Editorial: गहरी पैठ-औरतों को हुनर सिखाने से दूर रखा ताकि गुलाम बनी रहे

Editorial. दिल्ली में एक बस ड्राइवर और उस के साथी पर एक औरत के लगाए रेप चार्ज पर पुलिस को खासी मशक्कत करनी पड़ेगी. 2012 के केस की याद दिलाते हुए इस औरत का कहना है कि बस 7 किलोमीटर तक चलाई गई जब एकएक कर के 2 जनों ने उस से रेप किया.

इस मामले में पेंच यह है कि यह औरत सैक्स वर्कर का काम कर रही है और रात के 12 बजे के करीब बस में बैठाई गई थी. औरत ने शायद पुलिस रिपोर्ट में लिखाया है कि तय 3,000 रुपए कुछ देर के लिए तय हुए थे पर बस में चढ़ने के बाद बस में सवार 3 लोगों ने रातभर सैक्स करने की मांग 1,500 रुपए में रखी. जब झगड़ा हुआ तो पुलिस थाने में शिकायत की गई.

2012 के मामले में रेप की शिकार स्टूडैंट थी जो अपने साथी के साथ देर शामको जा रही थी जब खाली बस में सवार लोगों ने उन्हें सिर्फ लिफ्ट दी थी पर बाद में लड़के को बाहर फेंक दिया और लड़की को बुरी तरह रौंदा और उस के प्राइवेट पार्ट में रौड तक सिर्फ मजे के लिए डाली.

इस मामले में औरत 4 बच्चों की मां है, उस का आदमी निठल्ला टीबी का मरीज है और पैसा कमाने के लिए वह औरत रात को सैक्स से कमाई के लिए निकली. अपने घरों से दूर रह रहे सैक्स के प्यासों से अकेले, बिना दलाल के बदन बेचना गुनाह नहीं कानून में इसलिए रेप का मामला तो लेनदेन को सुलटाने के लिए नहीं बनाया गया, यह पुलिस को देखना होगा. अगर सुलह पहले से न हो तो अदालतों को सिर खपाना पड़ेगा कि क्या करें.

असल समस्या तो यह है कि औरतों को यह क्यों आज भी कहा जा रहा है कि वे बदन किराए पर दे कर पैसे कमा सकती हैं और मर्दों को यह पाठ क्यों पढ़ाया जा रहा है कि आज भी औरत का सैक्स खरीदा जा सकता है और उस से फिर जबरदस्ती की जाती है.

गरीब औरतों को आज इतना हुनर क्यों नहीं सिखाया जा रहा कि वे बिना बदन बेचे भी अच्छा पैसा कमा लें. अभी तक बदन बेचने में ज्यादा स्किल की जरूरत नहीं होती पर दूसरे कामों में खासी स्किल सीखनी होती है. पर आफतें तो इस धंधे में भी होती हैं, क्योंकि न मालूम कौन सा ग्राहक कौन सी बीमारी ले कर चल रहा है, कितना मैला और बदबूदार है, कितना खतरनाक है और मारपीट तक को सैक्स का आनंद समझता है.

सदियों से औरतों को जानबूझ कर हुनर नहीं सिखाए गए ताकि उन्हें मनमरजी से पुरुष की सेवा में लगा कर रखा जाए. अब जब गोरों से नहीं, राजाओं, जमींदारों, सेठों, पुजारियों के आतंक से भी 1947 में आजादी मिली तो 2026 में एक 30 साला औरत को क्यों बदन का सहारा लेना पड़े. मनमरजी से सैक्स करने का उसे हक है चाहे पति से, चाहे किसी दूसरे से, पर पैसे के लिए क्यों करना पड़ रहा है. यह सरकार, समाज और धर्म निकम्मापन दिखाता है जो दावा करते हैं कि हम ही तो बचाते हैं. Editorial

Social Awareness: धर्म की दुकान चले इसलिए बना कानून

Social Awareness, लेखक – शकील प्रेम

साल 2021 में उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण विरोधी कानून ‘उत्तर प्रदेश गैरकानूनी धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2021’ लागू हुआ था. यह कानून जबरन, धोखे से, लालच दे कर या शादी के जरीए गैरकानूनी धर्मांतरण को रोकने के लिए बनाया गया था. इस में एक से 10 साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है. साल 2024 में इस कानून में और सख्ती कर अधिकतम सजा को बढ़ा कर उम्रकैद तक की सजा कर दी गई.

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में धर्मांतरण विरोधी इस कानून पर गंभीर सवाल उठाए हैं. अदालत ने कहा कि अगर कोई शख्स अपनी मरजी से धर्म बदलना चाहे तो यह कानून उस के लिए मुश्किलें खड़ी करता है.

विश्व हिंदू परिषद के द्वारा धर्मांतरण के आरोप में 35 लोगों और 20 अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था. यह मामला फतेहपुर के हरिहरगंज में बने इवेंजेलिकल चर्च औफ इंडिया में सामूहिक धर्मांतरण के एक आयोजन से जुड़ा था. एक और मामले में सैम हिगिनबौटम कृषि, प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान विश्वविद्यालय (एसएचयूएटीएस) के कुलपति डाक्टर राजेंद्र बिहारी लाल को आरोपी बनाया गया था.

17 अक्तूबर के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने डाक्टर राजेंद्र बिहारी लाल और दूसरों के खिलाफ धर्म परिवर्तन के मामले को खारिज कर दिया. कुलमिला कर अदालत ने पुलिस की 6 में से 5 चार्जशीटों को रद्द कर दिया.

धर्म परिवर्तन के एक और मामले में सुबूतों पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने पाया कि पीडि़त और गवाहों द्वारा पेश किए गए हलफनामे साइक्लोस्टाइल तरीके से तैयार किए गए थे और उन की निजी जानकारियों को बदलने के बाद उसी मसौदे को कौपी पेस्ट किया गया था.

इस में यह भी सवाल उठाया गया कि उन गवाहों के बयान अभियोजन पक्ष के मामले में कैसे मदद कर सकते हैं, जिन्होंने न तो धर्म परिवर्तन किया था और न ही सामूहिक धर्म परिवर्तन की जगह पर थे.

कोर्ट ने पुलिस और प्रशासन को फटकार लगाते हुए कहा कि आपराधिक कानून को बेकुसूर लोगों को परेशान करने का साधन नहीं बनाया जा सकता, जिस से कि सरकारी एजेंसियों को पूरी तरह से बेबुनियाद सुबूतों की बुनियाद पर अपनी मरजी से अभियोजन शुरू करने की इजाजत मिल सके.

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की खंडपीठ ने धर्म परिवर्तन के मामले में सरकारी अफसरों के दखल पर भी चिंता जताई. कोर्ट ने कहा कि इस मामले में उत्तर प्रदेश धर्मांतरण अधिनियम के नियमों की संवैधानिक वैधता पर गौर करना हमारा काम नहीं है, फिर भी हम यह मानने से खुद को नहीं रोक सकते कि धर्मांतरण अधिनियम के कुछ प्रावधान बहुत ही कठिन हैं. जो शख्स अपनी मरजी से अपने धर्म के अलावा कोई दूसरा धर्म अपनाना चाहता है, उस के लिए रास्ते मुश्किल कर दिए गए हैं, जो संविधान की मूल भावना के खिलाफ है.

कोर्ट ने भारतीय संविधान की प्रस्तावना और कौन्स्टिट्यूशन के सैकुलर मूल्यों पर जोर देते हुए कहा कि भारत की सैकुलर प्रवित्ती संविधान के ‘मूल ढांचे’ का अभिन्न अंग है. संविधान की प्रस्तावना में भारत के सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय के अलावा विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता सुनिश्चित करने और उन सभी के बीच बंधुत्व को बढ़ावा देने, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने का संकल्प लिया गया है.

बड़ी अदालत ने कहा कि भारत के लोगों को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और पूजा की स्वतंत्रता दी गई है और यह स्वतंत्रता देश की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति की अभिव्यक्ति है. संविधान के अनुच्छेद 25 में कहा गया है कि सभी व्यक्तियों को अंतरात्मा की स्वतंत्रता प्राप्त करने का समान अधिकार होगा और उन्हें धर्म को मानने, उस का अभ्यास करने और प्रचार करने का अधिकार होगा, जो सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता के अधीन हैं.

कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत में लोगों को अपने धार्मिक विचारों का प्रचार करने का अधिकार है.

अनुच्छेद 25 द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के अधीन, हमारे संविधान के तहत प्रत्येक व्यक्ति को मौलिक अधिकार है कि वह ऐसे धार्मिक विश्वास को अपनाए, जिसे वह अपने विवेक से स्वीकार करता हो.

कोर्ट के इस अहम फैसले से यह तो साबित होता ही है कि धर्मांतरण विरोधी कानून की आड़ में ईसाई और मुसलिम को निशाना बनाया जा रहा है. यह मुद्दा हिंदुत्ववादी राजनीति के लिए जरूरी भी है, लेकिन जब आंकड़ों पर नजर डालते हैं, तो यह मुद्दा पूरी तरह प्रोपगैंडा ही साबित होता है.

प्यू रिसर्च सैंटर के मुताबिक 98 फीसदी लोग वही धर्म मानते हैं जो उन्हें बचपन में मिला होता है. हिंदू 0.7 फीसदी बाहर जाते हैं, लेकिन 0.8 फीसदी अंदर आते हैं. ईसाई महज 0.4 फीसदी हिंदू से कन्वर्ट होते हैं, लेकिन कुल ईसाई आबादी में नैट गेन सिर्फ 0.3 फीसदी का है. वहीं मुसलिम कन्वर्जन तो और भी कम 0.2 फीसदी है.

साल 1951 से साल 2011 के बीच का जनगणना डाटा भी यह बताता है कि ईसाई आबादी स्थिर (2.3 फीसदी) बनी हुई है. इस में 60 सालों में कोई बड़ा इजाफा नहीं हुआ है. यह डाटा मिशनरीज के द्वारा ‘मास कन्वर्जन’ के दावों को खारिज करता है.

प्यू रिसर्च सैंटर के मुताबिक, फर्टिलिटी रेट सभी धर्मों में घट रहा है. हिंदू में 2.1 फीसदी, मुसलिम में 2.6 फीसदी और ईसाई में महज 2 फीसदी है. हालांकि यह बात सच है कि सबसे ज्यादा हिंदू ही कन्वर्ट करते हैं. गुजरात में धर्म परिवर्तन के कुल आवेदन में 93 फीसदी के आसपास हिंदू आवेदक होते हैं, लेकिन इस से हिंदू धर्म को कोई नैट लौस नहीं है.

‘उत्तर प्रदेश गैरकानूनी धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2021’ के तहत साल 2020 से कुल 427 केस रजिस्टर हुए जिन में 833 गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन इन में ज्यादातर मामले कोर्ट में झूठे साबित हुए.

धर्मांतरण का डर दिखा कर अकसर यह फैलाया जाता है कि मुसलिम साल 2035 तक बहुमत में हो जाएंगे, लेकिन यह भी महज प्रोपगैंडा ही साबित होता है, क्योंकि मुसलिमों में भी फर्टिलिटी गैप लगातार सिकुड़ रहा है.

एक झूठ यह भी फैलाया जाता है कि मुसलिम ज्यादा शादियां करते हैं, इसलिए उन की आबादी तेजी से बढ़ती है लेकिन हकीकत यह है कि मुस्लिम में पौलीगैमी सिर्फ 5.7 फीसदी है, तो वहीं हिंदू में यह 5.8 फीसदी है.

भारत में धर्मांतरण ऐसा मुद्दा है जिस से धु्रवीकरण की राजनीति को ताकत मिलती है. धर्मांतरण के ज्यादातर मामले फेक न्यूज पर आधारित होते हैं और यह सब पौलिटिकल प्रोपगैंडा के तहत किया जाता है. ऐसा नहीं है कि देश में धर्मांतरण नहीं होता, लेकिन सालाना सिर्फ 5,000 लोग ही कन्वर्जन करते हैं. देश की तकरीबन 140 करोड़ की आबादी में यह बेहद मामूली संख्या है, जिसे इतना बड़ा मुद्दा बनाना महज प्रोपगैंडा ही है. Social Awareness

Exclusive Interview: मैं तीन तलाक को पसंद नहीं करती – स्मृति मिश्रा

Exclusive Interview: मुसलिम औरतों के हक से जुड़े शाहबानो बनाम मोहम्मद अहमद खान के ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कोर्टरूम ड्रामा फिल्म ‘हक’ को भले ही बौक्स आफिस पर ज्यादा कामयाबी न मिली हो, मगर इस फिल्म में शाजिया बानो के किरदार में यामी गौतम और शाजिया बानो के साथ खड़े रहने वाले नौकरानी उज्मा के किरदार में स्मृति मिश्रा की अदाकारी को काफी सराहा जा रहा है.

