्रीनगर से उन्हें सिकंदराबाद में भारतीय सेना की ईएमई (इलैक्ट्रिकल मैकेनिकल इंजीनियरिंग) इकाई में भेजा गया.

वहां पर रहते हुए उन्होंने पहली बार जनवरी 1953 में 6 मील (लगभग 10 किमी) क्रौस कंट्री रेस में भाग लिया और 6ठे स्थान पर रहे. उस के बाद उन्होंने अपनी पहली 400 मीटर दौड़ 63 सेकंड में ब्रिगेड मीट में पूरी की और चौथे स्थान पर रहे. फिर उन्होंने पूर्व एथलीट गुरदेव सिंह से ट्रेनिंग लेनी शुरू कर दी.

जीतने की धुन हुई सवार

उस वक्त अकसर 400 मीटर दौड़ के अभ्यास के दौरान कभीकभी उन की नाक से खून निकलने लगता था. परंतु उन्हें जीतने की इतनी धुन सवार थी कि उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था.

समय बीतता गया और एक एथलीट के रूप में वह दिनबदिन निखरते गए. आज उन्होंने जो पाया है, यकीनन वह उस के हकदार हैं. एक एथलीट के रूप में सभी भारतीयों को उन पर गर्व है.

बाद में सेना में एथलीट बनने के उन के ऐसे संघर्ष की शुरुआत हुई, जिस ने मिल्खा सिंह को खेल के आसमान में चमकने वाला ऐसा धु्रव तारा बना दिया, जिस का उदय अब शायद ही कभी होगा.

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नए कीर्तिमान किए स्थापित

मिल्खा सिंह ने दौड़ के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा को पहचान लिया था. इस के बाद उन्होंने सेना में कड़ी मेहनत शुरू की और 200 मीटर और 400 मीटर प्रतिस्पर्धा में अपने आप को स्थापित किया. उन्होंने एक के बाद एक कई प्रतियोगिताओं में सफलता हासिल की.

उन्होंने सन 1956 के मेलबोर्न ओलिंपिक खेलों में 200 और 400 मीटर में भारत का प्रतिनिधित्व किया पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुभव न होने के कारण सफल नहीं हो पाए. लेकिन 400 मीटर प्रतियोगिता के विजेता चार्ल्स जेंकिंस के साथ हुई मुलाकात ने उन्हें न सिर्फ प्रेरित किया, बल्कि ट्रेनिंग के नए तरीकों से अवगत भी कराया.

इस के बाद सन 1958 में कटक में आयोजित राष्ट्रीय खेलों में उन्होंने 200 मीटर और 400 मीटर प्रतियोगिता में राष्ट्रीय कीर्तिमान स्थापित किए और एशियन खेलों में भी इन दोनों प्रतियोगिताओं में स्वर्ण पदक हासिल किए.

साल 1958 में उन्हें एक और महत्त्वपूर्ण सफलता मिली, जब उन्होंने ब्रिटिश राष्ट्रमंडल खेलों में 400 मीटर प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल किया. इस प्रकार वह राष्ट्रमंडल खेलों के व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाले स्वतंत्र भारत के पहले खिलाड़ी बन गए.

मिल्खा सिंह ने खेलों में उस समय सफलता प्राप्त की, जब खिलाडि़यों के लिए कोई सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं, न ही उन के लिए किसी ट्रेनिंग की व्यवस्था थी. आज इतने सालों बाद भी कोई एथलीट ओलंपिक में पदक पाने में कामयाब नहीं हो सका है.

रोम ओलंपिक शुरू होने तक मिल्खा सिंह इतने लोकप्रिय हो गए थे कि जब वह स्टेडियम में घुसते थे तो दर्शक उन का जोशपूर्वक स्वागत करते थे.

