लेखक- रामचरण धाकड़

इस का सफल प्रयोग राजस्थान के झुंझुनूं जिले की चिड़ावा तहसील के तकरीबन आधा दर्जन गांवों में देखा जा सकता है. चिड़ावा तहसील में ज्यादातर बगीचे किन्नू, मौसमी, लिसोड़ा वगैरह के?हैं. इन बगीचों में आएदिन जंगली पशुओं द्वारा नुकसान होने का डर बना रहता है. इस समस्या से नजात दिलाने के लिए रामकृष्ण जयदयाल डालमिया सेवा संस्थान ने बगीचे के चारों ओर की मेंड़ों पर करौंदे के पौधे लगाने की सलाह दी.

इस पर अमल करते हुए तमाम किसानों ने बारिश में एक से डेढ़ मीटर की दूरी पर करौंदे के पौधे लगाए. तकरीबन 3 साल बाद ये पौधे बढ़ कर बड़ी झाडि़यों का रूप ले लेते हैं.

चूंकि करौंदे के पौधों में कांटे होते?हैं जिस से कोई जंगली जानवर बगीचे में घुस नहीं सकता है. इस से बगीचों की हिफाजत बढ़ गई है.

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बगीचे के चारों ओर करौंदे के पौधे लगाने से एक पौधे से हर साल तकरीबन 40 किलोग्राम फल आसानी से मिल जाते?हैं जो बाजार में 40 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिक जाते हैं यानी तकरीबन 30 पौधों से तकरीबन 8,000 से 10,000 रुपए तक की अतिरिक्त आमदनी मिल जाती?है.

बगीचे के चारों ओर की मेंड़ों पर लगाए गए करौंदे के पौधों में अतिरिक्त सिंचाई की जरूरत नहीं होती. बगीचे की सिंचाई करते समय करौंदे के पौधे जरूरत के मुताबिक पानी ले लेते हैं.

करौंदा के फल कांटेदार होने के अलावा खाने में खट्टेमीठे होते?हैं. इस से इन का अचार, मुरब्बा, जैम, चटनी वगैरह बनाने के लिए काम में लिया जाता है.

करौंदा शुष्क जलवायु का पौधा है और इस में कीट और रोग भी कम लगते?हैं. इस के अलावा करौंदे के पौधों पर फल भी साल में 2 बार लगते?हैं, किंतु बारिश के बाद आने वाले फलों का ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है.

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कांटेदार होने की वजह से करौंदे को तोड़ना भी इतना आसान नहीं है. हाथों में दस्ताने पहन कर इसे तोड़ें. कम लागत में करौंदे से अच्छी आमदनी हासिल की जा सकती है.

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