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Social Issue : स्कूल ठीक करो घबराई सत्ता

Social Issue. सरकारी स्कूलों की बदहाली दिखाने निकले कौकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के कार्यकर्ताओं के सामने खड़े हुए प्रतिबंध, विरोध और एफआईआर के सवाल. पर सरकारी स्कूल किसी मंत्री, विधायक या अफसर की निजी जागीर नहीं होते. वे जनता के पैसे से चलते हैं और उन में पढ़ने वाले बच्चे भी किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं हैं, इसलिए जब कोई संगठन सरकारी स्कूलों के हालात देखने और उन की कमियों को जनता के सामने लाने निकालता है.

तो पहला सवाल यह नहीं होना चाहिए कि वह संगठन स्कूल में क्यों गया? पहला सवाल यह होना चाहिए कि आखिर सरकारी स्कूलों की हालत ऐसी क्यों है कि उन्हें देखने और दिखाने को ले कर सरकार और सामाजिक संगठनों के बीच टकराव सा पैदा हो गया है?

राजस्थान में कौकरोच जनता पार्टी के ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान ने इसी सवाल को बहस के केंद्र में ला दिया है. अभियान की घोषणा के बाद सरकारी स्कूलों की इमारतों, बुनियादी सुविधाओं, बच्चों की पढ़ाई और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवाल सोशल मीडिया पर सामने आने लगे.

इसी बीच 16 अगस्त 2026 को राजस्थान के माध्यमिक शिक्षा निदेशालय की ओर से सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश, फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, इंटरव्यू, आडियो रिकौर्डिंग और लाइव स्ट्रीमिंग को ले कर निर्देश जारी किए गए.

आदेश के मुताबिक बिना पहले से ली गई इजाजत के बैगर कोई बाहरी शख्स स्कूल में एंट्री नहीं कर सकता और स्कूल परिसर में फोटो या वीडियो बनाने जैसी गतिविधियों के लिए भी इजाजत लेना जरूरी है.

सरकार का मानना है कि इन निर्देशों का मकसद किसी राजनीतिक अभियान को रोकना नहीं, बल्कि स्कूलों में पढ़ने वाले नाबालिग बच्चों की सुरक्षा, गरिमा और निजता सुनिश्चित करना है. यानी मातापिता के स्थान पर स्कूल की जिम्मेदारी का सिद्धांत भी इसी संदर्भ में सामने रखा गया है. बच्चों की तसवीरें, वीडियो, आवाज और निजी जानकारी बिना इजाजत सार्वजनिक न हो, यह चिंता निश्चित रूप से गंभीर है.

किसी सामाजिक अभियान या मीडिया संगठन को भी यह हक नहीं मिल सकता कि वह बच्चों को अपनी प्रचार सामग्री का हिस्सा बना दे. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. असली सवाल यहीं से शुरू होता है.

बच्चों की निजता या स्कूलों की ट्रांसपेरेंसी

बच्चों की निजता की हिफाजत जरूरी है, लेकिन क्या बच्चों की निजता और सरकारी स्कूलों की ट्रांसपेरेंसी को एकदूसरे के सामने खड़ा किया जा सकता है? क्या किसी बच्चे का चेहरा दिखाए बिना स्कूल की जर्जर इमारत की तसवीर नहीं

ली जा सकती? क्या छात्र की पहचान छिपा कर खराब शौचालय, टूटी खिड़की, पानी की समस्या या खाली पड़ी क्लास की हकीकत सामने नहीं लाई जा सकती? क्या किसी विद्यार्थी की निजी जानकारी सार्वजनिक किए बिना सरकारी स्कूल की व्यवस्थागत कमियों पर सवाल नहीं उठाए जा सकते?

बिलकुल उठाए जा सकते हैं. यही वजह है कि सरकारी आदेश को ले कर राजनीतिक बहस पैदा हुई है. सीजेपी का आरोप है कि ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान के जरिए सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति सामने लाने की कोशिश की जा रही थी और उसी दौरान बाहरी लोगों के प्रवेश और रिकौर्डिंग को ले कर कड़े निर्देश जारी कर दिए गए.

सरकार का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा और निजता सर्वोच्च प्राथमिकता है. दोनों पक्षों के इन दावों के बीच असली सवाल ट्रांसपेरेंसी का है.

सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा केवल शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी नहीं है. वह उस समाज का बच्चा है जिस के टैक्स और सार्वजनिक धन से स्कूल की इमारत बनी है, शिक्षकों का वेतन आता है, किताबें खरीदी जाती हैं और योजनाएं चलती हैं. अगर स्कूल में पीने का पानी नहीं है, शौचालय खराब है, भवन जर्जर है, शिक्षक कम हैं या बच्चों को जरूरी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं, तो समाज को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि समस्या कहां है और उस के समाधान की जिम्मेदारी किस की है.

यही वह जगह है जहां ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान और सरकार के बीच असली टकराव दिखाई देता है.

आदेश का समय भी बना सवाल

16 अगस्त का आदेश इसलिए भी चर्चा में आया, क्योंकि इस का समय सीजेपी के ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान से जुड़ गया. अभियान के समर्थकों ने इसे सरकारी स्कूलों की निगरानी रोकने की कोशिश के रूप में देखा. दूसरी ओर सरकार ने इसे बच्चों की सुरक्षा और स्कूल परिसर की गरिमा से जुड़ा प्रशासनिक फैसला बताया.

यहीं राजनीति ने भी अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया. सीजेपी की ओर से सरकार पर सवाल उठाए गए और शिक्षा व्यवस्था की असली हालात सामने लाने की बात कही गई.

दूसरी ओर शिक्षा मंत्री मदन दिलावर की ओर से अभियान और स्कूलों में बिना अनुमति पहुंचने को ले कर विरोधात्मक बयान सामने आए. सरकार की तरफ से यह तर्क रखा गया कि स्कूल कोई सार्वजनिक प्रदर्शन स्थल नहीं हैं और नाबालिग बच्चों के बीच किसी भी बाहरी व्यक्ति की गतिविधि नियमों के दायरे में होनी चाहिए.

बात का एक हिस्सा सही है. स्कूल में अनुशासन होना चाहिए. बच्चों की निजता सुरक्षित रहनी चाहिए. शिक्षकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार होना चाहिए. लेकिन सत्ता के सामने दूसरा सवाल भी उतनी ही मजबूती से खड़ा होता है. अगर नियम बच्चों की सुरक्षा के लिए हैं तो उन का इस्तेमाल स्कूल की कमियों को छिपाने के लिए नहीं होना चाहिए, क्योंकि कैमरा किसी बच्चे की निजता में घुस सकता है, लेकिन कैमरा किसी सरकारी स्कूल की टूटी दीवार, खराब शौचालय या खाली कक्षा को भी दिखा सकता है, इसलिए कैमरे को पूरी तरह समस्या मान लेना भी सही नहीं है.

स्कूल किस के हैं

यह सवाल जितना सरल है, उतना ही असहज भी. सरकारी स्कूल किस के हैं? सरकार के? शिक्षा विभाग के? मंत्री के? अधिकारी के? नहीं. वे जनता के हैं.

सरकार उन का संचालन करती है, लेकिन वे जनता की सार्वजनिक व्यवस्था का हिस्सा हैं, इसलिए जनता से यह कहना कि स्कूल के भीतर क्या हो रहा है, यह जानने की जरूरत नहीं, लोकतांत्रिक जवाबदेही की भावना से मेल नहीं खाता.

हां, स्कूल में प्रवेश के नियम होने चाहिए. विजिटर रजिस्टर होना चाहिए. बाहरी आदमी की पहचान दर्ज होनी चाहिए. बच्चों की तसवीर और निजी जानकारी के लिए सुरक्षा प्रोटोकौल होना चाहिए. लेकिन इस के साथ यह व्यवस्था भी होनी चाहिए कि पत्रकार, सामाजिक संगठन और नागरिक समूह जब किसी सार्वजनिक हित के मुद्दे की जांच करना चाहें तो उन के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और समयबद्ध अनुमति प्रक्रिया उपलब्ध हो.

अगर अनुमति मांगने वाला आदमी लंबे समय तक अनुमति का इंतजार करता रहे तो निगरानी का अधिकार केवल कागज पर रह जाएगा. और अगर अनुमति देने या रोकने का पूरा अधिकार उसी स्थानीय व्यवस्था के हाथ में हो जिस की जांच की जानी है, तो निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.

यही वह बिंदु है जहां सीजेपी समर्थकों और सरकार के आलोचकों का सवाल मजबूत होता है. उन का कहना है कि अगर सरकार को अपने स्कूलों की व्यवस्था पर पूरा भरोसा है तो उसे स्वतंत्र सामाजिक निगरानी से घबराने के बजाय ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिस में स्कूल की कमियों और उपलब्धियों दोनों को निष्पक्ष रूप से सामने आने दिया जाए.

जब स्कूल देखने पहुंची टीम और हो गया विवाद

इस पूरे विवाद ने उस समय और गंभीर रूप ले लिया जब जयपुर के बगरू क्षेत्र के रामपुराकंवरपुरा गांव में सीजेपी की टीम के स्कूल दौरे को ले कर विवाद सामने आया. उन की ओर से कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट और वाहनों में तोड़फोड़ के आरोप लगाए गए. मामले में पुलिस कार्रवाई और एफआईआर की बात सामने आई.

यह घटना बताती है कि स्कूलों की बदहाली का सवाल अब केवल शिक्षा विभाग की फाइलों तक सीमित नहीं रहा. वह राजनीतिक टकराव का विषय बन चुका है.

जब तक सरकारी स्कूल की समस्या किसी फाइल में बंद रहती है, तब तक वह सिर्फ एक आंकड़ा होती है. लेकिन जब उस की तसवीर सामने आती है, अभिभावक सवाल पूछते हैं और कोई संगठन उस समस्या को ले कर अभियान खड़ा करता है, तब वह राजनीतिक सवाल बन जाती है. सीजेपी ने इसी सवाल को जनता के बीच पहुंचाने की कोशिश की है.

अगर सीजेपी के कार्यकर्ताओं ने किसी नियम का उल्लंघन किया था तो प्रशासन के पास उन्हें रोकने के लिए कानूनी रास्ता मौजूद था. पुलिस को बुलाया जा सकता था. शिकायत दर्ज की जा सकती थी. जांच हो सकती थी. पर किसी भी सामाजिक अभियान से जुड़े लोगों के साथ हिंसा लोकतांत्रिक व्यवस्था का विकल्प नहीं हो सकती.

किसी स्कूल की समस्या पर

बहस हो सकती है. किसी संगठन की कार्यशैली पर सवाल उठ सकता है. लेकिन लाठी और भीड़ किसी समस्या का समाधान नहीं है.

सवाल पूछने वाले को अपराधी मत बनाइए

लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना अपराध नहीं है. किसी स्कूल की हालत देखना अपराध नहीं है. किसी स्कूल में टीचर की कमी पर सवाल उठाना अपराध नहीं है. बच्चों के लिए पानी और शौचालय मांगना अपराध नहीं है. सरकारी भवन की हालत पर सवाल उठाना अपराध नहीं है.

अपराध तब होगा जब कोई कानून तोड़ेगा, बच्चों को नुकसान पहुंचाएगा, उन की निजता भंग करेगा या हिंसा करेगा. लेकिन सवाल पूछने और अपराध करने के बीच फर्क करना जरूरी है.

अगर सीजेपी के किसी कार्यकर्ता ने कानून तोड़ा है तो कानून अपना काम करे. लेकिन केवल इसलिए कि वह सरकार की आलोचना करता है, उसे शक की नजर से देखना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत होगा.

गैरभाजपा राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के लिए भी यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज सवाल सीजेपी का है, कल किसी और संगठन का हो सकता है. आज किसी सीजेपी कार्यकर्ता को स्कूल के गेट पर रोका जा रहा है,

कल किसी पत्रकार को रोका जा सकता है, किसी अभिभावक को रोका जा सकता है या किसी सामाजिक संगठन को.

इसलिए यह लड़ाई केवल एक संगठन की नहीं है. यह नागरिक अधिकारों और सरकारी जवाबदेही का सवाल है.

शिक्षा मंत्री के बयान और बढ़ती बहस

शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने स्कूलों में बाहरी लोगों की गतिविधियों को ले कर विरोध जताया है और बच्चों की सुरक्षा तथा पढ़ाई में व्यवधान का मुद्दा उठाया है. मंत्री की चिंता को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता. स्कूल में अनुशासन होना चाहिए. बच्चों की निजता सुरक्षित रहनी चाहिए. शिक्षकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार होना चाहिए.

लेकिन मंत्री की जिम्मेदारी केवल यह बताना नहीं है कि कौन स्कूल में नहीं आ सकता. उन की जिम्मेदारी यह भी है कि जनता को बताया जाए कि स्कूलों में क्या हो रहा है. कितने स्कूलों में टीचर कम हैं? कितने भवन जर्जर हैं? कितने स्कूलों में पेयजल की समस्या है? कितने शौचालय खराब हैं? कितने स्कूलों में मरम्मत की जरूरत है? कितने स्कूलों में बच्चों के बैठने के लिए फर्नीचर नहीं है?

इन सवालों का जवाब देना शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी है. अगर विभाग ये आंकड़े सार्वजनिक कर दे तो सीजेपी का अभियान खुद तथ्यों की कसौटी पर आ जाएगा. तथ्य सामने होंगे तो राजनीतिक आरोपों की जगह तथ्य ले लेंगे. लेकिन अगर तथ्य सार्वजनिक नहीं होंगे तो सोशल मीडिया पर अफवाह और राजनीतिक आरोप दोनों बढ़ेंगे.

बच्चों की निजता जरूरी है, लेकिन बच्चों का भविष्य भी. यहां सरकार के तर्क को भी पूरी तरह खारिज करना गलत होगा.

बच्चों की निजता महत्वपूर्ण है. किसी बच्चे का चेहरा बिना अनुमति सोशल मीडिया पर डालना गलत है. किसी बच्ची की निजी समस्या को वायरल करना गलत है. बच्चों के इंटरव्यू ले कर राजनीतिक प्रचार में इस्तेमाल करना गलत है. लेकिन बच्चों का भविष्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

अगर बच्चा जर्जर भवन में पढ़ रहा है तो उस की सुरक्षा का क्या? अगर स्कूल में शिक्षक नहीं है तो उसकी शिक्षा की सुरक्षा कौन करेगा? अगर स्कूल में पानी नहीं है तो उस के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी कौन लेगा? अगर शौचालय नहीं है तो उस की गरिमा की रक्षा कौन करेगा? इसलिए बच्चों की निजता के नाम पर स्कूल की बुनियादी समस्याओं को छिपाना भी बच्चों के हित में नहीं हो सकता.

