‘हर हर शंभू’ गाने वाली फरमानी नाज की खुली किस्मत , मिला बिग बॉस 16 से ऑफर

हर हर शंभू गाना गाने वाली फरमानी नाज इन दिनों सुर्खियों में बनी हुई हैं, जहां देखे उनका नाम ही वायरल हो रहा है. उन्हें सलमान खान के चर्चित शो बिग बॉस 16 से ऑफर आया है. सिंगर के भाई फरमान खान ने खुलासा किया है कि उन्हें ऑफर आया है, लेकिन अभी फरमानी सोच विचार कर रही हैं कि इस शो में जाना है कि नहीं.

बता दें कि इस गाने के असली सिंगर अभिलिप्सा पांडा है, फरमानी ने इस गाने को दोबारा गाया था. लेकिन मुस्लिम धर्म से होने के बावजूद उन्होंने शिव जी के गाने को गाया. लेकिन एक मुस्लिम होकर शिव का गाना गाने की वजह से जमकर विवाद हुआ है. मौलाना लोगों के तरफ से फतवा जारी हुआ है.

ये भी खबर है कि फरमानी जल्द हिंदू धर्म को स्वीकार करने वाली हैं. लेकिन फरमानी नाज के भाई फरमान ने साफ किया है कि उन्हें किसी तरह का फतवा नहीं जारी किया गया है. उन्होंने यह भी बताया कि ऐसा कुछ भी नहीं है. हमलोग अपनी लाइफ अपनी तरह से जी रहे हैं.

फरमान ने ये भी बताया कि उनकी बहन कोई भी हिंदू धर्म को अपनाने नहीं जा रही हैं. इसी बात चीत के दौरान फरमान ने बताया कि उनकी बहन को बिग बॉस16 से ऑफर आया है. हालांकि बहन अभी इस बारे में सोच रही है.

वह इस शो में जाने से डर रही हैं कि वहां बहुत लड़ाई होती रहती है, क्योंकि जब हरियाणवी सिंगर सपना चौधरी शो में गई थी तो उनके साथ भी उनके को कंटेस्टेंट ने बहुत बुरा व्यवहार किया था. इस वजह से वो डर रही हैं.

कोरोना काल में भुलाए जा रहे रिश्ते

लेखक- वीरेंद्र कुमार खत्री

कोरोना की दूसरी लहर इतनी ज्यादा खतरनाक साबित हुई कि इनसान तो मरे ही, साथ ही नजदीकी रिश्ते भी मरते दिखे. बिहार में कई ऐसी मौतें हुईं, जिन में मृतक के परिवार के लोगों ने अंतिम संस्कार करने की पहल नहीं की.

पटना समपतचक कछुआरा पंचायत की एक घटना है. कोरोना की भेंट चढ़े पिता की लाश के पास मां को छोड़ कर बेटा और बहू फरार हो गए. मुखिया प्रतिनिधि को इस की जानकारी हुई, तो उन्होंने एंबुलैंस बुलाई और लाश को अंतिम संस्कार के लिए भेजा.

नालंदा स्थानीय बाजार के थाना मोड़ के पास चलतेचलते एक बुजुर्ग की मौत हो गई. बुजुर्ग की बेटी साथ में थी, पर वह वहां से भाग गई. लोगों ने इस की सूचना पुलिस को दी.

इसी तरह औरंगाबाद में पतिपत्नी की कोरोना ने जान ले ली. उन के बेटे व परिजनों ने लाश को हाथ लगाने से भी इनकार कर दिया. इस की जानकारी रैडक्रौस के चेयरमैन को मिली, तो उन्होंने अपने निजी खर्च से एंबुलैंस और  2 लोगों को तैयार कर लाश को श्मशान घाट भिजवाया व दाह संस्कार कराया.

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फुलवारीशरीफ थाना के जानीपुर नगवां डेर के रहने वाले 20 साल के एक नौजवान की मौत हो गई. मौत के बाद घर के एक कमरे में 12 घंटे तक उस की लाश पड़ी रही. कोरोना की आशंका को ले कर किसी ने अंतिम संस्कार करने की पहल नहीं की.