रायबरेली से लखनऊ, लखनऊ से दिल्ली और दिल्ली से मुंबई तक का सफर करने वाली हीरोइन स्मृति मिश्रा पिछले 13 सालों से ऐक्टिंग जगत में हैं. वे अब तक ‘सावधान इंडिया’, ‘अधूरी कहानी हमारी’, ‘गुस्ताख दिल’, ‘मंफोर्डगंज की बिनिया’, ‘धर्मपत्नी’ जैसे सीरियलों और ‘अ से अनार’, ‘रेड’, ‘तुम को मेरी कसम’ जैसी फिल्मों के अलावा नैटफ्लिक्स की वैब सीरीज ‘शी2’ में ऐक्टिंग कर चुकी हैं.

पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश :

आप की एक फिल्म ‘हक’ चर्चा में है. इस को ले कर आप क्या कहेंगी?

आप सभी जानते हैं कि यह फिल्म शाहबानो कांड पर आधारित है, जिस में मैं ने उज्मा का किरदार निभाया है. मतलब लोग मु झे उज्मा के किरदार में देख रहे हैं. सभी को पता है कि शाहबानो के संघर्ष में उज्मा चट्टान की तरह खड़ी रह कर उस का साथ देती रही. इस फिल्म मेरे सभी सीन हीरोइन यामी गौतम के साथ ही हैं, क्योंकि उज्मा तलाक के खिलाफ है.

उज्मा का मानना है कि तलाक देना गलत है. इसी वजह से मैं ने इस किरदार को करने के लिए हामी भरी, क्योंकि मैं ने महसूस किया है और लोगों से बातचीत कर के भी मु झे यही पता चला कि छोटे से छोटे तबके के लोग भी तलाक के खिलाफ हैं. वैसे भी औरत कोई चीज नहीं है कि आप ने तीन बार तलाक कह कर उसे तलाक दे दिया.

निजी जिंदगी में आप का साबका कभी उज्मा जैसी किसी औरत से पड़ा है या नहीं और तलाक को ले कर आप की अपनी सोच क्या है?

यह बहुत विवादास्पद विषय है. इस पर ज्यादा बोलना मेरे लिए ठीक नहीं होगा. लेकिन मैं ने जोकुछ पढ़ा है, उस आधार पर मैं तीन तलाक को कभी पसंद नहीं करती. तीन बार तलाक कह कर आप ने एक औरत को छोड़ दिया. इसे जायज कभी नहीं ठहराया जा सकता.

आप ने एक औरत के साथ रहते हुए एक लंबा वक्त गुजारा, आप के बच्चे हुए, पर छोटी सी बात पर बिना किसी सोचविचार के उस औरत को अपनी सफाई में कुछ कहने का मौका दिए बिना, सिर्फ तीन बार तलाक बोला और तलाक दे दिया… मेरी सम झ में नहीं आता कि कैसे लोग इसे कानूनी सही कहते रहे हैं.

13 साल के अपने ऐक्टिंग कैरियर के अनुभव को ले कर आप क्या कहना चाहेंगी?

इन 13 सालों में बतौर कलाकार मु झे सीखने को बहुतकुछ मिला. यह मौका किसी दूसरे क्षेत्र में नहीं मिल सकता. हम हर उस किरदार को जीते हैं, जो इस दुनिया में है. हम सिर्फ ऐक्टिंग नहीं करते, हम परदे पर किसी भी किरदार को जीते हुए उसे अंदर से महसूस करते हैं.

फिल्म ‘पवई’ में क्या खास है?

फिल्म ‘पवई’ में मुंबई के इस विकासशील उपनगर पवई में रहने वाली 3 अलगअलग औरतों की कहानियों को दिखाया गया है. इस में मैं ने उषा का किरदार निभाया है. इसी फिल्म में 2 और औरतों की कहानी है. इस फिल्म में इस बात को दिखाया गया है कि औरत चाहे अमीर हो या गरीब हो या फिर कामकाजी हो, सभी को संघर्ष करना पड़ता है, भले ही उन के संघर्ष के तरीके अलग हों.

अपने किरदार उषा को ले कर आप क्या कहना चाहेंगी?

उषा का किरदार एक ऐसी औरत का है, जो अपने पति के साथ बिहार से मुंबई आती है. अब उस का पति नहीं है और वह लोगों के घरों का काम करती है. वह अपनी बेटी की भी परवरिश कर रही है. उस को मुंबई के बारे में कुछ नहीं पता है. वह तो अपने पति के भरोसे यहां आई थी, पर अब पति नहीं है. उस के पति ने जो मकान खरीदा था, उसे भी उस का देवर हड़पने की कोशिश कर रहा है.

इस किरदार के लिए आप ने किस तरह का होमवर्क किया?

मेरे घर में एक कामवाली बाई है. उस की दोस्त के साथ भी ऐसा हादसा हो चुका है. उस का पति उसे गांव से शहर ले कर आया था. पर शहर आते ही कि कुछ समय के बाद उस का पति बीमार हुआ और इस संसार को अलविदा कह गया. उस के बाद उस ने जिस तरह का संघर्ष किया, वह सब उस ने मु झे बताया था, तो इस किरदार को निभाते समय मु झे वह सब याद आया और मैं ने स्क्रिप्ट की भी मदद ली.

किसी भी किरदार को निभाते समय आप अपनी निजी जिंदगी के अनुभवों का कैसे उपयोग करती हैं?

जब किसी किरदार से जुड़ा कोई हादसा मेरे साथ कभी घट चुका होता है, तो मैं उसे याद कर अपने किरदार में डालने की कोशिश करती हूं. अगर वैसा हादसा मेरी जिंदगी में न घटा हो, तो आसपास के लोगों से बात कर के जानने की कोशिश करती हूं.

कलाकार होने के साथसाथ आप पत्नी, बहू और एक बेटे की मां भी हैं. आप इन सारी जिम्मेदारियों को कैसे निभाती हैं?

मैं इन सभी जिम्मेदारियों के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश करती हूं और मेरी कोशिश रहती है कि मैं किसी को भी शिकायत करने का मौका न दूं. पर मु झे इन सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए कई बार अपनी दीदी और पति से भी सहयोग लेना पड़ता है. Exclusive Interview

Domestic Violence: पिटती औरतें – खामोश समाज

Domestic Violence: ‘डबल इंजन’ की सरकार वाले उत्तर प्रदेश में औरतों की क्या गत बन चुकी है, इस पर एक नजर डालते हैं. मामला नेपाल से सटे सिद्धार्थनगर जिले का है, जहां के लोटन कोतवाली क्षेत्र में एक पति ने हैवानियत की सारी हदें पार करते हुए लाठीडंडे से बुरी तरह पिटाई कर अपनी पत्नी को अधमरा कर दिया.

उस औरत को इतना मारा गया कि उस का चेहरा काला पड़ गया और एक हाथ टूट गया है. औरत के प्राइवेट पार्ट को भी डंडे से गहरी चोट पहुंचाई गई.

उस औरत को गंभीर हालत में मैडिकल कालेज, गोरखपुर में भरती कराया गया. पीडि़ता के भाई की शिकायत पर पुलिस ने पति के खिलाफ केस दर्ज किया.

पूरा मामला कुछ इस तरह है कि उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के कोल्हुई थाना क्षेत्र के एक गांव की इस औरत की शादी सिद्धार्थनगर जिले के लोटन कोतवाली क्षेत्र के एक गांव में हुई थी.

बताया जा रहा है कि पति आएदिन मारनेपीटने के साथसाथ अपनी पत्नी पर तमाम तरह के जुल्म करता था. इस हैवानियत से तंग आ कर वह औरत अपने मायके चली गई थी, पर 16 नवंबर, 2025 को आपसी सुलहसमझौते के बाद वह अपनी ससुराल वापस आ गई थी, लेकिन आरोप है कि 17 नवंबर, 2025 की रात पति ने उस की लाठीडंडों, जूतों से पिटाई की और थप्पड़ बरसाए.

इसी साल सितंबर महीने की एक घटना है. आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले में एक शख्स ने अपनी पत्नी को खंभे से बांध कर न केवल बैल्ट से बुरी तरह पीटा, बल्कि बारबार लातों से भी हमला किया. इस दौरान वह औरत चीखतीचिल्लाती रही, दया की भीख मांगती रही, लेकिन पति उस पर लगातार वार करता रहा.

पुलिस के मुताबिक, आरोपी पति बलराजू तारलुपाडु मंडल में अपनी पहली पत्नी भाग्यम्मा के साथ रहता था, जबकि उस की दूसरी पत्नी भी है. हाल ही में वह अपनी दूसरी पत्नी के साथ रहने के बाद गांव लौटा था.

बताया गया कि बलराजू किसी बीमरी से जूझ रहा है और उस ने अपनी पहली पत्नी भाग्यमा से इलाज के लिए पैसे लाने को कहा था.

भाग्यम्मा ने पैसे देने से इनकार कर दिया, क्योंकि वह 4 बच्चों की अकेली जिम्मेदारी उठा रही थी. इसी बात से नाराज हो कर बलराजू ने उसे खंभे से बांध दिया और बैल्ट से बुरी तरह पीटा.

पुलिस ने यह भी बताया कि बलराजू को अपनी पत्नी पर किसी गैरमर्द के साथ नाजायज रिश्ता होने का शक था और इसी शक ने उस के गुस्से को और ज्यादा भड़का दिया था.

इस तरह की घटनाएं रोजाना की आम बात हैं. कुछ घटनाओं की खबरें बन जाती हैं, बाकी के बारे चुप्पी साध ली जाती है. यहां सिर्फ पति द्वारा अपनी पत्नी को पीटने की बात नहीं हो रही है, बल्कि औरतों का यह पिटना इतना ज्यादा आम हो गया कि कोई भी ऐरागैरा उन पर हाथ साफ करना अपना बुनियादी हक समझता है.

इसी साल जनवरी महीने का एक वाकिआ है. महाराष्ट्र के नवी मुंबई की एक हाउसिंग सोसाइटी में चल रही एक बैठक के दौरान 5 लोगों ने 44 साल एक औरत को कथिततौर पर पीट कर घायल कर दिया था.

पुलिस ने बताया कि पीडि़ता ने मीटिंग के दौरान कुछ सवाल उठाए, जो आरोपियों को पसंद नहीं आए. फिर उन्होंने कथिततौर पर उस औरत के साथ गालीगलौज की, उसे जमीन पर धकेल दिया और कई मुक्के मारे.

सवाल उठता है कि औरतों के साथ यह मारपिटाई होती ही क्यों है? इस का सीधा सा जवाब है कि मर्द द्वारा औरत में डर बिठाना और उस पर काबू रखना. ज्यादातर मर्दों के लिए मर्दानगी की यही परिभाषा है.

लेकिन क्या कोई मर्द इतना ज्यादा गुस्सैल हो सकता है कि उस की पत्नी नाश्ते में परोसी गई साबूदाना की खिचड़ी में नमक कम डाल दे, तो वह अपना आपा खो कर उस की हत्या ही कर दे?

जी हां, साल 2022 में मुंबई के निकट ठाणे में एक बैंक क्लर्क निकेश घाघ ने गुस्से में अपनी 40 साल की पत्नी की गला घोंट कर हत्या कर दी, क्योंकि उस ने जो साबूदाना खिचड़ी परोसी थी, वह बहुत नमकीन थी.

एक अदना से बैंक क्लर्क ने अपनी पत्नी को चुटकीभर नमक की कीमत समझा दी. बेहद शर्मनाक. इस से भी ज्यादा शर्म की बात तो यह है कि भारतीय समाज में आज भी गांवदेहात हो या बड़े शहर, औरतों को मर्दों की पिछलग्गू समझा जाता है.

यह छोटी सोच समाज में गहरे तक पैठी हुई है कि औरत को हमेशा मर्द की गुलाम बन कर रहना चाहिए, वह किसी भी तरह का फैसला लेने के काबिल नहीं होती है, उसे अपने मर्द की सेवा करनी चाहिए और उसे उस से कम कमाना चाहिए, और भी न जाने क्याक्या.