बच्चों की तस्वीर मत दिखाइए. लेकिन बच्चों की समस्या तो दिखाइए. यही संतुलन होना चाहिए.

सत्ता को एक काम करना चाहिए

सरकार चाहे तो इस पूरे विवाद को एक  झटके में खत्म कर सकती है. राजस्थान के सभी सरकारी स्कूलों का सोशल आडिट कराइए. उस की रिपोर्ट सार्वजनिक कीजिए. स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं का औनलाइन डाटा सार्वजनिक कीजिए.

हर स्कूल के लिए शिकायत और निरीक्षण का ट्रांसपेरेंट सिस्टम बनाइए. पत्रकारों और सामाजिक संगठनों के लिए समयबद्ध अनुमति प्रणाली बनाइए. बच्चों की निजता की सुरक्षा के लिए स्पष्ट नियम बनाइए. और फिर सीजेपी से कहिए, आइए, हमारे स्कूल देखिए.

अगर सरकार यह कर देती है तो पूरा विवाद ही बदल जाएगा, क्योंकि तब सवाल यह नहीं रहेगा कि सीजेपी स्कूल में घुसी या नहीं. सवाल यह होगा कि सरकार ने स्कूल कितना ठीक किया. और यही असली इम्तिहान है.

एफआईआर से स्कूल ठीक नहीं होते

किसी कार्यकर्ता पर एफआईआर हो सकती है. किसी नेता पर मुकदमा हो सकता है. किसी संगठन पर आरोप लग सकते हैं. लेकिन इस से स्कूल नहीं सुधरता. स्कूल तब सुधरता है जब बजट खर्च होता है, टीचर होते हैं, भवन की मरम्मत होती है, पानी आता है, शौचालय साफ होते हैं और बच्चों को पढ़ने का सुरक्षित माहौल मिलता है.

इसलिए ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान का जवाब एफआईआर नहीं होना चाहिए. इस का जवाब होना चाहिए, स्कूल ठीक कर दिया गया है.

यही जवाब सत्ता की ताकत दिखाएगा. यही जवाब जनता का भरोसा बढ़ाएगा. और यही जवाब सीजेपी जैसे अभियानों की जरूरत भी कम करेगा.

कैमरे से नहीं, सवाल से डरना चाहिए

‘स्कूल ठीक करो’ अभियान ने सरकार के सामने एक असहज सवाल खड़ा किया है. क्या सरकारी स्कूलों की हालत को ले कर जनता की अपनी निगरानी की कोई जगह है?

सरकार इस सवाल का जवाब केवल राजनीतिक बयान से नहीं दे सकती. उसे व्यवस्था बनानी होगी. अगर सरकारी स्कूल सचमुच बेहतर हैं तो उन्हें दिखाने में डर कैसा? अगर स्कूलों में सभी सुविधाएं हैं तो सोशल आडिट से डर क्यों? अगर शिक्षा विभाग का निरीक्षण मजबूत है तो नागरिक निगरानी से परेशानी क्यों? अगर सीजेपी गलत दावे कर रही है तो सरकार तथ्य सामने क्यों नहीं रखती? और अगर कहीं स्कूल सचमुच बदहाल हैं, तो उसे स्वीकार कर ठीक करने में शर्म कैसी?

सत्ता का काम आलोचना को खत्म करना नहीं है. सत्ता का काम आलोचना की जरूरत खत्म करना है. जब स्कूल इतने अच्छे हो जाएं कि कोई भी सीजेपी कार्यकर्ता वहां जा कर कहे कि यह स्कूल सचमुच ठीक है, तब ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान अपने आप कमजोर पड़ जाएगा.

लेकिन अगर स्कूल की हालत खराब है और सवाल पूछने वालों को ही रोका जाता है तो सवाल और मजबूत होगा, क्योंकि लोकतंत्र में आवाज रोकने से सवाल खत्म नहीं होते, वे और दूर तक जाते हैं.

आखिर डर किस बात का है

सवाल आखिर वही है. अगर राजस्थान के सरकारी स्कूल शानदार हैं तो कैमरे से डर क्यों? अगर स्कूलों में सभी सुविधाएं हैं तो सोशल औडिट से डर क्यों? अगर सरकारी निरीक्षण व्यवस्था मजबूत है तो नागरिक निगरानी से परेशानी क्यों?

अगर सीजेपी गलत दावे कर रही है तो सरकार तथ्यों के साथ जवाब क्यों नहीं देती? और अगर स्कूल सचमुच बदहाल हैं तो उसे स्वीकार कर ठीक करने में शर्म कैसी?

सरकार के पास सत्ता है, संसाधन हैं, विभाग है, अधिकारी हैं और बजट है. उसे किसी सीजेपी कार्यकर्ता से बहस करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए. उसे सिर्फ अपना काम दिखाना चाहिए.

विरोध करने वालों को दुश्मन सम झना आसान है. आरोप लगाने वालों पर एफआईआर करना भी आसान है. कैमरा रोकना आसान है. लेकिन स्कूल ठीक करना मुश्किल है.

स्कूल ठीक करने के लिए बजट चाहिए, टीचर चाहिए, निगरानी चाहिए, जवाबदेही चाहिए और राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए. और शायद इसी वजह से इस पूरे विवाद का सब से बड़ा सवाल यही है कि क्या राजस्थान में बहस स्कूलों की हालत पर होगी या इस बात पर कि स्कूल की हालत दिखाने की इजाजत किसे है?

अगर बहस स्कूल की हालत पर होती है तो बच्चे जीतेंगे. अगर बहस केवल कैमरे और प्रवेश पर अटक जाती है तो राजनीति जीत जाएगी. और सरकार को यह तय करना है कि वह किस के साथ खड़ी होना चाहती है. बच्चों के साथ या व्यवस्था की चुप्पी के साथ?

कैमरा बंद किया जा सकता है. सोशल मीडिया की पोस्ट हटाई जा सकती है. एफआईआर दर्ज की जा सकती है, लेकिन एक सवाल को हमेशा के लिए बंद नहीं किया जा सकता.

स्कूल आखिर कब ठीक होंगे

यही वह सवाल है जिसे सीजेपी ने सड़क और सोशल मीडिया से उठा कर सत्ता के दरवाजे तक पहुंचा दिया है. और अब गेंद सरकार के पाले में है. अगर सरकार को लगता है कि सीजेपी का अभियान राजनीति है तो उसे राजनीति का जवाब राजनीति से देने के बजाय सरकारी स्कूलों की तसवीर बदल देनी चाहिए.

अगर सरकार को लगता है कि सीजेपी गलत तसवीर दिखा रही है तो वह सही तसवीर जनता के सामने रख सकती है. अगर उसे लगता है कि स्कूलों में सबकुछ ठीक है तो स्वतंत्र सामाजिक आडिट के लिए दरवाजे खोलने में उसे संकोच नहीं होना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में सब से मजबूत सत्ता वह नहीं होती जो अपने आलोचकों को चुप करा दे. सब से मजबूत सत्ता वह होती है जो अपने आलोचकों को गलत साबित करने के लिए अपने काम को जनता के सामने रख सके.

आज सीजेपी स्कूल देखने निकली है, कल कोई दूसरा संगठन निकलेगा. उस के बाद कोई अभिभावक निकलेगा. फिर कोई पत्रकार निकलेगा. सवालों को रोका नहीं जा सकता. उन्हें केवल जवाब दिया जा सकता है. और सरकारी स्कूलों के मामले में वह जवाब भाषण नहीं, बदला हुआ स्कूल होना चाहिए.

बच्चों की तसवीर मत रोकिए, उन की बदहाली रोकिए. सवाल पूछने वालों को मत रोकिए, उन समस्याओं को रोकिए जिन के कारण सवाल पैदा होते हैं.

कैमरा बंद करने से सरकारी स्कूलों की दीवारें सीधी नहीं होतीं. दीवारें तब सीधी होती हैं, जब सत्ता सवालों से भागना बंद करती है और स्कूलों को सचमुच ठीक करना शुरू करती है. Social Issue

Social Issue : नेहा बोरा पर स्याही-पौराणिक रिवाज को दोहराना

Social Issue. झारखंड में रांची की सड़कों पर प्रतियोगी परीक्षाओं में तथाकथित धांधली और अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन कर रहे छात्रों के बीच जोकुछ हुआ वह केवल एक छात्र नेता के ऊपर स्याही फेंके जाने की घटना नहीं है. यह घटना उस सोच पर गंभीर सवाल खड़ा करती है जो सवालों का जवाब सवालों से नहीं तर्क का जवाब तर्क से नहीं और असहमति का जवाब संवाद से नहीं देना चाहती.

जब छात्र अपने भविष्य को ले कर सवाल पूछने सड़क पर उतरते हैं और उन के आंदोलन के बीच आल इंडिया स्टूडैंट्स एसोसिएशन की प्रदेश अध्यक्ष नेहा बोरा पर स्याही फेंकी जाती है तो हमें इस घटना को केवल निजी अपमान के रूप में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक असहमति के प्रति बढ़ती असहिष्णुता के लिहाज से भी देखना चाहिए.

नेहा बोरा पर स्याही फेंकने की घटना इसलिए भी खास है, क्योंकि इस के पीछे केवल एक शख्स का गुस्सा नहीं दिखाई देता, बल्कि यह सवाल सामने आता है कि आखिर छात्रों की आवाज से इतनी बेचैनी क्यों है? अगर नेहा गलत हैं तो उन के सवालों का जवाब दिया जाना चाहिए. अगर छात्र आंदोलन की मांगें गलत हैं तो सरकार और प्रशासन को तथ्यों के साथ उन्हें गलत साबित करना चाहिए. अगर परीक्षा में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं हुई है तो जांच के बाद हालात साफ होने चाहिए, लेकिन किसी के चेहरे और कपड़ों पर स्याही डाल देना किसी सवाल का जवाब नहीं हो सकता.

यह घटना हमें इतिहास के एक बहुत पुराने दृश्य की याद दिलाती है. 10वीं सदी में जब सावित्रीबाई फुले लड़कियों को पढ़ाने के लिए घर से निकलती थीं तब उन के रास्ते में भी विरोध खड़ा किया जाता था.

उन पर गोबर और कीचड़ फेंका जाता था. उन का अपराध क्या था? उन का अपराध सिर्फ इतना था कि वे लड़कियों को पढ़ाना चाहती थीं. वे उस सामाजिक सिस्टम को चुनौती दे रही थीं जो मानता था कि पढ़ाईलिखाई पर कुछ लोगों का अधिकार है और लड़कियों को पढ़ने की जरूरत नहीं है. पर सावित्रीबाई ने फुले उस अपमान के सामने अपने कदम नहीं रोके.

उस समय गोबर और कीचड़ फेंका गया था, आज स्याही फेंकी जा रही है. साधन बदल गया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या विरोध की वह मानसिकता आज भी कहीं हमारे बीच मौजूद नहीं है? जब कोई महिला अपने अधिकारों की बात करती है, जब कोई नौजवान सिस्टम से सवाल करता है, जब कोई छात्र अपनी मेहनत और भविष्य की सुरक्षा की मांग करता है और उस के जवाब में उसे अपमानित करने की कोशिश होती है, तो हमें उस सोच को पहचानना होगा जो सवाल से घबराती है.

सावित्रीबाई फुले पर गोबर और कीचड़ फेंकने वाले लोग उस समय शायद यही सम  झते थे कि उन के विरोध से लड़कियों की पढ़ाईलिखाई का रास्ता रुक जाएगा. उन्हें लगता होगा कि अपमान से सावित्रीबाई फुले डर जाएंगी और स्कूल जाना छोड़ देंगी. लेकिन वे इतिहास को नहीं सम  झ पाए. गोबर और कीचड़ उन के कपड़ों पर लगा था, उन के विचारों पर नहीं. उन का रास्ता रोका गया, लेकिन शिक्षा का रास्ता नहीं रुका. उन का अपमान किया गया, लेकिन लड़कियों के पढ़ाईलिखाई के अधिकार का सवाल खत्म नहीं हुआ.

आज नेहा बोरा के साथ हुई घटना को भी इसी ऐतिहासिक संदर्भ में देखना जरूरी है. स्याही उन के चेहरे और कपड़ों पर पड़ी है लेकिन सवाल उन के चेहरे पर नहीं, व्यवस्था के सामने है. स्याही धुल जाएगी. कपड़े बदल जाएंगे. चेहरा साफ हो जाएगा. लेकिन जिन सवालों को ले कर छात्र सड़क पर हैं, वे तब तक बने रहेंगे जब तक उन का जवाब नहीं मिलता.

केवल नेहा का सवाल नहीं है, बल्कि यह हजारों छात्रों का सवाल है. यह उन अभ्यर्थियों का सवाल है जिन्होंने सालों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की है. यह उन परिवारों का सवाल है जिन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए अपनी सीमित आमदनी खर्च की है. यह उन नौजवानों का सवाल है जिन्होंने अपनी उम्र के बहुत अहम साल किताबों के बीच बिताए हैं और इस भरोसे के साथ परीक्षा दी है कि अगर वे मेहनत करेंगे तो उन्हें अपनी योग्यता के आधार पर अवसर मिलेगा.

प्रतियोगी परीक्षा किसी विद्यार्थी के लिए महज कुछ घंटों की परीक्षा नहीं होती. उस के पीछे कई सालों की मेहनत होती है. किसी छोटे शहर या गांव का छात्र अपने घर से निकल कर किराए के कमरे में रहता है. कभी कोचिंग करता है, कभी पुस्तकालय में घंटों बैठता है, कभी पैसे से जुड़ी परेशानियों से जू  झता है. उस के परिवार को उम्मीद होती है कि एक दिन उस की नौकरी लगेगी और घर के हालात बदलेंगे.

ऐसे में यदि परीक्षा प्रक्रिया में कथित अनियमितता की खबर आती है या प्रश्नपत्र, नतीजे या भरती प्रोसैस की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं तो उस का असर केवल एक परीक्षा पर नहीं पड़ता. इस से पूरे परिवार का भरोसा टूटता है. यही वजह है कि रांची में छात्र सड़क पर हैं. उन्हें केवल नौकरी नहीं चाहिए, उन्हें निष्पक्ष अवसर चाहिए.

उन्हें केवल परीक्षा नहीं चाहिए उन्हें ऐसी परीक्षा चाहिए जिस पर उन्हें भरोसा हो. उन्हें केवल नतीजा नहीं चाहिए, उन्हें यह विश्वास चाहिए कि नतीजा उन की मेहनत और योग्यता के आधार पर आया है. और जब यह भरोसा टूटता है तो आंदोलन पैदा होता है.