स्थानीय विधायक को सूचना दी गई, तो उन्होंने मृतक के घर पहुंच कर हालात की जानकारी ली. उन्होंने जिला प्रशासन को सूचना दे कर एंबुलैंस मंगा कर लाश को अंतिम संस्कार के लिए भेजा.

औरंगाबाद के मदनपुर पानी टंकी निवासी एक आदमी की कोरोना से मौत के बाद परिजनों ने लाश लेने से इनकार कर दिया. पुलिस प्रशासन ने उस का अंतिम संस्कार कराया.

इस तरह के दर्जनों मामले कोरोना काल की दूसरी लहर में सामने आए जब अपने अपनों से ही कन्नी काटने लगे, जबकि हमारे यहां शुरू से गांवों में देखा गया है कि जीनामरना, शादीब्याह, हारीबीमारी समेत दूसरे कामों में लोग एकदूसरे के साथ खड़े रहते थे.

सामाजिक सरोकार ही भारत की मुख्य ताकत रही है. पर कोरोना ने रिश्तों के बीच ऐसी खाई पैदा कर दी है कि किसी की मौत के बाद कोई सगासंबंधी अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होना चाह रहा है. यहां तक कि कोरोना के सामने खून के रिश्ते छोटे पड़ते जा रहे हैं.

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लाशों को सड़कों, अस्पताल और श्मशान घाटों में छोड़ कर बिना अंतिम क्रिया के ही जा रहे हैं. ऐसे में पुलिस के पास सूचना पहुंच रही है, तो वह अंतिम संस्कार करवा रही है.

भारत में रिश्तों की सब से ज्यादा अहमियत मानी जाती है. पटना सीआईडी विभाग के इंस्पैक्टर अरुण कुमार, हसपुरा के समाजसेवी कौशल शर्मा, राज कुमार खत्री, हैडमास्टर कुलदीप चौधरी, दंत चिकित्सक डाक्टर विपिन कुमार का मानना है कि रिश्ते को सम झने और निभाने में भारत के लोगों का जवाब नहीं है, पर कोरोना काल में परिवार के रिश्तों के धागे कमजोर होते दिख रहे हैं.

पेश की गई मिसाल

बिहार के गया जिले के रानीगंज के तेतरिया गांव में एक 58 साल की औरत की मौत लंबी बीमारी के चलते उस के घर पर ही हो गई थी. मौत की खबर से गांव में सन्नाटा पसर गया. लोगों ने अपनेअपने घरों के दरवाजे बंद कर लिए. कोई उस की अर्थी को कंधा देने को तैयार नहीं था.

ऐसे हालात में रानीगंज के मुसलिम नौजवानों ने अर्थी तैयार करते हुए  हिंदू रीतिरिवाज से उस औरत का दाह संस्कार कर आपसी भाईचारे की मिशाल पेश की.

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अंजलि इब्राहिम और लव जेहाद!

एक मुस्लिम शख्स द्वारा हिंदू लड़की से विवाह का मामला, छत्तीसगढ़ में इन दिनों कुछ इस तरह सरगर्म है की क्या शहर क्या परिवार, क्या हिंदू मुस्लिम और बौद्धिक वर्ग सहित पुलिस और न्यायालय के साथ-साथ राजनीति के धुरंधर इस मामले में इनवौल्व हो चुके हैं.

और सात माह से अंजलि नामक युवती जो 23 वर्ष की है के मानवअधिकारों को ताक में रखकर, सभी अपनी अपनी ढपली, अपना अपना राग भज रहे है  परिणाम स्वरूप अंजलि जो एक तरह से सखी सेंटर में निरुद्ध है को, अपनी आवाज दुनिया को सुनाने की खातिर महात्मा गांधी के…  उपवास, भूख हड़ताल को अपना हथियार बनाना पड़ा. छत्तीसगढ़ के गांधीवादी, डॉक्टर गुलाब राय पंजवानी कहते हैं, यह मामला एक इंसान के अधिकारों का है यह सच भी है साभार ऊपर मानूस सत्य!

