Feel-Good Story in Hindi : मुरलीजी की कचौड़ी

Feel-Good Story in Hindi. मुरलीजी की कचौड़ी पूरे इलाके में अपने स्वाद के लिए मशहूर थीं. पर अब उन के बेटों ने वहां रैस्टोरैंट बना दिया. मुरलीजी को लगा कि कुछ तो गलत हो रहा है और इसी चिंता में वे बीमार हो गए. क्या गलत हुआ था?

मुरलीजी की कचौड़ी की दुकान शहर की छोटी, पर बहुत ही पुरानी दुकान थी. यह दुकान जितनी जगह में छोटी थी, उतनी ही मशहूरी में बहुत बड़ी थी. दुकान पर उन के नाम का कोई बोर्ड नहीं लगा था, बस शहर के लोग उसे ‘मुरलीजी की कचौड़ी’ के नाम से जानते थे.

दुकान के बाहर खुद मुरलीजी कोयले की भट्ठी लगा कर गरम तेल की बहुत बड़ी कड़ाही में कचौडि़यां बनाते थे. वे कचौडि़यां बना कर बहुत बड़े बरतन में उन्हें डालते थे, जहां पर उन का बड़ा बेटा मोहन और नौकर पैसे ले कर कचौडि़यां पैक कर के ग्राहकों को देते थे. साथ में बहुत ही चटपटी चटनी भी देते थे. जो लोग वहीं दुकान पर खाना चाहते थे, उन्हें पुराने अखबार के कागज पर कचौड़ी के ऊपर चटनी डाल कर देते थे.

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ज्यादातर ग्राहक दुकान के बाहर खड़े हो कर कचौड़ी को बहुत चाव से स्वाद लेले कर खाते थे, क्योंकि दुकान के अंदर बैठने के लिए बहुत ही कम जगह थी. सिर्फ एक ही बैंच थी. दुकान पर हमेशा लंबी लाइन लगी रहती थी.

लाइन में खड़े लोग कचौडि़यां बनाते हुए मुरलीजी को बड़े ध्यान से देखते थे. वे गुंदे हुए मैदे के बड़े गोले को कटोरी बना कर उस में आलू का मसाला भरते थे, फिर दोबारा उस का गोला बनाते और दोनों हाथों से दबा कर तश्तरी जैसा आकार दे कर गरम तेल की कड़ाही में एकएक कर के डाल देते थे.

जब 50-50 कचौडि़यां एकसाथ कड़ाही में तलती थीं, तो वह छटा देखते ही बनती थी. कचौडि़यों की खुशबू आसपास फैलती थी और सड़क पर चलते हुए लोग उस खुशबू से खिंच कर वहां चले आते थे.

कई लोग तो कचौडि़यां पैक करा कर दूसरे शहरों में अपने सगेसंबंधियों को भेजते थे, क्योंकि वे कचौडि़यां दूसरे दिन और भी अपना स्वाद बरकरार रखती थीं और इसीलिए दिन में मुरलीजी हजारों कचौडि़यां बेचते थे. इस के चलते शाम तक उन की बड़ी मजबूत तिजोरी पैसों से भर जाती थी. पर उन्हें कभी भी पैसे का घमंड नहीं था, न ही इतनी छोटी दुकान चलाते हुए शर्म आती थी.

हालांकि, मुरलीजी के पास 2-3 बहुत बड़े बंगले थे और शहर में दूसरी जगह खरीदी गई दुकानें भाड़े पर दी हुई थीं, पर उन के दोनों बेटों को इस छोटी सी दुकान पर बैठ कर शर्म आती थी.

मुरलीजी ने अपने बेटों के लिए बहुत ही शानदार बंगला रहने को बनवाया था, पर दुकान जैसे 30 साल पहले थी, वैसे ही आज थी. उन के पास वाली बहुत बड़ी दुकान बिक रही थी और उस के ऊपर का हाल भी बिक रहा था. मुरलीजी ने अपने बेटों के कहने पर रैस्टोरैंट बनाने के लिए हाल समेत वह दुकान मुंहमांगे दामों पर खरीद ली.

बेटों ने उस रैस्टोरैंट में महंगा और शानदार फर्नीचर लगवाया और डिजाइनर टेबलकुरसियां भी रखवाईं. साथ में यूनिफौर्म वाले वेटर भी थे.

यह सारा आइडिया मुरलीजी के छोटे बेटे सोहन का था, जो दिल्ली में पढ़ कर आया था. दिल्ली में उसे अच्छी नौकरी मिली भी, पर तनख्वाह उस के पापा की दुकान की रोज की कमाई से काफी कम थी, इसीलिए उस ने 2-3 महीने नौकरी कर के छोड़ दी. इतने में तो शहर के अच्छे मकान का किराया भी मुश्किल से चुकाया जा पाता है.

मुरलीजी के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी. रैस्टोरैंट पर पानी की तरह पैसा बहाया गया. एक दिन शहर के बड़ेबड़े लोगों को न्योता दे कर उस रैस्टोरैंट का उद्घाटन किया गया.

सुबह स्थानीय अखबार में पहले पन्ने पर इश्तिहार भी दिया गया. अमीर घर के लोगों के लिए यह अच्छा था, क्योंकि शहर में कोई बड़ा रैस्टोरैंट था भी नहीं. पर रैस्टोरैंट में खाने का बिल ज्यादा आता था, तो छोटेमोटे ग्राहक रोजाना वहां नहीं आ पाते थे.

अब मुरलीजी को सिर्फ कैश काउंटर पर बैठना था और साथ ही रैस्टोरैंट पर नजर रखनी थी कि सभी को सर्विस बराबर मिल रही है या न. कचौडि़यां दुकान के पुराने नौकर बना रहे थे, साथ में उस के लिए 2-3 नए कुक भी रख लिए गए. वे कई बार कचौडि़यां बना कर गरम करने के लिए उन्हें बड़े ओवन में रख देते थे. अब हर काम दुकान की तरह न हो कर कंपनी की तरह होता था.

भट्ठी अब दुकान के पिछले भाग में लगा दी गई, क्योंकि इतने बड़े रैस्टोरैंट के आगे भट्ठी अच्छी नहीं लगती है. भट्ठी आगे नहीं थी, तो कचौडि़यों की खुशबू भी सड़क पर नहीं फैलती थी. लोग अब दुकान के आगे से आतेजाते, तो महसूस करते थे कि कुछ तो कमी है.

इस तरह से शाही अंदाज में खाना हो तो बड़ा बिल भी चुकाना पड़ेगा. रैस्टोरैंट में खाने का बिल ज्यादा आता था, तो मिडिल क्लास ग्राहक वहां रोजरोज नहीं आ पाते थे. सामने एक बहुत बड़ा स्कूल था. उस में बहुत सारे बच्चे पढ़ते थे. पहले वे आधी छुट्टी होते ही काफी तादाद में कचौड़ी खाने आते थे.

उस समय पूरी सड़क ब्लौक हो जाती थी, इसीलिए मुरलीजी एक घंटा पहले ही कचौडि़यां बना कर रख देते थे और दूसरे ग्राहकों को आधी छुट्टी खत्म होने के बाद आने को कहते थे.

पहले कचौड़ी का जितना बिल होता था, उतनी तो अब रैस्टोरैंट में वेटर की टिप हो जाती थी. अब छोटेछोटे बच्चे रोज रैस्टोरैंट में बैठ कर कचौड़ी नहीं खा सकते ठें, क्योंकि इतना ज्यादा बिल देना उन के बस का नहीं था.

इस सब के बावजूद महंगा वाला रैस्टोरैंट अच्छा ही चल रहा था. हालांकि, अब वहां के खर्चे भी बहुत बढ़ गए थे, धीरेधीरे पहले जो कचौड़ी बेचने में मुनाफा रहता था, वह अब रैस्टोरैंट में नहीं रहा. मुरलीजी को पूरे दिन काउंटर पर बैठना और पैसे गिनना और शाम को हिसाब लगाना अच्छा नहीं लगता था. कह सकते हैं कि उन्हें मजा नहीं आ रहा था और न ही उन्हें ग्राहकों के चेहरे पर संतुष्टि दिख रही थी.

ऐसे ही 2-3 महीने निकल गए. एक दिन मुरलीजी बहुत ज्यादा बीमार हो गए. उन्हें जिंदगी में पहली बार हौस्पिटल में भरती कराया गया. उन के बहुत सारे टैस्ट हुए, पर डाक्टर को उन की बीमारी समझ  में नहीं आ रही थी. इस वजह से डाक्टर टैस्ट पर टैस्ट कराए जा रहे थे कि शायद कोई कहीं तकलीफ पकड़ में आए.

डाक्टर को मुरलीजी की बीमारी पकड़ में नहीं आई, पर मुरलीजी समझ  गए कि वे क्यों बीमार हो गए. उन्हें याद आया कि एक बार वे बिल बनाते समय पैसों को ले कर ग्राहक से ही उलझ  गए थे. वह बहुत पुराना ग्राहक था और सालों से दुकान आता रहा था, पर अब दूसरे शहर में नौकरी के चलते उस का कभीकभार आना होता था. वह ग्राहक जब भी घर आता, तो यहां से 100 के आसपास कचौडि़यां पैक करा कर अपने शहर ले जाता था.

वह ग्राहक इस बार मुरलीजी का यह रूप देख कर हैरानी में पड़ गया कि इस आदमी के चेहरे पर हमेशा ही मुसकराहट होती थी, पर आज झुनझुलाहट क्यों दिख रही है.

‘‘मुरलीजी, आप की तबीयत तो ठीक है न?’’ उस ग्राहक ने प्यार व अपनेपन से सिर्फ इतना ही पूछा.

मुरलीजी को हौस्पिटल के बिस्तर पर लेटेलेटे न जाने कितने ही ऐसे किस्से याद आने लगे. फिर एक दिन उन्हें हौस्पिटल से छुट्टी मिल गई.

एक दिन जब दोनों बेटे सुबह 10 बजे रैस्टोरैंट पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि उन के पापा पुरानी दुकान के आगे भट्ठी लगा कर कचौडि़यां तल रहे थे और उस की वही पुरानी खुशबू के चलते दुकान के आगे लोगों की लंबी लाइन लगी हुई थी.

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आज दुकान में वैसा ही इंतजाम था, जैसा रैस्टोरैंट खोलने से पहले था. तमाम लोग हैरानी से दुकान की ओर बढ़ने लगे और देखने लगे कि आज खुद मुरलीजी कचौडि़यां बना रहे हैं. आज मुरलीजी के चेहरे पर वही पहले वाली रौनक थी.

लोग कानाफूसी करते हुए मुरलीजी से बात करने की कोशिश कर रहे थे, पर आज वे अपने मन के अलावा किसी की नहीं सुन रहे थे. बस, किस ग्राहक को कितनी कचौडि़यां चाहिए, वही पूछ रहे थे और यह भी पूछ रहे थे कि कचौडि़यां पहले जैसी ही बनी हैं न?