अगर गलती से किसी औरत ने इस सोच को चुनौती दी या खुद को मर्द से बेहतर समझा तो पति को पूरा हक है कि वह उसे ‘उस की सही जगह’ दिखा दे, फिर इस के लिए औरत की खाल ही क्यों न उधेड़ दी जाए.

अपना भाग्य मानती औरतें

भारत में औरतों को धर्म के जंजाल में इस कदर उलझा दिया गया है कि उन्हें लगता है कि मर्द से पिटना भी उन के पिछले जन्मों की सजा है. बहुत सी औरतें अपने मायके में इस तरह से पाली जाती हैं कि वे पितृसत्तात्मक नियमों को गांठ बांध लेती हैं, जैसे ससुराल में लड़की की डोली जाती है और अर्थी ही बाहर निकलती है. यहां यह छिपी सोच है कि ससुराल में कुछ भी भूचाल आ जाए, तुम्हें चूं तक नहीं करनी है.

‘घर में जो हो रहा है, उसे घर तक ही रखना है’, ‘अपने बड़ों के सामने जबान नहीं चलानी है’, ‘पति परमेश्वर होता है’, ‘पति अगर पीट दे तो बात का बतंगड़ नहीं बनाना है’, ‘शर्म औरत का गहना है’, और भी न जाने किस तरह की सीख दी जाती हैं कि अनपढ़ से ले कर एक पढ़ीलिखी औरत भी मर्द के ‘पिटाई पुराण’ का हिस्सा बन जाती है, बेवजह.

जब से भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में सरकार आई है, तब से धर्म के नाम पर औरतों के सिर पर अंधविश्वास के इतने घड़े लाद दिए गए हैं कि उन्हें अपने पर हुई घरेलू हिंसा का बोझ महसूस ही नहीं होता है.

बहुत सी औरतों को लगता है कि मर्द की सत्ता के बगैर वे इस समाज में नहीं रह सकतीं और तथाकथित धर्मकर्म के बिना इस दुनिया में, फिर मर्द चाहे उन की इसी दुनिया में चमड़ी न उधेड़ दें.

गरीब घरों की वंचित समाज की औरतों की हालत तो और ज्यादा बुरी है. वे शरीर की मजबूत होती हैं, मर्दों जितनी शरीरिक मेहनत करती हैं, बच्चों को अपने दम पर पालती हैं, फिर भी उन के साथ खूब मारपीट की जाती है.

यहां पर उन की और पति की अनपढ़ता, पति का बेरोजगार होना, पति की नशाखोरी, दूसरी औरत का चक्कर जैसी बहुत सी वजहें होती हैं, जो घर में क्लेश लाती हैं.

ऐसी औरतों के पास न तो पैसा होता है और न ही कहीं जाने की हिम्मत. बच्चों को पालपोस कर बड़ा करने की जिम्मेदारी भी इन पर होती है. अगर कहीं पति ने सिर से छत छीन ली, तो पूरा परिवार ही बिखर जाएगा. फिर इन की समाज में कहीं कोई सिक्योरिटी भी नहीं होती है. घर पर जैसा भी है, मर्द का साया तो साथ है न, इस की एवज में उस ने 2-4 लात जमा भी दी तो क्या हुआ, यह सोच भी औरतों को पिटने पर मजबूर करती है.

‘कास्ट मैटर्स’ के लेखक और दलित ऐक्टिविस्ट डाक्टर सूरज येंगडे बीबीसी के माध्यम से कहते हैं, ‘‘दलित औरतें दुनिया में सब से ज्यादा शोषित हैं. वे घर के अंदर और बाहर दोनों जगहों पर संस्कृति, सामाजिक संरचना और सामाजिक संस्थाओं की भुक्तभोगी हैं. दलित महिलाओं के खिलाफ लगातार होने वाली हिंसा में ये बातें नजर आती हैं.’’

बीबीसी की एक खबर के मुताबिक, ‘इंटरनैशनल दलित सौलिडैरिटी नैटवर्क’ ने दलित औरतों को झेलनी पड़ रही हिंसा को 9 हिस्सों में बांटा था, जिन में से 6 उन की जाति पर आधारित पहचान के चलते होती हैं और 3 जैंडर की पहचान के चलते.

जाति के नाम पर उन्हें यौन हिंसा, गालीगलौज, मारपीट, हमलों का शिकार होना पड़ता है, तो जैंडर के चलते उन्हें कन्या भ्रूण हत्या, जल्दी शादी के चलते बाल यौन अत्याचार और घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ता है.

मर्दों की ओछी सोच

साल 2019 की ‘औक्सफैम इक्ववैलिटी और इनइक्वैलिटी’ की एक रिपोर्ट पर नजर डालते हैं. इस रिपोर्ट में बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तर प्रदेश के तकरीबन 1,000 परिवारों का सर्वे किया गया था, जिस में यह बात सामने आई थी कि कई घरों के लोगों का ऐसा मानना था कि छोटीछोटी बातों पर औरतों पर हाथ उठाना गलत नहीं है.

यह हाल तो तब था जब रिपोर्ट के मुताबिक यह बात सामने आई थी कि जितनी गृहणियां घर संभालती हैं, अगर उन के कामकाज का हिसाब लगाया जाए, तो ये देश की जीडीपी यानी ग्रोस डोमैस्टिक प्रोडक्ट के 3.1 फीसदी के बराबर होगा.

इस के बावजूद इस रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि कराए गए सर्वे में शामिल परिवारों में से तकरीबन 53 फीसदी लोगों ने इस बात को माना कि अगर औरतें बच्चों की देखभाल में कोताही करती हैं, तो उन्हें फटकारना जायज है.

औरतों द्वारा खाना न पकाने पर 41 फीसदी लोगों ने उन्हें मारनेपीटने की वकालत की वहीं 42 फीसदी लोगों ने पीने का पानी न भरने और ईंधन न जमा करने पर भी उन की पिटाई करने की बात स्वीकारी.

54 फीसदी लोगों ने माना कि अगर औरत बिना बताए घर से बाहर घूमने जाती है, तो उसे डांटनाफटकारना गलत नहीं है. वहीं कुछ लोगों ने इस के लिए औरतों पर हाथ उठाने की बात को भी स्वीकार किया.

मर्द समाज की यह सोच उसे परिवार से मिली है. अगर कोई नकारा और उद्दंड लड़का है, तो परिवार वाले यह सोच कर उस की शादी करा देते हैं कि बहू अपनेआप संभाल लेगी, पर जरा सोचिए कि जो लड़का अपने गुस्सैल स्वभाव के चलते मांबाप को कुछ नहीं समझता है, गालीगलौज करता है, वह कल की आई लड़की की सुन लेगा?

उधर, लड़की के कान में बचपन से ही फूंक दिया जाता है कि पति जो कहे, तुम सिर झुका कर मान लेना. बैंक क्लर्क निकेश घाघ ने नमक की कमी में अपनी पत्नी का गला घोंट दिया. यह कोई एक पल में घटी घटना नहीं थी. ऐसा पहले भी हुआ होगा. उस ने अपनी पत्नी पर पहले भी खाने की थाली उछाल दी होगी या फिर किसी और बात पर उसे लतिया दिया होगा, पर आसपड़ोस वालों ने इसे ज्यादा सीरियसली नहीं लिया. अगर पत्नी ने यह बात अपने मायके वालों को बताई होगी, तो भी उन्होंने चुप रहने की सलाह दी होगी.

जब लड़की को हर जगह से हताशा हाथ लगती है, तो वह इसे अपनी किस्मत मान लेती है. जिन मांबाप ने उसे इतने लाड़प्यार से पाला हो, वे ही उस की पिटाई पर चुप्पी साध लें, तो फिर वह कहां जाएगी?

इधर, मर्द समाज को यह गुमान होता है कि और मारूंगा, बोल क्या कर लेगी? मेरी गुलाम है, तो नजरें नीची कर के चल. समय पर भोजन और शरीर मेरे सामने परोस दे. बस, यही तेरा काम है, तो फिर औरत के लिए जिंदगी नरक बनने में ज्यादा समय नहीं लगता है.

हरियाणा के जींद जिले के गांव बीबीपुर के पूर्व सरपंच, समाजसेवी और ‘सैल्फी विद डौटर’ मुहिम के संस्थापक सुनील जागलान ने इस मुद्दे पर कहा, ‘‘आज हमें स्वीकार करना पड़ेगा कि समाज में पुरुष सत्ता का प्रकोप अभी भी है और इस का सीधा असर यह होता है कि घरों में घरेलू हिंसा होती है.

‘‘इस में महिलाओं के साथ शारीरिक मारपिटाई के लाखों केस दर्ज होते हैं, लेकिन इस के 30 गुना केस ऐसे होते हैं, जो पुलिस में दर्ज ही नहीं हो पाते हैं. इस के लिए लगातार संवेदनशीलता के साथ लोगों को जागरूक करने की, कानूनी नियमों को आम घरों तक पहुंचाने की बहुत ज्यादा जरूरत है.’’

‘‘हम ने ‘अहसास का सौफ्टवेयर’ नाम का एक कार्यक्रम शुरू किया है, जिस का मकसद पितृसत्ता के वायरस को खत्म करना है. हम इस मुहिम में शहर और गांवदेहात के क्षेत्रों में पंचायतों के माध्यम से काम कर रहे हैं ‘‘इस समस्या का समाधान तभी हो सकता है, जब हम सब यह समझ लें कि महिलाओं के साथ मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न से समाज पतन की ओर जाता है.’’ Domestic Violence

Indian Constitution: सनातन के लिए संविधान पर चलाया जूता

Indian Constitution: भारत का सुप्रीम कोर्ट वह जगह है, जहां संविधान की आत्मा बसती है. जहां शब्द नहीं, व्यवस्था बोलती है. जहां न्याय की मर्यादा सब से ऊपर मानी जाती है. वहीं ऐसा सीन सामने आया, जिस ने पूरे देश को शर्मसार कर दिया.

सुनवाई के दौरान, 71 साल के एक वकील राकेश किशोर ने चीफ जस्टिस बीआर गवई की ओर जूता फेंकने की कोशिश की. यह न केवल एक अदालत की इज्जत को भंग करना था, बल्कि यह घोर पौराणिक और सनातन सोच का प्रदर्शन था, जो आज भी यह स्वीकार नहीं कर पा रहा है कि भारत के सुप्रीम कोर्ट की कुरसी पर एक एससी बैठा है और दूसरे एससीएसटी, पढ़ेलिखे लोगों की तरह पुराणवादियों की कठपुतली बनने को तैयार नहीं है.

चीफ जस्टिस बीआर गवई ने इस घटना को शांत भाव से लिया. उन्होंने कहा, ‘इस से मैं विचलित नहीं हुआ, कृपया कार्यवाही जारी रखिए.’

सामाजिक सोच

सवाल सीधा है कि अगर वही जूता किसी एससीएसटी ने ऊंची जाति के चीफ जस्टिस की ओर फेंका होता, तो क्या वही सहिष्णुता दिखाई जाती? क्या तब यह मामला भी माफ कर देने जितना हलका होता? वह वकील है, 71 साल का है और यह किसी किशोर का गुस्सा नहीं था. उस की हरकत में अनुभव, शिक्षा और विचार का मिश्रण था और यही उसे भयावह बनाता है.

किसी एससी चीफ जस्टिस पर इस तरह का हमला यह दिखाता है कि भारतीय समाज का एक हिस्सा अब भी उस ‘मनुस्मृति’ को भीतर दबाए बैठा है, जो कहती है कि शूद्र ज्ञान या न्याय पाने का अधिकारी नहीं है और उस से भी नीचे का अछूत एससी तो कतई नहीं, चाहे संविधान कुछ भी कहता रहे.

बीआर गवई का चीफ जस्टिस बनना उस व्यवस्था पर चोट है, जिस ने हमेशा सत्ता और न्याय को ऊंची जातियों के दायरे में सीमित रखा. एक एससीएसटी का सर्वोच्च न्यायासन पर बैठना उस सोच के लिए असहनीय है, जो अपने वर्चस्व को ईश्वरीय व्यवस्था मानती है. हां, ऐसा जना चुपचाप अगर ऊंची जातियों को माईबाप मानता रहे, तो ठीक है.

इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर कुछ पोस्टें आईं. किसी ने लिखा, ‘गवई तो बैचलर हैं, मास्टर नहीं’. यह तंज नहीं, जातिगत ईष्या का प्रदर्शन था. असलियत यह है कि चीफ जस्टिस बीआर गवई मास्टर इन ला में गोल्ड मैडलिस्ट हैं. लेकिन फिर भी सवाल उठे. ‘वह कैसे मुख्य न्यायाधीश बन गया और वह सनातनी वकील वकील ही क्यों रह गया?’