सरकार को इस आंदोलन को केवल राजनीतिक विरोध के रूप में देखने से बचना चाहिए. किसी आंदोलन में राजनीतिक संगठन शामिल हो सकते हैं. अलगअलग विचारधाराओं के लोग भी हो सकते हैं. लेकिन इस से आंदोलन में उठाए गए हर सवाल को   झूठा नहीं कहा जा सकता. छात्रों की मांगों की जांच होनी चाहिए. जो सही हो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए और जो गलत हो उसे तथ्यों के साथ साफ किया जाना चाहिए.

लोकतंत्र में सरकार का काम केवल कानून व्यवस्था बनाए रखना नहीं है. सरकार का काम नागरिकों की आवाज सुनना भी है खासकर तब जब सड़क पर खड़े लोग राज्य के वही नौजवान हों जिन के भविष्य की जिम्मेदारी आखिरकार उसी सरकार के पास है.

आज छात्र आंदोलन का विरोध करने वाले लोगों को भी यह सम  झने की जरूरत है कि किसी छात्र आंदोलन का विरोध करना अलग बात है और छात्रों के सवालों को ही गलत मान लेना अलग बात. अगर आंदोलन में कोई गलत तरीका अपनाया जा रहा है तो उस की आलोचना कीजिए. अगर कहीं हिंसा होती है तो कानून अपना काम करे. लेकिन शांतिपूर्ण सवालों को ही अपराध की तरह देखना लोकतांत्रिक समाज के लिए खतरनाक संकेत है.

दुख की बात यह है कि आज भी हमारे समाज में ऐसी सोच दिखाई देती है जो सवाल पूछने वाले को दुश्मन सम  झने लगती है. जो छात्र परीक्षा की पारदर्शिता मांगता है, उसे राजनीतिक कह दिया जाता है. जो पत्रकार सवाल पूछता है, उसे पक्षपाती कह दिया जाता है.

जो लेखक सत्ता की आलोचना करता है, उसे विरोधी बता दिया जाता है. जो महिला अपने अधिकारों की बात करती है, उसे अपमानित करने की कोशिश की जाती है. यही सोच लोकतंत्र के लिए सब से बड़ा खतरा है.

सावित्रीबाई फुले के समय में भी यही हुआ था. वे लड़कियों को पढ़ाने निकलीं तो कहा गया कि वह समाज को बिगाड़ रही हैं. आज जब छात्र अपनी परीक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने की मांग कर रहे हैं तो उन्हें भी तरहतरह के नाम दिए जा रहे हैं. तब सावित्रीबाई के ऊपर गोबर और कीचड़ फेंका गया था, आज नेहा पर स्याही फेंकी गई है. तब भी सवाल शिक्षा का था, आज भी सवाल शिक्षा और भविष्य का है. तब भी एक महिला को अपने रास्ते से हटाने की कोशिश हुई थी, आज भी एक महिला की आवाज को अपमानित करने का प्रयास हुआ है.

समय बदला है, साधन बदले हैं, लेकिन असहमति को दबाने की सोच यदि कायम है तो हमें उस पर गंभीरता से विचार करना होगा. हालांकि यह भी जरूरी है कि किसी घटना के लिए बिना सुबूत किसी पूरे समूह या विचारधारा को जिम्मेदार न ठहराया जाए.

स्याही फेंकने वाले की निजी जिम्मेदारी और उस के पीछे की वास्तविक मंशा की जांच कानून और तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए. लेकिन इस घटना ने जिस सोच की ओर ध्यान खींचा है, उस पर बहस करना बिलकुल जरूरी है कि क्या हम ऐसा समाज बना रहे हैं जहां सवाल पूछने वाले को जवाब देने के बजाय अपमानित किया जाता है?

यदि हां, तो यह केवल नेहा बोरा की समस्या नहीं है. यह हम सब की समस्या है, क्योंकि आज जिस सवाल को आप पसंद नहीं करते, कल वही सवाल आप के दरवाजे पर खड़ा हो सकता है. आज किसी दूसरे विद्यार्थी की परीक्षा में गड़बड़ी का सवाल है. कल आप के बच्चे की परीक्षा का सवाल हो सकता है. आज किसी दूसरे की नौकरी का सवाल है. कल आप के घर के बेरोजगार युवा का सवाल हो सकता है, इसलिए निष्पक्ष भरती सिस्टम की मांग किसी एक संगठन की मांग नहीं है. यह हर उस परिवार की मांग है जिस का कोई नौजवान प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है.

सरकार को चाहिए कि वह छात्रों के प्रतिनिधियों से खुले मन से बातचीत करे. जिन परीक्षाओं को ले कर गंभीर आरोप हैं, उन की निष्पक्ष और विश्वसनीय जांच हो. यदि अनियमितता साबित होती है तो जिम्मेदार लोगों पर कठोर एक्शन हो. यदि आरोप गलत साबित होते हैं तो सरकार को तथ्यों के साथ छात्रों को सम  झाना चाहिए. शिकायतों के निबटारे के लिए समयबद्ध व्यवस्था होनी चाहिए.

भरती परीक्षाओं में प्रश्नपत्र की सुरक्षा, परीक्षा केंद्रों की निगरानी, परिणाम प्रक्रिया और शिकायत निवारण को इतना पारदर्शी बनाया जाना चाहिए कि किसी विद्यार्थी को अपनी मेहनत के साथ धोखा होने का डर न रहे, क्योंकि सरकार और नौजवानों के बीच सब से जरूरी चीज भरोसा है.

सरकार कहती है कि पढ़ो, मेहनत करो, परीक्षा दो और काबिलीयत के आधार पर आगे बढ़ो. नौजवान इस बात पर विश्वास कर के अपनी जिंदगी के कई साल लगा देता है. यदि परीक्षा प्रक्रिया ही संदिग्ध हो जाए तो यह पूरा भरोसा टूट जाता है और टूटे हुए भरोसे को पुलिस की लाठी या स्याही से नहीं जोड़ा जा सकता. उसे संवाद, निष्पक्षता और न्याय से ही वापस पाया जा सकता है.

नेहा बोरा पर स्याही फेंकने वाले के खिलाफ कानून अपना काम करे. लेकिन सरकार और समाज को यह भी पक्का करना होगा कि स्याही की घटना छात्रों के मूल सवालों को ढक न दे. कहीं ऐसा न हो कि हम इस बात पर बहस करते रहें कि स्याही किस ने फेंकी और यह भूल जाएं कि हजारों छात्र सड़क पर क्यों उतरे, क्योंकि असली सवाल स्याही नहीं है. असली सवाल परीक्षा व्यवस्था है. असली सवाल बेरोजगार युवाओं का भविष्य है. असली सवाल मेहनत और योग्यता पर भरोसा है. असली सवाल सरकारी भरती की विश्वसनीयता है और असली सवाल यह है कि क्या राज्य अपने युवाओं को यह भरोसा दिला सकता है कि उन की मेहनत बेकार नहीं जाएगी.

नेहा बोरा के ऊपर पड़ी स्याही धुल जाएगी. जिस तरह सावित्रीबाई फुले के कपड़ों पर पड़ा गोबर और कीचड़ समय के साथ मिट गया. उसी तरह यह स्याही भी मिट जाएगी. लेकिन सावित्रीबाई फुले के संघर्ष की कहानी आज भी जिंदा है, क्योंकि उन्होंने अपमान के बाद अपने कदम नहीं रोके थे. उन्होंने लड़कियों को पढ़ाना नहीं छोड़ा था. आज भी यही संदेश जरूरी है. अपमान से आवाज नहीं रुकनी चाहिए.

छात्र आंदोलन को भी अपनी लड़ाई लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ानी चाहिए, क्योंकि आंदोलन की सब से बड़ी ताकत उस की नैतिकता होती है. छात्रों के हाथ में किताब और संविधान होना चाहिए, हिंसा नहीं. उन के पास तथ्य और तर्क होना चाहिए, नफरत नहीं. उन की आवाज में गुस्सा हो सकता है, लेकिन उस गुस्से को लोकतांत्रिक मर्यादा के भीतर रहना चाहिए.

सरकार को भी यह सम  झना होगा कि सड़क पर खड़ा छात्र उस का दुश्मन नहीं है. वह उसी राज्य का नागरिक है. वह उसी राज्य के भविष्य का हिस्सा है. वह आज सवाल पूछ रहा है क्योंकि वह अपने भविष्य को ले कर चिंतित है. उस की चिंता को सुनना सरकार की कमजोरी नहीं, लोकतंत्र की ताकत है.

सावित्रीबाई फुले पर गोबर और कीचड़ फेंकने वाले यह नहीं सम  झ पाए थे कि शिक्षा की राह पर फेंका गया कीचड़ इतिहास के पन्नों को गंदा नहीं कर सकता. आज नेहा पर फेंकी गई स्याही भी उन के सवालों को मिटा नहीं सकती. स्याही धुल जाएगी, सवाल नहीं. कपड़े बदल जाएंगे, विचार नहीं. चेहरा साफ हो जाएगा, लेकिन युवाओं के भविष्य का सवाल अपनी जगह खड़ा रहेगा.

और यदि आज भी वही सोच किसी महिला की आवाज, किसी छात्र के आंदोलन या किसी असहमति को अपमानित कर के दबाने की कोशिश करेगी तो उसे इतिहास से एक बात जरूर सीखनी चाहिए. सवालों को दबाने से सवाल खत्म नहीं होते वे और ज्यादा लोगों की आवाज बन जाते हैं.

एक नेहा बोरा को रोकने की कोशिश करोगे तो दूसरी नेहा सामने आएगी. एक छात्र की आवाज दबाओगे तो हजारों छात्र बोलेंगे. एक आंदोलन को रोकने की कोशिश करोगे तो नए सवाल पैदा होंगे, क्योंकि लोकतंत्र में आवाज दबाने से शांति नहीं आती, केवल बेचैनी बढ़ती है, इसलिए रास्ता एक ही है कि स्याही नहीं, संवाद. अपमान नहीं, तर्क. दमन नहीं, न्याय. और चुप्पी नहीं, जवाबदेही.

सावित्रीबाई फुले ने गोबर और कीचड़ के बीच भी लड़कियों के लिए शिक्षा का रास्ता नहीं छोड़ा था. आज नेहा बोरा पर स्याही फेंकी गई है, लेकिन छात्रों के सवालों का रास्ता भी नहीं रुकना चाहिए, क्योंकि स्याही शरीर पर पड़ सकती है, विचारों पर नहीं. एक आवाज को दबाया जा सकता है, लेकिन हजारों आवाजों को नहीं और जब ये हजारों आवाजें एकसाथ पूछेंगी, ‘हमारी मेहनत का भरोसा कौन देगा?’ तब सत्ता को स्याही नहीं, जवाब देना पड़ेगा.  Social Issue

Hindi Short Story : सरकारी मदद आ रही है

Hindi Short Story. हरि ने मुख्यमंत्री के बड़े से सरकारी घर पर एक नजर डाली, जहां सैकड़ों लोग हाथों में अर्जी लिए खड़े थे.

‘‘सिपाही भैया, आज मुख्यमंत्री जनता दरबार में आएंगे न?’’ एक बुढि़या ने अपनी धुंधली ऐनक और पोपला मुंह पोंछते हुए पूछा. ‘‘पता नहीं,’’ सिपाही से जवाब मिला.

हरि पिछले 3 दिन से इस जनता दरबार में आ रहा था, पर मुख्यमंत्री के पास जनता के लिए समय नहीं था. कतार में घंटों तपने के बाद वह अपनी बीमार बहिन को ले कर लौट जाता था.

हरि ने गमछे से मुंह पोंछा और पैबंदों से भरी छतरी की अधूरी छाया में लेटी कराहती हुई बड़ी बहिन की ओर देखा.

‘‘पानी पीओगी?’’ हरि ने पूछा. बहिन ने सिर हिला कर हामी भरी और हरि प्लास्टिक की मटमैली बोतल का गरम पानी उसे पिलाने लगा.

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‘‘बेटा, यह कौन है?’’ पास बैठी बुढि़या ने फटीमैली धोती के पल्ले से सिर ढकते हुए पूछा.

‘‘मेरी दीदी हैं.’’ ‘‘बीमार हैं?’’ ‘‘बहुत, इसीलिए तो मदद की आस ले कर यहां आया हूं. हमारा गांव यहां से 5 सौ किलोमीटर दूर है.’’

‘‘मैं भी बड़ी दूर से अकेली आई हूं. रेल के डब्बे में दरवाजे के पास 2 दिन बैठ कर यहां तक आ पाई हूं. 2 दिन से कुछ खाने को भी नहीं मिला है.’’

‘‘मेरे पास सत्तू है. आओ, खा लें. मैं भी भूखा हूं.’’ वे दोनों सत्तू बांटने लगे और अपने दुखदर्द भी.

‘‘मेरे बेटेबहू मुझे रोटी तक नहीं देते. मारपीट कर घर से निकाल दिया है. पंचायत वाले विधवा पैंशन भी नहीं दे रहे हैं. रिश्वत मांग रहे हैं. मैं गरीब हूं, रिश्वत कहां से दूं? अब मुझसे मजदूरी  नहीं होती. भूख बरदाश्त नहीं होती. बस, जब तक जिंदा हूं, भटक रही हूं.’’

‘‘मैं भी बड़ा परेशान हूं माताजी. मेरी दीदी को बहुत बड़ी बीमारी है. इलाज में बहुत रुपए लगेंगे. सरकारी मदद मिल जाए, तो मेरी दीदी की जान बच जाएगी. इन के अलावा इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है.’’

अचानक भीड़ में हलचल बढ़ गई. जनता दरबार में आ चुके मंत्रीजी के नजदीक उतावली भीड़ और उसे काबू करने की मशक्कत करते सिक्योरिटी वाले. मुख्यमंत्री सड़क किनारे खड़े लोगों की अर्जियां लेते, समस्या सुनते, अर्जी अपने अफसर को देते और अगले आदमी की ओर बढ़ जाते.

कतार बहुत लंबी थी. पौने घंटे के इंतजार के बाद मुख्यमंत्री हरि के सामने से गुजरे. वह रस्सियों और सिक्योरिटी वालों का घेरा तोड़ता हुआ मुख्यमंत्री के पैरों पर गिर कर रोने लगा.

सिक्योरिटी वाले तो उसे खींच कर अलग कर देते, अगर मुख्यमंत्री ने इशारे से उन्हें रोक न दिया होता.

‘‘रोओ मत बेटा. बताओ, क्या बात है?’’ मुख्यमंत्री ने झुक कर हरि के कंधे पर हाथ रखा. उस ने कांपते हाथों से अपनी अर्जी बढ़ा दी, हाथ जोड़े और डबडबाई आंखों से मुख्यमंत्री को ताकने लगा.