रोम ओलंपिक में हो गई बड़ी चूक

दरअसल, मिल्खा सिंह की लोकप्रियता का एक अन्य कारण यह था कि रोम पहुंचने के पूर्व वह यूरोप के कई टूर में अनेक बड़े खिलाडियों को हरा चुके थे और उन के रोम पहुंचने से पहले उन की लोकप्रियता की चर्चा वहां पहुंच चुकी थी.

हालांकि वहां वह कोई टौप के खिलाड़ी नहीं थे, लेकिन श्रेष्ठ धावकों में उन का नाम अवश्य था. उन की लोकप्रियता का दूसरा कारण उन की बढ़ी हुई दाढ़ी व लंबे बाल थे. लोग उस वक्त सिख धर्म के बारे में अधिक नहीं जानते थे. लोगों को लगता था कि कोई साधु इतनी अच्छी दौड़ लगा रहा है. उस वक्त ‘पटखा’ का चलन भी नहीं था, अत: सिख सिर पर रुमाल बांध लेते थे. मिल्खा सिंह के जीवन में 2 घटनाएं सब से ज्यादा महत्त्व रखती हैं.

पहली भारत पाकिस्तान का विभाजन जब उन के परिवार का पाकिस्तान में हुए कत्लेआम में खात्मा कर दिया गया, तब वह पहली बार रोए थे.  दूसरी घटना रोम ओलंपिक में उन का पदक पाने से चूक जाना था, जब वे दूसरी बार बिलखबिलख कर रोए.

रोम ओलिंपिक खेल शुरू होने से कुछ साल पहले से ही मिल्खा सिंह अपने खेल जीवन के सर्वश्रेष्ठ फौर्म में थे और ऐसा माना जा रहा था कि इन खेलों में मिल्खा पदक जरूर जीतेंगे.

रोम में 1960 के ओलंपिक खेलों में मिल्खा भारत के सब से बड़े पदक लाने की उम्मीद वाले खिलाडि़यों में से एक थे और उन के शानदार प्रदर्शन को देख कर देश उन से उम्मीदों पर खरे उतरने की उम्मीद कर रहा था.

लेकिन मिल्खा इस खेल में तीसरे स्थान पर भी नहीं रहे. दक्षिण अफ्रीका के मैल्कम स्पेंस ने ब्रोंज जीता था. हालांकि इस रेस में 250 मीटर तक मिल्खा पहले स्थान पर भाग रहे थे, लेकिन इस के बाद उन की गति कुछ धीमी हो गई और बाकी के धावक उन से आगे निकल गए थे. खास बात यह है कि 400 मीटर की इस रेस में मिल्खा उसी एथलीट से हारे थे, जिसे उन्होंने 1958 कौमनवेल्थ गेम्स में हरा कर स्वर्ण पदक पर कब्जा किया था.

दरअसल उन्होंने ऐसी भूल कर दी, जिस का पछतावा उन्हें मरते दम तक रहा. इस दौड़ के दौरान उन्हें लगा कि वह अपने आप को अंत तक उसी गति पर शायद नहीं रख पाएंगे और पीछे मुड़ कर अपने प्रतिद्वंदियों को देखने लगे, जिस का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा और वह धावक जिस से स्वर्ण की आशा थी कांस्य भी नहीं जीत पाया.

लेकिन 1960 के ओलंपिक में भले ही मिल्खा कांस्य पदक से चूक कर चौथे स्थान पर रहे. मगर उन का 45.73 सेकंड का ये रिकौर्ड अगले 40 साल तक नैशनल रिकौर्ड रहा.

मिल्खा को इस बात का अंत तक मलाल रहा. इस असफलता से वह इतने निराश हुए कि उन्होंने दौड़ से संन्यास लेने का मन बना लिया पर बहुत समझाने के बाद मैदान में फिर वापसी की.