दोनों बेटे अपने पापा को देख रहे थे, उन पर गुस्सा हो रहे थे, पर इतने ग्राहकों की भीड़ के सामने उन्हें कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई.

दोपहर को जब मुरलीजी थोड़े फ्री हुए तो छोटे बेटे सोहन ने कहा, ‘‘पापा, यह सब क्या है? इतना खर्च किया हम ने रैस्टोरैंट बनाने पर और आप…’’

मुरलीजी मुसकराते हुए बोले, ‘‘पंछी को पिंजरे में बंद हो कर जैसा लगता होगा, वैसा ही मुझे  लग रहा था. कह सकते हैं कि बहुत बुरा लग रहा था. शायद इसी वजह से मैं अपनी जिंदगी में पहली बार बीमार हुआ.

‘‘मैं ने 40 साल से इसी तरह काम किया है और बंगले बनवाए, बैंक बैलेंस खड़ा किया. अब इस उम्र में मैं बदल नहीं सकता और न ही अपनेआप से कोई समझोता कर सकता हूं. मैं अगर पहले जैसा नहीं बना, तो शायद जी भी नहीं पाऊंगा.’’

‘‘पर पापा, यह जो इतना बड़ा रैस्टोरैंट खोला है, इस का क्या करना?’’ बड़े बेटे मोहन को कुछ समझ  में नहीं आ रहा था.

‘‘बेटा, मैं तो इसलिए तैयार हुआ था कि तुम लोगों को एक छोटी सी दुकान में भट्ठी पर बैठने में शर्म आती है. गलती तुम्हारी नहीं है, क्योंकि तुम ने वह नहीं देखा, जो मैं ने देखा है. तुम लोग पढ़ेलिखे हो, तुम्हारी दोस्ती अच्छे पढ़ेलिखे लोगों से है. तुम लोगों ने शुरू से ही बंगलागाड़ी देखी है, शायद इसीलिए मैं ने रैस्टोरैंट खोलने के लिए तुम लोगों की बात मानी.

‘‘अब यह रैस्टोरैंट तुम लोग चलाओ. जो लोग फास्ट फूड खाना चाहते हैं, पंजाबी और विदेशी खाना खाना चाहते हैं और अच्छी कीमत देना चाहते हैं, उन्हें तुम संभालो. मैं अपनी कचौड़ी की दुकान में ही ठीक हूं.

‘‘मैं कचौडि़यां बनाऊंगा, क्योंकि इस रैस्टोरैंट के चलते मेरे बरसों पुराने कचौड़ी खाने वाले ग्राहक और स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे इस जगह से दूर हो चुके हैं, क्योंकि वे रोजरोज ज्यादा पैसे खर्च नहीं कर सकते हैं. न मेरी कचौड़ी खाने वाले खुश हैं और न ही मैं कचौड़ी बनाने वाला. पर आज हम दोनों ही खुश हैं,’’ लंबी लाइन देख कर वे खुशी से उठते हुए बोले.

इस पर सोहन ने कहा, ‘‘पापा, आप हमें माफ कर दो. हम ने आप को इस उम्र में बदलने की कोशिश की. पर जब हम इस उम्र में नहीं बदल सकते हैं, तो कैसे उम्मीद रखें कि आप को इस उम्र में बदल देंगे.’’  Feel-Good Story in Hindi

Marriage Conflict Story: एक दर्द ऐसा भी

Marriage Conflict Story. निजाम बिजनौर जिले के नारायणपुर गांव का रहना वाला था. उस के अब्बा उस गांव के प्रधान थे, जो अपने आखिरी समय में निजाम के लिए काफी जमीन और पैसा छोड़ कर इस दुनिया से चल बसे थे.

निजाम की उम्र उस समय 30 साल थी, जब उस की शादी साजिदा से हुई थी. साजिदा बिजनौर जिले के भागुवाले गांव की रहने वाली एक गरीब परिवार की बेटी थी.

साजिदा की उम्र उस समय महज 16 साल थी, जब उस की शादी निजाम से हुई थी.

साजिदा के अब्बा ने उस की शादी निजाम से इस लालच में करा दी थी, क्योंकि वह अपने बाप का एकलौता बेटा था और जिस के पास काफी जमीन और पैसा था, भले ही उस की उम्र साजिदा से दोगुनी थी.

साजिदा थी बड़ी खूबसूरत और गदराए बदन की मलिका. गोरीचिट्टी, बड़ीबड़ी आंखें, गुलाबी होंठ, सुर्ख गाल जिसे देखते ही निजाम उस का ऐसा दीवाना बन बैठा कि उसे न खाने का होश था, न कमाने का. वह तो बस रातदिन साजिदा की बांहों मे पड़ा रहता और उस के इर्दगिर्द मंडराता रहता.

निजाम साजिदा को जीजान से चाहता था. उस के मुंह से निकली हर बात को पूरा करना उस का मकसद रहता था.

साजिदा समझ चुकी थी कि निजाम उस का दीवाना बन गया है, वह जो कहेगी निजाम वही करेगा.

साजिदा ने अपनी जिंदगी में नया मोड़ लाना शुरू कर दिया. वह निजाम से मुंहमांगे पैसे लेती और मनमाने ढंग से खर्च करती. उस ने अपनेआप को एक देहाती औरत के बजाय मौडर्न बनाना शुरू कर दिया और निजाम से एकएक कर के जमीन बिकवाने लगी और खूब खर्च करने लगी.

साजिदा ने 10 साल में 2 बेटों और 2 बेटियों को जन्म दिया. निजाम और साजिदा दोनों खुश थे. उन के घर में किसी बात की कोई कमी न थी.

निजाम खेतीबारी करता था, पर उस के घर का खर्चा उस की कमाई से ज्यादा था, जिस की मुख्य वजह थी साजिदा का मनमाने ढंग से घूमनेफिरने में खर्च करना.

जब कभी निजाम साजिदा को फुजूलखर्च के लिए रोकता तो साजिदा उस से नाराज हो जाती और उसे अपने पास फटकने न देती. मजबूर हो कर निजाम को साजिदा की बात माननी पड़ती.

समय बीतता गया. बच्चे बड़े होते गए. बड़े लड़के रईस को एक लड़की से प्यार हो गया, तो उस ने उस से शादी कर ली और उसे ले कर देहरादून चला गया और वहीं कोई कामकाज करने लगा.

इधर साजिदा की फुजूलखर्ची और घूमनेफिरने की आदत से घर के कुछ सदस्य नाराज थे, तो एक बेटी अमीना उस के कहने में थी. वह भी उसी के रास्ते पर चल कर अपनी जिंदगी जी रही थी.

साजिदा 50 की उम्र में भी 30 की लगती थी. उस ने अपने हुस्न और जिस्म को इस तरह मेंटेन कर के रखा था कि कोई उसे जब निजाम के साथ देखता तो उन दोनों को बापबेटी समझता था. गांव के कई लड़के आज भी उस पर मरमिटते थे और मौका देख कर अपने प्यार का इजहार भी कर देते थे. साजिदा की एक कातिल मुसकान उन का दिल धड़का देती थी.

निजाम बूढ़ा होता जा रहा था. साजिदा की जिस्मानी जरूरत पूरी करने में अब वह कमजोर हो चुका था, जिस से साजिदा अब उस से कतराने लगी थी. यही वजह थी कि वह गांव के कई लड़कों से अपनी जिस्मानी जरूरत पूरी करने लगी थी.

जब साजिदा के बच्चों को उस की इस हरकत का पता चला तो उन्होंने उस के बाहर आनेजाने पर रोक लगा दी. सब बच्चे साजिदा के खिलाफ हो गए, सिर्फ अमीना उस के साथ थी, जिस का फायदा साजिदा को यह मिला कि जब भी वह अपने किसी आशिक से मिलने जाती तो अमीना को भी साथ ले जाती.

अमीना की उम्र उस समय 16 साल थी. सब यही समझते थे कि अमीना के साथ होते हुए साजिदा कोई गलत हरकत नहीं कर सकेगी, पर उन का यह समझना भूल था.

साजिदा की हरकतों से अमीना अच्छीखासी वाकिफ थी और उसे भी अपनी अम्मी के रास्ते पर चलना अच्छा लगता था.

अमीना भी खूबसूरती की एक जीतीजागती मिसाल थी. कम उम्र में ही उस के आशिकों की एक अच्छीखासी तादाद हो गई थी.

साजिदा जब अमीना के सामने ही अपने आशिकों की बांहों में सिमट कर खूब मजे लेती, तो अमीना की भी हवस जाग जाती और वह भी अपने जिस्म की आग बुझाने के लिए बेताब हो उठती.

साजिदा भी अमीना को किसी लड़के के साथ तनहा छोड़ देती, ताकि वह भी अपने जिस्म के मजे ले सके, ताकि साजिदा के नाजायज रिश्ते को अमीना छिपा ले.

एक दिन साजिदा अमीना के साथ खेत में टहलने गई थी, जहां साजिदा का आशिक उसे अपनी बांहों में भर कर मजे ले रहा था. दूसरी तरफ साजिदा के आशिक का बेटा अमीना को अकेली देख कर उस पर आशिक हो गया और अमीना को अपनी बांहों में भर कर उस के शरीर से खेलने लगा.

अमीना ने उस का कोई विरोध नहीं किया, क्योंकि उस पर तो सैक्स का भूत सवार रहता ही था. जब वे दोनों खेत में जिस्म की आग को ठंडा कर रहे थे, तभी गांव के किसी बुज़ुर्ग ने उन्हें देख लिया और उस ने सारी घटना आ कर साजिदा के छोटे बेटे और उस के शौहर निजाम को बता दी.

यह सुन कर निजाम को इतना गुस्सा नहीं आया जितना उस के बेटे रिहान को आया.

कुछ देर बाद साजिदा जैसे ही घर में घुसी तो निजाम उसे डांटने लगा. साजिदा भी बिना डरे उस से जबान चलाने लगी.

यह देख कर रिहान को गुस्सा आ गया और उस ने पास रखे डंडे से अपनी मां की पिटाई कर दी और जान से मारने की धमकी भी दी.

रिहान की धमकी से साजिदा घबरा गई और अब उस की हिम्मत जवाब दे गई. उस ने घर से बाहर निकलना बंद कर दिया.

कुछ दिनों में निजाम ने अपनी दोनों बेटियों की शादी कर दी, क्योंकि उसे अब डर था कि कहीं वे भी अपनी मां के रास्ते पर चल कर गलत न हो जाएं. उसे अपनी बड़ी बेटी सायरा पर तो भरोसा था, पर छोटी बेटी अमीना पर नहीं था, क्योंकि वह अकसर अपनी अम्मी का पक्ष लेती थी और उसी के साथ घूमतीफिरती थी.

