Social Issue : करोड़ों के लिए कौडि़यों की लड़ाई

Social Issue. अभी मीडिया बनाम कोचिंग विवाद थमा ही नहीं था कि कोचिंग का आपसी झगड़ा सामने आ गया. वह भी खास पटना में, जो कोचिंग का हब माना जाता है.

एक समय था, जब यहां इंजीनियरिंग और मैडिकल का भी कोचिंग हब था. पर जब नामांकन और डिगरियां आसानी से मिलने लगीं, लोगों का मोह भंग हुआ, तो वे इस से किनारा करने लगे. एक कारण यह भी था कि कोटा और दिल्ली कोचिंग हब बनने लगे थे, तो एक पढ़नेपढ़ाने वालों का एक बड़ा तबका उधर शिफ्ट हो गया था.

मगर बिहार में छोटे पद वालों, जैसे क्लर्क की, टीचर की, सिपाही आदि की नौकरियां तो थीं ही. हाल ही में थोक में बहाली भी हुई, तो अभ्यार्थियों के झुंड के झुंड इधर आने लगे. और अब बारी थी इन के कोचिंग की. कोचिंग वालों ने इधर संभावनाएं देखीं और अपनी सारी ऊर्जा इधर ही लगा दी. और कहना नहीं होगा कि उन्हें अपार सफलता भी मिली है.

मगर इस कोचिंग के चक्कर में हुआ यह है कि कहीं भी गांवदेहात में किसी भी बेनामी स्कूलकालेज में नामांकन ले कर अभ्यर्थी इस कोचिंग के नाम पर हजारोंलाखों की संख्या में पटना में रह रहे हैं. पढ़ाई के नाम पर मूल किताब किसी को पढ़ना नहीं है. कौन उस के पीछे लगे. सभी के हाथ में ग्लौसी पेपर में छपी गाइड, कुंजियां आदि हैं.

हाल यह है कि 50 रुपए की मूल किताब उन्हें महंगी लगती है, मगर 500 की गाइड, कुंजी आदि सस्ती दिखती है. सो, प्रकाशकों की भी बन गई है.

कौन कितना पढ़ रहा है या कौन कितना पढ़ा रहा है, यह बाद की बात है. फिलहाल ध्यान सफलता की तरफ है. और यह सफलता नतीजे से जानी जाती है.

यह सफलता तब दिखती है, जब थोक में बहालियां होती हैं. और तब कोचिंग सैंटर अपना दावा ठोंकने लगते हैं कि अमुक थोक बहाली में उन के इतने स्टूडैंट सफल हुए. उन लोगों की लिस्ट में जिन सफल अभ्यर्थियों के नाम होते हैं, वे सभी में होते हैं. और विवाद यहीं उठ खड़ा होता है कि सही सूची कौन सी है.

लोभी गांव में ठग भूखों नहीं मरते. अभ्यर्थी भी होशियार है. वह यहां भी माल काटना चाहता है, वहां भी गिफ्ट बटोरना चाहता है. वह यह भी देखता है कि कहां कितना बढि़या माल या गिफ्ट हाथ लगने वाला है.

साल 2019 के आगेपीछे यही काम इंजीनियरिंग कोचिंग वाले करते थे. जिन अभ्यर्थियों का नामांकन आईआईटी, एनआईटी आदि में हो जाता था, उसे महंगे मोबाइल फोन से ले कर लैपटौप तक के किट्स उपलब्ध कराए जाने लगे, तो मारामारी मच गई.

उन अभ्यर्थियों को लगने लगा कि बस अब तो हम मैदान मार ही लिया, जबकि उन्हें अभी 5 साल की पढ़ाई के पीछे लाखों रुपए खर्च करने थे. फिर नौकरियों के लिए लाइन में लगना था.

और इस विवाद में कोचिंग वालों की कलई खुलने लगी. अभ्यर्थियों का मोह भंग हुआ, तो कोटा, दिल्ली, पुणे आदि का रुख करने लगे. फिलहाल इंजीनियरिंग कोचिंग का बाजार पटना में मंदा है.

लेकिन छोटी नौकरियों का तो है ही, जो मैट्रिक और इंटर लैवल पर होते हैं. आमतौर पर कहीं भी किसी स्कूलकालेज में एडमिशन करा ये अभ्यर्थी अपने भावअभाव के साथ शहरों में चले आते हैं कोचिंग करने. अभिभावक अपना पेट काट कर उन्हें इन कोचिंगों में पढ़ने के लिए भेजते हैं.

पटना में रहनेपढ़ने का औसतन खर्च प्रति छात्र 10,000 का है. इस का सर्वे दिल्ली प्रैस के कहने पर मैं ने किया था. अंदाज करें कि लाखों छात्रों के पीछे पटना में कितना पैसा आता होगा. अब तो लड़कियां भी इस पढ़ाई के मैदान में ताल ठोंक कर आ रही हैं. सो, पटना में कुकुरमुत्तों की तरह गर्ल्स होस्टल हर गलीमहल्लों में हैं. लड़कों के लौज, होस्टल आदि का कहना ही क्या. सालोंसाल ये पढ़ते ही रहते हैं.

इन लाखों अभ्यर्थियों के पीछे पैसा पानी की तरह बह रहा है, जिस से एक नई अर्थव्यवस्था उपजी है. और इसी अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से को अपने नाम करने के लिए वर्चस्व की लड़ाई है.

‘समय मंथन’ के संपादक सेराज अनवर का सवाल है कि ‘यूट्यूब पर पढ़ाने वाले टीचर्स, जो न्यूज एंकर अंजना ओम कश्यप की एक भद्दी टिप्पणी से तिलमिलाए हुए हैं. ‘गोदी’ मीडिया को आज सत्ता के दलाल, चाटुकार, लोकतंत्र के दुश्मन और न जाने ग़ुस्सा में क्याक्या बता रहे हैं. क्या आप ने अपने बच्चों को लोकतांत्रिक मूल्यों के बारे में कभी पढ़ाया है? धर्मनिरपेक्षता की खूबियां बताई हैं? संविधान पर क्या खतरा है समझाया है? हिंदूमुसलिम एकता क्यों जरूरी है बताया? बेशक, आप ने दारोगा बनाया, एसपीडीएसपी भी बनाया होगा, हजारोंलाखों को नौकरी दिलाई होगी, लेकिन एक सभ्य नागरिक भी उसे बनाया?

‘आप सब के करोड़ोंअरबों फौलोअर्स हैं, तो समाज में नफरत का बीज कौन बो रहा है? उस में आप के लोग भी हैं क्योंकि आपने शिक्षा को रोजगार से, नौकरी से जोड़ दिया. इनसान बनने के बुनियादी टिप्स नहीं दिए वरना समाज इतना जहरीला नहीं होता. एजूकेशन को जब तक सिविलाइजेशन से नहीं जोड़ा जाएगा समाज में दो कौड़ी के लोग ही पैदा होंगे.

‘आप जब पढ़ाते हैं मुसलमान पंचर बनाता है, तो क्लासरूम में बैठा हिंदू दोस्त मुसलिम छात्र को घृणा वाली नजर से देखता है. आप जब मौब लिंचिग पर चुप रहते हैं, तो आप के छात्र की मानसिकता में उथलपुथल चलती है और आगे चल कर उसे जायज समझने लगता है.

आप जब बुलडोजर राज पर एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक के बतौर चुप रहते हैं तो आप के पढ़ाए पुलिस अधिकारी, नौकरशाह और नेता को बल मिलता है. आप जब वोट के अधिकार, गलत और सही का चुनाव करने के गुलाम मानसिकता को नहीं भेद पाते तो सत्ता के दलाल मीडिया को कुछ भी बकने का सेफ पैसेज देते हैं.

‘यह समाज आप का ही बनाया हुआ है मास्टर साहब, जो अब्दुल को टाइट करने को अपना धर्म मानते हैं. यदि आप ने लोकतंत्र, सैकुलरिज्म, संविधान की ताकत को समझायापढ़ाया होता तो किसी अंजना ओम कश्यप को ओछी टिप्पणी करने की जुर्रत नहीं होती.

‘यदि आप ने भारत की साँझा विरासत पढ़ाई होती तो समाज नहीं बंटता. यदि आप गंगाजमुनी संस्कृति की धारा को सकारात्मक रुख देते तो हिंदूमुसलिम में इतना मतभेद नहीं होता. यदि आप एक नौकरीपेशा के साथ छात्रों को एक अच्छा इनसान भी बनाए होते तो देश चमन होता. क्या आप ने यह सब सब्जैक्ट पढ़ाया?

‘आप को भी दरअसल नफरती समाज चाहिए. नफरत बढ़ाने में भी आप यूट्यूब के स्टार टीचरों का योगदान उतना ही है. छात्रों को रट्टूमल बना दिया, लेकिन इनसान नहीं बनाया तो भुगतेगा कौन?’

यहीं पर एक सवाल यह भी कि क्या यह मौजूदा समय में अंजना ओम कश्यप और कोचिंग संस्थानों के बीच जो शीतयुद्ध जैसा माहौल है, वह दरअसल पेपर लीक और सीबीएसई परीक्षा में फैली घटनाओं से ध्यान भटकाने के लिए एक सोचीसमझ  रणनीति तो नहीं है? दोनों एकदूसरे के सहयोगी और चर्चा में बने रहने के लिए इस तरह के स्टंट करते रहते हैं.

मूल सवाल यह है कि शिक्षा की गिरती साख को ले कर व्यापक प्रतिरोध कैसे खड़ा हो? शिक्षा मंत्रालय के दफ्तर में लगी आग क्या मात्र एक आपदा है या कुछ और? इस पर विचार करने की जरूरत है.

Social Issueआईआईटी एडवांस में पहली रैंक लाने वाले शुभम कुमार को बधाई देते हुए फेसबुक पर वाहवाही लूटने वाले नेताओं से क्या यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि मैट्रिक पास करने के बाद वह गयाजी से कोटा पढ़ाई करने क्यों गया? क्या यह बिहार के शिक्षण व्यवस्था की नाकामयाबी का सुबूत नहीं है? उस के रिजल्ट को ले कर मैंटर्स ने जो दावा किया, वह झूठ अब सामने आ रहा है. कोचिंग संस्थानों द्वारा रिजल्ट को बढ़ाचढ़ा कर पेश करते हुए विज्ञापन करना और उस की आड़ में बहुत सारे बच्चों को अपने कोचिंग संस्थानों में नामांकन कराने की पेशकश करना दुर्भाग्यपूर्ण है.

