Manohar Kahaniya: पुलिस में भर्ती हुआ जीजा, नौकरी कर रहा साला!- भाग 2

अनिल कुमार के बारे में विस्तृत जानकारी जुटाने के बाद पुलिस टीम अनिल को साथ ले कर ठाकुरद्वारा कोतवाली आ गई.

कोतवाली लाते ही पुलिस ने अनिल से पूछताछ शुरू की तो सारा फरजीवाड़ा खुल कर सामने आ गया. अनिल बतौर एक सिपाही उत्तर प्रदेश पुलिस में भरती हुआ, लेकिन उस की जगह पर उसी का साला सुनील कुमार पिछले 5 साल से उस की एवज में नौकरी करता रहा.

पुलिस विभाग की लापरवाही आई सामने

इस फरजीवाड़े के सामने आते ही पुलिस को संदेह हो गया कि अनिल ने पुलिस में भरती होने के लिए शैक्षिक प्रमाणपत्रों में भी कोई फरजीवाड़ा किया होगा.

अब पता चला कि थाने से जो तथाकथित सिपाही भागा था, वह अनिल का साला सुनील कुमार था. सुनील कुमार अभी तक पुलिस पकड़ से बाहर था.

पुलिस ने उसे हरसंभव स्थान पर खोजा, लेकिन उस का कहीं भी अतापता न चल सका. उस की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने हर जगह मुखबिरों का जाल बिछा दिया था.

अगले दिन एक मुखबिर से सूचना मिली कि फरजी सिपाही सुनील ठाकुरद्वारा बसस्टैंड तिकोनिया चौराहे के पास कहीं जाने की फिराक में खड़ा है.

यह जानकारी मिलते ही पुलिस ने चारों ओर से घेराबंदी कर उसे अपनी हिरासत में ले लिया. पुलिस ने आरोपी के पास से पुलिस की वरदी भी बरामद की.

सुनील को थाने लाते ही उस से भी कड़ी पूछताछ की गई. वहां अपने बहनोई अनिल को देख कर उस के होश उड़ गए. जीजासाले से गहन पूछताछ के दौरान जो हैरतअंगैज कहानी उभर कर सामने आई, उस ने न केवल पुलिस विभाग की लापरवाही की पोल खोल दी, बल्कि जीजासाले के रिश्ते का रहस्य भी सामने ला दिया था.

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सिपाही अनिल और उस का साला फरजी सिपाही सुनील दोनों ही जिला मुजफ्फरनगर के खतौली थानाक्षेत्र के अलगअलग गांव के रहने वाले थे. दोनों की बहुत पुरानी दोस्ती थी.

दोस्ती होने के नाते दोनों का ही एकदूसरे के घर आनाजाना था. दोनों ने एक ही साथ पुलिस में भरती होने के लिए आवेदन भी किया था. जिस में अनिल का चयन तो हो गया था, लेकिन सुनील फेल हो गया था.

अनिल और सुनील थे गहरे दोस्त

जिला मुजफ्फरनगर के खतौली थानाक्षेत्र में पड़ता है एक गांव दहौड़. इसी गांव में रहते थे सुखपाल सिंह. सुखपाल सिंह का सुखी संपन्न परिवार था. उन के 3 बेटे थे. तीनों ने ही उचित शिक्षा भी ग्रहण की थी. सुखपाल सिंह स्वयं पंजाब में रेलवे विभाग में कार्यरत थे.

उन के तीनों बेटों में अनिल सब से छोटा था. अनिल शुरू से ही एक टीचर बनने के सपने देखा करता था. यही कारण था कि जैसे ही उस ने अपनी शिक्षा पूरी की, शिक्षा विभाग में जाने की तैयारी शुरू कर दी.

उसी दौरान एक दिन उस की मुलाकात मुजफ्फरनगर के ही गांव गंधाड़ी निवासी सुनील से हुई. सुनील उस का बचपन का दोस्त था. सुनील एक सामान्य परिवार से था. उस के पिता राजपाल मेहनतमजदूरी कर अपने परिवार का पेट पालते थे. रामपाल सिंह के 4 बच्चों में सुनील चौथे नंबर का था. उस से बड़ी उस की एक बहन थी.

सुनील उस वक्त पुलिस में जाने की तैयारी में जुटा था. वह सुबहशाम दौड़ लगाने जाता था. उसी दौरान सुनील ने अनिल से कहा कि यार तेरे शरीर की अच्छी फिटनैस है. अगर तू पुलिस में जाने की तैयारी करे तो तेरा नंबर बड़ी आसानी से आ सकता है.

हालांकि अनिल ने बीएड कर लिया था. उस के बाद उसे टेट की परीक्षा भी पास करनी थी. यह परीक्षा पास करने के बाद ही वह शिक्षा विभाग में नौकरी के लिए आवेदन कर सकता था. इस के बाद भी जरूरी नहीं कि उसे नौकरी मिले.

यही सोच कर अनिल ने सुनील के कहने पर पुलिस में भरती की तैयारी शुरू कर दी. हालांकि अनिल पहले से ही पुलिस की नौकरी पसंद नहीं करता था. लेकिन जब सुनील ने उस से बारबार कहा तो उस का मन भी बदल गया.

अनिल और सुनील ने एक साथ पुलिस में भरती के लिए आवेदन किया. साथ ही दोनों ने तैयारी भी की थी. इस तैयारी में अनिल तो पास हो गया, लेकिन सुनील पास न हो सका.

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अनिल हुआ पुलिस में भरती

अनिल का चयन हो जाने के बाद सब से पहले वर्ष 2011 में पुलिस में आरक्षी पद पर जिला मुजफ्फरनगर में भरती हुआ. जिस की ट्रेनिंग बरेली पुलिस लाइन में हुई थी. लेकिन ट्रेनिंग के दौरान अनिल ने सारी परीक्षाएं छोड़  दीं, जिस के कारण वह फेल हो गया.

उस के बाद फिर से उसे एक और मौका मिला. उस के बाद ही 3 महीने की आरक्षी की ट्रेनिंग पीटीएस मुरादाबाद में हुई. अनिल वहां भी एक विषय में फेल हो गया. अगली बार उस की आरक्षी की ट्रेनिंग पीएसी गोरखपुर में हुई. वहां पर पासआउट होने के बाद आरक्षी की प्रथम पोस्टिंग जनपद बरेली पुलिस लाइन में हुई.

पुलिस लाइन बरेली से उस की पोस्टिंग भोजीपुरा में हुई. बाद में 2016 तक आरक्षी अनिल की पोस्टिंग कभी बरेली में, कभी पुलिस लाइन और कभी थाने पर रही. इस दौरान सुनील हर जगह उसी के साथ ही रहा.

उसी दौरान एकदूसरे के घर आनेजाने के दौरान ही अनिल सुनील की बहन को चाहने लगा था. हालांकि सुनील के घर की माली हालत उस वक्त सही नहीं थी. लेकिन जब अनिल उस की बहन शालू को चाहने लगा तो दोनों के संबंधों में और भी मधुरता आ गई थी.

सुनील हर समय ही अनिल के सामने अपनी किस्मत का रोना रोता रहता था, जिसे देख कर अनिल को भी बहुत दुख होता था. सुनील की हालत देख कर एक दिन अनिल ने उस से कहा, ‘‘दोस्त परेशान मत हो, एक दिन तेरी भी इच्छा पूरी होगी और तू भी पुलिस की नौकरी करेगा.’’

दोस्त की बहन से हुआ प्यार

अनिल सुनील को अपना सब से अच्छा दोस्त समझता था. वैसे भी उस की इच्छा पुलिस में जाने की नहीं थी. इस के बाद वह सुनील की परेशानी को देख कर उस के लिए तरहतरह के उपाय खोलने लगा था.

साल 2016 में अनिल का स्थानांतरण बरेली से मुरादाबाद हो गया. मुरादाबाद पुलिस लाइन में अपनी आमद कराने के बाद वह विभिन्न जगहों पर ड्यूटी करता रहा. उस समय तक वह सुनील की बहन को इतना चाहने लगा था कि उस के बिना उस का कहीं भी मन नहीं लगता था.

इस के बावजूद भी वह न चाहते हुए पुलिस की नौकरी करता रहा. अनिल को उम्मीद थी कि एक न एक दिन उस की टीचर की नौकरी लग ही जाएगी. फिर वह पुलिस की नौकरी छोड़ कर शिक्षा विभाग में चला जाएगा.

सुनील की बहन शालू से प्यार हो जाने के बाद अनिल उस के बारे में भी सोचता रहता था. उसी समय एक दिन उस के दिमाग में एक ऐसा ही आइडिया आया.

उस ने सोचा कि किसी तरह से अपनी पुलिस की नौकरी सुनील को दे दूं. फिर में शिक्षक की नौकरी के लिए भी पूरी तैयारी कर सकूंगा.

यह विचार मन में आते ही उस ने इस बारे में सुनील से भी बात की. लेकिन उस की योजना को सुन कर सुनील बुरी तरह से घबरा गया था.

अगले भाग में पढ़ें- फरजी सिपाही बन कई साल की ड्यूटी

GHKKPM की पाखी ने अपने मंगेतर Neil Bhatt को दिया स्पेशल बर्थडे गिफ्ट, शेयर किया ये Heartouching पोस्ट

‘गुम है किसी के प्यार में’ फेम विराट यानी नील भट्ट (Neil Bhatt) इन दिनों अपने किरदार को लेकर सुर्खियों में छाये हुए हैं. शो में दर्शकों को विराट का किरदार खूब पसंद आ रहा है. 4 अगस्त को विराट यानी नील भट्ट ने अपना बर्थडे सेलिब्रेट किया. फैंस ने एक्टर को सोशल मीडिया पर बधाइयां और शुभकामनाएं दी. ऐसे नील भट्ट की मंगेतर ऐश्वर्या शर्मा यानी पाखी ने भी  विराट (Neil Bhatt) को जन्मदिन की बधाई दी है.

ऐश्वर्या शर्मा ने एक फोटो शेयर किया है. उन्होंने नील को गले लगाते हुए एक फोटो पोस्ट की है. इस फोटो को शेयर करते हुए ऐश्वर्या शर्मा ने कैप्शन में लिखा है कि हैप्पी बर्थडे बुबू.