सायरा की शादी दिल्ली में हो गई और अमीना की शादी मुंबई में. समय बीतता गया. अमीना की डिलीवरी के समय साजिदा उस के पास मुंबई चली गई.

अमीना ने कुछ ही दिनों में एक बेटी को जन्म दिया, जिसे पा कर साजिदा का दामाद इरफान और बेटी अमीना बहुत खुश हुए.

इरफान एक अच्छा कारोबारी था. उस के घर में खानेपीने की कोई कमी न थी. साजिदा को इरफान के घर रहना अच्छा लग रहा था, इसलिए वह अपने गांव वापस जाने का नाम ही नहीं ले रही थी.

निजाम ने कई बार साजिदा को आने के लिए कहा, पर वह कोई न कोई बहाना बना कर टाल गई.

निजाम ने इरफान को फोन कर के कहा कि वह अपनी सास पर लौटने का दबाव डाले, पर अपनी अम्मी के गांव जाने की बात सुन कर अमीना गुस्सा हो गई और बोली, ‘‘मेरी अम्मी कही नहीं जाएंगी. वे मेरे साथ ही रहेंगी.’’

‘‘घर पर अब्बा परेशान हैं. वे अम्मी को बुला रहे हैं. तुम क्यों इन्हें रोक रही हो?’’

यह सुन कर साजिदा बोली, ‘‘मेरी बेटी मुझ से प्यार करती है और मैं भी उस से बहुत प्यार करती हूं.’’

इरफान बोला, ‘‘घर पर अब्बा भी तो परेशान हैं. आजकल उन की तबीयत भी सही नहीं रहती और उन्होंने मुझे  सख्ती से कहा है कि अपनी सास को घर भेज दो.’’

अमीना चिल्लाई, ‘‘अम्मी कहीं नहीं जाएंगी, बस यह मेरा आखिरी फैसला है.’’

यह सुन कर इरफान को गुस्सा आ गया और बोला, ‘‘आखिर कब तक रहेंगी ये यहां?’’

‘‘जिंदगीभर, क्योंकि ये मेरी अम्मी हैं,’’ कहते हुए अमीना अपने कमरे मे चली गई और गुस्से ने दरवाजा बंद कर लिया.

अमीना की इस हरकत से इरफान को काफी गुस्सा आया और उस ने अमीना और साजिदा से बात करना बंद कर दिया. उस ने सोचा कि अगर वह कुछ दिन अमीना से बात नहीं करेगा तो उसे अपनी गलती का अहसास होगा, पर ऐसा नहीं हुआ.

इस बीच साजिदा ने अपने एक मिलने वाले बिल्डर से अमीना को मिलवा दिया, जो देखने मे इरफान से ज्यादा हैंडसम और अमीर था. देखते ही देखती उन दोनों मे दोस्ती हो गई और साजिदा ने इस दोस्ती को इतना बढ़ावा दिया कि वे दोनों इरफान की गैरमौजूदगी में घर में ही मिलने लगे और साजिदा उन दोनों को अकेला घर में छोड़ कर बाहर निगरानी करने लगी.

जल्द ही उन दोनों के बीच जिस्मानी ताल्लुकात बन गए और अमीना अब उस बिल्डर की दीवानी हो गई.

इरफान ने देखा कि अमीना को अपनी गलती का अहसास नहीं है, तो वह खुद ही अमीना को मनाने उस के करीब गया तो अमीना ने उसे झिड़क कर दूर कर दिया. अमीना की इस हरकत से इरफान दंग रह गया.

कुछ ही दिनों में अमीना और इरफान के बीच झगड़ा शुरू होने लगा और अमीना अब इरफान की सूरत भी देखना गवारा नहीं कर रही थी और अपने आशिक के साथ गुलछर्रे उड़ा रही थी.

कुछ ही दिनों मे साजिदा और अमीना के हाथ इरफान के रखे हुए पैसे और जेवर लग गए, जिन्हें उन्होंने गायब कर दिया. जब इस बात पर बहस हुई तो अमीना और साजिदा इरफान का घर छोड़ कर कहीं चली गईं.

इरफान अमीना की हरकतों से पहले ही तंग आ चुका था, इसलिए उस ने अमीना को उस के हाल पर छोड़ दिया.

कुछ दिनों बाद इरफान ने दूसरी शादी कर ली और अपनी बेटी और नई बीवी के साथ बिजी हो गया.

अमीना और साजिदा कहां गायब हुईं, इस का कुछ पता न चला. कई महीने साजिदा का इंतजार करने के बाद आखिरकार निजाम ने बिजनौर के महिला परामर्श केंद्र की शरण ली.

वहां की इंस्पैक्टर संध्या ने साजिदा का मोबाइल नंबर लिया. अनजान नंबर से आई काल को साजिदा ने उठा लिया और उसे बिजनौर के परामर्श केंद्र मे आने को कहा गया.

यह सुन कर साजिदा घबरा गई और एक हफ्ते बाद आने का वादा कर लिया तो इंस्पैक्टर संध्या ने निजाम को भी बिजनौर आने के लिए फोन कर दिया.

एक हफ्ते बाद वे दोनों महिला परामर्श केंद्र पहुंचे. उन दोनों की बात इंस्पैक्टर संध्या ने सुनी तो वे साजिदा से बोलीं, ‘‘तुम अपने शौहर से दूर कहां रह रही हो? तुम इन के साथ क्यों नहीं रहती हो?’’

साजिदा बोली, ‘‘ये मुझे खर्चा भी नहीं देते और कुछ कामकाज भी नहीं करते. मैं इन के साथ नहीं रह  कती.’’

इंस्पैक्टर संध्या ने कहा, ‘‘ये तुम्हें खर्च देंगे. जैसा खुद खाएंगे, वैसा तुम्हें भी खिलाएंगे.’’

साजिदा बोली, ‘‘मुझे  इन के साथ नहीं रहना. इन का बेटा मुझे मारता है. एक बार उस ने मेरे पैरों पर इतनी तेज लाठी मारी थी कि मैं कई दिन तक उठ भी नहीं पाई थी. वह मुझे जान से मारने की धमकी देता है.’’

इस पर इंस्पैक्टर संध्या ने निजाम पर गुस्सा होते हुए कहा, ‘‘अपने बेटे को भी यहां बुलाओ. उस ने अपनी मां को क्यों मारा और क्यों जान से मारने की धमकी देता है?’’

निजाम बोला, ‘‘इस का आएदिन बिना बताए घर से गायब हो जाना और गांव वालों से इस के बारे में उलटीसीधी बातें सुन कर उसे गुस्सा आ गया था, इसलिए उस ने ऐसी हरकत की.’’

इंस्पैक्टर संध्या बोलीं, ‘‘क्यों साजिदा, यह सब क्या सुन रही हूं मैं…’’

साजिदा रोते हुए बोली, ‘‘ये सब मेरे ऊपर झुठा इलजाम लगा रहे हैं. मैं इन के साथ नहीं रहूंगी.’’

इस पर निजाम बोला, ‘‘इस ने तो अपनी बेटी का घर भी उजाड़ दिया है. वह भी अपने शौहर को छोड़ कर कहीं चली गई तो उस ने दूसरी शादी कर ली.’’

इंस्पैक्टर संध्या ने साजिदा से उस की बेटी के बारे मे पूछा तो वह बोली, ‘‘उस का शौहर भी उसे मारतापीटता था, इसलिए वह उस का घर छोड़ कर अलग रह रही है. हम दोनों साथ ही रहते हैं.’’

काफी देर के बाद भी साजिदा यही कहती रही कि उसे इन के साथ नहीं रहना, तो इंस्पैक्टर संध्या ने साजिदा को छोड़ दिया और निजाम से बोली, ‘‘हम जबरदस्ती साजिदा को तुम्हारे साथ नहीं भेज सकते और अगर भेज भी देंगे तो यह तुम्हारे साथ नहीं रहेगी, क्योंकि यह अब तुम्हारे साथ नहीं रहना चाहती.’’

निजाम हताश हो कर घर वापस आ गया. कई साल गुजर गए पर आज तक दोनों मांबेटी का कुछ पता न चला.

साजिदा एक ऐसी बेवफा औरत निकली, जिस ने अपना तो बसाबसाया घर उजाड़ा ही, साथ में अपनी बेटी अमीना का घर भी बरबाद कर दिया. Marriage Conflict Story

-अंसारी जीशान अहमद

शौचालय नहीं तो शादी नहीं

Scoiety News in Hindi: मध्य प्रदेश में इंदौर के बुरहानपुर इलाके में शादी के बाद ससुराल पहुंची एक दुलहन का स्वागत एक नई रीति से हुआ. ससुराल पहुंचते ही दूल्हा उस का हाथ पकड़ कर सब से पहले शौचालय दिखाने ले गया, क्योंकि शादी से पहले लड़की की शर्त थी कि लड़के के घर में अगर शौचालय नहीं होगा, तो वह शादी नहीं करेगी. इसी शर्त को मानते हुए दूल्हे शेख एजाज शेख अनवर ने अपनी दुलहन परवीन बानो के लिए पहले घर में शौचालय बनवाया, फिर निकाह किया. बात सही भी है, क्योंकि परवीन बानो की यह लड़ाई अपने बुनियादी हक को ले कर थी.

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर इलाके में भी एक दुलहन ने शादी के बाद विदाई से सिर्फ इस वजह से इनकार कर दिया, क्योंकि उस की ससुराल में शौचालय नहीं था. अब ससुराल वाले शौचालय बनाने का इंतजाम कर रहे हैं, ताकि बहू को घर लाया जा सके.

घर में शौचालय की कमी के चलते घर से बाहर शौच जाने वाली लड़कियों और औरतों के साथ बलात्कार होने की खबरें आती रहती हैं. ऐसे में उन के द्वारा इस तरह के फैसले लेना एक हिम्मत भरा कदम है.

भारत में शौचालय कम और मोबाइल फोन ज्यादा हैं. हैरानी की बात है कि औरतों की सब से बुनियादी जरूरत के प्रति अभी भी इतनी अनदेखी क्यों होती है?

ज्यादा देर तक पेशाब रोकने और कम पानी पीने के चलते लड़कियों के शरीर में खतरनाक बीमारियों के पैदा होने का डर कई गुना बढ़ जाता है. गुरदे की तरहतरह की बीमारियां, पेशाब की नलियों में रुकावट या फिर पेशाब से जुड़े कई तरह के इंफैक्शन का लैवल औरतों में इसी वजह से बहुत ज्यादा बढ़ जाता है.

एक स्टडी में सामने आया है कि भारत में 16 साल की उम्र से पहले 4 फीसदी लड़कों के मुकाबले 11 फीसदी लड़कियों में पेशाब संबंधी इंफैक्शन पाया है.

शौचालय बनाना तो 10वां हिस्सा काम है. फिर कारपोरेशनों और पंचायतों को घरघर पानी का इंतजाम करना होगा और पूरे इलाके में सीवर डलवाने होंगे. यह कौन और क्यों करेगा? दलितों का काम यहां के सवर्ण करने को तैयार ही नहीं हैं.