हाल ही में खान सर कोचिंग में हुए हमले पर सारा विवाद सतह पर सामने आ गया. साफ दिखा कि कोचिंग की आपसी होड़ में शिक्षा व्यवस्था की क्या दुर्गति हो रही है. खान कोचिंग ‘ग्लोबल स्टडीज कोचिंग सैंटर’ की ‘ज्ञान बिंदु’ कोचिंग से पुरानी प्रतिस्पर्धा है. मजे की बात यह कि यह दोनों कोचिंग सैंटर पटना के सर्वाधिक सघन इलाके मुसल्लहपुर हाट में अगलबगल ही हैं.

यह प्रतिस्पर्धा जब रंजिश में बदलती है, तो हमले होते हैं. यह हमला किस ने और कैसे किया, यह सब युद्ध स्तर पर पुलिस छानबीन कर ही रही है. सीसीटीवी के फुटेज तलाशे जा रहे हैं, बयान लिए जा रहे हैं. सो, सहीगलत का फैसला सामने आ ही जाएगा.

मगर इस चक्कर में कोचिंग उद्योग का सच सामने आ रहा है. 2 जून को अफवाह फैली कि गोलियां चली हैं, इस से सनसनी फैल गई. खुद खान सर ने आगे बढ़ कर यह दावा किया. हालांकि वे अगले दिन इस बयान से मुकर गए.

खान सर ने जो बयान दिया था उस के मुताबिक, रात के 10 बज रहे थे और औनलाइन बैच चल रहे थे. उन्होंने कहा था कि सिक्योरिटी गार्ड को इतना मारा गया कि उस का सिर फोड़ दिया. हमलावर बोल रहे थे कि 2 दिन के अंदर कोचिंग सैंटर को उड़ा देंगे. उन का कहना था कि वह यहां बच्चों को पढ़ाते हैं और अच्छे रिजल्ट देते हैं.

ऐसा हमला करना बचकाना हरकत है. गार्ड बोल रहा था कि दूसरी कोचिंग वाले लोग ही हमला करने आए थे. सीसीटीवी में सभी का चेहरा नजर आया है और नामजद एफआईआर दर्ज कराई गई है.

उन्होंने यह भी दावा किया था कि कोचिंग सैंटर में बम भी चलाया गया है. जल्द ही आरोपियों की गिरफ्तारी होगी. उन्होंने अन्य कोचिंग सैंटर्स के संचालकों पर हमला बोलते हुए कहा था कि शिक्षक के भेष में यहां व्यापारी घुसे रहते हैं.

हालांकि, बाद में पटना पुलिस के बड़े अधिकारियों के पहुंचने के बाद खान सर ने गोलीबारी वाला बयान बदल दिया था. उन्होंने कहा था कि उस समय ऐसा माहौल हो गया था कि कुछ समझ  में नहीं आया. पुलिस से अनुरोध है कि सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए.

खान सर ने बताया कि गार्ड को घसीट कर ले जा कर मारा गया. पता नहीं टारगेट कौन था, बीच में गार्ड मिला तो उसे मार दिया. गार्ड को इतनी चोट लगी है कि वह अभी कुछ बताने कि हालत में नहीं है. अभी हमारी प्राथमिकता यह है कि गार्ड ठीक हो जाए.

‘क्या सैंटर पर गोली चली थी?’ पत्रकारों के इस सवाल पर खान सर नाराज हो कर बोले, ‘‘हम लोग यहां लड़ाई झगड़ा के लिए नहीं बैठते. पुलिस जांच कर रही है. हमारे गार्ड को घसीट कर बहुत मारा गया है. जब वह सही होगा, तो बताएगा. कोचिंग सैंटर पर हमला कर बच्चों का मनोबल तोड़ने की कोशिश की गई है, लेकिन कोई ऐसा नहीं कर पाएगा.

‘‘कोई भी कोचिंग वाला ऐसा करता है, क्या कोई सोच सकता है? पर हम लोग कम पैसे में ही पढ़ाएंगे. क्या शिक्षा का हक केवल अमीर का है?’’

खान सर का कहना था कि हमारी कोशिश यही रहती है कि गरीब से गरीब बच्चे को पढ़ाया जाए और इस में कुछ लोग बाधा बनते हैं. लेकिन हमें प्रशासन पर पूरा भरोसा है. यहां पुलिस प्रशासन ने सजगता दिखाई है. सभी अधिकारी यहां देर रात तक मौजूद थे. पुलिस जल्द

से जल्द कार्रवाई करे और दोषियों को सजा दी जाए. किसी को भी आपसी द्वेष नहीं रखना चाहिए. यहां सुरक्षा मुहैया कराई जाए.

लड़ाई का मुख्य बिंदु क्या था, इस पर प्रकाश डालना उचित होगा. दरअसल, 19,000 सिपाहियों की बहाली हुई थी. सफल प्रतिभागियों को सम्मानित करने के लिए दोनों कोचिंग संस्थानों ने अलगअलग सम्मान समारोह का आयोजन किया था. इस सम्मान समारोह में सम्मानितों की जो सूची थी, उस में बड़ी संख्या में नाम दोनों ही सूची में थे. और इस बात पर दोनो ही समूह आमनेसामने थे.

शाम में ‘ज्ञान बिंदु’ के संचालकों ने पाया कि उन के बैनरहोर्डिंग्स पर खान कोचिंग के बैनरहोर्डिंग्स आदि लगाए हुए हैं. यहीं से उन का गुस्सा फूटा और बैनर हटाओ या फाड़ो अभियान चल गया. हालांकि, 10 बजे रात तक तक तो कार्यक्रम संपन्न हो ही चुके थे. मगर गरमी का दिन, लोग आमतौर पर जल्दी सोते नहीं.

छात्रों का कहना ही क्या, वे झुंड  में उपस्थित थे ही. लोगों को अंदाजा नहीं था कि मामला इतना संगीन हो जाएगा. गुस्से से उफन रहे कुछ लोग बैनरहोर्डिंग्स हटानेफाड़ने के क्रम में ढेलेबाजी भी करने लगे. खान कोचिंग के एक गार्ड ने विरोध किया, तो उस को पकड़ कर जम कर धुनाई कर दी.

वरिष्ठ पत्रकार अनूप सिंह बताते हैं, ‘‘पटना में कोचिंग संस्थानों के बीच वर्चस्व की लड़ाई कोई नई बात नहीं है. हाल की घटनाओं ने एक बार फिर उस दुनिया की तरफ लोगों का ध्यान खींचा है, जहां शिक्षा, प्रतिस्पर्धा, कारोबार, ब्रांडिंग और लोकप्रियता का अनोखा मिश्रण देखने को मिलता है.

‘‘एक समय था जब देश में इंजीनियरिंग और मैडिकल प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के लिए पटना सब से बड़े केंद्रों में गिना जाता था. अनिल परमार, बीके सिंह, भूपेश कुमार जैसे शिक्षकों की कक्षाओं में जगह मिलना ही छात्रों के लिए उपलब्धि मानी जाती थी. इसी दौर में ‘सुपर 30’ का उदय हुआ.

‘‘गरीब छात्रों को आईआईटी तक पहुंचाने के अभियान ने आनंद कुमार को राष्ट्रीय पहचान दिलाई. बाद में ‘सुपर 30’ और उस से जुड़े अन्य संस्थानों के बीच प्रतिस्पर्धा, सफलता का श्रेय लेने की होड़ और प्रचारप्रसार को ले कर कई विवाद भी सामने आए.

‘‘समय बदला और देश का कोचिंग नक्शा भी बदला. कोटा राष्ट्रीय स्तर पर सब से बड़ा कोचिंग हब बन गया, लेकिन पटना की प्रासंगिकता समाप्त नहीं हुई. यहां प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले शिक्षकों की नई पीढ़ी सामने आई. डाक्टर एम. रहमान जैसे शिक्षकों ने लाखों छात्रों के बीच अपनी मजबूत पहचान बनाई.

‘‘फिर आया कोरोना काल. लौकडाउन ने शिक्षा जगत की दिशा ही बदल दी. पहली बार ऐसा हुआ कि कक्षा से ज्यादा महत्व मोबाइल स्क्रीन और इंटरनैट को मिलने लगा. जो शिक्षक डिजिटल प्लेटफार्म को समझ  गए, वे रातोंरात राष्ट्रीय स्तर के ब्रांड बन गए. यूट्यूब, फेसबुक, टैलीग्राम और अन्य सोशल मीडिया मंच नए क्लासरूम बन गए.

‘‘इसी दौर में खान सर जैसे शिक्षक देशभर में चर्चित हुए. लाखों छात्र घर बैठे पढ़ाई करने लगे. शिक्षा सस्ती हुई, पहुंच बढ़ी और कोचिंग संस्थानों की भौगोलिक सीमाएं समाप्त हो गईं. बिहार का शिक्षक राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और यहां तक कि विदेशों में बैठे छात्रों तक पहुंचने लगा. औनलाइन शिक्षा ने शिक्षकों के लिए आय के नए स्रोत भी खोले. फीस के अलावा यूट्यूब विज्ञापन, डिजिटल सदस्यता, ब्रांड सहयोग और सोशल मीडिया की लोकप्रियता भी आय का जरीया बन गई.

‘‘धीरेधीरे कोचिंग संस्थान शिक्षा संस्थान से आगे बढ़ कर ब्रांड में बदलने लगे. बड़े टीवी चैनलों पर शिक्षकों को बुलाया जाने लगा. सोशल मीडिया पर उन की फैन फौलोइंग बनने लगी. कुछ शिक्षक सैलिब्रिटी की तरह पहचाने जाने लगे. शिक्षा और मनोरंजन के बीच की दूरी कम होने लगी. आज पटना का कोचिंग बाजार केवल एक या 2 नामों तक सीमित नहीं है.

‘‘ज्ञान बिंदु, एस मिश्रा, औफिसर्स अकादमी सहित कई संस्थान औनलाइन और औफलाइन दोनों माध्यमों में सक्रिय हैं. दूसरी ओर अनअकैडमी जैसे राष्ट्रीय प्लेटफार्म ने पूरे देश के शिक्षकों और छात्रों को एक मंच पर ला कर प्रतिस्पर्धा को और तीखा बना दिया है.