1960 में पाकिस्तान में एक इंटरनैशनल एथलीट दौड़ प्रतियोगिता में हिस्सा लेने जाने का न्यौता मिला,  लेकिन बचपन की घटनाओं की वजह से वह वहां जाने से हिचक रहे थे. लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समझाने पर वह इस के लिए राजी हो गए, क्योंकि दोनों देशों की मित्रता के लिए हो रहे प्रयासों के बीच उन के पाकिस्तान नहीं जाने से राजनीतिक उथलपुथल का संदेश जा सकता था. इसलिए उन्होंने दौड़ने का न्यौता स्वीकार लिया.

बहरहाल, रोम ओलंपिक के बाद हुए  टोक्यो एशियाई खेलों में मिल्खा ने 200 और 400 मीटर की दौड़ जीत कर भारतीय एथलेटिक्स के लिए नए इतिहास की रचना की. जब उन्होंने पहले दिन 400 मीटर दौड़ में भाग लिया. उन्हें जीत का पहले से ही विश्वास था, क्योंकि एशियाई क्षेत्र में उन का बेहतरीन  कीर्तिमान था.

शुरूशुरू में जो तनाव था, वह स्टार्टर की पिस्तौल की आवाज के साथ रफूचक्कर हो गया. उम्मीद के अनुसार उन्होंने सब से पहले फीते को छुआ और नया रिकौर्ड कायम किया.

जापान के सम्राट ने जब उन के गले में स्वर्ण पदक पहनाया तो उस क्षण का रोमांच मिल्खा शब्दों में व्यक्त नहीं कर सके. इस के अगले दिन 200 मीटर की दौड़ थी. इस में मिल्खा का पाकिस्तान के अब्दुल खालिक के साथ कड़ा मुकाबला था.

खालिक 100 मीटर का विजेता था. दौड़ शुरू हुई और दोनों के कदम एक साथ पड़ रहे थे. फिनिशिंग टेप से 3 मीटर पहले मिल्खा की टांग की मांसपेशी खिंच गई और वह लड़खड़ा कर गिर पड़े.

चूंकि वह फिनिशिंग लाइन पर ही गिरे थे इसलिए फोटो फिनिश रिव्यू में उन्हें विजेता घोषित किया गया और इस तरह मिल्खा एशिया के सर्वश्रेष्ठ एथलीट बन गए. जापान के सम्राट ने उस समय मिल्खा से जो शब्द कहे थे, वह मरते दम तक कभी नहीं भूले. उन्होंने उन से कहा था, ‘दौड़ना जारी रखोगे तो तुम्हें विश्व का सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त हो सकता है. बस, दौड़ना जारी रखो.’

पाकिस्तान में मिल्खा का मुकाबला एशिया के सब से तेज धावक माने जाने वाले अब्दुल खालिक से था. यह मिल्खा की जिंदगी का सब से रोमांचक दबाव भरा और भावनाओं की उथलपुथल भरा मुकाबला था. लेकिन इस मुकाबले में जीत के लिए मिल्खा ने अपना सर्वस्व झोंक दिया.

इस दौड़ में मिल्खा सिंह ने सरलता से अपने सभी प्रतिद्वंद्वियों को परास्त कर दिया और आसानी से जीत गए. इस मुकाबले में अधिकांशत: मुसलिम दर्शक इतने प्रभावित हुए कि पूरी तरह बुर्कानशीन औरतों ने भी इस महान धावक को गुजरते देखने के लिए अपने नकाब तक उतार दिए थे.

मिला फ्लाइंग सिख का खिताब

यही कारण रहा कि अब्दुल खालिक को हराने के बाद उस समय पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान ने मिल्खा सिंह से कहा था, ‘आज तुम दौड़े नहीं उड़े हो. इसलिए हम तुम्हें फ्लाइंग सिख के खिताब से नवाजते हैं.’ इस के बाद से मिल्खा सिंह को पूरी दुनिया में ‘फ्लाइंग सिख’ के नाम से जाना जाने लगा.