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तो वहीं विराट यानी नील भट्ट ने रिप्लाई देते हुए लिखा, थैंक यू बच्चा. ऐश्वर्या शर्मा मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं. यह फोटो सोशल मीडिया पर जमकर वायरलस हो रहा है. फैंस इस फोटो को खूब पसंद कर रहे हैं.

 

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एक यूजर ने लिखा, नील सर आपको जन्मदिन की बधाई. आपको और ऐश्वर्या मैम की ये खूबसूरती हमेशा बनी रहे तो वहीं दूसरे ने लिखा, आप दोनों की जोड़ी सच में काफी जच रही है.

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आपको बता दें कि नील भट्ट और ऐश्वर्या शर्मा की मुलाकात सीरियल ‘गम है किसी के प्यार में’  के सेट पर हुई थी. इस सीरियल की शूटिंग के दौरान दोनों को एक दूसरे से प्यार हो गया. दोनों कुछ महीने पहले ही सगाई की. ‘गुम है किसी के प्यार में’  ऐश्वर्या शर्मा पाखी का किरदार निभा रही हैं.

 

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Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin: पाखी को तलाक देगा सम्राट! आएगा ये बड़ा ट्विस्ट

नील भटट्, आएशा सिंह  और ऐश्वर्या शर्मा स्टारर सीरियल ‘गुम है किसी के प्यार में’ (Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin)  में अब तक आपने देखा कि सई-विराट की नजदिकीयां देखकर पाखी मन ही मन सोचती है कि विराट की जिंदगी में अब उसकी कोई जगह नहीं है. तो उधर विराट सई को ट्रिप पर ले जाना चाहता है.  विराट ने सई से झूठ कहा है कि ये ट्रिप उसके ऑफिस की ओर से ऑर्गनाइज की गई है. शो के अपकमिंग एपिसोड में बड़ा ट्विस्ट आने वाला है. आइए बताते हैं, शो के आगे की कहानी.

शो के अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि विराट और सई हिल स्टेशन पर हनीमून मनाने निकल जाएंगे. विराट इस ट्रिप को यादगार बनाना चाहता है. वह  सई से अपने दिल की बात कहना चाहता है, इसलिए वह सई को ट्रिप पर ले जाएगा.

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तो वहीं शो में जल्द ही पाखी का पति यानी सम्राट की एंट्री होगी. जैसे ही विराट सई से अपने दिल की बात बताना चाहेगा तभी उसके सामने उसका भाई सम्राट आ जाएगा.

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शो में  सम्राट की एंट्री विलेन के तौर पर होगी. सम्राट विराट से कहेगा कि वह पाखी के साथ नहीं रहना चाहता है. वह पाखी को तलाक देना चाहता है. यह बात सुनकर विराट के पैरों तले जमीन ही खिसक जाएगी.

 

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विराट को समझ नहीं आएगा कि आखिर सम्राट ऐसा क्यों कह रहा है. वह अपने भाई को समझाना चाहेगा लेकिन सम्राट कोई भी बात सुनने से इंकार कर देगा. इतना ही नहीं, वह विराट से कहेगा कि सई नहीं, बल्कि पाखी उसकी असली जिम्मेदारी है. यह सुनकर विराट हैरान हो जाएगा. शो में ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या विराट सई को छोड़कर पाखी को आपनाएगा?

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दिशाएं और भी हैं- भाग 2

Writer- Sushila Dwivedi

‘‘नहीं बेटी, तू ने केस फाइल कर अच्छा नहीं किया. अब देख ही रही है उस का परिणाम… सब तरफ खबर फैल गई है… ऐसे हादसों को गुप्त रखने में ही भलाई होती है.’’

पापा की दलीलें सुन कर नमिता का सिर घूमने लगा, ‘‘यह क्या कह रहे हैं पापा? सत्यवीर, कर्मवीर पापा में कहां छिपी थी यह ओछी सोच जो मानमर्यादा के रूढ़ मानदंडों के लिए अन्याय सहने, छिपाने की बात कर रहे हैं? यही पापा कभी गर्व से कहा करते थे कि अपनी बेटियों को दहेज में दूंगा तो केवल शिक्षा, जो उन्हें आत्मनिर्भर बनाएगी. ये अपनी ऊंचनीच, अपने अधिकार और अन्याय के खिलाफ खुद ही निबटने में सक्षम होंगी. और आज जब मैं ने अपनी आत्मरक्षा अपने पूरे आत्मबल से की तो बजाय मेरी प्रशंसा के अन्याय को सहन करने, उसे बल देने की बात कह रहे हैं… मुझ पर गर्व करने वाले मातापिता अखबार में मेरी संघर्ष गाथा पढ़ कर यकायक संवेदनशून्य कैसे हो गए?’’

ग्वालियर मैडिकल कालेज में पढ़ने वाली नमिता की छोटी बहन रितिका ने भी पेपर में पढ़ा तो वह भी आ गई. अपनी दीदी से लिपट कर उसे धैर्य बंधाने लगी. दीदी के प्रति मांपापा के बदले व्यवहार से वह दुखी हुई. ऐसी उपेक्षा के बीच नमिता को बहन का आना अच्छा लगा.

मम्मीपापा जिस भय से भयभीत थे वह उन के सामने आ ही गया. फोन पर योगेशजी ने बड़ी ही नम्रता से नमिता के साथ अपने बेटे की सगाई तोड़ दी. मम्मी के ऊपर तो जैसे वज्रपात हुआ. वे फिर नमिता पर बरसीं, ‘‘अपनी बहादुरी का डंका पीट कर तुझे क्या मिला? सुरक्षित बच गई थी, चुप रह जाती तो आज ये दिन न देखने पड़ते. अच्छाभला रिश्ता टूट गया.’’

‘‘अच्छा रहा मां उन की ओछी मानसिकता पता चल गई. सोचो मां यही सब विवाह के बाद होता तब क्या वे लोग मुझ पर विश्वास करते जैसे अभी नहीं कर रहे? मैं उन लोगों को क्या दोष दूं, मेरे ही घर में जब सब के विश्वास को सांप सूंघ गया,’’ नमिता भरे स्वर में बोली.

अविश्वास के अंधेरे में घिरी थी नमिता कि क्या होगा उस का भविष्य? अंगूठी उस के मंगेतर ने सगाई की बड़ी हसरत और स्नेह से पहनाई थी. वह छुअन, वह प्रतीति उसे स्नेह में डुबोती रही थी. रोमांचित करती रही थी. क्याक्या सपने बुना करती थी वह. उस ने अपनी अनामिका को देखा जहां हीरे की अंगूठी चमक रही थी. वही अंगूठी अब चुभन पैदा करने लगी थी. रिश्ते क्या इतने कमजोर होते हैं, जो बेबुनियाद घटना से टूट जाएं?

इस छोटी सी घटना ने विश्वास के सारे भाव जड़ से उखाड़ दिए. नमिता सोच रही थी कि केवल प्रांजल के मांबाप की बात होती तो मानती, अपनेआप को अति आधुनिक, विशाल हृदय मानने वाला उस का मंगेतर कितन क्षुद्र निकला. एक बार मेरा सामना तो किया होता, मैं उस को सारी सचाई बताती.

नमिता के साहस की, उस की बहादुरी की, उस की सूझबूझ की तारीफ नहीं हुई. उस के इन गुणों को उस के मांबाप तक ने कोसा. 1 सप्ताह से घर से बाहर नहीं निकली. आज वह यूनिवर्सिटी जाएगी. देखना है उस के मित्रसहयोगी की क्या प्रतिक्रिया होती है? कैसा व्यवहार होता है उस के साथ?

तैयार हो कर नमिता जब अपने कमरे से निकली तो मां ने टोक दिया, ‘‘बेटा, तू तैयार हो कर कहां जा रही है? कम से कम कुछ दिन तो रुक जा, घटना पुरानी हो जाएगी तो लोग इतना ध्यान नहीं देंगे.’’

नमिता बौखला उठी, ‘‘कौन सी घटना? क्या हुआ है उस के साथ? बेवजह क्यों पड़ी रहतीं मेरे पीछे मां? तुम कोई भी मौका नहीं छोड़तीं मुझे लहूलुहान करने का… कहां गई तुम्हारी ममता?’’ फिर शांत होती हुई बोली, ‘‘मां, तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं, जो होगा मैं निबट लूंगी,’’ और फिर स्कूटी स्टार्ट कर यूनिवर्सिटी चली गई.

परम संतुष्ट भाव से उस ने फैसला किया कि वह पीएचडी के साथसाथ भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा की भी तैयारी करेगी. निष्ठा और दृढ़ इरादे से ही काम नहीं चलता, समाज से लड़ने के लिए, प्रतिष्ठा पाने के लिए, पावर का होना भी अति आवश्यक है.

जो वह ठान लेती उसे पा लेना उस के लिए कठिन नहीं होता है. उस का परिश्रम, उस की

दृढ़ इच्छाशक्ति रंग लाई. आज वह खुश थी अपनी जीत से. देश के समाचार पत्रों में उस का यशोगान था, ‘‘डा. नमिता शर्मा भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा में प्रथम रहीं.’’ मम्मीपापा ने उसे गले लगाना चाहा पर वे संकुचित हो गए. उन के बीच दूरियां घटी नहीं वरन बढ़ती गईं. जिस समय मां के स्नेह, धैर्य और सहारे की सख्त जरूरत थी तब उन के व्यंग्यबाण उसे छलनी करते रहे. कठिन समय में अपनों की प्रताड़ना वह भूल नहीं सकती.

स्त्री सुलभ गुणों को ले कर क्या करेगी वह अब. स्त्री सुलभ लज्जा, संकोच, सेवा,

ममता जैसे भावों से मुक्त हो जाना चाहती है, कठोर हो जाना चाहती है. उस के प्रिय जनों ने उस की अवहेलना की. आज उस की सफलता, उपलब्धियां, सम्मान देख उस के सहयोगी, उस के मातहत सहम जाते हैं. फिर भी वह संतुष्ट क्यों नहीं? शायद इसलिए कि उस की सफलता का जश्न मनाने उस के साथ कोई नहीं.