कचरे में फेंकते बच्चे, आखिर क्यों मिलती है नवजातों को यह सजा

Society News in Hindi: भीड़ आमतौर पर तमाशा देखने और बातें बनाने के लिए ही जमा होती है, ऐसा ही इस मामले में भी हुआ. किसी की हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि बच्चे को जा कर उठा ले, मानो वह किसी इनसान की औलाद नहीं, बल्कि कोई खतरनाक बम हो. भीड़ में मौजूद हर शख्स देख पा रहा था कि उस नवजात के जिस्म पर चींटियां रेंग रही थीं और हर कोई यह समझ भी रहा था कि अगर जल्द ही बच्चे को इलाज नहीं मिला तो उस की मौत भी हो सकती है. आखिरकार हिम्मत करते हुए एक आदमी डालचंद कुशवाहा ने बच्चे को उठा कर कपड़े से साफ किया और उसे काट रही चींटियों को उस के बदन से हटाया. इसी बीच वहां मौजूद दूसरे लोगों ने एंबुलैंस और पुलिस को फोन कर दिया था. एंबुलैंस और पुलिस वाले आए और बच्चे को अस्पताल ले गए. पुलिस वालों ने नामालूम मांबाप के खिलाफ पैदाइश छुपाने की धारा के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी.

छंटती हुई भीड़ में यही बातें हो रही थीं कि न जाने किस के पाप की निशानी है… घोर कलियुग आ गया है जो कुंआरी लड़कियां हमबिस्तरी तो मजे से करती हैं, लेकिन जब पेट से हो जाती हैं तो बच्चा गिराने के बजाय उसे घूरे या कचरे में फेंक देती हैं. ऐसा होना तो अब आएदिन की बात हो गई है… कितनी पत्थरदिल होगी वह मां, जो अपने कलेजे के टुकड़े को यों फेंक गई.

हकीकत से सरोकार नहीं

भीड़ अपनी भड़ास निकालते हुए छंट गई, लेकिन कई सवाल जरूर अपने पीछे छोड़ गई कि क्यों लाखों नवजात हर साल देशभर के घूरों पर जिंदा या फिर मरे मिलते हैं? इन के लिए मां का दूध और प्यार क्यों नहीं होता और घूरे या कचरे के ढेर पर मिले बच्चे पाप की निशानी ही क्यों माने और कहे जाते हैं?

हर कोई यह जरूर मानता और जानता है कि ऐसे बच्चे अकसर कुंआरी लड़कियां ही पैदा करती हैं जो प्यारमुहब्बत में पड़ कर पेट से हो आती हैं और वक्त रहते, वजह कुछ भी हो, बच्चा नहीं गिरा पातीं. पेट में पल रहा बच्चा कभीकभार जोरजबरदस्ती यानी बलात्कार की देन भी हो सकता है, लेकिन लड़की का कुसूर यही रहता है कि वह समय रहते बच्चा गिरा नहीं पाती है.

कोई यह नहीं सोच पाता कि क्यों एक लड़की नाजायज करार दिए जाने वाले बच्चे को 9 महीने तक पेट में रख कर ढोने और छुपाने को मजबूर होती है और अकसर क्यों इस में उस का साथ घर वाले भी देते हैं?

जाहिर है, समाज में इज्जत बचाए रखने और लड़की के भविष्य की खातिर वे यह फैसला लेते हैं कि अगर बच्चा गिराया जाना मुमकिन न हो तो पैदा होने के बाद उसे किसी घूरे पर फेंक देना ही बेहतर है, क्योंकि समाज किसी भी हालत में उसे मंजूरी नहीं देगा और बात उजागर हो गई तो लड़की की शादी तो दूर की बात है, लोग उसे चैन से जीने भी नहीं देंगे, क्योंकि उस ने कुंआरी मां बनने का संगीन जुर्म जो किया है.

इस जुर्म में लड़की का भागीदार कौन था, उस की चर्चा न के बराबर होती है और चूंकि वह मर्द होता है इसलिए लोग उसे गुनाहगार नहीं मानते यानी लड़की या औरत होने का खमियाजा इस तरह भी भुगतना पड़ता है.

लड़कियां ये एहतियात बरतें

प्यारमुहब्बत में धोखा खा कर या धमका कर या फिर बहलाफुसला कर किसी ने कोख में बच्चा रूपी बीज बो दिया है, इसलिए लड़कियों को होशियार रहने की जरूरत है, क्योंकि पूरा खमियाजा उन्हें ही भुगतना पड़ता है. इन परेशानियों से बचने के लिए उन्हें ये एहतियात बरतनी चाहिए:

* अगर किसी से हमबिस्तरी की है और तयशुदा वक्त पर पीरियड न आए तो समझ लेना चाहिए कि पेट में बच्चा ठहर गया है.

* आशिक से हमबिस्तरी करते वक्त उसे कंडोम लगाने को मजबूर करना चाहिए, पर कई बार जल्दबाजी और हड़बड़ाहट में कंडोम का इस्तेमाल नहीं हो पाता है, इसलिए भी यह नौबत आ जाती है.

* वक्त पर पीरियड न आए तो तुरंत पेशाब की जांच करानी चाहिए कि कहीं आप पेट से नहीं हो गई हैं. आजकल यह जांच हर कोई खुद भी आसानी से सस्ते में कर सकती है.

* कई नामी कंपनियों की प्रैगनैंसी किट या स्ट्रिप यानी पट्टियां बाजार में मिलती हैं जिन से मिनटों में पता चल जाता है कि पेट में बच्चा है या नहीं.

* अगर ये स्ट्रिप जिन पर हिदायतें और इस्तेमाल का तरीका लिखा होता है, पेट से होने की तसदीक करें तो बिना वक्त गंवाए बच्चा गिराने के लिए भागादौड़ी करनी चाहिए.

* बच्चा गिराने के लिए सरकारी या प्राइवेट अस्पताल में जाना चाहिए. पहचान उजागर होने का डर अपने गांवकसबे या शहर के अस्पताल में बना रहता है, इसलिए दूर के शहर जाना ही ठीक रहता है.

* चूंकि लड़कियां अकेली यह काम नहीं कर सकतीं इसलिए पेट से होने की बात घर वालों को बता देनी चाहिए. तय है कि वे गुस्सा होंगे और मारेंगेपीटेंगे भी, लेकिन इस के अलावा कोई चारा भी नहीं रह जाता है. वैसे भी बहुत जल्द पेट से होने की बात उन पर जाहिर हो जाती है, इसलिए डर और शर्म छोड़ देनी चाहिए, नहीं तो 5 महीने के बाद तो बच्चा गिराना आसान नहीं रह जाता है.

* सरकारी या प्राइवेट अस्पतालों में बच्चा गिराने वाली लड़कियों की पहचान उजागर नहीं की जाती, इसलिए बेवजह डरना नहीं चाहिए लेकिन अस्पताल वाले पहचानपत्र मांगते हैं जो उन्हें दे देना चाहिए, क्योंकि यह कानूनन जरूरी होता है.

* ज्यादा सोचविचार में वक्त नहीं गंवाना चाहिए और न ही बच्चा गिराने के लिए देशी नुसखे या टोटके का इस्तेमाल करना चाहिए. नीमहकीमी से कई दफा लेने के देने पड़ जाते हैं.

* शुरुआत के 3 महीने तक गर्भनिरोधक गोलियों से भी बच्चा आसानी से गिराया जा सकता है, पर इस बाबत नजदीक या दूर के अस्पताल जा कर डाक्टर या स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं से जानकारी लेनी चाहिए. बच्चा गिराने की गोलियां सरकारी अस्पतालों में मुफ्त में मिलती हैं, लेकिन इन्हें अपने मन से नहीं खाना चाहिए.

तो मंजिल यही है

इस के बाद भी बच्चा न गिरे तो लड़कियों के पास इस के सिवा कोई और रास्ता नहीं रह जाता कि वे दुनिया और समाज से छिप कर बच्चे को जन्म दें और फिर बाद की परेशानियों से बचने के लिए उसे यों ही किसी घूरे या कचरे के ढेर में फेंक दें. यह कोई पाप नहीं है, बल्कि एक अनचाही मुसीबत से छुटकारा पाने का आसान तरीका है.

* भोपाल के शाहपुरा के लक्ष्मण नगर के कचरे के ढेर में मिले बच्चे के मामले में इस से ज्यादा कुछ हुआ लगता नहीं कि लड़की मजबूर थी और उस के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था.

एक रास्ता अकसर पेट से हो आई लड़कियों के पास खुदकुशी का रह जाता है, लेकिन यह समस्या का हल नहीं है, क्योंकि राज तो इस के बाद भी खुल ही जाता है, इसलिए बेहतर यही है कि जो भी सहूलियत वाला रास्ता मिले, उसे अपना लिया जाए.

* घर वालों को भी चाहिए कि वे लड़की की मदद करें, क्योंकि इस में उस की खास गलती नहीं होती है. जो थोड़ीबहुत होती भी है वह उस की नादानी ही मानी जाएगी जिसे माफ करते हुए उसे भी एक बेहतर जिंदगी जीने का मौका दिया जाना कोई गुनाह नहीं है.

समाज तो ऐसे बच्चों को नाजायज या लावारिस कहने से कभी चूकेगा नहीं, लेकिन कानून को जरूर अपना नजरिया बदलना चाहिए कि घूरे के ढेर में मिले बच्चों की पैदाइश छिपाने को संगीन गुनाह न माने, बल्कि एक लड़की की मजबूरी मानते हुए उसे नजरअंदाज करे, क्योंकि बाद की जांच से किसी को कुछ हासिल नहीं होता है. हां, लड़की की जिंदगी जरूर बरबाद हो जाती है, क्योंकि उस की पहचान कानूनी तौर पर उजागर हो जाती है.

 

लोगों की जेबें ढीली करेंगे नए ट्रैफिक नियम

ट्रैफिक से संबंधित नया नियम कड़ा है ताकि लोग और ज्यादा संभल कर सड़क पर गाड़ी चलाएं. दुर्घटना के शिकार न हों या दूसरों के लिए परेशानी का सबब न बनें. सड़क पर हिफाजत से चलें,  मनमानी न करें.

‘धीरे चलिए सुरक्षित चलिए’ का नारा अब सब की समझ आ गया है, पर लोग भी तमाम बहाने बना कर अपनी आदत को बदलने का नाम ही नहीं ले रहे थे तभी तो ट्रैफिक का नया नियम  कान ऐंठने के लिए लागू किया गया है.

सड़क आप की बपौैती नहीं है, इस बात का खयाल रखें और अपनी लापरवाही किसी और पर न थोपें. कहीं ऐसा न हो कि आगे ट्रैफिक पुलिस वाले आप के गलत गाड़ी चलाने या तेज स्पीड में गाड़ी चलाने पर चालान काट कर थमा दे और आप भी कोर्टकचहरी के चक्कर लगाते रहें.