‘‘इस प्रतिस्पर्धा का एक दूसरा पहलू भी है. रिजल्ट के प्रचार की लड़ाई अब पहले से कहीं अधिक आक्रामक हो चुकी है. किसी परीक्षा में जितनी रिक्तियां होती हैं, उस से कई गुना अधिक सफल छात्रों पर दावा करने के आरोप समयसमय पर लगते रहे हैं. सफल छात्रों को बाइक, बुलेट या अन्य उपहार दे कर सम्मानित किया जाता है. उन की कहानियां वीडियो के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं. सोशल मीडिया पर व्यापक प्रचार किया जाता है ताकि नए छात्रों को आकर्षित किया जा सके.

‘‘वास्तविकता यह है कि कोचिंग उद्योग अब केवल शिक्षा का क्षेत्र नहीं रह गया है. यह एक बड़ा आर्थिक तंत्र बन चुका है, जहां लोकप्रियता, डिजिटल पहुंच, मार्केटिंग और ब्रांड वैल्यू भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है, जितनी पढ़ाई.

‘‘दिलचस्प बात यह है कि जो शिक्षक कभी मुख्यधारा मीडिया और टीवी एंकरों से वैचारिक बहस करते दिखाई देते थे, आज उन्हीं के बीच प्रतिस्पर्धा और टकराव की खबरें सामने आने लगी हैं. इस का कारण केवल व्यक्तिगत मतभेद नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ता हुआ वह बाजार भी है, जिस में लाखों छात्र और करोड़ों रुपए दांव पर लगे हैं.

‘‘पटना का कोचिंग जगत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां शिक्षा, तकनीक और व्यापार तीनों का संगम दिखाई देता है. यह बदलाव अवसर भी ले कर आया है और चुनौतियां भी. अंतत: छात्रों और अभिभावकों के लिए सब से महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि चमकदार प्रचार, वायरल वीडियो और बड़ेबड़े

दावों के बीच वास्तविक गुणवत्ता और परिणाम को कैसे पहचाना जाए, क्योंकि किसी भी शिक्षा व्यवस्था की असली सफलता यूट्यूब के व्यूज, सोशल मीडिया फौलोअर्स या प्रचार अभियानों से नहीं, बल्कि छात्रों के भविष्य से तय होती है.’’

इस कोचिंग सैंटर विवाद में पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज, साक्ष्यों तथा बयानों के आधार पर ‘ज्ञान बिंदु’ के संचालक रोशन आनंद के साथ उन के सहयोगी अभिषेक तथा गौरव को गिरफ्तार कर लिया है. जो भी हो, कुछ दिन सनसनी रहेगी. कोचिंग संस्थान बंद रहेंगे. लेकिन अभिभावक ही नहीं, छात्र भी कुछ सोचने पर मजबूर हो रहे हैं कि क्या ऐसा ही चलता रहेगा? पढ़ाई के नाम पर पटना में मौजमस्ती और गाइडों का सहारा ले कर सफलता कितनी हाथ लगेगी?

शिक्षक, सिपाही, स्टाफ सेलेक्शन कमीशन आदि की परीक्षाएं गांवों और छोटे शहरों के स्कूलकालेज में पढ़ कर भी पास की जा सकती है. अच्छी पढ़ाई घर पर रह कर भी की जा सकती है, यह उन्हें समझना होगा. वह गाइड, कुंजी के बजाय मूल पुस्तकों की ओर बढ़ेंपढ़ें, तो वहां भी सफलता की इबारत लिखी जा सकती है.

Family Problem: मेरा छोटा भाई पैसों के लिए मम्मी पर हाथ उठाने लगा है

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सवाल –

मेरी उम्र 20 साल है और मैं बिहार का रहने वाला हूं. हमारे घर में मेरे मांबाप और हम 2 भाई रहते हैं. मेरा भाई मुझसे छोटा है और उसकी उम्र 17 साल है. मेरा भाई ज्यादातक वक्त अपने दोस्तों के साथ ही बिताता है और देर रात घर आता है. हाल ही में मुझे अपने दोस्तों से पता चला कि मेरा भाई अपने दोस्तों के साथ मिलकर नशे करने लगा है. जब हमें यह पता चला तो मम्मी पापा ने उसे पैसे देना बंद कर दिया. ऐसा करने से वे सबके साथ बद्तमीजी करने लगा और यहां तक की मांबाप का लिहाज किए बिना घर में गालियां भी देने लगा. उसकी गालियों से ही पता चल रहा था कि वे किसी गलत संगत में है. जब 2-3 दिन हमने उसे पैसे नहीं दिए तो उसने जो कदम उठाया जो हम कभी सोच भी नहीं सकते थे. वे मम्मी से पैसे छीनने लगा और जब मम्मी ने नहीं दिए तो उसने मम्मी को धक्का तक दे दिया और पैसे छीन के भाग गया. उसके ऐसा करने से मम्मी को चोट तक आ गई लेकिन उसे इस बात का कोई पछतावा नहीं हुआ. मुझे समझ नहीं आ रहा मैं क्या करूं क्योंकि उसका ऐसा रूप हमने पहले कभी नहीं देखा था.

जवाब –

आज के समय में अक्सर ऐसा सुनने और देखने को मिल रहा है कि बच्चे अपने ही मांबाप पर हाथ उठाने लगे हैं. जहां एक तरफ अब मांबाप यह सोचते हैं कि बच्चों पर हाथ नहीं उठाना चाहिए तो ऐसे में अब उल्टा बच्चे ही यह सब कर रहे हैं और समझ नहीं आता आखिर वे ऐसा सीख कहां से रहे हैं.

आपके भाई की बात की जाए तो आपकी बातों से साफ पता चल रहा है कि वे अपने यारों दोस्तों के साथ अय्याशी और नशा करने में इतना डूब चुका है कि उसे सही और गलत की पहचान ही नहीं रही. जब आप सबने उसे पैसा देने से मना किया तो जाहिर है कि वे नशे नहीं कर पा रहा होगा जिसके चलते जब उसे नशा करने की तलब हुआ तो उसने अपनी ही मां की जान जोखिम में डाल कर पैसे ले भागा.

अभी आप उसे कुछ भी समझाएंगे या फिर मारेंगे भी तो उसे कुछ समझ नहीं आएगा. आप किसी डौक्टर या काउंसलर की सलाह लेकर उसकी काउंसलिंग कराएं और जरूरत पड़े तो उसे नशा मुक्ति केंद्र भी भेजें क्योंकि हो सकता है वे नशे में इस कदर डूब चुका है कि वे क्या कर रहा है उसे खुद समझ नहीं आ रहा. आप उसके दोस्तों के मांबाप के पास भी जा सकते हैं और पूछताछ कर सकते हैं क्योंकि जाहिर है कि उसके दोस्तों के मांबाप भी परेशान होंगे.

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Social Issue: मेरे छोटे भाई को पैसे चुराने और घर का सामान बेचने की आदत लग गई है

Social Issue: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मेरी उम्र 25 साल है और मेरा एक छोटा भाई है जिस की उम्र 19 साल है. हम मेरठ के रहने वाले हैं. हाल ही में मैं ने नोटिस किया कि मेरा भाई आजकल अपने दोस्तों के साथ कुछ ज्यादा ही घूमने लगा है और खर्चा करने लगा है. उस की पौकेट मनी इतनी कम होने के बावजूद वह इतना खर्चा कैसे कर सकता है. इसी के चलते मैं ने उस के दोस्तों के बात की तो उन्होनें बताया कि मेरे भाई के पास पैसे तो रोज ही होते हैं. जब मैं ने उस पर नजर रखनी शुरू की तो पता चला कि वे आएदिन पापा की पौकेट से पैसे चुराने लगा है. मैं ने उसे इस बात पर खूब डांटा और समझाया भी, साथ ही पापा को बता देने की धमकी भी दी लेकिन वह अभी तक नहीं सुधरा. आएदिन हमारे घर से कोई न कोई चीज गायब हो जाती है और मुझे पूरा शक है कि उसे अब घर की चीजें बेचने की आदत लग गई है. मुझे उसे सुधारने के लिए क्या करना चाहिए?

जवाब –

आप के भाई की उम्र ऐसी है जिस में अकसर लोगों को दोस्तों के साथ घूमनाफिरना, मस्ती करना और ऐयाशी करने की आदत लग जाती है. ऐसे में जब उन के पास पैसे नहीं होते तो वे घर के पैसों और कीमती चीजों को चुराने लगते हैं. आप को ऐसे में सावधान रहना चाहिए, क्योंकि ज्यादा पैसों के लालच में इनसान कुछ भी करने लगता है और इस से नशे करने की आदत भी स्वाभाविक है.

आप को सब से पहले यह बात अपने घर वालों का बतानी चाहिए ताकि वे आप के छोटे भाई पर और उस की हरकतों पर नजर रख सकें. साथ ही, आप उस का पीछा कर के भी देखें की वे कहां जा कर सामान बेचता है और उन पैसों का आखिर करता क्या है, क्योंकि हो सकता है कि उस के दोस्त आप को सारी बात सच न बताएं.

जब आप के पास सारी जानकारी हो तब उसे बैठ के प्यार से समझाएं कि वह जो भी कर रहा है बिलकुल गलत कर रहा है. हमारे मांबाप बहुत ही मेहनत से पैसे कमाते हैं तो उसे खर्च भी हमें सोच समझ कर करना चाहिए और अगर सच में कभी पैसों की जरूरत हो तो मांग कर ले लेने चाहिए.

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Suicide Story: पत्नी से शराब पीने से रोका तो तेजाब पी कर दी जान

Suicide Story: गुस्सा, लालच और हवस, ये 3 ऐसी भावनाएं हैं जो इनसान को उस की असली पहचान से दूर ले जाती हैं. इस के असर में आ कर इनसान सहीगलत की पहचान भूल जाता है और ऐसे फैसले कर बैठता है जो न केवल उस की जिंदगी को, बल्कि उस के अपने और आसपास के लोगों की जिंदगी को भी बरबाद कर देता है. यही बातें इनसान को मौत के मुंह तक पहुंचा देती हैं, तो कभी उसे अपनी ही जान लेने पर मजबूर कर देती हैं.