यह सवाल पढ़ाईलिखाई या काबिलीयत का नहीं है, बल्कि उस सामाजिक सोच का है, जो यह नहीं स्वीकार कर पाती कि कभी ‘अछूत’ कहे जाने वाले लोग अब न्याय और सत्ता के केंद्र में पहुंच चुके हैं.

संविधान बनाम ‘मनुस्मृति’

भारत का संविधान कहता है कि सभी नागरिक समान हैं. किसी के साथ धर्म, जाति, लिंग या जन्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा, जबकि ‘मनुस्मृति’ का मानना है कि ब्राह्मण ही ईश्वर का मुख है, शूद्र उस के पैर हैं. ‘मनुस्मृति’ अछूतों की बात ही नहीं करती जो शूद्रों से भी नीचे हैं और जिन को कंट्रोल करने के लिए शूद्रों को डंडाभाला दिया गया है.

इन दोनों विचारों के बीच टकराव सिर्फ इतिहास का नहीं है, बल्कि यह वर्तमान भारत का सच है. चीफ जस्टिस बीआर गवई का वजूद ही इस टकराव की याद दिलाता है. वे संविधान के उस वादे के प्रतीक हैं, जिस में हर भारतीय को समान अवसर का अधिकार दिया गया है, पर यह समानता सिर्फ कागज पर नहीं टिक सकती, अगर समाज की मानसिकता बदलने को तैयार न हो.

जूता फेंकने वाला वकील संविधान से नहीं, उस के समानता के सिद्धांत से चिढ़ा हुआ था. वह यह नहीं सह सकता था कि एक दलित किसी ऊंची जाति की याचिका को नामंजूर कर दे. उस की मूर्ति को दोबारा स्थापित करने की मांग खारिज हुई, तो वह धर्म के नाम पर संविधान पर चोट करने निकल पड़ा.

कोर्ट में धर्म की दखलअंदाजी

यह पूरा मामला खजुराहो मंदिर परिसर से जुड़ा था. वकील ने एक याचिका दायर की थी कि वहां भगवान विष्णु की 7 फुट ऊंची मूर्ति को दोबारा स्थापित करने का आदेश दिया जाए. चीफ जस्टिस बीआर गवई ने अपनी पीठ से यह याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह धार्मिक मामला है, इसे अदालत नहीं, बल्कि भगवान पर छोड़ दीजिए.

यह संविधानिक नजरिए से सही टिप्पणी थी, क्योंकि कोर्ट धर्म का निर्णायक नहीं है. वह कानून का व्याख्याता है, लेकिन मनुवादियों के लिए यह बेइज्जती बन गया, क्योंकि उन का लक्ष्य भगवान नहीं, बल्कि अपने धार्मिक वर्चस्व का प्रदर्शन था. और इस बात को मनुवादी मानने के लिए तैयार नही थे. इसी का नतीजा यह हुआ कि जूता फेंकने की कोशिश की गई. यह जूता धर्म के नाम पर संविधान के चेहरे पर मारा गया.

भाजपा सरकार की चुप्पी

इस घटना के बाद जो सब से ज्यादा चौंकाने वाली बात रही, वह थी भाजपा सरकार की चुप्पी. न प्रधानमंत्री ने प्रतिक्रिया दी, न गृह मंत्री ने और न ही कानून मंत्री ने.

सवाल यह है कि क्या यह चुप्पी सहमति की भाषा थी? जब किसी मंदिर पर पत्थर फेंका जाता है, तो पूरा राष्ट्रवादी तंत्र जाग उठता है. फिर जब न्याय के मंदिर पर हमला हुआ, तो वही लोग खामोश क्यों रहे?

सुप्रीम कोर्ट अकसर छोटीछोटी बातों पर खुद से संज्ञान लेता है, तो फिर संविधान के सम्मान पर हुए इस हमले पर चुप क्यों रहा? क्या यह इसलिए कि हमला करने वाला ‘हमारा’ था या इसलिए कि जिस पर हमला हुआ, वह ‘दलित’ था?

न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व की असमानता

भारतीय न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व का संकट नया नहीं है. देश की बड़ी अदालतों में बहाल जजों में 80 फीसदी से ज्यादा सवर्ण बैकग्राउंड के होते हैं. सुप्रीम कोर्ट में दलित, पिछड़े या आदिवासी वर्गों से आने वाले जजों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है.

बीआर गवई का चीफ जस्टिस बनना इसलिए ऐतिहासिक था. वे यह प्रमाण हैं कि संविधान ने कम से कम एक शख्स को वह अवसर दिया जो ‘मनुस्मृति’ ने कभी नहीं दिया था. लेकिन इसी वजह से उन की उपस्थिति कई लोगों के लिए चुनौती बन गई, क्योंकि बीआर गवई का नाम यह साबित करता है कि भारत में न्याय केवल ब्राह्मण नहीं कर सकता, दलित भी कर सकता है.

सनातनी सोच की जड़ें बहुत गहरी

ब्राह्मणवाद कोई धर्म नहीं, एक विचार प्रणाली है जो श्रेष्ठता के भरम पर टिकी है. यह उस समय की देन है, जब समाज को जातियों में बांट कर सत्ता और ज्ञान कुछ हाथों में कैद कर दिया गया था. आज वही सोच नए रूपों में फिर से उभर रही है. कभी यह काबिलीयत के नाम पर कभी मैरिट के नाम पर, कभी संस्कृति के नाम पर समानता का विरोध करती है. जूता फेंकने वाला शख्स उसी सोच का प्रतिनिधि था, जो यह मानती है कि दलितों को सम्मान देना सामाजिक व्यवस्था का अपमान है.

मीडिया की भूमिका और चुप्पी

सब से गलत पहलू यह रहा कि मुख्यधारा मीडिया ने इस घटना को ‘बड़ी खबर’ की तरह नहीं उठाया, जहां मनोरंजन की छोटी घटनाएं घंटों तक चलती हैं. वहीं सुप्रीम कोर्ट की इस शर्मनाक घटना पर कुछ सैकंड की खबर, कुछ कौलम की रिपोर्ट बस इतना ही.

मीडिया की यह चुप्पी सिर्फ पत्रकारिता की नाकामी नहीं, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की कमजोरी भी है, क्योंकि यह घटना केवल जूता फेंकने की नहीं थी, बल्कि यह संविधान की आत्मा पर पुराणवाद द्वारा किया गया प्रतीकात्मक प्रहार था.

संविधान की ताकत

जस्टिस बीआर गवई ने जो किया, वह न्याय का नहीं, संस्कार का उदाहरण था. उन्होंने कहा कि ‘मुझे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता’. यह वाक्य साधारण नहीं है. यह उस शख्स का कहना है, जिस ने जाति के कांटों के बीच चल कर न्याय के मंदिर तक पहुंचने का सफर तय किया.

उन्होंने उसे माफ किया, लेकिन यह माफी उन की नहीं, संविधान की गरिमा की थी. वे जानते थे कि अगर वे प्रतिशोध लेंगे, तो लोग कहेंगे कि देखो, दलित जज भावनात्मक है, इसलिए उन्होंने माफी को हथियार बनाया.

पर इस माफी को समाज बुजदिली न सम झे, चेतावनी सम झे. यह पक्का है कि अगर उलटा होता तो जूता फेंकने वाले का पूरा परिवार और उस के दोस्त थानों में बैठे बयान दर्ज करा रहे होते.

आत्ममंथन की जरूरत

यह घटना न्यायपालिका के लिए भी आत्ममंथन का अवसर है. क्या हमारी अदालतें वास्तव में हर नागरिक के लिए समान हैं? क्या न्याय की कुरसी पर बैठने वालों का चयन सिर्फ काबिलीयत से होता है या उस में सामाजिक ढांचे की झलक भी है?

समानता का मतलब केवल अवसर देना नहीं, सम्मान की रक्षा करना भी है. जब किसी चीफ जस्टिस पर इस तरह हमला होता है, तो यह केवल उस शख्स का नहीं, पूरे संस्थान का अपमान है.

सामाजिक न्याय का अधूरा सपना

डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता बेकार है, अगर सामाजिक स्वतंत्रता नहीं है. आज वही बात सही साबित होती है. हम ने संविधान बना लिया, आरक्षण दे दिया, कानून बना दिए लेकिन समाज का सोचने का ढंग अभी भी वही है. दलितों को न्याय, पिछड़ों को समान अवसर और स्त्रियों को सम्मान ये सब आज भी सिद्धांत हैं, असलियत नहीं.

ब्राह्मणवाद चाहे जितना भी सिर उठाए, संविधान का उजाला उस की छाया को मिटाने के लिए काफी है. चीफ जस्टिस बीआर गवई ने माफ कर दिया, पर भारत को यह भूलना नहीं चाहिए, क्योंकि यह माफी नहीं, एक संदेश है कि समानता की राह अभी लंबी है, पर जब तक संविधान है, आशा भी है. Indian Constitution

Live-in Relationship का खौफनाक अंजाम

Live-in Relationship, लेखक – महेश कांत शिवा

27 जून, 2025 को हरियाणा के पानीपत में एक औरत की उस के लिवइन पार्टनर ने गला काट कर हत्या कर दी और फरार हो गया. दरअसल, उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद के गांव केलई की रहने वाली उषा के पति की काफी दिनों पहले मौत हो गई थी. गांव में रोजगार न होने के चलते वह कामधंधे की तलाश में पानीपत चली आई.

उषा पानीपत की गंगाराम कालोनी में किराए के कमरे में रहने लगी. यहां पर उस की मुलाकात उत्तर प्रदेश के बदायूं के रहने वाले महेंद्र नामक एक नौजवान से हुई. पहले उन दोनों में दोस्ती हुई और फिर बाद में उन्होंने लिवइन रिलेशनशिप में रहने का फैसला कर लिया.

बताया जाता है कि पिछले कुछ समय से उषा और महेंद्र में किसी बात को ले कर झगड़ा चल रहा था. 24 जून, 2025 को महेंद्र्र ने चाकू से उषा का गला काट कर उस की हत्या कर दी और फरार हो गया. हालांकि, पुलिस ने महेंद्र को 2 दिन बाद ही गिरफ्तार कर लिया.

महेंद्र ने पुलिस को बताया कि उषा उस से बातबात पर झगड़ा करने लगी थी. उसे शक था कि वह किसी दूसरे मर्द से फोन पर बात करने लगी थी. उस की इसी हरकत से तंग आ कर उस ने उषा की हत्या कर दी.

इसी तरह पश्चिम बंगाल की रहने वाली 24 साल की ब्यूटी खातून तकरीबन 6 महीने पहले अपने परिवार वालों को बिना बताए पानीपत आई थी. यहां वह पुराना औद्योगिक क्षेत्र के कुलदीप नगर में किराए पर रहने लगी और एक फैक्टरी में काम करने लगी.

इसी दौरान ब्यूटी खातून की जानपहचान सूरज पठान नाम के एक नौजवान से हुई. दोनों में पहले दोस्ती हुई और कुछ ही दिनों में दोस्ती प्यार में बदल गई. इस के बाद वे लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगे.

हालांकि, ब्यूटी खातून ने अपनी बहन नेहा खातून को फोन कर के बता दिया था कि वह पानीपत में है और एक लड़के से प्यार करती है और वे दोनों एकसाथ रहते हैं. पर 19 जून, 2025 को सूरज पठान ने ब्यूटी खातून की हत्या कर दी.

गिरफ्तारी के बाद सूरज पठान ने बताया कि ब्यूटी खातून उस के अलावा किसी दूसरे लड़के से भी बात करती थी. उस ने अनेक बार ब्यूटी खातून को सम?ाया कि वह किसी दूसरे से बात न करे, लेकिन वह नहीं मानी.

इसी के चलते सूरज पठान ने 19 जून, 2025 को ईंट से ब्यूटी खातून के सिर पर वार किया, जिस से उस की मौत हो गई.

14 जून, 2025 को पानीपत से सटे करनाल शहर में 35 साल की पूजा नामक औरत की हत्या भी उस के लिवइन पार्टनर ने कर दी थी.

पूजा मूल रूप से कंबोपुरा गांव की रहने वाली थी और उस की शादी गांव बढ़ेडा में हुई थी. वह 3 बच्चों की मां थी. वह अपने पति को छोड़ कर करनाल की दीवान कालोनी में एक आदमी के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगी थी.