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लेकिन जो नए ट्रैफिक नियम आए हैं, वे अच्छेअच्छों की जेबें ढीली कर देंगे और आप भी सोचने पर मजबूर होंगे कि काश, गाड़ी गलत न चलाई होती या अपने बच्चे को चलाने के लिए न दी होती तो मैं चालान कटवाने या जेल जाने से तो बच जाता.

सड़क पर कतई जल्दबाजी न दिखाएं या ओवरस्पीड में गाड़ी न चलाएं. वहीं दोपहिया वाहन पर 2 सवारियां ही बैठें यानी अब आप को नए नियमों के मुताबिक ही चलना होगा.

वजह कुछ भी हो, पर आप अब बेतरतीब ढंग से गाड़ी नहीं चला सकते. गलती से अगर आप ने अनदेखी की तो नए नियमों के मुताबिक चालान कटना तय है.
मतलब यह कि सड़क पर कोई भी वाहन हो, नियंत्रित स्पीड में चलाएं.

बता दें कि संसद ने जुलाई में मोटर वाहन (संशोधन) विधेयक, 2019 पारित कर दिया है. इस नियम के तहत सड़क सुरक्षा से सम्बंधित नियम कड़ा किया गया है जैसे ड्राइविंग लाइसैंस जारी करने और सड़क सुरक्षा में सुधार के प्रयास में उल्लंघन के लिए कठोर दंड लगाना वगैरह.

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अब तक जो चल रहा था जैसा चल रहा था, पर अब ऐसा नहीं चलेगा. अपनी सोच बदलें और नए नियमों का सख्ती से पालन करें. नए जमाने के साथ चलना है तो अपनी आदत में सुधार लाना होगा. जुर्माने से बचना है तो सचेत रहें, सावधान रहें.

जानें नए ट्रैफिक के नियम 

1- बिना ड्राइविंग लाइसैंस के गाड़ी न चलाएं. पकड़े जाने पर 5,000 रुपए का जुर्माना होगा.
2- शराब पी कर गाड़ी चलाने पर 10,000  रुपए जुर्माना भरना पड़ सकता है या फिर 6 महीने की कैद. अगर ऐसा दूसरी बार पाया गया तो 2 साल की कैद या 15,000 रुपए तक जुर्माना.
3-अगर गाड़ी तय स्पीड से तेज चलाई तो 2,000 रुपए का चालान काटा जाएगा.
4- बिना सीट बेल्ट बांधे गाड़ी चलाने पर 1,000 रुपए का चालान कटेगा.
5- मोबाइल फोन पर बात करते हुए ड्राइविंग करने पर 5,000 रुपए का जुर्माना भरना होगा.
6- सड़क नियमों को तोडऩे पर अब 500 रुपए का चालान कटेगा.
7-बिना इंश्योरेंस के गाड़ी चलाने पर अब 2,000 रुपए का चालान कटेगा.
8-इमर्जैंसी व्हीकल यानी अंबुलैंस गाड़ी, दमकल गाड़ी या अति महत्त्वपूर्ण लोगों के वाहन को रास्ता न देने पर 10,000 रुपए का चालान कटेगा.
9- डिसक्वालीफाई किए जाने के बावजूद भी अगर कोई शख्स गाड़ी चलाता है तो उसे 10,000  रुपए का जुर्माना देना होगा.
10- उबेर,ओला अगर ड्राइविंग लाइसैंस के नियमों का उल्लंघन करते हैं तो उन पर 1 लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है, वहीं जरूरत से ज्यादा सवारी बैठाने पर 20,000 रुपए का जुर्माना लगेगा.
11- हेलमेट न पहनने पर 1,000 रुपए देने होंगे. साथ ही, 3 महीने के लिए लाइसैंस रद्द कर दिया जाएगा.
12- नाबालिग अगर सड़क पर कोई दुर्घटना करता है तो उस के मातापिता कुसूरवार माने जाएंगे और उन पर 25,000 रुपए तक का जुर्माना लगेगा, वहीं गाड़ी के रजिस्ट्रेशन पेपर रद्द कर दिए जाएंगे और 3 साल तक की जेल हो सकती है.
13- ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने पर 500 रुपए का जुर्माना देना होगा.
14- गलत दिशा में ड्राइविंग करने पर 5,000 रुपए का चालान देना होगा.
15- दोपहिया वाहन पर 3 सवारी बैठाने पर 500 रुपए का चालान काटा जाएगा.
16-पौल्यूशन सर्टिफिकेट न होने पर  500 रुपए देने होंगे.
17- खतरनाक तरीके से गाड़ी चलाने  पर 5,000 रुपए का चालान होगा.
18- रेड लाइट जंप करने पर  1,000 रुपए का जुर्माना लगेगा.

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ब्रायलर की उन्नत नस्लों से अच्छा मुनाफा

लेखक-भानु प्रकाश राणा

इस प्रजाति के मुरगे (चूजे) व मुरगी अंडे से निकलने के बाद तकरीबन 40 ग्राम वजन के होते हैं जिन की सही प्रकार से देखरेख की जाए और उन्हें सही समय पर दानापानी दिया जाए तो वे 6 हफ्ते में तकरीबन 1.5 से 2 किलोग्राम वजन तक के हो जाते हैं.

ब्रायलरपालन करने से पहले इस के बारे में तकनीकी जानकारी जरूर ले लें और ब्रायलर की सही प्रजाति का चयन करें.

सीएआरआई द्वारा विकसित की गई ब्रायलर प्रजातियां

कैरी विशाल (सफेद ब्रायलर) : यह सफेद रंग की एक ऐसी ब्रायलर मुरगी प्रजाति है जो मांस गुणवत्ता के?क्षेत्र में अच्छी नस्ल साबित हो रही है.

इसे उष्णकटिबंधीय जलवायु के मुताबिक अच्छी खूबियों के साथसाथ रंगीन नस्ल वाली मुरगी के रूप में भी विकसित किया गया है. यह नस्ल भारतीय जलवायु और प्रबंधन स्थितियों के अनुरूप है और बेहतर बढ़ोतरी दर और रोग प्रतिरोधक क्षमता वाली नस्ल है.

उत्पादन की खासीयतें

* एक दिन के चूजे का वजन 43 ग्राम.

* 6 हफ्ते पर शरीर का?वजन 1650 से 1700 ग्राम तक.

* 7 हफ्ते पर शरीर का वजन 2100 से 2150 ग्राम तक.

कैरी धनराज (रंगीन ब्रायलर) : चमकदार, रंगीन एकल कलगी कैरी धनराज की खूबी है. अधिक वजनदार, अच्छी शारीरिक बनावट और उम्दा आहार इस की खास विशेषताएं?हैं. इस का मांस स्वादिष्ठ और अच्छी गुणवत्ता वाला है. अनेक रंगों में होने के कारण इन पक्षियों की मांग बाजार में बहुत ज्यादा है. इस से मुनाफा भी अच्छा मिलता है.

उत्पादन की खासीयतें

* एक दिन के चूजे का वजन 46 ग्राम.

* 6 हफ्ते पर शरीर का वजन

1500 से 1700 ग्राम.

* 7 हफ्ते पर शरीर का वजन

2000 से 2125 ग्राम.

इन नस्लों की अधिक जानकारी के लिए आप भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान, इज्जतनगर, उत्तर प्रदेश के इन फोन नंबरों 91-581-2300204, 2301220, 2303223 पर संपर्क कर सकते हैं.

गन्ना रस का कारोबार किसानों को मिले फायदा

लेखक- बृहस्पति कुमार पांडेय

गन्ने के रस को बेच कर इस कारोबार को करने वाले अच्छाखासा मुनाफा कमा रहे हैं. गन्ने के रस का कारोबार गरमियों में काफी मुनाफा देने वाला होता है क्योंकि गरमी से बेहाल व्यक्ति गन्ने के रस से न केवल अपनी प्यास बुझाना चाहता है, बल्कि यह सेहत के लिहाज से भी काफी अच्छा होता है.

ऐसे करें शुरुआत

अगर आप गन्ना किसान हैं और चीनी मिलों द्वारा भुगतान न किए जाने से परेशान हैं तो गन्ने के रस का कारोबार आप के लिए फायदेमंद साबित होगा. साथ ही, चीनी मिलों की अपेक्षा आप को ज्यादा मुनाफा भी मिलेगा.

अगर आप के पास खेती की जमीन नहीं?है या आप गन्ने की खेती नहीं करते हैं तब भी इस कारोबार को अपना सकते?हैं. इस के लिए या तो आप किराए की जमीन ले कर गन्ने की खेती कर सकते हैं या गन्ना किसानों से सीधे गन्ना खरीद कर गन्ने के रस का कामधंधा शुरू कर सकते हैं.

गन्ने के रस का काम शुरू करने के लिए जिन चीजों की जरूरत होती है, उन में छोटा इंजन, गन्ना पेराई के लिए छोटी गन्ना पेराई मशीन, कुछ बरतन, चाकू सहित अन्य छोटेमोटे सामान शामिल हैं.

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बस्ती जिले के गांव सबदेईया कला के बाशिंदे सुक्खू ने बताया कि गन्ने रस का कारोबार शुरू करने के लिए 50,000 रुपए से ले कर 1 लाख रुपए तक में सभी जरूरी चीजें आ जाती?हैं. लखनऊ और बाराबंकी जैसे शहरों में जुगाड़ वाहन सहित पूरी तरह से तैयार गन्ने का रस तैयार करने वाली मशीनें मिलती हैं.

 इसे हम दूसरे वाहनों की तरह चला

कर एक जगह से दूसरी जगह तक न केवल आसानी से ले जा सकते हैं, बल्कि मशीन को भी बारबार फिट करने की परेशानी से नजात मिल जाती है. गन्ने से रस निकालने वाली ये मशीनें औनलाइन भी खरीदी जा सकती हैं.

सुक्खू ने आगे बताया कि गन्ने की मशीन के अलावा जिन चीजों की हमें रोज जरूरत होती है, उन में गन्ने के रस की मांग के मुताबिक गन्ना, काला नमक, नीबू, पुदीना, बर्फ के?टुकड़े, कांच, प्लास्टिक व कागज के गिलास शामिल हैं.

गन्ने के रस को मशीन से निकालते समय नीबू और पुदीना की पेराई भी कर ली जाती है, जिस से रस का स्वाद बढ़ जाता है.

क्वालिटी का रखेंगे खयाल तो हो सकते हैं मालामाल

खानेपीने की किसी भी चीज की साफसफाई व बेहतर क्वालिटी न केवल मांग बढ़ाती है, बल्कि ग्राहक अच्छी कीमत देने से भी नहीं हिचकता है इसलिए गन्ने का रस निकालते समय उस की क्वालिटी का खयाल जरूर रखें.