उसे याद है उस के मन में भी उमंग उठी थी, सपने संजोए थे. आम भारतीय नारी की तरह एक स्नेहमयी बेटी, बहू, पत्नी और मां बनना चाहती थी. वह अपना प्यार, अपनी ममता किसी पर लुटा देना चाहती थी. रात के अकेलेपन में पीड़ा से भरभरा कर कई बार रोई है. एक आधीअधूरी जिंदगी उस ने खुद वरण की है… उसे भरोसा ही नहीं रहा है रिश्तों पर.

Manohar Kahaniya: जिद की भेंट चढ़ी डॉक्टर मंजू वर्मा- भाग 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

रिपोर्ट दर्ज होते ही थानाप्रभारी ने मृतका के पति डा. सुशील वर्मा को हिरासत में ले लिया. मृतका डा. मंजू वर्मा के शव का पोस्टमार्टम 3 डाक्टरों के एक पैनल ने किया. परीक्षण के बाद शव को मृतका के पिता अर्जुन प्रसाद को सौंप दिया गया. दरअसल ससुराल पक्ष से शव लेने कोई भी पोस्टमार्टम हाउस नहीं आया था.

अर्जुन प्रसाद बेटी का शव प्रयागराज ले जाना चाहते थे और वहीं अंतिम संस्कार करना चाहते थे, जबकि बिठूर पुलिस कोई रिस्क नहीं उठाना चाहती थी और अंतिम संस्कार कानपुर के भैरवघाट पर कराना चाहती थी. थानाप्रभारी ने इस बाबत अर्जुन प्रसाद से बात की तो वह इस शर्त पर मान गए कि बेटी को मुखाग्नि उस का पति दे.

इस पर बिठूर थानाप्रभारी मृतका के पति डा. सुशील वर्मा को ले कर भैरव घाट पहुंचे, जहां सुशील वर्मा ने पत्नी मंजू की चिता को अग्नि दी. उस के बाद उसे पुन: थाने लाया गया.

इधर मृतका की मां मीरा देवी व उस की बेटियों सरिता व गरिमा सुशील वर्मा के फ्लैट पर पहुंचीं. उस समय फ्लैट पर डा. सुशील वर्मा की मां कौशल्या देवी तथा छोटा भाई सुधीर वर्मा मौजूद था. मांबेटियों ने वहां जम कर भड़ास निकाली और बेटी की सास कौशल्या देवी को खूब खरीखोटी सुनाई.

मीरा देवी ने आरोपों की झड़ी लगाई तो कौशल्या देवी ने कहा कि वह गांव में रहती है. बेटा और बहू शहर में रहते हैं. उन्हें न तो लोन के संबंध में जानकारी थी और न ही दोनों के बीच मनमुटाव की. बहू ने क्यों और कैसे जान दी, वह नहीं जानती. दहेज मांगने और प्रताडि़त करने की बात सरासर गलत है.

उधर एसपी (वेस्ट) संजीव त्यागी ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट को गौर से पढ़ा. रिपोर्ट के अनुसार लगभग 75 फीट की ऊंचाई से गिरने के कारण डा. मंजू वर्मा की लगभग सारी पसलियां टूट कर चकनाचूर हो गई थीं. दिल और लिवर फट गया था. आंतरिक रक्तस्राव हुआ, जिस की वजह से मौत हो गई.

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पोस्टमार्टम रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद एसपी संजीव त्यागी व डीएसपी दिनेश कुमार शुक्ला ने आरोपी डा. सुशील वर्मा से बिठूर थाने में पूछताछ की. उस ने बताया कि 14 मई, 2021 की शाम सब कुछ सामान्य था. रात 8 बजे उस ने औनलाइन पिज्जा मंगाया. इस के बाद उस ने व मंजू ने पिज्जा खाया. कुछ देर तक हम दोनों बातचीत करते रहे. उस के बाद सोने चले गए.

रात 2 बजे डेढ़ वर्षीय बेटे रुद्रांश के रोने की आवाज सुन कर उस की नींद खुल गई. कमरे में आया तो देखा मंजू कमरे में नहीं है. कमरे से बाहर आ कर बालकनी में देखा तो मंजू वहां भी नहीं थी. बालकनी से नीचे झांका तो शोर सुनाई पड़ा. नीचे आ कर देखा तो मंजू की लाश पड़ी थी. इस के बाद उस ने अपने घर वालों को सूचना दी.

‘‘तुम्हारी पत्नी मंजू वर्मा ने आत्महत्या की या तुम ने उसे मार डाला?’’ डीएसपी दिनेश शुक्ला ने पूछा.

‘‘सर, मैं ने उस की हत्या नहीं की. मंजू ने स्वयं आत्महत्या की है.’’ सुशील ने जवाब दिया.

‘‘लेकिन डा. मंजू वर्मा ने आत्महत्या क्यों की?’’ श्री शुक्ला ने पूछा.

‘‘सर, डा. मंजू वर्मा ने एमबीबीएस की डिग्री हासिल की थी. शादी के पूर्व वह प्रैक्टिस करती थी. लेकिन शादी के बाद उन की प्रैक्टिस छूट गई थी. उन की साथी उन्हें चिढ़ाती थीं कि एमबीबीएस करने से क्या फायदा जो प्रैक्टिस न कर सको. वह एमडी करना चाहती थी. लेकिन बच्चा होने से वह पढ़ाई नहीं कर पा रही थी. इसी कारण वह डिप्रेशन में चली गई और उन्होंने आत्महत्या कर ली.’’

लेकिन सुशील कुमार की बात पुलिस अधिकारियों के गले नहीं उतरी और उन्होंने सुशील कुमार को दहेज हत्या में विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने सुशील के बड़े भाई सुनील वर्मा से भी पूछताछ की, जो बेसिक शिक्षा अधिकारी के पद पर कानपुर (देहात) जिले में तैनात थे.

उन्होंने बताया कि डा. मंजू वर्मा की मौत से उन का कोई लेनादेना नहीं है. डा. मंजू वर्मा ने मौत को गले क्यों लगाया, उन्हें कोई जानकारी नही है. डा. मंजू वर्मा के पिता अर्जुन प्रसाद ने उन की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए उन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई है.

पुलिस द्वारा की गई जांच, आरोपी के बयानों एवं मृतका के घर वालों द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर डा. मंजू वर्मा की मौत की जो कहानी प्रकाश में आई, वह इस प्रकार थी.

उत्तर प्रदेश का प्रयागराज शहर कई मायनों में चर्चित है. गंगा यमुना के संगम तट पर बसा प्रयागराज धर्म नगरी के रूप में भी जाना जाता है. हर 12 साल में यहां संगम तट पर कुंभ का मेला लगता है. देशविदेश के लाखों श्रद्धालु एवं संत मेले में आते हैं और गंगा नदी में डुबकी लगाते हैं. मेले का आकर्षण देख कर विदेशी श्रद्धालु अचरज से भर उठते हैं.

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प्रयागराज शहर में उच्च न्यायालय भी है, जहां प्रदेश के मुकदमों की सुनवाई होती है. पूर्व में प्रयागराज को इलाहाबाद के नाम से भी जाना जाता था.

इसी प्रयागराज का एक बड़ी आबादी वाला क्षेत्र है-नैनी. नैनी क्षेत्र की पीडीए कालोनी में अर्जुन प्रसाद अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी मीरा देवी के अलावा 3 बेटियां मंजू, सरिता, गरिमा तथा एक बेटा विष्णुकांत था.

अर्जुन प्रसाद औद्योगिक न्यायाधिकरण प्रयागराज में सहायक लिपिक पद पर कार्यरत थे. वह एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. लेकिन रहनसहन साधारण था.

अर्जुन प्रसाद की बड़ी बेटी मंजू दिखने में जितनी सुंदर थी, पढ़ने में भी उतनी ही तेज थी. हाईस्कूल तथा इंटर की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास करने के बाद मंजू ने प्रयागराज के स्वरूप रानी मैडिकल कालेज से एमबीबीएस की डिग्री हासिल कर ली थी. उस के बाद वह प्रैक्टिस करने लगी थी.

मंजू डाक्टर बन गई थी और कमाने भी लगी थी. लेकिन अर्जुन प्रसाद के माथे पर चिंता की लकीरें खिंचने लगी थीं. एक देहाती कहावत है ‘जब बेटी भई सयानी, फिर पेटे नहीं समानी.’ अर्जुन प्रसाद और उन की पत्नी मीरा भी इस कहावत से अछूते नहीं थे. मंजू के ब्याह की चिंता उन्हें सताने लगी थी.

मातापिता मंजू का विवाह ऐसे युवक से करना चाहते थे, जो उस के समकक्ष हो. मंजू डाक्टर थी, सो वह डाक्टर वर की ही खोज कर रहे थे. अथक प्रयास के बाद उन्हें एक लड़का पसंद आ गया. लड़के का नाम था सुशील कुमार वर्मा.

डाक्टर से ही की बेटी की शादी

सुशील कुमार वर्मा मूलरूप से उत्तर प्रदेश रायबरेली जिले के चतुर्भुज गांव का रहने वाला था. 3 भाइयों में वह मंझला था. सुशील का छोटा भाई सुधीर, गांव में मां कौशल्या देवी के साथ रहता था और पेशे से वकील था, जबकि सुशील का बड़ा भाई सुनील बेसिक शिक्षा अधिकारी था.

सुशील कुमार वर्मा स्वयं डाक्टर था. वह उरई मैडिकल कालेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर तैनात था और कानपुर (बिठूर) स्थित रुद्रा ग्रींस अपार्टमेंट में रहता था.

अर्जुन प्रसाद बेटी के लिए जैसा वर चाहते थे, सुशील कुमार वैसा ही था. अत: उन्होंने उसे पसंद कर लिया. इस के बाद 29 जनवरी, 2019 को अर्जुन प्रसाद ने अपनी बेटी डा. मंजू वर्मा का विवाह डा. सुशील कुमार वर्मा के साथ धूमधाम से कर दिया. शादी में उन्होंने अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च किया था.