उन दोनों में किसी बात को ले कर झगड़ा हुआ और पूजा के लिवइन पार्टनर ने उस की गला दबा कर हत्या कर दी और लाश को एक एंबुलैंस में घर के बाहर छोड़ कर फरार हो गया.

हरियाणा के पलवल के गांव नांगल ब्राह्मण का रहने वाला योगेश फरीदाबाद में प्राइवेट नौकरी करता था, जहां उस की जानपहचान उत्तर प्रदेश के अयोध्या की रहने वाली एक लड़की से हुई. दोनों में मुलाकात हुई और प्यार हो गया. इस के बाद योगेश ने साल 2017 में उस लड़की से लवमैरिज की थी.

शादी के बाद योगेश के 2 बच्चे हुए, जिन में 6 साल की बेटी और 10 महीने का बेटा था. इस के बाद उस की अपनी पत्नी से अनबन रहने लगी, तो योगेश की पत्नी उसे छोड़ कर बच्चों समेत अपने मायके चली गई और वहीं रहने लगी.

पत्नी के मायके जाने के बाद योगेश फरीदाबाद की नौकरी छोड़ कर हरियाणा के रेवाड़ी आ गया और यहां के धारूहेड़ा इलाके में एक अस्पताल में ओटी असिस्टैंट की नौकरी करने लगा.

नौकरी के दौरान योगेश की मुलाकात करनाल के वकीलपुरा सदर बाजार की रहने वाली प्रिया से हुई. दोनों में दोस्ती हुई और फिर प्यार हो गया, जिस के बाद उन दोनों ने लिवइन रिलेशनशिप में रहने का फैसला किया.

बाद में प्रिया भी अपने 3 बच्चों को ले कर आ गई और वे धारूहेड़ा के सैक्टर 6 में एक किराए के मकान में रहने लगे. प्रिया ने अपने तीनों बच्चों का दाखिला गुरुकुलम स्कूल में करा दिया.

बताया जाता है कि उन दोनों के बीच कुछ समय से किसी बात को ले कर अनबन चल रही थी. इसी बीच स्कूल की छुट्टी पड़ने के चलते प्रिया ने अपने तीनों बच्चों को अपनी बहन के पास भेज दिया. अब मकान में योगेश और प्रिया ही रह रहे थे.

जानकारी के मुताबिक, 2 से 6 जून, 2025 के बीच योगेश ने अपनी लिवइन पार्टनर प्रिया की गला घोंट कर हत्या कर दी और लाश को बैड में छिपाने के बाद खुद भी फांसी का फंदा लगा कर खुदकुशी कर ली.

इस बात का पता तब चला जब 6 जून, 2025 को लोगों को योगेश के मकान से बदबू आई, जिस के बाद लोगों ने पुलिस को सूचना दी. पुलिस ने कमरे का दरवाजा तोड़ा तो योगेश फांसी पर लटका हुआ मिला.

रेवाड़ी पुलिस ने भी रूटीन वर्क की तरह योगेश की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और आगे की जांच में जुट गई. उस वक्त योगेश के परिवार वालों सुसाइड करने की वजह पत्नी से अनबन होना बताई थी.

बेटे की मौत के बाद योगेश के पिता गिरीराज 19 जून को अपने बेटे का सामान लेने के लिए धारूहेड़ा पहुंचे. जब वे कमरे से बैड को उठाने लगे, तो वह काफी भारी लगा.

जैसे ही बैड खोला गया, तो उस में कपड़ों के बीच में एक औरत हाथ दिखाई दिया. वह योगेश की लिवइन पार्टनर प्रिया की लाश थी.

इसी तरह मूल रूप से उत्तराखंड के नानकमत्ता की रहने वाली 2 बच्चों की मां पूजा गुरुग्राम के थाना सैक्टर 5 में उत्तराखंड के ही सितारगंज गौरीखेड़ा के मूल बाशिंदे 25 साल के मुश्ताक अहमद के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहती थी.

पूजा एक स्पा सैंटर में काम करती थी, जबकि मुश्ताक टैक्सी चलाता था. कुछ दिनों पहले मुश्ताक पूजा को घुमाने के बहाने उत्तराखंड ले गया और वहां पर गरदन धड़ से अलग कर उस की हत्या कर दी.

हत्या के बाद मुश्ताक ने लाश के सिर को एक प्लास्टिक के थैले में डाल कर नाले में बहा दिया, जबकि धड़ को चादर में लपेट कर दूसरे नाले में फेंक दिया और छिपने के लिए कर्नाटक भाग गया.

उधर, जब काफी दिनों से पूजा नहीं मिली, तो उस की बहन ने उस की थाने में गुमशुदगी दर्ज कराई. पूजा की बहन ने पुलिस को बताया था कि उस की बहन मुश्ताक के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहती थी.

गुरुग्राम सैक्टर 5 थाना पुलिस ने पहले तो गुरुग्राम में ही पूजा की तलाश की, लेकिन जब वह नहीं मिली, तो उत्तराखंड में स्थानीय पुलिस के सहयोग से मुश्ताक को गिरफ्तार कर पूछताछ की गई.

मुश्ताक ने पुलिस को बताया कि उस की पूजा से मुलाकात रुद्र्रपुर बसस्टैंड पर हुई थी. वे दोनों बस से गुरुग्राम आ रहे थे. चूंकि दोनों एक ही राज्य के रहने वाले थे, तो दोनों में आसानी से दोस्ती हो गई. दोनों ने एकदूसरे का मोबाइल नंबर ऐक्सचेंज किया.

इसी बीच पूजा की बहन की तबीयत खराब हो गई, तो मुश्ताक उसे अपनी टैक्सी में ले कर उस की बहन के घर भी गया, जिस से दोनों की दोस्ती प्यार में बदल गई और उन्होंने लिवइन रिलेशनशिप में रहने का फैसला किया. तब से पूजा मुश्ताक को अपना पति मानने लगी थी.

इस बीच मुश्ताक अपने घर उत्तराखंड गया तो उस के परिवार वालों ने उस पर दबाव बना कर अपनी रिश्तेदारी की ही एक लड़की से शादी करा दी. जब पूजा को इस बात का पता चला तो वह मुश्ताक के घर पहुंच गई और मुश्ताक को अपना पति बताते हुए हंगामा किया. परिवार और रिश्तेदारों ने विवाद को आगे न बढ़ाते हुए पूजा और मुश्ताक को घर से बाहर निकाल दिया.

कुछ दिनों बाद मुश्ताक पूजा को धूमाने के बहाने उत्तराखंड ले गया और गरदन काट कर उस की हत्या कर दी.

बढ़ती जरूरतें और इच्छाएं

दरअसल, लिवइन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों की समय बढ़ने के साथसाथ जरूरतें और इच्छाएं भी बढ़ने लगती हैं. लिवइन रिलेशनशिप में आने से पहले दोनों के बीच भले ही यह सहमति बने कि वे दोनों एकदूसरे पर निर्भर नहीं रहेंगे, दोनों एकदूसरे पर पैसे से जुड़ा दबाव या सामाजिक बंधन का दबाव नहीं डालेंगे.

लेकिन जैसेजैसे समय गुजरता है और दोनों के बीच रिश्ता गहरा होता चला जाता है, वैसे ही उन की जरूरतें बढ़नी शुरू हो जाती हैं. दोनों में कहीं न कहीं वे भावनाएं भी पैदा होने लगती हैं, जो पतिपत्नी के रिश्ते के बीच होती हैं.

लिवइन रिलेशनशिप टूटने की दूसरी बड़ी वजहें

* दोनों के साथ रहने के चलते उन के खर्चे भी बढ़ते चले जाते हैं, फिर खर्चे उठाएगा कौन, यह सम?ा नहीं आता.

* लड़की या लड़के द्वारा शादी का दबाव बनाना.

* रसोईघर का खर्च और मकान का किराया कौन भरेगा, यह बड़ी समस्या.

* अगर दोनों के पहले से बच्चे हैं, तो उन की स्कूल फीस और दूसरे खर्च कौन उठाएगा.

* दोनों के घूमनेफिरने पर होने वाला खर्च किस की जेब से जाएगा.

* आपसी संबंध बनने के बाद महिला का पेट से हो जाना.

* परिवार द्वारा लड़के या लड़की की शादी दूसरी जगह तय कर दिया जाना. Live-in Relationship

Social Issue: औरतों पर जोरजुल्म नेता सब से आगे

Social Issue, विधायकों और सांसदों पर बलात्कार के आरोप

151 वर्तमान सांसदविधायक ऐसे हैं, जिन्होंने औरतों के ऊपर जोरजुल्म से जुड़े मामले घोषित किए हैं, जिस में स्त्री की लज्जा भंग करने के आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग (आईपीसी-354) विवाह आदि के करने को विवश करने के लिए किसी स्त्री का अपहरण करना, या उत्प्रेरित करना (आईपीसी-366) संबंधी मामले दर्ज हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक वर्तमान में 14 विधायकों और 2 सांसदों पर रेप के आरोप हैं. भाजपा और कांग्रेस के 5-5 विधायकोंसांसदों पर ये आरोप हैं.

इस में भाजपा के 3 विधायक और 2 सांसद हैं. वहीं, कांग्रेस के 5 विधायकों पर इस तरह के आरोप हैं. आम आदमी पार्टी, भारत आदिवासी पार्टी, बीजू जनता दल, तेलुगु देशम पार्टी के 1-1 विधायक शामिल हैं.

महिला मुख्यमंत्री होने के बाद भी देश का पश्चिम बंगाल ऐसा राज्य है, जो औरतों पर होने वाले जोरजुल्म में नंबर एक पर बना हुआ है. वर्तमान में पश्चिम बंगाल में 25, आंध्र प्रदेश में 21 और ओडिशा में 17 विधायकोंसांसदों पर महिला अपराध से संबंधित मामले दर्ज हैं, जबकि भाजपा के 55, कांग्रेस के 44, आम आदमी पार्टी के 13 विधायकसांसदों इस तरह के आरोप हैं.

मौजूदा दौर में जनप्रतिनिधियों पर इस तरह के आपराधिक आरोप लगने के चलते भारत में चुनाव सुधार की मांग भी बढ़ती जा रही है. एडीआर रिपोर्ट राजनीतिक दलों के लिए अपने उम्मीदवारों की गहन जांच करने और सार्वजनिक पद चाहने वालों के आपराधिक रिकौर्ड के बारे में मतदाताओं को जागरूक करती है. लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास बहाल करने के लिए भारतीय राजनीति में ज्यादा पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत है.

भारत के नागरिकों, समाजिक संगठनों और राजनीतिक नेताओं को यह तय करना है कि आपराधिक बैकग्राउंड के शख्स को सार्वजनिक पद पर न बिठाएं, ताकि देश की अखंडता और राजनीति में सुचिता बरकरार रहे.

संविधान की प्रस्तावना में यह साफ लिखा है कि भारतीय संविधान जनता से शक्ति प्राप्त करता है. जनता दागी छवि वाले नेताओं को न चुन कर भारतीय राजनीति में सुधार ला सकती है. मगर अफसोस की बात यह है कि इन पदों पर चुनाव लड़ने वाले ज्यादातर लोगों पर गंभीर किस्म के आपराधिक मामले दर्ज रहते हैं.

शादीशुदा औरतों पर जोरजुल्म करने के मामले केवल गरीब या मिडिल क्लास परिवारों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि हाईप्रोफाइल सोसाइटी में भी औरतें महफूज नहीं हैं. मध्य प्रदेश के कांग्रेस विधायक के परिवार की एक बहू काम्या भी इस जोरजुल्म की शिकार हुई हैं.

कांग्रेस विधायक सुरेंद्र सिंह बघेल के छोटे भाई देवेंद्र सिंह बघेल से काम्या दुबे की शादी 8 फरवरी, 2018 को धूमधाम से हुई थी. शादी के बाद से ही काम्या, देवेंद्र और उन की मां पीथमपुर में रहने लगे थे.

काम्या यही सम?ाती थीं कि उन के पति ‘बघेल फिलिंग्स’ नाम के पैट्रोलपंप पर जाते हैं. पर शादी के कुछ ही दिनों बाद घर में काम करने वाले एक नौकर ने काम्या को बताया कि उन के पति घर से कारोबार संभालने की बजाय शराब पीने के लिए जाते हैं.

काम्या के सपने जल्द ही बिखरने लगे थे. उन्हें भरोसा ही नहीं हो रहा था कि इस तरह एक इज्जतदार परिवार के? लोग उन्हें धोखा दे कर उन पर जोरजुल्म करेंगे.