शायद इसीलिए गांधी के बताए रास्ते पर चल अंजलि को गूंगे बहरी व्यवस्था को अपनी आवाज सुनाने भूख हड़ताल करनी पड़ी.

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अंजलि इब्राहिम का मामला 23 फरवरी 2018 के बाद सुर्खियां बना .आज देश दुनिया में लव जिहाद के नाम पर छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले का यह मामला एक तरह से छत्तीसगढ़ सरकार और प्रशासन के लिए एक बवंडर बन गया है.

क्या है मामला जानिए

दरअसल, छत्तीसगढ़ के अशोक जैन की 23 वर्षीय पुत्री ने वहीं के एक मुस्लिम शख्स इब्राहिम से आर्य समाज में विवाह कर लिया .इब्राहिम ने विवाह से पूर्व आर्य समाज में अपना धर्म बदल हिंदू बन गया और उसे आर्यन आर्य नाम मिल गया. उसने और अंजलि ने विवाह कर लिया मगर इसके बाद इसे कुछ कतिपय तत्वों ने लव जिहाद का नाम दे दिया.

सनद रहे 2018 में छत्तीसगढ़ में भाजपा की हिंदू हितों की पोषक सरकार थी, तब गली गली में हिंदुत्व की ढोल पीटती संस्थाएं, लोग थे और  शासन-प्रशासन में उनकी पुछपरख भी थी. ऐसे मे अंजलि के पिता अशोक जैन के सक्रिय होते और अंजलि को मनोरोगी निरूपित करने के बाद मामला सरगर्म होने होते चला गया. इब्राहिम जेल चला गया अंजली अशोक जैन के घर पहुंच गई. मामला तब चर्चा में आया जब इब्राहिम ने उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट तक अंजली का मामला लेकर न्याय की गुहार लगाई.

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चूंकि मामले में कई प्रतिष्ठित ताकतें अपना जोर लगा रही थी ऐसे में अंजली का यह मामला पेचीदा होता चला गया और अंततः कोर्ट के आदेश पर अंजलि को स्वतंत्र सोच की खातिर रायपुर के सखी सेंटर में रखा गया है,जहां 20 नवंबर को, उसकी भूख हड़ताल के बाद उसे छोड़ने का निश्चय किया गया है.

भूख हड़ताल से हड़कंप

अंजली बालिग है. देश में संविधान का शासन है. उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय है . यह सब होने के बाद भी एक लड़की किस तरह तमाशा बन  कर दुनिया में भारत के मानव अधिकार हनन की नजीर बन गई यह देखने लायक बात है. एक छोटी सी चीज किस तरह दबाव प्रभाव में अपनी प्राकृतिक, स्वतंत्रता, अस्तित्व को खो बैठती है यह भी अंजली इब्राहिम का विवाह की परते विहूप बन कर हमें नग्न सच दिखा रही हैं.

इस संपूर्ण मामले में अशोक जैन और उसके परिवार की अपनी कुंठा, अधिकार और प्रभाव है. उन्होंने कथित रूप से सात याचिकाएं अदालत में लगा रखी है दूसकी तरफ इब्राहिम आर्य अंजली आर्य है जो एक भारतीय नागरिक की हैसियत से अपनी कथित पत्नी अंजलि को पाना चाहता है और न्यायालय की देहरी पर मत्था टेके हुए हैं.

एक तरफ हिंदुत्व व अतिवादी संगठन है कुछ चेहरे और नाम है  जो इस साधारण से प्रकरण को अपने अपने ढंग से देखते और भूनाने की जुगत में है . तो क्या अंजलि को जीने का हक है… यह बहुत जल्द स्पष्ट होने वाला है या फिर वह भी एक चीड़, पक्षी की भांति दबोच दी जाएगी कैद रखी जाएगी.