अगले भाग में पढ़ें- सिक्योरिटी गार्ड ने क्या सूचना दी

मेरी खातिर- भाग 2: माता-पिता के झगड़े से अनिका की जिंदगी पर असर

राइटर- मेहर गुप्ता

पापा को 20 साल पहले की अपनी पेशी याद आ गई जब पापा, बड़े पापा और घर के अन्य सब बड़े लोगों ने उन के पैतृक गांव के एक खानदानी परिवार की सुशील और पढ़ीलिखी कन्या अर्थात् निकिता से विवाह के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था. घर वालों ने उन का पीछा तब तक नहीं छोड़ा था जब तक उन्होंने शादी के लिए हां नहीं कह दी थी.

पापा ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘नहीं बेटे ऐसी कोई बात नहीं है… 19-20 की जोड़ी थी पर ठीक है. आधी जिंदगी निकल गई है आधी और कट ही जाएगी.’’

‘‘वाह पापा बिलकुल सही कहा आपने… 19-20 की जोड़ी है… आप उन्नीस है और मम्मा बीस… क्यों पापा सही कहा न मैं ने?’’

‘‘मम्मी की चमची,’’ कह पापा प्यार से उस का गाल थपथपा कर उठ गए.

उस दिन उस के जन्मदिन का जश्न मना कर सभी देर से घर लौटे थे. अनिका बेहद खुश थी. वह 1-1 पल जी लेना चाहती थी.

‘‘मम्मा, आज मैं आप दोनों के बीच में सोऊंगी,’’ कहते हुए वह अपनी चादर और तकिया उन के कमरे में ले आई. वह अपनी जिंदगी में ऐसे पलों का ही तो इंतजार करती थी. उस की उम्र की अन्य लड़कियों का दिल नए मोबाइल, स्टाइलिश कपड़े और बौयफ्रैंड्स के लिए मचलता था, जबकि अनकि को खुशी के ऐसे क्षणों की ही तलाश रहती थी जब उस के मम्मीपापा के बीच तकरार न हो.

पापा हाथ में रिमोट लिए अधलेटे से टीवी पर न्यूज देख रहे थे. मम्मी रसोई में तीनों के लिए कौफी बना रही थी.

तभी फोन की घंटी बजने लगी. अमेरिका से बूआ का वीडियोकौल थी. हमारे लिए दिन का आखिरी पहर था, जबकि बूआ के लिए दिन की शुरुआत थी उन्होंने अपनी प्यारी भतीजी को जन्मदिन की शुभकामनाएं देने के लिए फोन किया था. बोली, ‘‘हैप्पी बर्थडे माई डार्लिंग,’’

मैं ने और पापा ने कुछ औपचारिक बातों के बाद फोन मम्मी की तरफ कर दिया.

‘‘हैलो कृष्णा दीदी,’’ कह कुछ देर बात कर मम्मी ने फोन रख दिया.

‘‘दीदी ने कानों में कितने सुंदर सौलिटेयर पहन रखे थे न, दीदी की बहुत मौज है.’’

‘‘दीदी पढ़ीलिखी, आधुनिक महिला है. एक मल्टीनैशनल कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत है. खुद कमाती है और ऐश करती है.’’

जब भी बूआ यानी पापा की बड़ी बहन की बात आती थी पापा बहुत उत्साहित हो जाते थे. बहुत फक्र था उन्हें अपनी बहन पर.

‘‘आप मुझे ताना मार रहे हैं.’’

‘‘ताना नहीं मार रहा, कह रहा हूं.’’

‘‘पर आप के बोलने का तरीका तो ऐसा ही है. मैं ने भी तो अनिका और आप के लिए अपनी नौकरी छोड़ अपना कैरियर दांव पर लगाया न.’’

‘‘तुम अपनी टुच्ची नौकरी की तुलना दीदी की बिजनैस ऐडमिनिस्ट्रेशन की जौब से कर रही हो?’’ कहां गंगू तेली, कहां राजा भोज.

मम्मी कालेज के समय से पहले एक स्कूल में और बाद में कालेज में हिंदी पढ़ाती थीं. वे पापा के इस व्यंग्य से तिलमिला गईं.

‘‘बहुत गर्व है न तुम्हें अपनी दीदी और खुद पर… हम लोगों ने आप को किसी धोखे में नहीं रखा था. बायोडेटा पर साफ लिखा था पोस्टग्रैजुएशन विद हिंदी मीडियम. हम लोग नहीं आए थे आप लोगों के घर रिश्ता मांगने… आप के पिताजी ही आए थे हमारे खानदान की आनबान देख कर हमारी चौखट पर नाक रगड़ने…’’

‘‘निकिता, जुबान को लगाम दो वरना…’’

‘‘पहली बार अनिका ने पापा का ऐसा रौद्र रूप देखा था. इस से पहले पापा ने मम्मी पर कभी हाथ नहीं उठाया था.’’

‘‘पापा, आप मम्मी पर हाथ नहीं उठा सकते हैं. आप भी बाज नहीं आएंगे… मम्मी का दिल दुखाना जरूरी था?’’

‘‘तू भी अपनी मम्मी का पक्ष लेगी. तेरी मम्मी ठीक तरह से 2 शब्द इंग्लिश के नहीं बोल पाती.’’

‘‘पापा, आप मम्मी की एक ही कमी को कब तक भुनाते रहोगे, मम्मी में बहुत से ऐसे गुण भी हैं जो मेरी किसी फ्रैंड की मम्मी में नहीं हैं.’’

क्षणभर में अनिका की खुशी काफूर हो गई. वह भरी आंखों के साथ उलटे पैर अपने कमरे में लौट गई.

पापा ने औक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से एमबीए किया था जबकि मम्मी ने सूरत के लोकल कालेज से एमए. शायद दोनों का बौद्धिक स्तर दोनों के बीच तालमेल नहीं बैठने देता था.

अनिका ने एक बात और समझी थी पापा के गुस्से के साथ मम्मी के नाम में प्रत्ययों की संख्या और सर्वनाम भी बदलते जाते थे. वैसे पापा अकसर मम्मी को निक्कु बुलाते थे. गुस्से के बढ़ने के साथसाथ मम्मी का नाम निक्की से होता हुआ निकिता, तुम से तू और उस में ‘इडियट’ और ‘डफर’ जैसे विशेषणों का समावेश भी हो जाता था. अपने बचपन के अनुभवों से पापा द्वारा मम्मी को पुकारे गए नाम से ही अनिका पापा का मूड भांप जाती थी.

इस साल मार्च महीने से ही सूरज ने अपनी प्रचंडता दिखानी शुरू कर दी थी. ऐग्जाम की सरगर्मी ने मौसम की तपिश को और बढ़ा दिया था. वह भी दिनरात एक कर पूरे जोश के साथ अपनी 12वीं कक्षा की बोर्ड की परीक्षा में जुटी हुई थी. सुबह घर से निकलती, स्कूल कोचिंग पूरा करते हुए शाम 8 बजे तक पहुंच पाती. मम्मीपापा के साथ बिलकुल समय नहीं बिता पा रही थी. इतवार के दिन उस की नींद थोड़ी जल्दी खुल गई थी. वह सीधे हौल की तरफ गई तो नजर डाइनिंग टेबल पर रखे थर्मामीटर की तरफ गई.

‘‘मम्मा यह थर्मामीटर क्यों निकला है?’’ उस ने चिंतित स्वर में पूछा.

‘‘तेरे पापा को कल से तेज बुखार है. पूरी रात खांसते रहे. मुझे जरा देर को भी नींद नहीं लग पाई.’’

‘‘एकदम से गला इतना कैसे खराब हो गया? डाक्टर को दिखाया?’’

‘‘बच्चे थोड़े हैं जो हाथ पकड़ कर डाक्टर के पास ले जाऊं,’’ मम्मी के स्वर में झुंझलाहट थी.

‘‘मम्मा आप भी हद करती हैं… पापा को तेज बुखार है और आप… मानती हूं आप सारी रात परेशान हुईं. पर अपनी बात को रखने का भी एक समय होता है.’’

‘‘तू भी अपने पापा की ही तरफदारी करेगी न…’’

मेरी हालत भी पेंडुलम की तरह थी… कभी मेरी संवेदनाएं मम्मी की तरफ और कभी मम्मी से हट कर बिलकुल पापा की तरफ हो जाती थी. प्रकृति पूरा साल अपने मौसम बदलती पर हमारे घर में बारहों मास एक ही मौसम रहता था कलह और तनाव का. मैं उन दोनों के बीच की वह डोर थी जिस के सहारे उन के रिश्ते की गाड़ी डगमग करती खिंच रही थी.

उस दिन मेरा अंतिम पेपर था. मैं बहुत हलका महसूस कर रही थी. मैं अपने अच्छे परिणाम को ले कर आश्वस्त थी. आज बहुत दिनों बाद हम तीनों इकट्ठे डिनर टेबल पर थे. मम्मी ने आज सबकुछ मेरी पसंद का बनाया था.

‘‘मम्मीपापा, मैं आप दोनों से कुछ कहना चाहती हूं.’’ आज अनिका की भावभंगिता कुछ गंभीरता लिए थी, जिस के मम्मीपापा अभ्यस्त नहीं थे.

‘‘बोलो बेटे… कुछ परेशान सी लग रही हो?’’ वे दोनों एकसाथ बोल चिंतित निगाहों से उसे देखने लगे.

उस ने बहुत आहिस्ता से कहना शुरू किया जैसे कोई बहुत बड़ा रहस्य उजागर करने जा रही हो, ‘‘पापा, मैं आगे की पढ़ाई सूरत में नहीं, बल्कि अहमदाबाद से करना चाहती हूं.’’

‘‘ये कैसी बातें कर रही हो बेटा… तुम्हें तो सूरत के एनआईटी कालेज में आसानी से एडमिशन मिल जाएगा.’’

‘‘मिल तो जाएगा पापा, पर सूरत के कालेजों की रेटिंग काफी नीचे है.’’