‘‘तो तुम्हारी बहिन बीमार है और उस के इलाज के लिए तुम्हें सरकारी मदद की जरूरत है,’’ मुख्यमंत्री ने हरि के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘तुम चिंता मत करो. तुम्हारी बहिन का इलाज जरूर होगा और उस का पूरा खर्च सरकार उठाएगी.’’

मुख्यमंत्री ने अर्जी पर कुछ लिखा और सचिव को पकड़ाते हुए कहा, ‘‘जितनी जल्दी हो सके, इस को माली मदद मुहैया कराई जाए.’’

हरि ने दीदी को प्रदेश की राजधानी के एक सरकारी अस्पताल के जनरल वार्ड में भरती करा दिया और रोज मुख्यमंत्री के अफसरों से जल्दी मदद की गुजारिश करने लगा.

वह बीमार बहिन को हिम्मत बंधाता, ‘‘मैं बड़ा चंट हूं दीदी. मैं ने मुख्यमंत्री के दफ्तर में इसी अस्पताल का पता लिखा दिया है. सरकारी मदद का रुपया सीधा यहीं तुम्हारे पलंग पर आएगा. बस 2-4 दिन में सरकारी रुपया मिल जाएगा और तुम्हारा औपरेशन हो जाएगा. फिर तुम पहले जैसी भलीचंगी हो जाओगी.’’

इसी इंतजार में 15 दिन बीत गए. एक दिन हरि को सरकारी चिट्ठी मिली, जिस में लिखा था कि मुख्यमंत्री ने उस की बहिन के इलाज के लिए 50 हजार रुपए मंजूर किए हैं और यह रकम जल्दी ही उसे भेजी जाएगी.

15 दिन और बीत गए, पर अब तक सरकारी मदद नहीं मिली थी. आज हरि के वे रुपए भी खत्म हो गए, जो उस ने कुछ गांव वाले से कर्ज के तौर पर उठाए थे. वह चिंता में पड़ गया.

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Sarita

बदबू और भीड़ से भरे जनरल वार्ड में अपनी बहिन के पलंग के निकट मैले फर्श पर फटी चादर बिछा कर लेटे हरि की आंखों में नींद नहीं थी. वह उठ बैठा. उस ने पोटली से मुख्यमंत्री की चिट्ठी निकाली और उसे कई बार पढ़ा, फिर खुद को तसल्ली देते हुए सो गया.

सुबह होते ही हरि अस्पताल से बाहर चला गया और देर शाम मिट्टी, धूल और पसीने में लथपथ लौटा. उसे देखते ही नर्स चीखी, ‘‘ऐ, तू कहां चला गया था? मरीज को क्या हमारे भरोसे छोड़ गया था यहां? न इस के पास दवाएं हैं और न खाना. दिनभर से रो रही है. अगर इसे मारना ही है, तो ले जा यहां से.’’

‘‘सिस्टरजी, मैं मजदूरी करने गया था. ये देखिए, मैं ने पूरे सौ रुपए कमाए हैं. मैं अभी दीदी की दवाएं और खाना खरीद कर लाता हूं,’’ चेहरे के पसीने को मैली शर्ट की आस्तीन से पोंछते हुए वह बोला.

‘‘ऐ सुन…’’  नर्स का लहजा कड़वा था, ‘‘बड़े डाक्टर साहब बहुत नाराज हो रहे थे. अब से अगर तू मरीज को छोड़ कर पूरे दिन के लिए गायब हुआ, तो हम मरीज को बाहर निकाल देंगे.’’

‘‘ठीक है सिस्टरजी, कल से मैं मजदूरी पर नहीं जाऊंगा.’’ कह तो दिया हरि ने, पर अगली सुबह फिर उस के पास रुपए नहीं थे. दीदी के पास बैठा हरि झाड़ू लगाते वार्ड बौय को उदासी से देख रहा था. वह भूखा था.

‘‘भैयाजी, तनिक सुनिए,’’ डरतेडरते वह वार्ड बौय के निकट पहुंचा. ‘‘क्या है?’’ ‘‘लाइए, झाड़ू मैं लगा देता हूं.’’ ‘‘तू क्यों लगाएगा झाड़ू? मेरा काम है, मैं कर लूंगा. भाग यहां से.’’

‘‘भैयाजी, मैं बड़ी सफाई से झाड़ू लगाऊंगा, एकदम बढि़या. बदले में आप मुझे  5 रुपए दे देना. 4 भी दोगे तो चलेगा.’’

वार्ड बौय ने क्षणभर को उस के चेहरे की ओर देखा और उसे झाड़ू पकड़ा दी. हरि ने पूरे वार्ड को अच्छी तरह बुहारा, जिस के एवज में उसे 5 रुपए मिले. उस ने 2 कप चाय खरीदी, एक अपनी बहिन के लिए और दूसरी अपने लिए.

‘‘ऐ सुन…’’ वार्ड बौय ने उसे पुकारा. ‘‘हां, भैयाजी,’’ वह लपका. ‘‘तेरे पास एक भी रुपया नहीं बचा है क्या?’’

‘‘नहीं भैयाजी, तभी तो कल मैं मजदूरी के लिए गया था, पर नर्स ने कहा कि अब अगर मैं पूरे दिन के लिए कहीं गया, तो वे मेरी दीदी को अस्पताल से बाहर कर देंगी.’’

‘‘अगर तुझे  पैसा चाहिए, तो मैं तेरी मदद कर सकता हूं,’’ वार्ड बौय ने कहा. ‘‘आप का बड़ा उपकार होगा.’’

‘‘तुम्हें पूरे एक हफ्ते तक मेरे कहने पर अस्पताल के काम करने होंगे, वह भी डाक्टर की नजर बचा कर. ये सरकारी डाक्टर भी न… खुद तो सरकारी दवाएं चुरा कर बेचते हैं. प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं. मैडिकल वालों से कमीशन खाते हैं और हम गरीबों को नियमों के नाम पर लताड़ते हैं,’’ वार्ड बौय ने अपनी भड़ास निकाली.

‘‘भैयाजी, आप खानेपीने के इंतजाम के बारे में कुछ कह रहे थे.’’

‘‘हां, यहां अस्पताल से बाहर सड़क के दाएं मोड़ से सीधे जा कर बाएं हाथ मुड़ते ही एक खैराती संस्था है, जहां सुबहशाम गरीबों को मुफ्त खाना मिलता है. तू वहां से खाना ले आया कर. आधा खुद खाया कर और आधा अपनी बहिन को खिलाया कर.’’

‘‘भैयाजी, मुसीबत की इस घड़ी में आप ने मुझ गरीब को उबारा है.’’ ‘‘ठीक है, पर तू वह अस्पताल के काम वाली बात मत भूलना.’’

अब हरि सुबहशाम उस खैराती संस्था के बाहर भिखारियों, गरीबों और जरूरतमंदों की लंबी कतार में खड़ा रहता और डेढ़दो घंटे के इंतजार के बाद उसे खाना मिल जाता.

पेट तो जैसेतैसे भर रहा था, पर दीदी की दवाएं? दीदी के बदन पर चांदी के 2-4 जेवर थे, वे हरि ने बेच दिए. इस से कुछ दिनों की दवाओं का इंतजाम तो हुआ.

15 दिन और बीत गए. बेचने को अब दीदी का कोई जेवर न था. 2 दिन से हरि की बहिन बिना दवाओं के कराह रही थी. डाक्टर दवा लाने या मरीज को अस्पताल से ले जाने के लिए कई बार कह चुके थे.

हरि ने अपनी पूरी हिम्मत बटोरी और टैंट के बाहर खड़े भिखारियों के दल में शामिल हो गया.

भीख में उसे एक कटोरा चावल और 3 केले मिले. बहुत दिनों बाद खाने को कुछ स्वादिष्ठ मिला था. वह सारा सामान अपने गमछे में बांध कर अस्पताल में आ गया.

दीदी को गहरी नींद सोते देखना हरि को अच्छा लगा. पिछले 2 दिन से बिना दवाओं के, बीमारी की पीड़ा से उस की बहिन दिनरात कराहती रही थी. लगता है, अब जरा आराम मिला है.

हरि ने गमछा दीदी के सिरहाने रख दिया. जब उठेंगी तो वह उन्हें बताएगा कि खाने में आज क्या है.

हरि जेब से मुख्यमंत्री की चिट्ठी निकाल कर पढ़ने लगा. कितने दिन हो गए यहां पड़ेपड़े, कब आएगी सरकारी मदद? कब होगा दीदी का औपरेशन? कब लौट पाएंगे वे अपने गांव? अचानक हरि को ध्यान आया कि दीदी को सोए बहुत देर हो गई है और वे भूखी होंगी.

‘‘उठो दीदी, कुछ खा लो, फिर सो जाना. देखो तो, मैं क्या लाया हूं.’’

हरि ने 3-4 बार बहिन का हाथ हिलाया, आवाज दी. फिर गौर से देखने लगा, बहिन का चेहरा शांत था. तिलतिल कर मरती देह को हमेशा के लिए छुटकारा मिल चुका था.

हरि कांप गया और अपनी बहिन को झंझोड़  कर जगाने लगा. तभी बड़े डाक्टर साहब के साथ 2-3 अफसर वहां आ गए.

‘‘हरिप्रसाद तुम्हारा ही नाम है? क्या तुम ने ही अपनी बहिन के इलाज के लिए मुख्यमंत्री के यहां अर्जी दी थी?’’ एक अफसर ने हरि से पूछा, पर वह तो जैसे पत्थर का बुत बन गया था.

डाक्टर ने आगे बढ़ कर मरीज की नब्ज देखी. ‘‘यह लड़की तो मर चुकी है,’’ डाक्टर ने कहा.

‘‘क्या?’’ एक अफसर पलभर के लिए चौंका, फिर अगले ही पल वह संभलते हुए बोला, ‘‘ओह, तब तो इस के इलाज के लिए सरकारी मदद का जो चैक हम लाए हैं, उसे वापस ले जाना होगा.’’  Hindi Short Story

-इंदिरा दांगी

Social Issue : करोड़ों के लिए कौडि़यों की लड़ाई

Social Issue. अभी मीडिया बनाम कोचिंग विवाद थमा ही नहीं था कि कोचिंग का आपसी झगड़ा सामने आ गया. वह भी खास पटना में, जो कोचिंग का हब माना जाता है.

एक समय था, जब यहां इंजीनियरिंग और मैडिकल का भी कोचिंग हब था. पर जब नामांकन और डिगरियां आसानी से मिलने लगीं, लोगों का मोह भंग हुआ, तो वे इस से किनारा करने लगे. एक कारण यह भी था कि कोटा और दिल्ली कोचिंग हब बनने लगे थे, तो एक पढ़नेपढ़ाने वालों का एक बड़ा तबका उधर शिफ्ट हो गया था.

मगर बिहार में छोटे पद वालों, जैसे क्लर्क की, टीचर की, सिपाही आदि की नौकरियां तो थीं ही. हाल ही में थोक में बहाली भी हुई, तो अभ्यार्थियों के झुंड के झुंड इधर आने लगे. और अब बारी थी इन के कोचिंग की. कोचिंग वालों ने इधर संभावनाएं देखीं और अपनी सारी ऊर्जा इधर ही लगा दी. और कहना नहीं होगा कि उन्हें अपार सफलता भी मिली है.

मगर इस कोचिंग के चक्कर में हुआ यह है कि कहीं भी गांवदेहात में किसी भी बेनामी स्कूलकालेज में नामांकन ले कर अभ्यर्थी इस कोचिंग के नाम पर हजारोंलाखों की संख्या में पटना में रह रहे हैं. पढ़ाई के नाम पर मूल किताब किसी को पढ़ना नहीं है. कौन उस के पीछे लगे. सभी के हाथ में ग्लौसी पेपर में छपी गाइड, कुंजियां आदि हैं.

हाल यह है कि 50 रुपए की मूल किताब उन्हें महंगी लगती है, मगर 500 की गाइड, कुंजी आदि सस्ती दिखती है. सो, प्रकाशकों की भी बन गई है.

कौन कितना पढ़ रहा है या कौन कितना पढ़ा रहा है, यह बाद की बात है. फिलहाल ध्यान सफलता की तरफ है. और यह सफलता नतीजे से जानी जाती है.

यह सफलता तब दिखती है, जब थोक में बहालियां होती हैं. और तब कोचिंग सैंटर अपना दावा ठोंकने लगते हैं कि अमुक थोक बहाली में उन के इतने स्टूडैंट सफल हुए. उन लोगों की लिस्ट में जिन सफल अभ्यर्थियों के नाम होते हैं, वे सभी में होते हैं. और विवाद यहीं उठ खड़ा होता है कि सही सूची कौन सी है.

लोभी गांव में ठग भूखों नहीं मरते. अभ्यर्थी भी होशियार है. वह यहां भी माल काटना चाहता है, वहां भी गिफ्ट बटोरना चाहता है. वह यह भी देखता है कि कहां कितना बढि़या माल या गिफ्ट हाथ लगने वाला है.

साल 2019 के आगेपीछे यही काम इंजीनियरिंग कोचिंग वाले करते थे. जिन अभ्यर्थियों का नामांकन आईआईटी, एनआईटी आदि में हो जाता था, उसे महंगे मोबाइल फोन से ले कर लैपटौप तक के किट्स उपलब्ध कराए जाने लगे, तो मारामारी मच गई.

उन अभ्यर्थियों को लगने लगा कि बस अब तो हम मैदान मार ही लिया, जबकि उन्हें अभी 5 साल की पढ़ाई के पीछे लाखों रुपए खर्च करने थे. फिर नौकरियों के लिए लाइन में लगना था.

और इस विवाद में कोचिंग वालों की कलई खुलने लगी. अभ्यर्थियों का मोह भंग हुआ, तो कोटा, दिल्ली, पुणे आदि का रुख करने लगे. फिलहाल इंजीनियरिंग कोचिंग का बाजार पटना में मंदा है.

लेकिन छोटी नौकरियों का तो है ही, जो मैट्रिक और इंटर लैवल पर होते हैं. आमतौर पर कहीं भी किसी स्कूलकालेज में एडमिशन करा ये अभ्यर्थी अपने भावअभाव के साथ शहरों में चले आते हैं कोचिंग करने. अभिभावक अपना पेट काट कर उन्हें इन कोचिंगों में पढ़ने के लिए भेजते हैं.

पटना में रहनेपढ़ने का औसतन खर्च प्रति छात्र 10,000 का है. इस का सर्वे दिल्ली प्रैस के कहने पर मैं ने किया था. अंदाज करें कि लाखों छात्रों के पीछे पटना में कितना पैसा आता होगा. अब तो लड़कियां भी इस पढ़ाई के मैदान में ताल ठोंक कर आ रही हैं. सो, पटना में कुकुरमुत्तों की तरह गर्ल्स होस्टल हर गलीमहल्लों में हैं. लड़कों के लौज, होस्टल आदि का कहना ही क्या. सालोंसाल ये पढ़ते ही रहते हैं.