ऐसा ही कुछ हुआ उधना के मफत नगर में रहने वाले 60 साल के श्यामराव भाई मणिक बोड़से के साथ, जो सिक्योरिटी गार्ड का काम करते थे. उन्होंने तेजाब पी कर अपनी जान दे दी. इस गलत कदम से उन्होंने न सिर्फ अपनी जिंदगी खत्म कर ली, बल्कि अपने परिवार के बारे में भी एक बार नहीं सोचा.

मीडिया खबरों के मुताबिक, खुदकुशी की वजह उन की पत्नी से होने वाला विवाद था. उन की पत्नी अकसर उन्हें शराब पीने पर डांटती थी और इसी बात से परेशान हो कर उन्होंने यह फैसला लिया. श्यामराव मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे और लंबे समय से अपने परिवार के साथ उधना में रह रहे थे.

इस घटना से एक बात साफ समझ आती है कि गुस्सा इनसान की सोचनेसमझने की ताकत को छीन लेता है. अगर श्यामराव एक पल के लिए ठहर कर अपने परिवार के बारे में सोचते, तो शायद उन्हें यह कदम उठाने की जरूरत ही नहीं पड़ती. आखिर इस खुदकुशी करने से उन्हें हासिल क्या हुआ? वे चाहते तो शराब की लत छोड़ कर अपने परिवार के साथ चैन और सुकून से जी सकते थे, लेकिन उन्होंने अपनी जान दे कर सबकुछ खत्म कर दिया. सच तो यह है कि अगर कोई इनसान शांत मन से एक बार सोच ले कि उस के जाने के बाद उस की पत्नी और बच्चों पर क्या गुजरेगी, तो शायद वह कभी खुदकुशी करने जैसा कदम नहीं उठाएगा. Suicide Story

Superstition: धार्मिक कर्मकांड के चंगुल में नौजवान

Superstition: ‘‘बाबा, अगर यह पूजा करा दूं, तो नौकरी पक्की हो जाएगी न?’’

बिहार की राजधानी पटना के एक बड़े मंदिर के बाहर खड़े 25 साल के रोहित ने पुजारी से यह सवाल किया. बीटैक पास रोहित पिछले डेढ़ साल से नौकरी की तलाश में है. सरकारी इम्तिहान दिए, प्राइवेट इंटरव्यू दिए, लेकिन नतीजा वही, नौकरी नहीं मिली. अब रोहित के भरोसे की आखिरी डोर भगवान और कर्मकांड है.

यह कहानी सिर्फ रोहित की नहीं, बल्कि आज के लाखोंकरोड़ों नौजवानों की है. पढ़ाईलिखाई में अच्छे, तकनीक के इस्तेमाल में आगे, लेकिन जिंदगी की चुनौतियों के सामने जब हार महसूस होती है, तो वे धर्म और कर्मकांड की शरण में चले जाते हैं.

धर्म की ओर लौटते नौजवान

यह विरोधाभास नहीं तो और क्या है कि जो नौजवान इंटरनैट पर रील बनाता है, आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस की बातें करता है, वही मंदिर में मन्नत का धागा भी बांधता है. पटना यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली 22 साल की नेहा कहती है, ‘‘हम पढ़ेलिखे हैं, लेकिन कभीकभी लगता है कि कोई ताकत तो है, जो सब बदल सकती है. शायद पूजा करने से किस्मत भी बदल जाए.’’

मंदिरों में नौजवानों की बढ़ती भीड़ इस का सुबूत है. पूजापाठ के बाद सोशल मीडिया पर फोटो डालना, शिवभक्ति के गानों पर रील बनाना, यूट्यूब पर धार्मिक गुरुओं के प्रवचन सुनना, यह नई पीढ़ी के रूटीन का हिस्सा बन गया है.

बेरोजगारी और निराशा की तरफ

बेरोजगारी इस सोच की सब से बड़ी वजह है. गांव का पढ़ालिखा लड़का जब शहर में स्ट्रगल करता है और नाकाम होता है, तो उस का भरोसा सिस्टम से ज्यादा ‘ऊपर वाले’ पर होने लगता है.

बिहार के औरंगाबाद के 27 साल के विकास की जबानी सुनिए, ‘‘मैं ने एमए किया. 3 बार शिक्षक भरती का फार्म भरा, लेकिन रिजल्ट नहीं आया. अब हर मंगलवार को हनुमानजी के मंदिर में जाता हूं. मन्नत मांगी है कि इस बार नौकरी मिल जाए.’’

आधुनिकता के साथ अंधविश्वास

तकनीकी युग में अंधविश्वास ने भी नए रूप ले लिए हैं. इंस्टाग्राम पर ‘शिवभक्त’ लिखने वाले नौजवान शनिवार को नीबूमिर्च जरूर टांगते हैं. बिल्ली रास्ता काट दे तो कार रोकी जाती है. नया बिजनैस शुरू करने से पहले मुहूर्त देखा जाता है. डाक्टर के इलाज के बाद भी श्रेय मंदिर और मजार को दिया जाता है.

एक रिटायर्ड डाक्टर का कहना है, ‘‘हम इलाज करते हैं, ठीक होना भगवान की मरजी है.’’

जब डाक्टर ही ऐसा मानते हैं, तो आम नौजवान क्या करेगा?

पढ़ेलिखे तबके में भी धार्मिकता की जड़ें

आज इंजीनियरिंग और मैनेजमैंट पढ़े नौजवान भी पत्थर की मूर्तियों से आशीर्वाद मांगते हैं. धार्मिक गुरुओं के प्रवचन, टीवी चैनल और सोशल मीडिया ने इस सोच को और गहरा कर दिया है. ‘संतोषी माता’ फिल्म से संतोषी माता की पूजा शुरू हुई. टीवी पर रामसीता के दर्शन होते ही लोग हाथ जोड़ने लगते हैं.

मुसलिम समाज भी घेरे में

सिर्फ हिंदू नहीं, बल्कि मुसलिम समाज के नौजवान भी धार्मिक कर्मकांडों में ज्यादा सक्रिय हुए हैं. रोजा रखना, मजार पर चादर चढ़ाना, दुआ के लिए ख्वाजा की दरगाह जाना, यह सब नई पीढ़ी की धार्मिक पहचान का हिस्सा बन रहा है.

धार्मिक शिक्षा का बढ़ता असर

मदरसे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरस्वती शिशु मंदिर जैसे संस्थान बचपन से धार्मिक शिक्षा दे रहे हैं. बच्चे मिट्टी की मूर्ति के सामने खड़े हो कर सरस्वती से विद्या मांगते हैं. यह धार्मिकता बड़े होने पर भी बनी रहती है.

मीडिया और धर्म का बिजनैस

धर्म अब उद्योग बन चुका है. टीवी चैनल 24 घंटे प्रवचन, कथा और कीर्तन दिखा रहे हैं. हर जगह बड़े यज्ञ, कीर्तन और प्रवचन हो रहे हैं. सोशल मीडिया पर धार्मिक इंफ्लुएंसर्स करोड़ों के फौलोअर बना चुके हैं.

क्या है समाधान

अंधविश्वास नाम की सामाजिक बीमारी खतरनाक है. जरूरत है वैज्ञानिक सोच विकसित करने की. स्कूलकालेजों में तार्किक और वैज्ञानिक नजरिए की शिक्षा को मजबूत करना होगा. नुक्कड़ नाटक, सैमिनार और वर्कशौप के जरीए गांवों में जागरूकता फैलानी होगी. मीडिया को भी धार्मिक अंधविश्वास के बजाय वैज्ञानिक जानकारी पर फोकस करना होगा.

आज का नौजवान लाभ तो विज्ञान से उठाता है, लेकिन इस का श्रेय ईश्वर और देवीदेवताओं को देता है. अगर हमें एक सजग और प्रगतिशील समाज बनाना है, तो नौजवानों को वैज्ञानिक सोच को विकसित करना होगा.

अगर नौजवानों में यह सोच पैदा नहीं होगी तो धार्मिक अंधविश्वास उन के दिमाग पर नैगेटिव असर डालेगा वे फैसले लेने से डरेंगे. कर्मकांड के चक्कर में अपना पैसा बरबाद करेंगे, जो उन्हें नकारा बना देगा. Superstition

Social Story: आखिर कब तक और क्यों

Social Story: ‘‘क्या बात है लक्ष्मी, आज तो बड़ी देर हो गई आने में?’’ सुधा ने खीज कर अपनी कामवाली से पूछा.

‘‘क्या बताऊं मेमसाहब आप को कि मुझे क्यों देरी हो गई आने में… आप तो अपने कामों में ही लगी रहती हैं. पता भी है मनोज साहब के घर में कैसी आफत आ गई है? उन की बेटी रिचा के साथ कुछ ऐसावैसा हो गया है… बड़ी शांत, बड़े अच्छे तौरतरीकों वाली है.’’

लक्ष्मी से रिचा के बारे में जान कर सुधा का मन खराब हो गया. बारबार उस का मासूम चेहरा उस के जेहन में उभर कर मन को बेधने लगा कि पता नहीं लड़की के साथ क्या हुआ? फिर भी अपनेआप पर काबू पाते हुए लक्ष्मी के धाराप्रवाह बोलने पर विराम लगाती हुई वह बोली, ‘‘अरे कुछ नहीं हुआ है. खेलते वक्त चोट लग गई होगी… दौड़ती भी तो कितनी तेज है,’’ कह कर सुधा ने लक्ष्मी को चुप करा दिया, पर उस के मन में शांति कहां थी…

कालेज से अवकाश प्राप्त कर लेने के बाद सुधा बिल्डिंग के बच्चों की मैथ्स और साइंस की कठिनाइयों को सुलझाने में मदद करती रही है. हिंदी में भी मदद कर उन्हें अचंभित कर देती है. किस के लिए कौन सी लाइन ठीक रहेगी. बच्चे ही नहीं उन के मातापिता भी उसी के निर्णय को मान्यता देते हैं. फिर रिचा तो उस की सब से होनहार विद्यार्थी है.

‘‘आंटी, मैं भी भैया लोगों की तरह कंप्यूटर इंजीनियर बनना चाहती हूं. उन की तरह आप मेरा मार्गदर्शन करेंगी न?’’