इस के लिए सब से पहले गन्ने से शुरुआत करनी होगी, जब आप खेत से गन्ने की कटाई कर लें तो गन्ने के?ऊपरी हिस्से को खूब अच्छी तरह से छील दें और साफ पानी में अच्छी तरह से धो लें.

यह भी कोशिश करें कि गन्ना खेत से ताजा काटा गया हो या जितनी मात्रा में गन्ने की जरूरत हो उतनी ही गन्ने की कटाई करें, क्योंकि कई दिनों के कटे गए गन्ने का?स्वाद खराब होने लगता है.

जहां पर आप अपने गन्ने की दुकान या ठेला लगाते हैं, वहां की साफसफाई का भी खयाल रखें. गन्ने की पेराई के दौरान मीठे की वजह से अकसर मक्खियां जमा होने लगती हैं ऐसे में इन की रोकथाम के लिए धूपबत्ती वगैरह का धुआं भी कर सकते हैं.

जब आप गन्ने का रस निकाल रहे हों तो आप अपने हाथों को साफसुथरा रखें. अगर हो सके तो प्लास्टिक की पन्नी के दस्ताने पहन लें. आप जिन गिलासों का इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें हमेशा साफ रखें, क्योंकि गंदगी देख कर ग्राहक दूर?भागने लगते हैं.

गन्ने के रस को पैक करने की सामग्री भी हमेशा अपनी ठेली में साथ रखें. आप की यह सावधानी ग्राहकों को आप की दुकान की ओर आकर्षित करने में बेहद मददगार साबित हो सकती है जिस से आप को रोज का मुनाफा भी ज्यादा हो सकता है. आप के गन्ने की रस की क्वालिटी आप के नियमित ग्राहकों की तादाद में इजाफा करने के लिए काफी है.

चीनी मिलों के बंद होने पर किसानों को मिला सहारा

वैसे भी लोगों की जिंदगी में मिठास घोलने वाले देश में कई हिस्सों के गन्ना किसानों की हालत किसी से छिपी नहीं है. किसान चीनी मिलों को अपना गन्ना बेच कर खुद के फसल के?भुगतान के लिए धरनाप्रदर्शन कर रहे हैं, पुलिस की लाठियां खा रहे हैं और सरकार किसानों की सुनने के बजाय मिल मालिकों को संरक्षण देने में लगी है. ऐसे में किसान या तो गन्ने की खेती छोड़ दूसरी फसलों की तरफ मुड़ रहे हैं या गन्ने से जुड़े व्यवसाय का दूसरा विकल्प खोज रहे हैं.

चूंकि गन्ने की फसल नकदी फसलों में गिनी जाती?है, ऐसे में जो किसान गन्ने की फसल लेते रहे हैं, उन्हीं में से कुछ किसानों ने चीनी मीलों के ऊपर निर्भरता को कम कर खुद का काम शुरू करने की ठानी है, जो बेहद कामयाब रहे हैं.

उत्तर प्रदेश का बस्ती जिला गन्ने की खेती का मुख्य केंद्र है. यहां पर कुल 5 चीनी मिलें थीं, जिस में से एकएक कर 3 मिलें बंद होती गईं. इस से यहां के किसानों के बेचे गए गन्ने का?भुगतान भी फंस गया.

ऐसे में कई किसानों ने तो गन्ने की खेती से तोबा कर ली. लेकिन कुछ किसान ऐसे भी थे, जिन्होंने हार नहीं मानी और न ही गन्ने की खेती से मुंह मोड़ा बल्कि इन किसानों ने बोए गए गन्ने से खुद के व्यवसाय शुरू किए जाने का निर्णय लिया और हाटबाजारों के साथ मुख्य रास्तों पर गन्ने के रस की ठेली लगाना शुरू किया. इस का नतीजा यह रहा कि इन किसानों को चीनी मिलों की अपेक्षा तिगुनाचौगुना ज्यादा मुनाफा मिलने लगा.

ऐसे ही किसानों में शुमार बस्ती जिले के बाशिंदे गणेश बाहर रह कर नौकरी करते थे. लेकिन चीनी मिलों के बंद होने पर उन के परिवार में गन्ने की फसल नष्ट किए जाने की नौबत आ गई. ऐसे में वे बाहर से अपने गांव पापस आ गए और उन्होंने मजदूरी से बचाए गए पैसे से गन्ने का रस निकालने वाली एक ठेली और मशीन खरीदी. यह ठेली उन्हें लखनऊ से मिली जो जुगाड़ वाहन पर सैट थी. इसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाना भी आसान हो गया.

गणेश ने पहली बार बस्तीगोरखपुर राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे पेड़ों के नीचे अपनी ठेली लगानी शुरू की. देखते ही देखते दुकान चल निकली और उन्हें एक दिन में 1,500 से 2,000 रुपए की आमदनी होने लगी.

गणेश पिछले 3 सालों से?ठेली लगा रहे हैं. अब उन की 4 दुकानें एक ही जगह पर लगती हैं जिस में उन के परिवार के बाकी सदस्यों के साथ ही दूसरे लोगों को भी रोजगार मिला है.

गांव सबदेईया कला के सुक्खू अपने बेटे भीम के साथ मिल कर गन्ना रस का कारोबार कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि वे?ठेली पर गन्ना पेरने की मशीन को छोटे इंजन के साथ फिट करा कर यह काम कर रहे?हैं. इस पर तकरीबन 50,000 रुपए का खर्चा आया था. एक दिन में वे बड़ी आसानी से 1,000 रुपए तक मुनाफा कमा लेते हैं.

बस्ती जिले के महसिन गांव के बृजभूषण मौर्या ने बताया कि वह पिछले 2 सालों से गन्ने के रस की ठेली लगा रहे हैं. मशीनें उन्होंने लखनऊ से खरीदी थीं जो उन्हें जुगाड़ वाहन पर सैट कर के मिली थीं.

सुक्खू ने बताया कि वे खुद खेतों के अलावा किराए पर भी खेत ले कर गन्ने की खेती करते हैं जिस से उन्हें हर समय ताजा गन्ना मिलता?है. साथ ही, लागत में भी कमी आ जाती?है.

कई लोग गन्ने का रस कोल्ड ड्रिंक की अपेक्षा ज्यादा पसंद करने लगे हैं. लेकिन साल के कुछ ही महीने यानी सर्दियों में इस?व्यवसाय को बंद रखना पड़ता है. इस दौरान वे अपने गन्ने के खेत की देखभाल करते हैं, जिस से उत्पादन अच्छा मिले.

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बस्ती जिले के दसैती गांव के राम अधीन पिछले 4 साल से गन्ने के रस का कारोबार कर रहे?हैं. जब चीनी मिलों ने किसानों से मुंह मोड़ लिया, ऐसे में उन्होंने गन्ने की खेती छोड़ने

के बजाय गन्ने के रस की?ठेली लगाना शुरू कर दिया. उन्होंने तब 80,000 रुपए से इस?व्यवसाय को शुरू किया था.

राम अधीन ने बताया कि आप जब भी गन्ने के रस का व्यवसाय शुरू करें, तो इस के लिए सब से पहले ऐसी जगह को चुनें जहां ज्यादा भीड़ होती हो या जिन रास्तों से लोगों का आनाजाना ज्यादा होता हो. आप इस के लिए स्कूल, कालेज, सरकारी दफ्तरों के नजदीक भी अपनी दुकान लगा सकते हैं क्योंकि ऐसी जगहों पर आप को ग्राहक अच्छी तादाद में मिल जाते हैं.

गन्ने के रस के व्यवसाय का ही कमाल था कि किसानों के परिवारों के जो नौजवान खेती से मुंह मोड़ कर रोजगार की तलाश में दूसरे शहरों में जा चुके थे, वही नौजवान वर्तमान में अपने परिवार के साथ गन्ने की खेती के साथसाथ गन्ने के रस के?व्यवसाय में हाथ बंटा रहे?हैं. इन में भीम, बृजभूषण मौर्या, गणेश कोल्हुआ, चंद्रेश जैसे तमाम नाम शामिल हैं.

रोजगार देने में मददगार

अगर आप गन्ने के रस का व्यवसाय करते हैं तो इस से आप को ही नहीं, बल्कि दूसरे लोगों के लिए भी रोजगार का रास्ता खोल सकता है क्योंकि गन्ने की कटाई, सफाई के साथ ही अगर आप ठेली या दुकान लगाते?हैं तो वहां भी आप को किसी मददगार की जरूरत पड़ती है.

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ये लोग आप के परिवार के लोग भी हो सकते हैं या गांव के बेरोजगार या अन्य कोई. अगर आप के पास गन्ने के रस का?व्यवसाय शुरू करने के लिए शुरुआती पूंजी नहीं है तो आप किराए पर भी ठेली ले सकते?हैं. ऐसे तमाम लोग?हैं जो गन्ने का रस निकालने वाली मशीनों को किराए पर उठाते?हैं. इन मशीनों का आप को हर रोज का बंधा किराया देना होता है.

गरमी में पशुओं को खिलाएं हरा चारा

लेखक-  डा. प्रमोद प्रभाकर, डा. मनोज कुमार भारती

भारत कृषि प्रधान देश है. इस में पशुपालन कृषि उत्पादन प्रक्रिया में सहभागी है. हमारा देश दुनियाभर में दूध उत्पादन के मामले में अव्वल है. यह वैज्ञानिकों और किसानों की कड़ी मेहनत का ही नतीजा है.

पशुओं के रखरखाव में अकसर 60-65 फीसदी खर्च पालनेपोसने पर ही आता?है. देश में साल में 2 बार हरे चारे की तंगी या कमी के मौके आते हैं, अप्रैलजून और नवंबरदिसंबर. पशुपालक गरमी में मक्का, लोबिया ज्वार, बाजरा वगैरह वैज्ञानिक विधि से उगा कर कम लागत में ज्यादा पैदावार ले सकते हैं. दलहनी चारे अधिक पौष्टिक होते?हैं, पर उन्हें ज्यादा नहीं खिलाना चाहिए क्योंकि इस से पशुओं में पेट फूलना या अफरा रोग हो जाता है.

पशुपालक एक दलहनी व गैरदलहनी वाली फसलों को मिला कर के अपने खेतों पर लगाएं. इस प्रकार के हरे चारे को पशुओं को खिलाने से पशुओं को कार्बोहाइड्रेट के साथसाथ प्रोटीन की आपूर्ति भी होती है. साथ ही, पशुओं की अच्छी बढ़ोतरी होने के साथसाथ दूध भी बढ़ जाता है.

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जलवायु : ज्यादा हरा चारा हासिल करने के लिए पानी, हवा, सूरज की रोशनी और माकूल जलवायु की जरूरत होती है. सफल उत्पादन मौसम की अनुकूल व प्रतिकूल दोनों ही दशाओं पर निर्भर करता है. आमतौर पर 25-30 डिगरी सैल्सियस तापमान मक्का, ज्वार, बाजरा, लोबिया वगैरह के लिए उपयुक्त रहता है.