‘‘बेटे, यह तुम्हारा ही फैसला था न कि ग्रैजुएशन सूरत से ही कर पोस्टग्रैजुएशन विदेश से कर लोगी, तुम्हारे अचानक बदले इस फैसले का कारण क्या हम जान सकते हैं?’’ पापा के माथे पर तनाव की रेखाएं साफ झलक रही थी.

घर में अनजानी खामोशी पसर गई. यह खामोशी उस खामोशी से बिलकुल अलग थी जो मम्मीपापा की बहस के बाद घर में पसर जाती थी…बस आ रही थी तो घड़ी की टिकटिक की आवाज.

Crime Story: कुटीर उद्दोग जैसा बन गया सेक्सटॉर्शन- भाग 3

पुलिस ने उन के कब्जे से 23 मोबाइल फोन बरामद किए थे. जांच के बाद पता चला कि बड़ी संख्या में इन के अलगअलग नाम से बैंक खाते हैं. महिलाओं के नाम से खुद के पेटीएम, वाट्सऐप और फेसबुक सहित अधिकतर प्लेटफार्म पर एकाउंट खोल रखे थे. ताकि दूसरे लोगों को विश्वास हो जाए कि ये खाते महिला के नाम से ही हैं.

इस के कुछ दिन बाद अगस्त, 2021 में राजस्थान के अलवर जिले की रामगढ़ थाना पुलिस ने भी लड़की के नाम से फरजी आईडी बना कर अश्लील चैंटिग कर लोगों को ब्लैकमेल करने और लाखों रुपए ठगने वाले शातिर गिरोह का परदाफाश कर सैक्सटौर्शन करने वाले शातिर अपराधियों इकबाल और साहिल को गिरफ्तार किया था. ये दोनों भी भरतपुर के मेवात क्षेत्र रहने वाले थे.

ठगी करने वाले लोग पहले फ्रैंडशिप लिस्ट में बड़ी चतुराई से शामिल हो जाते हैं. अगर आप पुरुष हैं तो महिला बन कर और महिला हैं तो पुरुष बन कर आप से दोस्ती की जाती है. कई बार महिला के साथ महिला और पुरुष के साथ पुरुष बन कर भी दोस्ती का जाल बिछाया जाता है.

सैक्सी बातों में फंस जाते हैं लोग

फेसबुक मैसेंजर के जरिए शुरू होने वाली बातचीत बाद में वाट्सऐप और कई बार मोबाइल पर भी होने लगती है. बातचीत के झांसे में ‘साम दाम दंड भेद’ सभी का पूरा सहारा लिया जाता है.

भावुक बातें, जरूरत से ज्यादा केयर करना, कुछ जोक्स, वीडियो और मैसेज के साथ सैक्सी बातें भी होने लगती हैं. यही नहीं, वीडियो चैट तक होने लगती है.

इस के बाद अचानक डिमांड शुरू हो जाती है. आजकल पैसा ट्रांसफर करना इतना सरल हो गया है कि लोग भावुकता में पड़ कर तुरंत पैसा भेज देते हैं. ठगों के लिए सरल बात यह है कि फेसबुक में प्रोफाइल बनाना आसान काम है. इसलिए वे सब से ज्यादा सोशल मीडिया फेसबुक प्लेटफार्म को ही ठगी के लिए इस्तेमाल करते हैं.

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रामपुर के भाजपा नेता का सैक्सटौर्शन

उसी दौरान जितेंद्र सिंह को मीडिया की सुर्खी बना एक किस्सा याद आ गया, जिस में उन्हीं की तरह उत्तर प्रदेश में रामपुर के एक भाजपा नेता को ब्लैकमेल किया गया था.

उन्हें भी कई बार दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच का फरजी अधिकारी बता कर फोन

किया गया और जेल जाने डर दिखा कर धमकाया गया.

पैसे न देने पर उन का वीडियो यूट्यब पर डाल दिया गया और फिर नेताजी से कहा गया कि अगर वीडियो हटवाना चाहते हैं

तो यूट्यूब कस्टमर केयर पर बात कर लें. एक नंबर भी दिया गया, जिस पर काल करने पर कहा गया कि अगर वीडियो हटवाना चाहते हो तो यूट्यूब को प्रोसेसिंग फीस देनी पड़ेगी.

नेताजी जब ज्यादा परेशान हो गए तो उन्होंने रामपुर के एसपी से मिल कर इस बात की शिकायत की और साइबर क्राइम की टीम ने जांचपड़ताल शुरू की.

न्यूड काल कर भाजपा नेता को ब्लैकमेल करने वाला गैंग बाद में पकड़ा गया. इस गैंग के पकड़े गए 2 सदस्य आमिर और मुस्तकीम राजस्थान के भरतपुर के रहने वाले थे, जबकि तीसरा आरोपी इमरान नेताजी के गृह जनपद रामपुर का ही रहने वाला था.

इस गैंग के लोगों से पूछताछ और जांच में पुलिस को पता चला था कि इन का नेटवर्क कई राज्यों में फैला था, जिस कारण उन्हें पकड़ना आसान काम नहीं था.

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राजस्थान से जुड़े गिरोह के तार

क्योंकि ये अपराधी जिन सिमकार्ड का इस्तेमाल करते थे, वे सिमकार्ड ओडिशा के मजदूरों के नाम पर लिए थे. जबकि काल भरतपुर से किए जा रहे थे. इसी गिरोह के कुछ लोग दिल्ली से भी फोन करते थे.

पुलिस की जांच में यह भी सामने आया कि इस गिरोह के तार राजस्थान के भरतपुर, ओडिशा, दिल्ली और हरियाणा के मेवात से जुड़े थे. ये अपराधी अपने शिकार को कौन्फ्रैंसिंग के जरिए काल करते थे. जिस से हर बार अलगअलग लोकेशन आती थी. कभी भरतपुर तो कभी रामपुर की.

इस गैंग ने नेताजी को पैसे डालने के लिए जो बैंक खाते दिए थे, वे भी जांच करने पर फरजी दस्तावेजों से खोले पाए गए. रामपुर पुलिस शायद बीजेपी नेता के सैक्सटौर्शन करने वाले गैंग को पकड़ ही नहीं पाती. क्योंकि पुलिस 15 दिन की कोशिशों के बाद सिर्फ एक नंबर ही ट्रैस कर सकी थी.

तब पुलिस ने चालाकी खेली और नेताजी के जरिए ब्लैकमेलर्स को नकद पैसा देने का लालच दिलाया गया. नेताजी को पैसे देने के लिए रामपुर से दूर दिल्ली में पैसे देने के लिए बुलाया गया.

बस यहीं पर गैंग से चूक हो गई और पैसा लेने पहुंचे गैंग के एक सदस्य  को रामपुर पुलिस ने दबोच लिया. जब गैंग के 3 लोग पकड़े गए तो पूछताछ में पता चला कि रामपुर का रहने वाला इमरान सेंट बेचने राजस्थान गया था. वहां उस की मुलाकात सैक्सटौर्शन करने वाले अपराधियों से हो गई. शार्टकट से पैसा कमाने के लालच में वह इस गैंग से जुड़ गया और इस गैंग से ट्रेनिंग ले कर रामपुर आ गया.

रामपुर आ कर वह लोगों के साथ इस तरह की ठगी करने लगा. अपने गैंग की मदद से इमरान ने बरेली, उत्तराखंड, हापुड़ और कई दूसरे जिलों में कई लोगों को अपना शिकार बनाया.

बदनामी का रहता है डर

जितेंद्र सिंह ने मीडिया की सुर्खी बने बीजेपी नेता के सैक्सटौर्शन के किस्से की खबरें समाचार पत्र में पढ़ी थीं. इसी से प्रेरित हो कर उन्होंने भी ऐसा ही साहस जुटाया था.

पहले तो उन्हें बदनामी का डर सता रहा था, लेकिन बाद में उन्हें लगा कि एक बार उन्होंने रकम दे दी तो ब्लैकमेल करने वालों का साहस बढ़ जाएगा. वे फिर उन से पैसे मांगेंगे. लिहाजा उन्होंने दिल्ली पुलिस में बड़े अधिकारी के पद पर बैठे अपने दोस्त से मदद मांगी.

रुचिका नाम की लड़की और खुद को साइबर क्राइम का इंसपेक्टर बताने वाले शख्स विक्रम सिंह राठौर ने जब देखा कि उन का पासा गलत जगह पड़ गया है तो उन दोनों ने अपने फोन बंद कर दिए और फेसबुक एकाउंट को डिलीट कर दिया. जिस कारण पुलिस जितेंद्र सिंह को ब्लैकमेल करने वाले लोगों तक नहीं पहुंच पाई.

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जितेंद्र सिंह किस्मत वाले निकले कि वह थोड़ी सूझबूझ और अपनी हिम्मत के कारण बच गए क्योंकि उन के संबध एक बड़े पुलिस अधिकारी से थे.

लेकिन इन दिनों देश के अलगअलग हिस्सों खासतौर से महानगरों में सोशल मीडिया के जरिए लोगों को हनीट्रैप में फंसा कर उन से जबरन वसूली यानी सैक्सटौर्शन करने वाले गिरोह का आतंक फैला हुआ है.

इसी दौरान दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने 10 जुलाई, 2021 को एक ऐसे बड़े सैक्सटौशन गैंग का खुलासा किया, जिस के सरगना इंजीनियर युवकयुवती थे और वे टिंडर ऐप से ग्राहकों को फंसाते थे.

अगले भाग में पढ़ें- टिंडर ऐप से भी चल रहा है सैक्सटौर्शन

Best of Satyakatha: विधवा का करवाचौथ

वह कोई दैवीय शक्तियों का मालिक नहीं था, लेकिन महज तजुर्बे से औरतों की बौडी लैंग्वेज का विशेषज्ञ बन गया था. वह औरतों के हावभाव देख कर ही ताड़ लेता था कि कहां कामयाबी की गुंजाइश ज्यादा है. जहां भी उसे संभावनाएं दिखतीं, वहां वह तनमनधन से जुट जाता था और जल्द ही अपने मकसद में कामयाब भी हो जाता था.