इन लाखों अभ्यर्थियों के पीछे पैसा पानी की तरह बह रहा है, जिस से एक नई अर्थव्यवस्था उपजी है. और इसी अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से को अपने नाम करने के लिए वर्चस्व की लड़ाई है.

‘समय मंथन’ के संपादक सेराज अनवर का सवाल है कि ‘यूट्यूब पर पढ़ाने वाले टीचर्स, जो न्यूज एंकर अंजना ओम कश्यप की एक भद्दी टिप्पणी से तिलमिलाए हुए हैं. ‘गोदी’ मीडिया को आज सत्ता के दलाल, चाटुकार, लोकतंत्र के दुश्मन और न जाने ग़ुस्सा में क्याक्या बता रहे हैं. क्या आप ने अपने बच्चों को लोकतांत्रिक मूल्यों के बारे में कभी पढ़ाया है? धर्मनिरपेक्षता की खूबियां बताई हैं? संविधान पर क्या खतरा है समझाया है? हिंदूमुसलिम एकता क्यों जरूरी है बताया? बेशक, आप ने दारोगा बनाया, एसपीडीएसपी भी बनाया होगा, हजारोंलाखों को नौकरी दिलाई होगी, लेकिन एक सभ्य नागरिक भी उसे बनाया?

‘आप सब के करोड़ोंअरबों फौलोअर्स हैं, तो समाज में नफरत का बीज कौन बो रहा है? उस में आप के लोग भी हैं क्योंकि आपने शिक्षा को रोजगार से, नौकरी से जोड़ दिया. इनसान बनने के बुनियादी टिप्स नहीं दिए वरना समाज इतना जहरीला नहीं होता. एजूकेशन को जब तक सिविलाइजेशन से नहीं जोड़ा जाएगा समाज में दो कौड़ी के लोग ही पैदा होंगे.

‘आप जब पढ़ाते हैं मुसलमान पंचर बनाता है, तो क्लासरूम में बैठा हिंदू दोस्त मुसलिम छात्र को घृणा वाली नजर से देखता है. आप जब मौब लिंचिग पर चुप रहते हैं, तो आप के छात्र की मानसिकता में उथलपुथल चलती है और आगे चल कर उसे जायज समझने लगता है.

आप जब बुलडोजर राज पर एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक के बतौर चुप रहते हैं तो आप के पढ़ाए पुलिस अधिकारी, नौकरशाह और नेता को बल मिलता है. आप जब वोट के अधिकार, गलत और सही का चुनाव करने के गुलाम मानसिकता को नहीं भेद पाते तो सत्ता के दलाल मीडिया को कुछ भी बकने का सेफ पैसेज देते हैं.

‘यह समाज आप का ही बनाया हुआ है मास्टर साहब, जो अब्दुल को टाइट करने को अपना धर्म मानते हैं. यदि आप ने लोकतंत्र, सैकुलरिज्म, संविधान की ताकत को समझायापढ़ाया होता तो किसी अंजना ओम कश्यप को ओछी टिप्पणी करने की जुर्रत नहीं होती.

‘यदि आप ने भारत की साँझा विरासत पढ़ाई होती तो समाज नहीं बंटता. यदि आप गंगाजमुनी संस्कृति की धारा को सकारात्मक रुख देते तो हिंदूमुसलिम में इतना मतभेद नहीं होता. यदि आप एक नौकरीपेशा के साथ छात्रों को एक अच्छा इनसान भी बनाए होते तो देश चमन होता. क्या आप ने यह सब सब्जैक्ट पढ़ाया?

‘आप को भी दरअसल नफरती समाज चाहिए. नफरत बढ़ाने में भी आप यूट्यूब के स्टार टीचरों का योगदान उतना ही है. छात्रों को रट्टूमल बना दिया, लेकिन इनसान नहीं बनाया तो भुगतेगा कौन?’

यहीं पर एक सवाल यह भी कि क्या यह मौजूदा समय में अंजना ओम कश्यप और कोचिंग संस्थानों के बीच जो शीतयुद्ध जैसा माहौल है, वह दरअसल पेपर लीक और सीबीएसई परीक्षा में फैली घटनाओं से ध्यान भटकाने के लिए एक सोचीसमझ  रणनीति तो नहीं है? दोनों एकदूसरे के सहयोगी और चर्चा में बने रहने के लिए इस तरह के स्टंट करते रहते हैं.

मूल सवाल यह है कि शिक्षा की गिरती साख को ले कर व्यापक प्रतिरोध कैसे खड़ा हो? शिक्षा मंत्रालय के दफ्तर में लगी आग क्या मात्र एक आपदा है या कुछ और? इस पर विचार करने की जरूरत है.

Social Issueआईआईटी एडवांस में पहली रैंक लाने वाले शुभम कुमार को बधाई देते हुए फेसबुक पर वाहवाही लूटने वाले नेताओं से क्या यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि मैट्रिक पास करने के बाद वह गयाजी से कोटा पढ़ाई करने क्यों गया? क्या यह बिहार के शिक्षण व्यवस्था की नाकामयाबी का सुबूत नहीं है? उस के रिजल्ट को ले कर मैंटर्स ने जो दावा किया, वह झूठ अब सामने आ रहा है. कोचिंग संस्थानों द्वारा रिजल्ट को बढ़ाचढ़ा कर पेश करते हुए विज्ञापन करना और उस की आड़ में बहुत सारे बच्चों को अपने कोचिंग संस्थानों में नामांकन कराने की पेशकश करना दुर्भाग्यपूर्ण है.

हाल ही में खान सर कोचिंग में हुए हमले पर सारा विवाद सतह पर सामने आ गया. साफ दिखा कि कोचिंग की आपसी होड़ में शिक्षा व्यवस्था की क्या दुर्गति हो रही है. खान कोचिंग ‘ग्लोबल स्टडीज कोचिंग सैंटर’ की ‘ज्ञान बिंदु’ कोचिंग से पुरानी प्रतिस्पर्धा है. मजे की बात यह कि यह दोनों कोचिंग सैंटर पटना के सर्वाधिक सघन इलाके मुसल्लहपुर हाट में अगलबगल ही हैं.

यह प्रतिस्पर्धा जब रंजिश में बदलती है, तो हमले होते हैं. यह हमला किस ने और कैसे किया, यह सब युद्ध स्तर पर पुलिस छानबीन कर ही रही है. सीसीटीवी के फुटेज तलाशे जा रहे हैं, बयान लिए जा रहे हैं. सो, सहीगलत का फैसला सामने आ ही जाएगा.

मगर इस चक्कर में कोचिंग उद्योग का सच सामने आ रहा है. 2 जून को अफवाह फैली कि गोलियां चली हैं, इस से सनसनी फैल गई. खुद खान सर ने आगे बढ़ कर यह दावा किया. हालांकि वे अगले दिन इस बयान से मुकर गए.

खान सर ने जो बयान दिया था उस के मुताबिक, रात के 10 बज रहे थे और औनलाइन बैच चल रहे थे. उन्होंने कहा था कि सिक्योरिटी गार्ड को इतना मारा गया कि उस का सिर फोड़ दिया. हमलावर बोल रहे थे कि 2 दिन के अंदर कोचिंग सैंटर को उड़ा देंगे. उन का कहना था कि वह यहां बच्चों को पढ़ाते हैं और अच्छे रिजल्ट देते हैं.

ऐसा हमला करना बचकाना हरकत है. गार्ड बोल रहा था कि दूसरी कोचिंग वाले लोग ही हमला करने आए थे. सीसीटीवी में सभी का चेहरा नजर आया है और नामजद एफआईआर दर्ज कराई गई है.

उन्होंने यह भी दावा किया था कि कोचिंग सैंटर में बम भी चलाया गया है. जल्द ही आरोपियों की गिरफ्तारी होगी. उन्होंने अन्य कोचिंग सैंटर्स के संचालकों पर हमला बोलते हुए कहा था कि शिक्षक के भेष में यहां व्यापारी घुसे रहते हैं.

हालांकि, बाद में पटना पुलिस के बड़े अधिकारियों के पहुंचने के बाद खान सर ने गोलीबारी वाला बयान बदल दिया था. उन्होंने कहा था कि उस समय ऐसा माहौल हो गया था कि कुछ समझ  में नहीं आया. पुलिस से अनुरोध है कि सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए.

खान सर ने बताया कि गार्ड को घसीट कर ले जा कर मारा गया. पता नहीं टारगेट कौन था, बीच में गार्ड मिला तो उसे मार दिया. गार्ड को इतनी चोट लगी है कि वह अभी कुछ बताने कि हालत में नहीं है. अभी हमारी प्राथमिकता यह है कि गार्ड ठीक हो जाए.

‘क्या सैंटर पर गोली चली थी?’ पत्रकारों के इस सवाल पर खान सर नाराज हो कर बोले, ‘‘हम लोग यहां लड़ाई झगड़ा के लिए नहीं बैठते. पुलिस जांच कर रही है. हमारे गार्ड को घसीट कर बहुत मारा गया है. जब वह सही होगा, तो बताएगा. कोचिंग सैंटर पर हमला कर बच्चों का मनोबल तोड़ने की कोशिश की गई है, लेकिन कोई ऐसा नहीं कर पाएगा.

‘‘कोई भी कोचिंग वाला ऐसा करता है, क्या कोई सोच सकता है? पर हम लोग कम पैसे में ही पढ़ाएंगे. क्या शिक्षा का हक केवल अमीर का है?’’

खान सर का कहना था कि हमारी कोशिश यही रहती है कि गरीब से गरीब बच्चे को पढ़ाया जाए और इस में कुछ लोग बाधा बनते हैं. लेकिन हमें प्रशासन पर पूरा भरोसा है. यहां पुलिस प्रशासन ने सजगता दिखाई है. सभी अधिकारी यहां देर रात तक मौजूद थे. पुलिस जल्द

से जल्द कार्रवाई करे और दोषियों को सजा दी जाए. किसी को भी आपसी द्वेष नहीं रखना चाहिए. यहां सुरक्षा मुहैया कराई जाए.

लड़ाई का मुख्य बिंदु क्या था, इस पर प्रकाश डालना उचित होगा. दरअसल, 19,000 सिपाहियों की बहाली हुई थी. सफल प्रतिभागियों को सम्मानित करने के लिए दोनों कोचिंग संस्थानों ने अलगअलग सम्मान समारोह का आयोजन किया था. इस सम्मान समारोह में सम्मानितों की जो सूची थी, उस में बड़ी संख्या में नाम दोनों ही सूची में थे. और इस बात पर दोनो ही समूह आमनेसामने थे.

शाम में ‘ज्ञान बिंदु’ के संचालकों ने पाया कि उन के बैनरहोर्डिंग्स पर खान कोचिंग के बैनरहोर्डिंग्स आदि लगाए हुए हैं. यहीं से उन का गुस्सा फूटा और बैनर हटाओ या फाड़ो अभियान चल गया. हालांकि, 10 बजे रात तक तक तो कार्यक्रम संपन्न हो ही चुके थे. मगर गरमी का दिन, लोग आमतौर पर जल्दी सोते नहीं.

छात्रों का कहना ही क्या, वे झुंड  में उपस्थित थे ही. लोगों को अंदाजा नहीं था कि मामला इतना संगीन हो जाएगा. गुस्से से उफन रहे कुछ लोग बैनरहोर्डिंग्स हटानेफाड़ने के क्रम में ढेलेबाजी भी करने लगे. खान कोचिंग के एक गार्ड ने विरोध किया, तो उस को पकड़ कर जम कर धुनाई कर दी.

वरिष्ठ पत्रकार अनूप सिंह बताते हैं, ‘‘पटना में कोचिंग संस्थानों के बीच वर्चस्व की लड़ाई कोई नई बात नहीं है. हाल की घटनाओं ने एक बार फिर उस दुनिया की तरफ लोगों का ध्यान खींचा है, जहां शिक्षा, प्रतिस्पर्धा, कारोबार, ब्रांडिंग और लोकप्रियता का अनोखा मिश्रण देखने को मिलता है.

‘‘एक समय था जब देश में इंजीनियरिंग और मैडिकल प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के लिए पटना सब से बड़े केंद्रों में गिना जाता था. अनिल परमार, बीके सिंह, भूपेश कुमार जैसे शिक्षकों की कक्षाओं में जगह मिलना ही छात्रों के लिए उपलब्धि मानी जाती थी. इसी दौर में ‘सुपर 30’ का उदय हुआ.

‘‘गरीब छात्रों को आईआईटी तक पहुंचाने के अभियान ने आनंद कुमार को राष्ट्रीय पहचान दिलाई. बाद में ‘सुपर 30’ और उस से जुड़े अन्य संस्थानों के बीच प्रतिस्पर्धा, सफलता का श्रेय लेने की होड़ और प्रचारप्रसार को ले कर कई विवाद भी सामने आए.

‘‘समय बदला और देश का कोचिंग नक्शा भी बदला. कोटा राष्ट्रीय स्तर पर सब से बड़ा कोचिंग हब बन गया, लेकिन पटना की प्रासंगिकता समाप्त नहीं हुई. यहां प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले शिक्षकों की नई पीढ़ी सामने आई. डाक्टर एम. रहमान जैसे शिक्षकों ने लाखों छात्रों के बीच अपनी मजबूत पहचान बनाई.

‘‘फिर आया कोरोना काल. लौकडाउन ने शिक्षा जगत की दिशा ही बदल दी. पहली बार ऐसा हुआ कि कक्षा से ज्यादा महत्व मोबाइल स्क्रीन और इंटरनैट को मिलने लगा. जो शिक्षक डिजिटल प्लेटफार्म को समझ  गए, वे रातोंरात राष्ट्रीय स्तर के ब्रांड बन गए. यूट्यूब, फेसबुक, टैलीग्राम और अन्य सोशल मीडिया मंच नए क्लासरूम बन गए.

‘‘इसी दौर में खान सर जैसे शिक्षक देशभर में चर्चित हुए. लाखों छात्र घर बैठे पढ़ाई करने लगे. शिक्षा सस्ती हुई, पहुंच बढ़ी और कोचिंग संस्थानों की भौगोलिक सीमाएं समाप्त हो गईं. बिहार का शिक्षक राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और यहां तक कि विदेशों में बैठे छात्रों तक पहुंचने लगा. औनलाइन शिक्षा ने शिक्षकों के लिए आय के नए स्रोत भी खोले. फीस के अलावा यूट्यूब विज्ञापन, डिजिटल सदस्यता, ब्रांड सहयोग और सोशल मीडिया की लोकप्रियता भी आय का जरीया बन गई.