पर जब काम्या के सब्र का बांध टूटा, तो 13 मई, 2025 को वे महिला पुलिस थाना पहुंचीं, जहां पर एसीपी निधि सक्सेना और थाना प्रभारी अंजना दुबे को अपने साथ हुए जोरजुल्म की जानकारी देते हुए लिखित में शिकायत दर्ज कराई.

भोपाल महिला थाना पुलिस ने इस मामले में कांग्रेस विधायक सुरेंद्र सिंह बघेल, उन की पत्नी शिल्पा सिंह बघेल, भाई देवेंद्र सिंह बघेल, मां चंद्रकुमारी और बहन शीतल सिंह बघेल के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 85, 351(2), 3(5) और दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 की धाराओं 3 और 4 के तहत मामला दर्ज कर लिया.

नेता प्रतिपक्ष पर भी गंभीर आरोप

मध्य प्रदेश के कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार पर भी अपनी पत्नी पर जोरजुल्म करने के अलावा अपनी लिवइन पार्टनर सोनिया भारद्वाज की हत्या का गंभीर आरोप लग चुका है.

इस मामले में मार्च, 2025 में उन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में स्पैशल लीव पिटीशन दायर की गई है. यह पिटीशन और किसी ने नहीं, बल्कि उमंग सिंघार की पहली पत्नी प्रतिमा मुदगल ने दायर की है.

मामला 16 मई, 2021 का है. उमंग सिंघार के भोपाल वाले बंगले के बैडरूम में सोनिया भारद्वाज की लाश मिली थी. पुलिस ने तब आईपीसी की धारा 306 के तहत आत्महत्या का केस दर्ज किया था. उस समय उमंग सिंघार के एक आईपीएस रिश्तेदार के दबाव में पुलिस ने महिला की मौत के मामले को सुसाइड में बदल दिया था.

उमंग सिंघार की पत्नी प्रतिमा मुदगल ने इस मामले में एक याचिका दायर की है, जिस में उन्होंने कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं. याचिका में प्रतिमा मुदगल ने कहा है कि मृतक सोनिया के बेटे ने डीजीपी को एक खत लिखा था, जिस में बेटे ने कहा था कि उस की मां की जान ली गई है, पर उमंग सिंघार और पुलिस ने मिल कर मामले को दूसरा रूप दे दिया है.

पुलिस में मामला दर्ज होने के बाद केस ट्रायल के लिए पहुंच गया. इसी बीच एफआईआर रद्द करने के लिए हाईकोर्ट जबलपुर में अपील की गई. कोर्ट ने सुनवाई के बाद 5 जनवरी, 2022 को एफआईआर रद्द करने के आदेश दिए. याचिकाकर्ता पहली पत्नी ने इसी आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की है.

उमंग सिंघार की पत्नी प्रतिमा मुदगल ने अब खुल कर इस का विरोध कर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका लगाई है. 142 पन्ने की याचिका में प्रतिमा मुद्गल ने साल 2022 में जबलपुर हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिस के तहत उमंग सिंघार को क्लीनचिट दी गई थी.

उमंग सिंघार ने 16 अप्रैल, 2022 को भोपाल में प्रतिमा मुद्गल से शादी की थी. प्रतिमा ने आरोप लगाते हुए कहा है कि शादी के 2 महीने बाद उमंग सिंघार का बरताव बदल गया था. वे उन्हें मानसिक रूप से सताने लगे थे. उमंग सिंघार ने उन्हें कई बार जान से मारने की धमकी भी दी थी. इस पूरे मामले की शिकायत उन्होंने धार थाने में की थी.

बहू को सुसाइड करने पर मजबूर किया

कानून की शपथ लेने वाले मंत्री भी जातबिरादरी की खाई को पाटने की बजाय उसे और गहरा करने पर आमादा हैं. इस का सुबूत मध्य प्रदेश के एक कैबिनेट मंत्री पर लगे आरोप दे रहे हैं.

मार्च, 2018 में मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार के तब के मंत्री रामपाल सिंह की बहू ने खुदकुशी कर अपनी जान दे दी थी, क्योंकि मंत्री और उन का परिवार उसे अपनी बहू मानने को राजी नहीं था.

राजपूत जाति के मंत्री के दूसरे बेटे गिरजेश प्रताप सिंह ने 20 जून, 2017 को आर्य समाज मंदिर में उदयपुरा की प्रीति रघुवंशी से लवमैरिज की थी, जो मंत्री को नागवार गुजरी थी.

रामपाल सिंह अपने बेटे के इस ब्याह को सामाजिक तौर पर मंजूरी देने को तैयार नहीं थे और उस की दूसरी शादी कराने पर तुले हुए थे.

जब गिरिजेश की पत्नी प्रीति को पता चला कि उस के ससुर ने पति की दूसरी सगाई इंदौर में करा दी है, तो प्रीति रघुवंशी ने फांसी लगा कर अपनी जान दे दी. मामला मीडिया में आने के बाद भी मंत्री रामपाल लगातार प्रीति को अपनी बहू मानने से इनकार करते रहे, लेकिन उन का बेटा गिरिजेश प्रीति के अस्थि विसर्जन में शामिल हुआ था.

हालांकि, इस घटना के बाद रामपाल सिंह को रघुवंशी समाज के विरोध का सामना करना पड़ा था और उन का राजनीतिक कैरियर भी खत्म होने के कगार पर पहुंच गया है.

सताने में नेता कम नहीं हैं

हमारे देश में औरतों पर होने वाले जोरजुल्म का मुद्दा एक गंभीर चिंता की बात बना हुआ है. देश में रोजाना औरतों पर जोरजुल्म की वारदातें हो रही हैं, पर सरकार इन्हें रोकने में नाकाम ही रही है. औरतों सताने में जनता के चुने हुए जनप्रतिनिधि भी पीछे नहीं हैं.

एडीआर यानी एसोसिएशन औफ डैमोक्रेटिक रिफौर्म्स की ओर से जारी एक रिपोर्ट से पता चलता है कि औरतों को सताने में जनप्रतिनिधियों की लंबी लिस्ट है.

इस लिस्ट में हिमाचल प्रदेश के भी एक जनप्रतिनिधि का नाम शामिल है. हिमाचल प्रदेश से 4 लोकसभा और 3 राज्यसभा सांसद आते हैं, जबकि 68 विधायक हिमाचल विधानसभा के सदस्य हैं. इन में से एक विधायक का नाम एडीआर की रिपोर्ट में शामिल है.

हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले की चिंतपूर्णी सीट से कांग्रेस विधायक सुदर्शन बबलू पर भी महिला अपराध से जुड़ा मामला दर्ज है.

एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक, उन पर महिला अपराध से जुड़ी आईपीसी की धारा 509 (महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के इरादे से शब्द, इशारा या कृत्य) के तहत एक मामला दर्ज है.

वैसे, हिमाचल प्रदेश के अलावा मणिपुर, दादर नगर हवेली और दमन और दीव ही 2 ऐसे राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हैं, जहां 1-1 जनप्रतिनिधि के खिलाफ महिला अपराध से जुड़े मामले चल रहे हैं.

इस के बाद गोवा, असम में 2-2, पंजाब, ?ारखंड में 3-3, उत्तर प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु में 4-4, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, केरल में 5-5 जनप्रतिनिधि इस लिस्ट में शामिल हैं.

इस के अलावा राजस्थान में 6, कर्नाटक में 7, बिहार में 9, महाराष्ट्र और दिल्ली में 13-13, ओडिशा में 17, आंध्र प्रदेश में 21 और पश्चिम बंगाल में सब से ज्यादा 25 सांसद और विधायक इस लिस्ट में शामिल हैं. Social Issue

Social Issue: पति ने की दूसरी शादी, तो पहली पत्नी ने मचाया तांडव

Social Issue: बिहार पुलिस के एक जवान ने दूसरी शादी की, तो उस की पहली पत्नी ने जबरदस्त हंगामा किया… दरअसल, यह मामला बिहार के एक जिले से सामने आया है, जहां पुलिस जवान ने बिना अपनी पहली पत्नी को बताए और बिना तलाक दिए दूसरी शादी कर ली.

पहली पत्नी को जब इस बारे में पता चला, तो उस ने गुस्से में आ कर जम कर हंगामा किया और पुलिस जवान पर कई आरोप लगाए… महिला ने पुलिस जवान के खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई.. इस के बाद मामला इलाके में चर्चा की बात बन गया और लोग इसे ले कर सोशल मीडिया पर भी कमैंट करने लगे.

जानिए पूरा मामला

भागलपुर में एक सिपाही ने पहली बीवी को छोड़ कर दूसरी औरत से शादी रचा ली, जिस को ले कर पहली बीवी ने जम कर तांडव किया.

इन दिनों देखा जा रहा है कि 2 शादी करना ट्रैंड सा हो गया है. और तो और अब इस में पुलिस के जवान भी शामिल हो गए हैं. यह मामला भी खूब तूल पकड़ रहा है. यह मामला शिवनारायणपुर के बिहार पुलिस जवान मोहम्मद वहाब अंसारी का है. वह बिना तलाक दिए ही दूसरी शादी कर के नई बीवी घर ले आया, तो हंगामा मच गया, क्योंकि जब इस की खबर पहली पत्नी अजमीरा खातून को मिली और उस ने जम कर तांडव किया.

पहली बीवी अपने परिवार वालों के साथ मोहम्मद वहाब अंसारी के घर पर पहुंची और हंगामा शुरू हो गया. इस मामले में जब आरोपी सिपाही से पूछा गया कि आप ने अपनी पहली बीवी को तलाक दिया है या नहीं, तो उस ने कहा कि नहीं मैं ने तलाक नहीं दिया है.

तब आप क्या कानून को नहीं मानते हैं, तो उस ने कहा कि यह हमारी गलती है, हम गलती स्वीकार करते हैं.

बताते चलें कि कुछ दिन पहले ही मोहम्मद वहाब अंसारी पर ऐसा आरोप है कि कुछ दिन पहले ही अजमीरा खातून को घर से बेघर कर दिया है. उन को बिहार पुलिस के जवान मोहम्मद वहाब से एक बच्चा भी है. पहली बीवी ने पति पर मारपीट का भी आरोप लगाया है. कहा कि वे दहेज की भी मांग करते हैं, जबकि जवान मोहम्मद वहाब ने पहली बीवी से लव मैरिज की थी.. और दूसरी बीवी से भी लव मैरिज की है… तो ऐसे बिहार पुलिस जवान को कब तक सजा मिलेगी, यह देखने वाली बात है.

लेकिन इस घटना ने यह सवाल उठाया कि समाज में ऐसे मामलों के प्रति सोच और संवेदनशीलता क्या होनी चाहिए, खासकर जब बात पारिवारिक और कानूनी अधिकारों की होती है? यह घटना एक गंभीर और दिलचस्प मामला है, जो समाज में बढ़ते हुए तलाक और दूसरी शादी के मामलों को ले कर कई सवाल खड़े करता है. कानूनी रूप से देखा जाए तो एक पति को बिना अपनी पहली पत्नी को तलाक दिए दूसरी शादी करना भारतीय दंड संहिता और मुसलिम पर्सनल ला के तहत गलत है.

इस तरह की घटनाओं से समाज में दोहरी शादी को ले कर और भी विचार-विमर्श बढ़ेगा… खासकर पुलिस जैसे संवेदनशील विभाग में काम करने वाले लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि वे कानून और नैतिकता का पालन करें, ताकि समाज में एक पौजिटिव संदेश जाए.

आज भी कायम है छुआछूत

हाल ही में 3 अक्तूबर, 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में जाति पर आधारित भेदभाव रोकने के लिए दायर जनहित याचिका पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जेल नियमावली जाति के आधार पर कामों का बंटवारा कर के सीधे भेदभाव करती है. सफाई का काम सिर्फ निचली जाति के कैदियों को देना और खाना बनाने का काम ऊंची जाति वालों को देना आर्टिकल 15 का उल्लंघन है.

सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जेल मैन्युअल के उन प्रावधानों को बदलने का निर्देश दिया है, जो जेलों में जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देते हैं.

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला यह तो साफतौर पर जाहिर करता है कि आजादी के 77 साल बाद भी छुआछूत समाज में ही नहीं, बल्कि सरकारी सिस्टम पर भी बुरी तरह हावी है.

जेलों के अंदर जातिगत भेदभाव आम बात है. जेल में कैदियों की जाति के आधार पर उन्हें काम सौंपा जाता है, जहां दलितों को अकसर साफसफाई जैसे काम करने के लिए मजबूर किया जाता है.