एक के बाद एक रेस जीतने और कई रिकौर्ड अपने नाम पर दर्ज करा चुके मिल्खा धीरेधीरे अपने करियर में आगे बढ़ते रहे. मिल्खा सिंह के करियर का मुख्य आकर्षण 1964 का एशियाई खेल था, जहां उन्होंने 400 मीटर और 4×400 मीटर रिले स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक जीते.

टोक्यो में आयोजित हुए 1964 ओलंपिक में मिल्खा सिंह का प्रदर्शन यादगार नहीं था, जहां वह केवल एक ही इवेंट में भाग ले रहे थे, वह था 4×400 मीटर रिले दौड़ में मिल्खा सिंह के नेतृत्व वाली भारतीय टीम गरमी के कारण आगे बढ़ने में असमर्थ रही, जिस के बाद इस असफलता से निराश लंबे समय तक मिल्खा सिंह ने अपने दौड़ने वाले जूते लटका दिए थे.

कभीकभार जब मिल्खा सिंह से उन की 80 दौड़ों में से 77 में मिले अंतरराष्ट्रीय पदकों के बारे में पूछा जाता था तो वह कहते थे, ‘ये सब दिखाने की चीजें नहीं हैं, मैं जिन अनुभवों से गुजरा हूं, उन्हें देखते हुए वे मुझे अब भारत रत्न भी दे दें तो मेरे लिए उस का कोई महत्त्व नहीं है.’

बता दें कि आज की तारीख में भारत के पास बैडमिंटन से ले कर शूटिंग तक में वर्ल्ड चैंपियन हैं. बावजूद इस के ‘फ्लाइंग सिख’ मिल्खा सिंह की ख्वाहिश अधूरी है. वह दुनिया छोड़ने से पहले भारत को एथलेटिक्स में ओलंपिक मेडल जीतते देखना चाहते थे.

1958 के एशियाई खेलों में मिल्खा सिंह के बेहतरीन प्रदर्शन के बाद सेना ने मिल्खा सिंह को जूनियर कमीशंड औफिसर के तौर पर प्रमोशन कर सम्मानित किया था. बाद में उन्हें पंजाब के शिक्षा विभाग में खेल निदेशक के पद पर नियुक्त किया गया और इसी पद से मिल्खा सिंह साल 1998 में रिटायर्ड हुए.

पहली जुलाई, 2012 को उन्हें भारत का सब से सफल धावक माना गया, जिन्होंने ओलंपिक्स खेलों में लगभग 20 पदक अपने नाम किए हैं. यह अपने आप में ही एक रिकौर्ड है. मिल्खा सिंह ने अपने जीते गए सभी पदकों को देश के नाम समर्पित कर दिया था, पहले उन के मैडल्स को जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में रखा गया था, लेकिन फिर बाद में पटियाला के एक गेम्स म्यूजियम में मैडल्स ट्रांसफर कर दिए गए.

जब नेहरू ने मिल्खा सिंह से कहा मांगो क्या मांगते हो

आजादी के फौरन बाद वैश्विक खेल मंच पर अगर किसी एक खिलाड़ी ने भारत का सिर ऊंचा किया तो वह थे मिल्खा सिंह. मिल्खा ने अपनी जिंदगी में कई यादगार रेस पूरी की थीं, मगर 1958 की उस रेस के बाद सब कुछ बदल गया था.

1958 की उस गौरवशाली रेस की कहानी, मिल्खा सिंह के शब्दों में जानना ज्यादा दिलचस्प होगा.

‘मैं टोक्यो एशियन गेम्स में 2 गोल्ड मैडल्स (200 मीटर और 400 मीटर) जीत कर 1958 के कौमनवेल्थ गेम्स (कार्डिफ, वेल्स) में हिस्सा लेने पहुंचा था. जमैका, साउथ अफ्रीका, केन्या, इंग्लैंड, कनाडा और आस्ट्रेलिया के वर्ल्ड क्लास एथलीट्स वहां थे. कार्डिफ में चुनौती बेहद तगड़ी थी और कार्डिफ के लोग सोचते थे, अरे इंडिया क्या है, इंडिया इज नथिंग.