उस ने कितनी औरतों से उन की सहमति से शारीरिक संबंध बनाए थे, यह बताने को अब रामचरण जिंदा नहीं रहा, लेकिन कटनी के उस के जानने वाले बेहिचक बताते हैं कि ऐसी औरतों की तादाद किसी भी सूरत में दर्जन भर से कम नहीं हो सकती.

कटनी के एक प्राइवेट स्कूल में ड्राइवर की नौकरी कर रहे रंगीनमिजाज रामचरण की एकलौती कमजोरी औरतें थीं. जवानी से ही उसे तरहतरह की औरतों से संबंध बनाने का शौक या रोग कुछ भी कह लें, लग गया था. हालांकि घर में उस की पत्नी थी, जो जीजान से उसे चाहती थी और उस की इस फितरत से वाकिफ भी थी.

लेकिन घरगृहस्थी न उजड़े और बच्चों पर कलह का बुरा असर न पड़े, यह सोच कर उस ने खामोश रहने में ही भलाई समझी.

रामचरण की इन हरकतों का चूंकि घरगृहस्थी की सुखशांति पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, इसलिए गाड़ी ठीकठाक चल रही थी. रामचरण की एक और खूबी यह थी कि वह कभी किसी प्रेमिका से जोरजबरदस्ती नहीं करता था. कम पढ़ेलिखे इस शख्स को यह ज्ञान जाने कहां से मिल गया था कि 2 बालिग अगर सहमति से शारीरिक संबंध बनाते हैं तो उन्हें नाजायज करार देने वाले खुद गलत हैं.

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मरजी के सौदे में यकीन करने वाले रामचरण को बीते कुछ सालों से लगने लगा था कि उस की जिस्मानी ताकत और यौनोत्तेजना में कमी आ रही है, लिहाजा उस ने कुछ आयुर्वेदिक और मर्दाना ताकत बढ़ाने वाली इश्तहारी दवाओं के बाद स्थाई रूप से वियाग्रा का सेवन शुरू कर दिया था, जो वाकई असरकारक दवा साबित हुई थी.

स्कूल की जिंदगी में रम चुके रामचरण की ड्राइवरी का हर कोई कायल था और वक्त की पाबंदी व ईमानदारी के मामले में भी उस की मिसाल दी जाती थी. इन सब खूबियों और बातों से परे रामचरण की खोजी निगाहें हर वक्त नए शिकार यानी ऐसी औरतों की तलाश करती रहती थीं, जिन्हें शीशे में उतार कर अपनी हवस मिटा सके.

इसी तलाश में एक दिन उस ने स्कूल की नई बाई (चपरासी) अंजलि बर्मन को देखा तो देखता ही रह गया. सांवली रंगत वाली अंजलि की उम्र 29 साल थी और वह खासी खूबसूरत और गठीले बदन की मालकिन थी. अंजलि को देखते ही इस अधेड़ बहेलिए ने जैसे मन ही मन संकल्प कर लिया कि जैसे भी हो, इस चिडि़या का शिकार करना है.

इस बाबत जब उस ने अंजलि को अपने स्तर पर टटोला तो नतीजा उस के हक में आया. लेकिन इस बात का भी अंदाजा हुआ कि स्कूल की यह नईनवेली बाई आसानी से उस के काबू में नहीं आने वाली. इस के लिए उसे थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी. इस चुनौती को स्वीकार करते हुए उस ने अपने नए मकसद की तरफ पहला कदम बढ़ा दिया.

विधवा अंजलि 2 बच्चों की मां थी और कटनी की एक बस्ती में रह रही थी. ये दोनों बातें रामचरण को सुकून देने वाली थीं. अपने स्तर की छानबीन में उसे यह भी पता चला कि विधवा होने के बावजूद अंजलि का कोई प्रेमी या आशिक नहीं है तो उस की बांछें और भी खिल उठीं.

स्कूल में रोज अंजलि से उस का सामना होता था. रामचरण ने जब अपने स्टाइल में उस से नजदीकियां बढ़ानी शुरू कीं तो अंजलि चौंकी. इस की वजह यह थी कि रामचरण उस से उम्र में लगभग दोगुना था. साथ ही घरगृहस्थी तथा बालबच्चेदार भी. इस के बाद भी वह उस पर डोरे डाल रहा था.

लेकिन जल्दी ही कुछ बातें उसे अपने हक की लगने लगीं. अंजलि को भी सुरक्षित ढंग से मर्द की और जिस्मानी सुख की जरूरत थी, यह बात स्त्री मनोविज्ञान का ज्ञाता हो चुका रामचरण पहली बार में ही ताड़ गया था. इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए वह यही अहसास अंजलि को भी करा रहा था.

जाहिर है, किसी बाहरी नौजवान से अंजलि का नाम जुड़ता तो उस की बदनामी होती और स्कूल वाले उसे नौकरी से बाहर करने में एक मिनट भी न लगाते. एक तरह से रामचरण की बड़ी उम्र और सहकर्मी होना किसी भी तरह का शक पैदा न करने वाली बातें थीं.

तजुर्बा और हालात दोनों काम आए तो जल्द ही रामचरण की रातें अंजलि के घर गुजरने लगीं. वह जानता था कि जितना ज्यादा वह अंजलि को बिस्तर में संतुष्टि देगा, वह उतनी ही उस की दीवानी और मुरीद होती जाएगी. ऐसा करने के लिए उस ने वियाग्रा की खुराक बढ़ा दी थी.

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अंजलि की संगत में आ कर खुद को जवान महसूस करने वाले रामचरण के सिलेबस में त्रियाचरित्र का यह पाठ नहीं था कि जवान औरत को बातें भी रोमांटिक और जवानों जैसी चाहिए. मर्द कितनी ही शारीरिक संतुष्टि दे दे, पर उम्र का फर्क कहीं न कहीं झलक ही जाता है. एक वक्त ऐसा भी आता है जब ताकत बढ़ाने वाली दवाइयां भी एक हद के बाद असर दिखाना बंद कर देती हैं.

अंजलि की तरफ से बेफिक्र और अभिसार में डूबे रामचरण को कतई अहसास नहीं था कि उस का अनुभव उसे धोखा दे रहा है और मौत दबेपांव उस की तरफ बढ़ी चली आ रही है. वह 10 अक्तूबर की सुबह थी, जब दमोह जिले के हिंडोरिया थाने के थानाप्रभारी पी.डी. मिंज को खबर मिली कि दमोह कटनी रेलवे लाइन के गेट नंबर 3 पर एक लाश पड़ी है. यह सूचना उन्हें रेलवे गेट के चौकीदार दीपक मंडल ने दी थी.

मामला संगीन था, इसलिए पी.डी. मिंज तुरंत अपनी टीम के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. चलने से पहले उन्होंने वारदात की खबर दमोह के एसपी विवेक अग्रवाल को देने की अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली थी.

लाश देख कर ही उन की समझ में आ गया था कि इस में शक की कोई गुंजाइश नहीं कि मामला बेरहमी से की गई हत्या का है. रेलवे पुलिया के नीचे पड़े मृतक की उम्र 50-55 साल थी. लाश के आसपास जानकारी देने वाला कोई सुराग नहीं मिला था, पर मृतक की तलाशी में उस की जेब से 2 चीजें बरामद हुईं, जिस में एक था मोबाइल फोन और दूसरी चौंका देने वाली चीज थी वियाग्रा का पूरा पत्ता.

इस चौंका देने वाली चीज से एक बात साफ जाहिर हो रही थी कि मामला जायज या फिर नाजायज संबंधों का था. तय था कि इस में कोई औरत भी शामिल थी. लेकिन जो भी था, सच जानना जरूरी था. इस के लिए मृतक की शिनाख्त जरूरी थी.

यह काम बहुत ज्यादा मुश्किल नहीं था. लाश की जेब से मिले मोबाइल फोन के नंबरों ने मिनटों में साफ कर दिया कि मृतक का नाम रामचरण बर्मन है और वह इंद्रा ज्योतिनगर कटनी का रहने वाला है.

रामचरण के फोन में मिले नंबरों पर बात करने से उस की शिनाख्त तो हो गई, पर यह कोई नहीं बता सका कि वह कटनी से दमोह कैसे पहुंच गया था. उस की पत्नी और घर वाले भी यह बात नहीं बता सके थे.

मामला जल्द सुलझाने की गरज से एसपी विवेक अग्रवाल ने पी.डी. मिंज के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी, जिस में थाना पटेरी के थानाप्रभारी रमा उदेनिया के साथ बांदकपुर चौकी के इंचार्ज पी.डी. दुबे को भी शामिल किया गया.

मामला हाथ में आते ही इस टीम ने सब से पहले रामचरण की काल डिटेल्स खंगाली तो पता चला कि उस की सब से ज्यादा बातें अंजलि बर्मन से हुई थीं. दिलचस्प और मामला लगभग सुलझा देने वाली एक बात यह भी थी कि 9 अक्तूबर को अंजलि के मोबाइल फोन की लोकेशन आनू गांव की मिल रही थी, जो घटनास्थल के नजदीक था.

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शक की कोई गुंजाइश नहीं थी कि हत्या की इस वारदात में अंजलि का हाथ न हो या वह इस कत्ल के बारे में न जानती हो. इसलिए जब उस से पूछताछ की गई तो शुरुआती नानुकुर के बाद उस ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. इस के बाद उस ने जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

अपने और रामचरण के संबंधों की बात तो अंजलि ने नहीं स्वीकारी, लेकिन ईमानदारी से यह जरूर बता दिया कि हत्या में उस का साथ 28 साल के सूरज पटेल के अलावा उस के दोस्तों 24 साल के संतोष पटेल और 26 साल के जगत पटेल ने दिया था.

अंजलि के मुताबिक रामचरण उस पर बुरी नजर रखता था और उस से नाजायज संबंध बनाने के लिए दबाव डाल रहा था. स्कूल में जानपहचान होने के बाद रामचरण ने सीधे शारीरिक संबंध बनाने की मांग कर डाली थी, अंजलि इनकार करने के साथ उस से दूरी बना कर रहने लगी थी.