समाज में जातिगत भेदभाव कोई नई बात नहीं है. आएदिन देश के अलगअलग इलाकों में दलितों से छुआछूत रखने और उन पर जोरजुल्म करने की घटनाएं होती रहती हैं.

आज भी गांवकसबों के सामाजिक ढांचे में ऊंची जाति के दबंगों के रसूख और गुंडागर्दी के चलते दलित और पिछड़े तबके के लोग जिल्लतभरी जिंदगी जी रहे हैं.

गांवों में होने वाली शादी में दलितों व पिछडे़ तबके को खुले मैदान में बैठ कर खाना खिलाया जाता है और खाने के बाद अपनी पत्तलें उन्हें खुद उठा कर फेंकनी पड़ती हैं.

टीचर मानकलाल अहिरवार बताते हैं कि गांवों में मजदूरी का काम दलित और कम पढ़ेलिखे पिछड़ों को करना पड़ता है. दबंग परिवार के लोग अपने घर के दीगर कामों के अलावा अनाज बोने से ले कर फसल काटने तक के सारे काम करवाते हैं और बाकी मौकों पर छुआछूत रखते हैं. छुआछूत बनाए रखने में पंडेपुजारी धर्म का डर दिखाते हैं.

25 साल की होनहार लड़की काव्या यों तो गांव में पलीबढ़ी, पर अपनी पढ़ाई के बलबूते वह बैंक में क्लर्क सिलैक्ट हो गई और उस की पोस्टिंग इंदौर में हो गई.

इंदौर में नौकरी करते वह अपने साथ बैंक में काम करने वाले हमउम्र लड़के की तरफ आकर्षित हुई. वह लड़का भी उसे चाहता था.

काव्या ने घर में बिना बताए उस लड़के से शादी कर ली. वह जानती थी कि उस के मातापिता शादी करने की इजाजत हरगिज नहीं देंगे, क्योंकि वह लड़का दलित जाति का था.

देरसवेर इस बात की जानकारी गांव में रहने वाले मातापिता को लग ही गई. इस बात को ले कर वे काफी आगबबूला हो गए और इंदौर पहुंच कर तुरंत ही काव्या को गांव ले आए.

घर में काव्या को दलित लड़के से शादी करने की बात को ले कर इतना टौर्चर किया गया कि उस ने फांसी लगा कर खुदकुशी कर ली.

साल 2024 के मार्च महीने में मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले से आई इस खबर ने साबित कर दिया है कि समाज में छुआछूत आज भी बदस्तूर जारी है. किस तरह पढ़ेलिखे गांव के मातापिता ने अपने ?ाठे मानसम्मान के लिए अपनी बेटी की खुशियां ही छीन लीं.

गांवकसबों और छोटे शहरों में आज भी लड़की को यह हक नहीं है कि वह अपनी मरजी और पसंद के लड़के से शादी कर सके. दूसरी जाति और धर्म में शादी करने पर परिवार और समाज के बहिष्कार का सामना करना पड़ता है और कई बार तो जान से हाथ भी धोना पड़ता है.

गांवकसबों में छुआछूत का आलम यह है कि दलितों के महल्ले, बसावट अलग हैं. इन के पानी पीने के नल और मंदिर तक अलग हैं. भूल से भी इन्हें ऊंची जाति के लोगों के नल को छूने और उन के मंदिर में घुसने की इजाजत नहीं है.

अपने चुनावी फायदे के लिए केंद्र और राज्य सरकारें दलितों को साधने के लिए भले ही करोड़ों रुपए खर्च कर संत रविदास का मंदिर बनवा रहे हों, लेकिन देश के ग्रामीण अंचलों में आज भी दलितों को छुआछूत का सामना करना पड़ रहा है.

मध्य प्रदेश सरकार गांवकसबों में छुआछूत मिटाने के लिए भले ही ‘स्नेह यात्राएं’ निकाले, गांधी जयंती पर ‘समरसता’ भोज कराए, मगर गरीब और दलितों के लिए सामाजिक समरसता का सपना अभी भी अधूरा है, क्योंकि तमाम कोशिशों के बाद भी आज लोग अपनी छोटी सोच से बाहर नहीं आ पाए हैं.

छुआछूत का एक मामला मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में दलित औरतों के साथ सरकारी नल पर पानी भरने को ले कर पिछले साल सामने आया था.

17 अगस्त, 2023 को छतरपुर जिले के गांव पहरा के गौरिहार थाना क्षेत्र के पहरा चौकी की रहने वाली 2 औरतें गांव में पानी की कमी के चलते एक सरकारी नल पर पानी भरने गई हुई थीं.

यह नल गांव के यादव परिवार के घर के सामने लगा हुआ था. जैसे ही इन उन औरतों ने पानी भरने के लिए बरतन हैंडपंप के नीचे रखा और नल चलाना शुरू किया, तभी वहां मंगल यादव, दंगल यादव और देशराज यादव आ गए और उन के बरतन फेंकते हुए कहा, ‘तुम दलित जाति की हो, तुम ने हमारे इलाके के इस नल को कैसे छुआ? तुम्हारे छूने से नल अशुद्ध हो गया.’

सरकारी नल पर पानी भरने गई दलित औरतों संदीपा और अभिलाषा ने जब उन से मिन्नतें करते हुए कहा, ‘हमारे घर में पानी नहीं है. पानी के बिना खाना भी नहीं बना है, बच्चे भूख से बेचैन हैं.’

इस बात पर हमदर्दी दिखाने के बजाय इन दबंगों ने मारपीट शुरू कर दी. अपने साथ हुई मारपीट की शिकायत करने पुलिस थाना पहुंची इन दोनों औरतों को पुलिस ने भी दुत्कार दिया.

छुआछूत से जुड़ी यह कोई अकेली घटना नहीं है. मध्य प्रदेश के अलगअलग इलाकों में इस तरह की घटनाएं आएदिन होती रहती हैं. कभी स्कूलों में दलित बच्चों के जूठे बरतन धोने से मना किया जाता है, तो कभी उन्हें धर्मस्थलों पर घुसने नहीं दिया जाता.

छुआछूत से जूझते हैं लोग

60 साल की उम्र पार कर चले लोगों की पीढ़ी ने छुआछूत का जो रूप समाज में देखा था, उसे उन्होंने उस समय के हालात के लिहाज से सहज तरीके से अपना लिया था, मगर मौजूदा दौर की नौजवान पीढ़ी को यह नागवार गुजरता है.

72 वसंत देख चुके डोभी गांव के सालक राम अहिरवार बताते हैं कि आजादी मिलने के बाद देश से अंगरेज भले ही चले गए थे, मगर गांव में रहने वाले ऊंची जाति के जमींदारों का जुल्म कम नहीं हुआ था. दलित तबके का कोई भी इन जमींदारों की हवेली के सामने से गुजरता था, तो अपने पैर के जूतों को सिर पर रख कर निकलता था.

दलितों के बेटों को शादी में घोड़ी पर चढ़ने की मनाही थी. गांव के ऊंची जाति के लोग उन्हें शादीब्याह में बुलाते तो थे, मगर भोजन उन्हें जमीन पर बैठ कर करना होता था और अपनी पत्तल खुद ही फेंकनी पड़ती थी. पीने के लिए घर से पानी भर कर ले जाना पड़ता था.

उस दौर की पीढ़ी को यह बुरा भी नहीं लगता था. वक्त बदलने के साथ जब आज की नौजवान पीढ़ी पढ़लिख कर  पुराने रिवाजों को नहीं मानती, तो टकराव के हालात बनते हैं और दलितों को जोरजुल्म का सामना करना पड़ता है.

मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में हर साल दलितों के घुड़चढ़ी करने और बरात में डीजे बजाने पर ?ागड़ा होता है.

पढ़ीलिखी नई पीढ़ी इन दकियानूसी रिवाजों को नहीं मानती. गांवकसबों में आज शादियों में बफे सिस्टम तो लागू हो गया है, मगर दलित समुदाय के लिए अलग काउंटर बनाए जाते हैं, उन्हें ऊंची जाति के लोगों के साथ दावत करने की आजादी आज भी नहीं है.

ऐसा नहीं है कि दलितों से छुआछूत बिना पढ़ेलिखे लोगों या गांवकसबों तक सीमित है, बल्कि पढ़ेलिखे लोग भी इसे बदस्तूर अपना रहे हैं.

2 साल पहले मध्य प्रदेश के एक मंत्री, जो दलित समुदाय से आते थे, भी ऊंची जाति के लोगों से छुआछूत के शिकार हुए थे.

दरअसल, वे मंत्री ठाकुरों के परिवार में मातमपुरसी के लिए गए थे. वहां और भी ऊंची जाति के नेता मौजूद थे. जब खानेपीने की बारी आई, तो ऊंची जाति के दूसरे लोगों को स्टील की थाली में खाना परोसा गया और दलित समुदाय से आने वाले मंत्री को डिस्पोजल थाली परोसी गई थी.

समाज में छुआछूत के लिए धर्म और मनुवादी व्यवस्था भी जिम्मेदार है. मनुवादियों ने अपने फायदे के लिए वर्ण व्यवस्था लागू की. ब्राह्मणों ने अपने को श्रेष्ठ साबित कर समाज को 4 वर्णों में बांटा और शूद्रों को उन के मौलिक अधिकारों से दूर रखा. उन्हें शिक्षा का अधिकार नहीं दिया गया. इस के पीछे की वजह भी यही थी कि ये लोग पढ़लिख कर काबिल न बन सकें. यही वजह रही कि दलितों ने धर्म परिवर्तन का रास्ता अपनाया.

स्कूलकालेज भी नहीं अछूते

राष्ट्र निर्माण की शिक्षा देने वाले सरकारी संस्थान भी छुआछूत को खत्म नहीं कर पा रहे हैं. ‘ऐजूकेशन मौल’ कहे जाने वाले इंगलिश मीडियम प्राइवेट स्कूलों में सरकारी अफसरों और ऊंची जाति के पैसे वाले लोगों के बच्चे पढ़ रहे हैं और सरकारी स्कूलों में गरीब, मजदूर, दलितपिछड़े तबके के बच्चे पढ़ रहे हैं.

सरकारी स्कूलों में दिए जाने वाले मिड डे मील में भी दलित और ऊंची जाति के छात्रछात्राओं के बीच गुटबाजी देखने को मिलती है.

स्कूल में ऊंची जाति के बच्चे दलित और पिछड़ी जाति के बच्चों के साथ भोजन करना पसंद नहीं करते. उन्हें यह सीख अपने घर से तो मिलती ही है, टीचर भी इस खाई को नहीं पाट रहे.

अगर कोई दलित जाति की महिला भोजन बना कर परोसती है, तब भी ऊंची जाति के बच्चे वह भोजन नहीं करते. अगर कोई ऊंची जाति की रसोइया खाना बनाती है, तो वह दलित बच्चों के जूठे बरतन नहीं धोती.

साल 2022 में मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले से 50 किलोमीटर दूर चरगवां थाना क्षेत्र से सटे गांव सूखा में दलित बच्चों से सरकारी स्कूल में खाने के बरतन धुलवाए जाने का मामला सामने आया था.

इसी साल गुजरात के मोरबी जिले के एक गांव में प्राइमरी स्कूल में मिड डे मील का खाना पिछड़े समुदाय के छात्रों ने इसलिए नहीं खाया, क्योंकि यह दलित औरत द्वारा बनाया गया था

मिड डे मील बनाने वाली दलित महिला गरमी की छुट्टियों के बाद जब स्कूल पहुंची, तो प्रिंसिपल ने 100 बच्चों के लिए खाना बनाने के लिए कहा, लेकिन एससी जाति के केवल 7 बच्चे ही भोजन के लिए पहुंचे. दूसरे दिन प्रिंसिपल ने 50 बच्चों के लिए खाना बनाने को कहा, जिसे सिर्फ दलित बच्चों ने ही खाया.

साल 2023 में कर्नाटक के तुमकुरु जिले से बेहद ही हैरान कर देने वाला मामला सामने आया था. सिरा तालुका के नरगोंडानहल्ली सरकारी स्कूल में कुछ बच्चों ने मिड डे मील के भोजन का बहिष्कार कर दिया था, जिस की वजह भी एक दलित महिला द्वारा भोजन पकाया जाना थी.

छुआछूत की समस्या स्कूलों में नासमझ बच्चों के बीच ही नहीं, बल्कि भविष्य गढ़ने वाले टीचरों के बीच भी है. लंच टाइम में ऊंची जाति के टीचर भी दलित जाति के टीचरों के साथ लंच बौक्स शेयर करना पसंद नहीं करते. स्कूल के अलावा दूसरे दफ्तरों में भी उन के साथ जातिगत भेदभाव किया जाता है.