‘मुझे यकीन नहीं था कि मैं कौमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीत सकता हूं. उस तरह का भरोसा कभी रहा ही नहीं क्योंकि मैं वर्ल्ड रेकौर्ड होल्डर मैल्कम क्लाइव स्पेंस (साउथ अफ्रीका) से टक्कर ले रहा था. वह उस समय 400 मीटर में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धावक थे.

‘मैं अपने अमेरिकन कोच डा. आर्थर डब्यू  हावर्ड को क्रेडिट दूंगा. पूरी रेस की रणनीति उन्होंने ही तैयार की थी. उन्होंने स्पेंस को पहले और दूसरे राउंड में दौड़ते हुए देखा. फाइनल रेस से पहले वाली रात वह चारपाई पर बैठे और मुझ से कहा, ‘मिल्का, मैं थोड़ीबहुत हिंदी ही समझता हूं लेकिन मैं तुम्हें मैल्कम स्पेंस की रणनीति के बारे में बताता हूं और यह भी कि तुम्हें क्या करना चाहिए.’

कोच ने मुझ से कहा कि स्पेेंस अपनी रेस के शुरुआती 300-350 मीटर धीमे दौड़ता है और फाइनल स्ट्रेच में बाकियों को पछाड़ देता है. डा. हावर्ड ने कहा, ‘तुम्हें शुरू से ही पूरी स्पीड से दौड़ना होगा. क्योेंकि तुम में स्टैमिना है. अगर तुम ऐसा करोगे तो स्पेंस अपनी रणनीति भूल जाएगा.’

‘मैं आउटर लेन पर था, नंबर 5 वाली और स्पेंस दूसरी लेन पर था. कार्डिफ आर्म्स पार्क स्टेडियम में रेस होनी थी. उन दिनों एक बैग से जो नंबर चुनते थे, उस के आधार पर लेन अलाट होती थी. इसी वजह से मुझे 5 नंबर वाली लेन मिली. मतलब हमें शुरुआती राउंड में पहले दौड़ना था, फिर क्वार्टर फाइनल में, सेमीफाइनल में और फाइनल में भी.

‘मैं शुरू से ही पूरा दम लगा कर भागा, आखिरी 50 मीटर तक बड़ी तेज दौड़ा. स्पेंस को अहसास हो गया कि मिल्खा बहुत आगे निकल गया है. मुझे दिख रहा था कि स्पेंस अपनी रणनीति भूल गया है क्योंकि वह मेरी बराबरी में लगा था.

‘वह तेज दौड़ने लगा और आखिर में वह मुझ से एक फुट ही पीछे था. वह आखिर तक मेरे कंधों के पास था, मगर मुझे हरा नहीं पाया. मैं ने 46.6 सेकेंड्स में रेस खत्म की और उस ने 46.9 में. डा. हावर्ड का शुक्रिया कि मैं ने गोल्ड मेडल जीता.

‘मैं अपनी जीत पर यकीन तक नहीं कर पा रहा था और उस महिला ने मेरी तारीफों के पुल बांधने शुरू कर दिए. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि वह महिला कौन है. इतने में अचानक अपना परिचय देते हुए उस महिला ने कहा, ‘आप ने शायद मुझे पहचाना नहीं, मैं पंडितजी की बहन हूं.’ जी हां, वह महिला थीं तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरूजी की बहन विजयलक्ष्मी पंडित.

‘विजयलक्ष्मी पंडित ने उसी समय मेरी बात पंडित नेहरू से ट्रंक काल के जरिए करवाई. मेरे लिए यह गर्व का क्षण था. पंडितजी ने कहा आज आप ने देश का नाम रोशन किया है. मिल्खा, तुम्हें क्या चाहिए?