जमीन की तैयारी : सही जल निकास वाली दोमट या रेतीली मिट्टी इस की पैदावार के लिए सही रहती है. साथ ही, जमीन समतल होनी चाहिए. एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें व 2-3 गहरी जुताइयां देशी हल या कल्टीवेटर से करने के बाद जमीन को समतल कर लें.

बीज बोने का समय : चारे की फसल लाइन में करें. छोटे आकार के बीज जैसे बाजरा वगैरह की बोआई छिटकवां विधि से भी कर सकते हैं. चारा फसलों की बोआई मार्च से जुलाई माह तक कर सकते?हैं.

फसल मिश्रण : चारे की फसल बोने पर साधारण बीज दर प्रति हेक्टेयर आधी कर देनी चाहिए. दलहनी व गैरदलहनी फसलों का ही मिश्रण बना कर पशुपालक उगाएं. इस से ज्यादा पैदावार होने के साथसाथ जमीन की उर्वराशक्ति भी बढ़ जाती है जैसे मक्का लोबिया, ज्वार, ग्वार वगैरह.

सिंचाई : गरमी में 10-15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहने से चारे की बढ़वार अच्छी होती है. बारिश में जरूरत पड़ने पर ही सिंचाई करें.

खाद व उर्वरक डालने की विधि : आमतौर पर मिट्टी जांच के आधार पर ही खाद और उर्वरक डालें. 250-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद जुताई के समय खेत में?ठीक से मिलाएं. फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा खड़ी फसल में डालें.

कटाई : एक काट वाली फसलों की कटाई 55-60 दिनों के बाद करें यानी फूल बनते समय कटाई करें जिस से अधिकतम पोषक तत्त्वों का फायदा मिल सके.

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कई काट वाली फसलें जैसे ज्वार की पहली कटाई 35-40 दिन के बाद करें और बाद की कटाइयां 20-22 दिन बाद करें. काट वाली फसलों की कटाई जमीन से 5-7 सैंटीमीटर ऊपर से करनी चाहिए, जिस से जल्दी बढ़वार हो सके.

मुख्य चारा फसलों की जानकारी : गैरदलहनी फसलों में मक्का, ज्वार, बाजरा हैं व दलहनी फसलों में लोबिया, ग्वार का हरा चारा मिला कर खिलाने से पशु का दूध उत्पादन गरमी में कम नहीं होगा. साथ ही, पशु की प्रजनन क्षमता में भी सुधार होगा. इस तरह पशुपालक कम खर्च कर के ज्यादा आमदनी हासिल कर सकेंगे.

बंजर भूमि में गेंदा उगाएं

लेखक- ललित वर्मा

वैसे, बंजर जमीन में हैवी मैटल्स जैसे कैल्शियम, जस्ता, क्रोमियम आर्सेनिक, सीसा वगैरह पाए जाते हैं जो मानव शरीर में विभिन्न रोगों को पैदा करने की विशेष कूवत रखते हैं. डाक्टर शिखा सक्सेना ने ऐसी बंजर जमीन में जिस में आर्सेनिक व सीसा जैसे हैवी मैटल्स मौजूद थे, उस में गेंदा उगा कर पीएचडी की डिगरी हासिल की है. इस का दूसरा प्रमुख फायदा यह होता है कि जमीन में सुधार होता है,क्योंकि गेंदे की फसल बंजर जमीन के आर्सेनिक व सीसा को सोख लेती?है. गेंदा उगाने की वैज्ञानिक विधि सीख कर किसान अपनी बंजर जमीन में गेंदा की फसल उगा कर फायदा ले सकते हैं.

खेत की तैयारी : पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें. उस के बाद 2 जूताई हैरो या कल्टीवेटर से आरपार करें. यदि खेत में भूमिगत कीटों की समस्या हो तो 50 किलोग्राम नीम की खली खेत में जरूर डालें. आखिरी जुताई के बाद पाटा जरूर लगाएं. खेत के चारों ओर मेंड़ जरूर बनाएं ताकि बारिश का पानी जमीन द्वारा सोख लिया जाए.

खाद और उर्वरक : पौधों से अधिक पुष्प उत्पादन के लिए मिट्टी जांच के मुताबिक ही खाद व उर्वरकों का इस्तेमाल करना चाहिए. यदि किसी कारणवश मिट्टी जांच न हो सके तो उस स्थिति में गोबर की खाद व उर्वरकों का इस्तेमाल इस तरह करना चाहिए:

गोबर की खाद 10-15 टन, नाइट्रोजन 120 किलोग्राम, फास्फोरस 80 किलोग्राम, पोटाश 80 किलोग्राम.

गोबर की खाद को पहली जुताई से पहले ही खेत में बिखेर देना चाहिए. साथ ही, फास्फोरस, पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा का मिश्रण बना कर आखिरी जुताई के समय जमीन में डालनी चाहिए. नाइट्रोजन की बाकी बची मात्रा को 2 भागों में विभाजित कर के डालना चाहिए. पहली खुराक रोपाई के 20 दिन बाद और दूसरी खुराक रोपाई के 40 दिन बाद देनी चाहिए.

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पौधों की अधिक बढ़ोतरी

व फूलों की अच्छी उपज के लिए वानस्पतिक बढ़ोतरी के समय 15 दिनों के अंतराल पर 0.2 फीसदी यूरिया के 2 पर्णीय छिड़काव करने चाहिए.

प्रवर्धन : आमतौर पर किसान गेंदे को बीज द्वारा प्रवर्धित करते हैं क्योंकि बीज द्वारा प्रवर्धित पौधे प्रबल, सेहतमंद होते हैं और खेत में अच्छी तरह जम जाते हैं. बढ़ोतरी व पुष्पण में एकरूपता लाने के लिए कुछ किसान इसे कलमों द्वारा भी प्रवर्धित करते हैं.

बीज प्रवर्धन : गेंदे के बीज आमतौर पर 18-30 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान पर अंकुरित होते हैं. नर्सरी की क्यारियों में गोबर की खाद डाल कर भलीभांति मिला देनी चाहिए. नर्सरी की क्यारी सुविधाजनक आकार की बनानी चाहिए. एक हेक्टेयर के लिए रोपाई तैयार करने के लिए 800 ग्राम बीज पर्याप्त हैं.

नर्सरी में बोने से पहले बीज को कैप्टाफ या बाविस्टिन से 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए ताकि फसल की फफूंदीजनित रोगों से सुरक्षा हो सके. बीज बोने के बाद उन्हें गोबर की खाद की पतली परत से ढक देना चाहिए. इस के बाद हर रोज केन के द्वारा हलका पानी दिया जाना चाहिए.

साल में 3 बाद गेंदे की फसल उगाई जा सकती है. ग्रीष्मकालीन फसल के लिए जनवरी के मध्य से फरवरी के मध्य तक नर्सरी में बोआई की जा सकती है. शरदकालीन फसल के लिए सितंबर के मध्य से अक्तूबर के मध्य तक बोआई की जा सकती है, जबकि बारिश की फसल के लिए मध्य जून से मध्य जुलाई तक बोआई की जा सकती है.

नर्सरी में बीज बोने के 25-30 दिन बाद पौध रोपाई के लिए तैयार हो जाती है.

कलमों द्वारा प्रवर्धन : पैतृक समरूप पौधों के उत्पादन के लिए गेंदे की कलमों द्वारा भी प्रवर्धित किया जा सकता है. कलमें 6-10 सैंटीमीटर लंबाई की होनी चाहिए.

पौध रोपण : रोपाई के समय पौध सेहतमंद हो, 6-10 सैंटीमीटर लंबी और 3-4 लाइनों वाली होनी चाहिए. गेंदे की प्रजाति के मुताबिक लाइन व पौध की दूरी 30 से 45 सैंटीमीटर रखनी चाहिए. यह दूरी व्यावसायिक खेती के लिए बेहतर पाई गई है.

उन्नत किस्में ही उगाएं : गेंदे की अनेक किस्में उपलब्ध हैं, जो पौधों की ऊंचाई, विकास की आदत, पुष्प की आकृति और आकार में भिन्न होती हैं. ज्यादातर किसान गेंदे की लोकल किस्मों की खेती करते?हैं, जिस की वजह से उन्हें निम्न गुणवत्ता वाली कम उपज हासिल होती है, इसलिए उन्हें उन्नत किस्में ही उगानी चाहिए.

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भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली और दूसरे संस्थानों द्वारा गेंदे की व्यावसायिक खेती के लिए निम्नलिखित अच्छी उपज देने वाली किस्में विकसित की गई हैं:

शीर्ष कर्तन: गेंदे के पौधों में शीर्ष कर्तन कक्षवर्ती शाखाओं को प्रोत्साहित करने के लिए किया जाता है, ताकि फूलों की तादाद व उत्पादन को बढ़ाया जा सके. पर ज्यादातर किसान इस काम को नहीं करते हैं. ज्यादा उत्पादन हासिल करने के लिए गेंदे की दोनों प्रजातियों का शीर्ष कर्तन अवश्य करना चाहिए.

अफ्रीकन गेंदे की शिखाग्र वर्चस्व के कारण पौधे बहुत कम शाखाओं के साथ लंबे व दुबले हो जाते हैं. ऐसे पौधे ढह जाने के लिए संवेदनशील होते हैं और पुष्प उत्पादन कम हो जाता है, इसलिए शीर्ष कर्तन जरूर करना चाहिए ताकि उच्च उपज मिल सके.

शीर्ष कर्तन पुष्पण को थोड़ा बिलवित करता है, पर पुष्प उत्पादन में सुधार होता है. रोपाई के 40 दिन बाद शीर्ष कर्तन करना एक समान पुष्पण व उपज के लिए सर्वोत्तम पाया गया है. फ्रैंच गेंदे में शीर्ष कर्तन की जरूरत नहीं होती है.

सिंचाई व जल निकास

अच्छी बढ़वार और पुष्पण के सभी चरणों के दौरान जमीन में सही नमी रखना बहुत जरूरी?है क्योंकि नमी की कमी में पौधे सूख जाते हैं और फलियां भी ठीक से पनप नहीं पाती हैं.

गेंदे की प्रजातियां मिट्टी व मौसम पर निर्भर करती हैं. गरमी में गरम हवाएं पौधे के सूखने की अहम वजह मानी जाती हैं इसलिए पौधों को वायुमंडलीय परिस्थितियों के मुताबिक सिंचित किया जाना चाहिए.

सर्दियों में फसल को 6-10 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की जरूरत होती है, जबकि बारिश में फसल में सिंचाई बारिश के ऊपर निर्भर करती है. यदि काफी लंबे समय तक बरसात न हो तो जरूरत के मुताबिक खेत में सिंचाई करनी चाहिए.