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20 नवंबर को प्रशासन द्वारा आम सूचना के अनुसार दिन के 11:00 बजे सखी सेंटर से अंजलि को एक तरह से रिहा कर दिया जाएग . विगत लंबे अरसे से वह यहां कोर्ट के एक आदेश के अनुसार रखी गई थी ताकि स्वतंत्र रूप से सोच विचार कर वह अपने भविष्य का निर्णय स्वयं करें . पिता, परिजनों व इब्राहिम यानी आर्यन आर्य से बहुत दूर. आगे यह स्पष्ट होगा की वह कौन सी डगर जाएगी- क्या 11:00 बजे बाहर आकर वह इब्राहिम का हाथ थामेगी  या फिर अपने पिता के घर जाना पसंद करेगी.

असम में मुसलमानों और दलितों के साथ भेदभाव की शुरुआत

लेखक- दिनकर कुमार

असम में 30 जुलाई, 2019 को राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी का प्रकाशन होने वाला है. राज्य के लाखों भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यकों से नागरिकता छीन कर उन को यातना शिविरों में बंद करने की पूरी तैयारी हो चुकी है और सब से ज्यादा हैरानी की बात यह है कि यह काम उस सर्वोच्च अदालत की देखरेख में पूरा किया जा रहा है, जिस पर संविधान और मानवाधिकार की सुरक्षा की जिम्मेदारी है.

अदालत भी अपने मूल कर्तव्य को भूल कर देश के वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व के साथ जुगलबंदी कर रही है. एक ऐसे प्रयोग के लिए जमीन तैयार की जा रही है जो आने वाले समय में देशभर में आजमाया जा सकता है और एक

ही झटके में अल्पसंख्यकों से नागरिकता छीन कर उन का सामूहिक संहार किया जा सकता है.

देश के नए गृह मंत्री अमित शाह ने चुनावी भाषणों में घुसपैठियों की तुलना दीमक से करते हुए उन को कुचलने की मंशा जाहिर करते हुए कहा था, ‘‘हम पूरे देश में एनआरसी को लागू करेंगे और एकएक घुसपैठिए को निकाल बाहर करेंगे.

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‘‘हम घुसपैठियों को अपना वोट बैंक नहीं मानते. हमारे लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सब से अहम है. हम तय करेंगे कि हर हिंदू और बौद्ध शरणार्थी को भारत की नागरिकता मिले.’’

सत्ता में आते ही अमित शाह ने अपनी घोषणा पर गंभीरता से काम करना शुरू कर दिया है. 30 मई, 2019 को भाजपा सरकार की तरफ से विदेशी (ट्रिब्यूनल) संशोधन आदेश, 2019 जारी कर देश के सभी राज्यों में ऐसे ट्रिब्यूनल बनाने का निर्देश दिया है. इस से साफ संकेत मिलता है कि अमित शाह अगले 5 सालों में एनआरसी के बहाने पूरे देश में नागरिकता छीनने का अभियान शुरू करना चाहते हैं.

इस मुद्दे पर अल्पसंख्यकों के पक्ष में संघर्ष कर रहे नागरिक अधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर का कहना है,

‘‘30 मई को जो आदेश जारी किया गया है, वह नागरिकों की राय लिए बिना ही लोकतंत्र के रूप में भारत के बुनियादी सिद्धांतों को नष्ट करने की साजिश कही जा सकती है. एनआरसी के साथ ही भाजपा पूरे देश में नागरिकता संशोधन विधेयक को भी लागू करना चाहती है. इस के नतीजे भयंकर होंगे और बड़े पैमाने पर लोगों से नागरिकता छीन ली जाएगी.

‘‘एनआरसी और विदेशी ट्रिब्यूनल की जुगलबंदी ने स्थानीय स्तर पर तानाशाही की छूट पैदा की है. इस के बहाने अपने दुश्मनों को ठिकाने लगाना आसान हो जाएगा.

‘‘असल में एनआरसी और विदेशी ट्रिब्यूनल जुड़वां प्रक्रिया है. एनआरसी आप से दस्तावेजों की मदद से नागरिकता साबित करने के लिए कहता है, जबकि ट्रिब्यूनल वह उपकरण है, जो नागरिकता छीनने का काम करता है.’’