‘उस वक्त मुझे पता नहीं था कि क्या  मांगना चाहिए. मैं 200 एकड़ जमीन या दिल्ली में घर मांग सकता था और मुझे मिल भी जाता, लेकिन मैं ने कहा मुझे मांगना नहीं आता. इसीलिए अगर वह कर सकते हैं तो देश भर में एक दिन की छुट्टी घोषित कर दें और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ऐसा ही किया. मिल्खा सिंह के यह कहने से पंडित जवाहरलाल उन की काबीलियत के साथसाथ उन की ईमानदारी के भी कायल हो गए.’

अंतरराष्ट्रीय गेम्स प्रतियोगिताओं की महत्ता उस दौर में भी वही थी और आज भी उन का जादू जस का तस बरकरार है. फर्क बस इतना है कि पहले खिलाड़ी देश के लिए खेलते थे और आज खेल पैसों के लिए खेला जाता है. लेकिन मिल्खा सिंह उस दौर के खेलों के लिए समर्पित इकलौते ऐसे खिलाड़ी थे जिन्हें जीवनपर्यंत दौलत का मोह नहीं रहा.

लव मैरिज हुई थी निर्मल कौर से

मिल्खा सिंह और निर्मल कौर की मुलाकात साल 1955 में श्रीलंका के कोलंबो में हुई थी.  मिल्खा सिंह और निर्मल कौर 1955 में कोलंबो में एक टूर्नामेंट में हिस्सा लेने गए थे. निर्मल कौर उस समय भारतीय महिला वालीबाल टीम की कप्तान थीं, जबकि मिल्खा सिंह एथलेटिक्स टीम का हिस्सा थे.

पहली नजर में मिल्खा को निर्मल पसंद आ गईं. दोनों ने एकदूसरे से काफी बातें कीं. जब वापस जाने लगे तो मिल्खा सिंह अपने होटल का पता लिख कर देने लगे. जब कोई कागज नहीं मिला तो उन्होंने निर्मल के हाथ पर ही होटल का नंबर लिख दिया.

फिर बातें और मुलाकातें होने लगीं और बात शादी तक पहुंच गई. लेकिन शादी में भी अड़चन आ गई. निर्मल पंजाबी खत्री फैमिली से थीं. इसलिए परिवार शादी के लिए राजी नहीं हो रहा था.

प्यार परवान चढ़ चुका था और निर्मल कौर का परिवार मिल्खा सिंह से शादी के लिए तैयार नहीं था. उन की शादी में अड़चन की बात भी कई लोगों तक पहुंच चुकी थी.

पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों को पता चला तो वह मदद के लिए आगे आए और दोनों परिवारों से बात कर शादी तय करवा दी. साल 1962 में दोनों शादी के बंधन में बंध गए.

एक इंटरव्यू में मिल्खा सिंह ने कहा था कि हर खिलाड़ी और एथलीट की जिंदगी में प्यार आता है, उसे हर स्टेशन पर एक प्रेम कहानी मिलती है. मिल्खा सिंह की जिंदगी में 3 लड़कियां आईं. तीनों से प्यार हुआ, लेकिन शादी उन्होंने निर्मल कौर से की.

मिल्खा सिंह ने कई बार सार्वजनिक तौर पर अपनी पत्नी की तारीफ की थी. उन्होंने कहा था कि वे खुद 10वीं पास थे. बच्चों को पढ़ाने और संस्कार देने में उन की पत्नी निर्मल का ही अहम रोल रहा. उन की गैरमौजूदगी में निर्मल ने बच्चों की पढ़ाई और बाकी सभी बातों का ध्यान रखा. वह अपनी पत्नी को सब से बड़ी ताकत मानते थे.