तजुर्बेकार रामचरण ने आदत के मुताबिक इस इनकार को इकरार समझा और उस के पीछे पड़ गया. अकसर आधी रात को वह फोन कर के उस से सैक्सी बातें करते हुए शारीरिक संबंध बनाने के लिए कहता.

पिछले कुछ दिनों से अंजलि की दोस्ती सूरज से हो गई थी. जब उस ने अपनी यह परेशानी उसे बताई तो वह रामचरण को रास्ते से हटाने को तैयार हो गया. इस बाबत उस ने अपने दोस्तों संतोष और जगत से बात की तो वे उस का साथ देने को तैयार हो गए.

इस के बाद चारों ने मिल कर रामचरण की हत्या की योजना बनाई और फिर उस पर अमल कर डाला. इन का सोचना यह था कि रामचरण को कटनी से दूर ले जा कर मारा जाए तो लाश की शिनाख्त नहीं हो सकेगी और वे बच जाएंगे.

योजना के मुताबिक, हादसे के कुछ दिन पहले जब रामचरण ने अंजलि से जिस्मानी ताल्लुक बनाने की मांग की तो इस बार उस ने मना करने के बजाय उसे उकसाने वाली यानी सैक्सी बातें कीं. रामचरण को मेहनत रंग लाती दिखी. फोन पर अंजलि ने कहा था कि वाकई उस ने उस जैसा दीवाना नहीं देखा, पर यहां कटनी में ऐसा करने से बदनामी हो सकती है, इसलिए इच्छा पूरी करने के लिए कहीं बाहर चलना पड़ेगा.

रामचरण की हालत तो अंधा क्या चाहे 2 आंखें वाली थी, इसलिए वह अंजलि के कहे अनुसार बांदकपुर चलने को तैयार हो गया. तय हुआ कि सैक्स करने से पहले दोनों बांदकपुर के मंदिर में दर्शन करेंगे.

पहले अंजलि ने उसे करवाचौथ वाले दिन चलने को कहा था, पर औरतों के रसिया रामचरण को अपनी पत्नी की भावनाओं और व्रत का पूरा खयाल था, इसलिए 9 अक्तूबर का दिन तय हुआ. त्रियाचरित्र तो अपना रंग दिखा ही रहा था, पुरुष चरित्र भी उन्नीस नहीं था, जो यह कह रहा था कि करवाचौथ के दिन पत्नी का व्रत खुलवाना है, इसलिए अगले दिन चलेंगे.

9 अक्तूबर को तय वक्त पर रामचरण ने अंजलि को अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाया और बांदकपुर की तरफ चल पड़ा. जाने से पहले उस ने वियाग्रा का पूरा पत्ता खरीद कर जेब में रख लिया था.

बांदकपुर जाने के बाद दोनों अंधेरा होने का इंतजार करने लगे, जिस से संबंध बनाने में सहूलियत हो. अंधेरा होते ही इस इलाके से वाकिफ रामचरण अंजलि को आनू गांव की रेलवे पुलिया के नीचे ले गया, जहां आमतौर पर सुनसान रहता है. इस के पहले उस ने वियाग्रा की दो गोलियां खा ली थीं.

रामचरण को जरा भी अहसास नहीं था कि प्रेयसी भले ही पहलू में है, पर मौत भी उस के पीछे दौड़ रही है. सूरज और उस के दोस्त अंजलि के इशारे पर उन का पीछा कर रहे थे. जैसे ही रामचरण पुलिया के नीचे सहवास के लिए अंजलि के ऊपर झुका, सूरज और उस के दोस्तों ने उसे खींच लिया.

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इस के बाद तीनों ने रामचरण के साथ मारपीट कर के उस का गला दबा दिया. फिर उस के सिर पर पत्थर से वार कर के उस की हत्या कर दी.

हत्या कर के चारों कटनी आ गए, पर मोबाइल फोन की लोकेशन ने इन्हें पकड़वा दिया. अंजलि का कहना था कि रामचरण उसे धमकी देता रहता था कि अगर उस ने उस की बात नहीं मानी तो वह सूरज और उस के प्रेमप्रसंग को आम कर देगा. अंजलि इस धमकी से डर गई थी, क्योंकि एक विधवा के प्रेमप्रसंग और नाजायज संबंधों से बदनामी होती तो उस की नौकरी जानी तय थी.

कटनी में किसी ने अंजलि के पुलिस को दिए बयान से इत्तफाक नहीं रखा. उलटे यह चर्चा आम रही कि रामचरण से ऊब जाने के बाद उस ने सूरज से पींगे बढ़ानी शुरू कर दी थीं, इस से रामचरण नाराज था. एक दिन रामचरण ने उसे सूरज के साथ रंगरलियां मनाते रंगेहाथों पकड़ भी लिया था. इस पर दोनों में खूब झगड़ा भी हुआ था.

सच जो भी हो, पर अब अंजलि अपने आशिक सहित जेल में है, जिस ने हत्या जैसे जघन्य अपराध को अंजाम देने से पहले अपनी मासूम बच्चियों के भविष्य के बारे में बिलकुल नहीं सोचा, जिन की कोई गलती नहीं थी.

Satyakatha: लॉकडाउन में इश्क का उफान- भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

लेखक- शाहनवाज

रमेश ने बताया कि दीपक 2 जुलाई, 2021 को ही अपने गांव बागपत से दिल्ली लौटा था. रमेश ने बताया कि दीपक का पास में ही रहने वाले सत्यवीर की बेटी पूजा के साथ अफेयर था. इस अफेयर के बारे में मोहल्ले में रहने वाले कई लोगों को पता भी था.

इस पूछताछ के बाद पुलिस ने पोस्टमार्टम के बाद आए शव की पहचान के लिए रमेश को अस्पताल में बुलाया. लाश देखने के बाद रमेश अस्पताल में ही फूटफूट कर रोने लगा. रोते हुए बोला, ‘‘ये हत्या उसी लड़की की वजह से हुई है.’’

दरअसल उत्तर प्रदेश के बागपत का रहने वाला 18 वर्षीय दीपक, दिल्ली के करावल नगर में अपने चाचा रमेश के घर बचपन से ही रहता था. दीपक के परिवार में उस के मातापिता की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण कई सालों से उन्होंने पढ़ाई के लिए दिल्ली में रमेश के पास उसे छोड़ दिया था.

दीपक पढ़नेलिखने में कमजोर था, और उस का ध्यान पढ़ाईलिखाई के अलावा मटरगश्ती में ज्यादा लगा रहता था. उस की इसी मटरगश्ती वाली आदतों की वजह से उस के चाचा रमेश ने उसे 10वीं पास होने पर सेकंडहैंड स्मार्टफोन खरीद कर दिया था. ताकि उस से संपर्क बना रहे और पता लगाया जा सके कि वह कहां हैं?

साल 2019 में जब वह 11वीं क्लास में था और जिस ट्यूशन सेंटर पर वह पढ़ने के लिए जाता था, वहां उस की मुलाकात पूजा से हुई थी. पूजा दीपक से एक क्लास जूनियर थी. दोनों ही इलाके के सरकारी स्कूल में पढ़ते थे, लेकिन उन के स्कूल अलगअलग थे.

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पूजा के अफेयर को अभी सिर्फ 4-5 महीने ही हुए थे कि 2020 में कोरोना की वजह से लौकडाउन लग गया. लौकडाउन के दौरान दीपक और पूजा के संपर्क का एकलौता जरिया फोन ही था. दोनों का ही लौकडाउन की वजह से स्कूल, ट्यूशन, घूमनाफिरना सब बंद हो गया था. दोनों अपनेअपने घरों में मानो कैद हो गए थे.

पूजा के पास अपना कोई फोन नहीं था, लेकिन वह घर में मौजूद फोन से अकसर दीपक को फोन कर उस से बात किया करती थी. उन की उम्र ही ऐसी थी कि वे प्यार में बंधते चले गए. दोनों का पहला प्यार दैहिक आकर्षण में भी बदल गया.

एकदूसरे के लिए बेचैनियां और फिक्र दोनों होने लगी.  कोरोना की वजह से लौकडाउन के चलते बनी सामाजिक और शारीरिक दूरी ने उन की बेचैनियों को और बढ़ा दिया. ऐसे में दोनों के परिवार में शक होना आम बात थी.

दीपक को दिन भर फोन पर लगा देख उस के चाचा रमेश को शक हुआ कि कहीं यह किसी बुरी संगत में तो नहीं पड़ गया. इसलिए जैसे ही सरकार ने लौकडाउन में ढील दी, तभी रमेश ने अपने भतीजे दीपक को आनंद विहार बस अड्डा से प्राइवेट बस के जरिए उस के मांबाप के घर बागपत भेज दिया.

दूसरी तरफ पूजा के पिता सत्यवीर सिंह को भी अपनी बेटी को दिन भर फोन पर लगे रहने की वजह से शक होने लगा था. उस के शक को कुछ पासपड़ोस वालों ने भी बढ़ा दिया. तब उस ने अपनी बेटी पर पाबंदियां लगानी शुरू कर दीं.

जब भी पूजा के हाथों में फोन होता वह उसे डांट देता. वह कुछ भी करती तो उस पर वह नजर रखी जाती. फिर भी पूजा अपने पिता की नजरों से बचते हुए कहीं से भी फोन का जुगाड़ कर दीपक से बात कर लिया करती थी.

इन पाबंदियों और रोकाटोकी के बीच दीपक और पूजा के बीच प्रेम संबंध और भी गहरा हो गया था.

पूजा पर उस के पिता द्वारा शक करने की वजह से वह अकसर रात को ही अपने प्रेमी दीपक से बातें किया करती थी. कई बार तो दोनों पूरी रात बातें करते रह जाते थे. उन के बीच घर, परिवार, दोस्त, रिश्तेदार, फिल्में, सीरियल, फैशन, कपड़े आदि हर तरह की बातें होती थीं. यहां तक कि वे सैक्स संबंधी बातें भी किया करते थे. जब दीपक अपने घर चला गया था, तब पूजा बारबार दीपक को फोन कर के दिल्ली आने को कहती थी.