‘‘धीरेधीरे कोचिंग संस्थान शिक्षा संस्थान से आगे बढ़ कर ब्रांड में बदलने लगे. बड़े टीवी चैनलों पर शिक्षकों को बुलाया जाने लगा. सोशल मीडिया पर उन की फैन फौलोइंग बनने लगी. कुछ शिक्षक सैलिब्रिटी की तरह पहचाने जाने लगे. शिक्षा और मनोरंजन के बीच की दूरी कम होने लगी. आज पटना का कोचिंग बाजार केवल एक या 2 नामों तक सीमित नहीं है.

‘‘ज्ञान बिंदु, एस मिश्रा, औफिसर्स अकादमी सहित कई संस्थान औनलाइन और औफलाइन दोनों माध्यमों में सक्रिय हैं. दूसरी ओर अनअकैडमी जैसे राष्ट्रीय प्लेटफार्म ने पूरे देश के शिक्षकों और छात्रों को एक मंच पर ला कर प्रतिस्पर्धा को और तीखा बना दिया है.

‘‘इस प्रतिस्पर्धा का एक दूसरा पहलू भी है. रिजल्ट के प्रचार की लड़ाई अब पहले से कहीं अधिक आक्रामक हो चुकी है. किसी परीक्षा में जितनी रिक्तियां होती हैं, उस से कई गुना अधिक सफल छात्रों पर दावा करने के आरोप समयसमय पर लगते रहे हैं. सफल छात्रों को बाइक, बुलेट या अन्य उपहार दे कर सम्मानित किया जाता है. उन की कहानियां वीडियो के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं. सोशल मीडिया पर व्यापक प्रचार किया जाता है ताकि नए छात्रों को आकर्षित किया जा सके.

‘‘वास्तविकता यह है कि कोचिंग उद्योग अब केवल शिक्षा का क्षेत्र नहीं रह गया है. यह एक बड़ा आर्थिक तंत्र बन चुका है, जहां लोकप्रियता, डिजिटल पहुंच, मार्केटिंग और ब्रांड वैल्यू भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है, जितनी पढ़ाई.

‘‘दिलचस्प बात यह है कि जो शिक्षक कभी मुख्यधारा मीडिया और टीवी एंकरों से वैचारिक बहस करते दिखाई देते थे, आज उन्हीं के बीच प्रतिस्पर्धा और टकराव की खबरें सामने आने लगी हैं. इस का कारण केवल व्यक्तिगत मतभेद नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ता हुआ वह बाजार भी है, जिस में लाखों छात्र और करोड़ों रुपए दांव पर लगे हैं.

‘‘पटना का कोचिंग जगत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां शिक्षा, तकनीक और व्यापार तीनों का संगम दिखाई देता है. यह बदलाव अवसर भी ले कर आया है और चुनौतियां भी. अंतत: छात्रों और अभिभावकों के लिए सब से महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि चमकदार प्रचार, वायरल वीडियो और बड़ेबड़े

दावों के बीच वास्तविक गुणवत्ता और परिणाम को कैसे पहचाना जाए, क्योंकि किसी भी शिक्षा व्यवस्था की असली सफलता यूट्यूब के व्यूज, सोशल मीडिया फौलोअर्स या प्रचार अभियानों से नहीं, बल्कि छात्रों के भविष्य से तय होती है.’’

इस कोचिंग सैंटर विवाद में पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज, साक्ष्यों तथा बयानों के आधार पर ‘ज्ञान बिंदु’ के संचालक रोशन आनंद के साथ उन के सहयोगी अभिषेक तथा गौरव को गिरफ्तार कर लिया है. जो भी हो, कुछ दिन सनसनी रहेगी. कोचिंग संस्थान बंद रहेंगे. लेकिन अभिभावक ही नहीं, छात्र भी कुछ सोचने पर मजबूर हो रहे हैं कि क्या ऐसा ही चलता रहेगा? पढ़ाई के नाम पर पटना में मौजमस्ती और गाइडों का सहारा ले कर सफलता कितनी हाथ लगेगी?

शिक्षक, सिपाही, स्टाफ सेलेक्शन कमीशन आदि की परीक्षाएं गांवों और छोटे शहरों के स्कूलकालेज में पढ़ कर भी पास की जा सकती है. अच्छी पढ़ाई घर पर रह कर भी की जा सकती है, यह उन्हें समझना होगा. वह गाइड, कुंजी के बजाय मूल पुस्तकों की ओर बढ़ेंपढ़ें, तो वहां भी सफलता की इबारत लिखी जा सकती है.

Family Problem: मेरा छोटा भाई पैसों के लिए मम्मी पर हाथ उठाने लगा है

Family Problem: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मेरी उम्र 20 साल है और मैं बिहार का रहने वाला हूं. हमारे घर में मेरे मांबाप और हम 2 भाई रहते हैं. मेरा भाई मुझसे छोटा है और उसकी उम्र 17 साल है. मेरा भाई ज्यादातक वक्त अपने दोस्तों के साथ ही बिताता है और देर रात घर आता है. हाल ही में मुझे अपने दोस्तों से पता चला कि मेरा भाई अपने दोस्तों के साथ मिलकर नशे करने लगा है. जब हमें यह पता चला तो मम्मी पापा ने उसे पैसे देना बंद कर दिया. ऐसा करने से वे सबके साथ बद्तमीजी करने लगा और यहां तक की मांबाप का लिहाज किए बिना घर में गालियां भी देने लगा. उसकी गालियों से ही पता चल रहा था कि वे किसी गलत संगत में है. जब 2-3 दिन हमने उसे पैसे नहीं दिए तो उसने जो कदम उठाया जो हम कभी सोच भी नहीं सकते थे. वे मम्मी से पैसे छीनने लगा और जब मम्मी ने नहीं दिए तो उसने मम्मी को धक्का तक दे दिया और पैसे छीन के भाग गया. उसके ऐसा करने से मम्मी को चोट तक आ गई लेकिन उसे इस बात का कोई पछतावा नहीं हुआ. मुझे समझ नहीं आ रहा मैं क्या करूं क्योंकि उसका ऐसा रूप हमने पहले कभी नहीं देखा था.

जवाब –

आज के समय में अक्सर ऐसा सुनने और देखने को मिल रहा है कि बच्चे अपने ही मांबाप पर हाथ उठाने लगे हैं. जहां एक तरफ अब मांबाप यह सोचते हैं कि बच्चों पर हाथ नहीं उठाना चाहिए तो ऐसे में अब उल्टा बच्चे ही यह सब कर रहे हैं और समझ नहीं आता आखिर वे ऐसा सीख कहां से रहे हैं.

आपके भाई की बात की जाए तो आपकी बातों से साफ पता चल रहा है कि वे अपने यारों दोस्तों के साथ अय्याशी और नशा करने में इतना डूब चुका है कि उसे सही और गलत की पहचान ही नहीं रही. जब आप सबने उसे पैसा देने से मना किया तो जाहिर है कि वे नशे नहीं कर पा रहा होगा जिसके चलते जब उसे नशा करने की तलब हुआ तो उसने अपनी ही मां की जान जोखिम में डाल कर पैसे ले भागा.

अभी आप उसे कुछ भी समझाएंगे या फिर मारेंगे भी तो उसे कुछ समझ नहीं आएगा. आप किसी डौक्टर या काउंसलर की सलाह लेकर उसकी काउंसलिंग कराएं और जरूरत पड़े तो उसे नशा मुक्ति केंद्र भी भेजें क्योंकि हो सकता है वे नशे में इस कदर डूब चुका है कि वे क्या कर रहा है उसे खुद समझ नहीं आ रहा. आप उसके दोस्तों के मांबाप के पास भी जा सकते हैं और पूछताछ कर सकते हैं क्योंकि जाहिर है कि उसके दोस्तों के मांबाप भी परेशान होंगे.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर पर 8588843415 भेजें. Family Problem

Social Issue: मेरे छोटे भाई को पैसे चुराने और घर का सामान बेचने की आदत लग गई है

Social Issue: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मेरी उम्र 25 साल है और मेरा एक छोटा भाई है जिस की उम्र 19 साल है. हम मेरठ के रहने वाले हैं. हाल ही में मैं ने नोटिस किया कि मेरा भाई आजकल अपने दोस्तों के साथ कुछ ज्यादा ही घूमने लगा है और खर्चा करने लगा है. उस की पौकेट मनी इतनी कम होने के बावजूद वह इतना खर्चा कैसे कर सकता है. इसी के चलते मैं ने उस के दोस्तों के बात की तो उन्होनें बताया कि मेरे भाई के पास पैसे तो रोज ही होते हैं. जब मैं ने उस पर नजर रखनी शुरू की तो पता चला कि वे आएदिन पापा की पौकेट से पैसे चुराने लगा है. मैं ने उसे इस बात पर खूब डांटा और समझाया भी, साथ ही पापा को बता देने की धमकी भी दी लेकिन वह अभी तक नहीं सुधरा. आएदिन हमारे घर से कोई न कोई चीज गायब हो जाती है और मुझे पूरा शक है कि उसे अब घर की चीजें बेचने की आदत लग गई है. मुझे उसे सुधारने के लिए क्या करना चाहिए?

जवाब –

आप के भाई की उम्र ऐसी है जिस में अकसर लोगों को दोस्तों के साथ घूमनाफिरना, मस्ती करना और ऐयाशी करने की आदत लग जाती है. ऐसे में जब उन के पास पैसे नहीं होते तो वे घर के पैसों और कीमती चीजों को चुराने लगते हैं. आप को ऐसे में सावधान रहना चाहिए, क्योंकि ज्यादा पैसों के लालच में इनसान कुछ भी करने लगता है और इस से नशे करने की आदत भी स्वाभाविक है.

आप को सब से पहले यह बात अपने घर वालों का बतानी चाहिए ताकि वे आप के छोटे भाई पर और उस की हरकतों पर नजर रख सकें. साथ ही, आप उस का पीछा कर के भी देखें की वे कहां जा कर सामान बेचता है और उन पैसों का आखिर करता क्या है, क्योंकि हो सकता है कि उस के दोस्त आप को सारी बात सच न बताएं.

जब आप के पास सारी जानकारी हो तब उसे बैठ के प्यार से समझाएं कि वह जो भी कर रहा है बिलकुल गलत कर रहा है. हमारे मांबाप बहुत ही मेहनत से पैसे कमाते हैं तो उसे खर्च भी हमें सोच समझ कर करना चाहिए और अगर सच में कभी पैसों की जरूरत हो तो मांग कर ले लेने चाहिए.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर पर 8588843415 भेजें. Social Issue

Suicide Story: पत्नी से शराब पीने से रोका तो तेजाब पी कर दी जान

Suicide Story: गुस्सा, लालच और हवस, ये 3 ऐसी भावनाएं हैं जो इनसान को उस की असली पहचान से दूर ले जाती हैं. इस के असर में आ कर इनसान सहीगलत की पहचान भूल जाता है और ऐसे फैसले कर बैठता है जो न केवल उस की जिंदगी को, बल्कि उस के अपने और आसपास के लोगों की जिंदगी को भी बरबाद कर देता है. यही बातें इनसान को मौत के मुंह तक पहुंचा देती हैं, तो कभी उसे अपनी ही जान लेने पर मजबूर कर देती हैं.

ऐसा ही कुछ हुआ उधना के मफत नगर में रहने वाले 60 साल के श्यामराव भाई मणिक बोड़से के साथ, जो सिक्योरिटी गार्ड का काम करते थे. उन्होंने तेजाब पी कर अपनी जान दे दी. इस गलत कदम से उन्होंने न सिर्फ अपनी जिंदगी खत्म कर ली, बल्कि अपने परिवार के बारे में भी एक बार नहीं सोचा.

मीडिया खबरों के मुताबिक, खुदकुशी की वजह उन की पत्नी से होने वाला विवाद था. उन की पत्नी अकसर उन्हें शराब पीने पर डांटती थी और इसी बात से परेशान हो कर उन्होंने यह फैसला लिया. श्यामराव मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे और लंबे समय से अपने परिवार के साथ उधना में रह रहे थे.

इस घटना से एक बात साफ समझ आती है कि गुस्सा इनसान की सोचनेसमझने की ताकत को छीन लेता है. अगर श्यामराव एक पल के लिए ठहर कर अपने परिवार के बारे में सोचते, तो शायद उन्हें यह कदम उठाने की जरूरत ही नहीं पड़ती. आखिर इस खुदकुशी करने से उन्हें हासिल क्या हुआ? वे चाहते तो शराब की लत छोड़ कर अपने परिवार के साथ चैन और सुकून से जी सकते थे, लेकिन उन्होंने अपनी जान दे कर सबकुछ खत्म कर दिया. सच तो यह है कि अगर कोई इनसान शांत मन से एक बार सोच ले कि उस के जाने के बाद उस की पत्नी और बच्चों पर क्या गुजरेगी, तो शायद वह कभी खुदकुशी करने जैसा कदम नहीं उठाएगा. Suicide Story

Superstition: धार्मिक कर्मकांड के चंगुल में नौजवान

Superstition: ‘‘बाबा, अगर यह पूजा करा दूं, तो नौकरी पक्की हो जाएगी न?’’

बिहार की राजधानी पटना के एक बड़े मंदिर के बाहर खड़े 25 साल के रोहित ने पुजारी से यह सवाल किया. बीटैक पास रोहित पिछले डेढ़ साल से नौकरी की तलाश में है. सरकारी इम्तिहान दिए, प्राइवेट इंटरव्यू दिए, लेकिन नतीजा वही, नौकरी नहीं मिली. अब रोहित के भरोसे की आखिरी डोर भगवान और कर्मकांड है.

यह कहानी सिर्फ रोहित की नहीं, बल्कि आज के लाखोंकरोड़ों नौजवानों की है. पढ़ाईलिखाई में अच्छे, तकनीक के इस्तेमाल में आगे, लेकिन जिंदगी की चुनौतियों के सामने जब हार महसूस होती है, तो वे धर्म और कर्मकांड की शरण में चले जाते हैं.

धर्म की ओर लौटते नौजवान

यह विरोधाभास नहीं तो और क्या है कि जो नौजवान इंटरनैट पर रील बनाता है, आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस की बातें करता है, वही मंदिर में मन्नत का धागा भी बांधता है. पटना यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली 22 साल की नेहा कहती है, ‘‘हम पढ़ेलिखे हैं, लेकिन कभीकभी लगता है कि कोई ताकत तो है, जो सब बदल सकती है. शायद पूजा करने से किस्मत भी बदल जाए.’’

मंदिरों में नौजवानों की बढ़ती भीड़ इस का सुबूत है. पूजापाठ के बाद सोशल मीडिया पर फोटो डालना, शिवभक्ति के गानों पर रील बनाना, यूट्यूब पर धार्मिक गुरुओं के प्रवचन सुनना, यह नई पीढ़ी के रूटीन का हिस्सा बन गया है.