गृह मंत्रालय ने विदेशी (ट्रिब्यूनल) संशोधन आदेश, 1962 में 2 नए पैराग्राफ जोड़ कर इंसाफ के सिद्धांत पर ही सवालिया निशान लगा दिया है. अब अगर किसी शख्स को विदेशी होने के शक में गिरफ्तार किया जाता है तो वह सिर्फ ट्रिब्यूनल में ही कुछ नियमों और शर्तों के आधार पर अपील कर सकता है. अब वह ऊंची अदालत में नहीं जा पाएगा.

इस का मतलब यह है कि सेना के पूर्व जवान सानुल्ला ने जिस तरह हाईकोर्ट में जा कर अपनी नागरिकता साबित की और डिटैंशन कैंप से रिहा हो पाए, उस तरह अब कोई शख्स अपनी फरियाद ले कर ऊंची अदालत में नहीं जा पाएगा.

इस तरह ट्रिब्यूनल को असीमित हक दे दिए गए हैं. किसी भी निचली अदालत को इस तरह असीमित हक नहीं दिए गए हैं. नागरिकता के सब से ज्यादा अहम संवैधानिक हक को ले कर ट्रिब्यूनल को मनमानी करने की पूरी छूट दे दी गई है.

असल में केंद्र 31 जुलाई, 2019 से पहले ऐसे 1,000 ट्रिब्यूनल बनाने के लिए असम सरकार की मदद कर रहा है. ट्रिब्यूनल के सदस्य के तौर पर ऐसे लोगों को शामिल किया जा रहा है जो कानून के जानकार नहीं हैं और जिन की काबिलीयत पर भी शक है.

उच्चतम न्यायालय का निर्देश था कि ट्रिब्यूनल में न्यायिक सदस्यों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए, पर हकीकत में ऐसा नहीं हो रहा है. सरकार के नजदीकी लोगों को सदस्य बनाया जा रहा है. इन सदस्यों पर ज्यादा से ज्यादा लोगों को विदेशी साबित करने का दबाव डाला गया है. यही वजह है कि एनआरसी के प्रकाशन से पहले ही सैकड़ों बेकुसूर लोगों को डिटैंशन कैंपों में ठूंस दिया गया है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उस के साथी संगठन मिल कर अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत का माहौल तैयार कर रहे हैं. इसी मुहिम में स्थानीय प्रिंट और इलैक्ट्रोनिक मीडिया भी आग में घी डालने का काम कर रहा है.

अब तक कम से कम 40 लोग यही सोच कर खुदकुशी कर चुके हैं कि अगर उन का नाम एनआरसी में नहीं आएगा तो उन को किन बुरे हालात का सामना करना पड़ेगा.

18 फरवरी, 1983 की सुबह असम की नेली नामक जगह पर 6 घंटे के भीतर तकरीबन 3,000 बंगलाभाषी मुसलमानों की हत्या की गई थी. उस घटना को ‘नेली नरसंहार’ के नाम से याद किया जाता है. अल्पसंख्यकों को डर है कि एनआरसी के प्रकाशन के बाद उस तरह की त्रासदी दोबारा हो सकती है.

‘नेली नरसंहार’ के लिए न तो किसी को जिम्मेदार ठहराया गया था और न ही किसी के खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही हुई थी.

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असम में मुसलमानों पर बारबार

इस तरह के हमले हुए और हर बार ‘बंगलादेशी घुसपैठिए’ का संबोधन दे कर हमले को उचित ठहराया गया. इस तरह का आखिरी हमला मई, 2014 में मानस नैशनल पार्क के पास खगराबाड़ी गांव में किया गया, जहां 20 बच्चों समेत 38 लोगों की हत्या कर दी गई.

इस तरह की हिंसा को राज्य में कट्टर जातीय सोच रखने वालों का समर्थन मिलता रहा है और सरकारी तंत्र भी इस तबके के साथ ही रहा है.

एनआरसी को भी इसी प्रक्रिया का औपचारिक रूप माना जा सकता है,

जिस का मकसद भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यकों की नागरिकता खत्म कर देना है. इस की तुलना अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड टं्रप की अप्रवासन नीति से की जा सकती है जो अल्पसंख्यकों को निशाना बना रही है.                  द्य

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