सुधा के हां कहते ही वह बच्चों की तरह उस के गले लग जाती थी. लक्ष्मी के जाते ही सारे कामों को जल्दी से निबटा कर वह अनामिका के पास गई. उस ने रिचा के बारे में जो कुछ भी बताया उसे सुन कर सुधा कांप उठी. कल सुबह रिचा अपने सहपाठियों के साथ पिकनिक मनाने गंगा पार गई थी. खानेपीने के बाद जब सभी गानेबजाने में लग गए तो वह गंगा किनारे घूमती हुई अपने साथियों से दूर निकल गई. बड़ी देर तक जब रिचा नहीं लौटी तो उस के साथी उसे ढूंढ़ने निकले. कुछ ही दूरी पर झाडि़यों की ओट में बेहोश रिचा को देख सभी के होश गुम हो गए. किसी तरह उसे नर्सिंगहोम में भरती करा कर उस के घर वालों को खबर की. घर वाले तुरंत नर्सिंगहोम पहुंचे.

अनामिका ने जो कुछ भी बताया उसे सुन कर सुधा स्तब्ध रह गई. अब वह असमंजस में थी कि वह रिचा को देखने जाए या नहीं. फिर अनमनी सी हो कर उस ने गाड़ी निकाली और नर्सिंगहोम चल पड़ी, जहां रिचा भरती थी. वहां पहुंच तो गई पर मारे आशंका के उस के कदम आगे बढ़ ही नहीं रहे थे. किसी तरह अपने पैरों को घिसटती हुई उस के वार्ड की ओर चल पड़ी. वहां पहुंचते ही रिचा के पिता से उस का सामना हुआ. इस हादसे ने रात भर में ही उन की उम्र को10 साल बढ़ा दिया था. उसे देखते ही वे रो पड़े तो सुधा भी अपने आंसुओं को नहीं रोक पाई. ऐसी घटनाएं पूरे परिवार को झुलसा देती हैं. बड़ी हिम्मत कर वह कमरे में अभी जा ही पाई थी कि रिचा की मां उस से लिपट कर बेतहासा रोने लगीं. पथराई आंखों से जैसे आंसू नहीं खून गिर रहा हो.

रिचा को नींद का इंजैक्शन दे कर सुला दिया गया था. उस के नुचे चेहरे को देखते ही सुधा ने आंखों से छलकते आंसुओं को पी लिया. फिर रिचा की मां अरुणा के हाथों को सहलाते हुए अपने धड़कते दिल पर काबू पाते हुए कल की दुर्घटना के बारे में पूछा, ‘‘क्या कहूं सुधा, कल घर से तो खुशीखुशी सभी के साथ निकली थी. हम ने भी नहीं रोका जब इतने बच्चे जा रहे हैं तो फिर डर किस बात का… गंगा के उस पार जाने की न जाने कब से उस की इच्छा थी. इतने बड़े सर्वनाश की कल्पना हम ने कभी नहीं की थी.’’

‘‘मैं अभी आई,’’ कह कर सुधा उस लेडी डाक्टर के पास गई, जो रिचा का इलाज कर रही थी. सुधा ने उन से आग्रह किया कि इस घटना की जानकारी वे किसी भी तरह मीडिया को न दें, क्योंकि इस से कुछ होगा नहीं, उलटे रिचा बदनाम हो जाएगी. फिर पुलिस के जो अधिकारी इस की घटना जांचपड़ताल कर रहे हैं, उन की जानकारी डाक्टर से लेते हुए सुधा उन से मिलने के लिए निकल गई. यह भी एक तरह से अच्छा संयोग रहा कि वे घर पर थे और उस से अच्छी तरह मिले. धैर्यपूर्वक उस की सारी बातें सुनीं वरना आज के समय में इतनी सज्जनता दुर्लभ है.

‘‘सर, हमारे समाज में बलात्कार पीडि़ता को बदनामी एवं जिल्लत की किनकिन गलियों से गुजरना पड़ता है, उस से तो आप वाकिफ ही होंगे… इतने बड़े शहर में किस की हैवानियत है यह, यह तो पता लगने से रहा… मान लीजिए अगर पता लग जाने पर अपराधी पकड़ा भी जाता है तो जरा सोचिए रिचा को क्या पहले वाला जीवन वापस मिल जाएगा? उसे जिल्लत और बदनामी के कटघरों में खड़ा कर के बारंबार मानसिक रूप से बलात्कार किया जाएगा, जो उस के जीवन को बद से बदतर कर देगा. कृपया इसे दुर्घटना का रूप दे कर इस केस को यहीं खारिज कर के उसे जीने का एक अवसर दीजिए.’’

सुधा की बातों की गहराई को समझते हुए पुलिस अधिकारी ने पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया. वहां से आश्वस्त हो कर सुधा फिर नर्सिंगहोम पहुंची और रिचा के परिवार से भी रोनाधोना बंद कर इस आघात से उबरने का आग्रह किया.

शायद रिचा को होश आ चुका था. सुधा की आवाज सुनते ही उस ने आंखें खोल दीं. किसी हलाल होते मेमने की तरह चीख कर वह सुधा से लिपट गई. सुधा ने किसी तरह स्वयं पर काबू पाते हुए रिचा को अपने सीने से लगा लिया. फिर उस की पीठ को सहलाते हुए कहा, ‘‘धैर्य रख मेरी बच्ची… जो हुआ उस से बुरा तो कुछ और हो ही नहीं सकता, लेकिन इस से जीवन समाप्त थोड़े हो जाता है? इस से उबरने के लिए तुम्हें बहुत बड़ी शक्ति की आवश्यकता है मेरी बच्ची… उसे यों बेहाल हो कर चीखने में जाया नहीं करना है… जितना रोओगी, चीखोगी, चिल्लाओगी उतना ही यह निर्दयी दुनिया तुम्हें रुलाएगी, व्यंग्यवाणों से तुझे बेध कर जीने नहीं देगी.’’

‘‘आंटी, मेरा मर जाना ठीक है… अब मैं किसी से भी नजरें नहीं मिला सकती… सारा दोष मेरा है. मैं गई ही क्यों? सभी मिल कर मुझ पर हसेंगे… मेरा शरीर इतना दूषित हो गया है कि इसे ढोते हुए मैं जिंदा नहीं रह सकती.’’

फिर चैकअप के लिए आई लेडी डाक्टर से गिड़गिड़ा कर कहने लगी, ‘‘जहर दे कर मुझे मार डालिए डाक्टर… इस गंदे शरीर के साथ मैं नहीं जी सकती. अगर आप ने मुझे मौत नहीं दी तो मैं इसे स्वयं समाप्त कर दूंगी,’’ रिचा पागल की तरह चीखती हुई बैड पर छटपटा रही थी.

‘‘ऐसा नहीं कहते… तुम ने बहुत बहादुरी से सामना किया है… मैं कहती हूं तुम्हें कुछ नहीं हुआ है,’’ डाक्टर की इस बात पर रिचा ने पथराई आंखों से उन्हें घूरा.बड़ी देर तक सुधा रिचा के पास बैठी उसे ऊंचनीच समझाते हुए दिलाशा देती रही लेकिन वह यों ही रोतीचिल्लाती रही. उसे नींद का इंजैक्शन दे कर सुलाना पड़ा. रिचा के सो जाने के बाद सुधा अरुण को हर तरह से समझाते हुए धैर्य से काम लेने को कहते हुए चली गई. किसी तरह ड्राइव कर के घर पहुंची. रास्ते भर वह रिचा के बारे में ही सोचती रही. घर पहुंचते ही वह सोफे पर ढेर हो गई. उस में इतनी भी ताकत नहीं थी कि वह अपने लिए कुछ कर सके.

रिचा के साथ घटी दुर्घटना ने उसे 5 दशक पीछे धकेल दिया. अतीत की सारी खिड़कियां1-1 कर खुलती चली गईं…

12 साल की अबोध सुधा के साथ कुछ ऐसा हुआ था कि वह तत्काल उम्र की अनगिनत दहलीजें फांद गई थी. कितनी उमंग एवं उत्साह के साथ वह अपनी मौसेरी बहन की शादी में गई थी. तब शादी की रस्मों में सारी रात गुजर जाती थी. उसे नींद आ रही थी तो उस की मां ने उसे कमरे में ले जा कर सुला दिया. अचानक नींद में ही उस का दम घुटने लगा तो उस की आंखें खुल गईं. अपने ऊपर किसी को देख उस ने चीखना चाहा पर चीख नहीं सकी. वह वहशी अपनी हथेली से उस के मुंह को दबा कर बड़ी निर्ममता से उसे क्षतविक्षत करता रहा.

अर्धबेहोशी की हालत में न जाने वह कितनी देर तक कराहती रही और फिर बेहोश हो गई. जब होश आया तो दर्द से सारा बदन टूट रहा था. बगल में बैठी मां पर उस की नजर पड़ी तो पिछले दिन आए उस तूफान को याद कर किसी तरह उठ कर मां से लिपट कर चीख पड़ी. मां ने उस के मुंह पर हाथ रख कर गले के अंदर ही उस की आवाज को रोक दिया और आंसुओं के समंदर को पीती रही. बेटी की बिदाई के बाद ही उस की मौसी उस के सर्वनाश की गाथा से अवगत हुई तो अपने माथे को पीट लिया. जब शक की उंगली उन की ननद के 18 वर्षीय बेटे की ओर उठी तो उन्होंने घबरा कर मां के पैर पकड़ लिए. उन्होंने भी मां को यही समझाया कि चुप रहना ही उस के भविष्य के लिए हितकर होगा.

हफ्ते भर बाद जब वह अपने घर लौटी तो बाबूजी के बारबार पूछने के बावजूद भी अपनी उदासी एवं डर का कारण उन्हें बताने का साहस नहीं कर सकी. हर पल नाचने, गाने, चहकने वाली सुधा कहीं खो गई थी. हमेशा डरीसहमी रहती थी.

आखिर उस की बड़ी बहन ने एक दिन पूछ ही लिया, ‘‘बताओ न मां, वहां सुधा के साथ हुआ क्या जो इस की ऐसी हालत हो गई है? आप हम से कुछ छिपा रही हैं?’’