बेरोजगारी और निराशा की तरफ

बेरोजगारी इस सोच की सब से बड़ी वजह है. गांव का पढ़ालिखा लड़का जब शहर में स्ट्रगल करता है और नाकाम होता है, तो उस का भरोसा सिस्टम से ज्यादा ‘ऊपर वाले’ पर होने लगता है.

बिहार के औरंगाबाद के 27 साल के विकास की जबानी सुनिए, ‘‘मैं ने एमए किया. 3 बार शिक्षक भरती का फार्म भरा, लेकिन रिजल्ट नहीं आया. अब हर मंगलवार को हनुमानजी के मंदिर में जाता हूं. मन्नत मांगी है कि इस बार नौकरी मिल जाए.’’

आधुनिकता के साथ अंधविश्वास

तकनीकी युग में अंधविश्वास ने भी नए रूप ले लिए हैं. इंस्टाग्राम पर ‘शिवभक्त’ लिखने वाले नौजवान शनिवार को नीबूमिर्च जरूर टांगते हैं. बिल्ली रास्ता काट दे तो कार रोकी जाती है. नया बिजनैस शुरू करने से पहले मुहूर्त देखा जाता है. डाक्टर के इलाज के बाद भी श्रेय मंदिर और मजार को दिया जाता है.

एक रिटायर्ड डाक्टर का कहना है, ‘‘हम इलाज करते हैं, ठीक होना भगवान की मरजी है.’’

जब डाक्टर ही ऐसा मानते हैं, तो आम नौजवान क्या करेगा?

पढ़ेलिखे तबके में भी धार्मिकता की जड़ें

आज इंजीनियरिंग और मैनेजमैंट पढ़े नौजवान भी पत्थर की मूर्तियों से आशीर्वाद मांगते हैं. धार्मिक गुरुओं के प्रवचन, टीवी चैनल और सोशल मीडिया ने इस सोच को और गहरा कर दिया है. ‘संतोषी माता’ फिल्म से संतोषी माता की पूजा शुरू हुई. टीवी पर रामसीता के दर्शन होते ही लोग हाथ जोड़ने लगते हैं.

मुसलिम समाज भी घेरे में

सिर्फ हिंदू नहीं, बल्कि मुसलिम समाज के नौजवान भी धार्मिक कर्मकांडों में ज्यादा सक्रिय हुए हैं. रोजा रखना, मजार पर चादर चढ़ाना, दुआ के लिए ख्वाजा की दरगाह जाना, यह सब नई पीढ़ी की धार्मिक पहचान का हिस्सा बन रहा है.

धार्मिक शिक्षा का बढ़ता असर

मदरसे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरस्वती शिशु मंदिर जैसे संस्थान बचपन से धार्मिक शिक्षा दे रहे हैं. बच्चे मिट्टी की मूर्ति के सामने खड़े हो कर सरस्वती से विद्या मांगते हैं. यह धार्मिकता बड़े होने पर भी बनी रहती है.

मीडिया और धर्म का बिजनैस

धर्म अब उद्योग बन चुका है. टीवी चैनल 24 घंटे प्रवचन, कथा और कीर्तन दिखा रहे हैं. हर जगह बड़े यज्ञ, कीर्तन और प्रवचन हो रहे हैं. सोशल मीडिया पर धार्मिक इंफ्लुएंसर्स करोड़ों के फौलोअर बना चुके हैं.

क्या है समाधान

अंधविश्वास नाम की सामाजिक बीमारी खतरनाक है. जरूरत है वैज्ञानिक सोच विकसित करने की. स्कूलकालेजों में तार्किक और वैज्ञानिक नजरिए की शिक्षा को मजबूत करना होगा. नुक्कड़ नाटक, सैमिनार और वर्कशौप के जरीए गांवों में जागरूकता फैलानी होगी. मीडिया को भी धार्मिक अंधविश्वास के बजाय वैज्ञानिक जानकारी पर फोकस करना होगा.

आज का नौजवान लाभ तो विज्ञान से उठाता है, लेकिन इस का श्रेय ईश्वर और देवीदेवताओं को देता है. अगर हमें एक सजग और प्रगतिशील समाज बनाना है, तो नौजवानों को वैज्ञानिक सोच को विकसित करना होगा.

अगर नौजवानों में यह सोच पैदा नहीं होगी तो धार्मिक अंधविश्वास उन के दिमाग पर नैगेटिव असर डालेगा वे फैसले लेने से डरेंगे. कर्मकांड के चक्कर में अपना पैसा बरबाद करेंगे, जो उन्हें नकारा बना देगा. Superstition

Social Story: आखिर कब तक और क्यों

Social Story: ‘‘क्या बात है लक्ष्मी, आज तो बड़ी देर हो गई आने में?’’ सुधा ने खीज कर अपनी कामवाली से पूछा.

‘‘क्या बताऊं मेमसाहब आप को कि मुझे क्यों देरी हो गई आने में… आप तो अपने कामों में ही लगी रहती हैं. पता भी है मनोज साहब के घर में कैसी आफत आ गई है? उन की बेटी रिचा के साथ कुछ ऐसावैसा हो गया है… बड़ी शांत, बड़े अच्छे तौरतरीकों वाली है.’’

लक्ष्मी से रिचा के बारे में जान कर सुधा का मन खराब हो गया. बारबार उस का मासूम चेहरा उस के जेहन में उभर कर मन को बेधने लगा कि पता नहीं लड़की के साथ क्या हुआ? फिर भी अपनेआप पर काबू पाते हुए लक्ष्मी के धाराप्रवाह बोलने पर विराम लगाती हुई वह बोली, ‘‘अरे कुछ नहीं हुआ है. खेलते वक्त चोट लग गई होगी… दौड़ती भी तो कितनी तेज है,’’ कह कर सुधा ने लक्ष्मी को चुप करा दिया, पर उस के मन में शांति कहां थी…

कालेज से अवकाश प्राप्त कर लेने के बाद सुधा बिल्डिंग के बच्चों की मैथ्स और साइंस की कठिनाइयों को सुलझाने में मदद करती रही है. हिंदी में भी मदद कर उन्हें अचंभित कर देती है. किस के लिए कौन सी लाइन ठीक रहेगी. बच्चे ही नहीं उन के मातापिता भी उसी के निर्णय को मान्यता देते हैं. फिर रिचा तो उस की सब से होनहार विद्यार्थी है.

‘‘आंटी, मैं भी भैया लोगों की तरह कंप्यूटर इंजीनियर बनना चाहती हूं. उन की तरह आप मेरा मार्गदर्शन करेंगी न?’’

सुधा के हां कहते ही वह बच्चों की तरह उस के गले लग जाती थी. लक्ष्मी के जाते ही सारे कामों को जल्दी से निबटा कर वह अनामिका के पास गई. उस ने रिचा के बारे में जो कुछ भी बताया उसे सुन कर सुधा कांप उठी. कल सुबह रिचा अपने सहपाठियों के साथ पिकनिक मनाने गंगा पार गई थी. खानेपीने के बाद जब सभी गानेबजाने में लग गए तो वह गंगा किनारे घूमती हुई अपने साथियों से दूर निकल गई. बड़ी देर तक जब रिचा नहीं लौटी तो उस के साथी उसे ढूंढ़ने निकले. कुछ ही दूरी पर झाडि़यों की ओट में बेहोश रिचा को देख सभी के होश गुम हो गए. किसी तरह उसे नर्सिंगहोम में भरती करा कर उस के घर वालों को खबर की. घर वाले तुरंत नर्सिंगहोम पहुंचे.

अनामिका ने जो कुछ भी बताया उसे सुन कर सुधा स्तब्ध रह गई. अब वह असमंजस में थी कि वह रिचा को देखने जाए या नहीं. फिर अनमनी सी हो कर उस ने गाड़ी निकाली और नर्सिंगहोम चल पड़ी, जहां रिचा भरती थी. वहां पहुंच तो गई पर मारे आशंका के उस के कदम आगे बढ़ ही नहीं रहे थे. किसी तरह अपने पैरों को घिसटती हुई उस के वार्ड की ओर चल पड़ी. वहां पहुंचते ही रिचा के पिता से उस का सामना हुआ. इस हादसे ने रात भर में ही उन की उम्र को10 साल बढ़ा दिया था. उसे देखते ही वे रो पड़े तो सुधा भी अपने आंसुओं को नहीं रोक पाई. ऐसी घटनाएं पूरे परिवार को झुलसा देती हैं. बड़ी हिम्मत कर वह कमरे में अभी जा ही पाई थी कि रिचा की मां उस से लिपट कर बेतहासा रोने लगीं. पथराई आंखों से जैसे आंसू नहीं खून गिर रहा हो.

रिचा को नींद का इंजैक्शन दे कर सुला दिया गया था. उस के नुचे चेहरे को देखते ही सुधा ने आंखों से छलकते आंसुओं को पी लिया. फिर रिचा की मां अरुणा के हाथों को सहलाते हुए अपने धड़कते दिल पर काबू पाते हुए कल की दुर्घटना के बारे में पूछा, ‘‘क्या कहूं सुधा, कल घर से तो खुशीखुशी सभी के साथ निकली थी. हम ने भी नहीं रोका जब इतने बच्चे जा रहे हैं तो फिर डर किस बात का… गंगा के उस पार जाने की न जाने कब से उस की इच्छा थी. इतने बड़े सर्वनाश की कल्पना हम ने कभी नहीं की थी.’’

‘‘मैं अभी आई,’’ कह कर सुधा उस लेडी डाक्टर के पास गई, जो रिचा का इलाज कर रही थी. सुधा ने उन से आग्रह किया कि इस घटना की जानकारी वे किसी भी तरह मीडिया को न दें, क्योंकि इस से कुछ होगा नहीं, उलटे रिचा बदनाम हो जाएगी. फिर पुलिस के जो अधिकारी इस की घटना जांचपड़ताल कर रहे हैं, उन की जानकारी डाक्टर से लेते हुए सुधा उन से मिलने के लिए निकल गई. यह भी एक तरह से अच्छा संयोग रहा कि वे घर पर थे और उस से अच्छी तरह मिले. धैर्यपूर्वक उस की सारी बातें सुनीं वरना आज के समय में इतनी सज्जनता दुर्लभ है.

‘‘सर, हमारे समाज में बलात्कार पीडि़ता को बदनामी एवं जिल्लत की किनकिन गलियों से गुजरना पड़ता है, उस से तो आप वाकिफ ही होंगे… इतने बड़े शहर में किस की हैवानियत है यह, यह तो पता लगने से रहा… मान लीजिए अगर पता लग जाने पर अपराधी पकड़ा भी जाता है तो जरा सोचिए रिचा को क्या पहले वाला जीवन वापस मिल जाएगा? उसे जिल्लत और बदनामी के कटघरों में खड़ा कर के बारंबार मानसिक रूप से बलात्कार किया जाएगा, जो उस के जीवन को बद से बदतर कर देगा. कृपया इसे दुर्घटना का रूप दे कर इस केस को यहीं खारिज कर के उसे जीने का एक अवसर दीजिए.’’

सुधा की बातों की गहराई को समझते हुए पुलिस अधिकारी ने पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया. वहां से आश्वस्त हो कर सुधा फिर नर्सिंगहोम पहुंची और रिचा के परिवार से भी रोनाधोना बंद कर इस आघात से उबरने का आग्रह किया.

शायद रिचा को होश आ चुका था. सुधा की आवाज सुनते ही उस ने आंखें खोल दीं. किसी हलाल होते मेमने की तरह चीख कर वह सुधा से लिपट गई. सुधा ने किसी तरह स्वयं पर काबू पाते हुए रिचा को अपने सीने से लगा लिया. फिर उस की पीठ को सहलाते हुए कहा, ‘‘धैर्य रख मेरी बच्ची… जो हुआ उस से बुरा तो कुछ और हो ही नहीं सकता, लेकिन इस से जीवन समाप्त थोड़े हो जाता है? इस से उबरने के लिए तुम्हें बहुत बड़ी शक्ति की आवश्यकता है मेरी बच्ची… उसे यों बेहाल हो कर चीखने में जाया नहीं करना है… जितना रोओगी, चीखोगी, चिल्लाओगी उतना ही यह निर्दयी दुनिया तुम्हें रुलाएगी, व्यंग्यवाणों से तुझे बेध कर जीने नहीं देगी.’’

‘‘आंटी, मेरा मर जाना ठीक है… अब मैं किसी से भी नजरें नहीं मिला सकती… सारा दोष मेरा है. मैं गई ही क्यों? सभी मिल कर मुझ पर हसेंगे… मेरा शरीर इतना दूषित हो गया है कि इसे ढोते हुए मैं जिंदा नहीं रह सकती.’’

फिर चैकअप के लिए आई लेडी डाक्टर से गिड़गिड़ा कर कहने लगी, ‘‘जहर दे कर मुझे मार डालिए डाक्टर… इस गंदे शरीर के साथ मैं नहीं जी सकती. अगर आप ने मुझे मौत नहीं दी तो मैं इसे स्वयं समाप्त कर दूंगी,’’ रिचा पागल की तरह चीखती हुई बैड पर छटपटा रही थी.

‘‘ऐसा नहीं कहते… तुम ने बहुत बहादुरी से सामना किया है… मैं कहती हूं तुम्हें कुछ नहीं हुआ है,’’ डाक्टर की इस बात पर रिचा ने पथराई आंखों से उन्हें घूरा.बड़ी देर तक सुधा रिचा के पास बैठी उसे ऊंचनीच समझाते हुए दिलाशा देती रही लेकिन वह यों ही रोतीचिल्लाती रही. उसे नींद का इंजैक्शन दे कर सुलाना पड़ा. रिचा के सो जाने के बाद सुधा अरुण को हर तरह से समझाते हुए धैर्य से काम लेने को कहते हुए चली गई. किसी तरह ड्राइव कर के घर पहुंची. रास्ते भर वह रिचा के बारे में ही सोचती रही. घर पहुंचते ही वह सोफे पर ढेर हो गई. उस में इतनी भी ताकत नहीं थी कि वह अपने लिए कुछ कर सके.

रिचा के साथ घटी दुर्घटना ने उसे 5 दशक पीछे धकेल दिया. अतीत की सारी खिड़कियां1-1 कर खुलती चली गईं…

12 साल की अबोध सुधा के साथ कुछ ऐसा हुआ था कि वह तत्काल उम्र की अनगिनत दहलीजें फांद गई थी. कितनी उमंग एवं उत्साह के साथ वह अपनी मौसेरी बहन की शादी में गई थी. तब शादी की रस्मों में सारी रात गुजर जाती थी. उसे नींद आ रही थी तो उस की मां ने उसे कमरे में ले जा कर सुला दिया. अचानक नींद में ही उस का दम घुटने लगा तो उस की आंखें खुल गईं. अपने ऊपर किसी को देख उस ने चीखना चाहा पर चीख नहीं सकी. वह वहशी अपनी हथेली से उस के मुंह को दबा कर बड़ी निर्ममता से उसे क्षतविक्षत करता रहा.