यदि किसी कारणवश गेंदे की फसल में फालतू पानी जमा हो जाए तो उसे तुरंत निकालने की व्यवस्था करनी चाहिए अन्यथा फसल के मरने की आशंका रहती है.

पौध संरक्षण उपाय

खरपतवार नियंत्रण : गेंदे की फसल में विभिन्न प्रकार के खरपतवार उग आते हैं, जो फसल के साथ नमी व पोषक तत्त्वों के लिए होड़ करते हैं. इस के चलते फसल की बढ़वार, विकास व उत्पादन पर बुरा असर पड़ता है इसलिए उन की रोकथाम के लिए जरूरत के मुताबिक निराईगुड़ाई करनी चाहिए. पूरी फसल के दौरान 5-6 बार निराईगुड़ाई की जरूरत होती है.

कीट नियंत्रण

लाल मकड़ी घुन : यह कीट पुराने पौधों पर हमला करता है. इस के चलते रोगग्रस्त पौधे धूलमय यानी झिल्लीदार दिखाई देते हैं. इस कीट की रोकथाम के लिए डायकोफोल के 0.1 फीसदी घोल का छिड़काव करना चाहिए.

पत्ता कुदकड : यह कीट पत्तियों और तनों का रस चूसता है, जिस के चलते संक्रमित भाग कुपोषित या लटकते हुए दिखाई देते हैं. इस कीट की रोकथाम के लिए मेटासिस्टाक्स के 0.2 फीसदी घोल का छिड़काव करना चाहिए.

बालों वाली सूंड़ी : गेंदे की शुरुआती अवस्था में यह सूंड़ी पत्तों को खाती?है और बाद में पुष्प वृंतों के अर-पुष्पकों को खा कर नुकसान पहुंचाती है. इस कीट की रोकथाम के लिए नुवान के 0.2 फीसदी घोल का पर्णीय छिड़काव करना चाहिए.

रोग नियंत्रण

पौध विगलन : यह एक फफूंदीजनित रोग है. इस के चलते पत्तियों के रोग छिद्रों पर भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं, जिस से अंकुर मुरझा जाते हैं, उदय के बाद अंकुरों के कौलर पर भूरे रंग के विगलित धब्बे एक विकराल रूप ले लेते हैं जो नर्सरी के पतन का कारण बनते हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए बाविस्टिन के 0.2 फीसदी घोल का छिड़काव करना चाहिए.

पुष्पकलिका विगलन : यह भी एक फफूंदीजनित रोग है. इस रोग की शुरुआती अवस्था में पुष्प क्रम या युवा कलिकाओं पर प्रकट होता है. गंभीर संक्रमण की अवस्था में कलियां सूखी व सड़ी हुई दिखाई देती हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए डाइथेन एम 45 के 0.3 फीसदी घोल का छिड़काव करना चाहिए.

जड़ तालन : यह रोग कई प्रकार की फफूंदियों (राइजोक्टोनिया सोलानी, स्क्लेरोसियम रोल्फ साई, पिथियम ओल्टिमम, फाइटोप्थोरा क्रिप्टोजिया) द्वारा फैलता?है. जड़ में रोग का पहला लक्षण दिखाई देते ही जड़ सड़ जाती है, पत्तियां झड़ जाती हैं और बाद में पौधा मर जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए कार्बंडाजिम और मेटालाक्सिल से मिट्टी को उपचारित करना चाहिए.

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फूलों की तुड़ाई : गेंदे के फूलों की तुड़ाई सही समय पर करना बेहद जरूरी?है. फूलों की तोड़ाई उस समय करनी चाहिए जब वे पूरी तरह से खिल जाएं.

तुड़ाई के बाद प्रौद्योगिकी

* पूरी तरह विकसित फूलों की सुबहशाम को ही तुड़ाई करें.

* तुड़ाई के बाद फूलों को कुछ समय के लिए पानी में डालें.

* तुड़ाई के बाद फूलों को जरूरत के मुताबिक छोटीबड़ी टोकरियों में रखें या पानी सूखने के बाद फूलों को 200 ग्राम कूवत वाली पौलीथिन की थैलियों में पैक करें.

* 1-2 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान व 80-90 फीसदी नमी होने पर ही भंडारित करें.

उपज

गेंदे की उपज कई बातों पर निर्भर करती?है जिन में जमीन की उर्वराशक्ति, उगाई जाने वाली किस्म और फसल की सही देखभाल प्रमुख?हैं. यदि बताई गई विधि से गेंदे की खेती की जाए तो प्रति हेक्टेयर 8-10 क्विंटल ताजा फूल मिल जाते हैं.

ऐसे करें तिल की खेती

लेखक-बृहस्पति कुमार पांडेय

खरीफ का मौसम तिलहन की खेती के लिए विशेष महत्त्व रखता है. इस में मूंगफली, सोयाबीन व तिल की खेती का खास स्थान है. इस सीजन में बोई जाने वाली तिलहन फसलों का खाने के तेल के अलावा और भी कई तरीकों से प्रयोग किया जाता है. मूंगफली को भून कर खाने के अलावा या उस के दानों का विभिन्न मिठाइयों में प्रयोग किया जाता है. इसी तरह सोयाबीन को सब्जी या आटे के रूप में प्रयोग किया जाता है.

लेकिन इन सभी तिलहन वाली फसलों में तिल की खेती का खास महत्त्व है. तिल से न केवल तेल निकाला जाता है, बल्कि इस से भी कई तरह की मिठाइयां बनाई जाती हैं. तिल की 2 प्रजातियां होती हैं, काला तिल व सफेद तिल. तिल का प्रयोग विभिन्न त्योहारों में भी किया जाता है. यह खासा महंगा भी होता है.

खरीफ सीजन की सब से खास तिलहनी फसल के रूप में तिल की बोआई बलुई, बलुई दोमट व मैदानी इलाकों की मिट्टी में आसानी से की जा सकती है. उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों में तिल की बोआई अकसर सहफसली खेती के रूप में अरहर, ज्वार या बाजरा के साथ भी की जाती है.

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तिल की बोआई से पहले खेत की 2 बार जुताई कल्टीवेटर या रोटावेटर से कर देनी चाहिए, जिस से खेत के खरपतवार नष्ट हो जाएं. इस के बाद जून के दूसरे सप्ताह में जुताई किए गए खेत में गोबर की खाद मिट्टी में मिला देनी चाहिए. फिर जून के आखिरी हफ्ते से जुलाई के आखिरी हफ्ते के बीच में तिल के 3 से 4 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से 200 ग्राम कार्बंडाजिम या 50 ग्राम थीरम से उपचारित कर के बोआई करनी चाहिए. बोआई के समय यह ध्यान देना चाहिए कि बीज ज्यादा गहराई में न जाने पाए.

उर्वरकों का इस्तेमाल : तिल की खेती में उर्वरकों का इस्तेमाल करने से पहले किसानों को मिट्टी जांच जरूर करा लेनी चाहिए. इस से फसल में खादों की संतुलित मात्रा का इस्तेमाल करने में आसानी होती है.

वैसे, तिल की बोआई के समय 30 किलोग्राम नाइट्रोजन, 15 किलोग्राम फास्फोरस व 12.50 किलोग्राम गंधक का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए. निराईगुड़ाई के समय 12.50 किलोग्राम गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से डालनी चाहिए. अगर तिल की खेती राकड (बंजर) जमीन में की गई हो तो 15 किलोग्राम पोटाश की मात्रा का प्रयोग भी प्रति हेक्टेयर की दर से करना चाहिए.

निराईगुड़ाई व सिंचाई : तिल की फसल में खरपतवार नियंत्रण बेहद जरूरी है, क्योंकि खरपतवार होने से तिल का उत्पादन घट जाता?है. बोआई के 20 दिनों के भीतर पहली निराईगुड़ाई करनी चाहिए. इस के बाद 35 दिनों के भीतर दूसरी बार फसल की निराईगुड़ाई करनी चाहिए. फसल में ज्यादा खरपतवार होने पर एलाक्लोर 50 ईसी का 1.25 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई के 3 दिनों के भीतर छिड़काव कर देना चाहिए. चूंकि तिल बारिश की फसल है इसलिए इसे सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती है. अगर तिल की फसल में 50 फीसदी तक फली आ गई हों और बारिश न हुई हो तो फसल की 1 सिंचाई कर देनी चाहिए.

फसल सुरक्षा: बरसात में तिल की फसल में लगने वाले प्रमुख कीट के रूप में पत्ती लपेटक व फलीबेधक का प्रकोप ज्यादा होता?है. तिल में सूंडि़यों के रूप में लगने वाले कीट पत्तियों में जाली बना कर पत्तियों व फलियों को खा जाते हैं. ऐसे में क्पिनालफास 25 ईजी का 1.5 लिटर प्रति हेक्टेयर या मिथाइल पैराथियान के 2 फीसदी चूर्ण का 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

तिल में लगने वाले रोगों में फाइलोडी रोग खास है. इस रोग से फूल गुच्छेदार हो कर खराब हो जाते हैं. इस रोग का कारण फुदका कीट होता है. तिल की फसल को फाइलोडी रोग से बचाने के लिए बोआई 10 जुलाई से 20 जुलाई के बीच करना ज्यादा सही होता है. फाइलोडी रोग से बचने के लिए फोरेट 10 जी को 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में बोआई के समय ही मिला देना चाहिए. फसल में इस रोग का प्रकोप हो जाने पर मिथाइल ओ डिमेटान 25 ईसी का 1 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

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तिल की फसल में फाइटोफ्थेरा रोग लगने से पत्तियां तेजी से झुलस जाती हैं, जिस का सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है. इस रोग की रोकथाम के लिए 3 किलोग्राम कौपर औक्सीक्लोराइड या 2.5 किलोग्राम मैंकोजेब का प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

फसल की कटाई व भंडारण : तिल की फसल की कटाई का समय आमतौर पर अक्तूबर से नवंबर माह के बीच होता है. जब पौधों की पत्तियां सूख कर गिर जाएं और फसल की कलियां सूखने लगें, तब फसल की कटाई कर लेनी चाहिए और फलियों को डंडे से पीट कर दानों को साफ कर अलग कर लेना चाहिए. फिर अलग किए गए दानों को 4 घंटे धूप में सुखा कर बोरे में भर कर सूखी जगह पर भंडारण करना चाहिए.

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लाभ : तिल का औसत उत्पादन 8-12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पाया गया है, जिस में 1 हेक्टेयर खेत में तकरीबन 6,000 से 8,000 रुपए की लागत आती है. इस आधार पर वर्तमान बाजार भाव को देखते हुए 80 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से औसतन 10 क्विंटल से 80,000 रुपए की आमदनी होती है. अगर लागत को निकाल दिया जाए तो 4 माह की फसल से किसान को 72,000 रुपए का शुद्ध लाभ होता है इसलिए कोई भी किसान तिल की खेती को नकदी फसल के रूप में कर के अच्छा मुनाफा कमा सकता है.

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