सुधा उस समय बाथरूम में थी. अत: मां उस रात की हैवानियत की सारी व्यथा बताते हुए फूट पड़ी. बाहर का दरवाजा अंदर से बंद नहीं था. बाबूजी भैया के साथ बाजार से लौट आए थे. मां को इस का आभास तक नहीं हुआ. सारी वारदात से बाबूजी और भैया दोनों अवगत हो चुके थे और मारे क्रोध के दोनों लाल हो रहे थे. सब कुछ अपने तक छिपा कर रख लेने के लिए बाबूजी ने मां को बहुत धिक्कारा. सुधा बाथरूम से निकली तो बाबूजी ने उसे सीने से लगा लिया.

बलात्कार किसी एक के साथ होता है पर मानसिक रूप से इस जघन्य कुकृत्य का शिकार पूरा परिवार होता है. अपनी तेजस्विनी बेटी की बरबादी पर वे अंदर से टूट चुके थे, लेकिन उस के मनोबल को बनाए रखने का प्रयास करते रहे.

सुधा ने बाहर वालों से मिलना या कहीं जाना एकदम छोड़ दिया था. लेकिन पढ़ाई को अपना जनून बना लिया था. भौतिकशास्त्र में बीएसी औनर्स में टौप करने के 2 साल बाद एमएससी में जब उस ने टौप किया तो मारे खुशी के बाबूजी के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. 2 महीने बाद उसी यूनिवर्सिटी में लैक्चरर बन गई. सभी कुछ ठीक चल रहा था. लेकिन शादी से उस के इनकार ने बाबूजी को तोड़ दिया था. एक से बढ़ कर एक रिश्ते आ रहे थे, लेकिन सुधा शादी न करने के फैसले पर अटल रही. भैया और दीदी की शादी किसी तरह देख सकी अन्यथा किसी की बारात जाते देख कर उसे कंपकंपी होने लगती थी.

सुधा के लिए जैसा घरवर बाबूजी सोच रहे थे वे सारी बातें उन के परम दोस्त के बेटे रवि में थी. उस से शादी कर लेने में अपनी इच्छा जाहिर करते हुए वे गिड़गिड़ा उठे तो फिर सुधा मना नहीं कर सकी. खूब धूमधाम से उस की शादी हुई पर वह कई वर्षों बाद भी बच्चे का सुख रवि को दे सकी. वह तो रवि की महानता थी कि इतने दिनों तक उसे सहन करते रहे अन्यथा उन की जगह कोई और होता तो कब का खोटे सिक्के की तरह उसे मायके फेंक आया होता.

रवि के जरा सा स्पर्श करते ही मारे डर के उस का सारा बदन कांपने लगता था. उस की ऐसी हालत का सबब जब कहीं से भी नहीं जान सके तो मनोचिकित्सकों के पास उस का लंबा इलाज चला. तब कहीं जा कर वह सामान्य हो सकी थी. रवि कोई वेवकूफ नहीं थे जो कुछ नहीं समझते. बिना बताए ही उस के अतीत को वे जान चुके थे. यह बात और थी कि उन्होंने उस के जख्म को कुरेदने की कभी कोशिश नहीं की.

2 बेटों की मां बनी सुधा ने उन्हें इस तरह संस्कारित किया कि बड़े हो कर वे सदा ही मर्यादित रहे. अपने ढंग से उन की शादी की और समय के साथ 2 पोते एवं 2 पोतियों की दादी बनी.

जीवन से गुजरा वह दर्दनाक मोड़ भूले नहीं भूलता. अतीत भयावह समंदर में डूबतेउतराते वह 12 वर्षीय सुधा बन कर विलख उठी. मन ही मन उस ने एक निर्णय लिया, लेकिन आंसुओं को बहने दिया. दूसरे दिन रिचा की पसंद का खाना ले कर कुछ जल्दी ही नर्सिंगहोम जा पहुंची. समझाबुझा कर मनोज दंपती को घर भेज दिया. 2 दिन से वहीं बैठे बेटी की दशा देख कर पागल हो रहे थे. किसी से भी कुछ नहीं कहने को सुधा ने उन्हें हिदायत भी दे दी. फिर एक दृढ़ निश्चय के साथ रिचा के सिरहाने जा बैठी.

सुधा को देखते ही रिचा का प्रलाप शुरू हो गया, ‘‘अब मैं जीना नहीं चाहती. किसी को कैसे मुंह दिखाऊंगी?’’

सुधा ने उसे पुचकारते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे साथ जो कुछ भी हुआ वह कोई नई बात नहीं है. सदियों से स्त्रियां पुरुषों की आदम भूख की शिकार होती रही हैं और होती रहेंगी. कोई स्त्री दावे से कह तो दे कि जिंदगी में वह कभी यौनिक छेड़छाड़ की शिकार नहीं हुई है. अगर कोई कहती है तो वह झूठ होगा. यह पुरुष नाम का भयानक जीव तो अपनी आंखों से ही बलात्कार कर देता है. आज तुम्हें मैं अपने जीवन के उस भयानक सत्य से अवगत कराने जा रही हूं, जिस से आज तक मेरा परिवार अनजान है, जिसे सुन कर शायद तुम्हारी जिजिविषा जाग उठे,’’ कहते हुए सुधा ने रिचा के समक्ष अपने काले अतीत को खोल दिया. रिचा अवाक टकटकी बांधे सुधा को निहारती रह गई. उस के चेहरे पर अनेक रंग बिखर गए, बोली, ‘‘तो क्या आंटी मैं पहले जैसा जी सकूंगी?’’

‘‘एकदम मेरी बच्ची… ऐसी घटनाओं से हमारे सारे धार्मिक ग्रंथ भरे पड़े हैं… पुरुषों की बात कौन करे… अपना वंश चलाने के लिए स्वयं स्त्रियों ने स्त्रियों का बलात्कार करवाया है. कोई शरीर गंदा नहीं होता. जब इन सारे कुकर्मों के बाद भी पुरुषों का कौमार्य अक्षत रह जाता है तो फिर स्त्रियां क्यों जूठी हो जाती हैं.

‘‘इस दोहरी मानसिकता के बल पर ही तो धर्म और समाज स्त्रियों पर हर तरह का अत्याचार करता है. सारी वर्जनाएं केवल लड़कियों के लिए ही क्यों? लड़के छुट्टे सांड़ की तरह होेंगे तो ऐसी वारदातें होती रहेंगी. अगर हर मां अपने बेटों को संस्कारी बना कर रखे तो ऐसी घटनाएं समाज में घटित ही न हों. पापपुण्य के लेखेजोखे को छोड़ते हुए हमें आगे बढ़ कर समाज को ऐसी घृणित सोच को बदलने के लिए बाध्य करना है. जो हुआ उसे बुरा सपना समझ कर भूल जाओ और कल तुम यहां से अपने घर जा रही हो. सभी की नजरों का सामना इस तरह से करना है मानो कुछ भी अनिष्ट घटित नहीं हुआ है. देखो मैं ने कितनी खूबसूरती से जीवन जीया है.’’

रिचा के चेहरे पर जीवन की लाली बिखरते देख सुधा संतुष्ट हो उठी. उस के अंतर्मन में जमा वर्षों की असीम वेदना का हिम रिचा के चेहरे की लाली के ताप से पिघल कर आंखों में मचल रहा था. अतीत के गरल को उलीच कर वह भी तो फूल सी हलकी हो गई थी.

Social Issue : आबादी की भरमार बेरोजगारी अपार

Social Issue : बढ़ती आबादी भारत के लिहाज से तो और भी बेहद गंभीर मामला है. इस देश की लगातार बढ़ती आबादी देख कर तो यही लगता है कि अगर मैडल मिलने की प्रथा होती तो भारत की झोली में एक गोल्ड मैडल जरूर होता. सब से ज्यादा आबादी वाला देश बनने का गौरव हमारे भारत का सरताज ही होता.

भारत दुनिया में सब से ज्यादा आबादी वाला देश तो बन गया है, लेकिन यहां संसाधनों की बेहद कमी होती जा रही है. आज जिस भी जगह जाओ एक लंबी कतार लगी मिलती है. लगता है, मानो जहां हम जा रहे हैं, वहीं सब से ज्यादा भीड़ उमड़ जाती है, चाहे बात करें एयरपोर्ट की, रेलवे स्टेशन की, अस्पताल की, यहां तक कि घरों के आसपास लगने वाले बाजारों में भी ऐसा लगता है कि सारी जनता वहीं आ जाती है. जहां हम हैं. फोन काल से ले कर रोजगार के मौके तक हर जगह यही सुनने को मिलता है कि ‘कृपया प्रतीक्षा करें’, ‘असुविधा के लिए खेद है’, ‘आप लाइन में हैं’.

आज दुनिया की आबादी 8 अरब है, जबकि साल 1950 में दुनिया की आबादी 2.5 अरब थी. महज चंद दशकों में यह आंकड़ा कहां से कहां पहुंच गया है. अंदाजा है कि साल 2050 तक दुनियाभर की आबादी 10 अरब तक पहुंच जाएगी, जो दुनियाभर में शांति के लैवल को गंभीर चुनौती दे सकती है. वहीं अगर सिर्फ हमारे भारत में देखें, तो 142 करोड़ की आबादी है, जो हमें गंभीर श्रेणी में ले जाता है.

अगर दुनिया में क्षेत्रफल के नजरिए से भारत को देखें, तो यह 7वें पायदान पर है और दुनियाभर का सिर्फ
2.5 फीसदी क्षेत्रफल ही भारत के पास है, लेकिन यह आबादी के नजरिए से सब से पहले नंबर पर है.

एक अंदाजे के मुताबिक, भारत में एक वर्ग किलोमीटर में 438 लोग रहते हैं और बात करें अमेरिका की, तो वहां एक वर्ग किलोमीटर में कुल 37 लोग रहते हैं.

यहां हम तुलना कर सकते हैं कि बढ़ती आबादी के चलते जमीन की कमी आने वाले दिनों में और भी ज्यादा होने वाली है, वहीं बढ़ती आबादी को बुनियादी सुविधाएं जैसे घर, पीने का साफ पानी, दवाएं आदि मुहैया करा पाना सरकार के लिए भी चिंता की बात है.

लेकिन अगर हम सीख लें, तो बहुतकुछ बदल सकता है. भारत की तुलना दूसरे विकसित देशों से करें, तो दक्षिण कोरिया में 527, जापान में 347, सिंगापुर में 8,358, जरमनी में 233 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है, जो बहुत ज्यादा है, लेकिन इन देशों की कामयाबी के पीछे कई वजहें हैं, जैसे कि अच्छी विकास दर, अच्छा शासन, स्थिर व्यवस्था, उच्च शिक्षा व तकनीक कौशल आदि.