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दीपक पूजा के लिए दिल्ली वापस आना तो चाहता था, लेकिन उस के मातापिता उसे आने से रोक रहे थे. किसी तरह दीपक ने अपने मातापिता को दिल्ली जाने के लिए राजी कर लिया था. पुलिस को जब पूजा के साथ दीपक के प्रेम संबंध की जानकारी मिली तब इंसपेक्टर राजेंद्र कुमार ने पूजा और उस के पिता को भी थाने बुलाकर पूछताछ की गई.

थाने में पूजा ने अपने और दीपक के प्रेम संबंधों को स्वीकार लिया. उस के पिता ने भी अपना जुर्म मान लिया. उस ने बताया कि ऐसा उस ने अपनी बेटी की इज्जत के साथ खिलवाड़ करने के कारण किया. उस ने दीपक को जब पकड़ा था, तब वह अपने बेकाबू गुस्से को रोक नहीं पाया.

उस ने बताया कि उस ने कैंची से भी दीपक के ऊपर वार किए थे. जिस की वजह से दीपक के शरीर से खून निकल आया. खून लगातार बहने की वजह से दीपक बेहोश हो गया. उधर कमरे में पूजा बिस्तर में तकिए के नीचे अपना मुंह दबाए रोए जा रही थी. उसे कोई अंदाजा ही नहीं था कि दीपक के साथ उस के पिता ने क्या किया है.

कुछ ही देर में ज्यादा खून बह जाने की वजह से दीपक का दम निकल गया. जब दीपक ने बिलकुल हिलनाडुलना बंद कर दिया तो उस का गुस्सा शांत हुआ. इस के बाद वह घबरा गया.

लाश को ठिकाने लगाने के बारे में सत्यवीर ने बताया कि दीपक की हालत देख कर उस के दिमाग में तरहतरह के खयाल पैदा होने लगे. जिस से उस के मन में बेहद खौफ पैदा हो गया था. इस के लिए उस ने रात के 3 बजे मोहल्ले में ही रहने वाले जानकार अनुज को फोन किया.

5-6 बार फोन किया तो उस ने नहीं उठाया, लेकिन 5 मिनट के बाद अनुज का ही उस के पास फोन आया. तब उस ने उसे ये सारा किस्सा फोन पर बताया और जल्द ही घर आने के लिए कहा. करीब 5 मिनट के बाद ही अनुज अपनी बाइक पर सत्यवीर के घर आ गया.

सत्यवीर और अनुज ने दीपक को पहले उल्टेसीधे कपड़े पहनाए फिर उस के शव को सीढि़यों से नीचे उतारा और उसे बाइक पर बीच में बैठा कर अपने घर से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर करावल नगर के भगत विहार में स्थित वर्ल्ड जिम के बाहर डाल आए.

सत्यवीर के जुर्म कुबूल करने के बाद पुलिस ने उसे हत्या कर लाश ठिकाने लगाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. फिर उसे कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया. बाद में लाश ठिकाने लगवाने वाले दूसरे आरोपी अनुज ने थाने में सरैंडर कर दिया. जहां से उसे भी जेल भेज दिया गया.

(कथा में पूजा परिवर्तित नाम है, कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित)

Manohar Kahaniya: जॉइनिंग से पहले DSP को जेल- भाग 2

आशुतोष ने उन की हां में हां मिलाई और निखिल से बात करते हुए बोला, ‘‘ले कर दिया तेरा जुगाड़, अब जल्दी तैयार हो जा. जो काम निपटाने हैं, निपटा ले. मैं बस एक घंटे में पहुंच जाऊंगा. पहले सौरभ को रिसीव करूंगा फिर तुझे’’ कहते हुए आशुतोष ने काल डिस्कनेक्ट कर दी.

निखिल से बात करने के एक घंटे बाद आशुतोष कार ड्राइव करता हुआ सौरभ के घर के नजदीक पहुंच गया. उस ने उसे फोन कर सड़क के मोड़ तक आने के लिए कहा.

सौरभ आ गया तो उसे गाड़ी में बिठा कर वे निखिल के घर की ओर बढ़ चले. निखिल को भी रिसीव करने के बाद आशुतोष ने गाड़ी मोड़ ली अपने ‘अड्डे’ की ओर, जहां पर वे अकसर शराब पीने और मस्ती करने के लिए जाया करते थे.

बिहार के दनियावान, बिहारशरीफ, नवादा के रास्ते दोस्तों की ये तिकड़ी झारखंड के कोडरमा, झुमरी तलैया होते हुए तिलैया बांध पर पहुंच गई. करीब 190 किलोमीटर का सफर और 5 घंटे की इस यात्रा को पूरा करने के बाद आशुतोष, निखिल और सौरभ अपने अड्डे पर आ पहुंचे थे.

वहां पहुंचने से पहले आशुतोष ने झारखंड के कोडरमा शहर में गाड़ी रोक कर वहां की सरकारी शराब की दुकान से व्हिस्की और बीयर की बोतलें खरीद ली थीं. साथ में खानेपीने के लिए कुछ और भी सामान खरीद लिया था.

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5 घंटे की इस ड्राइविंग ने तीनों दोस्तों को बुरी तरह से थका दिया था. वे वहां पर दोपहर के 2 बजे पहुंच चुके थे. गाड़ी से निकलते ही तीनों ने अंगड़ाइयां लीं.

जब उन की थकान थोड़ी हलकी हुई और उन्होंने नजर घुमा कर देखा तो तिलैया बांध के चारों ओर दिन के समय ही काफी दूरदूर तक लोग 4-5 के झुंड में शराब पीते और मस्ती करते हुए नजर आ रहे थे.

कोडरमा बन गया शराबियों का अड्डा

दरअसल इस इलाके में ऐसा होना आम बात थी. जब से बिहार में शराबबंदी हुई थी, लगभग तभी से लोगों की शराब की तलब उन्हें यहां खींच लाती थी.

बिहार में शराबबंदी के बाद बिहार की सीमा से सटा झारखंड का कोडरमा जिला शराबियों का अड्डा बन गया है. यहां पर बिहार के विभिन्न जिलों से लोग शराब पार्टी के लिए आते हैं.

यहां पर बिहार के नंबरों की तमाम गाडि़यां खड़ी मिल जाती हैं. वैसे ये इलाका है भी पिकनिक स्पौट लायक. नदी, बांध, पेड़पौधे इत्यादि की वजह से ये इलाका बेहद आकर्षक लगता है.

इसी इलाके में आशुतोष का एक और स्थानीय दोस्त, सूरज कुमार भी रहता था, जिसे उस ने यहां पहुंचने से पहले ही फोन कर के आने के लिए कह दिया था.

निखिल और सौरभ, सूरज को जानते तो थे लेकिन उस के साथ उन की उतनी घनिष्ठ दोस्ती नहीं थी जिस तरह से आशुतोष के साथ थी. सूरज खानेपीने का कुछ और सामान अपने साथ ले आया था.

दोपहर के 2 बज रहे थे लेकिन दिन बेहद हल्का था, धूप नहीं थी. यही देखते हुए आशुतोष ने सौरभ और निखिल से बीयर की बोतलें खोलने के लिए कहा.

वह बोला, ‘‘बीयर की बोतल अभी ठंडी ही है, दिन भी हल्का है. एक काम करते हैं, एकएक बीयर की बोतल यहीं पी लेते हैं और यहां से अब रात को ही जाएंगे. पास के होटल वाले से मैं ने पहले ही बात कर रखी है. वो 2 कमरे हमारे लिए खाली रखेगा. क्या कहते हो?’’

निखिल और सौरभ को आशुतोष का आइडिया बुरा नहीं लगा. उन दोनों ने तुरंत आशुतोष के सवाल का जवाब देते हुए हामी भर दी.

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आशुतोष ने अपनी गाड़ी से एक थैला निकाला, खानेपीने, चकना व बीयर की बोतलें उस में डाल कर और अपनी गाड़ी लौक कर के वे सब बांध के उस हिस्से के करीब जा पहुंचे जहां दूरदूर तक शांति थी.

तिलैया बांध के मैदान में शुरू हुई पार्टी

मैदान में एक जगह पहुंचने के बाद उन चारों ने नीचे घास पर अपनी तशरीफ टिका ली. आशुतोष ने अपने थैले से बीयर की 4 बोतलें, नमकीन के पैकेट निकाले और खानेपीने का सामान निकाला. चारों गोल घेरे में बैठ कर एकएक कर के बीयर की बोतलें खोल कर पीने लगे, और सब के बीच हंसीमजाक होने लगा.

ऐसे ही करते हुए करीब 4 बजे के आसपास नशे में धुत हर कोई अपने फोन से एक दूसरे की फोटो खींचने लगा.

इतने में नशे में अपना होश खो बैठे आशुतोष ने फोटो और अच्छे से खींचने और खिंचवाने के लिए अपनी पैंट की कमर से अपनी सर्विस पिस्तौल निकाल ली.

आशुतोष की सर्विस पिस्तौल को देखने के बाद निखिल, सूरज और सौरभ हैरान रह गए. निखिल को छोड़ कर सूरज और सौरभ ने अपने जीवन में पहली बार हकीकत में इतनी नजदीक से पिस्तौल देखी थी.

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वह उसे पकड़ कर महसूस करना चाहते थे कि आखिर इसे हाथ में पकड़ कर कैसा महसूस होता है. निखिल इसलिए हैरान हो गया था क्योंकि उसे लगा था कि आशुतोष इसे अपने घर ही छोड़ आया होगा.

उस समय वहां मौजूद चारों दोस्त नशे में धुत थे. इतने में सौरभ ने नशे में आशुतोष से उस की पिस्तौल मांगते हुए कह, ‘‘भाई, दिखा जरा. आखिर हम भी तो देखें कि कैसा लगता है इसे पकड़ कर.’’

आशुतोष अपने दोस्त को पिस्तौल थमाते हुए लड़खड़ाती जबान में बोला, ‘हां भाई, ले न. पूछ क्या रहा है. तेरी ही तो चीज है.’

अगले भाग में पढ़ें- रंज में बदल गई पार्टी

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