अर्धबेहोशी की हालत में न जाने वह कितनी देर तक कराहती रही और फिर बेहोश हो गई. जब होश आया तो दर्द से सारा बदन टूट रहा था. बगल में बैठी मां पर उस की नजर पड़ी तो पिछले दिन आए उस तूफान को याद कर किसी तरह उठ कर मां से लिपट कर चीख पड़ी. मां ने उस के मुंह पर हाथ रख कर गले के अंदर ही उस की आवाज को रोक दिया और आंसुओं के समंदर को पीती रही. बेटी की बिदाई के बाद ही उस की मौसी उस के सर्वनाश की गाथा से अवगत हुई तो अपने माथे को पीट लिया. जब शक की उंगली उन की ननद के 18 वर्षीय बेटे की ओर उठी तो उन्होंने घबरा कर मां के पैर पकड़ लिए. उन्होंने भी मां को यही समझाया कि चुप रहना ही उस के भविष्य के लिए हितकर होगा.

हफ्ते भर बाद जब वह अपने घर लौटी तो बाबूजी के बारबार पूछने के बावजूद भी अपनी उदासी एवं डर का कारण उन्हें बताने का साहस नहीं कर सकी. हर पल नाचने, गाने, चहकने वाली सुधा कहीं खो गई थी. हमेशा डरीसहमी रहती थी.

आखिर उस की बड़ी बहन ने एक दिन पूछ ही लिया, ‘‘बताओ न मां, वहां सुधा के साथ हुआ क्या जो इस की ऐसी हालत हो गई है? आप हम से कुछ छिपा रही हैं?’’

सुधा उस समय बाथरूम में थी. अत: मां उस रात की हैवानियत की सारी व्यथा बताते हुए फूट पड़ी. बाहर का दरवाजा अंदर से बंद नहीं था. बाबूजी भैया के साथ बाजार से लौट आए थे. मां को इस का आभास तक नहीं हुआ. सारी वारदात से बाबूजी और भैया दोनों अवगत हो चुके थे और मारे क्रोध के दोनों लाल हो रहे थे. सब कुछ अपने तक छिपा कर रख लेने के लिए बाबूजी ने मां को बहुत धिक्कारा. सुधा बाथरूम से निकली तो बाबूजी ने उसे सीने से लगा लिया.

बलात्कार किसी एक के साथ होता है पर मानसिक रूप से इस जघन्य कुकृत्य का शिकार पूरा परिवार होता है. अपनी तेजस्विनी बेटी की बरबादी पर वे अंदर से टूट चुके थे, लेकिन उस के मनोबल को बनाए रखने का प्रयास करते रहे.

सुधा ने बाहर वालों से मिलना या कहीं जाना एकदम छोड़ दिया था. लेकिन पढ़ाई को अपना जनून बना लिया था. भौतिकशास्त्र में बीएसी औनर्स में टौप करने के 2 साल बाद एमएससी में जब उस ने टौप किया तो मारे खुशी के बाबूजी के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. 2 महीने बाद उसी यूनिवर्सिटी में लैक्चरर बन गई. सभी कुछ ठीक चल रहा था. लेकिन शादी से उस के इनकार ने बाबूजी को तोड़ दिया था. एक से बढ़ कर एक रिश्ते आ रहे थे, लेकिन सुधा शादी न करने के फैसले पर अटल रही. भैया और दीदी की शादी किसी तरह देख सकी अन्यथा किसी की बारात जाते देख कर उसे कंपकंपी होने लगती थी.

सुधा के लिए जैसा घरवर बाबूजी सोच रहे थे वे सारी बातें उन के परम दोस्त के बेटे रवि में थी. उस से शादी कर लेने में अपनी इच्छा जाहिर करते हुए वे गिड़गिड़ा उठे तो फिर सुधा मना नहीं कर सकी. खूब धूमधाम से उस की शादी हुई पर वह कई वर्षों बाद भी बच्चे का सुख रवि को दे सकी. वह तो रवि की महानता थी कि इतने दिनों तक उसे सहन करते रहे अन्यथा उन की जगह कोई और होता तो कब का खोटे सिक्के की तरह उसे मायके फेंक आया होता.

रवि के जरा सा स्पर्श करते ही मारे डर के उस का सारा बदन कांपने लगता था. उस की ऐसी हालत का सबब जब कहीं से भी नहीं जान सके तो मनोचिकित्सकों के पास उस का लंबा इलाज चला. तब कहीं जा कर वह सामान्य हो सकी थी. रवि कोई वेवकूफ नहीं थे जो कुछ नहीं समझते. बिना बताए ही उस के अतीत को वे जान चुके थे. यह बात और थी कि उन्होंने उस के जख्म को कुरेदने की कभी कोशिश नहीं की.

2 बेटों की मां बनी सुधा ने उन्हें इस तरह संस्कारित किया कि बड़े हो कर वे सदा ही मर्यादित रहे. अपने ढंग से उन की शादी की और समय के साथ 2 पोते एवं 2 पोतियों की दादी बनी.

जीवन से गुजरा वह दर्दनाक मोड़ भूले नहीं भूलता. अतीत भयावह समंदर में डूबतेउतराते वह 12 वर्षीय सुधा बन कर विलख उठी. मन ही मन उस ने एक निर्णय लिया, लेकिन आंसुओं को बहने दिया. दूसरे दिन रिचा की पसंद का खाना ले कर कुछ जल्दी ही नर्सिंगहोम जा पहुंची. समझाबुझा कर मनोज दंपती को घर भेज दिया. 2 दिन से वहीं बैठे बेटी की दशा देख कर पागल हो रहे थे. किसी से भी कुछ नहीं कहने को सुधा ने उन्हें हिदायत भी दे दी. फिर एक दृढ़ निश्चय के साथ रिचा के सिरहाने जा बैठी.

सुधा को देखते ही रिचा का प्रलाप शुरू हो गया, ‘‘अब मैं जीना नहीं चाहती. किसी को कैसे मुंह दिखाऊंगी?’’

सुधा ने उसे पुचकारते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे साथ जो कुछ भी हुआ वह कोई नई बात नहीं है. सदियों से स्त्रियां पुरुषों की आदम भूख की शिकार होती रही हैं और होती रहेंगी. कोई स्त्री दावे से कह तो दे कि जिंदगी में वह कभी यौनिक छेड़छाड़ की शिकार नहीं हुई है. अगर कोई कहती है तो वह झूठ होगा. यह पुरुष नाम का भयानक जीव तो अपनी आंखों से ही बलात्कार कर देता है. आज तुम्हें मैं अपने जीवन के उस भयानक सत्य से अवगत कराने जा रही हूं, जिस से आज तक मेरा परिवार अनजान है, जिसे सुन कर शायद तुम्हारी जिजिविषा जाग उठे,’’ कहते हुए सुधा ने रिचा के समक्ष अपने काले अतीत को खोल दिया. रिचा अवाक टकटकी बांधे सुधा को निहारती रह गई. उस के चेहरे पर अनेक रंग बिखर गए, बोली, ‘‘तो क्या आंटी मैं पहले जैसा जी सकूंगी?’’

‘‘एकदम मेरी बच्ची… ऐसी घटनाओं से हमारे सारे धार्मिक ग्रंथ भरे पड़े हैं… पुरुषों की बात कौन करे… अपना वंश चलाने के लिए स्वयं स्त्रियों ने स्त्रियों का बलात्कार करवाया है. कोई शरीर गंदा नहीं होता. जब इन सारे कुकर्मों के बाद भी पुरुषों का कौमार्य अक्षत रह जाता है तो फिर स्त्रियां क्यों जूठी हो जाती हैं.

‘‘इस दोहरी मानसिकता के बल पर ही तो धर्म और समाज स्त्रियों पर हर तरह का अत्याचार करता है. सारी वर्जनाएं केवल लड़कियों के लिए ही क्यों? लड़के छुट्टे सांड़ की तरह होेंगे तो ऐसी वारदातें होती रहेंगी. अगर हर मां अपने बेटों को संस्कारी बना कर रखे तो ऐसी घटनाएं समाज में घटित ही न हों. पापपुण्य के लेखेजोखे को छोड़ते हुए हमें आगे बढ़ कर समाज को ऐसी घृणित सोच को बदलने के लिए बाध्य करना है. जो हुआ उसे बुरा सपना समझ कर भूल जाओ और कल तुम यहां से अपने घर जा रही हो. सभी की नजरों का सामना इस तरह से करना है मानो कुछ भी अनिष्ट घटित नहीं हुआ है. देखो मैं ने कितनी खूबसूरती से जीवन जीया है.’’

रिचा के चेहरे पर जीवन की लाली बिखरते देख सुधा संतुष्ट हो उठी. उस के अंतर्मन में जमा वर्षों की असीम वेदना का हिम रिचा के चेहरे की लाली के ताप से पिघल कर आंखों में मचल रहा था. अतीत के गरल को उलीच कर वह भी तो फूल सी हलकी हो गई थी.

Social Issue : आबादी की भरमार बेरोजगारी अपार

Social Issue : बढ़ती आबादी भारत के लिहाज से तो और भी बेहद गंभीर मामला है. इस देश की लगातार बढ़ती आबादी देख कर तो यही लगता है कि अगर मैडल मिलने की प्रथा होती तो भारत की झोली में एक गोल्ड मैडल जरूर होता. सब से ज्यादा आबादी वाला देश बनने का गौरव हमारे भारत का सरताज ही होता.

भारत दुनिया में सब से ज्यादा आबादी वाला देश तो बन गया है, लेकिन यहां संसाधनों की बेहद कमी होती जा रही है. आज जिस भी जगह जाओ एक लंबी कतार लगी मिलती है. लगता है, मानो जहां हम जा रहे हैं, वहीं सब से ज्यादा भीड़ उमड़ जाती है, चाहे बात करें एयरपोर्ट की, रेलवे स्टेशन की, अस्पताल की, यहां तक कि घरों के आसपास लगने वाले बाजारों में भी ऐसा लगता है कि सारी जनता वहीं आ जाती है. जहां हम हैं. फोन काल से ले कर रोजगार के मौके तक हर जगह यही सुनने को मिलता है कि ‘कृपया प्रतीक्षा करें’, ‘असुविधा के लिए खेद है’, ‘आप लाइन में हैं’.

आज दुनिया की आबादी 8 अरब है, जबकि साल 1950 में दुनिया की आबादी 2.5 अरब थी. महज चंद दशकों में यह आंकड़ा कहां से कहां पहुंच गया है. अंदाजा है कि साल 2050 तक दुनियाभर की आबादी 10 अरब तक पहुंच जाएगी, जो दुनियाभर में शांति के लैवल को गंभीर चुनौती दे सकती है. वहीं अगर सिर्फ हमारे भारत में देखें, तो 142 करोड़ की आबादी है, जो हमें गंभीर श्रेणी में ले जाता है.

अगर दुनिया में क्षेत्रफल के नजरिए से भारत को देखें, तो यह 7वें पायदान पर है और दुनियाभर का सिर्फ
2.5 फीसदी क्षेत्रफल ही भारत के पास है, लेकिन यह आबादी के नजरिए से सब से पहले नंबर पर है.

एक अंदाजे के मुताबिक, भारत में एक वर्ग किलोमीटर में 438 लोग रहते हैं और बात करें अमेरिका की, तो वहां एक वर्ग किलोमीटर में कुल 37 लोग रहते हैं.

यहां हम तुलना कर सकते हैं कि बढ़ती आबादी के चलते जमीन की कमी आने वाले दिनों में और भी ज्यादा होने वाली है, वहीं बढ़ती आबादी को बुनियादी सुविधाएं जैसे घर, पीने का साफ पानी, दवाएं आदि मुहैया करा पाना सरकार के लिए भी चिंता की बात है.

लेकिन अगर हम सीख लें, तो बहुतकुछ बदल सकता है. भारत की तुलना दूसरे विकसित देशों से करें, तो दक्षिण कोरिया में 527, जापान में 347, सिंगापुर में 8,358, जरमनी में 233 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है, जो बहुत ज्यादा है, लेकिन इन देशों की कामयाबी के पीछे कई वजहें हैं, जैसे कि अच्छी विकास दर, अच्छा शासन, स्थिर व्यवस्था, उच्च शिक्षा व तकनीक कौशल आदि.

भारत में नौजवानों की भरमार है. ऐसे में रोजगार की नजर से देखें, तो इतनी बड़ी आबादी को कामकाजी बनाना सब से बड़ी चुनौती है. नौजवान पीढ़ी का होना हर देश की तरक्की का मूलभूत तरीका है. जिस देश में नौजवान ज्यादा होंगे, उस देश की तरक्की होना मुमकिन है, लेकिन तब जब नौजवान अपनी जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक होंगे.

लेकिन अगर यही नौजवान अपने दिन का ज्यादा से ज्यादा समय सोशल मीडिया पर बिताएंगे, तो कहां से कोई देश तरक्की कर सकेगा, बल्कि यही नौजवान देश की गरीबी की वजह बनेंगे, क्योंकि युवा पीढ़ी हर देश का भविष्य तय करती है.

रोजगार व आबादी के बीच तालमेल बिठाने के लिए कुछ बदलावों की जरूरत है. जरूरी है कि देश को पूंजी प्रधान न बना कर श्रम प्रधान बनाया जाए.

हमारे देश की बड़ी आबादी खेतीबारी पर निर्भर है, तो इस के लिए ज्यादा से ज्यादा काम किया जाए. रोजगार के मामले में सरकारी योजनाओं का हर नौजवान फायदा उठा सके, इस के लिए उसे आसान और कुशलता से कार्यक्रमों की मदद से जागरूक किया जाए.

विकसित देशों का इतिहास खंगालें, तो देश की आबादी या परिवार की तादाद अगर छोटी और पढ़ीलिखी हो, तो वह देश और परिवार ज्यादा तरक्की करता है और वहीं अगर बढ़ती आबादी किसी समुदाय की हो और वह संविधान के कायदेकानून के तहत व्यवस्थित नहीं है, तो उस देश में संसाधनों की लूट, भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी जैसी समस्याएं पैदा होने लगती हैं.

भारत के अच्छे भविष्य के लिए समय की मांग है कि आबादी के बढ़ने से बचने के लिए कड़े कानून बनाए जाएं और जिन का जनता हर हाल में पालन करे और देश की तरक्की में योगदान दे.

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