भारत में नौजवानों की भरमार है. ऐसे में रोजगार की नजर से देखें, तो इतनी बड़ी आबादी को कामकाजी बनाना सब से बड़ी चुनौती है. नौजवान पीढ़ी का होना हर देश की तरक्की का मूलभूत तरीका है. जिस देश में नौजवान ज्यादा होंगे, उस देश की तरक्की होना मुमकिन है, लेकिन तब जब नौजवान अपनी जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक होंगे.

लेकिन अगर यही नौजवान अपने दिन का ज्यादा से ज्यादा समय सोशल मीडिया पर बिताएंगे, तो कहां से कोई देश तरक्की कर सकेगा, बल्कि यही नौजवान देश की गरीबी की वजह बनेंगे, क्योंकि युवा पीढ़ी हर देश का भविष्य तय करती है.

रोजगार व आबादी के बीच तालमेल बिठाने के लिए कुछ बदलावों की जरूरत है. जरूरी है कि देश को पूंजी प्रधान न बना कर श्रम प्रधान बनाया जाए.

हमारे देश की बड़ी आबादी खेतीबारी पर निर्भर है, तो इस के लिए ज्यादा से ज्यादा काम किया जाए. रोजगार के मामले में सरकारी योजनाओं का हर नौजवान फायदा उठा सके, इस के लिए उसे आसान और कुशलता से कार्यक्रमों की मदद से जागरूक किया जाए.

विकसित देशों का इतिहास खंगालें, तो देश की आबादी या परिवार की तादाद अगर छोटी और पढ़ीलिखी हो, तो वह देश और परिवार ज्यादा तरक्की करता है और वहीं अगर बढ़ती आबादी किसी समुदाय की हो और वह संविधान के कायदेकानून के तहत व्यवस्थित नहीं है, तो उस देश में संसाधनों की लूट, भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी जैसी समस्याएं पैदा होने लगती हैं.

भारत के अच्छे भविष्य के लिए समय की मांग है कि आबादी के बढ़ने से बचने के लिए कड़े कानून बनाए जाएं और जिन का जनता हर हाल में पालन करे और देश की तरक्की में योगदान दे.

फूटती जवानी के डर और खुदकुशी की कसमसाहट

इसे जागरूकता की कमी कहें या फिर अनपढ़ता, लड़के हों या लड़कियां, एक उम्र आने पर उन के शरीर में कुछ बदलाव होते हैं और अगर ऐसे समय में सम?ादारी और सब्र का परिचय नहीं दिया जाए, तो जिंदगी में कुछ अनहोनी भी हो सकती है. ऐसे ही एक वाकिए में एक लड़की जब अपनी माहवारी के दर्द को सहन नहीं कर पाई और न ही अपनी मां को कुछ बता पाई, तो उस ने खुदकुशी का रास्ता चुन कर लिया.

यह घटना बताती है कि जवानी के आगाज का समय कितना ध्यान बरतने वाला होता है. ऐसे समय में कोई भी नौजवान भटक सकता है और मौत को गले लगा सकता है या फिर कोई ऐसी अनहोनी भी कर सकता है, जिस का खमियाजा उसे जिंदगीभर भुगतना पड़ सकता है. सबसे बड़ी बात यह है कि उस के बाद परिवार वाले अपनेआप को कभी माफ नहीं कर पाएंगे.

आज हम इस रिपोर्ट में ऐसे ही कुछ मामलों के साथ आप को और समाज को अलर्ट मोड पर लाने की कोशिश कर रहे हैं. एक बानगी :

* 14 साल की उम्र आतेआते जब सुधीर की मूंछें निकलने लगीं, तो वह चिंतित हो गया. उसे यह अच्छा नहीं लग रहा था कि उस के चेहरे पर ठीक नाक के नीचे मूंछें उगें और वह परेशान हो गया.

* 12 साल की उम्र में जब सोनाली को पहली दफा माहवारी हुई, तो वह घबरा गई. वह बड़ी परेशान हो रही थी. ऐसे में एक सहेली ने जब उसे इस के बारे में अच्छी तरह से बताया, तो उस के बाद ही वह सामान्य हो पाई.

* राजेश की जिंदगी में जैसे ही जवानी ने दस्तक दी, तो उसे ऐसेवैसे सपने आने लगे. वह सोच में पड़ गया कि यह क्या हो रहा है. बाद में एक वीडियो देख कर उसे सबकुछ सम?ा में आता चला गया.

* दरअसल, जिंदगी का यही सच है और सभी के साथ ऐसा समय या पल आते ही हैं. ऐसे में अगर कोई सब्र और सम?ादारी से काम न ले, तो वह मुसीबत में भी पड़ सकता है. लिहाजा, ऐसे

समय में आप को कतई शर्म नहीं करनी चाहिए और घबराना नहीं चाहिए, बल्कि इस दिशा में जागरूक होने की कोशिश करनी चाहिए.

आज सोशल मीडिया का जमाना है. आप दुनिया की हर एक बात को सम?ा सकते हैं और अपनी जिंदगी को सुंदर और सुखद बना सकते हैं. बस, आप को कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए, जो आप को नुकसान पहुंचा सकता हो.

डरी हुई लड़की की कहानी दरअसल, मुंबई से एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है. वहां के मालवणी इलाके में रहने वाली

14 साल की लड़की रजनी (बदला हुआ नाम) ने अपनी पहली माहवारी के दौरान दर्दनाक अनुभव के बाद कथिततौर पर खुदकुशी कर ली थी. जब तक परिवार वालों ने यह देखा और सम?ा, तब तक बड़ी देर हो चुकी थी. उस की लाश घर में लटकी हुई मिली थी.

यह हैरानपरेशान करने वाला मामला मलाड (पश्चिम) के मालवणी इलाके में हुआ था, जहां रहने वाली 14 साल की एक लड़की रजनी की लाश रात में अपने घर के अंदर लोहे के एक एंगल से लटकी हुई पाई गई थी.

पुलिस के मुताबिक, वह नाबालिग लड़की अपने परिवार के साथ गावदेवी मंदिर के पास लक्ष्मी चाल में रहती थी. कथिततौर पर वह किशोरी माहवारी के बारे में गलत जानकारी होने के चलते तनाव में रहती थी. ऐसा लगता है कि उसे सही समय पर सटीक जानकारी नहीं मिल पाई होगी, तभी तो माना जा रहा है कि उस ने यह कठोर कदम उठा लिया होगा.

पुलिस के मुताबिक, देर शाम को जब घर में कोई नहीं था, तो उस लड़की ने खुदकुशी कर ली. जब परिवार वालों और पड़ोसियों को इस कांड के बारे में पता चला, तो वे उसे कांदिवली के सरकारी अस्पताल में ले गए, जहां डाक्टरों ने उसे मरा हुआ बता दिया.

मामले की जांच कर रहे एक पुलिस अफसर ने कहा, ‘‘शुरुआती पूछताछ के दौरान लड़की के रिश्तेदारों ने बताया कि लड़की को हाल ही में पहली बार माहवारी आने के बाद दर्दनाक अनुभव हुआ था. इसे ले कर वह काफी परेशान थी और मानसिक तनाव में थी, इसलिए हो सकता है कि उस ने इस वजह से अपनी जान दे दी हो.’’

कुलमिला कर कह सकते हैं कि अगर उस लड़की को सही समय पर सही सलाह मिल जाती तो पक्का है कि वह खुदकुशी करने जैसा कड़ा कदम कभी नहीं उठाती. मांबाप को भी चाहिए कि ऐसे समय में वे बच्चों को सही सलाह दें या फिर उन्हें किसी माहिर डाक्टर के पास ले जाएं.

धर्म की बेड़ियों में फंसी औरत

सभी धर्मों, धार्मिक ग्रन्थों और वेदों में, स्त्री के रूप और व्यवहार की जो चर्चा की गई है वह औरत की व्यथा का बयान ही है. कोई भी धर्म महिलाओं के प्रति संवेदनशील नहीं रहा है, तो क्यों कर हम इन धार्मिक पाखंडों का लबादा ओढ़े रखें. अब हम उन धार्मिक नारियों (सीता, द्रौपदी, सावित्री, मेनका आदि) को अपना रोल मौडल मानने से भी इनकार करते हैं जो आजीवन मूक और बधिर बनी रहीं क्योंकि उन्होंने अशिक्षा के कारण पंडों की नजर से देखा, पर आज की महिलाएं शिक्षित हैं, तो अपना भलाबुरा धर्म और इन पंडों की नजरों से क्यों देखें. अपना भलाबुरा पहचानने की हम में अब समझ भी है और परखने की हिम्मत और हौसला भी है.

‘धर्म की बेड़ियां खोल रही है औरत’ पुस्तक में अस्मिता के इन्हीं उद्देश्यों के अनुसार ही धर्म में स्त्री की छवि को दर्शाते हुए उसे धार्मिक आडंबरों से बाहर लाने की कोशिश शब्दों द्वारा की गई है. हमेशा औरत को धर्म का अनुगमन करने पर क्यों विवश किया जाता है. वह आज इस धर्म का पल्ला छोड़ना चाहती है तो ये पंडे, पुजारी, मौलवी क्यों उसे उसी ओर धकेलते हैं. समाज में स्त्री की इस दुर्दशा का कारण धर्म ही है.

इस पुस्तक में पौराणिक और साहित्यिक कथाओं के स्त्रियोचित व्यवहार और विशेष रूप से स्त्रीप्रधान चरित्रों को उजागर करने की संकल्पना की है, जिस से नारी जीवन में प्रेरणा और एक नई सोच की नियति पैदा होती है.

आधुनिक नारी की परिभाषा देते हुए नीलम आधुनिक नारी के विचारों को इस तरह बयां करती हैं : ‘रामायण व महाभारत की स्तुति सैकड़ों वर्षों से इस समाज में इसलिए हो रही है कि स्त्रियां द्रौपदी, गांधारी बनी आंसू बहाती रहें, इन पुरुषों की सत्ता ऐसे ही निर्बाध बनी रहे.’ फिर लड़कियों के स्वर को ऊंचा करती हैं, ‘हमें अपने ये रोल मौडल स्वीकार्य नहीं हैं.’