दलित जाति के चपरासी से दफ्तरों में झाड़ू लगाने और शौचालय साफ करने का काम करवाया जाता है, मगर उन के हाथ से खानेपीने की चीज और पानी नहीं मंगाया जाता.

जातियों में बंट गए देवीदेवता

जिस तरह समाज जातियों में बंटा हुआ है, उसी तरह उन्होंने देवीदेवता को भी बांट लिया है. पंडितों ने परशुराम को, कायस्थों ने चित्रगुप्त को, तो यादवों ने कृष्ण को ले लिया. कुशवाहा ने कुश से संबंध जोड़ लिया, कुर्मियों ने लव को पकड़ लिया, तो कहारों ने जरासंध को अपना पूर्वज बता दिया. लोहारों ने विश्वकर्मा के साथ संबंध जोड़ लिया.

दलितों की एक जाति ने वाल्मीकि से अपना नाता जोड़ा, तो एक तबका रैदास को भगवान मानने लगा. कुम्हारों ने अपना संबंध ब्रह्मा से बता दिया. तमाम जातियों को कोई न कोई देवता या कुलदेवता या ऋषि पूर्वज के तौर पर मिल गए.

ऊंची जाति के लोगों से हुई बेइज्जती से छुटकारा पाने का ये इन जातियों का अपना तरीका था. शूद्र और अतिशूद्र होने की बेइज्जती से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने देवीदेवताओं का ढाल बना लिया. यह जाति व्यवस्था से विद्रोह भी था और ऊंची जातियों की तरह बनने की लालसा भी थी.

अमीर ऊंची जाति वालों की होड़ में दलितों ने भी अपनेअपने देवीदेवताओं के मंदिर बना लिए, मगर पुजारी की कुरसी उन की जेब ढीली करने वाले पंडितों के हाथ में ही रही.

‘गुलामगिरी’ किताब से सबक लें सरकार हिंदूमुसलिम का भेद करा कर कट्टरवादी हिंदुत्व की हिमायती तो बनती है, पर हिंदुओं के बीच ही जातिवाद की दीवार तोड़ने और दलितपिछड़े तबके के लोगों पर दबंग हिंदुओं के द्वारा किए जाने वाले जोरजुल्म पर चुप्पी साधे रहती है.

मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के पेशे से वकील मनीष अहिरवार कहते हैं कि एक इनसान का दूसरे इनसान के साथ गुलामों सरीखा बरताव करना सभ्यता के सब से शर्मनाक अध्यायों में से एक है. लेकिन अफसोस है कि यह शर्मनाक अध्याय दुनियाभर की तकरीबन सभी सभ्यताओं के इतिहास में दर्ज है. भारत में जाति प्रथा के चलते पैदा हुआ भेदभाव आज तक बना हुआ है.

वे आगे कहते हैं कि एक बार ज्योतिबा फुले की किताब ‘गुलामगिरी’ पढ़ लें, तो उन की आंखों के चश्मे पर पड़ी धूल साफ हो जाएगी. साल 1873 में लिखी गई इस किताब का मकसद दलितपिछड़ों को तार्किक तरीके से ब्राह्मण तबके की उच्चता के ?ाठे दंभ से परिचित कराना था.

इस किताब के जरीए ज्योतिबा फुले ने दलितों को हीनताबोध से बाहर निकल कर इज्जत से जीने के लिए भी प्रेरित किया था. इस माने में यह किताब काफी खास है कि यहां इनसानों में भेद पैदा करने वाली आस्था को तार्किक तरीके से कठघरे में खड़ा किया गया है.

दलितपिछड़ों की हमदर्द बनने का ढोंग करने वाली सरकारें पीडि़त लोगों को केवल मुआवजे का झनझना हाथों में थमा देती हैं. सामाजिक, मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से दलितों का उत्पीड़न कर बाद में केवल मुआवजा दे कर उन के जख्म नहीं भर सकते. ऐसे में किस तरह यह उम्मीद की जा सकती है कि आजादी के

77 साल बाद भी अंबेडकर के संविधान की दुहाई देने वाला भारत छुआछूत से मुक्त हो पाएगा?

जिस तरह किसान आंदोलन ने सरकार की गलत नीतियों का विरोध कर के सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था, उसी तरह दलितपिछड़ों को भी अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए एकजुट होना होगा.

प्यार में खुद को न मिटाएं

असम के होम ऐंड पौलिटिकल सैक्रेटरी शिलादित्य चेतिया ने 18 जून, 2024 को गुवाहाटी के एक प्राइवेट हौस्पिटल के आईसीयू में पत्नी की लाश के सामने ही अपनी सर्विस रिवौल्वर से खुद को गोली मार ली. पत्नी की मौत के कुछ मिनटों बाद ही उन्होंने अपनी जान दे दी.

उसी अस्पताल में कुछ देर पहले उन की पत्नी की मौत कैंसर से हो गई थी. 44 साल के शिलादित्य चेतिया राष्ट्रपति के वीरता पदक से सम्मानित आईपीएस अधिकारी थे.

दरअसल, शिलादित्य चेतिया की पत्नी ब्रेन ट्यूमर से पीडि़त थीं और पिछले कुछ महीनों से अस्पताल में भरती थीं. शिलादित्य चेतिया पिछले 4 महीनों से छुट्टी ले कर अपनी पत्नी का इलाज करा रहे थे.

शिलादित्य की पत्नी अगमोनी बोरबरुआ की उम्र 40 साल थी. नेमकेयर अस्पताल में शाम के 4 बज कर 25 मिनट पर उन की मौत हो गई.

10 मिनट बाद ही आईपीएस अधिकारी शिलादित्य चेतिया ने भी दुनिया छोड़ दी.

पत्नी की मौत के बाद पहले वे आईसीयू केबिन में गए और मैडिकल स्टाफ से कहा कि वे अपनी पत्नी की लाश के पास प्रार्थना करना चाहते हैं, इसलिए उन्हें कुछ देर के लिए अकेला छोड़ दिया जाए. इस के बाद उन्होंने अपनी सर्विस रिवौल्वर से अपनी ही जान दे दी.

इसी तरह 18 जून, 2024 को ही उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में एक शादीशुदा जोड़े ने भी साथ जीनेमरने का वादा निभाया. पत्नी की मौत के कुछ घंटे बाद ही बुजुर्ग पति ने भी दम तोड़ दिया.

दरअसल, 70 साल की पार्वती प्रजापति और 75 साल के मगन प्रजापति की शादी 50 साल पहले हुई थी. पिछले कुछ समय से पार्वती काफी बीमार चल रही थीं.

17 जून, 2024 की रात को उन की मौत हो गई.

18 जून की सुबह जब पति मगन प्रजापति चाय ले कर उन के पास पहुंचे, तो देखा कि वे बिस्तर पर मरी हुई पड़ी थीं. उन की मौत से पति मगन सदमे में आ गए.

रिवाज के मुताबिक, जब पति मगन आखिरी बार उन की मांग में सिंदूर भरने लगे तो अचानक से उन की भी हालत खराब हो गई और कुछ ही देर में उन्होंने भी दम तोड़ दिया. इस के बाद पतिपत्नी का एकसाथ अंतिम संस्कार किया गया.

इसी तरह 9 अप्रैल, 2024 को उत्तर प्रदेश के एटा से एक सच्चे प्यार का मामला सामने आया था. बीमार पति की इलाज के दौरान मौत हो गई.

यह सूचना जैसे ही पत्नी को मिली कि उस का पति इस दुनिया में नहीं रहा, तो वह रोने लगी. फिर अचानक ही उस की भी मौत हो गई. पत्नी की मौत के साथ ही 2 बच्चे अनाथ हो गए.

यह मामला कोतवाली अलीगंज का है. 50 साल के ओम नारायण उर्फ राजू की कुछ दिन पहले तबीयत खराब हो गई थी, जिन का इलाज चल रहा था. वे सही हो गए थे. पर फिर ओम नारायण की अचानक फिर से तबीयत बिगड़ गई थी. वे फर्रुखाबाद के एक प्राइवेट अस्पताल में इलाज के लिए ले जाए गए, जहां उन की मौत हो गई.

जब इस बात की सूचना उन की पत्नी मोहिनी को हुई, तो वह रोने लगीं. जैसे ही पति की लाश घर पर आई, तो वे और तेज रोने लगीं.

तभी अचानक मोहिनी की भी तबीयत खराब हो गई. जब तक परिवार वाले उन्हें संभाल पाते, तब तक उन की भी मौत हो गई. दोनों का अंतिम संस्कार एक ही चिता पर हुआ.

इन घटनाओं के बारे में जान कर दिल को यह अहसास जरूर होता है कि आज भी प्यार जिंदा है. किसी को इस हद तक चाहना कि उस के बगैर जीने की चाह ही खत्म हो जाए और इनसान खुद ही अपना वजूद खत्म कर दे, बहुत मुश्किल है. पर ऐसी कहानियां हम अकसर फिल्मों में जरूर देखते हैं.

प्यार क्या है

प्यार क्या है? किसी को पाना या खुद को खो देना? यह एक बंधन या फिर आजादी? यह जिंदगी है या फिर जहर?

दरअसल, प्यार का मतलब है कि कोई और आप से कहीं ज्यादा खास हो चुका है. जैसे ही आप किसी से कहते हैं कि मैं तुम से प्यार करता हूं, आप अपनी आजादी खो देते हैं. आप की मरजी में अब उस की मरजी भी शामिल हो जाती है. आप के पास जो भी है, वह उस का भी हो जाता है. आप की खुशी उस की खुशी में शामिल हो जाती है. उस के गम आप अपने दिल में महसूस करने लगते हैं. जिंदगी में आप जो भी करना चाहते हैं, वह उस के साथ मिल कर करने की ख्वाहिश रखने लगते हैं. उस के बिना आप को अपना वजूद ही अधूरा लगने लगता है यानी प्यार बड़ी खूबसूरती से खुद को मिटा देने वाली हालत है.

अगर आप खुद को नहीं मिटाते, तो आप कभी प्यार को जान ही नहीं पाएंगे. आप के अंदर का कोई न कोई हिस्सा मरना ही चाहिए. आप के अंदर का वह हिस्सा जो अभी तक आप का था, वह मिट कर उस का हो जाता है. कोई और इनसान उस हिस्से की जगह ले लेता है.

दरअसल, जब हमें किसी से प्यार होता है, तो हमारे दिमाग में एक रासायनिक मिश्रण निकलता है, जो हमारी हरकतों और भावनाओं को प्रभावित करता है. डोपामाइन जैसे हार्मोन की वजह से उत्तेजना और खुशी महसूस होती है, जबकि औक्सीटोसिन जैसे हार्मोन से हमें अपने प्यार में विश्वास और भावनाएं आती हैं.

ये हार्मोन हमें अंदर से खुश रखते हैं, जिस वजह से हम अपने पार्टनर के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताना चाहते हैं. हमारे दिमाग को सम?ा आ जाता है कि इस रिश्ते में हमें खुशी मिलती है और उस वजह से हम एक तरह से इस फीलिंग के आदी यानी एडिक्ट से हो जाते हैं. प्यार एक तरह का नशा ही है, जिस के बिना हमें अपना वजूद अधूरा लगने लगता है.

इस तरह का सच्चा प्यार आजकल ज्यादातर रिश्तों में नजर नहीं आता है. जराजरा सी बात पर पार्टनर पर हाथ उठा देना, ?ागड़े करना, दूर हो जाना, बात नहीं करना और यहां तक की तलाक ले लेना बहुत आम हो गया है.

वैसे भी आज के समय में नाजायज रिश्ते बनाने मुश्किल नहीं. मोबाइल और इंटरनैट के जरीए दूसरों के संपर्क में आने के बहुत से रास्ते खुले हुए हैं, तभी तो लोग शादी में रहते हुए भी किसी और के साथ रिश्ते बना लेते हैं, पार्टनर से ?ाठ बोलते हैं, उसे बेवकूफ बनाते हैं और कई दफा तो बात इतनी बढ़ जाती है कि वे एकदूसरे के ही खून के प्यासे बन जाते हैं. बहुत आसानी से पार्टनर को मौत की नींद सुला देते हैं, ताकि आजाद हो जाएं. पर यह आजादी प्यार नहीं है. प्यार तो वह बंधन है, जो किसी भी हालत में आप को पार्टनर से जोड़े रखता है.

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