शादी के बाद उन के 4 बच्चे हुए, जिन में 3 बेटियां और एक बेटा है. मिल्खा सिंह के बेटे जीव मिल्खा सिंह इंटरनैशनल स्तर पर एक जानेमाने गोल्फर हैं. जीव ने 2 बार एशियन टूर और्डर औफ मेरिट जीता है. उन्होंने साल 2006 और 2008 में यह उपलब्धि हासिल की थी. 2 बार इस खिताब को जीतने वाले जीव भारत के एकमात्र गोल्फर हैं. वह यूरोपियन टूर, जापान टूर और एशियन टूर में खिताब जीत चुके हैं.

जीव मिल्खा सिंह को पद्मश्री सम्मान से नवाजा जा चुका है. ऐसे में मिल्खा सिंह और उन के बेटे जीव मिल्खा सिंह देश के ऐसे इकलौते पितापुत्र जोड़ी हैं, जिन्हें खेल उपलब्धियों के लिए पद्मश्री मिला है.

साल 1999 में मिल्खा सिंह ने 7 साल के एक बेटे को भी गोद ले लिया था. जिस का नाम हवलदार बिक्रम सिंह था, जोकि टाइगर हिल के युद्ध में शहीद हो गया था.

मिल्खा सिंह ने बाद में खेल से संन्यास ले लिया और भारत सरकार के साथ खेलकूद के प्रोत्साहन के लिए काम करना शुरू किया. अब वह चंडीगढ़ में रहते थे. मिल्खा सिंह देश में होने वाले विविध तरह के खेल आयोजनों में शिरकत करते रहे.

हैदराबाद में 30 नवंबर, 2014 को हुए 10 किलोमीटर के जियो मैराथन-2014 को उन्होंने झंडा दिखा कर रवाना किया. अपने जीवन के अंत समय तक वह युवाओं को खेलों के लिए प्रेरणा देते रहे.

जापान ओलंपिक में यूपी के विजेताओं को मिलेगी इनामी धनराशि

खेलों को बढ़ावा देने वाली प्रदेश सरकार इस साल टोकियो (जापान) में होने वाले ओलंपिक गेम्स में भाग लेने वाले प्रत्येक खिलाड़ी को 10 लाख रुपये देगी. एकल और टीम खेलों में पदक लेकर लौटने वाले खिलाड़ियों का भी उत्साह बढ़ाएगी. यूपी से 10 खिलाड़ी विभिन्न स्पर्धाओं में भाग लेने के लिये टोकियो जाएंगे. राज्य सरकार ओलंपिक खेलों में होने वाले एकल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले खिलाड़ियों को 6 करोड़ रुपये, रजत पाने वालों खिलाड़ी को 4 करोड़ रुपये और कांस्य पदक लाने वाले खिलाड़ियों को 2 करोड़ रुपये देगी.

सीएम योगी ने प्रदेश की कमान संभालने के बाद से लगातार खिलाड़ियों की सुविधाओं में बढ़ोत्तरी की है. खिलाड़ियों की प्रतिभा को और निखारने और सुविधाओं को बढ़ाने का भी काम किया है. सरकार ने टोकियो में आयोजित होने वाले ओलंपिक में टीम खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर लाने वाले खिलाड़ी को 3 करोड़ रुपये, रजत लाने पर 2 करोड़ रुपये और कांस्य लाने पर 1 करोड़ रुपये देने का निर्णय लिया है.

‘खूब खेलो-खूब बढ़ो’ मिशन को लेकर यूपी में खिलाड़ियों को राज्य सरकार बहुत मदद दे रही है. खेल में निखार लाने के लिये खिलाड़ियों के बेहतर प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई है. प्रशिक्षण देने वाले विशेषज्ञ कोच नियुक्त किये गये हैं. छात्रावासों में खिलाड़ियों की सहूलियत बढ़ाने के साथ-साथ नए स्टेडियमों का निर्माण भी तेजी से कराया है. गौरतलब है कि अपने कार्यकाल में योगी सरकार ने 19 जनपदों में 16 खेलों के प्रशिक्षण के लिये 44 छात्रावास बनवाए हैं. खेल किट के लिये धनराशि को 1000 से बढ़ाकर 2500 रुपये किया गया है.