धर्मों की बात करते हुए हिंदू धर्म में सब से पहले वर्णन सीता का आता है. इस पर डा. उमा देशपांडे सीता को जहां अमर्यादित पुरुष राम की पत्नी बताती हैं वहीं उर्मिला को मौन व खोखली सामाजिक मान्यता का दर्जा डा. नलिनी पुरोहित अपनी कविता ‘उर्मिला का टूटता मौन’ में देती हैं.

इसी तरह हिंदू धर्म की अन्य नारियों जैसे द्रौपदी, सावित्री, सती, तारामती, कुंती, गांधारी, मेनका आदि के उदाहरणों से भी नारी के चरित्र का तार्किक चित्रण उकेरा गया है. इस बात की स्पष्टता इन शब्दों में झलकती है :

‘‘क्यों रहूं घेरे में बंद खींची गई लक्ष्मण रेखा के मध्य मैं भी हूं मजबूत इतनी कि खींच सकती हूं रेखा किसी को रखने के लिए.’’

नीलम कुलश्रेष्ठ (संपादक) अपनी कथा ‘सति इतिकथा’ में सती को चरितार्थ करती हैं कि क्या सती अपने लंबे सुहाग के लिए ही सबकुछ नहीं कर रही थी, तो उस में इस का ही भला निहित था? लेकिन यह भी गलत नहीं है कि धर्मगुरुओं ने ही पति को श्रेष्ठ मानने के लिए एक स्त्री को आमादा किया है और यही धर्मगुरु एक स्त्री के साए से भी घृणा करते हैं. यह स्पष्ट है नीलम के ही आलेख ‘स्वामीनारायण धर्म की शिक्षापत्री और स्त्री’ के शब्दों में :

‘‘स्वामीनारायण धर्म के धार्मिक गुरुओं की संकीर्ण मानसिकता का परिचय मुझे तब मिला जब एक विवाह समारोह में हम स्त्रियों से यह कहा गया कि हम सब स्टेज की तरफ जाने वाले रास्ते की तरफ से मुंह फेर कर खड़ी हो जाएं क्योंकि वरपक्ष के स्वामीनारायण मत के गुरु वरवधू को आशीर्वाद देने आ रहे हैं.’’

स्त्री से इतनी घृणा करने वाले ये धर्मगुरु किस प्रकार समाज का भला कर सकते हैं क्योंकि स्त्री भी समाज का ही एक हिस्सा है. इस पर ये धर्मगुरु भी इन धार्मिक ग्रंथों को गलत मानते हैं. ‘क्या धर्म का प्रचार जरूरी है’ आलेख में गीताबेन शाह के शब्द भी यही स्वीकारते हैं, ‘रामायण, महाभारत व गीता सब राजनीति ही है. यदि हम राम व कृष्ण को भगवान का अवतार मानते हैं तो उन्होंने भी तो राजकुटुंब में जन्म लिया था, किसी राजकुटुंब का काम राजनीति के बिना चल नहीं सकता तो धर्म व राजनीति अलग कहां हुए?’

स्वामीनारायण धर्म की शिक्षापत्री में तो विधवा स्त्री को संक्रामक रोग का दर्जा दिया जाता है तो इस धर्म का लोग, खासकर औरतें क्यों अनुगमन करें.

हर धर्म में स्त्री की तुलना या तो जानवर से की गई है या फिर किसी रोग से. और यह दर्जा देने वाले ये धार्मिक गुरु इन्हीं महिलाओं के कंधों पर धर्म की बंदूक रख कर चला रहे हैं. इन धर्मग्रंथों में अपनी इतनी बुरी स्थिति पाते हुए भी महिलाएं अभी तक क्यों धर्म के भंवर में फंसी हुई हैं? यह सवाल बारबार जेहन को मथता है. अगर इस भंवर से औरतें निकलना चाहती हैं तो सब से पहले खुद को अबला कहना व समझना छोड़ें और फिर अबला बनाने वाले इन पंडों- मौलवियों को इस समाज से बहिष्कृत करें.

इस पुस्तक में कई जगह पर ऐसे धार्मिक पहलुओं पर प्रश्नचिह्न लगाए गए हैं, जिन से धर्म में स्त्री की क्षतविक्षत दशा का बोध होता है. पुस्तक में खास बात यह भी है कि इस में सभी कुछ (एक कविता को छोड़ कर) स्त्रियों द्वारा ही लिखा गया है. ऐसे में एक पुरुष (कार्तिक साराभाई) का अपनी कविता के माध्यम से पुरुषों पर ही आक्षेप सचमुच सराहनीय है. साथ ही इस में मल्लिका साराभाई, किरण बेदी, मृदुला गर्ग, उमा देशपांडे जैसी हस्तियों ने अपने शाब्दिक हस्ताक्षर दे कर इसे और भी सशक्त बना दिया है.

फूटती जवानी के डर और खुदकुशी की कसमसाहट

इसे जागरूकता की कमी कहें या फिर अनपढ़ता, लड़के हों या लड़कियां एक उम्र आने पर उन के शरीर में कुछ बदलाव होते हैं और अगर ऐसे समय में समझदारी और सब्र का परिचय नहीं दिया जाए, तो जिंदगी में कुछ अनहोनी भी हो सकती है. ऐसे ही एक वाकिए में एक लड़की जब अपनी माहवारी के दर्द को सहन नहीं कर पाई और न ही अपनी मां को कुछ बता पाई, तो उस ने खुदकुशी का रास्ता चुन कर लिया.

यह घटना बताती है कि जवानी के आगाज का समय कितना ध्यान बरतने वाला होता है. ऐसे समय में कोई भी नौजवान भटक सकता है और मौत को गले लगा सकता है या फिर कोई ऐसी अनहोनी भी कर सकता है, जिस का खमियाजा उसे जिंदगीभर भुगतना पड़ सकता है. सब से बड़ी बात यह है कि उस के बाद परिवार वाले अपनेआप को कभी माफ नहीं कर पाएंगे.

आज हम इस रिपोर्ट में ऐसे ही कुछ मामलों के साथ आप को और समाज को अलर्ट मोड पर लाने की कोशिश कर रहे हैं. एक बानगी :

-14 साल की उम्र आतेआते जब सुधीर की मूंछ निकलने लगी, तो वह चिंतित हो गया. उसे यह अच्छा नहीं लग रहा था कि उस के चेहरे पर ठीक नाक के नीचे मूंछ उगे और वह परेशान हो गया.

-12 साल की उम्र में जब सोनाली को पहली दफा माहवारी हुई, तो वह घबरा गई. वह बड़ी परेशान हो रही थी. ऐसे में एक सहेली ने जब उसे इस के बारे में अच्छी तरह से बताया, तो उस के ही बाद वह सामान्य हो पाई.

-राजेश की जिंदगी में जैसे ही जवानी ने दस्तक दी, तो उसे ऐसेवैसे सपने आने लगे. वह सोच में पड़ गया कि यह क्या हो रहा है. बाद में एक वीडियो देख कर उसे सबकुछ समझ में आता चला गया.

दरअसल, जिंदगी का यही सच है और सभी के साथ ऐसा समय या पल आते ही हैं. ऐसे में अगर कोई सब्र और समझदारी से काम न ले, तो वह मुसीबत में भी पड़ सकता है. लिहाजा, ऐसे समय में आप को कतई शर्म नहीं करनी चाहिए और घबराना नहीं चाहिए, बल्कि इस दिशा में जागरूक होने की कोशिश करनी चाहिए.

आज सोशल मीडिया का जमाना है. आप दुनिया की हर एक बात को समझ सकते हैं और अपनी जिंदगी को सुंदर और सुखद बना सकते हैं. बस, आप को कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए, जो आप को नुकसान पहुंचा सकता हो.

डरी हुई लड़की की कहानी

दरअसल, मुंबई से एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है. मुंबई के मालवणी इलाके में रहने वाली 14 साल की लड़की रजनी (बदला हुआ नाम) ने अपनी पहली माहवारी के दौरान दर्दनाक अनुभव के बाद कथिततौर पर खुदकुशी कर ली थी. जब तक परिवार वालों ने यह देखा और समझा, तब तक बड़ी देर हो चुकी थी. उस की लाश घर में लटकी हुई मिली थी.

यह हैरानपरेशान करने वाला मामला मलाड (पश्चिम) के मालवणी इलाके में हुआ था, जहां रहने वाली 14 साल की एक लड़की रजनी की लाश रात में अपने घर के अंदर लोहे के एक एंगल से लटकी हुई पाई गई थी.

पुलिस के मुताबिक, वह नाबालिग लड़की अपने परिवार के साथ गावदेवी मंदिर के पास लक्ष्मी चाल में रहती थी. कथिततौर पर वह किशोरी माहवारी के बारे में गलत जानकारी होने के चलते तनाव में रहती थी. ऐसा लगता है कि उसे सही समय पर सटीक जानकारी नहीं मिल पाई होगी, तभी तो माना जा रहा है कि उस ने यह कठोर कदम उठा लिया होगा.

पुलिस के मुताबिक, देर शाम में जब घर में कोई नहीं था, तो उस लड़की ने खुदकुशी कर ली. जब परिवार वालों और पड़ोसियों को इस कांड के बारे में पता चला, तो वे उसे कांदिवली के सरकारी अस्पताल में ले गए, जहां डाक्टरों ने लड़की को मरा हुआ बता दिया.

मामले की जांच कर रहे एक पुलिस अफसर ने कहा, “शुरुआती पूछताछ के दौरान लड़की के रिश्तेदारों ने बताया कि लड़की को हाल ही में पहली बार माहवारी आने के बाद दर्दनाक अनुभव हुआ था. इसे ले कर वह काफी परेशान थी और मानसिक तनाव में थी, इसलिए हो सकता है कि उस ने इस वजह से अपनी जान दे दी हो.”

कुलमिला कह सकते हैं कि अगर उस लड़की को सही समय पर सही सलाह मिल जाती, तो पक्का है कि वह खुदकुशी करने जैसा कड़ा कदम कभी नहीं उठाती. मांबाप को भी चाहिए कि ऐसे समय में वे बच्चों को सही सलाह दें या फिर उन्हें किसी माहिर डाक्टर के पास ले जाएं.

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