आशा वर्कर जानेंगी बुजुर्गों की सेहत का हाल

बुजुर्गों की बेहतर सेहत के लिए प्रदेश सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. खासकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे और डायलिसिस करवा रहे बुजुर्गों की तीमारदारी में अब आशा वर्कर तैनात की जाएंगी. प्रदेश भर में आशा वर्कर इन बीमारियों से जंग लड़ रहे बुजुर्गों की सूची तैयार करेंगी और इनसे संवाद स्‍थापित कर रोजाना सेहत का हाल जानेंगी. साथ ही दवा और जांच कराने में भी इन बुजुर्गों की मदद करेंगी. मुख्‍यमंत्री ने एक उच्‍च स्‍तरीय बैठक में यह निर्देश जारी किए हैं.

मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ ने प्रदेश के वरिष्‍ठ नागरिकों की स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं को और बेहतर बनाने के निर्देश दिए हैं. चिकित्‍सा एवं स्‍वास्‍थ्‍य विभाग को वरिष्‍ठ नागरिकों की सूची बनाने को कहा गया है. इससे जरूरत पड़ने पर हर संभव मदद पहुंचाने में आसानी होगी. इस काम में आशा वर्कर अहम रोल अदा करेंगी. अभी तक प्रदेश की 10 लाख 71 हजार से अधिक आशा वर्कर ग्रामीण व शहरी इलाकों में महिलाओं व बच्‍चों को स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी सेवाएं मुहैया कराने में मदद करती है. अब आशा वर्कर प्रदेश के वरिष्‍ठ नागरिकों की सेहत का ख्‍याल भी रखेंगी. आशा वर्कर अपने इलाके के वरिष्‍ठ नागरिकों की सूची तैयार करेंगी. खासकर कैंसर व डायलिसिस पीडि़त मरीजों पर इनका विशेष ध्‍यान होगा. इसके बाद आशा वर्कर रोजाना इनसे संवाद स्‍थापित करेंगी और सेहत का हालचाल पूछेंगी. वरिष्‍ठ नागरिकों को दवा व जांच कराने में सहयोग करेंगी.

एक कॉल पर मिलेगी एम्‍बुलेंस व दवा

चिकित्‍सा एवं स्‍वास्‍थ्‍य विभाग वरिष्‍ठ नागरिकों की बेहतर सेहत के लिए बनाई गई विशेष हेल्‍पलाइन नम्‍बर 14567 को और प्रभावी बनाने जा रहा है. ताकि सेहत से जुड़ी कोई समस्‍या होने पर बुजुर्गों तक फौरन मदद पहुंचाई जा सके. इसके अलावा हेल्‍पलाइन नम्‍बर की जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए बड़ा जन जागरूकता अभियान भी शुरू किया जाएगा, ताकि अधिक लोगों को इस सेवा का लाभ मिल सके. हेल्‍पलाइन के जरिए विशेष परिस्थितियों में बुजुर्गों को एक कॉल पर एम्बुलेंस और दवा भी पहुंचाने का काम विभाग करेगा. चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग अगले 8-10 महीने में इसे लेकर अपनी कार्ययोजना तैयार करेगा.

अकेले रहने वाले बुजुर्गों के लिए योजना बनेगी वरदान

प्रदेश सरकार अकेले रहने वाले बुजुर्गों की बेहतर सेहत के लिए विशेष योजना तैयार कर रही है. इस योजना के तहत ऐसे बुजुर्गों की देखरेख के लिए एक व्‍यक्ति तैनात किया जाएगा. जो अकेले रह रहे बुजुर्ग को जरूरत पड़ने पर दवा पहुंचाने के साथ जांच के लिए अस्‍पताल ले जाएगा और उनको घर तक पहुंचाएगा. चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग अगले 8-10 महीने में इसे लेकर अपनी कार्ययोजना तैयार करेगा.

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